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00:00:03:20 तो सभी को जय श्री राम आशा करते आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और आज आपने देख लिया है बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय है जिस पर हम चर्चा करने जा रहे हैं और आज चैनल पर एक एक अत्य सम्माननीय विभूति यहां पर पधारने वाले हैं जिनका नाम है ष महा ऋषि तो मैं उन्हें ले लेता हूं वल्लभ संप्रदाय से हैं और अपने बारे में स्वयं भी आपको बताएंगे और एक व्यवस्थित रूप से एक महत्त्वपूर्ण चर्चा आपको प्राप्त होगी जानकारिया आपको प्राप्त होंगी विशेषतः जो

00:01:00:21 विदेशी धारणाएं विदेशी विचारधाराएं और जो विदेशी तंत्र है कैसे हमारे धर्म को हमारे परंपराओं को हमारी संस्कृति को नष्ट करने के लिए अमादा है और हम अपनी इन बहुमूल्य अपनी इस बहुमूल्य सामग्री को उनके हाथों में हाल ही में परोस कर दे रहे हैं यह कहते हुए कि वो तो भक्ति सिखा रहे हैं चलिए विल करते हुए ले लेते

00:01:36:26 हैं प्रत जी आपका स्वागत है जय श्री रामय श्री कृष्ण जय श्री राम तो वैसे मैंने एक प्रयास किया है आपके बारे में यथोचित जानकारी में दे सकू हमारे दर्शको को थोड़ा सा आप अपना एक संक्षेप परिचय दे नाम तो आप बता ही चुके हैं प्रत्युष महर्षि मेरा नाम है मूल हम लोग मथुरा के रहने वाले हैं सूर्य घाट बट स्वामी घाट जिसका बंगाली घाट नाम है वहा से जी एक मिनट बस मैं कहूंगा आप शायद हेडफोन जो यूज कर रहे हैं ना उसको ना करके आप डायरेक्ट बोलेंगे तो ज्यादा अच्छी आवाज आएगी अच्छा ठीक जी और थोड़ा कैमरा ऐसे करले कि आपका फेस है ना यह कट रहा है आपका ऊपर आधा थोड़ा सा

00:02:41:10 दिखाई आपका वीडियो दिख नहीं रहा है यह बोल रहे हैं अभी दिख रहा है अभी दिखाई दे रहा है इनका चेहरा स्क्रन शेयर नहीं हुआ है शिवांश जी दिख रहा है ना हम दोनों का ही ठीक से दिख रहा है ठीक है मगर बस आपका वो ऊपर का फोरहेड कट रहा है थोड़ा सा हा असल में क्या है ये टैबलेट है मेरे पास में और ये टेबलेट जो है टे हो रहा है तो भी साथ में टेढ़ हो रहा है तो आप ठीक कर लीजिए आप सेंटर में आ जाइए या तो मैं प्रयास करता हूं श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण आदित्य जी छोटों को ढेर सारा आशीर्वाद प्रेम स्नेह बनों का

00:03:52:04 सम्मान जय श्री राम जय श्री राम हां बात करते हैं भेजिए किसी कश्चन कश्चन को हा जी अभी है मेरी स्क्रीन से कमेंट हटा दीजिए ऑपरेटर जी आपसे नहीं कह रहा प्रतीश जी आपसे नहीं कह रहा जी ऑपरेटर जी

00:04:31:19 यह कमेंट हटा दीजिए ऑपरेटर जी स्क्रीन से चलिए तो प्रत्युष जी अपने बारे में बताए उससे पहले मैं एक बार और थोड़ा सा बता दूं वल्लभ संप्रदाय से दीक्षित है प्रामाणिक परंपरा से और इनके गुरुजनों के बारे में भी अभी बताया जाए एक बहुत विशेष बात है इन्होंने एक ग्रंथ लिखा है जिस ग्रंथ में इन्होंने प्रबल रूप से जितने भी ऐसे सनातन परंपरा विरोधी तत्व है उन पर जो है इन्होंने प्रतिकार किया है उनका उस ग्रंथ के माध्यम से और उसमें इकोन के बारे में भी एक बृहद इन्होंने चर्चा की है क्योंकि इनका स्कोन पर भी एक वो भी हम सब बातें करने वाले हैं कोन पर इनकी इतनी वृहद जो है व्याख्या कैसे इन्ह प्राप्त हो पाई तो सबसे पहले प्रती जी आप अपने बारे में अपना जो जो आपका जो पारंपरिक बैकग्राउंड है वो आप थोड़ा सा बता दे जी वंदे श्री वल्लभाचार्य चरण श्री कृष्णा

00:05:47:08 आप नाम तो मेरा सबको बता ही चुके हैं और मैं य भी बता च हम मूल मथुरा के रहने वाले हैं और मथुरा में सूर्य घाट बट स्वामी घाट यहां पर हमारे पूरे संपूर्ण कुल का ही निवास स्थान था लगभग लगभग जब महाप्रभु जी मथुरा पधारे श्रीनाथ जी को प्रकट किया और मथुरा नगरी को घाट के एरिया को पुनः बसाया क्योंकि गजनवी के कतलम के पश्चात से पूरी मथुरा उजड़ी पड़ी थी तो हमारा पूरा कुल उस समय जो मथुरा में था सब श्रीम महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के सेवक हुए ये बात है 1492 ईसवी की 1492 में मैं एक बात क्लियर कर दूं महाप्रभु जब वे बोल रहे हैं प्रत्यूष जी तो महाप्रभु जी संबोधन हो रहा है वल्लभाचार्य जी महाराज के लिए क्योंकि महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु के सामने भी लगता है वह भी काफी प्रासंगिक है इसलिए दर्शक समझ पाए कि महाप्रभु किसकी बात हो रही है तो इसलिए जी जी जी तो महाप्रभु श वल्लभाचार्य जी जब पधारे तो हमारा पूरा कुल उनका सेवक हुआ और ऐसे ही मतलब संपूर्ण कुल व्रज का ही निवासी रहा है प्रारंभ से तो और सभी वैष्णव संप्रदायों में समस्त संप्रदायों में मेरे अपने पूर्वज गौड़ीय संप्रदाय में भी

00:07:02:10 सूरदास मदन मोहन थे गौड़ीय संप्रदाय के सूरदास थे ये सूरदास मदन मोहन जी नाम से प्रसिद्ध थे सनातन गोस्वामी रूप गोस्वामी के सेवक थे ये मेरे पूर्वज रहे हैं एक निंबा संप्रदाय के आचार्य बिहारी दास जी बड़े प्रसिद्ध हुए हैं वोह भी हमारे पूर्वज माने कहे जाते हैं घर में यही बताया जाता है हमारी कुल परंपरा में भी यही बताया जाता है मेरा ननिहाल जो है उनका मेरा ननिहाल वृंदावन में है और नाना जी ये सब इनका परिवार राधा वल्लभ संप्रदाय को बिलोंग करता है और सौभाग्य से नाना जी के बहुत अच्छे मित्र थे प्रभुपाद जब भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद स्कन के संस्थापक जब ये वृंदावन सन्यास लेकर के आए थे तब अच्छा नाना जीन के बहुत अच्छे मित्र थे और उससे पहले से ही काफी अच्छे मित्र रहे थे इसका वर्णन हां मेरे नाना जी बड़े नाना जी मेरे श्री हित शरण शर्मा उनका नाम था वृंदावन में इनका निवास था और ये प्रभुपाद भन स्वामी प्रद के बहुत अच्छे मित्र थे तो प्रभुपाद जी कई बार नाना जी के य घर भी पधारे हैं और जब उन्होंने भागवत इंग्लिश में पहली बार लिखना प्रारंभ किया प्रभुपाद ने तो छ पाने के पैसे नहीं थे तब नाना जी ने विदाउट

00:08:17:25 एनी कॉस्ट अपनी निजी प्रिंटिंग प्रेस राधा प्रेस के नाम से दिल्ली में जो है उसमें प्रिंट करा कर के छापा था और प को कहा था प्रभुपाद जी को कि आपके पास जब धन आ जाए तब आप इस पेमेंट कर दीजिएगा पहला भागवत का सेट और प्रभुपाद की पहली बैक टू गॉड हेड जब सन्यास लेकर आए थे तब जो छपी है तो राधा प्रेस में छपी है नाना जी की जो निजी प्रिंटिंग प्रेस थी वहा और उसके पश्चात सत स्वरूप दास गोस्वामी जिन्होंने यह प्रभुपाद लीलामृत लिखा है उसको लिखने के समय भी मेरे नाना जी के घर दिल्ली में आकर के काफी महीनों तक उन्होंने निवास किया और इसके प्रभुपाद लीलामृत के लेखन का कार्य किया है तो ऐसा था कि वहां पर मेरे ननिहाल में प्रभुपाद के ग्रंथ शुरू से ही मौजूद थे मैं बचपन से ही उनको मुझे पढ़ने का और उनको देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो कई सारे इनके ग्रंथ आत्म साक्षात्कार का विज्ञान हिंदी में भी इंग्लिश में भी थे प्रभुपाद लीलाम उनका अध्ययन मैंने काफी पहले से ही मेरा हो चुका था चैतन्य चरिता और भागवत का अध्ययन मैंने तब नहीं किया हमारे परिवार था वल्लभ संप मथुरा के थे वल्लभ संपदा तो जब मैं था तो तब मैं तब भी मैं स्कन

00:09:32:26 के कांटेक्ट में आया थान पुणे में राधेश्याम प्रभु राधेश्याम दास ब्रह्मचारी राधेश्याम प्र काफी अच्छे भक्त है तलंग तैलंग नहीं तमिल ब्राह्मण परिवार से बिलंग करते थे वो उनके कांटेक्ट में रहा व उनका वॉइस नाम का ग्रुप चलता है और वहां पर मायापुर वॉइस नाम से था भारतीय विद्यापीठ के पास वहां मैं जाया करता था वहां मुझे काफी अच्छा लगता था प्रारंभ में तो नहीं नहीं भगवान का नाम लिया जा रहा हैको भगवान के नाम लेने के बारे में बताया जा रहा है आस्तिक बना रहे सब लोगों को और जब उन्ह पता लगा कि मेरे नाना जी प्रभुपाद के बहुत अच्छे मित्र थे और प्रभुपाद लीलामृत में नाना जी के बारे में लिखा हुआ है तो तो मुझे आग्रह करके बला हु लीला प्रभुपाद लीलामृत में नाना जी के बारे में उन्होंने काफी लिख रखा है और इवन तो ये आप थोड़ा सा डिस्क्रिप्शन बता सकते हैं कहां पर लिखा है यह बिल्कुल बता सकता हूं मैं प्रभुपाद लीलामृत में जो

00:10:41:10 है अच्छा मेरी स्क्रीन यहां पर शेयर हो पाएगी शायद नहीं हो पाएगी आपकी वो बुक बुक से दिखाना है ना आपकी आपकी बुक से दिखाना है प्रती जी आपकी आवाज नहीं आ रही अभी हेलो हा जीी आवाज आ रही है मेरी अभी आवाज आ रही है आपकी बुक से दिखाना है बुक में लेकिन य प्रभुपाद लीलामृत का वो नहीं है स्क्रीनशॉट नहीं है में प्रभुपाद लीला कोई बात नहीं बाद में आप दे दीजिएगा हम पिन कमेंट में डाल देंगे कोई बात इसके पश्चात प्रने ख को वे सब्रह करके नाना जी को म मामा जी को दिए गए थे वो सब मेरे पास में है ओरिजनल लेटर प्रभुपाद के और नान एक चीज मैं क्लियर कर दू की प्रत्युष जी के जो नाना जी है उनके प्रभुपाद जी मित्र थे और प्रत्युष जी के जो नाना जी है उनका नाम जो प्रभुपाद लीलामृत नाम के नाम की पुस्तक छपती स्कोन द्वारा उसमें दिया गया है और इसके साथ ही साथ इसके साथ बहुत से ऐसे लेटर्स है जो इनके

