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00:00:02:00 सभी को जय श्री राम और आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। हमारे साथ आज बहुत ही आदरणीय अतिथि हैं यहां पर जो हमारे साथ चर्चा करने वाले हैं जो इटावा का प्रकरण हुआ है और उसके नाम पर जो राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही हैं। तो हम सबसे पहले आचार्य श्री को ले लेते हैं। आचार्य ज्ञानेंद्र शर्मा जी चश आचार्य श्री जय हो भैया जय हो जयस्तु

00:00:40:00 आचार्य श्री आपके चरणों में एक बार पुनः दंडवत प्रणाम निवेदित करते हुए और इस समय जो प्रासंगिक एक विवाद बहुत ही गर्म है जैसा आपको बताया भी था मैंने कि एक चर्चा हम रखना चाहते इस चैनल पर और जो इटावा वाला विवाद चल रहा है उस पर हम चर्चा करने वाले हैं। और मैं एक बात दर्शकों को बता दूं कि आचार्य श्री ने अपने चैनल पर बहुत ही टू द पॉइंट कुछ आवश्यक जानकारियां वहां पर प्रोवाइड कराई हैं जो ये वर्ण व्यवस्था से रिलेटेड है। वर्ण व्यवस्था पर कई प्रकार के तर्क और प्रमाण इस चैनल पर ही हम कई बार देख चुके हैं और पूर्व में आचार्य श्री जैसे मर्मज्ञ जो धर्म के ज्ञाता हैं उन लोगों ने भी अपने अपने चैनल पर बहुत से वीडियोस के माध्यम से तर्क और प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। इस संबंध में एक पार्ट आता है एक कि भाई कुछ लोग यह कहने लगते हैं कि फलाने वो जो इस पर हम बात करेंगे कि जो ग्रंथकार थे वह ब्राह्मण नहीं थे। या वह भागवत वक्ता थे, वह ब्राह्मण नहीं थे। इस तरह के वो कुतर्क करने का प्रयास करते हैं। तो उस समय भी हम लोग एक

00:01:55:08 व्यवस्थित आज चर्चा देखने वाले हैं। तो सबसे पहले तो हम एक बार थोड़ा सा एक रिककैप कर ले कि विवाद क्या था। विवाद यह दिखाया गया है क्योंकि हमने अपने एक वीडियो में आचार्य श्री ये बताया है दर्शकों को कि यह पूरा जो विवाद है यह प्रायोजित है। प्रायोजित अर्थात एक विवाद बनाया गया जैसे ऐसे लग रहा है क्योंकि जो एक कथा वक्ता है जो कहीं पर कथा बोल रहा है और वो पिछले 16 सालों से कथा बोल रहा था अनेक मंचों पे और जहां पर उसका अपमान होने की घटना दिखाई जा रही है वहां पर भी उसने एक महीने पूर्व ही कथा बोली है तो जो आयोजक है जो ये जो ऐसा दिखाया जा रहा है कि आयोजकों के द्वारा उसको पीटा गया या उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया अपमान किया गया उन आयोजकों को क्या वो एक महीने पहले जो कथा हुई थी तब नहीं पता था कि ये ब्राह्मण नहीं है यादव नहीं है जो व्यक्ति 16 साल से कथा कर रहा है उसके बारे में आपको 16 वर्ष लग गए जानने में कि ये ब्राह्मण नहीं है ये यादव है तो इससे और फिर घटना के

00:03:10:09 तुरंत बाद राजनीतिक पार्टियों का उसमें कूद पड़ना उसको जाति जातिवाद के रूप में घृणा मूलक जातिवाद के रूप में प्रचारित करते हुए जो व्यवस्था मूलक हमारा वर्णाश्रम धर्म है उस पर आघात करना उसको जो है उसका प्रतिकार करना तो ये पूरी घटना इस तरह से प्रायोजित दिखती है और भी कई सारे इसके पहलू है जिस पर हमने पूर्व में भी बात की आज भी बात करेंगे तो इसको आचार्य श्री कैसे देखते हैं मुझे लगता है सत्येंद्र आचार्य सत्येंद्र जी भी आ गए हैं चरण स्पर्श आचार्य श्री सत्येंद्र पाठक जी भी हमारे साथ में है और संभवत उन्होंने अभी तक जो पृष्ठभूमि हमने तैयार की है वो सुनी होगी आचार्य श्री ने हां जी और दोनों ही हमारे धर्म के ज्ञाता हैं मर्मज्ञ हैं। तो आज इनकी मुख से इनकी वाणी से जो दिव्य वाणी इनके गुरु मुख से हम आज इस ये जो विवाद चल रहा है इसकी समीक्षा पर दृष्टि डालेंगे तो सबसे पहले मैं पुनः जो आचार्य ज्ञान जी है उनके उनके पास वापस लौटता हूं। थोड़ा सा मैं कहता

00:04:25:13 हूं कि इस विवाद पर जो आपका जो दृष्टिकोण उसको थोड़ा सा इस विवाद पर अपने दृष्टिकोण से प्रकाश डाल दीजिए आप। देखो [संगीत] वागदेव विद्महे कामराजाय धीमहि तन्न सरस्वती प्रचोदयात बाद संवाद होता है तो वादे वादे जा तत्व बोधा बाद संवाद से कोई तत्व का बोध होता है यह जो यह जो प्रसंग चल रहा है तो वाद संवाद ना हो के एक दूसरा इसका वो होता है जलवाद जलवाद का बात जलवाद उसको कहते हैं जो हम कह रहे हैं वही सही है आजकल जो अपना जो उनका पक्ष लेकर के विषयांतर करके किसी ना किसी ढंग से जो है एक जाति को आधार मान करके उसका अपमान कर रहे हैं। तो जलपवाद है वह किसी की सुन रही सुन नहीं रहे हैं।

00:05:40:14 वो अपनी कह रहे हैं। यदि दोनों पक्ष बैठकर के बात हो तो कहीं कुछ है ही नहीं। जैसे खरगोश से सिंह नहीं होती है ना वैसी स्थिति है। ये इस बंध्या सुता सत्संग धनुर्धरा कोई कहता है कि भाई पुत्र किसका जाता है कि ये जो बंध्या का पुत्र है अरे जो धनुर्धर है। धनुष किसका है? खरगोश सिंह का है। अरे वो दूध किसका पी रहे हो? कछुआ का दूध पी रहे हैं। अरे माला किसकी पहन रहे हो कि आकाश के कुसुम है। इसी ढंग से विवाद है। इसके मूल में आप जाओगे तो कहीं कोई बात है ही नहीं। तो जलपवाद वो अपनी बात कह रहे हैं। किसी सुन नहीं रहे। तो हमने कहा कि भाई इसके बाद आता है वितंडावाद।

00:06:29:25 यह तीसरा पक्ष है। उसका कहना यह है कि आप सही क्या है? सही क्या है ये बताओ। तो तीसरा पक्ष ये तो हम भी नहीं जानते क्या है। तो हमको जलपवाद से विथंडावाद से आगे निकल के यदि हमारी सोच बढ़ेगी तो इस विषय को जानेंगे। बाकी यह जो जैसे वहां थे तो नहीं कोई केवल जैसे वीडियो के माध्यमों से जिस ढंग से जो है देखने में विषय आ रहा है उसके अनुसार ही सबसे पहले यह है कि जो व्यास पीठ है उसकी गरिमा होती है एक मर्यादा होती है और व्यास पीठ पर बैठा हुआ जो आचार्य है अथवा जो विद्वान है उसका सबसे पहले लक्षण ये है कि आचोति शास्त्रान आचार्य स्थापना दपि स्वयं आचस्तु तस्माद आचार प्रचक्षते

00:07:34:04 स्वयं आच शास्त्राण जो शास्त्र है क्या विधि है क्या निषेध है और क्या कहना है क्या नहीं कहना है इस सब का चयन करता है कौन आचार्य चाहे व्यास वेद व्यास जी हो आचार्य हो गुरुकुल को पढ़ाने वाले हो चुस्तव में शास्त्री बात है क्या और आचार स्थापना जो शास्त्रों में बात कही है उस आचार को हमें समाज में स्थापित करना है। तो श्रीमद् भागवत का जो विषय है जिसके हम वक्ता हैं उस महात्म में जो विषय लिखा है वो सही ढंग से हम पर घटता है अथवा नहीं घटता है। तो भागवत में जो बात कही गई है पुराणों में जो बात कही गई है शास्त्र में जो बात कही गई है उस बात को हमें समाज में स्थापित करना है। और क्या स्वयं आचरतेस्तु और वह बात अपने आचरण में भी लानी है जब जाकर के वह जो है पात्रता बनती है उसमें कहीं कोई जिसमें श्लोक घटेगा वो पात्र है नहीं घटेगा तो नहीं पात्र है वहां पर जो चला कि जो कथा व्यास थे उन्होंने जो है

00:08:50:02 उन पर दो आईडी थी एक ब्राह्मण पर थी और एक जाति परक थी तो ब्राह्मण के यहां उन्होंने जो है जैसे सुनने में आया है तो परिचय दिया ब्राह्मण होने का दिया ये नहीं देना चाहिए ये गलत है यदि ब्राह्मण की इच्छा ब्राह्मण से कराने की है कराओ तो क्षत्रिय को क्षत्रिय से कराने की है जो जाट है वो जाट से कराएं कराएं वो इसका निर्णय तो धर्मराज करेंगे ये निर्णय यहां नहीं होगा। यह तो धर्मराज के जाकर के होगा कि आपने जो है जो धर्म का अनुसार जो आपने

