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00:00:01:20 सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक से होंगे और अपने से सभी छोटों को ढेर सारा प्यार आशीर्वाद और सभी वरिष्ठ हैं जो प्रणम में है जो सभी को यथोचित अभिवादन देर ना करते हुए क्योंकि ऑलरेडी आज लेट है मेरे लेट होने की कारण को मैं आशा करता हूं आप सभी समझते होंगे।

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→ Used in: B · Video रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #5 अध्याय 3 का #श्लोक #gita #gitagyan at 0:02 ↗

00:00:35:22 तो देर ना करते हुए सबसे पहले हम जो बुलेट पॉइंट्स हैं अ जो चौथा एपिसोड हमारा हुआ है जिसमें कि हम चैप्टर तीन के 38वें चैप्टर तीन के तीन की जो शुरुआत है उसको हम लोग पढ़ेंगे। तो बुलेट पॉइंट्स में हमने पिछले एपिसोड में जाना था। अर्जुन ने भी ठीक वैसा ही प्रश्न किया जैसा मार्कंडेय पुराण में जो मुनि की कथा है जिनके पितर उनको दर्शन देते हैं और यह कहते हैं कि भाई तुमने तुम इस तरह से विरक्त हो गए हो और तुमने सभी जो कार्य हैं कर्म है उनको छोड़ दिया है तो वहां पर जो मुनि होते हैं रुचि मुनि थे संभवत उनका नाम तो वो अपने पितरों से कहते हैं कि जब मैं ऑलरेडी कर्मों से कर्मों के बंधन से मुक्त हो गया हूं तो तुम मुझे मुझे दोबारा कर्म में लिप्त होने को क्यों कह रहे हो? तो वहां पर उनका अभिप्राय था कि कर्म ना करने से अच्छा होता है कर्म करना परंतु आसक्ति रहित होकर। और वहां पर उनका कहना था कि व्यक्ति कर्म मार्ग पर चलते

00:01:51:01 हुए ग्रस्त होते हुए भी मुक्ति को प्राप्त हो सकता है। तो ऐसा ही प्रश्न यहां पर चैप्टर तीन की शुरुआत में अर्जुन जी ने किया भगवान श्री कृष्ण से। अब मार्कंडेय पुराण में इस कथा के आधार पर रामपाल और उसके मूर्ख अनुयाई यह कहते हैं कि अ ये देखो देखो पितर जो जब व्यक्ति खुद जो है अविद्या से दूर हो गया है कर्म बंधनों से दूर हो गया तो पितर देखो दोबारा घसीट रहे हैं। जबकि दूसरे अध्याय में भी और यह जो तीसरा हम लोग अध्ययन करने जा रहे हैं, इसमें भी कई बार उसने यह माना है कि कर्म यानी गृहस्थ होते हुए भी गस्थ सांसारिक संसार में रहते हुए भी व्यक्ति यदि आसक्ति रहित कर्मों को करने लगेगा तो वह भी मुक्ति पाएगा। ठीक है? तो हम बुलेट पॉइंट्स को ले लेते हैं। सबसे पहले इसमें यहां पर भी चैप्टर तीन की शुरुआत में भी चैप्टर तीन की शुरुआत हम निकाल लेते हैं। चैप्टर तीन की जो शुरुआत है उसमें भी इसने जो अर्थ है जहां पर कर्म

00:03:06:02 आया है कि कर्म हमको क्या शास्त्र सम्मत कर्म हमको किस तरह से करने होते हैं उस उसको उनको करते समय हमारे अंदर क्या भावना होनी चाहिए जैसे कि मान लीजिए कि विवाह तो विवाह को करते समय हमारी भावना क्या होनी चाहिए हमारे मन में किस तरह का होना चाहिए क्या कर्म से मिलने वाले जो भोग हैं उसमें उसमें आसक्ति होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए। तो ये सब बताया गया है यहां पर। परंतु ये हर जगह जहां पर कर्म की बात हो रही है वहां पर भक्ति कर्म कर देता है रामपाल। तो ये इसका एक ढोल चल रहा है लगातार और अगर जहां पर भी कर्म की बात हो रही है वहां ये भक्ति कर्म कह देता है। यानी कि भक्ति कैसे करनी है और क्या सोचते हुए करनी है ये बताया गया। बाकी जो जीवन के अन्य कर्म है जो शास्त्रों द्वारा वर्णित है कि तुम्हें ऐसे करना है विवाह ऐसे करना है इससे करना है उससे करना है ये सब शास्त्रों की जो आज्ञा है जिसके लिए कहा गया है कि 16 23 और 24 में कि तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के लिए एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। तो ये सब जो चीजें बताई गई है कर्मों के लिए ये इसमें भी कह देता है कि भक्ति ऐसे करनी है। तो अगर भक्ति ऐसे करनी है तो व्यक्ति को अपने जीवन में कर्म किस भावना के साथ करने हैं यह

00:04:21:08 कहां पर बताया गया है? यह बहुत बड़ा एक फैक्ट है जो रामपाल ने कहीं पर भी बताया ही नहीं है कि आपको अपने जीवन में कर्म नॉट भक्ति कर्म क्या सोचते हुए करने हैं। पहली बात दूसरी बात इसी में ये पष्ठ संख्या 38 चल रही है गमा गीता की पृष्ठ संख्या 38 और उसके पहले श्लोक में अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से यही कहा है कि भाई वही मार्कंडेय पुराण की तरह कि जब मैं कर्मों से जब कर्मों से विरक्त होने में ही मुक्ति है। कर्म से मतलब जो मन में जो कर्मों से दूर हो जाने की जो कर्म बंधन से ही मुक्ति का नाम मुक्ति है तो फिर आप मुझे कर्म में क्यों जोड़ रहे हैं? ये करने को क्यों कह रहे वो करने को क्यों कह रहे हैं? तो भगवान श्री कृष्ण ने यहां पर बताना शुरू किया और जो भी उन्होंने बताया मगर इसने इसने झोल क्या किया वो हम बात कर रहे हैं मोटे उसको ही बुलेट पॉइंट्स का नाम दिया है। तो सबसे पहले तो इसने प्रत्येक जहां पर कर्म की बात हो रही है उसको भक्ति कर्म कर दिया। दूसरी बात इसके आगे

00:05:24:13 इसने माना है कि जो क्योंकि ये कहता है ना कि ब्रह्मा विष्णु महेश सत रज और तम गुण है। गुण के अधिष्ठाता नहीं है या गुण के वो उस डिपार्टमेंट को संभालने वाले नहीं है। वो स्वयं गुण ही है। ठीक है? तो अभी यहां पर इसने क्या किया है? पृष्ठ संख्या 38 में कि इसने ये स्वीकार किया है कि जीव तीनों देवताओं से निकल रहे गुणों के प्रभाव से गलत कर्म करता है। पाप कर्म करता है। तो तीनों देवताओं से निकल रहे गुणों के प्रभाव से। ठीक है? गुण उनसे निकल रहे हैं। देवता स्वयं गुण नहीं। और यदि वह स्वयं गुण है तो निकल भी वही देवता रहे तो फिर बात बनेगी नहीं। ठीक है? तो यह हम लोग करते चलेंगे। इसमें कई प्रकार से इसकी ही बातों से इसी की बातों का प्रतिकार होगा, खंडन होगा। जो मूर्खता की पराकाष्ठा इसने की है तो गुण निकल रहे हैं यानी कि वह स्वयं गुण नहीं है। इसके बाद क्या है कि त्रिदेव पाप करवाते हैं। इसने यहां पर ये माना है कि त्रिदेव

00:06:39:22 जो है ब्रह्मा विष्णु महेश ये व्यक्ति से पाप कराते हैं। जबकि इसी अध्याय में थोड़ा आगे क्या कहा है? पष्ठ संख्या 43 पष्ठ संख्या 43 में इसने कहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश जब कोई व्यक्ति भक्ति कर रहा होता है इसके अनुसार तो उसको ब्रह्मा विष्णु महेश बिन मांगे मतलब सभी जो इक्षित फल होते हैं सब दे देते हैं यानी कि वहां पर त्रिदेव किसको पोषित कर रहे हैं जो व्यक्ति पुण्य करने वाला है इसके ही अनुसार और यहां पर क्या कह रहा है कि त्रिदेव का पाप करवाते हैं तो या तो यहां पे रामपाल सही हो सकता है या फिर वहां पर सही हो सकता है या फिर कोई आके बता सकता है कि भैया त्रिदेव पाप करवाते हैं या पुण्य करवाते हैं क्योंकि यदि वो पुण्य करने वाले को फल दे रहे हैं अच्छा इक्षित फल तो फिर वो पाप करवाने वाले सिद्ध नहीं होंगे है ना पहली बात अच्छा और आगे चलते हैं बुलेट पॉइंट और क्या है इसने इस पृष्ठ में पृष्ठ संख्या 38 में भक्ति के बिना इंद्रिय इंद्रिय निग्रह करने का खंडन किया है जो कि वो भी है। मगर हम ये बात उठा क्यों रहे हैं? क्योंकि ये ये कई जगह पर इंद्रिय

00:07:55:03 निग्रह करने जब जब व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण की पूजा करेगा ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करेगा उनका नाम जप करेगा एक स्थान पर बैठकर करेगा तो ये कहेगा नहीं एक स्थान पर बैठ के नहीं करना चलते फिरते करना है। चलते फिरते भी कर सकते हैं। मगर एक स्थान पर बैठने का खंडन तो नहीं है। यह कहा जा रहा है कि हठ पूर्वक यदि कोई व्यक्ति अ हम अपने कर्मेंद्रियों पर तो कंट्रोल कर ले मगर मन में चिंतन जो जिन चीज जिन जिन विषयों से अपने आप को रोक रखा है कर्मेंद्र्रियों के द्वारा उन विषयों का ही चिंतन मन में यदि करता रहेगा तो बात नहीं बनेगी वो मूर्ख है फिर उसको मन से भी उसका चिंतन त्यागना होगा जिसको उसने अपने तन से त्यागा ये भगवान का कहने का तात्पर्य है कि वो मूर्ख होते हैं जो हठ पूर्वक अपनी इंद्रियों को तुम कर लेते हैं कंट्रोल कर लेते हैं और मन में उसी का उनहीं विषयों का चिंतन करते रहते हैं। वो मूर्ख होते हैं। तो इसने वहां पर क्या कर दिया कि नहीं हठ पूर्वक में भक्ति करना एक जगह आसन बिछाकर भक्ति करना और ध्यान लगाना ये सब गलत है। ये है मूर्खता की पराकाष्ठा। खैर आगे चलते हैं। और क्या किया इसमें? इसमें इसने फिर यहां पर निष्काम कर्म का समर्थन किया है। अब निष्काम कर्म का समर्थन

00:09:10:12 जब कर दिया 3.9 में तो 3.9 में इसने निष्काम कर्म करने का समर्थन कर दिया तो इसने एक जगह दो बिना लाभ के युद्ध नहीं। इसने दूसरे अध्याय में ये कहा था बिना लाभ के कैसा युद्ध? तो फिर यहां पर निष्काम कर्म करने का समर्थन करके अपनी उस बात का खंडन कर दिया। तो बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। यह कहकर इसने कम से कम अब तक हमने नोट कर लिए हैं। एक दो तीन चार पांच छ सात 8 9 10 11 12 13 14 15 16 अभी तक के अध्ययन में बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। बिना लाभ के युद्ध कैसे होगा? यह वाली बात कहकर कम से कम अभी तक 16 श्लोक ऐसे हैं भगवत गीता के जिसका इसने खंडन किया है। ठीक है? दूसरी बात और क्या है कि इस इसमें भी इसने कहीं पर आज के जो बुलेट पॉइंट्स मैं आपको बता रहा हूं उसमें भी इसने राग

