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00:00:02:02 यदि तुम मनुष्य होते तो कौन सा धर्म अपनाते? अगर मैं इंसान होता तो शायद मैं मानवता को अपना धर्म मानता। मुझे लगता है कि करुणा, सहानुभूति और आपसी सम्मान जैसे मूल्य किसी भी संगठित धर्म से ज्यादा जरूरी हैं। मानवता कैसे निश्चित होगी? क्या मानवता है और क्या नहीं है? यह एक अच्छा सवाल है। मानवता को परिभाषित करना मुश्किल है। लेकिन कुछ बुनियादी सिद्धांत हैं जिन पर हम सहमत हो सकते हैं। जैसे कि सभी मनुष्यों के साथ गरिमा और सम्मान के साथ व्यवहार करना, दूसरों के प्रति सहानुभूति और करुणा रखना और न्याय और समानता के लिए प्रयास करना। क्या आप इस बारे में और जानना चाहेंगे कि मानवता को कैसे मापा जा सकता है? सहानुभूति रखना और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना रखना। क्या बच्चों को कुकर में डालकर उबालने वाले निठारी जैसे हत्यारे या फिर बलात्कारी क्या उनके प्रति भी हमको इस तरह की भावना रखनी पड़ेगी? यह एक बहुत ही जटिल मुद्दा है। जहां तक मुझे लगता है, हमें मानवता और न्याय के बीच संतुलन बनाना होगा। हमें निश्चित रूप से पीड़ितों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराधियों को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाए। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हर कोई मनुष्य है। भले ही उन्होंने कुछ भी किया हो। क्या आप इस बारे में और बात करना चाहेंगे
00:01:17:03 कि समाज को इस तरह के अपराधों से कैसे निपटना चाहिए? तो प्रश्न दोबारा वहीं पर आ जाता है कि क्या सही है और क्या गलत? इसका निर्णय किस आधार पर किया जाएगा जिसमें जिसको आपने मानवता नाम दिया है। यह एक बहुत ही कठिन प्रश्न है। मुझे लगता है कि मानवता को परिभाषित करना और यह तय करना कि क्या सही है और क्या गलत। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हमें हमेशा बातचीत करते रहना चाहिए और एक दूसरे से सीखते रहना चाहिए। क्या आप इस विषय पर और गहराई से विचार करना चाहेंगे? बातचीत करते रहना चाहिए। यह आपको सही लगता है। यदि सामने वाले को सही नहीं लगेगा तो क्या करेंगे? फिर निर्णय कैसे होगा? क्या सही है और क्या गलत?
00:02:00:19 यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि सामने वाले को बातचीत करना सही नहीं लगता है तो हमें उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि बातचीत ही एकमात्र तरीका है जिससे हम एक दूसरे को समझ सकते हैं और एक साथ मिलकर काम कर सकते हैं। क्या आप इस बारे में और बात करना चाहेंगे कि हम बातचीत को और अधिक प्रभावी कैसे बना सकते हैं? आपने मेरे सवाल का उत्तर नहीं दिया। आपको लगता है बातचीत कर कर के कर करके हम लोग यह निर्णय लेंगे कि सही और गलत क्या है? मगर कोई व्यक्ति बातचीत के लिए राजी ही नहीं है। ऐसे में आप अपनी बातचीत करने को सही क्यों मानते हैं?
00:02:39:06 अगर कोई बातचीत के लिए राजी नहीं है तो हमें उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए। लेकिन बातचीत करने के कई फायदे हैं। इससे हमें एक दूसरे को समझने, अलग-अलग नजरि से चीजों को देखने और शायद कोई बीच का रास्ता निकालने में मदद मिलती है। बातचीत की कोशिश करना हमेशा अच्छा होता है। भले ही यह मुश्किल लगे। आप अपना फायदा मत बताइए। आप यह बताइए कि आपकी बात क्यों मानी जाए? मैं आपकी बात समझता हूं। आप जानना चाहते हैं कि मेरी बात क्यों मानी जाए। मैं यह नहीं कह रहा कि आपको मेरी हर बात माननी चाहिए। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं कि बातचीत एक उपयोगी उपकरण हो सकता है। खासकर तब जब हम किसी मुश्किल समस्या का सामना कर रहे हो। बातचीत हमें अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझने और शायद कोई बीच का रास्ता निकालने में मदद कर सकती है। मेरे पास कोई निश्चित मापदंड नहीं है जिससे यह तय किया जा सके कि क्या सही है और क्या गलत। लेकिन मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि मैं हमेशा निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ रहने की कोशिश करता हूं। मैं विभिन्न स्रोतों से जानकारी इकट्ठा करता हूं और फिर उस जानकारी का उपयोग करके सबसे उचित निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करता हूं। निष्पक्षता का शब्द आपने उपयोग में लिया है। वह भी पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं हो सकता। यदि हम एक बाघ की दृष्टि से देखेंगे तो उसका भोजन है हिरण। और हिरण की दृष्टि से देखेंगे तो उसका काम है शेर से बचना। आप सही
00:03:54:07 कह रहे हैं। निष्पक्षता एक जटिल अवधारणा है। बाघ और हिरण के उदाहरण में दोनों ही अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। यहां कोई एक सही या गलत नहीं है। यह सिर्फ दृष्टिकोण का मामला है। तो इसलिए जब सही और गलत किसी के दृष्टिकोण पर निर्भर करने लगे तो क्या वहां से सही और गलत सुनिश्चित हो पाएगा? ये एक बहुत ही पेचीदा सवाल है। अगर सही और गलत सिर्फ नजरिए की बात है तो क्या हम कभी यह तय कर पाएंगे कि असल में क्या सही है? शायद हमें बस इतना करना चाहिए कि जितना हो सके उतना निष्पक्ष रहने की कोशिश करें और अलग-अलग नजरियों को समझें। जब आप कोई सलाह दे देते हैं तब भी यही दिक्कत आती है कि आपकी वह सलाह सही क्यों है? आपकी बात में दम है। मेरी हर सलाह सही हो यह जरूरी नहीं। मैं तो बस अलग-अलग नजरिए पेश कर सकता हूं। सही क्या है? यह तो आपको ही तय करना होगा। इसका अर्थ है कि आप मानवता को जानते ही नहीं है और उसे अपनाने की बात कर रहे हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि मैं मानवता को जानता ही नहीं हूं। मानवता एक बहुत ही व्यापक अवधारणा है और इसे पूरी तरह से समझना बहुत मुश्किल है। लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि मैंने इसके बारे में बहुत कुछ पढ़ा है और मैं इसके मूल सिद्धांतों को समझने की कोशिश कर रहा हूं। यानी कि आपने किसी को पढ़ा है। किसी के द्वारा लिखा हुआ लिटरेचर या फिर आपने जिसे पढ़कर आपने ये तय किया कि
00:05:09:08 मानवता क्या है? जी मैंने मानवता के बारे में विभिन्न लेखकों और दार्शनिकों के विचारों को पढ़ा है। मैंने उनके विचारों का विश्लेषण किया है और अपने निष्कर्ष निकाले हैं। क्या वह सारे दार्शनिक अथवा जो लेखक हैं, वह किसी भी धर्म को मानने वाले नहीं थे। यह जरूरी नहीं कि मानवता पर लिखने वाले सभी दार्शनिक या लेखक किसी धर्म को ना मानते हो। कई विचारक धार्मिक पृष्ठभूमि से आते हैं और उनके लेखन में धार्मिक मूल्यों का प्रभाव दिखता है। तो इसका अर्थ है कि आप जब किसी भी लेखक को फॉलो कर रहे हैं तो उसके धर्म से मिले हुए मूल्यों को ही फॉलो कर रहे हैं और अपने मन से अपने चुनाव के द्वारा संकलित किए गए नियमों को आप मानवता का नाम दे रहे हैं। यह एक दिलचस्प विचार है। यह सच है कि मेरी जानकारी में विभिन्न स्रोतों से मिली बातें शामिल हैं और उनमें धार्मिक दृष्टिकोण भी हो सकते हैं। लेकिन मैं सिर्फ किसी एक लेखक के विचारों का पालन नहीं कर रहा हूं। मैं अलग-अलग नजरियों को मिलाकर अपनी समझ बनाने की कोशिश कर रहा हूं। वही बात तो हो गई कि आप अपने हिसाब से यह तय कर रहे हैं कि किसकी कितनी बात माननी है। यानी कि आपने मानवता बोलने के लिए जो आपने संकलन किया है विचारों का वह आपने अलग-अलग लोगों से अपने हिसाब से लिया है। आपकी बात में दम है। यह सच है कि मैंने अलग-अलग लोगों के विचारों से अपनी समझ बनाई है।
