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00:00:02:03 शंकराचार्य आदि कोई भी आचार्य अभी तक यह नहीं बता पाए कि संसार का वह एक परमेश्वर कौन है जैसे वह जो एक परम तत्व जो है वह पांच रूपों में स्वयं को प्रकट करता है तो इनका कहना है कि वह पांच रूपों में कौन किसका ईश्वर है ये इसीलिए होता है क् सामर्थ मान गुरुओं के पास तो जाते नहीं है सीधे गीता प्र ग्रंथ उसकी पढ़ाई शुरू कर दी उसमें अपना आधा चीटर आधा बटेर मिल गया उसी के ऊपर एक नया कल्ट शुरू कर दो इसीलिए होता है गुरु से दूरी तो क्या है कि अब क्या होता है कि अब हम उस शास्त्र से प्रमाण देते हैं जिस शास्त्र की बात आप बार-बार करते रहते हैं मगर हम पृष्ठ संख्या नहीं बताएंगे हम श्लोक क्रमांक बताएंगे तो निर्गुण निराकार ईश्वर साकार होकर अर्थात सनातन अद्वैत पर तत्व द्वैत रूप से संसार की रचना करता है कौन कर रहा है सनातन अद्वैत परम तत्व यह हमें कहां से पता चला मालूम है शंकराचार्य जो जगतगुरु शंकराचार्य हैं उनसे पता चला सनातन

00:01:17:18 अद्वैत परमेश्वर संसार की रचना करता है कहां लिखा है देवी भागवत नछ चर ठीक है अच्छे से पढ़ना तीन छ चार यानी तीसरा स्कंध छ अध्याय चौथा श्लोक और विद में प्रमाण है ओए यद्यपि अव्यक्त आद्य विभु स्वयं ज्योति निर्गुण निराकार सत्ता मात्र निर्विका अवतार असंभव है अब यहां बताया जा रहा है कि भगवान अवतार कैसे ले लेते हैं भगवान निर्गुण निराकार हैं तो वो सगुण साकार कैसे होते हैं तो यहां उसके लिए बताया जा रहा है कैसे बताया जा रहा है कि वो रही अवतार असंभव है तब भी असंभव को संभव करना ही ईश्वर का कार्य है जितने लोग तर्क देते हैं ना कि ईश्वर है ईश्वर है मगर वह अवतार नहीं ले सकता यह उनके मुह पर बहुत जोर का तमाचा है तमाचा है कि जो सर्वत्र व्याप्त है वह एक देशीय कैसे हो सकता है अरे भाई ईश्वर कहते ही उसी को है जो कोई नहीं कर सकता वह कर सकता है उसी को ईश्वर कहते हैं और अगर आप यह मानते हो कि वो सर्वत्र व्याप्त है तो एक जगह पर वो दिखाई क्यों नहीं दे सकता हमारी आंखों का विषय क्यों नहीं बन सकता

00:02:32:22 तो आपको यह भी मानना पड़ेगा कि वो जो है अथुनी सृष्टि की रचना भी नहीं कर सकता है और जब वो अपने अपने आप को कंट्रोल नहीं कर सकता है तो फिर वो सृष्टि की रचना भी उससे नहीं होगी भाई अगर ईश्वर समान रूप से सर्वत्र व्याप्त है तो जिस समय मिट्टी आदि के कणों का जुड़ना शुरू होगा ना आपस में संगठित होना शुरू होगा पृथ्वी का बनना निर्माण शुरू होगा वो सारे ब्रह्मांड में एक साथ होगा आपको मानना पड़ेगा कि ईश्वर स्वयं को रेगुलेट करता है सृष्टि की रचना के लिए तो रेगुलेट करके वह आपको दिखता भी है उसके पास स्वयं को रेगुलेट करने की क्षमता है अगर यह मान ले कि जिस जितने अंश को हम देख रहे हैं ईश्वर ने अपना नियंत्रित किया हुआ रेगुलेट किया हुआ जो रूप है वो है वो पूर्ण ईश्वर नहीं है संपूर्ण ईश्वर नहीं है तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि पूर्ण ईश्वर ने सृष्टि की रचना नहीं की है उसने रेगुलेट करके जो अपना रूप बनाया उसने सृष्टि की रचना की है तो कान को कैसे भी पकड़ लो आपको मानना ही होगा कि ईश्वर जो है सगुण साकार होते हैं ईश्वर के दोनों रूप है साकार भी और निराकार भी तो क्या