00:09:35:06 धर्म को मान के जो व्यासपीठ का उपयोग किया है वो धर्म अथवा अधर्म है। तो भगवान धर्मराज है चित्रगुप्त है ना वो उसका निर्धारण करेंगे जाकर के। उससे बात ऐसा देखने में मिली के शिख मतलब शिख को काटा तो यह गलत है। तो पक्ष जो है जैसे सुनने में आता है पक्ष दोनों ही दोषी हैं। जी और मैं ये समझता हूं यदि अति उत्साह में वो ना आते। मुझे लगता है कोई थोड़ा विषय चला है तो अन्य ने लपक लिया है। कुछ असामाजिक तत्व आ जाते हैं तो आगे का जितना भी प्रसंग है आगे उस असामाजिक तत्वों के द्वारा ही मुझे मालूम पड़ता है कि उनके द्वारा उठाया गया है। जैसे आपके द्वारा भी ये बात ध्वनि हो रही है। जी उसमें उसमें आचार्य श्री ये वाली बात भी है ना कि पहली बात तो दोनों ही पक्ष दोषी है और दूसरी बात यह है कि

00:10:34:16 भागवत में ही और अन्य हमारे जो वेद शास्त्र वांगमय है वैदिक वांगमय है उसमें किसे ब्राह्मण के रूप में अपने घर पर लेकर आए इस बारे में भी बहुत व्याख्या दी गई है किसको ब्राह्मण के रूप में आप स्वीकार करें और उसकी जांच कैसे करें ये भी है ये भी बताया गया है हम तो जब हम एक तरफ धर्म के और शास्त्र के इतने बड़े रक्षक बनते हैं कि यदि कोई व्यक्ति ने अपना नाम बदल करके और व्यास गद्दी को अपमानित किया या फिर व्यास गद्दी को विकृत किया या फिर भागवत को विकृत किया और उसके परिणाम स्वरूप आप उसके साथ इतना दुर्व्यवहार कर देते हैं। खुद ही राजा खुद ही दंडाधिकारी बनते हुए आप इतना उसके साथ इस आगे तक बियों्ड द लिमिट जाकर के और ऐसा आचरण कर देते हैं। तो फिर जब आप धर्म और शास्त्र के इतने रक्षक हैं तो आपने धर्म शास्त्र के इस पक्ष पर ध्यान क्यों नहीं दिया कि व्यास के रूप में किसको लेकर आया जाए इस बारे में विवेचना है हमारे शास्त्रों में जहां तक मुझे ज्ञात है तो उन्होंने तो वो जब किसी को लेने जा रहे हैं जो 16 वर्ष

00:11:49:25 से 16 वर्षों से जो कथा कर रहा है और वो यादव है वास्तविकता में उसके उसके बारे में आसपास के तमाम सारे गांव में पता मगर यह क्या और इनके यहां पर वही व्यक्ति एक महीने पहले आकर के जा चुका है कथा करके और फिर भी इनसे यह गलती हो रही है कि उसी को कथाव्या तो ये इसलिए मुझे मतलब ये जो सारी चीजें हैं वो प्रायोजित फिर दिखाई देने लगती है कि ये ब्राह्मण और यादवों में फूट डाल के इनके बीच में एक युद्ध की स्थिति बना करके और वोट बैंक की राजनीति की जाए और ऐसे में फिर दूसरा एक पक्ष खड़ा हो जाता है जो इस विवाद को समझने की बजाय कि यह प्रायोजित मामला है। वह विवाद को समझने की बजाय अपना दामन छुड़ाने के लिए वो सीधेसीधे ये जो ये घृणा मूलक ये दृश्य प्रस्तुत किया गया कि जाति के नाम पर घृणा तो ये जो दृश्य प्रायोजित रूप से प्रस्तुत किया गया इससे वो लोग जो अपनी मार्केटिंग करना चाहते हैं वो तुरंत कहने लगते हैं अरे भाई हम तो जातिवाद को मानते ही नहीं वर्णाश्रम धर्म तो हमें मतलब अपमान करने लगते हैं। उसके लिए बहुत सारी उलजुलूल बातें करने लगते हैं। मतलब पहली बात तो

00:13:04:28 वो अस्तित्व में है ही नहीं। दूसरी बात वो घृणा मूलक है और आप उसके आधार पर कोस किसको रहे हो? व्यवस्था मूलक को, शास्त्र मूलक को। तो यह सब दोनों पार्टियां फिर उसमें ज्वाइन कर लेती हैं। एक पार्टी जो उसका फायदा उठाने की कोशिश करती है और एक पार्टी वो अपना दामन छुड़ाने के लिए फिर कहने लगती है अरे वर्णाश्रम धर्म तो श्राप है। वर्णाश्रम धर्म ये है उसकी वजह से धर्म परिवर्तन हो रहा है। बहुत सारी चीजें हैं। तो इस पर मैं एक वक्तव्य शतेंद्र पाठक जी है आचार्य जी उनका भी ले लेता हूं। जी आचार्य जी स्वागत है आपका। ये इटावा में जो प्रकरण हुआ जिसमें आपने सही तरह से समझाया कि इसमें यादव और ब्राह्मण का विद्वेष फैलाने के लिए यह सोची समझी हुई साजिश है। जी जबकि भागवत कथा के विषय में जो श्रीमद् भागवत का महात्म है उसी में बताया गया है किस प्रकार का वक्ता होना चाहिए। उसमें विरक्तो वैष्णव विप्रो वेद शास्त्र विशुद्ध कृत इस प्रकार से विप्र शब्द आया है। विप्र शब्द का मतलब ही होता है जन्मना ब्राह्मणोगे संस्कार द्विजते

00:14:20:19 द्वाभ्याम जन्म संस्कार्या जाज जब संस्कार उसका उपनयन संस्कार आदि हो जाता है तब द्व कहलाता है और वेदाभ्यासा विप्रतम जो वेदभ्यास करेगा उसके बाद विप्रज्ञा होगी वही भागवत कथा करने का अधिकारी है तो इसमें जो यादव है वो कथा करने के श्रीमद भागवत कथा के विषय में वो अधिकारी नहीं माने जा सकते और जहां तक कि ब्राह्मण भी अधिकारी नहीं माना जाएगा अगर यदि वो वेद वेद और वेदांग का जिसने अध्ययन नहीं किया है वह ब्राह्मण भी अधिकारी नहीं है यादव की तो बात छोड़िए और किसी की बात की बात नहीं है यहां तो ऐसी स्थिति में यह कि नहीं उसको अधिकार है ब्राह्मण को ही अधिकार है ब्राह्मण सभी ब्राह्मण को अधिकार नहीं है यह श्रीमद् भागवत के महात्म ही स्पष्ट हो गया और जो ये कथा करने वाले आजकल हैं ये क्या करते हैं? ये कुछ जो श्रीमद् भागवत की कुछ कथाएं हैं उनको याद कर लिया और फिर गाना बजाना करके और जनता को जो है वो रिझा देते हैं। उससे जो उसी को कथा मानते हैं। जबकि उसका जो श्रीमद् भागवत के जो मूल श्लोक

00:15:35:25 हैं उनका वो उच्चारण भी नहीं कर सकते। चतुश्लोकी भागवत जो कि मूल है जो कि भगवान नारायण से परंपरा से प्राप्त होकर के ब्रह्मा जी को नारद जी को और सनका आदि ऋषियों को और व्यास जी को सुखदेव जी को उसके पश्चात प्राप्त हुआ है और उस परंपरा में जो जिस प्रकार से चतुश्लोकी भागवत का ज्ञान प्राप्त हुआ उस चतुश्लोकी भागवत के जो चार श्लोक हैं उनका जो इतना गढ़ रहस्य है उसको बिना वेद वेद वेदांग और वेदांत के उसका कोई भी मर्म नहीं जान सकता है। तो ये आजकल के जो कथावाचक हैं इसमें ब्राह्मण भी बहुत से कथावाचक हैं कि जो भागवत का जो मूल है उसको लेकर के नहीं चलते हैं। गाना बजाने में ही और उसको जो है मनोरंजन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जबकि राजा परीक्षित जो है वो राज्षि थे और भगवान सुखदेव जी महाराज वो परमहंस थे और परमहंसों की संभता है। तो परमहंस की संभिता का जो बखान करते हैं इस तरह से तो वो तो उसके परमहंसों के विपरीत है तो उसको श्रीमद् भागवत कथा नहीं कहा जा सकता है। रही बात भगवत चर्चा की या सत्संग की वो हर

00:16:50:26 वर्ण की हर जाति का पूर्ण अधिकार है। उसमें किसी की रोक नहीं है। और हमारे भारतवर्ष में भी अन्य भी जो कथा करने वाले हैं। कोई भागवत कथा के नाम से कर रहे हैं। कोई राम कथा के नाम से कर रहे हैं। उनकी जाति भी सबको मालूम है। किंतु उनका प्रस्तुतीकरण सही है। वह मनोरंजन अच्छा कर लेते हैं तो जनता उनको उनकी जाति नहीं पूछती है। और वो जैसे मुरारी बापू है, अन्य जाति हैं वो तो सब लोग उनको जानते हैं कौन किस जाति का है और ये तो एक समीप गांव के ही थे। कोई ज्यादा दूर के नहीं थे कि जो इनकी जाति के बारे में ना पता हो। किंतु बाद में किसी कारण से साजिश करके विद्वेष फैलाने की दृष्टि से ऐसा किया कि ब्राह्मण यादवों का विद्वेष हो जाए। इस प्रकार का किया गया षड्यंत्र है और बाकी इसमें ब्राह्मण और यादव के विद्वेष राजनैतिक मात्र है। इसमें कोई वास्तविकता नहीं है। जी आचार्य श्री इसमें एक जो हम एक जो पक्ष प्रस्तुत किया जाता है यह तो ठीक है प्रायोजित है मगर अब जब वो मामला बन ही गया विवाद का आधार तो फिर उसकी विवेचना समीक्षा करना होना फिर दायित्व हो जाता है आचार्यों का तो इसमें एक बात आती है आचार्य श्री कि जब हम ये

