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00:00:01:27 तो सभी को जय श्री राम। आज हम उस महत्वपूर्ण और गंभीर विषय पर बात करेंगे जिसके बारे में हम लोग अपने कई वीडियोस में आपको बता चुके हैं। जैसा कि आप जानते हैं अभी हाल ही में कश्मीर से ऐसी सूचनाएं प्राप्त हुई जिसने सभी के दिल को दहला दिया। सभी के लिए हृदय विधारक थी वह सूचना। और यह सूचना अचानक से कई दिनों के बाद आई है तो ऐसा लग रहा है हमें कि भाई कुछ ऐसा हुआ है जो पहले ना हुआ हो मगर ऐसा तो नहीं है। ये पहले भी हमारे साथ हो चुका है। बंगाल में हो ही रहा था। बस एक नए रूप में एक नए समय पर एक नई जगह से देश काल परिस्थिति बदल करके आपको एक सूचना आई जिसकी वजह से आप आश्चर्यचकित हुए। दुख की बात है मगर उससे भी ज्यादा गंभीर विषय है कि व्हाट टू डू करें क्या रोड मैप क्या है सब लोग कहते हैं कि उन्होंने ऐसा किया इसने ऐसा किया वो ये करते हैं वो ये करते हैं मैंने कई बार लोगों को ऐसे भाषण देते हुए सुना है कि हिंदुओं तुम्हें कभी समझ में नहीं आएगा वह यह कर देंगे वो वो कर देंगे उन्होंने ऐसा किया था
00:01:17:03 वैसा किया था खूब सारे ऐसे गंभीर आग लगा देने वाले भाषण सुनते हैं। मगर अंतत गतवा यह नहीं बताते कि करें क्या? एग्जजेक्टली व्हाट टू डू। प्रैक्टिकली बताइए कि अभी मैं क्या करूं? यहां से बाहर निकलूं गड्ढा खोदने लगूं। कुदाली लेकर के क्या करने लगूं? तो सदैव समस्या पर ही बात होती है। तो आज उस समस्या से हम आगे बढ़कर के उसके समाधान पर बात करने वाले हैं। तो हमने अपने पिछले लाइव में बताया था। आपको समझाया था कि हिंदुओं की जो मुख्य समस्या है वह क्या है कि हिंदू बटे हुए हैं। जबकि वेद भगवान मना कर रहे हैं कि बट करके नहीं रहना चाहिए। अनेकानेक शास्त्र मना कर रहे हैं। बटे होने का कारण क्या है? सार्वभौम सिद्धांतों से अनभिज्ञता। और सार्वभौम सिद्धांतों से अनभिज्ञता क्यों है? यह आज हम जानेंगे। तो आज हम इस रोड एक तरीके से यह एक रोड मैप है जो बहुत ही इजी करेगा। किसी भी धर्म रक्षक को अपने धर्म की रक्षा करने के विषय को और या फिर उसे अपने आध्यात्मिक मार्ग पर ही प्रगति करनी है। नहीं आना है धर्म के कार्य। उसको स्वयं की आध्यात्मिक यात्रा भी यदि सुदृढ़ करनी है
00:02:32:07 तो उसमें भी बहुत सहायक सिद्ध होगा। आज का हमारा यह वीडियो और आज का ये जो हमारा टॉपिक है धर्मामीटर। थर्मामीटर एक चार्ट है जिसके द्वारा जिसको पढ़ करके आप यह जान सकेंगे कि आस्तिकता के किस स्तर पर आप हैं? कौन से पायदान पर आप खड़े हैं? आपके निकटवर्ती कौन है? आपका विरोधी कौन है? आपसे द्वेष किस आपसे द्वेष रखने वाला कौन है? कौन आसानी से आपकी बातों को समझ सकता है? कौन बिगड़ा हुआ सुधर सकता है? किसको सुधारना कठिन? इत्यादि इत्यादि तो यह बहुत जरूरी है जब आप सनातन धर्म की रक्षा करने के बारे में सोचेंगे। अपने अस्तित्व और आदर्श की रक्षा करने के बारे में सोचेंगे। कश्मीर जैसे आतंकी हमलों का जवाब देने के बारे में सोचेंगे। बंगाल जैसी स्थितियों को होने से रोकने के बारे में आप सोचेंगे तो आपको इस धर्मामीटर की आवश्यकता पड़ेगी। क्योंकि संशयात्मा विनश्यति जितना संशय होगा आपके मन में उतना ही आपका जीवन ना तो इस लोक में अच्छा होगा और परलोक की तो बात दूर की है। तो इसलिए आपको आपकी
00:03:47:13 स्ट्रेटजी क्लियर होनी चाहिए। करना क्या है? व्हाट टू डू एक्सक्टली। तो देर ना करते हुए आज यह थर्मामीटर का आपको मैं दिखा देता हूं। देखिए हमने इसमें स्वयं को आस्तिक कहने वालों को पांच भागों में विभक्त किया है। उन पांच में से एक भाग है जो वास्तव में आस्तिक है और बाकी के चार भाग जो हैं वो आस्तिकता भास है। है वो भी नास्तिक। मगर ये वो नास्तिक हैं जिनके अंदर आस्तिकता भास है। है ना? अब वह आस्तिक कैसे हैं और वह कौन से स्तर पर हैं और उनमें से किसके साथ किस प्रकार का इंटरेक्शन एक धर्म रक्षक का होना चाहिए। शुद्ध सनातन वैदिक आर्य हिंदू का होना चाहिए वह आज आपको पता चलेगा। तो सबसे पहले हम बात करते हैं प्रथम श्रेणी की। आस्तिक में आस्तिकता के स्तरों में प्रथम श्रेणी पर कौन होता है? शुद्ध सनातन वैदिक आर्य हिंदू पूर्ण आस्तिक कुल हिंदू जनसंख्या का 10% अथवा उससे कम यह ध्यान रखिएगा कि
00:05:02:28 यह जो प्रतिशत है वो हमने मतलब मन रखने के लिए बोला है जो शुद्ध सनातन वैदिक आर्य हिंदू धर्म है धर्म को मानने वाले हैं हिंदू हैं उनकी संख्या बहुत कम है ना के बराबर है तो आज इस चार्ट के जरिए आप स्वयं को जाने सबसे पहले कि आप इसमें से किस स्तर पर हैं। आप आस्तिक के स्तर पर हैं या फिर आस्तिकता भास के किसी चार में से एक स्तर पर हैं। है ना? तो कुल हिंदू जनसंख्या का 10% या उससे भी कम। अब इसका आधार क्या है? गुरु गोविंद और ग्रंथ जिनके जीवन में जो आध्यात्मिकता है उसका आधार तीन है। गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल ग्रंथ नहीं केवल गुरु नहीं केवल ग्रंथ गोविंद नहीं गुरु गोविंद और ग्रंथ। तो ये तीनों आधार जिसके जीवन के हैं धर्म और ब्रह्म के विषय में वो पूर्णतया आस्तिक है। इसके आगे और भी लक्षण हम समझेंगे। इसी को पूर्णतया वैदिक भी आप मान सकते हैं। ठीक है? अब इनके व्यवहारिक लक्षण क्या है? वो
00:06:17:28 समझिए। पहला लक्षण है परंपरा प्राप्त प्रामाणिक सार्वभौम एवं अकाट्य सनातन सिद्धांतों का अनुकरण करने वाले आचार्य संत महात्मा तथा उनके परिकर। ठीक है? तदपरांत परंपरा से प्रामाणिक आचार्यों द्वारा प्राप्त सार्वभौम सिद्धांतों का अनुगमन करने वाले उस संप्रदाय के शिष्य अथवा प्रामाणिक आचार्यों पर आस्थान्वित महानुभाव ऐसे भी लोग होते हैं ना कि हम रामानुजाचार्य परंपरा पर आस्थान्वित है। अभी तक दीक्षा नहीं ली है। शिष्य नहीं बने हैं। मिले भी नहीं है। मगर उस परंपरा पर आस्था है आचार्यों पर। वह भी प्रथम श्रेणी में ही आते हैं। उसके बाद पूर्व जन्म के पुण्य तथा इस जन्म के संस्कारों के कारण प्रामाणिक गुरु से वंचित होने पर भी सार्वभौम सिद्धांतों पर आस्था महानुभाव मतलब जैसे कई बार होता है कि कोई व्यक्ति प्रमाणिक आचार्यों से कभी नहीं मिल सका मगर वह ऐसे कुल में उत्पन्न है या कुछ ऐसे जीवन के उसके घटक हैं जिसके कारण वो आज भी उन्हीं सिद्धांतों में प्रमाण्य बुद्धि रखता
