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00:00:06:16 हरि सनो मित्रा संप सन्नो भवय मा सन इंद्र बृहस्पति सन विष्णु क्रमा कल्याणा नाम निधानम कलि मल मथन पावनम पावना ना पाथे जम जन्म मुखो हो सपद पर पद प्राप्त
00:00:48:02 प्रस्त विश्राम स्थान में कम कविवर साम जीवनम सज्जना नाम बीजम धर्म दमस प्रभव भवता भूत राम नाम अ पारम तीवा जनक तनया पाद कमले प्रणम तो लंका मन यत सलील
00:01:24:12 मलिन कृते रामस प्रथित चरितम कमश हरम सदा हम तम वंदे पवन त नयम भक्त परमम शंभु महेश करुणामय सूल पांडे गौरी पते पशु पते पशु पास नासन काशी पते करुण या जग देत देक त्वम हंस पास विधास महेश्वर स देवे प्रपन्ना हरे प्रसिद्ध प्रसिद्ध मातर जगतो खिस प्रसिद्ध विश्वेश्वरी पाहि विश्वम श्वरी देवी चरा
00:02:27:01 चरस श्री शंकराचार्य नवतार विदव बरेम चय इंद्र मुख्यम कल युगे धर्म युग प्रवर्तक वंदे सदा श्री करपा त्रण गुरु शंकर शंकराचार्य केशवम बारायण सूत्र भाष्य कृत वंदे भगवत पुन पुन हरे नाम हरे नाम हरे नाम व केवलम कल नास्ते व नास्ते व नास्ते व गति रथा नारायणम नमस्कृत्य नरम चैव नरोत्तम देवी सरस्वती व्यास ततो जय मुद रे श्री सच्चिदानंद भगवान की नीलकंठेश्वर महादेव की
00:03:42:28 वीर बजरा बली की परांबा दुर्गांबा की श्री मदद जगत गुरु शंकराचार्य भगवान की सर्व भूत हद स धर्म सम्राट श्री स्वामी करपात्री जी महाराज की श्रीम जगत गुरु ऋग्वेदी पूर्वा नाय श्रीमद पुरी पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य भगवान की श्री स्वामी जी महाराज की सत्संग समाज की जय हो सत्य सनातन धर्म की श्री राम जय राम जय जय राम श्र
00:04:48:16 रामय श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय जराम जय श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जयम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम [संगीत] जय श्री कंठे शवर महादेव की सत्य सनातन धर्म की जनन की जय जय श्री सीता श्री राधे श्याम
00:06:04:02 नम पार्वती पते ह हरहा नम परमहंस स्वाद चरण कमल चि मकरंद दय भक्त जन मानस निवासा श्रीमत परम हंसाय श्री सच्चिदानंद परम धाम नमाम अनंता अनंत श्री समल कृत भगवान नीलकंठेश्वर महादेव परांबा भगवती त्रिपुर सुंदरी वीर बजरा देह धार श्री हनुमान जी महाराज आश्रम के अधिपति श्री स्वामी जी
00:06:58:01 महाराज का के सभा के संयोजक श्री पांडे जी हमारे आपके बीच में नवक आचार्य स्वजन उपनयन के अभ्यर्थी मातृ शक्ति एवं सज्जनों भगवत भ भगवान की अनंत असम अनुकंपा से
00:07:31:25 हम लोग सत्कर्म के लिए उपस्थित होते कई जन्मों का पुण्य इकट्ठा होता है तब हमारे आपके बीच में सत्संग की कड़ी प्राप्त [संगीत] होगी शास्त्रों में यही वचन है अनेक जन्मर्जन पूर्ण संचयन कई जन्मों के हमारे गोस्वामी जी भी कहते हैं अति हरि कृपा राम कर होई तो पाव दे यही मार्ग सोई भगवान की बड़ी कृपा होए तो हम लोग सत्संग के लिए सत्कर्म के लिए धर्मा धर्म के विचार के लिए उपस्थित हुआ कर
00:08:34:10 बड़े भाग्य और बड़े ही पुण्य से हम लोग इस विचार के लिए उपस्थित हुए हैं हमारा जीवन यद्यपि धर्म से ही चलता उठना बैठना चलना फिरना भोजन प्रसाद लेना विश्राम करना जन्म और मरण के सिद्धांतों से जुड़े
00:09:08:21 रहना इतना सारा कार्य धर्म से ही चलता धर्म का अभिप्राय है त्य यम धर्मा जो धारण किया जाए धरती धर्मा धार धर्मा हमारे जीवन में जो धारण करने की कला है जिसके द्वारा हम सब धारण करते हैं और जिस पद्धति पर चलते हैं उसे धर्म कह संस्कृत में धी धारण धातु से धर्म बनता है
00:09:59:13 जो निरंतर बना रहे उसी का नाम धर्म जिसकी सत्ता कभी समाप्त ना होए वही धन इसीलिए रामो विग्रहवां धर्मा साक्षात श्रीमन नारायण निरंतर बने रहते हैं निरंतर रहते ही भगवान के प्रकट होने का युवावस्था होने का उनकी वृद्धावस्था होने का उनके समापन का आज तक कोई समय आए नहीं भगवान जब से हैं अब तक हैं और तब तक रहे भगवान की भगवता निरंतर बनी र इसीलिए भगवान को सत्य कहा सत्य माने अस्थ सत जो ही है उसका नाम स जिसका अभाव ना होए वही स गोस्वामी
00:11:14:24 जी भी इसी बात को दोहराते हैं धर्मन दूसर सत्य समाना धर्म क्या है बोले सत्य दूसरा कोई शब्द ही नहीं धर्म के साथ जोड़ा जा सक तो कहा प्रमाण दीजिए तो गोस्वामी जी ने दो गवाही दार उपस्थित किया बोले आगम निगम पुराण
