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00:00:00:00 ऐसे मंदिर जान की जरूर ही नहीं है क्योंकि ऐसी जगह मंदिर कहलन योग्य नहीं है यह कौन सा मंदिर है जो तन देखा है तुम्हारा भगवान श्री रामचंद्र जी को हम बना ब्राह्मण संदेश यात्री संदेह कुछ उनके गन जहां ब्राह्मण जैसे हैं ये तीर चला दो क्षत्रिय हैं तो क्या है ब्राह्मण है की क्षत्रिय हैं कुछ भी नहीं है दोनों में से कुछ भी नहीं है परिवार वाले शादी के लिए इसलिए नहीं राजी हुए क्योंकि जाति का अंतर ऊपर नीचे वो लड़की अगर सही होगी उसके फ्रेम में सच्चाई होगी तो ऐसे घर वालों की बात क्यों सुन रही है इसका अर्थ क्या हुआ की लैबराडोर से हम बहुत ही एग्रेसिव होने की उम्मीद नहीं कर सकते और रॉटविलर से हम बहुत ही डोमेस्टिक होने की उम्मीद नहीं कर शक्ति
00:00:52:03 तो उसके अनुसार पांच प्रकार के रक्त प्राप्त हुए और जब श्वेत वर्ण रक्त वाले शरीर में श्वेत वर्ण रक्त को डाला गया तब उसे ऑफिसर को बचाया जाना संभव हो गया जय श्री राम तो आज हम बात करेंगे वर्ण व्यवस्था के ऊपर जो हमारा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि इसी को आधार बनाकर के जो सनातन के विरोधी तंत्र हैं वो कई बार सनातन पर आक्षेप लगाने का प्रयास करते रहते हैं और यही वो मुख्य विषय है जिसे सनातन खुद को सनातनी खाने वाले कई ऐसे तंत्र हैं जिसको समझ ना अपने की स्थिति के करण अथवा इसका पालनपुर करने में कठिनाई आने के करण वर्ण व्यवस्था को जानकारी देते हैं सरे से तो हम कई चैप्टर में इस बड़े में बात करेंगे पर इस टॉपिक को स्टार्ट करने से पहले मैं आपको एक पॉइंट को याद दिल देना चाहता हूं की सनातन धर्म जब कोई भी बात करना स्टार्ट करता है तो सनातन धर्म उसे विषय को उसकी अंतिम स्थिति तक ले जाता है बिल्कुल पिक लेवल तक जाकर के बात करता है इसीलिए क्या होता है कई बार इतना नॉन सत्य सुनने के लिए हर कोई व्यक्ति तैयार नहीं होता है जिसके करण या तो वो धर्म से च्युत होने लगता है या फिर उसके मां में संशय आने लगता हैं ये
00:02:07:22 तरह तरह की कई बातें आने लगती है इसीलिए हर बार मैं अपनी वीडियो में बताता हूं की कभी भी धर्म के विषय में कोई भी निर्णय लेने से पहले परंपरा प्राप्त आचार्यों का सानिध्य में जैन और तब उसे समझना का प्रयास करें स्वाधीन करते हुए अपने मां से बनाए हुए नियम ना बनाएं सनातन धर्म के विषय में तो चलिए स्टार्ट करते हैं आज का विषय वर्ण व्यवस्था और विधि निषेध विधि निषेध में क्या है की स्त्रियों के जो अलग आचरण बताए हैं या फलाने व्यक्ति की जो अलग अधिकार बताए हैं उन पर भी बात करेंगे
00:02:43:09 क्या हमें वनावस्था की आवश्यकता है तो अगर देखा जाए तो दुनिया में कोई भी तंत्र जो कोई भी सिस्टम है जो कोई भी विभाग है जो कहानी पर भी कुछ भी कार्य हो रहा है तो वहां पर सबसे पहले होता है वर्गीकरण यानी की क्लासिफिकेशन अगर कोई स्कूल खुलेगा तो यह ते होगा की वहां पर प्रिंसिपल कौन होगा क्लर्क कौन होगा पियून कौन होगा टीचर्स कौन होंगे और टीचर्स में भी वर्गीकरण होगा की ये इस स्टैंडर्ड तक के बच्चों के टीचर हैं ये इस स्टैंडर्ड तक के बच्चों के टीचर हैं सब कुछ अगर कोई क्रिकेट खेल जा रहा है क्रिकेट के मैच है तो वहां पर जब टीम उतरेगी तो उसमें वर्गीकरण होगा की कौन कैप्टन है कौन वॉइस कैप्टन है कौन विकेट कीपर है कौन बॉलर है कौन बैट्समैन है इसी प्रकार से अगर कोई पुलिस स्टेशन है तो उसमें भी क्लासिफिकेशन है की कोई स्पेक्टर है कोई हेड कांस्टेबल है कोई कांस्टेबल है कोई केवल गार्डन है और इसी तरीके से जो आपका कोर्ट है न्यायालय है जुडिशल सर्विसेज है उसमें भी वर्गीकरण होता है की कोई वहां पर जज है कोई वहां पर एडवोकेट है कोई वहां पर कानून है और कोई वहां पर कोई वहां पर स्टेनोग्राफर है तो इसका अर्थ क्या हुआ वर्गीकरण जो है वो समाज की जरूर है वर्गीकरण समाज की डिमांड रिटायरमेंट है आवश्यकता है इसीलिए समाज को सुवास्थित करने के
00:03:58:09 लिए ईश्वर ने भी एक वर्गीकरण दिया है जिसे हम वर्ण व्यवस्था कहते हैं जिसके लिए प्रमाण है की ईश्वर ने ये वाले कार्य करने के लिए इनको बनाया फलाने वाले कार्य करने के लिए इनको बनाया फलाने कार्य करने के लिए इनको बनाया और वर्ण व्यवस्था केवल मनुष्य में नहीं है पशु में है पक्षियों में है सनातन धर्म के द्वारा पेड़ों में भी वर्ण व्यवस्था दी गई है देवताओं में वर्ण व्यवस्था दी गई है इस चैप्टर को स्टार्ट करने से पहले हम दो बातें जान लेना हमारे लिए बहुत आवश्यक है की दुनिया में ईश्वर के विषय में जितनी भी विचार धाराएं हैं जितने भी मत्तांतर हैं उनके अनुसार एक बात तो निश्चित है की मनुष्य का जो भौतिक जीवन है यह उसकी अंतिम स्थिति नहीं है इस जीवन से भिन्न भी उसका एक अस्तित्व है उसकी एक पहचान है जहां पर यहां पर किया गए कर्मों के आधार पर उसका फैसला होना है और इसी कम में आगे जैन तो यहां किया गए जो पुण्य कर्म है उनका जो संग्रह है मनुष्य के पास इस के आधार पर यह ते किया जाएगा की उसको मोक्ष प्राप्त होगा या नहीं होगा अगर सरल भाषा में कहें तो यहां पे मनुष्य का आना उसके लिए टास्क है उसके लिए उसके लिए प्रतियोगिता में भाग लेने जैसे के समाज है उसको यहां पर आकर के विजय
00:05:13:15 प्राप्त करने के समाज है अब जरा जो हमने पिछले जहां पर हमने वर्ण व्यवस्था की आवश्यकता को जाना वहां पर जो हमने उदाहरण लिए थे उन उदाहरणों से हम यह जचने की कोशिश करें की मनुष्य का वर्ण से निर्धारित होना चाहिए या कर्म से तो अगर कोई पुलिस स्टेशन है वहां पर हमने ठाणे में जान से पहले ते नहीं किया की कौन इंस्पेक्टर होगा और कौन हवलदार होगा तो ठाणे की स्थिति क्या होगी की किसी के यहां पर ढाका पद रहा है और वो फोन मिला रहे हैं पुलिस स्टेशन में के भाई हमारी आकर के हेल्प कर दीजिए मगर ठाणे में एक माल युद्ध चल रहा है की आज इंस्पेक्टर कौन बनेगा आज हवलदार कौन बनेगा और जब उनके पास वो फोन आया नेक के लिए सहायता के लिए तो यहां से जो महानुभव होंगे जो आपस में माल युद्ध कर रहे होंगे इंस्पेक्टर की पदवी को प्राप्त करने के लिए वो कहेंगे की अभी हमारे बीच में डिसाइड नहीं हुआ है की कौन इंस्पेक्टर है कौन हवलदार है कौन संतरी है कौन गार्डन है इसलिए पहले हम डिसाइड कर लेने फिर हम आपकी मदद करने आएंगे क्या यह कोई व्यवस्था कहलाएगी अच्छा अगर क्रिकेट के मैदान में किया जाए की कौन कप्तान होगा कौन विकेट कीपर होगा कौन वॉइस कैप्टन होगा तो मैदान में उतारने के बाद टीम सामने वाली टीम से पहले मुकाबला के लिए लड़ेगी या आपस
00:06:28:25 में ग जाएगी की कौन कप्तान बनेगा और कौन नहीं इसके साथ ही साथ अब कोर्ट रूम की बात ले लेते हैं अगर कोर्ट रूम से बाहर यह ते नहीं होगा की कोर्ट रूम में जान के बाद कौन जज है कौन हार्डवेयर है कौन पुणे है कौन स्टेनोग्राफर है कौन कलर है तो वहां कोर्ट रूम में जो मुकदमा चलेगा वो पहले इस बात का चलेगा की आज जज कौन बनेगा तो ये कोई व्यवस्था है यहां से एक तत्व उद्देश्य होता है की संसार में यदि कोई भी तंत्र ये मानता है की ये जो भौतिक दिखाई देने वाला मनुष्य का जीवन है यह मनुष्य की अंतिम स्थिति नहीं है और इससे भिन्न भी मनुष्य की कुछ आईडेंटिटी है कुछ ऐसी पहचान है जो अभी भी शेष र जाएगी इसी कम में वो ये मानता है की ये जो भौतिक जीवन है मनुष्य का ये तो केवल एक टास्क की तरीके से उसको प्राप्त हुआ है जिसे उसे पूरा करना है उसे प्रतियोगिता में जितना है तो फिर ऐसे में उसे ये भी मानना पड़ेगा की भाई यहां पर आने वाले व्यक्ति के जो पदभार हैं वो यहां आने से पहले निश्चित किया जाते हैं और यहां आने के बाद उसको टास्क के लिए पर्यटन करना पड़ता है ना की इस बात के लिए ये कौन कैप्टन होगा कौन वाइस कैप्टन होगा कौन विकेट कीपर होगा अच्छा इसके साथ ही साथ देखने वाली बात ये भी है की यहां अगर यहां