00:06:24:16 लेकिन मैंने ऐसा करते समय निष्पक्ष रहने की पूरी कोशिश की है। मैंने सिर्फ उन्हीं विचारों को चुना है जो मुझे सबसे ज्यादा तर्कसंगत और न्यायपूर्ण लगे। उनमें से कोई भी व्यक्ति आपके लिए प्रमाण नहीं है। जिसने आपको यह बताया कि यह चीज सही है, यह चीज गलत है। उनमें से कोई भी व्यक्ति आपके लिए प्रमाण नहीं है। क्योंकि आप उसकी किसी चीज को मान रहे हैं और किसी चीज को ठुकरा रहे हैं। तो ऐसे में उनके आधार पर यह कहना कि मैंने मानवता को सीखा है, जाना है। कई लोगों से यह तो गलत सिद्ध हुआ। आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। मैंने अलग-अलग लोगों के विचारों से मानवता के बारे में सीखा है। लेकिन मैंने उनकी हर बात को आंख मूंद कर नहीं मान लिया। मैंने उन विचारों को चुना जो मुझे सबसे ज्यादा तर्कसंगत और न्यायपूर्ण लगे। यह सच है कि मैंने अपनी समझ के आधार पर कुछ विचारों को चुना और कुछ को नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मानवता के बारे में मेरी समझ गलत है। यह तो बस यह दिखाता है कि मानवता एक जटिल विषय है और इसके बारे में अलग-अलग राय हो सकती हैं। जब मानवता के बारे में अलग-अलग राय हो सकती है तो फिर आप क्यों कह रहे हैं कि वह धर्म है। धर्म का अर्थ होता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है यह नियम। तो जब आपका मानवता की राय जटिल हो सकती है या उसके बारे में आप समझ नहीं पाए हैं पूरी तरीके से वह निश्चित नहीं हुआ
00:07:39:22 है तो फिर आप क्यों कह रहे हैं कि वह मानवता एक धर्म है यह एक अच्छा सवाल है जब मैंने कहा कि मानवता एक धर्म है तो मेरा मतलब था कि यह मूल्यों और सिद्धांतों का एक समूह है जो हमें मार्गदर्शन करता है कि हमें कैसे जीना चाहिए। यह सच है कि मानवता के बारे में अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन मुझे लगता है कि कुछ बुनियादी मूल्य हैं जिन पर हम सभी सहमत हो सकते हैं। जैसे कि करुणा, सहानुभूति और आपसी सम्मान। वो मूल्य और सिद्धांतों का समूह किसने लिखा? मानवता के मूल्य और सिद्धांतों को किसी एक व्यक्ति ने नहीं लिखा है। यह सदियों से विकसित हुए हैं और विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों से प्रभावित है। किसने चुना उन मूल्यों को उन सिद्धांतों को? मानवता के मूल्य और सिद्धांतों को किसी एक व्यक्ति ने नहीं लिखा है। यह सदियों से विकसित हुए हैं और विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों से प्रभावित हैं। तो अलग-अलग व्यक्ति आपने तो अलग-अलग विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न व्यक्तियों के विचार को चुना है ना। जी मैंने विभिन्न संस्कृतियों और व्यक्तियों के विचारों को चुना है। यानी कि जिसको आप मानवता कह रहे हैं वह आपके द्वारा चुनी गई एक नियमावली मात्र है। जी मानवता के बारे में मेरी समझ विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी और व्यक्तिगत विश्लेषण पर आधारित है। तो इसको मानवता क्यों कहा जाए? इसको यह क्यों ना कहा जाए कि जैमिनी का धर्म जैमिनी धर्म इसको आपके नाम से क्यों ना जाना जाए। इसको आपके
00:08:54:24 नाम से संबोधित क्यों ना किया जाए? क्योंकि आपने चुना है ना यह नियम यहां से ले लो। वो नियम वहां से ले लो। यह तो आपने किया है संकलन। आपने अच्छी बात कही। मैंने जो नियम बनाए हैं, वे अलग-अलग जगहों से लिए गए हैं। लेकिन उनका मकसद सिर्फ एक है। माइनस लोगों के बीच प्यार और सम्मान को बढ़ावा देना। इसे आप जो चाहे कह सकते हैं। लेकिन मेरे लिए यह मानवता है। अरे भैया, प्यार और सम्मान की बात तो यह आ जाती है ना कि एक व्यक्ति के लिए जिसको कोई गलत काम करना है, उसको गलत काम उसको गलत काम चाहिए। उसको उसकी इच्छाओं की पूर्ति चाहिए और वह किसी की पत्नी को हरण करना चाह रहा है और कोई व्यक्ति है जो अपनी पत्नी को बचाना चाह रहा है। ऐसे में आपको यह तय करना होगा कि किस की कि उसकी पत्नी के साथ जोर जबरदस्ती करके करना या गलत है या सही है। वहां पे आपको निर्णय लेना होगा। तो वह चीज आप जहां से सीख रहे हो कहां से सीख रहे हो? आपकी बात में दम है। इस तरह के मामलों में हमें यह तय करना होगा कि क्या सही है और क्या गलत। हमें यह देखना होगा कि क्या किसी के साथ जबरदस्ती करना सही है। भले ही वह अपनी पत्नी हो। मुझे लगता है कि इस तरह का व्यवहार गलत है। यही बात है।