00:11:47:04 बखाना आगम शास्त्र कहते हैं तंत्र भी कहते निगम वेद भी कहते हैं और धीरे से उन्होंने कहा पुराण भी अनुगमन करते नहीं सत्या परो धर्मा मनुस्मृति क सत्य के समान कोई धर्म नहीं और सत्य का अभिप्राय है अथिति सत जो निरंतर बना रहे जिसका कभी अभाव ना हो वही धर्म हमारे जीवन की जितनी कड़ी है वह सब धर्म में ही भाषित होती उसका उद्भव उसका विकास उसका समापन धर्म में ही होता इसलिए धर्म हमारे जीवन की कड़ी है हमारे जीवन का साधन है हमारे जीवन का साध्य है और हमारे जीवन का फल भी धर्म ही है इसीलिए अमृति का वचन है शत स्मृति सदाचारा
00:13:03:19 कैसे माना जाए कि धर्म है कैसे कहा जाए कि धर्म है चलना फिरना उठना बैठना भोजन प्रसाद करना य धर्म है कैसे माना जाए तो कहा शति स्मृति सदाचारा वेद जो कहते वो धर्म अमृतिया जो कह रही है धर्म सदाचार जो कह रहा है व धर्म स्वस्य च प्रिय आत्मन अपनी आत्मा जो गवाही दे रही व धर अपनी आत्मा गवाही ना दे और वेद पुराण साक्षी ना बना तो धर्म के विपरीत अधर्म की महिमा कही गई जो धर्म के विपरीत आचरण हो वो अधर्म
00:13:59:27 धर्म तो सारे जीवन में व्यवहार में व्यत है पर उसी धर्म के विपरीत जितने आचरण है वेही अधर्म कहलाते इसलिए धर्मा धर्म का विवेक जीवन में आना चाहिए और यह धर्म आया कहां से तो कहा यह धर्म सनातन सनातन माने अत्यंत प्राचीन जिसकी प्राचीनता हम आप सब ना कह सके शास्त्र इतने कहकर छोड़ देते हैं अनादि है अनंत है अपरिमित है इसे समझने के लिए शास्त्रों में जाना पड़ेगा वेदों से पूछना पड़ेगा संत महात्माओं के अनुभव से समझना पड़ेगा आचार्य विद्वानों से जानना पड़ेगा धर्म किसे कहते धर्म हमारे जीवन में साथ साथ चल रहा है
00:15:15:16 जितने भी आचरण है वे सब धर्म ही है इसीलिए साथ कोई नहीं जाता धर्म जाता ना गो धन कहां तक साथ देता भूमि तक बैक बैलेंस आगे इसकी कोई गति नहीं पशु कहां तक सास देते हैं गौशाला तक धना नि भूम पवस गो नारी गृह द्वारी सखा मसाने स्त्री कहां तक साथ दे दरवाजे तक आगे नहीं जा और मित्र इष्ट बंधु स्मशान घाट तक जाते आगे नहीं जाने वाले तो धनानी भूम पवस गोषट नारी गृह द्वारी सखा स् मसाने केवल स्मशान घाट तक और शरीर जिसको बहुत खिलाया पिलाया हलवा रबड़ी मलाई
00:16:31:00 खूब बढ़िया बढ़िया इत्र तेल फुलेल से सजाया इसको प्लास्टिक सर्जरी भी करा लिया दुनिया भर का काम इसके साथ किया तो देह चिता याम परलोक याने देह कहां तक साथ देती चता त परलोक जाने पर ये सब छूट जाते हैं धर्मानगर का केवल धर्म साथ अब धर्म का जो प्रकारा स्वरूप है पहली बात तो यह हम लोगों को समझ में आनी चाहिए हमारे जीवन में जितनी धारणाएं हैं जितनी धारक वस्तुएं हैं जितना हम धारण कर सकते हैं जितना श ने अनुमोदन किया है वेद पुराण स्मृतियों ने तंत्र ग्रंथों ने जिन बातों को हमने जीवन हमारे जीवन में धारण करने को बताया है वे सब धर्म
00:17:46:19 कहलाते अब इसके विपरीत आचरण को अधर्म कह इतनी बात तो समझनी चाहिए अब धर्म के प्रकारा भेद बहुत छोटे छोटे भद प्रत्येक जीवों के अलग-अलग धर्म होते पशु का अलग धर्म मनुष्य का अलग धर्म शरीर सिर्फ सर्पा आदिक के जो भूमि में चिपट करके चलते हैं उनका अलग धर्म जल में रहने वाले प्राणियों का अलग र् पक्षियों के आकाश में का अलग धर्म य विविध प्रकार के वृक्षों के कांटेदार वृक्षों के अलग धर्म और सरलतम पुष्प देने वाले वृक्षों के अलग धर्म बाटिका के अलग धर्म पृथ्वी में भी पहाड़ी पठारी मैदानी भागों के अलग धर्म नदियों के अलग धर्म पर्वतों के अलग धर्म सारे जीवों के अलग-अलग धर्म
00:19:02:04 देख पड़ते माताओं के अलग धर्म पुरुषों के अलग धर्म बच्चों के अलग धर्म भारतवर्ष यों के अलग धर्म अन्य प्रदेशों के रहने वालों के अलग धर्म प्रदेशों के अलग-अलग रहने वालों के अलग धर्म जनपदों में रहने वाले नगर ग्राम में रहने वाले पुई पुर में रहने वाले अलग धर्म बढ़ते चले जाते यह छोटे छोटे धर्म हमारे आपके जीवन में बढ़ जा फिर मनुष्यों में भी वर्णाश्रम उचित अलग धर्म और णा णा शम उचित रहित अलग धर्म फिर वर्णों में ब्राह्मण क्षत्रिय ै शूद्रों के अलग धर्म फिर मात्र शक्तियों के अलग धर्म फिर वर्णाश्रम में वर्णों के अलग धर्म और आश्रमों के अलग इस प्रकार से धर्म व्यवहार में बढ़ता चला जाता और उस व्यवहार के
