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00:00:02:15 तो सभी को जय श्री राम जैसा कि आप सब लोग जानते हैं हम जो धार्मिक पक्ष होते हैं विभिन्न उनको सरलता से जनता के सामने लाकर रखने का प्रयास करते हैं इसी चर्चा के निमित्त आज हम आए हैं यह आर्य समाज का गुरुकुल भी है विद्यालय विद्यालय आर्य समाज द्वारा संचालित विद्यालय है और यहां पर एक महानुभाव हैं और इनका परिचय मैं चाहूंगा कि सबसे पहले आप ही दें दर्शकों को अपना परिचय दे धन्यवाद जी मेरा नाम प्रकाश आर्य है और 2006 के पहले में अभिभाषक का कार्य करता था किंतु 2006 के पश्चात पूरा समय आर्य समाज के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं कार्य के लिए देता हूं और मह में निवास है मेरा इसी कार्य के लिए मुझे देश विदेश भी कई बार जाना आना पड़ता है पर 24 घंटे एक ही काम है आर्य समाज सनातन धर्म का काम अच्छा सुंदर परिचय आपका जैसे कि हमने कहा कि आज की जब हम प्रासंगिकता देखते तो हमारे समाज में सनातन को मानने वाले समाज में ही ईश्वर को

00:01:17:16 लेकर धर्म ब्रह्म को लेकर के बहुत सारे वैचारिक मतभेद आ गए तो इसीलिए हम इस तरह की चर्चाएं सामने लाते हैं जिससे कि एक मूल धारा में सब लोग आ सके ठीक तो अभी अगर सीधे मुख्य विषय पर आए तो क्या आर्य समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है वो सर्वशक्तिमान अनंत सामर्थ्य वान है मतलब कहा भी जाए और फिर वह अपने व्यवहार से सिद्ध भी हो क्या ऐसा है सर्वशक्तिमान अनंत सामर्थ्य मान आर्य समाज का जो दूसरा नियम है जी उस नियम में महर्षि दयानंद ने वेदोक्त जानकारी प्रदान करते हुए और ईश्वर के स्वरूप को उसमें स्पष्ट किया है जिसमें सर्वशक्तिमान भी है सर्वव्यापक भी है अंतर्यामी भी बताया है उसी को आर्य समाज मानता है और ईश्वर की सत्ता को ही क्योंकि आर्य समाज का नियम पहला ही नियम की जितने भी जो विद्या हैं उन सबका आदि मूल परमेश्वर है तो परमेश्वर को तो मानते हैं और उसी रूप में मानते हैं जिस रूप में आप कह रहे हो सर्वशक्तिमान है अनंत सामर्थ्य वान क्योंकि आर्य समाज का ही मानना

00:02:32:22 है वेद का मानना है कि य स्मात तेन सिद्ध यजो विपत सद नाम योग मिनती उस परमपिता परमात्मा की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है मनुष्य पुरुषार्थ करने के बाद में भी प्रार्थना क्यों करता है इसीलिए करता है कि उस परमात्मा की कृपा अत्यंत आवश्यक है वह सर्वशक्तिमान है तो इस बात को आर्य समाज बड़ी दृढ़ता से मानता है तो इसमें एक फिर एक मतभेद आता है कि यदि वो सर्वशक्तिमान है तो वो अवतार क्यों नहीं ले सकता या फिर वो मनुष्य के व्यवहार का दृष्टि का विषय क्यों नहीं बन सकता दो बातें है जी संसार में तीन बातें सनातन है न ये त्रेत वाद है हम त्रेत वाद को मानते हैं ईश्वर जीव और प्रकृति ये सनातन सत्ता है सनातन का अर्थ जिसका ना कभी जन्म है और ना जिसका अंत है ईश्वर का जन्म और अंत का प्रश्न ही नहीं होता क्योंकि हम उसको अजन्मा मानते हैं और इसलिए जब सनातन है सनातन का अर्थ यदि इससे हट के हो जाएगा तो ईश्वर को फिर सनातन जो प्रश्न उसम प्रश्न चिन्ह लग जाएगा सनातन का अर्थ यही

00:03:47:25 है जैसे जीव आत्मा सनातन है ईश्वर सनातन है प्रकृति सनातन है जो जिसका ना कभी जन्म हुआ ना जिसका अंत हुआ तो वो कैसे जन्म लेगा जो कभी गया ही नहीं है मैं यहां पर बैठा हूं मुझे तो आवाज आप तभी देंगे तभी मेरा आना होगा जब मैं यहां से बाहर जाऊं जब परमात्मा कहीं गया ही नहीं है तो फिर प्रकट होने का क्या सवाल वो तो हर हर घट में वासी है यहां पर हमने दो बातें पकड़ी एक तो क्योंकि वह अजन्मा है इसलिए उसका जन्म लेना सिद्ध नहीं होता और दूसरा क्योंकि वह सर्वव्यापक है तो उसका कहीं पर भी प्रकट होना सिद्ध नहीं हो प्रकट होना सिद्ध नहीं होता तो अगर हम इस चीज को माने कि क्योंकि ईश्वर अजन्मा है इसलिए वो जन्म नहीं लेता तो जैसा कि आपने बताया आत्मा भी अजन्मी है जीव भी है वो अजन्मा है मगर वो प्रकट होता है एक शरीर धारण करता है और वह व्यवहार का विषय बनता है आत्मा प्रकट नहीं होता है हां आत्मा की पहचान के लिए हम शरीर मानते हैं आत्मा तो कभी नम छिंदंति शस्त्राणि कृष्ण जी ने लिखा है आत्मा तो कभी भी नहीं प्रकट होने का सवाल ही नहीं जी आत्मा प्रकट नहीं हो रही है आत्मा प्रकट नहीं हो रही है आत्मा तो अजन्मा है आत्मा तो हमेशा र वो तो शरीर चकि आत्मा को कार्य करने का माध्यम कुछ चाहिए ना

00:05:03:00 कठोपनिषद में कहा है कि यह आत्मा जो है यह यात्री है शरीर जो है यह उसका वाहन है तो यात्रा को पूरी करने के लिए वाहन की आवश्यकता है यात्री तो कभी रह गई वो तो इस वाहन को छोड़ के उसको पकड़ेगा उसको छोड़ के उसको पकड़ेगा वो तो निरंतर या प्रश्न ये आता है कि जैसे जिस प्रकार आत्मा शरीर धारण करके किसी के व्यवहार का विषय बन रही है हां वो स्वयं प्रकट नहीं हो रही शरीर धारण कर रही है इसी प्रकार से जो ईश्वर है वो भी अजन्मा विनाशी होते हुए भी वो शरीर धारण करके किसी के व्यवहार का विषय बन सकता है ना अब उसका ये बताइए यदि कोई चीज शरीर धारण कर रही है उसका आकार है तो आकार वाली वस्तु सर्वव्यापक नहीं हो सकती है नहीं जैसे सुनिए मे प्रश्न आपने जो कहा उसका उत्तर जिस चीज का आकार बन गया वो सर्वव्यापक नहीं हो सकता है जी जी सर्वव्यापक वही है जिसका आकार नहीं है इस आवाज को दुनिया में कहीं भी पहुंचा दो क्योंकि आकार नहीं है इस हवा को कहीं भी पहुंचा दो क्योंकि इसका आकार नहीं है इस सुगंध दुर्गंध को कहीं पर भी पहचा दो क्योंकि इसका आकार नहीं है आकार वाली वस्तु सर्वव्यापक नहीं हो सकती है यह सिद्धांत हम मानते हैं नहीं नहीं ठीक है मगर जैसे आपने बताया ना कि आत्मा

00:06:18:04 यहां पर एक शरीर धारण कर रही है वो भी तो वो भी तो निराकार है अगर वो एक ऐसा शरीर धारण कर रही है जो कि इंद्रियों का विषय बन सके ना अब इंद्रियों का विषय बन सके जब परमात्मा निराकार है तो उसको इंद्रियों की क्या आवश्यकता है दूसरे के लिए नहीं दूसरे के लिए जैसे आत्मा ने एक शरीर धारण किया हां तो वो किसी और के लिए अ क्या कहते हैं व्यवहार का विषय बन गई दोनों में अंतर है जी जी आत्मा जो है अल्पज्ञ है परमात्मा सर्वज्ञ है हम हम आत्मा जो है उसका एक क्षेत्र छोटा है और आत्मा जो है वो वो एक सीमित उसका है उसको तो हर आत्मा के साथ में मतलब कि आप एक उसको एक पर्टिकुलर थोड़ा टाइम है कहने का मतलब है कि आत्मा को आवश्यकता है इसलिए वो ऐसा करती है ईश्वर को आवश्यकता नहीं देखिए ईश्वर को आवश्यकता ही नहीं है ईश्वर को आवश्यकता है उसके कृपा से ही सब कुछ हो रहा है जी जी वो तो कर करवा करने वाला है करवाने वाला है उसको किसी चीज की आवश्यकता नहीं है उसको जन्म लेना हो उसको आत्मा ने जन्म लिया उसके साथ में शरीर के साथ में जुड़ा तो उसको तो बहुत सी चीज सीखना है जी कहीं जाना है तो उसको शरीर की आवश्यकता जो सर्वव्यापक है उसको कहां जाने का का है नहीं सर्वव्यापक तो आत्मा भी है ना नहीं सर्वव्यापक आत्मा नहीं है

00:07:33:09 आत्मा यही बात है आत्मा सर्वव्यापक नहीं है आत्मा आत्मा को आप ये कहते हो वो सनातन है अजन्मा हैर सर्वव्यापक नहीं है मगर जैसे 2 30 में आया भगवत गीता में देही नित्यम जैसे आपने भी कहा कि आत्मा जो है सनातन है तो सनातन का अर्थ तो यह है ना जो किसी भी देश काल परिस्थिति से प्रभावित ना हो या केवल काल से प्रभावित ना हो सनातन का अर्थ यह है तीन प्रकार की विचारधाराएं चलती है एक है नूतन एक है पुरातन एक है सनातन नूतन जो अभी नया है जिसको हम बांध सकते हैं कि इस्लाम अभी हल चाल सिख पंथ अभी चालू हुआ 500 साल का कर सकते हैं इस्लाम 1400 साल से हुआ है बौद्ध जैन ईज साल के आसपास के हो गए हैं जी ये इस प्रकार हम इनको सीमा में बांध सकते हैं समय की पुरातन पहले नूतन जो नया है पुरातन जो इसका पहले है लेकिन सनातन को हम समय की सीमा में नहीं बांध सकते जो हमेशा खड़ा रहे उसको सनातन कहते हैं मगर इसमें केवल हम काल नहीं है ना जैसे मान लीजिए कि अगर आत्मा यहां है और वो वहां नहीं है तो उसको हम सनातन कैसे कह रहे हैं परमात्मा अब देखो यहां दोनों चीज आप अलग अलग है दोनों को एक में मत मिलाइए जी

00:08:48:09 आत्मा जो है अल्पज्ञ उसम पूरे उसका ज्ञान नहीं हो सकता सनातन का अर्थ ये नहीं सुनिए जी सनातन ये मैंने कहा श्वर जीव प्रकृति जी यह प्रकृति जो देख रहे हैं आप जो भी दृश्य ये भी सनातन है तो क्या इसको जानकारी होगी क्या व इंग्लैंड में क्या है अमेरिका जानकारी जानकारी होना अलग है यहां प्रश्न ये है कि सर्वव्यापक होते हुए भी वो एक देशीय शरीर में आ रही है आत्मा आत्मा सर्वव्यापी है कि नहीं आत्मा नहीं आत्मा सर्वव्यापक नहीं है सर्वव्यापक नहीं तो जब हम कहते हैं कि आत्मा सनातन है तो सनातन का अर्थ होता है किसी भी देश काल परिस्थिति में प्रभावित ना हो मगर अगर वो सर्व एक मिनट जब वो सर्वव्यापक नहीं है तो यहां पर आत्मा है वहां पर नहीं है तो वो सनातन कैसे रही फिर फिर आप दोनों चीज को आप दोनों को गलत बता रहे हैं सनातन का समय ये है कि वो हमेशा रहने वाली मतलब काल से प्रभावित ना हो मगर देश से प्रभावित हो जाए सनातन सनातन का अर्थ केवल यही होता है कि जो जो सनातन का अर्थ जो नित्य है जिसमें काल में नित्य है मगर देश में नित्य नहीं केवल ईश्वर सर्वव्यापक केवल उसी को दिया हुआ तो और कोई नहीं हो सकता तो मतलब

