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00:00:01:22 तो सभी को जय श्री राम दो बहुत बड़े कन्फ्यूजिंग चैप्टर खोले गए हैं इसकन की तरफ से एक कि विष्णु से भिन्न किसी भी अन्य रूप भगवान के किसी भी अन्य रूप की भक्ति को बताने वाले जितने भी शास्त्र है उनकी श्रेष्ठता बताने वाले शास्त्र है यानी कि शिव पुराण भगवती पुराण य सभी ब्रह्म पुराण यह सभी तामसिक है या फिर सात्विक नहीं है और अगर आपको मोक्ष प्राप्त तो उसके लिए उपयुक्त नहीं है और या फिर यह कहा जाता है कि वह तामसिक लोगों के लिए है सात्विक लोगों के लिए नहीं है इसके अलावा एक क्लेम और किया जाता है पद्म पुराण के आधार पर ही कि विष्णु से भिन्न जहां पर भी कहीं पर भी किसी अन्य रूप की भगवान के किसी अन्य रूप की भक्ति बताई जा रही है वह सभी भ्रम फैलाने के लिए है और भ्रामक है यहां एक बात और ध्यान में रखने है कि जिस प्रकार से पद्म पुराण पर कहीं पर वैष्णव पुराणों में कहीं पर शैव पुराणों को या भगवती पुराणों को शाक्त पुराणों को तामसिक कह दिया गया या फिर सात्विक नहीं माना गया है तो उसी ठीक इसी प्रकार ऐसे पुराण भी है जिसमें कि वैष्णव
00:01:17:03 पुराणों को तामसिक कहा गया है पर आज हम जो बात करने वाले हैं हम केवल वैष्णव ग्रंथों के आधार पर ही अपनी बात रखेंगे और केवल वैष्णव ग्रंथों के आधार पर यह देखेंगे कि क्या शिव जीी की भक्ति बताने वाले जो शास्त्र हैं वो सभी तामसिक है या फिर उनमें कही जाने वाली बातें जो है वो झूठी है सिद्धांत अपनाने योग्य नहीं है तो आज इन दोनों क्लेम की बहुत अच्छे से लेंस लेकर के मीमांसा करेंगे और सभी प्रकार के जितने भी तर्क कुतर्क लिए जा सकते हैं उसको पूर्व पक्ष में ले रखते हुए हम सभी तर्क और कुतर्कों पर बात करेंगे तो चलिए चलते हैं तो सबसे पहले मेरे पास य भागवत पुराण है इसको इकोन के द्वारा सबसे श्रेष्ठतम पुराण माना जाता है और वैष्णव पुराण तो है ही विष्णु भगवान के रूपों की बात हुई है इसमें इसके गवे स्कंध के पांचवे अध्याय में 11वें श्लोक में लिखा हुआ है कि इस संसार में जन्म लेने वाले जितने भी प्राणी हैं उनमें ये मास मदरा मैथुन इस प्रकार की प्रवृत्ति भवान ने ही डाली है और
00:02:32:03 मनुस्मृति में भी यही श्लोक है कि यह जो प्रवृत्तियां होती है तामसिक गुणों वाली भगवान ने आपके अंदर इनबिल्ट की है और इन प्रवृत्तियों पर धर्म की लगाम लगा कर के सात्विक कर्मों को करना या फिर सात्विक कर्मों को करने के लिए प्रयत्नशील होना यही धर्म है और उसी से आपको मुक्ति मिलेगी तो अगर इन सिद्धांतों को अपना लिया जाए तो संसार में प्रत्येक मनुष्य तामसिक ही है है तो उस हिसाब से अगर देखा जाए तो क्योंकि ये लोग ये क्लेम करते हैं कि जो शिव पुराण है वह तामसिक है सात्विक नहीं है तो मनुष्य की जो मुक्ति का सहयोगी है वोह तो तामसिक पुराण ही हुआ क्योंकि हर मनुष्य तामसिक है सात्विक तो है नहीं तो इस हिसाब से देखा जाए तो मनुष्य के लिए जो उपयोगी शास्त्र है वो तो शिव पुराण ही हुआ जो तामसिक कहे जा रहे हैं वही पुराण जो तामसिक प्रवृत्ति के लोग हैं उनके लिए उपयोगी है और दुनिया में सभी मनुष्य तामसिक प्रवृत्ति के साथ ही जन्म लेते हैं ये मैं नहीं भागवत पुराण कह रहा है जो इनके लिए प्रमाणिक है है ना इसके साथ ही साथ अगर किसी पुराण को तामसिक या सात्विक मानने का आधार ये है कि वो किस प्रकार के लोगों की मुक्ति
00:03:47:03 के लिए है किस प्रकार के लोगों के लिए अनुकरणीय अनुगमन पुराण तमोगुण लोगों के मोक्ष के लिए नहीं है और यदि है तो फिर उसको तामसिक क्यों ना माना जाए या फिर सात्विक राजसिक तामसिक तीनों ही प्रकार का क्यों ना माना जाए यह प्रश्न भी खड़ा हो जाएगा इसके साथ ही साथ जो इकन जैसे तंत्र इस प्रकार के भ्रामक प्रचार करते हैं कि वह सात्विक है वह तामसिक है वो सात्विक लोगों के लिए व तामसिक लोगों के लिए है क्या वह कोई डिटेक्टर मशीन के साथ अपने लोगों को अपने गेट पर खड़े करते हैं क्या जहां पर व प्रवचन देते हैं कि यहां आने वाला व्यक्ति सात्विक हो क्योंकि यहां भागवत पुराण पढ़ाया जा रहा है तामसिक ना हो क्या ऐसा करते क्या क्योंकि तामसिक लोगों के लिए तो वह शास्त्र नहीं है ना जो आप लोग पढ़ा रहे हो या है और अगर है तो फिर किस प्रकार किसी शास्त्र को आप तामसिक और किसी शास्त्र को आप सात्विक कह रहे हो और अंततः यदि जो भागवत पुराण है वह सात्विक है सात्विक लोगों के लिए है और जो शिव पुराण है व तामसिक है तामसिक लोगों के लिए है तो इस प्रकार से तो यह माना जाएगा कि जो भागवत पुराण है व सनातन शास्त्र नहीं है क्योंकि सनातन की क्या व्याख्या है जो किसी भी
00:05:02:07 देश काल परिस्थिति में ना बदले ना उत्पन्न हो ना उसका अंत हो उसका नाम सनातन है अथर्ववेद तो यहां पर क्या हो रहा है कि भाई अगर व्यक्ति सात्विक है तो ही उसके लिए उपयोगी है भागवत पुराण अगर व्यक्ति तामसिक है तो उसके लिए भागवत पुराण उपयोगी नहीं है और अगर है तो फिर भागवत को केवल सात्विक पुराण क्यों कह रहे हैं उसको कहिए वो तामसिक भी है सात्विक भी है राजसिक भी है जो कि सत्य है जो कि सत्य है मगर आपके अनुसार चलेंगे तो भागवत पुराण सनातन शास्त्री सिद्ध नहीं होगा सनातन विरुद्ध शास्त्र सिद्ध होगा किसी देश काल परिस्थिति में उत्पन्न होने वाला किसी देश काल परिस्थिति में उपयोगी होने वाला जैसे कि अब्राह्मिक आडलज के शास्त्र होते हैं किताबें होती हैं उसी तरह का प्रूफ करना चाहते हैं ना अब अगर बात यह की जाए कि भाई क्योंकि विष्णु भगवान जो हैं वो सतोगुण कृत के देवता है ब्रह्मा जी है वो रज गुण कृत के देवता है और शिवजी जो है वह तमोगुण कृत के देवता है इसलिए जहां पर उनकी श्रेष्ठता की बात हो रही है उनकी भक्ति की बात हो रही है उन शास्त्रों को तामसिक माना जाएगा तो इस विषय में मैं आपको बताना चाहूंगा मेरे पास य भागवत पुराण है
