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00:00:02:00 जैसा कि आपने अभी बताया कि हमें गीता क्यों पढ़नी चाहिए? तो इससे एक और प्रश्न था गीता कहां से पढ़े? शुरुआत में तो वो बता जी ऐसा है कि भगवत गीता यद्यपि हमें शुरुआत से ही पढ़नी चाहिए। पर जो तात्विक जो उसमें जो मटेरियल जो हमें प्राप्त होता है स्मृति कि वहां ये हो रहा था। ये सब स्मृति का अंश है और इसके बाद एक वैसे उनका भी बहुत बहुमूल्य अर्थ निकाले जा सकते हैं, निकल सकते हैं। प्राप्त भी है। परंतु जो गीता का रस है जहां से चालू होता है वहां से चालू होता है। जब अर्जुन जी चिंता व्यक्त करने लगते हैं भगवान कि मैं मेरे सामने मेरे चाचा ताऊ खड़े हैं। मेरे सगे संबंधी खड़े हैं। तो मैं इन पर मैं इनका वध कैसे कर दूं? क्या कर मतलब ऐसा इससे अच्छा तो है मैं हथियार डाल के और चला जाऊं युद्ध छोड़ के तो भगवान उनको यह बताने के लिए कि तुम जिसके मरने के बारे में चिंता कर रहे हो वो चिंता तुम्हारी क्यों व्यर्थ है यह बताने के लिए एक विश्लेषण शुरू करते हैं कि तुम कौन हो ये कौन है फिर जीव कौन है ब्रह्म कौन है या ऐसे समझ लो कि भक्त कौन है भगवान कौन तो क्या होता है अब जैसे लोग कहते हैं कि गीता
00:01:17:03 हमारे लाइफ में कैसे काम आती होती है। हम तो जब अर्जुन जी ने यह कहा कि मैं इनको कैसे मार दूं? तो भगवान ने बताना शुरू किया दूसरे अध्याय से कि भाई तुम्हारा वास्तविक स्वरूप जो है इनका वास्तविक स्वरूप जो है वो क्या है? नित्य सनातन सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा हो तुम। ईश्वर के अंश हो तुम। तो तुम भी सच्चिदानंद ही हो। क्योंकि ईश्वर सच्चिदानंद ही है। तो जब यह बताना शुरू किया तभी यह श्लोक आया ना नैन छिनती शस्त्राण नैन दति पावका ना चैन क्ले शति वता तो आत्मा को कोई काट नहीं सकता आत्मा कोई आत्मा को कोई जला नहीं सकता सुखा नहीं सकता डुबो नहीं सकता ये सब चीजें उसमें आई तो आपको क्या पता लगा कि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है आत्मा जो सनातन है जो सच्चिदानंद है जिसको जो अविनाशी है जिसको कोई कभी कुछ नहीं कर सकता तो भगवान ने वहां अर्जुन को बताया क्योंकि आत्मा सन सनातन है अविनाशी है इसलिए उसको कोई कुछ नहीं कर सकता तो फिर तू इनके मरने की फिक्र क्यों कर रहा है तो भगवान को तो उसको यह बताना था कि तेरा इनके मरने की फिक्र करना व्यर्थ है मगर तुमको यहां पता चल गया कि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप क्या है और तुम्हें उस वास्तविक स्वरूप तक पहुंचना है जो जहां तक अभी तुम पहुंचे
00:02:32:14 हुए नहीं हो तुमको यहां पर ये पता इसलिए गीता रेलेवेंट है कहते है ना गीता का हमारे जीवन में क्या कारण है तो आप जिस सतचित आनंद को ढूंढने निकले हो वो सच्चिदानंद के लिए सबसे पहले आपको आपकी पहचान कहां से प्राप्त हुई? भगवत गीता में। वहां पे उनका वहां पे उनका यह उद्देश्य है कि अर्जुन को ये समझाया जाए कि तुम समझ रहे हो जिनके जिनका मरना वो मर रहे नहीं है। वास्तविकता में वो सदैव जीवित रहने वाले हैं। तो उनका मरना मरने की फिक्र करना व्यर्थ है। और यदि तुम उनके शरीर की चिंता कर रहे हो तो शरीर तो कुछ दिन पहले