⬜ Not used yet · 00:00:00:09 – 00:04:05:25 (4:06)
00:00:00:09 जी कुशाल जी जय श्री राम तो एक विषय है जिसके बारे में कई अंधविश्वास फैले हुए हैं जैसे कि भगवान या तो साकार है या फिर निराकार है और या फिर कई बार कुछ मत और संप्रदाय ऐसे हैं जो भगवान
00:00:42:12 को यह नहीं मानते कि व अवतार ले सकते हैं तो इस प्रकार से अगर हम यह कहते हैं कि भगवान शि निराकार है तो हम भगवान को सीमित कर रहे हैं अगर हम एक कहते हैं भगवान से निराकार है तो हम भगवान को सीमित ही कर रहे हैं तो अगर हम यह मानते हैं कि इस संसार में कोई ईश्वर है तो हमें य मानना पड़ेगा कि वो ईश्वर कस्टमाइज ईश्वर नहीं होना चाहिए वो ईश्वर सर्वशक्तिमान होना चाहिए और कहीं ना कहीं वैदिक विचारधारा सनातन धर्म की विचारधारा और अन्य जितनी भी अवैध विचारधारा उनके में जो बड़ा और सबसे इंपॉर्टेंट अंतर है वो यही है कि सनातन धर्म के द्वारा स्थापित होने वाला स्पित होने वाला जो ईश्वर है सनातन धर्म ग्रंथों के द्वारा जो स्थापित होने वाला जो ईश्वर है वो पूर्ण
00:01:51:14 है अभी कुछ इसी पे जी मैं एक बात कहना चाहूंगा कि ईश्वर तो वही है जो कुछ भी कर सकता है जो कि किसी भी नियमों के नीचे ना आने वाला बल्कि सारे नियमों को बनाने वाला स सर्व नियामक होता है तो अगर हम यह कहे कि वह निराकार है या फिर हम यह कहे कि वह रो नहीं आपकी आपकी आवाज आपकी आवाज आपकी आवाज ब्रेक हो रही
00:02:40:27 है जी जो सनातन वेदों द्वारा ईश्वर है वह कुछ भी कर सकता है उसके लिए हम यह नहीं कह सकते कि वोह सिर्फ निराकार है जी तब तो हम उसे वहां पर बाधित कर दे रहे हैं ना ईश्वर तो वो है जो जिसने सारे नियमों को बनाया है वह सर्व नियामक है जी बस यही बात तो ईश्वर के बारे में हम यह बात नहीं कह सकते कि ही कांट डू इट बस यही बात हम जनजन तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं और इसको अगर सरलतम भाव में अगर हम कहे तो इस संसार में यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जो स्वयं को पशुओं से भिन्न मनुष्य समझता है तो इसका अर्थ है कि वह यह मानता है कि संसार में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है जिसे प्राप्त करने के लिए उसने उन मर्यादाओं का आलंबन लिया हुआ है जिसके कारण वह पशुओं से भिन्न कहलाता है फ इसी में क्रमानुसार आगे क्या आता है इसी में
00:03:56:01 क्रमानुसार आगे आएगी अगली पंक्ति जो यदि इस सार में कोई ऐसा व्यक्ति है जो यह मानता है कि इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान
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→ Used in: A · Video Similarity between ISKCON Arya Samaj and Rampal Panth | ईश्वर को बाधित क्यों बता... at 7:06 ↗
00:04:05:25 ईश्वर है तो इसका अर्थ है कि वह यह मानता है कि वह वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को मानता है और
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00:04:15:25 फिर इसी में क्रमानुसार अगली पंक्ति जो आएगी वह यह आएगी यदि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति है जो यह मानता है कि वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो इसका अर्थ है कि प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष किसी भी रूप से वह आदि शंकराचार्य के सिद्धांत को मानता है भगवान आदि शंकराचार्य के सिद्धांत को व ग्रहण करता है इसका अर्थ है कि वह वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को यदि सर्वशक्तिमान मान रहा है तो इसका अर्थ है उसने वेदों का वह अर्थ ले रखा है उसने उपनिषदों का वह अर्थ ले रखा है उसने शति शास्त्रों का स्मृति शास्त्रों का वो अर्थ ले रखा है जो आदि शंकर आचार्य जी के द्वारा दिया गया
00:05:05:00 है अब इसमें एक परेशानी आ जाती है कई बार अब इसमें एक परेशानी आ जाती है कई बार कि जब हम यह कह देते हैं ना कि ईश्वर अ सब कुछ कर सकता है वह रो भी सकता है वो नाच भी गा भी सकता है वह अच्छे से अच्छा और बुरे से बुरा काम कर सकता है तो इसमें कई बार लोग भ्रमित होने लगते हैं कि भाई यह क्या बात है बुरा काम कैसे तो पहली नंबर की जो बात है वो हमें यह ध्यान देना चाहिए यदि हम यह मान रहे हैं कि सृष्टि ईश्वर ने बनाई है तो बुराई भी ईश्वर के अंदर से ही आई ना इस दुनिया में अगर कुछ कहीं पर बुरा है खराब है छोटा है निम्न है तो वो आया कहां से उसका जन्म कहां से हुआ अगर कोई मान लीजिए विचारधारा ही केवल गंदी है क्रिया या किसी वस्तु विशेष का अस्तित्व उसको छोड़ दीजिए केवल कोई विचारधारा है जो गंदी है या अच्छी नहीं है तो वह विचारधारा इस दुनिया में उसका अस्तित्व कैसे है इसका अर्थ है कि उस वो भी ईश्वर के अंदर से आ रहा है तो इसका अर्थ है कि वह ईश्वर के अंदर थी पहले से तो कुल मिलाकर के बात यह
00:06:20:04 है कि इस संसार में अच्छे से अच्छी या बुरे से बुरी चीज का निर्माण करने वाला ईश्वर है इसी बात से सिद्ध होता है कि ईश्वर वो है जो कुछ भी कर सकता है और वैसे भी जब हम पीछे जाएंगे थ्योरी में कि मनुष्य की सत चित आनंद की चाह का विषय ईश्वर है तो अगर हम यह कहते सत चित आनंद की चाह तो कुल मिलाकर के अगर इस चाह को अगर इन शॉर्ट एक सरल शब्दों में कहे तो मनुष्य की चाह है सब कुछ कर सकने वाला बनने की तो उसकी चाह का विषय वही ईश्वर होगा जो सब कुछ कर सकता होगा फिर हम उसे निराकार और साकार में सीमित नहीं कर सकते इसलिए बृहद उपनिषद में दिया गया है कि ईश्वर के व्यक्तित्व के आयाम है यह ईश्वर का साकार होना या निराकार होना उसे हम सीमित नहीं कर सकते तो यह तो पहली बात हो गई अब दूसरी बात य आती है द्वैत और अद्वैत में भी यही वाला मामला है और इसके साथ ही साथ एक ज्ञान और भक्ति में भी यही वाला अंतर है इसको हम आगे वो कर लेंगे मगर फिलहाल हम यह
00:07:35:20 साकार और निराकार वाला जो चैप्टर चल रहा था हमारा उस पर अगर बात करें मैं अपने दर्शकों को कहूंगा जो भी इस समय वीडियो को देख रहे हैं कि वह अपने प्रश्न को कमेंट के माध्यम से लिखें हमें जो भी प्रासंगिक कमेंट हमें लगेगा तो हम उसको यहां पर ले लेंगे क्योंकि इस लाइव स्ट्रीम में में एक से ज्यादा लोगों के जवाइन करने का स्पेस नहीं है तो इसलिए जिसको भी लगता है कि वह जवाइन करना चाहता है तो वह अपना विषय जो है क्या सवाल है और सबसे ज्यादा हम प्राथमिकता देंगे जो वैचारिक मतभेद रखते हैं उनको हम प्राथमिकता अवश्य देंगे जो वैचारिक जो संतुष्ट नहीं है सिद्धांतों से जिन सिद्धांतों का हम प्रचार प्रसार कर रहे हैं सनातन धर्म उत्थान के लिए तो वो कमेंट के माध्यम से अपना जो विषय है वह प्रस्तुत करें और जो विषय हमें प्रासंगिक दिखेगा तो हम उनको इधर यहां पर ले लेंगे इस बात को मैं कमेंट के माध्यम से लिख भी देता
00:08:58:06 हूं तो
00:15:51:26 यह बंता साहू वांट्स टू जॉइन इन दिस स्ट्रीम ठीक है अ साहू जी एक बार और ट्राई करिए साहू जी एक बार और ट्राई कर लीजिए आपका अभी अभी रिक्वेस्ट आई थी मगर मेरे क्लिक करने से पहले चली गई है तुम आ जाओ
00:16:39:12 तो हम लोग बात कर रहे थे साकार निराकार द्वैत और अद्वैत तो अब एक सबसे पहली बात तो यह आती है कि जब हम ईश्वर को बाधित नहीं करते हैं और यह कहते हैं कि ईश्वर वह है जो कुछ भी कर सकता है तो इसमें एक प्रॉब्लम ये आती है कि भाई ईश्वर वह है जो कुछ भी कर सकता है गलत भी कर सकता है तो फिर हम उसकी पूजा कैसे करें हमारे मन में उसके प्रति भाव कैसे आएंगे तो हम ईश्वर के उस रूप को उस रूप का उस रूप के प्रति भाव आते हैं हमारे मन में जो रूप हमें वेदों का प्रतिपादन कराते हैं जो रूप हमें धर्म का प्रतिपादन कराता है हम ईश्वर के संपूर्ण जो उसका रूप है उसके प्र उसका हम वो नहीं करते हैं उसके प्रति हमारे मन में भाव नहीं आते हैं हमारे मन में भाव आते हैं ईश्वर के उस रूप के प्रति उस उस उसका जो स्तर है उसके प्रति जो हमारे हमारे को हमारे द्वारा वेदों का प्रतिपादन कराए हमारी सहायता करे धर्म का पालन करने में धर्म की स्थापना करे हम ईश्वर के उस रूप का उस रूप की वंदना करते हैं रूप के प्रति हमारे मन में भक्ति भाव आता है ईश्वर तो सर्वव्यापक है मगर सर्वव्यापक
00:17:55:03 ईश्वर जब कुछ ऐसा करता है जो हमारे मन में जो हमारे मुक्ति मार्ग में अनुकूल होता है तो वह हमारे लिए आराध्य बन जाता है उसका वो रूप जिस प्रकार से गुरुदेव का उदाहरण था बिजली वाला कि बिजली जो है वह सर्वव्यापक है मगर उससे प्रेम में तब होता है जब वो प्रकाशित हो जाती है और वैसे भी प्यारा होना भी एक गुण है और अगर हम यह कहेंगे कि भाई हमें निर्गुण निराकार से प्रेम है तो प्रेम तो उसी को किया जा सकता है जो प्यारा हो और जब प्यारा है तो यह गुण हो गया इसको फिर हम यह नहीं कह सकते कि वो निर्गुण निराकार है
00:18:44:06 खैर जो 5:00 बजे स्टार्ट की थी तो उसमें काफी लोग जवाइन करने को बोल रहे थे मगर संभवतः अब उन लोगों को मालूम नहीं है कि स्ट्रीम दोबारा हो रही है इसके के बाद मैं एक वो जो पंक्ति अभी थोड़ी देर पहले बोली थी दोबारा से एक बार याद दिला दूं सभी लोगों के लिए है ये कि यदि कोई मनुष्य इस संसार में ऐसा है जो स्वयं को पशुओं से भिन्न समझता है तो उसे मानना पड़ेगा कि इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है जिसे प्राप्त करने के लिए उस लिए उसने उन मर्यादाओं का आलंबन लिया हुआ है जिस जिन मर्यादाओं के आलंबन से वो पशु से भिन्न बन जाता है ये सबसे पहला हमारा सिद्धांत और इसी में क्रमानुसार आगे यदि कोई मनुष्य ऐसा है जो यह मानता है कि इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान सत्ता करने वाला ईश्वर है तो उसे मानना पड़ेगा कि वह वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को मानता है और फिर अगेन इसी में क्रमानुसार आगे कि यदि इस यदि कोई मनुष्य ऐसा है
00:19:59:19 जो वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानता है तो उसे मानना पड़ेगा कि वह वेदों के उस अर्थ को मानना है मानता है जो शंकराचार्य जी द्वारा प्राप्त है आदि शंकराचार्य जी द्वारा प्राप्त है उसमें परंपरा अनुसार हमें जो हमारे अमदावाद है उनके माध्यम से जो प्राप्त होता है जो अर्थ वेदों का उसी अर्थ को मानता है अगर इस अर्थ के विरुद्ध हम कहीं भी जाते हैं तो हम कहीं ना कहीं ईश्वर को बाधित कर देंगे अब एक बात य आ जाती कि द्वैत और अद्वैत तो इसके बारे में बता दूं यहां पर द्वैत व्यवहार का विषय है और अद्वैत प्राप्त व्य है अद्वैत जब यह बताया जा रहा है कि भाई एट द एंड आप और ईश्वर एक हो जाओगे तो यह नहीं कहा जा रहा कि आज आप मान लो इस स्थिति को कि आप और ईश्वर एक हो जाओगे यह बड़ी प्रॉब्लम आती है लोगों को यह नहीं कहा जा रहा आज तो ईश्वर की अपने से भिन्न उसको रखते हुए ही आपको व्यवहार करना है प्राप्त आपको होगा वो प्राप्ति का विषय है आपको प्राप्त वो होगा व्यवहार
00:21:14:28 आपको द्वैत वाला करना है और प्राप्त आपको अद्वैत की होगी तो आदि शंकराचार्य जी अगर यह कहते होते कि भाई किसी आप और ईश्वर एक हो तो वो ये क्यों कहते कि ईश्वर की मूर्ति बना कर के पूजा करो वो जगन्नाथ मंदिर का पुनरुत्थान क्यों करते मूर्ति भंजक के समय में उन्होंने कितने सारे मंदिरों का पुनरुत्थान किया जीण उद्धार किया जहां पर मूर्तियों को किया गया था तो इसलिए हमें य ध्यान रखना है कि जो अद्वैत है वह व्यवहार का विषय नहीं है अद्वैत प्राप्ति का विषय है और व्यवहार का विषय है द्वैत तो इसमें पूर्णतया उनके सिद्धांत को अद्वैतवाद कह दिया गया है मगर अद्वैतवाद में द्वैतवाद का सामंजस्य उपलब्ध है इसी बात को जितने हमारे आचार्य गण है इसी बात को घुमा फिरा करके बाद में वह एक्सप्लोर करते आए इसी अर्थ को जैसे श्री राम आचार्य जी है उ उन्होंने भी इसी तरीके से माना है सृष्टि को तो एक अगर आप पिलर बनाएंगे एक पिलर तो उसमें से चलिए छोड़ दीजिए अगर आप यह मानते हैं