00:06:17:18 और इसके आठवे स्कंध के सातव अध्याय के 23 से 31 में श्लोक में बताया गया है कि भगवान शिव ही [संगीत] भगवान शिव ही ब्रह्मा विष्णु महेश बनके जगत की उत्पत्ति स्थिति और संहार करते हैं इसके साथ ही साथ भागवत पुराण मेंही आठवें स्कंद के सातवें अध्याय के 30 में श्लोक में बताया जा रहा है कि भगवान शिव ना तो तमोगुण है ना ही रजोगुण है ना ही सतोगुण है वो तो इनसे परे हैं महाभारत अनुशासन पर्व दान धर्म पर्व इसमें 14 अध्याय के 224 में श्लोक में बताया जा रहा है कि जो भगवान शिव है वह तीनों ही प्रकार के गुणों से परे हैं गुणा धीश है गुनातीत नहीं है गुणधी नहीं है गुणा दीश है ठीक है तो इसका अर्थ यह है कि भगवान शिव के द्वारा जो तमोगुण कृत्य का निर्वाह किया जा रहा है उसके आधार पर भी यह सिद्ध नहीं होता कि उनकी बात करने वाले जो शास्त्र है उनको तमोगुण माना जाना चाहिए ठीक और यदि किसी
00:07:32:19 शास्त्र को तमोगुण मानने का आधार यह है कि उसमें मनुष्य जीवन के किस अंश की बात हो रही है क्या तामसिक कार्यों की बात हो रही है जैसे कि मनुष्य के जीवन में सात्विक कार्य भी है उसको भक्ति कैसे करनी है मगर उसके जीवन में तामसिक कार्य भी है कि उसको भोग कैसे करना है यदि इस हिस्से की किसी शास्त्र में बात हो रही है इस आधार पर अगर उसे तामसिक कहा जा रहा है तो पहली बात तो यह है कि इस प्रकार की जो श ाए हैं वो तो सभी पुराणों में है वैष्णव पुराणों में भी है कि आपको आपके जीवन में भोगों को कैसे सा साधना है आपको तरह-तरह की जितनी भी जो तामसिक गुण से प्रभावित जो अंश होते हैं उन अंशों का निर्वाह कैसे करना है धर्म की सीमा में रहते हुए यह शिक्षा तो तीनों ही प्रकार के शास्त्रों में दी गई है चाहे वो वैष्णव हो चाहे वह शैव हो चाहे वो शक्त हो सौर हो या नपत हो मगर फिर भी अगर थोड़ी देर के लिए ये मान लिया जाए कि नहीं भाई भागवत पुराण में मनुष्य जीवन के इस अंश की बात नहीं हुई है केवल सात्विक अंश की ही बात हुई है अर्थात भगवान के लिए क्या-क्या कार्य करने केवल इनकी बात हुई है बाकी जो उनके [संगीत]
00:08:51:16 धर्माचक्र पान करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए मैथुन किससे करना चाहिए किससे नहीं करना चाहिए इस बारे में दो मिनट के लिए मान लिया जाए कि वहां पर बात नहीं हुई है तो ऐसे में भी जो जहां पर इस बारे में बात हो रही है अर्थात उनके हिसाब से यदि शिव पुराण इसलिए तामसिक है क्योंकि मनुष्य जीवन के इन हिस्सों की इन अंशों की बात शिव पुराण में हुई है इसलिए वो तामसिक है अगर इसको मान भी लिया जाए तो उस स्थिति में भी उसको तामसिक माने जाने से यह सिद्ध नहीं होता कि उसमें दिए गए सिद्धांतों को गलत मानना है उसमें दिए गए जो दृष्टांत है उन्हें मिथ्या समझना है ये तो सिद्ध नहीं होता अगर कहीं पर विवाह आदि प्रकरण की बात हो रही है अगर कहीं पर ये बताया जा रहा है कि मदरा नहीं पीनी है अगर कहीं पर यह बताया जा रहा है कि मांस नहीं खाना है और इस कारण से उसे तामसिक कहा जा रहा है उस ग्रंथ को तो उससे य सिद्ध नहीं होता कि उस ग्रंथ में दिए गई जो नियमावली है वो गलत है उस ग्रंथ में जो दिए गए सिद्धांत है वो गलत है भ्रम है मिथ्या है अब ये मेरे पास शिव पुराण है इसमें युद्ध खंड में 26 में श्लोक में तुलसी माता का वर्णन दिया गया है कि कैसे वृंदा का वृंदा जी का
00:10:06:18 जन्म होता है तुलसी के रूप में कैसे वो विष्णु जी की प्रिया बनती है पूरा वृतांत है तो क्योंकि शिव पुराण तामसिक है इसलिए क्या इस वृतांत को झूठा मानेंगे और अगर झूठा मानेंगे तो फिर तुलसी की उत्पत्ति कैसे मानेंगे आप यह मेरे हाथ में पद्म पुराण है पहले पार्ट में 45 से 46 में श्लोक में लिखा हुआ है कि सृष्टि के प्रारंभ में केवल एक अरब श्लोक संख्या वाला एक ही पुराण था वस्तुतः कोई अलग-अलग पुराण है ही नहीं एक ही पुराण है जिसको संक्षिप्त करके द्वापर में आकर के भगवान व्यास जी 18 भाग मात्र करते हैं और यही बात मत्स्य पुराण में भी लिखी हुई है कि अलग-अलग पुराण नहीं है 18 चैप्टर्स वाला एक ही पुराण है और वो भी सबसे पहले तो एक अरब शलोक संख्या में था व संक्षिप्त होकर के हमें प्राप्त हुआ है जो आज 18 टुकड़ों में है तो फिर कैसे कह रहे कि आप व य अलग है यह अलग है वास्तविकता में यह जो श्लोक है इस प्रकार के यह भक्ति भाव के अनुरूप है और अपने ईट के प्रति अन्यता का भाव लाने के लिए हैं इन श्लोकों को सनातन
00:11:21:24 सिद्धांत के रूप में लेना कदाचित उचित सिद्ध नहीं होता जो जिनकी निष्ठा शिव में है उन के लिए मुक्ति दिलाने वाला जो शास्त्र है व शिव पुराण है तो उसको सात्विक कह दिया गया और जिनकी निष्ठा विष्णु में है उनको मुक्ति दिलाने वाला वैष्णव शास्त्र यानी कि भागवत पुराण या विष्णु पुराण आदि तो इस दृष्टिकोण से उसे सात्विक कह दिया गया इससे भिन्न इस श्लोक का और कोई औच नहीं लिया जा सकता क्योंकि अगर लेंगे तो सारी व्यवस्था चरमरा जाएगी अब आ जाते हैं हमारे दूसरे प्रश्न में दूसरा क्लेम जो दूसरी मिथ्या फैलाई जाती है कि पद्म पुराण के अनुसार भगवान विष्णु से भिन्न भगवान के जिस भी किसी रूप की भक्ति बताई जा रही है वह सब ब्रह्म फैलाने के लिए और ये बात कही किसने भगवान शिव ने पदम पुराण से रेफरेंस आपके सामने हे पुत्र कार्तिक भगवान विष्णु के साथ हमारी शिव आदि यहां तक कि मुक्त आत्माओं की समानता यह सब केवल ब्रह्म के लिए कहा गया है यस ने नहीं लिखा है पदम पुराण में है है ना तो इसकी मीमांसा करते हैं तो सबसे पहले तो ऐसे बहुत सारे शास्त्र हैं वैष्णव शास्त्र जिसमें कि शिव और विष्णु को एक बताया जा रहा है वहां पर वहां पर शिव जी यह कह रहे हैं कि शिव और विष्णु की जो एकता है वो भ्रम फैलाने