00:10:13:12 द्वेष राग द्वेष में अंतर मतलब करना सिखाया है कि राग द्वेष तो होना ही चाहिए। राग द्वेष के बिना जो है काम कर्म नहीं होंगे। ठीक है? तो यह इसने इसमें सिखाया। कहने का मतलब है अपनी बात को खुद ही काट रहा है। आगे चलते हैं और क्या है आज के में? आज के बुलेट पॉइंट्स में अनुवाद के नाम पर इसने बार-बार वो तो किया ही है अपना बकवाद अनुवाद के नाम पर। अच्छा और क्या है? अब आ जाते हैं प्रश्न संख्या 39। हम 39 पेज पर क्या है? कि सबसे पहले तो मार्कंडेय पुराण में जो कर्म करने का समर्थन किया गया है वही समर्थन इसने यहां पर भी किया है रामपाल ने जिस मार्कंडेय पुराण की जिस बात का खंडन करता है जो पितरों के द्वारा कही गई थी वही अपनी बात का यहां खंडन करता है ये क्या कह रहा है यहां पर ये कि इसलिए परमात्मा के निमित्त शास्त्र वर्णित कर्तव्य कर्म कर्म यानी कर्तव्य कर्म जो है करते रहना चाहिए। ठीक है? अच्छा अब आगे क्या है? तीन छ 9 के अर्थ में इसने लिखा है एकांत में

00:11:28:14 बैठकर ध्यान लगाने का खंडन किया है। वो हमने आपको बता ही दिया। जबकि भगवान श्री कृष्ण ने क्या कहा है कि केवल इंद्रिय निग्रह करने से काम नहीं चलेगा। चिंतन मनन भी विषयों का छोड़ना पड़ेगा और उसके लिए आवश्यक है कि आप चिंतन मनन किसका कर रहे हो? ईश्वर का। और यही बात भगवान ने क्या कहते हैं? इसने यहां पर उदाहरण दिए हैं कुछ श्लोकों के। तो यही बात इस भगवान ने उपाय उपाय के रूप में बताया

00:12:05:19 है कि भाई यदि हां अध्याय आठ के श्लोक सात में इसने कहा है कि अर्थ गलत किया है कि हर समय मेरा स्मरण भी कर मेरा युद्ध भी कर इस प्रकार से मेरे आदेश का पालन करते हुए अर्थात सांसारिक कर्म करते करते साधना करते हुए मुझे ही प्राप्त होगा। भले ही अपनी परम गति को अब यह इसने फिर वो अपनी बकवास व्याख्या चालू कर दी। भले ही अपनी परम गति को श्लोक सात अध्याय सात श्लोक 18 में अनुत्तम बताया। इसके अनुसार जो है घटिया जो ये कहता है गीता बोलने वाले की भ जो भक्ति है वो घटिया है। मगर वहां भगवान ने क्या कहा है कि तुम निरंतर मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो। तो क्या हुआ कि विषयों का चिंतन छोड़कर मेरा चिंतन करो। अपना कर्तव्य कर्म करते रहो। ठीक है? तो यह सब इसने यहां पर किया है। अब यहां पर एक बात ध्यान रखने की यजुर्वेद 40 वे अध्याय में 10वें मंत्र का भावार्थ ये करता है कि जो पूर्ण परमात्मा की जानकारी है वो वेद का ज्ञान देने वाला ब्रह्म भी नहीं

00:13:20:22 जानता उसे धीरा नाम अर्थात तत्वदर्शी संतों से सुनो ये इसने अर्थ किया है किसका अर्थ किया है वेद के 40वें अध्याय के दव मंत्र का जबकि वेद के 40वें अध्याय के 10वें मंत्र का जो अर्थ है वो मैं आपको पढ़कर सुना दे रहा हूं। ये आ गया। संग या संभूति का फल भिन्न प्रकार का है। ऐसा कहते हैं। असंग भावना का फल भिन्न ऐसा धी अर्थात बुद्धि में रमण करने वाले विद्वानों से सुनते आ रहे हैं। उनके पास जाकर सुनना नहीं है। जो यहां बताया जा रहा है वो किनसे सुना गया है? विद्वानों से। ठीक है? उनके पास जाने को नहीं कहा। जाने को कहा है तो यह बताएं कहां कहा है। ठीक है? जिन्होंने हमको इस विषय में उपदेश किया है। तो पहली बात क्या है कि यहां पर धीरा नाम पुरुषों पुरुषों को धीरा नाम पुरुषों को यहां पर इसने तत्वदर्शी माना

00:14:35:22 है। किस कहां पर माना है तत्वदर्शी? 39 पृष्ठ संख्या पर इसने धीरा नाम पुरुषों को तत्वदर्शी माना है। ठीक है? और ये ये बात ध्यान रखने की है कि इसने कहा है ना संतों से सुनो। यहां संतों से सुनने का आदेश नहीं दिया गया है। निर्देश नहीं दिया गया है। ऐसा हमने उनसे सुना है। मतलब जो बताने वाला है उसने सुना है। वो ये नहीं कह रहा जाके सुनो आप। ठीक है? पहली बात। अब ये धीरा नाम की बात हो ही गई है तो हम आगे कर ले। क्या है वो बात? वो जरूरी है। इसने अपनी भगवत गीता के पृष्ठ संख्या 49 में भगवत गीता का अर्थ करते समय फिर लिखा है गीता अध्याय तीन श्लोक 25 से 29 तक का भावार्थ करते हुए लिखा है कि यजुर्वेद अध्याय 40 श्लोक 13 श्लोक नहीं है महा मंत्र होता है हालांकि यह श्लोक ही लिखता है ठीक है कोई बात नहीं तो श्लोक 13 में वेद ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा कि जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान हो जाएगा जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं। जिसे अक्षर ज्ञान नहीं है उसे अविद्वान कहते हैं। यह कौन कह रहा है? इसी जिस

00:15:51:03 जिस अध्याय के जिस 40 वे अध्याय के दव मंत्र का ये समर्थन ले रहा है अपने लिए कि भैया उसे तत्वदर्शी से सुनो जाकर के धीरा नाम से सुनो जाकर के। उनहीं के लिए यहां पर यह कह रहा है कि वेद ज्ञान दाता ने कहा कि जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं। जिसे अक्षर ज्ञान नहीं है उसे विद्वान कहते हैं। परंतु विद्वान तथा अविद्वान की वास्तविक जानकारी तत्वदर्शी संत ही बताते हैं। उनसे सुनो। ये बात ये बात इसके ही अनुसार ब्रह्म ने नहीं कही है। वेद में ये खुद बोल रहा है कि ब्रह्म ने यहां पर गलत बात कह दी। 40 13 में वेद ज्ञान दाता ने रामपाल के अनुसार गलत बात कही है कि भाई जिसको अक्षर का ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं। जिसे अक्षर का ज्ञान नहीं है उसे अविद्वान कहते हैं। ये वाला मैंने आपको अभी फोटो भेजा है तो थोड़ा सा दिखा दीजिए। तो अब यहां पर वास्तविकता क्या है? वास्तविकता है कि आत्म ज्ञान का फल भिन्न है। ऐसा कहते हैं। अनात्म ज्ञान का

00:17:06:07 फल भिन्न है। कहते हैं। ऐसा विद्वत जनों से सुनते आए हैं। यह भी सुनने को कहा है कि हम सुनते आए हैं। यहां पर ऐसा कहीं नहीं कहा जा रहा है कि अक्षर का ज्ञान जिसको होगा उसको जो है वो कहा जाएगा और अक्षर का ज्ञान नहीं होगा उसको वो कहा जाएगा। यह आप सामने देख सकते हैं। यह दवा है। वो 13वा दिखाइए जो दूसरा चित्र आपको प्राप्त हुआ होगा। हम यहां पर अक्षर का ज्ञान कहीं नहीं है कि भाई जिसको अक्षर का ज्ञान होता है वो विद्वान है। जिसको नहीं होता है वो अविद्वान है। पहली बात तो इसने अपने मन से वो किया है। दूसरी बात यह है कि इस मंत्र में भी यह जो ज्ञान है यह कौन दे रहा है? यह दे रहा है धीरा नाम धीरा नाम जो होते हैं यानी जिनको विद्वत जन कहा गया है। ठीक है? यह बड़ा करके दिखा दीजिए धीरा नाम राइट साइड में विद्वत जन और रामपाल के अनुसार ये तत्वदर्शी है तो रामपाल यजुर्वेद के 40 वे मंत्र के रामपाल यजुर्वेद के 40 वे अध्याय के दव मंत्र में बताता है कि वेदों को कहने वाले को पूर्ण ज्ञान नहीं

00:18:21:13 है। पूर्ण ज्ञान जाइए आप धीरा नाम पुरुषों से लीजिए। यह अर्थ करता है रामपाल जबकि अर्थ वहां पर कुछ और है। कि रियाणाम ने हमें बताया है जो हम आपको बता रहे हैं। ठीक है? मगर अगले ही पल दो तीन पष्ठों के बाद यह उनहीं धीर नाम पुरुषों को क्योंकि 40व अध्याय का 13 वे मंत्र में भी जो ज्ञान दिया जा रहा है वो विद्वान जनों यानी धीर नाम पुरुषों के द्वारा बताया गया ज्ञान दिया जा रहा है उनके द्वारा जो भी चीज बताई गई है वो उस मंत्र का अर्थ है तो अगर यह कह रहा है कि उस मंत्र का अर्थ क्या है कि अक्षर का ज्ञान जिसे है वो विद्वान है जिसको नहीं है वो अविद्वान है तो यह ज्ञान भी किसने दिया धीम पुरुषों ने और धीम पुरुष कौन है? यह मान चुका है कि वो तत्वदर्शी है। धीम मगर यहां पर तत्वदर्शियों की बात को काटते हुए और फिर कह रहा है कि भैया पूर्ण परमात्मा कबीर जी ने अमृत वाणी में विद्वान और विद्वान की बात की है। तो या तो ये मान ले कि धीराम जो है वो तत्वदर्शी नहीं है। एक बात तो मान ले भाई और यदि उनको तत्वदर्शी मान रहा है तो इनसे भिन्न मत बता। तत्वदर्शी को या तो मान ले कि धीरा नाम जो है वो तत्वदर्शी नहीं होते क्योंकि दोनों

00:19:36:21 जगह धीरा नाम आया है। 40 10 में भी धीरा नाम है और 40 क्या कहते हैं? 13 में भी धीरा नाम है। दोनों जगह ज्ञान बताने वाला जो है बताने वाले के रूप में धीरा नाम का उपयोग हुआ है। ठीक है? तो यह भी एक बुलेट पॉइंट था। अभी हम अध्ययन करते टाइम इसको पढ़ेंगे आगे और इसके बाद क्या है? एक बात आती है इसने 39 नंबर पर कहा है कि काल यह कहता है आठव अध्याय के 13 वे श्लोक में कि जो ऐसा ऐसा करेगा मेरे मेरे अनुसार चलेगा वो जो है मेरी वाली परम गति को प्राप्त होगा। अब ये मेरी वाली परम गति क्या है? परम गति क्या है? पहले समझिए। जो सबसे परम हो वह गति आपको प्राप्त हो जाएगी। मगर मेरी वाली परम गति यानी कि मेरी कई मेरी मेरे मान लिया। इसकी बात को थोड़ी देर मान लेते हैं कि मेरे से मिलने वाली गति इसको प्राप्त होगी। मगर जब हम कह रहे हैं कि मेरे से मिलने वाली परम गति प्राप्त होगी। तो यानी कि मेरे से मिलने वाली अन्य कई गतियां भी तो होंगी। वो उनका वर्णन कहां पर है? कि जो मुझे प्राप्त करने पर एक लोअर क्लास की गति होगी। फिर एक मिडिल क्लास