00:18:05:27 कह रहे हैं कि अ उनको झूठ नहीं बोलना चाहिए था है ना चलिए उसकी गलती मान ली जाती है। अभी मैं थोड़ी देर वो कुतर्कियों की ओर से एक प्रश्न रख रहा हूं आपके समक्ष। है ना? तो एक बात रखी जाती है कि कि वो मान लीजिए उसने अपनी आइडेंटिटी छुपाई। मगर उसको आइडेंटिटी अपनी छुपानी क्यों पड़ रही है? ये व्यवस्था क्यों है? कि वक्ता जो है कथा का वो ब्राह्मण कुल से ही होना चाहिए। है ना? तो इसमें तर्क और युक्ति और प्रमाण क्या-क्या हो सकते हैं उस पर थोड़ा सा प्रकाश डालें। उसमें

00:18:53:27 [संगीत] उसमें ऐसा है कि जो है वहां महात्म जो लक्षण दिए हैं उसमें निश्चित निश्चित किया कहा है कि विद्या और जन्म विद्या से ही पवित्र हो जन्म से ही पवित्र हो और आचार संपन्न भी हो कर्म से भी हो तो पहले बोला ही था इन्होंने पहली शर्त यह है कि वृक्तो वैष्णवो वेद शास्त्र विशुद्ध कृत आप जब श्रीमद् भागवत की कथा कर रहे हैं जी जो अपने पक्ष में है उसको तो आप कहते हैं और वही भागवत में अपने विपक्ष में बात जा रही है उस बात को आप छिपा लेते हैं छिपाना नहीं चाहिए जैसे वही के श्लोक है ये वक्त वैष्णो वेद शास्त्र विशुद्ध दृष्टांत कुशल धीरा वक्ता कार वक्त होना जो कथा व्यास है वो वक्त हो मतलब राग द्वेष वाला नहीं होना चाहिए और वैष्णव होना चाहिए वैष्णव का तात्पर्य वहां उससे

00:20:09:06 नहीं है संप्रदाय से नहीं है ये तो विष्णु मुख भूता वैष्णव से तात्पर्य है कि ब्राह्मणो वै मुख्या यतो मुखवा अंगे देवता सर्वा मुखे वेदा व्यवस्थिता ये ऐसा ये श्लोक इसमें घटेगा वो वैष्णव है और वेद शास्त्र विशुद्ध कृत जो वेद का अध्ययन है गुरु परंपरा के के माध्यम से जो गुरु जी है गुरु जी भी कैसे होंगे तद विज्ञानार्थम स गुरु गुरुवा गच्छत समिति पानी भ्रम निष्ठम मुंडकोपनिषद है ये के गुरु के समीप में जाए हाथ में जो है समित पानी लेकर के और गुरुकुल में रहे और गुरुकुल में रह के जिसने उपरवा धर्म का पालन करके ब्रह्मचर्य का पालन करके जिसने वेद का स्वाध्याय किया है ऐसा जो ज्ञाता है

00:21:09:27 आचार्य जी के कुछ टेक्निकल इशू आ गया है आचार्य ज्ञान जी के यहां पर ठीक है तब तक सत्येंद्र आचार्य सत्येंद्र जी आप गुरुदेव की बात को आगे थोड़ा सा मैं प्रस्तुत कर दे तो ये विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेद शास्त्र विशुद्ध कृत इस पर आचार्य जी बता रहे थे कि विरक्त होना चाहिए वैष्णव होना चाहिए वैष्णव का मतलब वैष्णव दीक्षा से यहां तात्पर्य नहीं है। जो भगवान में जिसकी निष्ठा है वो उसका हां भगवान का जो भक्त है वही वही वैष्णव है। और जो यादवों की जहां तक बात है तो उद्धव जी जो है बृहस्पति के साक्षात शिष्य थे। उन्होंने गोपियों के लिए उपदेश किया। भगवान कृष्ण ने उनको भेजा। तो उन्होंने वो भी भागवत का ही अंश है। तो उन्होंने गोपियों को उपदेश देने के लिए वो गए थे ना कि उन्होंने जैसे सुखदेव जी ने भागवत कथा करते थे उस तरह से व्यास पीठ पर बैठकर के उन्होंने कोई भागवत कथा नहीं की थी। तो इस प्रकार से

00:22:24:28 जो भी किसी भी जाति का हो सत्संग है भगवान के गुणों का गुणों का गान करना है तो उसको करने के लिए सभी का अधिकार है। पर वो उसको अब जाति रूप जातिवाद के रूप में और राजनैतिक विद्वेष के रूप में अपने लाभ के लिए इधर से उधर लोग प्रचारित कर रहे हैं जो कि बहुत गलत है। और जहां तक ब्राह्मण यादवों की बात है उनका जो कभी भी विद्वेष नहीं रहा है। कोई जातिगत विद्वेष नहीं रहा है। यादव ब्राह्मणों में श्रद्धा रखते हैं और सब साथ में रहते हैं। ऐसा कोई हमारे भारत की परंपरा नहीं रही है और पूर्व काल से ही नहीं रही है। किंतु यह राजनीतिक लोग जो है वह अपना हित साधने के लिए इस प्रकार का करते हैं और कुछ लोग ऐसे भी हैं कि जो वर्ण शंकर कार्य करने के लिए है वो खुद अपनी बेटी है या खुद ने अपना जो विवाह किया है किसी दूसरी जाति में किया है तो वो लोग भी इसको राजनीतिक रूप में लेते हैं और अपना जो कमी है उसको ढकने के लिए और वो कहते हैं कि व्यास जी जो है वह भी धीवर के

00:23:40:00 पुत्र थे जबकि जो लिखा है व्यासम वशिष् नतारम पौत्र कलमसम पराज सुतात तपो निधि जो ब्रह्मा वशिष्ठ है उनके वो नाती हैं। शक्ति के पुत्र हैं और सुखदेव जी जो महाराज है उनके पिता हैं। तो जो ब्रह्मा वशिष्ठ के जो नाती हैं तो वह धीवर कैसे हो सकते हैं और यह सब दिव्य जन्मा है और इनका जो है कोई वो किसी भी प्रकार से इनका जो है हो नहीं की जा सकती है। अब कोई लोग कहे कि यह भी हैं व्यास जी भी हैं या सूत जी को भी बताते हैं। जबकि सूत जी लोम हर्षण जी उनके व्यास जी के जो पुत्र लोम हर्षण जी हैं। उसके वो भी अयोनिज है। और उनको भी जो वर्ण शंकर शद्र सूद्र के रूप में लोग प्रचारित करने का प्रयास करते हैं। तो यह केवल अपनी जो कमियां है वो जो अंतरजाती विवाह को बढ़ावा देने के लिए या विजाती को बढ़ावा देने के लिए ये इस प्रकार की चीजों के लिए वो जो वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध है। तो वर्णाश्रम में जो जैसा बताया गया है उसके हिसाब

00:24:55:08 से जो आचरण करना है वही मुख्य उद्देश्य होना चाहिए ना कि अपना धर्म जातिगत विदेश को बढ़ावा देना जिससे कि समाज में जो भ्रांतियां फैलती जा रही है किंतु अभी भी जो समझदार जो यादव भी है ब्राह्मण भी है वो इसको सही नहीं मान रहे आचार्य श्री वापस आ गए आचार्य श्री मैं ये कह रहा था एक बार आप ये अगर समस्या स्या ना हो तो जो हेडफोन है ना इसको आप हटा के अगर बोलेंगे तो ज्यादा अच्छी आवाज आ रही है। अच्छा अच्छा वो मोबाइल से हटा दीजिए तो ज्यादा अच्छे से आवाज आएगी। संभवत

00:25:46:08 [संगीत] आवाज आ रही है अच्छा हां कुछ इंटरनेट की भी जो है वो समस्या है जी जी अब अब आवाज आपकी बहुत प्रकरता से आ रही है अब अच्छा अच्छा आवाज आपकी ज्यादा अच्छी आ रही है हां तो उसमें तो आचार्य श्री आपकी बात को पूरा किया है मगर यदि आपको कुछ लग रहा हो तो आप उस पर उसको पूर्ण कर दे अन्यथा फिर आगे हम थोड़ी है ये जो पात्रता ये नहीं है त्रिच उसमें सबसे कहा कि तीन व्यक्ति जो है वेद के अधिकारी नहीं है तो सबसे पहले उसमें जो ब्राह्मण ही गित कहा जो पतित ब्राह्मण है पतित सावित्री है जिसने जो है विध्वत वेद का स्वाध्याय नहीं किया वही वेद पढ़ने का अधिकारी नहीं है। जी और स्त्री है और इनका सेवा धर्म है। तो शास्त्र जो कभी भेद नहीं करता है। जो पात्रता इसमें हमने बताई वो पात्रता ब्राह्मण में है तो वो अधिकारी होगा और वो पात्रता ब्राह्मण में नहीं है तो वो भी जो व्यास पीठ पर

00:27:01:08 बैठने का अधिकारी नहीं है। समझिए जो है तो उसत्र ब्राह्मणो वैजा वेदा पुरुषोत्तम शब्द शब्द है क्योंकि पहले परंपरा थी गुरुकुल में जैसे देख भी रहे हैं जैसे उज्जैन में पढ़ने गए सुदामा जी भी साथ में पड़े हैं भगवान श्री कृष्ण भी साथ में बलराम भी साथ में ब्राह्मण क्षत्रिय सब साथ में ही पढ़ते थे तो जैसे जन्म ना होकर के जो है वेदा अध्ययन जो है सब में बराबर ही होता जिन गुरु से जो है सुदामा जी पढ़े हैं। जिन गुरु से जो है भगवान श्री कृष्ण बलराम पड़े हैं। वही जो है साक्षात रूप से जो है भगवान श्री कृष्ण भी पढ़े हुए हैं। जी तो वेदा अध्ययन साम्य वेदा अध्ययन अर्थात भगवान श्री कृष्ण का बलराम का सुदामा जी का वेदा अध्ययन साम्य है। उसमें किंतु उसमें लिखा शोत्र ब्राह्मण किंतु शोत्री सबसे केवल ब्राह्मण ही गहित होगा ना वैश्य नाजा वैश्व भी गहित नहीं है ना बाहु अर्थात