00:11:56:14 पास अभी भी है जो उनके बीच में जो पत्राचार हुआ है प्रभुपाद जी और इनके नाना जी के बीच है ना तो ये प्रभुपाद जी को जानने की जो एक बात है ना कैसे जानते हैं तो उस बारे में बात हो रही जी बताए तो इसके बाद जब वहा वॉइस में मैंने चैतन्य चरितामृथम ने श्रीमद वल्लभ जी के साथ वाद विवाद किया भक्ति रसा मृत सिंधु नामक ग्रंथ प ये रूप गोस्वामी द्वारा लिखित ग्रंथ है कथा ऐसी आती है भक्ति रत्नाकर में बंगाली ग्रंथ है इसमें ऐसी कथा आती कि भक्ति रसा मृत सिंधु का लेखन रूप गोस्वामी ने किया तब जीव गोस्वामी वही थे और श्री वल्लभाचार्य मिलने आए उनसे तो उन्होंने अपनी पुस्तक दिखाई वल्लभाचार्य जी कोय भक्ति रसा सिंधु हमने लिखा आप इसको देखें तो उन्होंने देख कर उसम कुछ त्रुटि बताई तो जीव गोस्वामी जो थे वो उन्होंने वाद किया उनसे नहीं नहीं आप ऐसा कैसे कह सकते हैं वाद करके उनको पराजित किया तो वल्लभाचार्य जी चले गए किय तो आपका शिष्य बड़ा होशियार है तब रूप गोस्वामी ने कहा कि क्यों भाई तुम वो नहीं तुम्हारे अंदर ऐसे मैनर्स नहीं है ये शिष्टाचार

00:13:11:14 नहीं आया अभी तुम्हारे अंदर धैर्य नहीं आया तुमने ऐसे इतने वैष्णव चार्य से कैसे तुमने वाद विवाद किया जब अभी तुम वापस जाओ बंगाल और जब मन तुम्हारा शांत हो जाए तब यहां आना वृंदावन और ऐसा कह कर उनका त्याग कर दिया ऐसी स्टोरी आती है लेकिन इस कथा में कठिनाई यह है कि भक्ति रसा मृत सिंधु ग्रंथ का लेखन 1542 ईसवी में हुआ है और महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी इसके कई वर्ष पहले 1530 299 ईसवी में लीला प्रवेश कर चुके थे वाराणसी तो असंभव है कि भक्ति रसा मृत सिंधु भक्ति रसा सिंधु के ऊपर कोई वाद हुआ हो अथवा यह भी असंभव है कि जीव गोस्वामी जी ने महाप्रभु वल्लभाचार्य के दर्शन ही किए हो क्योंकि इनका वृंदावन आगमन का जो संवत दिया जाता है व संवत ही 1535 ईसवी कहा जाता है खुद प्रभुपाद के द्वारा और खाली प्रभुपाद ही नहीं कई सारे ग्रंथ और भी हमें प्राप्त होते हैं एक जगदानंद दास जी नाम के गौड़ीय वैष्णव भी थे इन्होंने भी सेम यही बात लिखी है अपने ब्लॉग में अपने आर्टिकल में कि यह बात संभव नहीं है वल्लभाचार्य जी से जीव गोस्वामी किसी भी परिस्थिति में

00:14:27:01 भेंट कर ही नहीं सकते तो बेट करके वाद करके उनको पराजित करना तो मैंने उनको कहा जब संभव नहीं है तोय आया कैसे इसका मतलब किसी ने इसमें इंटरपोलेशन किया है बाद में इसको प्रक्षिप्त कर दिया गया तो तब से मेरा थोड़ा वहा से टपट प्रारंभ हुई और उसके बाद जब चैतन्य चिमत को देखा तो उसमें तो बहुत सारी ऐसी चीजें आई जिनके बारे में अभी हम आगे चर्चा करेंगे तो तब फिर मैं वहां से अलग हुआ और तभी उसी समय के दौरान मैं मेरे गुरुजी पूज्य गोस्वामी श्याम मनोहर दीक्षित जी महाराज इनसे मैं मिला तब तो खर उन्होंने ज्ञान की गंगा ब आप अपने अपने गुरु महाराज जी अपनी परंपरा का भी थोड़ा उनकी गुरु महाराज जी की और वहां से लेकर वल्लभाचार्य जी तक की थोड़ी सी बता दे लोगों को जी जी मेरे गुरु जी गोस्वामी श्याम मनोहर दीक्षित जी महाराज श्री य आप श्री किशनगढ़ से बिलोंग करते हैं किशनगढ़ राज परिवार के गुरु रहे हैं शुरू से मतलब प्रारंभ से तो उस फैमिली से बिलोंग करते हैं एंड किशनगढ़ में आप श्री का मूल निवास स्थान है और फिलहाल मुंबई यूनिवर्सिटी में वल्लभ वेदांत का अध्यापन करते हैं प्रोफेसर के उस में वो कोर्स वेदांत में सभी वेदांत उसम

00:15:42:02 जितने भी वेदांत हमारे सारे दर्शन है उनका इंट्रोडक्टरी रूप में और वल्लभ वेदांत क्या है कैसा है यह आप श्री वहा अभी पढ़ाते हैं अध्ययन अध्यापन करते हैं आप ने कई सारे ग्रंथ भी लिखे हैं एंड पंडित चराज को भी आप श्री ने विष्णु पद गायन सिखाया बहुत वेदांत पर और इतिहास के विषय पर आप बहुत बहुत सूक्ष्म और गहन प आप श्री के पिताजी दीक्षित जी महाराज जो थे बृहण मंदिर मोटा मंदिर मुंबई के उन्हो दीक्षित जी महाराज का जो मोटा मंदिर था इसकी ऐसी बात है कि प्रभुपाद जो थे उन्हें यूएस जाना था और इसके लिए वे मोटा मंदिर में आकर के उन्होंने जो मोटा मंदिर की सीढ़िया है प्रभुपाद वहां पर बैठ जाते थे और और दीक्षित जी से विनती की आप हमें वहा भिजवाए यूएस भिजवाए तो ऐसा जब कुछ दिनों तक हुआ तब दीक्षित जी ने उनकी शिष्या थी सुमति मुरार जी मुरार जी देसाई की धर्मपत्नी उन्होने सुमति मुरार जी को कहा आप इनको यूएस भिजवाने का प्रयत्न करें सुमति मु जी ने अपनी गुरु आज्ञा का पालन किया और प्रभुपाद को अपनी प्राइवेट शिपिंग कंपनी के जहाज जलदूत में म जलदूत में उनको यूएस पहुंचाया था तो

00:16:57:19 बहुत अच्छे इनके संबध रहे थे लेकिन उसके पश्चात कुछ ऐसी घटनाए हुई जिससे उन्होंने महाप्रभु जी के बारे में जब कुछ आर्टिकल लिखे तो कुछ प्रश्न उठने लगे तब श्याम मनोहर दीक्षित जी ने अपने पिताजी से पूछा कि भा आप ऐसा पत्र छाप रहे हैं तो हमें क्या करना चाहिए तो उन्होने कहा आप उत्तर लिखो इसका तो दीक्षित जी की आज्ञा से श्याम मनोहर जी ने उनसे पत्राचार भी किया प्रभुपाद से वो पत्राचार का फिर उन्होंने उत्तर दिया फिर तिलका महाराज ने जो नाथ द्वारा में श्री जी के प्रधान पीठ के तिलका महाराज सेवायत आप श्री गोवर्धन लाल जी महाराज श्री ने भी बहुत लंबा पत्राचार किया प्रभुपाद से उसका भी उत्तर आया और उनकी सबकी समीक्षा मैंने मेरी पुस्तक में करी हुई है जो जो उत्तर प्रभुपाद की तरफ से आए श्रीधर स्वामी आदि को लेकर के जो जो बातें उन्होंने कही विष्णु स्वामी आदि को लेकर के महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को लेकर के जो जो बातें कही उन सबकी समीक्षा की है उसके पश्चात उनके शिष्यों ने जो जो बातें कही उसकी भी हमने समीक्षा करी खर सो यहां प्रारंभ हुआ जी कुल मिलाकर के दर्शकों को इसमें अब कोई डाउट नहीं होना चाहिए कि यह कितने प्रामाणिक है वल्लभ संप्रदाय की ओर से और जो प्रभुपाद

00:18:12:20 जी है उनके बारे में जितना शायद एक आम फॉलोअर नहीं जानता होगा इनको वो तक बातें पता है तो आज हम इन्हीं सब बातों बात करने चाह रहे अच्छा मैं यह जो बात है कि उन्होंने दावा किया गया कि उन्होंने वल्लभाचार्य जी का खंडन किया यह दावा किया जाता है स्कोन के द्वारा है ना तो इसमें टाइम लाइन ही अलग अलग है दोनों की मतलब 10 12 साल 20 साल का अंतर है ऐ गोस्वामी जी ने महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से वाद किया यह असल में भक्ति रत्नाकर नाम का बंगाली ग्रंथ है जिसमें आता है और सच्ची बात तो यह है कि जितने भी रिसर्चर हुए हैं बंगाल के ही या फिर कोई भी जैसे अमिया पी सेन है इन्होंने चैतन्य हिज एसोसिएट्स एंड हिज लाइफ ऐसी बुक लिखी है उसमें वो से लेकर के चाहे राधाश्याम बागची हो इन सभी को इनवेरिएबली स्वीकारना पड़ा है कि यह चीज संभव नहीं है जो चैतन्य चरितामृथम

00:19:15:07 ग्रंथों की प्राचीन ग्रंथों की विरोधी है वो संभव ही नहीं है और फिर भी चैतन्य चरितामृथम पी सेन कहते हैं कि इन बातों को लेखक ने बाद में जाकर के अपनी ओर से लिखा है इनका कोई प्रमाण नहीं है ये योग्राफी योग्राफी याने बढ़ा चढ़ा करके लिखी गई कथा हा हा जैसे किया जाता है जी ठीक है तो अभी एक हमारे सामने एक वीडियो आया था जिसमें प्रभुपाद जी के दो शिष्य आपस में बात कर रहे हैं दोनों फॉरेनर्स ही है ऑपरेटर जी आप वो वीडियो दिखा सकते हैं अभी आपको भेजा गया था कुछ समय पहले रिसेंट वीडियो वही भेजा हमने आपको प्रत जी आप नहीं रहे हैं मतलब आपका फ्रीज हो गया है जो चित्र

00:20:18:22 है प्रत जी आपका जो चित्र है वो रुक गया है और अभी कुछ समय पूर्व हमने ऑपरेटर जी आपको उपलब्ध कराया वीडियो वो थोड़ा सा आप दिखाए तब तक इनको जवाब देते एलियन जी आप आना चाहते हैं अ चर्चा के लिए तो तो ऐसा है कि पहली बात तो आज हम लोग चर्चा करेंगे