00:10:03:15 कहने का अर्थ ये है कि आर समाज के अनुसार जो आत्मा है तवादु सार वो देश और परिस्थिति से तो प्रभावित होती है बस काल से नहीं होती इसलिए उसे सनातन क सनातन उसको कहते है जबक जो जो अगर ईश्वर के बारे में सनातन की व्याख्या की जाएगी तो वो तो किसी देश काल परिस्थिति में भी प्रभावित नहीं होगा व श्वर वो भी वैसे ही है ना तो सनातन की दो परिभाषाएं हो गई नहीं सनातन की परिभाषा एक ही है आप कार्यक्षेत्र में दो अलग-अलग होंगे जानकारी में अलग-अलग होंगे व्यापकता में अलग अलग होंगे परमात्मा सर्वव्यापक है आत्मा एक निश्चित स्थान तक सीमित है जिस शरीर में है वो वही तक है वो वही तक उसके बाहर नहीं है नहीं उसके बाहर नहीं तो वो आत्मा सर्वव्यापक नहीं हैप तो एक जो ये मतभेद आया कि सनातन का अर्थ जो है एक यह भी प्रासंगिक है जो किसी भी देश काल परिस्थिति से प्रभावित ना हो ये भी स प्रासंगिक है सनातन का मगर यहां पर आत्मा के लिए जब सनातन यूज हो रहा है तो वो केवल काल से प्रभावित नहीं हो मगर देश और परिस्थिति से प्रभावित होगी जैसे यहां आत्मा है मगर यही आत्मा वहां नहीं है अच्छा ठीक है अब इसमें हम थोड़ा सा आगे बढ़ जाते हैं यह तो क्लियर है कि जब हमने कहा कि ईश्वर अनंत सामर्थ्य वान

00:11:18:15 है अनंत तो जैसे हम जब आकाश के लिए अनंत बोलते हैं कि वो अनंता का है उसका कोई अंत नहीं है तो जब अनंत सामर्थ्य वान कह रहे हैं तो उसकी सामर्थ्य का अंत हो जाता है यदि वह यह कहे कि मैं जन्म नहीं ले सकता क्योंकि मैं सर्वव्यापक उसका कारण है मतलब वह तथ्य पूर्ण है व कह रहा है कि मैं सर्वव्यापक हूं इसलिए मैं जन्म नहीं ले सकता मगर अगर हम यह मान ले कि ईश्वर ऐसा ही है ईश्वर तो हम उसे मान रहे हैं मगर उसके सामने जब अनंत कैसे लिख रहे हैं क्योंकि यदि अनंत लग जाएगा तो उसकी सामर्थ्य पर बाधा नहीं आनी चाहिए कि वो जन्म नहीं ले सकता प्राकृतिक एक नियम लागू हो रहा है ठीक है ऐसा है कि जिस जिसको आवश्यकता ही नहीं है जन्म लेने की जिसको जन्म लेने की आवश्यकता है ही नहीं जी जी पूरे वेद में इन बातों को उपनिषदों में अनेक ग्रंथों ने इस बात को बहुत स्पष्ट किया कि वो अजन्मा है अनेक बात नहीं यह भी कहा है कि अनेक प्रकार के रूप लेता है देखिए ऐसा है कि सनातन संस्कृति का दुर्भाग्य यह हुआ है कि इसमें प्रक्षेप बहुत हुआ है इसमें प्रक्षेप बहुत ज्यादा हुआ है महाभारत के इतने श्लोक जो आज सामने आए इतने थे नहीं प्रारंभ

00:12:33:20 में मनुस्मृति में जो था उतना उसको कई गुना गलत उसमें प्रक्षेप करके उसके स्वरूप को ही परिवर्तित कर दिया तो यह यह जितनी बातें हैं आधार कुछ भी बात क हो किससे लोगे आप मनु को तो आप विद्वान मानते हैं ना मनु ने स्पष्ट क्या लिखा है कि धर्म जिज्ञासा माना नाम प्रमाणम परमम शति जिसको प्रमाण वेद के अनुसार है उसको सही मानना चाहिए फिर इसमें एक लिखा गया नहीं

00:13:00:02 वेद के ही मंत्रों का अर्थ बताया जैसे सहस्त्र प्रतिमा जैसे नाथस प्रतिमा आता है तो दूसरी जगह सहस्त्र प्रतिमा भी आया नहीं तो वेद नहीं तो लिखा न तस्य प्रतिमा अस्थ तो वो तस्य प्रतिमा अस्ति जी जी सहस्त्र प्रतिमा स्ती शंकराचार्य जी को ले लो जी शंकराचार्य जी ने शंकराचार्य जी ने पुस्तक लिखी है उसका नाम है एक छोटी पुस्तक उन्होंने परा पूजा अब उसम क्या लिखा है उसमें स्पष्ट एक जगह नहीं दो जगह नहीं तीन जगह नहीं चार जगह लिखा है हम थोड़ा सा विषय से अलग हो रहे हैं जैसे शंकराचार्य है शंकराचार्य ने परा पूजा भी लिखा है और मणि रत्न माला भी लिखा है भज गोविंदम भी लिखा है तो तो शक तो देखो ऐसा है शंकराचार्य जी ने जो लिखा है वह तीन बार यदि अलग अलग चीज लिखी तो आप उसको किससे प्रमाण से मानोगे वेद से ही तो मानना पड़ेगा इसमें ये मानना पड़ेगा नहीं वेद में भी ऐसे मंत्र है वेद में

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00:14:04:22 ऐ ठीक है वेद के मंत्र को बाद में ले लेते स्वामी दयानंद से विश्व के जितने बड़े-बड़े विद्वान थे जितने बड़े-बड़े विद्वान इस मामले में स्वामी दयानंद के सामने स्वामी दयानंद खुला उनको चुनौती देते थे जी जी और आज तक के इतिहास में एक ऐसा नहीं कि जो स्वामी दयानंद को इस बात से स्वामी दयानंद ने कहा बताओ वेद में कहां है मूर्ति पूजा खुला चैलेंज दिया उन्होने नहीं मूर्ति पूजा है नहीं है श्वेता सत्र उपनिषद है आपके पास देखो कितने नहीं ऐसा है कि वेद का जो ओरिजिनल भाष्य है हा उस भाष्य में बता भाष्य प मैं आऊंगा मैं आऊंगा बाद में अभी हम आगे बढ़ते हैं अभी दो बातें आपने बताई कि एक ईश्वर को आवश्यकता नहीं है और दूसरा क्योंकि वेद में नहीं है इसलिए ईश्वर अवतार नहीं ले सकता इसलिए आवश्यकता नहीं एक बात और सुन लीजिए क्योंकि ईश्वर हमें जीव आत्मा को किसी दूसरे के किसी प्रकार के सहयोग की आवश्यक पड़ती है ईश्वर तो स्वयं सर्वशक्तिमान है उसको किसी की आवश्यकता ही नहीं है जी जी जी हमें तो कहीं कुछ प्राप्त करना होगा तो कहीं जाना होगा जो पहले से ही सब जग और सर शक्ति माने जो खुद दूसरों को देता है उसको क्या आवश्यकता है नहीं भारत का राष्ट्रपति एक जगह रहता है वहां पर रहकर पूरा देश दुनिया को

00:15:20:07 कंट्रोल करता है कि नहीं करता उसको हर जगह जाना पड़ेगा क्या मुझे इस गांव में आना है तो यहां आ के काम करूं जी जी तो इसी प्रकार ईश्वर की जो सत्ता है हा अब आ गया प्रश्न क्या बताए तो इसमें बात ये आती है कि जब हम यह कह देते हैं कि उसे अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है इसलिए व अवतार नहीं लेता मगर फिर बात यह आती है कि यहां बात उसकी क्षमता पर हो रही है वह ले सकता है कि नहीं उसको आवश्यकता है कि नहीं यह बात की बात उसमें क्षमता है कि नहीं क्षमता का सवाल एक मिनट क्षमता नहीं है तो अनंत क्यों कहा जा रहा है ना ना क्षमता मेरे सामने कोई शराब लाकर रख दे और क कि आप इसको पी सकते हो कि क्षमता है कि नहीं मुझे आवश्यकता ही नहीं है मैं क्यों करूंगा वो सही बात है मगर पी तो सकते हैं ना नहीं आवश क्यों पिएंगे जब पीना नहीं आवश्यकता नहीं पीने को कोई नहीं बोल आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है परमात्मा को आवश्यक इसकी आवश्यकता ही नहीं है नहीं नहीं वो आप मैं आपकी बात मान लेता हूं मगर मैं यह कह रहा हूं कि मैं शराब नहीं पिऊंगा क्योंकि मुझे आवश्यकता नहीं मगर क्या मुझे ये कहा जाएगा कि मैं नहीं पी रहा हूं तू नहीं पी सकता नहीं मुझे पी के दिखाने की आवश्यकता भी नहीं है ये कुतर्क है ये कुतर्क है आपका अच्छा आवश्यक नहीं उसके क्यों करेंगे नहीं मैं कहां कह रहा हूं कि ईश्वर करता है मैं ये पूछ रहा हूं कर सकता है कि नहीं

00:16:35:26 देखिए बात सुनो जी दुनिया में आज जो एक भ्रम है ना वह यही है कि जो ईश्वर नहीं कर सकता हम सोचते हैं कि यह करता है और जो ईश्वर करता है वो हम दूसरे फल कई लोगों के आगे पीछे घूमते हैं ईश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है ठीक है ठीक है अब आगे बढ़ जाते हैं कि मैं आप मतलब ये हो गया कि दुनिया में कुछ कार्य ऐसे हैं जो ईश्वर भी नहीं कर सकता है ये तो मानना पड़ेगा ना कार बनाने का काम ईश्वर का नहीं है कपड़ा सीने का काम ईश्वर का नहीं है वो तो वो तो जो भी करवा रहा है वो ईश्वर के ईश्वर के ही कृपा से हो रहा है वो तो ऐसा है वो तो मैं पहले कहा कि ईश्वर सामर्थ देता है बुद्धि देता है यसमान सिद्ध उसके बिना कुछ है ही नहीं जी जी जी अब बात ये आती है कि यदि ईश्वर कुछ कार्य ऐसे हैं जो वो नहीं कर सकता जैसे आपने कहा तो फिर हम उसे अनंत क्यों कह रहे हैं अनंत सामर्थ वान क्यों कह रहे हैं नहीं अनंत है उस देखिए बात सुन अभी आपने एक बात कही जी आपको उस कार्य करने की जो प्रेरणा और सामर्थ्य दे र वो देने वाला भी ईश्वर ही है क्योंकि जब जय जगदीश हर की आत्मा बोलते तो उसमें आता है पंक्ति तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पति हमारे प्राणों का स्वामी वही है हमारे