00:20:51:25 की गति होगी। यह 39 पर इसने कहा है। ठीक है? तो यह परम गति को डिफाइन करें कि उसकी जो लोअर क्लास की गति होगी वो उसको क्या कहा जाएगा। उसका वर्णन कहां पर है? और अगर इसकी गति है जो कि और कोई गति नहीं है तो इसको परम गति क्यों कहा जा रहा है? खाली गति कहो। मेरी वाली गति प्राप्त होगी। जो मुझसे मिलती है वो गति प्राप्त होगी। जो मेरी गति है वो प्राप्त होगी। यह कहो। परम गति क्यों कह रहे हो? किस हिसाब से कह रहे हो? तब तो यह है ना कि और भी गतियां हो मुझसे मिलने वाली वो गतियों का वर्णन कहां है? ठीक है ये हो गया और चलते हैं

00:21:38:18 आगे पूर्ण परमात्मा की पूरी जानकारी केवल तत्वदर्शी जानता है। इसने कहा पूर्ण परमात्मा की पूर्ण जानकारी केवल तत्वदर्शी जानता है। मगर जब इनके भक्तों से पूछा जाता है भक्तों से कि आत्मा को नित्य क्यों कहा? जब जब कबीर जो है संसार बना रहा था तो वो कहां पर खड़ा था? उस संसार को उसने बनाया था कि नहीं बनाया था? और भी बहुत सारी तात्विक विवेचना के सर्वशक्तिमान परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म जैसे कि इसमें इन्होंने मान लिया है कि मोक्ष जो कोई लोक है जहां पर जो काल के जाल में फंसी हुई जो आत्माएं होती है वो होती हैं। तो काल जब दोबारा जन्म लेता है तो उसके जाल में फिर फंस जाती हैं। तो अब बात यह है काल जब दोबारा जन्म लेता है तो इनके अनुसार अब तक तो एक आध बार तो लिया ही होगा। तो उसके जाल में वह आत्माएं फंसती है जो काल के जाल में पहले से होती हैं या वह आत्माएं फंसती है जिनको अभी भी उसने उत्पन्न किया है कबीर ने नई आत्माओं को या वो आत्माएं फंसती है जिनको मोक्ष प्राप्त हो गया था ठीक है तो ये बात है अब आगे चलते हैं और क्या है आगे तो

00:22:53:18 तत्व तत्व ज्ञान तो इनसे मिलता मिलता नहीं है झोलाचा जेलधाम निवासी से। खैर आगे चलते हैं। फिर इसने इसी में कुछ समय तक अमर कहा है। जब हमें यह ज्ञात है कि यह व्यक्ति आगे चलकर के मर भी सकता है तो हम उसको अमर कैसे कहेंगे? अमर की डेफिनेशन कहां पर लिखी है? कुछ समय के लिए जो व्यक्ति मरेगा नहीं उसको अमर कह सकते हैं। यह इन्होंने तात्विक रचना कहीं नहीं बताई है। और देखो आक्षेप तो यह लगाता ही चलता है कि यज्ञों का लाभ केवल जो है वह सांसारिक सुविधाएं हैं। मुक्ति नहीं है। जबकि यज्ञों में प्रतिष्ठित बार-बार कहता है कि पूर्ण परमात्मा है जैसा कि इसने श्लोक

00:23:42:00 तीन 10 में कहा है। यज्ञ से कौन पूजा जा रहा है? ये पृष्ठ संख्या 40 दिखाइए। यज्ञ से कौन पूछ पूजा जा रहा है? यज्ञ से पूजा जा रहा है। पूर्ण परमात्मा 40वा पृष्ठ दूसरा तीसरा पैराग्राफ हम यज्ञ में पूर्ण परमात्मा प्रतिष्ठित है। यज्ञ से पूज्य इष्ट देव ही मनवांछित भोग प्रदान करें। और इष्ट देव कौन है? पूर्ण परमात्मा। तो जब यज्ञ से पूर्ण परमात्मा वो पूजा जा रहा है तो फिर वह सांसारिक सुख तक सीमित क्यों है? ठीक है? और वैसे तो यहां पर धर्म यज्ञ की बात हो रही थी। इसके बाद और आगे चलते हैं। तो

00:24:32:00 तीन 10 में इसने झोल किया है। पहली बात तो एक अर्थ का अनर्थ कर दिया है। अनेन शब्द आया है तीन 10 में और इसने अनेन का अर्थ लिखा है अन्न द्वारा होने वाला। अनेन का मतलब इसने लिखा है इससे जस्ट ऊपर वाला पैराग्राफ। हां यही यही इसमें देखिए अनेन का मतलब इसने लिखा है। इस समय मेरी फोटो के मेरे स्क्रीन के पीछे चला गया है वो

00:25:03:14 पैराग्राफ। सेकंड पैराग्राफ है जिसमें एक श्लोक का अर्थ बताते हुए अनुवाद में सेकंड लाइन में यह लिखता है कि अनेन ब्रैकेट में और फिर लिखता है अन्य द्वारा होने वाला धार्मिक कर्म। जबकि अनेन का अर्थ है कि इस प्रकार या फिर यह है अनन तो यह अर्थ का अनर्थ किया और क्या किया है इसने कहा है कि यज्ञ में जो है पूर्ण प्रतिष्ठित जो है वो पूर्ण परमात्मा है जबकि वहां पर पूर्ण परमात्मा की कोई बात ही नहीं हो रही है। श्लोक में पूर्ण परमात्मा को दर्शाने वाला कोई अर्थ नहीं है। यह है गपोड़ बाबा जेलधाम निवासी। आगे चलते हैं। अच्छा एक पॉइंट टू बी नोटेड कि इसने यहां पर 3.1 के अर्थ में हिंदी अनुवाद में परम का अर्थ परम माना है। जबकि आगे चलके गीता प्रेस गोरखपुर के अनुवादकों और अन्य आचार्यों के अनुवाद में जब परम का अर्थ कहीं पर पर माना गया या परम का अर्थ कहीं पर परम माना गया। तो इस व्यक्ति ने वहां पर कहा देखो देखो यह लोग तो परम का अर्थ पर मानते हैं। फिर भी यहां पर परम का अर्थ परम मान रहे हैं। जबकि यह खुद व्यक्ति परम का अर्थ परम मानता है। यहां पर देखिए। ठीक

00:26:18:22 है? और यह इसने इसी प्रश्न में बताया है। सबसे लास्ट पैराग्राफ दिखा दीजिए इनको। हां। इसमें देखिए परम का अर्थ इसने परम ही माना है। श्लोक में आया है परम अवाप्सत और हिंदी अनुवाद में इसने हिंदी अनुवाद की लास्ट लाइन में परम कल्याण लिखा है। ठीक है? तो इसने परम का अर्थ परम माना और आगे चलकर के गीता प्रेस वालों ने जो अनुवाद किया है उन पर उंगली उठाई। ठीक है? ये सब ध्यान रखने वाली चीजें हैं कपूर बाबा की। कॉमेडी है। जिनको हंसना हो वह रुके रहे। बहुत सारी चीजें इनका जब ये जो लिखा हुआ कचरा है वो जब पढ़ते हैं तो बहुत सारी चीजें हंसने वाली हमें प्राप्त होती है। अब आ जाइए पष्ठ संख्या इनकी 43 तक। यहां पर हमें एक सार्वभौम सिद्धांत प्राप्त होता है भगवत गीता का कि जो व्यक्ति अपने केवल शरीर को पोषित करने के लिए शरीर के पोषण के निमित्त भगवान ने क्या किया ना कि हम हमारे हर कर्म को

00:27:34:07 भक्ति से वैराग्य से जोड़ दिया है कि अपने लिए मत करो उसको भक्ति से उसको शास्त्र की आज्ञा के रूप में समझते हुए कार्य करो तो तुम उन कर्म बंधनों से लिप्त नहीं होगे तो इसलिए इसलिए जो व्यक्ति स्वयं के भूख मिटाने के लिए भोजन बनाएगा, भोजन को पकाएगा, उसे पापी कहा गया है। और वहीं पर अनुष्ठान के निमित्त पकाए हुए यज्ञ यानी धार्मिक यज्ञ से बचे हुए अन्न को ग्रहण करने वाले को पुण्य पुण्यत्मा कहा गया। यह सार्वभौम सिद्धांत है। बीच-बीच में आएंगे तो आपको वो भी देते चले। इसके बाद फिर उसने ब्रह्मा विष्णु महेश बिन मांगे दे देते हैं। देखिए यहां पर इसने मान लिया बिन मांगे देते रहते हैं। ये दूसरे पैराग्राफ में आइए इस पृष्ठ के 43 के दूसरे पैराग्राफ में। इसने यहां मान लिया कि पूर्ण परमात्मा रूपी मूल यानी जड़ की इष्ट रूप में प्रतिष्ठित करके पूजा करने वाले के शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्मों का फल तीनों देवता ठीक है भक्ति कर्मों का फल यानी कि पुण्य का पुण्य का फल तो यहां पे पुण्य करने में सहायक बन रहे हैं ब्रह्मा विष्णु महेश इसके ही अनुसार देख लो

00:28:49:13 इसको झूठे की झूठ की पराकाष्ठा पीछे कह रहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश क्या करवाते हैं? पाप जुआ खेलना विचार करना ये सब करवाते हैं। अभी हमने पीछे नोट किया था और यहां क्या कह रहा है कि ब्रह्मा विष्णु महेश बिना मांगे जो पुण्य पुण्य आत्मा है उसको देते रहते हैं। ठीक आगे चलते हैं। अच्छा अब एक बहुत बढ़िया बात आ रही है। टाइम नोट कर लीजिए भाई। पहले 3.12 का और देख लें। इस यहां पर फिर से इसने अर्थ करने में झोल कर दिया है। वहां देवताओं की पूजा बताई जा रही है कि यज्ञ में जो देवता होते हैं वह

00:29:27:14 हमको हमारा इक्षित जो फल है वो प्रदान करें। मगर यहां पे इसने जबरदस्ती क्योंकि वो त्रिदेव को ले चलना है। देवताओं की जगह बिठाना है उनको साधारण। तो इसलिए यहां पर त्रिदेव की पूजा करने वाले त्रिदेव होते हैं। उनकी पूजा करते हैं प्रतिष्ठित करके और यह सब इसने यहां त्रिदेव को डाल दिया है। इसके बाद अब यहां का टाइम आप लोग नोट कर लीजिएगा। बहुत जरूरी बात आ रही है। हम क्या है वो बात

00:30:05:21 कि प्रजापति ब्रह्मा ने [संगीत]

00:30:45:22 यहां एक बहुत ही आवश्यक बात है जो आपको चौंका देने वाली है। तो इसलिए थोड़ा सा धैर्य रखें। अत्यंत लाभदायक होगी। वैसे इन लोगों से बात करने का कोई अर्थ है नहीं जो कि यह भी मानते हैं। इसने भी अपने उसमें कहा है कि मूर्खों को मत समझाओ। परंतु यदि मूर्खों को नहीं समझाएंगे तो समझाएंगे किसको? तो देखिए

