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00:00:01:26 तो अब जो है इनकी आठवी मिथ्या आती है कि जो ब्रह्मा विष्णु महेश हैं वह गुण है या तो वह गुण से बंधे हुए हैं यह दशाना चाहते हैं वह गुण मात्र गुण का स्वरूप है सतर और तम है ना हमने पूर्व में प्रमाण दिए ना फिर से दे देते हैं क्या देते हैं भगवान माया के गुणों से रहित हैं अनंत हैं और अपनी इच्छा से यह तीन गुण वो स्वीकार करते हैं कहां लिखा है

00:00:29:07 श्रीमद् भागवत दो पा 18 अच्छा और क्या है शिवजी किसी भी प्रकार के गुण से रहित हैं एवं वही सृष्टि की उत्पत्ति पालन समार तीनों करते हैं अतः इस प्रकार शिव जी की श्रेष्ठता बताने वाले शास्त्र भी तामसिक नहीं है ना तो शिव जी तामसिक है ना जो है उनके शास्त्र तामसिक है ये कहां लिखा है श्रीमद् भागवत 8 सा 2 31 महाभारत अनुशासन पर्व दान धर्म पर्व अध्याय 14

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00:01:02:04 से 14.2 24 और भगवती को तो निर्गुणा हम सुन आए हैं फिर से ले लीजिए देवी भागवत 3.9 34 से 37 भगवती जो है निर्गुणा है गुणों से परे हैं निर्गुण तो एकमात्र परमात्मा कौन है परमात्मा परमात्मा कौन है देवी देवी भागवत 3.70 तो आपके द्वारा फैलाई गई ये मिथ्या भी यहां समाप्त हो गई वो जो है गुण नहीं है गुण है वो ब्रह्मा विष्णु महेश अब आपकी नवी मिथ्या आती है ब्रह्मा विष्णु महेश अविनाशी नहीं है इनका जन्म और मरण होता है होता है लीला रूप में होता है लीला रूप में वस्तुतः अविनाशी है कहां से पता लगा देवी ब्रह्म स्वरूपा नित्य और सनातनी है भगवती नित्य और सनातनी है देवी भागवत 9 एक आ से 10 देवी पुराण में भगवान श्री कृष्ण को भी परब्रह्म परमात्मा कहा गया है श्री कृष्ण को परब्रह्म परमात्मा कहा गया है तो भगवती का पांचवा स्वरूप देवी श्री राधा परमात्मा श्री कृष्ण को प्राणों से भी प्राप्त प्यारी हैं देवी भागवत न 1.44

00:02:18:14 श्री कृष्ण चंद्र परमात्मा की आज्ञा से तो यह सब वो वाले प्रमाण आ गए जहां पर कृष्ण जी को परमात्मा कहा जा रहा है और निर्गुण तो एक वो जो नित्य सनातन है वो कौन है माता है वह परमात्मा एक है और भगवान श्री कृष्ण ही ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश इन पांच रूपों में उत्पत्ति स्थिति समार निग्रह और अनुग्रह नामक तथ के कृत के निर्वाह हेतु लीला रूप में प्रकट होते हैं ब्रह्म वैवर्त पुराण पढ़ो बहुत अध्ययन की आवश्यकता पड़ेगी श्री भगवान कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं मैं अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी अपनी योग माया को अधीन करके प्रकृति को अधीन करके प्रकट होता हूं चार छ भगवत गीता ध्यान देने वाली बातें दो है पहली यह है कि भाई लीला रूप से वह जन्म लेकर और अपनी देह का नाश करके दिखा रहे हैं लीला रूप से अब आपका कहना है कि उनका भी जन्म मरण होता है तो बात ये आ जाती है कि क्या आपका ईश्वर सर्व मान है जिसको आप कबीर कह रहे हैं अगर वह

