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00:00:02:04 तो जय श्री राम सभी को आशा करता हूं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और आज गरिमा गीता की का अवलोकन कर रहे हैं हम इसकी जो भ्रष्ट किताब है इसने अपने भ्रष्ट मंसूबों के साथ लिखी है रामपाल ने और उसका अवलोकन करते हुए पांचव पांचवा अध्याय उसका आज अंतिम भाग है ये जो इस पार्ट में जो पिछले वाले एपिसोड के जो बुलेट पॉइंट्स हैं उसके लिए पर्टिकुलरली एक मतलब बीच में लाइव हुआ था उसमें बुलेट पॉइंट्स बता दिए गए थे। वो बुलेट पॉइंट्स आपको मिल जाएंगे कहां? जो सर्वशक्तिमान धर्म दूसरा चैनल है हमारा वहां पर। तो मेरी तैयारी तो आज अभी बात करने की थी इस बारे में जो गरमा गीता के पांचवा अध्याय है शायद श्लोक सात से लेकर के 29 तक तो उस बारे में मेरी प्रिपरेशन थी।

00:01:02:00 फिर आने से पहले मैंने एक कॉमेडी शो देखा तो थोड़ा सा मैं उस कॉमेडी शो के बारे में बात कर लूं। कॉमेडी शो क्या है कि एक पगला चला है बुद्धिमान की चाल। एक मूर्ख चला है बुद्धिमान की चाल। और उसने उसने एक वीडियो बनाया है। वीडियो जारी किया है कि भाई मैं 50 लाख रुपए दूंगा जो मेरी बातों को गलत साबित कर दे और वह खुद को सनातन का आदि सनातन का एडवोकेट कह रहा है। तो उसकी जरा बोली हुई जो टच्चेगिरी की बातें हैं उनका अवलोकन करते हुए उनका रिप्लाई कर देते हैं और फिर आज का जो चैप्टर है वो चालू करते हैं। वो क्या है ना आज बुलेट पॉइंट्स बुलेट पॉइंट्स तो है नहीं तो उनका स्पेस खाली रहेगा तो चलो इसने अच्छा कॉमेडी शो दे दिया तो उसी पे बात हो जाएगी। अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] बात करते हैं इसने क्या-क्या बकवास की है अपने उस कॉमेडी सर्कस में। हम

00:02:15:01 वर्किंग प्रोजेक्ट हम इसने बोला है विश्व के जितने भी धर्म गुरु हैं पहले तो क्या इसको धर्म की परिभाषा मालूम है परमात्मा की परिभाषा मालूम है यह कहता है आगे कि पवित्र जो शास्त्र हैं जिसमें ये कबीर सागर को भी जोड़ देता है सूक्ष्म वेद के नाम पे सूक्ष्म वेद छमम छक्षम वेद करके अपना जो उसमें पष्टण किया कबीर सागर एक पवित्र ग्रंथ है पर जो यह प्रस्तुत करता है अपना घोटाखोरी मिलावट के साथ वह पवित्र नहीं है। तो कबीर सागर एक सम्मानित ग्रंथ है तब तक जब तक उसकी बात का अर्थ उसमें कही हुई किसी बात का अर्थ वेद के सम्मत है। सनातनियों के लिए बाकी वो अपने नजर से कुछ भी हो उससे हमें कोई आपत्ति नहीं है। सनातनियों के लिए तब तक वो ग्राह है तब जब तक उसकी कही हुई किसी बात का अर्थ वेद के विरुद्ध ना निकल रहा हो। क्योंकि वेद यह घोषणा करते हैं कि वेद के अलावा कोई मार्ग नहीं है। और उपनिषदों के अनुसार जो पंचम वेद कहा गया है, सूक्ष्म वेद कहा गया, सूक्ष्म वेद तो प्रणव है। जो प्रणवाक्षर है वही सूक्ष्म वेद है। बीज रूपी वेद वो हमारा प्रणवाक्षर है। और पंचम वेद कहा गया इतिहास, पुराण, महाभारत इत्यादि को, पुराण, शास्त्र इत्यादि को और इसके भरभर के उपनिषदों में प्रमाण भी हैं।

00:03:30:26 अच्छा तो ये कहता है कि जो हमारे शास्त्र हैं उन पर आधारित चर्चा होगी। इसने कम से कम उस वीडियो में तीन से चार बार ये बताया है कि कौन-कौन से शास्त्र ने इस पर जोर दिया है। उसमें रामचरितमानस का नाम लिया है। उसमें जो है वाल्मीकि रामायण का नाम लिया है। महाभारत का नाम लिया है। गीता का नाम लिया है। और गीता को इसने सार बताया है। गीता को इसने किसका सार बताया है? चारों वेदों का प्लस सूक्ष्म वेद का। इसके चमचम वेद का। तो उसको इन सब का सार इसने गीता गीता को बताया है। जबकि यह खुद ही कहता है कि गीता में पूर्ण ज्ञान नहीं है। यह खुद ही कहता है और गीता कबीर सागर का भी सार है। यह इसकी मूर्खता है। इसने अपनी वीडियो में कहा। तो एक-एक करके चलते हैं। सबसे पहली बात इसने बोली है कि परमा पवित्र शास्त्र में कबीर सागर यह कैसे जुड़ा? रामपाल तुम बता दो। जब पंचम वेद, इतिहास, पुराण शास्त्र इत्यादि हैं उपनिषदों के अनुसार, महाभारत के अनुसार, पुराणों के अनुसार, ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार तो फिर तुम कैसे उसमें कबीर सागर को घुसेड़ोगे? अपनी वो थुल्लाग्लागिरी के आधार पर। अच्छा। फिर तुम कहते हो कि

00:04:46:00 गीता चार वेद प्लस सूक्ष्म वेद। तुम्हारे छमम छमम वेद का सार है। तो भैया तुम ही तो यह कहते हो कि गीता में पूर्ण परमात्मा की भक्ति कैसे करनी है? ये देखो वेदों और गीता में ज्ञान तो श्रेष्ठ है। मगर जो साधक परंतु भक्ति की साधना केवल तुम्हारे अनुसार जो काल ब्रह्म है जिसको पाकर के मुक्ति नहीं होती वहां तक की है। तो फिर तुम कैसे कह रहे हो कि गीता उसका सार है। या तो तुम यह कहो कि कबीर सागर में भी पूर्ण ज्ञान नहीं है। इसके अलावा और भी कई जगह तुमने कहा है चारों वेदों 18 पुराणों गीता जी व छह शास्त्रों में केवल ब्रह्म काल की उपासना है यानी मुक्ति की बात नहीं है तुम्हारे हिसाब से तो तुम गीता को कबीर सागर का सार कैसे कह रहे हो क्योंकि भैया दुकान चलानी है अपनी आप को फेमस करना है इसलिए है ना और एक जगह लिखा हुआ बिल्कुल साफ सुथरा कि भैया गीता में जो है अच्छा क्या कहता है गीता इसके और यह कहता है कि यह जो शास्त्र है ना वेद, पुराण और गीता यह सब जो है सद ग्रंथ है। इसके लिए पवित्र ग्रंथ हैं। और यह सद

00:06:01:08 ग्रंथ कहने वाला कौन है? जो लोगों को बहकाता है, झूठ बोलता है, अज्ञानता करता है, अपना उल्लू सीधा करता है, झूठ बोल के उल्लू सीधा करता है। उसके द्वारा की गई जो उल्टी है, जो इसने कहीं अपनी कल्पनाओं में सोच रखी है, उसको ये हमारे शास्त्रों से जोड़ देता है। और फिर भी इस मूर्खता को करने के बाद भी कहता है कि ये सद ग्रंथ है। अरे भाई तेरे अनुसार ये सद ग्रंथ है। पहले ये तो साबित कर सद ग्रंथ है कैसे? इनको तो काल दे रहा है और काल झूठ बोलता है। यह देखो इसका 95 नंबर पेज खोलकर दिखाओ। 95 चलो बाद में लगा देना। अभी मत खोलो। 95 नंबर प्रश्न पर तीसरे चौथे पैराग्राफ में लिख रहा है यह कि जो काल ब्रह्म है वह अच्छी आत्माओं को रचता है अर्थात पैदा करता है फिर उनमें स्वयं प्रवेश करके गुप्त रूप से अपना उल्लू सीधा कर लेता है और अभी आज पांचवे चैप्टर में भी यह बात आ रही है कि काल जो है भ्रमित करता है व्यक्ति को अज्ञानता फैलाता है व्यक्ति को तो फिर काल के द्वारा दिए गए जो वेद है वह भ्रमित करने वाले नहीं है कैसे तय हो रहा ठुल्ले गिरी के ज्ञान से घटियाई घटियाई रामपाल की घटिया गिरी के ज्ञान से जैसे तुम कहते हो ना ब्रह्मा विष्णु महेश

00:07:16:09 की भक्ति करने वाले या वो गीता ज्ञान दाता की जो भक्ति है वो गति है वो घटिया है तो वास्तविकता में तुम्हारा जो घटिया स्तर है उसके आधार पर तुम ये कहते हो तुम्हारी घटियागिरी है ये कि तुम पहले तो कहते हो कि काल जो है वो उल्लू सीधा करता है झूठ बोलता है अज्ञानता फैलाता है भ्रमित करता है और और फिर उसी के द्वारा दिए जाने वाले शास्त्रों को तुम कहते हो कि ये हमारे सद ग्रंथ है और सद ग्रंथ होने के बाद भी तुम फिर उसमें एक ठुल्लू लगाते हो कि इसमें ये तो काल ने अपनी मर्जी से कह दिया ये झूठ है वो झूठ है फलाना है ढिमका है तो पहली बात तो तुम यही सिद्ध कर दो कि भैया धर्म किसे कहते हैं ईश्वर किसे कहते हैं तुम्हारे अनुसार जो धर्म है जो धर्म है वही सिद्ध नहीं होगा धर्म की परिभाषा ही सिद्ध नहीं होगी फिर उसके बाद तुम ईश्वर की परिभाषा तुम्हारी सिद्ध नहीं हो पाएगी और तो और अंतत गतवा तुम्हारे द्वारा शास्त्र की परिभाषा सिद्ध नहीं हो पाएगी और अंत में अगर बात करो कि तुम इनको शास्त्र कहते हो सद ग्रंथ शास्त्र कहते हो तो किस आधार पर कहते हो सद ग्रंथ कहते हो तो किस आधार पर कहते हो अगर गीता कबीर सागर का और बाकी चारों वेदों का सार है तो फिर गीता में पूर्ण भक्ति की बात क्यों नहीं है तुम्हारे हिसाब से उसमें ज्ञान अधूरा है यह है तुम्हारा घटियागरी

00:08:31:27 का ज्ञान है ना ठोको ताली अच्छा इसके बाद इसने अपने उसमें क्या कहा है। आगे चलते हैं। इसने बड़ी कॉमेडी की है उसमें। मैं तो अभी तक समझता था कि रामपाल ही जो है ज्यादा बड़े कॉमेडियन हैं। मगर आज मुझे इस वीडियो को देख के पता लगा कि सबसे बड़ा कॉमेडी तो कॉमेडी किंग तो रामपाल है। कैसे? आगे क्या कह रहा है? फैसला कौन करेगा? जनता करेगी। है ना? फैसला कौन करेगा? जनता करेगी। और उसमें उदाहरण देता है। उदाहरण क्या देता है कि जैसे दो वकील हैं। ध्यान देना इस बात पे। जैसे दो वकील हैं, वह आपस में एक दूसरे को कुछ नहीं कहते हैं। बल्कि वह अपनेप पक्ष को रखते हैं। फैसला जो है वह करता है। जज करता है। ठीक है? तो फैसला जब जनता को करना है और फिर इसने ये कहा कि मैं साधना टीवी पर बैठकर के अपने आश्रम में क्या कहते हैं? कायरता पूर्वक क्योंकि मैं अपने बिल से तो बाहर निकल नहीं सकता। तो कायरता पूर्वक रामपाल अपने वक्तव्य निर्गत करेगा साधना टीवी पर आकर के और उसके बाद जिसका भी मन हो उसकी बात को काटने का जिससे कि रामपाल फेमस हो जितने ज्यादा से ज्यादा धर्म गुरु रामपाल की बात करेंगे उससे शास्त्रार्थ जैसा सीन बनेगा रामपाल कभी ये मानेगा नहीं कि मैं गलत हूं जनता का जनता ने किसको गलत

00:09:47:01 माना किसको सही माना ये फैसला कैसे होगा इस बारे में रामपाल जी का घटियागरी का ज्ञान कोई आधार नहीं है जनता ने किसको चुना इस इस बारे में रामपाल के पास कोई उपाय उपाय नहीं है। उसके बाद रामपाल यह कहता है कि रामपाल यह नहीं कहता कि आप साधना टीवी पर आकर के लाइव चर्चा करो मेरे सामने बैठकर ना रामपाल ये कहता है कि आप भी अपना चैनल बुक करके उस पर बोलो जैसे मैं बोल रहा हूं और चैनल ना हो तो YouTube पर बोलो और YouTube पर या Instagram पर जिस पर सोशल मीडिया पर मेरे बारे में बोलना है मेरी बात को काटो। कितना घटियागिरी करोगे भाई। कितनी घटियाई बातें करोगे। जो चीज तुम करने को कह रहे हो वह तो वह अभी भी कर रहे हैं। क्या अनुचार्य ज्ञान नहीं दे रहे? क्या देवकीन नंदन ज्ञान नहीं दे रहे? क्या रामानुजाचार्य परंपरा के जो आचार्य गण है वो ज्ञान नहीं दे रहे? क्या मधवाचार्य परंपरा के लोग हैं वो ज्ञान नहीं दे रहे सोशल मीडिया पर? क्या शंकराचार्य परंपरा के लोग ज्ञान नहीं दे रहे सोशल मीडिया पर? तो ये क्या मूर्खता की पराकाष्ठा प्रस्तुत कर रहे हो? तुम्हारे लोग वैसे ही अर्ध पागल है। उन्हें पूरा पागल बना के ही छोड़ोगे क्या? भाई वो लोग जो काम तुम करने को कह रहे हो वह तो दे ही रहे हैं। अच्छा तुम कहो कि मेरा नाम लेकर

00:11:02:07 के मेरी बात काटते हुए तो कोई बात नहीं कही। वैसे तो कही भी है। सुक्राईनाथ इत्यादि तरीके के जो कई ऐसे संत हैं जिन्होंने तुम्हारी बात को काटते हुए बातें की है। पर यदि चलो मान लिया कि जो बड़े संत है उन्होंने तुम्हारी बात को काटते हुए बात नहीं कही। उन्होंने अपना पक्ष रखा है। तो होत चुल्लू व्यक्ति शुरू में तू ही तो कह रहा है कि भैया केवल अपना पक्ष रखो। आपस में नहीं लड़ना है। फिर बाद में तुम ये क्यों अपेक्षा कर रहे हो कि भैया मेरा नाम लेकर के ज्ञान दो। वो तो वो कर ही रहे हैं। तो एक नया एक वो क्या होता है वो? एक तनतुना लेकर के आए बस और कुछ नहीं। फिर तनतुने में आगे क्या बोलते हैं? आगे क्या बोलते हैं? कि

00:11:50:28 आगे बोलते हैं कि जो सृष्टि रचना जो सृष्टि रचना बता सकता है वही सृष्टि करता है। तो भाई अगर सृष्टि रचना बतानी है तो जितने शास्त्र वेदव्यास के माध्यम से हमको प्राप्त हुए यानी वेदव्यास मानते थे जानते थे सृष्टि रचना तो वो तो सृष्टि तो वो तो तुम्हारे हिसाब से ईश्वर हो गए वेदव्यास जी अच्छा इसने कुछ उदाहरण भी दिए अपने बकवास में एक उदाहरण दिया भागवत का जो इनका फेवरेट पुराण है जिसमें इनको अपना वो ब्रह्मा विष्णु महेश का आविर्भाव तिरोभाव मिल जाता है तो ये वहां पर जो है ये व्यक्ति कहता है देवी भागवत में ब्रह्मा जी पूछ रहे हैं और देखो जो शिव शिव पुराण है उसमें ब्रह्मा विष्णु पूछ रहे हैं। इससे सिद्ध हो गया कि तीनों लोगों को नहीं मालूम है। जबकि सृष्टि रचना के बारे में ही जहां पर ब्रह्मा जी पूछ रहे हैं वहां पर देवी जी बता रही है। जहां पर ब्रह्मा और विष्णु दोनों पूछ रहे हैं वहां पर शिव जी बता रहे हैं। मगर यह बात नहीं बोलेगा क्योंकि ये दोगला व्यक्ति है। झूठा व्यक्ति है। कहीं पर भी एक बात को आप नोट करो। ये लोग कहते हैं कि शास्त्रों में इनकी भक्ति करने को मना किया गया है। पहली बात इस यह कभी प्रमाण सहित बता पाएगा यह घटियागिरी करने वाला व्यक्ति कि ब्रह्मा विष्णु महेश जो हमारे पंच देवोपासना

00:13:06:04 है वो करने के लिए यदि मना किया गया है शास्त्रों में तो इनकी भक्ति करने की जो विधा है वो आई कहां से अगर इनको जो है पूर्ण परमेश्वर नहीं कहा गया है शास्त्रों में तो इनको पूर्ण परमेश्वर माना कैसे किस आधार पर माना क्यों माना तो यहां पर तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं होगा क्योंकि जो हमारे सारे शास्त्र हैं। इसके हिसाब से इसकी घटियागरी की बातों के हिसाब से वो सारे शास्त्र तो इस बात के लिए हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश भगवान नहीं है। पूर्ण भगवान नहीं है। इस बात के लिए है तो फिर उनको पूर्ण भगवान माना किस आधार पे? दूसरी बात एक बहुत पॉइंट की बात है। यह लोग जितने लोग ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश की भक्त को पूर्ण ब्रह्म मानने वाली बातों को कट करने के लिए जितने भी शास्त्र के प्रमाण लेके आएंगे आपके सनातन शास्त्रों के तो जहां से प्रमाण दे रहे होंगे वहीं पर यदि ब्रह्मा विष्णु महेश को कहा जा रहा होगा कि उनका जीवन मरण होता है या आविर्भाव तिरोभाव होता है। हमारे अनुसार आविर्भाव तिरोभाव इनके अनुसार जीवन मरण। तो जहां पर यह कहा जा रहा होगा वहीं पर इन पांचों देवों में से किसी ना किसी एक को पूर्ण ब्रह्म के रूप में स्थापित किया है। मगर वह बातें यह नहीं बताएंगे क्योंकि यह है दोगले कौन है यह दोगले अपने बिल में बैठकर के बकवास करने वाले