00:20:17:08 धर्मों को जीवन में उतारना बहुत आवश्यक यदि नहीं उतार पाए तो मनुष्य के जीवन मनुष्य की शरीर भगवान की अतु की कृपा से मिली यह मनुष्य की शरीर जो हम आप सबको प्राप्त है यह परमात्मा की आतु की कृपा से मिली अनंता अनंत योनियों में भ्रमण करते हुए इस जीव को परमात्मा अचानक मनुष्य की शरीर देते अचानक देते क्यों अन्य जो नियों में इसने कौन सा एकादशी का व्रत किया प्रदोष का व्रत किया त्रयोदसी मनाया महाशिवरात्रि में जागरण किया अभिषेक किया कौन सा कर्म किया मेक के शरीर पशु की शरीर में कौन सा आचरण इसके पास कोई पुण्य की राशि नहीं है तो परमात्मा स्वयं सप्लीमेंट्री चांस इसको ग्रेस मार्ग दे कर के अपने पुण्य से इस जीव को पुण्य प्रदान कर दे ये उनकी
00:21:32:13 कृपा यदि कृपा ना करें तो इस जीव को मनुष्य की शरीर ना मिले तो परमात्मा देखते हैं कि जीव अनंत जो नियों में भ्रमण कर रहा है आक चार लाख चौरासी जोनी भ्रम त याहा जीव अविनाशी पोर्टफोलियो इसके पास तो अविनाशी का लेकिन भ्रमण करता है बोला इसका उद्धार कैसे हो तो कबहु की कररी करुणा नर देही और देत बिन हेतु सनेही करुणा कर परमात्मा इस जीव को कभी आकस्मिक मनुष्य की शरीर देते हैं क्यों देते हैं मनुष्य की शरीर से मुक्ति का साधन सुलभ हो जाता है अन्य जीवों को भी मुक्ति का साधन है पर आवश्यक नहीं कि उस शरीर से मुक्ति पा जाए पर मनुष्य की शरीर से मुक्ति पाना आवश्यक
00:22:47:26 अवश्य भावी निश्चित है मनुष्य की शरीर मिल जाने से हम आपको जो यह परमा की आ की कृपा मिली है मनुष्य की शरीर की प्राप्ति हुई है इस शरीर से हम इस संसार से पार हो सकते पार होना आवश्यक क्यों है इसलिए आवश्यक है कि तीन प्रकार के दुख है यहां पर दहिक दुख देह जन दैविक दुख देव जन्य देवताओं ने
00:23:30:04 आकस्मिक ऐसे उपद्रव को प्रकट कर देते हैं ऐसी वर्षा हो जाती है ओले पाले पड़ जाते हैं गर्मी अधिक पड़ जाती है शीत अधिक पड़ जाती है हम लोग त्रा त्र कर इससे कैसे बचे य दव योग से प्राप्त हो भौतिक जगत से तो भौतिक पदार्थों के ना मिलने से दुख मिलता और दैविक दुख तो देवताओं की कृपा से मिलता [संगीत]
00:24:01:25 और दैहिक जो शारीरिक दुख है वो हमारे आपके असज के कारण मिल जाता भोजन के अधिकता हो जाने पर असज के कारण दहिक दुख मिलता यात्रा अधिक कर लिया जागरण अधिक कर लिया भोजन अधिक कर लिया सब में धर्म काम करता है भोजन करना धर्म अ अधिक कर लेना अधर्म हा ज्यादा कर लेना अधिक पावर हो गया भोजन का कंठ तक हो गया तो अध ना करना अधर्म और ज्यादा कर लेना अधम और संजम पूर्वक भोजन करना ध छोटी छोटी बात में धर्म प्रवेश किया आप नहीं कह सकते कहां धर्म नहीं जहां धर्म नहीं वही अधर्म उसी के भाई है अधर्म वही बैठ जाते हैं तो कहने का अभिप्राय मनुष्य की शरीर बड़ी कीमती है गोस्वामी जी तो कहते हैं क्षण भंगुर भागवत जी भी कहते हैं अत्यंत दुर्लभ दे हो य देह अत्यंत दुर्लभ है
00:25:17:24 अत्यंत द जल्दी नहीं मिलने वाला और देही नाम क्षण भंगुर और क्ण भंगुर मिल तो गया बड़ी कृपा लेकिन टिकाऊ नहीं यह शरीर टिकाऊ नहीं हो सकता है रात में दर्द हो जाए सर में हो सकता है दिन में पीड़ हो जाए बुखार आ जाए हो सकता है मानसिक दुख आ जाए हो सकता है वैचारिक दुख आ जाए वैचारिक दुख जानते हैं किसी ने गाली दे दिया तो वैचारिक दुख आया वो भी आ जा मानसिक दुख आ जा स्वपन व आ जा स्वयंभू दुख आ जाता इसीलिए सांख के आचार्य कहते हैं दुखत विता तीन दुख बड़े वीर है यह सबको आते रहते हैं तो कहा जाएंगे कैसे तो कहा इनके जाने के लिए उपाय करना पड़ तो कत्र विता जिज्ञासा पहले जिज्ञासा पैदा होनी चाहिए य दुख जो आया है इसके प्रति हमारे मन में जसा आवे अघात के हेत इनका अपघात
00:26:33:08 कैसे इनका बंटाधार कैसे हो इस प्रकार की हमारे मन में चीख आनी चाहिए विचार आना चाहिए मनुष्य की शरीर मिल गया मनुष्य के शरीर का अंतिम लक्ष्य क्या अंतिम लक्ष्य मनुष्य की शरीर का क्या शास्त्रम मतवा मन माने धातु से मनुष्य बनता है शास्त्रम मतवा करोति मनुष्य जो शास्त्र की बात मान कर के आचरण कराए वही मनुष्य कहलाते तो मनुष्य का शरीर तो मिल गया अब मनुष्य की शरीर का उपयोग करना उपयोग करने के लिए हमारे सामने धर्म है बालक का धर्म शैशवावस्था का धर्म गर्भावस्था का धर्म गर्भावस्था का धर्म क्या है गर्भावस्था में जीव गर्भ गुहा में गर्भाशय में नीचे सिर करके ऊपर पैर करके दोनों हाथ से कान पकड़ कर के सस स्तुति करता भगवान पैदा हो जाने के बाद निकल आने के बाद आपके