00:07:33:03 है जो सिद्धांत प्रामाणिक परंपरा प्राप्त आचार्यों द्वारा स्वीकार्य और प्रचारित किए जाते हैं। जैसे मान लीजिए कि कोई किसी भी साधारण सामान्य परिवार में जन्मा हो और वह कभी भी आचार्यों से मिला ही नहीं जानता ही नहीं है। परंतु उसकी प्रमाण्य बुद्धि है। वर्ण व्यवस्था में उसकी प्रमाण्य बुद्धि है। क्या कहते हैं? वेद में, उपनिषदों में, पुराणों में प्रमाण्य बुद्धि है। उसकी वो अभी जानता भी नहीं अपने धर्म को बहुत ज्यादा। मगर उसकी प्रमाण्य बुद्धि है। उसके अंदर ऐसा है भाव कि अगर मेरे को यहां पर कोई चीज ऐसी गलत लिखी मिलेगी जो कि जिसके कारण कि मेरा जीवन ऐसा दिखाई देगा जो उसके अगेंस्ट जा रहा है तो वहां पर वो स्वयं को दोष देगा कि हां मैं इस हिस्से में तो गलत हूं। क्योंकि शास्त्र में ऐसा लिखा है क्योंकि शास्त्र के अनुसार जो गुरु कह रहे हैं वो गुरु ऐसा बोल रहे हैं क्योंकि शास्त्र के अनुसार जो गोविंद है वो ऐसा है और मैं ऐसा समझता हूं। तो यहां पे तो मैं गलत हूं। जो ऐसी बुद्धि रखता है वह भी प्रथम श्रेणी में ही आता है। और यह बहुत खास पॉइंट है। आपको अपने धर्म को बचाने के लिए जो संगठन तैयार करना है हिंदुओं का यह पॉइंट बहुत खास है।
00:08:48:28 क्यों? क्योंकि विवशता पूर्ण अज्ञता अथवा विवशता पूर्ण स्थिति में पूर्णतया धर्म का अनुकरण ना कर पाने की स्थिति में भी जब आपको यह ज्ञात होता है कि आप धर्म धर्म का अनुकरण नहीं कर रहे हो बल्कि धर्म के विरुद्ध कार्य कर रहे हो तो दो स्थितियां होती है या तो धर्म जो धर्म के द्वारा जो आदेशित किया गया है आप उसको ही मना कर देते वो गलत कह रहा है। यानी कि शास्त्र अमुक अमुक स्थिति में गलत बोल रहा है। और कभी और कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई एक ऐसा धर्मवान व्यक्ति होता है जिसको जब पता चलता है कि वो शास्त्र के प्रतिकूल हो रहा है अनुकूल होने की बजाय तो वहां वो सोचता है कि यहां पर मैं गलत हूं और या तो वो प्रयास करता है कि तुरंत सुधर जाए या फिर मन में ठानता है भगवान से प्रार्थना करता है कि मेरी विवशता के कारण यहां पर मैं धर्मानुकरण में विफल हो रहा हूं। तो मुझे ऐसी शक्ति दें किसी भी प्रकार से जो मैं हो रहा हूं विफल तो मैं धर्मानुकरण पूर्णतया कर पाऊं। ऐसी विनती करता है। तो यह बहुत आवश्यक है यह पॉइंट। क्यों? क्योंकि जब भी आप किसी को किसी आस्तिकता भाष को आस्तिक वाले स्तर पर लाने का प्रयास
00:10:04:10 करोगे तो यही स्थिति उसके अंदर बहुत गंभीरता से होना आवश्यक है। क्या कि जब उसको अपनी शास्त्र के प्रति अनुकूलता ना होने का बोध हो तब वो स्वयं को पीछे रखे और शास्त्र प्रमाण को आगे रखे। गुरु वाक्यों को आगे रखे। गोविंद को आगे रखे ना कि वह यह कह दे कि नहीं नहीं यहां पर मैं इस बात में एग्री नहीं करता हूं। इतनी बात मैं नहीं मानता है ना सुविधा अनुसार चयन करने वाला। तो प्रथम स्तर में कौन-कौन हो गए? परंपरा प्राप्त आचार्य, उनके परिकर, उनके शिष्य और संयोग से प्रारब्ध के कारण प्रामाणिक सिद्धांतों पर ही प्रमाण्य बुद्धि रखने वाले चलने का प्रयास करने वाले और लास्ट में कौन से लोग? जो धर्म के प्रति अनुकूलता नहीं है। ऐसी स्थिति का बोध होने पर धर्म शास्त्रों को धर्म को प्रधानता देने वाले और स्वयं को पीछे रखने वाले अपने धर्म विरुद्ध आचरण की वकालत ना करने वाले है ना। भले ही वो चेंज आगे चलकर के कभी भी आए मगर उसकी वकालत ना कर करने वाले। प्रमाण्य बुद्धि
00:11:19:15 यदि आपकी है धर्म में शास्त्रों में गुरु गोविंदों ग्रंथ में तो भी आप प्रथम श्रेणी में ही आते हो। अब इनका प्राप्तव्य क्या है? इनका प्राप्तव्य है सबसे पहले तो यह हो जाते हैं वैदिक। ऐसे ही लोग पूर्णतया वैदिक कहलाते हैं। फिर सर्वशक्तिमान ईश्वर, परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म ये तीनों चीजें इनके पास होती हैं। इसके बाद उदाहरण किस तरह के लोग हैं इसमें? शंकर श्री मद इत्यादि संप्रदाय अंतर्गत प्रामाणिक आचार्य गुरु परंपरा व उनमें प्रमाण्य बुद्धि रखने वाले महानुभाव और अथवा संयोग से बिल्कुल एज इट इज वही करने वाले वही मानने वाले जो यह आचार्य बता रहे हैं। ठीक है? ऐसा बहुत कम होता है मगर होता है संयोग से कभी-कभी।
00:12:17:12 नियमावली इनकी नियमावली क्या है? सुनिश्चित होती है। क्या करना है? क्या नहीं करना है? क्लियर होता है। थॉट्स इनके क्लियर होते हैं। स्थिति स्पष्ट होती है और धर्म के प्रति परायणता होती है। प्रतिरात धर्म परायण होते हैं। संगठित होते हैं। एक दूसरे से संगठन शक्ति होती है इनका। मगर आत्मबल अधिक होता है। परंतु संख्या बल बहुत कम है। आत्मबल अधिक है इनका। संख्या बल बहुत कम है। और यह वो स्थिति है जो प्राप्ति के योग्य है। मतलब अन्यों को इसी स्तर पर आने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। तो यह हमारी प्रथम श्रेणी है जिसमें कि आस्तिक आते हैं। अब आस्तिकता भाष और इस चार्ट में द्वितीय श्रेणी में आते हैं। तो यहां से आस्तिकता भाष चालू हो जाएगा। कैसे? तो द्वितीय श्रेणी में कौन है? जिसको कहा जा कहा जाएगा पहले जो प्रथम श्रेणी थी उसको क्या कहा जाएगा? धर्मज्ञ। और द्वितीय श्रेणी इसको क्या कहा जाएगा? धर्मज्ञाभास। हिंदुओं की कुल जनसंख्या में 65% अथवा उससे अधिक यह प्रतिशत आप अनुमान लगा सकते हैं। किसी कारण से यहां बस लिख
00:13:32:16 दिया है। ढांडस मधा रहे अन्यथा सबसे ज्यादा संख्या इसी प्रकार के हिंदुओं की है हमारे समाज में जो अब हम बताने जा रहे हैं। और जो पहले बताया था प्रथम श्रेणी के हिंदू उनकी संख्या बहुत कम है। 10% हमने बोल दिया। बहुत मुश्किल है कि दो-ती% भी हो जाए। तो वह भी भगवत भगवान की कृपा ही होगी। अगर दो तीन प्रतिशत निकल आए फिर भी कि पढ़ के जो है हतोत्साहित ना हो जाए इसलिए प्रतिशत थोड़ी-थोड़ी बढ़ा के लिखी है। जो ज्यादा होनी चाहिए वो हल्की सी कम लिखी है। जो कम होनी जो कम है उसको हल्का से बढ़ा के भी लिखा गया है। तो इसका अब ये क्या है? इनका व्यवहारिक लक्षण क्या होता है? सबसे पहले आधार आधार इसका होता है अस्पष्ट व्यवहारिक लक्षण क्या है दिखने में सनातन धर्म पर आस्था दिखने में क्या दिखेगा भैया ये तो बहुत धर्म कर्म वाला है दान भी देता हुआ दिखेगा मंदिर भी जाता हुआ दिखेगा आरती करता हुआ भी दिखेगा है ना परंतु गुरु तत्व से अनभिज्ञ परंपरा प्राप्त सार्वभौम प्रमाणिक एवं अकाट सनातन सिद्धांतों से