00:17:51:04 बुद्धि देने वाला सुबुद्धि देने वाला वही है परमात्मा से हम प्रार्थना करते हैं तो उस प्रार्थना में एक हम यह नहीं कह रहे हैं कि ईश्वर निराकार नहीं है हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि वो साकार भी है या नहीं ब्रह उपनिषद में आया है कि ईश्वर जो है दोनों प्रकार के उसमें मौजूद है ये उसके ये जो दर्शन है जो उस दर्शन के हिसाब से दो चीज इसीलिए मैं प्रमाण पर नहीं आ रहा हूं क्योंकि प्रमाण प जब जब आऊंगा तो वो गलत हो जाएंगे नहीं इसलिए मेरी बात गलत हो जाएगा ऐसा योग दर्शन न्याय दर्शन दोनों एक बात कहते हैं कि एक वस्तु को के बारे में अलग अलग दोनों मत दोनों सही नहीं हो सकते हैं उसको तो फिर जैसे कि कहा चाणक्य ने कहा मनुस्मृति में तो आया दो में अगर दो अलग अलग बातें तो दोनों को धर्म माना बिलकुल गलत है परिस्थिति बात सु प्रक्षिप्त है डॉक्टर सुरेंद्र कुमार जो थे गुरुकुल कांगड़ी के चांसलर थे उन्होंने एक शुद्ध मनुस्मृति लिखी है आपके पास ब्रद

00:18:55:07 उपनिषद है क्या नहीं होगा शायद दो तीन एक लिखा है कि ईश्वर साकार भी है निराकार भी है ना और तीसरे अध्याय में स् उपनिषद में लिखा है ईश्वर मैंने क्या बोला कि प्र गलत भाष्य गलत प्रक्षेप बहुत हो चुके

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00:19:08:18 हैं तो अभी हम लोग दोबारा विषय से भटक रहे हैं थोड़ा सा नहीं नहीं आप जो पूछ रहे मैं उसका जवाब दे रहा हूं वो मैं ही भटक रहा हूं तो दोबारा से उस पर आ जाते हैं कि अगर यदि चलिए मान लीजिए कि ईश्वर ऐसा ही है कि वो सब कुछ कर सकता है मगर कुछ कार्य है वो भी नहीं कर सकता तो हम उसको अनंत सामर्थ्य वान क्यों कहते हैं मैंर एक बात बताओ जी यह तो आप फिर वही बात कह रहे हो कि वह कार्य नहीं कर सकता कार्य वह नहीं करता उसके कार्य वही करता है ईश्वर के कार्य सुन लीजिए ईश्वर के जो कार्य इसके अलावा ईश्वर के कोई कार्य नहीं मैं बताता हूं सुन लीजिए ईश्वर इस सृष्टि की रचना करता है ईश्वर इस सृष्टि की सुरक्षा इसका पालन करता है सबका जी ईश्वर सबको कर्मों का फल देता है जी और ईश्वर इस सृष्टि का प्रलय भी करता है यह ईश्वर के काम है जी जो दुनिया के कोई दूसरी सारी शक्तियां पूरी दुनिया मिल जाए विश्व सब इकट्ठा हो जाए तो भी नहीं कर सकते ये है ईश्वर के काम ईश्वर ने आपको बुद्धि दी है बाकी काम आपके लिए छोड़ दिया कि आप करो जो कते मैं करना है विद्यार्थी जो होता है विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए उसने ज्ञान दिया ना परमात्मा ने यह ज्ञान भरा हुआ है वेद का अब इसको तुम करो

00:20:23:18 आप आपकी जो बात है वो वो मतलब ग्रहण करने योग्य है वो पूरी तरीके से गलत नहीं है मगर हम उसमें यह पूछ रहे हैं कि यदि ईश्वर भी कुछ कार्यों को ना करने के लिए सीमित है कुछ कार्यों को ना करने के लिए वो भी सीमित है तो हम उसको अनंत क्यों कह रहे हैं असीमित क्यों कह रहे हैं इसलिए देखिए बात सुने फिर वही आ गई ईश्वर के कार्य अलग है और मनुष्य के कार्य अलग उसने मनुष्य को कहा कि तू यह कर ईश्वर जो कार्य करता है वो उसके अनंतता के कारण ही हम भी कुछ कर सकते हैं यदि ईश्वर की रचना ना हो आप सोच रहे हो कि ईश्वर मतलब कि कुछ काम क्या कर सकता है क्या करेगा ईश्वर काम जन्म लेने की बातचीत कर रहे हैं आपके ना उसको आवश्यकता ही नहीं है जो पहले से हमेशा जन्म वो लेता है सुनिए नहीं आवश्यकता ना होना एक अलग बिंदु हो जाएगा कमता है कि नहीं यह तर्क नहीं हो सकता जो है ही हमेशा ही है उसका जन्म कैसे होगा अच्छा इस हम हाल में य बैठे हुए हैं जी यहां पर हाल में हम पहले से उपलब्ध है ये तो वो वाली बात से खत्म हो जाता है कि जब आत्मा पहले से है तो उसका जन्म कैसे हो रहा है आत्मा का जन्म तो नहीं होता है ये भी गलत है आत्मा का जन्म नहीं होता है शरीर का सुनिए जी जी जी कट उपनिषद का मैंने एक श्लोक

00:21:39:10 बताया था जो आपको उसमें यह मंत्र में कि इसको ये आत्मा जो है इसको यात्रा इसकी अनंत है और इसका इसको यात्रा करने के लिए बार-बार अलग-अलग प्रकार के वाहनों की आवश्यकता पड़ती है कभी इसने दूसरा शरीर लिया कभी इसने यह शरीर लिया कभी दूसरा शरीर लिया आत्मा का जन्म नहीं होता है शरीर का जन्म होता कक आत्मा को आवश्यकता है इसलिए वो शरीर धारण कर शरीर कितने दिन च क्या ईश्वर भी शरीर धारण कर सकता है कि नहीं नहीं क्योंकि उसको आवश्यकता नहीं आवश्यकता ना होने के कारण व बाधित है हा नहीं उसको आवश्यकता ही नहीं व सरी मेरी बात का फिर जवाब दीजिए आप यह मैं बोल रहा हूं आप इसकी आकृति बनाएंगे क्या कभी भी इसकी आकृति बना देंगे क्या याय हवा च रही इसकी आकृति बना देंगे क्या बन ही नहीं सकती जो नहीं है उसके लिए क्यों तक यानी कि कुछ बाधा है ना जब बा नहीं बाधा नहीं है हो ही नहीं सकती नहीं हो नहीं मैं मान रहा हूं आपकी बात ईश्वर अवतार नहीं ले सकता मैंने मान लिया मगर जब वो नहीं ले सकता तो हम उसे अनंत सामर्थ्य वान क्यों कर अनंत सामर्थ्य वान है क्योंकि उसकी कृपा के बिना तो हम सांस भी नहीं ले सकते हैं जो कुछ हम देख रहे हैं जो कुछ सुन रहे हैं जिसका उपयोग कर र एक कट लग रहा है ना

00:22:54:13 कि नहीं अवतार नहीं ले सकता हा नहीं ले नहीं ले सकता अं नहीं उसके उसके उसके कार्यक्षम उसमें है ही नहीं वो अच्छा उसको आवश्यकता ही नहीं अच्छा आवश्यकता को हम रख लेते हैं और दूसरी चीज ले लेते हैं कि नहीं ले सकता पर आते हैं कि सर्वव्यापी होते हुए वो एक देशीय नहीं हो सकता इस बारे में जो जवाब आता है वो होता है ईश्वर जो अवतार लेता है उसमें तिरोभाव और आविर्भाव का अंतर होता है ईश्वर का जो स्ट्रक्चर हमें दिख रहा है उसमें और जो सर्वव्यापी ईश्वर है उसमें सिर्फ इतना अंतर होता है कि ईश्वर का जो सर्वव्यापी रूप है निराकार उसमें ईश्वर ऐसी कुछ चीजें करता है जिसकी वजह से वो आंखों का विषय बन जाए जिससे कि वो दृष्टिगोचर हो जाए आविर्भाव हो जाए ऐसा नहीं है कि वो जब उस जगह खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है तो दूसरी जगह नहीं है वो जैसे उस उसमें लिखा हुआ वेद का मंत्र कहता है पश्य देवस्य काव्यम नमार न रति परमात्मा की जो कृति है ना जी परमात्मा की जो कृति जो कुछ कर रहा है दो प्रकार की कृति एक परमात्मा की कृति को हम वेद से जोड़ सकते हैं उसने ज्ञान दिया जो और दूसरा परमात्मा की जो अनंत कृति है जी तो यह परमात्मा के एहसास दिलाती कि यह परमात्मा य पहाड़ कौन

00:24:09:18 बनाएगा समुद्र कौन बनाएगा तो यह परमात्मा की कृति है यह कृति को यह हम कह सकते हैं उसने बनाया इस मकान को बनाने वालों को आपने नहीं देखा लेकिन प्रमाण तो आप समझते हैं ना आठ प्रकार के होते हैं लेकिन अनुमान हैय कि किसी ने तो बनाया है जी तो अभी मैं आपसे एक चीज पूछूंगा बस अनंत का अर्थ क्या है जिसका कोई अंत नहीं अच्छा तो हम अगर कह रहे हैं अनंत सामर्थ्य वान तो फिर ईश्वर की इस सामर्थ्य में अंत लग रहा है ना कि वो जन्म नहीं ले सकता उसको लेना ही नहीं है फिर वही बात है देखिए नहीं आपका आपका आपका प्रश्न जो है मैं चार बार आपको क्लियर कर चका अच्छा चलिए इसको बदल देते हैं हां उसको लेना नहीं है आवश्यकता नहीं है नहीं उसको आवश्यकता नहीं वो है ही एक आवश्यकता उसकी होती है जो पहले से ना हो ठीक ठीक उसको लेना नहीं है आवश्यकता नहीं हैको मान लेते हा अब बात ये आती है कि आपने कहा जो पहले से ना हो तो ईश्वर के अंदर वेद का ज्ञान है ईश्वर में वेद का ज्ञान है और वेद हम जो ईश्वर है वो सर्वव्यापी है हमारे आपके अंदर हर हदय में मगर फिर भी वेद का ज्ञान कैसे प्रकट हो रहा है किसी किसी ऋषि के मन में क्योंकि वेद का ज्ञान

00:25:24:25 भी पहले से बहुत छोटी बात बहुत अच्छी बात की आप जी जैसे कि हमने कहा क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापी है इसलिए उसका एक जगह पर प्रकट होना सिद्ध नहीं हो सकता वह बात अलग है कि फिर भी हम उसे अनंत स अनंत सामर्थ वान तो कह ही रहे हैं मगर क्योंकि ईश्वर सर्वत्र

00:25:45:09 व्याप्त है तो वह हमारे आपके मन मस्तिष्क में भी व्याप्त है फिर भी ऋषि किसी एक देश काल परिस्थिति में मंत्रों की दृष्टा क्यों बन रहे हैं जब कोई शिशु जन्म ले रहा है उसके मस्तिष्क में भी ईश्वर है सर्वत्र समान रूप से होता है फिर भी उसे वेद के मंत्रों को जानने के लिए किसी ग्रंथ की आवश्यकता क्यों है क्यों वोह एक देशीय हो रहा है जबकि उसके उसके मन के अंदर वही ईश्वर है जो सर्वत्र है जो ज्ञानी है ठीक