00:21:13:21 नहीं सम पायस फ्रड गोइंग न देर राइट सो देन यह आप प्ले करिएगा जब वो वापस आ जाए तो एलियन जी आज जो है हम लोग वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा नहीं करने बैठे हैं आज हम लोग इसकन को समझ रहे हैं इन द पर्सपेक्टिव इन द पर्सपेक्टिव ऑफ वल्लभ संप्रदाय स्कोन के क्लेम कितने अनर गर्ल और झूठे हैं

00:22:01:09 है ना तो और कैसे यह सब चीजें अभी सामने आएंगी वह अभी डिस्कनेक्ट हो गए किसी कारण वश और हम लोग इंतजार कर रहे हैं कि वह जल्दी से जल्दी आए तब तक हम लोग बात कर ले एक मैत्रे जी है मातृशक्ति हैं उनसे भी हमें मिलना है क्योंकि वो काफी अच्छे से वर्णाश्रम धर्म इत्यादि को रिप्रेजेंट कर रही हैं प्रत्यूष जी आ गए मगर प्रत्यूष जी एक बात का हमारा और शिकायत रहेगी कि आपका पूरा वीडियो ऐसे ही आएगा हां ये कटा हुआ आ रहा है मैं इसका प्रयास कर रहा हूं क्योंकि ये आप आप मोबाइल से जुड़ सकते हैं

00:22:56:21 क्या ये ठीक है हां ठीक है ठीक है थोड़ा सा उसको और ऐसे कर लीजिए हल्का सा ऊपर की ओर अभी ठीक हुआ था अभी ठीक हुआ था बस नीचे आ जाता है वापस योगा ऑफ लव का रिप्लाई नहीं आया आपको क्या लगता है आएगा मुश्किल है अब ठीक है परफेक्ट ठीक हा

00:23:40:07 तो यह एक वीडियो हम हमारे पास आया है जिसमें कि प्रभुपाद जी के शिष्य हैं दोनों आपस में बात कर रहे हैं एक प्रभुपाद के शिष्य है एक प्रभुपाद के शिष्य है और एक उनके शिष्य है अच्छा तो इसको जरा जरा वीडियो दिखा दीजिए लोगों को ये वीडियो देख लीजिए आप लोग तो इसमें वो किस तरह से द्वेष भावना भरी हुई है ये जो कहते हैं ना प्रामाणिक संप जीय फ्रड गोइंग ऑन देर राइ सो देन सो व रिली डिस्कसिंग र इ द बबस देर हिस्टरी टू द बप नॉट एकली लाइक ए ब दे अ बिट हिस्टरी देर एंड इन द हिस्ट दे स्लिंग द थेफ्ट अ अ टी एंड अ कोर्ट केस एंड अ अ रिस्टड कोर्ट केस जस्ट ू जंप अहेड इन द स्टोरी श प्रप आ गु म ड हिज डिपल

00:24:55:10 अ ग r महाराज अ सस अ न् स्टडिंग इन इसन व बक इन द डे वन गिराज महारा वाज द टपल प्रेसिडेंट द बमबे टपल ज इ j जपल इ बमबे ही रिस्टड गही सेड हि इफ य इफ यू एवर बम पावरफुल इन र वडस इसकन एवर बम्स पावरफुल र इन इंडिया एंड इन a स् पो देन य यू शड टेक द बबस ट कोट ए यू श सु एंड यू शड ग आटी द दे स्टोल यू श गट द टी बक वर स्किंग अब द टी अफ ी इ थ इ न स there's a हिस्ट हा आ इ ग p b वा s बन ट वशिप गोल दले ड ठीक है मेरे खल से इतना काफी

00:26:10:27 है जीय बो रहे हा जी बताइए प्रभुपाद ने अपने शिष्य गिरिराज को बोला कि इफ यू कैन गेट एनफ पावर इन फ्यूचर यू शुड टेक बैक आवर डीटी फ्रॉम लवाइट एंड देम टू कोर्ट कि इनको आपको कोर्ट में लेकर जाना चाहिए और हमारे जो डीटी है हमारी जो विग्रह है वो इन्होने चुराए ऐसा यह प्रभुपाद ने कहा अब यदि ऐसी बात है तो फिर तो यही बात हो गई कि परोक्ष कार्य अता प्रत्यक्ष प्रिय वाद क्योंकि प्रभुपाद जो दीक्षित जी महाराज की कृपा से यूएस पहुंचे थे एक पुष्टि मार्गी वण सुमति मुरार जी ने प्रभुपाद की सहायता करी बहुत से पुष्टिमार्ग ने और भी प्रभुपाद की सहायता करी उनसे वे पहुंच पाए यूएस तक तक और वहां पहुंचने के पश्चात जब इसकन पावरफुल हो जाएगा तो ये श्रीनाथ जी को वल्लभ संप्रदाय से छीन ले ऐसा कह रहे हैं प्रभुपाद अब ये पता नहीं ने क्यों कहा अच्छा एक लेकिन इसकन की वैष्णव है दूति देवी दासी जी परिचित है उनसे बात हुई है उन्होंने गिरिराज महाराज से पूछा कि महाराज कुछ ऐसा प्रभुपाद ने आपसे कहा था क्या तो गिरिराज महाराज ने नाय कर दिया कि नो

00:27:26:01 नोनो ऐसा नहीं कहा था अ तो गिरिराज महाराज झूठ बोल गए या तो ये झूठ बोल अब एक चीज यहां पर हम देखेंगे गराज महाराज ने एक बुक लिखी है उस बुक को हम य पर एनालिसिस करेंगे अभी अंत में उस बुक में हम ये देखेंगे कि गिरिराज महाराज ने और भी कुछ मिसकनसेप्शन को फैलाने का कार्य किया है तो मेरे हिसाब से तो य य पर सही बोल रहे हैं कि प्रभुपाद ने ऐसा कहा होगा क्योंकि जब पत्राचार चल रहा मतलब गिराज जी ने प्रभुपाद जी से भी अग और भी कुछ मिसकनसेप्शन फैलाए मतलब ऐसा कुछ है हां बिल्कुल और भी मिसकनसेप्शन फैलाए हैं मत मतलब एक कदम आगे ऐसा कहना एक कदमस र है प्रभुपाद के डिपल ये तो प्रभुपाद से और 10 कदम आ ऐसी निंदा

00:28:20:22 तो कभी भी किसी भी ना तो वैष्णव संप्रदाय और ना शंकर संप्रदाय ना कोई स्मार्थ ना कोई शव किसी ने भी ऐसी निंदा नहीं करी है जैसी ये कर गए हैं वो भी दीक्षित जी की सहायता लेने के पश्चात पुष्टि मार्गी वैष्णव की सहायता लेने के पश्चात जैसी नि कर गए हैं नरसिंह स्वामी जी पु मार्गी वैष्णव ने इनको यथा सामर्थ्य सहायता प्रदान की इनके ग्रंथ छप वाए गए स्कोन वालों के उनको यहां से वहां विदेश जाना था तो विदेश यात्रा भी व्यवस्थित करवाई गई और उसके बाद वहां जाकर के पुष्टि मार्ग मागियो के बारे में ऐसी बात है जो कि मर्यादा के बाहर है अगर आप तात्विक खंडन करने निकले तो एक बात अलग है नहीं वो ठीक स्वीकार आप बिल्कुल खंडन करें वो तो आपका अधिकार है बिल्कुल करें तवा के आधार पर खंडन करें अपने मत के आधार पर खंडन करें व तो बिल्कुल आपका अधिकार है उसका उत्तर भी दिया जाएगा व झूठी खबर फैलाना और फिर क्या कहते

00:29:31:00 जी अप प्रामाणिक जानकारिया फैलाना बिल्कुल अपमा जानकारी ये ब अशोभनीय बात है किसी को भी शोभा नहीं देता कहा अशोभनीय है हम आ देखेंगे प्रभुपाद की जो भी इनकी चर्चा वगर है वो हम आगे देख एकज और पूछा की सबसे पहले अगर देखे तो क्योंकि प्रभुपाद जी जन्म से ब्राह्मण नहीं थे और उन्होंने सन्यास भी लिया और जैसे कि उन्हो उनके गुरु जो है फोटो से सन्यास लिया अच्छा तो सबसे पहले तो हम यह जान ले कि वल्लभ संप्रदाय का क्योंकि आप देख ही रहे हैं कि कौन किस तरीके से कार्य कर रहा है कि वह कर्म से भी है जन्म से भी ऐसी खिचड़ी पकाई हुई है और सबसे बड़ी दिक्कत पता है क्या है कि इनके लोग अगर एक व्यक्ति एक बात बोलेगा तो दूसरा व्यक्ति उस उस बात को काटते हुए दूसरी बात बोल देगा तो फिर दिक्कत य आएगी कौन सी बात को बोरहा है नहीं ये बात आप बिल्कुल सत्य कह रहे हैं यह बात मैंने भी बहुत बहुत बात देखी है क्योंकि मैंने महाप्रभु के प्रति इस की चीज आ रही है इसको लेकर के मैंने बहुत पत्र भी लिखे हैं इसने भी भेजे थे और कई और भी इनको गौड़ी वैष्णव को मेल भी किए

00:30:46:00 थे लेकिन जी उसके बारे में र मैं आगे चर्चा करूंगा उसका कभी कोई उतर सबसे पहले हम इसको जान ले कि वल्लभ संप्रदाय में जो वर्ण व्यवस्था है वह किस आधार पर है जन्म के आधार पर है और मैं प्रश्न पूरी तरीके से रख दूं कि अगर वह जन्म के आधार पर ये तो अपना पर्सपेक्टिव थोड़ा सा बता दीजिए वल्लभ संप्रदाय में आपको क्या ज्ञान प्राप्त हुआ है और फिर स्कन जो कर रहा है स्कन जो कर रहा है उसको लेकर के वल्लभ संप्रदाय के दष्ट दृष्टिकोण में आपको जो आपके गुरुजनों से जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसके अनुसार व स्कोन की व्यवस्था क्या ठीक है उचित है या जो भी है वो आप थोड़ा सा बता दें जी देखिए मैं महाप्रभु जी ने जो स्वयं जो वचन कहे हैं उनके आधार पर ही बात करूंगा महाप्रभु जी ने सदैव अपने नियत वर्णाश्रम धर्म को पालन करना जैसे यदि ब्राह्मण है तो आप संध्या वंदन करिए आपका नित्य कर्म है इस प्रकार से अपने जन्म से ब्राह्मण यदि आप जम से ब्राह्मण है दे जाए जन्म से कर्म से तो महाप्रभु जी ने दोनों से माना महाप्रभु जी स्पष्ट रूप से ऐसा लिखते हैं कि जाति जैसी चल रही है इसका स्वरूप वैसा ना होकर

00:32:01:07 के महा आगे पुरुषोत्तम जी ने इसको क्लेरिफाई किया है पुरुषोत्तम जी ने महाप्रभु जी के सभी ग्रंथों पर टीका लिखी तो इसमें उन्होंने एक अवतार वादा वाली ग्रंथ में ब्राह्मणवादी देवता वाद में इस इन सब चीजों को क्लियर किया है कि ब्राह्मण जो है वो देवता कैसे है क्या है तो उसम आप श्री आज्ञा करते हैं कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश और शूद्र यह चार असल में है क्या क्या ब्रह्मा जी से चार शरीरों की उत्पत्ति हुई थी चार आत्माओं की उत्पत्ति हुई थी क्योंकि ब्राह्मण के शरीर में आत्मा तो जन्मांतर में दूसरी आती रहती है और शरीर की यदि उत्पत्ति हुई थी तो शरीर कैसे ब्राह्मण हो सकता है शरीर तो मल मूत्र से भरा हुआ है तो उसके ऊपर उन्होंने उत्तर यह दिया है कि असल में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश और शूद्र ये चार देवों के नाम है जो ब्रह्मा जी के शरीर से प्रकट हुए अब जो व्यक्ति ब्राह्मण कुल में जन्मा है जिसके सात पीढ़ी से पिता सात पीढ़ी से माता ब्राह्मण है वो यदि अपने संस्कार सारे उसने संस्कारों को ग्रहण किया है गुरु कृपा से संस्कारवान वह है अब वो यदि अपने नियत कर्मों को करेगा अर्थात संध्या बंदन या फिर जो भी अग्नि होत्र उपासना आदि विश् देवद यज्ञ उनको करेगा तब तो उसमें इन ब्राह्मण देवता का आवेश होगा तब वह