00:14:49:00 अनभिज्ञ अज्ञानता लोभ अथवा धर्मानुकरण में कठिनाई के कारण शास्त्रों अथवा शास्त्रों में दी गई कुछ शिक्षाओं का सुविधा अनुसार चयन करने वाले धर्म शास्त्र अथवा ईश्वर विरुद्ध स्थिति का बोध हो जाने पर भी परिवर्तन को स्वीकार ना करने वाले पहली श्रेणी में कौन था धर्म विरुद्ध धर्म धर्म अथवा ईश्वर विरुद्ध स्थिति का बोध हो जाने पर भी परिवर्तन को स्वीकार कर लेने वाले परिवर्तन के प्रति प्रमाण बुद्धि रखने वाले परंतु यह कौन है द्वितीय श्रेणी में कि अगर इनको पता चला कि कोई ऐसी बात है जो धर्म शास्त्रों में इनके अगेंस्ट लिखी है तो वहां पर ये अपनी वकालत करेंगे धर्म शास्त्रों को नकार देंगे कहेंगे या तो प्रक्षिप्त है या कहेंगे वो किसी देश काल परिस्थिति के लिए ठीक था वो ये सब कह देंगे किसी तरीके से उस चीज को अपने ऊपर लागू होने से बचेंगे। मैं अभी बताऊंगा।
00:15:52:19 सनातन धर्म पर आस्था कुल में उत्पन्न परंतु अभी तक यह इनकी अच्छाई है जो धर्मज्ञा भाषा है द्वितीय श्रेणी ये इनकी इनके अंदर एक अच्छाई है कि सनातन धर्म पर आस्थानित कुल में उत्पन्न परंतु अभी तक प्रामाणिक गुरु परंपरा विरोधी किसी भी विचारधारा से दूर ऐसे हिंदू जो अभी तक आर्य समाजी नहीं हुए हैं जो अभी तक इस वाले नहीं हुए हैं ब्रह्मा कुमारीज वाले नहीं हुए हैं कहीं फंसे नहीं है हां वो हैं ऐसे कि धर्म शास्त्रों की कोई ऐसी बात पता चलने पर जो उनके अगेंस्ट जा रही है। वह खुद अपने कृत की वकालत करते हैं और धर्म शास्त्रों को नकार देते हैं। परंतु अभी तक वो उन्होंने अपने सिद्धांतों को क्लियर लागू नहीं किया है कि हमारे क्या सिद्धांत है कि कृष्ण और अल्लाह एक है पर शिव और कृष्ण एक नहीं है। इस तरीके के सिद्धांतों को लागू नहीं किया है। वह अभी कुछ भी उन्होंने स्पष्टता से अपने जीवन में इस ओर सोचा ही नहीं है। हां, जब कभी मंगल आता है तो मंदिर चले जाते हैं। हनुमान चालीसा पढ़ लेते हैं या अपने घर में सत्यनारायण की कथा भी कराते हैं। परंतु उन्होंने कभी बैठकर सोचा नहीं है कि भगवान निराकार है कि साकार है। उन्होंने अभी तक आर्य समाज की विचारधारा को स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने अभी तक ब्रह्मा कुमारीज की विचारधारा को
00:17:07:28 स्वीकार नहीं किया है। अब मैं आपको बताऊं यह जो स्थिति है वह क्या है? जैसे मान लीजिए कि कोई व्यक्ति अपने घर में सत्यनारायण की कथा करवा रहा है। अब यह क्या हुआ? दिखने में धर्मज्ञ है। सनातन धर्म पर आस्थानित है। पर उसी स्कंद पुराण जिसका वो अंश है सत्यनारायण की कथा स्कंद पुराण का ही अंश माना जाता है जो गुरु गीता है। अब गुरु गीता में लिखा हुआ है कि जिसका गुरु नहीं वो पशु है। जिसका परम ये प्रामाणिक आचार्य गुरु नहीं है। उसमें लक्षण भी दिए हैं गुरु के और अन्य शास्त्रों के आधार पर निकालेंगे तो परंपरा प्राप्त लक्षण संपन्न जो है समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा देने वाला गुरु तो जिसका गुरु नहीं है वो पशु है अब वो सत्यनारायण की कथा सुन रहा है धर्मज्ञ दिख रहा है परंतु उसका कोई गुरु है नहीं अभी तक जो कोई भी आध्यात्मिक रास्ते पर ना ही उसने पैर रखा और ना ही उसने किसी को अपना गुरु स्वीकार किया है
00:18:23:01 कि यह मेरे आध्यात्मिक जगत के गुरु हैं और उसी को गुरु कहा जाता है। जो विद्या आपको मुक्त कराती है उसी को विद्या कहा जाता है और जो गुरु आपके अज्ञानता रूपी अंधकार अविद्या रूपी अंधकार से आपको मुक्त कर कराने की शिक्षा देता है। वह आपका गुरु कहलाता है। तो जिसका कोई गुरु नहीं है वह पशु है। यह स्कंद पुराण के अंश माना जाता है जो उसमें लिखा है गुरु गीता में। अब सत्यनारायण की कथा करते समय उस व्यक्ति को यह बताया गया कि भाई तुम जो है पशु के समान हो शास्त्र के हिसाब से। अब वो कहने लगा अरे ये तो शास्त्र में ऐसे ही लिख दिया है। ये मैं नहीं मानता। फिर वो और कमियां निकालने लगा। शास्त्रों में तो और भी बहुत कुछ लिखा है। तो क्या वो सब मानते हो क्या? तो क्या है यहां पर? कि धर्म का अनुकरण ना कर पाने में आपकी विवशता होनी चाहिए। आपका चयन नहीं आपकी किसी कारण से विवशता वश आप धर्म का अनुकरण नहीं कर पा रहे हो तो बात अलग है मगर चयन नहीं होना चाहिए और चयन है भी मान लीजिए इंद्रियों के वशीभूत होकर के आपने स्वीकार किया है कि भाई अमुक अमुक स्थिति में हम धर्म का अनुकरण नहीं कर पाएंगे विपरीत
00:19:38:07 परिस्थितियां हैं तो हम नहीं चल पा रहे हैं धर्म के अनुसार बिल्कुल अक्षरश तो कम से कम हम अपने उस कृत की वकालत नहीं करेंगे हम कहेंगे कि हां मुझे व्यवस्था में ऐसा तो करना पड़ रहा है परंतु होना तो वही चाहिए। जब हम अपने को सही नहीं बल्कि शास्त्र के वचन को सही ठहराएंगे तो हम प्रथम श्रेणी वाले हो जाएंगे। और यदि हमने यह कहा कि नहीं इतने अंश में जो वो रेलेवेंट नहीं है। भगवत गीता की जो शिक्षा है जैसे इस के एक महानुभाव इंदौर में जोनल सेक्रेटरी वो बोले कि भगवत गीता की जो शिक्षाएं हैं वो आज के टाइम में रेलेवेंट नहीं है उतनी। तो यहां क्या हुआ कि जब वैसे भगवत गीता भगवत गीता करते रहते हैं। मगर जब उसी भगवत गीता की कोई शिक्षा कोई आदेश उनके विरोध में दिखाई देने लगा। अपने आप को उन्होंने ऊपर किया। अपने अपनी वकालत की अपने कृत की वकालत की शास्त्र विरुद्ध और उन्होंने भगवत गीता को पीछे कर दिया। ठीक है? तो यहां क्या हुआ? अच्छा इसमें एक दिक्कत और आती है। जब आप शास्त्र से बाहर जाते हैं क्योंकि हमारे यहां पर विशेष धर्म, आपातकालीन धर्म और सामान्य धर्म तीनों की व्याख्या वृहत तरीके से कर दी गई है शास्त्रों के द्वारा। मगर जब हम बिना किसी
00:20:53:10 शास्त्र प्रमाण के बाहर निकलते हैं शास्त्र से तो दुनिया में विप्लव होता है। मान लो कि आपने कहा मैं भगवत गीता की अमुक अमुक बात नहीं मानता और मैं यहां पर यह अपने मन से कार्य करता हूं तो वह जो कार्य भगवत गीता के विरुद्ध जाते हुए होने वाला है आपके द्वारा वो कार्य भी शास्त्र के अनुसार होना चाहिए जो शास्त्र हमारे यहां प्रामाणिक माने गए हो परंपरा से और अगर आप मनमाने तरीके से करेंगे तो सबको छूट मिल जाती है कि हम जब तुम इतने हिस्से में अपने मन से कुछ कर रहे हो शास्त्र के विरुद्ध जाकर के तो हम भी करेंगे तो फिर दूसरा दूसरा भी करेगा। फिर तीसरा और अलग करेगा। चौथा और अलग करेगा। पांचवा और अलग करेगा। तो इस तरीके से दुनिया में विप्लव होता है। और लोग पूछते हैं ना कि ये कैसे बने तंत्र? ये मुस्लिम कहां से आए? क्रिश्चियन कहां से आए? ये सब कहां से आए? नास्तिक कहां से आए? यहां से आते हैं। जब प्रथम स्तर वाला जो प्रथम श्रेणी वाला जो आस्तिक है वह बिगड़ता है या वहां पर जब चूक होती है तो वहां से यदि कोई पतित होता है तो वो यहां आता है या वहां वो पहुंच नहीं पाता है तो वो यहां आता है। तो तो सबसे पहली श्रेणी कौन सी बनती है?