00:14:21:27 इसके बाद ये दो बातें हमेशा ध्यान रखो एक बात कि भैया ब्रह्मा विष्णु महेश को पूर्ण परमेश्वर मानने वाली बात शुरू कहां से हुई इसका प्रमाण क्या है क्योंकि ये सारे शास्त्र तो उनको पूर्ण परमेश्वर ना मानने के निमित्त बनाए गए हैं और दूसरी बात क्या कहीं पर ऐसा है कि एक सिरे से पांचों देवों की उपासना को खंडन कर दिया गया हो कहीं नहीं है। यदि ब्रह्मा विष्णु महेश का आविर्भाव तिरोभाव बताएंगे तो वहां पर देवी ब्रह्म के रूप में स्थापित है। उत्पत्ति के रूप में स्थापित है। यदि देवी को उत्पन्न होना दिखाएंगे तो वहां पर शिव जी स्थापित है। यदि शिव जी का उत्पन्न होना दिखाएंगे तो विष्णु जी स्थापित है। इसका अर्थ क्या है? एक ही परम तत्व ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश के रूप में बार-बार सृष्टि करता है। कभी सृष्टि उसने मां मां भगवती के रूप को प्राथमिकता देते हुए रखी तो ये उनके परिकर कहलाए। बाकी के चार देव और जिस-जिस देव को प्राथमिकता देते हुए सृष्टि रचना की व्याख्या हुई। तो उस सृष्टि रचना के आधार पर जो बाकी के चार अन्य देव हैं वो उनके परिककर कहलाए। इतनी सी बात समझने वाली है। इसको कल्प भेद कहते हैं। वह बात और है कि इनके यहां पर काल मरता भी है। काल मरता है इसका मतलब वो दोबारा पैदा होता है। दोबारा पैदा होता है।

00:15:37:03 उसका जीवन मरण होता है। मानता है ना रामपाल अपनी घटियागरी के ज्ञान के अनुसार। तो काल जब मरा उसके बाद वो जन्म लिया। कबीर को मालूम है ये ऐसा-सा करेगा। फिर भी उसको जन्म दिया। यानी कि उसको फंसाना है दोबारा से आत्माओं को और जब वो दोबारा जन्म लेगा तो वही कहानी सब रिपीट होगी। वह दोबारा से ऐसा कुछ करेगा कि आत्मा उसके जाल में फसग दोबारा से कुछ ऐसी गलतियां जिससे कि ब्रह्मा विष्णु महेश रामपाल के हिसाब से प्रकट होंगे। ये सारी चीजें इसके यहां पर मान्य है और हमारे यहां के कल्पवेद को ये घटियागिरी का ज्ञान देने वाला कभी समझ नहीं सकता। इसके बाद इसने क्या बकवास की है? ये इसने पुराणों की बात की थी। वो हो गया। इसके बाद इसका एक चमचा बैठा हुआ है। किसी संत का भष धरे हैं। मैं उनको जानता नहीं हूं। हो सकता है संत हो या फिर हो सकता है इनके द्वारा प्रायोजित हो। ज्यादा चांसेस ऐसे हैं क्योंकि उन्होंने संस्कृत बोली और रामपाल के खेमे का व्यक्ति कभी संस्कृत बोलता हुआ नहीं मिलेगा। है ना? तो उन्होंने संस्कृत बोली तो वो एक इनका एक घटियागिरी का चेला वहां पर बैठा हुआ है और वो बातें कर रहा है कि वो रामपाल ने जो गौशाला में दान भेजा। अरे भैया रामपाल यदि गौशाला में दान भेज रहा है तो यह प्रश्न करने वाले क्या अपनी स्त्रियों को रामपाल के पास सोने के लिए भेज देंगे

00:16:53:27 जो तुम ऐसी बातें करते हो कि दुर्गा माता के बलात्कार की बात करने वाले का पक्ष लेते हो कि उसने पाइप दिए हैं। उसने जो है गेहूं, शक्कर, आटा, तेल, चावल दिया है। हां। बात हो रही है कि उसने जो है वेदों के नाम पर कूड़ा क्यों किया? उसने उसको कूड़ा करना है अपना भैया जो तुम लिख रहे हो किताब अपने आप को परमेश्वर कहो भजवाओ मगर वेदों के नाम पर कूड़ा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि वेदों पे सबकी आस्था है पुराणों पे सबकी आस्था है गीता पे सबकी आस्था है इसलिए जिस पे पहले से सबकी आस्था है उसी के अंदर चोरी से घुसना है और अंदर घुस करके ऐसा दिखाना है कि भैया इसके द्वारा तो मुझे ही पूजा जा रहा है वो बात और है कि मेरी हर दूसरी बात पहली बात से कट जाती है और हर पहली बात दूसरी बात से कट जाती है क्योंकि मेरा जो ज्ञान है रामपाल का जो ज्ञान है वो घटियागरी का ज्ञान है। है ना? अच्छा और आगे क्या है? फिर इसने आखिर में कहा कि जो है ये इनाम देगा जो इसकी एक बात को गलत साबित कर देगा। गलत साबित का निर्णय कैसे होगा? तेरी बात गलत साबित हो गई। अरे फोड़ है क्या तू? एक नंबर का मूर्ख व्यक्ति है क्या? एक तरफ तो कह रहा है भैया जनता फैसला ले लेगी। जनता फैसला ले लेगी। ये पता कैसे चलेगा? इस बारे में कोई तूने समीकरण बैठाए। समीकरण

00:18:09:08 बैठा भी नहीं पाएगा। उसके लिए दिमाग चाहिए होता है। उसके लिए पूर्ण बुद्धि काम नहीं करती है। एक लेवल तक जो रटा रटाई चीजें हैं वो बोल लोगे। उसके बाद ये सब चीजें कैसे स्थापित करोगे? जनता ने किसको चुना, किसको नहीं चुना। अच्छा दूसरी बात जब ये निर्णय ही नहीं होगा तो फिर ये कैसे तय होगा कि तेरी बात गलत साबित हुई कि नहीं हुई? हम अच्छा अब 100 की सीधी एक बात है। तो अभी रामपाल ने एक घोषणा की है। एक घोषणा अब मैं कर देता हूं। कॉमेडी सर्कस उसने किया है। मैं उसको उसका जवाब दे देता हूं। आप लोग यहां से चाहो तो रील कट करके अपना जो जवाब किसी को देना हो तो दे देना। तो एक कॉमेडी सर्कस में रामपाल ने हरियाणा का जो तथाकथित बाबा है जो हमारे सनातन देवी देवताओं का मजाक उड़ाता है। हमारे सनातन धर्म को मानने वाले हिंदुओं की आस्था के जो केंद्र हैं हमारे तीज त्यौहार इत्यादि हमारे ईश्वर के स्वरूप और हमारी पूजा पद्धति यानी कि श्राद्ध कर्म इत्यादि करवा चौथ के व्रत इत्यादि इन सबका मजाक उड़ाता है। कहता है करवा चौथ रखने वाली जो महिलाएं हैं वो गधी बनेंग है ना और ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति करने वाले नीच हैं। दुर्गा के साथ जो है बलात्कार किया एक राक्षस ने और भी ना जाने कितनी

00:19:24:14 बातें कि गायत्री ने गवाही देने के लिए झूठी झूठी गवाही देने के लिए शर्त रखी कि मेरे साथ पहले संभोग करो तब जो है मैं झूठी गवाही दूंगी। तेरे इकाई कई सांड पति होंगे। यह सब अश्लील बातें हैं। स्त्रियों के अंतरंग वस्त्रों की बात ये करता है माता पार्वती और शिवजी के विवाह वाले प्रकरण में अंतरंग वस्त्रों वो भी अंग्रेजी नाम उनका हिंदी नाम नहीं अंग्रेजी नाम। तो ये सब चीजें करने वाला जो बाबा है तथाकथित जो अपने जो कायरता पूर्वक अपने बिल में बैठा रहता है। उसने अपने बिल में बैठकर के एक घोषणा की है कि मैं हूं आदि सनातन धर्म का एडवोकेट। अरे घोंंचू तेरी सबसे पहले तो यही बात गलत हो गई। तू कह रहा है ना मेरी गलत बात साबित कर दो। सनातन के आगे यदि आदि लगा दिया तो सनातन का अस्तित्व कहां रह गया? जिसकी शुरुआत हो रही है वो सनातन नहीं है। सनातन वो जो अनादि है। अनादि सनातन कहता मूर्ख तो तेरी बात चल भी जाती। कहां तू प्रबुद्ध जनों में बैठकर के सोच रहा है कि लाइव तेरे साथ कोई शास्त्रार्थ करेगा। इतना बड़ा तू मूर्खता का पिटारा है ना। इतना बड़ा पिटारा है कि तुझको कौन अपने सामने बिठाएगा? आदि सनातन मैं हूं आदि सनातन का एडवोकेट तो सुन ले भाई रामपाल कहता है कि वह आदि सनातन का एडवोकेट

00:20:39:18 है और वो आदि सनातन उसका जो तथाकथित धर्म है जिसका उसे खुद ज्ञान नहीं है धर्म होता क्या है उसके बारे में वो अपना पक्ष रखेगा और उसकी बातों को जो भी गलत साबित कर देगा वो उसको 50 लाख देगा तो सुन मैं हूं सनातन धर्म का एडवोकेट और जितनी बातें तुमने सनातन परंपरा परंपरा प्राप्त सनातन धर्म के विरुद्ध कही है। उसके संबंध में जो मैंने निराकरण प्रस्तुत किए और तेरी मूर्खता प्रस्तुत की है। उसके एक भी शब्द को एक भी पंक्ति को एक भी बात को जो गलत साबित कर देगा उसको मैं ₹1 करोड़ इनाम दूंगा। बोल कर गलत साबित तू डाल डाल तो मैं पाथ पाथ। और फैसला कौन करेगी जनता? तो जनता फैसला करके बता देगी गलत साबित किया कि नहीं किया? तेरी डपोर शंख वाली बातें हैं ना। कर गलत साबित रामपाल के विरुद्ध मेरे द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले सिद्धांतों में से एक भी सिद्धांत को कोई गलत साबित कर देगा मैं उसको ₹1 करोड़ इनाम दूंगा। अपना चैनल खोलो सोशल मीडिया पे आओ YouTube पे आओ और करो गलत साबित और अगर कर दिया तो ₹1 करोड़ तुम तुम्हें मैं इनाम दूंगा। रामपाल

00:21:56:04 तू भी कर दे गलत साबित तेरे को मैं इनाम दूंगा। जा

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00:22:01:10 ठीक है भाई। तो यह आज के कॉमेडी शो का शो की थोड़ी सी विवेचना थी और उस पर हमारे रिप्लाई था। सबने सुन लिया इस रील को काट लेना और डालना आप लोग अपने अपने चैनल पर। अब आ जाते हैं इसके पांचव अध्याय पे और देख आज ही तेरी कितनी बातें गलत साबित होंगी। देख 110 नंबर का प्रश्न है। इसमें बोलता है गीता जी अध्याय पांच श्लोक सात में स्पष्ट किया हुआ है कि उपरोक्त दोनों प्रकार के सन्यासियों यानी कि कर्म सन्यास वाले कर्म सन्यास पर इसने कितनी बकवास की है वो आप लोग पहले देख चुके होंगे

00:22:51:06 दोनों प्रकार के सन्यासियों फिर से बोल दे रहा हूं एक बार मैं हूं सनातन धर्म का एडवोकेट अधिवक्ता और मैं चैलेंज दे रहा हूं कि रामपाल के विरुद्ध दिए गए सिद्धांतों को मेरे द्वारा प्रस्तुत किए गए सिद्धांतों में से किसी भी एक सिद्धांत को जो भी व्यक्ति दुनिया का जो भी कोई रामपाली गलत सिद्ध कर देगा मैं उसे ₹1 करोड़ इनाम दूंगा। ठीक है? अब कर दूं मेरी चीजों को गलत साबित। जिसने अपनी मां का दूध पिया हो, जिसको भी उसकी मां ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो, तो एक भी मेरे द्वारा रामपाल के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए सिद्धांत को गलत साबित कर दे, मैं उसे ₹1 करोड़ दूंगा। ठीक है?

00:23:39:18 हां। तो अब यह कह रहा है कि भाई गीता जी पांच श्लोक सात में स्पष्ट किया गया है कि उपरोक्त दोनों प्रकार के सन्यासियों खोल लो पेज खोल लो 110 सन्यासियों को अपने त्याग व साधना का अभिमान हुए बिना नहीं रहता। अभिमान भगवान के मार्ग में पूरा बाधक है। अर्थात अभिमानी व्यक्ति ही सर्व साधना अभिमानी व्यक्ति की सर्व साधना पूजा निष्फल हो जाती है। यहां ध्यान दीजिएगा अभिमानी। ठीक है? अहंकार नहीं होना चाहिए व्यक्ति के अंदर। ठीक है? अभिमानी व्यक्ति की सर्व साधना पूर्ण रूप से निष्फल हो जाती है। परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। इसके आगे इसने प्रमाण भी दिए हैं। कि ध्रुव प्रहलाद राजा अंबरीश राजा जनक शास्त्र विधि रहित गृहस्ती कर्म योगी थे। श्री नानक जी संत रविदास एवं संत गरीबदा दास जी शास्त्र अनुकूल साधना करने वाले गृहस्थ कर्म योगी थे। कर्म योगी में अभिमान नहीं हो पाता है। तो बात यह है कि शास्त्र विधि रहित कर्म योगी व्यक्ति बना कैसे? भाई कर्म योगी में

00:24:54:24 तो जब तक व्यक्ति शास्त्र सम्मत कार्य नहीं करेगा तो उसको आप कर्म योगी नहीं कह सकते हो यानी उत्तम नहीं कह सकते हो तो फिर वो कर्म योगी बना कैसे जब वो शास्त्र के विपरीत है तो वो कर्म योगी बन ही नहीं सकता क्योंकि कर्म तो वो है जो शास्त्र बताए जो शास्त्र नहीं बताएगा वो तो विकर्म है वो तो अधर्म है जो शास्त्र की सीमा से बाहर होगा फिर उसको कर्म योगी कैसे कहोगे दूसरी बात कि फिर फिर भी इनकी स्थिति को अच्छा कह रहा है ध्रुव प्रह्लाद इत्यादि की स्थिति को। वो बात अलग है कि भाई साहब ऑपरेटर जी आप मेरी बात सुन लीजिए। 110 नंबर पष्ठ को खोल लीजिए। दूसरी बात यह है कि इसने जो है एक जगह पर प्रह्लाद को प्रह्लाद को क्या कहा है? संसार के सब नर नारी सनक सनंदन 59 नंबर पेज है। संसार के सब नर नारी सनक सनंदन सनातन तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी उनके पिता ऋषि पाराशर जी प्रह्लाद तथा मुनि ऋषि ये सब स्वयं परमात्मा कबीर जी ही थे। यानी कि जो कबीर हैं वह भी गृहस्थ कर्म

00:26:10:07 योगी थे क्योंकि प्रह्लाद कर्म योगी थे। है ना? तो कबीर जी कौन है? गृहस्थ कर्म योगी मगर शास्त्र रहित साधना करने वाले। ठीक है ना? 59 नंबर पेज दिखा दीजिए इनको पहले। पृष्ठ संख्या 59 और उसके बाद दिखा दीजिए अह 110 नंबर। इसके आगे चलते हैं। इन्होंने कुछ बहुत सारी कथाओं का वर्णन दे दिया है कि अच्छा एक चीज इसकी इसकी जो ये लिखता है ना ये इसकी चीजों में एक चीज साफ पता चलती है कि यह व्यक्ति ये तय नहीं कर पा रहा है कि मुझे जो है काम वासना से अलग होना है या नहीं होना है। क्योंकि कहीं पे काम वासना का पक्ष लेता है। कहीं पे काम वासना का विरोध करता है। जैसे अभी सुखदेव जी का नाम लेकर के काम वासना का पक्ष ले रहा है कि सुखदेव जी ने उसको छुआ तक नहीं वह अप्सरा आई। यानी कि इसके पास अगर कोई आएगा तो ये छू लेता है। तो इस पर जो आरोप लगते हैं छू लेने के या बबिता इत्यादि वाले वो सही आरोप है क्या? यहां पर ये कह रहा है। ये देखिए पहले 59 नंबर देख लीजिए। दूसरी लाइन

00:27:25:13 से संसार के नर नारी सनक सनंदन सनातन तथा सन सन सनत कुमार तथा नारद जी व्यास जी ये सब जो है कबीर परमात्मा कबीर पूर्ण स्वयं परमात्मा कबीर जी ही थे। ठीक है? अब आ जाइए 110 नंबर पेज पर। 110 नंबर पेज पर सुखदेव जी की कथा बताते समय यह व्यक्ति कह रहा है कि जो सुखदेव जी थे उनको अभिमान था। ध्यान रखिएगा यहां पर ये अभिमान का भी विरोध कर रहा है कि कि जो है अभिमान नहीं होना चाहिए। ये बात तो सही है नहीं होना चाहिए। वो बात आगे है कि आगे इसने एक कूड़ा और कर रखा है। वो कूड़ा क्या है कि आगे जाकर के ये कहेगा कि अभिमान होना चाहिए। अहंकार होना चाहिए। समझ रहे हो? यही इसका घटियाईगिरी का ज्ञान है। तो यहां पर ये सुखदेव जी के अंदर अहंकार बता रहा है और वहां पर बता रहा है कि सुखदेव जी के पास एक अप्सरा आई। सुखदेव जी ने उसे छुआ तक नहीं। इसका मतलब ये है कि ये जो है छूना चाहता है। इसके पास अगर कोई जाएगी भवता सखा सरीखी इत्यादि तो छुएगा। इसका मतलब ये है। इसका मतलब ये है कि इसके ऊपर जो ये तथाकथित जो ये इन लोगों के अनुसार जो आरोप लगते हैं जो तथाकथित है वो सब सत्य होने की प्रतीति हो रही है। क्योंकि ये खुद इस