00:33:16:09 ब्राह्मण कहा जाएगा यदि उसने विरोध में कर्म किया जन्म लेने के बाद भी तो पतित हो जाएगा तो वो चांडाल समान ब्राह्मण नहीं जैसे उसने सुरा पान योग्यता है नॉमिनेटेड है पर सिलेक्टेड नहीं है हा बिल्कुल बिल्कुल मतलब नॉमिनेटेड है पर सिलेक्टेड नहीं हम भी इसी बात को प्रचारित करते हैं कि भाई जन्म से होना चाहिए फिर यदि उसके कर्म होंगे तो उसका सिलेक्शन होगा कर्म नहीं होंगे तो कर्महीन प तो बहिष्कृत हो जाएगा जाति बहिष्कृत आप हो जाए तो इसलिए महाप्रभु जी ने जन्म और कर्म दोनों को कहा है और यही चीज भगवान जन्म और कर्म ही दोनों सारे संप्रदाय जन्म और कर्म को ही लेक चलते हैं कोई भी व्यास गद्दी पर तभी बैठ पाएगा व्यास गद्दी पर तभी बैठ पाएगा जब उसने जन्म भी लिया हो फिर जन्मा निसार फिर अपने वर्ण के वर्ण गत उसने आचरण को धारण भी किया हो मगर ऐसा नहीं कर सकते केवल जन्म ले लिया मगर उसने सारे कार्य विपरीत किए उसको व्यास बना दिया जाए गुरु बना दिया जाए और ऐसा भी नहीं किया जाएगा केवल उसने कर्म अच्छे कर लिए मगर वो उस उस वर्गत उसमें कुल में जन्म नहीं लिया है तो उसको भी हम वो नहीं करेंगे मगर हम नहीं करेंगे ऐसी बात नहीं है

00:34:31:15 हमारे वेदों में ऐसी लिमिटेशन है वेदों में स्पष्ट रूप से इस बात को कहा गया है जैसे हमारे अवाद मंत्र जो ब्राह्मण लेते हैं तो उसम प्रवर होते हैं ब्राह्मणों के प्रवर यानी जो हमारे पूर्वज ऋषि मंत्र दृष्टा ऋषि रहे उनके नाम ही प्रवर है अब वो जैसे सरकारी काम करने के लिए हम बताते हैं सरकार में कि हमारे फलाने फलाने मंत्री जी या हमारे फलाने अफसर है तो हमारा काम पहले किया जाए ऐसे देवताओं को भी अपने पूर्व ऋषियों का नाम लेकर के हम बताते कि हमारे मंत्र दृष्टा ऋषि रहे हैं कृपा हम पर कृपा करें तो उनका नाम लेने की ऐसी परंपरा रही है अब वो जन्म से ही होते हैं शाखा जन्म से निर्धारित हो रही है वेद की शाखा कौन सी है आपकी ग्रहीय सूत्र आपका कौन सा सूत्र कात्यायन है आलाय है बौधायन ये जन्म से निर्धारित हो रहा है तो इन सबको आप वो कर ही नहीं सकते आप कौन सी शाखा का आप चयन करेंगे क्या करेंगे ये आप कर्म से नहीं कर सकते और दूसरी असल बात जो है जो भी ऐसा कहता है कि कर्म से होता है सब कुछ जन्म से नहीं होता व देखा जाए तो मूर्ख बना रहा है क्योंकि जन्म भी अंतत तो कर्म से ही हो रहा है ना पूर्व जन्म के कर्मों से ही तो जन्म हुआ है पूर्व जन्म के कर्मों से ही तो जन्म हुआ है तो जन्म तो कर्म का ही प्रमाण है तो कोई य ऐसा कहर कि नहीं नहीं हम तो कर्म से वण मानते जन्म से नहीं मानते तोव मूर्ख बना रहा है सब लोगों को जन्म

00:35:46:16 तो कर्म के ही अंतर्गत आ रहा है तो मूर्ख बनाने की बात हो गई तो इसलिए भगवान कह रहे हैं गुण कर्म विभाग तो गुण और कर्म तो कर्म तो कह रहे हैं लेकिन गुण जो है वो होते कैरेक्टरिस्टिक और वो जन्म और परिवेश से ही आते हैं यह सभी आचार्यों का मत है इवन गौड़ी आचार्यों का भी आप विश्वनाथ मतलब वल्लभाचार्य जी का जो सिद्धांत है वल्लभ संप्रदाय का उसके अनुसार जोय गुण कर्म विभाग वाली बात है और जो ये चातु ये जो वर्ण व्यवस्था है वो आपको जन्म से एक शरीर प्राप्त होगा यदि आपने उसके यथोचित कर्मों का निर्वाहन किया तो उसमें वो ब्राह्मण देवता का वास होगा यानी कि आप प्रॉपर एक ब्राह्मण कहलाएंगे अन्यथा आपके पास वो शरीर होने के कारण शरीर होने के कारण आपके पास एडजेक्टिव तो रहेगा ब्राह्मण का मगर वो पतित ब्राह्मण बहिष्कृत ब्राह्मण कर्महीन कर्म शंकर इत्यादि से वो कहा जाएगा गिना जाएगा पंक्ति जिन्ह कहा जाएगा मतलब उम ब्राह्मण देवता का आवेश नहीं होगा अभ सामान्य मनुष्य ब्रह्म बंधु हो सकते हैं ब्राह्मण नहीं कहते ऐसा महाप्रभु जी का मत है स्पष्ट रूप से और ही बात वर्ण व्यवस्था की तो वल्लभ दिग्विजय नामक ग्रंथ है जिसमें जी प्रभु जी के जीवन का जो सबसे प्रमाणिक हमारे पास में फिलहाल

00:37:02:07 जो अकाउंट है वो वल्लभ दि ये महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पोते यदुनाथ जी जो थे गोस्वामी विट्ठलनाथ जी प्रभु चरण के पुत्र छठ पुत्र यदुनाथ जी उन्होंने लिखा हुआ है और ऐसा कहा जाता है उनके द्वारा लिखा गया है इस वल्लभ दिग्विजय में जिसे यदुनाथ दिग्विजय भी कहा जाता है इसमें एक इंसीडेंट मेंशन है इसमें जब महाप्रभु जी भारत परिक्रमा करते हुए त पदमनाभ से होते हुए जनार्दन क्षेत्र केरल में है जनार्दन क्षेत्र जो वकला है से होते जब उडपी में पहुंचे तो उपी में व्यास तीर्थ जी ने श्रीमत वल्लभाचार्य से पूछा कि आपने अनंत पद्मनाम में भागव का घर्षण क्यों किया उनके आपने निंदा वहा पर क्यों उनसे वाद क्यों किया तब वहा महाप्रभु जी ने स्पष्ट कहा कि जो वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करते वे वैष्णव नहीं हो सकते

00:37:54:08 यनल इसलिए दर्शको को बताना चाहूंगा भाई किकन के द्वारा जो क्लेम किया जाता है ना कि चार संप्रदाय प्रामाणिक है उनमें से एक संप्रदाय जो राघवाचार्य जी महाराज है उनका वक्तव्य आपने सुन लिया कि कौन वैष्णव नहीं हो सकता और अभी हमारे सामने प्रामाणिक एक विभूति विराजमान है मैं नहीं जिस ग्रंथ की बात कर रहा वो प्रामाणिक मैं ठीक कर दूं मैंने शायद गलत बोल दिया हमने जो है श्री संप्रदाय श्री संप्रदाय के जो राघवाचार्य जी महाराज जगतगुरु है प्रामाणिक आचार्य उनका वक्तव्य सुन लिया कि वैष्णव कौन हो सकता है तो कभी भी आप जो व्यक्ति वर्णाश्रम विरोधी है जो व्यक्ति किसी प्रकार से वर्णाश्रम धर्म को तार तार करते हुए अपने कार्य कर रहा है तो आप उसका प्रतिकार करते समय कभी भी मन में भावना ना लाए कि आप कोई वैष्णव अपराध कर रहे हैं आपको एक पर परम पूज्य वैष्णवास्त्र राघवाचार्य जी का वक्तव्य प्राप्त है जिसमें वो बोल रहे हैं कि ऐसे व्यक्ति वैष्णव हो ही नहीं सकते जो वर्णाश्रम धर्म का पालन ना करते हो अभी वल्लभाचार्य जी की संप्रदाय से हम लोग उनके जो आचार्य

00:39:09:20 गण है उनके पास भी जाएंगे और जो अभी हमारे सामने प्रत जी बैठे हैं यह भी अपमा नहीं है तो इनका भी वक्त ग्रंथ में प्राप्त होगी के आधार पर बोल रहे हैं वल्लभ दिग्विजय ग्रंथ के आधार पर बोल रहे हैं कि जो वर्णाश्रम धर्म का यथोचित पालन नहीं करते हैं और यह जो व्यवस्था जो महाप्रभु जी ने वल्लभ महाप्रभु जी ने जो बताई है वह नहीं करते हैं तो वह वैष्णव नहीं है इस बात को आप ध्यान रखिए कई बार य ये वैष्णव अपराध के नाम पर एक जहर फैला दिया गया मार्केट में कि आप कुछ भी बोलो कैसे होगा जी वैष्णव जब वर्णाश्रम धर्म को जो पालन कर वेद का पालन कर रहा है वही वैष्णव है य महाप्रभु जी के स्पष्ट वचन है और इस अच्छा एक और बात महाप्रभु जी ने कही महाप्रभु जी ने कहा कि अल सर्वे वृद्धा चार तत्परा स्वाध याद क्रियाना तथा चार परा मुखा महाप्रभु जी कहते त धर्म कथम भवे ऐसी स्थिति में धर्म हो कैसे सकता है तो उसम महाप्रभु ने समाधान दिया तथापि धर्म मार्गे तथापि भक्ति मार्गे इसके बाद भी भक्ति मार्ग में स्थित हो कर के जो भगवान का भजन पूजन सेवा आदि करें