00:07:43:29 से बाहर की भी स्थिति है मैदान से बाहर भी अगर ये ते हो रहा है की कौन कैप्टन होगा कौन वाइस कैप्टन होगा तब भी मनुष्य आपस में फैसला नहीं कर रहे हैं जो टीम के प्लेयर हैं वो आपस में मिलकर के फैसला नहीं करेंगे की मैदान में जान का मैं कैप्टन बनेगा आप वॉइस कैप्टन बनेंगे नहीं उनसे एक सुपीरियर अथॉरिटी होगी जो ये ते करेगी की भाई तुम कैप्टन हो और तुम जो है वाइस कैप्टन हो इसी प्रकार से अगर हम पुलिस स्टेशन को देख लेने तो ठाणे में जान से पहले ते तो होगा की अंदर जान के बाद कौन इंस्पेक्टर है कौन हेड कांस्टेबल है कौन कांस्टेबल है कौन संतरी है मगर वो पहले जो ते हो भी रहा है वहां पर भी उनसे एक सुपीरियर अथॉरिटी है जो ये ते करेगी की अंदर जान के बाद तुम में से कौन किस पद को संभालेगा तो जितनी भी विचारधारा है जो ये मानती हैं की भाई यहां आना मनुष्य के एक टास्क है यह मैदान है जिसमें उसको जितना है तो ऐसे में उन्हें मानना पड़ेगा की उनके जो यहां पर आकर के जो डेजिग्नेशन है जो व्यवस्था निमित्त जो उनके पद हैं वो भी यहां से पहले यहां आने से पहले और एक किसी सुपीरियर अथॉरिटी के द्वारा ते किया जाते हैं इसीलिए सनातन के अनुसार समाज को सूर्यग्रस्थित रखना हेतु एक वर्ण
00:08:59:06 व्यवस्था दी जाति है जो व्यक्ति के जन्म से पहले ही प्रारंभ हो जाति है जिसके लिए ये प्रमाण भी उपलब्ध है अब जरा ये देख लेते हैं की ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य में अंतर क्या है तो ब्राह्मण वह है जिसे ज्ञान देने का कार्य करना है क्षत्रिय जिसको रक्षा देने के कार्य करना है जिसे व्यापार आदि के कार्य करने हैं और शुद्ध वह है जिसका सेवा का विभाग है यानी की साड़ी सर्विसेज इस के पास है तो ऐसे में ईश्वर को जब किसी से लड़वाने का कार्य करना है या इससे भिन्न किसी से केवल ज्ञान देने का कार्य करना है या इससे ने किसी से केवल सेवा के कार्य करने हैं या इससे भिन्न किसी से केवल व्यापार करना है तो अगर वो ईश्वर एक परफेक्शनिस्ट पूर्ण ईश्वर है तो फिर वह यह भी ध्यान रखिएगा की मैं छतरियां को रक्षा करने वाले व्यक्ति को एक ऐसा शरीर डन जो उसके रक्षा करने में सहयोग करें यानी की जो मैं कर्म उसके लिए निर्धारित कर रहा हूं उसके अनुकूल उसको शरीर प्राप्त हो जो मैं ब्राह्मण के लिए कार्य निश्चित कर रहा हूं वो ऐसा शरीर उसको प्राप्त हो जो उसके लिए जो उसके कार्य के लिए अनुकूल सिद्ध हो इसी प्रकार से जो मैं सेवा कर शुद्ध को दे रहा हूं वो उन कर्मों के लिए उसके पास एक अनुकूल
00:10:14:15 शरीर भी हो देखा जाए तो विज्ञान भी इस नियम को मानता है की अलग-अलग कर्मों को करने के लिए जो अनुकूल गन धर्म होते हैं वो मनुष्य को जन्म से प्राप्त हो जाते हैं वह मनुष्य को उसके जो वंशज होते हैं उसके जो पूर्वज होते हैं उनसे अनुवांशिकता के द्वारा प्राप्त होते हैं अब इसमें हम एक उदाहरण ले लेने की जो डॉग्स हैं उनकी कई ब्रीड्स हो गई हैं आजकल तो उन डॉग्स में कुछ लेब्रा डोर्स हैं आ कुछ रॉटविलर हैं पति बुलडॉग भी है और डाबरमैन भी है तो जन्म से इनके अंदर जो इसे जी प्रकार का कार्य लिया जाता है उसे प्रकार के जो गन हैं वो इनके अंदर जन्म से मिलते हैं आप रॉटविलर को जो छोटे बच्चे जी घर में होंगे बिल्कुल दूध मुंह में बच्चे वहां पर पाल नहीं सकते ड्रफटविलर से आप क्या कार्य कराएंगे फैक्ट्री की सुरक्षा करवाना या किसी ओपन एरिया है आपके पास वहां पर आपने उसको खुला छोड़ रखा है जो उसका मस्तिष्क और जो उसका ब्लू है बहुत ही ज्यादा एग्रेसिव है तो उसको आप अगर घर में रखेंगे तो आपको बहुत ही अलर्ट रहना होगा अपने बच्चों के प्रति अगर घर में कोई बूढ़े मां आप हैं तो उनके प्रति अभी हाल ही में आपने लखनऊ शहर में घटना अच्छी होगी जहां पर पति बुलडॉग नाम का डॉग पाल गया था और और उसकी हिंसक प्रवृत्ति के करण एक
00:11:29:17 वृद्ध महिला के मृत्यु हो गई थी वहीं पर लेब्रा डोर वाली जो ब्रेड है डॉग उनको कोई भी व्यक्ति सहजता से अपने घर में रखना है वह एक बात अलग है वह धर्म समझ नहीं होता है कुत्तों को घर के अंदर पालना मगर लोग रखते हैं लैबराडोर को और अपने घर के बच्चों के बीच उसको खेलने देते हैं कूदने देते हैं इसका अर्थ क्या हुआ की लैबोरेटर से हम बहुत ही एग्रेसिव होने की उम्मीद नहीं कर सकते और रॉटविलर से हम बहुत ही डोमेस्टिक होने की उम्मीद नहीं कर शक्ति तो ये जो चीज हैं जो डॉग्स की ब्रेड को क्लासीफाइड कर रही है वर्गीकृत कर रही हैं ये चीज उन्हें जन्म से ही प्राप्त हुई हैं उनकी अनुवांशिकता है उनके अंदर पहले से ही ऐसा ब्लू ऐसे मांसपेशियां ऐसी हड्डी इस तरह की चीज हैं जो उनसे फलाने फलाने कर लेने के लिए सहज हैं इस बात को और थोड़ा सा एक्सप्लोर कर लेते हैं तो आजकल आपने देखा होगा की जिनके संतान नहीं हो रही होती है वो डोनेशन लेने जाते हैं या फिर कोई कोई स्त्री अगर मां बने के लायक नहीं होती है तो शेरों की ऐसी मदद की और अपना रुझान करते हैं जब ऐसा कोई करता है जब वह डोनेट स्पर्म डोनेशन लेने जा रहा है और या फिर सरोगेट मदर के मदर के लिए जा रहे हैं तो वहां पे उनको ट्राई करते हैं की जी जिसको हम सरोगेट मदर बनाएं अपने
00:12:44:17 बच्चे होने वाले बच्चे की या फिर हम जिसका स्पर्म डोनेशन लेने वो फलाने फलाने गुना से परिपूर्ण हो वो ऐसा ऐसा हो जैसा हमें चाहिए वैसा हो यानी की डॉग्स सरोगेट मदर और स्पर्म डोनेशन के मामले में साइंस भी इस बात को मां रही है की व्यक्ति को जो गन हैं जो जेनेटिक्स हैं वो उसको जन्म से प्राप्त होते हैं जिनके अनुसार उसके द्वारा कार्य लिए जान पर आपका जो कार्य है आपका जो प्रयोजन है वो बहुत ही सरलता पूर्वक संपन्न हो जाता है फिर भी अगर इस व्यवस्था को मां भी लिया जाए तो कर्म करने के आधार पर बनी हुई जो व्यवस्था होगी वो कैसी व्यवस्था होगी इस प्रकार से एक ही दिन में कितनी बार किसी मनुष्य के वर्ण चेंज हो जाएंगे एक माता है जो अपने शिशु का ललन पालनपुर करती है सेवा करते समय वह शुद्ध कहलाएगी उसके लिए खाने की व्यवस्था करते समय वो वैश्य कहलाएगी और बाहर से कहीं पर उससे लड़ने ए गई की तुम्हारे लड़के ने हमारे बच्चे को मार दिया है इसको मारो तो उससे रक्षा करते समय वो माता क्षत्रिय कहलाएंगी और अपने इस शिशु को शिक्षा देते समय वो ब्राह्मण कहलाएगी तो क्या ये कोई व्यवस्था है जो पल-पल में बदलती है व्यवस्था वो होती है जो समाज को अनुशासित करें
00:13:59:21 नियमित करें सुनिश्चित करें ना की अनियमित को जन्म दिए उन्माद को जन्म दे इस कम में और आगे बंधन की क्या सनातन धर्म द्वारा ऐसी कोई अन्य निश्चित नियमावली दी गई है की किस व्यक्ति का किस आयु में कौन सा निश्चित कर्म कर देने के आधार पर किस भीम द्वारा यह सिद्ध होगा की उसका वर्ण क्या है नहीं ऐसी कोई नियमावली प्राप्त नहीं इसके अलावा कुछ जानकारी के अभाव में लोगों के द्वारा और इस्कॉन द्वारा श्लोक का उदाहरण दिया जाता है नया सिस्टम वाले श्लोक का जिसमें वह सिद्ध करते हैं की जो व्यक्ति के गन कर्म हैं वो भगवान ने बनाए हैं मगर इनके अनुसार जो प्रतिपादित होने वाली वर्ण व्यवस्था है उसमें तो मनुष्य चुनाव कर रहा है ना की उसका कौन सा कर्म होगा कौन सा नहीं सरल भाषा में कहें तो ईश्वर द्वारा मनुष्य के लिए निर्धारित किया गए कर्म जींस की समाज शुभ स्थित होता है वही कर्म धर्म कहलाने हैं और इससे भिन्न समाज में अव्यवस्था को जन्म देने वाले और ईश्वर द्वारा निश्चित किया गए कर्मों के विपरीत कर्म धर्म कहलाने हैं इसीलिए हमारे शास्त्रों में करके कई बार कई शास्त्रों में श्लोक आए हैं इसीलिए सनातन धर्म ने समाज को सुवासरा रखना के लिए और उन्माद
00:15:15:09 से बचाने के लिए एक व्यवस्था दी जिसका नाम है वर्ण व्यवस्था और उसमें जी जी व्यक्ति के जो-जो कर्म सुनिश्चित किया उसके अनुसार व्यक्ति को गन देकर के जन्म दिया गया की भाई आपसे अगर हमें सेवा कार्य करना है तो आपकी हड्डियां आपकी मांसपेशियां आपका ब्लू हमने इस तरह का बनाया की वो सेवा कार्यों के लिए अनुकूल सिद्ध हो अगर आपसे हमको ज्ञान दिलवाना है तो आपका ब्लू आपकी बोनस आपकी हड्डियां हमने अगर बनाई तो वो ऐसी बनाई जो की ज्ञान देने के कार्य के लिए अनुकूल सिद्धू आपसे हमें अगर रक्षा कार्य करना है तो आपकी हड्डियां आपकी मांसपेशियां आपका रक्त हमने इस तरह का निर्माण किया जो की आपके रक्षक भाव के अनुकूल सिद्ध हो ध्यान रहे जब हम शारीरिक भेद की बात कर रहे हैं तो उसे आप शरीर के वजन से और मसल्स का वेट या फैट का वेट इससे मत तोलिएगा यहां पर जब हम शारीरिक गुना की बात कर रहे हैं तो जेनेटिक्स किस प्रकार के मिले हैं उनमें गुणवत्ताएं किस प्रकार की है प्रवृत्ति किस प्रकार की है ब्लू में इसकी बातें कर रहे हैं इसका भेद है शरीर में हो सकता है कोई क्षत्रिय वर्ण वाला भी दुबला पतला हो 5556 चुटकुलों का हो 6 फिट का होते हुए और हो सकता है की कोई 6 फिट का वशिष्ठ 100 किलो का हो तो यहां पर हम दृष्टिगोचर गुना की बात नहीं कर