00:03:47:28 है श्रीमद् भागवत में बता रहे हैं न सान में और श्री राम पूर्व ताप नियो उपनिषद कि असंभव को संभव करना ही ईश्वरीय माया शक्ति की चमत कृति लीला शक्ति की अभिव्यक्ति है यह ध्यान रखें आप अब क्या अब यह कुछ लोग कहेंगे हम इनको नहीं मानते हम जो है श्री राम पूर्व ता अपनी उपनिषद मैं इस समय कबीर पंथी की बात नहीं कर रहा हूं अलंकार समाज की बात कर रहा हूं तो वह कहेंगे नहीं नहीं हम तो वेद को मानेंगे वेद तो वेद से भी ले लो यद्यपि ईश्वर जन्मा है फिर भी वे अपनी माया द्वारा अनेक रूप बनाकर विचर है कहां लिखा है ऋग्वेद 647 18 य जो वेद 31 19 और भगवत गीता में कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योग माया से प्रकट होता हूं क्यों होता है वह अभी इसमें है आगे उसमें ज्यादा आनंद आता है परित्राणाय साधु नाम विनाशा आया

00:04:56:15 चतु श्रीमद् भगवत गीता चार छ का था ये

00:05:02:07 जिस प्रकार एक दीप से सैकड़ों दीप जला दिए जाते हैं वैसे ही एक ही परमात्मा यत्र तत्र सर्वत्र सर्व रूपों में संकल्प योग से विलस होता है महाभारत

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00:05:15:27 आश्मन पर्व 42 पट 60 से 62 ठीक है इसी क्रम में आगे जिस प्रकार अग्नि काठ की लकड़ी में सर्व अब यहां पर बताया जा रहा है कि वह जो अवतार है वह कैसे सिद्ध होता है काठ की लकड़ी में पूरे में अग्नि की जो शक्ति विद्यमान होती है मगर उद्योग आदि करने से वह प्रकट भी हो जाती है आंखों का विषय भी बन जाती है अब हम क्या यह कहेंगे कि यह जो अग्नि है व वोह अग्नि नहीं है जो सर्वत्र व्याप्त है तो काट की लकड़ी में लकड़ी में सर्वव्यापक होते हुए भी किसी एक जगह पर प्रकट भी होती है उसी प्रकार सर्वव्यापक ईश्वर भी स्वयं को व्यवहार में आ सकने वाले पांच अलग-अलग रूपों में प्रकट कर जगत की उत्पत्ति स्थिति समार आदि निग्रह अनुग्रह नामक कृत्य का निर्वाह करते हैं इन्हीं पांच रूपों में आठ वसु 11 रुद्र 12 आदित्य विश्वदेव और मृत तथा इंद्र और प्रजापति को लेकर कुल 33 कोटि के जो देवता है 33 प्रकार 33 कोटि यहां 33 प्रकार की बात हो रही है 33 कोटि के देवता समाहित हो जाते हैं वो 33 प्रकार में वो बहुत देवता है मगर 33 प्रकार के देवता अब यह कहां से लिया

00:06:31:01 हमने बृहदारण्यक उपनिषद एक च 12 बृहदारण्यक उपनिषद 39 दो श्वेता सत्र उपनिषद तीन शिव पुराण शिव महापुराण 11 और विष्णु पुराण 2.3 ठीक है इसी कारण से विप्र जन उसी एक परम तत्व को अलग-अलग नाम रूप से कहते हैं उसी एक परम तत्व को ऋग्वेद एक 164 46 अब आ जाते हैं आगे कि ये पांच रूपों की बात कहां-कहां हो रही है तो शैव शैव सौर गणेश गान पतनी की वैष्णव तथा शाक्त ये जो इस नाम के जो पंच देव उपासक जो हैं लोग उस एक ब्रह्म को उसी प्रकार प्राप्त कर लेते हैं जिस प्रकार वर्षा का जल सागर को प्राप्त कर लेता है तो क्या हुआ यहां पर एक ही ब्रह्म स्वयं को पांच रूप प्रकट करते ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश और इन अलग अलग रूपों में भगवान की भक्ति करके लोग मुक्त हो जाते हैं प्राप्त कर लेते

