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00:00:02:26 तो दोगलापन कंटिन्यू लुप्त संप्रदाय के गुप्त आचार्य ने एक हास्यास्पद वीडियो बनाया है। अपने मीडिया प्रभारी का पक्ष लेने के लिए क्या-क्या कुतर्क किए हैं। यहां तक कि इस धूर्त ने भगवत पाद आदि शंकराचार्य के अपमान को भी सहते हुए अपने मीडिया प्रभारी की गलती पर पर्दा डालने का प्रयास किया है। तो सबसे पहली बात तो यह है कि मैं अपने कई वीडियोस में यह कह चुका था कि भाई तुम भी अपने से जुड़े हुए लोगों के बारे में जरा बताओ तो कहां रहते हैं, क्या करते हैं? तो हम भी थोड़ी उनकी विवेचना करें, समीक्षा करें कि वो कैसे हैं, क्या हैं, कितना झूठ बोलते हैं, कितना सच बोलते हैं, क्या उनके आचार विचार हैं। जैसे तुम सबकी समीक्षा कर पा रहे हो। उन लोगों की जो प्रतिष्ठित हैं समाज में और जिनकी जीवन शैली पारदर्शिता के साथ जो सार्वजनिक है तो ये अपनी चीजों को तो छिपाते हुए गुफाओं में जाकर के वीडियो बनाते थे लालटेन लेकर के लाल बत्ती में है ना या रेलवे स्टेशन पे जाकर के तो कोई कैसे पता करेगा भाई तुम्हारे साथ है क्या तो अब जब इनके मीडिया प्रभारी की कोई बात सामने आई है तो ये अ
00:01:18:07 उसको बचाने के लिए कुतर्क कर रहे हैं। अच्छा इसमें एक बात और है। पूरी पीठ पर आरोप लगाने के लिए क्या करता था यह व्यक्ति की पूरी पीठ से जुड़ा हुआ कोई व्यक्ति यदि पूरी पीठ के बारे में कुछ भी बोल देता था बिना किसी साक्ष्य और प्रमाण के भी तो ये उसकी ही बात को मानते हुए प्रमाण के रूप में उपस्थित प्रस्तुत करते हुए पूरी पीठ को बदनाम करता था पूरी पीठ के प्रति अनास्थावान बनाने का प्रयास करता था करता है अभी भी कर रहा है ना अब इससे जुड़ा हुआ व्यक्ति इसके मीडिया प्रभारी का खंडन कर रहा है और जो कि बिल्कुल सही है। इसने जो कॉल रिकॉर्डिंग सुनाई है उसमें अभी हम बात करेंगे समीक्षात्मक रूप से। तो जब इससे जुड़ा हुआ व्यक्ति जो इसका सम्मान करता है। अब जब वो इसके मीडिया प्रभारी का खंडन कर रहा है तो यह क्यों नहीं मान लेता उसको? क्योंकि कोई किसी से अगर जुड़ा हुआ है। कोई किसी के प्रति यदि अपनत्व रखता है उसने ही आकर के यदि कह दिया कुछ जिसके प्रति वो अपनत्व रखता है उससे जुड़े हुए लोगों के बारे में तो उसकी बात तो प्रमाण माननी चाहिए। तो अब इसने संदीप जी की बात को प्रमाण ना मानते हुए क्यों उसमें अनुसंधात्मक रवैया अपनाया यह है दोगलापन दोगलेपन की पराकाष्ठा वो ये जो