00:16:30:09 रहा है यहां पर उन गुना की बात कर रहे हैं जो दृष्टि के द्वारा सुलभ नहीं है पता लगाया जनाना वर्ण व्यवस्था से अर्थ इतना मत रोटा है की हमको अपने कम के लिए किसका नामांकन करना है ये समझ सकें ये एक ताला चाबी के सिस्टम की तरह है कई बार इस तरह के तारक देते हैं लोग की हमने कई ब्राह्मण को देखा जो ऐसे कार्य करते हैं तो फिर ऐसे कैसे ये एक स्टार्टिंग पॉइंट है मंत्र इसके बाद आपको उसके आचरण को भी देखना पड़ेगा पर किसके आचरण को देखने के जाएंगे जो जन्म से ब्राह्मण हो ये एक स्टार्टिंग पॉइंट है अगर आप इस स्टार्टिंग पॉइंट को लेकर नहीं चलेंगे तो आपकी अनिश्चित रहेगी ये ठीक इस प्रकार से है जब कहानी पर कोई भारती होती है तो निकाला जाता है भाई 10वीं वाले आएं 10वीं पास आए 12th पास इंटर पास आए बा पास आए अगर वो इस स्टार्टिंग पॉइंट को ना निकले तो नर्सरी में पढ़ने वाला बच्चा भी वहां पर होगा तो जो कवायत है अपने योग्य व्यक्ति को ढूंढने की वह बाढ़ जाएगी जब भी अपने घर से बाहर निकलते हैं तो अपना एक बेसिक कम जरूर करते हैं की ताला लगा कर जैन अब इसका अर्थ ये तो नहीं है की अगर हम ताला लगा करके जा रहे हैं तो चोरी होना संभव है मगर वो हमारा एक बेसिक स्टार्टिंग पॉइंट हो जाता है की हमने भाई अपना कर्म सही से किया तो इसी प्रकार से जो हमारी खोज होती है एक ब्राह्मण को
00:17:45:19 ढूंढने की एक क्षत्रिय को ढूंढने की एक वैश्य को ढूंढने की एक शुद्ध को ढूंढने की वो खोज प्रारंभ होती है की वो जन्म से क्या है उसके बाद हमें उसके आचरण से देखना होता है की क्या वो हमारे अनुष्ठान के लिए रक्षा के लिए व्यापार के लिए सेवा के लिए सुयोग्य है या नहीं तो यहां तक की थ्योरी से हमने क्या सिद्ध कर लिया की जन्म से पहले यह ते होता है की किस जीवात्मा से कौन सा कार्य करने के लिए उसको किस प्रकार का शरीर देने के लिए उसको किसके कल में जन्म देना आवश्यक है अगर ऐसा नहीं है तो ईश्वर किस स्टार पर किसी को स्त्री या पुरुष बनाता है ईश्वर किस आधार पर किसी को पशु या पक्षी बनाता है ईश्वर किस आधार पर किसी को विकलांग बना देता है इसका अर्थ है की ईश्वर आपके जीवन से पहले यह सुनिश्चित करते हैं की किस कर्म के अनुकूल आपको शरीर प्रधान किया जाए और अगर ऐसा नहीं है तो इसका अर्थ होगा की ईश्वर जो है बिना जान ही किसी को कोई भी शरीर प्रधान करता है और बिना जान ही एक लकी ड्रा की तरीके से वो चिट्ठी निकलता है की भाई ये स्त्री बनेंगे ये आदमी बनेंगे और ये पशु बनेंगे या ये विकलांग पैदा होगा ये अंधा पैदा होगा तो इस प्रकार से जो ईश्वर
00:19:00:28 हैं वो सर्वज्ञता सिद्ध नहीं होते वो सिद्ध नहीं होते की उनको इस दुनिया के हर बात पता है क्या होने वाला है क्या नहीं होने वाला तो ऐसे में वो ईश्वर भी सिद्ध नहीं होते और ऐसे में उन्हें ईश्वर खाने वाला ऐसे ईश्वर को माने वाला नास्तिक प्रसिद्ध हो जाता है जिसको यह नहीं पता है की किस मनुष्य को कौन सा शरीर में दे रहा हूं किस प्रकार का शरीर किस कम के अनुकूल शरीर में दे रहा हूं अब बाकी जो अन्य मत और पंत हैं उसमें तो कहानी ना कहानी ईश्वर को बाद सिद्ध कर भी दिया जाता है मगर सनातन धर्म के अनुसार तो ऐसा नहीं है सनातन धर्म के अनुसार तो सत्यम ज्ञानामन्नतम ब्रह्म ईश्वर वही है जो किसी भी प्रकार के नियम के अधीन नहीं है तो ऐसे में खुद को सनातनी खाने वाले उन सभी तथाकथित सनातनी टैटो का वह पक्ष निर्थक सिद्ध हो जाता है जहां पर वह कहते हैं की वर्ण जो है वो मनुष्य के कर्म के अनुसार ते किया जाता है और कुछ ऐसे श्लोक भी हैं जिनका की गलत अर्थ निकाला जाता है और उनका भाव कुछ और है जैसे की जनगणना जयते शुद्ध इसमें खाने का प्रयास किया जा रहा है की जन्म से सभी लोग शिक्षा के मामले में शुद्ध होते हैं अगर हम यह अर्थ नहीं लेंगे तो हमारे शास्त्रों में ऐसे कई प्रमाण दिए गए हैं जहां पर कहा जा रहा है माता-पिता
00:20:16:18 से उत्पन्न दूज ही यज्ञ में होता हो सकता है तो अगर यहां पर संस्कारों के द्वारा हम उसका भेजो तो घोषित करेंगे तो ऐसे प्रमाण खंडित हो जाएंगे और वैसे तो लॉजिकल भी है मगर प्रमाण भी दिया गया है की हमें सभी शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा को ग्रहण करना है ऐसा नहीं कर सकते की एक जगह का लिखा हुआ ठुकरा दिया और एक जगह का अपने मंतव्य की पूर्ति करने वाला वाक्य पकड़ लिया तो अगर हम जानना जाते शुद्ध का अर्थ ये मानेंगे की जन्म से सभी शुद्ध ही जन्म लेते हैं शुद्ध वत नहीं होते हैं बुद्धि के मामले में तो यहां पर अथर्ववेद के इस प्रमाण का खानदान हो जाएगा पहले और जो नया सिस्टम वाला श्लोक है उसके बड़े में तो हम बात कर ही चुके हैं की वहां पर तो भगवान ये कहीं रहे हैं की मैंने व्यक्ति के गुना कर्म के अनुसार वर्ण को निर्धारित कर दिया है एक बात और ध्यान देने योग्य है की इस श्लोक में भगवान का रहे हैं की गन कर्म विभाग मैं करता हूं मगर जब कर्मणा वर्ण व्यवस्था को मानते हैं तो उसमें व्यक्ति स्वयं च है भगवान नहीं चुनते हैं व्यक्ति स्वयं च है की उसको दारू का अड्डा खोलना है या फिर मंदिर का पुजारी बन्ना है जब कौन सा कर्म करना है कौन सा नहीं करना है ये चुना मनुष्य के हाथ में है तो फिर कर्म पर आधारित वर्ण भगवान किस प्रकार से बना रहे हैं इसके अतिरिक्त कुछ लोग मनुस्मृति के
00:21:31:20 दसवें अध्याय का 65 श्लोक का भी उदाहरण देते हैं जिसमें लिख-लिखा हुआ है की ब्राह्मण शुद्ध बन जाता है और शुद्ध ब्राह्मण बन जाता है वो वास्तविकता दिखाना नहीं चाहते या फिर देखना नहीं चाहते क्योंकि 65वें श्लोक से जस्ट 64वें श्लोक में बताया जा रहा है की किस प्रकार से गलत आचरण के द्वारा कोई ब्राह्मण शुद्ध बन जाता है और किस प्रकार से जन्मांतर में कई पीडिया बाद वही शुद्ध बना हुआ ब्राह्मण वापस ब्राह्मण बन जाता है और इसी कम में पंक्ति आगे आई है की ब्राह्मण शुद्ध बन जाता है और शुद्ध भी ब्राह्मण बन जाता है आपने अगर अनाधिकृत आचरण द्वारा अपने प्राप्त तत्वों को को दिया है तो आप उसे पुनः प्राप्त कर सकते हो मगर साथ पीडिया के लिए दिया गया है वहां प्रताप का समय और हमने शुरू में क्या कहा था हमने शुरू में ही कहा था की मैदान में कौन कप्तान होगा कौन विकेटकीपर होगा ये मैदान से बाहर ते होता है मैदान के अंदर नहीं इस प्रकार से जो ये मानते हैं की इस मैदान से बाहर हमारा अस्तित्व है और ये एक मैदान है जहां पर मैं इस प्रतियोगिता को जितना है तो ऐसे में हमारा जो पदभार है वो इस मंच से इस मैदान से बाहर ते होगा और ते करने वाला कोई हमसे सुपीरियर होगा हम नहीं
00:22:44:04 जब कर्मों के आधार पर वर्ण सिद्ध होगा तो वह मनुष्य की इच्छा के अनुसार हो जाएगा अब ऐसे में इन तथाकथित सनातनियों के लिए कुछ तार्किक प्रमाण भी ले लेते हैं जिसमें की सबसे पहले महाभारत का वह दृश्य अर्जुन अपने सेज संबंधियों को देखकर के रणभूमि से मुंह फ़िर चुके थे तब भगवान ने उनसे कहा था की है अर्जुन तू छतरियां है तेरा धर्म युद्ध करना तो ऐसे में अगर कर्मों के अनुसार या मनुष्य की इच्छा के अनुसार वर्ण को बदला जा सकता होता तो अर्जुन सरलतापूर्वक यह का सकते थे की भाई मैंने अभी अभी ये ते किया है की मैं तो आज से पंडिताई करूंगा मैंने अपना वर्ण चेंज कर लिया है और अगर ऐसा हो सकता होता तो फिर भगवान श्री कृष्णा ऐसी अटार के एक बात अर्जुन के सामने रखते ही क्यों दूसरा उदाहरण ले लेते हैं तो क्या रामायण के युग में चुनाव होता था की भाई राजा कौन बनेगा या फिर राजा अपने पुत्र को राजा बना देते थे कुछ और भी उदाहरण ले लेते हैं ऋषि विश्वामित्र ऋषि विश्वामित्र एक ऐसे क्षत्रिय कल में उत्पन्न होने वाले ऋषि हुए जिन्होंने घनघोर तपस्या करके अंततः ब्रह्मा जी के द्वारा अपने वर्ण