00:40:25:09 स कथन चती उसम भी वेद निंदा अथवा वेद विरुद्ध यदि करेंगे तो कोई उपाय नहीं बस इतना है कि य भक्त होने पर इनका ये नहीं होगा नरक वास नहीं होगा किंतु तथापि हीने जायते ऐसा महाप्रभु जी ने आज्ञा करी तत्वार्थ दप साधन प्रकरण हीन योनि में प्राप्त हो जाएगा ये यदि वेद निंदा और वेद के आचार के विरुद्ध गया तो भले वैष्णव हो चाहे कैसा भी हो और वल्लभ में तो आपने स्पष्ट आज्ञा करी है अच्छा इसमें महाप्रभु जी ने एक और चीज दी है कि भाई इतने सारे सब पतित होने के पश्चात आचार छूट जाने के पश्चात जब वर्णा सं धर्म से बाहर जो हो चुके हैं लोग उनकी कैसे क्या गति हो तो उसमें महाप्रभु जी ने ऐसी आज्ञा करी है यदि आपके कुल में आचार विचार अभी भी चल रहे हैं वेद शाखा आपकी अभी भी चल रही है तो आपका प्रथम कर्तव्य आप उसे पढ़े बिल्कुल आप अपने वेद आदि धर्म आप संध्या वंदन आदि कर सकते हैं कर पा रहे हैं तो बहुत अच्छी बात है नहीं कर पा रहे हैं तो सर्वम कृष्णम अर्पण तो सब कुछ कृष्ण को अर्पण करें जो भी अपने जीवन में सब कृष्णु को अर्पण करें और उनकी भक्ति में लगे रहे यही परम परम सबसे परम कार्य है जो आप कर सकते हैं और इसमें महाप्रभु जी ऐसा कहते हैं ना तो इससे ऊपर कोई मंत्र है

00:41:40:18 ना तो इससे ऊपर कोई व्रत है तीर्थम नात परा ना ही इसके ऊपर कोई तीर्थ ये सबसे परम है आप कृष्ण सेवा और कृष्ण भक्ति कर रहे हैं तो इसके परे कुछ भी नहीं है इसको आप ध्यान रखें वर्णाश्रम जहां तक आपका देहा भिमान है कि हम इस वर्ण के हैं तब तक आपको पालन करना धर्म कर्तव्य और यदि आपके अंदर वो देहा विमान नहीं रह गया आपको नहीं लग रहा कि आप ब्राह्मण हो या क्षत्रिय हो वैश्य हो तब आप केवल कृष्ण भक्ति करें और जो वैष्णव के आचार विचार है उनका आप यथा यथोचित पालन करें भगवत सेवा में लगे सात्विक मगर इसका मतलब ये तो नहीं है ना मगर इसका मतलब यह तो नहीं है ना कि फिर वो जो है अगर कोई अधिकारी नहीं है तो वो जनेऊ पहने या लोगों को जनेऊ देने लगे क्योंकि ये दावा करने लगे क्योंकि वो दावा कर लगे कि मैं जो है अब मुझे जो है वो अपने देहा विवान नहीं रहा है तो इसलिए मैं कुछ भी करने लगू मैं यज्ञ कराऊ मैं जो है जने वाक् ऐसा कहने वाला व्यक्ति यह देहा भिमान बोल रहा है वो व्यक्ति नहीं बोल रहा है वो ये देहान भी नहीं है य थ का विमान जब आपका जन्म व भगवान ने आपको जन्म दिया नहीं है आप जबरदस्ती वहा क्यों चा रहे हो भक्ति छोड़ कर के क्या भक्ति जो है अपने आप में परिपूर्ण नहीं है महाप्रभु जी कहते हैं कृष्ण भक्ति सबसे परम है इसके

00:42:55:18 ऊपर कुछ भी नहीं ना तो कोई है ना तो कोई तीर्थ है ना तो कुछ भी इसके ऊपर नहीं तो जबसे आपने प्रात कर तो आपको काहे को जन के पीछे पड़ना है जब आप नहीं है उसके अधिकारी वेद के क्रम धर्म जैसे ही आप दोबारा व्यवहारिक दुनिया में आ जाएंगे तो दोबारा से व वर्णाश्रम धर्म लागू हो जाएगा और जब आप व्यवहारिक दुनिया से प्र हो चुके हैं तो आप वहां पर उसका आपका अपना स्वांता सुखा है कि आप किस तरह से जीवन को आगे ले जा जाते मगर जब आप और लोगों के साथ व्यवहार करने में आ जाएंगे तो आपका वर्णाश्रम धर्म पुनः आपको आपका आपको आलंबन लेना ही पड़ेगा तो इस हिसाब से देखा जाए तो जैसे कि आपने बताया कि आपके जो नाना जी थे उनके साथ इनकी मित्रता थी तो इस बारे में क्या पर्सपेक्टिव था कि उन्होंने सन्यास लिया हुआ था सन्यास लिया था उन्होंने उनके गुरु ने संन्यास लिया था तो क्या वल्लभ संप्रदाय के अकॉर्डिंग वो एक प्रामाणिक सन्यासी है तो इनके सन्यास को लेकर के क्या कहना है मतलब अब देखि सन्यास देखिए मैं इस बारे में डायरेक्ट टीका टिप्पणी करने से तो बूंगा लेकिन इतना है कि सन्यास आदि जो

00:44:10:20 धर्म है वो आश्रम है सन्यास चतुर्थ आश्रम है और इसके नियम वर्णाश्रम से ही डिसाइड होंगे तो जो वर्णाश्रम के शास्त्र है यही इसे डिसाइड करेंगे किसी कोई मन से डिसाइड कर नहीं सकता यह महाप्रभु जी का स्पष्ट मत है इनको अधिकार है तो है इनको नहीं है तो नहीं इतने से यदि आप पवित्र हो जाएंगे इतने को चीज को छूने पर तो आप होंगे और इतने से अपवित्र हो जाएंगे तो आप अपवित्र हो जाएंगे आपको जन कंठी बदलनी पड़े इसमें आप छेड़खानी नहीं कर सकते इस वर्णाश्रम धर्म में तो इसलिए ज येन क्लेम कर रहा है हमारे इसकन जो क्लेम कर रहा है कि सन्यास का हमारे पास सन्यास था तो क्या यह इनके यहां जो संन्यास आया है जो आप नाम ना लीजिए हम नाम नहीं लेते मगर इसकन जो क्लेम कर रहा है कि हमारे य सन्यास सन्यासी थे हमारे हमारे यहां सन्यास की परंपरा है तो वो परंपरा जो सन्यास की है तो क्या वो प्रामाणिक है इनके यहां की आपके वल्लभाचार्य संप्रदाय के अकॉर्डिंग असंभव है ये बात क्योंकि सन्यास आश्रम है वर्णाश्रम धर्म का भाग है और वर्णाश्रम के जो शास्त्र है उसमें जन्मना ब्राह्मण जिसके प्रवर गोत्र शाखा सूत्र ज्ञात हो उसी को अधिकार है जिनके प्रवर शाखा

00:45:25:20 पूत्र आदि नहीं है वे तो संन्यास के अधिकारी नहीं है हां वे वैष्णव संन्यास अधिकारी अवश्य है वैराग्य दशा के अधिकारी अवश्य है कि आप सब कुछ छोड़ छाड़ करके कृष्ण की भजन कर कृष्ण का भक्ति करें इसको वैष्णव सन्यास बोला जाता है व सन्यास के मैं इसको अगर ऐसे समझ उस सन्यास के अधिकारी नहीं है जिसकी उपयोगिता ऐसे प्रामाणिक सन्यासी जो क्योंकि वो जो सन्यासी होता है वो फिर उसकी उपयोगिता की जाती कि आप यहां के आचार्य बन जाइए या यहां के जा उसके अपने स्वांता सुखाय के लिए विरक्त हो सकता है वो हां बिल्कुल विरक्त हो सकता है विरक्त होकर कृष्ण का भजन करें य यही वैष्णव संन्यास है और प्राचीन गड़िया में यही वैष्णव सन्यास यानी बाबाजी वेश इसको गड़िया में कहा जाता था इसकी परंपरा रही है पुष्टि मार्ग में भी ऐसे कई विरक्त वैष्णव रहे हैं जो महाप्रभु जी के सेवक थे अवधूत दास वगर इन सबका नाम वार्ता ग्रंथों में आता है ये विरक्त थे सन्यासी नहीं विरक्त थे अवधूत दास तो इस तरह से कई सारे भक्त आते हैं जो वैरागी हु विरक्त होकर के भजन में तल्लीन रहने वाले लेकिन जबरदस्ती सन्यास यदि आप लेंगे वर्ण की मर्यादा के बाहर जाकर के उसके लिए महाप्रभु जी ने चेतावनी भी दी महाप्रभु जी ने कहा ऐसे कराल कली काल में यदि आप फिर भी

00:46:40:20 घर छोड़ कर के भक्तो का संग छोड़ कर के कहीं सन्यास अपने अहंकार से जाकर के लोगे तो स्वयं च विष क्रांत पाखंडी सातु काल अब स्वयं तो विषयों से आक्रांत हो जाओगे और समय के साथ पाखंडी हो जाओ ये महाप्रभु जी की चेतावनी है सन्यास लेने की तरीके से चेतावनी कहा फिट हो रही है वो मुझे समझ में आ रहा हैता ही यदि आप मनमाना आचरण करेंगे जो संन्यास के जो वर्णाश्रम धर्म के जो ग्रंथ है जिनम संन्यास लेना लिखा है उन्ही में उसके नियम दिए जब आप उसी के विरुद्ध चले गए तो सन्यास आपका वैसे ही सिद्ध नहीं हो पाया और महाप्रभु जी कृष्ण भक्ति में माना ही नहीं है इसकी कोई आवश्यकता है महाप्रभु जी ने कहा जैसे सन्यास असल गोपिका गुरु पुष्टि मार्ग में मार्ग में गोपिका गुरु जैसे गोपिका केवल और केवल भगवान में लगी हुई थी उनका घर बार आदि से कोई अधिक नाता नहीं था उसमें आसक्त बिल्कुल नहीं थी केवल और केवल भगवान में आ सकती उनको महाप्रभु जी ने कहा ये असल सन्यास है और यदि ऐसी दशा सिद्ध हो गई भजन करते करते गृह में तुम्हारे अपने ठाकुर जी में इतने आसक्त हो गए तब संन्यास लेना केवल औपचारिकता मात्र रह जाएगी उस दशा में संन्यास आप विधिवत धारण करो केवल औपचारिकता मात्र आपका संन्यास ठाकुर जी ने वही सिद्ध कर दिया तो समय सन्यास की आवश्यकता

00:47:56:01 य होती किसी अन्य को जब हमें प्रमाणिक बताना है कि मैं सन्यासी हूं किसी अन्य को तो किसी अन्य को बताने की आवश्यकता तब पड़ेगी ना जब आपको व्यवहारिक उसम जाना है ना आपके स्ता सुकाय के लिए आपकी जो विरक्ति है वो पर्याप्त है बिल्कुल वो पर्याप्त महाप्रभु जी ने तो भक्ति मार्ग को एकाकी बताया है कि आपकी भक्ति आपके लिए है प्रीत हि में राखि प्रकट किए रस जाए तो महाप्रभु जी तो इतनी गोपनीयता से ठाकुर जी की से भक्ति आदि करने की आज्ञा करते हैं तो इसलिए महाप्रभु जी ने घर छोड़ कर के अपने ठाकुर जी को छोड़ कर के आप अलग से सन्यास लो और दीक्षा लो इसको महाप्रभु जी ने सावधान किया है चलिए ये

00:48:41:26 तोता जी इसमें इसमें मैं एक तरफ ध्यान खींचना चाहूंगा कि अब जब सन्यास की बात चल रही है तो एक चीज और आती है जो मैंने आपके यहां के प्रामाणिक आचार्य हैं उनको सुना था उनका परिचय आप भी बता देंगे वो आपने बताया था कि उनके भतीजे हैं क्या नाम था उनका गोविंद राय जी की बात आप कर रहे हैं गोविंद गोविंद गोविंद जी वह महाराज जी भी अपने वीडियो में यही बोल रहे थे कि भाई अच्छा जब यह क्लेम करते हैं कि चैत यह इतना स्वीकार करते हैं चैतन्य महाप्रभु जी ने सन्यास लिया है शंकर परंपरा से तो जब शंकर परंपरा से आपका सन्यास आया है तो आगे आपका सन्यास उसी परंपरा से आना था है ना बिल्कुल सन्यास की परंपरा बदल नहीं सकती फिर आपके य सन्यास अपने मन किसी और परंपरा से ला रहे हो आप सन्यास बास की परंपरा सन्यास की परंपरा ही नहीं है जाए