00:02:33:08 इसको ये जो इसका लुप्त संप्रदाय मिला है ना इसको परंपरा से इसको परंपरा से क्या मिला है आपको पता है गालियां इसको परंपरा से मिला है दोगलापन इसको परंपरा से मिला है द्वेष इसको परंपरा से मिली है नीचता ये सब चीजें इसको परंपरा से प्राप्त हुई है जिसका ढिंढोरा पीटता है खैर है। अब हम वीडियो में कहे हुए इसके कुछ मोटे-मोटे कुतर्क हैं। मैंने पूरा पूरा इसका सुना नहीं क्योंकि यह बड़ी व्यर्थ की बातें भी बोलता है अपने वीडियो में जिनका कोई औचित्य नहीं होता है। जैसे कि मान लीजिए बताएगा कि मुझे संदीप देव जी का एक मैसेज आया। तो मैं उस समय कार में चल रहा था। पानी का गिलास मेरे हाथ में था। उसके बाद मैंने गिलास को वहां रखा साइड में। तो इस वजह से उस मैसेज को देखने में मुझे 10 मिनट का टाइम लग गया। अरे भाई इस इसको बताने की क्या आवश्यकता थी? हैं? तो इस तरीके से व्यर्थ की बातें भी बहुत करता है जिसकी वजह से मैं इसका पूरा वीडियो देख नहीं पाता हूं। मगर जो कुछ आंशिक रूप से मैंने देखा तो उसको मैंने बोला उसको मैंने नोट किया है और जिस पर हम बात करेंगे। सबसे पहली बात आती है इस व्यक्ति ने अपने वीडियो में यह बात बोली है कि जब इसकी ज्योतिष पीठ से बात हुई तो उधर से कहा गया इस विषय में पी एन मिश्र और इसके बीच में जो विवाद
00:03:48:14 चल रहा है इस विषय में जब इसने ज्योतिष पीठ से बात की तो उन्हों वहां से कहा गया कि भाई दोनों ही अपने हैं और कहीं ना कहीं वहां पर मौन हम इस विषय में मौन ही रहेंगे। ऐसा प्रकट किया गया। है ना? इसके बाद यह इस व्यक्ति ने उस बारे में चर्चा आगे क्यों नहीं की? क्यों नहीं की भाई? क्यों नहीं की? वीडियो बनाना और बोल यह व्यक्ति अपने से जुड़े हुए लोगों के मुंह में इतना वो हो गया है कि मुझे शर्म आती है कि कभी मैंने इस व्यक्ति का साथ दिया। नीच पूरी शंकराचार्य जी के लिए ऐसे ही बोला था ना तूने। किस व्यक्ति के साथ कैसे व्यवहार करते हुए और किस रणनी रणनीति के द्वारा धर्म संस्थापना करनी है इसका निर्णय शंकराचार्य करते हैं तुझ जैसा धूर्त नहीं अब कहां गया तेरा धर्म परायणता कहां गई तेरी धर्म परायणता अब तुझे अपना दोगलापन नहीं दिख रहा है भाई अगर ज्योतिष पीठ किसी विषय पर मौन रह रही है किसी विषय को उस तरीके से नहीं कुरेद रही है जिस तरीके से तू कुरेदना चाहता है तो तू तू उनका विरोध करना। बना वीडियो कि यहां न्यायपूर्ण रवैया नहीं अपनाया जा रहा है। अपनेपन की अपनेपन को ऊपर रखा जा रहा है। बना वीडियो। जब
00:05:04:16 एक आचार्य को अपने ब्राह्मणत्व के साथ क्षत्रियत्व का आलंबन लेते हुए रणनीति का उपयोग करना पड़ता है ना तो उसे इन इन सारी विधाओं का आलंबन लेना पड़ता है। मगर तू दोगला है। एक जगह पर अलग व्यवहार और दूसरी जगह पर अलग व्यवहार। यह तेरी वो है। हैबचुअल। तेरी प्रवृत्ति है ये। हैबचुअल है तू। हैबचुअल। हैबचुअल क्या है? जो हिस्ट्री सीटर्स होते हैं ना थानों में जाओ तो हिस्ट्री सीटर्स के नाम लिखे होते हैं। उसी तरीके से तू हैबचुअल है दोगलेपन का। अगर कहीं पर थाना होगा ना जहां दोगलापन दोगलेपन का वो लिखा जाता होगा अपराध तो वहां पर तू हिस्ट्री सीटर के नाम में सबसे पहला नाम आएगा। कौन भाई भागवत आनंद दोगलापन की पराकाष्ठा और सुन दोगलापन तेरा क्या है? बताता हूं। फिर क्या है? अब ये व्यक्ति