नहीं था और कुछ दिन बाद भी नहीं होगा तो भी तुम्हारी चिंता करना व्यर्थ है। आज नहीं तो कल ये लोग मरेंगे ही। तो फिर तुम्हारी चिंता करना व्यर्थ है। तो इस तरीके से अर्जुन को समझाने के निमित्त जो बातें कही भगवान ने वह आपसे कनेक्ट हो जाती है। एक इसमें बात आती है कि आपके मन में एक सवाल आएगा कि जैसे कि iPhone है। iPhone के प्रति अट्रैक्शन आपके अंदर कब आया? जब आपको पता चला कि किसी वैज्ञानिक ने किसी कंपनी ने अमुक नाम की कंपनी ने iPhone बना दिया है। ठीक है? अच्छा आपके अंदर यह जो सब कुछ प्राप्त कर लेने की चाह है कि मैं सदैव खुश रहूं
00:03:47:25 तो यह चाह क्यों आई आपके अंदर जब आपको मालूम ही नहीं है किसी ने बताया ही नहीं है कि जो है इस दुनिया में कोई सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है तो उसको प्राप्त करने की इच्छा आपके अंदर कैसे आ रही है जब आपको बताया ही नहीं इस दुनिया में कोई Samsung S24 अल्ट्रा है तो आप Samsung S24 अल्ट्रा को ढूंढने क्यों जाओगे? सही बात है। तो यहां से एक चीज निकल के आएगी कि क्योंकि तुम उसके अंश हो क्योंकि जो उसके गुण है जो उसके लक्षण है वही तुम्हारे भी है। इसलिए तुम्हारे अंदर उसके प्रति अट्रैक्शन है। जैसे कि जो जहां से निकलता है उसी की ओर वापस उसी को वापस प्राप्त हो जाने के निमित्त वो करता है। जैसे कि अग्नि जब लपट बनके जलती है तो आकाश में स्थित सूर्य की ओर भागती है। कभी भी इधर-उधर नहीं भागती। हवा चले कोई बाधा उसको उत्पादित करे तो ठीक है। वरना उसका इशारा किस ओर होता है? आकाश की तरफ जहां सूर्य स्थित है। और जैसे कि झरने इत्यादि पृथ्वी के गर्भ से निकलते हैं और फिर दोबारा जो मूल स्त्रोत है समुद्र की ओर भागने लगते हैं तुरंत। इवन जो जड़ धरती से निकलने वाले पेड़ पौधे इत्यादि वो भी इसीलिए फलते फूलते हैं। वापस एक दिन मिट्टी में ही मिल
00:05:02:28 जाना है। मिट्टी से ही निकले। तो इसी प्रकार से क्योंकि हमारा अस्तित्व भी अविनाशी है। हम भी हमारी आत्मा हम जो आत्म स्वरूप है हम भी सच्चिदानंद हैं। इसलिए हम सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की ओर बिना किसी के कहे ही अट्रैक्ट होते हैं। तो क्या हुआ कि जब हमने गीता पढ़ी तो उधर तो वो अर्जुन को समझा रहे हैं कि भाई वो अविनाशी है, सच्चिदानंद है, सनातन है, नित्य है। है ना? ये सब वो अर्जुन को समझा रहे हैं। ये समझाने के लिए कि तू इनके मरने की चिंता मत कर। मगर हमको क्या समझ में आ रहा है कि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है? नित्य है, सनातन है, अविनाशी है। इसलिए हमारे अंदर बचपन से ही गर्व जन्म से ही सच्चिदानंद को प्राप्त लेने की इच्छा इनबिल्ट है। तो इसलिए गीता रेलेवेंट है और गीता इस इस तरीके से आपके कार्य में आती है। जी। मैं समझता हूं कि आपको काफी कुछ जान जी भैया। बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। थैंक यू सो मच भैया। चलिए जय श्री राम। जय श्री राम भैया।
00:06:04:23 [संगीत]
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भगवद्गीता कहाँ से पढ़ें? The relevant questions #2 #गीता_का_महत्व
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