00:03:33:20 सर्वशक्तिमान है तो क्या वह किसी सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है अथवा व नियमों के नीचे कोई कोई एक नियम ऐसा जो उसे मानना पड़ता है तो अगर वह सर्व नियामक है तो क्या वह जन्म ले सकता है तो क्या वह अपनी देह का नाश करके दिखा सकता है अगर आप कहते हो कि नहीं दिखा सकता तो पहली बात तो यह है कि वह ईश्वरी क्या पहली बात तो तर्क है कि जो कहीं पर बाधित हो जाए वह ईश्व ही कैसा इस पर नास्तिकों का खंडन वाला वीडियो देखिएगा जीव की चाह है सत चित आनंद अवाद बन जाना सब कुछ कर सकने वाला बन जाना तो जीव की चाह का मुख मूल विषय कौन है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर तो जब जी जीव की चाह है कि वह अ बाध्य बन जाए तो इसका अर्थ है कि सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर जो है वह बाधित ना होने वाला हो अब बाध्य हो वो ईश्वर वही जीव की चाह का मूल विषय है और उसी को उसी के साथ एकत्व स्थापित करके जीव को जो है मोक्ष प्राप्त हो सकता है जिसे हम मोक्ष कह सकते हैं परम कल्याण कह सकते हैं है ना तो ये तो तर्क हो गया कि वो ईश्वर जो बाधित है किसी नियम से इसका

00:04:48:25 मतलब उसके ऊपर भी कोई अन्य अथॉरिटी है जो उसे कंट्रोल कर रही है दबाव आ रहा है उसके ऊपर मैं जन्म नहीं ले सकता मैं अपनी देह का नाश नहीं कर सकता दबाब आ रहा है है ना तो क्या है अब मगर शास्त्रों में भी दिया गया है कि जो ईश्वर है वह पूर्ण है पूर्ण का मतलब पूर्ण उसमें से ना कुछ घटता है ना कुछ बढ़ता है वो पूर्ण है उसमें कोई कमी नहीं है तो उसमें यह कमी भी नहीं हो सकती कि वो जन्म नहीं ले सकता उसमें यह कमी भी नहीं हो सकती कि वो अपनी देह का नाश नहीं कर सकता तो क्या हुआ तैत्र उपनिषद दो एक सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म ईश्वर किसी भी प्रकार के नियमों के नीचे नहीं है वो सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है तो अगर ईश्वर के ऊपर भी नियम लग रहा है तो इसका मतलब जिसके बारे में बात हो रही है वो ईश्वर नहीं है इसी प्रकार से ब्रह दनक उपनिषद में पांचवें अध्याय में बताया गया कि ईश्वर जो है वो पूर्ण है

00:05:48:03 पूर्ण हम ये पूर्ण और ये पूर्ण ईश्वर जीव की चाह का मूल विषय है ये कैसे पता लगा बनक उपनिषद एकती 28 असतो मा सद गमय तमसो मा ज्योतिर्मया मृत मा मतम गम ठीक है तो ये जो चाह आ रही है जीव के अंदर इस चाह का विषय वही ईश्वर हो सकता है जो अवाद हो जिसके ऊपर किसी भी प्रकार का कोई भी नियम लागू नहीं हो सकता आप आना मेरे पास हम जिस ईश्वर को मानते हैं वह जगत बनाता ही नहीं बनता भी है गुरुदेव का वचन है जिनका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता भी है उन्हीं का ईश्वर श्री राम कृष्ण आदि के रूप में अवतार ले सकता है सकता है यह सक्ता नहीं आना चाहिए ईश्वर के सामने कि वह यह नहीं कर सकता उसका ऐसा नहीं हो सकता यह सक्ता जहां जहां आएगा वहां वहां ईश्वर बाधित हो जाएगा और जैसे ही ईश्वर को बाधित होगा वैसे ही लोग अपने बाधित होने वाले सैकड़ों ईश्वर बनाते रहेंगे सैकड़ों धर्म बनाते रहेंगे सैकड़ों धर्म बना बना कर के दुनिया में संसार में जो है विप्लव की स्थितियां