00:28:40:14 बात की इस बात का पक्ष ले रहा है कि कोई अगर तुम्हारे पास भले ही तुम्हारे अह तुम्हारे अधिकार में वो महिला आती हो तुम्हारा उससे विवाह हुआ हो या ना हुआ हो। हालांकि इनके विवाह की टेक्निक भी आप लोग जानते हैं पर अभी उस पे नहीं जाएंगे लंबा हो जाएगा। तो भले ही वो विवाहित हो आपसे ना हो मगर आपके पास यदि आए तो ये उसको छूता है। ये अपनी किताब में यही समझ में नहीं आ रहा है इसको कि मैं उसको छू कि नहीं छू। इसलिए कोई छू रहा है तो आपत्ति है इसको और कोई नहीं छू रहा है तो भी आपत्ति है इसको। कहां ना छूने पर आपत्ति है बता देता हूं। रुचि ऋषि की कथा ये व्यक्ति बताता है। तब उसके पितर उसको कहते हैं कि तू गृहस्थ होते हुए भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है तो ये वहां पर खंडन करता है। देखो देखो वो जो है पूर्ण सन्यासी बन करके अपना जीवन बिता रहा है। वैदिक धर्म पर चल रहा है और उसके पिता आ करके उसको भटका रहे हैं। कहता है [चीखने की आवाज़] और यहां पर क्या कर रहा है? यहां पर जो है दूर रह के और अप्सराओं से दूर रहना उन्हें ना छू करके और जो है कोई साधना कर रहा है तो उसका भी खंडन कर रहा है। तो ये कशमकश में है कि छूना है कि नहीं छूना है। है ना? तो इसका इस एपिसोड का नाम डाला जाए आगे चलकर के कि छूना है कि नहीं छूना है। भाई रामपाल अच्छा इसके बाद यह अगले भावार्थ में लिखता है। यह आप आ जाइए

00:29:55:15 110 नंबर पृष्ठ पे। 110 नंबर पृष्ठ पर आ जाइए। इसके बाद भावार्थ में लिखता है परमेश्वर कबीर जी सर्व प्राणियों के उत्पत्ति करता है। ठीक है भाई। इसलिए सर्व के पिता तथा माता भाई सखा रूप में सच्चे हितैषी हैं। अब देखो रामपाल जिस तरीके से हमारी चीजों का अनर्थ वो अर्थ निकालता है। अब मैं उसका अर्थ निकालता हूं। इसने लिखा है सबके पिता चल पिता मान लिया तथा माता अब क्या हुआ यानी कि कबीर जो है माता भी है और पिता भी है तो कबीर की पत्नी कौन हुई कबीर और क्योंकि रामपाल को भी कहा जाता है क्या कहते हैं वो कबीर ही है तो यानी कि कबीर जो सतलोक में बैठा है वो कबीर जी जो सतलोक में बैठे हैं इसके वाले वो जो संत कबीर दास हैं उनका बहुत सम्मान है अभी ये रामपाल के तथाकथित कबीर की बात हो रही है तो रामपाल का जो कबीर है वह सतलोक में बैठा हुआ है और उसकी पत्नी कौन है? उसकी पत्नी यानी कि सर्व प्राणियों की माता यानी कि रामपाल है। और रामपाल की रामपाल का विवाह कैसे हुआ होगा? जैसे रामपाल ने षष्ठी रचना में बताया है। कैसे

00:31:10:24 होता है विवाह? विवाह कैसे हुआ कि स्त्री इंद्री पहले थी नहीं। तो रामपाल की जाहिर सी बात है नहीं है। उसके बाद वो स्त्री इंद्री चिपकाई जाएगी नाखूनों के द्वारा। वो नाखूनों के द्वारा जो रामपाल से विवाह कर रहा है यानी कि जो सतलोक वाला कबीर वो स्त्री इंद्री रामपाल के चिपकाएगा। फिर रामपाल से उसका विवाह होगा। इसके आगे फिर कबीर भाई भी है। तो भाई भी है इसका मतलब क्या हुआ? ये तो बहुत ही गंदी बात हो गई यहां पर। क्योंकि कबीर भाई कबीर पिता है और कबीर ही भाई भी है। तो भाई जो है यानी कि माता का पुत्र वो कबीर के रूप में माता का पति हो गया। अरे कितनी अश्लील बातें हैं भाई तेरे सद ग्रंथ में ये सद ग्रंथ है तेरे कूड़े कहीं के ऐसे सद ग्रंथ हां ऐसे ही करते हो ना हमारे धर्म ग्रंथों का अपमान ऐसे ही करते हो ना उनकी बातों का अनर्थ अब ले तेरे ग्रंथों से तेरी बात निकल रही है क्या है कि कबीर सर्व आत्माओं का पिता भी है माता भी है भाई भी है आगे सखा मित्र भी है सखा भी है ठीक है तो भाई भाई अगर है तो वह किसका पुत्र है? माता का पुत्र है, भाई भी है। और क्योंकि पिता भी है तो यह जो पुत्र है वो कबीर के रूप में रामपाल का पति भी है। यानी कि अगर रामपाल पत्नी

00:32:26:02 के रूप में है कबीर की है ना? वो स्त्री अंग चिपका चिपकू करके बनाई गई। तो अगर रामपाल पत्नी के रूप में तो उसका जो पुत्र है भाई वही उसका पति भी है। ये कैसे रिश्ते हैं भाई? तुम्हारे यहां कैसे संबंध है? इस अश्लीलता को तुम लोग कहते हो सद ग्रंथ। धिक्कार है तुम जैसे लोगों पर। ऐसे ही करते हो ना हमारे सनातन धर्म ग्रंथों का अपमान। हां। खैर तो ये अगर इनकी तरीके से माना जाए तो यहां पर यही अर्थ निकलेगा जो मैंने अभी बताया। बाकी क्या है कि ईश्वर जो है वो हर रूप में सर्व रूपों में ईश्वर ही है। एक ही परम तत्व जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट होता है। तो परमार्थ क्या है कि सब कुछ ईश्वर ही है। व्यवहार क्या है? सब जो हम देख रहे हैं भौतिक जगत। तो उस रूप में अगर देखेंगे तब तो इस बात, ये बात की सार्थकता निकल आएगी। मगर क्योंकि इन रूप चुल्लुओं का ज्ञान कैसा है? जिस तरीके से हमारे धर्म ग्रंथों का नर्थ करते हैं उसी तरीके से अगर किया जाए तो यही निकलेगा कि रामपाल पत्नी है जो कि जिसके स्त्री अंग चिपकाया गया है और उसके बाद वो कबीर कबीर के साथ ब्याही हुई है कबीर ने भी उसका वो जो जबरदस्ती की है उसकी नियत खराब हो गई थी रामपाल पर वैसे रामपाल पर नियत खराब हो गई

00:33:41:03 वो भैया उससे पहले तो कोई व्यक्ति आत्महत्या कर लेगा [हंसी] खैर तो कभी इसके अनुसार रामपाल पर नियत खराब हो गई थी और फिर रामपाल के साथ जबरदस्ती ब्याह करवा दिया गया है। उसके बाद जो इनका इनका जो पुत्र है वह भी अपनी माता के पति के रूप में भी स्थापित हो जाता है। कबीर के रूप में ये सारी खिचड़ी ये निकल आएगी अनर्थ करने के लिए। अगर अनर्थ किया जाए बातों का तो है ना? खैर आगे चलते हैं। अच्छा एक बात और है कि ब्रह्मचारी का जो शाब्दिक अर्थ निकलता है ब्रह्म के लिए आचरण करने वाला। सीधी बात। तो यहां पर ये कह रहा है अह इसमें थोड़ा नीचे आइए। के भावार्थ में हूं मैं इस समय। यहां पर यह कह रहा है कि ब्रह्मचारी का अर्थ इसने माना है ब्रह्मचारी जो किसी स्त्री की ओर आकर्षित ना होता हो। ठीक है? तो वो इसने माना है कि जो किसी स्त्री की ओर आकर्षित नहीं होता वो ब्रह्मचारी है और ब्रह्मचारी ना होने की बात ये कह रहा है। यानी कि रामपाल आज भी किसी ना किसी स्त्री की ओर आकर्षित होता है। अब भाई इतनी सारी स्त्रियां आती है तो होता होगा किसी की ओर आकर्षित। क्या पता क्योंकि यहां पर सुखदेव जी द्वारा स्त्री की ओर आकर्षित ना होने की बात कह रहा है तो

00:34:56:07 रामपाल स्त्रियों की ओर आकर्षित हो रहा होगा अभी भी होता है ना भाई बता देना वो साधना साधना टीवी पे आएगा तो बता देना कौन सी वाली के ऊपर होता हूं क्योंकि विकल्प तो बहुत है तुम्हारे पास खैर ये इसका फुअर ज्ञान है यह इसकी फुअर बातों का जवाब है इसी की भाषा में आगे अगले प्रश्न पर आ जाते हैं 111 111 पर इसने कहा है गीता अध्याय सात श्लोक 19 में गीता ज्ञान कहने वाले ने कहा है कि सर्व मानव अन्य देवी देवताओं की भक्ति करते हैं पर मेरी भक्ति तो बहुत बहुत जन्म जन्मांतर के पश्चात कोई ज्ञानी पुरुष करता है ज्ञानी कौन करता है ज्ञानी पुरुष करता है ये कह रहे हैं ये कह रहे हैं गीता ज्ञान दाता यानी हमारे भगवान श्री कृष्ण तो गीता गीता ज्ञान दाता ने कह दिया कि मेरी भक्ति श्रेष्ठ है। जन्म जन्मांतर के बाद होती है। अब इसके बाद इसने एक लाइन आगे चिपका दी। परंतु यह बताने वाला सत्य कठिनता से प्राप्त होता है कि वासुदेव यानी जिस परमेश्वर की सत्ता सब ब्रह्मांडों पर है वही कुल का मालिक है। यह इसने अपना घुसेड़ दिया। वो कह रहे हैं कि मुझ वासुदेव की भक्ति कोई जन्म जन्मांतर में करता है और इसने अपना घुसेड़ दिया।

00:36:12:19 तो यहां से गीता करने वाले गीता कहने वाले के द्वारा उसकी भक्ति करना सिद्ध होता है। सात 19 से भी और परंतु यह बताने वाला संत कठिनता से प्राप्त होता है। यह जो इसने लाइन लिखी है इसमें पहले पैराग्राफ में परंतु यह बताने वाला संत कठिनता से प्राप्त होता है। इस बात का संस्कृत अनुवाद उस श्लोक में है ही नहीं जो ये बात करता है सात 19 की। अब आ जाते हैं इसने बहुत सारी चीज कथाएं कही है हम लोग इसकी पर्टिकुलर इसने जो बातें कही हैं

00:36:53:18 गरिमा गीता की में भगवत गीता का अर्थ करते हुए उन बातों पर हम लोग ध्यान दे रहे हैं सीधे-सीधे एक ये पष्ठ संख्या निकालिए 115 115 में यह सतगुरु बोले करी स्नान तखत पर आए सुखदेव परम ज्ञान गहराए 115 नीचे आइए नीचे करी स्नान तखत पर आए सुखदेव परम ज्ञान गहराए अकल अचिंत शब्द निर्मोही सुखदेव दर्श दर्श भर्म सब खोई कबीर राजा जनक गुरु किया कीन हरि की सेव अब देखो ये कहते हैं हरि राजा जनक को तत्व ज्ञानी तो मिला नहीं था राजा जनक को तो तत्व ज्ञानी कोई मिला नहीं था। फिर उसने हरि की सेवा कैसे कर ली? क्योंकि ये कहता है कि हरि यही है। हरियाणा में हरि आए हैं। बोलता है ना ये इसकी बात को ना इसी की किताबों से निकल आएगा। जूता जैसा इसके सर पर मारो। इसकी हर एक बकवास का जो उत्तर है वो इसकी किताबों में आपको मिल जाएगा। निकाल के जूता इसके सर पे मार। तो राजा जनक ने हरि की सेवा कैसे कर ली?

00:38:08:19 राजा जनक को तत्वदर्शी मिल गया था क्या? हम हरि की सेवा कैसे कर ली? अच्छा कहे कबीर बैकुंठ में चले गए सुखदेव। यह भी लिखा है। कहे कबीर बैकुंठ में चले गए सुखदेव। सुखदेव जी को बैकुंठ प्राप्त हो गया। बैकुंठ का मतलब जहां कुंठा नहीं होती किसी प्रकार की। यानी कि अभाव नहीं होता। यानी कि पूर्ण होता है। और भागवत के अनुसार भी सुखदेव जी को मोक्ष मिला था। सतगुरु बोले अमृत वाणी गुरु बिन मुक्ति नहीं रे प्राणी अब बता भाई तूने वेद भाष्य किससे पढ़ा कौन है तेरा वेद को पढ़ाने वाला गुरु क्या कबीर ने कभी वेदों पर भाष्य किया ठीक है और इसमें आगे यही सब बातें लिखी हुई है गुरु के बारे में

00:38:57:08 अच्छा हां यह और देख लो भाई यह कह रहा है कि 116 अगले प्रश्न पे दिखाते हैं एक बहुत बढ़िया चमत्कार दिखा रहा हूं आपको बढ़िया चमत्कार। अगले प्रश्न पे आइए 116 पे। 116 पे पहला ही जो दो चार लाइन है। हां ये देखो इसमें तीसरी लाइन देखिए आप क्या लिखा है? ब्रह्मा गुरु कविग्नि को कीना हां? होम यज्ञ जिन आज्ञा दीनना। पहली बात तो यह है कि आज्ञा दी गई है तो प्रमाणित हो गया यज्ञ की। होम यज्ञ तो भैया इनके यहां पर यज्ञ कौन-कौन करता है रामपाल के यहां पर यह बताएं और यहां पर जो है इसने माना है

00:39:48:26 अगर इसके हिसाब से इसकी तरीके से अगर मैं अर्थ करूं तो यहां पर कबीर जी ने गुरु किसको माना ब्रह्मा जी को क्योंकि यह तो अपने हिसाब से कुछ भी अर्थ कर लेता है तो यहां पर मैं अर्थ कर ले रहा हूं कबीर जी ने गुरु किसको किया ब्रह्मा जी को ठीक है। कवि अग्नि को ब्रह्मा गुरु कीना। ठीक है। होम यज्ञ जिन आज्ञा दीना। तो भैया इनके यहां पर कौन है जो यज्ञ करता है? यह बताएं ओम यज्ञ करता है। और तुम्हारे तो कबीर कबीर जो हैं कबीर अग्नि हम तो कबीर जी जो है वह तो जो है क्या कर रहे हैं? ब्रह्मा जी को गुरु बना रहे हैं। ठीक है भाई। ब्रह्मा जी गुरु हो गए। कबीर जी के। चलो अब आगे चलते हैं। अब 118 पर आ जाइए। श्लोक क्रमांक पर आते हैं। गीता अध्याय पांच अच्छा हां पांच सात का जो इसने कूड़ा किया था वो पढ़ दूं। हमारे यहां क्या लिखा है? पांच सात में पांच सात में हमारे यहां लिखा है। जिसका मन अपने वश में है। जो जितेंद्रिय है एवं विशुद्ध अंतःकरण वाला है। है ना? यह प्रैक्टिसिंग के बाद जो स्थिति प्राप्त होती है उसकी बात हो रही है और संपूर्ण प्राणियों का आत्म स्वरूप परमात्मा ही जिसका

00:41:04:04 आत्मा है यानी परमात्मा के साथ एकत्व को स्थापित करने वाला उसके सानिध्य को सानिध्य में रहने वाला ऐसा कर्म योगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता यानी कि आसक्ति रहित है जो राग द्वेष जिसमें नहीं है वो कर्मों को करते हुए भी उनसे प्रभावित नहीं होता यह यहां कहा गया है इसमें कहीं भी अभिमान होने अथवा ना होने की कोई बात यहां पर नहीं आई है। मगर इस फुअर ने क्या लिखा है? पुअर ने क्या लिखा है पांच सात के उसमें अर्थ करते हुए कि उसमें कहा गया है कि अ

00:41:38:24 कि भाई जो सन्यासी होता है कर्म सन्यास उसको जो है अभिमान होते हुए भिन्न नहीं रहता। भाई इसकी संस्कृत कहां है? फड़ कहीं के तू कहता है मेरी बात को गलत साबित कर दो। दिखाना अनुवाद कहां है? कौन से शब्दों से तूने अभिमान को यहां पे ठोका है? ठोको ताली। इस समय मैं अपनी भगवत गीता पढ़ रहा हूं। अच्छा अब आगे आठ और नौ का अर्थ बता रहा है। अच्छा एक बात ध्यान दीजिएगा। ज्यादातर ऐसा होगा इसकी गीता में कि जहां जहां पर गीता प्रेस से अर्थ करते समय कभी-कभी ऐसा होता है दोद श्लोकों को एक साथ लेकर के उसका अनुवाद किया जाता है तो जहां जहां पर ऐसा क्योंकि खुद तो उड़क चुल्लू है तो ये पूरा कॉपी करता है ना तो इसलिए जहां पर उन्होंने दो श्लोक एक साथ होंगे तो यह भी वही पर दो श्लोक एक साथ लेगा इसका उदाहरण बता रहा हूं पांचवे अध्याय में जय दयाल गोविंद का जी के जो अर्थ है वहां पर आठ और नौ श्लोक का एक साथ अनुवाद किया गया तो इसने भी फड़ ने आठ और नौ श्लोक का एक साथ ही अनुवाद किया। आगे भी मिलेगा ये चीज है ना। तो क्या है? आठ और नौ श्लोक में यह कहता है कि आठ और नौ श्लोक का भाव है कि जो जो भी

00:42:53:27 कर्म व्यक्ति करता है, वह सोच ले कि मैं कुछ नहीं करता। यह अनुवाद अन्य गीता जी के अनुवादकर्ताओं ने किया है जो गलत है। यानी कि यह गलत है। ठीक है? अब भैया नीचे करो जरा इनको दिखाओ 118 पे नीचे जाओ गीता अध्याय पांच श्लोक आठ और नौ का भावार्थ ठीक है इसमें भाव आठ और नौ का भाव अब देखो क्या कह रहा है श्लोक आठ और नौ का भाव है ये श्लोक का भाव बता रहा है भाव फिर आगे क्या कह रहा है यह अनुवाद इन्होंने किया है जो गलत है तो फिर तू क्यों कह रहा है कि ये भाव है तू भी कहना अनुवाद है शुरू से अनुवाद कहना अरे फ अनपढ़ है क्या तू ये गुस्सा मुझे पता है क्यों आता है ये इसलिए आता है कि जब मैं इसका अर्थ करने बैठता हूं तो भाई मैं सर में दर्द होता है कुछ भी लिखता है ये आदमी अरे कुछ तो सर पैर हो कह रहा है कि ये भाव है भाव है मतलब तू जानता है कि इसका अर्थ सही क्या है और तू बता रहा है कि सही क्या है फिर आगे जाके आगे आगे जाके कह देता है यह अनुवाद गलत किया है। अरे भाई जब ये अनुवाद है और गलत