00:23:59:04 को बदलवाना सिद्ध किया मगर यहां से हमें क्या जानकारी प्राप्त हुई हमने अभी पहले बात की थी की क्रिकेट के मैदान के बाहर ही ये ते होगा की कौन कप्तान है कौन नहीं और ते करने वाला प्लेयर्स नहीं प्लेयर्स से सुपीरियर अथॉरिटी होंगे जो हत्या करेंगे की कौन कप्तान होगा कौन नहीं बहुत सी ऐसी विषम परिस्थितियों हैं जिसके लिए वर्ण को बदलने की बात शास्त्रों में भी की गई है मगर इसका फैसला कौन करेगा तो यहां पर विश्व जी के बदले हुए वर्ण को किसने स्वीकार ब्रह्मा जी ने रचयिता ने सुप्रिया अथॉरिटी ने मनुष्यों ने ते नहीं कर लिया आपस में हालांकि विश्वामित्र जी भी स्वयं कोई साधारण आ व्यक्तित्व नहीं थे वशिष्ठ जी भी जींस वो अपने ब्राह्मण वर्ण पर मोर लगवाने गए कई बार के हमको ब्राह्मण हम ब्राह्मण हो गए या नहीं हुए मगर वशिष्ठ जी ने उन्हें ब्राह्मण घोषित नहीं किया ये कहते हुए की आप राज ऋषि हैं पर ब्रह्म ऋषि नहीं हैं इसके साथ ही साथ हमें ये जान लेना चाहिए की विश्व मित्र जी का क्षत्रिय कल में जन्म तो हुआ था परंतु जो एक खीर वाली कहानी है जिसमें की उनकी जो माता थी जब उन्होंने ऐसी ब्राह्मण उचित खीर का ली थी जिसके करण विश्वामित्र जी के शरीर में ब्राह्मण उचित गन भी ए गए थे अब यदि कोई व्यक्ति ये
00:25:14:06 कहता है की जैसे विश्वामित्र जी का वर्ण बादल गया ऐसे ही किसी व्यक्ति का वर्णन बदला जा सकता है तो हमें यह देखना होगा जी व्यक्ति का वर्ण बदलने की घोषणा में करनी है की क्या उसके जन्म के समय ऐसी कोई बातें साहब कुछ हुआ है जिससे की यह सिद्ध हो की उसके शरीर में ब्राह्मण उचित गन विद्यमान है इसके साथ ही साथ यह भी जांचना होगा की क्या उसे व्यक्ति ने ऐसी गणगौर तपस्या की है जैसी विश्वामित्र जी ने की थी जो नूतन सृष्टि करता थे और इसके साथ अंततः घोषित हम नहीं कर सकते घोषित करने के लिए सुप्रिया अथॉरिटी को आना होगा मानव समाज से सुपीरियर अथॉरिटी ब्रह्मा जी ब्रह्मा जी जैसी कोई सुपीरियर अथॉरिटी आएगी और ये घोषित करेगी की हां भाई इनका वर्ण बदला जा चुका है तो ये तीन चीज हमें फिर देखनी होगी अगर हम इस कहानी का अनुकरण करते हैं मगर इस कहानी के अनुकरण से एक पक्ष हमारा बहुत ही दृढ़ता के साथ सिद्ध होता है की जब क्षत्रिय कल में विश्वामित्र जी का जन्म हो गया तो उसके बाद वो सालों साल तक प्रयासरत रहे ब्राह्मण में परिवर्तित होने के लिए अर्थात स्वयं विश्वामित्रजीवी स्वयं को जन्म से क्षत्रिय ही मां रहे थे इसका अर्थ
00:26:29:08 क्या हुआ की संतो के अनुसार हमारे हमारे जो अध्यात्म शास्त्र हैं उनके जो महान व्यक्तित्व हैं विश्वामित्र जी और उनके जैसे कई अन्य महान व्यक्तित्व उनके अनुसार भी जो वर्ण है वो जन्म से प्राप्त हो जाता है इन प्रकरणों में ध्यान देने वाली बात यह भी है की भगवान श्री कृष्णा ने अर्जुन को उसका छात्र धर्म याद दिलाया था अर्थात यहां से यह अर्थ प्राप्त होता है की जो वर्ण धर्म है वो भी सनातन धर्म का ही एक अंश है और सनातन किसका नाम है जो किसी भी देश कल स्थिति में ना बदले इस का नाम सनातन है अब इतने सारे तरकीब और प्रमाणिक तथ्य प्राप्त हो जान के बाद भी ये जो तथाकथित सनातनी तंत्र हैं ये अगर वर्ण व्यवस्था को जन्म से जानकारी रहे हैं तो फिर प्रश्न ये बनेगा की क्या यह मानते हैं की सनातन धर्म वह जो बादल जाता है या फिर यह मानते हैं की वर्ण जो है धर्म नहीं है और श्री कृष्णा जी ने वर्ण को वहां धर्म गलत कहा
00:27:36:01 वर्ल्ड वार के समय जर्मनी के जब कई ऑफिसर घायल हो गए थे तो उन्हें मृत्यु से बचाने के लिए उनको यह सोचकर शुद्ध रक्त दिया गया की शुद्ध रक्त शरीर में प्रवाहित कर दिए जान से शायद इनको मृत्यु से बचाया जा सकता है मगर इस प्रणाली द्वारा 100 में से 90% लोगों की मृत्यु हो गई और 10% ही बैक पे तब ये जचने की कोशिश की की शुद्ध रक्त पहुंच जान के बाद भी ऐसा क्यों हो रहा है की लोग मा रहे हैं तब यह जाना गया की रक्त भी पांच प्रकार के होते हैं जिम की रक्त का जो वर्ण होता है किसी का श्वेत है किसी का कृष्णा है इस तरीके से वर्ण रक्त के वर्ण अलग-अलग होते हैं तो जब विज्ञान ने ऐसी खोज की तो उसके अनुसार पांच प्रकार के रक्त प्राप्त हुए और जब श्वेत वर्ण रक्त वाले शरीर में श्वेत वर्ण रक्त को डाला गया तब उसे ऑफिसर को बचाया जाना संभव हो गया तब यह तथ्य भट हुआ की श्वेत वर्ण वाले रक्त के साथ स्वीट वर्ण वाले रक्त को जाना ही मिलाया जाना ही लाभकारी सिद्ध होगा अगर देखा जाए तो हमारे शास्त्रों में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य आदि जो वर्ण है ये वर्ण जो शब्द है वो रक्त के कलर को ही इंगित करता है रक्त के रंग को ही इंगित करता है यही
00:28:51:16 हमारे शास्त्रों में कहे गए हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्ध और अंत्याज कई लोग वर्ण का नाम सुनकर के उसको चंडी के कलर से आंकने लगता हैं मगर वास्तु था ये जो कलर है उनके रक्त का कलर है ब्राह्मण में शूद्रोषित रक्त का पाया जाना और शुद्ध में ब्राह्मण उचित रक्त का पाया जाना केवल गुप्त रूप से किया गए विचार का दुष्परिणाम ही हो सकता है इसको अपवधि माना जाएगा और इसके आधार पर हम वर्ण व्यवस्था को व्यवस्थित नहीं कर सकते क्योंकि बहुत सारे ऐसे तारक और प्रमाण हमने लिए हैं जींस संगति हो जाएगी इस नियम के करण ऐसे में इस प्रकार की स्थिति को गुप्त रूप से किया गए विचार का दुष्परिणाम मानते हुए अपवाद रूप में लेना ही उचित होगा
00:29:36:12 जी प्रकार से एक ग्रेजुएट परसों को इंस्पेक्टर की परीक्षा में बैठने का अवसर प्राप्त हो जाता है पर जब तभी मिलती है जब वह परीक्षा में पास हो जाता है इस प्रकार से जन्म से ब्राह्मण होने का इतना तात्पर्य मात्रक है की आप फल फल अनु का मुंह कर्मों में अधिकृत हो गए मगर आप वहां पर चयनित तभी होंगे जब आपके आचरण आपके कर्म भी आपके जन्म के अनुसार प्राप्त वर्ण के अनुसार ही होंगे जैसे की अगर कोई ब्राह्मण है जो अपने वर्ण के विरुद्ध आचरण करना है तो वो कई प्रकार के पूजा पाठ वैदिक अध्ययन और यज्ञ आदि के कर्मों से बहिष्कृत हो जाता है यह सारे शास्त्रों में नियम दिए गए हैं परंतु अंततः ऐसा नहीं कहा जाता अब वो ब्राह्मण नहीं था वो क्षत्रिय हो गया ऐसा नहीं कहा जाता हां उसको एक पतित ब्राह्मण की दृष्टि से ही देखा जाएगा जी प्रकार से अगर जब मिलती है तो उसके किसी सर्टिफिकेट के आधार पर मिलती है और जब में भ्रष्ट आचरण करने पर मां लीजिए इंस्पेक्टर है इंस्पेक्टर ने अगर भ्रष्टाचारण किया वो ग्रेजुएट था उसको जब मिल गई और भ्रष्ट आचरण करने पर उसको जो है सस्पेंड कर दिया गया है टर्मिनेट कर दिया गया परंतु उसकी जो डिग्री थी जब में आने से पहले की भाई उसने मां तक पढ़ाई की है उसने एचडी किया हुआ है
00:30:51:14 या उसने ग्रेजुएशन किया हुआ है वो जो उसकी डिग्री है वो उससे चीनी नहीं जाएगी हां उसके पद से उसे बहिष्कृत जरूर कर दिया जाएगा निष्कासित जरूर कर दिया जाएगा इसी प्रकार से ब्राह्मण के आधार पर ब्राह्मण उचित स्थान पर जहां-जहां पर ब्राह्मण को जगह सम्मान प्राप्त होगा क्षत्रिय कल में जन्म लेने के आधार पर जहां-जहां पर क्षत्रिय उचित स्थान पर क्षत्रिय को सम्मान प्राप्त होगा या फिर शुद्ध कल में जन्म लेने के आधार पर जहां-जहां पर सुब्रोचित स्थान में शुड हा को सम्मान प्राप्त होगा वहां पर भ्रष्टाचारण करने के करण उन स्थान से तो इन्हें व्यवस्थित किया जाएगा परंतु इनका ब्राह्मण होना इनका छतरियां होना ये कभी भी परिवर्तित नहीं होगा हां यह प्रत्येक शुद्ध पतित ब्राह्मण प्रत्येक क्षत्रिय अवश्य कहलाता है अब आता है हमारा अगला चैप्टर