00:28:16:14 ये वेद को जो पढ़ सकते हैं पढ़ा नहीं सकते दान दे सकते ले नहीं सकते ये श्रुति का ये वाक्य है तो वेदाध्यन वेदा अध्ययन बराबर होने पर भी तो दृष्टांत दिया पुरुषोत्तम शब्दवत जैसे भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम है उनका नाम है और किसी की संज्ञा रख लो पुरुषोत्तम तो पुरुषोत्तम संज्ञा वाला जो मनुष्य पुरुषोत्तम शब्द से गित नहीं होगा कि भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम वही गित होंगे तो इसीलिए शोत्री शब्द से जो है ब्राह्मण गित होगा वैश्य और क्षत्रिय गित नहीं होंगे ये वहां का सब विषय है यदि श्रोत्री ब्राह्मण नहीं है वेद का स्वाध्याय नहीं किया है और वैष्णव नहीं है वत नहीं है और मासरी उसको कहेंगे मत्समा सस कोपी नास्त मेरे बराबर संसार में कोई नहीं है यह बुद्धि भी इसमें नहीं होनी चाहिए यदि कोई भी कमी इसमें रही तो ब्राह्मण भी वेद व्यास पीठ पे बैठने का अधिकारी नहीं है शास्त्र ने कहीं भेद किया ही नहीं है यदि कोई निर्धारण है तो सबसे पहले ब्राह्मण सब ब्राह्मण को पहले बनाया उन्होंने के भाई नहीं तुम भी पात्र हो यदि ऐसा

00:29:31:15 तुम्हारे अंदर नहीं होगा जी आचार्य श्री इसमें एक समस्या सामने रखी जाती है कि क्या आजकल जितने भी कथावाचक हैं और भी कथावाचक हैं जो ब्राह्मण कुल से आते तो हैं परंतु कई अंशों में उनके भी आचरण ऐसे नहीं दिखते हैं या फिर जैसे कि बताया गया कि वो विरक्त होना चाहिए या फिर वो बताया गया कि वो मतम होना चाहिए। तत्ववेता होना चाहिए। वेद वेदांगों को जानने वाला होना चाहिए। तो ऐसे कई कथावाचक है जो ब्राह्मण कुल से तो आते हैं परंतु वो भी मतलब वो जो ये जो आपने जो चीजें बताई है ये उन पर घटित नहीं होती है कुल मिलाकर के और ऐसे हैं मैं भी जानता हूं आप भी जानते हैं समाज में ऐसे कई कथावाचक है और मुझे लगता है आपको भी कभी-कभी उनको उनके लिए बोलना पड़ता है कि आप ऐसा वक्तव्य ना दें जो शास्त्र के विपरीत जा रहा हो तो एक तो यह बात आ गई और इसमें में एक तर्कपूर्ण स्थिति दूसरी और खड़ी की जाती है कि जो भाई

00:30:45:20 ब्रह्म को जानता है वो ब्राह्मण है। जो जो ज्ञानी है वही ब्राह्मण है। जो वक्ता है वही जो ज्ञान रखता है वही वो है। तो इसमें जो हम लोग जो पक्ष अपने सामर्थ्य से प्रस्तुत कर पाते हैं वह यही होता है कि थोड़ी देर के लिए अगर मान भी लिया जाए कि जो भी व्यक्ति ज्ञान रखता है भगवान की कथा करने का जिसमें भी सामर्थ्य है वो जो है वो क्या कहते हैं भगवान की कथा कर सकता है। वो व्यास गद्दी पर बैठ सकता है। तो सबसे पहली बात तो है कि यह जो सामर्थ्य है कि भगवान की कथा कौन कर सकता है? यह सामर्थ्य जांचने के लिए हमको उसको व्यास गद्दी पर बैठाने से पहले उसके द्वारा कथा जाननी होगी। उसके द्वारा कथा को सुनना होगा कि ये जानता है कि नहीं और उसके इस गुण को नापने के लिए हमारा ज्ञानी होना आवश्यक होगा। भाई ये कथा सही कह रहा है कि नहीं। ये तत्व का विवेचन सही कर रहा है कि नहीं? इसका परीक्षण करने के लिए जो परीक्षा लेने वाला गया है जहां उसको बुलाने के लिए उसका तत्व को जानने वाला होना चाहिए। तो ऐसी स्थिति में यदि हम इस योग्यता के आधार पर कि जो ब्रह्म को जानता

00:32:00:21 है जो भागवत को जानता है जो भागवत का ज्ञान रखता है वही ब्राह्मण हो जाएगा। वही व्यास हो जाएगा। तो इस स्थिति के लिए तो फिर व्यास गद्दी की आवश्यकता ही नहीं रह गई। क्योंकि व्यास कौन है? यह जांचने के लिए कोई पहले से ब्रह्म ज्ञानी भागवत को जानने वाला होना चाहिए। भाई कथा हम लोग हम लोगों को वेद वेदांग का ज्ञान तब होगा जब कोई संत की गद्दी पर व्यास की गद्दी पर बैठ के हमें सुनाएगा। तब हम लोगों को ज्ञान होगा। मगर उसकी व्यास की गद्दी पर बैठने से पहले हम उसकी जांच कर रहे हैं कि तुमको ज्ञान है कि नहीं। इसका मतलब हम हम ज्यादा बड़े ज्ञाता हो गए। जो हम यह जांच रहे हैं। पहली बात एक दूसरी बात यह भी आती है कि कुछ लोगों ने अभी मुझसे यह पक्ष रखे थे कि जो भागवत कथा बोल देगा या भागवत वचन बोल देगा, भगवत वचन बोल देगा या जो भी जिसको भी वेद वेदांगों का ज्ञान होगा वही ब्राह्मण है। उसी को कथा कहने का आ गया। तो एक समस्या तो यही आ गई कि सबसे पहले तो हमें उसको व्यास गद्दी पर बैठाने से पहले हमें पता होना चाहिए कि ये व्यास गद्दी पर बैठने योग्य है कि नहीं और ये ज्ञात करने के लिए हमारा ब्रह्म ज्ञानी होना आवश्यक है। तो फिर कथा सुन क्यों रहे हैं? जब हम ब्रह्म ज्ञानी है पहले

00:33:15:22 ही पहली और दूसरी एक बात हम ये पक्ष रखते जैसे एक बहुत बड़ा आतंक चला एक समय धर्म परिवर्तन का आज भी वह आधार है डॉक्टर जाकिर नायक वेद वेदांगों की बात वो भी कर रहा था। वो भी अपने मुख से जो है उपनिषदों के वाक्य बोलता था। वेदों के वाक्य बोलता था। तो क्या ये जो समाज आज कह रहा है कि जो भागवत को जानने वाला है जो वेद को जानने वाला है वही ब्राह्मण है। वही ज्ञानी है। क्या यह समाज डॉक्टर जाकिर नायक जैसे सरीखे लोगों को भी बिठा देगा व्यास गद्दी पर अपना धर्माचार्य बनाकर तो यह भी एक पक्ष है। जैसे एक पूर्व में एक बात आई थी एनआरसी को लेकर के एक वो आया था कि बिल पास किया जाए एनआरसी वाला। रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में ना आने के लिए भाजपा सरकार ने कहा था कि हम रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में नहीं आने देंगे। जिसका विरोध किया गया मुस्लिम्स के द्वारा। तो यही लोग जो आज कह रहे हैं ना कि जो भागवत को जानने वाला है वो व्यास है। यही लोग उस समय एनआरसी का समर्थन कर रहे थे। क्यों भाई वहां आप सीमा पर जाकर खड़े हो

00:34:30:24 जाइए और जो भागवत बोल दे वो हिंदू है। वो रोहिंग्या मुसलमान थोड़ी ना है। जो भागवत को बोल दे वो हिंदू हो गया। वो हिंदू हो गया। उसको आने दो। तो मुसलमान होने के नाते आप किसी को मत रोको। तो कहीं पर यही लोग जन्म से मान लेते हैं आधार है ना व्यवहार का आधार जन्म से मानते हैं ये लोग कई जगह और कई जगह कुतर्क करते हैं अपने मंतव्यों की सिद्धि करने के लिए तो इस पर थोड़ा सा आप प्रकाश डाल दें यह सबसे पहले तो ये जो है ना वो जन्म से कर्म से ये प्रमाण देते हैं आर्य समाज लोग भी और लोग भी कि जन्मना जात संस्कारते वेदा्यासमधते

00:35:16:16 ये मनुस्मृति का बताते हैं कहीं है नहीं नहीं नहीं ये कहीं नहीं है वो पहले जन्मना ब्राह्मण संस्कार वेदाभ्यास ये है चलो एक आता है तस दुर्जन न्याय आता है तस तभी हम दुर्जन को भी संतुष्ट करें तो सिर्फ बात सुननी चाहिए तो हम चलो आपका ही श्लोक है आपने अपने मनमाने ढंग से बना लिया है तो हम आपसे प्रश्न करते आप सबसे पहले इस पक्ष पर जन्म से जाती मानते तो कर्म से मानते हैं। एक पे तो आना ही पड़ेगा। जन्म से मानो तो कर्म से मानो। जी हां तो आप ये आप इसमें जन्म से भी जाती मानने और कर्म से भी मान रहे हैं। तो बद तो व्याघात हो गया। अर्थात अपनी बात अपने से ही कट रही है। तो जन्म ना जाते शद्रा कह रहे जन्म से शद्र होता है तो जन्म ना मान लिया आपने और और संस्कार से हो जाता है। कर्म से मान ली आप जो है जन्म से भीति मान रहे हैं। कर्म से भी जाति मान रहे हैं। तो ऐसी स्थिति में जो है ये नहीं अब रही जो है आपकी तत्व ज्ञानी बात तत्व ज्ञान तो सबसे पहले क्या कहते हैं कि कर्म को