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00:26:13:20 बात जी यही मनुष्य में और अन्य पशु पक्षियों में योनियों में अंतर है किसी भी प्रजाति का पशु हो पक्षी हो उसके जीवन की जो आवश्यकता है वो पर उसको जन्म से ही दे देता है गाय के बचड़े को तैरना नहीं सिखाना पड़ता है गाय के बचड़े को उसके मां के पास ले जाने की आवश्यकता नहीं होती है उसको दूध पीना सिखाना नहीं पड़ता है अन्य पशु पक्षियों को कुछ घास खाना बताना नहीं पड़ता है उनके जीवन की जो आवश्यकता है लेकिन परमात्मा ने क्या कहा परमात्मा ने तो यह भी कहा कि तू जन्म मनुष्य का तो ले रहा लेकिन तू मनुष्य है नहीं मनु मनु भव जन्य देवम जनम मनुष्य बन अब मनुष्य बनने के लिए तुझे क्या कर करना है उसके लिए वेद रूपी और जो ज्ञान रूपी जो हमारे सामने क्या इसका अध्ययन कर यह स्वाध्याय करने से होता है एक व्यक्ति पिछले जन्म जब यदि पहले से ही सब कुछ है तो फिर तो कोई अज्ञानी बनेगा ही नहीं फिर राक्षस की प्रवर्ती ऐसा नहीं है मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र दिया उसको नहीं ज्ञान तो होना चाहिए ना उसको पहले से ज्ञान तो है मगर वो ले रहा लेकिन ज्ञान की वृद्धि करना तो जरूरी है वृद्धि वृद्धि वृद्धि है नहीं कहने का मतलब य अगर ईश्वर पहले से व्याप्त है तो फिर वो वेद मंत्रों

00:27:28:25 के दृष्टा किसी एक देशकाल परिस्थिति में क्यों बन रहे हैं हमारे ऋषि और अगर कोई शिशु है वो जन्म ले रहा है उसके मन में भी ईश्वर है तो फिर उसे आवश्यकता क्यों है किसी ग्रंथ को पढ़ने की नहीं इसमें ज्ञान एक जो मनुष्य है मनुष्य के व्यक्ति बच्चे को हर चीज सिखाना पड़ती है नहीं नहीं मैं कह रहा बात सु यदि उसमें ये युक्ति की उसम सब उसको चारों वेदों का ज्ञान उसको पहले से ही हो जाना चाहिए था ऐसा नहीं है परमा ने तो खाली स्लेट दी है अकल दी है कि इसको आगे लिखो पढ़ो और आगे बढ़ो इस वेद के मंत्रों में कई जगह यह आया कि हमारे को इस प्रकार के पुरुषार्थ से अपने जीवन की उन्नति करना पड़ती है उसने हमें रास्ता दिखाया है और सुनिए यदि परमात्मा यदि सबके दिमाग में बैठा हो और सबको ज्ञान वो प्रारंभ से ही दे दे तो फिर रावण का क्यों होता फिर कंश क्यों होता फिर दुर्योधन क्यों होता ये तो आगे की बात हो गई हम ये कह रहे हैं कि क्यों नहीं उसको ज्ञान पड़ता बिना सीखे नहीं होता आप सही कह रहे हैं मैं ये कह रहा हूं अगर पहले से ईश्वर है उसके मन में तो ईश्वरीय ज्ञान भी है हा नहीं ईश्वरी ईश्वरीय ज्ञान मनुष्य के बीच में तो हो ही नहीं सकता अनंत ईश्वर का ज्ञान तो एक संक्षिप्त में जो आवश्यकता है वैदिक वैदिक ज्ञान है वैदिक ज्ञान

00:28:43:27 तो ईश्वर तो उसका ज्ञान कितना है इसकी कुछ सीमा समा नहीं मगर वेदों के

00:28:49:01 मनुष्य को जो आवश्यक है जीवन के लिए जो उसके इस लोक और परलोक के लिए आवश्यक है वो ज्ञान उसको उसने दिया लेकिन सीखना पड़ता है मनुष्य को इसीलिए जन्म से सारी चीज यानी कि पहले से जो हमें प्राप्त है ज्ञान उसको भी बाहर निकालने के लिए हमें उद्योग करना पड़ता है प्रयास करना पड़ेगा तो इसी प्रकार से तो हम अग्नि को भी मानते हैं कि पहले से वो काट की लकड़ी में मौजूद है उसकी शक्ति मगर फिर भी उद्योग करने प प्रकट होती है जैसे दूध के अंदर वो जो दूध के अंदर मक्खन है फिर भी उद्योग करने प्रकट होती है इसी प्रकार से जो सर्वत्र व्याप्त ईश्वर है है वो हर जगह फिर भी वहां उद्योग करने से वो प्रकट हो जाते हैं क्या चीज ईश्वर प्रकट हो जाता

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00:29:29:06 है ना इस बात को नहीं स् फिर वही बात है ईश्वर देखो ईश्वर देखो सुनो ईश्वर तो वेन पश्यंति नितम गुवा उसको तो यहां देखते हैं वेन पश्यंति नितम गुवा का मतलब व यहां रहता है उसको प्रकट होने की क्या जरूरत है तो उसके ज्ञान को प्रकट होने की क्या जरूरत ज्ञान तो करना पड़ेगा ना उसका ज्ञान तो अनंत है जितनी दुकान सुनिए ये दुकान है जो पहले से है वो प्रकट क्यों हो रहा है इतना क्यों वो नहीं होगा ना सब वो तो सीखना पड़ेगा उसने किया है सब उसके हिसाब व पहले से नहीं था पहले इतना नहीं था क्यों फिर आवश वो जो ईश्वर है वो समान रूप से सर्वत्र व्याप्त नहीं है सर्वत्र व्याप्त है लेकिन उसका ज्ञान सर्वत्र नहीं हो सकता अच्छा उसका ज्ञान सर्वत्र व्याप्त नहीं है ईश्वर सर्वत्र व्याप्त उसका ज्ञान मतलब मनुष्य के एक हृदय में नहीं हो सकता उसका ज्ञान तो जो है वो है लेकिन किसी एक मनुष्य के हृदय में नहीं आ सकता वो नहीं नहीं मैं दोबारा क्लियर कर लू ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है मगर ईश्वर का जो वैदिक ज्ञान है वो सर्वत्र व्याप्त नहीं है समान रूप सर्वत्र ईश्वर का ज्ञान कोई ऐसा बाहर पड़ा है क्या का ज्ञान तो उसका स्थान ज्ञान का स्थान तो हृदय है मस्तिष्क है ईश्वर में नहीं है ज्ञान ईश्वर में तो है ही ईश्वर तो फिर श्वर स ईश्वर का ज्ञान तो ईश्वर में तो है ही उसी ज्ञान से तो हम प्राप्त करते हैं

00:30:44:07 मैं वही कह रहा हूं ईश्वर का ज्ञान जब सर्वत्र व्याप्त है तो उसे प्रकट होने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है वह तो है ना पहले से मनुष्य के दिमाग में नहीं मन मस्ति उसको लाना पड़ता हैब इस रूप में मनुष्य को शूद्र क्यों कहा चलो बताओ हर व्यक्ति को जन्म जाए तो शूद्र क्यों कहा बताइए नहीं नहीं मेरे इस बात को यदि आप समझ जाएंगे तो एक मिनट में समझ जाऊ देखिए ये आप मैं आपकी बात को ग्रहण करके आपसे प्रश्न करता हूं मैं आपसे कह रहा हूं कि मनुष्य को जन्म से सब शूद्र ते क्यों कहा इसलिए शूद्र वत होते हैं क्योंकि वो अभी मूर्ख है या अभी अज्ञानी अज्ञानी है ये है ना तो अज्ञानी है तो उसको ज्ञान देना पड़ेगा ना ठीक है हमने मान लिया वो अज्ञानी है अब ये बताइए जब ईश्वर उसके दिमाग में पहले से है तो वो अज्ञानी क्यों है ईश्वर ने जिस प्रकार से प्रारंभिक कार्य करने के लिए जो जो देख ये जो पशु हो पक्षी हो कुछ भी हो इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुख जना नत मनो लिंगम ये परमात्मा ने उनके हर मनुष्य के जीवन में लक्षण भर दिया चाहे सड़क पर घूमने वाला गधा हो चाहे भारत का राष्ट्रपति हो ये आत्मा के लक्षण सब में समान है जी ये समान है लेकिन इसके बाद में अपने जीवन को उन्नति करने के लिए यह परमात्मा ने हमको मनुष्य जीवन दिया है हम स्वाध्याय कर सकते हैं सं

00:32:00:02 कर सकते हैं संस्कार हमको मिले हुए हैं उससे हमको उन्नति करना पड़ेगा पुरुषार्थ करना पड़ेगा वो पुरुषार्थ से हम अपने नि प्रश्न यही है कि अगर ईश्वर सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है तो उसका ज्ञान क्यों नहीं व्याप्त है पूरा ज्ञान उसने दे दिया आवश्यक जो था आवश्यक जो था प्रारंभ हम बाहर से ले रहे

00:32:19:07 हैं वो हमारे मन में नहीं है नहीं उतना नहीं है मतलब ईश्वर सर्वत्र समान रूप से व्याप्त नहीं मेरी बात सुनो साइंस के मैं साइंस का विद्यार्थी नहीं हूं जी जी साइंस का ज्ञान है कि नहीं पहले से लेकिन मैं तो आर्ट्स का या कॉमर्स का हूं मैं उसको कैसे कर मैं इसीलिए आपको बताना चाह रहा हूं ना कि जैसे पार मार्थी दृष्टि से ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है पार मार्थी दृष्टि से ईश्वर का जो ज्ञान है वैदिक ज्ञान वह सर्वत्र व्याप्त है फिर भी उद्योग आदि से उसको व्यवहारिक बनाया जाता है इसी प्रकार से परमार्थिक दृष्टि से जो ईश्वर है वोह सर्वत्र व्याप्त है मगर उद्योग आदि से उसको व्यवहारिक बनाया जाता है जिसमें वो साकार हो जाता है जैसे जैसे वेद वेद

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00:32:58:13 आपकी इस बात से नहीं मानता मानता ये आपका तर्क हो सकता है मैं तो एक बात निराकार जो है निराकार अज्ञानता वश लोग निर्गुण और सगुण को निराकार और साकार का के रूप देते जबक अर्थ उसका बिल्कुल भी नहीं है निर्गुण की बातचीत तो निराकार सगुण की बातचीत तो सगुण इसका अर्थ है ही नहीं लेकिन प्रचलन है ईश्वर निराकार है और दो विपरीत परिस्थितियों में दोनों बातें सही नहीं हो सकती है दो में से कोई एक है और उसके लिए प्रमाण देखना चाहिए प्रमाण दुनिया के कितने लोगों ने कहा है कितने महापुरुष हुए हैं उन्होंने भी इस बात को कहा भाई शंकराचार्य को हम छोटा मोटा तो नहीं मानते विद्वान है तो सवाल उन्होने तो साकार की भक्ति बताई उन्होंने तीर्थेश पशु यशु काष्ट पाषाण मि सुनिए प्रतिमा याम मनोय तेन मू चेतस उसको तो महामूर्ख का अधमा प्रतिमा पूजा उत्तमा निगमा पूछा प्रतिमा पूजना तो अधम निष्ठा का काम बता भज गोविंदम भज गोविंदम भज गोविंदम मण मते अब ये मैं बता रहा हूं तो फिर अब ये तो उनका मैं बता रहा हूं ना उन्होंने ईश्वर के दो रूप है व्यवहारिक श्वर बोलने तो दीजिए ईश्वर के दो रूप उन्होंने माने व्यवहार

00:34:13:27 जिस सिद्धांत की मैं बातचीत कर रहा हूं अब उसको स्पष्ट कर लो आप मेरे को तर्क से कितना भी करो मैं उस तर्को को नहीं मानूंगा नहीं मानने के लिए ईश्वर एक है ईश्वर निराकार है सर्वव्यापक है और उसका कोई स्वरूप नहीं हो सकता इस आंखों से नहीं देख सकते है अनुभूति की ईश्वर जो है वह अनुभूति का विषय है ठीक अनुभूति से होता है जिस प्रकार मेरी आवाज की आप अनुभूति कर रहे हैं इस पंखे की हवा की आप अनुभूति कर रहे हैं दुनिया की अनेक वस्तुएं जिनके सुगंध दुर्गंध ठंड गर्मी इसको आंख से नहीं देखा जा सकता है ये अनुभूति के विषय है वैसे ही हमारी दृष्टि को हमारे विचार से ईश्वर अनुभूति का विषय है देखिए ठीक है इसको हम छोड़ देते हैं अब थोड़ा सा आगे बढ़ जाते हैं विषय बदल देते हैं अभी जो एक तर्क है कि ईश्वर को आवश्यकता नहीं है अवतार लेने की ठीक है तो क्या हमारे वेदों में ईश्वर ने जो मंत्र आदि दिए हैं कई बार वहां अलंकार का उपयोग किया है क्या कैसे जैसे कहीं पर उपमा अलंकार है कहीं पर श इस प्रकार के कुछ मंत्र आए तो उसमें नहीं नहीं मैं पूछ रहा हूं अलंकार है कि नहीं अलंकार कहीं कहीं तो होंगे तो अलंकार की क्या आवश्यकता है किसी वस्तु का कि आपके साथ मतलब उसको समझाने