00:31:44:13 अब यहां से आगे चलने से पहले हमें सर्वप्रथम यह जानना होगा की यह जो वैदिक मंत्र होते हैं जिसमें की किसी को अधिकारी हो किसी को अनाधिकार किया गया है यह होते क्या है और किस प्रकार से कार्य करते हैं तो मंत्र जो है एक दवाई है हमारे आध्यात्मिक रोगन की अर्थात मंत्र का आध्यात्मिक उपयोग जो चित के दोष है रोग हैं कम क्रोध मो इत्यादि इसे वे मुक्त करना है परंतु व्यवहारिक विधि निषेध के लिए व्यवहारिक उपयोग भी जानना आवश्यक है तो सबसे पहले मंत्र किस प्रकार से कार्य करते हैं हम यह देख लेते हैं आज के विज्ञान में भी मां लिया है की जो दुनिया उच्चरित होती हैं वायुमंडल में उनसे प्राप्त होने वाले कंपनियां के आधार पर आजकल कई यंत्र ऐसे हैं जो बन चुके हैं और कार्य कर रहे हैं जैसे हमने लाइट ऑन बोला तो लाइट ऑन हो गई जैसे
00:32:42:13 वाला गाना लगाओ तो हंसते वाला गाना लगा दिया इसका अर्थ क्या है की कुछ निश्चित ऐसे कंपन है जिनको जिनको अलेक्सा को बताया गया की अगर तुम्हें फल फल प्रकार के कंपन वायुमंडल में महसूस हो उनका अनुभव हो तो तुम फल फल गाना तुरंत बजा देना तो इस आधार पर अलेक्सा कार्य कर रहा है इसी तरीके से जो हमारे मंत्र हैं वो जब उच्चरित होते हैं तो उनसे विशेष प्रकार के जो कंपन उत्पन्न होते हैं उनसे संबंधित जो फल है जो ईश्वर ने निर्धारित किया हुए हैं वो हमें प्राप्त होने लगता हैं इसी प्रकार मां में भी उच्चरित होने पर हमें फल प्राप्त होते हैं भले ही हम उसको ध्वनित करें या ना करें जैसे की गुड के बड़े में सोने पर चीनी के बड़े में सोने पर या फिर रबड़ी आदि जैसे पकवान के बड़े में सोने पर ही आपके मुंह में पानी उत्पन्न हो जाता है इसका अर्थ क्या हुआ की मां में उच्चरित होने वाले शब्दों के करण भी भौतिक रूप से दृष्ट क्रियाएं होती हैं तो इसी आधार पर यह जो मंत्र है वो कार्य करते हैं जब चरित होते हैं तो उनसे विशेष प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती हैं और उन तरंगा से फल फल संबंधित जो है फल हमें प्राप्त होते हैं इसका उदाहरण आप रामायण में देख लीजिए जिसमें विश्वामित्र जी जब अस्त्र शास्त्र
00:33:57:14 दे रहे हैं प्रभु श्री राम को तो हाथों में नहीं दे रहे हैं वो उनसे संबंधित मंत्र वहां पर देते हैं प्रभु श्री राम को और प्रभु श्री राम मेट्रो से प्रकट हुए जो अस्त्र शास्त्र होते हैं उनको कहते हैं आप मेरे मां में निवास करिए और समय आने पर मैं आपका स्मरण कर लूंगा तब आप प्रकट हो जाएगा तो इस प्रकार से मेट्रो के रूप में अस्त्र शास्त्र लेकर चलते थे जो प्रभु श्रीराम आदि रूप है भगवान के तो यहां से हमने ये जान लिया की मंत्र कर कैसे करते हैं की निश्चित प्रकार की जो तरंगे हैं वो उत्पन्न होगी और उनसे संबंधित जो क्रिया है वह फलिबुत होने लगेगी और फलीभूत होने के करण हमें उसे मंत्र को चरित करने का फल प्राप्त हो जाएगा अब जब इन उत्पन्न होने वाले तरंगा की और चर्म सीमा में जान लगेंगे हमें यह भी निर्धारित करना पड़ेगा की किस शारीरिक क्षमता वाले व्यक्ति को यह मंत्र चरित करना है जिससे की इस प्रकार की तरंगे उत्पन्न होगी जिससे की फलिबुत होने वाला परिणाम स्वरूप फल प्राप्त होगा मगर वहीं पर अगर ऐसा हो जाए की जिसकी क्षमता जो है वो इससे भिन्न है मैं ऊंच-नीच नहीं कहूंगा मैं भिन्न कहूंगा उच्चरित होने वाले मेट्रो के द्वारा उत्पन्न होने वाली जो तरंगे हैं वो सकारात्मक फल प्रधान कर रही है मगर वहीं पर शारीरिक अंतर के करण जो
00:35:12:23 मंत्र उच्चारण किया जा रहा है उससे जो तरंगे उत्पन्न हो रही हैं वही तरंगे आपको नकारात्मक प्रभाव भी प्रधान कर शक्ति हैं इसलिए विधि निषेध दिया गया है है तो यहां पर आप एक बार फिर से याद कर लीजिए हमने शुरू में ही एक बात की थी सनातन धर्म किसी भी बात को आधा अधूरा नहीं बताता वो बिल्कुल अंतिम सीमा तक चर्म सीमा तक ज्ञान देता है तो इस बात को ध्यान रखते हुए अब इस चैप्टर में आप आगे बंधन तो सबसे पहले तो समाज को सुव्यवस्थित करने हेतु जन्म से प्राप्त शरीर के अनुसार जो आजीविकों पर्जन के उपाय दिए जाते हैं उनके अंतर्गत मां में आने वाले छिपने के भावों का कम या ज्यादा होने के आधार पर यह ते होता है की किसकी भगवान को प्राप्त करने की क्या विधि हनी चाहिए उदाहरण ले लेते हैं एक ब्राह्मण अपने मां की बात किसी को बता कर यानी की शिक्षा प्रधान करके अर्थ प्राप्त करता है वहीं पर एक वैश्य है जो कितने में समाज आया और मैं तुम्हें कितने में दे रहा हूं इन सारे तथ्यों को छिपाते हुए अर्थ प्राप्त करता है तो इस प्रकार दोनों के जीवन में जो छिपने वाले भाव हैं उनकी जो क्वांटिटी है मंत्र है वह अलग-अलग है इसी के आधार पर सभी वर्णों की जो भगवान
00:36:27:28 को प्राप्त करने की विधियां हैं वो अलग-अलग प्रकार की है जिसके मां में छिपने वाले भाव कम उसकी भगवान को प्राप्त करने की जो विधि है वो उतनी कठिन जिसके मां में छिपने वाले भाव ज्यादा उसकी भगवान को प्राप्त करने की जो विधि है वो उतनी ही सरल अब क्योंकि हमारे कर्मों के द्वारा हमारा शरीर भी प्रभावित होता है तो अगर हम अपने वर्ण के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं या फिर निम्न हैं आचरण कर रहे हैं तो उसका भी प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है जो इस तरह का संस्कार होता है वो हमारे रक्त में बैठ जाता है और इसके करण भी हम हीनता को प्राप्त हो जाते हैं भले ही इस प्रकार का शरीर हमें जन्म से मिला हो या फिर हमने स्वयं ऐसे आचरण किया जिसके करण हमारा शरीर उसके प्रति ढलना लगा दोनों ही स्थितियां में ऐसे शरीर वाला व्यक्ति ऐसे कर्मों वाला व्यक्ति जिसके जीवन में छुपाने वाले कर्मचारी होते हैं उसे पर क्रमशः विभिन्न शहर लागू होते जाते हैं अब यहां पर चलते चलते हमें एक तथ्य पे और प्रकाश डालना आवश्यक होगा की जी प्रकार से शुद्ध को रक्त के रूप में वेद अध्ययन के प्रतिकूल गन प्राप्त हुए हैं जी करण से शुद्ध के लिए वेदोक्त पूजा पद्धति को निषेध करते हुए भागवत प्रताप के अन्य मार्ग दिए गए हैं इस प्रकार स्त्री को
00:37:42:28 भी शारीरिक भेद के चलते वेद अध्ययन निषेध करते हुए भागवत प्रताप का दूसरा मार्ग दिया गया है यहां पर जन वाली बात सबसे पहले यह है की स्त्री के जीवन में पुरुष की आपेक्षिक कहानी ना कहानी अत्यधिक मंत्र में छिपने वाले कर्म होते हैं जैसे की उसका प्रतिमा 16 होना जैसे की उसका अपने बच्चे को शॉक आदि कर्मों में लिपट रहना जैसे की उसका अपने धूल दूसरी बच्चे को भी स्तनपान करना अपना दूध पिलाना तो यह सारे कार्य करते समय इसके अलावा अन्य कई ऐसे कार्य हैं जिनके करण स्त्री के जीवन में छिपने वाले भाव की मंत्र अधिक हो जाति है जी प्रकार ब्राह्मण की अपेक्षाकृत क्षत्रिय और क्षत्रिय की अपेक्षाकृत विश्व की अपेक्षा अनंत शुद्ध के जीवन में छिपने वाले भाव अधिक होते हैं इस प्रकार स्त्री के जीवन में भी पुरुष की अपेक्षाकृत छिपने वाले कार्य अधिक होते हैं जी करण से स्त्रियों को भी वेदोक्त पूजा ना बताते हुए भागवत प्रताप का दूसरा रास्ता बताया गया है यहां पे एक बात ध्यान देने योग्य है की ऐसे भी कई लोग हैं कई तंत्र हैं जो स्त्रियों का ओपिनियन कर देते हैं या फिर विधि निषेध को ध्यान ना देते हुए किसी का भी उपनयन कर देते हैं किसी को भी गायत्री मंत्र की दीक्षा आदि दे देते हैं
00:38:57:28 किसी को भी पुराना वो चरण दे देते हैं तो ऐसे तो मैं उनसे प्रार्थना करूंगा की कम से कम दीक्षा देने के बाद अपने इन शिष्यों का आप व्यक्तिगत जीवन अवश्य देखा करें की उनके व्यक्तिगत जीवन में क्या घटित हो रहा है क्योंकि मैं जब ऐसे लोगों से मिलता हूं जो कभी भी कहानी पर भी प्रणव का उच्चारण कर देते हैं या फिर गायत्री मंत्र की डोर बेल लगा राखी है या फिर गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हैं गायत्री मंत्र से पूजा करते हैं अधिकृत होते हुए जब मैं उनके व्यक्तिगत जीवन को निहारत हूं तो मैं देखा हूं की किसी के साथ कुछ हो गया किसी की संतान जब जन्म ले रही है तो वो विकृत है किसी की संतान जब जन्म ले रही है तो विक्षिप्त कोई मेंटली डिसेबल्ड हो चुका है किसी की बिटिया कहानी चली गई है किसी का लड़का बिल्कुल यंग आगे में मृत्यु को प्राप्त हो गया तो ये साड़ी ऐसी घटनाएं हैं बिल्कुल सरप्राइजिंग घटना है तो यही मनुस्मृति में लिखा हुआ है जब इस तरह की कालिका घटनाएं आपको दिखाई देने लगे आपके आसपास तो समझ लीजिए की कोई अनाधिकृत व्यक्ति और जो है वेदोक्त पूजा पाठ कर रहा है क्योंकि जिन तरंगा को उत्पन्न करने के निमित्त आपका शरीर नहीं बनाया गया है अगर उन तरंगा को उत्पन्न करने का प्रयास करेंगे तो जो मंत्र का आप उच्चारण कर रहे हैं अच्छे परिणाम के लिए वही मंत्र आपके लिए