00:07:03:13 बनाते रहेंगे जब तक आप ईश्वर को अवाद नहीं पकड़ोगे अबद ईश्वर तक नहीं आओगे तब तक सबको छूट मिल जाती है ठीक है तुम्हारा अवतार नहीं ले सकता ठीक है हमारा निराकार नहीं हो सकता हो गए भैया हमने भी बना लिया अपना नया ईश्वर सब बनाएंगे ईश्वर के प्रति निष्ठा ही नहीं है जबकि गुरुदेव का वचन क्या है कि जिनका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं जगत बनता भी है उन्हीं का ईश्वर श्री राम कृष्ण आदि के रूप में अवतार ले सकता है तो क्या कहा भगवान ने यद्यपि मैं अजन्मा विनाशी हूं मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी सभी भूतों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योग माया से प्रकट होता हूं और यजुर्वेद में क्या कहा गया यद्यपि व अजन्मा है फिर भी विविध रूपों में उत्पन्न होता है यजुर्वेद 311 अब एक फैक्ट फुल बात यह आती है कि भाई अविनाशी तो जीव भी है इनके जो इस समय जेल में है रामपाल दास जी वो भी बोलते हैं जीव भी अविनाशी है अरे भाई जब वोह अविनाशी होते हुए जन्म ले सकता है तो ईश्वर को कैसे वादित कर देते हो आप वोह नहीं ले

00:08:18:19 सकता हां वही बात आ जाती है कि वह कैसे आ सकता है वह जन्म के जन्म और मरण के उससे कैसे हो सकता है और जब आप जीव की देह के नाश से जीव का नहीं मानते हो तो ईश्वर को ईश्वर की देह के नाश से उसका नाश क्यों मानते हो क्योंकि अपनी रोटिया सेकनी है ना तो क्या है चलो हम प्रमाण अपने देंगे जीव भी अविनाशी है क्या है नैनम छिंदंति शस्त्राणि है भगवत गीता दो 30 और ये जो श्लोक पढ़ा था यह 22 तो अब क्या आता है कि कबीर पंथिया के द्वारा रामपाल दास के फॉलोअर्स के द्वारा इस अविनाशी सनातन ईश्वर को ना मानकर सनातन धर्म ग्रंथों की ही आड़ में अपने अनुसार मनमुक व्याख्या करते हुए ईश्वर को किससे जोड़ा जाता है इस्लामिक ईश्वर से सातव आसमान पर तो बैठा ही दिया छह दिन में सृष्टि की रचना कर ही दी और कैसे जोड़ा

00:09:34:00 गया उससे जोड़ दिया गया मगर वहां पर वोह क्या कह रहा है इस्लाम का ईश्वर क्या कह रहा है 611 में उसकी कोई मूर्ति नहीं हो सकती तो अनेक अनेक जगह का 611 में स्पष्ट कहा है मेरी कोई संतान नहीं हो सकती बाधित है तो अब बात यह आती है कि अगर वह बाधित है तो इसमें कहीं-कहीं पर यह कह देते हैं कि वहां पर वह गलत है या वह लोग समझ नहीं पा रहे हैं भाई वह जो ज्ञान है जो इस्लामिक किताब है उसका जो ज्ञान है वह आप तक आया कैसे है जिन लोगों की मध्यस्थता से आया उनका बताया हुआ अर्थ यदि आप नहीं मान रहे हो तो आपका उनके द्वारा दी गई किताब पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता कैसे करोगे जो आपको अर्थ गलत बता रहा है वह आपको किताब भी तो गलत दे सकता है तो आप ऐसा नहीं कर सकते कि उसी सोर्स ऑफ इंफॉर्मेशन से एक चीज मान ली और उसी सोर्स ऑफ इंफॉर्मेशन से दूसरी चीज नहीं मानी जैसे हमने अभी जो उदाहरण दिया कि जीव जो है नित्य है सनातन है उसका कभी नाश नहीं होता विनाशी है उसके लिए हमने आपको बताने के लिए जो आपके रामपाल दास हैं

00:10:49:02 उनका अ संदर्भ तो दिया मगर उसके ऊपर निर्भर नहीं रह गए हमारे पास अपनी सामग्री है ये मानने के लिए कि जीव अविनाशी क्यों है इसी प्रकार से यदि कुरान के संदर्भ से आप कुछ कह रहे हैं कि कुरान में यह लिखा है तो कुरान में क्या-क्या लिखा है उसके लिए तो आप उसी पर आश्रित है ना जिससे कुरान ले रहे हैं तो इसलिए उसकी अन्य बातों को नकार नहीं सकते हम रामपाल दास की अन्य बातों को इसलिए नकार सकते हैं क्योंकि जीव को अविनाशी मानने के लिए हम रामपाल पर निर्भर नहीं है क्योंकि अगर निर्भर होते तो हम हमें उसकी दूसरी बात भी माननी पड़ती न 10 जो गायत्री मंत्र है वो महत्त्वपूर्ण नहीं है वह जो है मोक्ष में मोक्ष का साधक नहीं है और अपितु जो इनके द्वारा बताया गया जो मंत्र है वो भी इनके द्वारा वहीं से पिक किया गया है चेरी पिकिन जो भगवत गीता में भगवान ने कहा प्रणव के साथ तत सत तो एक मात्र यही मंत्र सर्वोपरि है बाकी जो नमः शिवाय हैं प्रणव के साथ सभी या प्रणव के बिना जो स्त्रिया स्त्रिया आदि के लिए उपयुक्त माना गया है मातृ शक्ति के लिए वो सभी जो है एक साइड केवल इनका ये जो ये है यही सही