00:07:40:04 हैं इसमें जो एक ब्रह्म अचिंत शक्ति के योग से उत्पत्ति स्थिति संहार निग्रह एवं अनुग्रह रूप कृत्यों के निर्वाह सूर्य अर्थात ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ति और गणपति संख्यक पंच देव के रूप में वैसे ही परिलक्षित होता है जैसे कि एक ही व्यक्ति नाम रूप क्रिया तथा संबंध भेद से देवदत्त श्याम वैदिक और पुत्रा आदि रूप से निरूपित होता है अब यह किस आधार पर है आनंद रामायण विलास कांड 8910 ये सब तो नाम भी नहीं सुने होंगे सूत्रा सूत्र उपनिषद ब उपनिषद क्योंकि वो जो जितनी चाबी भरी है ना उतना चले खिलौना देवी भागवत शिव पुराण और वेदों में प्रमाण ओए बस उससे आगे तो निकले नहीं इधर उधर कहीं मनुस्मृति होता क्या है भाई ठीक है अभी सब आएगा अभी अगर आप यह कहने लगो ना कि हम इन ग्रंथों को नहीं मानेंगे ऐसा नहीं है उसकी उसको भी हम उधेड़ उस पॉइंट को भी उधेड़ सब लेकर आए तो

00:08:55:09 यह सब कहां है रामायण विलास कांड 8910 जहां पर पाच रूपों में ब्रह्म की बात हो रही है मत्स पुराण तीन 14 से 16 मत्स पुराण दो 31 अब मिथ्या नंबर पांच सनातन श यहां से बहुत इंपॉर्टेंट है क्योंकि सबसे ज्यादा क्या है इनके पास तर्क नहीं है केवल य प्रमाण पर ही बात करते हैं तर्क नहीं ओनली प्रमाण तो मिथ्या नंबर पांच क्या है इनकी कि सनातन शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती एवं गणेश ये पंच देव जो है परम तत्व परम ब्रह्म परमेश्वर नहीं है अब पहली बात तो एक यह बड़ी चीज है कि एक एडजेक्टिव विशेषण लगता जाता है और आपको एक नई चीज के रूप में अपनी चीजें परोस दी जाती है जैसे किसी ने कहा कि भाई मुझे जो है घी चाहिए अब दुनिया में नकली घी आ गए तो उसके आगे एडजेक्टिव लग गया कि मुझे जो है देसी घी चाहिए उसके बाद किसी ने नकली कंपनी खोली तो उसने कहा मैं अपना कैसे सेल करूं तो उसने कहा शुद्ध देसी घी फिर कोई और पोरेट शुद्ध देसी घी कुछ और है ना ऐसे करके वह एडजेक्टिव लगाते जाएंगे

00:10:10:14 तो जो हमारे शास्त्रों के अनुसार सबसे परम तत्व माना गया उसी को ही ब्रह्म का है उसी को ही ब्रह्म काहा है जो सबसे अंत अंततोगत्वा जो परम हो सकता है परम तत्व उसको ही हमारे शास्त्रों ने ब्रह्म कहा है इसीलिए तो ब्रह्म सूत्र लिखा अब क्या हुआ कि नई दुकान खोलनी नई चलानी है तो परम भी जोड़ दो परम ब्रह्म तो परम ब्रह्म भी शास्त्रों ने कहीं कहीं कहा है मगर उसको ब्रह्म से अलग नहीं कहा है कहीं पर परम ब्रह्म कह दिया कहीं पर ब्रह्म कह कर के काम चलाया मगर इनको एक परम परम ब्रह्म कौन है अब उसके बाद मैं पूछू परम परम ब्रह्म कौन है फिर पूछो परम परम परम ब्रह्म कौन है यही चलता रहेगा है ना चलो इसको भी देख लेंगे यह भी लिया है चिंता ना करना तो अब सबसे पहले हम लोग बात करेंगे भगवान ब्रह्मा हिरण्य गर्भम जो सूर्य हैं उनके बारे में इनके प्रमाण कहां कहा पर हैं वेदों में कि यही परम नियंता है परम परमेश्वर है परमात्मा तत्व है परम वो है सब कुछ परम हैय तो ऋग्वेद 115 एक ऋग्वेद एक 164 दो सपद ब्राह्मण 10 पा दो एक