00:35:29:00 की दृष्टि से उपनिषद क्यों बना समने की दृष्टि से अवतार भी बना उपनिषद क्या है समझाने की दृष्टि से अवतार भी तो हो सकता है नहीं ये नहीं अवतार नहीं हो सकता अलंकार हो सकता है बिना आवश्यकता के अवतार नहीं एक बात सुनो एक बात सुनो मैं आपको समझाता जी एक व्यक्ति है वह खाता भी है पीता भी है वो कितने समय तक एक बिस्तर पर बिना वहां से नीचे उतर के कुछ कर सकता है कितने दिन जीवित रह सकता है उसको खाना है पीना है क्या कर सक कितने दिन कर सकता है सही बात है मैं आपसे प्रश्न कर रहा हूं कितने दिन दिक्कत आएगी उसको ज्यादा बहुत कम रह पाएगा क्योंकि उसके लिए परिश्रम करना पड़ता है अब एक छोटा बच्चा जो अभी दो महीने का है तीन महीने का है वह तो नीचे नहीं उतर सकता लेकिन परमात्मा ने उसको प्रेरणा दी कि तू दिन भर में हज 500 बार पैर हिला हाथ हिला जोर से रो तो तेरा एक्सरसाइज जाए य प्रेरणा द परमात्मा परमा सुनि य प्रेरणा है यह ज्ञान जो जीवन के लिए आवश्यक था परमात्मा ने जन्म से बच्चे को बहुत छोटा बच्चा उसके ले जाओ आख बंद कर लेगा यह किसने अकल दी आख बंद कर लो नहीं तो नुकसान हो जाएगा

00:36:44:12 तो इस प्रकार से जो परमात्मा जो है उसने जो आवश्यक था मनुष्य के जीवन के लिए अलंकार की आवश्यकता थी उसे अलंकार उसने कहा किस प्रकार से उदाहरण बताओ जरा कोई उदाहरण जैसे शर्मा सूक्त है उसमें देवताओं की कुति कुतिया जो है आकर के मंत्र बोल रही मंत्रों की वक्ता है यय दयानंद जी के भाष्य में माना दयानंद जी के भाष्य में तो हो ही नहीं सकता है ही नहीं सकता है बता रहा नहीं मैं आपको बताता हूं एक मिनट कट लगा दीजिए जैसे आए जी जैसे कि मनुष्य को किन चीजों से दूर रहना चाहिए तो लिखा उसमें व उसम इस ढंग से लिखा उलो सुलो केतुम जातो कि उल्लू से गिद्द से कुत्ते से चीड़ से और गरुड़ से इनकी बातें मनुष्य के जीवन में नहीं आना चाहिए इस दृष्टि में ये वेद का मंत्र है नहीं नहीं मैं कह रहा हूं वेद में अलंकार को स्वीकार किया है आर्य समाज ने अलंकार तो मतलब इस प्रकार से किया हुआ हां उपमा अलंकार है कहीं प कोई और अलंकार हैय उपमा ये तो इसमें तो कौन सी बड़ी बात है तो अलंकार की आवश्यकता थी वो पड़ी होगी जिनने भाष्य किया उनको नहीं ईश्वर दे र नहीं

00:37:59:13 तो भाष्य करने वाले जो है उन्होने उसम किया होगा कुछ ईश्वर अकार आव समाज कह रहा है कि यहां पर ईश्वर ने अलंकार का उपयोग किया है अलंकार का उपयोग इस रूप में किया है सुनो जैसे जीवन को किस प्रकार सृष्ट करना तो उन्होंने स्वस्ति पंथा मनुचर में सूर्या चंद्र मसा इस प्रकार का सूर्य और चंद्रमा जिस प्रकार से हैं उस प्रकार से तुम अपना जीवन बनाओ यही तो उपमा है मैं गलत और सही नहीं कह रहा हूं को मैं पूछ रहा हूं कि अलंकार की इस प्रकार के जो मनुष्य के जीवन के लिए श्रेष्ठ है जो उसके वो हो तो उसका उपयोग उन्होंने इस ढंग से वेद में आया होगा नहीं नहीं वो सही कह रहे हैं आप मैं ये कह रहा हूं मैं उसको गलत नहीं कह रहा हूं बार-बार वो थोड़ा सा तो आप कहना क्या चाह रहे हो हां मैं ये कह रहा हूं कि अलंकार की आवश्यकता नहीं थी फिर भी अलंकार है ना वो सीधे भी अपनी बात कह सकते हैं अल कैसी बात भाई समझाने के लिए समझाने सुनिए माना कि 100 धन मूलधन 100 है हम बच्चों को एकदम से आना नहीं पढ़ा देते हम अनार बना के उसको बता देते हैं ये अनार है ये आम है तो मेरा पॉइंट यही है कि जब समझाने के लिए अलंकार हो सकता है तो अवतार क्यों नहीं हो सकता अवतार तो उसका होगा जो पहले किसी वस्तु है जो वस्तु का आकार ही नहीं उसका आकार तो बनाना अज्ञानता है मेरा आप फोटो बना सकते हो आपका

00:39:14:19 बना सकते हो लेकिन एक व्यक्ति को जिसको तुमने देखा ही नहीं उसका किसे बनाओगे चित्र मैं कह अवतार का हम उसके उसी रूप का चित्र नहीं बना रहे हैं जैसे हम जब जैसे आप मेरा चित्र बना रहे हैं तो मेरे मूल स्वरूप का चित्र नहीं बना रहे हैं मगर मैंने जो रूप धारण किया हुआ है उसका चित्र आप बना रहे इसी प्रकार इसी प्रकार से ईश्वर भी रूप धारण कर सकता है आद मेरे को उदाहरण बताओ ईश्वर ने इस रूप में धारण कियाम राम को मानते हैं कृष्ण को मानते किसको मानते अब इससे और आगे बढ़ते इसी प आ रहा हूं कि हम हमने यह माना कि ईश्वर भी अपनी म दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो अपनी मर्जी से अवतार मतलब जन्म ले सके ऐसा कोई नहीं है अपनी इच्छा को जब ईश्वर नहीं ले सकता तो मनुष की ईश्वर ले सकता है शब्द हटा दो ईश्वर को आवश्यकता ही नहीं वो निराकार है आप फिर वही बात कर र आप आप देखिए बात सुनो आप या तो आप समझ नहीं रहे हो या मेरे को घुमाने की प्रयास कर रहे हो ले सुनिए जो मैं स्पष्ट कह चुका हूं ये मेरी मान्यता है वेद के अनुसार मान्यता है और एक दो नहीं आपको मैं 25 उदाहरण दे दूं आपको जिसमें सबने ये कहा है कि ईश्वर निराकार केवल आर्य समाज का नहीं मैं बोलू इवन

00:40:28:27 शंकराचार्य जी को लेलो शंकराचार्य जी ने दोनों स्वरूप माने हैं तो गलत है फिर दो दो स्वरूप प्रमाण के रूप में आप उपयोग नहीं कर सकती प्रमाण के लिए फिर करो तो वेद है हां प्रमाण तो तो वे मैं आता हूं उस पर तो अब जब हम ये कह रहे हैं कि ईश्वर भी अपनी मर्जी से जन्म नहीं ले सकता तो फिर आप गलत आपका प्रश्न ही गलत है हां ईश्वर अपनी मर्जी से जन्म ले नहीं सकता मतलब ले सकता है ले ईश्वर के ऊपर किसी दूसरे का बंधन है क्या यही तो मैं कह मैं आपसे कह रहा हूं क्यों लेगा जन्म अरे नहीं नहीं मैं नहीं कह रहा वो लेगा मैं उसकी शक्ति के बारे श आपने क्या कहा आपने ये कहा कि ईश्वर अपनी मर्जी से जन्म नहीं ले सकता हां तो मतलब फिर मतलब किसी अपनी मर्जी से नहीं ले सकता मतलब सुनो यानी किसी दूसरे की मर्जी के अंतर्गत व वो आ रहा है वादित है तो ऐसा है क्या नहीं नहीं होना चाहिए तो इसीलिए तो नहीं नहीं वो लेगा नहीं वो अलग बात है चलिए छोड़ जिसका आकार ही नहीं है आप उसको जबरदस्ती आकार में क्यों लाके बैठ अभी आ जाते हैं कि य ये ये जो पुस्तक है ना मेरी जी जी जी इस पुस्तक को इसमें मैंने 100 200 उदाहरण दिए हैं अलग अलग

00:41:44:21 पुराणों को भी दिए हैं शंकराचार्य दिए मनु के दिए चाणक्य दिए हैं वाल्मीक के दिए तुलसीदास के दिए कबीर के दिए हैं नानक के दिए हैं तुकुर दस के दिए 100 उदाहरण है इसमें जी जिन्होने कहा कि ईश्वर निराकार है नहीं 100 से ज्यादा उदाहरण आदि शंकराचार्य जी की बुक में मिल जाएंगे कि ईश्वर साकार है तो इसका क कपाती जी में 500 मिल जाएंगे साकार ये वेद देखिए आपने हां कह दिया लेकिन इसका आधार वेद होना चाहिए नहीं वेद से ही नहीं वेद से नहीं हो ही नहीं सकते वेद से नहीं हो सकते चलिए चलिए इस हम आगे आएंगे सुनि वेद का भाष्य तो महिदर ने किए वेद के भाष्य तो वो प्रकार से कर दिए इसमें मांस का वो बता दिया जी जी वेद का भाष्य तोव जिन ऋषियों ने किया है जो जो भाष्य का जो हुए हैं जो उसकी पद्धति है जिसने अष्टाध्याई कभी पढ़ी नहीं समझ ही नहीं उन्होने वेद के भाष्य कर दिए अच्छा आपकी जानकारी में बताऊ कि एक बार वेद के ईवास मदम को ईवास मदम करके खत्म कर दिया उसमें ईवास मदम तो यजुर्वेद का जो मंत्र है उसमें ईश्वर के बारे में और को सा कर दिया लोग तो वर्षों तक पकड़ ही नहीं आए हमारे गथ में प्रक्षेप हुआ है ठीक

00:42:59:26 ठीक अभी हम लोग उस पर आ जाते हैं जो मूल विषय चल रहा था कि कोई भी मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार जन्म नहीं ले सकता कर्म का फल परमात्मा देता वो कर्म का फल देता है मगर ऐसे नहीं कि हम प्रार्थना करें और ईश्वर उसको दे दे सवाल ही नहीं क्योंकि वो लिखा भी है सत्यार्थ प्रकाश में बकुल ईश्वर की ईश्वर कृपा नहीं करता वो सिर्फ कर्म का फल देता है ईश्वर भयंकर है जितना डिपॉजिट करते उतना आपको लौटा देता है जी अपनी तरफ से कुछ देता तो जो व्यक्ति यह सोच रहा है कि मैं अपनी इच्छा के अनुसार जन्म ले लू उसको क्या मूर्ख माना जाएगा उसको प्रयास करना चाहिए वैसे अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने का बिल्कुल उसको वैसे प्रयास करना पड़ेंगे करेगा अपनी इच्छा अनुसार जन्म अपनी इच्छा अनुसार तो खर देखिए ऐसा है कि बच्चा कितना भी बढ़िया लिख दे अंक देना परीक्षक के हाथ में है जी ऐसे ही हम कर्म करने में स्वतंत्र है जी परिणाम के लिए नहीं है और फिर हमें जो भोग हमें करना है अवश्य में भक्त कृतम कर्म शुभ शुभम जी हमने जो अच्छा किया है उसको उससे कोई वंचित नहीं कर सकता और बुरा किया है उससे कोई बचा नहीं सकता यदि हमने अच्छे कर्म किए हैं तो यह जन्म जन्मांतर के ही तो परिणाम है कि