00:40:13:03 हानिकारक सिद्ध हो जाएगा और ऐसी तरंगे उत्पन्न करेगा जो आपके लिए सकारात्मक नहीं नकारात्मकता लेकर आएंगे तो इस बात का सदैव ध्यान रखें और इस तरह के विधि निषेध की उलझन से बचन क्योंकि सनातन धर्म में कार्य नहीं होता है बिल्कुल पी पॉइंट आखिरी हद तक कार्य होता है यह ऐसे है की पर एग्जांपल के युद्ध का दृश्य और सामने वाली टीम पर आपको गोला फेंकना है एक व्यक्ति का जो शारीरिक संरचना है वो है मोबिलिटी वाली कूदने वाली और एक व्यक्ति के शारीरिक संरचना है वो है वजन उठाने वाली तो मोबिलिटी वाले की भी अपनी जरूर है की वो कूदेगा फाड़ देगा लोगों को चकमा दे गया और अपनी लेट चलाएगा घूस चलाएगा बहुत सी चीज करेगा और वहीं पर वजन उठाने वाले व्यक्ति की भी अपनी जरूर है की वो समय आने पर ज्यादा वजन उठा सकेगा उठा के चीजों को फैंस सकेगा तो ऐसे में इन दोनों में कोई उच्च नीचे तो नहीं है मगर सामने वाली टीम पर हमें गोला फेंकना है उठा करके अब गोला फेंकते समय यदि वो ताकतवर वाला जो व्यक्ति है वह उठाकर ना फेक और मोबिलिटी वाला आदमी गोला उठा करके फेक तो कहानी ना कहानी गोला जी निश्चित दूरी पर जाकर के गिरना चाहिए वो वहां नगर कर के हो सकता है की आपके नजदीक भी गिर पड़े फेकने की क्षमता
00:41:28:04 में अंतर होने के करण तो इससे क्या होगा सर्वप्रथम तो प्रभावित होगा वो व्यक्ति जिसने इस विधि निषेध का उलझन किया और इसके साथ ही साथ इसकी जो अपनी से होगी इधर वाली पार्टी होगी वह भी प्रभावित हो जाएगी इसका अर्थ है की अपने डेटन को ना निभाना भी अपराध ही होता है और ऐसे ही एक अपराध की सजा प्राप्त हुई थी संभोग को इसलिए संभोग के द्वारा बेमल वेदोक्त पूजा पाठ तपस्या उल्टा लटक करके स्वर्ग प्रताप का प्रयास समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ जिसके करण एक बालक की मृत्यु हो गई बस उसे समय का विज्ञान इतना उन्नत था की यह बात पता ग जाति थी की किस करण से कौन सी सुविधा हो रही है और वहां पर उदाहरण भी है की नारद जी ने आकर के प्रभु श्री राम को बताया की कोई अनाधिकृत व्यक्ति वेद पाठ कर रहा है जिसके करण से इस बालक की मृत्यु हुई है और पूरे समाज को इस प्रकार की छाती से बचाने के लिए प्रभु श्री राम ने संभोग मत किया देखा जाए तो संसार में ईश्वर को लेकर के बहुत साड़ी विचारधारा आए हैं और हर विचारधारा अपने से भिन्न विचारधारा के लिए काल्पनिक होती है मगर कल्पना नहीं सही संसार में ऐसी कोई भी धारा नहीं है जिसने यह दवा प्रस्तुत किया हो की अगर कोई समाज मेरा अनुकरण
00:42:43:07 करता है तो ऐसा राज्य स्थापित किया जा सकता है जहां पे धूप उतनी ही निकलेगी जितनी निकालनी चाहिए हवा उतनी ही चलेगी जितनी चलने चाहिए इसी को राम राज्य कहते हैं संसार में केवल और केवल सनातन धर्म ऐसी घोषणा करता है जिसमें वो ऐसा राज्य स्थापित करने की बात करता है जहां पर हवा उतनी ही चलती है जितनी जल्दी चाहिए धूप उतनी निकलते है जितनी निकालनी चाहिए जहां कल नहीं पड़ता है जहां कोई काल मृत्यु नहीं मरता है जहां कोई विधवा नहीं होती है जहां कोई अनाथ नहीं होता है जहां कोई संतान ही नहीं होता है जहां कोई नास्तिक नहीं होता है और ऐसा राज्य स्थापित होता है वर्ण व्यवस्था का अनुकरण करने के आधार पर जहां पर लोग अपने अपने वरना आश्रम धर्म का यथोचित पालनपुर करते हैं क्योंकि जब ऐसा किया जाता है तो विधि निषेध का उलझन ना होने की स्थिति में जो नकारात्मक तरंगे हैं वो उत्पन्न नहीं होती हैं और जिसकी वजह से सुखप्रीत वातावरण बना राहत है इस करण से स्त्री शुद्ध और पटेट जो दूज हैं जिनका जिनके किसी करण से समय पर यज्ञ प्रवत नहीं हो पता है या फिर उनके व्यवहारिक आचरण उतनी शुद्ध नहीं र जाते जिसके करण रक्त में विकार भी उत्पन्न हो जाते हैं विकार से मतलब है अंतर का अंतर ए गया जरूरी नहीं की वो एक बुरी चीज है मगर जो पहले थी वो अब नहीं है इन्हीं
00:43:58:24 फैक्ट्स के चलते अलग-अलग लोगों को अलग-अलग स्थितियां में वेद पाठ देव दर्शन मंदिर प्रवेश इस तरह की चीजों में निषेध किया गया है तो ऐसे सभी लोगों के लिए भगवान ने जो ईश्वर को प्राप्त करने की विधि है वह अलग कर दी है जिससे की ना ही वो स्वयं को प्रभावित करें और ना ही उनकी करण किसी अन्य समाज पर इसका प्रभाव आएगा आज की जो जेनरेशन है वो जब कुछ खाती है तो उसको यह पता नहीं होता है की बॉडी में जाकर के किस-किस तरह के प्रभाव दाल रहे हैं जो माइक्रोन्यूट्री से प्रोटीन क्या कर रहा है कार्बोहाइड्रेट कितना है बिना जान तन कुछ भी खाता रहते हैं ऐसी स्थिति में उनका शरीर हो जाता है ओबेसिटी उनकी लाइफ में प्रवेश कर जाति है और वह अनफिट भी हो जाते हैं अस्वस्थ भी हो जाते हैं इसका करण क्या है की उनको वो करण दिखाई नहीं दे रहे हैं जिन कर्म से वो अस्वस्थ हो रहे हैं उनको नहीं मालूम की जो रिफाइंड तेल उनकी रसोई में रखा हुआ है वही उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है उनको नहीं मालूम की महंगी किस प्रकार से जाकर के उनके इंटेस्टाइन में चिपक जाति है और यह दिखाई ना दे अपने के करण कई लोग रोज मैगी खाता हैं इसी प्रकार से ये जो प्रभाव है की किस करण से किसके
00:45:14:04 जीवन में या किस करण से वायुमंडल में मौसम में प्रभाव आया यह दृष्टि ना होने के करण दिखाई ना दे अपने के करण आज हर व्यक्ति गायत्री मंत्र का जब प्रणाम का जवाब हर स्त्री कुछ भी किसी भी तरीके की पूजा पद्धति को अपना घर सर्वप्रथम अपने और उसके बाद सामाजिक जीवन को भी अस्त व्यस्त कर रहे हैं अब अगला चैप्टर ए जाता है ऊंच-नीच क्या हमारे शास्त्रों द्वारा ईश्वर द्वारा किसी के साथ ऊंच-नीच की गई है क्या है जो वर्ण व्यवस्था है यह भेदभाव मुल्क है या फिर व्यवस्था मलक है तो इसका अर्थ नहीं क्या कभी ईश्वर ने ऐसा कहा की मैं फलाने शुद्ध के अंदर नहीं हूं क्या ईश्वर ने ऐसा कहा की मैं वैश्य के अंदर नहीं हूं क्या ईश्वर ने ऐसा कहा की मैं सिर्फ ब्राह्मण के अंदर हूं क्या ईश्वर ने ऐसा कहा की सिर्फ ब्राह्मण या क्षत्रिय को ही मोक्ष मिलेगा भागवत प्रताप होगी और शुद्ध वैश्य को नहीं होगी नहीं यानी की ईश्वर के पर्सपेक्टिव से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्ध में कोई अंतर नहीं है ईश्वर के लिए सब कुछ बराबर है नहीं तो वो क्यों बंता भारत तो ये जो अंतर है फिर हमको दिया क्यों गया जब कुछ अंतर है नहीं ये अंतर है नहीं ये अंतर हमको दिखाई दे रहा है क्योंकि इस अंतर का नाम ही संसार
00:46:29:08 है दुनिया में जब तक हमें अपने से भिन्न कोई दिखाई पद रहा है तभी तक हमारे लिए संसार का अस्तित्व है और हमारा लक्ष्य क्या है ऐसी स्थिति को प्राप्त हो जाना जहां हमसे भिन्न हमें कुछ भी दिखाई ना दे यानी की मोक्ष तो अब बात ये आई है की अगर ये अंतर हमें दिखाई दे भी रहा है तो ईश्वर मनुष्य की दृष्टि को देखते हुए या शास्त्र मनुष्य की दृष्टि को देखते हुए कहते हैं की अगर तुम्हें फालना फालना श्रेष्ठ दिखे भी रहा है या फालना फालना तुम्हें निम्न अधिक भी रहा है तो चलो उसको श्रेष्ठ मानते हुए ये कार्य करो उसको निम्न मानते हुए ये कार्य करो क्योंकि एड दी और तुम्हारा लक्ष्य है मिट्टी और सोनी में एक भाव लाना आत्मा और ब्रह्म में एक भाग उत्पन्न करना तो इसका अर्थ क्या हुआ भेद का नाम ही संसार है जब तक हमसे भिन्न किसी व्यक्ति वास्तु अथवा स्थान का अस्तित्व है तब तक हमारे लिए संसार का अस्तित्व है और जब हमसे भिन्न किसी भी व्यक्ति वास्तु अथवा स्थिति का कोई अस्तित्व बाकी नहीं र जाएगा वही हमारा मोक्ष है अब ये जो हमको व्यवस्था दी गई है की भाई भेद है नहीं पर तुम तब भी भेद मानते हुए ये कार्य कर लो यह क्यों दिया गया तो इसका कुछ उदाहरण कर लीजिए दो उदाहरण तो गुरुदेव ने दिए हैं जैसे की पहले है की यदि कोई व्यक्ति जमीन पे गिर जाता है और बहुत