00:12:04:08 है तो गायत्री मंत्र का विरोध करते हुए यह मंत्र जो है वो है यह जो शब्द है वो है हालांकि भगवान के तो नाम है उन्होंने कहा ये नाम है इसके द्वारा भी परम गति मिल जाए है ना मगर यदि गायत्री मंत्र का विरोध करते हुए इसका कोई अस्तित्व है वही वाली बात कि माता भगवती का विरोध करते हुए किसी का कोई अस्तित्व अगर मानेंगे भगवान विष्णु का शिव का तो यह वो शिव और विष्णु नहीं है जो परम तत्व है है ना तो गायत्री मंत्र का महत्व क्या है गायत्री के जब से मोक्ष और भोग दोनों की प्राप्ति होती है कहां बताया गया देवी भागवत 123 25 पृष्ठ संख्या नहीं है जो कबीर पंथ के द्वारा पृष्ठ संख्या बोला जाता है पृष्ठ संख्या नहीं है श्लोक क्रमांक है देवी भागवत 12325 गायत्री के से मोक्ष की प्राप्ति होना बताया गया है श्रीराम के द्वारा गायत्री का आलंबन लेते हुए सच्चिदानंद स्वरूप परब्रह्म के रूप में भगवान शिव की शिव का ध्यान किया गया है किसका किसके किसके द्वारा गायत्री मंत्र के द्वारा और कहां पर किया गया वाल्मीकि रामायण एकती एक 29 31 से 32 संध्या में गायत्री मंत्र का जाप होता है रामो विग्रह वान धर्म

00:13:19:08 वाल्मीकि रामायण 337 1 धर्म क्या है श्री राम तो धर्म का पालन करना है तो क्या करना श्री राम जैसा जैसा कर रहे वो धर्म तो अब बताइए कि श्री राम का जो धर्म है उसका पालन करें कि धर्म विरुद्ध जो बताया गया है उसको सच माने श्री राम तो कह रहे हैं कि गायत्री मंत्र भी है जो पंचाक्षरी मंत्र भी है वह भी है वह तो कह रहे हैं आप कह रहे नहीं गायत्री मंत्र नहीं केवल जो हम बता रहे हैं वही है जो हम बता रहे हैं केवल वही है तो यहां पर राम का विरोध हो गया राम की बातों का व खंडन हो गया तो राम कौन है धर्म तो राम को माने कि आपको बात वैया मैंने कई बार कहा था ना मेरे जो जैसे ही कहीं पर कोई अधर्म हो रहा होता है तो मेरे पास जब कुछ नहीं होता है तो राम होते हैं केवल राम को ले आओ सारे जितने भी तथाकथित सनातन का विरोध करने वाले तंत्र है व्यक्ति है विचारधाराएं हैं सब शांत होने लगेंगी राम को लागे राम को पकड़िए राम राम राम को रखो कहां भागोगे राम से कैसे बचोगे राम धर्म है तो आप आपने कहा गायत्री मंत्र निरर्थक है व्यर्थ है हां तो ले