00:22:30:26 कि शुद्ध द्वैत विशिष्टा द्वैत तो यह सभी अलग-अलग सिद्धांत है जो हमारे आचार्य गणों द्वारा दिए गए हैं और इन सिद्धांतों के आधार पर वही बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है जो बात शंकराचार्य जी ने अपने सिद्धांत में कही जैसे श्री मधवा चार्य जी गीता के भाष्य में लिखते हैं कि अंत में जो जीव है भगवान विष्णु के शरीर में रहता है तो अंततः उसको भी तो अद्वैत की ही प्राप्ति हुई कहां रह रहा है वह भगवान विष्णु के शरीर में तो ऐसा तो रहा नहीं कि भगवान विष्णु अलग और जीव अलग तो इसी प्रकार से सबका घुमा फिरा कर के दूसरे शब्दों में यह ऐसा भी होता है कि जैसे मान लीजिए शंकराचार्य जी के भाष्य को अब जैसे से समय बदलता है तो लोगों का जो व्यवहारिक भाषा है लोगों की वह बदलती जाती है कई ऐसे अर्थ होते हैं जो उन्हीं शब्दों के पहले नहीं हुआ करते थे बाद में हो जाते हैं जैसे कि टीवी का आविष्कार जब हुआ टेलीविजन कहा गया दूर के दर्शन को तो यह शब्द आ गया इसके
00:23:45:27 बाद कई दिनों बाद टीवी आया तो अब टीवी एक अर्थ बन गया टेलीविजन का दूर के दर्शन का एक अर्थ बन गया टीवी जबक टीवी एक यंत्र है जिसके दूर के दर्शन किए जाते हैं और टेलीविजन दूर का दृश्य तो इस प्रकार से है जैसे जैसे कालांतर में क्या होता है कि जो व्यवहारिक भाषा है वह बदलती जाती है जिसके कारण बार-बार उसी बात को उस समय की जो प्रासंगिक विधि होती है भा भाषिक जो ज्ञान होता है स्तर होता है व्यक्ति का उसके अनुसार लिखना पड़ता है तो इसको शाब्दिक भेद से हर आचार्य ने जो लिखा है दर्शन को वह शंकराचार्य जी के ही मत का समर्थन प्रस्तुत करता है और इसी में एक यह बात भी आती है कि अगर यह सभी आचार्य एक साथ होते एक ही समय पर तो इस बा इस तरह का जो वैचारिक मतभेद फैल गया आचार्यों के नाम पर कि भाई रामाचार्य परंपरा या शंकराचार्य परंपरा या निबार का तो यह वाला होता ही नहीं मधवा चार्य परंपरा ये जो वैचारिक मतभेद है संभवतः यह होता ही नहीं क्योंकि वहां पर जब किसी को कोई प्रॉब्लम आती शंकराचार्य जी की किसी बात पर भगवान आदि शंकराचार्य जी
00:25:01:01 की किसी बात पर तो वहां क्या होता कि वह शंका उनकी दूर हो जाती मगर हुआ क्या आदि शंकराचार्य जी जब चले गए उसके बाद दूसरे आचार्य आए फिर उसके बाद तीसरे आचार्य आए तो इस तरीके से हुआ है कि वहां पर कोई भी बात करने का समय ही नहीं मिला कि एक दूसरे के पक्ष को समझ सके आदि शंकराचार्य जी ने भी यह नहीं कहा कि आप अपनी पूजा करने लगो अह ब्रह्मास्मि अह ब्रह्मास्मि की स्थिति तक तुम्हें पहुंचना है कैसे कि मैं ब्रह्म नहीं हूं इस इस नियम का पालन करते हुए हमें उस नियम को प्राप्त करना है कि मैं ब्रह्म हूं यही है यही एक सबसे इसी तरह से साकार और निराकार भी है साकार व्यवहार का विषय है और जो निराकार है वह प्राप्ति का विषय है अब कई जगह वेदों में आप देखिए श्रुति शास्त्र उसमें यह श्लोक आता है कि वह जो व्यवहार में ना आने वाला है तो जो व्यवहार में नहीं आने वाला ईश्वर का रूप है जो उसको हम व्यवहार में कैसे ले आएंगे तो यह मेरा प्रश्न उनसे बनता है निराकार वादियों से जो जिसके लिए हम व्यवहार कर ही नहीं सकते उसके लिए हम भक्ति कैसे
00:26:16:03 कर सकते हैं उसके लिए हम प्रेम कैसे कर सकते हैं अगर हम प्रेम कर रहे हैं तो इसका मतलब है हम ईश्वर के उस रूप के लिए नहीं कर रहे हैं जो व्यवहार में ना आ सके तो तो ये यही एक दुविधा ऐसी है अच्छा अब हम थोड़ी देर के लिए सोच लेते हैं कि हम अद्वैत की स्थिति को नहीं मानते कि जो एट दी एंड व्यक्ति को अद्वैत की स्थिति प्राप्त होगी हम थोड़ी देर नहीं मानते हैं कि व्यक्ति अंत में भगवान से जाकर के मिल जाएगा ठीक है तो अगर अद्वैत की स्थिति हम नहीं मानते हैं तो व्यक्ति की जो सत चित आनंद की चा है क्या वो पूरी हो रही है असतो मा सद्गमय तमस ज्योतिर्गमय अमृतम गमाया क्या ये पूरी हो रही है अंततः तो वो वो परम स्वतंत्र नहीं बना ना वो परम स्वतंत्र नहीं बना और दूसरी बात व्यवहारिक दुनिया में देखें तो उसको चाहिए एक ईश्वर तो जो ईश्वर सर्वव्यापक नहीं है वो ईश्वर फिर मनुष्य की चाह का विषय नहीं हो सकता तो कान को ऐसे पकड़ लीजिए ऐसे पकड़ लीजिए बात कुल मिलाकर के यही माननी पड़ेगी कि अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है
00:27:31:20 तो हमें अद्वैत जिसमें कि द्वैत का सामंजस्य है उस सिद्धांत को अपनाना पड़ेगा इसी सामंजस्य को विशिष्टा दैत में भी लिखा गया है इसी सामंजस्य को शुद्ध द्वैत में लिखा गया है और द्वैता दैत में भी लिखा गया है हां मधवा चार्य जी ने साफसाफ कहा जरूर कि मैं विरोध कर रहा हूं मगर मानना तो उन्हें भी पड़ा एक जगह आकर के अद्वैत की स्थिति को अब दिक्कत यह आती है कि यह अद्वैत नाम आते ही व्यक्ति को एक वह हो जाती है अरे हम अपने आप को भगवान नहीं मानेंगे आपको मानना नहीं तो एक तो यह बात है अब मुझे मैसेजेस
00:28:17:09 अच्छा कई सारे आ गए हैं जो भी महानुभाव आई वांट टू जॉइन जी हम ऐसा करते हैं यह विनीता साहू है जो जवाइन करना चाहती हैं जी लेकिन उससे पहले मेरा एक प्रश्न है जी जी बताइए मेरा प्रश्न यह है कि बहुत लोग य पूछते हैं कि हम चलिए मान लेते हैं हम अधत की स्थिति को हम प्राप्त होंगे लेकिन उस स्थिति तक हम कैसे पहुंचे क्योंकि द्वैत द्वैत के नियमों का निर्वाह करके द्वैत के नियमों का निर्वाह करके द्वैत की स्थिति का निर्वाह करके अब भेद की स्थिति का निर्वाह करके अभेद तक पहुंचना है इसको ऐसे भी मान सकते हैं जैसे पृथ्वी वस्तुतः गोल है मगर हम पृथ्वी के साथ जो व्यवहार करते हैं कि वो उस दिशा में है हमें उधर जाना है पूर्व में जाना है ईस्ट में जाना है वेस्ट में जाना है तो हम जो व्यवहार जो हमारा होता है के साथ वो हमारा होता है कि जो पृथ्वी है वह चपटी है
00:29:32:21 व्यवहार के अनुसार हमारी पृथ्वी हमारे लिए चपटी है वस्तुतः क्या है गोल तो व्यवहार उसी तरीके से हमारा द्वैत का होना चाहिए और वस्तुत हमें प्राप्त क्या होगा अद्वैत अद्वैत अब इसमें हम यह मानने लगे कि भाई भगवान जो है उनका जो रूप है वो माया है तो यह सब अपने मन को परेशान करने वाली बातें हैं ठीक है मैं थोड़ी देर उनको ले लेता हूं एक विनीता साहू जी हैं जो आना चाह रही है इस पर बिल्कुल बिल्कुल मैं फिर लीव कर देता हूं हां आप लीव कर दीजिए जय श्री राम शिवांश जी विनीता जी आप लिंक को टच करके ट्राई करिए जवाइन करने के
00:30:26:07 लिए नीता जी तुम जाना नहीं है अभी रुको विनीता साहू आप देख रही हैं तो जुड़ जाइए कृपया
00:31:17:00 करके खैर तकनीकी खराब हों के कारण इस लाइव डिबेट को बाद में डिलीट ही कर दिया जाएगा चैनल से [संगीत] क्योंकि विनीता जी आप सुन पा रही हैं तो जवाइन कर लीजिए
00:32:09:14 विनीता साहू जी जी दोबारा एक बार और करिए अभी मैंने हा अच्छा आप विनीता साहू मैंने आपका नाम देखा था जय श्री राम जय सीताराम जी कैसे हैं आप आपका यब चैनल कुछ महीने पहले मैंने डिस्कवर किया आप बहुत अच्छा कंटेंट बनाते हैं जी जगतगुरु पूरी पीठा ईश्वर का जो मैसेज है सनातन हिंदुओ के प्रति आप उसको फैला रहे हैं वो देखकर बहुत अच्छा लगा क्योंकि बहुत ऐसे कम लोग है जैसा प्रसार प्रचार करते हैं तो आपका य चैनल देखा तो बहुत अच्छा लगा कि आप कर रहे हैं जी जी बहुत-बहुत आभार और कम लोग नहीं है काफी लोग हैं अपने अपने स्तर पर सब तरह के कार्य हो रहे हैं बस हो सकता है कि मैं दिख ज्यादा रहा हूं ऐसा हो सकता है मगर नहीं बहुत हमारे गुरु भाई है और नहीं नहीं बहुत है मुझे बहुत परिचित है मेरे भीय प बहुत कम है तो आप हैय यह संभव
00:33:24:15 हो सकता है य संभव हो सकता है जी मेरा एक प्रश्न था जी बताइए मैंने जगतगुरु की बहुत सार प्रवचन सुने तो जो मुझे पता चला है कि जितने भी भारत में संप्रदाय वगैरह पूर्व काल से आए हुए हैं उनका उद्देश्य एक ही था कि अभी के समय भारत में जहां जहां मलेच्छ का आक्रमण हुआ है जहां पर वेद आचरण शिता वहा पर वेदाच का प्रसार प्रचार और ज्ञान भक्ति वैराग्य का प्रसार करना यह मूल उद्देश्य था का और हम देखते हैं कि पहले के समय सबको पता था कि मूल तो धर्म है ही धर्मा आचरण है वो हर वर्ण के व्यक्ति को करना ही है तो पहले इस सिद्धांत के नाम पर इतना इतना ह डिबेट य सब होता नहीं था पहले है कि नहीं हम आज देखते आजकल कुछ नवीन सं हो जो जिनको कुछ आ तो है नहीं नहीं नहीं नहीं देखिए मैं आपसे विनती करूंगा कि अपनी बात को आप रखें
00:34:39:16 मगर थोड़ा सा एक मर्यादा का निर्वाह अवश्य करें क्योंकि गुरुदेव हमेशा एक बात कहते हैं कि दर्शन विज्ञान और व्यवहार को साध करके अपनी बात को रखिए तो हमारे व्यवहार में हमारे दर्शन में हमारे विज्ञान में सामंजस्य होना चाहिए और प्रभु श्री राम से ही देख ले प्रभु श्री राम ने देखिए कभी भी हीनता पूर्वक किसी के लिए बात नहीं की है तो थोड़ा सा मर्यादा का निर्वाह करें किसी के लिए भी ऐसा ऐसी बातें ना करें जो मतलब म अमर्यादित जैसी दिखे और सबसे अच्छी बात तो यह है कि आप अपने प्रश्न किसी भी विचारधारा के लिए पॉइंट आउट कर सकते हैं मगर निर्णायक बनते हुए जजमेंट ना दे ना ही हम लोग जजमेंट देने लायक है और ना ही हम इस ऐसी पोस्ट पर हैं तो वो जिनका कार्य है वो करेंगे हम केवल प्रश्न कर सकते हैं कि हमारे संशय का आप समाधान करिए आप ऐसा कह रहे हैं तो उस उस तरह से थोड़ा सा बातचीत को हम ले जाएंगे ठीक है जी जीमा नहीं नहीं क्षमा कोई बात नहीं मेरा प्रश्न था कि जी आज भी हम देखते हैं कि भारत में जितने संप्रदाय हैं वो सब शास्त्रों
00:35:54:22 को मानने वाले हैं और शास्त्र अनुसार भक्ति करते हैं भक्ति का प्रचार करते है पर हम देखते हैं आजकल जो जो संस्था आई हुई है जो जैसे मले को बाहर के लोग हो उनको दीक्षा दे देते हैं उनको गुरु बना देते हैं है कि नहीं और उसको भक्ति बोलते हैं और बहुत ू प्रचार प्रसार उनका हुआ है इन सब चीजों का क्या यह सही है मतलब भक्ति शास्त्र उचित होनी चाहिए कुछ भी करने से भक्ति सही होता है बात य है ना यहां पर समस्या यह आ जाती है कि उनको ऐसा लगता है कि वह शास्त्र सम्मति कर रहे हैं जो भी कर रहे हैं समस्या यह है तो उनको यह बताना उनको यह दिखाना पड़ेगा कि आप जो कर रहे हैं व शास्त्र में वर्णित नहीं है तब य तब य सिद्ध होगा कि वह शास्त्र सम्मत नहीं है अब बात आती है कि शास्त्र सम्मत नहीं है तो अब जब किसी को हम बताने जाएंगे तो वो जो स्थिति है ना बताने की वो स्थिति कभी बनती नहीं है कि कभी दो लोगों बैठ कर के बात हो और हम उनको या फिर वो भी इतने सकारात्मक उसके साथ आए कि अगर मुझे कुछ समझ में आया तो मैं मानूंगा जैसे मैं अभी
00:37:10:10 मंडन मिश्र जी का जो शास्त्रार्थ हुआ था मंडन मिश्र जी बहुत अच्छे प्रकांड विद्वान और वो ब्रह्मा जी का अवतार माने गए और मतलब उनकी जो धर्मपत्नी थी भारती जी तो उनको आना पड़ा था बीच में अन्यथा वह तो मान ही चुके थे अपनी हार स्वतः तो यह जो शास्त्रार्थ में हार मानने वाली बात है यह आजकल किसी का वह रहा ही नहीं है कि हम कोई और आक के हमें अगर प्रमाण देगा अगर हम ऐसा करेंगे या वह ऐसा कर देगा तो मैं यह बात मान लूंगा ना य बैठा हुआ है कि नहीं मेरे सामने कुछ भी कोई कर दे मुझे मानना वही है जो मैं मानता था सकारात्मक विचार लेकर के कोई नहीं आ रहा है मैं इस विचार के साथ चलता हूं मुझे तो पूरा इस बात का मतलब कंठस्थ हूं फिर भी मैं इस विचार के साथ चलता हूं कि आप जो है ईश्वर को बाधित और मोक्ष को परम स्वतंत्र ईश्वर को बाधित और मोक्ष को परम क्या कहते परतंत्र मत होने दो तो मैं आपके मत को स्वीकार कर लूंगा आप जो मत सिद्धांत कहेंगे मेरा मोक्ष परम स्वतंत्र होना चाहिए और मेरा जो ईश्वर है वह अवाद होना चाहिए अगर आप ऐसा ईश्वर
00:38:25:15 ऐसा मोक्ष मुझे दे तो आपका जो सिद्धांत है व मुझे स्वीकार है भाई मनुष्य का धर्म से यही संबंध है कि वह धर्म का पालन इसलिए करता है कि उसे दो चीजें प्राप्त होनी है परम स्वतंत्र मोक्ष और यहां व्यवहार में अवाद ईश्वर तो यह दोनों चीजें अगर गायब है तो फिर आपका वह सिद्धांत का किसी अन्य वजह से वह लिखा गया है वह एक बात अलग है किसी विशेष देश काल परिस्थिति वष मगर वह सिद्धांत मनुष्य के मोक्ष के लिए नहीं है मुक्ति के लिए नहीं है फिर वह सिद्धांत जहां पर परम स्वतंत्र मोक्ष नहीं है एट द एंड आप अधीन ही रहे ईश्वर से आलिंगन नहीं कर पाए और यहां व्यवहार में आपको ईश्वर भी ऐसा नहीं मिला जो सर्वशक्तिमान हो जो किसी भी नियम के नीचे ना आता हो अगर ऐसा ईश्वर आपको प्राप्त नहीं हुआ तो फिर जो आपने जो सिद्धांत लिखा है या बनाया है जो दिया है उस सिद्धांत का निर्वाह कोई क्यों करेगा ऐसे ही परत मोक्ष और अबाध बाद ईश्वर की आड़ में ही अधर्म पनपता है अधर्म कैसे पनपता है कि भाई सनातन शास्त्रों ने एक ऐसा ईश्वर प्रतिपादित किया जो कुछ भी कर सकता है जिसके