00:27:49:24 नाम का जप करूंगा 10 अपराध का त्याग करूंगा 10 धर्म के लक्षण है उनको पकड़ लूंगा 10 अवतार भगवान के हैं उन अवतारों का ध्यान करूंगा और इस संसार सागर से पार हो जाऊ लेकिन निकलने के बाद वो कहता है कहां कहां कहां यहां कहां उसको जो कर में भगवान दिख पड़ रहे थे वो तो दिखाई नहीं पड़ते वो तो संसार दिख पड़ता तो 10 इसके मेहमान आ जाते इसको पकड़ने के लिए जीव को माता अलग पिता अलग भाई अलग बहन अलग ताऊ अलग पत्नी अलग आ जाएगी संबंधी अलग आ जाएंगे द द रिश्तेदार उसके सामने आ जाते वो कहते हमारा है माता कहती हमारा पुत्र है पिता कहते हमारा पुत्र है बहन कहती हमारा भाई है भाई कता हमारा भाई है बुआ कहती हमारा भतीजा कई रिश्तेदार आ जा पत्नी कहती हमारा पति इतने पोर्टफोलियो लग जाते हैं इसके साथ ये बच के निकल नहीं सकते इतने
00:29:05:02 कांटे लग जाते हैं चा कहा सब इसको मना लेते हैं नौकर कहते हमारे स्वामी मालिक है सब चारों तरफ से घेर लेते हैं गुरु जी कहते हमारे शिष्य इतने संबंधी आ जाते हैं एक जीव के पीछे द द संबंधियों का निर्वाह करना इतना कठिन हो जाता तब इसीलिए धर्म की आवश्यकता है हम धर्म का प्रयोग करें माता के साथ अलग धर्म पिता के साथ अलग धर्म भाइयों के साथ बहनों के साथ अलग धर्म बुआ इत्यादि कों के साथ अलग धर्म पत्नी के साथ अलग धर्म ससुराल वालों के साथ अलग धर्म बहनोई के साथ अलग धर्म गुरुदेव के साथ अलग धर्म संबंधियों के साथ अलग धर्म पड़ोसियों के साथ अलग धर्म छोटे छोटे धर्म आ जा कितने धर्म का पालन करें इसीलिए हमारे जीवन में अमृति का प्रयोग किया गया शति स्मृति सदाचारा वेद जो कह रहे हैं उनके अनुपालन के लिए स्मृतियां 20 स्मृतियां हमारे जीवन
00:30:20:04 में वेद हमारे जीवन में चार ऋजु साम अथर्व चारों वेदों में एक लाख मंत्र है 8 हज कर्मकांड के मंत्र है 16000 उपासना के मंत्र है 4000 ज्ञान अब ये सब मंत्र हमको सिखाते हैं सामवेद भक्ति सिखाता है अथर्ववेद ज्ञान सिखाता है ऋग्वेद उपासना सिखाता है यजुर्वेद कर्मकांड सिखा यह सब वेद हमको हमारे जीवन में चार प्रकार के धर्म सिखाते ये चारों धर्म सत्य सौज तब और दान ये धर्म के चार पैर य स्मृतियां सिखाते जो स्मृतियां है वेदानु प्राणित वेदानु वेदानु गन वेद के अनुसार चलने की प्रक्रिया सिखाने का काम स्मृतियां करती स्मृत्य
00:31:35:20 भव अमृत जो अमरण में बात बनी रह जाए उसी को स्मृति कह तो महर्षि हों ने वेद की बात को समझने के लिए समझाने के लिए अ स्मृतियों का निबंधन किए उसमें मनुस्मृति सर्व प्रथम और कलयुग में कल पारा सरस पारा सरस मृति कलयुग में परा सर मृति का बड़ा महत्व है स्मृतियों का पठन पाठन जब तक नहीं होगा तब तक धर्मा धर्म का ज्ञान नहीं क्योंकि स्मृतियां वेदांग से प्रकट हुई वेद के छांग है ना शिक्षा वेद के मस्तिष्क को शिक्षा क वेद के मुख को व्याकरण मुखम व्याकरण वेद के नेत्र को ज्योतिष कह कब चलना कब उठना कब सूर्योदय हुआ कितना समय हो गया आज कौन सा दिन है कौन सा मुहूर्त है सूर्य चंद्र मादिक ग्रह
00:32:51:04 किन किन राशियों पर चल रहे हैं किन किन राशियों से कौन कौन सा फल होगा यह सब बताने का काम ज्योतिष कर अगर ज्योतिष ना होए तो पता नहीं चलेगा कौन दिन रात्रि कब आई दिन कब आया टाइम का पता समय का पता ना चले इसलिए वेद के नेत्र है ज्योतिष और वेद के पैर है छंद किस प्रकार से मंत्र पढ़ा जाए यह छंद बतलाते और वेद के हाथ को कहते हैं कल्प यही कल्प स्मृतियों को प्रकट कर यही कल्प ग्रंथ कर्मकांड को प्रकट कर यही कल्प ग्रंथ आपस तम बड़े बड़े आचार्य भूषण अनेक ग्रंथों को प्रकट कर और वेद के पेट का नाम है निरुक्त व पर्यायवाची शब्दों को दे तो शिक्षा कल्प नि निरुक्त ज्योतिष छंद वकरम गति ये छ जो व्याकरण छ जो व्याकरण आद वेदांग है इनका
00:34:06:20 जब तक समुचित अध्ययन नहीं होगा भला वेद कैसे समझ में आएगा और जब तक वेद नहीं समझ में आएगा तोतिया कैसे सम और जब तक अमृतिया हमारी सहायता नहीं करेंगी तो पुराणों में त्मक भाव प्रदर्शित किए गए पुराणों में बहुत से ऐसे विरोधाभास मिलेंगे जहां हम आपको सावधानी की आवश्यकता पुराणों में वचन अलग अलग मिलेंगे उन वचनों को सामंजस्य बैठाने के लिए स्मृतियों में जाना पड़ता इसलिए पुराण की बात को समझने के लिए स्मृतियों में जाना आवश्यक हैम ही कल्प ग्रंथों से प्रकट हुई और पुराण की बात को विषद रूप में समझने के लिए इतिहास ग्रंथों में जाना पड़े रामायण महाभारत तो जब तक हम ग्रंथों की सहायता नहीं लेंगे गुरुओं की सहायता नहीं लेंगे तब तक गोविंद तक नहीं पहुंचा जा