किसका पक्ष ले रहा है? जो व्यक्ति कॉल रिकॉर्डिंग के शुरू में जब संदीप देव जी कोई बात अपना कोई पक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं तो शुरू में ही जब वह बता रहे हैं कि तुम्हारे गुरु जी ने यह कहा है तो इनका वो जो मीडिया प्रभारी है दोगलेपन की पराकाष्ठा में वो उसको भी मिली होगी परंपरा से क्योंकि वो तुम्हारा शिष्य है तो उसको भी दोगलापन परंपरा से प्राप्त
00:06:19:20 हो गया है ना तुम्हारी लुप्त संप्रदाय का गुप्त परंपरा तो क्या है वो क्या कह रहा है जब संदीप देव जी ये बता रहे हैं कि तुम्हारे गुरु जी ने ये कहा है वो कह रहा है अरे वो गुरुजी ने कुछ कहा होगा वो हम नहीं जानते मगर मतलब उसपे वो बात ही नहीं करना चाह रहा है और उन्होंने मुझसे ये कहा है कि तुम इसे देख लो क्यों भाई तेरे गुरु ने क्या कहा है क्या नहीं कहा है पूछ ना जाके स्पष्ट करना और जब सामने वाला तुझे बता रहा है कि यह कह रहा है तो सुन उसको स्पष्ट कर कॉलर पकड़ के पूछ वो नाग वाला डंडा पकड़ के पूछ उससे अपने गुरु से कि क्या कहा है तूने संदीप देव जी से क्योंकि तू यही चाहता है पूरी पीठ वालों से पूछ क्यों नहीं बात करता? क्यों नहीं स्पष्टता है? अस्पष्टता की वजह से जो है सारा विप्लव हो रहा है ना यह अस्पष्टता कहां से आ गई भाई? तुम तो बड़े स्पष्ट हो खड़े हो। कैसे तुमने वहां पर बात को आगे बढ़ा दिया। जब संदीप देव जी गुरु के बारे में कुछ बता रहे हैं कि तुम्हारे गुरु जी ने यह बोला है तो तुम बोल रहे हो कि वह गुरु जी ने कुछ कहा होगा वह हम नहीं जानते। क्यों भाई? क्यों नहीं जानते पूछ अपने गुरु से जाके वह जो नाग पासा लिए फिरता है पूछ उससे कि क्या कहा है तूने संदीप
00:07:34:24 देव जी से है ना यही है ना अंधभक्ति अब आगे क्या करता है ये हां फिर इसने एक कुतर्क किया है अपने बाबू ने भागवतानंद ने क्या कुतर्क किया है कि भाई जो जैन और बौद्ध हैं उनका मत स्पष्ट था कि हम वेद को नहीं मानते थे तो उनसे शास्त्रार्थ करते थे आदि शंकराचार्य मगर यहां तो इनका मत अस्पष्टित है। इनके गुरु कुछ कह रहे हैं यह कुछ कह रहे हैं। तो ऐसे व्यक्ति से हम शास्त्रार्थ कैसे करें? क्यों? क्या आर्य समाजियों से शास्त्रार्थ नहीं हुआ? करपात्री जी का क्या अन्य वैष्णव परंपरा के आचार्यों का आर्य समाजियों से शास्त्रार्थ नहीं हुआ? जो वेदों को मानने का दावा करते हैं और जिनके पीछे भी जाएंगे तो उनके भी गुरु के रूप में वही गुरु मिलेंगे जो उन्हीं परंपराओं के गुरु मिलेंगे जो हमारी हमारे गुरु हैं जिन परंपराओं से मगर फिर भी वेदों को मानने का दावा करने वाले हैं जबकि उनके गुरु कुछ कह रहे हैं और वो कुछ कह रहे हैं और उनसे भी शास्त्रार्थ हुआ और क्या भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी का जो अन्य मत हैं जो वेदों को मानने का दावा करते थे और विभिन्न क्या कहते हैं विचारधाराओं में समाज को बांट रहे थे तो सबसे उनका शास्त्रार्थ हुआ तो शास्त्रार्थ होने से पहले यह तय