00:44:14:28 आपको यह मनुष्य का जन् सति मूल तपा को जात भगा न जाने कितने जन्म जन्मांतर हो के शुभ कर्म थे जो आज हमको ये मिला हुआ है जी तो हमारे जो कर्म है हम अपने उसके अनुसार मिलते अनुसार तो अब ये बात आती है कि हम डायरेक्ट अगर भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि हमको ऐसा ऐसा कर दो या कुछ भी मांग रहे हैं तो क्योंकि वह प्रार्थना के ऊपर काम नहीं करता व आपके कर्मों के ऊपर काम करता है तो ईश्वर से प्रार्थना करना तो मूर्खता कहलाए गी ना ना मैंने एक प्रश्न पहले आपसे कि यमा दते सिद्ध यजो विपत मनुष्य को भक्ति कर भक्ति का तरीका ही बदल दिया सब पाखंड घुस गया इसमें भक्ति करना है तो स्तुति प्रार्थना उपास केय तरीके उसके तो प्रार्थना कब करनी चाहिए आप अपने पूर्ण पुरुषार्थ से आप अपने पूरे दक्षता से किसी कार्य को करो और उसके बाद में प्रन से कहते कि मैंने तो अपनी शक्ति के अनुसार कर लिया है लेकिन अब तेरे आशीर्वाद की आवश्यकता यह है प्रार्थना प्रार्थना का मतलब ये नहीं तुम करो कुछ भी नहीं और तुमने भगवान नेता नहीं है कि तुमने उसको को चढ़ावा दे दिया उसकी गाली तो बहुत खुश अगर हम भगवान से डायरेक्ट कुछ मांग रहे हैं तो यह मांगना क्या सही है या गलत

00:45:30:06 है मांगना पुरुषार्थ के बाद में मैंने कहा हां आपकी जितनी क्षमता है तो पुरुषार्थ जब जब जब जो ईश्वर है वह सिर्फ कर्म आधारित आपको दे देगा तो मांगने की आवश्यकता क्यों है आवश्यकता बिल्कुल है बिल्कुल है आवश्यकता उसमें क्या होता है वो मतलब अगर आपने मांगा नहीं तो वो नहीं देगा आपके पुरुषार्थ का फल परमात्मा ने तो बिगर मांगे जो आपके लिए आवश्यकता है सब दे रखा है पानी की कोई आपके पास कमी नहीं है ये धरती आपको दे रखी है जी फल सब लगा रख पुरुषार्थ करके आपको इनको प्राप्त करना है किंतु इन सबका स्वामी कौन है ईशा वास मदम सर्वम य सब दुनिया का स्वामी कौन है हम उसकी कोई वस्तु करना है तो धन्यवाद तो करें उसे प्रार्थना तो करें कि हमने य हम जो प्रयास कर मांगना सही है क्यों मांगना बिल्कुल क्यों नहीं मांगते ईश्वर से क्या नहीं मांगते बुद्धि किससे मांगे मेरा कहने का मतलब जब ईश्वर आपके कर्मों के आधार पर आपको फल दे देगा ठी तो कर्म करें हम ईश्वर से अगर मांग रहे तो ये अनावश्यक है नाय तो नहीं अनावश्यक नहीं है हमने जो कुछ भी कर्म किए है परमात्मा से हां ठीक बात है परमात्मा से कार मांगने की आवश्यकता नहीं है परमात्मा से महल मांगने की आवश्यकता नहीं यदि ऐसा कोई करता तो

00:46:45:06 अज्ञानी है परमात्मा से उत्तम बुद्धि की कामना है गायत्री महामंत्र गायत्री मंत्र को महामंत्र का उसमें क्या मांगा उत्तम बुद्धि की कामना जिसके पास बुद्धि है दुनिया में अपने आप आ जाएगी परमात्मा से मांगने के लिए सिर्फ क्या चीज मांगना है परमात्मा मुझे सद्बुद्धि दे मेरा जीवन अच्छा हो मुझे ऐसा शक्ति दे कि मैं किसी गलत पथ पर ना चलू मुझे ऐसी शक्ति दे कि मैं अपने जीवन में धर्म अर्थ काम मोक्ष इस मार्ग पर चलते हुए बुधि मांगनी चाहिए सद बुद्धि तो अगर हम अच्छे कर्म करेंगे तो व सद बुद्धि नहीं देगा क्या कौन सा अगर हम अच्छे अगर कर्म हम वैदिक वेदों के हिसाब से चल रहे हैं तो क्या वो हमें सद्बुद्धि नहीं देगा अपने आप बिल्कुल देगा तो फिर हम मांग क्यों रहे हैं अलग से नहीं

00:47:31:19 बुद्धि तो मांगना ही पड़ेगी आपके पास में बुद्धि को इसकी सीमा मत रखो अनंत है तो उसको बढ़ाना है हमें निरंतर वेद कहता है कि तो ईश्वर अगर बुद्धि भी देता है अलग से उत्पति स्थिति सं और क्या कहते हैं कर्मों का फल तो इसमें ये कहा आ रहा है कि वो अलग से आपकी पना पर बुद्धि तो उसने जो आपको देना था दे दिया सुनि बुद्धि सब में है बुद्धि सब में नक्सलवादियों में भी बुद्धि है आतंकवादियों में भी बुद्धि है और दुनिया के जितने भ्रष्ट काम करने वाले सब में बुद्धि है परमात्मा देखिए उपासना का क्या अर्थ हुआ परमात्मा को इसके साथ में उपासना से जोड़ो जब

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00:48:11:25 हम जिस व्यक्ति के पास में जैसे बैठेंगे जिसका हम सहयोग मतलब निरंतर उसके संपर्क में रहेंगे उसका बुद्धि और उसका प्रभाव हम पर पड़ता है सही बात परम पिता परमात्मा का सानिध्य क्योंकि वो तो निश्चल दयालु है सब पर कृपा करना ही उसका काम है देवता है वो देते देर आ जाते उससे उसके पास बैठोगे तो उसकी अच्छाई आप में आना चाहिए यह परमात्मा का है और उसको चूंकि जो भी कुछ है सब कुछ जो हमारे प्राणों का स्वामी वही है जी तो आपका यह कहना है कि परमात्मा से क्यों मांगे क्या मांगे उसके अनुसार कर्म कर रहे तो फिर मांगना क्यों इसलिए कि नहीं मांगना आवश्यकता तो पड़ती है आपके पास जो है उसे आप उसको आगे बढ़ाना चाहते हो कि नहीं तो ये अनावश्यक नहीं हुआ ईश्वर तो सिर्फ कर्मों का फल देगा आपकी प्रार्थना प कोई रिएक्ट नहीं करेगा ये चीज अलग ये दोनों चीज अलग आप दो को एक म मैं ये पूछ रहा हूं क्या ईश्वर प्रार्थना पर प्र वो का काम करता है प्रार्थना पर प्रार्थना पर देखिए ऐसा है आपके पुरुषार्थ के बिना आपकी प्रार्थना का कोई महत्व नहीं है न रिते सुन वेद की सूक्ति बता रहा हूं न रिते उसमें

00:49:27:01 लिखा है कि बिना पुरुषार्थ के यह परमात्मा आपके कोई मदद नहीं करता है आपको आपने कोई कार्य किया आप में अहम भाव ना आए घमंड ना आए इसलिए सब कुछ आप करने के बाद में परमात्मा से कह रहे हैं परमात्मा मैंने तो अपना काम किया अब तेरी कृपा की आवश्यकता है इसमें क्या बुरा है नहीं बुरा नहीं है मैं बुरा नहीं कह रहा मैं जब ये कह रहा हूं जब नहीं आपका आप कुतर्क कर रहे हैं मेरे से नहीं आपके जो तर्क है कुतर्क है मैं क्षमा करू आप जिज्ञासा है वो आप कुतर्क कर रहे हैं आप अपनी बात को किसी भी मैं जिन सिद्धांतों को मानता हूं जी उन सिद्धांतों को स्वामी दयानंद ने नहीं बनाया है वह सिद्धांत किसी व्यक्ति ने नहीं बनाए उन सिद्धांतों को मानता हूं जिनका कि और वेद के भी उस भाष्य को जो सही ढंग से जिसमें हुए हैं क्योंकि वेद में तो कई प्रकार के कितने मैक्सर ने भी वेदना कर दिया मर ने भी कर दिया कई लोगों ने कर दिए लेकिन उनके भाषिक अर्थ का अनर्थ हुआ है उसमें हम तो यह तो हो गया कि हमें प्रार्थना करनी चाहिए केवल सद्बुद्धि की कि सद्बुद्धि से अलग भी प्रार्थना कर सकते हैं आपके पास

00:50:42:03 में बुद्धि रियस बलम तस्य निर् बुद्धे स्तु कुत बलम एक जो बुद्धि होती है सद बुद्धि वो मास्टर की होती है जी आपके पास में वो आ गई तो सब कुछ आ जाना है तो या अच्छी बुद्धि की आवश्यकता है और वो देने वाला परमात्मा भि अगर हम कुछ मांगते हैं भगवान से तो व मूर्खता है कोई भौतिक वस्तु मांगना तो अज्ञानता है ही शरीर भौतिक में आता है क्या चीज शरीर मांगना तो कुछ ने मांगा शरीर कौन मांग रहा है किसने मांगा कृष्ण कृष्ण जी उसम पढ़ो जरा सत प्रकाश उस उठा के पढ़ यदाय धर्म यदाय धर्म से तो उसका अर्थ क्या हुआ उन्होंने ही कहा है वो शायद ये कह रहे हैं कि मुझे जब जब धरती पर पाप हो मुझे भेजे ऐसा नहीं है इसका अर्थ कई लोगों ने जैसे गुरु ब्रह्मा गुरु सुनिए मेरी बात सुनो उसमें ये है कि उसका भावार्थ ये है कि जब जब इस समय में कुछ अवस्था होते कोई ना कोई महापुरुष आते हैं जो मार्ग दर्शन करने के लिए किसी दयानंद जी ने ये लिखा है भगवान आते ईश्वर आते नहीं उन्होंने ये लिखा है कि वहां वो ये प्रार्थना कर रहे हैं ईश्वर से कि जब जब धर्म प वो हानि आए तो मुझे धर्म की रक्षा करने के लिए यहां भेजे ईश्वर वो प्रार्थना कर रहे हैं हो तो है उसम वेद में भी है वो तो वेद में भी दूस बा वे