00:31:24:03 जो भगवत गीता तीन 10 में कहा जा रहा है कि प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित ये टाइम नोट कर लीजिएगा है ना तो भगवत गीता के तीसरे अध्याय के 10व श्लोक में क्या कहा गया है प्रजापति प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित यानी धर्म सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि धर्म के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम लोगों को इक्षित भोग प्रदान करने वाला हो तो धर्म को करने से धर्मानुष्ठान में लगे रहने से धर्म यज्ञ में लगे रहने से जो आपको सदा सिद्ध परिणाम है फल है वो मिलते रहे ऐसा यहां पर श्लोक में कहा जा रहा है कि ब्रह्मा जी ने यहां पर उनको प्रजापति को ब्रह्मा कहा गया है। ठीक है? और प्रजापति ब्रह्मा को ही कहा जाता है। ये हम सिद्ध करेंगे। मगर इसने तीसरे अध्याय के दव श्लोक से लेकर और तीसरे अध्याय के दव श्लोक में क्या कहा है कि पूर्ण परमात्मा ने यहां पर इसने प्रजापति किसको माना प्रजापति कौन है? पूर्ण परमात्मा बहुत ध्यान रखने वाली बात है। इसने प्रजापति

00:32:39:13 किसको माना है? पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में यज्ञों यानी धार्मिक अनुष्ठानों इसने ऊपर प्रजापति का अर्थ किया है। ये 40वा पृष्ठ संख्या है। देखिए इसने प्रजापति का अर्थ किया है। तीन 10 श्लोक इसमें अर्थ दिखाइए इनको ब्रैकेट में लिखा है प्रजापति अनुवाद के समय 39 40वा ही है पेज। हां यही है। यही है। इसमें लाइए हां यह तीन 10 का अनुवाद हो रहा है ना सेकंड पैराग्राफ में। सेकंड पैराग्राफ कर लिया। हां, यह अनुवाद हो रहा है। तो, इसने क्या कहा है? प्रजापति का अर्थ क्या माना है? प्रजापति यानी कुल के मालिक ने। ठीक है? इसके बाद अगले अगला इसका जो भावार्थ है उसमें आ जाइए। भावार्थ में आ जाइए इसके नीचे। हां। पूर्ण परमात्मा ने कल्प के प्रारंभ में। ठीक है? तो यहां पर प्रजापति का अर्थ इसने माना। कौन है? प्रजापति का अर्थ इसने माना पूर्ण परमात्मा। अब देखिए यहां पर इसके ही अनुसार ब्रह्मा जी पूर्ण परमात्मा सिद्ध होंगे। कैसे? श्रीमद् भागवत तीसरा स्कंध 12वा अध्याय 33वा श्लोक वहां पर ब्रह्मा

00:33:54:16 जी को प्रजापति कहा गया। और ऋग्वेद में कई जगह भाष्य करते समय अर्थ करते समय ब्रह्मा जी को प्रजापति कहा गया है और ब्रह्म को भी प्रजापति कहा गया है। तो इसका अर्थ क्या हुआ? कि ब्रह्मा इसके अनुसार प्रजापति जो है वह ब्रह्मा है। इसके अनुसार प्रजापति क्योंकि पूर्ण ब्रह्म कबीर है तो पूर्ण परमात्मा है। कबीर नहीं इसके अनुसार प्रजापति पूर्ण परमात्मा है। यहां पर लिखा हुआ है। तो ब्रह्मा जी पूर्ण परमात्मा है। और ब्रह्म और ब्रह्मा में अंतर नहीं है। ऋग्वेद में आ जाएगा। प्रजापति ब्रह्मा जी को कहां कहा गया? यह मैंने आपको भागवत से बता दिया। अन्य अनेकों अनेक अनेकों जगह ब्राह्मण ग्रंथ है जो है ना शतपत ब्राह्मण इत्यादि अनेक जगह आपको प्रमाण मिल जाएंगे कि ब्रह्मा जी को प्रजापति कहा गया है। तो इसने यहां मान लिया कि प्रजापति कौन है? पूर्ण परमात्मा। कबीर नहीं। तो यहां पे ब्रह्मा जी पूर्ण परमात्मा इसने मान लिया। ठीक है? अब दूसरी बात एक बात और

00:35:09:16 है। ये लोग जो लांछन लगाते हैं ब्रह्मा सरस्वती विवाह का अर्थ समझ नहीं पाते हैं। वो हम लोग किसी और दिन बात करके उसको समझा भी चुके हैं कई बार मगर आगे भी समझा देंगे। मगर ये लोग जो लांछन लगाते हैं कि ब्रह्मा जी अपनी पुत्री पर मोहित हो गए। तो ये जो प्रजापति शब्द आ रहा है भागवत पुराण में तीसरे स्कंध के 12 वे अध्याय के 33 वे श्लोक में जो प्रजापति शब्द आ रहा है ब्रह्मा जी के लिए वहां पर वही सरस्वती माता वाला प्रकरण ही चल रहा है। तो यदि पूर्ण परमात्मा प्रजापति है इसके अनुसार तो पूर्ण परमात्मा स्वयं रामपाल का पूर्ण परमात्मा वहां पर अपनी पुत्री के लिए मोहित हो रहा है। वहां पर वो सृष्टि की रचनाएं नहीं बताई जा रही है। जो हम बताते हैं उसका अर्थ। जो ये आरोप लगाता है वो इसके ही पूर्ण परमात्मा पर लग रहा है। क्यों? क्योंकि प्रजापति कौन है? पूर्ण परमात्मा। शास्त्र में प्रजापति कौन है? ब्रह्मा जी। और ब्रह्मा जी का वही प्रकरण वहां पर चल रहा है सरस्वती माता वाला। ठीक है? अब यह उस उस आधार पर जो है लांछन लगाते हैं, आक्षेप लगाते हैं, मजाक उड़ाते हैं। तो इनका ही पूर्ण परमात्मा क्योंकि प्रजापति है तो वहां पर इनका ही पूर्ण परमात्मा उस लीला में इन्वॉल्व है। अब

00:36:24:16 ये उसका मजाक उड़ाएं। रामपाल के पूर्ण परमात्मा का मजाक उड़ाएं। ठीक है? तो ये बहुत रोचक बात है। आप लोग याद रखिएगा। भागवत पुराण तीसरा स्कंध 12वा अध्याय 33वा श्लोक ब्रह्मा जी को प्रजापति कहा गया और यहां पर रामपाल ने प्रजापति को क्या माना है पूर्ण परमात्मा तो ब्रह्मा जी यहां पर पूर्ण परमात्मा सिद्ध हो गए आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ब्रह्मा जी को पूर्ण परमात्मा सिद्ध करने के लिए इसकी गीता से ही सिद्ध होगा ठीक है अब अगर ये संदर्भ बदलेगा कि अरे वो किसी और संदर्भ में कहा था किसी और संदर्भ में कहा था तो भाई ऐसे ही एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं। अलग-अलग संदर्भों में उनका अर्थ अलग-अलग लिया जाता है। पर तुम तो उनका मना करते हो ना। नहीं वही अर्थ लो जो एक जगह ले लिया। दूसरा अर्थ नहीं ले सकते। जबकि तुम लेते हो तो हम भी तो तुम्हारे पीछे पीछे फिर चलेंगे कि तुमने यहां क्यों लिया? वो बोलेंगे ना पूछेंगे ना तुमसे। तुम तो श्रेष्ठ हो। और श्रेष्ठ लोगों को तो बिल्कुल वही बात करनी चाहिए। तो यह बात हो गई बहुत काम की है। इसके बाद फिर से अनुवाद के नाम पर इसने बकवात की है और पष्ठ संख्या 44 पे आ जाइए इसकी और पृष्ठ संख्या 44

00:37:40:00 में इसने फिर वही वही वाली बात इसने वही आरोप लगाया है कि देखिए देखिए इन्होंने ये लास्ट पैराग्राफ दिखाइए। इसने वही आरोप लगाया है। देखो देखो इसने इन्होंने जो है अह ये वेद को परम परम वाला मामला चल रहा है कि देखो देखो इन्होंने परम का अर्थ वहां तो पर किया है। अन्य श्लोकों में पर किया है कि मेरे से मतलब कुछ और परे जैसे मन वहां कह रहे हैं भगवान मन बुद्धि से परे तो वहां पे परे का अर्थ पर किया है। है ना? अन्य मन बुद्धि से परे अलग और यहां पर देखो परम का अर्थ कुछ और किया है तो पहली बात तो वहां पर पर जो आ रहा है वो बाद में आ रहा है मन बुद्धि से परे वो हम आगे देखेंगे मन बुद्धि से परे वाली बात और यहां क्या आ रहा है पहले आ रहा है परमात्मा परमेश्वर है ना परम ईश्वर तो खैर मगर ये बातें अगर छोड़ भी दें तो ये जो आरोप लगा रहा है यहां पे लास्ट पैराग्राफ में कि देखो देखो इन्होंने परम का अर्थ जो है परमात्मा किया जबकि इनहीं अनुवादों ने इसी अध्याय के आगे के श्लोकों में परम का अर्थ पर किया है। तो भाई तू भी तो कर रहा है परम का अर्थ परम एक श्लोक

00:38:55:01 एक पृष्ठ पहले ही दिखाओ इनका पष् 40 नंबर जब परम का अर्थ पर ही है तो तूने क्यों किया है यहां पर परम का अर्थ परम बेवकूफी की पराकाष् 39 नंबर पर है 40 40 40 का बिल्कुल लास्ट हां यहां परम का अर्थ परम क्यों किया भाई तूने? परम कल्याण क्यों किया तूने? परम का अर्थ हो गया। ये है बाबा जी वाले बाबा जी। इसके

00:39:33:00 बाद अच्छा इसने ये आरोप भी लगाया है यही कहीं कि भाई इन्होंने वेद का अर्थ ब्रह्म ब्रह्म का अर्थ एक जगह वेद बता दिया है। है ना? और जबकि ब्रह्म का अर्थ काल होता है। और इसने स्वयं पष् संख्या 36 निकालिए। इसने स्वयं ब्रह्म का अर्थ परमेश्वर बताया है। तो यह एक ही शब्द के कई अर्थ क्यों कर रहा है? संदर्भ के अनुसार एक ही शब्द के जो अलग-अलग अर्थ होते हैं, वह यूज़ होते हैं। मगर अन्य लोग कर रहे हैं तो उन्हें टारगेट कर रहा है और खुद कर रहा है। परम का अर्थ खुद भी परम कर रहा है। मगर सामने वाला परम का अर्थ परम कर रहा है तो उससे इसको प्रॉब्लम है। वहां ये कह रहा है अनुवाद गलत। फिर ब्रह्म का अर्थ खुद परमेश्वर बोल रहा है। जबकि ब्रह्म का अर्थ यह खुद बोलता है काल है। यह पष्ठ संख्या 36 पर है। 2.72 का अर्थ बताते समय इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा किया है। हां दो के श्लोक 72 हां ये देखिए ब्रह्म निर्वाणम वृक्षति उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त होता है। यह क्यों किया भाई तूने? तो एक ये बात हो गई। अब इसने

00:40:48:07 आगे क्या किया है? दोबारा से वही आ जाइए 44 पर। तीन 15 का अर्थ करते समय पृष्ठ संख्या 44 तीन 15 का अर्थ करते समय इसने एक चीज और कर दी है। संस्कृत में आया है अक्षर। हमारे लिए तो ब्रह्म अक्षर परम अक्षर सब एक ही है। कहीं कहीं पर लीला भेद होने के कारण जब लीला में भगवान इन्वॉल्व है तो उनको कुछ कहा गया फिर उनके पूर्ण स्वरूप को परम ब्रह्म कह दिया गया बताने के लिए अंतर लीलात्मक अंतर बताने के लिए। मगर ये तो नहीं मानता ये अंतर इस तरह से कि सब एक ही है। तो इसने क्या कहा है? अक्षर को इसने परम अक्षर माना है। जबकि अक्षर और परम अक्षर में अंतर करता है। कैसे अंतर करता है? पहले 44 पे दिखा दीजिए। 44 प्रश्न