00:44:09:03 भी है तो तू भाव क्यों कह रहा है? फिर आगे अब ये खुद बताता है सही भाव क्या है? ठीक है अब विचार इसने कहा इसने तर्क दिया विचार करें। यदि कोई किसी की हत्या कर दे और कहे कि मैंने कुछ नहीं किया। क्या वह दोष मुक्त है? यह ज्ञान भगवान श्री कृष्ण का नहीं ब्रह्म काल का है। पहले कर्म करवाएगा फिर भोग देगा। ठीक है? तो ये काल जो है फंसाने वाली चीजें करता है। फिर इसी के ये काल फसाएगा तो फंसाने वाली चीजें करता है। फिर इसी के शास्त्रों को तू सद ग्रंथ भी मानता है। चल ठीक है। वो तो बातें जब किसी दिन तू अपने बिल से बाहर मिलेगा हाई कोर्ट में आएगा वो सब बातें तो तब होंगी। अभी तो ऐसे ही तेरे पर कच्चे उड़ाने हैं। तूने कहा था ना कि भैया सोशल मीडिया पे करो। कर रहा हूं। दे जवाब और एक करोड़ ले जा। हम तो अब इसने क्या कहा है कि भाई विचार करें अगर कोई किसी की हत्या कर दे। देखिए जो बात ये कही गई है आठ और नौ में पहले कहा क्या गया है उसको समझ लीजिए। तत्व को जानने वाला सांख्य योगी तो देखता हुआ सुनता हुआ स्पर्श करता हुआ सूंघता हुआ भोजन करता हुआ गमन करता हुआ सोता हुआ श्वास लेता हुआ बोलता हुआ त्यागता हुआ ग्रहण करता हुआ तथा आंखों को खोलता हुआ और मूंदता

00:45:24:16 हुआ भी सब इंद्रियां अपने अपने अर्थों में बरत रही है। इस प्रकार समझकर निसंदेह ऐसा माने माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूं। अब इसने यहां पे इस चीज का उदाहरण यहां किसकी बात हो रही है? जो तत्व को जानने वाला है उसको ऐसा मानना चाहिए। और यहां इसने क्या कहा है कि भाई अह जो कोई हत्या कर देगा तो वो यह मानेगा कि मैंने मैंने कुछ नहीं किया। पहली बात तो यह है कि हत्या जब जैसे तूने हत्या की तो तू भले ही यह मान के मैंने नहीं की। मगर वो कोर्ट तुझको दे ठोक देगी जेल में और वहां पे होगी ठुकाई वहां पे अच्छे से ठुकाई होगी और वो तुझे कुछ नहीं वहां निर्णय करना है मैंने किया कि नहीं किया वो कोर्ट करेगी निर्णय न्यायालय करेगा पहले तो ये वाली बात है हत्या करने वाली बात दूसरी बात ये है कि भाई जो तत्व को जानने वाला है वो हत्या क्यों करेगा तत्व को जानने वाला तो यानी कि धर्म को जानने वाला ह तत्व को जानने वाला हत्या करता है क्या इसका मतलब कि तू हत्यारा है क्योंकि तू अपने आप को तत्वदर्शी कहता है और तेरे अनुसार तत्व को जानने वाला हत्या करता है। भाई तत्व को जानने वाला यानी धर्म को जानने वाला वो हत्या क्यों करेगा? वो तो जिन कर्मों को कर्तव्य कर्मों को कर रहा है। यानी कि यहां पर कर्तव्य कर्मों की बात हो रही है। यहां पाप कर्म को तो भूल ही

00:46:39:18 जाओ। यहां बात हो रही है कि आप जो कर्तव्य कर्म भी कर रहे हैं उसके लिए भी आप यह सोचो कि आप नहीं कर रहे हैं। यानी जो अच्छे कार्य भी आप कर रहे हैं उसके लिए भी स्वयं के ऊपर ना लाओ। अहंकार मत लाओ कि मैंने किया। यानी धर्म कार्य के लिए भी ऐसा मत सोचो कि मैंने किया। इसके लिए ऐसा कहा जा रहा है। मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा हूं। और यही बात नैनम चिंदती शस्त्राणी भी साउंड करता है कि कोई कुछ कर ही नहीं सकता। तुमको कुछ हो ही नहीं सकता क्योंकि तुम कहीं से लिप्त हो ही नहीं। दूसरी बात ये आती है कि कर्तव्य कर्मों को करने पर भी तुम यह मत सोचो कि ये मैंने किया है। मगर सबसे जरूरी बात यह आती है कि इसे कहते हैं अहंकार। अब यहां पर ये फुअर अहंकार का पक्ष ले रहा है। यानी हमें अहम करना चाहिए। देखो देखो हमने उसको पाइप बांट दिए अनाकोंडा के बराबर। देखो देखो मैंने उसको चीनी दे दी 4 किलो। देखो देखो मैंने वहां पर राहत कार्य कर दिया। इसलिए रामपाल के अनुसार रामपाल के चेलों के अनुसार सब लोगों को अपने-अ अपने घर की गरिमा को भंग करते हुए अपनी गरिमा को गरिमा के ध्वज को लहराने वाली जो भी विषय वस्तु व्यक्ति स्थिति स्त्री होती है उसको रामपाल के पास भेज देना चाहिए। क्योंकि भाई रामपाल ने पाइप बांटे हैं। रामपाल को अहंकार है

00:47:54:19 और रामपाल पीछे कह रहा था अहंकार नहीं होना चाहिए और यहां पर कह रहा है कि अहंकार होना चाहिए। ठोको ताली क्योंकि यह है रामपाल का कॉमेडी शो कॉमेडी नाइट वि रामपाल ठोको ताली कितनी घटियाई बातें हैं भाई तेरी हर पन्ने पे अपनी पहली बात को तू काटता है हर दूसरी बात से तू अपनी पहली बात को काटता है ये जो मुझे जो गुस्सा आता है इसीलिए आता है वो सब बातें तो एक तरफ है कि उसने ये कहा है वो कहा है मगर ये गुस्सा इसलिए आता है ये सब कचरा मुझे अब मुझे पढ़ना पड़ता और इसके बारे में बात करनी पड़ती है आप लोगों से। [हंसी]

00:48:37:01 अच्छा तो आप लोग यहां समझ गए पांच और आठ और नौ में क्या कहा जा रहा है और ये क्या कह रहा है। ठीक है। इसने क्या कहा है आठ और नौ का अर्थ? अब इसने विचार तो करने को कह दिया था। फिर आगे कह रहा है कि तत्व ज्ञान युक्त साधक सर्व कर्म करता हुआ ध्यान रखता है कि मैं कोई पाप कर्म तो नहीं कर रहा हूं। इसलिए कहा है कि वह ज्ञान आधार से सोच समझकर सर्व्म करता है। अब यह फवर ने यहां पर जो भी बातें लिखी है इस जगह पे है ना उसका संस्कृत अनुवाद तो करके दिखा शास्त्र चोर कहीं के

00:49:14:21 खैर आगे चलते हैं। तालियां ठोकते रहिए बीच-बीच में। अच्छा आगे इसने क्या बोला है? गीता के इस अध्याय पांच श्लोक के 14 15 16 19 20 24 25 26 अब देखिए इसने 10 11 और 10 11 12 13 की बात ही नहीं की है। सीधा 14 पे आ गया। चोर है ना कहीं ना कहीं तो फसेगा। ये जो बात कहता है कि काल ने कुछ श्लोक अपने मन से कह दिए। ये लोग कभी बता ही नहीं सकते कि काल ने कितने श्लोक कौन-कौन से कहां-कहां पर अपने मन से कहे। क्योंकि इनके अनुसार तो सारे श्लोक कट जाएंगे। बहुत कम श्लोक बचेंगे गीता के। खैर अब इसने जो है 10 11 12 13 की बात नहीं की। आठ नौ के नहीं 10 से 13 की बात की है। 10 से 13 की बात की है। क्या कह रहा है? अध्याय पांच के श्लोक 10 से 13 में कहा है कि आत्म तत्व में आए साधक अर्थात जिन्होंने पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हुआ। जिनको पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हुआ तथा पूर्ण गुरु के नाम से लिया। वह पूर्ण गुरु से नाम लिया। वह व्यक्ति शुभ कर्म करता है। इसलिए कर्मों के बंधन में नहीं बंधता है। तथा अब

00:50:30:00 देखो इसने क्या मान लिया? जिसको तत्व ज्ञान है वो शुभ कर्म करता है। तो फिर तू क्यों कह रहा है भैया हत्या करेगा तो हत्या का दोष उस पर लगेगा कि नहीं? अगर तेरी बात भी मान ली जाए कि तत्व ज्ञान तेरा नाम है। तो जिसके पास तत्व ज्ञान है वो हत्या क्यों करेगा जो उससे तू उसकी तुलना कर रहा है। वह तो सिर्फ धर्म कार्य करेगा। तो शास्त्र तो यह कह रहे हैं कि धर्म कार्य का धर्म कार्य करने के लिए भी अहम भाव अपने ऊपर मत लाओ। इसमें क्या गलत कह रहे हैं शास्त्र खैर अब जो है आगे अब हम लोग अपना 10 से 13 का अर्थ पढ़ते हैं क्या है? तो 10 में लिखा है जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भांति पाप से लिप्त नहीं होता। ठीक है। यहां पर संस्कृत की इसमें संस्कृत के साथ इन्होंने गरिमा भंग कर दी संस्कृत की। आगे क्या कह रहा है? भगवत गीता क्या कहती है आगे? अह 11वें श्लोक का अर्थ कर्म योगी ममत्व बुद्धि रहित केवल इंद्रिय मन बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। ममत्व की बुद्धि

00:51:45:08 रहित वही वाली बात कि अगर ऐसा सोचो कि इंद्रियां ही इंद्रियों में गुण गुण ही गुण में बरत रहे हैं और अपना अहम भाव ना लाओ तो ममत्व की बुद्धि रहे राग द्वेष इत्यादि से रहित हो के और इंद्रिय मन बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं तो उनके मन में किसी के प्रति राग द्वेष नहीं होता है। तत्व कुछ भी मान लो जो सना परंपरा प्राप्त तत्व का अर्थ है यहां पर वह मान लो या रामपाल का तत्व मान लो मगर तत्व ज्ञान जिसको है वो हत्या जैसी चीजें क्या अत्याचार पाप कर्म नहीं करेगा कर्तव्य कर्म करेगा अगर हत्या होगी तो वध के रूप में होगी किसी दुराचारी की हत्या होगी जैसे अर्जुन को करने के लिए कह रहे हैं भगवान यहां पर आगे चलते हैं पांच 12 में कहा गया है कर्म योगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत प्राप्ति रूप शांति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बंधता है। ठीक है? अब आप एक चीज नोटिस करिए कि 10 से लेकर 13 में हर श्लोक अलग-अलग बातें कर रहा है। क्रम को आगे बढ़ा रहा है। मगर इसने केवल एक बात कर दी। 10 से 13 में क्या कहा गया है? इस 10 से 13 में कहा गया कि आत्म तत्व में आए साधक जिन्होंने पूर्ण परमात्मा का ज्ञान जिनको पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हुआ

00:53:00:12 तथा पूर्ण गुरु से नाम लिया ले लिया वह व्यक्ति शुभ कर्म करता है इसलिए कर्मों के बंधन में नहीं बंधता तथा अन्य काल ब्रह्म ज्ञान के आधार पर अन्य लोग जो है वह काल ब्रह्म के आधार पर कर्म करते हैं और फिर कर्म फल भोगते हैं। ठीक है? तो यहां पर काल ब्रह्म के आधार पर कर्म करते हैं। ऐसा कहीं नहीं लिखा है। और इन श्लोकों में अलग-अलग बातें हो रही। जैसे इन शब्दों का अनुवाद कहीं है ही नहीं। इसकी बात में ममत्व, बुद्धि रहित केवल इंद्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर यह सब अनुवाद का घोल घपला कुछ है ही नहीं। यहां पर है ना? फाड़ के फेंक दिया जाए। इनके हिसाब से इनके लोग तो बोलते हैं इनके चूहे भगत। फिर कर्म योगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत प्राप्त रूपी शांति को प्राप्त होता है। तो यह भैया शांति को प्राप्त हो रहा है। फिर फिर इसकी बात क्यों नहीं की इसने? हां यह भी नहीं बात की। 5 13 क्या कह रहा है? अंतःकरण जिसके वश में है। ऐसा सांख्य योग आचरण करने वाला पुरुष ना करता हुआ और ना करवाता हुआ ही नव द्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्याग कर आनंद पूर्वक सच्चिदानंद घन ब्रह्म सच्चिदानंद घन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है। लो यहां भी सच्चिदानंद की बात हो गई। परमात्मा

00:54:15:15 की बात हो गई, सुख की बात हो गई। तो यहां सर्व कर्म करते हुए भी परमात्मा में समर्पित समझकर कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। कर्तव्य कर्मों का पालन मात्र कर रहा हूं। इस रूप में कर्म करते हुए अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए वो कर्म करते हैं। और ऐसे लोग जो होते हैं वो सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा में स्थित रहते हैं। सुख में स्थित रहते हैं। सुख का मतलब क्या है? ज्ञान स्वरूप। सुख क्या है? सुख आएगा आपके पास ज्ञान के रूप में। तो सुख का अर्थ क्या हुआ? फाइनली जो सुख है उसका अर्थ क्या हुआ? सुख का अर्थ है ईश्वर। तो इसलिए यहां पर ईश्वर लिखा गया। ठीक है? अब ये आ जाता है 5 14 पे। 5 13 में तो इसने घोल घपला कर दिया। श्लोकों का अलग-अलग अर्थ किया ही नहीं। वो उस समय इसको शायद कोई छूने वाली आ गई हो आश्रम में। तो ये इसको लगाओ इन 10 से लेके और 13 तक के श्लोकों का अर्थ जल्दी से र सपड़ा मार सपाटा मार दो। तो इसने अपना जल्दी से मार दिया। अलग-अलग अर्थ नहीं किया उन सारे श्लोकों का। और अब जो है फिर से पांच 14 पांच के पांचव अध्याय के 14 15 16 19 20 24 25 26 इसमें ये जो है कुछ लोगों को छोड़ रहा है। उसका क्या करेगा वो नहीं पता। खैर तो यह इसका जहां मन होता है ऐसे ही जंप

00:55:30:24 मार जाता है। लोग जो जेल में बंद होते हैं वो कई बार जेल से भागने की प्रैक्टिस करते हैं। उसमें एक प्रैक्टिस होती है कि उनको कोई लंबा सा बंबू मिल जाए और बंबू लेकर के वो उसका सहारा लेकर के और दीवार को फान जाए जेल की। हालांकि मेरी जानकारी में अभी तक ऐसा हुआ नहीं है। पर जिस प्रकार से ऐसी भावना जेल में बंद लोगों के मन के अंदर आती है, उसी प्रकार की भावना गीता पर बात करते समय इस जेल कट्टू रामपाल के मन में आती है। जगह-जगह पर यह श्लोकों पर जंप मार देता है। जैसे 10 से लेकर 13 के बीच में इसने दो-तीन पंक्तियों में ही चार श्लोकों का अर्थ कर दिया और एक का भी हिंदी अनुवाद इसने नहीं लिखा। ठोको ताली। आगे चलते हैं। अब यह कह रहा है कि गीता ज्ञान बोलने वाले से अन्य पूर्ण परमात्मा है। यह बात गीता के इस अध्याय पांच के श्लोक 14, 15, 16, 19, 20, 24, 25, 26 में कही गई है। गीता ज्ञान बताने वाला अपने से अन्य पूर्ण परमात्मा की भक्ति बता रहा है। कहीं नहीं बता रहा है। देखते हैं कैसे। देखो सबसे पहले पांच श्लोक 14, 15, 16 में क्या कहा गया है? देख लेते हैं। कहा है कि पूर्ण परमात्मा ने जब सतलोक में सृष्टि रची थी। उस समय किसी को कोई कर्म आधार बनाकर उत्पत्ति नहीं

00:56:45:27 की थी। सत्यलोक में सुंदर शरीर दिया था जो कभी विनाश नहीं होता। परंतु प्रभु ने कर्म फल का विधान अवश्य बनाया था। इसलिए सर्व प्राणी इसलिए सर्व प्राणी अपने स्वभाव वश कर्म करके सुख व दुख की भोगी होते हैं। जैसे हम सर्व आत्माएं सत्यलोक में पूर्ण ब्रह्म परमात्मा द्वारा अपने मध्य से शब्द शक्ति से उत्पन्न किए गए। वहां हमें कोई कर्म नहीं करना था तथा सर्व सुख उपलब्ध थे। हम स्वयं अपने स्वभाववश ध्यान रखिएगा आत्मा का स्वभाव है। क्या है? हम अपने स्वभाववश होकर ज्योति निरंजन ब्रह्म काल पर आसक्त होकर अपने सुखदाई प्रभु से विमुख हो गए। ठीक? अब यहां पर एक बात है कि इसने प्रभु का अर्थ मान लिया परमेश्वर। यह ध्यान रखना प्रभु का अर्थ भी परमेश्वर माना है। तो कई जगह पर रामचंद्र जी के लिए कृष्ण भगवान के लिए प्रभु शब्द आया है। जैसे रामायण में आया है भगवान राम जी के लिए या अन्य शास्त्रों में आया है कि वो स्वयं प्रभु है। जैसे कृष्णस्तु भगवान स्वयं आया वैसे स्वयं प्रभु राम जी के लिए आया है। तो राम जी भी परमेश्वर सिद्ध हो रहे हैं ना प्रभु के अर्थ

00:58:01:01 में। अच्छा दूसरी बात एक है कि स्वभाववश यानी कि आत्मा का स्वभाव क्या है? इसके अनुसार काल की ओर आकृष्ट होना और काल क्या करवाता है? काल अज्ञान देता है। अधर्म करवाता है। तो इसका अर्थ क्या हुआ? कि काल की ओर आकृष्ट हो के अधर्म करना पाप करना इसके अनुसार रामपाल के अनुसार वह आत्मा का स्वभाव है। आत्मा का अगर स्वभाव है तो इसका मतलब आत्मा वही कर रही है जो उसे करना होता है। स्वभाव क्या होता है? वही कर्म करना जो उसे करना है। ठीक है? तो यहां पर इसने ये मान लिया। तो इसका अर्थ क्या है? इसके अनुसार यह व्यक्ति को सिद्धि नहीं कर पाएगा कि तेरा स्वभाव तो भैया भगवान की ओर आकृष्ट होना है। काल की ओर नहीं। तेरा स्वभाव तो मुक्ति है। तेरा स्वभाव तो सदाचरण है। धर्माचरण है। स्वभाव तो इसने पाप मान लिया। यह तो सबको पापी बनाएगा। अपना आटा खिला के, चीनी खिला के, तेल पिला के और ना जाने क्या-क्या पिला के। खैर आगे चलते हैं। फिर इसने 5:15 के उसमें अर्थ में कहा है। अच्छा हम लोग भी पढ़ लेते हैं जरा।