00:14:34:18 लो अब क्या है कि धर्म धार्मिक आचरण करें कि धर्म विरुद्ध आचरण करें ये आप बताइए अब बात यह आ जाती है कि सबसे पहली बात गीता अथवा किसी भी शास्त्र में इस शब्द युग्म को प्रणव इसको मंत्र नहीं बोला गया है मंत्र कहकर संबोधित नहीं किया गया और ना ही इसका जाप करने के रूप में कहीं पर आदेश प्राप्त हुआ है सभी सुति स्मृति शास्त्रों में नाम जप हेतु निर्देशित इस नाम जप हेतु यह वाला नाम जब इसके लिए भी निर्देशित नहीं किया गया अच्छा इसका इसका किस रूप में उल्लेखित हुआ है किस रूप में हुआ है यज्ञ दान तप आदि शुभ कार्यों को करते समय इसका प्रयोग किया जाता है प्रयोग जाप के रूप में प्रयोग किया जाता है यह नहीं है फिर भी यदि नाम जप के रूप में इसको ग्रहण कर भी तब भी जिस शास्त्र में इसका वर्णन है उसी शास्त्र में सभी प्रकार के कार्यों को शास्त्र द्वारा निर्धारित विधि के आलंबन के सानिध्य में किसी भी कार्य को करने का करने की आज्ञा दी जा रही है कहां लिखा है श्रीमद भगवत गीता 1724 1624

00:15:49:28 शास्त्र विधि तस्मा शास्त्रम प्रमाणम तो क्या है अब ध्यान देने योग्य बात है कि शास्त्र के किसी वचन मंत्र अथवा उसमें बताए गए भगवान के नाम का जाप करने हेतु शास्त्र विधि भागवत में बताई गई है क्या है वह विधि बिना गुरु दीक्षा के जाप नहीं करना चाहिए बिना दीक्षा के जाप नहीं करना चाहिए तो यह हो गया देवी भागवत 12 सा दो से तीन अभी मुझे लग रहा है आप लोगों के मन में आने लगा होगा जो जो इस वीडियो का विरोध करने बार अरे हम बिना दीक्षा के नहीं करते हम तो नाम दीक्षा ले लेते हैं बताता हूं आगे गुरु दीक्षा से विमुख रहे लोग भ्रांत है अपने वास्तविक ज्ञान से रहित है सचमुच पशु के समान है परम तत्व को वो नहीं जानते स्कंद पुराण गुरु गीता 189 ठीक है अब यहां पर ये हमने बताया इससे क्या सिद्ध हो रहा है तो सब कुछ प्रश्न उठते हैं क्या संत कबीर दास जी के संदर्भ से नाम मंत्र जाप के समर्थन में कोई प्रमाण है यह जो तत्सत दिया जा रहा है प्रणव के साथ

00:17:05:24 क्या कबीर दास जी ने इसका जाप करने को कहा है या किया है या कुछ उनकी तरफ से निर्देशित यदि है भी तो कबीर दास जी को यह नाम मंत्र दीक्षा स्वरूप किससे प्राप्त हुआ क्या कहा जा रहा है कि गुरु सबका होना चाहिए और गुरु दीक्षा के बिना आगे नहीं बढ़ सकते कबीर दास जी को यह जो नाम मंत्र है कहां से प्राप्त हुआ अगर उसने उन्होंने दे दिया है कहीं पर पहले बात तो दिया नहीं है अगर दिया है तो उनको कहां से मिला क्या गुरु से मिला उनके गुरु थे नाम रामानंदाचार्य जी तो उनसे वह यह वाला मंत्र जो है गुरु दीक्षा में नहीं देते थे ठीक है तो इसका मतलब यह गुरु दीक्षा के बिना वाला मंत्र है तो देवी भागवत में क्या लिखा है भाई उनको नहीं मिला ना दीक्षा स्वरूप आपको मिल रहा है तो जब आप मिल रहा है दीक्षा के रूप में तो पीछे से वो दीक्षा के रूप में नहीं है तो आपको जो मंत्र मिल रहा है व बिना दीक्षा का ही सिद्ध हो रहा है तो अब यहां पर कहानी क्या बनेगी प्रश्न यह खड़ा हो जाएगा कि यदि पीछे से गुरु के द्वारा मिला हुआ य मंत्र नहीं है तो दीक्षा मंत्र नहीं हुआ ये अपने आप दिया जाने वाला मंत्र है वो भी तब जब हमें ये पता चले