00:39:40:25 सामने कोई लिमिट नहीं लगाई जा सकती है हम किसी भी कारण से उसके सामने यह नहीं लिख सकते हैं कि ही कांट डू इट हम यह नहीं लिख सकते हैं अब क्या हुआ जब ऐसा ईश्वर मिल गया हमको वेदों से तो वेदों से ही को एक मर्यादा मिली कि इन मर्यादाओं का पालन करो यह आपकी बहन है इनसे विवाह मत करो यह आपकी फलाने हैं ये इस तरह से अमुक अमुक आपके रिश्तेदार हैं तो यह सब क्या मिल गई आपको मर्यादा अब किसी को प्रॉब्लम आ रही है इसी मर्यादा को निभाने में निर्वाह करने में तो अब वह क्या करेगा उसको एक नई मर्यादा की ग्रंथावली बनानी है नई मर्यादा देनी है संसार को अब वो नई मर्यादा कैसे दे अब वोह यह उसे यह कहना पड़ेगा कि भाई मेरे पास एक और ईश्वर है अब ईश्वर को डिफरेंट कैसे बनाए जो पहले वाला ईश्वर है उससे डिफरेंट कैसे बनाए तो वह तो सबका वह है उद्गम स्थल तो उससे डिफरेंट बनाने के लिए उसमें कहीं ना कहीं कट लगाना पड़ेगा उस ईश्वर में जब सर्वव्यापक ईश्वर है तो उसको बनाना पड़ेगा किसी विशेष देशकाल परिस्थिति में रहने वाला जब ऐसा ईश्वर है जिसका ना आदि है ना अंत है
00:40:56:00 तो तो फिर ऐसा ईश्वर बनाना पड़ेगा जिसका कोई आदि और अंत हो जिसमें कहीं बाध्यता आ रही हो तो मेरी किसी हमारी मेरी क्या मैं तो हूं ही कौन भगवत कृपा से मैं कुछ भी नहीं हूं बस हमारी हमारा प्रश्न जो है हमारा देखिए हमारा जो युद्ध है वह है अधर्म से और हमारा जो प्रश्न है वोह उन सारी विचारधाराओं से है जो ईश्वर को बाधित करती है ईश्वर को बाधित मत करो हम आपके सिद्धांतों को स्वीकार लेंगे हो जाएंगे जो हमारा मोक्ष है उसे आप परतंत्र मोक्ष मत बनाओ परम स्वतंत्र मोक्ष बना दो हम आपके लिए नतमस्तक हो जाएंगे क्योंकि धर्म का आलंबन तो इसीलिए ले रहे हैं ना हम क्योंकि हमें परम स्वतंत्र मुक्त चाहिए हमें य व्यवहार में सर्वशक्तिमान ईश्वर चाहिए तो आप जब हमें वह नहीं दे रहे हो तो हम आपके सिद्धांत को कैसे अपना ले अब कैच यहां पर यह है कि जब भी कोई ऐसा सिद्धांत दे देगा जिसमें कि मोक्ष परम स्वतंत्र हो हो जब भी कोई ऐसा सिद्धांत दे देगा जिसमें कि मोक्ष परम स्वतंत्र हो और जय श्री कृष्ण आदित्य वशिष्ठ जी जय श्री कृष्ण हर हर महादेव तो जब भी कोई ऐसा सिद्धांत
00:42:11:09 दे देगा जो जिसमें कि मोक्ष जो है परम स्वतंत्र हो और ईश्वर जो है वह सर्वशक्तिमान हो तो वह जाने अनजाने में वेदों का और तदा अनुसार वेदों का जो अर्थ भगवान आदि शंकराचार्य ने दिया है वो वही अर्थ होगा और मुझे उसे स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं होगी तो यहां जो मानवता और पशुता धर्म और अधर्म मर्यादा और अमरदा की जो य लड़ाई है इसमें सिर्फ यही है कि यह जो पक्ष है धर्म वाला यह पक्ष देता है सर्वशक्तिमान ईश्वर यह पक्ष देता है परम स्वतंत्र मोक्ष और यह जो पक्ष है यह पक्ष देता है बाद श्वर और परतंत्र मोक्ष एट द एंड मैं वहां रहूंगा मगर मैं प्रकृति को कंट्रोल करने वाला नहीं बन पाऊंगा अगर मैं किसी विशेष स्वर्ग नरक ऐसी जगह जाकर के रह रहा हूं तो भी मैं प्रकृति को कंट्रोल करने वाला नहीं बन पाऊंगा क्योंकि प्रकृति को कंट्रोल करने वाले तो ईश्वर है अच्छा मेरी चा कहां से आरंभ हुई थी असतो मा सद गम तमसो मा ज्योतिर्मया यह मेरी चा है मेरी चा है सत
00:43:26:13 चित आनंद की चाह कि मैं इस पूरे भौतिक संसार को कंट्रोल करने वाला बन जाऊं यह चाह पूरी हो रही है क्या अन्य सिद्धांतों में नहीं हो रही है कि मैं भाई आंधी ला दूं मैं पहाड़ों को उखाड़ के फेंक दूं मैं ऐसा नहीं हो पा रहा हूं तो इसलिए जब भी कोई ऐसा सिद्धांत मुझे मिलेगा जो मुझे परम स्वतंत्र मोक्ष दे दे यह सत चितता आनंद की चाह को कंप्लीट करने की बात कहे और सच्चितानंद की चाह का विषय जो सर्वशक्तिमान ईश्वर है वो मुझे प्राप्त होगा जहां से जिस सिद्धांत से वो सिद्धांत मेरा अपना है मेरी कोई किसी जो भी ये संस्था विशेष है जैसे कि स्कोन हो गई या अन्य हो गए ब्रह्म कुमारी हो गए पर्टिकुलर उनकी किताबों में उनके ग्रंथों में जो जगह जगह पर कहीं कहीं पर वेद विरुद्ध और भ्रामक चीजें हैं मेरी केवल उन पर प्रश्न होता है और उन्हीं को परिवर्तित करने के लिए प्रयासरत हूं क्योंकि आज के टाइम में सबसे बड़ा खतरा होता है गुरुदेव भी कहते हैं व्यास गद्दी का शोधन जब हमारा सोर्स ऑफ नॉलेज सोर्स ऑफ इंफॉर्मेशन ही गंदा रहेगा बिगड़ा हुआ रहेगा तो फिर हम कहां से कुछ कर पाएंगे हमारा व जब तक हमारे विचार
00:44:41:20 सही नहीं होंगे हमारा व्यवहार कहां से सही हो जाएगा तो अब ये जो बस ये जो द्वैत अद्वैत निराकार साकार की जो लड़ाई है इसमें लोग यह नहीं जानते हैं और जानते इसलिए नहीं क्योंकि वो सही गुरु तक पहुंचते नहीं है जो सही प्रमाणिक आचार्य गण है उन तक पहुंचते नहीं है इसलिए द्वैत अद्वैत की लड़ाई में पड़े रहते हैं साकार निराकार की लड़ाई में पड़े रहते हैं शंकराचार्य जी ने भगवान आदि शंकराचार्य जी ने द्वैत को ठुकराया नहीं है अद्वैत उन्होंने बताया आपकी प्राप्ति की स्थिति है आपका प्राप्त है अद्वैत परमार्थ है अद्वैत आपका व्यवहार द्वैत है द्वैत के मार्ग पर ही चलना है कृष्ण की भक्ति ही करनी है उन्होंने बताया कृष्ण की भक्ति करिए राम की भक्ति करिए शिव की भक्ति करिए कितने सारे तो उन्होंने स्त्रोत लिखे हैं तो उन्होंने भक्ति ही बताई है कि आप उसकी भक्ति करोगे तब आपकी ऐसी स्थिति होगी कि आप अद्वैत को प्राप्त कर
00:45:41:14 लोगे ठीक है तो मुझे लगता है और कोई भी जुड़ना चाहता है क्या देख ले कोई और जुड़ना नहीं चाहता है असल में हुआ क्या था हमने लाइव स्ट्रीम रखी थी 5:00 बजे की और कुछ टेक्निक हां जी मैं आया था मैं उसम आया था पर वो 10 मिनट बाद टेक्निकल इशू रहे है क्या कि हमको दिन भर में व्यस्तता काफी रहती है आज भी एक विद्यालय में था कार्यक्रम तो व्यस्तता होने के कारण वह सही से व टेक्निकल उपलब्ध नहीं हो पाई तकनीकी चीजें मगर फिर भी एक सार्थक प्रयास लग रहा है मुझे आज का और
00:46:29:07 आपका नाम आपने आपका नाम आपने विनीता साहू डाला हुआ है यही नाम है आपका या कुछ और नाम है मेरे माता का नाम अच्छा अच्छा कंचन ओझा बहुत अच्छा जय श्री राम भैया पर आप एक और ध्यान सेल्फ हां उन दिया न पर दिया हुआ है हम बच्चों को सिखाते भी हैं हम अपने वीडियोस डालेंगे आपको एक
00:47:15:09 मिनट जब हम विद्यालय में छात्र छात्राओं के बीच में होते हैं तो हम वहां पर बताते हैं कि एक फिल्टर आप लगाइए कि ज्ञान प्राप्त होता है परंपरा से तो जब भी आप किसी जब भी आप धार्मिक शिक्षा लेने जा रहे हैं तो आप यह चेक करिए कि वह व्यक्ति जो पढ़ा रहा है वह किस परंपरा से हम यह बताते हैं और हमारे जो पांच सिद्धांत होते हैं जो वहां पर हम पढ़ाने जाते हैं विद्यालयों में तो वहां पांच सिद्धांत पर हम बात करते हैं पहला इस संसार का प्रत्येक मनुष्य भगवान को ही ढूंढ रहा है फिर वह भले ही खुद को नास्तिक ही क्यों ना कहता हो इसका आधार है एकती 28 भाई या शिव जी को गुरु बना सकते हैं कृष्ण तक पहुंचने के लिए नहीं देखिए आपको एक व्यवहारिक गुरु तो अपने जीवन में रखने ही पड़ेंगे ना आप जो शिव जीी को आप गुरु मान सकते हो मगर उनके साथ गुरु वाला व्यवहार नहीं कर सकते जैसे आप शिव जी से यह पूछ के देखिए कि शिव जी ऋग्वेद के दसवें मंडल के फलान सूक्त के फलान श्लोक में क्या लिखा है तो क्या शिव जी आपको बता पाएंगे नहीं
00:48:30:09 बता पाएंगे तो इसमें गुरुदेव का वचन है जो गुरुदेव है वोह यह कहते हैं कि भगवान को प्राप्त करना कठिन है इसलिए गुरु का आलंबन लिया जाता है और जब हम गुरु ही ऐसा बना लेंगे जिसको प्राप्त करना कठिन हो जाएगा तो फायदा क्या हुआ गुरु बनाने का वो गति ही क्या जो गणता को गंतव्य तक ना पहुंचाए भाई गुरु आप के जीवन का मार्ग प्रशस्त करते हैं अब मार्ग प्रशस्त होना है शिवजी तक पहुंचने का भगवान तक पहुंचने का कृष्ण तक पहुंचने का और आपने गुरु बना लिया उन्हीं को शिव जी को ही गुरु बना लिया तो वह शिव जी आपका मार्ग प्रशस्त थोड़ी ना करेंगे वो खुद एक प्राप्त व्य बन गए वो खुद एक डेस्टिनेशन बन गए उन तक आप पहुंच सकते हो क्या पूछने के लिए कि इसका अर्थ क्या
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→ Used in: A · Video भागवतानंद का निगमानंद पर प्रलाप । इस्कॉन व रामपाल जैसी संस्थाओं द्वारा प्रशिक्षण at 29:36 ↗
→ Used in: A · Video चाटुकारों के कुतर्कों का निराकरण at 55:28 ↗
00:49:18:00 है तीन बेर खाती थी वो तीन बेर खाती है इस इस पंक्ति में बेर शब्द दो आया एक बार आया है कि वह दिन में थ्री टाइम्स इन डे भोजन करती थी और दूसरी बार आया है थ्री फ्रूट्स इन डे कि व दिन भर में सिर्फ तीन बेर खाती है
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00:49:40:01 तो अब इसमें से कहां पर लिखने वाले ने क्या लिया है इस इस सत्य को पहुंच जानने के लिए आपको जो क्रमानुसार लिखने वाले के बाद परंपरागत जिसने अध्ययन किया होगा उससे आपको करेक्ट चीज मालूम हो सकती वो आपको बताएगा कि भाई एक बार उसने यह कहा था कि वह तीन बार खाती थी दिन भर में और दूसरी बार कहा था कि तीन जो फल होते हैं बेर वो खाती है उसकी स्थिति इतनी खराब है अब यह अर्थ आप प्राप्त नहीं कर पाएंगे तो फिर आपका जो गुरु है वह गुरु नहीं रहा जब गुरु ऐसा है जो आपका अंधेरा नहीं मिटा पा रहा है अज्ञानता का तो वह गुरु नहीं रहा क्योंकि गु का मतलब अंधकार और रू का मतलब निकालने वाला गुरु अद्वैता आर का उपनिषद में है तो इसलिए जो इस पर मैंने एक शॉर्ट बनाया हुआ है कि जो लोग ये कहते कि मेरे तो स्वयं शिव गुरु हैं मेरे तो स्वयं कृष्ण गुरु हैं अगर उनको कृष्ण और शिव आकर के थोड़ी बहुत शिक्षा दे भी रहे हैं स्वप्न में तो वह उस गांधी की तरह है जो गांधी इनको दिखाई देता था संजय दत्त को लगे रहो मुन्ना भाई में एक गांधी दिखाई देते थे संजय दत्त को लगे रहो मुन्ना भाई में और वो जो गांधी जी थे उनको उतना ही पता था जितना
00:50:55:04 कि संजय दत्त को पता था तो यह जो आपको सपने में आकर के स्वप्न में आकर के ध्यान में आकर के जो बता के जा रहे हैं शिक्षा वह शिक्षा भी उतनी ही प्राप्त होगी आपको जितना आपको ऑलरेडी ज्ञान है जितना आप खुद किताबों से ज्ञान ले लोगे वो अपनी ओर से आपको शिक्षा नहीं देंगे नहीं तो आप पूछ के देख लीजिएगा जैसे कई लोगों पर माता आती है या इस तरह से भी होता है तो उनसे आप पूछ के देखिए कि आप अगर एक वैसी शक्ति है पारलौकिक शक्ति तो आप बता दीजिए तो पहली बात तो यह हो गई दूसरी बात यह भी है कि कई बार तो पहली बात यह हो गई कि आपका जो गुरु है पहला पॉइंट है कि गुरु व्यवहारिक होना चाहिए परमार्थिक गुरु नहीं होना चाहिए क्योंकि परमार्थ को प्राप्त कराने वाला व्यवहारिक गुरु होता है तो पहली बात यह हो गई दूसरी बात यह हो गई कि आपके वोह गुरु गुरु तभी कहलाएंगे जब वह आपके ज्ञान अज्ञानता को दूर करें और उन तक पहुंचना अपने आप में एक अज्ञानता होगी दूसरी बात य हो गई और इस कारण से वह गुरु सिद्ध नहीं होते तीसरी बात यह हो गई कि यह जो गुरु है उनको अधिकांशत इस तरह के जो गुरु होते हैं कि
00:52:10:06 हमको शिव भगवान आकर के शिक्षा दे जाते हैं अधिकांश ता जिन लोगों के ऐसे गुरु होते हैं उनको उतना ही पता होता है जितना कि आपको पता है इसका अर्थ क्या हुआ कि वोह आपके मन के द्वारा बनाया गया एक प्रतिबिंब है व वास्तविकता में शिवजी नहीं है क्योंकि शिवजी होते तो बता देते ऋग्वेद में कहां क्या लिखा है तो वो वास्तविकता में प्रतिबिंब है भैया मेरा नाम कस्त है यह मामी का मोबाइल है इसलिए मैं कह रहा हूं आप अच्छे से एक्सपोज करते हैं सेल्फ क्लेम आचार्य ना वर्ण आश्रम पर पुनर्जन्म को गलत साबित किया है हा हा यह वाला पॉइंट जिने आपने पढ़ाया वो सही बात बोला बहुत सारे में देखता हूं जो हिंदुत्ववादी कहते हैं हिंदू कहते हैं सब सब जातिवाद और वर्णाश्रम धर्म का विरोध करते हैं वो इसलिए करते हैं क्योंकि वो इसलिए करते हैं क्योंकि उनकी प्रायोरिटी