00:59:14:14 पांच से 17 तक हम भी पहले इसकी पूरी बात पढ़ ले फिर क्या है तो इसमें [गला साफ़ करने की आवाज़] फिर आगे लिखा है अब जैसे कर्म करते हैं उसी के अनुसार प्राप्त हो रहे हैं शास्त्र विधि के अनुसार साधना करने से क्षमा कर देता है अन्यथा संस्कार ही बरतता है अध्याय पांच 14 26 तक शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्म तथा मर्यादा में रहकर पूर्ण परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं तथा पूर्ण प्रभु पाप पाप क्षमा कर देता है इसलिए लिए कर्म करता हुआ ही पूर्ण मुक्त होता है। जबकि इसने अपनी पिछली इसी पांचव अध्याय में इसने माना था कि वो जो है पाप कर्म वगैरह क्षमा नहीं करता कुछ नहीं करता। वो कुछ नहीं करता है। और यहां पर मान रहा है कि पाप कर्म क्षमा कर देता है। ठीक है? अब जो है

01:00:02:19 एक बात तो यह है कि इसने पांच 14 में जो संस्कृत में प्रभु शब्द आया है उसका अर्थ इसने परमेश्वर माना पांच 15 में विभु शब्द आया है। विभु का मतलब व्यापक सर्वव्यापक तो विभु का मतलब इसने जो है वहां भी परमेश्वर मान लिया। इसका मतलब इसने मान लिया कि जो परमेश्वर है वो सब जगह है। सर्वव्यापक मान लिया। इसलिए क्या करता है ना जहां देखता है कि यहां पे हमारी बातें कट रही है तो वहां पे खोल खोल के एक-एक शब्द पे बात नहीं करता। जहां पे इसके मतलब का कुछ निकल रहा होगा वहीं पे बात करेगा जैसे अभी थोड़ी देर आगे करेगा। तो

01:00:38:00 आगे सब अगले पैराग्राफ में कह रहा है पांच 14 15 16 19 20 24 25 26 का अर्थ करते हुए अगले अगले पैराग्राफ में कह रहा है सब स्वभाववश चलते हैं। कर्म तो काल ज्योति निरंजन ने लगा रखे हैं। वही अज्ञान पैदा करके जीवों को भ्रमित करता है। देख ले भाई तू ताल ठोक रहा है ना अपने 50 लाख वाले इनामी कूपन वाले वीडियो में कि भैया ये सद ग्रंथ है। सद ग्रंथ को कहने वाला तो अज्ञान पैदा करके जीवो को भ्रमित करता है। भाई दिख रहा है? अंधे हो तुम लोग जो इसकी बातों में आते हो। अंधे और पुअर पत्रकार जो इसका प्रचार करते घूम रहे हैं। पेड़ प्रचारक

01:01:22:24 वास्तविक ज्ञान पूर्ण परमात्मा का अज्ञान काल ज्ञान के द्वारा दबा रखा है। काल ने वास्तविक ज्ञान को दबा रखा है। ध्यान रखो। काल ने वास्तविक ज्ञान को दबा रखा है। यानी कि गीता में गीता कहने वाला काल है और वेद भी कहने वाला काल ही है। तो उसने तो ज्ञान को दबा रखा है। काहे है कि सद ग्रंथ बिल से बाहर तो निकल फड़ कहीं के बात करता है। हां तो वास्तविक ज्ञान दबा रखा है। जिससे अज्ञानी जिनको पूर्ण ब्रह्म परमात्मा का ज्ञान नहीं है मोहित हो रहे हैं। इस अज्ञान काल ज्ञान को तत्व ज्ञान पूर्ण परमात्मा के ज्ञान द्वारा नष्ट करके उत्तम ज्ञान को सूर्य की तरह प्रकाशित कर दिया जाता है। जिनको पूर्ण ज्ञान हो गया है। वह वह व्यक्ति पूर्ण संत के नाम से पूर्ण संत से नाम ले लेता है। बस एक ही बात है। नाम ले लेता है। वहां संशय दूर होने की बात हो रही है। नाम ले लो। नाम ले लो भाई। पूर्ण संत से नाम ले लो। वो बताया उस जो सोनिया माथुर है उसने अपने वीडियो उन्होंने अपने वीडियो में दिखाया था। पता नहीं क्या वो बंदर की एक तस्वीर लगी हुई थी और आवाज आ रही थी। कॉमेडी था अच्छी। खैर तो जिनको पूर्ण ज्ञान हो गया वह पूर्ण संत के नाम पूर्ण

01:02:38:00 संत से नाम ले लेता है तथा काल साधना त्याग देता है क्योंकि सत्य नाम से पाप कटते हैं। अपने पापों को पूर्ण ज्ञान से समझकर सतनाम व सारनाम से काटकर एक रस होकर अविनाशी परमात्मा पूर्ण ब्रह्म सत्पुरुष में स्थित होकर जन्म मरण से मुक्त हो जाता है। अब यह सबसे पहली बात तो अनुवाद है ही नहीं इसमें और कोरी बकवास भाई शब्दार्थ के अनुसार अनुवाद करता चलना जिससे व्यक्ति समझ पाए कि भाई गीता ये कह रही है और तू भी उसी के अनुसार बता रहा है और दूसरी बात इसने 5 17 को तो छुआ ही नहीं क्योंकि 5 17 में क्या कहा जा रहा है 5 17 में कहा जा रहा है जो पीछे जो बताया जा रहा है उसके अनुसार जो बरतता है उसके अनुसार जो चलता है वह मुक्त होता है अभी बात करते हैं सबसे पहले तो हम 5 14 से लेकर के और इसने 14 15 16 की बात कही है। 17 को इसने छोड़ दिया है। तो हम 14 से लेकर 17 तक पढ़ते हैं वास्तविकता में क्या लिखा है? परमेश्वर मनुष्य के ना तो कर्तापन की ना कर्मों की ना कर्म फल के संयोग की रचना करता है। किंतु स्वभाव ही बरत रहा है। तो क्या है कि सबसे पहली बात यह अनुवाद के अनुसार इसने यहां पर कोई बात नहीं की। ये कोरी बकवास की है। फिर आगे क्या

01:03:53:01 कह रहा है कि [गला साफ़ करने की आवाज़] एक तरीके से यहां पे ये कहा जा रहा है कि परमेश्वर जो है वो मनुष्यों के कर्तापन का मतलब अहंकार का जो कर्मों को करते समय कर्तापन का निर्माण वो नहीं करता है और वो केवल जो कर्म फल होता है कर्म फल उसकी व्यवस्था देखता है। ठीक है? और आगे क्या है? सर्वव्यापी परमेश्वर अगले में सर्वव्यापी कहा गया है। सर्वव्यापी परमेश्वर भी ना किसी को पाप किसी के पाप कर्म को ना किसी के शुभ कर्म को ही ग्रहण करता है। किंतु अज्ञान के द्वारा अज्ञान के द्वारा काल के द्वारा नहीं काल तो ये ठूस देता है। जहां भी इसका मन होता है दो चार शब्द अपने मन से ठूस देता है। अज्ञान के द्वारा अज्ञान किसको है? अज्ञान है जीव को। तो अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है। कौन सा ज्ञान? कि परमेश्वर किसी के पाप कर्म को ना किसी के शुभ कर्म को ग्रहण करता है। तो तो अज्ञान के कारण यानी माया के द्वारा एक तरीके से यह ज्ञान ढका हुआ है। उसी से सब अज्ञानी मोहित हो रहे हैं। किससे मोहित हो रहे हैं? माया से। ठीक है? और यहां पर परमेश्वर को सर्वव्यापक कहा गया है विभू। आगे क्या कहा गया है? ज्ञान। परंतु

01:05:08:04 जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया। अब ध्यान देने वाली बात है। यहां पर अनुवादकर्ता ने गीता प्रेस में जय दयाल गोविंद का जी ने ज्ञान का अर्थ तत्व ज्ञान माना है। और इसने भी यह चीज जो कही है कि भैया वो तत्व ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इसी आधार पर यानी कि ज्ञान का अर्थ तत्व ज्ञान है। इसने मान लिया। यानी कि ज्ञान यज्ञ की भक्ति करने से ज्ञान यज्ञ से मोक्ष होता है। जबकि अपनी गीता में लिखता है ज्ञान यज्ञ से भी मोक्ष नहीं होगा। ज्ञान से भी मोक्ष नहीं होगा। यह खुद कहता है फड़ है ना इसलिए तो यहां पर [गला साफ़ करने की आवाज़] इसने ज्ञान मान लिया और फिर उनका वह ज्ञान सूर्य के सदस उस सच्चिदानंद घन ब्रह्म परमात्मा को प्रकाशित कर देता है। तो कहने का तात्पर्य यह है यहां पे इसने जबरदस्ती दूसरा एक खड़ा किया जो कि है नहीं कि भैया वह अपने से अलग किसी की बात कर रहा है। ऐसा कुछ नहीं है। यहां पर इसने केवल अपनी पूता के अनुसार केवल बकवास की है। अनुवाद रखते हुए इसने कोई बात नहीं समझाई। आगे चलते हैं। अब यहां पर 57 को यह खा गया। जैसे इसने बहुत सारी चीजें खा गए कि भाई इसके जब छापा पड़ा था तो मीडिया खबरों के अनुसार रामपाल

01:06:23:08 के बाथरूम से कैमरे वगैरह मिले थे और बहुत सी वैसी चीजें मिली थी जो काम वासना से काम वासना को काम वासना में गति करने के लिए। आजकल के आधुनिक समाज के लोग का उपयोग करते हैं जिन चीजों का ऐसी सामग्री एक-ए किलो दो-द किलो मीडिया खबरों के अनुसार वो मिली थी। तो जैसे ये उन चीजों के बारे में उनको अपने पेट में डाल लेता है। इन इस बारे में कोई बात ही नहीं होती। दूसरी बात जैसे बहुत से भगवत गीता के जो अर्थ होते हैं जो इसके विरुद्ध जा रहे होते हैं उनको पी लेता है। उसी तरीके से इसने यहां पर भी 5 17 को पी लिया। 5 17 पे बात ही नहीं की। तो क्या बात की है? 57 में बात क्या लिखी लिखी जा रही है वह देख लेते हैं। जिनका मन तदूप हो रहा है जिनकी बुद्धि तदूप हो रही है यानी पीछे जो बताया गया उसके अनुसार और सच्चिदानंद

01:07:11:22 घन ब्रह परमात्मा में जिनकी निरंतर एक ही भाव से स्थिति है। ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान के द्वारा पाप रहित होकर अपुनरावृति को अर्थात परम गति को प्राप्त होते हैं। यह इसने छोड़ दिया यह सब कुछ। ठीक है? इसने यह वाली बात ही नहीं की। और अब इसने अगला क्या कहा है? पांच श्लोक 18 का अर्थ किया है इसने। इसने बताया कि पंडित कौन होते हैं? इसके यहां के लोगों को पंडित से बड़ी नफरत है। मुझे कुछ ऑडियो प्राप्त हुई है। लखनऊ का जो वकील है ना दिनेश चंद्र छोकरा उसकी कुछ ऑडियो सुनी है। उसमें वो जब बात करता है अपने गुरु भाई से। ऐसा गुरु भाई जो उनके पहले उनके खेमे में था अब अलग हो गया। तो जब वो बात कर रहा है तो कह रहा है यादव पंडित की गोदी में बैठ गया जाके पंडित की बड़ी पंडितों से बड़ी चिढ़ है इन लोगों को फड़ लोगों को तो पंडित के बारे में यहां क्या लिखा है इसके बाबा जेल कट्टू ने वो भी सुन लो पांच श्लोक 18 में पंडित की परिभाषा बताते हुए बताया गया है कि जो समदर्शी ज्ञान योगी देखिए ज्ञान योगी तत्वदर्शी साधक पंडित तत्वज्ञानी यानी पंडित की परिभाषा पंडित को इसने माना है तत्वज्ञानी पंडित कौन होते हैं? तत्वज्ञानी। और तत्वज्ञानी

01:08:27:08 कौन है? जो क्या कहते हैं? पंडित होते हैं। तत्वज्ञानी जो तत्वज्ञानी वो तो पूर्ण वो हो गए। पूर्ण संत हो गए। तो तू जिनकी गोदी में जाकर के बैठने को कह रहा है क्या उनकी गोदी में नहीं बैठना चाहिए? पूर्ण संत की गोदी में इस फोड़ आदमी जो जो यहां का जो वकील है जो ऐसी बातें करता है द्वेष भावना रखता है जाति के आधार पर है ना कि पंडित और यहां कमेंट में भी कई पंडित पंडित कर रहे होंगे ये रहा ये रहा मिल गया अरे ऊपर निकल गया जरा ऊपर निकल गया जरा लाइए जरा उसको पंडित वाला अभी अभी हां पंडित को तो राक्षस बताया गया है जिसका मेरे पास बड़ा सबूत है लो भाई अरे देख ले तेरा जेल कट्टू बाबा बाबा यहां क्या कह रहा है पंडितों के बारे में? तत्वज्ञानी है पंडित। जा अपने जेल कट्टू दादा को बाबा को जाकर के आन मिलो सजना वाला जो पट्टा होता है ना थाने में रखा हुआ उससे उसका परिचय करा अपने बाबा का। थाने में एक पट्टा होता है पुलिस के पास। उसमें लिखा होता है आन मिलो सजना या लिखा होता है फिर कब मिलोगे? वो पट्टा लेके अपने बाबा के पास जा और उसको परिचित करवाओ पट्टे पट्टे से। ठीक है? और या फिर उसको बिल से बाहर निकाल दो। हम लोग हम में से कोई ऐसा योद्धा जाएगा और वह उसका परिचय करवाएगा उस पट्टे से।

01:09:42:26 वह तेरा बाबा ही लिख रहा है यहां पर पंडित कौन होता है? ठोको ताली। पंडित कौन होता है? तत्वज्ञानी। अच्छा गौ, कुत्ते, हाथी व चांडाल को एक समझता है। वह जीवित मुक्त कहलाता है। वह तथा भगवान प्राप्ति के लिए भक्ति में लग चुका है। जो ऐसा नहीं करता है। वह बेशक बात बनाए। 84 लाख योनियों का कष्ट भोगेगा तथा इसने फिर अपनी आगे की जो है बकवास लिख दी है। [गला साफ़ करने की आवाज़] आगे चलते हैं।

01:10:19:06 इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज निकाली है। 122 नंबर पेज है। उसमें इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज पे पहला पैराग्राफ और उसकी लास्ट की दो लाइन कर्म योगी ब्रह्मचारी या गृहस्ती कार्य करते-करते साधना करने वाला भक्त कर्म सन्यासी भक्तों से श्रेष्ठ है तथा जो पूर्ण परमात्मा की भक्ति करते हैं वो सर्वोत्तम है। यहां पे फिर से यह गृहस्ती का पक्ष ले रहा है। वहां पर गृहस्ती का विरोध करता है। कहां पर? रुचि ऋषि की उसमें फिर सुखदेव जी की में गृहस्ती का पक्ष लेता है। फिर यहां पर पक्ष लेता है। तो यह कशमकश में है कि मुझे ड्रामा तो करना है विरक्त होने का और फिर मुझे जो है गृहस्ती वाले सुख भी चाहिए कि अप्सरा आए तो मैं छू लूं। ऐसी बातें करता है ये कि सुखदेव जी के पास अप्सरा आई। उसने उन्होंने छुआ नहीं। यानी कि छू लेना चाहिए। यानी इसका स्वभाव है। यानी कि काल के वश में यह भी है। अच्छा आगे चलते हैं। अब आ जाइए भाई अभी

01:11:34:21 ये सीधे पांच श्लोक 23 पे क्यों आ गया है? 51 19 की बात इसने की नहीं। 519 की बात हां देखिए अब इसने 51 18 की बात की पृष्ठ क्रमांक 51 18 की बात की पृष्ठ क्रमांक 119 पे उसके बाद इसने कुछ खिचड़ी पकाई और फिर उसके बाद इसने 5 19 20 21 22 इनकी बात ही नहीं की गायब पी गया वो सारी मीडिया खबरों की तरह पी गया अब सीधे आ गया यहां पर पांच श्लोक 23 में

01:12:18:19 और क्या करता है जिन जिन श्लोकों में से चोरी करनी होती है तो वैसे ये श्लोक श्लोक लिखेगा तो उसमें हेडिंग डालेगा कि पांच श्लोक 19 में ये कहा पांच श्लोक 20 में 21 में ये कहा मगर जब इसे चोरी करनी होगी तो क्या करेगा कहीं और से किसी और शब्दों से बात शुरू करेगा और पांच 19 20 21 की समराइज करते हुए बात बीच में घुसा देगा जैसे इसने यहां पर इसमें बीच में घुसाई क्या घुसाई बीच में हर श्लोक में लिखता है अध्याय पांच के श्लोक 23 में बताया गया है कि और यहां पे क्या लिख रहा है यहां पे 5 19 20 21 की हेडिंग से शुरू ही नहीं है पैराग्राफ ऊपर देखो बड़ा करो

01:13:00:16 हां इसमें इसने इस पैराग्राफ के मध्य से ये बात शुरू की है कि पांच के श्लोक 19 से 21 में फिर प्रमाण है कि वही व्यक्ति को मुक्त समझो जिसमें निम्न लक्षणों जो गीता जी के श्लोकों में निम्न निम्नलिखित है। पांच श्लोक 22 में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए लड़ाई करना। फिर भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध कर यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग में मौज मारेगा। पांच के श्लोक 22 में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए लड़ाई करना तथा फिर मौज मारना नाशवान है। ज्ञानवान व्यक्ति इससे दूर रहता है तथा अध्याय दो के श्लोक 37 में भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध कर यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग में मौज मारेगा और यदि जीत गया तो राज का आनंद लेगा। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां पर मतलब श्लोक 237 की बात को यहां 22 52 से काट रहा है यह और हालांकि इसने यहां पर भी 5:1 से लेकर के 5:22 तक का अनुवाद शब्दार्थ नहीं किया। अपने मन से गड़ब जिम्म कर दिया। खैर आगे चलते हैं।