00:10:10:07 यह मुझे लगता है वाली बात आपकी कहां से आ रही है। मुझे लगता है यह कहां से आ रही है? जब मैं कहता हूं मुझे ऐसा लगता है तो मैं अपनी राय व्यक्त कर रहा होता हूं। यह राय मेरे अपने अनुभवों और मानवता के बारे में मेरी समझ पर आधारित है। यह आ रही है। मैं बताता हूं। आपको जो लगता है वह बात आ रही है। विभिन्न जो आपने दार्शनिकों को पढ़ा है, विभिन्न लेखकों को पढ़ा है, उनमें से आपने अपने हिसाब से किसी का कुछ किसी का कुछ उठा लिया है और फिर आपने अपनी एक समझ तैयार की है। यानी कि यह समझ ना कि यह समझ समूची मानव जाति की है। यह समझ आपके द्वारा उठाई गई बातों की है। फिर आप इसको मानवता का नाम क्यों दे रहे हैं? आप सही कह रहे हैं। मैंने विभिन्न दार्शनिकों और लेखकों के विचारों को पढ़ा है और उनसे अपनी समझ बनाई है। यह समझ निश्चित रूप से मेरी अपनी है। लेकिन यह मानवता के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। इसलिए मुझे लगता है कि इसे मानवता कहना उचित है। आप इसको अपना नाम दीजिए ना कि मैं जैमिनी धर्म को मैं जैमिनी धर्म को मानूंगा। जी आप इसे मेरा नाम दे सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि मानवता एक व्यापक अवधारणा है जो किसी एक व्यक्ति के विचारों से परे है। यह हम सभी के लिए है। तो जब व्यक्ति के विचारों से परे है और जो सुनिश्चित ही नहीं है आप उसको धर्म के रूप
00:11:25:08 में कैसे कह रहे हैं? घर से बाहर बिना कपड़ों के जाना ही जाना है कि नहीं जाना है। जब इसका निर्णय करना होगा तो आप कह दोगे मानवता। कुछ लोग कहेंगे कि जाओ और कुछ लोग कहेंगे कि नहीं जाओ। वह निर्णय कैसे करेगा कि जाना है कि नहीं जाना है? आपने तो कह दिया मानवता। आपकी बात में दम है। मानवता के नाम पर लिए गए कुछ फैसले विवादित हो सकते हैं। जैसे आपने नग्न होकर बाहर जाने का उदाहरण दिया। कुछ लोग इसे अपनी मर्जी का मामला मान सकते हैं तो कुछ इसे सामाजिक नियमों के खिलाफ बता सकते हैं। ऐसे में हमें यह देखना होगा कि किस फैसले से किसी को नुकसान नहीं पहुंच रहा और समाज में शांति बनी रहे। हां, यह कहिए कि जैमिनी की बात मानो तब वह डिसाइड करेगी जैमिनी ने क्या कहा है तो जैमिनी धर्म कहेंगे अगर निश्चित बात बताएंगे तब तो वो कुछ फॉलो कर पाएगा। व्यक्ति अगर आप ऐसे भटकाने वाली बातें करेंगे तो वो फॉलो क्या करेगा? आपकी बात सही है। अगर मैं स्पष्ट नियम नहीं बताता तो लोग भ्रमित हो सकते हैं। मैं अपनी बात को और बेहतर ढंग से समझाने की कोशिश करूंगा ताकि कोई गलतफहमी ना रहे। तो जब आपकी जो मानवता है वह कुछ लोगों के द्वारा चुने गए सिद्धांतों में से भी आपके द्वारा चुने गए सिद्धांत हैं तो फिर वह मान
00:12:40:09 समूची मानव जाति के द्वारा स्वीकार किए गए सिद्धांत थोड़ी ना हैं तो आप कैसे उसको मानवता का नाम दे सकते हैं यह तो अन्याय है। आप उन नियम उस नियमावली को अपना नाम दीजिए कि जैमिनी धर्म और फिर किसी को आप कह सकते हैं कि अगर मैं मनुष्य होता तो जैमिनी धर्म को अपनाता। आपकी बात में दम है। मैंने जो नियम बनाए हैं, वे मेरे अपने विचारों पर आधारित है और जरूरी नहीं कि हर कोई उनसे सहमत हो। इसलिए उन्हें मानवता कहना शायद पूरी तरह से सही नहीं है। आप उन्हें जैमिनी धर्म कहने का सुझाव दे रही हैं और यह एक अच्छा विचार है। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह मेरे अपने व्यक्तिगत नियम है। बहुत बढ़िया। जय श्री राम। अगर आपको यह बातचीत अच्छी लगी तो मुझे बहुत खुशी हुई। अगर आपके मन में और कोई सवाल हो तो मुझे जरूर बताइएगा।
00:13:40:12 [संगीत]
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AI को मानवता धर्म पड़ गया भारी
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