00:47:44:15 ज्यादा फुर्तीला नहीं है तो उसको जमीन पर धक्का मार करके उठाना ही पड़ता है यानी की इस दृश्य में उसकी जो अंतिम गति है वो क्या है खड़े होना मगर वो इस समय जमीन पर गिरा हुआ है तो उसने धरती का ही आलंबन लिया यानी की धरती से उठने के लिए धरती का ही सहारा लेना जी प्रकार से नदी को पर करने के लिए चप्पू इस प्रकार से चलाइए के पानी ही आपको धक्का मारे आगे बढ़ाने के लिए और आप नदी को पर कर जो जी प्रकार से जो एरोप्लेन है उसकी जो अंतिम स्थिति है वो है उड़ना मगर उड़ने के लिए भी वह सबसे पहले जमीन पर ही दौड़ता है यानी की जमीन को छोड़ना उसका लक्ष्य है और उसे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वो जमीन का ही सहारा ले लिया यहां पर यही अर्थ बताने का प्रयास किया जा रहा है की कहानी पर कोई भेद नहीं है मगर क्योंकि तुमको भेद प्राप्त हो गया भेद का भाव प्राप्त हो गया है इसलिए अब आप ऐसा ऐसा करिए इस भेद का अनुसरण करते करते आप अवेद स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं यहां पर ध्यान देने वाली एक बात और भी है की लोगों को जो दिखाई देता है वैसे कोई उच्च नीचे है नहीं मगर क्योंकि दिखाई दे रहा है तो उसे हिसाब से अगर कहा जाए की ब्राह्मण क्षत्रिय को उच्च कहा गया है अगर देखा जाए तो इनको अगर अधिकार प्राप्त हुए हैं तो साथ ही साथ इनका जीवन बहुत कठोर है ब्राह्मण के जीवन में शॉक के बाद इतने कूल्हे मूत्र विसर्जन के बाद इतने
00:48:59:15 कल खाना खाने के बाद इतने खुले इतनी बार आज मां इतनी बार उठाना बैठना इतना आसन इतनी नियमावली है जिसको फॉलो करते करते एक आम इंसान परेशान हो जाए इसके साथ ही साथ ब्राह्मण नाच नहीं सकता ब्राह्मण टैटू नहीं बावा सकता ब्राह्मण अभिनय नहीं कर सकता ब्राह्मण वेतन नहीं ले सकता इन सभी चीजों को करने से पतित हो जाता है अब आप बताइए की अगर सब ब्राह्मण बन जाएंगे तो फिर रक्षा कौन करेगा और अगर सब रक्षा करने सड़क पर खड़े हो जाएंगे तो वैश्य कौन बनेगा व्यापार कौन करेगा और अगर सब व्यापार करने बैठ जाएंगे तो सेवा के कार्य कौन करेगा सर्विसेज में कौन जाएगा और अगर सबको समय हक दे दिया गया तो सब लोग सबसे पहले अपनी अपनी पोस्ट संभालने की बजे लड़ेंगे की नहीं भाई मैं जाऊंगा वहां पे रक्षा करने मेरा मां रक्षा करने का है मैं जाऊंगा मैं ब्राह्मण बने मेरा बनयान देने का है और यही उन्माद है और इसी उन्माद का जो दृश्य वो वर्तमान का दृश्य जब हम अपनी जब हम अपनी जन्म से प्राप्त आजीविका को ठुकरा कर अपने मां के वशीभूत होकर के अपनी-अपनी आजीवी को पर्जन को ढूंढते हैं और धर्म से पहले अर्थ को रखते हैं तो जो व्यक्ति नास्तिक है या जिसके लिए धर्म से ज्यादा अर्थ है उसे व्यक्ति का यह कहना
00:50:14:15 की मैं वर्ण व्यवस्था को नहीं मानता या फिर वर्ण व्यवस्था में क्रमानुसार मानता हूं उचित दिखाई देता है परंतु जिसके लिए धर्म है सर्वप्रथम और जिसके लिए ईश्वर है सर्वप्रथम और जो नास्तिक नहीं है उसका जन्मानुसार वर्ण व्यवस्था को स्वीकार करना ही तार्किक सिद्ध होता है इसके साथ ही साथ अगर देखा जाए तो शुद्ध को घर के सबसे छोटे अबोध शिशु की भांति पहले पोस गया है और वहीं पर ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को दायित्व दिए गए हैं जिसमें की ब्राह्मण के पास सबसे ज्यादा दायित्व है यहां पर एक दृश्य ले लीजिए उदाहरण के लिए की घर में यदि पिताजी बिजली का कार्य कर रहे हैं पंख आदि को ठीक कर रहे हैं तो प्रयास यही किया जाता है की घर का जो अबोध बालक है जो शिशु अवस्था में हैं वो पानी में खेल करके कहानी पिताजी को ऊ ना दे इसलिए उसको प्रॉपर निश्चित तोर पर का दिया जाता है की पिताजी से आप दूर रहना इसी प्रकार अगर देखा जाए तो जन्म से प्राप्त शारीरिक भिन्नता के करण और तथा अनुसार विधिक भिन्नता के करण गुना आदि में अल्पंभिन्नता के चलते विवाह के लिए निषेध किया गया है दूसरे वर्ण में वहीं पर ठीक विपरीत गन कर्म आचरण होने के करण शुद्ध से अस्पृश्यता के व्यवहार रखना को भी कहा गया है मगर यहां ध्यान रखना वाली बात यह है की इस स्पष्ट
00:51:30:03 व्यवहार से जहां एक और ब्राह्मण के ब्रह्मांत्व की रक्षा हो रही है वहीं दूसरी और शुद्ध के शुद्ध तत्व की रक्षा हो रही है यह बात विज्ञान भी मानता है की चुने के मध्य से एक शरीर से दूसरे शरीर में गन दोष जा सकते हैं तो यही प्रमाण हमारे शास्त्रों में भी दिए गए हैं और अपने अपने रक्त और अपने अपने गुना की शुद्धता को बनाए रखना के लिए इस व्यवहार का आदेश शास्त्रों में दिया गया है जिससे की ज्ञान देने वाले शुद्ध ब्राह्मण के शुद्ध बी को रक्षा करने वाले शुद्ध क्षत्रिय के शुद्ध बी को व्यापार करने वाले शुद्ध वैश्य के शुद्ध बी को और सेवा कार्यों में निपुण शुद्ध के शुद्ध बी को मिलावट से बचाया जा सके इसके साथ ही साथ दूसरी जगह पे देखेंगे की जब भी हम अपने घर में आर्थिक उपलब्धि की बात करते हैं तो कहानी ना कहानी जो सबसे छोटा बच्चा होता है उसे पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है की भाई कपड़े आएंगे तो उसके आएंगे इस पर सबसे ज्यादा खर्च होगा और जो सबसे घर का बड़ा व्यक्ति होता है उसे पर सबसे कम अर्थव्यय किया जाता है तो यही बात शास्त्रों में भी कहीं गई है की ब्राह्मण को केवल अपनी प्राण रक्षा के निमित्त ही धन को वजन करना है ब्राह्मण को कहा गया है की आप अपमान की खोज में रहिए और सम्मान से दूर रहिए आप आपके लिए सम्मान विश्व
00:52:45:12 के समाज है और अपमान अब मृत्यु के समाज है इसके बाद एक जगह और है जहां से ये पता चला है की शुद्ध को एक शिशु की तरीके से देखा गया है अबोध बालक बच्चे की तरीके से करके कैसे की हमारे घर में जब किसी बड़े से कोई गलती होती है तब उसको ज्यादा दांत ज्यादा बड़ी सजा मिलती है वहीं पे अगर घर के अबोध बालक से बच्चे से अगर कोई गलती हो जाए तो उसकी जो सजा होती है उसका जो दंड होता है वो कहानी ना कहानी जो घर का बड़ा था उसको जो दंड मिला था उससे कहानी कम होता है तो इसी प्रकार से जहां चोरी करने पर शुद्ध को कुछ डंडे दिए गए हैं वहीं पर अपराध करने पर वही से अपराध करने पर ब्राह्मण को अत्यधिक कई गुना डंडे मारे जान का विधान किया गया है इन्हीं साइंटिफिक धरातलों पर स्थापित जानकारी के अभाव में लोग वर्ण व्यवस्था को ठुकराते हैं जिसके करण समाज में उन्माद फैलता है एक्सपोर्ट होता है और जी उन्माद का स्पष्ट परिणाम है आज के भयावाद दृश्य जबकि रियलिटी तो यही है की सनातन धर्म के द्वारा दिया गया वर्ण व्यवस्था के रूप में जो विधान है वो मानव मंत्र के कल्याण का करण है हेतु है जहां एक तरफ मर्यादा का उलझन करने पर संभोग का वध किया जाता है तो वहीं पर दूसरी तरफ दुराचारी होने के करण
00:54:00:14 ब्राह्मण और रावण का भी वध किया जाता है अब इस पहेली को जो समझ नहीं पाते हैं वो नासमझ अपने की स्थिति में शास्त्रों के उसे अंश को स्वीकार करने से माना कर देते हैं जिन अंशु में उनके प्रतिकूल बातें उन्हें दिखाई दे रही हैं ऐसी स्थिति में नास्तिक सिद्ध हो जाते हैं क्योंकि जिन शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ईश्वर और मोक्ष के लिए वह सारे विधि विधान अपना रहे हैं उन्हें शास्त्रों के दूसरे अंशु द्वारा प्रतिपादित किसी नियम को वो अस्वीकार भी कर रहे हैं तो जब शास्त्र के एक अंक पर उनका विश्वास होना सिद्ध होता है तो इसका अर्थ है की पूरे पूरे शास्त्र की क्रेडिबिलिटी पर प्रश्नवाचक चिन्ह ग जाता है तो इस प्रकार से अपनी सुविधा अनुसार परमाणु को स्वीकार करने वाले लोग सनातन धर्म ग्रंथ को ना माने वाले वस्तुत नाश्ते की सिद्ध होते हैं और उसे पर भी जी ईश्वर को वो स्वयं अंतर आत्मा से नहीं स्वीकार कर रहे हैं जिन जी मोक्ष को वो स्वयं अंतर आत्मा से नहीं स्वीकार कर रहे हैं उसे ईश्वर को उसे मोक्ष को प्राप्त करने हेतु अपने जान वाली कोई ऐसी विधि जिसको आपके लिए किसी ने अनुचित बताया है यह ऐसे व्यक्तियों के द्वारा अपनी वर्चस्वता सिद्ध करने का एक प्रयास मंत्र सिद्ध होता है यहां