00:53:25:09 नहीं है कि धर्म की रक्षा कैसे होगी उनकी प्रायोरिटी य है उनकी प्रायोरिटी यह है कि हमारा जो चल रहा है मामला वह कैसे चलता रहे वोह प्रायोरिटी है और मैं वह गुरु गुरु वाली बात खत्म कर लू तो तो तीन चार बातें तो मैंने बता दी कि पहला वोह था कि गुरु आपके तभी सिद्ध होंगे जब वो आपके व्यवहारिक गुरु जवाइन कर लीजिए भगवत वचन अच्छा अच्छा तो अब अ आपने साहू जी मैं कह रहा था कि एक सज्जन है जो जुड़ना चाहते हैं तो आप थोड़ा सा अगर स्थान बनाए उनके लिए क्योंकि इसमें एक ही व्यक्ति का स्थान है आप आए आपसे बात हुई काफी अच्छा लगा आप हमसे हमारा जो संपर्क सूत्र है उसके माध्यम से संपर्क सूत्र हमारे उसमें दिया जाता है जो लिंक होता है उसमें डिस्क्रिप्शन में तो उसके माध्यम से आप जुड़िए और आदित्य वाहिनी से जुड़िए सब आदित्य वाहिनी से जुड़ने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने
00:54:40:09 घर से निकल कर के और कहीं दूर चले जाए पुरी शंकराचार्य जी के मठ में चले जाएं आदित्य वाहिनी का अर्थ यह है कि कोई भी ऐसा सनातनी जो अपनी तदा अनुसार अपने परिवार की फिर अपने आसपास के लोगों की सुरक्षा चाहता है वह आदित्य वाहिनी है और आदित्य वाहिनी की दूसरा जो लक्षण है वह यह है कि जब वह सुरक्षा चाहता है तो वह संगठन बनाना चाहता है और जब वह संगठन बनाना चाहता है तो संगठन बनेगा सार्वभौम सिद्धांतों के आधार पर वह सिद्धांत आपको प्राप्त होते हैं अपने प्रमाणिक आचार्य से सार्वभौम गुरु से श्रीमद जगतगुरु शंकराचार्य से और इसका और अन्य कोई तात्पर्य नहीं है आदित्य वाहिनी से जुड़ने का अपनी रक्षा करिए जहां पर आप है वहां अपने निकटतम मठ मंदिर में जाइए हर सप्ताह बैठना चालू करिए हनुमान चालीसा का पाठ करना शुरू करिए इसके अलावा अन्य जो प्रारंभिक जानकारिया होंगी वहां पर अटैच हो जाइए और वहां पर जुड़कर वो प्रारंभिक जानकारियां प्राप्त करी जैसे जो सार्वभौम सिद्धांत आपको प्राप्त हुए जब भी आप जहां भी बोलोगे तो इसको कोई भी आदमी मुकर नहीं पाएगा नहीं मुकर पाएगा तो वह धीरे धीरे आपसे जुड़ेगा व्यक्ति और ऐसे ही संगठन का निर्माण किया जा सकता
00:55:56:14 संगठन बनाइए क्योंकि गुरुदेव कहते हैं कलयुग में दो ही चीजें हमारे काम आएंगी एक आध्यात्म का बल भगवान की शक्ति और दूसरा संग की शक्ति तो जहां भी रह रहे हैं जिस हिस्से में भी रह रहे हैं वहां तुरंत अपने घर के आसपास एक संगठन बनाइए उनके साथ में भजन कीर्तन करना चालू करिए ठीक जय श्री राम जय जगन्नाथ जय जगन्नाथ जी आप
00:56:32:12 जुड़िए ट्राई करिए आप लिंक में सबसे ऊपर जाकर के तुलसीदास अद्वैत वादी थे फिर भी राम भद्राचार्य जो तुलसी जी को मानते हैं फिर भी हमारे आदि शंकर के दर्शन का विरोध करते दिखते हैं इसका क्या कारण है आप ट्राई करिए भगवत वचन जी इसका कारण क्या हो सकता है हम किसी कृत्य को हम किसी के कृत्य के ऊपर बात कर सकते हैं वैसे वह भी हमारे लिए बहुत सम्माननीय है राम भद्राचार्य जी तो उनके बारे
00:57:23:06 में उनके बार किसी प्रकार का सराइज या कोई टिप्पणी देना या इस प्रकार की चीज तो नहीं कर सकते जय जगन्नाथ आपका स्वागत है आज आपको इसमें स्ट्रीम में होना था हा मैं एक्चुअली मेरी पर्सनल प्रॉब्लम थी इसलिए मैं आज नहीं जी थोड़ लेट जवाइन किया मैंने आज जी एक प्रश्न का उत्तर दे रहे थे तो किसी ने पूछा था गुरु बना सकते हैं क्या जी प्रणाम भाई भाई जी जय शिवशंकर प्लकर जी भैया जय हर हर महादेव तो एक किसी ने पूछा था कि क्या मैं शिवजी को गुरु बना सकता हूं मैसेज वो डिलीट हो गया है हम कंचन कंचन ओझा जी ने पूछा
00:58:14:07 था तो यह है तुलसीदास जो राम भद्राचार्य जी हैं अ वो राम भद्राचार्य जी हमारे सम्माननीय है तो उनके बारे में किसी प्रकार का एनालिसिस हम नहीं कर सकते हां कोई ऐसी बात आप पूछ सकते हैं कि यह सही है कि नहीं तो अगर प्रयास करेंगे केवल अगर गुरुदेव ने कुछ उसमें प्रकाश डाला होगा तो और हम लोग अभी हमने अभी वही बात की थी थोड़ा कि अ द्वैत द्वैत अद्वैत और साकार निराकार में अंतर जो हमारे बीच में कई बार ऐसी चर्चा हो भी चुकी है कि अद्वैत में लोगों को यह भ्रमित किया जाता है कि वह मायावादी हैं अब मायावादी की बात तो ऐसी है कि ऐसा शायद ही कोई आचार्य गण होंगे जिन्होंने अपने भाष्य में अर्थ लिखते समय श्रुति शास्त्रों का माया शब्द का उपयोग ना किया हो तो सर्वप्रथम तो बात यह आती है कि मायावादी थे यह सिद्ध कैसे होता है क्योंकि मायावा तो स्कोन की किताबों में भी लिखा हुआ है माया
00:59:29:18 माया शब्द का उपयोग होने से सिद्ध नहीं होता कि व मायावादी थे दूसरी बात जो रामानुजाचार्य संप्रदाय के हैं उन्होने अपनी क्यों जो श्री मधवा चार्य शास्त्री जी उन्होंने साफसाफ अपनी क्यों नाम की पुस्तक है उसमें लिखा है पुराण दिग दर्शन में कि भाई यह जो मायावादी वाला शलोक है कि मायावादी आम वाला वो जो श्लोक है प्रक्षिप्त श्लोक है और इसका उपयोग करने वाले को मूर्ख कहा है तो जो भी ऐसा आरोप लगाते हैं कि शंकराचार्य मायावादी थे तो वह उनको उनको भी उनका भी विरोध कर रहे हैं जिनका वो पक्ष लेते हैं क्योंकि जो रामानुजाचार्य संप्रदाय है श्री संप्रदाय वो वो तो इनके अनुसार प्रमाणिक संप्रदाय है इस कौन के अनुसार चार संप्रदाय बताते हैं नि निंबार्क वल्लभाचार्य मधवा चार्य और एक और
01:00:28:18 भाई जी आप दोनों ही लोग उल्टा दिख रहे हैं हमें अरे यह क्या बात हुई भाई तो दोनों लोग हम लोग अपना मोबाइल उल्टा कर ले क्या अब सीधा दिख रहे हैं आप सीधा दिख रहे हैं तो यही बातें चल रही थी गुरु वाली जो अंतिम बात थी वो मैं कहता रह गया व कुछ आखरी बहुत अच्छा एक बिंदु था जिस पर प्रकाश डालना था कि हमने यह तो बता दिया था कि भाई गुरु अंततः वह होना चाहिए जो व्यवहार में आपके अज्ञानता को दूर कर सके चलिए कोई नहीं वो ध्यान आएगा विषय तभी होगा एक हां फिर अंततः ये जो हम बात कह रहे थे उसमें गुरु वाले में कि गुरु का मामला यह भी है कि हो सकता है कि वह आपके द्वारा आपकी इंद्रियों के द्वारा ही बनाया गया पुष्टि मार्ग और शुद्ध द्वैत
01:01:43:26 के बारे में बताइए वैसे जो आज का विषय है वो द्वैत अद्वैत साकार निराकार के बार बारे में है तो एक बहुत बड़ा चैप्टर खुल जाएगा अन्य दर्शनों को खोलेंगे मगर जैसे शुद्ध द्वैत है तो इनमें भी जो हमने आप एक क्यों नाम की पुस्तक लीजिए पुराण पुराण दिग दर्शन लीजिए तो उसमें इन सबकी व्याख्या का समरा दिया गया है इसके साथ ही साथ एक संक्षिप्तीकरण भक्ति सुदा में भी है आप कपात जी महाराज की भक्ति सुदा लीजिए उसमें दिया हुआ है ज्यादातर जो दर्शन है वो जो भगवान आदि शंकराचार्य जी का दर्शन है उसकी तरफ जाते हुए दर्शन है यह हो सकता है कि कोई रास्ते में रुक गया तो कोई ऐसा दर्शन नहीं है जिसने कि स्पष्ट तौर तौर पर और पूरी तरीके से शंकराचार्य जी का विरोध कर दिया हो तो मेरे जो मेरा जो अवलोकन है जो समझ में आया भगवत कृपा से वह यही है कि अगर एक खंबा बनाया जाए पिलर पिलर बनाया जाए तो उसमें क्या किया गया है कि जैसे किसी आचार्य ने उसके 60 पर तक ले गए व्यक्ति को और मेरा नाम कौस्तव है मैं कह रहा था वर्णाश्रम और
01:02:59:06 16 संस्कार पुनर्जन्म पर मैं प्रशांत जी का काम से बहुत गुस्से में हूं और वह बुद्ध वादी है उन्होंने अच्छा अच्छा भाई जी अभी भी उल्टा दिख रहे हैं अरे अब उल्टा ही देखिए क्या बताएं हमने तो उलट पुलट करके देख लिया अपने को भाई बहुत ज्यादा टेक्निकल वाला हैंड इतना स्ट्रांग नहीं है हमारा मुझे तो आप सीधे दिखाई दे रहे हैं हा मुझे भी सीधे ही दिख रहे हैं आप अब क्षमा चाहता हूं सनातन वैदिक धर्म तो हमारे जैसा ही नाम लग रहा है ठीक है
01:03:58:01 तो जी कोसतु जी मैं उनसे जो है आचार्य प्रशांत जी के देखि समय नहीं मिल रहा है हालांकि मैंने एक वीडियो उनके लिए बनाया था जिसमें कि वह बता रहे थे जिसमें उन्होंने कहा था कि मनुस्मृति को पढ़ना बेकार है वह बेकार की पुस्तक है तो मैंने बताया था सबसे पहली बात तो यह है ना कि हम किसी को भी आचार्य मान क्यों रहे हैं आप मठा मना म अनुशासनम का अध्ययन करिए तो उसके अनुसार आचार्य हर कोई नहीं बन सकता है आचार्य के गुण होते हैं दूसरी बात यह है कि फिर मैं वही बात रिपीट करूंगा कि जब वह यह बताते हैं कि भाई मैंने आईआईटी पास आउट किया है तो व जब वोय जी जी जी जी जी आपकी बात समझ ली तो जब वो यह बताते कि मैंने आईआईटी पास आउट किया है तो वहां पर वो कहते कि मैंने मैं एक आईआईटी हूं मैं आईआईटी से पास आउट हूं तो यानी कि वह अपने गुरु का नाम वहां पर बताते हैं तो जब वो इतना महत्त्वपूर्ण विषय मानवता का जो सबसे महत्त्वपूर्ण विषय अध्यात्म धर्म जब वो इसके बारे में बात करते हैं तो क्यों नहीं बताते कि उनके गुरु का नाम क्या
01:05:13:13 है अगर वह यह मानते हैं कि कि वह राम को मानते हैं तो राम जी तो गुरु विहीन नहीं थे वो कृष्ण को मानते तो कृष्ण जी तो गुरु विहीन नहीं थे तो फिर उनका गुरु कौन है जिसने उन्हें अध्यात्म सिखाया तो इस मामले में कोई उत्तर अभी तक तो मेरे को प्राप्त नहीं हुआ है शिवांश जी यहां पर भारत के अंदर एक सबसे बड़ी दुर्गति जो मेरे को दिखाई दे रही है भागवत के पांचवे स्कंध का यदि हम सभी अध्ययन करते हैं तो उसम र का एक चरित्र आता है तासर अंदर इंद्र अपने गुरु का अपमान करते हैं तो गुरु के अपमान के कारण देवराज इंद्र को जो ब्रह्म हत्या का पाप लगता है और अन्य घटनाए उनके साथ घटित होती हैं एक स्वर्ग पर जो शासन कर रहा है देवराज इंद्र उनको भी गुरु की आवश्यकता पड़ती है अच्छा स्वर्ग पर शासन आप छोड़ दीजिए कुछ मिनट कुछ देर के लिए आप आतंकवादियों को ले लीजिए जो आतंकवादी होते हैं उनका भी एक जो होता है मास्टर माइंड होता है उस व्यक्ति के कहने पर सारी जो घटनाएं
01:06:28:14 है वो घटित होती है मैं जरा दो मिनट का ब्रेक चाहूंगा अभी पिताजी का कॉल आ रहा है दो मिनट जी बिल्कुल बक तो वही मैं अपनी वो जो गुरु वाली बात है उसको एंड कर रहा था अब कई पॉइंट हमने देख लिए कि लोग अभी किसी ने जो प्रश्न किया था क्या मैं शिव जी को अपना गुरु बना सकता हूं तो पहली बात तो शिव कृष्ण को प्राप्त करना एक आपका कठिन है तो उस कठिन को सरलता में बदलने के लिए गुरु का आलंबन लिया जाता है तो आपने जब गुरु भी ऐसा ही बना लिया जो कठिन है तो फिर उसका आने का औचित्य क्या रहा दूसरा यह है कि जब गुरु आपकी अज्ञानता को दूर नहीं कर रहा है वह यह नहीं बता पा रहा है कहां क्या लिखा है किस चीज का क्या अर्थ है इसका अर्थ क्या हुआ कि वह आपकी अंधेरा दूर नहीं कर रहा जब अंधेरा दूर नहीं कर रहा है तो फिर उसका गुरु होना सिद्ध नहीं होता तीसरा यह है कि अधिकांशत जो इस प्रकार से गुरु हमें दिखते हैं जो शिव बनक हमको मिल रहे हैं वह उनको उतना ही पता होता है जितना कि हमको पता होता है इसका अर्थ क्या हुआ अधिकांश ता इस प्रकार से दिखने वाले शिव और कृष्ण
01:07:43:14 हमारी ही इंद्रियों द्वारा बनाए गए प्रतिबिंब होते हैं जो उस प्रकार की हमारे अनुकूल बात कहते हैं जो हमें कहनी होती है खुद से और इसके बाद अंतत यह भी हो सकता है महा ऋषि शब्द पर प्रकाश डालिए शास्त्रों के अनुसार पढ़ नहीं पाया महा ऋषि शब्द पर प्रकाश डालिए शास्त्रों के अनुसार क्योंकि स्वामी दयानंद
01:08:16:18 सरस्वती जी तो अपना वेद भाष्य में कहता है कहते हैं वेद पढ़ना पढ़ने वाला ऋषि और जिसने पढ़ लिया वो महा ऋषि है देखिए यह यह सब वस्तुनिष्ठ बातें होती हैं सिद्धांति बातें नहीं होती है ये ऐसा कई बार होगा वैसे मुझे इस बारे में ज्ञात नहीं है मषि के बारे में कि क्या कहना है यहां पर पर मैं आपको सैद्धांतिक बात बता दूं महा ऋषि दयानंद सरस्वती की जी किस गुरु परंपरा से थे अगर गुरु परंपरा से नहीं थे या उनके जो गुरु थे उनके गुरु का नाम था अभी नहीं आ रहा उनसे दो पीढ़ी पहले के गुरुओं के नाम है उनके पास और कहीं ना कहीं देखिए जब भी कोई स्वतः सिद्ध गुरु होगा तो वहां या फिर जब भी कोई अप्र माणिक गुरु होगा जो पूरी तरीके से प्रमाणिक नहीं होगा तो कहीं ना कहीं जो उसके उनकी जो चेन होगी गुरु की उसमें कहीं ना कहीं आ जाएगा कि उसने ज्ञान गुरु से नहीं लिया है उसने जो है स्व प्रतिपादित