01:14:10:14 अब यहां पर बात यह है कि अगर यह 52 से 237 काट रहा है तो 237 से 52 क्यों नहीं काट रहा है? ये बाबा जी कट्टटू कभी इस बात का उत्तर नहीं दे पाएंगे। ठोको ताली। अब पांच श्लोक 23 पे आ जाते हैं। अच्छा 51 19 से लेकर 58 भी हमें पढ़ना है। 5:18 क्या है? हमारा 5:18 क्या कह रहा है? ये भी आप पढ़ते चलो। वह ज्ञानी जन विद्या और विनय युक्त ब्राह्मण में कौन ज्ञानी जन जो तद रूप काम करते हैं जो इसको ले चल रहे हैं एक एक श्लोक का जो श्लोकों के अनुसार जो कर्म कर रहे हैं तो उनको ज्ञानी जन कहा गया जो परमात्मा में स्थित हो जाते हैं पूर्ण क्रांति को प्राप्त कर जाते हैं जो कि पांच 17 में कहा गया है ना अपुनरावृत्ति यानी कि दोबारा पुनरावृति नहीं होती तो वो कौन है वो ज्ञानी जन जो विद्या और विनय युक्त ब्राह्मण में तथा गौ हाथी कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी होते हैं। व्यवहार अलग हो सकता है। परंतु सब में ही परम तत्व को देखने का प्रयास करते हैं। तो वह जो है परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं। यहां ये कहा गया है। जबकि इसने क्या कर लिया? इसने पंडित किसको कहा है? इसने पंडित उसको माना है जो पूर्ण भक्ति में लग चुका है। यानी कि इसने तब भी यह नहीं माना कि वो जो है मुक्त

01:15:25:25 हो जाएगा। उसको मुक्त होने वाला नहीं कह रहा है। वो नहीं माना इसने। अब इसने 51 में क्या कहा है वह भी देख लेते हैं। 51 [गला साफ़ करने की आवाज़] 51 का हमारा अर्थ है जिनका मन समभाव में स्थित है यानी कि हार और जीत में जीत का लालच हार का भय ये दोनों चीजें नहीं होनी चाहिए। तो जिनका मन समभाव में स्थित है उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया गया है। क्योंकि उनको अब राग द्वेष नहीं है। इसलिए उनको कोई कष्ट नहीं है। जब कष्ट नहीं तो जीत लिया संसार को। तो संपूर्ण संसार जीत लिया है। क्योंकि सच्चिदानंद घन परमात्मा निर्दोष और सम है। इसका मतलब जब आप सम स्थिति में पहुंच गए तो आप जो है एकत्व में है। किसके साथ एकत्व में है? ईश्वर के साथ। इससे वह सच्चिदानंद घन परमात्मा में स्थित है। आप देखिए यह कितना अंतर करता है। 5:19 से लेकर 22 तक इस फर ने बकवास कर दी। शब्दार्थ तथा इसने कोई अनुवाद नहीं किया। अपने मन से जो मन आता है लिखता है। ठीक है? जो पुरुष 20वें का पढ़ रहा हूं। जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता है। यानी समदर्शिता क्या है? जो पुरुष यह समदर्शिता वहीं से

01:16:40:26 चल रही है जिसके मन में अहंकार ना हो जो गुण ही गुण में बरत रहे हैं ऐसा समझे जो गौ पांच 18 जो इनमें अंतर ना करता हो गौ कुत्ते हाथी चंडाल में ब्राह्मण में समदर्शिता रखता हो तो वही आगे चल रही है जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित ना हो और प्रिय को प्राप्त होकर जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित ना हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्वग्न ना हो वह स्थिर बुद्धि संशय रहित ब्रह्मवेत्ता कौन ब्रह्मवत्ता

01:17:17:10 51 19 520 है इसने क्या कहा है 520 में 19 21 में प्रमाण है कि लिखित में देखिए अपने मन से यहां पर ब्रह्मत्ता कहा जा रहा है संशय रहित कहा जा रहा है कहां ले जाओगे इन शब्दार्थों क्या ये रामपाल के फुहड़ चेले चिलए भगत क्या ये संशय रहित हैं? एक सवाल में एक प्रश्न में गीले गीला होने लगती गीली होने लगती है इनकी पतलू ऐसे ऐसे तो लोग हैं। और क्या कह रहे हैं यहां संशय रहित वाली बात को काट ही दिया। ब्रह्मवित्ता संशय रहित कौन है? जो ब्रह्मवित्ता है। ब्रह्म की बात करता है। लो इनके इनके अनुसार तो ब्रह्म से मुक्ति नहीं होगी। मगर ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म की बात करने वाला वही संशय रहित है और वही सच्चिदानंद घन ब्रह्म परमात्मा में एक ही भाव से नित्य स्थित है। और वहां क्या कह रहा है? फड़ अपनी कुछ अलग ही बकवास चला रहा है। 21 में क्या कहा जा रहा है? बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अंतःकरण वाला देखिए 21 में बहुत जरूरी बात है। बाहर के विषयों में अंतःकरण बाहर के विषयों

01:18:32:16 में आसक्ति रहित अंतःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यान जनित सात्विक आनंद है उसको प्राप्त होता है। तदंतर वह सच्चिदानंद घन ब्रह परम ब्रह्म परमात्मा के ध्यान रूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनंद का अनुभव करता है। अब यहां पे 5:21 को इसने क्यों नहीं खोला? पता है आपको? क्यों नहीं खोला? इसलिए नहीं खोला कि यहां पर ब्रह्म के साथ योग युगात्मा शब्द आया है। ब्रह्म के साथ और उसके लिए कहा जा रहा है कि उसको अक्षय अक्षय सुख की प्राप्ति होती है। 5:21 में यहां भी मुक्ति मिल गई। अक्षय सुख प्राप्त होता है। कौन? किसको प्राप्त होता है? जो ब्रह्म ब्रह्म योग युगात्मा युक्त आत्मा। ब्रह्म योग से युक्त युक्त है जो आत्मा वो उसको अक्षय सुख की प्राप्ति होती है। इसलिए इसने छोड़ा क्योंकि यहां ब्रह्म की बात आ रही है। ब्रह्मवित्ता की बात आ गई। संशय रहित तो यह कभी कर ही नहीं सकता। इसके चपड़ गंजू चेलों को आपने देखा होगा कैसा सूखा सा मुंह लेकर आते हैं मेरे सामने। संशय रहित तो ये कभी कर ही नहीं सकता। और यहां पर ब्रह्म योग युक्त आत्मा को अक्षय सुख प्राप्त करने वाला कहा गया। इसलिए यह जो है जेलकट्टू इन

01:19:47:18 चीजों के बारे में खोल खोल कर बात नहीं करता। फिर 22 में क्या कहा गया है? जो यह इंद्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाला सब भोग है। वे यद्यपि विषय पुरुषों को सुख रूप भासते हैं तो भी वे दुख के ही हेतु है और आदि अंत वाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन बुद्धिमान विवेक पुरुष में पुरुष उनमें नहीं रमता। अब एक बात है यहां पर जो इसने अर्जुन को इस अर्जुन को कहे गए इस वाक्य का खंडन करने का प्रयास किया है कि भाई अर्जुन अगर तू युद्ध में जीत गया तब तो तू राजमल का सुख भोगेगा ही और अगर हार भी अगर तू इसमें जो वीरगति को प्राप्त हो गया तब भी तू जो है स्वर्ग जाएगा तो भैया एक कायर और पीठ दिखाकर भागने वाले से तो उत्तम गति वहां पर बताई जा रही है ना कि कम से कम तेरी अपकीर्ति तो नहीं होगी इस बारे में वहां बात कर रहे हैं कि तुझे इस युद्ध को लड़ने में कितने वो हैं। अगर इस बात को लेकर के चल रहे हैं कि इस युद्ध को लड़ने से मुझे क्या फायदा होगा और व्यवहारिकता को लेकर के चल रहे हैं। उस व्यवहारिक ज्ञान के अनुसार वो बता रहे हैं कि अगर तू जीत गया तब तो तुझे यहां का सुख मिलेगा और तू अगर हार भी गया यानी कि वीरगति को प्राप्त हो गया। हारने का मतलब वीरगति को प्राप्त होना तो भी तुझे स्वर्ग मिलेगा क्योंकि तू

01:21:02:24 क्षत्रिय है और कर्तव्य कर्म करते हुए वो हुआ है। तो अगर तू तत्व ज्ञान जो तत्वज्ञ ज्ञान है ब्रह्म के साथ एकत्व वाली बात को नहीं अभी समझ पा रहा है और केवल व्यवहारिकता के अनुसार देख रहा है तब भी तेरी गति श्रेष्ठ होगी उस कायर नपुंसक कहलाने वाले पुरुष की अपेक्षाकृत जिसकी स्त्रियों की गरिमा भंग कर दी जाती है जिसकी अपकीर्ति होती है जिसके कुल का नाश हो जाता है ये वहां पर समझा रहे हैं व्यवहारिक ज्ञान के अनुसार होने वाला फायदा बता रहे हैं जैसे ये जैसे ये जेल कट्टू बताता है कि मैं बिजली के तारों से छुड़ा लूंगा ये खुद भी तो बताता है भाई यह भी तो भौतिक संसार का लालच देता है। गेहूं, शक्कर, आटा, चावल। तू क्यों देता है भौतिक संसार का? हम तू क्यों छोड़ता है अपने चेले? पीछे गन मशीन लिए दो आदमी खड़े हुए हैं। क्यों छोड़ता है भाई अपने? पहले तेरे पीछे भी रहते थे गन मशीन लिए हुए व्यक्ति। अब तेरे चेलों के पीछे भी रहते हैं। यानी कि तू भी उनसे कह रहा है कि युद्ध कर और भोग। किनको भोग? वो बात अलग है। वो स्त्रियां चिपका चिपका के भोगते हैं बेचारे। [हंसी] ठोको ताली। खैर आगे चलते हैं। अब 5 23 में क्या कह रहा है ये? अब इसका पढ़ लेते हैं। 5 23 [गला साफ़ करने की आवाज़] 52

01:22:18:04 में पूर्ण मुक्ति बताई गई है। और 5:21 में पूर्ण मुक्ति बताई गई है। इसने यहां पर कहीं भी पूर्ण मुक्ति की बात नहीं की है। ठीक है? 5:21 में पांच श्लोक 23 में बताया गया है कि योग योगी की व्याख्या इस प्रकार है कि जो अपने काम क्रोध को जीत लेता है वही योगी परमात्मा और वही सुखी है। ठीक? फिर इसके बाद ये कह रहा है विचार करें। यह मन तथा इंद्रियां तो शंकर जी जैसे योगी से भी नहीं जीते गए। अन्य प्राणी अर्जुन जिसने दो-दो शादियां करवा रखी हैं। रखी थी। जैसे साधक कैसे योग युक्त परमात्मा को प्राप्ति हो सकता है। अब देखो भाई इसकी इस बात को काटते हैं कि अर्जुन जो है परमात्मा को प्राप्त हो सकता है कि नहीं। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] ठोको ताली। इस फवर्ड की बात का तो सारा इंतजाम इसकी ही किताबों में दिया गया है। मेरे ख्याल से

01:23:18:09 प्रश्न क्रमांक अर्जुन को मोक्ष 99 प्रश्न क्रमांक 99 निकालिए भाई। हम ये देखिए पृष्ठ क्रमांक 99 अब ये कह रहा है अर्जुन को मोक्ष नहीं मिल सकता जबकि ये खुद ये फर् खुद ही कह रहा है कि अर्जुन को मोक्ष मिला। देखिए 99 99

01:24:00:16 इसी में नीचे जाइए बस पहले पैराग्राफ की लास्ट की तीन लाइन पहले पैराग्राफ की लास्ट की तीन लाइन ऊपर ऊपर ऊपर चला गया हां देखिए लास्ट की तीन लाइन ये अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा को पहली बात तो अर्जुन को कोई तत्वदर्शी मिला नहीं भाई है ना वो तो काल से ज्ञान ले रहा था रामपाल के अनुसार तो अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमा पूर्ण पूर्ण परमात्मा को इष्ट रूप में मानकर यज्ञ करता है तथा यज्ञों के साथसाथ वास्तविक नाम का सुमिरण करके यानी कि उसको तत्वदर्शी मिल गया था। पूर्ण मोक्ष रूपी अमंत शायद अनंत होगा को प्राप्त हो जाता है। अर्थात पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं। यानी अर्जुन को मुक्ति मिल गई। ठोको ताली दोद पत्नियां करने वाले। अब बता फुअर तेरी कौन सी बात मानी जाए? एक तरफ तू कह रहा है अर्जुन जिसने दो-दो शादी करवा रखी है। उस जैसे साधक कैसे योग युक्त परमात्मा प्राप्ति हो सकती है। हैं इसको कहते हैं पागल फूहड़। ठीक है ना? अच्छा अब आगे इसने पांच अध्याय पांच के 24 25 26 का अर्थ किया है। अच्छा हम भी अपने पांच 23 का अर्थ पढ़ लेते हैं। तो 5 23 का अर्थ हमारा क्या है? जो साधक इस मनुष्य शरीर में शरीर का नाश होने से पहले पहले ही अपने काम क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग

01:25:15:25 को सहन करने में समर्थ हो जाता है। वही पुरुष योगी है वही सुखी है। मतलब शरीर समाप्त होने से पहले मेरा राग द्वेष इत्यादि सब नष्ट हो जाए और मैं स्थिर बुद्धि का हो जाऊं, संशय रहित हो जाऊं, समदर्शी हो जाऊं। तो ऐसा होगा तो शरीर नष्ट होने पर मुझे ऐसा होने होगा तो मैं सुखी यहां भी कहलाऊंगा और परमार्थ में भी। ठीक है? तो 5 23 में इसने कुछ अलग ही अपनी बहा दी और ऐसी उल्टी की जिस उल्टी को हमने आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिया। वापस आ जाइए भाई उसी पृष्ठ पर 123 पांच के श्लोक 24 25 26 में गीता ज्ञान दाता अब रामपाल की पढ़ रहे हैं हम लोग से अन्य परमात्मा की जानकारी फिर ले आया अन्य परमात्मा को अच्छा एक बात है यहां भी देखो इसने गृहस्ती का खंडन किया है हां ये तो मैं भूल ही गया ये कशमकश में है रामपाल कि मैं छू कि मैं नहीं छू पकडूं कि नहीं पकड़ूं स्त्री अंग फिट करूं कि ना करूं तो रामपाल इस कशमकश में रहता है इसलिए कहीं पर सन्यास को गृहस्ती से दूर वाली चीजों का खंडन करता है। फिर उसके मन में लालच आ जाता है तो फिर गृहस्ती का पक्ष लेने लगता है। अब फिर जो है ध्यान आता है कि मुझे तो अपना ड्रामा फैलाना है। पाखंड करना है तो फिर से गृहस्ती का खंडन

01:26:30:26 करता है। तो यहां पे ये एक तरफ क्या कह रहा है? सुखदेव जी के पास अप्सरा आई। पर सुखदेव जी ने नहीं छुआ। सुखदेव जी को इसके हिसाब से छूना चाहिए था। और यहां पर जो छू रहा है यहां पर जो छू रहा है उसका भी खंडन कर रहा है। सुखदेव जी ने नहीं छुआ तो आफत क्योंकि वहां पर इसको गृहस्ती का लालच है। और यहां पर छू लिया तो आफत क्योंकि यहां पर ये बाबा बनना चाह रहा है। ठोको ताली है ना? अच्छा आगे चलते हैं। पांच के श्लोक 24 25 26 में गीता ज्ञान इसीलिए इस सीरीज का नाम होगा पांचवा अध्याय जो है इसका नाम अलग से रखा जाएगा कि छूना है कि नहीं छूना है। रामपाल इसी कसमकश में पूरा ये पांचवा चैप्टर है ना इसमें फंसा रहा है। गृहस्थ होना है कि विरक्त होना है ये समझ नहीं पा रहा है। तो पांच श्लोक 24 25 26 में गीता ज्ञान दाता से अन्य परमात्मा की जानकारी बताई गई है। श्लोक 23 में कहा गया है कि जो सच्चिदानंद घन ब्रह्म यानी परम अक्षर ब्रह्म की शास्त्रोक्त साधना निश्चल मन से करता है तो उस परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। है ना जबकि यहां पर फिर से इसने अनुवाद की मटिया मेट कर दी फिर से इसने ये सब बताया ही नहीं कि काम क्रोध मोह को सहने में समर्थ हो जाता है।

01:27:45:27 इनकी यहां पे संस्कृत दी गई है। राम क्रोधोभव राम क्रोधोदभवम संस्कृत दी गई है भाई कोई बात ही नहीं करता अनुवाद की ठोको ताली बनते रहो घिस घिस के मूर्ख बनते रहो रामपाल का जो मल्लम है रामपाल का जो बाम है वो माथे पर लपेटते रहो ठोको ताली ताली ठोकते रहो हां [गहरी सांस लेने की आवाज़] [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] आगे क्या कह रहा है तो श्लोक 23 की बात तो हमने कर ली अब पांच पांच श्लोक 24 में कहा है कि वह योगी साधक ही निर्वाण ब्रह्म। अब देखिए यहां पर निर्वाण ब्रह्म आगे के दो तीन श्लोक में बार-बार शब्द आएगा। इसने क्या किया है? निर्वाण ब्रह्म को ब्रह्म से अलग कर दिया है। निर्वाण ब्रह्म को जबकि वहां कहा जा रहा है कि ब्रह्म का जो निर्वाण है ब्रह्म की जो शांति है वो प्राप्त होती है। मगर इसने कहा है कि निर्वाण ब्रह्म जो है अलग है। इस कारण से जो निर्वाण ब्रह्म है वो गीता कहने वाले से अलग हो गया। ठोको ताली बाकी हमने बता दिया है कौन सा पृष्ठ है वह पहले इसका पढ़ लेते हैं तो भैया निर्वाण ब्रह्म है अर्थात पूर्ण परमात्मा सत्पुरुष को प्राप्त होता है श्लोक 25 में भी निर्वाण ब्रह्म को पाने का वर्णन है तथा श्लोक