00:22:10:07 आस्तिकता के बाद आस्तिकता भास में और इस चार्ट के हिसाब से द्वितीय श्रेणी धर्मज्ञा भास की। अब इनके उदाहरण क्या-क्या हैं? बस इनकी अच्छाई सबसे अच्छी क्या है? कि यह अभी तक किसी के साथ बॉन्ड में नहीं बंधे हैं। यह एक अच्छाई है। जैसे आपको बहुत सारे ऐसे संगठन मिल जाएंगे जो सोशल वर्क कर रहे होंगे। सनातन धर्म के नाम से चल रहे होंगे। जय श्री राम संगठन या और भी इस तरीके के राष्ट्र राष्ट्रभक्ति भी होगी और ये सब भी होगा। मगर होंगे सब हिंदू है ना जागृति संस्थान या बहुत से ऐसे मिल जाएंगे मगर इनकी अपनी जो धार्मिक ग्रंथ होंगे वो किसी से प्रभावित नहीं होंगे या इनके पास धार्मिक ग्रंथ होंगे ही नहीं धार्मिक ग्रंथ होने के नाम पर इनके भी वही ग्रंथ होंगे जो हमारे और आपके हैं। जैसे गीता प्रेस गोरखपुर की भगवत गीता वही इनके भी ग्रंथ होंगे। पर्टिकुलर इनका वह जो संस्था विशेष के जो ग्रंथ हैं आध्यात्मिक चर्चा करने वाले आध्यात्मिक व्याख्यान करने वाले बिना परंपरा प्राप्त गुरुओं के वो सब इनके पास नहीं होंगे तो यह एक अच्छाई है इनकी तो
00:23:25:08 क्या अच्छाई है कि सनातन धर्म पर आस्था कुल में उत्पन्न अथवा आस्थानित परंतु अभी तक प्रामाणिक गुरु परंपरा विरोधी किसी भी विचारधारा से दूर अभी तक बचे हुए हैं। इनकी संख्या सबसे ज्यादा है। तो एक तरीके से इनको कहें कि वही भटके वाले जिनका कोई सिद्धांत नहीं है। इसीलिए हमने बताया कि इनका आधार स्पष्ट है। और इसमें कौन-कौन आते हैं? आपको धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति भी मिल जाएगा। कहेगा मैं धर्मनिरपेक्ष हूं। अपने धर्म पर आस्था होगी। मगर यह भी कहेगा नहीं मैं किसी की बुराई नहीं करूंगा या उसमें कोई कमी नहीं निकालूंगा। इस तरीके के साकार विरोधी निराकार विरोधी ईश्वर को पूर्ण रूप से स्वीकार ना करने वाले भी इसमें आएंगे और शास्त्रों अथवा ईश्वर को दोष देने वाले वो भी आएंगे जिज्ञासु कौन से वाले जो जानने की इच्छा रखते हैं कम से कम सुनना सुनने की इच्छा रखते हैं सकारात्मक रवैया लेकर के चलते हैं है ना एक जिज्ञासु वो हो गए जो धर्म अध्यात्म के विषय में जानना चाहते हैं अपने गुरु से वह हो गए प्रथम स्तर वाले। यह जिज्ञासु कौन है? यह भटक तो रहे हैं। अभी गुरु से गुरु से जुड़े नहीं है। ना ही इनके पास प्रमाणिक
00:24:40:16 सिद्धांत हैं। अकाट्य सिद्धांत हैं। और ना ही ये संयोग से उनका अनुकरण या अनुसरण भी कर रहे हैं। है ना? या उनके प्रति प्रमाण्य बुद्धि है। मगर इनके अंदर एक तत्व है जिज्ञासा का। ज्ञान की जिज्ञासा रखते हैं। जिज्ञासु हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण है। जानने की इच्छा रखना है। रखते हैं। इनका प्रतव्य क्या है? इनका सब कुछ असुनिश्चित है। आप इन ऐसे लोगों से जाकर के पूछो कि भगवान साकार है कि निराकार है? नहीं पता होगा। सत्यनारायण की कथा करा रहे होंगे। मगर इनके सिद्धांत नहीं होंगे कुछ भी। कि ब्रह्म ब्रह्म जो है अवतार ले सकता है कि नहीं ले सकता ईश्वर या इसी तरीके के और मोक्ष के विषय में क्लियर नहीं होंगे। बस ये जी रहे हैं। ज्यादातर जो है भटक भटक भटके हुए और कंजप्शन में लगे हुए जैसे कि ज्यादातर हिंदू जब या तो परंपरा प्राप्त सिद्धांतों से जुड़ता है या फिर परंपरा विरुद्ध सिद्धांतों से जुड़ता है तो उसके बीच की उससे पहले का जुड़ने से पहले का जो पहले की जो उसकी स्थिति होती है वो आते हैं इसमें आस्तिकता भास की दृष्टिकोण से सबसे निम्न लेवल के और
00:25:56:14 आस्तिक के दृष्टिकोण से द्वितीय स्तर पर इनकी नियमावली जीवन को जीने में क्या करना है क्या नहीं करना है अस्पष्ट है धर्म इनका परिवर्तनशील है कभी उसी सिद्धांत को लागू कर लेंगे कभी उसी सिद्धांत का खंडन कर देंगे स्थिति अप्रत्यक्ष धर्म विरोधी होते समय आने पर अचानक से कब ये आपका विरोध कर देंगे आपको पता नहीं है। ठीक है? तो आप सदैव इनके प्रति जो है वो नहीं विश्वसनीय नहीं हो सकते क्योंकि आपको पता है कि इनका कोई ग्रंथ नहीं है। निश्चितता नहीं है इनकी नियमावली में। संख्या बल अधिक परंतु धर्मज्ञता का अभाव और सरलता से सुधार योग्य। बस इनकी यही सबसे अच्छी बात है कि अभी तक इन्होंने अपने सिद्धांत नहीं बनाए हैं। अमुक अमुक संस्था संगठन से नहीं जुड़ गए हैं। ध धार्मिक धार्मिकता के नाम पर आध्यात्म के नाम पर नहीं जुड़ गए हैं। देशभक्ति के नाम पर जुड़ गए हैं। राष्ट्रवादिता के नाम पर जुड़ गए हैं। समाज सेवा के नाम पर जुड़ गए हैं। धर्म रक्षा के नाम पर जुड़ गए हैं। मगर आध्यात्मिक सिद्धांतों को प्राप्त करने के नाम पर अभी तक किसी संस्था से नहीं जुड़े हैं। यही सबसे अच्छी इनकी स्थिति अच्छाई है। और यह जो इनका स्तर है, यह सुधार योग्य है। इनका
00:27:12:02 सुधार किया जा सकता है। और यही वह पट्टी है जिस पर आपको सबसे ज्यादा फोकस करना है। यह अभी हम लास्ट में बात करेंगे। यही वो कैटेगरी है हिंदुओं की जिस पर आपको सबसे ज्यादा कार्य करना है। यदि आप स्वयं पहले स्तर पर पहुंच गए हैं तो वरना स्वयं पर कार्य करना है। अब आते हैं तृतीय श्रेणी में। तो तृतीय श्रेणी क्या है? सनातनाभास। द्वितीय क्या थी? धर्मज्ञाभास। अब तृतीय आ गई सनातनाभास। हिंदुओं की कुल जनसंख्या का 25% अथवा उससे
00:27:52:08 अधिक आधार आंशिक वैदिक आंशिक रूप से वैदिक दिखेंगे। समय आने पर वेदों की ही वेदों का ही उल्लंघन करने लगेंगे। अब इसमें व्यवहारिक लक्षण क्या है? जो धर्मज्ञाभास होता है जो धर्मज्ञाभास वाला स्तर है वही जब किसी एक विशेष मान बिंदुओं पर अपना संगठन तैयार कर लेते हैं तो वह बन जाते हैं सनातना। लगेगा कि सनातनी है। सनातन की बात कर रहा है। मगर वो सनातन सनातन नहीं है। सनातनाभास है वो। तो अब जैसे मान लीजिए कि कुछ लोग यह मानना कुछ लोगों ने यह मानना शुरू किया कि हम लोग ईश्वर की पूजा नहीं गुरु की ही पूजा करेंगे। या मान लीजिए किसी ने यह मानना शुरू किया कि ईश्वर निराकार है। निराकार है। निराकार है। निराकार है। और इन लोगों ने एक ग्रुप बना लिया। इनमें कोई हेड है। उसने अपने लिखना चालू कर दिया। अपनी थ्योरी लिख डाली इसके पक्ष में कि ईश्वर निराकार है। तो यही यही जो धर्मज्ञाभास था जो अभी थोड़े समय पहले तक धर्मज्ञाभासी था यही व्यक्ति बन जाता है कौन?