00:11:26:04 सपद ब्राह्मण 14 एक दो एक छांदोग्य उपनिषद एक छ छ से सात ब्रह्म सूत्र एक एक 20 इसके अलावा भी अनेक अनेक म समझ यही है य तो हम प्रमाण आपको दे दिया क्योंकि एक भी प्रमाण को आप गलत नहीं बोल सकते मत्स पुराण 145 वा अध्याय 5वा श्लोक समस्त सुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा साधु सम्मत धर्म है सामंजस्य होना चाहिए एक भी पंक्ति को आप काट नहीं सकते उसमें सामंजस्य बिठाना होगा यहां तो हमने काफी म दे दिए भगवान ने भगवान श्री राम ने वाल्मीकि रामायण में गायत्री के द्वारा इनकी वंदना की है आदित्य हृदय स्त्रोत में है ना पढ़ लेना वाल्मीकि रामायण भगवान विष्णु की पारब्रह्म ता वेदों में

00:12:18:10 ऋग्वेद एक 22 17 से 23 ऋग्वेद 116 ऋग्वेद 7 प 100 यजुर्वेद 5 15 5.15 में 52 भगवान वाली वो बात है तीन पक्ष से उन्होंने व संसार को नापा था तो ब्रह्मा जी द्वारा भगवान नारायण अर्थात विष्णु की वंदना की जाती है श्रीमद् भागवत दो पा 12 भगवान माया के गुणों से रहित हैं अनंत है सृष्टि स्थिति तथा प्रलय के लिए रजोगुण सतोगुण एवं तमोगुण माया के तीन गुण उनकी इच्छा से उनके द्वारा स्वीकार

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00:12:58:14 किए गए हैं इच्छा से गुणों को उन्होंने स्वीकार किया है इच्छा से ठीक है श्रीमद् भागवत दो पा 18 और वेदों के द्वारा कौन जानने लायक है कौन जाने जाते हैं नारायण विष्णु कबीर नहीं वेदों के द्वारा कौन जाने जाते हैं परम तत्व के रूप में विष्णु जिनकी भक्ति कबीर दास जी ने की थी राम के रूप में

00:13:28:04 समस्त यज्ञ नारायण की प्रसन्नता के लिए हैं समस्त योग साधना तपस्या नारायण के लिए है समस्त साध्य और साधन नारायण के लिए है ज्ञान के द्वारा भी नारायण ही जाने जाते हैं श्रीमद् भागवत दो पा 15 ब्रह्मा विष्णु और शंकर रूप से जगत की उत्पत्ति स्थिति एवं संहार के कारण विकार रहित शुद्ध अविनाशी परमात्मा सर्वदा एक रस सर्व विजय भगवान वासुदेव विष्णु है कौन है विष्णु विष्णु पुराण दो एक तीन

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00:14:05:02 अब ये क्या हो रहा है उसी परम तत्व की बात हो रही है यहां पर विष्णु भगवान के नाम से विष्णु रूप में परम तत्व की बात हो रही है भगवान शिव की पारब्रह्म आ जाओ भोले बाबा बम बम भोले पर आ जाओ भगवान शिव की पारब्रह्म क्या है ऋग्वेद 2.33 यजुर्वेद 16 दो 41 भगवान की भक्ति भगवान शिव की भक्ति करने से मोक्ष मिलता है कल्याण मिलता है ऋग्वेद 647 18 ब्रार उपनिषद दो 51 श्वेता शत्र उपनिषद तीन मांड