00:36:31:22 छोड़ दो। जब हमारा जो है परमात्मा स्थिति हो गई तो फिर किसी कर्म की आवश्यकता नहीं है। तो कहा तुलसी जो है ब्रह्म ज्ञान उपज नहीं कर्म दिए झटकाए ब्रह्म ज्ञान के और पास तक भी नहीं है और हमारे जो है संध्या वंदना आदि अग्निहोत्र तर्पण वो छोड़ देते हैं ये लोग जो है ऐसा जो है तुलसी कहते हैं ऐसी आत्मा सहज नरक में जाए आपको तत्व ज्ञान हुआ नहीं तत्व ज्ञान क्या परवासा से क्या अनुभव है के शब्द से कहने लगे और कर्म को छोड़ दिया ऐसी जो आत्माएं अपने आप ही नरक में चली जाती है। कोई है नहीं। तत्व का मतलब ये होता है कि जो है ब्रह्म शब्द स्वरूप ब्रह्म शब्द वाच्य वेद अने ब्रह ब्रह्म शब्द वाच्यम सब में जो भी है उसमें शब्द स्वरूप ही ब्रह है। चींटी से लेकर के ब्रह्मा पर्यंत उसी परमात्मा का दर्शन होना चाहिए। मुक्ति रूपम स्वरूप मुक्ति रूपम ये ब्रह्म साक्षात्कार है जो अन्यथा रूप है उसको मार के भाई हमारा जो है हम कथा वाचक है

00:37:46:28 हम व्यास जी है कि हम गुरु जी है हम पाठक जी है ये अन्यथा हम पुत्र है बेटा है बेटी अन्यथा रूप है इसको छोड़ के अपने स्वरूप में स्थित हो जाएंगे तो आप ब्रह्म ज्ञानी माने जाएंगे अर्थात अपनी अपना जो आत्मा है वो तो सबकी आत्मा है। अपने आत्म दर्शन सब की आत्मा में करना। सबकी आत्मा का आ अपनी आत्मा में करना है। तो उसका तात्पर्य होता है वो अपने से व्यक्ति विरोध करता नहीं है। यदि तत्व ज्ञानी होते तो विवाद चलता कहां? जी ये उसमें आता है अथवा तो ब्रह्म जिज्ञासा जैसे आजकल जो है वो जो ब्रह्म साक्षात्कारी बन रहे हैं। उनको ब्रह्म ज्ञानी समझ रहे हैं। ब्रह्म हो गए। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है। ये बहुत से लोग मूर्ख है। ये ब्रह्म जानी थी ब्रह्मज्ञ बनेगा। ब्रह्म जानी ब्रह्मज्ञ ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म होता है। ब्राह्मण नहीं बनता। सुन लिया ब्रह्म जानी ब्राह कुछ नहीं है ये जो है निरक्षर भट्टाचारी लोग है इनके विषय में जो है के यदि इनकी बातों को कहने सुनने लगोगे तो समय का ही बर्बादी है तो अर्थात ब्रह्म

00:39:02:04 जिज्ञासा कहेंगे ब्रह्म की जिज्ञासा होगी तो ब्रह्म साक्षात्कार हो गया ऐसा अर्थ निकाल लेते हैं अथातो ब्रह्म जिज्ञासा किंतु वहां भगवान वेदव्यास भाष्य किया है भामतीकार ने कि ब्रह्म साक्षात्कार पर्यंत ब्रह्म साक्षात्कार पर्यंत ब्रह्म की जिज्ञासा होनी चाहिए। जब तक ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हो जब तक ब्रह्म नहीं बनोगे। तो जिज्ञासा को भ्रम मानने लगे। ये लोग जो है जिज्ञासा को ही भ्रम मानने लगे। यही आकर के जो है वो बुद्धि का पर विषय हो जाता है। जी जी और आचार्य सत्येंद्र जी मैं आपसे इस बात पर प्रकाश डालने को का निवेदन करूंगा कि जिससे हम ज्ञान लेने जा रहे हैं उसके ज्ञान की समीक्षा हम कैसे करेंगे? यदि जो ज्ञानी होगा वही ब्राह्मण है वही व्यास है तो जिससे हम भागवत की चर्चा सुनने जा रहे हैं जिससे हम ज्ञान प्राप्त करने जा रहे हैं उसकी परीक्षा हमें लेनी होगी तभी तो हम उसको व्यास के रूप में स्वीकार करेंगे तो क्या यह व्यवहारिक रूप से मतलब तार्किक है यह बात कहना कि जो ज्ञानी होगा वही ब्राह्मण है व्यास के रूप में वही स्वीकार कर लिया जाएगा जो ज्ञानी

00:40:17:13 है इस पर आप कैसे प्रतिक्रिया देंगे ज्ञान की परीक्षा तो वो इनका कहां अध्ययन हुआ है और आजकल तो खैर आज संचार का माध्यम हो गया है तो उससे हम लोग सुनते हैं कि कौन कैसी कथा कर रहा है उससे हम लोग सोचते हैं कि हां इनका कथा का वाचन सही है। ये श्लोकों की व्याख्या भी कर रहे हैं। जो स्तुति अंश है उसको नहीं छोड़ रहे हैं। तो उससे हम लोग पता कर लेते हैं। वैसे पहले तो बहुत कम होती थी जो कथावाचक थे उनको कथा प्रवक्ता कहा जाता था। पहले व्यास शब्द से प्रयोग नहीं किया जाता था कि भागवत प्रवक्ता ऐसा करके कहा जाता था। अब वो भागवत व्यास करके श्लोक जब क्योंकि व्यास तो भगवान के अवतार हैं। व्यास कोई नहीं हो सकता। जिन्होंने वेदम विद्यासति वेद व्यास तो वो व्यास की संज्ञा तो किसी की हो ही नहीं सकती। तो वह तो भागवत प्रवक्ता माना जाएगा और भागवत का वो निर्वचन करने की सामर्थ्य है। उपाधि स्वरूप व्यास स्वरूप स्वीकार कर लिया जाता है। उपाधि प्रतिनिधि हां व्यास

00:41:32:14 जी का प्रतिनिधि मान के अभी जो विद्या भास्कर जी हैं तो उन्होंने उनकी एक शिष्य गौरांगी देवी है तो उन्होंने वो अच्छी तरह से संतों के सानिध्य में रही। उनको ज्ञान हो गया। तो वो विद्या भास्कर जी बता रहे थे कि मैंने कहा कि तुमको जो है भागवत कथा करने का अधिकार नहीं है। तुम्हें क्या करना है? एक भागवत पीठ जो है आप बनाएं। उस पर श्रीमद् भागवत को विराजमान करें। उनकी पूजा करें और जो मंच है उस पर अलग बैठ के अपना जो ज्ञान है जो सत्संग है उसको प्रकाशित कर सकते हैं। तो उन्होंने जो महिला जो महिलाएं हैं उनके लिए भी इस तरह से अधिकार नहीं है और जो ब्राह्मण जो वेदज्ञ ब्राह्मण जो वेदांग का जिन्होंने अध्ययन नहीं किया है वो भी अधिकारी नहीं है। ऐसा जो देव ये वासुदेवाचार्य विद्या भास्कर जी जो कि अयोध्या के बहुत प्रतिष्ठित और बहुत विद्वान है उनके द्वारा ये सफाई दी जा रही है। उनसे किसी ने कहा आपकी भी शिष्या जो भागवत कर रही है। वो बोले मैंने तब से उससे जो मना कर दिया कि मेरे मेरा नाम मत लो। क्योंकि जो मैंने जो बताया था उसका तुमने पालन नहीं किया। तुमको व्यास पीठ

00:42:47:15 जो है बना करके उसकी पूजा करनी चाहिए और पास में बैठकर के अपना जो ज्ञान है उसको सत्संग के रूप में प्रकाशित करें। उसी प्रकार से अन्य किसी को ज्ञान है अगर यदि वह अधिकारी नहीं है तो वो व्यासपीठ इस तरह से निर्माण करके उसका विधिवत पूजन करके उसको प्रणाम सभी लोग करें और बाकी जो किसी भी जाति का हो महिला हो पुरुष हो वो सत्संग और प्रवचन कर सकते हैं। उसमें किसी कोई धर्म की बाधा नहीं। जी। और ज्ञान तो ये हम लोग इस तरह के ज्ञान के चक्कर में अगर पड़ेंगे कि हां कौन योग्य है अयोग्य है तो उसका जो श्रोता है तो उनके लिए जो पहले पूर्व में जो श्रोता रहे जैसे नारद जी है उन्होंने भी सनकादी से कथा सुनी जो 88 हजार ऋषि थे वो सब जो है विद्वान थे सभी वेद वेदांकों के जो है जानकार थे वो भी कथा सुनते थे तो पहले तो 88000 ऋषि एक तो ऋषि नहीं 880001 एक जगह बैठकर के और सू जी से कथा सुन रहे हैं तो वो उनको परीक्षण का परीक्षण की जरूरत ही नहीं वो वैसे ही समझ जाते थे कि हां कौन योग्य है कौन अयोग्य कौन अधिकारी है तो अधिकारी का जो जो व्याख्या की गई है कौन