00:35:21:21 सकता इसलिए सारांश में कहा जाए तो हमारे साक्षात भगवान है वेद है स्मृतियां है पुराण है वेदांग है शिक्षा कल्प निरुक्त ज्योतिष छंद व्याकरण है यह सब धर्म के द्वारा ही पहचाने जाते क्योंकि शिक्षा का विज्ञान धर्म से प्राप्त होगा धर्मा धर्म का विवेक धर्म ही से होगा इसलिए धर्मा धर्म के विवेक के लिए अत्याधिक ग्रंथों में जाने के लिए हमें आपको भरपूर धर्म समझना पड़ेगा क्या हमारा धर्म श्वेत छत्र नाम के एक राजा हुए व बड़े प्रतापी हुए अयोध्या के राजा स्वेत नाम वे पुण्य कमाते थे धर्मा चरण करते थे धर्म में बड़ी निष्ठा थी धर्म की बदौलत धर्म के आदेश से यज्ञ
00:36:42:22 जागादु कम रह जाता था तो फिर मृत्यु लोक में आते और फिर राजा बनते थे क्योंकि स्वर्ग में धर्म कमा करके स्वर्ग जा की विधि है और धर्म कमा करके बैकुंठ जाने की विधि है और धर्म कमा करके इस लोक में भी सुख की अनुभूति करने की विधि है तो महाराज स्वेत धर्म का आचरण करते रति भर धर्म से डिग नहीं हम लोग तो काम चलाऊ धर्म का प्रयोग कर क्योंकि धर्म मुख्य धर्म जब नहीं हो पाता तो हम लोग कह देते भाई आपद धर्म का पालन कर आपत्कालीन धर्म आपद धर्म भी धर्म कहलाता काम चलाऊ धर्म का उपयोग कर लेते व्यावहारिक धर्म का उपयोग कर लेते पर जो मूल धर्म है वो भगवत प्राप्ति के लिए ही उपयोग में लिया
00:37:58:06 जाता पर धर्म तो यज्ञ जागादु वेद भाष्य भूमिका में कहते हैं ज्योतिष माद स्वर्ग कामो यजे ज्योतिष माद ञ करिए स्वर्ग जाने की स्वर्ग तक पहुंचा कर के छुट्टी ले लेते वे धर्म आगे नहीं ले जा स्वे छत्र ने धर्म का पालन किया जग जागा आदि का पालन किया और स्वर्ग गए स्वर्ग में जब पुण्य कमाने की सीमा कम हो जाती स्वर्ग में जो सुख भोगने का एक सम सीमा है स्वर्ग भोगने की एक विधा है उतने तक तो आप स्वर्ग में रह सकते अब जब कम हो जाता है वोल्टेज कम हुआ जब तो नीचे आ जाते ी पुण मृत लोके विषद जब पुण क्षीण हुआ तो मृत लोक में आ जाना तो फिर कैसे पता चलेगा कि पुण ीन वाले लोग आए तो कहा अच्छे परिवार
00:39:13:13 मिल जाए अच्छी पत्नी मिल जाए आज्ञाकारी पुत्र मिल जाए पड़ोसी ईमानदार दीनदार मिल जाए परिवार समझौता वादी मिल जाए तब जान लेना चाहिए स्वर्गम गता ये तो स्वर्ग से आए किसी पैथोलॉजिकल डॉक्टर से जांच कराने की बढ़िया सामान सब मिल जाए बढ़िया परिवार मिल जाए और नरक से आए हुए प्राणी उनका भी लक्षण है उ ग्राम बासा कुल हीन सेवा को भोजन क्रोध मुखी च भारिया पुत्र च मूर्ख पथवा च कन्या येय छ चीज मिल जाए तो मान लेना चाहिए नरक से आए कहां से आए हैं उसका पता चल जाता है गड़बड़ गांव में पास हो जाए चारों ओर से गड़बड़ लोग हो बीच में पांडे जी हो कैसे गुजारा हो तो कहा ग्राम बास हो जा कुल हीन की सेवा करनी पड़े ये सब है तो कहने का अभिप्राय लिखा है कि पकारा पंच दुर्लभ पांच पकार जिसको मिल
00:40:28:18 जाए उसका स्वर्ग यही है माने स्वर्ग से आया हुआ पत्नी मनो हारिणी मिल जाए नहीं तो कहीं से आइए पहले वोह डाट डपट करने लगे सामान पत्नी मनोहर मिल जाए पुत्र आज्ञाकारी मिल जाए पड़ोसी ईमानदार दिनदार नहीं गाड़ी खड़ी किया सामान है उसका निकाल ऐसा नहीं ईमानदार दीनदार पड़ोसी मिल जाए और परिवार समझौता वादी मिल जाए और पिता प्रतिष्ठित यह पांचों किसी के पास है जिसके पास पांचों हो जाए वह सीधे स्वर्ग से आया स्वर्गत या मु स्वे छत्र को सब मिलता पर सुख भोगते भोगते उ गए तो उन्होंने [संगीत] किया तो बड़े बड़े ऋषि इंद्र मुनेंद्र कब्र अमला अपमा विमला मा देवता आत्मा सब आए उनके पंचायत इसलिए आपने पंचायत बुलाई तो हाथ जोड़कर खड़े हो गए उन्होंने कहा
00:41:44:02 सरकार मुझे स्वर्ग नहीं चाहि सुख नहीं चाहि अच्छा क्या बात काहा सुख भोगते भोगते थक गया यहां आता हूं राजा महाराजा बन जा जाता हूं वहां जाता हूं दिव्य स्वर्ग स्वर्ग गए है कि नहीं स्वर्ग में सब पूरा एयर कंडीशनल है स वहां गस सिलेंडर ंडर नहीं भराना वहां बैठ करके केवल हलवा रबड़ी मलाई गुलाब जाम जो भी कहना चाहिए आप नाम लीजिए सामान आपके सामने व भंडारे के लिए जरूरत नहीं सबको मुहैया होता र कल्प वृक्ष है कामधेनु गैया है सब मनोविज्ञान वहां काम कर वहां शरीर वि ज्ञान की आवश्यकता जो सामग्री आप स्मरण करेंगे स्वर्ग में सब मि सारी सुख सु तो श छत्र ने कहा वहां का सुख और यहां का सुख दोनों हमको बर्दाश्त नहीं है मारियों ने कहा अपराध करो चार सीट लगेगी जेल जाना पड़ेगा और फिर नरक जाना वहां