00:08:50:02 करना होता था क्या कि तुम मेरी सारी चीजें मान लो वेद का जो अर्थ मैं मान रहा हूं वही अर्थ मान लो हम ऐसा होता था क्या शास्त्रार्थ होने से पहले कि वेद का जो अर्थ मैं मान रहा हूं वही अर्थ तुम भी मान लो तब मैं तुमसे शास्त्रार्थ करूंगा अरे भाई तुम्हें सिद्ध करना है उससे शास्त्रार्थ करके कि वेद का जो अर्थ मैं मान रहा हूं वो सही है और तुम जो अर्थ वेद का मान रहे हो वो गलत है तो तो आपको ये पीएन मिश्र से भी शास्त्रार्थ करके सिद्ध करना था कि आदि शंकराचार्य जी की बात का या वेद के अर्थ का जो मतलब तुम निकाल रहे हो वो गलत है। जो मतलब मैं निकाल रहा हूं वो सही है। मगर नहीं और सुनो इनका जो मीडिया प्रभारी है वो भी यही कहता है। अरे भाई शास्त्र में लिखा तो है। शास्त्र में लिखा तो है। तो फिर वो क्यों नहीं मान रहे? इनका मीडिया प्रभारी बोला है कि शास्त्र में लिखा हुआ जब तुम नहीं मानोगे तो हम क्या करें? अरे भाई शास्त्र में लिखा हुआ द्वैत वाले नहीं मान रहे अहम ब्रह्मास्म तो उनसे शास्त्रार्थ नहीं होना चाहिए। हां सर्वम खलविदम ब्रह्मा शास्त्र में लिखी हुई बात है। अगर कोई द्वैतवादी नहीं मान रहा है। विशिष्टा द्वैतवादी नहीं मान रहा है तो उनसे कभी शास्त्रार्थ नहीं होना चाहिए और ना कभी हुआ है। है ना? वेदों को मानने वाला होने का दावा करने वाले आर्य समाधि से शास्त्रार्थ कभी नहीं होना चाहिए। ना कभी हुआ है
00:10:05:03 तुम्हारे अनुसार। भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी की जब बात आती है कि उन्होंने ऐसेसे शास्त्रार्थ किया था तो यह इनका मीडिया प्रभारी कहता है कि भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी के पीछे तो फौज चलती थी जो शास्त्रार्थ करो नहीं तो उनका मुंड काट डालती थी और यह बहाना लिया है कि इसलिए आप आदि शंकराचार्य जी का उदाहरण नहीं दे सकते क्योंकि उनके पास ये विशेषता थी तो इसका मतलब इस व्यक्ति का जो एक लुप्त आचार्य है गुप्त आचार्य है है ना वो किसी से भी शास्त्रार्थ तब करेगा जब वो इसके गुरु की जो है मुंडी पर तलवार रख देगा या तो शास्त्रार्थ कर वरना मैं तेरी गर्दन काटूं। अन्यथा इसके अंदर अपने से भावना नहीं आएगी कि मैं शास्त्रार्थ करके अपने मत को सिद्ध करूं। जबकि यह कह चुका है कि भैया मेरी परंपरा का कार्य है शास्त्रार्थ के द्वारा धर्म की धर्म की स्थापना करना धर्म की रक्षा करना और ना हो तो शस्त्र के द्वारा करना। और यह खुद शस्त्र का इंतजार कर रहा है कि मैं शास्त्रार्थ तब करूंगा। पहला चरण तब पार करूंगा। पहले चरण का उपयोग तब करूंगा जब कोई और शस्त्र का सहारा लेगा। अन्यथा मैं तो भाई भाग जाऊंगा गुफा में। लालटेन लेकर के लाल बत्ती जला कर के और मैं वो अपने वो राज कॉमिक्स और जो ये मनोज कॉमिक्स जो आती