00:49:57:01 मायावादी मायावादी शब्द का उपयोग जो करते हैं तो वह खुद को कह रहे हैं व चेतन महाप्रभु जी कि मैं मायावादी सन्यासी हूं तो आगे उनके लोग जो है उनके फॉलोअर वो भी मायावादी सन्यासी होने चाहिए अगर सन्यासी हो रहे हैं तो विशेष रूप से जो फोटो से संन्यास लेते हैं जो वो असल में फोटो से संन्यास लेने वाली बात तो जो है वो तो मतलब उसको हम प्रमाणिक परंपरा नहीं कह सकते नई परंपरा का सजन अवश्य कह सकते हैं लेकिन प्रमाणिक परंपरा नहीं कह सकते उसके लिए तो आपको जो परंपरा चली आ रही है उससे सन्यास लेना चाहिए यदि आप फोटो से ले रहे हैं तो आपने एक नई परंपरा सृजन कर दी इतना आप कह सकते होलो इतना कहो तो भी ठीक है लेकिन उसको आप बोलो नहीं नहीं हम इस परंपरा के हैं वो तो गलत बात हो जाएगी वो तो बात ठीक नहीं पीछे वाले से क्लेम म कर अपने को जी जी बिल्कुल आप पीछे वाले से क्लेम कर नहीं सकते संभव नहीं रह जाएगा और बात सही है क्योंकि गौड़ीय संप्रदाय में यह बाबाजी वेष और वैरागी होना ही सन्यास परंपरा नहीं थी गड़ी वैष्णव चार में पुष्टि मार्ग में थी ना राधा वल्लभ में थी बात अलग है गड़ वैष्णव की तो बात अलग है अभी कोन की बात अगर करें तो स्कोन का जो प्रादुर्भाव है वो बड़ा

00:51:12:03 ही मतलब ऐसे तरीको से हो रहा है कि जिसका जहा मनाया वो वो करने लगा मैं कहूंगा कि रामपाल जो चल रहा है व मनमाना अपना कुछ भी करता रहता है वो अगर पढ़ लिख जाए इंग्लिश इंग्लिश बोलने लगे रामपाल वाले रामपाल वाले गैंग में भी विदेशी आ जाए और वह संस्कृत भी थोड़ा बहुत पढ़ने लगे तो फिर वह बिल्कुल हुबहू वो जो है स्कोन जैसा दिखाई देने लगेगा रामपाल का गैंग है पूरा पूरा स्कन जैसा क्योंकि थोड़ा सा अंतर कर ले बस कबीर और कृष्ण का बाकी सारी चीजें सेम चल रही है दोनों की एक ही बात असल में आप य वेद आदि शास्त्रों को वर्ण व्यवस्था को छोड़ोगे तो फिर तो आपका धरातल रहा नहीं आप फिर वैष्णव आचार्य मतलब महाप्रभु जी के हिसाब से फिर वैष्णव कहने के अधिकारी तो नहीं रहे ऐसा है हां लेकिन नहीं हो पा रहे कोई परंपरा खंडित हो गई है तो आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है महाप्रभु जी कह रहे हैं आप कृष्ण को समर्पित करो उनकी भक्ति करो उससे परम कुछ है नहीं तो आपको क्यों जबरदस्ती जन में जाना है और क्यों जबरदस्ती और चीज करनी है वेदों के विरुद्ध जाकर के इससे क्या लाभ होगा क्योंकि धार्मिक सत्ता अयानी है ना धार्मिक सत्ता हथनी लोगों का गुरु बनना है र्म सत्ता हतया

00:52:27:08 करके लोगों का गुरु बन कर के कृष्ण के नाम पर क्राइस्ट को घुसे करना है यह सब चीजें है ना जी ठीक है तो अभी हम आगे चलते हैं थोड़ा सा काफी हो गई चीजें अब एक जो माधवेंद्र पुरी जी है इनके गुरु जी थे लक्ष्मीपति तीर्थ जी और जिस कारण से इसकन क्लेम करता है कि हम जो है मधुवा संप्रदाय से हैं तो ये इनके बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालिए में ठीक माधवेंद्र पुरी पर बात करते माधवेंद्र पुरी जो थेय तैलंग ब्राह्मण थे इनका वर्णन भी वल्लभ दिग्विजय में प्राप्त होता है और महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी को वैष्णव शास्त्र माधवेंद्र पुरी ने ही पढ़ाए हैं माधवेंद्र पुरी द्वारा ही महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने वैष्णव शास्त्रों का अध्ययन किया है वाराणसी में और इसीलिए ये माधवेंद्र पुरी जो थे ये मधु संप्रदाय के आचार्य लक्ष्मीपति तीर्थ जी लक्ष्मीपति तीर्थ जी व्यास तीर्थ जी के शिष्य थे व्यास तीर्थ जी दरब में राज गुरु पद पर सुशोभित मध संप जी इन्होने तर्क तांडव और न्यायाम जैसे मिनट क्लियर कर चैत महाप्रभु जी का जिनको गुरु बताया जा रहा है माधवेंद्र

00:53:43:12 माधवेंद्र जी को ददा दादा दादा चैतन्य ईश्वर गुरु चत मभु के इनके अकॉर्डिंग इसन केडिंग गर गणोश दीपिका नाम का ग्रंथ है प्राचीन ग्रंथ है गौर गणो देश दीपिका वो उसके अनुसार उसमें यह परंपरा इनकी वर्णित है गौर गण देश दीपिका में कि चैतन्य महाप्रभु के गुरु जो थे भक्ति मार्गी दीक्षा गुरु ईश्वर पुरी और ईश्वर पुरी के गुरु जी ये माधवेंद्र पुरी और माधवेंद्र पुरी के गुरुजी लक्ष्मीपति थ अब माधवेंद्र पुरी जी ने पुरी उपनाम जो धारण किया है उसके बारे में कथा ऐसी है कि वि पु जी को भी गुरु रूप में मानते थे तो इस कारण उन्होने विष्णु पुरी से ऐसा उपनाम धारण सन्यास उन्होने पुरी उससे वहां से प्राप्त किया है लेकिन वैष्णव दीक्षा उन्होंने मध संप्रदाय में प्राप्त की है यह बात मध संप्रदाय में भी स्वीकार और वल्लभ संप्रदाय के ग्रंथों में भी यह बात का स्पष्ट वर्णन है कि यह जो थे मद्व संप्रदाय के जैसे वल्लभ दिग्जा में आता है कि महाप्रभु जी को जब इन्होंने पढ़ाया वल्लभाचार्य जी को माधवेंद्र पुरी ने और गुरु

00:54:58:13 दक्षिणा की जब बारी आई तो उन्होंने कहा कि आप हमें श्रीनाथ जी की सेवा दोगे ऐसी माधवेंद्र पु ने वि महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से तब महाप्रभु जी ने कहा वल्लभाचार्य ठीक है अभी आप भारत यात्रा पर पधारे जब समय आएगा और श्रीनाथ जी का गोवर्धन पर्वत पर मंदिर स्थित होगा तब आपको तब आपको सेवा प्रदान करें तो 1519 ईसवी में जब श्रीनाथ जी का मंदिर पूरा बनकर तैयार हुआ तब महाप्रभु जी ने माधवेंद्र पुरी को वहां नियुक्त किया और माधवेंद्र पुरी के साथ में उनके बंगाली ब्राह्मण वैष्णव जो थे उनको भी नियुक्त किया था यह बात वल्लभ दिग्विजय में भी आती है 84 वैष्णव वार्ता श्रीनाथ जी की प्राकट्य वार्ता इन सभी ग्रंथों में आती है वल्लभ दिग्जा में स्पष्ट रूप से आता है माधव माधव सिष्य नियुक्त यानी माधव माधव जो थे यानी माधवेंद्र पुरी उनको स शिष्यों के साथ में नियुक्त किया महाप्रभु जी ने श्रीनाथ जी की सेवा पाक कार्य रामदास नियुक्त पाक कार में साचो रा ब्राह्मणों को और गायने कुंभन कुंभन दास जी को गायन कार्य में नियुक्त किया सूरदास जी को नियुक्त किया ऐसा पूरा बहुत सुंदर विवरण वल्लभ दिवज ग्रंथ में आता है संस्कृत ग्रंथ इसम य स्पष्ट

00:56:13:13 रूप उख है की माधव जी को नियुक्त किया गया और य पर विस जो आ जाता है य आता है कि कन यह बात प्रचारित करता है कि श्रीनाथ जी का प्राकट्य माधवेंद्र पुरी ने किया यह बात गौड़ीय ग्रंथ जो पूर्ती ग्रंथ है चैतन्य पर यह बात असत्य सिद्ध हो जाती चैतन्य भागवत में यह बात स्पष्ट रूप से आती है आवाज आ रही है

00:56:47:19 क्लियर जी आ रही है आही मेरी आवाज क्लियर आ रही है जी क्लियर आ रही है चैतन्य भागवत य चैतन्य भागवत में बात आती है कि माधवेंद्र पुरी जो वो नित्यानंद प्रभु के साथ कई वर्षों तक रहे कन आपका आपका चित्र है फ्रीज हो गया आपका चित्र आपका वीडियो जो है थोड़ा सा फ्रीज हो रहा है अटक अटक के चल रहा है मुझे भी यहां पर मुझे भी यहां पर थोड़ा थोड़ा ऐसे ही वीडियो फ्रीज फ्रीज सा दिख रहा है बार बार बार बार

00:57:26:18 अभी ठीक है थोड़ा फिर फ्रीज हो गया आपका वो जो टेबलेट जिससे आप कर रहे हैं वीडियो कॉन्फ्रेंस वह गर्म तो नहीं हो गया है कभी कभी हीट हो जाने के कारण ऐसा होने लगता है जी जी शायद संभव हो सो अभी आवाज क्लियर है क्या हा अभी भी कोई देखिए वैष्णव

00:58:05:01 अपराध देखो वैष्णव अपराध का डर दिखा रहा है किसको डर दिखा रहे हो भाई जिसको आत्मा का बोध हो जाता है उसे भय नहीं होता नैनम छिंदंति शस्त्राणि नैनम दती पाव का नम क्लेंप ना सो सति मारुता ठीक जी अभी आवाज आ रही जी जी जी जी ठीक है तो मैं ये बात कह रहा था कि चैतन्य एक मैं एक बात थोड़ा सा क्लियर कर दूं दर्शकों को कि चैतन्य महाप्रभु जी का गुरु स्कोन के द्वारा जिसको क्लेम किया जाता है ईश्वर पुरी जी उनके गुरु माधवेंद्र जी जी वो वो भी वो क्लेम उनकी ओर से किया जाता है फिर उनके जो गुरु है माधवेंद्र जी जिनके गुरु हैद लक्ष्मीपति तीर्थ जी है ना माद पुरी जी से ही जो वल्लभाचार्य जी महाराज थे वल्लभ महाप्रभु थे उन्होंने अध्ययन किया था जो वैष्णव ग्रंथ है उनका वैष्णव शस्त्र इस तरीके से भागवत है भगवत गीता है हा