00:42:59:09 क्या मिलेगा कहा वहा तो खोलते हुए कड़ा है के तेल में डाल दिया जाए कहा ये सब तो नहीं चाहिए हमको नरक नहीं चाहिए सुख भी नहीं चाहिए दुख भी नहीं चाहिए तब क्या चाहेंगे तो कहा जहां कभी सुख दुख की पहुंच ना हो तो कहा तो बैकुंठ बगता कु मा बैकुंठा जहां किसी प्रकार की कुंठ ना हो बैकुंठ गए कि नहीं नहीं वहा रात दिन होते नहीं बैकुंठ बैकुंठ में ना जाड़ा ना गर्मी ना रात ना दिन ना सुख ना दुख ना जन्म ना मरण बढ़ती का कोई सवाल नहीं य कोई मृत्यु नहीं है बैकुंठ बैकुंठ की जलवायु हा न तत्र छु पा न जरा बाध वहां पर बती बती का बाध बाध नहीं है न मृत्यु न जन्म मृत्यु वहा जन्म है ना मरण है ना भूख है ना प्यास है ना रात है
00:44:14:12 ना दिन है ना उठना है ना जागना सोना है ही नहीं सर्वे आनंद मगना सर्वे कीर्तन कारि कुंठ की जलवायु में सब आनंद में रहते हैं और सब कीर्तन करते वहां दूसरा शब्द कोई उच्चारित होता ही नहीं हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम मरी शरणम हरी रणम मरी शरणम हरीम मरी शरणम हरि शरणम मरी शरणम मरी शरणम मरी शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम मरी शरणम हरी शरणम मरी शरणम शरणम मरी शरणम
00:45:29:19 बैकुंठ बिहारी भगवान की जय वहां किसी प्रकार की कोई कुंठा नहीं है बैकुंठ लो मयों ने कहा बैकुंठ जाओ कहा बैकुंठ के लिए क्या करना पड़े कहा मरते समय भगवान का नाम निकल ये समस्या है भगवान का नाम जीवन भर लेते हैं बड़े-बड़े जोगेंद्र मुनि और मरते समय संसार की याद आने लगी कोटि जन्म मुनि जतन कराही बोले अंतराम कहि आवत नाही कोई आवश्यक नहीं कि अंत में भगवान का नाम निकल [संगीत] पड़े भगवान का नाम मरते समय निकल पड़े तो बैकुंठ का पास परमिट बन जाए कोई झट झट नहीं वहा सीधे जाइए है ना कोई आधार कार्ड की वहा सीधे बैकुंठ पर भगवान का नाम निकलता नहीं मरते समय मरते समय भगवान का नाम नहीं निकलता अभ्यास
00:46:45:01 नहीं रहता इसलिए निकलता इसीलिए पहले से अभ्यास कराया जाता एक बाबा से बच्चों ने कहा मरण धर्मा है मृत्यु करीब आ गई तो बोले भगवान का नाम तो ले लेंगे बाबा से कहा बाबा बोलो राम तो बाबा बेचारे अभ्यास किए नहीं थे और दांत भी नहीं था बाबा ने कहा आम और कह के प्राण निकल गए भगवान का नाम निकलना बड़ा कठिन अभ्यास नहीं है पहले का
00:47:27:09 अन अभ्यास से कैसे काम कर बो अभ्यास तो कर लो करो अभ्यास बोले ना निकला तब हमारी जिम्मेदारी नहीं अब जब नाम निकल पड़े तभी तो बैकुंठ जाना हो उस राजा ने अभ्यास किया काम नहीं बना क्योंकि मरते समय उसको स्वर्ग का सुख याद आ अंते याम गति जा मति जैसे बुद्धि होगी वैसे चला जाएगा स्वर्ग में प्रमोट कर गया स्वर्ग चला गया बैकुंठ जाना तो दुर्लभ था भगवान का नाम निकला नहीं तो फ्लैट वगैरा सब एयर कंडीशन सारी सुख सुविधा वस्त्र आदि जितना पुण्य था उस पुण्य के आधार पर पुण्य की सीमा पर सुविधाएं सब मिली भोजन नहीं मिला भोजन तक पूर्ण नहीं था नारद जी बड़े वाले मार्ग से जा रहे थे महामार्ग से सिविल लाइन वाले मार्ग बड़ा मार्ग उसी मार्ग से जा रहे थे स्वेत ने कहा अरे यह तो नारद ऋषि है मषि है इनको दौड़ के प्रणाम कर लू प्रणाम किया बाबा ने पूछा कब आए
00:48:42:10 कहा तीन दिन हुआ सब ठीक है कहा ठीक तो सब लेकिन भोजन नहीं मि सुविधा सब मिली है भोजन ता अच्छा तुम्हारे पुण्य की सीमा इत नहीं थी भोजन नहीं भोजन कैसे मिलेगा नीचे लौटो यह तुम्हें दिव्य वस्त्र मिले हैं यह वस्त्र उतार देने के बाद नए हो जाते धुलने की जरूरत नहीं प्रेस करने की आवश्यकता स्वर्ग के कपड़े मिले हैं क्या कभी सुर का कपड़ा मिल जाए तो हम लोगों को कोई जरूरत नहीं दूसरा कप क्योंकि पहनी उतार दीजिए फिर नया हो फिर पहनी स् की विचित्र स्थि तो बोले तो के वस्त्र है और ले जाओ इसको अयोध्या में इस समय अगस्त ऋषि आए हैं सरजु के तट पर स्नान कर रहे हैं और जैसे निकले यही वस्त्र दान कर देना क ताने के बाद न हो जा आए अगस्त ऋषि ने देखा य तो वही राजा है यह तो मृत प्रई हुआ था बात क्या हो गई हाथ जोड़ के खड़े रहे बाहर निकले बाबा वस्त्र दान कर दिया बाबा नेहा मैं क्या करूं य स्वर्गी वस्त्र
00:49:57:20 नहीं पहनता मैं तो वृक्षों की छाल पहनता हूं महाराज इस वस्त्र को ले लीजिए नारद जी ने कहा था अगर नहीं लेंगे तो उनसे कह देना बावी पीढ़ी में भगवान श्री राम भद्र के रूप में अवतार लेंगे और यही वस्त्र उनको राज गद्दी पर जब बैठेंगे पहना दिया जाएगा आपके द्वारा तो 11000 वर्ष शासन करेंगे ये वस्त्र बड़े कीमती है अगर ऋषि को देना ले लेंगे तो महाराज आपको मैं दे रहा हूं ले लिया और फिर स् छत्र आकाश को चले गए स्वर्ग में गए तो भोजन मिला तो पुण्य धर्म के द्वारा जो पुण्य है क्योंकि धर्म के चार पाद है सत्य सच दया और तप सत्य बोलना धर्म सत्य स पवित्रता से रहना धर्म तब नियम से हर कार्य को करना तब सत्य सच तब उ दान दान देना ध कलयुग में प्राय सब कमजोर हो गए हम लोग एक झूठे