00:12:36:27 के लिए है मगर ऐसे अनेका अनेक शास्त्र हैं जहां पर शिव और विष्णु की एकता बताई जा रही है तो क्या सारे वैष्णव शास्त्र भी ब्रम फैलाने के लिए जैसे कि
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→ Used in: A · Video रामपाल जी महाराज का मिथ्या प्रचार E-3 #rampaljimaharaj #gitagyan #kabirisgod #sa... at 9:47 ↗
→ Used in: A · Live प्रमाण देखते ही भाग गया रामपाल का चेला --तत्वदर्शी कौन है? at 9:41 ↗
→ Used in: B · Video रामपाल के फूहड़ शिष्य को पड़ी प्रमाण की मार at 2:16 ↗
00:12:47:16 महाभारत अनुशासन पर्व मोक्ष धर्म पर्व 341 वा अध्याय श्लोक 27 से 28 श्रीमद् भागवत दो च 12 श्रीमद भागवत 12 10 22 वरा पुराण 70 30 26 से 27 और 39 से 40 नारद पुराण
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00:13:07:18 82 वा अध्याय जो पूर्वार्ध उसका भाग है उसमें 82 वा अध्याय और दवा श्लोक इसी प्रकार से आगे एक पा 72 और फिर उसके बाद 15 158 से 159 इन सब जगह ये सारे वैष्णव शास्त्र है और इन सब जगह जो मैं आपको बता रहा हूं स्थल इन सब जगह और विष्णु की एकता बताई जा रही है एक ना मानने वालों को पापी तक कहा जा रहा है नरक गामी कहा जा रहा है तो क्या यह सारे वैष्णव शास्त्र भी भ्रामक है भ्रम है इसके साथ ही साथ श्रीमद् भागवत में आठवें अध्याय आठवें स्कंद के सातवें अध्याय के 23वें श्लोक में फिर वही बताया जा रहा है कि भगवान शिव ही ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप में अवतरित होकर के और वो उत्पत्ति स्थिति और सम्हार का कृत्य का निर्वाह करते हैं अच्छा इसके बाद एक बहुत जरूरी और आवश्यक बात भगवत गीता में दव अध्याय के 35 में श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं कि मंत्रों में मैं गायत्री हूं छंदों में मैं गायत्री हूं और श्रीमद् भागवत में क्या कहा जा रहा है आठवे अध्याय के आठवे स्कं के सातवे अध्याय के 30 श्लोक में कहा जा रहा है कि गायत्री किसका विचार है गायत्री के द्वारा किसका वर्ण होता है गायत्री
00:14:22:26 कौन है वेदा आदि शास्त्र कौन है भगवान शिव तो यहां क्या हुआ यहां कृष्ण भगवान कह रहे हैं गायत्री मैं हूं और वहां पर गायत्री कौन है शिवजी और वैष्णव शास्त्र के आधार पर मैं शैव शास्त्रों की बात नहीं कर रहा हूं अभी तो क्या यह वैष्णव शास्त्र भ्रामक है झूठ है और अभी इसका भी तिया पाचा कर लेंगे यह मेरे पास पद्म पुराण है इसके ब्रह्म खंड के 25 में अध्याय के चव श्लोक में ब्रह्म खंड का 25 वा अध्याय और 14वां श्लोक इसमें 10 नाम अपराध में से एक नाम अपराध बताया गया है कि हरि हर में भेद करना पाप है अपराध है नाम जप करने वालों के लिए वह बात और है कि स्कोन के द्वारा जो इसका ट्रांसलेशन किया गया वह क्या है पता है कि शिव और विष्णु को एक समान समझना अथवा भिन्न समझना अपराध है इसका क्या अर्थ है भाई समान समझना अथवा भिन्न समझना अपराध है तो ये क्या हुआ दोनों तरह की बातें बोल दी कन्फ्यूजिंग अर्थ कर दिया इससे क्या होगा व्यक्ति को जब व्यक्ति पूछने आएगा तो उसको अपने हिसाब से बता
00:15:37:28 देंगे वहां पर शाब्दिक अर्थ नहीं लिखा है जो शाब्दिक अर्थ है श्लोक का वह नहीं लिखा है उसमें हल्की सी अपनी चतुराई से मिलावट कर दी और उसका खुब प्रचार कर दिया अब बताइए ये चौखंबा वाले भी शैव है ना इसलिए ऐसा कर रहे हैं केवल एक स्कन ही सही है मचार भी गलत है केवल एकन सही है और वह वहां जहां जहां पर उसको लगता है कि यह श्लोक जो है मेरे लिए गड़बड़ कर सकता है उसमें अपने अनुसार मिलावट कर देता है अब यहां लिखा हुआ है कि शिव और विष्णु को एक समझना अथवा भिन्न समझना पाप है तो व्यक्ति समझे क्या भाई ना तो भिन्न समझ सकता है ना ही एक समझ सकता है तो ऐसे में फिर वो अपनी चक्री चलाएंगे कि भैया क्योंकि कुरान में लिखा हुआ है कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता ईश्वर अजन्मा है और भगवत गीता में भी ईश्वर अजन्मा है इसलिए कुरान और गीता एक है यह चक्री चलाई जाएगी है ना मगर इसका जो उपाय है ना इस मिथ्या का वह उपाय आपको नारद पुराण में मिल जाएगा नारद पुराण के 82 में अध्याय के दसव श्लोक में स्पष्ट लिखा है
00:16:52:28 हरियर में भेद करना पाप है वहां भी दस नाम अपराध बताए जा रहे हैं अब क्या करोगे यह मानोगे यह भी वैष्णव शास्त्र है यह झूठा मानोगे यह झूठा मानोगे किसे झूठा मानोगे व कहते हैं ना कि जो झूठ होता है ना उसको छिपाने के लिए 100 झूठ और बोलने पड़ते हैं तो आप एक जगह पर ट्रांसलेशन बदल दोगे कहां कहा बदलो अब आ जाती है वह फेवरेट बात जो बोलते समय हमेशा मेरी हृदय गति बढ़ जाती है जब कभी कुछ ना समझ में आए तब राम की शरण में जाओ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम रामो विग्रहवां धर्मा उसको कैसे झुट आओगे आपके पद्म पुराण में ही पाताल खंड में पाताल खंड में 46 में अध्याय के 20 से 21 श्लोक में भगवान श्री राम कह रहे हैं मुझ में और शिव में कोई भेद नहीं है भेद मानने वाला कुंभी पाक नामक नरक में कई हजार कल्पों तक पकाया जाता है य राम के वचन अब बताओ राम को भी झुट दोगे रामो विग्रहवां धर्मा नहीं है राम जी भी भ्रम