00:41:46:06 संख्या प्रश्न संख्या 44 दिखाइए इनको। प्रश्न संख्या 44 में 14 से 19 हिंदी अनुवाद ये जो पैराग्राफ है इसमें देखिए नीचे से सेकंड लास्ट लाइन नीचे से तीन 15 से हां यहां से इसके ऊपर जस्ट लाइन देखिए इसने क्या माना

00:42:19:07 कि ब्रह्म यानी काल की उत्पत्ति अविनाशी परमात्मा यानी परम अक्षर पुरुष से हुई है। जबकि ब्रह्म को गीता प्रेस वालों ने वेद माना है। ठीक है? चलो मान लिया काल की उत्पत्ति या वेद की उत्पत्ति किससे हुई है? अक्षर से हुई है। श्लोक दिखाइए। संस्कृत वाला संस्कृत वाला श्लोक दिखा दीजिए। हम ये देखिए अक्षर समुद्भवम लिखा है यहां। परम अक्षर नहीं लिखा भाई जेल वाले बाबा जी। अब क्या करें? यह ध्यान रखने लायक बात है। फिर आगे चलते

00:42:59:21 हैं। इसने एक बात और कही है 44 व पष्ठ पर कि यज्ञों से मुक्ति नहीं मिलती। हम 44 वे पे हां जब यज्ञों से मुक्ति नहीं मिलती। जबकि यहां 44 में बार-बार कह रहा है यज्ञ में प्रतिष्ठित कौन है? पूर्ण परमात्मा पर पर यज्ञों से मुक्ति नहीं मिलती। इसके बाद इसने तीन 17 का अर्थ करते हुए पष्ठ संख्या 44 में तीन 17 का अर्थ करते हुए फिर झोल किया है। क्यों झोल किया है? कि वहां कहा जा रहा है कि जो व्यक्ति आत्मा में ही संतुष्ट होता है। आत्मा में ही रमण करता है। वो व्यक्ति के लिए कोई भी कर्म करने की आवश्यकता नहीं होती है। प्रयोजन नहीं होता है। परंतु लोक संग्रह के लिए और मतलब पाप से बचने के लिए क्योंकि अगर कुछ नहीं करेंगे तो ऐसा ना हो कि शास्त्र सम्मत कर्मों में लिप्त ना रहे तो ऐसा ना हो अशास्त्रीय कर्म हो जाए इस कारण से आप कर्मों को करते रहिए शास्त्र सम्मत बिल्कुल छोड़िए मत तो यहां यह भाव है कहने का परंतु इसने क्या वहां पर पूरा अर्थ बदल दिया है और इसने कर दिया है आत्मा से ही संतुष्ट होने

00:44:14:26 को इसने कर दिया है आत्मा के लिए शास्त्र अनुकूल कर्म से संतुष्ट तो इसकी संस्कृत बतानी पड़ेगी ना बाबा जी संस्कृत कहां है इसकी तीन 18 में भी झोल है वहां बात की जा रही है तीन 18 में देखिए बहुत हंसी वाली बात है तीन 18 में क्या किया है कि उस महापुरुष के लिए विश्व में ना तो व्यर्थ के पाप कर्म करने से कोई प्रयोजन रह जाता है यानी पाप कर्म करने का भी कोई प्रयोजन होता है तो जो महापुरुष होते हैं उनके लिए ना तो पाप कर्म करने के लिए कोई प्रयोजन रह जाता है ना ही शास्त्र अनुकूल धर्म कर्म ना करने के लिए बताइए तो यहां यहां कहा जा रहा है कि ना तो कर्म ना तो कर्म करने के लिए कोई प्रयोजन रह जाता है जो जो आत्मा में रमण करने लगता है जो भगवान को समझ लेता है तो यह भाव यहां पर प्रकट किया जा रहा है कि उसके लिए कोई प्रयोजन नहीं होता है कि तुझे करना ही है क्योंकि आसक्ति नहीं है उसको कुछ भी फल प्राप्त करने की आसक्ति। उसका मन तो भगवान में लगा हुआ है। भगवान के चिंतन में रमा हुआ है। तो उसको कुछ भी ऐसा नहीं लगता मेरा ये करना जरूरी है। पर वो इसलिए करता है उसको इसलिए करना चाहिए कि शास्त्र ने कहा है शास्त्र अनुकूल कर्म करते रहो

00:45:30:20 बस। मगर यहां पर इसने कितना अर्थ का अनर्थ कर दिया कि पाप कर्म करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। भाई पाप कर्म पाप की तू यहां पर दिखा। संस्कृत कहां है? तीन 18 में कहां लिखा है पाप? यह है ढोल की पोल बाबा जी की। चलिए और आगे का क्या है कि परम पुरुष पर पुरुष और तीन 11 में परम परम हम ये बात बताए हैं। एक ही शब्द के दो अलग-अलग अर्थ नहीं हो सकते। ऐसा यह कहता है जबकि खुद ही एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ करता रहता है अपने अनुसार। एक सार्वभौम सिद्धांत क्या है जो हमने अभी बताया कि आत्मा में जो व्यक्ति संतुष्ट होने लगता है भक्ति में लीन हो जाता है आत्मा में ही रमण करने लगता है उसको कोई कर्म करने का प्रयोजन नहीं है किंतु जो लौकिक मर्यादा है उसकी रक्षा हेतु ऐसा ना हो कि आपको देखकर जो व्यक्ति अभी आत्मा में रमण करने वाला परमात्मा में चिंतन मनन करते रहने वाला नहीं बना है वो व्यक्ति भी आपको देख के कर्मों से विरक्त ना हो जाए है ना तो इसलिए आपको कर्म करते रहना होगा। इसको लोक संग्रह संग्रह भी कह सकते हैं। और साथ ही

00:46:45:22 साथ अपनी शास्त्र सम्मतता की रक्षा हेतु ऐसा ना हो कि आप कर्म नहीं कर रहे हैं तो कर्म ना करना भी अपने आप में एक कर्म है। तो कर्म ना करने के कारण कहीं शास्त्र विरुद्ध आचरण ना हो जाए। इसलिए कोई प्रयोजन नहीं है। परंतु केवल इस कार्य के लिए आसक्ति रहित होते हुए हमें कर्तव्य कर्मों में लगे रहना चाहिए। यह सार्वभौम सिद्धांत भी हमें प्राप्त होता है। यहां तक अब हम जरा जल्दी से क्विक क्विकली वैसे आज का चैप्टर थोड़ा बड़ा है। बुलेट पॉइंट्स भी थोड़े बड़े हो गए। 45

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00:47:16:16 मिनट्स तो बुलेट पॉइंट्स में ही हो गए। हम जरा जल्दी से चालू करेंगे। क्या किसने ढोल ढोल किया है? हम देखिए भगवान ने भगवत गीता के 20वें श्लोक में कहा है कि इसी प्रकार से जनक आदि ज्ञानी जन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। है ना? विरक्त नहीं हो गए मगर आसक्ति रहित कर्मों के कारण परम सिद्धि को प्राप्त हुए। यहां भगवान ने कह दिया आपको प्रमाण दिया गया कि आसक्ति रहित कर्मों के द्वारा भी परम सिद्धि को प्राप्त हो सकते है। जैसा वहां मार्कंडेय पुराण में वो जो पितरगण है वो कह रहे हैं भगवान ने भी यहां तक कई बार ये बात समझाई है कि अगर आसक्ति रहित कर्म करते रहोगे भोगों की भोगों में आसक्ति नहीं रखोगे तो आप कर्म करते हुए भी आप जो है मुक्ति प्राप्त कर सकते हो और यह बात इस मूर्ख ने भी मानी है कई जगह मगर क्या करें? खंडन भी करना है भगवान की बातों का, गीता का और यहां यह तो कहे कहना ही नहीं है कि

00:48:31:18 जनक को मोक्ष मिला था क्योंकि फिर ये हो जाएगा कि उसको कौन सा तत्वदर्शी मिला था। तो इसने क्या किया है अपनी यहां जनक जनक आदि यानी जनक में बहुत से लोग आ गए। उसमें वह भी आ गए। प्रह्लाद जी आ गए और भी कई मुक्त आत्माएं हैं। वह सब आ गए। मगर इसने क्या किया? 14 का श्लोक करते करते क्या क्या कह रहे हैं? दव दवा क्या झोल किया है

00:49:07:00 कि इसने सीधे-सीधे वो नहीं लिखा है इसने ऐसा कहा है कि जो श्रद्धालु इसने तीन 20 का अर्थ नहीं किया है। ये ध्यान देने वाली बात है। और क्यों नहीं किया? क्योंकि यहां पर जनक को मुक्ति प्राप्त हो रही है तीन 20 में। तो यह हम कैसे कह दे कि जनक जी को मुक्ति प्राप्त हुई सारा चरमरा जाएगा। तो यहां पर इसने तीन 20 का अर्थ ही नहीं किया। इसने क्या कहा कि तीन के श्लोक 20 में प्रमाण है कि बिना इच्छा जो देत है सो दान कहावे पल बा नहीं तासका सो अमरापुर जावे। ठीक है? अमरापुर जाने वाला है। यह तो इसने यहां पर दे दिया ना दोहा। अमरापुर जावे। अब इसने अर्थ क्या लिखा है? इसने अर्थ क्या लिखा? जो

00:49:55:06 श्रद्धालु किसी मनोकामना की पूर्ति की इच्छा ना रखकर अपना धार्मिक कर्तव्य जानकर दान करता है, वह वास्तविक दान है।

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00:50:02:12 ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से दीक्षित होकर दीक्षा लेकर अमरलोक शाश्वत स्थान में चला जाता है। यानी मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अब इसने राजा जनक की बात कही है। क्या कही है? राजा जनक भी यज्ञ आदि करते थे। परंतु इच्छा रूपी नहीं। मनुष्य का कर्तव्य समझकर किया गया यज्ञ परमात्मा प्राप्ति में सहयोग देता है तथा यज्ञ का फल भी देता है। यह क्या है भाई? यह आपने जो लिखा है श्लोक का अर्थ कहां है? बाबा जी पी गए क्या अर्थ? खीर के साथ। चलिए आगे चलते हैं। फिर इसने क्या किया है? अध्याय तीन के श्लोक 21 से 24 में कहा है कि हे अर्जुन ज्ञानी साधु संतों को अच्छे कर्म शास्त्र अनुकूल करने चाहिए क्योंकि उन्हीं का अनुसरण अन्य समाज भी करता है। जबकि मुझे तीन लोक में कोई कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि तीन लोक की सर्व सुविधा मैं बिना कर्म किए भी प्राप्त कर सकता हूं। फिर भी अच्छे कर्म करता हूं। ताकि अन्य प्राणी भी मेरा अनुसरण करें। नहीं तो मैं समाज का नाश करने वाला और वर्ण संकरता पैदा करने वाला साबित हो जाऊं। यहां ध्यान से सुनिए। बहुत मजेदार जोक है यहां

00:51:17:12 पे। अब यहां पे इन्होंने यह सिद्ध करने के लिए कि गीता बोलने वाला गीता बोलने वाले भगवान श्री कृष्ण नहीं है। बल्कि वो इनका तथाकथित जो एक इनका कार्टून कररेक्टर है राक्षस काल वो है। तो इन्होंने क्या किया है? यह सिद्ध करने के लिए अब यहां पर यह बताया कि देखिए यहां पर स्वयं भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं कि भैया मैं मैं कर्म मेरे लिए कर्म करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है और मैंने मेरे को जो सारी चीजें बिना कर्म किए ही प्राप्त हो सकती हैं। ठीक है? तो अब आगे कह रहे हैं कि यदि यह भगवान श्री कृष्ण होते तो भगवान श्री कृष्ण ने तो इतने बुरे बुरे कर्म किए हैं तो वह यह बात कैसे कहते हैं कि लोग मेरा अनुसरण करते हैं या अनुसरण करेंगे। है ना? तो इसने बहुत सारी वृतांत बताए हैं यहां पर। इसी की गीता का पष् खोल दीजिए। फिर हम 21 से 24 अपना अपनी गीता का दिखाएंगे। तो इसने बहुत सारे वृतांत बताए हैं। अब पहले कहा है इसने कि श्री कृष्ण के चरित्र का अनुसरण करने से तो समाज में अराजकता अश्लीलता फैल जाएगी। जैसे कुमारी राधा से रमण कुमारी कुजा के साथ भोग ये सारी चीजें हम अपने कई बार