00:18:20:24 कि संत कबीर दास जी ने इस मंत्र को दिया है और यदि य उन्हीं से मिला है रामानंदाचार्य जी से तो अगर यह दीक्षा में मिला हुआ मंत्र है तो किसी भी अंश में रामानंदाचार्य जी का विरोध तो नहीं प्रकट किया जाता संत कबीर दास जी के संदर्भ से रामपाल दास या उनके तंत्रों के द्वारा किया जाता है रामानंदाचार्य जी कह रहे राम की भक्ति करो अब संत कबीर दास जी के नाम से बताया जा रहा है कि संत कबीर दास जी की भक्ति करो तो यानी कि अगर वहां से दीक्षा मिली भी है तो वह दीक्षा भी दीक्षा नहीं रह गई क्योंकि गुरु विरोध सिद्ध हो रहा है गुरु विरोध हो गया जबकि कबीर दास जी के गुरु रामानंदाचार्य जी ने प्रभु श्री राम की भक्ति करके मुक्ति को प्राप्त करने का ज्ञान दिया मिथ्या प्रचारकों द्वारा इन कबीर के जो कबीर के नाम से जो तथाकथित सेक्स चल रहा है तो इनके नाम से क्या कहा जाता है कि कबीर दास जी के अनुसार वह परमेश्वर है तो यहां पर गुरु विरोध हो गया जबकि शास्त्र क्या कहते हैं गुरु विरोध के लिए वो शास्त्र कहते हैं जिसकी ईश्वर

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00:19:27:14 में जितनी भक्ति होती है उतनी ही भक्ति परमेश्वर में भी होती है वही भव सागर को पार कर पाते हैं

⬜ Not used yet · 00:19:32:28 – 00:28:45:00 (9:12)

00:19:32:28 उन्हें ही मोक्ष मिलता है तो यदि उनको दीक्षा उनसे मिली वो उनके गुरु हैं उनकी अन्य शिक्षाओं को नहीं मान रहे भाई एक ही सोर्स की इंफॉर्मेशन को हम ठुकरा नहीं सकते अगर मंत्र ले रहे हैं तो फिर उनसे ज्ञान भी लेना होगा ज्ञान ज्ञान ले रहे हैं तो मंत्र भी लेना होगा तो क्या हुआ गुरु विरोध हो गया यह कहां लिखा है गुरु विरोध नहीं करना है स्ता स निषद 6 2 स्कंद पुराण गुरु गीता 64 स्कंद पुराण गुरु गीता 65 गुरु से अधिक ज्ञाता बनने एवं गुरु से बड़ा बनने का प्रयास करने वाला ब्रह्म राक्षस होता है संपूर्ण तत्त्वज्ञान

00:20:14:09 विक्षेप संपूर्ण तत्त्वज्ञान जी को अथवा बाद में उनके अवतार रूप में प्रचारित किए जा रहे तथाकथित जो रामपाल दास उनको गुरु की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह तो स्वयं ईश्वर है तो ऐसे में उनके द्वारा अपने ईश्वर को सिद्ध करने हेतु अथवा प्रचारित किए जा रहे नाम मंत्र की प्रमाणिकता हेतु श्रीमद् भगवत गीता की अनिवार्यता भी सिद्ध नहीं है वो भी आवश्यक नहीं है आप अपने आप को भगवान कहो संत कबीर दास जी को भगवान कहो मगर भगवत गीता के नाम पर नहीं सनातन शास्त्रों के नाम पर नहीं क्योंकि जैसे ही आप सनातन शास्त्र की बात करोगे तो गुरुओं को स्वीकारना पड़ेगा जिनके द्वारा वह भगवत गीता यहां तक आई है नहीं तो सुनाओ सारे शास्त्र मुझे सुनाओ आके सारे शास्त्र किसको याद है 18 महापुराण 108 उपनिषद चारों वेद सारे ब्राह्मण ग्रंथ सुनाओ आके कैसे आए तुम तक