00:18:08:02 फैलाते हैं इसके साथ ही साथ अनेक वैष्णव शास्त्रों में भगवान शिव की भगवान विष्णु के समान श्रेष्ठता पर ब्रह्म बताई जा रही है वैष्णव शास्त्रों में अब यह मेरे पास महाभारत है इसका अनुशासन पर्व दान धर्म पर्व अध 17 इसमें क्या कहा जा रहा [संगीत] है महादेव की भक्ति के कारण ही भगवान श्री कृष्ण ने पूरे विश्व को व्याप्त कर रखा है किसकी भक्ति करने से महादेव की भक्ति करने से स्तुति कर रहे हैं भगवान श्री कृष्ण महादेव की स्तुति और क्या कह रहे हैं कि मुझे वर देने वाला और कोई नहीं है सिवाय महादेव के सिवाय भगवान शिव के और क्या कह रहे हैं उपमन्यु ऋषि से सैवी दीक्षा लेकर उन्होंने 1000 साल तक तपस्या की पुत्र प्राप्ति के लिए किसकी भगवान शिव की ऑफिशियल भक्त महादेव के ऑफिशियल भक्त है राम और कृष्ण ऐसे नहीं है ऑफिशियल भक्त अधिकृत नाम सैवी दीक्षा लेकर जप करते हैं अच्छा इसमें और क्या कहा जा रहा है
00:19:23:02 कि श्री कृष्ण परम सैव है आप लोग कहते हो ना परम वैष्णव परम वैष्णव नाम यथा शंभू अरे भाई परम शैव कौन है यह भी तो जान लो राम है परम शैव विष्णु है परम शैव कृष्ण है परम शैव यह सब नहीं जानोगे या जानोगे तो छुपा दोगे अब यहां पर एक कुतर्क किया जाएगा क्या कि भगवान श्री कृष्ण तो अपने भक्तों का भजन करते ही हैं भगवान श्री कृष्ण तो लीला लीला करते हैं अरे भाई भगवान श्री कृष्ण यदि अपने भक्तों का भजन कर सकते हैं तो क्या भगवान शिव नहीं कर सकते चलो इसको भी कर देते हैं आपके शैव पुराण में आपके वैष्णव पुराण में सॉरी नारद पुराण में क्या लिखा है 179 अध्याय के 196 से 19 श्लोक में भगवान विष्णु पूछ रहे हैं शिव जी से कि आप जिसका सब वर्णन करते हैं जिसका सब ध्यान लगाते जिसकी सब पूजा करते हैं ऐसे आप किसका ध्यान लगाते हो आप किसका भजन करते हो तो भगवान शिव वहां पर अगले श्लोक में कह रहे हैं 200 नंबर के क्या कह रहे कि मैं किसी का ध्यान नहीं लगाता हूं हे गोविंद मैं किसी का ध्यान नहीं लगाता हूं मैं तो नास्तिकों को प्रवृत
00:20:38:04 करने के लिए यह करता हूं कि वह मुझे देख कर के थोड़ा आस्तिक में आ जाए यह कह रहे भगवान शिव तो भगवान कृष्ण लीला कर सकते हैं मगर भगवान शिव लीला नहीं कर सकते है ना भगवान श्री कृष्ण के लिए यह बात कही जाएगी कि वह अपने भक्तों का भजन करते हैं तो इसको आप एज इट इज मान लोगे मगर भगवान शिव के लिए कही जाएगी तो आप कह दोगे कि नहीं नहीं ये तो भ्रामक है अब यहां पर एक छोटा सा प्रश्न आता है कि जब भगवान श्री कृष्ण लीला वस ऐसे वचन बोलते हैं जो कि सत्य नहीं है तो फिर आप उनके उन वचनों को सत्य कैसे मान लेते हैं जो कि आपके मंतव्य की सिद्धि करते हैं आपको भगवान श्री कृष्ण को ही सर्वोपरि बताना है भगवान शिव की भक्ति को भ्रामक बताना है अन्य सभी को दास बताना है अन्य सभी को पूजा ना करने के योग्य बताना है तो यह बताइए कि भगवान श्री कृष्ण जब यह कहते हैं कि मैं ईश्वर हूं मैं ईश्वर हूं या मेरी शरण में आ जा इन वचनों को आप लीला क्यों नहीं मानते किस आधार पर नहीं मानते अब आप कहेंगे कि भाई हमारे भगवान हमसे झूठ नहीं बोलेंगे यही हो सकता है कि हमारे भगवान पर हमें विश्वास है मगर इन्हीं मगर वो भगवान भगवान तब है ना जब आपने उनके इन वचनों को
00:21:53:04 सत्य माना उनको सत्य मानने से पहले तक तो आप उनको सर्वोपरि नहीं मानते हैं ना और अगर मानते तो किन वचनों के आधार पर मानते हैं आप ही तो ढंडोरा पीटते हैं ना कि शिव जी ने कहा कि आप भगवान है ब्रह्मा जी ने कहा कि आप भगवान है क्या कहते हैं विष्णु भगवान ने कहा कि आप भगवान है इंद्र ने कहा कि आप भगवान है और कृष्ण ने कहा कि हां मैं भगवान हूं इन्हीं बातों की वजह से तो आप उनको सर्वोच्च ईश्वर के रूप में देखते हैं तो फिर उससे पहले आपको एक ऐसे निर्णय हो गया कि वो भगवान है और क्योंकि वो लीला करते हैं तो उनकी इस बात पर विश्वास क्यों है कि वो सर्वोच्च है पद्म पुराण में पहले अध्याय में ही भगवान श्री राम भगवान शिव की श्रेष्ठता का वर्णन कर रहे हैं रामेश्वर की स्थापना के समय उनका उनकी स्तुति कर रहे हैं उनकी श्रेष्ठता का वर्णन कर रहे हैं जैसा कि वह कहते हैं कि मैं ध्यान किसका लगाता हूं शंभू का और इसके साथ ही साथ वाल्मीक रामायण में उन्होंने गायत्री मंत्र का जाप जगह जगह किया है गायत्री मंत्र का जाप क्या है सच्चिदानंद परमेश्वर मंत्रों में मैं गायत्री सबसे बड़ा मंत्र क्या है भगवान को ध्यान करने वाला सबसे श्रेष्ठ मंत्र आप ही के हिसाब से अगर कृष्ण सर्वोच्च है तो उन्होंने कहा मंत्रों में मैं गायत्री हूं
00:23:08:18 तो यानी कि सर्वोच्च मंत्र कौन सा हुआ गायत्री मंत्र और गायत्री मंत्र के द्वारा किसका वर्ण होगा किसका ध्यान लगाया जाएगा सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का तो भगवान राम गायत्री मंत्र का जाप जगह जगह कर रहे हैं आप सवाल यह आता है प्रश्न यह आता है कि यदि भगवान राम कृष्ण का या काही वर्णन कर रहे हैं तो इस प्रकार से उन्होंने मनुष्य समाज को अद्वैत की शिक्षा दी अद्वैत कि परम ब्रह्म आप ही का परम ब्रह्म स्वरूप है और उसका आपको ध्यान लगाना है यह अद्वैत की शिक्षा हो गई भगवान को अपना ही मानना अपना ही पूर्ण रूप मानना आप अपूर्ण है और आपका ही पूर्ण रूप है भगवान ईश्वर तो ये तो अद्वैत की शिक्षा हो गई कि श्री राम ने अगर कृष् और विष्णु का ध्यान लगाया गायत्री मंत्र के द्वारा तो इससे सिद्ध हो गया कि भगवान राम ने अद्वैत की शिक्षा का प्रतिपादन किया शंकराचार्य की शिक्षा का प्रतिपादन किया क्या आप यह मानेंगे आपको यह मानना पड़ेगा कि भगवान राम ने किसी और का वर्ण किया अगर किसी और का किया तो किसका किया पद्म पुराण पाताल खंड भगवान राम किसका ध्यान लगाते हैं