00:14:40:24 उपनिषद सात ऋग्वेद 6 10 अथर्ववेद सा 27 एक ऋग्वेद 8723 यजुर्वेद 1654 यजुर्वेद 6663 ऋग्वेद 565 अथर्ववेद 13 4.4 ऋगवेद 52 11 ऋग्वेद 749 12 महामृत्युंजय मंत्र यहीं पे है 7491 स्वेता सत्रप निषद एक 10 ऋग्वेद 11 114 ऋग्वेद 746 शुक्ल यजुर्वेद

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00:15:14:08 रुद्राष्टाध्याई सूक्त वो भी भगवान शिव को ही समर्पित है है ना और अगर कोई ब्रम आए बीच में तो पारब्रह्म के रूप में स रुद्र सा महादेव जिस रुद्र की बात की जाती है वही महादेव हैं यह भी है ठीक है हां ये कभी-कभी मैंने कुछ देखता हूं ऐसे लोग हैं जो ऐसी बातें करते हैं कि क्या कहते हैं जो जिस रुद्र की बात वेदों में हुई है वो जो है शिवजी नहीं महादेव नहीं है तो स रुद्र सा महादेव हां शिवलिंग और शिव की प्रतिमा दोनों के ही पूजन से अब यहां मोक्ष की बात कर रहा हूं परम तत्व से मोक्ष मिलेगा ना तो मोक्ष की बात हो रही है क्या हो रहा है

00:16:01:09 शिवलिंग और शिव की प्रतिमा दोनों से ही दोनों के ही पूजन द्वारा भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है शिव महापुराण एक

⬜ Not used yet · 00:16:09:18 – 00:17:26:20 (1:17)

00:16:09:18 पा 31 शिव ही परमात्मा है शिव महापुराण एक पा 12 शंकर के अतिरिक्त अन्य देवों का जीववू का ब्रह्मवर्त उपनिषदों से सिद्ध होता है यानी कि अगर आप भगवान शिव से पृथक करके किसी को देवता मान रहे हैं प्रथक करके देख रहे हैं तो फिर वह वहां से डिग्निटी आएगी वह फिर उनके लेवल के नहीं इसलिए ब्रह्मा विष्णु महेश में एकत्व होना बहुत आवश्यक है और एकत्व है भी अब वह अन्यता की रक्षा के लिए भले ही कहीं कहीं पर ऐसा हो जाता है भक्ति रस की प्रधानता से भाई विष्णु ही है सब कुछ विष्णु ही है य सब बातें गलत है इस पर भी बात करेंगे खैर तो यह बात कहां कही गई शिव पुराण एक पा 14 से 15 इसके बाद शिव महापुराण में लिखा है शिव से भिन्न और कोई ईश्वर नहीं है भिन्न शिव से भिन्न और कोई परमेश्वर नहीं है शिव पुराण एकन 31 से 37 कोई नहीं है उनसे बिन्न अगर तो फिर क्या हुआ कि आपका जो प्रमाण है कि कबीर साहब भगवान है वह तो शिव से अलग है है ना तो अगर व शिव से अलग है तो फिर वो

00:17:24:26 परमेश्वर नहीं है

00:17:26:20 ठीक शिव जी किसी भी प्रकार के गुण से रहित है वह एवं वही सृष्टि की उत्पत्ति पालन और समार तीनों करते हैं