01:09:31:22 ज्ञान दिया है आप एक बात बताइए भगवान आदि शंकराचार्य से पहले हमारे पास नारायण तक के नाम है अगर हम शास्त्रों का अध्ययन करते हैं हां स्वामी बृजनंदन के गुरु का नाम था पूर्णागिरी इनके गुरु का नाम था पूर्णागिरी जी तो जब हम इनके शास्त्रों का अध्ययन करते हैं तो आदि शंकराचार्य जी से पहले अब इसको हम एक पक्ष को छोड़ दें दयानंद सरस्वती जी ने जो भाष्य किया है जिन वेदों का वह वेद उनको प्राप्त कहां से हुए वह वेद सनातन जब सृष्टि का निर्माण हुआ वह जो भी माने कब हुआ कब नहीं हुआ जहां से भी हुआ क्या वहां तक की चेन ऑफ नरेशन है उनके पास नहीं है तो वो वेद उनको प्राप्त हुए कहां से शंकराचार्य आदि जो हमारे आचार्य गण है उनके माध्यम से तो जब शंकराचार्य जी पर उन्हें विश्वास नहीं है कि यह वेदों का गलत अर्थ बता सकते हैं तो उनसे प्राप्त होने वाले वेदों पर उन्हें विश्वास कैसे है भाई ऐसा तो हुआ नहीं कि भगवान ने आकर के उनको वेद पकड़ाए हो उनको पीढ़ी दर पीढ़ी तो वेद प्राप्त हुए थे आर्य समाजी मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी हैं ऐसे में
01:10:47:25 तो दयानंद सरस्वती जी की बातें हम तब तक मान सकते हैं जब तक वो शंकरा भगवान आदि शंकराचार्य जी के अनुकूल है और जैसे ही वो विपरीत जाएंगी तो वहां पर वो स्वीकार नहीं है मैं फिर वो एक पंक्ति जो बताई थी वोह बता दूं आपको कट्टर रोधी है दयानंद सरस्वती कटर विरोधी है और अन्य धर्मा भास में क्या भेद है जी जी इस पर मैंने ना एक चार्ट बनाया था कुछ दिन पहले अपनी पोस्ट पर डाला है कम्युनिटी पोस्ट पर डाला है और एक चार्ट बनाया था भगवान की कृपा से गुरुदेव की प्रेरणा से एक चार्ट बनाया है तो उसमें कुछ स्तर है आपकी आस्तिक के प्रथम स्तर दिया है फिर द्वितीय स्तर दिया है फिर तृतीय स्तर दिया है तो तृतीय स्तर पर वोह होते हैं जो प्रथम स्तर पर वो होते हैं जिनके पास गुरु गोविंद और ग्रंथ तीनों होते हैं द्वितीय स्तर पर वो लोग होते हैं जिनके पास कुछ भी निश्चित नहीं होता है उनका गुरु कौन है नहीं पता उनका ईश्वर कैसा है बाध्य है कि अ बाद है कभी सोचा ही नहीं
01:12:03:20 और उनका ग्रंथ कौन सा प्रमाणिक है कौन सा प्रमाणिक नहीं है यह भी कभी नहीं सोचा यह लोग होते हैं द्वितीय स्तर पर यह लोग अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर कुछ अपने एक छोटे मोटे कुछ सिद्धांत बना लेते हैं उन सिद्धांतों से मेल खाने वाले लोगों को लेते हुए जब ये एक गुट बनाते हैं तो ऐसा गुट बन जाता है वो तृतीय चरण पर जो उसको कहा जाना चाहिए सनातना भास धर्मा भास नहीं कहेंगे उसे धर्मा भास तो वह सभी है जो जैसे ही पहले पहले चरण से आप नीचे आए तो व सब धर्मा भास हो गए सब अज्ञात नास्तिक हो गए मगर इसको अगर पर्टिकुलर इस स्तर के लोगों को अगर समझेंगे तो यह इनको कहा जाएगा सनातना भास सनातना भास मतलब आभास करा रहे हैं कि सनातन नहीं बता रहे आपको मगर वो सनातन है नहीं आभास है सनातन इसके बाद जब यह और विपरीत जाते हैं तो वह अध्यात्मा भास हो जाते हैं कई ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे वेद विरुद्ध इन्हीं का बिगड़ा हुआ स्वरूप होता है वेद विरुद्ध बहुत स्पिरिचुअल क्लासेस चल रही होंगी मेडिटेशन सेंटर होंगे सब कुछ होगा और खुल के वेद विरोध करेंगे सनातना भास में और अध्यात्मा भास में एक अंतर होता है सनातना भास अप्रत्यक्ष रूप से वेदों का विरोध करता है और
01:13:19:07 अध्यात्मा बास प्रत्यक्ष रूप से वेदों का विरोध करता है और इसके बाद जब ये और बिगड़ जाते हैं लोग और अपना वो फैला लेते हैं तो यही अध्यात्मा भास जाकर के अंत में बनता है धर्मा भास और यह व्यवहारिक और वैचारिक दोनों प्रकार से धर्म पर प्रहार करने वाला होता है और मानवता भाष क्या है जो व्यक्ति नास्तिक हो वो मानवता भाष है तो इस तरह से चरण बनाए हैं पहला चरण क्या कहते हैं धर्माजा भास वो दिखेगा हिंदू वो दिखेगा पूजा करने वाला मगर ना ही उसके पास गुरु है ना गोविंद है ना ग्रंथ है और उसके बाद वो जब अपना गुट बना लेगा तो वो बन जाएगा सनातना भास वो जब अपना और पंख फैला लेगा तो बन जाएगा अध्यात्मा भास व जब अपना और पंख फैलाए तो बनेगा धर्मा भास तो यह आप वहां से उस पोस्ट को ले लीजिएगा स्क्रीनशॉट ले लीजिएगा अन्यथा हमारे डिस्क्रिप्शन में जो संस्था का अधिकृत नंबर दिया हुआ है आदित्य वाहिनी का भी तो वहां पर आप जुड़े तो वहां पर आपको दे दिया जाएगा उसका अध्ययन करेंगे बहुत आसानी से आप वो अंतर समझ जाएंगे कुल मिलाकर के जो अभी शुरू में इस स्ट्रीम के शुरू में मैंने एक बात कही थी घुमा फिरा कर के वही बात है कि यदि
01:14:34:18 संसार में कोई मनुष्य ऐसा है जो यह मानता है कि वह पशुओं से भिन्न है मनुष्य है तो उसे मानना पड़ेगा कि इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है जिसे प्राप्त करने के लिए उसने उन मर्यादाओं का उन नियमों का आलंबन लिया हुआ लिया हुआ है जिसे धर्म कहते हैं और जो वेदों के द्वारा प्रतिपादित होता है और अगर कोई व्यक्ति यह मानता है कि इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है तो उसे मानना पड़ेगा कि वह उस ईश्वर को मानता है जिसकी व्याख्या वेदों ने की है और इसके साथ ही साथ तदा अनुसार इसी क्रम में अगर हम आगे कहेंगे तो यदि संसार में कोई ऐसा व्यक्ति है जो यह मानता है कि वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है अवाद है प्राप्त होने वाला मोक्ष परम स्वतंत्र मोक्ष है तो इसका अर्थ है कि वह यह मानता है कि उसने वेदों के उस अर्थ को स्वीकार किया हुआ है जो भगवान आदि शंकराचार्य के द्वारा हमें प्राप्त होता है सिंपल तीन पंक्तियां है पहली अगर मनुष्य य मानता है पशुओं से भिन्न है तो इसका अर्थ है कि वना सर्वशक्तिमान ईश्वर को मानता है अगर वो ये मानता है कि
01:15:49:18 व स ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो व वेदों को मानता है अगर मानता है कि वेदों के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह शंकराचार्य को मानता है अगर अब इस नियम के बाद यदि वो इस नियम के प्राप्त हो जाने के बाद यदि वह शंकराचार्य की पदी के अंदर रहते हुए किसी भी प्रकार से ज्ञान भक्ति कर्म की व्याख्या कर रहा है भगवान के निर्गुण निराकार सगुण निराकार सगुण साकार स्वरूप की व्याख्या कर रहा है तो वो सारी चीजें स्वीकार रहे हैं मगर जब वो ये बातें इस प्रकार से करने लगेगा कि नहीं मैं शंकराचार्य का विरोध कर रहा हूं तो उसकी कोई बात स्वीकार होगी नहीं कहीं ना कहीं व मोक्ष को परतंत्र और वह सर्वशक्तिमान ईश्वर को बाधित सिद्ध कर देगा जैसे सबसे सरलतम उदाहरण पकड़ लीजिए इकोन के जो अनुयाई है वह अधिकतर यह कहते हैं कि भाई हम शंकराचार्य को नहीं मानते हम मायावादी हैं उनका एक सिद्धांत ले लीजिए जिस प्रकार दूध से दही बन सकता है पर दही से दूध
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01:16:53:22 नहीं बन सकता उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण तो शिव बन सकते हैं मगर शिव बनने के बाद वो वापस
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01:16:59:28 कृष्ण नहीं बन सकते तो यहां पर क्या हुआ ईश्वर बाधित हो गया यहां पर ईश्वर बाधित हो गया तो यह क्या हुआ शंकराचार्य का विरोध करने वाले जो आपको ईश्वर देंगे वह सदैव बाधित रहेगा और वे वैदिक विचारधारा में और जितनी भी वेद विरुद्ध विचारधारा उनमें अंतर क्या है ईश्वर वादित है ना किसी प्रकार से ईश्वर वादित है जैसे हम इस्लाम का जो ईश्वर है वह यह कहता है कि मैं जन्म नहीं ले सकता ठीक है वह उनके लिए संतुष्टि जनक है मगर जहां पर इस स्तर पर बात हो रही हो असतो मा सद गम के स्तर पर इस कलयुग में क्या आज भी यह संभव है कि भगवान को देखने के लिए हमारे अंदर इतनी व्याकुलता आ गई कि अब वह नहीं आए तो हमारे प्राण गए ऐसी स्थिति में क्या भगवान आज भी दर्शन दे सकते हैं देखिए य तो बहुत ही गुण रहस्य वाली बातें हैं मगर इनका जो मैंने जो सिद्धांत पकड़ा है इन बातों से निपटने के लिए वह क्या है कर्मन निवादी कारस मा फलेशु कदाचना आप परिणाम पर क्यों ध्यान दे रहे हैं आप भक्ति करने का आनंद लीजिए आप युद्ध के परिणाम पर क्यों ध्यान
01:18:15:04 दें हम तो युद्ध लड़ने का आनंद ले ना कई बार ऐसा होता है कि भाई रिप्लाई भैया ओजा आपने क्या प्रश्न किया था आपका मैसेज डिलीट हो गया है आपका मैसेज डिलीट हो गया है हा तो यह किसका अल्टीमेट एक मिनट आपने धन्यवाद कहा महा ऋषि शब्द अच्छा अच्छा अच्छा एक प्रश्न और ठीक है तो चलिए आभार आपका तो इस सिद्धांत को जब हम पकड़ लेंगे ना तो हमें कहीं भी कोई हिला नहीं पाएगा सिर्फ दो सिद्धांत ईश्वर सर्वशक्तिमान और मोक्ष परम स्वतंत्र इसको आप पकड़ लीजिए कभी भी कोई विरुद्ध विचारधारा आपको हिला ही नहीं पाएगी कहीं भी आप वो नहीं होंगे जो गुरुदेव की भाषा में जो ईश्वर जगत बनाता भी बनता भी उन्हीं का ईश्वर अवतार ले सकता है तो यह सक्ता वाला जो शब्द है ना यह ना सक्ता नहीं आ सकता ऐसा ईश्वर हमें तो दे दो आप हमें ऐसा ईश्वर दे दो हम हर विचारधारा हर सिद्धांत को मान लेंगे मगर कैच कैच इसी बात का है कि जब भी कोई ऐसा ईश्वर आपको
01:19:30:08 देगा तो वेदों की बात कर रहा होगा और शंकराचार्य की बात कर रहा होगा जब भी कोई आपको ऐसा मोक्ष देगा परम स्वतंत्र मोक्ष तो वह वेदों की बात कर रहा होगा और वह शंकराचार्य की बात कर रहा होगा जी आपकी आवाज नहीं आ रही है आशु जी युगल जी आपकी आवाज नहीं आ रही मुझे नहीं आ रही है कि किसी को भी नहीं आ रही अगर कोई लाइव देख रहा है तो जरा बता दे कोई क्या इनकी आवाज आ रही है
01:20:07:03 आपको युगल जी की आवाज आ रही है किसी को कमेंट के माध्यम से बता दें कृपया क्या 300 साल क्या 300 साल या उससे पुरानी कोई मनुस्क्रिप्ट मिलती है या नहीं 300 साल पुरानी मनुष मैनु स्क्रिप्ट तो वही है क्या कहते हैं हमारे वेद है जो ओरिएंटेड रिसर्च इंस्टिट्यूट में रखे हुए हैं ऋग्वेद की जो पांडुलिपि
01:20:51:04 है पुणे में में भंडारकर ओरिएंटल इंस्टिट्यूट वहां रखी हुई है हमारी उसको यूनेस्को ने शामिल भी किया है सबसे पुराने ग्रंथों में युगल जी आपकी आवाज नहीं आ रही है जय श्री राम जय गुरुदेव माई हाई स्कूल कंचन ओझा जी ने कहा है नहीं आपको आवाज नहीं आ रही ना युगल जी की जी जी आपकी आवाज नहीं आ रही किसी को
01:21:26:19 भी आप ऐसा करिए एक बार हट जाइए और एक बार दोबारा जवाइन करिए ओझा जी आप आना चाहेंगे आप आना चाहेंगी जुड़ना चाहे तो आप ट्राई कर लीजिए [संगीत]
01:22:05:19 किसी का भी वॉइस नहीं आ रहा है हमारा भी नहीं आ रहा है हा अब आपकी आवाज आ रही है मुझे तो मैं यह कह रहा था कि अभी कुछ समय पहले मैंने स्कोन की एक वीडियो देखी जिसके अंदर अमोग लीला प्रभु जी कह रहे थे एक मिनट कंचन ओझा जी आपका रिप्लाई आपका एक बार प्रश्न दोबारा से लिख दीजिए तो हम रिप्लाई दे देंगे अच्छा अच्छा ठीक ठीक है जी बताइए आप कुछ कह रहे थे ल जी य कह रहा था कि मैंने अभी कुछ समय पहले की एक वीडियो देखीय बताया जा रहा था अमोग लीला जी ये कह रहे थे कि हमारे सनातन धर्म के मतलब जो हमारे हिंदू धर्म के मंदिर है और जो हमारे स् कोन के मंदिर है उनमें ये डिफरेंस है कि वहां पर केवल आपको दर्शन कराए जाते हैं और निकाल दिया जाता है किंतु हमारा जो स्कोन का मंदिर है उसकी तरफ से आपको जो है फूड प्रोवाइड करवाया जाता है प्रसादम प्रोवाइड करवाया जाता है आपको शास्त्रों का ज्ञान प्रोवाइड करवाया जाता है किंतु बाकी जो हिंदू मंदिर है उनके अंदर ऐसा
01:23:20:21 नहीं करवाया जाता ये हिंदू और का बहुत बड़ा डिफरेंस है तो वहां पर एक जो मुझे बहुत बड़ी जो यह है कि आप सबसे पहले तो हिंदू को नहीं मानते ठीक है अब दूसरी बात उन्होंने यह कही कि कौन के मंदिर और हिंदू के मंदिर इसका अर्थ क्या हो गया कि हिंदू अलग स्कन वाले अलग जो स्कन वाले हो जाएंगे अब वह हिंदू के नहीं रहेंगे क्योंकि उन्होंने अपना एक टैग लगा दिया ट इ स्कोन जैसे अब हमको दूध तो गौ माता का प्राप्त होता है किंतु अब उस परल का टैग लग जाए किसी कंपनी का कि यह इस कंपनी का मिल्क है किंतु है तो वह गौ माता का ही आप चाहे किसी भी कंपनी का टैग लगा लीजिए अब जो हमारे धर्मशास्त्र है जो भागवत जी पर पहली टीका लिखी गई वह तो श्रीधर स्वामी के द्वारा लिखी गई है जी और जो प्रभुपाद जी के द्वारा भगवत गीता लिखी गई या फिर जो भागवत लिखा गया है उसके अंदर भगवान शिव को एक स्कोन वाले से मेरी बात हुई उन्होंने कहा कि भगवान शिव के लिए हमको इंग्लिश में ऐसा कोई वर्ड नहीं मिला जिसके लिए हम उनको परम भगवान बोल सके तो हमने उनके लिए ड यूज कर दिया लेकिन इनका खंडन इन्हीं की बात कर रहे हैं कि भगवान