00:24:23:19 भगवान राम के हृदय में कौन है भगवान शिव तो भगवान राम किसका ध्यान लगाते भगवान शिव का भागवत पुराण 11वां स्कंद सातवा अध्याय 30 वा श्लोक गायत्री किसका विचार है भगवान शिव का तो वहां पर भगवान राम क्या कर रहे हैं गायत्री मंत्र का जप कर रहे हैं और गायत्री मंत्र क्या है किसका विचार है गायत्री मंत्र के द्वारा किसका ध्यान लगाया जाता है वैष्णव शास्त्र के अनुसार भगवान शिव का ध्यान लगाया जाता है तो भगवान राम ने किसकी पूजा की कहां तक भागोगे सच्चाई से कहां तक भागोगे भाई राम को भी झूठा कहोगे अब यहां पर इस प्रकरण से क्या सिद्ध होता है या तो राम अद्वैत की शिक्षा देने वाले हैं या फिर राम व्यवहारिक स्तर में तो कम से कम द्वैत को मानते ही है और वह जो भगवान का शिव रूप है उसका ध्यान लगाते हैं और या फिर आप यहां पर भी कह दो कि यह राम भी भ्रम फैलाने वाले थे भ्रामक शिक्षा देने वाले थे रामो विग्रहवां धर्मा गलत है मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं है झूठ बोलते हैं सच्चाई कुछ और है मगर वो लोग तो वो तो भ्रमित करते हैं लोगों को राम को भी झूठा सिद्ध कर दोगे आप लोग ऐसे लोग हो अपने मंतव्य की सिद्धि के
00:25:38:19 लिए अब इसके साथ ही साथ श्रुति शास्त्र है यजुर्वेद सवा अध्याय दूसरा मंत्र यजुर्वेद सवा अध्याय 41 वा मंत्र शिव जी है वो कल्याण दाता है मोक्ष दाता है अब क्या वेद आदि शास्त्रों को भी झुट दोगे आप स्वेता सत्र उपनिषद में तीसरे अध्याय के एक से लेकर नौ तक और उसके बाद पवे मंत्र तक सब जगह यही वर्णन है कि रुद्र जो है वह परम ब्रह्म है शता सत्र उपनिषद भी झूठ है आपके वैष्णव शास्त्र भी झूठ है राम भी झूठे हैं वेद भी झूठे हैं जबकि वेदों के लिए क्या लिखा जाता है वेद विरोधी नास्तिक महाभारत में लिखा है मनुष में लिखा है कहां तक जाओगे कितनी कितना मिथ्या प्रचार करोगे तो कुल मिलाकर के अब बात यह करें कि पद्म पुराण के उस श्लोक में भगवान शिव ने जो बात कही है उसका क्या करें फिर अरे भाई जब किसी की किसी के प्रति प्रीति होती है भक्ति होती है प्रेम होता है तो उस समय वह ऐसी बातें भक्ति रस में आकर के बोलता है भक्ति रस में आकर के उन्होंने
00:26:53:25 ऐसी बातें बोली मगर उन्हें एज इट इज सनातन सिद्धांत के रूप में ले लेना का विरोध करते हुए राम का विरोध करते हुए अन्य वैष्णव शास्त्रों का विरोध करते हुए तो गलत है उन्होंने भक्ति रस में आक के बोल दिया कि विष्णु आपके जैसा कोई नहीं है आपके बारे में सब बताने वाला कई बार होता है व्यक्ति अपनी प्रेमिका से कह देता है कि तुम्हारे जैसा सुंदर कोई नहीं है इस दुनिया में अपने बच्चे से कहता है कि तुम इस संसार के सबसे अच्छे पुत्र हो तुम इस संसार की सबसे अच्छी बिटिया हो तो तो क्या दुनिया की सारी जितनी भी पुत्रियां है बिटियां है अपने अपने मां-बाप के लिए वह सब क्या अच्छी नहीं है यह मान लिया जाए यह भक्ति यह भक्ति भाव है अनन्य को प्रकट करने के लिए उसके प्रति जो हमारा अनन्य का भाव है उसको प्रकट करने के लिए ऐसी बातें कही जाती है मगर इसका उपयोग आप सनातन सिद्धांत के रूप में करते हैं क्योंकि उससे आपके मंतव्य की सिद्धि होती है शिव जीी जो और बातें कहेंगे उनको भले ही ना माने फिर कह दे हम तो वैष्णव हैं हमारे तो गुरु नारद हैं हमारे तो गुरु व्यास हैं शिव जीी आप क्या नहीं है नारद पुराण में नारद कह रहे हैं भागवत पुराण में व्यास कह रहे हैं सुखदेव कह रहे हैं जो आपकी परंपरा के आचार्य गण है वो कह रहे हैं मगर वहां पर आपको शिव जी की बात को आगे रखना
00:28:08:27 है जो कि आपके आचार्य नहीं है और अपनी जो आचार्यों की बात है उसको पीछे कर देना व भ्रम है भ्रामक है क्योंकि उनसे आपकी बातों की सिद्धि नहीं हो रही है मंतव्य की सिद्धि नहीं हो रही है तो आप गुरु विरोधी हुए और गुरु विरोधी कौन होता है स्वेता स उपनिषद छवा अध्याय 23 वा श्लोक क्या कहा जा रहा है कि भगवान में और गुरु में अंतर करने वाला कभी भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाता और स्कंद पुराण में तो गुरु पत्नी गमन यह सब बहुत सारे पाप बताए गए हैं गुरु और भगवान में अंतर करने वाले के लिए कहां तक जाओगे आज नहीं छोडूंगा अभी और बाकी है पद्म पुराण पाताल खंड 46 वा अध्याय और 20 से 22 वा श्लोक है पाच से नौ श्लोक है इसमें यह जो भगवान शिव का जो भक्ति भाव है विष्णु रूप के प्रति विष्णु भगवान के प्रति अन्यता का भाव है उसका खंडन किया गया है किसके द्वारा पता है श्री राम के द्वारा मुझसे अक्सर लोग कहते हैं राम जी को बीच में क्यों लाते हो राम जी को बीच में क्यों लाते हो क्योंकि राम जहां पर होते हैं वहां पर अधर्म की गति