00:51:57:08 वेद में वेद में अंत का मंत्र है उसमें दूसरा मंत्र एक आता है उसमें हम सामूहिक रूप से प्रार्थना की गई है कि यह फिर से जन्म ले नहीं नहीं भौतिक तो फिर वही बात आ गई जब ईश्वर उस जब ईश्वर से सिर्फ सद्बुद्धि मा जन्म के लिए बातचीत है जन्म जन्म की जो बातचीत है यदि मैं ऐसा सोचता हूं कि परमात्मा मेरे को बार-बार जन्म दे इस काम के लिए जसे महाभारत में रति देव का एक प्रश्न आता है कि उनने पूछा तुम क्या मांगता हो तो उसने ये उत्तर दिया महाभारत में ही है नव हम काम राज्यम न स्वर्गम न पुनर्व काम दुखता नाम पराण नामत मैं तो बारबार ज जन्म लू तो इन प्राणियों की सेवा करने के लिए यदि ऐसी भावना है तो क्या बुरी बात स्वार्थ की बातचीत नहीं है कि मैं बरी नहीं है बात है कि जब वो हमारे कर्मों पर हमें फल देने वाला है तो हम प्रार्थना क्यों कर रहे हैं उससे प्रार्थना कर रहे इसलिए कि यदि मैं अच्छे काम के लिए मैं प्रार्थना य कर रहा हूं कि वर्थ कर वो तो हम काम कर देंगे उससे हो जाएगा ऐसा नहीं ऐसा नहीं एक्स्ट्रा कर रहे प्रार्थना का मतलब क्या होता है प्रार्थना का मतलब आपका अधिकार नहीं है लेकिन प्रार्थना आपकी इस भावनी की है कर्म तो है आपके और उस प्रकार के आप कर्म कर भी रहे हो लेकिन उस प्रकार की यदि आपकी भावना है कि मैं अच्छे कुछ

00:53:12:10 कर्म करो परमात्मा मेरे को पुरान जन्म मिले तो मैं फिर कई लोग बोलते हैं पुनर्जन्म मुझे मिले तो मैं इससे और ऐसा काम कर कईयों के कर देने से वो सही थोड़ी ना हो जाएगा हा तो ये बात तो ये तो तय है कि मनुष्य को जो जन्म मिलेगा जो योनि मिलेगी उसका परिणाम उसके कर्म के आधार पर ही होगा उसको कोई उसमें कोई दो प्रार्थना आवश्यक नहीं प्रार्थना अलग चीज है ये चीज अलग है प्रार्थना के अनुसार उस प्रार्थना नहीं वो जो मांग रहा है वो आवश्यक नहीं है वो यूं ही मांग रहा है बस नहीं मैं ये नहीं कह रहा हूं प्रार्थना को आप दूसरे रूप में ले रहे हो प्रार्थना को आप कह रहे हो कि परमात्मा से कोई वस्तु को मांगना ही प्रार्थना है भगवान कृष्ण ने मांगा ना कि मुझे एक शरीर दीजिए दोबारा जन्म दीजिए पढ़ा होगा आपने मैंने नहीं पढ़ा प्रकाश में है देना कौन सा सत्या प्रकाश ला दे सत्या प्रकाश देना य पर वैसे रोचक रोचक है बातचीत आपसे कोई बात नहीं बात में तो कोई एक छोटा सा प्रश्न लेकर हम जो दूसरा मुख्य विषय है उसको ले लेंगे छोटा सा प्रश्न ईश्वर के बारे में जैसे हमने कहा कि हम ईश्वर की प्रार्थना करते सत्या प्रकाश भी य बात कहती है कि हम ईश्वर की प्रार्थना करते उससे ईश्वर के गुण हमारे अंदर आते हैं तो क्या ईश्वर का उत्पत्ति स्थिति संहार करने का गुण हमारे अंदर आ जाएगा नहीं नहीं

00:54:27:22 तो यह ब्रेक के बारे में कहां क वर्णन है कि ईश्वर का सिर्फ दया ही आएगी अच्छाई ही आएगी उत्पत्ति स्थिति समार नहीं आएगी इसका प्रमाण है कहीं ऐसा कहीं प्रमाण देखिए पहली बात तो सब चीज ईश्वर की हमारे में आ जाएंगी ये कहां से आप कै बा आपने कहा ईश्वर के गुण आ जाते हैं गुण मतलब सब नहीं ईश्वर के जो आपने उस बात को ध्यान नहीं दिया जी बोलिए जो परमात्मा जो कार्य करता है जी देखिए बात सुनो परमात्मा संरक्षा किसी का हम संरक्षक नहीं बन सकते किसी गरीब के हम उसका यानी सारे गुण नहीं आएंगे थोड़े से आएंगे नहीं जो परमात्मा करता मैंने चार बात बताई आपकी ईश्वर निराकार है आत्मा भी हमारी निराकार है ईश्वर सर्वव्यापक है हम नहीं हो सकते ईश्वर सर्वांतर्यामी है हम नहीं हो सकते ईश्वर को ब्रह्मा या सृष्टि का रचना करने वाला है कर सकते आत्मा सर्वव्यापक नहीं है सव सर्वव्यापक नहीं तो बात हो चुकी है पहले

00:55:26:27 मनुष्य के कार्य और ईश्वर के कार्य दोनों अलग है जी ईश्वर जो कार्य कर सकता है एक मनुष्य की तो क्या बात है विश्व के सारे लोग मिलक भी उस कार्य को नहीं कर सकते जो मैंने आपको बताया प बु तो ईश्वर के सारे गुण नहीं लेकिन ईश्वर में दयाल तो का गुण है क्यों नहीं आए ईश्वर सत्य है हम क्यों नहीं करेंगे मैं मान रहा हूं आपकी बात मैं पूछ रहा था इस बारे में इस बारे में क्या कहीं कोई प्रमाण है कि जब ईश्वर की भक्ति करेंगे तो ईश्वर के ये ये गुण मगर ये वाले नहीं नहीं ऐसा कोई क्लियर हु ऐसा नहीं ऐसा को नहीं प्रमाण क्या है ईश्वर के पास में बैठा उपासना का मतलब यही होता है प्रमाण पूछ नहीं प्रमाण हर चीज का प्रमाण क्या देंगे उपासना का अर्थ यही होता है कि उसके पास में बैठने से आपको गर्मी लग रही है आप पंखे के पास में बैठे उसका प्रभाव आप पर आएगा जाड़ा है आपको ठंड लग रही है अग्नि के पास बैठोगे उसका प्रभाव आपके पास में आ कि सारे गुण नहीं आएंगे वो वाले आएंगे जो आप बता रहे हो नहीं मैं नहीं बता ईश्वर के वो चार गुण छोड़ दो आप वो प्रमाण आप दे नहीं रहे तो ये तो मैं कह चुका हूं कि ईश्वर के जो कर्म है कार्य है वो ईश्वर के इन कार्य के अलावा आपने कहा हर बात का प्रमाण नहीं होता तो ये आपकी बात हो गई ना कि ईश्वर के सारे गुण नहीं आएंगे सारे गुण

00:56:42:01 तो नहीं आ थोड़ आएंगे तोय आपकी बात हो गई बकुल ठीक है

00:56:45:28 अच्छा अब बात आ जाती है कि जो एक बहुत कई बार हम लोगों की इस पूरी बातचीत में बात आई कि गलत प्रक्षेप हो गया या मिलावट हो गई या भाष उसमें गलत कर दिया तो मैं यह पूछना चाहता हूं कि जो आर्य समाज है इसकी गुरु परंपरा क्या है ऐसा है कि आर्य समाज जो हमारी वैदिक मान्यता है वह तो परमपिता परमात्मा सबका गुरु है एक तो यह वह अलौकिक गुरु है वही है और गुरु के लिए तो गुरु का जो शिक्षा प्रदान करता है एक मनुष्य को कई गुरुओं के वो होता है हम दयानंद जी के बिल्कुल बताए हुए मार्ग से इधर का उधर नहीं जाएंगे ऐसा नहीं है और हम क्योंकि लेकिन उन्होंने एक वो रास्ता दिखाया जिसको लोग भूल चुके थे हर किसी बात कोही सनातन के साथ जोड़ रहे थे तो इसलिए हमारा लौकिक जगत में वो एक हमारे गुरु है उसके बाद में जो आज जो गुरु परंपरा तो आप य इसको फुल स्टॉप तो लगता ही नहीं

00:58:01:09 तो जो ईश्वर का ज्ञान है वेद हमारे सोच का और हमारा आधार वही है कोई व्यक्ति विशेष हमारा गुरु नहीं है नहीं वेदा आदि शास्त्र आज से कई अनेक अनेक वर्ष पूर्व मंत्र दृष्टा बनते हैं हमारे ऋषि गण हा वहां से लेके स्वामी दयानंद जी तक वो वेद मंत्र कैसे आए जिन्हें उन्होंने प्रमाण माना सनातन का श्रुति नाम सुना है ठीक है श्रुति का अर्थ क्या हुआ श्रुति जो सुना जाता है इस प्रकार से आज भी आप चले जाइए दक्षिण भारत में छार सुन सुन के याद है उनको नहीं नहीं मैं वही कह रहा हूं तो दयानंद जी ने किससे सुने स्वामी जब दयानंद जी ने जब सुने नहीं दयानंद जी ने जब पढ़े जब तक तो वो उनको लिपिबद्ध कर दिया गया था किसी से वेरीफाई तो करवाएंगे वो थे ना फिर हां थे ना अपने क्या नाम गुरु विरजानंद जी गजानंद जी के गुरु पूर्णानंद जी पूर्णानंद जी के गुरु अब ये इतने लंबी परंपरा नहीं स्वामी जी ने लिखा होगा सत्या प्रकाश में क हो हमने काफी ट्राई किया पर मिला नहीं नहीं सत्या प्रकाश में जरूर होगा कहीं क बा स्वामी जी के सुनो स्वामी जी के जीवन उसमें मिलेगा कहीं ना कहीं उ मतलब हमें मालूम नहीं है नहीं

00:59:16:09 हम उसमें जो उनका जीवन चरित्र है उसमें इसका उल्लेख होना चाहिए क् पूर्णानंद जी त हुआ तो तो क्या नहीं हुआ तो इसका कोई वो बात है कहने का अ है हम ये कैसे माने कि ये जो वेद मंत्र है ये वही मेन मंत्र है जो परमेश्वर ने दिए क्योंकि हमें पूर्णानंद जी से पहले का गुरु मालूम ही नहीं है तो इससे क्या होता है उस उस सुनिए व जो वेद मंत्र है उसको यह देखो कि य इसमें गलत बता रहे हैं कुछ गलत है क्या वेद तो अपने आप में उनके भावार्थ जो है नहीं नहीं जो वेद है हम ये जैसे वेद मार्केट से हम लेकर के आए मान लीजिए कुछ छपा हुआ है किताब में ऐसे ही नहीं हो गया तो वो बताए वेद के बारे में आपको मालूम है वेद को अशुद्ध कोई इसलिए नहीं कर सका कि वेद को याद करने की और पढ़ने की विधि आठ प्रकार से कई प्रकार से इसलिए उसमें कोई मिलावट नहीं कर सका वो आप सही कह रहे हैं मैं ये कह रहा हूं कि उस आठ प्रकार की वो जो श्लोक है उसके साथ वो वेदा आदि मंत्र हम तक पहुंचे कैसे यदि हमें ये नहीं पता व्याकरण के प्रकांड विद्वान थे प्रकांड विद्वान थे उन लोगों ने सब देख के पूर्णानंद जी ने मान लीजिए कहीं से वेद लिए पढ़ने के लिए मान लीजिए उने भी किसी से सीखी तो वो किससे सीखे कैसे प्रमाणित ये तो एक विषय अलग है इसको देखना पड़ेगा ये हमें इसको होगा