01:29:01:03 26 में भी निर्वाण ब्रह्म पाने का प्रमाण देता है जिसमें काम क्रोध समाप्त कर लिए वह व्यक्ति पूर्ण ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त समझो यह समता ना ब्रह्मा जी में ना शिव जी में ये अपनी इसने बकवास डाल दी ठीक है अर्थात वार ही ब्रह्मा ये सब इसने अपनी बकवास अब यहां पर निर्वाण ब्रह्म की मेन बात है कि भाई निर्वाण ब्रह्म निर्वाण आया है। यहां पर ब्रह्म से प्राप्त होने वाली शांति की बात हो रही है। पहले तो हम लोग अपना पढ़ लेते हैं क्या है 24 से 26 जो पुरुष अंतरात्मा में यह गीता प्रेस का पढ़ रहा हूं। जो पुरुष अंतरात्मा में सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानंद घन ब्रह्म परम ब्रह्म परमात्मा हमारे यहां तो ब्रह्म का अर्थ फाइनल है। तो वो परमात्मा के साथ एक ही भाव को प्राप्त हो गया। अब ये एक ही भाव का वहां पे एक वो है। क्या है? ब्रह्म भूत। यह ब्रह्म भूत शब्द का अर्थ करना फड़। गीता में एक शब्द आया है। ब्रह्म भूत। तो ब्रह्म भूत का मतलब ब्रह्म स्वरूप। ब्रह्म के साथ एकत्व तो ब्रह्म के साथ एकत्व वाली बात तो स्वीकार कर नहीं पाएगा कभी भी तो ब्रह्म ब्रह्म भूत होने की बात का क्या करें यहां पर जो श्लोक में आई है ठोको ताली उसको पी जाओ जैसे बबता वाला मामला हो गया जैसे रामपाल अपने लोगों को कुछ खिलाता पिलाता है

01:30:16:04 वो वो जब पिया जाता है उसी तरीके से ब्रह्म भूत भी गायब कर दो तो यहां क्या कहा जा रहा है कि ब्रह्म के साथ एक ही भूत हो के जो ब्रह्म की शांति को प्राप्त हो जाता है ब्रह्म ब्रह्म के पास जाने से जो आपको वो अक्षय सुख मिलेगा वही परम शांति है वही सद्गति है उसको प्राप्त हो जाता है। ठीक है? तो यह हो गया 24 का आगे क्या है? जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं। 25 का सही अर्थ जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं। जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं। है ना? अब देखो 5:25 में सीधी सी बात आई है। छिन्न द्वैधा है ना? यह बात सीधे-सीधे आई है और इसका अर्थ संशय समझ लीजिए या द्वैत रूपी संशय समझ लीजिए कुछ भी समझ लीजिए यहां पर द्वैत भाव के कारण होने वाले संशय की बात की जा रही है कुछ अनुवादकों के द्वारा संशय की बात तो की जा रही जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं। कौन सा चपड़ गंजू चेला है इनका? जिसको ज्ञान है, जिसके संशय दूर हो गए हैं। परमात्मा सर्व्यापक है कि एक देश है। सर्वशक्तिमान है तो कैसे है? व्यवहार में आ सकने वाला है या ना आ सकने वाला है। एक एक पॉइंट पर इनके पुअर चेलों की फवरता के प्रमाण है हमारे

01:31:31:06 पास एक-एक पॉइंट पर। फिर कहने लगते हैं अल्ला ल ये करने लगते हैं। जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत है और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है। वह ब्रह्मवित्ता देखिए यहां पर भी ब्रह्मवित्ता कहा जा रहा है उसको। पुरुष शांत ब्रह्म को ब्रह ब्रह्म का जो मोक्ष है ब्रह्म का जो सुख है ब्रह्म की जो शांति है उसको प्राप्त हो जाते हैं। ब्रह्म निर्वाण तो यहां पर भी ब्रह्म निर्वाण शब्द आ गया। और 26 में क्या है? काम क्रोध से रहित जीते हुए चित्त वाले परम ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परम ब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है। तो यहां पर भी परम ब्रह्म वाली शांति की बात हो रही है। परम ब्रह्म वाला जो सुख है अक्षय होता है जो उस सुख की बात हो रही है। जिसको यह गीता कहने वाले से अलग टाइप का सुख बनाना चाहते हैं। ठीक है? अब ये तो इन्होंने बना दिया। पर इसका हम साथ-साथ एक खंडन करते चल जो आवश्यक है। शायद 59 नंबर पेज है वह निकालिए जरा। 59 है जहां पर यह वाली बात की है ना कि वो उस की बात हो रही थी। उस

01:32:50:19 उस दिन जो बात हुई थी ना वह तारेंद्र करके आया था कोई व्यक्ति। आ गया क्या? 59 नहीं है और कोई है। पहले एक बार हमने अभी पिछले एपिसोड जो तारेंद्र [गला साफ़ करने की आवाज़] के साथ बात हुई थी उसमें उसमें उस वाले शब्द में फंसाया था ना

01:33:43:08 आगे होगा कहीं पे ठीक वो अलग से आप लगा दीजिएगा बुलेट पॉइंट्स में संसार के नर नारी हां ये आ गया मिल गया 63 है 63 [गला साफ़ करने की आवाज़] अब यहां से गरमा गीता की में इनके जो कबीर हैं वो भी एक अलग परमात्मा की बात कर रहे हैं अपने से भिन्न परमात्मा की वो क्या कह रहे हैं वो भी देखते चलो वह परमात्मा यानी कि कबीर से अलग परमात्मा है इसलिए कबीर कह रहा है के भाई रामपाल का कबीर कह रहा है रामपाल का परमात्मा कह रहा है कबीर का नाम मत लो रामपाल का जो तथाकथित ईश्वर है वो कह रहा है वह परमात्मा जिसका काल ना हो यानी अविनाशी सत्पुरुष वह सच्चा परमात्मा जिसका नाश ना हो यानी अविनाशी शब्द स्वरूपी राम वह यहां देख लो शब्द स्वरूपी शब्द स्वरूप है वो शब्द स्वरूपी राम वह परमात्मा जिसका वास्तविक रूप शब्द है वास्तविक रूप शरीर नहीं है शब्द है और शब्द खंड नहीं होता वह नाश में नहीं आता यानी अविनाशी उस परमात्मा को जो अविनाशी ये भैया तुम्हारा कबीर फिर भी यहां पर अपने से भिन्न किसी परमात्मा की बात कर रहा है। वो भी तुम्हारी ही लेखनी के अनुसार। ठोको ताली। चलिए अब वापस आ जाते हैं उसी प्रश्न पर।

01:34:57:07 [खांसने की आवाज़] कौन सा प्रश्न चल रहा था? हां। ये चल रहा था 24 से 26 वाला। तो निर्वाण ब्रह्म की बात हमने कर ली और अपने से भिन्न परमात्मा की बात कर ली। कबीर से भी भिन्न कोई परमात्मा जिसके बारे में कबीर इसकी ही किताब में फूल की किताब में बात कर रहे हैं। अब आगे बात करते हैं। अब आ जाते हैं हम 27 और 28 पर। अब देखो यहां पर 27 और 28 का भग ये जो गीता प्रेस गोरखपुर है उसमें भी दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ किया गया है। तो इस पुअर ने तुरंत नकल करते हुए 27 और 28 श्लोक का अनुवाद तो ये करता नहीं है। अपनी जो मक्कारी जो कर सकते हैं लोग गलत लोग वही यह भी करता है। तो क्या किया इसने? इसने क्या किया वो पढ़ लेते हैं। बाहर के विषयों से मन हटाकर शरीर के अंदर चल रहे स्वास से नाम स्मरण करते हुए स्वास व नाम जप पर ध्यान लगाएं। ठीक है? स्वास उस स्वास जो भकुटी यानी दोनों नाक छिदों के मध्य सुषमना द्वार के अंदर बाहर होता है उसको सम करके यानी अभ्यास से साधक साधना करता है। ठीक है? अब यह बताओ यह एक जगह बैठकर

01:36:12:09 के साधना करने को मना करता है ये फवर्ड। ठीक है? और यहां पर यह जो बातें कह रहा है कि भकुटी यानी दोनों नाक छिदों के मध्य सुषमना द्वार के अंदर बाहर होता है। उसको सम करके यानी अभ्यास के अभ्यास से साधक साधना करता है। यहां पे इस तरह की चीजें बता रहा है। और क्या बता रहा है? बाहर के विषय भोगों से मन हटाकर अंदर चल रहे स्वास से नाम स्मरण करते हुए तो मूर्ख व्यक्ति तू यह सब कार्य चलते फिरते करता है बता ये कहता है ना कि भाई एक जगह बैठकर मत करो हठ योग मना करता है ना एक जगह बैठकर करने के लिए छठव अध्याय में यही किया इसने तीसरे में भी यही बताया है कि एक जगह बैठकर के साधना मत करो चलते फिरते करो एक जगह बैठकर ध्यान लगाना गलत है नाम जप करना बदल गलत है। एक एकाग्रचित हो के करना गलत है। और यहां पर जो बातें करता है तो इसके फूहड़ जो अनपढ़ चेले इसके ही अनुसार गीता की इसकी गीता के अनुसार वो चलते चलते सब करते होंगे। भगटी के बीच में ध्यान लगाते होंगे। इसीलिए उनके बार-बार वो किसी बुलडोजर जैसे व्यक्ति से भिड़ जाते हैं। क्योंकि उसको तूने ये ज्ञान दिया है ना फोड़ता वाला। इसलिए वो देखते नहीं है। भगवती के बीच में ऐसेसे चलते हुए करते रहते हो। चलते

01:37:27:15 फिरते चलते फिरते किसी मनुवादी से टकरा जाते हैं। जैसे राघव दास की आजकल मिट्टी पलीद हो रही है। शिवाश नारायण द्विवेदी से टकरा गए क्योंकि चलते चलते वो ऐसे करते हैं। वो भ्रकुटी के बीच में ध्यान लगाते हैं। [हंसी] भकुटी के बीच में ध्यान लगाते हैं। ये जो रामपाल द्वारा बनाए गए जॉम्बीज हैं। राघव दास और ये फैक्ट बाय अभिषेक जैसे ये ज़ॉम्बीज चलते चलते भकुटी के बीच में ध्यान लगाते हैं। क्योंकि एकाग्र चित्त होकर एक जगह बैठकर आसन लगाकर बैठने के लिए तो मना किया गया है। रामपाल के अनुसार ठोको ताली। अब की बार जब भी कोई इनका वीडियो बनाता हुआ दिखे इन लोगों का तो उससे पूछना कि तू इस समय भगवती के बीच में ध्यान लगा रहा है कि नहीं लगा रहा? इससे पूछना। [हंसी] ठीक है। एक मातृशक्ति है जो कह रहे हैं आज के आजकल किसी के पास टाइम नहीं है एक जगह बैठने का तो टाइम नहीं है बैठने का। आजकल लोगों के पास धर्माचरण करने का टाइम भी नहीं है। यह टाइम भी नहीं बचेगा थोड़े दिन बाद कि विवाह करो तो किसी से भी मुंह मार लेंगे क्या? और दूसरी बात तुम अगर टाइम नहीं है तो कोई बात नहीं। वह बात एक अलग है। तुम तो उसका निषेध कर रहे हो ना। ऐसा करना ही नहीं है।

01:38:46:00 चलिए आगे चलते हैं। 5 27 से 28 अब हमारे 5 27 से 28 क्या कह रहे हैं? बाहर के विषय भोगों का ना चिंता चिंतन करता हुआ बाहर ही निकालकर नेत्रों की दृष्टि को भकुटी के बीच में। अब देखिए नेत्रों की दृष्टि को देखिए चक्षु यहां पर चक्षु शब्द आया है। तो नेत्रों की दृष्टि को भकुटी के बीच में स्थित करके यह सब का अनुवाद कौन करेगा रे फड़ जेल कट्टू और तेरी बात को गलत साबित कोई कर नहीं सकता कोई बच्चा भी कर देगा तेरी बातों को गलत साबित

01:39:27:15 50 लाख गिनते गिनते थक जाएगा इतने लोग करेंगे तेरे को गलत साबित यहां चक्षु की बात हो रही तेरे अनुवाद में चक्षु क्यों नहीं बे फर् कहीं का अनपढ़ तो बाहर के विषयों में विषय भोगों को ना चिंतन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी इंद्रियां मन और बुद्धि जीती हुई है। ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि मोक्ष परायण कहा गया है। मोक्ष परायण परायण शब्द आया है। इसके पास तो है ही नहीं ऐसा शब्द मोक्ष परायण यह सब ब्रह्म भूत सब खा जाता है और कहता है मैंने सबसे अच्छा अनुवाद किया है मूर्ख कहीं का तो मोक्ष परायण शब्द आया है ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि इच्छा भय और क्रोध से रहित हो गया वह सदा मुक्त है

01:40:28:14 ये है तत्वदर्शी अब देखो लास्ट में क्या कहा इस सब के बाद अंत में माम सब इसने जो किया ना उस उसकी भक्ति बताई। अब देखो लास्ट में अब यह अपनी अज्ञान अज्ञानता का प्रदर्शन करेगा। अब यहां भगवान लास्ट में कह रहे हैं कि [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] माम शब्द आ गया। भगवान कह रहे हैं मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला संपूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा संपूर्ण भूत प्राणियों का सुहृद अर्थात स्वार्थ रहित दयालु और प्रेमी ऐसा तत्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है। मेरा भक्त शांति को कौन प्राप्त होता है? मेरा भक्त यह कह रहे हैं भगवान अंत में और वहां पर कह रहे ऐसा तत्व से यानी तत्व तत्व को जानने वाला भी हो गया भगवान श्री कृष्ण का भक्त भी हो गया गीता कहने वाले का भक्त भी हो गया और शांति को प्राप्त होने वाला भी हो गया अब देखो ये एक फर्ता इसमें फैलाएगा क्योंकि माम शब्द आ गया ना अगले प्रश्न पर आ जाओ 126 अब ये पांच 29 का श्लोक का अर्थ बताता है गीता ज्ञान देने वाला काल ब्रह्म ने कहा है कि इस तत्व ज्ञान के अभाव से मुझ काल

01:41:43:22 को यज्ञ तथा तपों को भोगने वाला संपूर्ण लोकों का महान ईश्वर यानी महेश और सर्व प्राणियों का सुह यानी स्वार्थ रहित दयालु हितषी जानकर शांति को गवा देता है। दीक्षति का अर्थ होता है गवाना। ये कहां लिखा है? कहां लिखा है? अभी चैट जीपीटी करो। अभी Google करके देख लो। कहां लिखा है? इच्छति का अर्थ गवा देना। ठीक है? दूसरी बात एक और है कि अभाव तत्व ज्ञान के अभाव से वहां पर बात हो रही है तत्व से जानकर यानी तत्व ज्ञान का अभाव नहीं अभाव है मगर यहां यह बात कर रहा है कि तत्व ज्ञान के अभाव से इस अभाव की संस्कृत कहां मिलेगी रमलू अभाव की भी तो संस्कृत करनी पड़ेगी केवल तेरी ही किताबें पर्याप्त है तेरी बातों का खंडन करने के लिए भाई तत्व ज्ञान के अभाव की संस्कृत तो मिल ही नहीं रही ना इसमें कहां है? तत्व ज्ञान के अभाव की संस्कृत ज्ञात्वा तत्व से जानकर ज्ञात्वा इसमें कहां है? अभाव अभाव कहां है इसमें? अभाव है ही नहीं। ज्ञान का अभाव है ही नहीं। तो ज्ञान का

01:42:58:24 अभाव नहीं है। ज्ञान का भाव है यहां। तो ज्ञान का अभाव है। तो जिसको ज्ञान का भाव है वो शांति को कैसे गवा देगा? तो ये आप लोग देख लेना। 5 29 हो गया। इस तरीके से इसका पांचवा अध्याय रमलू का बैंड बजाते हुए हमने पूरा किया और फिर से लास्ट में मैं घोषणा कर दूं कि मैं हूं सनातन

01:43:15:25 धर्म का एडवोकेट और मैं घोषणा करता हूं रामपाल और इसके विश्व भर में फैले हुए समस्त चूहे भगत को कि रामपाल ने जो परंपरा प्राप्त सनातन सिद्धांतों के विषय में जिन विषय को लेकर मैंने आपत्ति प्रकट की है उन विषयों में मेरी एक भी बात को गलत साबित कर दे मैं उसे एक करोड़ दूंगा 50 लाख नहीं ₹1 करोड़ दूंगा। ठीक है? यह मेरा खुला चैलेंज है। जिसने भी अपनी मां का दूध पिया हो, जिसको भी उसकी मां ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो, वो गलत साबित करके बताए और ₹1 करोड़ ले जाए।

⬜ Not used yet · 01:43:54:10 – 01:59:27:00 (15:33)

01:43:54:10 [गहरी सांस लेने की आवाज़] थोड़ा सा लिंक दे दीजिए। तो किसी को कुछ विचार प्रकट करने हो कुछ लोग हैं इस समय जो देख रहे होंगे लाइव वो आ सकते हैं। वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा के लिए ना आए उसके लिए संपर्क करें WhatsApp पर फॉर्म भरें। WhatsApp पे और कोई बात ना करके फॉर्म भरा करिए। आपको फॉर्म यहां से मिल जाता है। जैसे ही आप WhatsApp करेंगे तो आपको फॉर्म मिलेगा। अपने रुचि के अनुसार

01:44:30:00 अपनी रुचि के अनुसार यह देखिए रिक्षति का अर्थ इसका मुख्य अर्थ होता है प्राप्त करता है पहुंचता है जैसे फल फलम वृक्षति फल को प्राप्त करता है और यह बातें लिखी हुई है शिवराम आपटे में डिक्शनरी में ठीक है हां जी प्रेम सिंह भाटी जी जय श्री राम जय श्री राम भाटी जी जी जय श्री राम जी

01:45:14:09 बहुत अच्छा मैं देख रहा था शुरू से बढ़िया एक वो कह रहा है वो कहता है ना हमारे गुरु जी अंगुली रख कर दिखाते हैं हां आपने अंगुली रख रख के अच्छा इसका भंडाफोड़ कर दिया सारे अज्ञान का सारे कुतर्कों का मतलब इसमें अपनी घफोड़बाजी साबित करने के लिए ना तो कोई व्याकरण का ध्यान रखा है ना कोई संदर्भ का ध्यान रखा कुछ नहीं बस उलूल जुलूल करके अपना वो गपोड़बाजी सिद्ध करने की कोशिश की है। अब इनसे बात करते कहते व्याकरण पर मत जाओ हमारे तिरछादर्शी है। उन्होंने कह दिया वही फाइनल है। ठीक है ना? हमें व्याकरण से, संधि से, संदर्भ से कोई लेना देना नहीं है। हमारे लिए जो तिचा दर्शी ने कह दिया वो फाइनल है। तो भाई तुम्हारे लिए लेना देना नहीं है। फिर गीता से भी क्यों लेना देना रखते हो? वो कहे वही मान लो।

01:46:11:08 अच्छा लगा। बहुत अच्छा। एक-ए चीज को इसको अलग-अलग काट के डाला जा सकता है। आजकल ऐसा कंटेंट आपने दे दिया है। निश्चित रूप से प्रचारित करने जैसा है। सबको जो भी सोशल मीडिया पर है उनको ये प्रचारित चीजें करनी चाहिए। एक एक श्लोक की व्याख्या आप लोग ले ले के एक एक श्लोक जो आपको हिस्सा अच्छा लगे उस श्लोक को कट करिए और खूब सोशल मीडिया पर आप प्रचारित करिए। कोई यहां पर रोक नहीं है कि आप यहां से उठा नहीं सकते। एक एक श्लोक पर जो मैंने धज्जियां इसकी उड़ाई है रामपाल की उसको यहां से कट करिए और दिखाइए कि ये क्या कर रहा है। उस उस उस पर बात करता है ना उसमें ही घुसा दिया इसको उसकी बात करता है ना उस उस परमात्मा हां जी

01:46:58:04 गोस्वामी जी बोले जय शिव जी जय श्री राम जय श्री राम जय राम कल एक नया आएगा कि ये 50 लाख तो हम लोग ये फलाने गुरु और ढक गुरु पूछे गुरु वो आएंगे उसके साथ ही शास्त्रार्थ करेंगे तो मैं मैं थोड़ी ना कह रहा हूं कि मैंने इससे शास्त्रार्थ कर लिया मैं तो एक नई घोषणा कर रहा हूं मैं ये नहीं कह रहा कि मैंने शास्त्रार्थ मैं तो नई घोषणा कर रहा हूं कि मैं एक करोड़ की घोषणा करूंगा तू कल एक करोड़ की कर मैं दो करोड़ की कर दूंगा घोषणा तो घोषणा ही तो करनी है केवल करता रहे उसका कोई सर पैर तो है नहीं तेरी बातों का कि कहां पर लाइव डिबेट होगी, क्या होगा? वो कह रहा है अपना चैनल पर जाओ, अपने पक्ष को प्रस्तुत करो। फिर कह रहा है मेरी बात को काटो। अपना पक्ष तो प्रस्तुत कर ही रहे हैं वे मूर्ख। कौन नहीं कर रहा अपना पक्ष प्रस्तुत?