00:51:12:25 को सत्य करने के लिए पस झूठ बोल जाते क्योंकि झूठ को सत्य करना और गवाही दार कहां से आएंगे अब झूठ ही झूठ को सत्य कर के लिए झूठ ही गवाही मिलेगी सत्य गवाही तो मिलेगी नहीं एक सत्य को झूठ को एक झूठ को सत्य बनाने के लिए कई झूठ बोलना नंबर दो पर सच माना जाए तो पवित्रता बहुत दूर चली गई हम लोग कितनी पवित्रता रख पाते सरकार ने भी और समाज ने भी दोनों ने हाथ धो कर के पवित्रता को ताक पर रख दिया पवित्रता बहुत कमजोर हो गई सत्य सच तप और तप नियम से उठना नियम से भोजन करना नियम से स्वाध्याय करना नियम से नौकरी चाकरी करना नियम से संतान उत्पादन करना नियम पूर्वक रहना कठिन हो नियम भी क और दन दान
00:52:28:01 तो आप लोग जानते ही दान पहली बात तो तमय दानम दते अनुप काने देश काले च पात्रे त दानम सात्विक स्मत बहुत कठिन देश काल परिस्थिति देख कर के देना ही धर्म है दबाव पूर्वक नहीं दबाव पूर्वक दे दिया तीन प्रकार के दान होते हैं दान प्रतिदान अनुदान तो एक दान तो होता है देने चाहिए सात्विक धर्म पात्र देकर सात्विक दान किया जा दूसरा ये तो सव गुण दान हुआ रजोगुण दान इन्हीं को दान करेंगे ताकि यह हमारे काम आते रहे ऐसा समझ करके दान किया य रजो गुणी दान हो और दान दे दिया अब दरवाजे पर मत आना य तमोगुण दान हो गयान हो गया तो दान भी विचित्र है प्रतिदान हमारी कन्या के विवाह में उन्होंने लिफाफा में क्या दिया है रजिस्टर देखकर उनकी कन्या में
00:53:43:04 वही दान देना य कौन सा दान प्रतिदान और कमेटी में हमारा नाम हमको पद लिखा दीजिए और शिलालेख पर नाम डाल दीजिए अनु दान तो ये दान विशेष फल नहीं देते यही तक का फल देते केवल लौकिक फल दे तमोगुण दान तमोगुण फल देता है और रजोगुण दान पंडित जी गाय ले जाइए बछिया ब्याज आगी तो हमको वापस कर भी दान तो कहते यह दान है रजोगुण दान इससे इस दान का यही तक फल अ सत गुण दान भगवत प्राप्ति में सहायता कर इसी प्रकार सत्य बोलना भगवत प्राप्ति के लिए जो नित्य सत्य बोलता है उसके वचन में सत्य भगवान का वास होता है किसी को कुछ कह दिया अवश्य में फल दे जा पवित्रता से रहना आजकल पवित्रता बहुत कमजोर
00:54:58:14 है देहातों में तो लोग मैदान गए लोटा ले आए हाथ नहीं मट आते लोटे मटिया लोटा ने कौन गलती की क्या अपराध किया बचारे और तो जल आपको दिया ना हाथ धोए शहर में एक ही डब्बे से सब लोग आप दस्त लेते हैं वो डब्बा कहां मटिया जाता है कहां पवित्र शौचालय में व डब्बा पवित्र उसी डब्बे को सब लोग अपवित्र हाथ से छ भला का मिट्टी का प्रयोग नहीं करते मुल्तानी मिट्टी मिट्टी का प्रयोग कहां करते हैं साबुन का प्रयोग करते सर्प का प्रयोग कर भला पवित्रता कहां रह गई स्नान कक्ष में कहां पवित्रता रह गई भोजनालय में कहां पवित्रता र न को भी वैसे ही धोते हैं और बर्तन भी अलग अलग ढंग के आ गए धातु के बर्तन कहां अब तो धातु के बर्तन है नहीं तो बहुत सी बात कितनी कही जाए तो घर में भी हम लोग पवित्रता
00:56:13:28 का पालन नहीं कर पा रहे शुद्धता का पवित्र नहीं कर पा बैदेशिक नीति के आधार पर कुछ महानुभाव ने छुआछूत का नाम दिया हमारे य छुआ छूट शब्द नहीं है स्पर्शा स्पर्श हमारे धर्म सम्राट श्री स्वामी कपाती जी महाराज गुरुदेव कहा करते थे नाक छू कर के भोजन की सामग्री नहीं छुए कान में अंगुली डाल कर के कोई जलपान की सामग्री नहीं छ हमारे छुआ छु शब्द नहीं है हमारे यहां स्पर्शा स्पर्श सौ जाने के बाद भोजन का में नहीं जाया बहुत सी बातें तो पवित्रता में भगवान वास करते क्योंकि भगवान का नाम है पवित्रता पवित्रता पवित्र में भी भगवान अवित्र पवित्रो सर्वा वस्था पवित्र हो चाहे पवित्र हो किसी भी स्थिति में हो जिसने भगवान का नाम लिया जाम पुंडरीका क्म सवाया भतरा बाहर भीतर सर्वत्र पवित्र
00:57:29:00 हो इसलिए पवित्रा नाम पवित्रम पवित्रतम है भगवान का नाम तो भगवान के नाम को लेने के लिए पवित्र होने की आवश्यकता है और पवित्र होना स्नान संजम के द्वारा मन की पवित्रता संतोष से हो जाता संतोष कर ने से मन पवित्र हो जा मन समा च जैसे शरीर की पवित्रता स्नान से हो जा धन की पवित्रता दान से हो जाती बुद्ध की पवित्रता सद विचार से होती ऐसे ही मन की पवित्रता भगवान का नाम लेने से होगा इसलिए मन पूतम समाच तो धर्मा धर्म का विज्ञान अनंत काल से कब से धर्म आजा यह नहीं कहा जा सकता कब से भगवान आए यह नहीं कहा जा सकता यही कहा जा सकता है जब से भगवान आए तो जब से भगवान आए तो जब से धर्म आया