00:52:32:14 कवर कर चुके हैं। इनका अर्थ क्या था लीलाओं का मगर इसने आक्षेप लगाया है कि कृष्ण भगवान का अनुसरण करने पर तो ऐसा ऐसा हो जाएगा। तो यहां पर यह उदाहरण देकर के कि देखिए भगवान कृष्ण के कर्म तो ऐसे हैं ही नहीं जिनका अनुसरण किया जाए। इसका मतलब है कि गीता बोलने वाला कोई और है। वो भगवान श्री कृष्ण नहीं है। काल है। तो क्या भैया काल के अच्छे कर्म है? ये सोचने वाली बात है। है ना? लगा ना जैकपॉट। क्या काल के अच्छे कर्म है? रामपाल के अनुसार जो यहां पर बताया जा रहा है। यानी कि रामपाल की इस थ्योरी को अगर माने तो काल ने भी गीता नहीं बोली। क्योंकि रामपाल यहां पर यह कह रहा है कि कृष्ण जी बुरे कर्म करने वाले हैं। जबकि यहां पर गीता बोलने वाला कह रहा है कि यदि मैं अच्छे कर्म ना करूं तो लोग समाज में जो है हीनता आ जाएगी, संकीर्णता आ जाएगी। यानी कि गीता बोलने वाला अच्छे कर्म करने वाला है। जबकि रामपाल के अनुसार काल तो अच्छे कर्म करने वाला है नहीं। वो तो व्यभचारी बलात्कारी वो तो लोगों को भटकाने वाला अपना उल्लू सीधा करने वाला अपने लिए झूठ अपने काम को बनाने के लिए झूठ बोलने वाला क्या-क्या नहीं है वो

00:53:47:27 तो फिर वो क्या अच्छा है क्या और यहां तक कि वो मन के रूप में आकर के सभी को जो वो परेशान करता है सबसे जो गलत काम करवाता है वो तो काल ही करवाता है तो इसका अर्थ है अगर तुम्हारी इस थ्योरी को मान लिया जाए तो काल ने भी भगवत गीता नहीं बोली तो किसने ने बोली क्योंकि काल भी अच्छे कर्म करने वाला नहीं आया। बोल दो अच्छे कर्म करने वाला है। वो लोगों को खाता नहीं है। दूसरी एक बात और है। यहां पर गीता बोलने वाला इसके अनुसार कह रहा है कि मुझे कोई भी कर्म करना शेष नहीं है। मैं बिना कोई भी कर्म किए सब कुछ प्राप्त कर सकता हूं। सारा सुख यही बोल रहा है। देखो क्या बोल रहा है कि मुझे तीनों लोकों में कोई कर्म करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सभी सुविधा मैं बिना कर्म किए ही प्राप्त कर सकता हूं। हम जबकि यहां क्या है? बेचारे को झूठ बोलना पड़ रहा है। यहां क्या है कि उसको रोज इंतजाम करना पड़ रहा है। सवा लाख वो खाना है। इसको तो सब कुछ प्राप्त है। फिर इसको क्यों ये सब तड़म भिानी पड़ रही है? यही तो अपने पीछे के अभी तक जो अध्ययन किया उसी में काल की बहुत सारी बुराई है। आगे भी काल की बहुत बुराई है। मगर यहां पर श्री कृष्ण से अलग करना था तो भूल

00:55:03:03 गया कि मैं काल को भी बुरा बताता हूं। ये है बाबा जी का ज्ञान। तो इसने श्री कृष्ण जी का यहां पर कई बार खंडन किया कि अगर देखिए यहां पर कह गीता कहने वाला गीता जी में कहता है कि मैं यदि सोच समझकर कर्म ना करूं तो मैं वर्ण संकरता का कारण साबित हो जाऊं। यानी कि जो गीता बोलने वाला है यहां के हिसाब से वो बुरा करने वाला नहीं है। अच्छा करने वाला है। जबकि काल कौन है? बुरा करने

00:55:40:13 वाला पवित्र श्रीमद् भगवत गीता जी श्री कृष्ण के जी के शरीर में प्रविष्ट होकर करके काल ब्रह्म यहां पे देखो काल ब्रह्म भगवान ने अपना उल्लू सीधा करवाकर युद्ध करवाकर लाखों व्यक्तियों का श्रृंगार करवाता था करने के लिए कही क्योंकि काल ब्रह्म ने गीता के सब इसने फिर आगे दर्शन नहीं दूंगा सर्वकार मेरे द्वारा गुप्त शक्ति से होते हैं ये सब कर दिया मगर ये ये भूल गया कि हम भगवान कृष्ण की बुराई करते करते हम यह भूल रहे हैं कि भगवान कृष्ण को काल से अलग करने के चक्कर में हम यहां काल को सही कहने का प्रयास कर रहे हैं और जबकि हमारे अनुसार तो काल बहुत बुरा है। भगवान श्री कृष्ण तुम्हारे अनुसार भगवान श्री कृष्ण अच्छे नहीं है पर काल तो और अच्छा नहीं है भाई। तो क्या काल का अनुसरण करना चाहिए लोगों को? तो तो गीता कहने वाला यदि ये बात कह रहा है कि मेरा अनुसरण करेंगे इसलिए मुझे अच्छा कार्य करना पड़ेगा। तो क्या काल के कार्य ऐसे हैं रामपाल के अनुसार जो लोग उसका अनुसरण करें? नहीं है। अब हम लोग 21 से 24 का जो हमारा अर्थ है वो पढ़ लेते हैं और वो व्याख्या भी बता देते हैं आपको वो क्या है? श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है अन्य पुरुष भी वैसा वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देते

00:56:55:15 हैं मतलब जो करते हैं समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है। हे हे अर्जुन मुझे इन तीनों

00:57:06:00 लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है और ना कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है।

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00:57:11:03 ठीक है? क्यों? क्योंकि भगवान परम मुक्त है। और कई बार जो लोग ऐसी बातें करते हैं ना भगवान ये क्यों नहीं किया? वो क्यों नहीं किया? ये क्यों नहीं बचाया? ये क्यों किया? वो क्यों किया? वो जो भी कर रहे हैं उनके पास उसको करने का कोई कारण नहीं है। वो बस कर रहे हैं। वो मुक्त है। उनकी कोई आवश्यकता नहीं है। तो भी मैं कर्म में बरतता हूं। उनकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए यदि मैं कर्म ना करूं। अच्छा फिर क्या है? यदि कदाचित मैं सावधान होकर कर्मों में ना बरतू तो अब ये लौकिक रूप से अपना बता रहे हैं। जो व्यवहारिक स्वरूप है। अब यहां पे उसके अनुसार अपनी व्याख्या बता रहे हैं। तो भी मैं कदाचित होकर कर्मों में ना बरतू तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि सब मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। ठीक है? यदि मैं कर्म ना करूं तो सब मनुष्य नष्ट भ्रष्ट हो जाए और मैं संकरता का कारण करने वाला हो जाऊं। इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूं। मेरे ही मार्ग का मेरे बताए हुए मार्ग का भगवान यहां पर अपने बताए जाने वाले कर्मों की बात करते हुए ये कह रहे हैं कि मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। ठीक है?

00:58:23:16 क्योंकि लीला पुरुषोत्तम भगवान है तो उनका अनुकरण नहीं किया जा सकता। वो तो सृष्टि भी बनाते हैं। है ना? विराट स्वरूप भी दिखाते हैं। तो क्या ये भी भगवान का मनुष्य का धर्म है। विराट स्वरूप दिखाना या सृष्टि रचना करना। तो भगवान के द्वारा बताए हुए मार्ग के अनुसार चलते। इसलिए यदि मैं कर्म ना करूं यानी जो धर्म स्थापना भगवान कर रहे हैं तो ना करें तो क्या हो मनुष्य समाज जो है नष्ट भ्रष्ट हो जाए और जो ये मनुष्य संकरता को करने वाला हो जाऊं समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बन तो भगवान को कोई भी ऐसा नहीं है कि ये नहीं किया तो उनका काम नहीं चलेगा ये केवल उनके व्यवहारिक स्वरूप की व्याख्या यहां पर की गई और इस बेवकूफ ने क्या किया ये जो गीता का अर्थ जिसने भी लिखा है मुझे लगता नहीं है रामपाल ने भी लिखा लिखा है रामपाल तो कोई आई वो क्या है आरटीआई से मंगाया गया था कोई पुस्तक लिख लिखी जाती है क्या जेल में तो वहां से तो मना किया गया फिर भी ये पुस्तकें उसके जेल जाने के बाद आ रही छप रही तो कौन लिख रहा है ये भी बात है खैर आगे चलते हैं तो फिर आगे क्या कहा है

00:59:38:21 भगवान ने और इसकी ढोल की पोल भी हमने देख ली। तो जो ये ये बातें जो लोग कहते हैं कि भगवान शिवलिंग थी उस पर चूहे चढ़ रहे थे। भगवान ने उन्हें हटाया क्यों नहीं? ये सब कहानियां यहां से हो जाती है कि मुझे इन तीनों

01:00:00:16 लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है और ना ही कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है। उनके

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01:00:06:14 पास कोई ऐसा हेतु नहीं है कर्म को करने का। चूहे कूद रहे हैं या नहीं कूद रहे हैं। वह अपनी परम मुक्ति में परम शांति में उन्हें प्राप्त है। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। तो सबसे पहले चूहे कूदने से शिवलिंग को परेशानी हो। ये जो दयानंद एंड कंपनी द्वारा बताई गई चीजें आर्य समाज अलंकार समाज द्वारा बताई गई चीजें हैं। तो यदि इनके द्वारा बताई गई जो चीजें हैं कि शिवलिंग पर चूहे कूद रहे थे तो भगवान ने क्यों नहीं अपनी रक्षा की? अरे भाई उनको फर्क तो पड़े। फर्क आपको पड़ेगा चूहे कूदने से क्योंकि आप परम शांति को प्राप्त नहीं है। ईश्वर को नहीं पड़ता है। इसलिए ईश्वर का जहां पर मन होता है वहां वो अपने अनुसार कर्म कोई भी कर सकता है और जहां पर मन होता है नहीं कर सकता है। ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। परम स्वतंत्र है ईश्वर। ठीक है? तो यह सार्वभम सिद्धांत भी लेते चले। अब

01:01:07:01 यहां यह ध्यान रखिए जो कहा गया श्लोक में कि कर्म ना करना कर्म करना शेष नहीं है। मगर काल के तो कर्म शेष है। काल को यहां पर क्या कहा गया कि मुझे ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मुझे प्राप्त ना हो और मुझे प्राप्त करनी है। क्या कहा गया कि कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु ऐसी नहीं जो मुझे अप्राप्त है। यहां कहा गया ना श्लोक में 22 में मगर उसको तो अप्राप्त है। सवा लाख जीभ चाहिए ना डेली कहां गए काल वाले खैर चलिए आगे चलते हैं हम इसके बाद अच्छा एक बात और है काल यहां पर कह रहा है 24व में इसके ही अनुसार नहीं तो मैं समाज का करने वाला हो जाऊं और जबकि काल खुद ही समाज का नाश करता है जिसको को भी बरगलाता है। राम जी को ऐसा दिखाया, फिर शिव जी को ऐसा दिखाया, फिर पार्वती माता को ऐसा दिखाया। ये बार-बार खुद ही कह रहा है। ये काल ही दिखाता है। और यहां क्या कह रहा है कि नहीं नहीं मैं समाज को नष्ट करने वाला ना हो जाऊं। अरे भैया तू ही तो फसा के लाया जीवात्माओं को वहां सतलोक