00:29:07:24 सनातनाभास। अब ये वेदों का ऐसा अर्थ करने लगेगा जो परंपरा प्राप्त आचार्यों के विरुद्ध होगा। परंपरा प्राप्त सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। तो क्या है? इसको क्रम से पढ़ लेते हैं। धर्मभासियों का विकसित स्वरूप परंपरा रहित अथवा असत परंपरा दिखाते हुए परंपरा से ज्ञान प्राप्त होने का दावा करने वाले समूह संस्थान अथवा संगठन अज्ञानता धर्मानुकरण में कठिनाई अथवा लोभ के कारण कुछ विशेष मान बिंदुओं के आधार पर शुद्ध सनातन सिद्धांतों का विरोध करने वाले समूह संगठन इत्यादि। धर्म के संबंध में अपनी स्थिति जानने की इच्छा ही ना रखने वाले। देखिए पहला चरण क्या था? धर्म के धर्म के संबंध में अपनी विपरीत स्थिति पता चलेगी तो सुधरने के लिए प्रयास प्रयासरत होंगे। दूसरा चरण क्या था कि धर्म के संबंध में अपनी विपरीत स्थिति प्राप्त ज्ञात होगी तो वहां पर धर्म शास्त्रों का विरोध करेंगे। स्वयं को सही ठहराएंगे। और यह तीसरा चरण क्या है? अब इनको जानना ही नहीं है अपनी स्थिति को। अब तो इन्होंने जो मान लिया है वही सही है और उसकी ही रक्षा करनी है। इनको यह तो सोचना ही नहीं है कि धर्म के किस स्तर पर है कहां खड़े हैं। तो जानने की इच्छा
00:30:22:28 ही नहीं है। उदाहरण क्या है? जानते हैं आप आर्य समाज इस ब्रह्मा कुमारी कबीरपंथी रामपाली ये सब हम अब परंपरा रहित जैसे ब्रह्मा कुमारी आर्य समाज असत परंपरा दिखाने वाले जैसे इस और कुछ विशेष मान बिंदुओं के आधार पर शुद्ध सनातन सिद्धांतों का विरोध करने वाले विशेष मान बिंदु कैसे जैसे हमको कृष्ण और इल्लाह को एक करना है तो हम स्कॉन बनेंगे दूसरा कहेगा मुझे मूर्ति पूजा बंद करनी है तो हम आर्य समाज बनेंगे। तीसरा कहेगा हमको कृष्ण और अल्लाह को एक भी करना है और मूर्ति पूजा भी बंद करनी है तो हम ब्रह्मा कुमारीज बनेंगे। चौथा कहेगा कि हमको खुद को ईश्वर के रूप में ख्यापित करना है तो हम रामपाली बनेंगे। है ना? तो ये हो गए कि कुछ विशेष मान बिंदुओं को लेकर के ये संगठित होते हैं और फिर इन संगठनों पर आस्था इन संगठनों से जुड़ने वाले ये भी इसी स्तर में आ गए। अब इनका प्राप्तव्य क्या है? अब यहां से
00:31:38:02 शुरू हो जाता है खेल जो धर्म जब धर्मज्ञ थे तो क्या-क्या था? वैदिक थे। सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म जब जब धर्माज्ञाभास हुए तो क्या आ गया कि असुर असुनिश्चित ईश्वर एवं मोक्ष और अपरिवर्तन वो परिवर्तनशील धर्म। जब धर्म जब धर्मज्ञ थे तो अह तीनों चीज़ें बिल्कुल स्थिर सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म जब धर्मज्ञा भास हुए तो ईश्वर और मोक्ष में तो अस्पष्टता आ गई यह तो पता ही नहीं है क्या है और धर्म भी परिवर्तनशील हो गया शाश्वतता उसकी नष्ट हो गई अब क्या हुआ ईश्वर पता चल गया अब ईश्वर के प्रति जो असुनिश्चितता थी वो बदल गई अब पता चल गया कि ईश्वर क्या है बाधित है मोक्ष क्या है परतंत्र है और धर्म तो परिवर्तनशील पहले ही हो गया था तो वो अभी लागू है नियमावली असुनिश्चित स्थिति अप्रत्यक्ष सनातन धर्म विरोधी मतांतरों में बटे हुए संगठन कठिनता से सुधार योग्य अब पहले क्या था सरलता से सुधार योग्य धर्मज्ञाभास सरलता से सुधार योग्य और सनातनाभास कठिनता से सुधार योग्य अब
00:32:53:03 इसमें आपको एक बात ध्यान देनी है यहां से आगे चलने से पहले क्योंकि यहां से आगे सनातन विरुद्ध विचारधाराएं हैं आस्तिकता भास में कि आपको जो वर्क करना है सनातन धर्म को संगठित करने के लिए सनातन धर्म की रक्षा करने के लिए हिंदुओं को एक छत्र करने के लिए वो आपको वर्क करना है यह जो द्वितीय श्रेणी है धर्मज्ञाभावास इन पर सबसे पहली बात है कि इन्हीं की संख्या सबसे ज्यादा है तो आपका संख्या बल किससे बढ़ेगा इनसे दूसरी बात है कि इनका अभी तक कोई सिद्धांत नहीं बना है। मतलब ये कोरा कागज है सिद्धांत ना बना होने के कारण। तो इसलिए आपको पहले मिटा करके इन कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है। खाली नोटबुक है उसमें आपको कुछ लिखना है। तो आपके लिए सरलता है। इसीलिए लिखा गया है सरलता से सुधार योग्य। ठीक है? संख्या बल है सरलता से सुधार योग्य हैं। इन्होंने अभी तक अपने सिद्धांत नहीं बना लिए हैं। क्योंकि जब ये सिद्धांत बना लेते हैं अपने तो ये चले आते तीसरे चरण पे। तो इन पे ही सबसे ज्यादा हमें कार्य करना होता है। ऐसे लोगों पर 65% और यह ध्यान रखना होता है कि यह 65% वाला जो व्यक्ति है धर्मज्ञा भाष है यह किसी भी
00:34:08:09 प्रकार से सनातनाभास में ना चला जाए यानी कि वहां से और कठिन ना हो जाए। सरलता से सुधार योग्य की बजाय कठिनता से सुधार योग्य ना हो जाए। इसीलिए हम ऐसे इनफॉर्मेटिव वीडियोस बनाते हैं जिससे कि यह जो धर्मज्ञा धर्मज्ञाभास वाले हैं वह उससे बचें और नीचे और पतित होने से बचें और ऊपर आए। किसी प्रकार से उनके अंदर जो जानने की इच्छा है उसके कारण वह जब अपनी स्थिति को ज्ञात स्थिति से अवगत हो कि अमुक अमुक अंशों में वह धर्म के विरुद्ध जा रहे हैं। शास्त्रों में विरुद्ध जा रहे हैं तो वो अपनी वकालत ना करें। अपने कृत की वकालत ना करें और धर्म और शास्त्रों के प्रति गुरु गोविंद ग्रंथ के प्रति प्रमाण्य बुद्धि दिखाएं। तो तुरंत वही की व जिसने अभी मन में ऐसा सोच लिया इस वीडियो को चलते-चलते अगर उसे लग रहा है कि वह सेकंड वाली स्टेज पर है। इस वीडियो को चलते-चलते भी यदि उसने ऐसा सोच लिया कि जहां पर भी ऐसा होगा कि मेरे में और गुरु गोविंद ग्रंथ में डिफरेंसेस आएंगे। वहां मैं अपना पक्ष लेने की बजाय उनको वरीयता दूंगा। भले ही उसके अनुसार मैं आचरण कुछ दिन बाद करने की ठानू या बहुत दिन बाद कर पाऊं या ना भी कर पाऊं। मगर मैं अपने प्रमाण्य बुद्धि उसी के प्रति रखूंगा। क्योंकि जब तक हम धर्म के वास्तविक स्वरूप के प्रति प्रमाण्य बुद्धि नहीं रखेंगे