00:29:24:00 नहीं हो सकती इसलिए मैं लाता हूं जब मेरे पास कुछ नहीं था तब मेरे पास राम थे सिर्फ राम को रख दो हर समस्या का हल कभी अधर्म की गति नहीं हो सकती जब तक आप राम को पकड़े रहोगे राम देखो राम ने क्या किया भगवान शिव ने ऐसे ही बिल्कुल इसी तरीके से कहां पर पद्म पुराण के 46 में अध्याय के पांचवे से नौवे श्लोक में विष्णु राम के प्रति अनंतता का भाव ऐसे ही प्रकट किया कि आपके जैसा कोई नहीं है आप सबसे श्रेष्ठ आप य हो आप कोई अनंतता का बाप प्रकट किया मगर वहां तो राम खड़े थे ना और राम कौन है रामो दुर ना भी भाषित राम दो प्रकार की
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00:30:10:03 बातें नहीं करता राम कौन है सत्य प्रतिज्ञ राम कौन है जो अपनी पत्नी को त्याग सकता है अपने भाई को त्याग सकता है अपने प्राणों को त्याग सकता है
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00:30:21:14 पर वह झूठ वचन नहीं बोल सकता असत्य वचन नहीं बोल सकता वो है राम तो उन्होंने क्या किया जब वहा भगवान शिव इस प्रकार से भाव हील होक के अपनी भक्ति रस के कारण अनंतता का भाव प्रकट कर रहे हैं तो वहा उन्होंने बोला कि आप में और मुझ में कोई भेद नहीं है शिव जी मेरे हृदय में आप है आपके हृदय में मैं हूं और जो हम दोनों में भेद देखता है वह कुंभी पाक नामक नरक में कई हजार कल्पों तक वर्षों तक नहीं दिनों तक नहीं कल्पों तक पकाया जाएगा यह राम कह रहे हैं आप आचार्य की बात नहीं मानोगे श्रुति शास्त्रों की बात नहीं मानोगे आप किसी की बात नहीं मानोगे आप केवल वो जो भगवान ने भक्ति रस में आकर के कुछ बात कह दी जहां पर सिर्फ उतनी बात मानोगे शिवजी की दूसरी जगह जो बातें हो रही होंगी वो नहीं मानोगे अरे भाई जब किसी व्यक्ति पर किसी स्त्रोत पर आपको विश्वास नहीं है या फिर आपको पता लग गया कि झूठ बोलता है लोगों को भ्रमित करता है तो आपको कैसे पता कि जो बात है वो आपसे बोल रहा है वह भ्रम नहीं है आप कहोगे कि उसने हमसे कहा है कि य भ्रम नहीं है अरे भाई यह भी तो भ्रम भ्रम फैलाने के लिए बात हो सकती
00:31:36:14 है जब हम किसी को झूठ बोल रहे होते तो एक क्या यह बता के बोलते हैं कि मैं यह भ्रम नहीं फैला रहा हूं सत्य बोल रहा हूं तो आप शिव जी जो जहां पर कह रहे हैं मैं किसी का ध्यान नहीं लगाता उसको नहीं मानोगे पदम पुराण में ही नारद पुराण मेंही वैष्णव पुराण में उसको नहीं उसको नहीं मानोगे मगर जब वो ये कह रहे होंगे कि शिव और विष्णु में अभेद देखने वाले लोग मूर्ख हैं या पापी हैं तो उसको मान लोगे क्योंकि वो आपके मन मतलब की बात है ना चलो अभी इस भक्ति रस की और में मांसा करते हैं इसी प्रकार पद्म पुराण के उत्तरखंड के 68 अध्याय में वैष्णव की महिमा का गान करते करते यह तक कह दिया गया कि वैष्णव जो होते हैं वो विष्णु भगवान ही है वैष्णव में और विष्णु में कोई अंतर नहीं है अब बताइए क्या करेंगे इसको मानेंगे अद्वैत की शिक्षा हो गई य तो भक्त और भगवान एक हो गए अब इस प्रमाण को आप भक्ति रस अनन्य का भाव या महिमा मंडन करने के निमित्त कहा जाने वाला रखेंगे या हर वैष्णव को विष्णु भगवान मानेंगे क्या करेंगे आप तो द्वैत वादी है ना एक बार को अद्वैत वादी तो मान भी लेंगे भाई कि चलिए ठीक है परमार्थ की दृष्टि से है व्यवहार की दृष्टि से नहीं है मगर आप तो द्वैत
00:32:51:14 वाली है द्वैत वाले लोग हैं आप क्या करेंगे इसका सब गलत पूरा प पुराण गलत केवल वो श्लोक सही है जो भगवान शिव ने कह दिया राम गलत वेद गलत शति शाश्वता सत्र उपनिषद गलत आपके परंपरा प्राप्त आचार्य गलत मगर केवल एक वो शिव जी ने जो वहां पर जो बातें बोल द वही सही है क्योंकि उससे आपके मंतव्य की सिद्धि होती है यहां ध्यान रखने वाली बात क्या है कि इकोन के द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली जो गुरु परंपरा है उसमें शंकर भगवान कहीं नहीं आते हैं नारद जी आते हैं व्यास जी आते हैं मगर नारद जी कह रहे हैं कि हरि हर में भेद करना पाप है नारद जी कह रहे हैं कि परम ब्रह्म शिवजी है ना व्यास जी कह रहे हैं भागवत में के परम ब्रह्म शिव जी मगर उनकी बातें नहीं मान रहे हैं और जो उनके आचार नहीं है और उन्होंने भक्ति रस में भक्ति भाव में आकर के जो बातें बोल दी है उनकी बातें मान रहे हैं अब बात यह आती है कि भगवत गीता का भाष्य करते समय दूसरे अध्याय के दूसरे श्लोक में इसकन की जो भगवत गीता है यथारूप उसमें विष्णु को भी कृष्ण से निम्न कर दिया गया और वहां पर शिव जी की बात को क्या माना जा रहा है कि जो भी कहीं पर भी विष्णु से भिन्न किसी और की भक्ति बताई जा रही है व भ्रम है तो अब क्योंकि यहां पर स्वयं इकोन य मान रहा है
00:34:06:15 कि इस कृष्ण में और विष्णु में अंतर है मैं नहीं मान रहा इस कौन यह मानता है कि कृष्ण और विष्णु में भी अंतर है और कृष्ण श्रेष्ठ है तो कंपनी के लोग क्या मानते जो आया स की व से आया अरे कृष्ण भी आए नाी व विष्णु की इनको य नहीं पता अरे विष्णु को अपॉट किसने किया ओनर ने किया कृष्णा इ ओनर जितने अवतार आते विष्णु से आते जो हो रहा है सी सा विष्णु की होरहा हैचर हो ऑपरेशन हो फाइनेंस हो ये हो ममका हो लेकिन आज एक्सेप्शन है जी कृष्णा कम ओनर कृष्णा आ कम आ कम ू रिसीव ओ कृष्ण शायद विष्णु के अवतार हो ना जी ना इन्होने विष्णु का पॉइंट कि है फर यूनिवर्सल मैनेजमेंट दिस दैट किको न तो इसको अगर सत्य मानेंगे पद्म पुराण के इस वाक्य को शिव जी के इस वचन को अगर आप सत्य मानते हैं तो उसके आधार पर आपकी जो भगवत गीता है वह भी भ्रामक है कहां तक जाएंगे क्योंकि आपने कृष्ण और विष्णु को एक नहीं माना है क्या कहते हैं कि विष्णु भी कृष्ण के समान पूर्ण