01:02:22:07 से। तेरी कार्टून फिल्म में यही चल रहा है ना। रामपाल ही है क्या काल? वही लाया है क्या जीवात्माओं को? रामपाल ही काल है। तभी कह रहा है। कभी-कभी वह काल के उसमें आ जाता है। कभी-कभी वह जो अपने संत कबीर थे उनके उसमें आ जाता है। तो वो समझ नहीं पा रहा है मैं किसके पीछे [हंसी] चलूं। क्या झोल है भाई। चलिए 25व पे आते हैं। अब 25 से 29 तक इसने क्या कहा है? 25 से 29 में इसने फिर वही अपनी बातें शुरू कर दी जो हम पीछे बात कराए हैं कि इसने 40 13 यजुर्वेद का उदाहरण देते हुए धीरा नाम पुरुषों का खंडन किया है और अपनी ही किताब में 40 10 यजुर्वेद का 40 10 का संदर्भ देते हुए धीर नाम पुरुषों का समर्थन किया है। इससे पूछ लो धीर नाम पुरुषों के पुरुषों की बात को मानना है कि नहीं मानना है? उनके पीछे चलना है कि नहीं चलना है? वह तत्वदर्शी है कि नहीं है। इनहीं से पूछ लो महाराज जी से इनका प्रकट दिवस आ रहा है ना पूछ लो इनहीं

01:03:35:28 से। क्या ही अनर्थ कर रखा है। खैर चलिए पढ़ते हैं। तो लास्ट पैराग्राफ है 49 का श्लोक 25 में कहा है कि शास्त्रानुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त अविद्वान अर्थात अशिक्षित। अच्छा यहां पे एक बहुत बढ़िया जोक आने वाला है। बहुत अच्छा जोक सब लोग टाइमिंग नोट कर लेना और इसकी कटिंग बनाना बहुत बढ़िया जोक आ रहा है भाई। क्या जोक आ रहा है सुनिए आप लोग हिल जाओगे इसको सुन के। मेरा वचन है आप लोगों को। हिल जाओगे सुन के। देखो क्या कह रहा है। श्लोक 25 में कहा है कि शास्त्र अनुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त अविद्वान अर्थात अशिक्षित किस किस में किस में आसक्त है? शास्त्र अनुकूल यानी कि रामपाल के द्वारा बताई जाने वाली भक्ति। शास्त्र अनुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त अविद्वान अविद्वान है। कौन जो रामपाल के द्वारा बताई जाने वाली भक्ति क्योंकि इसके हिसाब से शास्त्र अनुकूल भक्ति कौन सी है? इसके

01:04:51:06 अनुसार शास्त्र अनुकूल भक्ति वही है जो रामपाल बताता है। तो शास्त्र अनुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त

01:04:57:20 अविद्वान अर्थात अशिक्षित जिस प्रकार भक्ति कर्म करते हैं। विद्वान शिक्षित भी लोक संग्रह अधिक अनुयाई इकट्ठे करना चाहता हुआ उसी प्रकार करें।

⬜ Not used yet · 01:05:12:28 – 01:22:58:00 (17:45)

01:05:12:28 ठीक है? तो शास्त्र अनुकूल साधना भक्ति कौन करता है? अशिक्षित अविद्वान और आगे बहुत बड़ी बात है बहुत बड़ी बात इसमें लाइए भैया कहां गए पष्ठ संख्या 49 लास्ट में आ जाइए बिल्कुल सीधे सीधे नीचे आइए हां बहुत बड़ी बात आपके सामने आ रही है क्या लिख रहा है नीचे की दो लाइन देखिए एक ब्रैकेट में जो लिखा है जैसे जैसे से स्टार्ट करिए हां सारे रामपाली अनपढ़ है। ठीक है? देखो क्या लिखा है। जैसे अविद्वान अर्थात भोलेभाले अशिक्षित शास्त्र अनुकूल साधना तत्वदर्शी संत से प्राप्त करते

01:06:07:09 हैं। कौन प्राप्त करते हैं? अशिक्षित भोले भाले पिछड़े हुए तत्वदर्शी संत से प्राप्त करते हैं साधना वैसे ही जो शिक्षित है ये हमको बताया जा रहा है ठीक है जो बुद्धि वाले हैं ना उनको यहां बताया जा रहा है कि जैसे वो बिना बुद्धि वाले जो लोग हैं अशिक्षित है अनपढ़ है गवार है वो तत्वदर्शी के पास जाकर के जो वो भक्ति करते हैं उसी प्रकार हम जैसे लोगों को भी करनी चाहिए यहां यहां ये बताया जा रहा है इस प्रकार हम पाप को प्राप्त नहीं होंगे तो हमें उनको फॉलो करना चाहिए और जबकि वहां क्या कहा जा रहा है अभी तीन 23 में हम क्या देख आए हैं कि तीन 23 में क्या देखा था कि तीन 21 में

01:07:04:20 हम श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है अन्य पुरुष भी वैसा ही वैसा करते हैं। तो भाई श्रेष्ठ कौन है? शिक्षित या अशिक्षित विद्वान या अविद्वान अनपढ़ या फिर पढ़ा लिखा कौन है श्रेष्ठ? तो हमको बोल रहा है मूर्ख यहां पर खुद ही कह रहा है कि श्रेष्ठ को फॉलो करो और फिर मूर्ख खुद ही कह रहा है कि जो है अनपढ़ गवारों को फॉलो करो। ये है मूर्खता की पराकाष्ठा। द कॉमेडी शो। देखिए क्या लिख रहा है। भोले भाले अशिक्षित शास्त्र अनुकूल साधना तत्वदर्शी संत से प्राप्त करते हैं। कौन लोग फंसते हैं? तत्व इसके जाल में इसके जाल में कौन लोग फंसते हैं? तत्वदर्शी के नाम पे ये रामपाल के जाल में कौन फंसते हैं? अनपढ़ अविद्वान भोलेभाले। अशिक्षित ये सब ये जितने भी घूम रहे हैं ना कल तक तेल बेच रहे थे। अब आजकल वीडियो बना रहे हैं। ये भोलेभाले लोग थे। पकड़ लिया इनको काल ने फसा लिया अब हमसे कहा जा रहा है कि तुम भी इनके ही जैसा करो अब आगे देखिए

01:08:19:25 क्या है पष्ठ संख्या 50 तीन श्लोक 26 का भावार्थ है कि तत्वदर्शी संत द्वारा शास्त्र विधि अनुसार साधना प्राप्त अशिक्षित व्यक्ति की बुद्धि में शिक्षित अक्षर ज्ञान युक्त व्यक्ति भ्रम भ्रम उत्पन्न ना करे देखिए हमको कहा जा रहा है कि भैया वो जो अशिक्षित व्यक्ति है उसको तुम भ्रम उत्पन्न मत करो उसको मत बताओ तुम्हारा रामपाल जो है वो तत्वदर्शी नहीं है ये देख लो क्या कह रहा है तीन श्लोक 26 का भावार्थ हा बल्कि स्वयं भी उसकी शास्त्र अनुसार जो वो साधना कर रहा है यानी कि वो तत्वद के जाल में फंस के जो काम कर रहा है स्वयं भी वैसे ही करो ये हमको वो अप्रत्यक्ष रूप से कह रहा है भाई हाथ जोड़ रहा हूं भाई है ना मैं हाथ जोड़ रहा हूं भाई शिवश नारायण द्विवेदी टीआर पहाड़ी जी मैं आपके यहां मैं तुम लोगों के हाथ जोड़ रहा हूं मैं हाथ जोड़ रहा हूं भाई इनके इनको इनको फंसा रहने दो मेरे जाल में और तुम इनको दिखाने के लिए वही करो जो ये कर रहे हैं

01:09:29:21 खैर फिर क्या है तत्वदर्शी संत की भूमिका करने के लिए काशी नगर में यह अपना उदाहरण इसने दिया है कोई बकवास टाइप तो गीता अध्याय यहां पर इसने बार-बार कहा है भोलेभाले अशिक्षित तत्वदर्शी से ज्ञान प्राप्त करते हैं और तत्वदर्शी के नाम पर जो बताई जाने वाली साधना जिसको वो शास्त्र अनुकूल कह रहे हैं वो वो करते हैं। ठीक है? इसने खुद ही मान लिया कि मेरी मेरे झपट्टे में कौन आता है? अनपढ़ गवार अशिक्षित अविद्वान बेवकूफ मूर्ख ये सब आते हैं इसके लपेटे में खैर अ इसमें बाबूराम कह रहा है कि टीआर पहाड़ी और कथा कीर्तन यज्ञ हवन करने का अधिकारी नहीं क्योंकि गौतम ऋषि ने श्राप दिया है। बाबूराम पागल हो गया है। भटकती आत्मा। खैर अ आगे चलते हैं। तो हम लोग अपना अर्थ पढ़ लें 25 और 26 का। कर्म में आसक्त हुए अज्ञानी जन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्ति रहित विद्वान को भी लोक संग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार

01:10:44:26 कर्म करें। यहां यह बात नहीं हो रही है कि जो अज्ञानी जन कर रहे हैं वही करना है। मगर अज्ञानी जन की जो आसक्ति है भोगों के प्रति और उस आसक्ति के स्तर के कारण वह जो जो काम जो अपनी तीव्रता जिस स्तर का बल वेग लगाते हुए जो अपना कर्म कर रहे हैं आप भी पूर्ण मतलब पूरी निष्ठा से क्योंकि अभी क्या है कि आसक्ति नहीं है तो आपका कोई प्रयोजन नहीं है कर्म करने का तो उसमें ऐसा ना हो कि आपकी आपकी जो परफॉर्मेंस है जैसे मान लीजिए के ना कोई मतलब तू ना किसी को मारेगा ना तेरे मरने से कोई मरेगा और ना ही तेरे बचाने से कोई बचेगा। ठीक है? वो जो हमने पढ़ा दूसरे अध्याय के 17 से लेकर के 31 में ठीक है तो तुझे आसक्ति रहित होना है। तुझे अपने कर्म कर्मण्यवादी कारस्ते मा फलेशु कदाचना कर्म से मिलने वाले भोग के प्रति आसक्ति नहीं है। तो आसक्ति ना होने के कारण तेरा जो कर्तव्य कर्म है उसमें तेरा परफॉर्मेंस ना बिगड़े तो तेरा परफॉर्मेंस कैसा होना चाहिए? जैसा आसक्ति होने वालों को होता है वैसा ही परफॉर्मेंस तेरा होना चाहिए। वेग बल उतने ही निष्ठा के साथ लड़ो जैसा जब आसक्ति होती है तो लड़ते हैं। तो उसमें अंतर