00:35:23:13 और अपने ही कृत को हम जो हम मजबूरी में भी कर रहे हैं अगर उसको सही ठहराने लगेंगे उसी को धर्म के रूप में बताने लगेंगे तो धीरे-धीरे वो जो वास्तविक धर्म होगा उसका तो लोप ही हो जाएगा। आने वाली पीढ़ियां जान ही नहीं पाएंगी कि भाई वो धर्म था। आपने क्योंकि विषम अथवा विशेष परिस्थितियों में जो कार्य किया धर्म के विरुद्ध जाकर के उसी को धर्म के रूप में ख्यापित कर दिया। जैसा कि अभी अलंकार समाज के आचार्य आए थे। उन्होंने क्या कहा कि हम देश काल परिस्थिति के अनुसार बदल देते हैं। चीजें नियम बदल देते हैं। और उन्होंने हमसे भी सवाल किया कि आप भी तो ऐसी ऐसी ड्रेस पहनते हो। हम ड्रेस पहनते हैं मगर हम उसकी वकालत नहीं करते। हम उसको धर्म नहीं कहते। हम बोलते हैं कि इतने अंश में मैं धर्म के विरुद्ध चला गया। धर्म से बाहर चला गया। विरुद्ध नहीं। विरुद्ध तो तब होगा जब मैं अपनी वकालत करूं। धर्म का अनुकरण नहीं कर पाया। ठीक है? और प्रयास मन में यही होता है भगवान से ही प्रार्थना करते हैं कि भगवान हमें इतना इच्छा शक्ति दे, मनोबल दे, हमारे आसपास का वातावरण हमें ऐसा प्रदान करें कि हम ज्यादा से ज्यादा शास्त्रनिष्ठ आचरण कर सकें। ठीक है? तो हमें सबसे ज्यादा कार्य किस पर करना है? यह सेकंड वाला जो स्तर है क्योंकि यह बहुत निकट है प्रथम स्तर के। सबसे पहली बात बहुत निकट है। दूसरी बात संख्या बल बहुत ज्यादा है।
00:36:38:26 तीसरी बात अभी तक इन्होंने अपने सिद्धांत नहीं बनाए इसलिए यह सरलता से सुधार योग्य हैं। अब जब इनसे आपको समय मिलता है तो आपको तीसरे चरण वालों पर काम करना है कि वह भी धीरे से प्रथम स्तर की ओर अग्रसर हो सके। ठीक है। अब आ जाती है चतुर्थ श्रेणी। इसमें क्या है? अध्यात्माभास। अब यहां से स्पष्ट वेद विरोध सनातन विरोध चालू। यह आस्तिकता भास की तीसरी और आस्तिक के हिसाब से देखें तो चौथी श्रेणी है। इनका आधार क्या है? वेद विरोधी ग्रंथ।
00:37:21:02 अच्छा। व्यवहारिक लक्षण क्या है? सनातना भाषसियों का विकसित स्वरूप जब सनातना भाष समय पर रोके नहीं जाते वही आने वाले टाइम में नया पंथ नया मत बन जाता है कभी जो इस्लाम है वो भी इसी तरीके से एक संगठन ही तो था किसी जमाने में नहीं रोक पाया आज इस्लाम हो गया अभी आप इस को इस के प्रति कार्य नहीं करोगे प्रतिकार नहीं करोगे थोड़े दिन स्कॉन नाम का एक नया वो आ जाएगा। कुछ भी कह लो उसे पंथ कह लो या वह भी अपने आप को धर्म कहेगा तो धर्म कह लो। खैर अच्छा तो क्या है ये इनका और क्या है? ईश्वर अथवा वेद को प्रत्यक्ष रूप से नकार देने वाले। किसी विशेष देश काल स्थिति में उत्पन्न सिद्धांतों का अनुसरण करने वाले। किसी विशेष देश काल परिस्थितियों में उत्पन्न सिद्धांत उनके भी हैं। धर्मज्ञा भाष से ही चालू है। बस यह उन्हीं का विकसित स्वरूप है और तो ईश्वर अथवा वेद को प्रत्यक्ष रूप से नकार देने वाले इसमें आ जाते हैं। ईश्वर को नकारते
00:38:36:07 कौन है? जैसे जैन बौद्ध इत्यादि। तो अच्छा यह जो पंथ होते हैं वाले चतुर्थ श्रेणी वाले आध्यात्मभास वाले इनको देखने में लगेगा कि आध्यात्म की यात्रा पर जा रहे हैं। इनसे जुड़ेंगे तो बहुत बढ़िया मेडिटेशन ये है वो है विपासना इत्यादि की भी बात होगी। पर अंततवा वो आध्यात्म का आभास है क्योंकि वहां पे सर्वशक्तिमान ईश्वर और परम स्वतंत्र मोक्ष नहीं होता है। ठीक है? तो अध्यात्म भास हो गया। आचरण की दृष्टि से यह मिलते जुलते से ही दिखते हैं। सनातनियों से मैच खाते हुए जैसे अहिंसा की बात करेंगे। है ना? जैन जैन होते हैं वो प्याज लहसुन नहीं खाते हैं। तो काफी हद तक मतलब मिलते जुलते लगेंगे। धर्म के धार्मिक आचरण के स्तर पर सतह लेवल पर देखेंगे। काफी मैच खाएंगे। हिंदू ही हिंदू ही हैं जो थोड़ा सा दूसरी धारा में चले गए हैं। इनका प्रातव्य क्या है? बाधित ईश्वर अथवा ईश्वर का विरोध इनका प्राप्तव्य है। परतंत्र परतंत्र मोक्ष है इनका और धर्म तो परिवर्तनशील है ही। जैसे ही आप वहां से
00:39:51:12 हटे धर्मज्ञ की श्रेणी से वैसे ही आपका धर्म जो है परिवर्तनशील रहेगा। और जब आप धर्मज्ञ होंगे तो आपका धर्म जो है शाश्वत होगा। नियमावली क्या है? असुनिश्चित। इनकी भी नियमावली कब क्या करना है? असुनिश्चित है। स्थिति प्रत्यक्ष सनातन विरोधी गुप्त व्यवहारिक परंतु प्रत्यक्ष वैचारिक शत्रु इनसे वार्ता का विकल्प है। वैचारिक शत्रु तो हैं गुप्त रूप से व्यवहारिक भी हैं। परंतु वार्ता का विकल्प शेष है अभी भी। उदाहरण जैन, बौद्ध इत्यादि। अब आ जाती है पंचम श्रेणी। धर्माभास। इसमें क्या है? आधार वेद विरोध, सनातन विरोध। अब लक्षण क्या है? व्यवहारिक लक्षण। अज्ञात नास्तिक पंथों का विकसित स्वरूप। अब जब यह जैन बौद्ध जैसे इसमें भी विकृति आती है। इसमें भी पतन होता है। तो कहां पहुंचता है फिर मामला? धर्माभास पर। तो अज्ञात नास्तिक पंथों का विकसित स्वरूप। जब ये और प्रबल हो जाते हैं, शक्तिशाली हो
00:41:06:12 जाते हैं तो यह धर्मास में पहुंच जाते हैं। किसी विशेष देश काल परिस्थिति में उत्पन्न सिद्धांतों का अनुसरण करने वाले कालांतर में उद्भाषित पंथ आचरण की दृष्टि में अधिकांशत भिन्न रहने वाले सनातन से मत, पंथ इत्यादि। जैसे उदाहरण इस्लाम, क्रिश्चियनिटी। अब इस्लाम क्रिश्चियनिटी क्या हो गए? कि आपको सतह स्तर पर ही बहुत सारी भिन्नताएं दिख जाएंगी। प्राप्तव्य क्या है? बाधित ईश्वर ईश्वर का विरोध या तो बाधित ईश्वर है या फिर ईश्वर का विरोध होगा और परतंत्र मोक्ष