00:59:20:02 यानी चैतन्य महाप्रभु जी के दादा गुरु से वल्लभ महाप्रभु जी ने वैष्णव ग्रंथों का अध्ययन किया था यह भी एक बहुत रोचक जानकारी है अब इसके बाद इनके द्वारा य क्लेम किया जाता है स्कन के द्वारा कि माधवेंद्र पुरी जी के द्वारा ही श्रीनाथ जी को प्रकट करवाया गया जिसके कारण अभी व जो दो अंग्रेज थे वोय बातें कर रहे थे कि जो है हमें वह मंदिर वापस लेना है ऐसा प्रभुपाद जी कह कर के गए हैं ठीक है जी जी तो

00:59:56:10 तो अब इससे आगे की जानकारी आपको दी जा रही है प्रत्यूष जी बोल रहे हैं जी प्रत जी बताइए जी जी तो यह माधवेंद्र पुरी जो थे इन्होंने ऐसा चैतन्य भागवत में आता है चैतन्य भागवत चैतन्य महाप्रभु के जीवन के ऊपर प्रकाश डालने वाले सबसे प्रथम ग्रंथ में से एक वृंदावन दास ठाकुर द्वारा य लिखा गया बंगाली ग्रंथ है और सर्वाधिक प्रमाणिक स्वीकार किया जाता है इस बात कर रहे चैतन्य भागत नहीं नहीं चैतन्य भागवत चैतन्य भागवत एक प्राचीन ग ये चैतन्य चरितामृथम

01:00:37:21 प्रभु के लीला प्रवेश कुछ ही वर्षों के अनंतर इसे लिखा गया था तो यह सर्वाधिक प्रमाणिक भी है इसकी प्राचीन हस्तलिखित मैनु स्क्रिप्ट भी प्राप्त है तो इसलिए वो इसकी प्रमाणिकता को और भी बढ़ा देती है तो इस ग्रंथ के अनुसार आपका आपका चेहरा अगर आ जाए चेहरा नहीं आ पाएगा हेलो जी हेलो हां जी आवाज आ रही है आपका आवाज आ रही है चेहरा नहीं दिख रहा है हां मैंने असल में ये वीडियो जो है बंद करी थी ये मेरे को लग रहा था थ से ज्यादा आगा महत्वपूर्ण जानकारी चेहरा आवश या तो आप किसी और डिवाइस से कनेक्ट होना चाहे तो आप हो सकते हैं थोड़ी देर के लिए रोक लेते हैं नहीं ठीक है अभी ठीक है क्या ठीक है बोलिए हा जी तो माधवेंद्र इन्होंने नित्यानंद प्रभु यानी चैतन्य के गौर निताई जो कहे जाते हैं

01:01:54:04 नित्यानंद तो प्रभु के साथ बहुत कई दिनों तक इन्होने वास किया और क यात्रा भी करी लंबी हेलो जी जी बोलिए वीडियो आपका जो फ्रीज हो गया है क्या आपके दिक्कत आ रही है आप ऐसा करिए केवल आवाज आप अपना कैमरा ऑफ कर लीजिए और आप केवल ऑडियो दे दीजिए या फिर अगर कोई डिवाइस दूसरे से कनेक्ट होना चाहे तो एक और दूसरे डिवाइस से दूसरी डिवाइस से आप कनेक्ट हो जाए वो ज्यादा बेटर प्रयास करता हूं जी जी तब तक थोड़ी सी बातें कर लेते हैं हम टॉपिक चल रहा है जो माधवेंद्र पुरी जी

01:02:51:09 का हरे कृष्णा आपके कारण मैं प्रामाणिक गौरिया परंपरा से जुड़ रहा हूं चलिए बहुत अच्छी बात है बहुत अच्छी बात है प्रामाणिक गौड़ीय परंपरा से आप जुड़ी है इस कौन से नहीं इसकन सनातन विरोधी तंत्र है अभी तक तो यही पता चला है कोई आकर के उन चीजों का अगर वोह कर दे तो बात अलग है मेरे ख्याल से प्रत्य जी आ गए परी उनका चेहरा दिखाई नहीं दे क्या प्रत जीय चैनल चलाते हैं यह अभी बताएंगे हमें भी नहीं पता है यह बात चलाते हैं कि

01:03:45:02 नहीं कथा यह है कि श्री संप्रदाय के नाथ श्रीनाथ स्वामी श्री नाथ जी को प्रकट किया जब वे वृंदावन आए फिर वापस [संगीत] तब तक कुछ क्वेश्चंस ले सकते हैं उस कन वालों को शंकराचार्य जी के चरणों में जाकर इसका समाधान पूछना चाहिए

01:04:28:19 [संगीत] तो कुछ क्वेश्चन हो आपके तो आप तब तक कर सकते हैं जब तक वो आ रहे हैं दोबारा किसी और डिवाइस से जुड़ेंगे वो अच्छा आ गए जी अभी आवाज आ रही है हां बहुत बढ़िया जी ठीक है तो हा बात हो रही थी माधवेंद्र पुरी जी की सो माधवेंद्र पुरी के बारे में चैतन्य भागवत ग्रंथ में हमें प्राप्त होता है माने बताया चैतन्य भागवत ग्रंथ बंगाली ग्रंथ है और वह चैतन्य महाप्रभु जी के बारे में सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है और चैत चैत चमत है उससे भी पूर्व में उसका वो कालखंड है ब 60 7 वर्ष पूर्व लिखा गया हैसन हमें प्राचीन मनुस्क्रिप्ट प्राप्त नहीं है इसके बारे में हम बाद में डिटेल में आएंगे चैतन्य भागवत के प्राप्त चैतन्य भागवत में आता है कि माधवेंद्र पुरी ने नित्यानंद प्रभु का संग कई दिनों तक किया कत दिन माधवेंद्र संगे नित्यानंद धकिया चलीला देखे यथा सेतु बंद मतलब थोड़े

01:05:43:20 समय पश्चात कई दिनों तक उनका संग करने के पश्चात नित्यानंद प्रभु जो थे वो सेतु बंद रामेश्वर देखने गए और माधवेंद्र चलीला सरीय देखी बारे कृष्णा वेश कृष्णा देहा नि निज देह नहीं कुछ ऐसा ही भल रहा लेकिन ऐसा मतलब अर्थ उसका यह है कि माधवेंद्र पुरी जी कई दिनों तक नित्यानंद प्रभु के संग रहने के पश्चात कत दिन कई दिनों तक नित्यानंद जो थे दक्षिण में गए और माधव पु जो सरय देखने अब यहां पर मूल बात यह है कि नित्यानंद प्रभु ने जो अपना गृह त्याग किया है वो 1491 में किया है 92 में किया यह बात चैतन्य भागवत से ही सिद्ध होती है चैतन्य चरितामृथम

01:06:35:10 में हम बाद में देखेंगे और एक और ग्रंथ है अद्वैत प्रकाश नाम से जिसको कुछ गड़िया अपमा मानते हैं भक्ति सिद्धांत सरस्वती उसको अपमा कहते हैं खैर प्रभुपाद जी के गुरु उस ग्रंथ में जो तिथि दी हुई है गृह त्याग की उस ग्रंथ के हिसाब से है 1487 चलिए 1487 को भी लेले कि 1487 में नित्यानंद प्रभु ने अपना घर छोड़ा तो इस समय माधवेंद्र पुरी नित्यानंद प्रभु के साथ कुछ वर्षों बाद होने चाहिए नित्यानंद प्रभु ने लक्ष्मीपति तीर्थ के साथ अपना घर छोड़ा था ऐसा माना जाता है गौड़ीय संप्रदाय में और उस बीच लक्ष्मीपति तीर्थ का जब तिरोधन हुआ तो माधव पुरी का इनको सघ हुआ भारत में कहीं और मध्य भारत में गई और वो उसके कई दिनों बाद दक्षिण गए माधरी स अब जी तो लक्षमी माधवेंद्र पुरी जी तो लक्ष्मीपति तीर्थ के शिष्य थे ना है बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल तो नित्यानंद गुरु है ये भी लक्ष्मी पति जी के शिष्य है अब यहां पर जो है गौड़ी वैष्णव में मतभेद है कुछ इनको लक्ष्मीपति बताते हैं और कुछ कहते माधव पुरी के शिष्य थे

01:07:50:16 प्रभुपाद का ही वक्त स्थानों पर जो कह रहे माधव पुरी के शिष्य थे और कुछ स्थानों पर तो प्रभुपाद ऐसा भी कहते कि इन्होंने 20 वर्षों तक माधवन पुरी का संग किया अब ये जो चैतन्य भागवत की बात है कि 1490 के आसपास माधवेंद्र पुरी को इनके साथ होना चाहिए अच्छा श्रीनाथ जी का प्राकट्य कब हुआ है 478 में तो 1478 में श्रीनाथ जी का प्राकट्य हुआ और इकोन वाले ऐसा प्रचारित करते हैं चैतन्य चरितामृथम

01:08:23:13 वत्स दुई करीले सेवन उसके पश्चात उनको ठाकुर जी ने चंदन यात्रा के लिए भेज दिया और वो चंदन लाने चले गए यदि यह बात इनकी सत्य होती तो ना तो महाप्रभु वल्लभाचार्य को माधवेंद्र पुरी पढ़ा सकते थे और ना ही नित्यानंद प्रभु से कभी मिल सकते थे क्योंकि वो तो दो वर्ष पीछे 1480 में ही उनका लीला प्रवेश हो गया होगा फिर तो यहां पर चैतन्य चरितामृथम पी सेन आदि जो भी अध्ययन करने वाले हैं और जिन्होंने चैतन्य भागवत का अध्ययन किया हुआ है वे इस बात को एग्री करते हैं कि हा यहां पर विरोध हो गया है और कई इस बात को एग्री करते हैं कि ये प्रक्षिप्त है ग्रंथ चैतन्य चरितामृथम

01:09:10:26 नहीं है खैर कहने की बात य है कि चैतन्य भागवत के यदि हम प्रमाणिक मान रहे चैतन्य भागवत को तो माधवेंद्र पुरी जी ने श्रीनाथ जी को प्रकट नहीं किया श्रीनाथ जी का प्रकट 1478 में हो चुका है मुख प्रकट हुआ है और श्रीनाथ जी स्वयं प्रकट हुए हैं ब्रजवासी को श्रीनाथ जी ने दर्शन दिए हैं और तत्पश्चात 1492 में महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को स्वप्न में आज्ञा देकर के गोवर्धन बुलाया कि हमारी सेवा प्रकट कर तब महाप्रभु जी ने एक छोटा मंदिर वहां बनवाया है गोवर्धन महाप्रभु वल्लभाचार्य जी वहां पहुंचे गोकुल में आप श्री को ब्रह्म संबंध की आज्ञा हुई और उसके दो दिन पश्चात श्रावण शुक्ल एकादशी दो दिन पश्चात त्रयोदशी के दिन महाप्रभु जी का प्रथम मिलन हुआ है श्रीनाथ जी से और महा प्रभु जी ने मंदिर बनवाया है श्रीनाथ जी का और रामदास चौहान जी को सेवा सौपी है इसके पश्चात लगभग 25 26 वर्ष पश्चात 1519 में जब नया मंदिर बन केर पूर्ण हुआ है पूर्णमल क्षत्रिय के द्वारा जो महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के सेवक थे तब उस नए मंदिर में माधवेंद्र पुरी को आपने सेवा सौंपी है और उनके साथ में बंगाली ब्राह्मणों को वहां पर सेवा में रखा है कुन दास जी को रखा है सूरदास जी को रखा है सूरदास जी जो लीला का दर्शन होता था