00:44:02:16 है वो हम श्रीमद् भागवत के महात्म और शास्त्रों से ही वो ज्ञान कर सकते हैं और उसकी उपयुक्तता जो है आप अपने हिसाब से या अन्य विद्वानों के संसर्ग से उसको पता कर सकते हैं। हां कि इनकी योग्यता है कथा करने की है नहीं है ये पता लग सकता है। इसमें आचार्य जी इसमें इसमें ना एक जो समस्या है जो एक ही पक्ष जो कुतर्क करने वाला जो पक्ष है वही खुद समस्या को बताता भी जैसे आचार्य श्री ने अभी आपने वो उदाहरण दिया कि जन्म जन्म जन्मना जाते शद्र वाला तो उसी में उन्होंने जन्म से मान लिया उसके बाद कर्म से भी मान लिया इसी तरीके से एक तरफ यह कहते हैं कि जो मतलब क्या कहते हैं आवश्यक नहीं है कि हर कोई जो कथा करने वाला है आजकल जो जिसको ब्राह्मण के स्वरूप में जो है बिठा के व्यास के रूप में और व्यास के प्रतिनिधि के रूप में और कथा वक्ता जितने लोग हैं जो ब्राह्मण कुल से ही आते हैं और कथा कर रहे हैं कि वो उन सब पर वो आचरण लागू नहीं होते। और दूसरी ओर खुद ही कहते हैं कि आजकल ऐसे आचरण वाले क्या ब्राह्मण मिलते हैं? तो इसमें हमारा पक्ष यह होता है लोगों को समझाने का कि

00:45:17:25 भाई इसीलिए तो ब्राह्मण एक वर्गीकरण किया गया। जैसे कि अभी रामदेव जी भी हैं। वो भी अनेक न्यूज़ चैनल्स के मंचों से और इस तरह के कुछ अंटस शंट बयान दे रहे हैं जिसमें कि कह रहे हैं कि अरे ऊंचनीच करना गलत है। शंकराचार्यों के द्वारा संतों के द्वारा आचार्यों के द्वारा ऊंचनीच शब्द। जबकि अब जब ऊंचनीच की बात ही आएगी तो उनसे यह पूछा जाए कि भाई कोई व्यक्ति आप अपना जब योग दिखाते हैं तो आप ऊंचे पर क्यों बैठे हैं? आप जिस जगह पर बैठे हैं वहां पर हर सामान्य व्यक्ति क्यों नहीं बैठ सकता? हर रास्ता चलने वाला क्यों नहीं बैठ सकता? तो उत्तर यही आएगा कि हर रास्ता चलने वाला वहां पर वक्ता बनने योग्य है कि नहीं? योग शिक्षक बनने योग्य है कि नहीं? यह जांचना पड़ेगा और रामदेव जी जांचे परखे हुए हैं इसलिए वह बैठते हैं। है ना? तो इसका अर्थ क्या हुआ कि जांचने में समय ना गवाना पड़े इसलिए एक कैटेगराइज कर दिया गया कि भैया अगर वो इस कुल से आता हो इस इस वर्ण से सद्ध हो तो उसको यथा योग्य अपनी जांच पड़ताल करके भी आप व्यास के रूप में स्वीकार कर

00:46:32:26 ले। है ना? जिससे कि इस समय को इस श्रम को बचाया जा सके कि हर बार किसी भी कार्य के लिए व्यक्ति को चयन करने के से पहले उसकी पूरी संपूर्ण जांच की जाए। जैसे कि रामदेव जी कई ऐसे उनके चलने वाले जो उनके प्रकल्प है जो भी व्यापार इत्यादि के प्रकल्प है उसमें कई जगह ऐसी होंगी जहां पर रामदेव जी का ही आधिपत्य होगा। उनसे इत्र उनसे इतर और किसी का आधिपत्य नहीं होगा। तो वहां पर रामदेव जी के अनुसार भी ऊंचनीच स्वीकार की गई। तो इस पर आप कैसे प्रकाश डालते हैं आचार्य श्री वो थोड़ा सा बता दें।

00:47:15:13 आचार्य ज्ञान जी अच्छा अच्छा अच्छा तो ये है कि जो पहले परंपरा थी अब भी परंपरा है राजस्थान में तो जब हम श्रीमद् भागवत की कथा कहलवानी है तो पहले आचार्य जी का गोत्र क्या है कहां के हैं कैसे हैं वहां जाते हैं पूरा उपपचार पूजन करते हैं आचार्य जी और जाकर के जो है वो नारियल देके आते हैं। जैसे आचार्य जी वहां नारियल पकड़ लेंगे तो वचनबद्ध हो जाते हैं कि हमें जो है यहां कथा करने जाना है। जी और यजमान है वो उतना धना नहीं है। जो वचन दे दिया उसी के यहां जाएंगे। चाहे अंबानी क्यों ना आ जाए पर उसके वहां भी वो नहीं जाएंगे। तो सबसे पहले गांव में जाते थे जहां आचार्य जी रहते थे वहां जाते थे उनका पूजन करते थे नारियल देते थे ये परंपरा थी आजकल नहीं है कि बस जो है फोन से संपर्क कर लिया कि हमारे यहां भागवत आप आ जाओ इतने इतने तारीख तक आपकी बुकिंग है जब ये सोशल मीडिया बीच में आ गई ना तो परंपरा समाप्त हो गई जी

00:48:30:24 नहीं भूला जन श्रति हमारे मूल में जो परंपरा है वो वेद के द्वारा ही प्रमाणित कहा भी है कि जो है जो हमारी परंपरा है और जिस परंपरा से हमारे पूर्वज चले हैं उसी के अनुसार भी चलना चाहिए तो यते पित याता याता पितामता मार्गते जिस पर हमारे माता पिता पिताम चले हो गुरुजन चले हो पूजन चले हो संत लोग चले हो उसी मार्ग पर चलना चाहिए हम सुन रहे थे कि जो है विद्वान यदि विपरीत अर्थ करने लगे विद्वान है और लोभ से मोह से जो है कहीं धर्म का आचरण छोड़ने लगे जबकि न जात भया ना लो धर्म हेतु ना काम से ना क्रोध से ना लोभ से अपने धर्म का प्रत्याग नहीं करना चाहिए किंतु किसी ने राजनीति महत्वाकांक्षा के कारण अथवा अन्य प्रयोजन के कारण अपने मनमाने ढंग से व्याख्या की तो साक्षरा राक्षसी केवलम यदि साक्षर विपरीत आचरण करने लगेगा तो साक्षर

00:49:46:00 का विपरीत क्या हुआ राक्षस उसकी राक्षस में गणना हो जाएगी तो आजकल जो ऐसा है कि अपना थोड़ा YouTube के सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ जान लिया कुछ सुन लिया और मैं बार-बार कहता हूं हमारा जो वेद है वो कभी भी जो है पैसा देकर के नहीं पढ़ा कहा जाता है। हमारी जो भागवत है ज्योतिष वेदांग है। ये इनका कभी क्र भी नहीं होता है और ना ये जो है पैसा देकर के पढ़े जाते हैं। किंतु वृंदावन में भी जो है चल गए छ महीना का एक वर्ष का लोग कोर्स कर जाते हैं। साप्ताहिक विधि से द 50 लोग पढ़ लिए और व्यास गद्दी पर आके बैठ गए। फिर वही जो नाचना गाना हर्ष स्वामी कृपाती जी महाराज कहते थे कि कीर्तन की एक विधि है जिसमें प्रणव नम शब्द का प्रयोग आ गया उसका कीर्तन नहीं हो सकता ओम नमः शिवाय का कीर्तन नहीं होगा ओम नमो भगवते वासुदेव का कीर्तन नहीं ओम नमो नारायण का भी गाजे वाजे के साथ कीर्तन नहीं हो सकता केवल नाम शिव हरि राम सीता केवल नाम उसका आप कीर्तन कर सकते हैं

00:51:01:08 और कहीं इसमें प्रणव और नम शब्द का प्रयोग हो गया तो माय के द्वारा कीर्तन नहीं कर सकते किंतु इन्हें ज्ञान है नहीं चाहे ब्राह्मण हो या ब्राह्मणतर हो उसको मर्यादा तो रखनी होगी मर्यादा ज होगी जब गुरुकुल में 12 वर्ष पर्यंत रह के उसने निवास किया होगा जब धर्म शास्त्र का ज्ञान उसके लिए होगा आजकल क्या है कि जो है गुरु ग्रह पंच वेदांत समाधा कुट जैसे होता है ना कि जो है मुर्गा यदि ना बोले तो भोर नहीं होगा ऐसा कहते है चार बजे मुर्गा जो है बोलता है कुकुद है ये गुरु पंच बैठ गए दो चार छ दिन संगत किया और समझ गए हम विद्वान है पंच केवल पांच दिन ही पढ़े हैं। वेदांत शास्त्र और तीन दिन में वेदांत पढ़ लिया। अभी समाज में जाग तर्क वितर्क कुत संभावना संभावना जाग फैला देते हैं। ये जो है अपनी कुतों के द्वारा जो समाज को

00:52:16:19 भ्रमित करते हैं। समागथा कुपुट पाद कुट कुकुर मु तो ये ऐसे लोग हैं इनके द्वारा धर्म की रक्षा नहीं होनी ना कथा कितनी भी कहेंगे वो कथा से कोई लाभ नहीं मिलने वाला है जब तक हमारा समाज जागरूक नहीं होगा जो लिखा प्रेरणा अर्थ उसमें लिखा कि धर्मात महाराज हम पढ़ रहे थे कि वेद प्रतिपादित जो विधि निषेध है और वेद प्रतिपादित जो प्रवृत्ति निवत्त है। जब जिसको वेद के द्वारा ज्ञान होगा अर्थात वेद विधि के द्वारा जो बात कही जाएगी उसी के द्वारा धर्म अधर्म का पता चलेगा। जब मूल में हमारे वेद का ज्ञान तो क्या धर्म है क्या अधर्म है तो कैसे बात पूरी हो सकती है जी आचार्य जी फिर इसमें जो वो एक कुछ भ्रम फैले हुए हैं जो कि मूल एक समस्या भी है। कई उनके बारे में ठीक से पता नहीं होने के कारण जैसे व्यास जी जो है खुद एक दासी पुत्र कहे मतलब एक उनके बारे में प्रचार किया जाता है कि वो ब्राह्मण नहीं थे व्यास जी ब्राह्मण नहीं थे वाल्मीकि जी