00:41:49:28 और परिवर्तनशील धर्म। तो इसके बाद इनकी नियमावली भी भाई धर्म नहीं है तो नियमावली असुनिश्चित जैसे ही धर्म जहां से लोप हुआ वहां पर नियमावली असुनिश्चित क्योंकि धर्म होने का मतलब ही है कि आपकी नियमावली असुनिश्चित नहीं है। सुनिश्चित है। व्हाट टू डू? स्थिति क्या है? प्रत्यक्ष सनातन विरोधी प्रभाव रहित वैचारिक पिछले वाले कैसे थे? गुप्त रूप से व्यवहारिक परंतु प्रत्यक्ष वैचारिक शत्रु और यह क्या है? प्रभाव रहित वैचारिक इनके पास वैचारिक दृष्टि से कोई बहुत प्रभावशाली नहीं है ये। परंतु प्रबल व्यवहारिक विरोधी व्यवहार की दृष्टि से ये प्रबल विरोधी हैं आपके। यह ध्यान रखने वाली बात है। तो
00:42:45:21 और हमने यहां लिखा है कि कोई विकल्प नहीं वार्ता का कोई विकल्प नहीं। परंतु आप समझ सकते हैं यहां क्या होना चाहिए उचित होगा। तो यह हमारा धर्मामीटर है। अब इसमें सबसे बड़ी बात है कि यदि आपको सनातन धर्म की रक्षा करनी है तो सबसे पहले अपने ये जो धर्मज्ञाभास द्वितीय श्रेणी वाले हिंदू हैं इनको बचाना है। सनातनाभास तृतीय श्रेणी वाले हिंदुओं में जाने से। इसमें जाने से आपको बचाना है। इनको जैसे जैसे करके अपने साथ प्रथम स्तर पर लाकर के खड़ा करना है और
00:43:26:04 प्रथम स्तर पर लाने का सबसे सरल उपाय है। यह नहीं है कि वह त्रिकाल संध्या करने लगे। यह नहीं है कि वो जनेऊ धारण कर करके करते हुए 100 चदि पूरे सारे समस्त जितने भी नित्य कर्म बताए गए हैं वो सब का निर्वाह करने लगे। केवल एक चीज गुरु गोविंद और ग्रंथ के प्रति प्रमाण्य बुद्धि अपनी वकालत ना करे। उनके प्रति प्रमाण बुद्धि रखे। तुरंत उसी समय आ गया। जैसे ही उसके अंदर यह बात आई बहुत सरल है। जिसको भी आप यह पढ़ाएंगे यदि वह द्वितीय स्तर पर होगा तो पढ़ते-पढ़ते भी प्रथम स्तर पर आ जाएगा। इसलिए थर्मामीटर की आवश्यकता है। तो आपको इनको नीचे जाने से बचाना है, ऊपर लाना है और फिर जो तृतीय श्रेणी वाले अपने हिंदू भाई हैं उनको भी किसी तरीके से जागरूक कर करके कर करके कर करके प्रथम स्तर तक लाना है। तब आप जो है ये जो चार्ट में जो आपको तीन सेक्शन दिखाई दे रहे हैं हिंदुओं के और बाकी के दो सेक्शन दिखाई दे रहे हैं। अह अहिू मतलब हिंदू तो इन्हें भी कहा जाता कहा जाता है जैन बौद्ध इत्यादि को कुल मिलाकर के जब आप अपना संगठन तैयार करेंगे इन तीन पट्टियों को एक साथ करेंगे और किसी तरीके से आप तब जाकर के आप
00:44:41:27 यह जो पंचम श्रेणी का धर्माभास है इससे सामना करने के लायक हो सकेंगे तब आप संगठित हो सकेंगे तब आप खड़े हो सकेंगे तब आप कह सकेंगे कि हम तुमसे नहीं डरते तब आप अपने घर की मातृ शक्तियों की रक्षा कर सकेंगे। इसलिए यह धर्मामीटर आप लोगों के पास होना चाहिए और हम इसको उसके द्वारा प्रिंट प्रिंट के द्वारा जो है स्टीकर्स के माध्यम से और अन्य अन्य-अ्य्य्य तरीकों से आपको उपलब्ध कराने का प्रयास करेंगे। पर पंचम श्रेणी जहां पर क्या है? एक बहुत आवश्यक चीज
00:45:24:13 कि प्रभाव रहित वैचारिक परंतु प्रबल व्यवहारिक विरोधी तो इसमें जैसे हमने कॉमन चीजें देखी हैं कि जैसे ही धर्मज्ञ से धर्मज्ञाभास पर आए थे तो धर्मज्ञाभास का तो सब कुछ असुनिश्चित है। बस परिवर्तनशील धर्म हो गया। वह भी असुनिश्चितता ही है। उसके बाद से ले और लास्ट तक यानी कि सनातनाभास, आध्यात्मभास और धर्माभास इन तीनों में बाधित ईश्वर है। परतंत्र मोक्ष है। मोक्ष पूरी तरीके से परम स्वतंत्र नहीं है। और परिवर्तनशील धर्म है। बाधित ईश्वर कैसे? जैसे सनातना बाधित ईश्वर जैसे आर्य समाज का ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। ब्रह्माकुमारी का ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। और इस का ईश्वर दूध से दही दही से दूध ये सब भी बाध्यता है
00:46:24:08 और आगे है अ बौद्ध और जैन का ईश्वर ईश्वर के संबंध में उनका मोक्ष बाधित है क्योंकि उनके पास ईश्वर है ही नहीं तो नित्य ईश्वर नहीं है और प्राप्तव्य क्या है आगे जो पंचम श्रेणी है उनका क्या है वहां पर बाधित ईश्वर है अल्लाह अवतार नहीं ले सकता। गॉड अवतार नहीं ले सकता। और भी बहुत सी चीजें सब सर्वव्यापी नहीं है। सब जगह नहीं है। उसकी शक्ति है सब जगह तो वो नहीं हो सकता। यह भी बाध्यता आ गई। मोक्ष भी परतंत्र है। आखिर रात में केवल दर्शन होंगे ऊपर वाले के। और इसी तरीके से बाकियों का भी पर मोक्ष परतंत्र है। जैसे सनातनाभास का आर्य समाज का मोक्ष क्या है? कि आपको इतने समय तक रहना है फिर वापस आ जाना है। यह मोक्ष है। और रामपाल का मोक्ष क्या है? कि आप जो है काल के संसार में हो और आपको जो है सतलोक में वापस जाना है। मगर काल क्योंकि जन्मता मरता है तो काल मरेगा जब उस समय तो कोई लोक होगा नहीं। यानी सारी आत्माएं वापस अपने वहां पहुंच चुकी होंगी सतलोक में। वह फिर उत्पन्न होगा। फिर उत्पन्न होगा तो फिर उसके दोबारा से वह सृष्टि बनाएगा। दोबारा से
00:47:39:10 आत्माएं उसके चाल में फसेंग। तो इस तरीके से यह चार्ट है। यह आपकी मदद करेगा हिंदुओं को प्रथम स्तर पर लाने में। जहां पर हिंदू स्पष्ट हिंदुओं की नियमावली स्पष्ट हो पाएगी। जहां पे वह प्रतिराध धर्म परायण हो पाएंगे। जहां वह संगठित हो पाएंगे। आत्मबल अधिक होगा और जो प्राप्ति के योग्य स्थिति है उसमें वह पहुंच पाएंगे। जिनके पास सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म होगा। यही चीजें हैं जो आपको एक कर सकती हैं धर्माभास से लड़ने में। पंचम श्रेणी वाले से सामना करने में। ठीक है? अब वीडियो को पूरा करने से पहले एक चीज और बता दूं मैं कि धर्म एवं ईश्वर यानी यह जो अध्यात्म के संबंध में अंतरात्मा से उठने वाले प्रश्नों का उचित समाधान प्राप्त ना हो पाने की स्थिति जब चरम सीमा पर पहुंच जाती है तब धर्माभास से भी पतित हो जाने वाला मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से नास्तिक बन जाता है। है ना? तो जब