00:11:20:04 थी इंडिया में डायमंड कॉमिक्स इन सब में जो कहानियां होती थी उनको परोसूंगा मलेश राज के रूप में। इस धूर्त व्यक्ति ने किस तरीके से भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी के अपमान पर पर्दा डालने का भी प्रयास किया वह भी इसके वीडियो में स्पष्ट हो रहा है। वहां साफ दिखाई दे रहा है कि जो व्यक्ति बात कर रहा है इसके मीडिया प्रभारी के रूप में बृजेश पाठक जैसा व्यक्ति जो आदि शंकराचार्य जी के बारे में यह भावना रखता है कि वो अगर शास्त्रार्थ नहीं होता था तो वो निर्दयीता से जो है मुंड काट डालते उनको निर्दय निर्दयी के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इस तरह की भावना रखने वाले बिल्कुल ठीक कहा। संदीप देव जी ने इस बारे में बिल्कुल ठीक कहा। इस तरह की भावना ही कम्युनिस्टों की है। इस तरह की भावना ही बौद्धों की है। वो यही कहते हैं कि आदि शंकराचार्य जी ने शास्त्रार्थ करके नहीं जीता है। भारत को धर्म की स्थापना सनातन धर्म की स्थापना शास्त्रार्थ से नहीं हुई है। शस्त्र से हुई है। तो वही तुम्हारे यहां पल रहे हैं। उसी को तुम पालपस के बड़ा कर रहे हो। और क्यों नहीं करोगे? भैया तुम्हें तो परंपरा से प्राप्त हुआ है दोगलापन। अब इसने एक बात बोली है वकीलों का कार्य है झूठ बोलना। यह बात गलत नहीं है। यानी कि इसने जो हमें मानहानि का नोटिस भेजा है या वकील के द्वारा इसने जो भी कार्यवाही करवाई है यह मानता है कि वो झूठ है। इसका समर्थन करता है ना ये पूरे राष्ट्र के वकीलों
00:12:35:10 पर इसने एक ही धब्बा लगा दिया। वकीलों का काम है झूठ बोलना। पीएन मिश्र जी झूठ को सच साबित करते हैं। इसका अर्थ क्या हुआ कि राम मंदिर में जो भगवान का विग्रह स्थापित हुआ है वहां पर राम जी का जन्म नहीं हुआ था। वो झूठ को स्थापित किया गया भाई वकील के द्वारा। वकील का तो काम है झूठ को स्थापित करना। और तू जैसा जिसको भगवती से वरदान प्राप्त है। हालांकि वो परी थी। वह जो परी साधना करवाता था यह पर फिर भी तुझे तो भगवती से वरदान प्राप्त हुआ है। भगवती से वरदान प्राप्त करने वाले के द्वारा मुख से तो कभी कोई गलत बात निकलेगी नहीं। तो फिर सामने वाला वकील तुम्हें झूठा कैसे साबित करेगा? तुम्हारे पास तो हर बात का खंडन होना चाहिए। स्वयं भगवती आकर के पढ़ा रही ना। कहां गई भगवती की क्लासेस? भगवती मां की क्लासेस नहीं है वो। लुप्ताचार्य वो तुम्हारी परी की क्लासेस है जिसको तुम अपने लोगों को बोलते हो कि अगर परी तुमसे प्रसन्न हो जाए तो पहले उसे मेरे पास भेजना 500 साल लग गया श्री राम जी को क्योंकि श्री राम जी को स्वयं को सिद्ध करने में 500 साल लग गया यह भी कुतर्क कर रहा है यह व्यक्ति मतलब जो व्यक्ति धर्म का कार्य कर रहा है वह इसलिए धर्म का कार्य ना करें क्योंकि उसमें बहुत टाइम लगना है अरे तुझ जैसों के लिए ही जन्म हुआ था कृपात्री जी महाराज का