00:53:31:22 ब्राह्मण नहीं थे और जो रोमहर्षण जी थे वो ब्राह्मण नहीं थे और कोई एक नाम और लिया था तो इन इन चारों के विषय में थोड़ा थोड़ा प्रकाश डाल दें शास्त्र सम्मत कि किस तरीके से इनके बारे में मिथ्या प्रचार किया गया है। हां सबसे अधिक जो भयंकर प्रचार करते हैं सूत को प्रमाण मानकर करते हैं लोग। जी देखिए ये सूत शब्द है। एक सूत शब्द उसको कहते हैं जो अपना रथ चलाता है उसका नाम भी सूत है।

00:54:06:12 जो सूत है वो भी उसको सूत कहेंगे। रथ चलाने वाले के लिए और एक जो उसको सूत कहते हैं [संगीत] क्षत्रिय के द्वारा ब्राहणी में उत्पन्न होता है उसका नाम सूत है जी किंतु सूत जी से इसका कोई लेना देना नहीं है सूत जी से इसका कोई लेना देना नहीं है तो मैं बहुत संक्षिप्त में जो विष्णु पुराण का जो है बतला देता हूं आचार्य श्री सूत जी और रोम जी एक ही एक ही है ना जो है सूत जी संज्ञा है नाम है उनका अच्छा वोति परक शब्द नहीं है ये रोम भी उनकी संज्ञा है लोम जो है सूत जी की संज्ञा है सूत शब्द जो है ना जो पुराणों का प्रवक्ता हो वक्ता हो ब्राह्मण तो जाति से हो सकता है सबसे विशिष्ट होता है उसका नाम सूत होता है तो वो जो सूत है उनका नाम है वो संज्ञा नहीं है जैसे ब्राहणी से उत्पन्न हो गए उसमें कहा है कि जो है महाभारत में ही जब महाराज पृथ्वी यज्ञ कर रहे थे तो अग्निकुंड से सू जी महाराज उत्पन्न हुए हैं। तो शिव कहते हैं महाभारत में कहां पर है आचार्य श्री

00:55:21:22 हां हां ये जो है उसमें भी आया है भागवत में भी आ गया है और वायु पुराण में भी है कि यज्ञ वर्तमानु महाराज के द्वारा यज्ञ हो रहा था प्रथम वर्णम तो वहां क्या होता है कि हसा तम बहस्पते तो वहां इंद्र को उदेश करके जो है हानस मतलब सामग्री छोड़ी जाती है उसी क्षण जो है बृहस्पति को उदेश करके भी सामग्री छोड़ दी जाती है इंद्र क्षत्रिय है और बृहस्पति ब्राह्मण है तो दोनों शांत एक साथ जो उसमें जाकर के जो है मिली तो उससे क्या होता है जो इंद्र तथा सूत उसमें जो अग्नि से उत्पन्न कौन हो गए सूत महाराज हो गए इस ढंग से वो जो है उनकी उत्पत्ति है अग्निकुंड समता सूतो निर्मल मानसम अग्निकुंड से उत्पन्न होने के कारण ये जो है जो सूत जी है वो निर्मल मानस थे और शास्त्रज्ञ थे पुराण देखता थे जो लोम हर्षणा इनहीं को लोम हर्षण कहते हैं और भगवान

00:56:37:10 भगवान वेदव्यास जी के जो है ये प्रधान शिष्य है सूत संिता इनके द्वारा बनी हुई है पुत्र सौती उग्रवा जब बलराम जी द्वारा वध हो गया तो इनके पुत्र कौन है सौती यहां पे मैं यहां पे मैं एक बात कहूंगा कि ये ये बात भविष्य में आनी थी इसीलिए बलराम जी के द्वारा वहां पर लीला पूर्वक पहले ही दिखा दिया गया कि शिवसूत जी को लेकर के भ्रम हो गया है ना तो उनको जैसे जैसे आज के कलयुग में होने वाले कुतर्कों को जानते थे भागवतकार तो वो लीला पूर्वक वहां पर पहले ही प्रस्तुत कर दिया गया कि सूत जी को ले भ्रम होगा तो वो बलराम जी ने वो वो स्थिति दिखाते हुए उस भ्रम का निराकरण वहां पर प्रस्तुत किया गया भागवत में और आप एक चीज मैं और क्लियर कर दूं जिससे कि जो श्रोता है दर्शक है वो भी समझ जाए कि जैसे यहां पर जो आचार्य श्री ने उत्पत्ति बताई है कि जो इंद्र देव और बृहस्पति देव के निमित्त जो सामग्री डाली गई तो क्योंकि इंद्रदेव को ब्राह्मण वर्ण में जो जब देवताओं का वर्ण होता है तो उसके अनुसार इंद्रदेव ब्राह्मण वर्ण में आते हैं और क्षत्रिय वर्ण में बृहस्पति

00:57:52:21 ब्राह्मण वर्ण क्षत्रिय इंद्र इंद्रदेव क्षत्रिय में आते हैं और बृहस्पति ब्राह्मण में तो उनके निमित्त डाली गई सामग्री से उत्पन्न होने के कारण उनको सूत संज्ञा दे दी गई तो इसमें उनको जो वर्ण है चतुर्थ वर्ण में इसलिए नहीं लिया गया क्योंकि यह जो उत्पत्ति है यह मानसिक संसर्ग के द्वारा नहीं हुई है। ये दय ये दय संसर्ग के द्वारा उत्पत्ति उनकी हुई है। इसलिए उनके उनकी उत्पत्ति को अभिव्यक्त करने के लिए संज्ञा तो सूत्र दे दी गई उनको। परंतु उनके ऊपर वह विधि निषेध लागू नहीं होते हैं जो मानसिक संसर्ग जब होगा और उसमें ब्राह्मण ब्राहणी में और क्षत्रिय द्वारा उत्पन्न पुत्र होगा तो उस पर जो विधि निषेध लागू होंगे वो विधि निषेध उन पर लागू नहीं हुए वो एक औपचारिक रूप से उनको एक उनकी स्थिति उनकी उत्पत्ति कैसे हुई थी उस कथा को अभिव्यक्त करने के लिए उनको संज्ञा दे दी गई इतना मात्र अहिल्या दोप की तारा कुंदी मंदोदरी तथा आपकी द्रोपदी के पांच पति होते हुए भी कन्या ही रही क्यों से विधि लागू नहीं होता है अच्छा रही

00:59:08:02 व्यास जी की बात तो व्यासम वशिष् शक्ति पौत्र कल्पसम परा वंदे सुख तात तपो निधि जी व्यास जी वशिष् के प्रपत्र है जो वशिष्ठ है उनके प्रपत्र है शक्ति के पौत्र है और पराशर जी के पुत्र है और सुखदेव जी के पिता है। जी ये हो गया। इनकी वंश परंपरा क्या रही कि ब्रह्मा जी से वशिष्ठ जी हुए। वशिष्ठ से शक्ति और शक्ति से परासर और परासर से व्यास जिसको कृष्ण भी कहते हैं और उनके पुत्र हुए सुखदेव जी। यहां कहीं अब ब्राह्मण वाली बात आ रही है क्या? ब्राह्मण वाली बात संभता वहां आ जाती है जो एक व्यवस्था थी कि द्वापर तक जो कन्या है वो अब ब्राह्मण भी है यदि तो भी ब्राह्मण के द्वारा उसमें जो पुत्र उत्पन्न होगा तो ब्राह्मण में गिना गिना जाएगा ऐसा कुछ जो पूज्य जगुरु शंकराचार्य जी वो भी बताते तो क्या व्यास देव जी की माता को लेकर के वो एक भ्रम फैला हुआ है कि उनसे उत्पन्न होने के कारण व्यास देव जी को जो है अब्राह्मण में गिनते तो वो बात है वो

01:00:23:03 भी जो है अप्सरा थी वो कोई जो है निषाद की पुत्री नहीं थी वो अप्सरा थी पिक्चर रिसीव हुए है उनकी है वो पूरा हमने वीडियो में डाल दिया है वो कहीं भी कुछ भी नहीं है जब उनका सत्यवती का और जो पाराशर जी का सहयोग भी नहीं है केवल मात्र से जो पांच तरह के पुत्र भी होते दृष्टि से भी होता है स्पर्श से भी होता है हमारे शारीरिक संबंध की सृष्टि नहीं है ये और एक क्षण में ही जो है तुरंत पुरुष रूप में हो गए वो और वेदों का जो भास करने लगे तो इनका जो जन्म कर्म दिव्य होता है इनको जाति से नहीं जोड़ा जाता भगवान श्री राम को जाति से नहीं जोड़ सकते कृष्ण को जाति से नहीं जोड़ सकते परशुराम जी को जाति से नहीं जोड़ सकते उसी भगवान विष्णु का अवतार कौन है भगवान वेदव्यास है जी जन्म कर्म दोनों दिव्य है येति से जोड़ते हैं अज्ञानी लोग अज्ञानी है। जी

01:01:27:15 जी अ वाल्मीकि जी के बारे में बता दिया है आचार्य श्री आपने। हां विस्तार से बताया है। वाल्मीकि जी जो है ब्रह्मा जी के पुत्र प्रचता थे। उनके पुत्र प्रास करके है उसमें कुछ संदेह नहीं है तो ब्राह्मण ब्राह्मण ब्राह्मण होते हैं और मन मान मनु की संतान मानव होते हैं तो ब्राह्मण कोई संदेह नहीं है ये तो अपनी कप कल्पना ही है जी जी अच्छा आचार्य श्री इसमें