01:24:36:00 श्री कृष्ण के लिए यह वर्ड यूज कर रहे हैं सुप्रीम पर्सनालिटी ऑफ गॉड हेड वही पर भगवान के लिए यूज कर रहे हैं डेमी गड इनको इंग्लिश में शिवजी के लिए कोई वर्ड नहीं मिला कि उनको परम भगवान बोल सके अच्छा एक चीज एक चीज मैं यहां पर और थोड़ी सी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि जोय बहुत बड़ी पंच जी आजकल कबीर का नाम लेकर वर्णाश्रम का खंडन करता
01:25:11:15 है करता है प्रशांत जी का स्टूडेंट भैया मेरा नाम कौस्त है मैं आपका वीडियो अपना मां को मोबाइल लेकर देख रहा हूं अच्छा अच्छा जी ठीक है कस्प जी जी ठीक है तो आचार्य प्रशांत जी जो है वह एक प्रमाणिक आचार्य नहीं है प्रमाणिक गुरु नहीं है और उनके द्वारा दिए जाने वाले सिद्धांत है वह अप्र माणिक है सेल्फ क्लेमड है तो हम क्यों उनकी बात मान सकते हैं आप यही सोचिए बस उनका सबसे बड़ा खंडन यही है कि वो अपना गुरु का नाम ही नहीं पता है ना उनको और जन प्राप्त होता है परंपरा से भगवत गीता च दोती 16 ंद उपनिषद मंडक उपनिषद सब में है तो जो अप प्रमाणिक आचार्य उसकी कोई बात कैसे मान सकते हैं कम से कम इकन वाले जो हैं ये भ्रामक ही सही एक गुरु परंपरा तो दिखाते हैं उसका तो मान रख लेते हैं कि परंपरा से न ज्ञान प्राप्त होता है वो व क्लेम करने लायक है चैलेंज के लायक है वो स्टेप एक आगे का स्टेप है मगर ये तो और नीचे का स्तर है जब आदमी य कहे कोई गुरु नहीं है हमें गुरु की आवश्यकता ही नहीं है गुरु की आवश्यकता
01:26:26:27 ना होने वाला कहने वाला य वही व्यक्ति होता है जिसका कोई गुरु नहीं होता है जैसे अंगूर खट्टे हैं और उतने अंश में वह उन्ही शास्त्रों का खंडन कर देता है जिन शास्त्रों को व पढ़ा रहा है जिन शास्त्रों को आपको दे रहा है तो जब उसके अनुसार वह शास्त्र अल्टीमेट नहीं है तो वह दे क्यों रहा है और जैसे कि अभी युगल जी आप बात कर रहे थे उस परे मैं एक बात कहना चाहूंगा कि भैया मैं आपसे सहमत हू जी जी तो कुल मिलाकर के बात यही है ना कि जो भी व्यक्ति इस प्रकार से गलत बातें करेगा वह खुद उन्हीं नियमों को तोड़ देगा कहीं ना कहीं कभी ना कभी जिन नियमों को वह खुद कह रहा है अगर इन लोगों से कहा जाए कि भाई तुम एक महीना ले लो दो महीने ले लो एक साल ले लो और एक नए अपने बिल्कुल आप क्या क्या मानते हो वो नियमावली हमें पकड़ा दो आपसे जब बात होगी तो उनमें से ही किसी नियम को आप खुद तोड़ोगे यही होता है सबसे ज्यादा सबसे बड़ी पहचान अधर्म की ओर जाने वालों की नास्तिकता की ओर जाने वालों की अधर्म
01:27:42:00 क्या है जो बदलता है कि हम आज यह कर रहे हैं कल वो करेंगे और धर्म क्या है जो कभी नहीं बदलता शाश्वत वो धर्म है तो अधर्म की ओर ले जाने वालों की अधर्म धार्मिक विचारधारा अ वैदिक विचारधारा या नास्तिक विचारधारा की ओर ले जाने वालों की सबसे बड़ी पहचान होती है कि वह स्वयं उन्ही नियमों को तोड़ देते हैं जिन नियमों को वह खुद अभी थोड़ी देर पहले मान रहे थे अब जैसे यहां पर जो अभी युगल जी ने एक बात बहुत अच्छी कही सुप्रीम पर्सनालिटी ऑफ गॉड हैड कि श्री कृष्ण गॉड हेड नहीं है सुप्रीम पर्सनालिटी है किसकी गड हेड वो खुद कह रहे हैं ना श्री कृष्ण जो है वोह ईश्वर का सबसे बढ़िया रूप है सबसे सर्वोत्तम रूप तब भी वो वहां पर तो एक अद्वैत की ओर जाता हुआ सिद्धांत है ना इनका फिर ये सुप्रीम पर्सनालिटी ऑफ गॉड हैड अद्वैत की ओ निर्गुण निराकार की ओर जाता हुआ सिद्धांत हो गया कि नहीं कि भगवान का सर्वोत्तम रूप कौन है श्री कृष्ण भाई इसको हिंदी करिए आप सुप्रीम पर्सनालिटी ऑफ गॉड हैड को खैर और भी बहुत से हैं एक जगह अमोग लीला जी कह रहे थे
01:28:57:02 अच्छा इ इनका एक इनके एक फॉलोअर है जो योग करके उनका चैनल है योगा ऑफ लव योगा ऑफ लव योगा ऑफ लव वो एक जगह आ कर के शंकराचार्य जी का खंडन कर रहे थे कि शंकर गुरुदेव ने एक जगह कहा है कि वह हिंदू अलग हो गए और इकन वाले अलग हो गए तो आप ये वीडियो मुझे भेज दीजिएगा मैं उनके में कमेंट कर दूंगा जाकर के देखिए है मैंने तो वो वो अब कोई ऐसा वैसा व्यक्ति अगर कहेगा जो प्रतिनिधि ना हो इसकन का तो वह व्यक्ति तो उसके लिए तो यह कह देंगे कि भाई वह हमारे कोई रिप्रेजेंटेटिव थोड़ी ना है अगर उन्होंने कह भी दिया तो खैर यह तो ऐसी संस्था है कि अमोग लीला जी को भी डिनायर देती है कि भाई आदि शंकराचार्य जी का ये लोग खंडन कर रहे हैं आदि शंकराचार्य जी का खंडन का मतलब ये लोग श्रुति हों का खंडन कर रहे हैं श्रुति का खंडन ईश्वर का खंडन वेदों का खंडन और धर्म का खंडन और अगर और और अगर गणता में चले जाए तो मानवता का खंडन क्योंकि धर्मे ही ना पशु भी समाना कैमरा सही कोई खंडन कर जी इसमें गोत्र को लगा कर के विवाह नहीं हो रहा किसी से भी विवाह किए जा रहे हैं जिसमें कोई मर्यादा नहीं है विवाह कीन
01:30:12:03 अंदर अब ये कहते हैं कि व्यक्ति का जो कर्म होता है वो जो वर्णाश्रम वर्ण होता है व कर्मानुसार वो होता है एक वीडियो में खुद ही वो कह रहे हैं कि श्री राम चंद्र जी कभी ब्राह्मण जैसे दिखते हैं कभी कभी क्षत्रिय जैसे दिखते हैं तो वो खुद ही अपनी समस्या को उद भाषित कर रहे हैं जो गुरुदेव कहते हैं कि भाई अगर कर्म के अनुसार किसी का वो करेंगे तय वर्ण तो पाच पाच पाच मिनट में दिन भर में कितनी बार वर्ण बदलेगा उसका सबसे बड़ी बात ये है कि ये लोग रावण को ब्राह्मण भी मानते हैं अब उसने युद्ध किया कर्म से क्षत्रिय होकर भीय मान भी उसको ब्राह्मण रहे हैं और दूसरी बात ये कि क्षत्रिय होते हुए भगवान श्री राम को ये लोग क्षत्रिय ही मान रहे हैं तो थे किंतु उनको यह नहीं कह रहे कि व मनीष शर्मा जी जो कैमरा है ना वो अब यह क्षमा चाहूंगा यह ऐसे ही रहेगा भाई टेक्निकल हैंड हमारा उतना अच्छा नहीं है बस यह मान के चलिए तैयारी का कोई भी समय नहीं मिला था और बहुत लेट यह कान्फ्रेंस शुरू हो पाई है संभवत अगली बार प्रयास करेंगे कि जो कैमरा क्वालिटी व अच्छी हो जाए पुराणों का सत्य माना जाए या
01:31:28:01 पुराणों को सत्य माना जाए या नहीं ये आर्य समाज वाले कंफ्यूज कर रहे हैं जब जब प्रकाश डाले अच्छा जरा प्रकाश ठीक है पुराण बिल्कुल सत्य है पुराणों में दी गई जो घटनाएं हैं वो हमें विभिन्न प्रकार के जो अर्थ होते हैं वैज्ञानिक आध्यात्मिक और दार्शनिक इस तरह के अर्थ समझाने के लिए भगवान रचते हैं फॉर एग्जांपल एक छोटी सी घटना बता दूं आपको ब्रह्मा सरस्वती का विवाह सबसे पहली बात है कि पुराण पुराण जो रचे गए हैं पुराण पुराणों की जो घटना है वह कभी ना कभी किसी ना किसी काल में वह आर्य समाज त वाद के सिद्धांत को मानता है जी जी हम इस पर बात करेंगे तो यह जो पुराण वाली बात है इसमें बात यह है
01:32:24:16 कि जैसे ब्रह्मा सरस्वती का विवाह तो कोई भी घटना पुराणों में जो ऐसी है उसका आधार कहीं ना कहीं वेदों में वर्णन है इसके लिए श्री रामानुजाचार्य संप्रदाय के जो श्री संप्रदाय के जो मधवा चार्य जी हैं उनकी पुस्तक है क्यों उसका अध्ययन करेंगे तो उसमें पुराणों की ज्यादातर जो विवादास्पद घटनाएं हैं ब्रह्मा सरस्वती विवाह भगवान श्री कृष्ण की रास लीला तो यह सारी घटनाए आपको उसमें मिल जाएंगी और उनका संतुष्टि जनक बिल्कुल क्रिस्टल क्लियर आपको जवाब वहां पर उत्तर आपको मिल जाएगा एक जवाब में आपको यहां बता देता हूं ब्रह्मा सरस्वती विवाह ब्रह्मा सरस्वती विवाह के माध्यम से भगवान ने जो वैज्ञानिक अर्थ बताया है वह बताया है कि कोहरा कैसे बनता है सूर्य को वहां पर पिता की दर पिता माना और सूर्य से उत्पन्न होने वाली लालिमा उनकी पुत्री और पुत्री आगे आगे निकलती है सर्दियों के दिनों में आप देखेंगे कि जो लालिमा होती है सूर्य की वो सूर्य से पहले दिखाई देती है तो लालिमा हो गई उनकी पुत्री और सूर्य हो गए उनके पिता बाद में जो वाष्प जमी हुई होती है वाष्प के बादल होते हैं जो वही घनीभूत हो कर के ओस
01:33:40:02 बन के टपकते हैं तो यही चीज है कि पिता अपनी पुत्री के पीछे पीछे चले फिर जो वाष्प यानी कि वो जो भाई थे मरीच आदि उनके समझाने पर जब पिता को अपनी गलती का एहसास हुआ तो अपने शरीर का उन्होंने त्याग दिया त्याग किया और वह कोरा बनके अंधकार बनके पूरे समाज में छा गए तो य गया के अंदर भी है हा वही भागवत से ही बोल रहा हूं भागवत से ही बोल रहा हूं तो तो ये उसमें दिया हुआ है भागवत में बाकी हमारी हर संडे को एक 10:30 बजे ऑनलाइन जूम एप पर मीटिंग होती है उसमें आप आएंगे तो ये
01:34:19:27 सारे यह सारे जो टॉपिक्स हम एक एक करके क्लियर करते हैं बहुत अच्छा व इस पर अध्ययन कर रहे हैं तो उस पर आप आ सकते हैं और आप उस पर संपर्क करिएगा आप उस पर आ सकते हैं जूम प पर और वहां पर विस्तृत अध्ययन कर सकते हैं एक बात मैं हमेशा आपको कहूंगा एक सिद्धांत को आप सदैव पकड़ लीजिए जो भी गलत बात होगी वह आपसे कोसो दूर चली जाएगी एक सिद्धांत ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है अगर हम जिसके बारे में बात कर रहे हैं उसके सामने हमने यह लगा दिया
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→ Used in: A · Video क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता जिसको वह स्वयं ना उठा सके Part-2 #iskcon #aryasamaj... at 6:45 ↗
01:34:57:07 कि मनुष्य दृष्टि से सोचा जा सकने वाला कोई ऐसा कार्य है जो ईश्वर नहीं कर सकता
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01:35:02:10 तो इसका अर्थ है कि जिसके बारे में बात हो रही है वह ईश्वर नहीं है यह बहुत जरूरी सिद्धांत है अब अगर कोई कहे कि ईश्वर जो है निराकार है व साकार नहीं हो सकता तो गलत बाधित हो गया ईश्वर अगर कोई कहे कि ईश्वर सिर्फ साकार है वो निराकार नहीं हो सकता तो गलत बाधित हो गया ईश्वर तो ईश्वर साकार भी है ईश्वर निराकार भी है अगर कोई कहे कि वो शिव बन के वापस कृष्ण नहीं बन सकता तो गलत अगर कोई कहे कि वो कृष्ण बन के वापस शिव नहीं बन सकता तो गलत तो इसीलिए भगवान प्रूफ करने के लिए आपको तरह तरह के अर्थ बताने के लिए लीलाए तो रचते
01:35:42:01 हैं मुझे मेरी आवाज सुनाई दे रही है आपने क्या स्पीकर ऑन किया है तो इसीलिए भगवान तरह तरह की लीलाए रचते हैं जो इनके माध्यम से वह आपको साइंटिफिक अर्थ तो बता रहे हैं स्पिरिचुअल अर्थ तो बता रहे हैं और फिलोसॉफिकल अर्थ तो बता रहे हैं मगर एट द एंड व आपको यह बता रहे हैं कि मैं ईश्वर हूं और मैं कुछ भी कर सकता हूं भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा भगवत गीता में कि यह जो मूर्ख लोग हैं जो मानवो चित मर्यादा का चश्मा लगाकर मुझे देखते हैं वहां शब्द दूसरे हैं पर मैं अपने भावार्थ में कह रहा हूं तो भगवान ने खुद मना किया है कि मैं अगर मनुष्य दे में तु सामने आया हूं तो तुमको कुछ बताने के लिए आया हूं उस और ध्यान दो ना कि यह ध्यान दो अरे भगवान नेय कैसे कर दिया अब जो ब्रह्मा सरस्वती विवाह वाला मामला है उसको अगर हम और सरल भाषा में समझना चाहे तो ऐसे समझ सकते हैं
01:36:37:13 कि जिस जैसे हमने दूध और पनीर की सब्जी बनाई तो दूध पनीर की सब्जी बनाते समय हमने दूध क्या है वहां पर पनीर का पनीर किससे बन दूध से तो इसलिए दूध वहां पर पनीर का क्या हुआ पिता संस्थान हा और पनीर क्या है उसका अभिवचन यानी कि वह हो गई उनकी पुत्री क्योंकि वह दूध से निकली तो उनकी पुत्री हो गई अब इन दोनों को एक साथ कढ़ाई में डाला गया तो यह क्या हो गया पिता और पुत्री का समागम और फिर प्राप्त क्या हुआ हमें समागम से दूध पनीर की सब्जी यह हो गई इनकी संतान तो पिता और पुत्री के से विवाह पिता और पत्री का समागम और उससे प्राप्त हुई संतान तो इसी प्रकार से भगवान आपको अ यह बात बताना चाहते हैं कि भाई दूध पनीर की सब्जी कैसे बनती है तो उन्होंने लीला पूर्वक एक लीला रची जिसमें वो ब्रह्मा थे सरस्वती थी लीला रच करके उन्होंने आपको यह बता दिया कि दूध पनी की सब्जी ऐसे बनती है अच्छा एक इसमें एक फैक्ट और है कि इसी माध्यम से उन्होंने आदि देविक अर्थ भी समझा दिया आपको कि सृष्टि की रचना कैसे होती