00:21:23:03 वो गुरुओं के द्वारा गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा गुरुओं ने जब जो याद रखने की वो थी क्षमता कम होती गई तो उनको छपवा शुरू कर दिया मगर पीछे उन्होंने अपने गुरु से जो देखा उसको आगे देखा क्लेरिफाई आज अगर गीता प्रेस पर हम केवल डिपेंड हो जाए गीता प्रेस के आज अच्छे हैं करता धरता कल को बदल जाए उनकी प्रवृत्ति ठीक ना रहे तो उसमें यदि एक दो श्लोक बढ़ा दिए जाएंगे कम कर दिए जाएंगे तो कैसे पता चलेगा जो परंपरा से अध्ययन करते आ रहे हैं वो आचार्य तय करेंगे कि हमारे आचार्य ने जब गीता में पढ़ाई थी तो ये वाला संदर्भ जो है नहीं था वहां मना करेंगे य नहीं है प्रक्षिप्त हैय इसका अर्थ है कि गुरु परंपरा के आलंबन के बिना आप तक शास्त्र आना सिद्ध नहीं होता है तो जब आप गुरुओं को ठुकरा रहे हैं तो उनके द्वारा प्राप्त होने वाले शास्त्रों के आधार पर कबीर को आप भगवान मत कहिए अपना नया कबीर धर्म बनाइए नया रामपाल धर्म बनाइए खूब करिए आराम से तत्सत भी करिए प्रणव भी बोलिए मगर यह ना बताइए यह जो मंत्र गीता में लिखा है हमारा नया धर्म है हमने खुद से अंदर से आया है क्या आवश्यकता है वहा किताब

00:22:38:06 का प्रमाण देने की क्या आवश्यकता अंदर से निकालो ना अब एक चीज और कही जाती है मैंने पीछे कहा था कि आगे में बताऊंगा यह कहा जाता है कि भाई कबीर दास जी ने लीला करने के लिए लीला पूर्वक जिससे कोई संसार में ये ना कहे इनका कोई गुरु नहीं है इसलिए उन्होंने लीला पूर्वक गुरु बनाया था उसके अलावा भी उन्होंने मानव देह में रहते हुए बहुत सी ऐसी चीजें की जो मानव के लिए ही उपयुक्त लगती हैं जैसे सौचा चार सोचा चार इत्यादि ये सब भी उन्होंने किए तो क्या हम यह माने कि ईश्वर को इन सब चीजों की आवश्यकता है सोच जाना मल मूत्र का त्याग करना मर उन्होंने भी यह सब किया तो जब उन्होंने ये सब किया तो इसको भी इन्ह मानना पड़ेगा कि वो लीला है वो भी लीला पूर्वक किया तो जब आप कबीर संत कबीर के द्वारा यह सब चीजें जो मानवीय देह में होने के कारण उन्होने दिखाई करके उसको लीला रूप में स्वीकार कर सकते हो तो जब ब्रह्मा विष्णु महेश आकर के अवतार लेते हैं जन्म लेते हैं अपनी देह का नाश करके दिखाते हैं वह लीला नहीं हो सकती वह तो उनकी जीवन मृत्यु होती है है [संगीत]

00:23:48:06 ना यदि भगवान के किसी भी नाम जप का अधिकार होने के कारण उसका जाप करने का निर्देश दिया जा रहा है तो ऐसे में आपके अनुसार परमेश्वर के कबीर नाम का जप निषेध क्यों है अगर आप यह सोच के उस जो तत सत का जाप कर रहे हो तत्सत वाले पर आ जाते हैं कि भाई भगवान के कई नाम है पहली बात तो मंत्र के रूप में उसको कहीं नहीं कहा गया मंत्र जाप मंत्र है और दीक्षा सिद्ध नहीं हो रही आपकी अगर दीक्षा ली है पीछे से तो आपका गुरु विरोध सिद्ध हो रहा है वहां पर भी शास्त्रों का खंडन हो रहा है और अगर आपने गुरु औपचारिकता के लिए बनाया तो फिर इनकी इन्होंने औपचारिकता के लिए जो जन्म और मरण दिखाया उससे क्या दिक्कत है उसमें फिर क्यों दिखाते हो वो ये अविनाशी नहीं है इन जीवन और मरण से बढे हुए हैं क्योंकि भैया अपनी बातें अपने मंतव्य की सिद्धि करनी है और क्या और क्या है अब बात ये आ जाती है कि अब मंत्र के रूप में उसे कहीं बताया नहीं गया है कि ये मंत्र है मगर नाम भगवान के कई हो सकते हैं उनमें से कोई भी नाम जपा जा सकता है उस रूप में भी अगर मान ले थोड़ी देर के लिए कि आपने गीता में बताया गया वो जो नाम है तत्सत प्रणव के साथ वो जो आपने उठाया ठीक है कबीर क्यों नहीं उठाया भगवान है ना आपके कबीर