01:02:12:21 एक कुतर्क और आता है। जो समस्या फैलाई जा रही है यह जो उन्माद बनाया जा रहा है इसको इसमें कुतर्क कर रहे हैं। रामदेव जी की बात करूंगा मैं नाम लेके बात करूंगा। उन्होंने कुतर्क किया है कि यदि जो अमुक अमुक वर्ण के लोग व्यास गद्दी पर नहीं बैठ सकते या ब्राह्मणोचित कार्य नहीं कर सकते तो फिर ब्राह्मणों को भी अमुक अमुक वर्ण के कार्यों से हट जाना चाहिए। ऐसा क्यों है कि वह तो सभी क्षेत्रों में कार्य कर सकते हैं। और जब चतुर्थ वर्ण के लोग या अमुक अमुक वर्ण के लोग जब वो कार्य कर रहे हैं जो के ब्राह्मण के लिए स्पेसिफाई है तो उसमें आपको आपत्ति है। तो इसमें हम तो यह पक्ष रखते हैं कि भाई देखिए जब ऐसा होना तो नहीं चाहिए कि ब्राह्मण जो है अपने से जाकर के व्यापार करने लगे। ब्राह्मण जो है परचून की दुकान खोले, मेडिकल स्टोर खोले या जो है फौज में चला जाए या इंस्पेक्टर बन जाए ऐसा होना नहीं चाहिए। प्राथमिकता तो प्रथमता तो ब्राह्मण का यही है कि वो ब्राह्मणोचित माध्यम से ही अपना आजीव कोपार्जन करे। बिल्कुल बिल्कुल परंतु यदि वो

01:03:27:22 करता भी है तो उसको हीन ब्राह्मण पतित ब्राह्मण ही माना जाएगा। कर्म संकरता का दोष तो लगेगा ही उसप भी। बिल्कुल बिल्कुल लगेगा। मगर जब जब आज हम संक्रमण काल देख रहे हैं कलयुग में जब हमारी जो व्यवस्थाएं लागू नहीं है धर्म शास्त्रों के अनुसार नहीं है तो ऐसी स्थिति में यदि किया भी जा रहा है तो धर्म जहां से धार्मिक ज्ञान उत्पन्न हो रहा है केवल उस क्षेत्र को संरक्षित रखने के लिए आजोपार्जन के निमित जीवन को संरक्षित रखने के लिए नहीं वो जो धर्म की जो व्याख्या है वो बदल ना जाए धर्म ब्रह्म की व्याख्या में दोष ना आ जाए। रामपाल जैसे लोग खड़े ना हो जाए जो धर्म का सत्यानाश करें। इस कारण से धार्मिक ज्ञान बताने वाली जगह पर उस चीज को बिल्कुल क्या कहते हैं? कठोरता के साथ वहां पालन करने के लिए कहा जा रहा है कि सारे सेक्टर्स में तो आज एक दूसरे के उसमें कूद ही रहे हैं। सभी वर्ण के लोग क्षत्रिय वैश्य के कार्य कर रहा है। वैश्य क्षत्रिय के कार्य कर रहा है। शद्र भी सब जगह अपॉइंट हो रहे हैं। यहां तक कि आधुनिक शिक्षा में भी वो शद्र पढ़ाते हैं। अगर चतुर्थ वर्ण का पढ़ाता है या जो वैश्य पढ़ाते हैं तो उससे भी कोई आपत्ति नहीं है। केवल एक

01:04:42:24 धर्म की और ब्रह्म की व्याख्या जो है उसको संरक्षित रखने के लिए अपने सही स्वरूप में इस कारण से वहां पर केवल इस बात का ध्यान कठोरता के साथ रखने का कहा जाता है हमारे आचार्यों के द्वारा कि वहां पर भाई ब्राह्मण ही वो कार्य करे तब लोग भाजी तो मार रहे हैं अन्य क्षेत्रों में मारो मगर कम से कम धर्म की व्याख्या को छोड़ दो तो इसमें जो है आप थोड़ा सा प्रकाश डाल देखिए ऐसा है कर्म क्षेत्र संग्राम ब्रह्मचर तपो मंत्र त ब्राह सबसे पहले है जो वैश्य है उनका कृषि धर्म था गोपालन था गोचारण था और चतुर्थ वर्ण का सेवा धर्म था और क्षत्रियों का जो है युद्ध करना था। ब्रह्मचर्य तप है, मंत्र है और ज्ञान है। यह सब ब्राह्मणों के धर्म थे। तो सबसे ब्राह्मण का पठन पाठन धर्म था। यज्ञ करना कराना धर्म था और दान लेना

01:05:58:00 दान देना धर्म था। यदि इसके अलावा दूसरा अपनाता है तो उसमें किया कि विशेष परिस्थिति है प्राण संकट में है तो क्षत्रियों की वृत्त को ग्रहण कर ले और उससे ना जो है की वृत्त गित कर सकता है चौथे वर्ण की नहीं ये बात उन्होंने कही और अन्य वृत्त ग्रहण करने के बाद में श्रेष्ठ ब्राह्मण नहीं कहलाता वहां क्या होगा सकल भय शंकर आता है ना उसमें किस में आता है उसमें भगवान तुलसीदास जी कह रहे हैं कि कलयुग में जितने भी लोग हैं सब वर्ण शंकर हो गए हमने सोचा कि ब्रह्मा से पर्यंत आज तक कहीं हमारे परिवार में बेकार नहीं तो हम भी शंकर कैसे हो गए तो बड़ा अंदर से गिरानी हुई जब अध्ययन किया तो कहीं हो जाता है कि जाति सांक्य जाति से भी सांकर हो जाता है कि ब्राह्मण है उसे अन्य वर्ण की जाति से कर लिया जाति सांकर हो गया एक होता है वित्त सांकर्य वित्त सांकर यही है जो रामदेव जी जो कह रहे हैं कि ब्राह्मण शरीर है और आपने जो है सूअर पालन केंद्र खोल दिया मत्स्य पालन केंद्र खोल दिया और मांस का विक्रय करने लगे

01:07:13:03 अथवा शराब की दुकान खोल ली ये आपका जो है क्या है ये वित्त सा है ये सा श्रेणी में आता है ये और एक होता है विद्या शरी ब्राह्मण अन्य किसी के द्वारा ब्राह्मण ने जो है किसी अन्य के द्वारा विद का स्वाध्याय कर लिया विद्या हो जाएगा तो ब्राह्मण की जो जीविका है वही जीविका है पढ़ना पढ़ाना है जब उससे काम नहीं चलता जब शास्त्र आदिक क्षति की करो फिर वैसे कर सकते हो ये विशेष परिस्थिति में सामान्य परिस्थिति में नहीं जी तो इसमें इसमें ही जो कुतर्की है वो ये सवाल कर देते हैं ना कि जब काम नहीं चल रहा है तो जैसे ब्राह्मण क्षत्रिय की वृत्ति का उपयोग कर सकता है आलंबन ले सकता है तो काम ना चलने पर शूद्र या अमुक अमुक क्षत्रिय वैश्य क्यों नहीं ब्राह्मण की वृत्ति का आलंबन ले सकते हैं तो वही मैंने उसमें बोला कि भाई जहां धर्म की व्याख्या की बात आ रही है प्रामाणिक उसको केवल संरक्षित रखने के लिए ये नियम लागू बाकी तो कलयुग है ही तो उसमें थोड़ा सा बता दीजिए कि यदि ब्राह्मण आप अपने मतलब जो जो आचार्य की वाणी के रूप में भी हमें मिल जाए कुछ कि ब्राह्मण जो है वो तो अमुक अमुक स्थिति में अमुक अमुक

01:08:28:12 सभी व्यक्तियों का आलंबन ले सकता है। परंतु फिर अन्य वर्ण वाले वो सभी यही कहेंगे ना कि भाई हम क्या कहते हैं हमारा काम नहीं चल रहा है। तो इसलिए हम कथा माच रहे हैं। तो इस पर क्या किया जाए? नहीं जो है वो कथा का जो विषय है वो धर्म शास्त्र फर्क है। तस् प्रमाण कर्मसी उसमें शास्त्र वाक्य वो मानना पड़ेगा। इसमें अपनी मनमानी या व्यवहारिक सत्ता नहीं है। जी वही वो परमार्थ वही वाली बात कि जब शास्त्र की बात आएगी तो वो कम से कम वो शास्त्रों के हिसाब से चले कि शास्त्र कौन पढ़ेगा पढ़ाएगा वो वाली बात ये तो परमार्थ का विषय है जी व्यवहार का नहीं है ये तो ये व्यवहारिक विषय है जी ठीक है आचार्य श्री बहुत अच्छा लगा आप आए आपने समय निकाला हमारे लिए हम अल्पज्ञों के अज्ञानियों के लिए आपने समय दिया अपना और मुझे लगता है कि बहुत सारी चीजें जानने को मिली होंगी दर्शकों को और आचार्य श्री का चैनल है डॉक्टर ज्ञानेंद्र शर्मा नाम से वहां पर आचार्य श्री भी यथावत रूप से धर्म

01:09:43:13 के स्तंभ को खड़ा कर रहे हैं। आप जो है वहां पर जाकर के उनकी दिव्य वाणी को दिव्य वाणी से स्वयं के जीवन का कल्याण कर सकते हैं। अ बस इसी के साथ हम सब आपसे जो है अनुमति चाहेंगे। आचार्य श्री आपसे भी अनुमति लूंगा और आपके आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आचार्य श्री और जी ठीक है आचार्य जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका पधारने के लिए।

01:10:18:19 सभी को जय श्री राम। चरण आचार्य जय जय जय [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:10:37 · 04 Jul 2025

#इटावा प्रकरण :‌ समस्या या राजनीति-आचार्य ज्ञानेंद्र जी आचार्य सत्येंद्र जी

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