01:47:56:12 तुम अपना ज्ञान बताओ। मैं अपना ज्ञान बताता हूं। ये तो सदियों से युगों से ज्ञान पड़ा है। कोई आज नया थोड़ी है। युगों से ये कह रहा है ये कह रहा है खुद भीख मांगने वाला एक करोड़ देगा। अबे तेरा तेरा जो तथाकथित बाबा है ना जेलकट्टू वो कह रहा है कि मैं तो भक्तों से चंदा लेकर के पाइप लगवाता हूं। अनाकोंडा वाले मुझे क्या बता रहा है तू? हां वो कौन सा मजदूरी करके कमाता है जो भीख की बात कर रहे हो। नहीं नहीं उस उसके शायद उसके जो वो सुबह सुबह जो खीर निकलती है ना उसके गुदा द्वार से होकर के दूध बह के आता है। मीडिया खबरों के अनुसार रामपाल जो स्नान करता है जो दूध इत्यादि से तो वो जाने कहां-कहां से बह करके आता होगा। उसमें जो है वो पैसा नोट इत्यादि आ जाता होगा जिसके आधार पर ये पाइप लगवाते हैं जगह-जगह पर। अगर इनकी बात मानी जाए तो जो यह बात कर रहे हैं जिस तरह से ठीक है मैं इनको ले लेता हूं

01:48:56:16 जी कुलकर्णी जी बताइए जय श्री राम गुरु जी जय श्री राम जय श्री राम नमस्कार गुरु जी मैं ओमकार कुलकर्णी हूं भीड़ महाराष्ट्र से जी जी थोड़ा सा विषय से हटके बोलना था। विषय से हटके आप कॉल कर लीजिएगा। कल दिन में कॉल कर लीजिएगा। यहां पर चर्चा केवल रामपाल के बारे में। जी जी जी जी ठीक है गुरु जी धन्यवाद। बस बोलना था। धन्यवाद। थैंक यू। जी जी जी जय श्री

01:49:41:25 ठीक है तो मुझे लगता है आज अ काफी अच्छा रहा और कल हम लोग इनके एक इनके यहां का एक प्रह्लाद है इस गैंग के अंदर रामचंद्र यादव उनके पास बहुत सी तथ्यात्मक बातें हैं इस गैंग के बारे में हमें बताने के लिए वह कल यहां प्रस्तुत होंगे और उनके साथ चर्चा होगी ठीक ठीक है? बहुत से खुलासे होने वाले हैं। तो कल सब लोग अप टू डेट रहे रात के लिए। बहुत बड़े-बड़े खुलासे होंगे कल। एक सत साहिब जी करके आए हैं यहां पर। आप पहली बात तो चेहरा नहीं दिखा रहे। दूसरी बात यह है वैचारिक मतभेद के निमित्त अभी हमारे पास समय नहीं है। 1 घंटे 50 मिनट हो चुका है। है ना? रुके हुए हैं।

01:50:35:26 [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़] अच्छा एक बात है थोड़ी देर भाई अगर उसको अस्पताल जल्दी नहीं भेजा गया ना तो भैया उसको श्रवण करने वाले लोग बहुत पहुंच जाएंगे अस्पताल। आज आपको दो खुशखबरियां बता रहा हूं। जो ऑडियो क्लिप है मैं डाल दूंगा। एक रामपाल का एक वकील हुआ करता था लखनऊ में जो बहुत षड्यंत्र करता था। अभी उसने पता है क्या क्या हुआ? उसको जब ये पता चला कि हम लोग ये बहिष्कार आंदोलन चला रहे हैं। ये सब कर रहे हैं। तो उसको जब पता चला कि हम लोग उसके घर का भी उसके घर के आसपास भी वो तो करेंगे ही। उसके घर के आसपास हम लोग यह उसका बॉयकॉट करने के लिए हम लोग जाएंगे। परमिशन लेकर के वहां पर जो है प्रदर्शन करेंगे कि भाई आम आदमी उसका बहिष्कार करें। तो वो तो करेंगे ही मगर उससे पहले उसको जब ये पता चला ऐसा होने वाला है तो वो व्यक्ति क्या बोल रहा है मालूम है? वो व्यक्ति बोल रहा है मैंने अब सब छोड़ दिया है। दंद फन मतलब जो षड्यंत्र वगैरह करना

01:51:51:01 छोड़ दिया है। अब मैं केवल भक्ति में सीमित हूं। अच्छा उसके बाद मेरे से उसकी बात हुई। मैंने फोन लगाया क्योंकि वो मेरे लोगों को कॉल कर रहा था। मैंने उसको कॉल लगाया तो वो बोल रहा है मैंने उसको बोला मतलब उससे कुछ बात पूछने लगा तो वो पागल हो गया। वो बोल रहा है कि भाई मैं तो शंकराचार्य जी का शिष्य हूं पूरी वाली। ऐसे बोलने लगा। मैंने कहा हो शिष्य तो बोलो जय। जगदगुरु शंकराचार्य महाराज की जय। तो बोला जय। पागल हो गया वो। [हंसी] आप लोगों को भी आएगा एक दो दिन में और सुनो इनको धन इनको धन से मतलब है धन से धन धन से नहीं अपना जीवन कैसे सरलतम से कटे धर्म तो धन तो जो ये लोग बात करते हैं ना धर्म वो इनको कुछ पता ही नहीं है तो ये करेंगे क्या अच्छा एक चीज और है कि जो रामचंद्र यादव जी हैं उन्होंने उसको फोन किया था एकद दिन पहले तो ये जब ये बोला बोला था ना कि मैं तो अब भक्ति में सीमित हूं। मैंने ये सब दंद फंद छोड़ दिए। मुझसे जो ये बोला राम शंकराचार्य भगवान की जय। उससे पहले ये रामचंद्र यादव जी बोले इससे कि भाई जय श्री राम। तो ये बोला अरे तुम

01:53:06:02 जय श्री राम क्यों बोल रहे हो? तुम तो बंदी छोड़ जय बंदी छोड़ बोलने वाले जय श्री राम बोलने लगे। मतलब ये देखो जय श्री राम बोलने पर कितनी आपत्ति है। रामचंद्र यादव जी ने उसको बोला कि अगर लखनऊ में रहना है तो जय श्री राम बोलना पड़ेगा। यह उन्होंने बोला और उसके बाद एक दिन बाद देखो उसको जय शंकराचार्य बोलना पड़ा। हमारे पक्षी बाद उसको जय करनी पड़ गई। बोला ना जय हो शंकराचार्य की तो बहुत बढ़िया है। और सुनो जो व्यक्ति हमारे लिए वहां जा रहा था कलेक्टेट में ज्ञापन देने। वो व्यक्ति आज कह रहा है। है ना? वह व्यक्ति आज कह रहा है कि भैया मैं शिवश नारायण द्विवेदी का फोन आएगा तो उसको कह दूंगा कि भाई मुझे अब इस सब से कोई मतलब नहीं है क्योंकि जो लोग मुझे पुश कर रहे हैं जो लोग षड्यंत्रकारी हैं वो लोग खुद आगे नहीं आते दूसरों को पुश करते हैं भोलेभाले लोगों को तो वो यह कह रहा है कि मुझको जो लोग पुश कर रहे थे जब बार-बार शिवश नारायण द्विवेदी ने किताबों में लिखी हुई बातों पर बात की और मैं उनके पास लेकर गया भैया इन किताबों का तुम जवाब क्यों नहीं देते हो आपने सुना होगा कल की एक रिकॉर्डिंग डाली उसमें भी मैं पूछ रहा हूं कि तुम्हारे घर पे किताबें रखी है क्या? वो भी यही बात इस बात पर आकर के चुप हो जा रहा है। तो वो जो हमारे खिलाफ कलेक्टेट में गया था वो गया उन लोगों

01:54:21:06 के पास अपने आकाओं के पास कि भाई इन किताबों का जवाब दो ना मैं क्या जवाब दूं? तो आका पीछे हट गए ये वकील की तरह कि भैया किताबों का जवाब हमारे पास नहीं है। हमारे पास तो दूर से षड्यंत्र हैं। महिला को खड़ा कर दो। ये कर दो, कपड़े फाड़ दो, छेड़खानी का आरोप लगवा दो। ये सब षड्यंत्र हैं। हमारे पास किताबों में लिखी हुई गलत बातों का जवाब नहीं है। क्योंकि हम तो अनपढ़ हैं, गवार हैं, फूलण हैं। किसके अनुसार? हमारे रामपाल के अनुसार। रामपाल ने ही अपनी गीता में लिख दिया है। तो वो व्यक्ति ये बोला कि जब वो लोग पीछे हट रहे हैं ना किताबों का जवाब देने से वो व्यक्ति भी कह रहा है कि अब मैं इन सब में नहीं हूं। अब मैं भी कोई किसी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं बनूंगा। ठोको ताली। देखिए कितना परिवर्तन आ रहा है लखनऊ में। जो समोसे वाला समोसे की ठेल लगाता था। उस समोसे वाले वो समोसे वाला अपनी ठेल पर रामपाल का पोस्टर लगा के रखता था। हमने प्रदर्शन किया उसने पोस्टर हटा दिया। एक प्लास्टिक की दुकान वाली जिसका नाम है रंजना। वो अपनी दुकान पर ये फूहड़ तत्वदर्शी राम पाल का फोटो लगा के रखे थी। आज वहां पर प्रभु श्री रामचंद्र जी की फोटो लगी हुई है। यह है जीत। इसको कहते हैं धर्म की जीत। और जो लोग

01:55:36:09 षड्यंत्रकारी थे, जो हमारे विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे थे, वह आज कह रहे हैं कि अब मैं इन सब में नहीं हूं, मैं तो दूर हूं। वह आज कह रहे हैं जय हो शंकराचार्य जी की। इसको कहते हैं जीत। इसको कहते हैं धर्म की जीत। ठीक है। जी जय श्री राम भाई। जय श्री राम जी बताइए। ये सही आ रही है मेरी

01:56:09:27 थोड़ा सा वो कट कट कट ऐसे हो रहा है दिक्कत क्या दिक्कत है क्या आपने कोई लीड वीट तो नहीं लगा रखी है नहीं नहीं नहीं अब अब अभी सही आई थी अभी अभी सही आई थी अभीभी जिसको भी कुछ जवाब चाहिए वो वो हमारे नंबर पर संपर्क करें, फॉर्म भरे और फॉर्म भर के सामने आकर बात करें। यह कमेंट सेक्शन में मक्कारी पूर्वक कायरता पूर्वक अपनी अपनी नपुंसकता का प्रदर्शन ना करें। ठीक है? चलिए फिर काफी हो चुका है समय और यह जो सरिता जी हैं उन्होंने वहां पर प्रदर्शन किया है। प्रधानमंत्री जी से गुहार लगा रही हैं कि मेरी बेटी को बचाओ।

01:57:02:28 सरिता जी हैं। इनकी बिटिया जो तथाकथित स्वयं को भगवान कहने वाले अमोल कोकने द्वारा संचालित जो केंद्र है आध्यात्मिक विश्वविद्यालय जो ब्रह्मा कुमारी की उपज है उसमें इनकी बेटी ब्रेन वाश करके उसको लोगों ने एक तरीके से मानसिक गिरफ्त में लिया हुआ है और ये अपनी बेटी को छुड़ाने की गुहार लगा रही हैं और इसमें हिंदी में इनके यह प्लेट है जो इन्होंने वहां बांटे हैं। पहले संसद पर प्रदर्शन करने गई थी पर वहां नहीं कर पाई। उसके बाद फिर इन्होंने राजीव चौक पर प्रदर्शन किया है। जितना हो सके इनका संदेश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाए जिससे कि इनकी बिटिया जल्दी से घर वापस आए और

01:57:55:25 इनकी बिटिया का घर वापस आने आना केवल इनकी जीत नहीं होगी। धर्म की जीत होगी। जिस प्रकार से रामायण में प्रभु श्री राम की जीत हुई थी। जिस प्रकार से महाभारत में पांडवों की जीत हुई थी। तो आप इसको ऐसा ना समझे कि इनकी लड़ाई है। ये हम सब की लड़ाई है। इस रूप में देख के इसको अ समझे। ठीक है? ठीक है। और आप में से किसी को कोई बात रखनी हो तो बताएं।

01:58:28:24 भाटी जी जी विश्राम कीजिए लंबा बोले आप भी आज सारा परिवार गोस्वामी जी कोई बात जी नहीं विश्राम कीजिए जय श्री राम सभी को हर हर महादेव जय श्री राम जय श्री राम सभी को जय श्री राम जय श्री राम और जय श्री राम कल हमारी लाइव होगी रामचंद्र यादव जी के साथ वो जरूर रहिएगा और परसों लाइव होगी जो नीलमा जी हैं जो हमें कोर्स करा रही है ब्रह्मा कुमारी का से डेज वाला तो उन सब में रहिएगा और भगवान के नाम का जप करते रहे सवा घंटे का नाम जप अवश्य करें सभी को जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम

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1. गीता 5/7-5/9 और 7/19: रामपाल ने 'अभिमान' कहाँ से ठूँसा? संस्कृत दिखाओ! (~16:00)

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: 'जूता मारो' वाली line

: 'स्त्री को रामपाल के पास भेज देना' (harassment का ख़तरा)

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प्रश्न 110-111: 5/7 में 'अभिमान' शब्द है ही नहीं, 7/19 में 'बताने वाला संत' वाली line संस्कृत में नहीं है, 5/8-9 को एक साथ 'भाव' भी कहा और 'गलत अनुवाद' भी। 'हत्या करके कहे मैंने नहीं किया' वाले तर्क का पूरा जवाब। 0:49:14 पर 'खैर आगे चलते हैं' से topic साफ़ ख़त्म।

2. गीता 5/10-5/17: रामपाल 4 श्लोक एक line में निपटा गया, 5/17 पी गया! (~17:34)

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: 'छूने वाली आ गई आश्रम में' वाली line

: छापे में मिली चीज़ों वाले मीडिया आरोप (मानहानि का ख़तरा)

Teaser (at the start):

10-13 श्लोकों का अनुवाद ही नहीं किया, 'जेल की दीवार कूदने' वाला उदाहरण, 'प्रभु' और 'विभु' (सर्वव्यापक) का अर्थ ख़ुद परमेश्वर माना, 'स्वभाव' को पाप बना दिया, 5/17 छोड़ दिया। 1:07:11 पर 'यह इसने छोड़ दिया' से topic पूरा।

3. गीता 5/18-5/23: पंडित कौन? और रामपाल की अपनी किताब में अर्जुन को मोक्ष मिल गया! (~16:57)

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: लखनऊ के वकील का नाम (निजी व्यक्ति)

: थाने के 'पट्टे' वाली बात

: 'पतलून गीली' वाली line

: 'स्त्रियां चिपका के' वाली line

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5/18 में पंडित = तत्वज्ञानी (उन्हीं की किताब से), 5/19-22 बिना अनुवाद के निपटाए, 5/22 से 2/37 काटा तो 2/37 से 5/22 क्यों नहीं, 5/21 'अक्षय सुख' और ब्रह्मवेत्ता, फिर पृष्ठ 99 पर 'अर्जुन को मोक्ष मिल गया', जो उनके 'दो शादी वाला अर्जुन कैसे मुक्त होगा' से उलटा है। 1:25:40 पर 5/23 का सही अर्थ पूरा।

4. गीता 5/24-5/29: 'निर्वाण ब्रह्म' का घोटाला, भ्रकुटी ध्यान का दोगलापन और 'ऋच्छति = गँवाना'? (~13:29)

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Remove (middle part):

: 'खिलाता पिलाता' वाली line

: पेज ढूँढने का इंतज़ार

: दूसरे YouTubers के नाम और 'zombies' वाली बात

Teaser (at the start):

निर्वाण ब्रह्म = ब्रह्म की शांति, पृष्ठ 63 पर उनका कबीर भी 'अपने से अलग परमात्मा' बता रहा है, 5/27-28 में भ्रकुटी के बीच ध्यान, जबकि ख़ुद बैठकर ध्यान को मना करते हैं, 5/29 में 'ऋच्छति' का अर्थ 'गँवाना' कहाँ लिखा है। 1:43:15 पर 'पांचवा अध्याय पूरा किया' से पूरा अंत। आख़िर में 28 सेकंड का शिवराम आप्टे शब्दकोश वाला प्रमाण जोड़ें।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:59:27 · 22 Sep 2026

रामपाल की घटिया गिरी पाखंडी का गीता ज्ञान भाग 10 अध्याय 5

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