01:00:31:14 इसकी जानकारी ऐसा नहीं कि नहीं है होगी बिल्क आर्य समाज के रि नहीं ऐसे बहुत से ऐसे स्कॉलर है जिन्होंने इसम रिसर्च किया है वो कहीं ना कहीं मिल सकती है कहीं ना कहीं मिलेगी ऐसा नहीं है हमने इस का मंत किया है अभी तक आर्य समाज से इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है और इसका को मैं कहता हूं कि चलो जो कुछ है वो कुछ ऐसा है क्या जो सनातन के विरुद्ध है मैं वही उसी पे आ रहा हूं बात ऐसी है कि जो गुरु शिष्य परंपरा जिसके बारे में हमें सामग्री प्राप्त है वह इनकी है शंकराचार्य निंबार्काचार्य इन सबकी गुरु परंपराओं की सामग्री हमें प्राप्त है कौन से सन में कौन गुरु हुए आदि शंकराचार्य जी के बा मैं मना नहीं करर अब बात ऐसी है कि हमने माना मेरे पास जानकारी नहीं है इसकी और ऐसा ही आप कह रहे हैं कि इसकी जानकारी कहीं नहीं मिलेगी य भी मैं जाएगी रहा मैं आपको प्रयास करके बता दूंगा पास में ऐसे लोग बताइएगा अभी समस्या क्या है वो समस्या यह है कि अगर हमें यह नहीं पता कि पूर्णानंद जी के गुरु कौन है है कि अगर हमें पूर्णानंद जी के जो गुरु है उनके बारे में कुछ नहीं पता कि उनको वेद कहां से स नहीं नहीं ऐसा मत बोलो पता नहीं है ऐसा मत बोलो बिल्कुल मिलल जाएगा दिक्कत मगर आपको पता नहीं है मगर विश् मेरी व्यक्तिगत जानकारी में नहीं है सुनिए

01:01:46:14 आर्य समाज की जानकारी और आर्य समाज की मतलब पूरे विस्तार से मैं बहुत बड़ा कुछ व हूं ऐसा मत समझना मैं तो बहुत छोटा सा एक आर्य समाज का कार्यकर्ता जी जी मैं समझ गया विवान भी नहीं मैं कुछ बात बोलना चाहता इसलिए कि जैसे कि प्रॉब्लम ये है कि जिनकी सामग्री हमें प्राप्त है कि शंकराचार्य के कौन शिष्य हुए उनके शिष्य कौन हुए उनके शिष्य कौन हुए आज तक के वो पूरी वंशावली हमें प्राप्त है अब हमें अगर पूर्णानंद जी अगर मैं ये नहीं कह रहा कि नहीं है वो आप देंगे तो मिल जाएगी अगर पूर्णानंद जी के गुरु के बारे में हमें नहीं पता और हम यह कह रहे हैं कि यह जो वेद मंत्र है जो वेद मंत्र शंकराचार्य जी की गुरु परंपरा के द्वारा यहां तक आ रहे हैं तो वेद मंत्रों का अर्थ तो हम मान रहे हैं अर्थ अपना दे रहे हैं और वेद मंत्र उनके मान ले रहे हैं उनके द्वारा दिए हुए अब बात ऐसी है यदि शंकराचार्य परंपरा या निंबार्काचार्य परंपरा या रामानुजाचार्य परंपरा गुरु शिष्य परंपरा जिसकी वंशावली हमें प्राप्त है वो आपको गलत अर्थ दे रही है क्योंकि उनके अर्थों को हमने नहीं माना शायन के अर्थ को आर्य समाज ने नहीं माना तो सायनाचार्य के अर्थ को जब हम नहीं मान रहे हैं तो उनकी ही परंपरा के द्वारा आने वाले वेद मंत्रों को हम कैसे विश्वास कर ले रहे हैं कि वही वेद मंत्र है जो ईश्वर के हैं ऐसा है कि म स्वामी दयानंद ने जब पढ़ा उनको

01:03:01:15 तो उन्होंने कहा प्रत्येक एक जैसे संस्कृत की तो यह है कि एक शब्द के कई अर्थ है जी जी प्रसंग के अनुसार नहीं है अब जैसे मान लीजिए कि आपने सद शब्द का उपयोग किया सद शब्द के अर्थ विषय कुछ है और वहां पर होना चाहिए नमक की बात और वहा आप घोड़े की बातचीत कर र है ठीक तो इस प्रकार की अनर्गल जो बातें थी नहीं वो ठीक है मेरा कह आपका कहना ये है कि पूर्णानंद जी ने किससे सीखा पूर्णानंद जी ये पहला प्रश्न आप कर रहे हैं मेरे ख्याल से आज तक दुनिया में किसी ने ये किया नहीं था लेकिन ये वो प्रश्न है जिसका कोई महत्व नहीं है मेरी दृष्टि मैं बता रहा हूं महत्व जैसे आपने कहा कि जो ईश्वर का ज्ञान है वो जो दयानंद जी ने भाष्य किया है वो सही भाष्य है ठीक है अब ये जो अच्छी बातें हैं मैं कह रहा हूं वो दयानंद जी ने जो बातें बताई है ईश्वर के विषय में सब अच्छी है मगर यह जो अर्थ बताया है उन्होंने यह उन्हीं मंत्रों का अर्थ है जो मंत्र हम जी आप स्वामी दयानंद जब कई कई बार जब विपक्षियों ने विरोधियों ने जब शास्त्रार्थ करने के लिए और सनातन धर्म के ऊपर आक्षेप लगाए और दयानंद के यह वेद के मंत्रों का गलत अर्थ था वह बताया केवल आर्य समाज के पंडितों ने जाकर वहां पर वो किया है नहीं ये तो अच्छी बात है केवल

01:04:16:27 पिताजी प उन्होंने ये कहा कि हम लोगों ने फिर कहा कि तुम तो दया का भाष्य मानते ही नहीं हो मेरे पिताजी बस में बैठ कर के जा रहे थे कोनी निकली हुई थी ट्रक से उनका जो हाथ है वो रगड़ गया बस वाले ने निर्ममता से उनको जो है सड़क पर उतार दिया अपना चला गया वो तड़प रहे थे मुझे बचाओ मुझे बचाओ उस समय उनकी सहायता एक मुस्लिम ने की तो ऐसा हो सकता है कि कोई जिसके जो मूल में सिद्धांत अलग अलग हो मगर फिर भी वो अच्छा कार्य करे तो इस क्योंकि उन्होंने एक जगह अच्छा कार्य किया इसलिए उनकी वो जो बात है बिल्कुल प्रमाण के रूप में मान ले तो ये तो नहीं हो स लेकिन देखिए बात सुन जी स्वामी दयानंद का रिकॉर्ड है जी विश्व में कोई व्यक्ति उनको चुनौती से उनको पराजित नहीं कर सका जब वह जाते थे अपना बनारस में तो वहां पर पोस्टर लवाते ि ये सभी सभी लोग कहते हैं काशी के पंडित का की वो भी किताब छपी है जिसमें वो साथ साथ में हारे बाद में उसने मांगी मानी है हारे नहीं है उसने क्षमा मांगी है उ उसे उसने राजा ने स्वामी जी को बाद में बुलाया और बोले ये पंडितों की हमारे को मतलब षड्यंत्र में हम आ गए थे उसने क्षमा मांगी है और स्वामी जी को लेके गया हो आप सही थे कोई उनको नि ये जो बातें है ना इनका हम लोग वो नहीं

01:05:31:28 निकाल पाएंगे आप सही बोल नहीं मेरे पास नहीं मेरे पास स्वामी जी के जैसे पू प्र मैं ये पूछ रहा हूं कि अगर हमें यही सही अर्थ है जो आप बता रहे हैं ईश्वर और ब ब्रह्म और धर्म के बारे में अधातु धर्म जिज्ञासा अधातु ब्रह्म जिज्ञासा इसके बारे में आप जो बोल रहे हैं वही सही है मगर ये उन मंत्रों का अर्थ है जो मंत्र में गुरु शिष्य परंपरा शंकराचार्य आदि से तो क्या हुआ तो गलत तरीके से भी तो उसका भाष्य करें उस यण मदर और मैक्सर ये सब गलत कर सकते हैं तो पहले भी कर सकते मैं वही पूछ रहा हूं मेरा सवाल ये है जो व्यक्ति हमें गलत अर्थ दे सकता है किसी लोभ वश लालच वश द्वेष वश वह व्यक्ति हमें गलत मंत्र क्यों नहीं दे सकता और यदि वह सही अर्थ व वो सही मंत्र दे रहा है तो उसके अर्थ गलत क्यों है गलत देखिए अभी मैंने एक उदाहरण दिया था आपको एक प्रक्षेप हुआ शवास मदम की जगह श की जगह उन्होंने सा कर दिया देखिए उनके पास भी अपने पक्ष है अपनी चीजों को नहीं ईसा कर दिया कैसे पक्ष वो ईसा मसीह से जोड़ रहे थे पादरी लोग उसका प्रचार कर रहे थे मैं आपको ये पूछ रहा हूं तो ठीक है वो अलग चीज है मगर अगर हम जैसे मान लीजिए य भाई साहब बैठे हैं सामने और इनसे मैं एक किताब ले रहा हूं और मैंने कहा यह किताब बिल्कुल प्रमाणिक है क्योंकि इसने

01:06:47:00 कहा है कि परमेश्वर से आई है ठीक है अब मैं इस किताब को मान रहा हूं अब इस किताब में इसने अर्थ भी लिखे हैं मैं कह रहा हूं इसने लालच वश अज्ञानता वश इन अर्थों को बल दिया है तो जब इसके ज्ञान पर मुझे भरोसा नहीं है किय सही ज्ञान दे रहा है या द्वेष बस या लालच बस ज्ञान पर भरोसा नहीं है तो इसके मंत्रों पर मैंने भरोसा क्यों किया मंत्र बात अलग है देखिए ऐ मंत्र के भावार्थ करने का तरीका अलग है और भावार्थ वही कर सकता है जिसने कि उसको गणता से मतलब के उसमें अष्टाध्यायी सरल है मैंने ये कैसे माना अब मैं उदाहरण सु एक गणित है जी गणित करने को मैंने भी करा दूसरे ने भी करा मैंने अपने हिसाब से किया दूसरे ने दूसरे से हिसाब से कर दिया अच्छा तो मतलब मैंने जो किया वो जो उत्तर है उसको सही मानेंगे क्या य तो देखना पड़ेगा कहीं ना कहीं उसका प्रमाण होना चाहिए कि किस कारण से यह सही है और किस कारण सेय गलत है ठीक है किसी भी कारण से अगर आप कहना क्या चाह रहे हो कि मतलब आप पूर्णानंद जी की बात प आए थे बस वहां आ जाओ आप तो किसी भी कारण से अगर यह निकल रहा है कि ये जो अर्थ है इस व्यक्ति ने अज्ञानता वस लिख दिया है तो हम ये क्यों मान रहे हैं कि इसने जो मंत्र में दिया लिखा हुआ मंत्र तो वही है मंत्र में कैसे पता कि वही मंत्र है मंत्र तो वही है मंत्र तो ज सेत कोई किसीसे हमें क्यों विश्वास है कि मंत्र वही

01:08:02:06 है करो हम मानते हैं उसको आप अच्छा मतलब विश्वास है बस हमें मान मंत्र वही है लेकिन उसके भावार्थ उसके उसम परिवर्तन हुआ ये है मंत्र को मंत्र तो कोई परिवर्तन कर ही नहीं सकता आनंद आया चर्चा में और हमें वर्ण व्यवस्था पर भी बात करनी थी पर भाई साहब अभी आपके पास समय कम है 5:30 बजे 5 बजे का समय दिया हुआ था विवाद संस्कार भी दूसरे एक मीटिंग भी रखी थोड़ी इसके बाद में सारे डॉक्टर मऊ के वो आने वाले हैं यहां अच्छा अच्छा कुछ कार्यक्रम ऐसा है जो आपने की मैं ऐसा है कि मैं कोई बहुत विद्वान नहीं हूं लेकिन मैं इस संबंध में और अच्छा इसके बारे में आपसे मेरा निवेदन है कि अगर पूर्णानंद जी के पीछे के कुछ गुरु पा 10 मिनट अगर प्राप्त हो पाए तो आप थोड़ा सा कृपा करिए ठीक

⬜ Not used yet · 01:08:46:08 – 01:08:51:00 (0:05)

01:08:46:08 सभी को जय श्री राम ठीक है [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:08:54 · 16 Aug 2024

क्या आर्य समाज का ईश्वर बाधित है (प्रकाश आर्य अध्यक्ष - मध्य भारतीय आर्य प्रतिनिधि सभा) #aryasamaj

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