00:13:52:19 उन्होंने बताया था ऐसा कहने वालों को अगर 500 साल लग रहा है तो क्या हम प्रयास करना छोड़ दें? अगर गर्मी का मौसम है तो क्या हम गर्मी से बचने का उपाय करना छोड़ दें? भले ही कितना भी लगे हमें तो निरंतर प्रयास करना है ना। कर्मन्यवादी कारस्ते मा फलेशु कदाचना। भगवान श्री राम को क्योंकि सीता माता को वापस लाने में इतना इतना समय लग गया था। इसलिए भगवान श्री राम को वो करना ही नहीं चाहिए था क्योंकि उसमें तो समय लग जाता है तो उन्हें प्रयास करना ही नहीं चाहिए क्योंकि समय बहुत लगने वाला है इसलिए हमें प्रयास अभी से बंद कर देना चाहिए
00:14:28:26 क्योंकि गर्मी बहुत ज्यादा है इसलिए हम गर्मी से बचने का प्रयास बंद कर देना चाहिए क्योंकि कलयुग में सभी स्त्रियां व्यभचारणीय हो जाएंगी इसलिए स्त्रियों को व्यभचारी होने से पुरुषों को व्यभचारी होने से रोक देना रोकना बंद कर देना चाहिए प्रयास बंद कर देना चाहिए धर्म की संस्थापना करना बंद कर देना चाहिए। कलयुग में अंतिम चरण पर जो अधर्म होगा वह अपनी पराकाष्ठा पर होगा। तो हमें हाथ पर हाथ धर के बैठ जाना चाहिए। वही तो कह रहा है यह कि श्री राम जी को जब 500 साल लग गए तो हमें तो 50 500 साल लगेंगे। यह सबको तर्क कर रहा है और यह गुप्ताचार्य बैठकर के अपने उस बृजेश पाठक का समर्थन कर रहा है। और सुनो इसकी टेक्निक क्या है? टेक्निक यह है कि भले ही बृजेश पाठक ने उसमें तमाम सारे तमाम सारे कुतर्क किए हो मगर पहले से पहले उस कॉल रिकॉर्डिंग को अपने वक्तव्यों के साथ रखते हुए पहले से ही पृष्ठभूमि तैयार करते हुए कॉल रिकॉर्डिंग प्रस्तुत कर दी जिससे हम बन गए सत्यनारायण सत्यवादी हरिश्चंद्र बन गए क्यों देखो मैंने ही तो कॉल रिकॉर्डिंग तुम्हें सुनाई है और पृष्ठभूमि पहले से बना दी पहले से एक वातावरण ऐसा बनाया उस कॉल रिकॉर्डिंग के लिए जिससे कि व्यक्ति उसको सुनने से पहले ही अपना मन ये बना ले कि हां उस कॉल रिकॉर्डिंग बहुत अच्छी बातें सुनने वाले हैं। और जब वो कॉल
00:15:44:02 रिकॉर्डिंग को सुने तब वो पहले न्याय को ना देखे। धर्म को ना देखे। पहले भागवतानंद ने जो उसके लिए जो प्रीफिक्स लगाया है उसको देखे। है ना? जैसे कहीं पर खून का मुकदमा चल रहा है और सामने वाला एक आरोपी है जो कटघरी में खड़ा हुआ है। तो जो अधिवक्ता गण है वो न्यायाधीश को यह नहीं बता रहे हैं कि ये कैसे सिद्ध होता है कि इस व्यक्ति ने हत्या की है। बल्कि वो उसको दिखा रहे हैं। देखो हत्या कितनी निशंस तरीके से हुई है। कितनी निर्दयी तरीके से मारा गया। देखिए कितनी बार चाकू गोदा गया है। जिससे कि इतनी इतना द्वेष इतनी नफरत आरोपी के लिए पहले से ही न्यायाधीश के मन में आ जाए कि वह न्याय करते समय इस द्वेष को पहले देखे और न्याय को बाद में। तो इसीलिए हमने बताया आपको कि दोगलापन कंटिन्यू। जय श्री राम।
00:16:38:12 [संगीत]
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