00:35:21:20 ऐश्वर्य वान नहीं है इसका मतलब पहले तो अंतर है ये मान लिया आपने और उसके बाद क्या हुआ कि आपने कृष्ण को श्रेष्ठ कर दिया जब कृष्ण को श्रेष्ठ कर दिया तो भ्रम हो गई आपकी भगवत गीता आप ही के अनुसार भ्रम है भ्रामक है मानेंगे आप इसीलिए कहते हैं झूठ होता है ना उसके लिए बहुत सारे कर्म करने पड़ते फिर भी बचा नहीं पाते उस कहां तक जाएंगे अब एक बात यहां पर और ध्यान रखने की है कि विष्णु के नाम पर सभी देवी देवताओं को नकारने का जो निरर्थक प्रयास है वो खूब किया जाता है मगर चातुर्य देखिए अपने मंतव्य की सिद्धि के लिए पहले तो विष्णु के नाम पर सभी देवी देवताओं से विष्णु की शिष्टता के नाम पर सबसे श्रे विष्णु विष्णु विष्णु हम वैष्णव वैष्णव वैष्णव इसका नाम का ढंडोरा पीटते हुए सबसे पहले तो सारे धर्म ग्रंथों को सारे सिद्धांतों को नकार दिया और उसके बाद एक समय आया त विष्णु को भी साइड कर दिया बहुत अच्छे भाई य कैसा कृष्ण है आपका किस प्रकार के कृष्ण को आप पूज रहे हो यह सनातन कृष्ण नहीं है सनातन कृष्ण और विष्णु में कोई अंतर नहीं
00:36:37:24 है यह अब्राह्मिक कृष्ण है अब्राह्मिक दोबारा से एक तरफ मैं आपका ध्यान लाना चाहूंगा जो भी देख रहे हैं कि जब हम शास्त्र ग्रंथ देने वाले आचार्यों पर ही उंगली उठा रहे हैं कि व्यास जी ने ही जो अन्य शास्त्र लिखे हैं वो झूठ लिखे हैं भ्रम फैलाया है तो अप्रत्यक्ष रूप से हमने अपने पूरे सनातन धर्म को ही नष्ट करने का इंतजाम स्वयं ही कर दिया क्यों कि सवाल वही है जो झूठ बोल सकता है वह आपसे झूठ नहीं बोल रहा है यह कैसे पता आपको क्या झूठ बोलते समय वह यह बताएगा क्या कि मैं यहां पर आपसे झूठ बोल रहा हूं तो फिर उस झूठ का फायदा क्या रह गया औ चित क्या रह गया इसका अर्थ है कि वह आपसे भी जब बोलेगा तो इस तरह से ही बोलेगा कि आपको उसकी बात पर विश्वास होना चाहिए तो यदि आप खुद य स्वीकार कर रहे हैं कि भगवान वेदव्यास जी भ्रम फैला रहे हैं दूसरे शास्त्रों को दे करर के तो आप अपने शास्त्रों को अपने धर्म को सनातन धर्म को भ्रामक विचारधारा वाले जो किताबें हैं उनके साथ में खड़ा कर दे रहे हैं क्यों वहां कहा जा रहा है कि जो कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है दो 106 वह अपनी कही हुई बातों को बदल देता है व वो भटका है लोगों को भ्रम फैलाता है
00:37:53:16 तो अगर आप अपने ग्रंथों को लिखने वाले को देने वाले को स्त्रोत को भ्रम फैलाने वाला सिद्ध करेंगे तो आपसे बड़ा शत्रु कौन है सनातन का इसीलिए इसीलिए मैं आप लोगों के ऊपर वीडियो बनाता हूं इसीलिए क्योंकि हमारा
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→ Used in: A · Live judge ने बोला हैं भगवानो का अपमान करो रामपाल at 1:31:43 ↗
00:38:15:00 शत्रु सामने शस्त्र लिए खड़ा हुआ कोई अजनबी नहीं है हमारा असली शत्रु पीछे शास्त्र लिए खड़ा हुआ कोई परिचित व्यक्ति है
⬜ Not used yet · 00:38:24:24 – 00:46:47:00 (8:22)
00:38:24:24 अब इन शास्त्रोक्त तथ्य जो है तार्किक जो तथ्य हैं इनसे बचने के लिए क्या कहा जाता है भाई हम वैष्णव वसली ऐसा कहते हैं वैष्णव परंपरा में हरि हर भेद आपको देखने को मिलेगा स्मार्ट परंपरा में य देखने को नहीं मिलेगा पहली बात तो स्थिति लागू हो रही है तो सनातन सिद्धांत नहीं आपके द्वारा दिया जाने वाला तो खुद को सनातनी कहना बंद कर दो क्योंकि जो किसी भी देश काल परिस्थिति से प्रभावित ना हो यहां पर जो आपके सिद्धांत आ रहे हैं वह आपकी रुचि के कारण आ रहे हैं सनातन सिद्धांत नहीं आ रहे आपसे तो अगर आप वैष्णव की आड़ में अगर इन चीजों से बचने का प्रयास करोगे तो स्वयं को सनातनी कहना बंद करो सनातन धर्म नहीं है वो उसका जो भी नाम रखो क्योंकि क्या सनातन का क्या वैष्णव का अर्थ यह है कि वेदों का विरोध करने वाला जबकि पद्म पुराण के उत्तरखंड के 68 अध्याय के आठवें श्लोक में कहा जा रहा है कि वैष्णव कौन है वैष्णव कौन है वेदा आदि शास्त्रों का अनुगमन करने वाला उनमें लगा रहने वाला वैष्णव है कहां तक कैसे भागोगे आपके ही शास्त्र जो आपके द्वारा स्वीकार है उनसे प्रमाण दूंगा मैं वेद जिन कर्मों का विधान करते हैं वही धर्म है और जिन कर्मों का निषेध करते हैं वही अधर्म
00:39:40:25 है कौन कह रहा है भागवत पुराण भागवत पुराण छठवां स्कं पहला अध्याय 4 वां श्लोक जो मनुष्य शास्त्रों के उपदेश के अनुरूप नहीं चलता है और केवल भक्ति मात्र से ही जी रहा है ऐसी मनम भक्ति करने वालों से भगवान कभी प्रसन्न नहीं होते वैष्णव पुराण नारद पुराण मैं नहीं कह रहा हूं भैया नारद पुराण कह रहे हैं मना कर दो जो धर्म साधन से रहित है उसे यमदूत खींच कर ले जाते हैं नारद [संगीत]
00:40:18:14 पुराण धर्म और अधर्म के विषय में एक मात्र शास्त्र ही प्रमाण है शास्त्र भगवत गीता 16 24 अच्छा क्या वैष्णव का अर्थ स्तुति स्मृति शास्त्रों का को वेद विरोधी सिद्ध करने वाला है पहला तो यह हो गया क्या वैष्णव का अर्थ यह है कि जो वेद वेदों का विरोध करे शास्त्रों का विरोध करे वह वैष्णव है तो आपकी चीजों से व सिद्ध हो रहा है और अगर और आगे देखें तो क्या वैष्णव का अर्थ स्मृति शास्त्रों को वेद विरुद्ध सिद्ध करने वाला है क्योंकि आप स्मृति शास्त्रों का ऐसा अर्थ ले रहे हैं जो वेदों के विरोध में है तो आप खुद सिद्ध कर रहे हैं कि जिन शास्त्रों का आप अनुगमन कर रहे हैं व वेदा दि शास्त्र सम्मत धर्म नहीं देते हैं इसका मतलब उन्हें सनातन शास्त्र नहीं कहा जा सकता किसी देश काल परिस्थिति में उत्पन्न होने वाले शास्त्र बन के रह जाएंगे वो आप खुद स्मृतियों की अवमानना कर रहे हैं उनका ऐसा अर्थ निकाल कर के जो कि वेदों के विरुद्ध है क्या वैष्णव का अर्थ जितने भी जो आचार्य गण है व्यास जी हैं नारद जी हैं सुखदेव जी हैं इनकी एक बात को मानने वाला और दूसरी बात को ठुकरा देने वाला है शिव जी की एक बात को मानने वाला दूसरी बात