00:55:19:11 स्वयं को सनातनी खाने वाला एक तंत्र है इस्कॉन श्री चैतन्य महाप्रभु को इनकी गुरु परंपरा का एक गुरु माना जाता है और उनके ही आदर्श उनके ही द्वारा स्थापित भक्ति के नियमों को यह पालनपुर कर रहे हैं ऐसा ये प्रस्तुत करते हैं दवा तो श्री चैतन्य महाप्रभु के बड़े में अगर हम पता करें तो यही प्राप्त होता है की जो शास्त्रों में हरे राम हरे राम राम हरे हरे का जो वर्णन है महामंत्र का उन्होंने विभिन्न क्षेत्र का उलझन ना करते हुए सभी जनों को यह मंत्र सुलभ हो जाए इस करण से इसका जो कम है वो बदला था तो यदि श्री चेतन महाप्रभु जनमानव अवस्था के आधार पर विभिन्न क्षेत्र को ना मानते होते तो वो जो महामंत्र है उसका कम ना बदलते जिसमें की कृष्णा बाद में था राम पहले था उसके अलावा इस को के अनुसार जो कर गुरु परंपराएं हैं जो मनुष्य के द्वारा ग्रहण किया जान योग्य हैं वो सभी चारों उनके अनुसार प्रमाणिक हैं
00:56:15:05 मड़वा संप्रदाय रामानंद संप्रदाय विभाग संप्रदाय संप्रदाय यह कर बोनाफाइड संप्रदाय है जिससे आप जाकर ज्ञान ले सकते हो ये चारों गुरु परंपराएं भी इनके अगर अधिकृत मतों में जाकर के जांच जाए तो वहां भी हमें यही प्राप्त होगा की वहां पर जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को स्वीकार गया है और रावण जो कर परंपरा से ही एक महान आचार्य हैं श्री माधवाचार्य शास्त्री माधवाचार्य गुरु परंपरा वाले माधवाचार्य ने रामानुजाचार्य परंपरा में एक अभी महान आचार्य हुए श्री माधवाचार्य शास्त्री जी उन्होंने सनातन धर्म पर जितने भी प्रकार के आप लगाते हैं लगभग सभी प्रासंगिक विषयों को संकट करते हुए एक महान ग्रंथ लिखा क्यों और इस क्यों में रामानुजाचार्य परंपरा के जो माधवाचार्य शास्त्री जी हैं इन्होंने जन्मना वर्ण व्यवस्था को इस स्वीकार किया है जिसके लिए उन्होंने प्रमाण और तारक दोनों इस पुस्तक में दिए हैं तो अब यदि इस्कॉन जन्म ना वर्ण व्यवस्था को नहीं मानता है और दूसरी और रामानुजाचार्य परंपरा को प्रमाणिक मानता है तो ऐसे में वो स्वयं की विश्वसनीयता पर स्वयं ही प्रश्न उठाता है तो संक्षिप्त में देख लेते हैं आज हमने क्या जाना पहले है वर्ण व्यवस्था मानव समाज का अभिन्न अंग है वर्ण
00:57:30:23 व्यवस्था पशु पक्षी पेड़-पौधे और देवताओं तक में होती है दूसरा वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित होती है क्योंकि ईश्वर मनुष्य द्वारा कराए जान वाले कर्मों के निमित्त गन युक्त रक्त शरीर आदि प्रधान करने हेतु उसे किसी विशेष कल में जन्म देता है जहां से उसका वर्ण सुनिश्चित होता है ईश्वर की दृष्टि में मनुष्य की मूल पहचान उसके मनुष्य जन्म से पहले जो उसका जीवात्मा रूप था उसमें होती है और उसे जीवात्मा के पूर्व जन्मदिन में किया गए कर्मों के आधार पर उसको इस जन्म में प्राप्त होने वाला गन युक्त शरीर एवं तदनुसार कल निर्धारित होता है जिसके आधार पर उसका वर्ण सुनिश्चित होता है वर्ण धर्म होता है जबकि किसी मनुष्य के चुनाव पर आश्रित क्रमानुसार वर्ण व्यवस्था परिवर्तनशील होती है ऐसे में परिवर्तनशील होने के करण वर्ण को धर्म की संज्ञा दिया जाना तर्कसंगत नहीं र जाता है समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में किसी विशेष समय अथवा स्थिति की प्रतीक्षा ना करते हुए सभी पत्रों को उनके जन्म से मिले वर्ण की संज्ञा प्राप्त हुई है जैसे अगर जानना चाहते शुद्ध
00:58:46:06 का अर्थ माना जाए की जन्म लेने वाला हर व्यक्ति शिक्षा आदि में शूद्रवत नहीं होता बल्कि वो मूल रूप से सुधरे ही होता है तो ऐसे में यह जानना होगा की रामकृष्ण अथवा अन्य किसी पत्र बाल्यावस्था में जन्म के समय शुद्ध कहा गया है नहीं हां उसके माता-पिता का जो वर्ण है उसके कल का जो वर्ण है उसकी संज्ञा उसे अवश्य प्राप्त हुई है वर्ण का विभाजन सुनिश्चित कर्मो हेतु दिए जान वाले गन युक्त रक्त तथा शरीर के आधार पर होता है वर्ण विरुद्ध आचरण की स्थिति में अमु कामुक व्यक्ति को उसके वर्णन अनुसार सुनिश्चित कार्यों से त्याग दिया जाता है अलग-अलग प्रकार के गन दोष वाले मनुष्यों को सुनिश्चित लाभ और विशेषता मोक्ष प्राप्त करने हेतु साथ ही साथ उनको तथा उनके आसपास के संपूर्ण समाज को हनी से बचाने हेतु अलग-अलग मनुष्यों को भागवत प्रताप के अलग-अलग मार्ग बताए गए हैं जिसे विधि निषेध कहा जाता है लौकिक दृष्टि से देखने में जो अधिकारी हैं उन्हें का लौकिक जीवन सर्वाधिक कठोर भी होता है वैदिक पूजा पठान पठान तथा मंत्र आदि से अभी ईस्ट फल की एवं धर्म की रक्षा हेतु रक्त
01:00:01:13 गन अथवा दोष को मिश्रण से बचाने के निमित्त अस्पृश्यता का विधान किया गया है जो की घृणा मूलत नहीं है और अंततः ईश्वर की दृष्टि में कोई भेद नहीं है मनुष्य की दृष्टि में भेद है और इस भेद का निर्वाह करके अवैध की स्थिति को प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य है जिसे मोक्ष कहा जाता है मार्ग भले ही भिन्न भिन्न हो पर उनसे प्राप्त होने वाले प्रैपटैब से ईश्वर तथा शास्त्रों ने किसी को भी वंचित नहीं रखा है और जो सद्गति ब्राह्मण की है वही सद्गति अपने वर्णन अनुसार धर्म का पालनपुर करने वाले शुद्ध की भी है
01:00:51:02 [संगीत] परंपरा प्राप्त सनातन विधायक [संगीत] केवल यज्ञ को अभी धरण करने वाले को गायत्री मंत्र पढ़ने का अधिकार है स्त्रियों को बलजीत है पूर्व गन कर्म के अनुसार वर्तमान शरीर प्राप्त हुआ है ठीक है शरीर की सीमा में वर्ण प्राप्त है वर्ण की सीमा में आश्रम प्राप्त है वर्णसम की सेवा में पुनः करूं प्राप्त किया अंततः मैं यही कहूंगा की कोई व्यक्ति है जो खुद को मानता है की मैं मनुष्य हूं जानवरों से भिन्न हूं तो सर्वप्रथम उसे मानना पड़ेगा की दुनिया में कोई ईश्वर है वो आस्तिक है और अगर कोई व्यक्ति स्वयं को आस्तिक मां रहा है तो उसे यह मानना पड़ेगा की वो सनातन धर्म के द्वारा प्रतिपादित होने वाला सर्व शक्तिमान पूर्ण ईश्वर उसको मानता है और अगर वो उसको मानता है और उसको मानते हुए जब वो वर्ण व्यवस्था के संबंध में आने वाले सनातन शास्त्रों के अर्थ निकलेगा तो वह इस बात के निमित्त निकलेगा की उन औरतें से जो सर्वशक्तिमान की जो सर्वशक्ति
01:02:06:16 मट्टा है वो बांग एन होने पे तो वह जो अर्थ निकलेंगे वो जानना अवस्था के होंगे और आप जन्मना वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध वह अर्थ निकलेंगे तो कहानी ना कहानी ईश्वर को बाधित घोषित करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से नास्तिक हो जाएंगे और अप्रत्यक्ष रूप से नाश्ते होते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य भी नहीं रहेंगे तो अब ये साड़ी इनफॉरमेशन हमने आपको दिखे हुए हैं जिससे की आप ब्लू की प्योरिटी की इंर्पोटेंस को समझ सके आप समझ सकें की जो धर्म का अस्तित्व है वह पुराण भाग क्षण में है आप समझ सकें की प्रणव को जो एक्सप्लोर किया गया है वो गायत्री मंत्र में किया गया है आप रक्त की शुद्धता की रक्षा के लिए प्रयासरत हो सके आप समझ सके की संसार में किसी का तो ऐसा रख तो की जिसके मुख से गायत्री मंत्र उच्चरित होने पर एक सृष्टि का सृजन हो सके धर्म की रक्षा हो सके आप समझ सके की दुनिया में किसी का तो ऐसा शुद्ध रक्त हो जो उसे ब्राह्मण की रक्षा कर सके आप समझ सके की दुनिया में कोई तो ऐसा शुद्ध रक्त वाला हो जो इनके लिए खान-पान वस्त्र आदि की व्यवस्था कर सके आप समझ सके की दुनिया में किसी का तो रखना ऐसा हो जो अपने साथ साथ इन तीनों की देखभाल कर सके तो आप वरना आश्रम धर्म की महत्व को समझिए रक्त की शुद्धता की रक्षा के लिए प्रयासरत हुई है क्योंकि
01:03:22:13 इसीलिए गुरुदेव अपने भाषणों में कहते हैं की बी की रक्षा भगवान को विशिष्ट है करते रहना तो इस बीच की रक्षा में ही धर्म की रक्षा छुपी हुई है जय श्री राम अपना बी की रक्षा भगवान का अभी तक करते रहना [संगीत]
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