01:37:52:13 है कि ईश्वर को जब सृष्टि की रचना करनी करनी होती है तो व एक से दो होते हैं और फिर एक से दो हो कर के फिर उन्हीं के साथ समागम करते हुए फिर व सृष्टि की रचना करते हैं और दुनिया के जितने भी धार्मिक ग्रंथ हैं धार्मिक नहीं धर्मा भाषी ग्रंथ या संसार के जितने भी ऐसे ग्रंथ हैं जो अध्यात्म की बात करते हैं या जो दर्शन की बात करते हैं उनमें सृष्टि की रचना तो ऐसे ही हो रही है आप भले ही तौरा पढ़ लीजिए आप भले ही आर्य समाज की पुस्तक पढ़ लीजिए शृष्टि की रचना तो ऐसे ही हो रही है तो यह तत्व आपको उसमें भी मिल जाएगा और अंततः एक बात ध्यान रखिए कि लीलाओं में आपको सारे फैक्ट बताने के बावजूद भगवान बार-बार यह कह रहे हैं कि ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है इसको मत भूलिए कभी भी सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रम यह गुरुदेव के उससे जो प्राप्त हुआ है आप इस सिद्धांत को पकड़े रहिए कभी भी यह मत भूलिए कि अब अभी एक यूट्यू है उन्होंने क्या किया ब्रह्मा सरस्वती विवाह का सारा सब व्याख्यान बताया है मगर उन्होंने अंत में यह बात नहीं बताई कि भैया यह केवल लिखा नहीं गया है यह बाकायदा भगवान ने
01:39:07:14 किया ऐसा व्यवहारिक तौर पर अब क्या होगा अगर हम केवल यह मान लेंगे कि यह केवल प्रतीकात्मक व्याख्या की गई आपको समझाने के लिए तो हम यह मान लेंगे कि पुराणों की जो बातें वो सिर्फ व्याख्या है वो असल में नहीं हुई घटनाए तो इसलिए सेल्फ प्रोक्लेम गुरु नहीं बनना चाहिए सेल्फ प्रोक्लेम आचार्य नहीं बनना चाहिए क्योंकि आप अच्छा करते करते भी कहीं ना कहीं अधर्म को बढ़ावा दे देते हैं जी भैया आर्य समाज जवाइन कर लिया
01:39:42:00 तो आर्य समाज जवाइन कर लिया तो लगता है कुछ समय बाद नास्तिक बन जाऊंगा तो मत करिए आर समाज जवाइन देखिए मैंने कहा ना आप कहीं से भी शिक्षा ले सकते हैं मगर उस सीमा के अंदर जब तक वह शिक्षा शंकराचार्य के विरुद्ध ना जा रही हो तदा अनुसार वेदों के विरुद्ध ना जा रही हो और तदा अनुसार सर्वशक्तिमान ईश्वर और परम स्वतंत्र मोक्ष के विरुद्ध ना जा रही हो इस नियम को पकड़ लीजिए आप कभी नहीं फस कहीं पर भी ठीक है जी आप कुछ कह रहे थे ल जी जी मैं यह कह रहा था किन के द्वारा सबसे ज्यादा यूज होने वाला एक वर्ड है कि हम जो स्कोन वाले आपको तो केवल आरोप लगाना आता है आप तो केवल आरोप लगाते हो इसन इतनी सेवा कर रहा है उसने इतने टेंपल्स बनवाए इतने स इतने करोड़ लोगों को उसने भोजन करवाया प्रसादम बांटा और सबसे बड़ी बात जब उनके लिए कुछ यदि उनके लिए हमको कोई बात उनकी अच्छी ना लगे उनके विरुद्ध हम कुछ बोले तो सबसे पहला उनका जो बचाव के लिए शब्द होता है तो वो यूज करते हैं कि वैष्णव अपराध आप लोग वैष्णव अपराध कर रहे हो आप लोग
01:40:57:03 बड़े पापी हो तो क्या इसकन के अंदर जितने लोग हैं केवल वही वैष्णव है इस कोन के बाहर वाले वैष्णव नहीं है क्योंकि स्कोन भी मैंने देखा है इस कोन के अंदर कई सारे आचार्य ऐसे हैं अमोग लीला के साथ जो कि कई बार वैष्णव आचार्यों का भी खंडन करते हैं और उनके अगेंस्ट भी बोलते हैं तो क्या वो वैष्णव अपराध नहीं है क्या वो यह देख नहीं सकते कि हम भी वैष्णव अपराध ही कर रहे हैं या फिर व संप्रदाय अपनी जो है उसको श्रेष्ठ मान रहे हैं किंतु गौड़ीय संप्रदाय का टैग भी कौन का अपना नहीं है वह भी चैतन्य महाप्रभु की संप्रदाय है क्योंकि राधा रमण जी तो सबके है केवल स्कोन की राधा रमण जी तो नहीं है केवल गड़ी संप्रदाय नहीं है यदि हम गड़ी संप्रदाय का तिलक लगा लेका अर्थ य नहीं कि हमने स्न का टैग लगा लिया अपने ऊपर हरे कृष्णा महामंत्र केवल इसको ने एक चीज पकड़ रखी है हरे कृष्णा अगर हम जय श्री कृष्णा भी बोलेंगे उनको जय श्री राम भी बोलेंगे राधे राधे भी बोलेंगे तो भी उनको आपत्ति आती है इस बात में कि आप जय श्री कृष्णा मत बोलिए आप हरे कृष्णा बोलिए आप जय श्री राम मत बोलिए आप हरे कृष्णा बोलिए आप राधे राधे मत बोलिए आप हरे कृष्णा बोलिए केवल हरे कृष्णा ही एक ऐसा महामंत्र
01:42:12:18 है जो आपको गलोक तक पहुंचा सकता है उनकी एक सबसे बड़ी फिलोसोफी यह है कि वो लोगों को किस चीज के अंदर फसा रहे हैं कि हम आप गलोक तक लेकर जाएंगे भाई जो यह संसार है यह बहुत बड़ा माया है और आदि शंकराचार्य जी का खंडन तो व मायावादी कह कर के बहुत सारी बातें हैं वह सब करते ही है खंडन नहीं करते नहीं नहीं खंडन का प्रयास करते हैं वह लोगों को भ्रमित करते हैं भ्रम करते हैं खंडन वो अपनी तरफ से खंडन करने का प्रयास करते हैं उनकी नजर में प्रकार से खंडन ही है किंतु खंडन वास्तव में है नहीं उनकी नजर में उनको ये लगता है कि हमने खंडन कर दिया क्योंकि अपने के अंदर जब वो उनके विरुद्ध बोलते हैं तो वहां पर तालियां बजती है देखिए मैं आपको एक मैं आपको एक बात बताऊं यहां पर अभी शायद आप थे नहीं उस समय अब मैंने अभी एक बात कही थी कि जो अप्र माणिक व्यक्ति होता है अपमा विचार होता है वह उन नियमों को स्वतः तोड़ता है जिन नियमों को वह अभी अभी दो मिनट पहले मान रहा था तो हम उन्हीं के नियमों से उनको उत्तर दे सकते हैं अब उन्होंने कहा कि चार संप्रदाय प्रमाणिक है रामानुज मधवा चार्य निंबार्काचार्य और वल्लभाचार्य यह चार संप्रदाय उन्होंने प्रमाणिक माने
01:43:28:08 उसी संप्रदाय का जो एक प्रमाणिक आचार्य हैं उसी संप्रदाय के श्री संप्रदाय के वह एक पुस्तक लिखते हैं क्यों और उस पुस्तक में वह लिखते हैं कि मायावादी मूर्ख है और भैया राधा को मना करता है आर्य समाज मानने को थोड़ा बताए नहीं नहीं राधा जी है उनका अस्तित्व है मैं ये बात पूरी कर लू तो क्या कहते हैं ये अभी वोह कह रहे हैं कि श्री संप्रदाय प्रमाणिक है अब श्री संप्रदाय यह बात बोल रहा है कि नहीं भाई
01:44:16:10 मायावादी जी है या इकोन वाले हैं या तो उनके अनुसार श संप्रदाय प्रमाणिक नहीं है और या फिर उनके अनुसार वो मायावादी नहीं है शंकराचार्य उनकी बातों से खंडन हो रहा तो वो खुद ही अपनी ही बातों का खंडन करते हैं ना अगर वो मायावादी कहेंगे तो उसी संप्रदाय प्रमाणिक नहीं है अगर प्रमाणिक है तो मायावादी नहीं है और वो उनको अगर मान रहे हैं कि श्री संप्रदाय प्रमाणिक है तो वो मान रहे हैं कि हम मूर्ख है हम मूर्ख है वो ये मान रहे हैं अब जैसे अ भगवत गीता के दूसरे अध्याय के 62 में श्लोक में यथारूप में इन्होंने लिखा कि जो शिव जीी है वह काम वासना के अधीन है लत के अधीन है ठीक और वहीं पर भागवत पुराण के भाष्य में एक श्लोक है मैंने पीडीएफ डाली हुई है उसका क्रमांक अभी वर्बल याद नहीं है उसमें शील प्रभुपाद जी कहते हैं मतलब जो जो भी भाष्य को लिखने वाले हैं क्योंकि मुझे तो इस बात पर भी डाउट है कि श्रील प्रभुपाद जी ने ही वो भाष्य लिखा है पूरा मुझे तो इस पर भी डाउट है तो वहां पर लिखा हुआ है कि पार्वती के साथ शिव को देखकर भोगी और काम वासना के अधीन समझने वाला व्यक्ति मूर्ख है तो अब
01:45:31:19 क्या हुआ यहां पर जो लिख रहा है जो भी जिसने यहां पर लिखा है उसने अपना ही अपने आप को मूर्ख कर दिया वहां पर भगवत गीता के आधार पर और अगर उसने उसने वहां पर यह लिखा तो उसने इसका खंडन कर दिया वो आप मुझ बता रहे हैं एक ब सेंड करना मैं उसको देखूंगा हां हां दे तो ये होता है अप्र माणिक की पहचान ये प्रमाणिक जो होते हैं अभी मैं कुछ दिन पहले ब्रह्मा कुमारी इस के सेंटर में चला गया था तो वहां पर जाकर के मैंने कहा कि क्या है क्या नहीं थोड़ा सा उनसे पूछा तो उन्होंने बताया रेडियो पर आकाशवाणी होती है डेली तो मैंने उनसे पूछा कि अच्छा मतलब भगवान डेली ज्ञान देते हैं आ कर के बोले हां तो मैंने कहा ये तो माना नहीं जा सकता शाश्वत नहीं है तो मैंने कहा जो किसी विशेष देश काल परिस्थिति में उत्पन्न हो हमारा धर्म थोड़ी ना हो सकता है ये तो भगवान भगवान कह रहे हैं आपसे आकर के तो तो झूठ भी हो सकता है बोले नहीं भगवान झूठ नहीं बोल सकते मैंने बाद हो गए सर्वशक्तिमान नहीं रहे भगवान उसके बाद जब वो मुझसे परेशान हो गए तो अंत में उन्होंने मुझको प्रसाद खाने को दिया अंदर बोर्ड में सब जगह लिखा हुआ था सात्विक आहार सात्विक आहार करें और प्रसाद के नाम पर क्या दिया
01:46:47:12 नमकीन भुजिया तो जब मैंने हाथ में लिया उन्होंने जब मुझे पकड़ाया तो मैंने कहा कि यह तो सात्विक नहीं है यह तो तामसिक है है तो मैंने कहा मैंने कहा मैंने कहा यह तो सात्विक है वो तामसिक है ये तो तो बोले अरे वो थोड़ा इतना क्वेश्चन नहीं करनी चाहिए तो मैंने कहा था तो धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा इसका क्या करें तो बोले कि नहीं नहीं आप जो है बहुत क्वेश्चन करते हैं आप रहने दो इस तरीके से यानी क्या हुआ अंदर जो कह रहे सात्विक भोजन करो खुद प्रसाद के नाम पर तामसिक प्रस्तुत कर रहे हैं तो स्वयं उन्ही नियमों को तोड़ रहे हैं जिन नियमों को खुद प्रतिपादित करते हैं इसका अर्थ क्या हुआ कि मैं जब तक जो कुछ मानता सोचता समझता हूं उसको तुम सब मान लो यही तो अधर्म है आप वोह सिद्धांत मत मानो जो स जो सार्वभौम हो जो मनुष्य मात्र के लिए वो जो जिस समय जिस काल में मुझे अच्छा लग रहा है वो आप मानो वो धर्म इनसे क्वेश्चन करने का का प्रयास करेंगे तो यह कहीं ना कहीं कोई ना कोई बहाना बना देंगे या फिर कुछ ना कुछ टाल देंगे लेकिन य इसका सही उत्तर इनके पास प्रमाणिक उत्तर ये लोग नहीं देंगे उस ची ना ना और बात करने से बचेंगे
01:48:03:04 बात करने से बचेंगे हालांकि राहुल आर्य जी जो है उनका सिद्धांत हम हमारे लिए स्वीकार्य नहीं है क्योंकि ईश्वर बाधित है मगर फिर भी उन्होंने जब इनको चैलेंज किया तो ये उन्होंने चैलेंज किया जो भी किया मगर इन्होंने सामना करने की बजाय पक्ष निकाले कि किस तरीके से डिबेट ना हो अरे भाई हिंदी में बात करके यह तो कर सकते हो कि किसका क्या विचार है मत करो संस्कृत की संस्कृत का अर्थ हिंदी में आप एक चर्चा कर लो उसको शास्त्रार्थ नाम मत दो आप एक बहस समझ लो उसे डिबेट समझ लो उसको शास्त्रार्थ मत कहो भाई शास्त्रार्थ का मतलब हुआ शास्त्र का अर्थ तो शास्त्रार्थ उसे मत कहो डिबेट मान लो उसको चर्चा मान लो इंटरव्यू मान लो इकोन की जो आपने जीबीसी को ललकार रहे हो आपको होश भी है आप क्या कर रहे हो तो इनको भी नहीं है कि यह लोग क्या कर रहे हैं श पुरी शंकराचार्य जी पर एक वीडियो डाल कर के योगा और योगा ऑफ लव कह रहा है कि बात सिद्धांत की नहीं है किंतु आप डायरेक्टली आदि शंकराचार्य जी पर प्रश्न कर रहे हो और आपको होश नहीं कि आपका क्या कर रहे हो अरे देखिए इस तरह से अगर बात करेंगे तो हजारों चीजें निकल आएंगी अभी थोड़े
01:49:18:14 दिन पहले एक विवाद हो गया था उन्होंने कह दिया था मनोज मुंतशिर जी ने कि भाई यह जो है हनुमान जी जो है भगवान नहीं है उनकी इस बात पर कितना बवाल हुआ अब इस कौन तो छाप रहा है पढ़ा रहा है लिखवा रहा है उसकी बात प कोई वो नहीं हैके अलावा इसके अलावा अभी स्कोन वालों ने एक अमोग लीला जी ने एक वक्तव्य दे दिया था इनके ऊपर विवेकानंद जी के ऊपर भाई विवेकानंद जी ऐसे ऐसे है तो कितना तमाशा हुआ अब उसके बाद आप देखो कि अमोग लीला जी स्वयं भगवान आदि शंकराचार्य और उनसे जुड़े हुए लोग उनकी माता वाला दृश्य का मिमिक्री कर कर के बताते हैं उनकी माता वाला जो दृश्य है जिस समय वो विरा समय था मां से जब वो ब्रह्मलीन होने वाली थी तो उस समय का उस समय के सीन की मिमिक्री कर कर के बताते हैं और वो ज्यादातर तो मिमिक्री करते हैं लोगों की तो मिमिक्री जब वो करके खुद मजाक उड़ा रहे हैं तो फिर वह कैसे किसी को टोक सकते हैं तो ऐसे बहुत सारी चीजें हैं जो विवादास्पद है मैं तो सदा यही कहता हूं एक प्रश्न आया था एक मिनट एक प्रश्न आया था
01:50:34:04 आत्मा परमात्मा और प्रकृति तीनों अनादि तत्व निराकार है भाई निराकार तो है वो ठीक है मगर वो अंततः लीन है एक ही जगह जाकर के अद्वैत की स्थिति में मगर वो परमार्थ की स्थिति है वो व्यवहार की स्थिति नहीं है परमार्थ व्यवहार का अंतर समझ लीजिए जब हम कहते हैं हम ब्रह्मास्मि तो इस स्थिति तक हमें प्राप्त इस स्थिति को हमें प्राप्त करना है इस स्थिति को अभी मानना नहीं है इसके अनुसार व्यवहार नहीं करना है हमें व्यवहार करना है कि मैं ब्रह्म नहीं हूं तब हमें स्थिति प्राप्त होगी कि मैं ब्रह्म हूं तो वह प्राप्त है अब इसको उदाहरण के तौर पर ऐसे समझ सकते हैं यही अंतर अद्वैत द्वैत का यही अंतर साकार निराकार का है इसको ऐसे समझ सकते हैं कि पृथ्वी वास्तविकता में गोल है मगर हम व्यवहार करते हैं चपटी के अनुसार कि इधर चले जाओ इस दिशा में चले जाओ उस दिशा में चले जाओ अगर हम देखें वास्तविकता में जब हम ऐसे उंगली कर रहे हैं तो वो उंगली पृथ्वी से बाहर जा रही है हमारी जब भी हम उंगली कर रहे कि इधर चले जाओ उधर चले जाओ मगर हम व्यवहार क्या मान के करते हैं ईस्ट वेस्ट नॉर्थ साउथ ये सब हम चपटी के अनुसार करते हैं हम मैप बनाते हैं चपटी के अनुसार