00:41:33:16 को ठुकरा देने वाला है यही होता है वैष्णव क्या वैष्णव का अर्थ राम को भ्रामक सिद्ध करने वाला है अधर्मी सिद्ध करने वाला है असत्य वादी सिद्ध करने वाला है वैष्णव का अर्थ क्या वैष्णव का अर्थ गुरु विरोधी है अपने गुरु का विरोध करते हुए वह शिवजी ने जो कह दिया उसको मानना है तो वैष्णव का अर्थ आपने क्याक सिद्ध किया वेद विरोधी स्मृति शास्त्रों को वेद विरोधी सिद्ध करने वाला जो प्रामाणिक आचार्य गण नारद व्यास आदि उनकी एक बात को मानने वाला दूसरी बात को ना मानने वाला राम को भ्रामक सिद्ध करने वाला अपने ही गुरु का परंपरा अपनी ही परंपरा के गुरु का विरोध करने वाला अथवा क्या विष्णु से भिन्न किसी और को श्रेष्ठ मानने वाला वैष्णव है जबकि पद्म पुराण में तो लिखा हुआ है कि वैष्णव कौन है जो विष्णु को विष्णु की भक्ति करता है विष्णु को श्रेष्ठ मानता है वह वैष्णव है तो आप तो कृष्ण को विष्णु से अलग मानते हो और फिर उसमें भी कृष्ण की पूजा करते हो ऐसे कृष्ण की पूजा करते हो आप जो विष्णु से अलग है और विष्णु से श्रेष्ठ है तो फिर आप वैष्णव कैसे हुए आप तो क्राइस्ट नव
00:42:48:20 है ना क्राइस्ट नव क्यों क्योंकि आप कृष्ण को मानते हो कृष्ण और क्राइस्ट में कोई अंतर नहीं है आप ही ने लिखा है आत्म साक्षात्कार का विज्ञान में कि जो बाइबल का जो ईश्वर है मैं जीसस क्राइस्ट की बात नहीं कर रहा हूं बाइबल का जो ईश्वर है वो और कृष्ण एक है तो आपका नाम तो वैष्णव होने की बजाय कृष्णव रख लो क्यों वैष्णव के पीछे पड़े हो विष्णु भगवान तो पूर्ण है ही नहीं ना मगर उनके पीछे नहीं पड़ोगे तो अपने आप को परंपरा प्राप्त कैसे सिद्ध करेंगे आप इसलिए विष्णु को पकड़ के रखना है और फिर मजाक भी उड़ाना है उनका और अंततः क्या वैष्णव का अर्थ भ्रम फैलाने वाला है क्योंकि आप अपनी भगवत गीता के द्वारा भ्रम ही तो फैला रहे हैं आपके ही अनुसार क्योंकि विष्णु के अलावा जहां भी जिस किसी की भक्ति बताई जा रही है वह भ्रम है आपके अनुसार हम नहीं मानते मगर आपने स्वयं अपनी भगवत गीता में विष्णु से अलग करते हुए कृष्ण की भक्ति को श्रेष्ठ बताया है तो फिर आप भी ब्रम फैलाने वाले सिद्ध हो गए तो क्या वैष्णव का अर्थ य होता है भ्रम फैलाने वाला और अंततः आप अगर वैष्णव के नाम पर इन चीजों से बचना चाह रहे हैं तो आप मुझे यह बताइए कि जब आप शिक्षा देते हैं जब आप मंदिर खोलते हैं तो वहां पर लिखते हैं कि हम यहां वैदिक शिक्षा
00:44:03:21 नहीं देते वेद सवत शिक्षा नहीं देते सनातनी शिक्षा नहीं देते हम यहां पर जो तथाकथित हमारे द्वारा प्रतिपादित होने वाला हमारे द्वारा सिद्ध होने वाला जो वैष्णव धर्म है उसकी शिक्षा देते हैं वह सनातन धर्म नहीं है केवल नाम उसका वैष्णव है ऐसा शब्द है उसका नाम जो कि सनातन धर्म ग्रंथों में भी मिलता है उसका हम उपयोग मात्र करते हैं हम शिक्षा तो यहां पर सनातन विरुद्ध देते हैं वेद विरुद्ध देते आप ऐसा बोर्ड लगाइए देखिएगा फिर कितने लोग मृदंग में आते हैं आपके पास तो मैं आप लोगों से निवेदन करूंगा शिव और विष्णु के नाम पर इस तरह का विप्लव समाज में फैलाना बंद करें और एक धरातल पर लाने के लिए समाज को प्रयास करें इस तरह का वित वाद ना फैलाए मिथ्या प्रचार ना करें अपने ही शास्त्रों का खंडन ना करें अपने ही सिद्धांतों का खंडन ना करें धर्म और अधर्म की एक मूलभूत पहचान और है जो धर्म होता है वह सनातन है स्थाई रहता है और जो अधर्म होता है वह चेंज होता है आप जो बात खुद कहोगे अगर वह अधर्म है तो खुद ही अपनी बात को आप चेंज करोगे और वह आप कर रहे हो आप कहोगे कि भाई शिव जी ने ऐसा कहा हम शिव जी की बात को मानेंगे
00:45:18:22 फिर दूसरी जगह शिव जी की बात को नहीं मानोगे आप कहोगे हम वैष्णव शास्त्र को मानेंगे फिर वैष्णव शास्त्र को नहीं मानेंगे अपने सिद्धांत को बचाने के लिए आप कहोगे कि विष्णु से भिन्न किसी भक्ति जो है ब्रम है फिर आप जो है आपको यह भी तोड़ना पड़ेगा और आपको कृष्ण की भक्ति को श्रेष्ठ करना पड़ेगा अगर कृष्ण और विष्णु एक है तो तो कृष्ण की भक्ति ठीक है आपके सिद्धांत के अनुसार कृष्ण कृष्ण भी पूर्ण ब्रह्म है शिव भी पूर्ण ब्रह्म है वस्तुतः एक ही ईश्वर स्वयं को पांच रूप प्रकट करते हैं ब्रह्मा विष्णु महे भगवती एवं गणेश कल्प भद से और भक्ति रस के आधार पर जो अनन्य का भाव प्रकट करने के निमित्त अलग-अलग शास्त्रों में भगवान के अलग-अलग रूपों को श्रेष्ठ बताया गया है और बाकी सबको उनके अधीन बताया गया है तो इस तरह से अगर लेंगे सभी शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा मत्स पुराण के अनुसार 145 अध्याय 5 शलोक तब तो ठीक है मगर अन में अगर भेद करने लेंगे तो शति शास्त्रों का विरोध हो जाएगा राम का विरोध हो जाएगा तो ऐसा ना करें आशा करता हूं यह तामसिक वाले प्रश्न के अनुसार और भगवान शिव की भक्ति या विष्णु से भिन्न
00:46:34:01 किसी की भक्ति भ्रामक है इस प्रश्न के अनुसार फैलने वाली जो मिथ्या है जो कंफ्यूजन है उन सबका इस वीडियो के द्वारा निराकरण हो जाएगा जय श्री राम [संगीत]
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शिव पुराण तामसिक है | हरि हर में भेद #iskcon #aryasamaj
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