01:12:00:04 नहीं आना चाहिए। ठीक है? तो अपने कर्तव्य कर्म को वैसे ही करें। परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्र भेद कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न ना करे किंतु स्वयं शास्त्र भेद समस्त कर्म भलीभांति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे तो यहां क्या हो रहा है कि क्योंकि तुम्हारा कोई प्रयोजन नहीं है तो अगर तुम का कार्य करना बंद कर दोगे तो तुम्हें देखकर के अन्य लोग भी समझेंगे कार्य करने से फायदा जैसे मान लीजिए नाम जप करते हैं। अरे नाम जप करने से क्या हो जाएगा? यह क्या हो जाएगा? वो क्या हो जाएगा? इस कई बार जो महापुरुष होते हैं तब भी अपने उस कार्य में लगे रहते हैं। जबकि उनके मन में सदैव चिंतन मनन चल रहा है। मगर लोग प्रभावित होकर के गलत मार्ग पर ना पड़ जाए। जो अभी मुक्त नहीं हुए हैं। जो अभी चिंतन मनन में नहीं आए हैं। जिनके परमात्मा नहीं आया है। वो उनको देखकर के अरे इससे कुछ नहीं। देखो उन्होंने महाराज जी ने भी तो छोड़ दिया। उन्होंने भी तो छोड़ दिया। तो कई बार इस कारण से इसको भी लोक संग्रह कहते हैं। इस कारण से अपने कर्म को करते रहना चाहिए। अब यहां पर देखिए एक बात और आ रही है सारभम सिद्धांत वाली बात वो क्या

01:13:15:26 है कि ये जो वर्ण व्यवस्था वाली बात है कई बार ऐसा कहा जाता है वो संत हो गए वो महान हो गए। तो वहां पर क्या है कि क्योंकि सामाजिक व्यवस्था बिगड़ ना जाए। इसलिए वर्ण व्यवस्था का जो लोकाचार है वो बंद नहीं होता कभी। कभी भी ऐसा नहीं है जो कि भाई कोई बहुत बड़ा ज्ञानी हो गया मगर उसने जो है वह जिन कर्मों के लिए अधिकृत नहीं है उन कर्मों को भी करने लगा अगर वास्तविकता में वो धर्माचरण करने वाला व्यक्ति है तो तो इसीलिए अ विरक्त होते हुए भी अपने जो शास्त्रों के द्वारा बताई हुई जो सीमाएं हैं मर्यादाएं हैं उनमें रहने वाला व्यक्ति और अपना स्वधर्म आचरण करने वाला व्यक्ति ही ठीक माना गया है। तो क्या कहा गया? परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वे शास्त्र भेद कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में श्रद्धा अश्रद्धा उत्पन्न ना करे किंतु स्वयं शास्त्र भेद समस्त कर्म भलीभांति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे। ठीक है? अब आगे 27 पे 27 से 29 का भावार्थ इसने क्या लिखा है? कि प्राणी जब तक पूर्ण संत की

01:14:31:06 शरण ग्रहण नहीं करता तब तक अपने संस्कार ही प्राप्त करता है। संस्कार संस्कार का फल तीनों भगवानों रजगुण ब्रह्मा सद्गुण विष्णु तथा तमगुण शिव द्वारा दिया जाता है। तीनों गुणों तीनों गुणों यानी ब्रह्मा विष्णु महेश अर्थात प्रकृति अर्थात दुर्गा से उत्पन्न है। ये तीनों बार-बार इसको अपना एजेंडा तो चलाना ही है। उसके बाद क्या है? अहंकार वश सर्व शास्त्रों को तत्वज्ञानी द्वारा अच्छी तरह समझकर भी अपने अहंकार युक्त हट को स्वभाव वश नहीं छोड़ता। अर्थात वास्तविकता को आंखों से देखकर भी स्वीकार नहीं करता। परंतु तत्वदर्शी संत तत्व ज्ञान के आधार से प्रत्येक प्रभु की शक्ति से परिचित होकर इन भगवानों व शास्त्रों के विरुद्ध साधना पर आसक्त नहीं होता। तत्वदर्शी कौन है? तत्वदर्शी वह है जो तत्व ज्ञान के आधार पर प्रत्येक प्रभु की शक्ति से परिचित होकर इन भगवानों व शास्त्र विरुद्ध साधना पर आसक्त नहीं होता। ये पॉइंट टू बी नोटेड है। क्यों? क्योंकि इसके अनुसार तत्वदर्शी वो सब लोग हैं जो रामपाल को मानने लगे। जिन जिनने जिन

01:15:46:14 लोगों ने ब्रह्मा विष्णु महेश को मतलब पूर्ण परमात्मा नहीं माना है वो सब तत्वदर्शी है आज से। तो तो तदशी की जो यूनिकनेस है वह समाप्त हो गई। ठीक? आगे चलते हैं। 27 से 29 का हमारा भावार्थ भी पढ़ ले। क्या है? वास्तव में संपूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं। तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है। ऐसा अज्ञानी मैं करता हूं। ऐसा मानता है तो यह जो कर्तापन है ना यही बंधन का कारण है कि आई एम समथिंग मैं यह हूं मैं वो हूं यही हमारे बंधन का कारण होता है और कई जो फिलॉसफी है जैसे कि हम भगवान से जो है ये कहा जाता है भगवान से अलग होकर के भोग करना था अलग होकर के भोग करना था इसलिए संसार के प्रपंच में फंस गए तो वो अलग होकर के अपने अस्तित्व को स्वीकार किया ना कि मैं अलग हूं भगवान भगवान से भिन्न भी मेरी कोई आइडेंटिटी है। तो यहां पर यह जो अपनी आइडेंटिटी होना अपने मन में यही बंधन का कारण है। और ये अविद्या से अविद्या भी है ये। तो मैं करता हूं। इसी बात को छुड़ाने के लिए कई

01:17:01:18 बार कहा जाता है कि भगवत कृपा से ये हुआ। भगवत कृपा से हुआ। किसी भी अच्छे कार्य को ऐसे नहीं जोड़ा जाता। कहा जाता है, सिखाया जाता है कि सब कुछ जो भी हो रहा है, भगवत कृपा से हो रहा है। जब आप ऐसे अभ्यास करेंगे, धीरे-धीरे आपके मन के अंदर वो चिंतन होने लगेगा क्योंकि आप कर्म अपनी जीभा के द्वारा बार-बार वो उच्चारित कर रहे हैं। भगवत कृपा से हुआ। तो जब भी आपके जीवन में जो कोई श्रेष्ठ कर्म होंगे, बड़ी बड़ी चीजेंगी, उपलब्धियां होंगी तो भगवत कृपा से, भगवत कृपा से इस तरह से आपको अनुभूति होने लगेगी कि भाई जो भी कर रहे हैं भगवान ही करवा रहे हैं। तो किसी भी प्रकार से हम अपने कर्मों में लिप्त नहीं होंगे। मेरे अंदर जो अहम भाव है वह कम होने लगेगा। तो यहां पर इसके बारे में भी कहा जा रहा है कि मैं करता हूं। यह मानना नहीं चाहिए। यही मोहित होने का लक्षण है कि मैं करता हूं। और मुक्त कौन है? देखिए भगवान ने क्या कहा? भगवान ने क्या कहा? कि मुझे कुछ भी कर्म करने का प्रयोजन नहीं है। वो मुख्य है। परंतु हे महाभाव गुण विभाग और कर्म विभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञान योगी संपूर्ण गुण ही गुण में बरत रहे हैं। ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता। तो कर्मों के फल में आसक्त नहीं होता है। ये 28व

01:18:17:03 श्लोक का अर्थ दिखा दिया। इसके बाद 29व श्लोक का अर्थ क्या है? प्रकृति के गुणों से अत्यंत मोहित हुए मनुष्य गुणों में कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया ना समझने वाले मंद बुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाली जानने वाला ज्ञानी विचलित ना करे। क्या हुआ कि जो लोग कर्म करने में बुद्धि रख रहे हैं कि भैया हमें कर्म से फल प्राप्त होगा। तो कर्म ना करके क्योंकि कर्म करते ही उन्हें कर्म से विरक्त होना है। तो कर्म ना करके ऐसा ना हो कि आप कर्म करना बंद कर दे क्योंकि आपको वास्तविकता पता चल गई तो ऐसा ना हो कि वह जो वह लोग जो है मंद बुद्धि जिनको कहा गया ज्ञानी जो है वो आपको फॉलो करने लगे और वो जो है अपना कर्म करना छोड़ दे तो अवस्था फैल जाए तो इसलिए आपको आसक्ति रहित होकर कर्म करते रहना चाहिए। यह इसने 3 से 29 में कहा मैं ठीक है अब आज के लिए इतना ही वह बुलेट पॉइंट्स आज के बहुत ज्यादा हो गए हम एक काम करेंगे कल रात को भी सेशन ले लेते हैं जिससे कि ये चैप्टर बहुत लंबा ना हो जाए क्योंकि इससे आगे बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं तो हम कल एक एक्स्ट्रा एक चैप्टर ले लेंगे जिसमें

01:19:32:09 कि इसके जो आज जो और 10 12 श्लोक होने थे वो हम कल उनको कवर कर लेंगे। बहुत जरूरी और आवश्यक बातें हैं। मगर आज के लिए अभी इतना ही बहुत है। लिंक दे दीजिए। यदि कोई अभी वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा नहीं करनी है। पीआर पहाड़ी जी जैसे इत्यादि जो कोई सज्जन हो भगवान के भक्त हो वो कुछ आकर के कुछ विचार छोटा मोटा कुछ समय देना चाहे तो वह आ सकते हैं।

01:20:11:27 लिंक दिया है। मेरे ख्याल से कोई है नहीं। लिंक दे दीजिए। लिंक दे दिया गया है। कोई जुड़ना चाहे तो जुड़ सकता है। आशा करते हैं आपको ये जो श्रंखला है वो ठीक लग रही हो। हमारा एक प्रयास है। क्या है ऐसी बहाने? भगवत गीता का एक अध्ययन भी चल रहा है हमारा। भगवत गीता का अध्ययन इन

01:21:02:13 द भगवत गीता का अध्ययन प्रतिकार स्वरूप किसके रामपाल एंड कंपनी के तो मेरे ख्याल से कोई है नहीं अभी जो आना चाहे और बाकी वैचारिक मतभेद के निमित्त किसी को भी यदि चर्चा करनी है तो वह जो है हमारे संपर्क सूत्र पर संपर्क कर सकता यदि किसी को कहीं हमें चर्चा के लिए बुलाना है या कोई भी इस तरह की चर्चा करनी है कि भाई वहां आ जाओ यहां आ जाओ तो वह हमें अधिकृत रूप से यदि कोई आश्रम बुला रहा है आश्रम बुलाने की बात कर रहा है तो पहले आश्रम से फोन करवाओ हम आश्रम का कोई बॉस होगा ना कोई प्रबंधक होगा वो वहां से फोन करे कि भाई यहां आ जाओ तब हम ये सोचेंगे कि वहां जाना है कि कहां जाना है ठीक है बाकी निष्ठा माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो तो आओ आकर के बताओ कि रामपाल में कितना दम है भाई क्या-क्या गपोड़ बाजी करके गया है रामपाल मूर्खता की पराकाष्ठा मूर्खता की पराकाष्ठा अब लोग कहते हैं कि भाई तुम मूर्ख क्यों कह रहे हो भाई ब्रह्मा विष्णु महेश को अज्ञानी

01:22:17:22 कह रहे हो ऋषियों को अज्ञानी कह रहे हो आचार्यों को अज्ञानी कह रहे हो मूर्ख कह रहे हो अश्लील शब्दों का उपयोग कर रहे हो तो हम चुप रहे। चलिए ठीक है। सभी को जय श्री राम। ये क्या कह रहे हैं? अमित जी बता रहे हैं कि इनके जो आश्रम है उसमें इनको। चलिए जय श्री राम सभी को और कल हम प्रयास करेंगे कि 8:00 बजे उपस्थित हो जाए। जय श्री राम सभी को।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:23:02 · 05 Jun 2025

गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 3 Ep- 5(a) #satlokashram

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A · Live गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 3 Ep-4 #satlokashram
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A · Live रामपाल के चेलों का दोगलापन #तत्त्वदर्शीसंत #rampaljimaharaj
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