00:58:44:28 क्योंकि भगवान साक्षात सनातन है और उनका निर्देश उनका आचरण वही धर्म भगवत धर्म पर वह धर्म सृष्टि की दृष्टि से उन्होंने अलग-अलग व्यवहार में परिणित कर दिया इसलिए हम आप सबको अपने धर्म का आचरण करना चाहिए जन्म से सब महाराजी कहते थे जन्म से सब हिंदू होते काट पीट करके मुसलमान बन हिंदी तो सब जन्म से होते अब जब उनको क हा काट पट करके बनाया जाता है तो काट पट करके बनाए जाते और जन्म से सब हिंदू सनातनी सब होते हैं उनमें जब काट पीट कर देते हैं उससे मुसलमान बनते हैं अनुलोम विलोम करके ईसाई बन अनुलोम विलोम करके ईसाई बनते हैं तो यह सब जितने भी बनने वाले हैं बनावटी कहते हैं सनातन धर्मी बन के आते
01:00:00:03 और शेष लोग बनाए जाते उनमें मिलावट डाली जाती है सनातन धर्मी बने बनाए बन और शेष लोगों को बनाया जाता उनको कुछ ना कुछ अदल बदल करके शंकर दोष से जो बनाए जाते उनको कलमी कहते कलमी नहीं जा करके बना इसकी डाल उसकी डाल उसम मिला दिया दूसरे वृक्ष तैयार कर दिया आम को कटल के रस से मिला करके तैयार कर दिया उसका नाम कलमी आम तो कलमी आम धर्म है कि देसी आम धर्म तो कहते हैं देसी धर्म है और कलमी
01:00:48:24 बनावटी जो बनावटी है व मत है मजहब उसको मत तो जितने भी हमारे वैचारिक क्रांति लेने वाले देने वाले महानुभाव आए वे कलम करके काम किए इसलिए उनके विचार कलमी कहे कलम कलम करके बनाए तो कलमी आम खाने से शुद्धि रहती है कि क देसी आम तो कहते देसी आम खाने से शुद्धि मिलती है और कलमी आम खाने से बदहजमी हो कलमी आम खा लीज चार देसी आम बा देसी आम से नहीं होगी और कलमी आम से इसलिए कलम करके जितने बनाए गए मत मजहब है वे धर्म नहीं है वे मत विचार जैसे आपने बताया स्वामी दयानंद जी महाराज का जो कानून कायदा है वो आर्य मत उनका एक विचार व धर्म नहीं है वो
01:02:04:18 एक सोसाइटी बनाई उन्होने आ समाज इसी तरीके से ईसाई मत अब यस्ती मत फिलिस्तीन मत तुर्की मत इस्लाम मत जैन मत बौद्ध मत चार बाग मत और सनातन धर्म इसलिए सनातन धर्म ही धर्म अब उस धर्म के आचरण के लिए बहुत सी सभाएं बहुत से संघ बहुत से विचारक बहुत से मिशन तमाम बने हैं इसी कड़ी में हमारे पांडे जी ने भी एक मिशन बनाया एक धर्म बनाया शंकराचार्य का सनातन धर्म है उसी का अनुगमन धर्म सम्राट महाराज शी ने गुरुदेव ने उसको प ने का विचार किया और फल पाया और लोगों की समझ में बात आई थोड़े ही सही लोगों ने समझा महाराज जी कहते थे एक मुट्ठी धान पर्याप्त है और एक बोरा पट पर किसी काम का तो थोड़ा भी हो तो धर्म का आचरण लोगों को जीवन में उतारने की
01:03:19:24 विधा सिखाता तो धर्मा चरण की दृष्टि से व्यवहारिक धर्म की दष्ट से सैद्धांतिक दृष्टि से ये संस्कार हमारे धर्म है गर्भाधान संस्कार से लेकर के विवाह पर्यंत 16 संस्कार जो अंतिम में मृत संस्कार होता है उसका नाम है क्रिया अंत क्रिया व्यवहार में लोग संस्कार भी कह देते हैं लेकिन उसका नाम है अंत क्रिया विवाह पर्यंत 16 संस्कार धर्म कहलाते उसमें कल य गो पवित धर्म संस्कार है वो हम आप सबको अधिकारी की सीमा में दु जात की सीमा में धारण करने का जो विधान है वह करना चाहिए 16 साल तक ब्राह्मण 18 20 क्षत्री और 22 24 तक वैश्य का धर्म अधिक समय हो जाने पर महर्षि हों के निर्देशानुसार काला अतिक्रमण दोष हो जाने पर प्रायश्चित करके उस धर्म का निर्वाहन
01:04:34:24 किया जाता है इसे कहते हैं आपद धर्म तो साधारण धर्म असाधारण धर्म आपद धर्म विशेष धम धर्म के चार प्रकार हो तो हम लोग आप धर्म को मान कर के कल ज संस्कार करेंगे और धर्म के विषय में बहुत सी बातें कही जा सकती हैं पर यही विराम करना उचित है दो बार भगवान का नाम और फिर आगे की कार्यवाही पांडे जी करें श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम
01:05:23:03 जय श्री राम जय राम जय जय [संगीत] राम धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गौ माता की ग हत्या भारत संविधान शास्त्रीय श्री मदद जगतगुरु शंकराचार्य भगवान सर्व भूत हदय विश् धर्म सम्राट श्री स्वामी कपाती जी महाराज की जय हो श्री स्वामी महंत जी की जय हो जनता जनार्दन की जय हो धर्म उत्थान संस्थान कीय हर हर महादेव
01:06:17:06 [संगीत]
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