01:51:49:07 उस पर चलते हैं हम गोल उस पर नहीं चलते हमारा व्यवहार होता है गोल वो चपटा और व्यवहार होता है वोह परमार्थ प्राप्त वास्तविकता होती है क्या कहते हैं गोल पृथ्वी गोल है मगर हम व्यवहार करते हैं चपटा उसी प्रकार से जो हमारी जो प्राप्त है वह है हमारा अद्वैत की स्थिति और वह प्राप्त कैसे होगी द्वैत से द्वैत और अद्वैत का सामंजस्य आदि शंकराचार्य जी का व है सिद्धांत और यह लोगों ने अपनी अपनी किसी प्रकार रोटिया सेकने के लिए या अपनी दुकान चलाने के लिए इस तरह की बातें उड़ाई है कि अरे वो वो लोग तो स्वयं को भगवान समझते हैं जीव कभी भी ब्रह्म नहीं बन सकता ब्रह्म यानी भगवान अलग है और जीव अलग [संगीत] है भाई साहब य आप एक पक्षीय बात कह रहे हैं ये आपका क्लेम है आप इसको सिद्ध करने के लिए मंच पर आए और प्रमाण प्रस्तुत करें ये आपका क्लेम है या आप निर्णय दे रहे हैं हम निर्णय के साथ साथ हम निर्णय तो देने वाले होते ही कौन है हम जो बात कह रहे हैं उसके लिए तर्क रख रहे हैं प्रमाण भी रख रहे हैं अगर आप इस सिद्धांत को नहीं मानेंगे तो इसका
01:53:04:08 अर्थ यह है कि आप यह नहीं मानते कि आप जो है आपका जो परम स्वतंत्र मोक्ष है आपके सिद्धांत के अनुसार ठीक है भैया राधा को मना करता है आर्य समाज मानने को थोड़ा बताएं राधा को मानना है राधा को माना है हमारे प्रमाणिक आचार्यों ने हमारे उन सभी आचार्यों ने राधा को माना है जो परंपरा प्राप्त आचार्य है और ज्ञान वही प्रमाणिक जो परंपरा से प्राप्त हो एक अंश राधान हा उसको उसका आप आलंबन लीजिए और इसमें भी क्यों में भी आपको मिल जाएगा राधा का प्रकरण धा राधा जी का प्रकरण तो उसका आप अध्ययन कर लीजिए आप आर की बात को तब मान सकते हैं ना जब आ समाज एक प्रमाणिक परंपरा से हो तो गुरु गोविंद और ग्रंथ इन तीन चीजों के यह तीनों चीजें आप आपस में इंटरडिपेंडेंट है तो इनमें से किसी भी एक चीज को हटा देंगे तो आपको धर्म प्राप्त नहीं होगा धर्म के नाम पर अधर्म प्राप्त होगा हमारी जो गुरु परंपरा है वो 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष की है अब किसी को यह नहीं पता कि उसकी गुरु परंपरा कितनी पुरानी है जो जितना पुराना होगा
01:54:19:21 उतने ही ज्यादा उसके पास अच्छा तर्क और सिद्धांत होगा क्योंकि 31 10 खरब 40 अरब वर्ष जो पुरानी एक अरब 97 करोड़ 29 911 वर्ष की गुरु परंपरा हमारी है तो नारायण से हमारी गुरु परंपरा चलती है जी जो ना मानने वाला है गुरु परंपरा को वह तो कुछ कह नहीं सकते उसका जैसे आचार्य प्रशांत उ को प्रमा वो उन्ही शास्त्रों को नहीं मान रहे ना जिनको वो मानते हैं अगर गुरु परंपरा को नहीं मान रहे तो वह उसी राम को नहीं मान रहे जिनको व मानते हैं उसी कृष्ण को नहीं मान रहे जिनको व मानते हैं दो साट बातें लोगों की एक चीज मैंने देखी एक तो गौतम खतर जी है व पहले तुलसी की माला पहनते थे की माला पहनना बंद किया वृंदावन में के साधुओं के इंटरव्यू लिया करते थे अ जाते होंगे अपने व्यूज वगैरह के लिए य के लिए किंतु बाद में एक चैनल पर आकर के वहीं पर वो यह कहते हैं कि मैं केवल को मानता हूं यदि आप वेदों को मानने वाले हैं तो वृंदावन में जा क्योंकि आर्य समाज तो मूर्तियों का खंडन करता है तो वृंदावन में जाकर के आप तुलसी की माला पहन कर के आप उन साधुओं का इंटरव्यू ले रहे हैं रशियन का इंटरव्यू ले रहे हैं
01:55:35:02 तो इसका अर्थ फिर आप अपने आ समाज का खंडन कर रहे हैं अब जो वाले हैं जो श्रीला प्रभुपाद जी को मानते हैं व श्रीला प्रभुपाद जी के नाम का कीर्तन करते हैं मेरे भी कॉलेज के अंदर आए थे जीएल यूनिवर्सिटी स के अंदर तो वहां पर भी उन्होंने अपने गुरु के नाम का कीर्तन करा हालांकि हम जो कीर्तन करते हैं वो भगवान के नाम का करते हैं जो भी आचार्य या गुरु होते हैं उनके कहे हुए वचनों का आदर करते हैं सम्मान करते हैं और उनके वचनों के ऊपर हम चलते हैं कपात जी महाराज के वचनों के ऊपर हम चलते हैं उनको मानते हैं पूरी तरीके से किंतु उनके नाम कीर्तन नहीं करते उनकी जय भी बोलते हैं हम धर्म सम्राट कर पाते जी महाराज की जय भी बोलते हैं हम अपने आचार्य की जय बोल सकते हैं किंतु उनके नाम का कीर्तन किस प्रकार हम कर रहे हैं मीराबाई का कीर्तन कोई नहीं करता तुलसीदास जी का कीर्तन कोई नहीं करता उनकी लिखा हुआ जो ग्रंथ है रामचरित मानस उसको सब पढ़ते हैं उसको सब फॉलो करते हैं मीराबाई के जो पद है धोए हैं सूरदास जी के उनको सब पढ़ते हैं किंतु ये कहीं नहीं देखा जा रहा कि सूरदास जी के नाम पर मीरा बाई के नाम पर तुलसीदास जी के नाम पर इन सबके नाम पर मंदिर बना कर के और इन्हीं के नाम पर लोग नाच रहे हैं किंतु जो स्कन वाले हैं वो शीला प्रभुपाद जी के नाम के ऊपर नाच रहे हैं और जी जी हम लोग बैच कर रहे हैं और
01:56:50:16 ये हर संडे को 10:30 बजे एक जूम मीटिंग की लिंक हम प्रोवाइड कराते हैं तो उसमें आप आ सकते हैं आप संपर्क करिए उसमें कुछ औपचारिकताएं हैं उनको आप पूरा करिए तो आप उस जूम मीटिंग में आप बैठेंगे और हम सब मिलकर के साथ में थोड़ा सा अध्ययन करेंगे और मनीष जी आपने एक बात कही कि जीव और ब्रह्म एक है उस पर मैं आपको बता दूं जीव और ब्रह्म एक नहीं है आपने कहा तो इसका अर्थ है आप यह मानते हैं कि जीव में ब्रह्म नहीं है यानी कि दुनिया में कोई ऐसी जगह है जहां पर ईश्वर नहीं है जिस ईश्वर को आप मान रहे हैं यही तो मैं कह रहा था कि ईश्वर मतलब जब भी कोई सिद्धांत शंकराचार्य के विरुद्ध जाएगा तो व ईश्वर को तुरंत बाधित करने लगेगा अब आप य आपको य मानना पड़ेगा सबसे पहले कि कण कण में ईश्वर नहीं है इसका क्या करेंगे मनीष जी से पूछा मैंने खैर मनीष जी अगर आप अपना पक्ष रखना चाहते हैं तो यह जो मंच है आज इसीलिए विशेषता किया है देखिए मेरी किसी संस् से लड़ाई नहीं है मेरी लड़ाई है मेरी लड़ाई है सिद्धांतों से जो ऐसे सिद्धांत है जो ईश्वर को बाधित करेंगे तो उसके लिए उससे मैं हमेशा लडूंगा ईश्वर जीव में भी है जीव
01:58:05:22 के बाहर भी है प्रकृति में भी है पर जीव और प्रकृति ईश्वर नहीं है आप मंच पर आकर के बात करें तब थोड़ा बात हो पाएगी क्योंकि इस तरीके से व्यवधान पड़ेगा बीच बीच में अ कोई आना चाहे मंच पर तो आ सकते हैं मंच खाली है युगल जी आपको मैं दोबारा ना
01:58:39:22 चाहूंगा ठीक है तो बात ऐसी है कि जीव में ईश्वर है पर जीव और ईश्वर एक नहीं है तो इसको थोड़ा मुझे प्रैक्टिकली आप समझाइए कि कैसे है जीव के अंदर ईश्वर है पर जीव ईश्वर नहीं है तो यह तो वही सिद्धांत हो गया ना शंकराचार्य जी का व्यवहारिक तौर पर जीव ईश्वर नहीं है मैं भी यही कह रहा हूं पर मेरे अंदर क्योंकि ईश्वर है तो अंतता मैं उस स्थिति को प्राप्त कर करूंगा जिसमें मैं और ईश्वर एक हो जाएंगे जिसमें भगवान राम के साथ मेरा मिलन हो जाएगा भगवान कृष्ण के साथ मिलन हो जाएगा आपको आर समाज के आचार्यों को आमंत्रित करना चाहिए मैं आपको सही से अपना तत वाद का पक्ष समझाने में सक्षम नहीं हूं तो आप उन्हीं को लेकर आइएगा अब मैंने तो अब मेरा जितना यथासंभव प्रयास था तो वह मैंने कहा हालांकि यह कोई शास्त्रार्थ की जगह नहीं है मगर मेरा सिद्धांत केवल इतना है कि आप ईश्वर को सर्व शक्तिमान और मिलने वाले मोक्ष को परम स्वतंत्र मोक्ष सिद्ध कर दो आप
01:59:55:02 मुझे अपना बना लो मैं आपका प्रचारक बन जाऊंगा फिर आप चाहे आर समाज वाले हो स्कोन वाले हो कोई भी हो वद वेद विरुद्ध विचारधारा के भी हो तब भी मैं आपका प्रचारक बन जाऊंगा सच्चाई यह है कि जब आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करने के पीछे पड़ जाएंगे जब आप मिलने वाले मोक्ष को परम स्वतंत्र मोक्ष सिद्ध करने के पीछे पढ जाएंगे तो आप वेदों का अनुसरण करते हुए शंकराचार्य के अर्थ को मानने वाले बन जाएंगे और तब स्थापित होगा आपके द्वारा भी
02:00:35:27 धर्म ठीक है तो इसको फिर समाप्त करते हैं आज काफी अच्छा रहा अगली बार थोड़ा अच्छे कैमरे के साथ आएंगे और शब्दावली में कुछ भूल चुक हुई हो उसको क्षमा करिएगा यह चर्चा केवल तो तो आप मंच पर क्यों नहीं आ रहे हैं लिंक ऊपर दिया गया उसको टच करिए और मंच पर आ जाइए इस प्रकार आपको भी समय लग रहा है आपकी बात एक एक पढ़ के जवाब देने में वो है सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि जिस पर की कोई भी नियम लागू ना होता हो हां तो आप वो उत्तर दे दीजिए ना भाई ईश्वर अवाद है आपकी चाह क्या है सिंपल यहां से शुरू कर लीजिए क्या आप चाहते हैं आपके मन में ऐसे भाव आते हैं कि मैं प्रकृति को कंट्रोल कर सकूं धूप ज्यादा पड़ रही तो कम हो जाए भविष्य देखना चाहते हैं आपके मन में ऐसे भाव आते हैं कल कौन जीतेगा इंडिया पाकिस्तान के मैच में क्या आपके मन में भाव आते हैं कि मैं अपनी माता जी की
02:01:50:28 गोद में दोबारा खेला हं भूतकाल में जाकर के इसका अर्थ क्या है इसका अर्थ है कि आप सब सारे नियम तोड़ने वाला बनना चाहते हैं तो आपकी चाह का विषय कौन होगा सब्जेक्ट कौन होगा जो सारे नियम तोड़ सकने में सामर्थ्य वान हो और अगर मान लीजिए आप तब भी यह कह रहे हैं कि ईश्वर जो है सर्वशक्तिमान नहीं है तो इसी बात की तो लड़ाई है इसी बात की लड़ाई है अगर आपका ईश्वर जो है बाध्य बाध्य है अबाध नहीं है आप अबाध ईश्वर को ख्या पित नहीं कर रहे हैं तो इसी बात का दुनिया में युद्ध है उसी को घुमा फिरा के किसी ने अन्य अलग-अलग दर्शनों के नाम से प्रतिपादित कर दिया उसी बाध्य ईश्वर को बाधित ईश्वर को अगर मनुष्य जो है सब कुछ कर सकने वाला बनना चाहता है तो उसकी चाह का विषय वही ईश्वर होगा जो सब कुछ कर सकता हो सत चित आनंद जो कहीं भी अटके ना ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे ना हो सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक हो वह कहलाएगा ईश्वर आप कह रहे हैं कि ईश्वर सब कुछ नहीं कर सकता कुछ कार्य ईश्वर ऐसे हैं जो नहीं कर सकता तो नियमों के नीचे आ गया ना बाधित
02:03:06:20 हो गया सर्वशक्ति मत्ता खत्म हो गई उसकी और सव शक्ति मत्ता खत्म हो गई तो इसका मतलब आप यहां पर लोगों को नास्तिक बना रहे हैं आप कह रहे हैं कि दुनिया में एंटिटी है ही नहीं और जब ति बना रहे तो मैंने क्या कहा था नास्तिकता की ओर ले जाने वाले जो हमारा कम्युनिटी पोस्ट पर जो व डाला हुआ है चार्ट उसको आप पढ़िए तो उसमें जो तीसरा चरण होता है वो यही होता है नास्तिकता की ओर ले जाने वाले व आप आपको पता नहीं आप लोगों को नास्तिकता की ओर ले जा रहे हो इस प्रकार से जब आप यह कह रहे हो कि दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान नहीं है तो ऐसे ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कोई व्यक्ति अपना अथाज ताकत नहीं लगाएगा धर्म को धर्म का आलंबन लेने की और वो उसके धर्म में ढीला आएगी वो कभी झूठ बोल लेगा अगर बहुत व्यवहारिक तौर पर आ जाए तो उसका धर्म ऐसा होगा जिसके जीवन में सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं होगा उसका धर्म भी वीक पड़ने लगेगा क्योंकि उसके मन में य होगा कि अरे ये भी तो इसको प्राप्त करके पढ़ मुझे मिल भी क्या जाएगा आखिरकार वो भी तो अधीन ही है किसी नियम के तो यही होता है यह नियम के अधीन ना होने वाला ईश्वर और नियम के अधीन होने वाला ईश्वर और फिर भी अगर आपको मानना है तो आप उसे मानिए आपका वह
02:04:21:25 चुनाव है मैं उसमें कुछ नहीं कर सकता ठीक है तो समाप्त करते हैं आज की चर्चा को अच्छा लगा आप सब लोग आए मनीष शर्मा जी से बात करके अच्छा लगा और आयुर्वेदिक मार्ग आपसे भी बात करके अच्छा लगा जूम पर कनेक्ट हो जाइएगा अपने बारे में बताइएगा फॉर्मेलिटीज कुछ होती है वो और उसमें आप अध्ययन कर सकते हैं साथ में ठीक है सभी को जय श्री राम जय जगन्नाथ हर हर
02:05:04:25 महादेव
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