00:25:03:25 कबीर का नाम जप क्यों नहीं दिया रामपाल का नाम जप क्यों नहीं दिया क्योंकि बताना था कि हम आपको वेदा आदि शास्त्रों का ज्ञान दे रहे हैं यह बताना था क्योंकि जब तक हम अपने आप को सनातन सिद्ध नहीं करेंगे कौन सुनेगा हमारी बातें अपने मन की बातें सनातन धर्म ग्रंथों के नाम से हम देंगे और पब्लिक लेगी और सुनो क्या कहा था विधि के बिना जो है शास्त्रों की विधि जहां पर मंत्र दिया है जिस उसमें उसी में यह विधि के द्वारा करने का बताया जा रहा है आप सुनो क्या है उपनयन संस्कार के बिना प्रणव का उच्चारण निषेध है आपके य कितनों के उपनयन संस्कार होते हैं जानते हो क्या होता है जनेऊ यज्ञ पवित इतना भी नहीं पता होगा उपनयन किसे कहते हैं क्योंकि वो रटे रटाई चीजें प्र संख्या ये फलाना वो छ दिन में सृष्टि रचना सातवा आसमान कबीर इज गॉड वेदों में प्रमाण है कबीर साहब भगवान है संसार में एक मात्र तत्वदर्शी संत रामपाल बस ये कुछ और एक और है वो श्रीमद् भागवत भगवत देवी देवी भागवत में लिखा हुआ है कलयुग में सभी ब्राह्मण राक्षस है

00:26:19:26 ना तो क्या है भाई अब मैंने जो कहा प्रणव के बिना वो प्रणव का उच्चारण नहीं कर सकते जने के बिना तो क्या है लिखा है शास्त्र में कि गायत्री मंत्र ओमकार यजुर्वेद उप लक्षित यज्ञ आदि का अधिकार बिना उपनयन संस्कार के स्त्री शूद्र इत्यादि जिनका उपनयन संस्कार नहीं होता है उनके लिए इसका निषेध है प्रणव का उच्चारण का नाम जप कर सकते हैं तो आपने जो तत्सत लिया है वो बिना प्रणव के अगर लेते तो भी ठीक था आपने प्रणव के साथ लिया तो प्रणव के साथ ले लिया तो फिर क्या हुआ लेने वाला भी गलत हो गया और इनको जो दे रहा है वह भी कहां जाएगा नरक को प्राप्त होगा अथर्ववेद 1157 मनुस्मृति दो 171 173 अथर्ववेद नरसिंह पूर्वोत्तर तापन परिषद एक तीन ठीक अच्छा आपने कहा होगा मनुस्मृति को हम नहीं मानते में प्रमाण मनुस्मृति को हम नहीं मानते मनुस्मृति की प्रमाणिकता सुनो मनुस्मृति में मनु ने जो

00:27:34:27 कुछ कहा है वोह औषधि है कृष्ण यजुर्वेदीय त्रय समिता दो दो द दो पढ़ो ये सब शास्त्र तो बिल्कुल ऐसा लग रहा यह कौन से शास्त्र आ ग ये कौन से शास्त्र के नाम आ गए भाई हमने तो देवी भागवत जाना था और वेदों में प्रमाण हो और शिव पुराण थोड़े ब ये सब क्या आ रहा उप निषद तोय क्या है जिसका एक बार माता के गर्भ से और दूसरी बार उपनयन संस्कार के समय इस प्रकार दो बार जन्म होता है उसे द्विज कहते हैं इस प्रकार दो बार जन्म लेने वाले को द्विज द्विज द्वारा ही वेद के पठन पाठन का निर्देश दिया गया है यह जो आपको सार है यह मिल जाएगा अथर्व वेद 19171 प एक दो बार जन्म कैसे हुआ एक बार माता का गर्भ और दूसरा उपनयन संस्कार उपनयन संस्कार के बाद ही प्रणव का उच्चारण गायत्री मंत्र इत्यादि का वो है वरना नाम जप है तो तत्सत करो प्रणव हटा दो तो तो ठीक है वो भी दीक्षा तो है नहीं पीछे से तब भी दिक्कत है [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 28:49 · 09 Sep 2024

रामपाल का मिथ्या प्रचार Ep-4 #rampaljimaharaj @Factful Debates@SA News Channel

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A · Video रामपाल जी महाराज का मिथ्या प्रचार E-2 #rampaljimaharaj @Fact by Ab...
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