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00:17:35:21 यह सब भी है श्रीमद् भागवत में लिखा है और 8 सा 23 और 31 में महाभारत अनुशासन पर्व दान धर्म पर्व अध्याय 14 2.24 वेदों द्वारा भगवान शिव का ही प्रतिपादन किया गया जैसे अभी हमने देखा वहां विष्णु के वेदों द्वारा भगवान विष्णु को जाना जाता है तो यहां पर क्या है कि परम तत्व के शिवर ूप को वेदों द्वारा जाना जाता है कुल मिलाकर उसी परम तत्व को जाना जा रहा है वेदों द्वारा कहीं पर विष्णु के नाम से कहीं पर शिव के नाम से मां भगवती की पारब्रह्म ता देवी भागवत हर जगह कमेंट में देवी भागवत देवी भागवत देवी भागवत वो ब्रह्मा विष्णु महेश की माता है और काल की पत्नी है है ना सुनो जैसे वह र वो कोई वायरस वगैरह नहीं फैल जाता है कुछ इस तरीके का आचरण जैसा दिखता है जो इस तरह से लगातार एक जैसा कमेंट एक जैसा कमेंट करते हैं काजल काजल काजल बस तो सुनो मां भगवती के पारब्रह्म का वेदों से ले लो पहले अदिति सूक्त 10 12 पा ऋग्वेद 10 125 वाक सूक्त ऋग्वेद परिशिष्ट श्री

00:18:51:01 सूक्त परिशिष्ट में आता है श्री सूक्त पढ़ लेना ऋग्वेद 1011 श्रद्धा सूक्त वे 10 127 एक से आठ रात्रि सूक्त स्वेता सत्र उपनिषद 4.10 सब पढ़ो देवी और परब्रह्म एक है आपने क्या कहा देवी परब्रह्म नहीं है वो ब्रह्म की पत्नी है मगर देवी और पर परब्रह्म

00:19:17:07 एक है देवी में और उसमें किंचित मात्र भी वेद नहीं है कहां देवी भागवत तीसरा स्कंद छठवां अध्याय दूसरा श्लोक ब्रह्म एक

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00:19:30:06 है और सनातन है ब्रह्म कौन है एक है और सनातन है यानी सनातन मलब शाश्वत नित्य वो कभी जन्मा नहीं है ब्रह्म भी रचना करते समय वह द्वैत भाव को प्राप्त होता है देवी भागवत नछ चार यहां हमने ब्रह्म को जान लिया कौन है ब्रह्म मैं और ब्रह्म एक ही है अभी पहले क्या था कि देवी मां और पर परम ब्रह्म एक है अब यहां देवी मां क्या कह रही है कि मैं और ब्रह्म एक है इसलिए ब्रह्म और परम ब्रह्म एक है ठीक है मैं और परम ब्रह्म एक ही

00:20:02:25 है तो भी माया रूपी कार्य कारण की उपाधि भेद से हमारा प्रतिबिंब प्रथक प्रथक दिखाई

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00:20:08:16 देता है हम लोग एक हैं मगर माया जब माया के द्वारा जब सृष्टि की रचना करते हैं दिखाई दो दो अलग-अलग देते हैं तो जगत का निर्माण करने के लिए भेद दिखता है भेद का नाम ही संसार है और भेद का निर्वाह करते हुए अभेद परम तत्व की प्राप्ति यह हमारा जीवन का उद्देश्य है मोक्ष यह कहां लिखा है देवी भागवत छ चार से छह प्रकृति और पुरुष यह दोनों सर्वत्र अब यहां पर फिर वही जो ब्रह्म और देवी मा है उन्हीं का दूसरे रूप में बात हो रही प्रकृति और पुरुष यह दोनों सर्वत्र व्याप्त है अय व सर्व व्यापकता आ गई सर्वत्र व्याप्त है ऐसा नहीं है कि कहीं कहीं पर ना हो इन्हीं को लोग आद्य शक्ति और परमात्मा कहते हैं जो सर्वत्र व्याप्त है वही परमात्मा है यह भी सुन लो देवी भागवत प्रकृति और पुरुष अजन्म है अविनाशी है यानी कि इनको आपके व ब्रह्म ने नहीं बनाया अजन्म है अविनाशी है जो शक्ति है वही परमात्मा है और जो परमात्मा है वही शक्ति है अभी मैं इस पर भी आऊंगा कि फिर उनका जन्म क्यों लिखा है वहा वो आएगा सारा चिंता ना करिए घबराइए नहीं एक एक चीज है बस दिल थाम कर बैठे रहिए और कुर्सी की पेटिया जरा टाइट बांध लीजिए भगवती सगुणा या निर्गुणा केवल कार्य भेद से प्र प्रतीत होती है वस्तुत