00:48:54:25 जब धर्मज्ञ पतित होता है तो धर्मज्ञाभास फैलता है। जब धर्मज्ञाभास पतित होता है तो सनातनाभास फैलता है। जब सनातनाभास पतित होता है विकृति उसमें भी आ जाती है तो अध्यात्माभास होता है। अध्यात्माभास में विकृति हो जाती है तो धर्माभास होता है। और जो धर्माभास से भी विकृत स्थिति है वो है मानवताभास जिसे हम नास्तिक कहते हैं। नास्तिक कौन है? धर्मणी ना पशु भी समान है। तो जिसके पास धर्म नहीं है वो पशु के समान है। इसका मतलब मानव होते हुए वो क्या है? उसके अंदर मानवता भास है। है वो पशु। तो मानवता भास हो जाता है। और इसमें एक चीज और ध्यान रखिएगा कि इस अध्ययन में वर्गीकरण करते समय जो लक्षण प्रकट करने वाले शीर्षक दिए गए हैं। वो लक्षण वो शीर्षक लगभग सभी आस्तिकता भाषियों में घटित होते हैं। है ना? जैसे धर्मज्ञा भाषी जो है वह वैदिकता भाषी भी है क्योंकि अमुक अमुक जगह अपने शास्त्रों का खंडन कर देगा तो इस कारण से वह सनातना भाषी भी है यानी कि वो जो थर्ड
00:50:09:27 वाली श्रेणी थी वो भी उसमें गौण रूप से है तो जब वो सनातना भाषी भी है तो आस्तिकता भाषी भी है तो वो नास्तिक भी है गौण रूप से तो जब नास्तिक भी है गौण रूप से तो गौण रूप से वो मानवता भासी भी है। परंतु यह शीर्षक जो दिए गए हैं सद्ध श्रेणी श्रेणी में आने वाले व्यक्ति अथवा समूह के उस लक्षण को ध्यान में रखकर दिए गए हैं जिसके द्वारा इस व्यक्ति अथवा समूह को सरलता से चिन्हित किया जा सके और जो लक्षण उसमें प्राथमिकता से हो। गौण रूप से तो नास्तिक सभी हैं। जैसे ही आप पतित हुए तो नास्तिक सभी गौण रूप से मगर उनमें आस्तिकता भास भी है। तो नास्तिक की बजाय उनको आस्तिकता भाष कहना ज्यादा उचित सिद्ध हुआ। और आस्तिकता भासी होते हुए क्योंकि वो धर्माचरण कर रहे हैं। कहीं ना कहीं मंदिर जा रहे हैं, ये कर रहे हैं, धर्मज्ञ दिख रहे हैं। तो धर्मज्ञाभास उनके लिए ज्यादा वो हो गया। उनका उनके अंदर प्राथमिकता से चरितार्थ जो लक्षण है वो हो गया। तो इस तरीके से इसमें दिए गए हैं। आपको आशा करते हैं यह जो हमारा हमारी पहल है यह अच्छी लगी हो। यह प्रयास हमारा कुछ आपको लाभ लाभदायक
00:51:25:03 लगे। आपको लाभप्रद होगा। ऐसी हमारी ईश्वर से प्रार्थना है। और अब जब आपको यह पता चल गया है कि आपको किस हिंदू पर किस तरीके से कार्य करना है। सबसे ज्यादा द्वितीय श्रेणी पर कार्य करना है। हम कर भी रहे हैं और आपको भी करना है। धर्मज्ञा भाषियों पर आप कार्य करिए। क्योंकि वही ऐसे हैं जिनका जिनके सिद्धांतों की जो नोटबुक है वह भी कोरी है। उसमें आप सनातन के सार्वभम अकाट्य सिद्धांत लिखिए। ठीक है? और एट दी सेम टाइम उनको बचाइए सनातना सिद्धांतों में जाने से क्योंकि फिर आपका उन्हें वापस लाना कठिन हो जाएगा। रामपाली जो हो गया कुंद हो गया। वापस लाने में आपको दिक्कत है। आर्य समाधि अलंकार समाधि जो हो गया कि फिर तो गायत्री मंत्र व्यर्थ है। व्यर्थ तो नहीं है। हर तरह से व्यर्थ सिद्ध हो गया। उसके बाद गलत तो नहीं है। है ना? कहेंगे वही जो हमें हमने रटा है। तो इसलिए बचाइए वहां पहुंचने से और फिर ऐसा भी नहीं है। इनको अपने भाइयों की दृष्टि से ही देखिए। जो आर्य समाज इस इत्यादि इनको भी वापस लाने का प्रयास करना है। मगर सबसे ज्यादा हमारा फोकस होना चाहिए जो धर्मज्ञाभास वाली श्रेणी है उस पर और जैसे-जैसे हमारा ये संगठन बड़ा होता जाएगा वैसे-वैसे
00:52:40:04 जो सनातनास का जो कमजोर हिस्सा होगा वो पहले आएगा। फिर वहां का जो कठोर हिस्सा होगा उससे हम लोग बातचीत करके चर्चा के माध्यम से तब वो आएंगे। तो हम संगठित होंगे और जब हम संगठित होंगे तब सामने वाला यानी कि यह पंचम श्रेणी धर्माभास व्यवहारिक रूप से सबसे स्ट्रांग जो सामने खड़ा हुआ विरोधी है वो हमारे बारे में कोई गलत बात सोचने से पहले 100 बार सोचेगा इस समय अभियान चल रहा है संघास्त्र उससे जुड़े अपने घर के बाहर लिखें मेरा घर हिंदू राष्ट्र अपने आसपास के मंदिरों के बाहर लिखें हर घर हिंदू राष्ट्र और अगर इन दोनों में से कोई भी चीज संभव नहीं है तो कम से कम एक स्लेट में लिख के कि मेरा जीवन हिंदू राष्ट्र रील्स बनाएं अपने घर में लिखते हुए भी रील्स बनाएं मंदिरों में लिखते हुए भी रील्स बनाएं मगर वो रील्स बनाते समय आपको अपना चेहरा सामने लाना आवश्यक नहीं है। अगर जब आप मेरा जीवन हिंदू राष्ट्र कह रहे हैं कम से कम तब अपने चेहरा दिखाते हुए रील बनाएं और इन रील्स को हमसे शेयर करें#शटग यूज़ करें ऑपरेशन संघास्त्र अपने घर के बाहर वैदिक ध्वज
00:53:55:26 लगाएं और इस तरीके से चिन्हित करें उन हिंदुओं को जो कायर नहीं है। चिन्हित करें उन हिंदुओं को जो समय आने पर हिंदुओं हिंदू धर्म की रक्षा के लिए हिंदुओं के घर की रक्षा के लिए हिंदुओं की मातृशक्तियों के लिए मानवता की रक्षा के लिए आपके साथ खड़े होने वाले हैं। कौन है वो? अभी आपको नहीं पता है। चिन्हित करिए इस माध्यम से और इसी माध्यम से एक मैसेज दीजिए सामने वाले को कि हम तुमसे डरते नहीं हैं और हम इतने हैं। है ना? इतने हैं जो समय आने पर तुम्हारे सामने खड़े हो जाएंगे। तो यह चीजें बताइए सामने वाले को अपना संख्या बल बताइए। अपने संघ की शक्ति बना बताइए सामने वाले को और Instagram पर भी कैंपेन चल रहा है। तो वहां फॉलो करिए। WhatsApp नंबर है। WhatsApp ग्रुप से जुड़ जाइए। तो वहां पर फॉलो करिए। तो यह आज धर्मामीटर हमने आपके सामने रखा। आशा करते हैं आपको लाभदायक लगा हो। सभी को जय श्री राम।
00:55:05:28 [संगीत]
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