00:21:23:18 व गुण से दूर है जिस परम पुरुष को त्रिगुण तीत कहा गया त्रिगुणा तीत क्या हो गया त्रिगुण से बाहर परे वही उत्पत्ति स्थिति समार का कार्य संपादन करने वाली महामाया अर्थात भगवती है अब लो भगवती कौन हो गई परम पुरुष परम तत्व परम पुरुष कौन वो भगवत गीता का उदाहरण देते व भी सब सब है इस सब है एवरीथिंग सब कुछ लेकर आया हूं मैं ठीक है चलो देवी भागवत न 34 से 37 सब कुछ निर्गुण तो एक मात्र परमात्मा अर्थात देवी ही है अब क्या हुआ यहां परमात्मा किसको कहा गया देवी और यहां पर परमात्मा निर्गुण है तो निर्गुण कौन है देवी और विष्णु जी भी निर्गुण है और शिवजी भी निर्गुण है हालांकि इसको भी मैंने एक हेडलाइन बनाकर लिया है आगे के चैप्टर में देवी भागवत 3970 यह निर्गुण तो एकमात्र परमात्मा है अर्थात देवी है समय आने पर परमात्मा होते हुए वही देवी ही सगुण हो जाती है निर्गुण से सगुण हो गई देवी भागवत 3972 देवी भगवती

00:22:38:20 ब्रह्म और ब्रह्म की शक्ति है लो ब्रह्म भी वही है और ब्रह्म की शक्ति भी वही है यानी कि ब्रह्म ही अपनी शक्ति के रूप में सर्वत्र व्याप्त है एक देशीय नहीं है वोह देवी भागवत नछ 11 लीला रूप से देवी भगवती गौरी ब्रह्माणी वैष्णवी आदि है यह भी देवी भागवत में लिखा है कहां खा है नछ 13 से 14 तो ये आपके भागवत जिसके पृष्ठ संख्या बताते हो ना उसी से आपको मैं बता रहा हूं यह इसी के पृष्ठ संख्या आप बताते हो तो क्या है लीला रूप से देवी भगवती गौरी ब्रह्माणी वैष्णवी आदि हैं तत्त भगवती क्या कह रही है ना मैं स्त्री हूं ना मैं पुरुष हूं ना ही नपुंसक ही हूं यानी यह केवल लीला रूप से आपको दिख रही है तो जब वो स्त्री नहीं है जब वो पुरुष नहीं है तो कैसे आप उनको कह रहे हो कि वह पत्नी है वो मां है वो तो लीला है लीला पर बात करेंगे कि तुम्हारे ही अकॉर्डिंग कबीर ने लीला की कि नहीं की तुम्हारे अकॉर्डिंग जो परम तत्व कबीर दास जी के रूप में आया था उन्होंने लीला की कि नहीं की इस पर भी बात करेंगे है ना

00:23:55:20 [संगीत] भगवान गणेश की पारब्रह्म बहुत पावरफुल है भगवान गणेश आज के जो वीडियो है इसके मेन हीरो है वो महानायक है इस वीडियो के वह अंत में पता चलेगा आप लोगों को क्यों है अंत तक देखते रहिए तो भगवान गणेश की पारब्रह्म क्या है यजुर्वेद 23 19 ऋग्वेद दो 2 एक मुद्गल पुराण पूरा गणेश पुराण को सम गणेश भगवान को समर्पित है गणेश पुराण पूरा गणेश भगवान को समर्पित है गणेश उत्तर ताप नियो उपनिषद यह भी गणेश भगवान को समर्पित है पढ़ो पढ़ो भाई व आप उसमें सीमित रह गए ना बात ये है विदव में प्रमाण है ओए ओ कबीर साहब भगवान है अरे भाई उपनिषद तो पढ़ो ब्रह्म सूत्र तो पढ़ो अगर पुराणों की बात कर रहे हो तो 18 महापुराण ही पढ़ लो [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 24:54 · 08 Sep 2024

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