01:10:25:28 व महाप्रभु जी की कृपा थी कि सूरदास जी को महाप्रभु जी ने ऐसी दिव्य दृष्टि प्रदान करी कि उन्ह प्रत्यक्ष लीला का दर्शन हो जाता था और इस बात का तो हमारे य वार्ता प्रसिद्ध है कि इस बात की इस बात को कौतुक हमारे ही आचार्यों ने गोकुलनाथ जी नेतो इसको देखना चाहा कि हमने ऐसा सुना है कि इनके दिव्य दृष्टि और य जो भी श्रीनाथ जी के दर्शन होते हैं हुबहू वैसे वर्णन कर देते हैं तो उन्होने कहा हमें देखने की इच्छा है तब उनके बड़े भ्राता जो थे गिरधर जी गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी के बड़े पुत्र महाप्रभु जी के सबसे बड़े पोते उन्होंने कही की है उनकी महाप्रभु जी के सेवक है उनकी परीक्षा ना लोने कहा हम कौतुक देखने की इच्छा है तो हम उन्ह दर्शन करने य बलाए तो उने गोकुल बुलाया सूरदास को दर्शन करने और नवनीत प्रिया जी बालकृष्ण जी के जो स्वरूप है उनको गर्मी बहुत थी उसन केवल मोतियों के श्रृंगार धराए और कुछ भी नहीं धराया और सूरदास जी से विनती की जो सूरदास जी ठाकुर जी के श्रृंगार का वर्णन करो तो सूरदास जी ने तब पद गाया था देख हरि नंगम नंगा जलस भूषण अंग विराजत वसन हीन छवि उठी तरंगा अंग अंग प्रति अमित माधुरी निरखी लज्जित रति कोटि अनंगा किलकत दधि सुत मुख लेपन करी सूर हसत ब्रज योन संगा देखी हरि नंगम तो सभी गोकुलनाथ

01:11:41:01 जी समत सभी आचार्य बालकों ने भी उनको प्रणाम किया कि आप अद्भुत आपने ऐसे सामर्थ के दर्शन कराए कि आपने ऐसे कैसे गाया आपने तो उन्होने कहा जैसे आपने श्रृंगार कि हमने तो वैसे ही गाया तो ये स क्लेम एक क्लेम आ रहा है कि यह कह रहे हैं कि माधवेंद्र पुरी पाद का तिरो भाव आपने बताया 1490 में हो गया मैंने नहीं बताया चैतन्य चरितामृथम के हिसाब से 1490 नहीं 1480 में होना चाहिए क्योंकि श्रीनाथ जी का प्राक 1478 में हुआ 147 और उसके दो वर्ष बाद चैतन्य चरिता वो हो गया रोन 1480 में हो गया तो इसमें होने प माधवेंद्र पुरी कभी नित्यानंद प्रभु से मिल ही नहीं सकें असंभव यहा आपर है यहां पर आप अगर स् कन के पक्षधर है तो यहां पर आप अपने ही उसका विरोध कर रहे हैं य कह के कि भाई 1530 तक के उनके प्रमाण मिलते माधवन पुरी के तो चैत चता चैतन्य चरितामृथम

01:12:50:25 भाव करवाया प्रकट करवाया श्रीनाथ जी को प्रकट किया उसके दो वर्ष बाद वह जो है उनकी लीला समाप्त हो गई तो जो फैक्ट है व यह बताते हैं कि जो श्रीनाथ जी प्रकट हु व 1978 में हुए हैं तो उसके दो वर्ष है हा यानी कि 1480 में आपकी चेतन चरता मृत के अनुसार माधवे जी का रो भाव हो गया जी प्र जी जी तो अब जब हमारे पास में ऐसी बात आ रही है कि महाप्रभु माधवेंद्र पुरी जी काव 1480 में संभव नहीं है ना तो वार्ता साहित्य के हिसाब से और ना ही चैतन्य भागवत के हिसाब से तो यहां पर वार्ता साहित्य और म पुष्टि मार्गी साहित्य और चैतन्य भागवत ये एक मत हो जाते हैं दोनों ग्रंथ ऐसी बात है वार्ता साहित्य और च भागवत जब एकमत हो जाते हैं यहां पर इस स्थान पर तो यहां से सत्य प्रकट हो के सामने आ जाता है कि जो भी दूसरी बात जा रही है वे मिथ्या बात हैं और बाद में जोड़ी गई है माधवेंद्र पुरी को 1519 में महाप्रभु जी ने श्रीनाथ जी की सेवा दी और उन्होंने

01:14:06:06 आगे 14 वर्ष तक श्रीनाथ जी की सेवा करी है इसका स्पष्ट उल्लेख श्रीनाथ जी की प्राकट्य वार्ता में प्राप्त होता है और महाप्रभु जी को सन्यास दीक्षा भी माधवेंद्र पुरी नेही दी है 1530 मेंब महाप्रभु जी काशी पधारे और आपने सन्यास लिया तब माधवेंद्र पुरी ने ही का नाम पूर्णानंद रखा यह बात वल्लभ दिग्ज नामक संस्कृत ग्रंथ में हमें प्राप्त होती है माधवेंद्र प्रेश दर्शित और प्रेश दर्शा कर केसा पूर्णानंद नाम आपका रखा यह बात हमें वल्लभ तो अब वल्लभ दिग्विजय जो सबसे प्रमाणिक ग्रंथ है इसकी बात है और की प्राकट्य वार्ता है और तन भागवत है यह तीनों मैच कर रहे हैं आपस में आप देखें इनको ध्यान से तो जाहिर सी बात है बात इतने ग्रंथों में आ रही है इतनी जगहो पर आ रही है वही सत्य है और अन्य बातें सत्य नहीं है अर्थात चैतन्य भागवत के अनुसार श्रीनाथ जी का प्राकट्य माधवेंद्र पुरी ने नहीं किया यह सिद्ध होता है श्रीनाथ जी का स्वत हुआ और महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने उनकी सेवा प्रकट करके मंदिर बनवाया यह बात हमें स्पष्ट

01:15:21:10 रूप से पता यहां पर ल ठीक तो मुझे लग रहा है इनके प्रश्न का उत्तर हो गया होगा यहां पर जी जी जी बिल्कुल हो गया और मैं आफ्टर ल एक बात कहूंगा एक काम आप करिएगा जब आपको ऐसा लग ही रहा है कि श्रीनाथ जी का प्राकट्य जो है वो माधवेंद्र पुरी जी ने करवाया है अ वल्लभ जी ने नहीं करवाया है ना वल्लभाचार्य जी महाराज जी ने नहीं करवाया और इनके हिसाब से माधवेंद्र पुरी जी ने करवाया हां ये चैतन्य चरितामृथम करते हैं ऐसा लेकिन चैतन्य च अगर यय क्लेम कर रहे तो आप ऐसा करिएगा कि आप जो वो दो लोग बातें कर रहे थे आपस में कोर्ट केस में जाने की तो आप भी चले जाइएगा ले लीजिएगा श्रीनाथ मंदिर फिर क्या है हम लोगों हम लोग भी देखेंगे भाई कैसे क्या हुआ है ना कोर्ट केस जाने से पहले एक बात मैं बता हूं कोर्ट के जाने से पहले एक बार विश्वनाथ चक्रवर्ती जी को उठाकर पढ़ लीजिएगा यदि विश्वनाथ चक्रवर्ती को प्रमाणिक मानते हो तो विश्वनाथ चक्रवर्ती पा गोपाल देवाक नाम का स्त्र लिखा है उसम आप लिखते तमल हद थाम माधवन कर रहे

01:16:36:15 हैं अच्छा य ऐसा मैं ये पूछ रहा थाय ऐसा क्लेम करते क्यों है कि माधवेंद्र पुरी जी ने व करा है जबक उन्हीं के तो शिष्य है वल्लभाचार्य जी महाराज भी उन्होंने पढ़ाई की है उनसे तो ये क्लेम क्यों करते हैं माधवेंद्र पुरी जी ने प्रकट किया है वल्लभाचार्य जी ने नहीं किया है मैं बताया मैंने चैतन्य चरितामृथम जो है वो प्रक्षिप्त हो चुका है मूल रूप में हमारे पास विद्यमान नहीं रह गया है अच्छा दूसरी एक बात ये भी है इनके अनुसार वल्लभाचार्य जी प्रामाणिक थे प्रामाणिक संप्रदाय है तो जो प्रामाणिक है उसकी प्रामाणिकता पर आप झूठ बोलने वाली वो अप प्रामाणिकता का दोष लगा रहे हो आप पहले आप त कर लोगे प्रामाणिक कौन है और कौन नहीं है हां आप एक पक्ष तो ग्रहण करें वो पक्ष ग्रहण जो है क्लियर नहीं है मैं विष्णुनाथ चक्रवर्ती पाद प आता हूं विष्णुनाथ चकवती पाद ने श्रीनाथ जी की जो स्तुति लिखी है गोपाल देवाक उसमें आप शी लिख रहे हैं कि तमल हृद थाम प्रेम सेवाम विन प्रकट निज शक्त वल्लभाचार्य भक्ता स्मति दद सव शील गोपाल देव यानी जो अपनी निज शक्ति महाप्रभु वल्लभाचार्य की भक्ति के द्वारा प्रकट

01:17:52:07 हुए वे सरती हद स श्रील गोपाल देव वे श्रील गोपाल देव यानी श्री नाथ जी मेरे हृदय में स् फुरित हो यह स्तुति श्री नाथ जी की ये प्रार्थना श्रीनाथ जी से मा ये कर रहे हैं विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर अब यहां पर तो व कह रहे हैं कि प्रकट निज शक्त वल्लभाचार्य भक्त तो अब आप बताएं आप किसको रिजेक्ट कर रहे हैं और किसके ऊपर आप कोर्ट केस कर रहे हैं विष चकवती पाद कोर्ट केस कर रहे हैं या चैतन्य भागवत पर कोर्ट केस कर रहे हैं या रघुनाथ दास गोस्वामी जी पर कोर्ट केस कर रहे हैं जो कि ग स्वामी विठ्ठल नाथ जी की और महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की स्तुति कर रहे हैं या फिर आप जीव गोस्वामी को कोर्ट केस कर रहे हैं जो कि अपने भागवत की टीका में महाप्रभु जी को कोट कर रहे हैं वल्लभाचार्य जी को कोट कर रहे हैं विष्ण चक्रवर्ती ने सारा दर्शनी में तो झड़ी लगा दी है महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को कोट करने की और आप केस कर रहे हैं तो आप किसके ऊपर केस कर रहे हैं पहले आप ये देखें वो आपके ही पूर्वा चार्य है अन्य नहीं अब खर केस करना है कर सकते हैं कलयुग है संभव हो आगे जाकर के भविष्य में जीत भी जाए लेकिन वह विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद के अनुवर्ती तो नहीं होंगे विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद तो प्रकट निज शक्त वल्लभाचार्य भक्त यही कह रहे हैं और यही सत्य है तो ऐसे संस्कृत ग्रंथों का आलंबन यद

01:19:07:07 करें प्राचीन मनु स्कृत ऐसे चैतन्य भागवत का आलंबन करें वल्लभ दिवजा का आलंबन करें तो सारी चीज क्लियर हो जाती है श्रीनाथ जी को महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने ही आपकी सेवा प्रकट करी और मंदिर पहली बार बनवाया आपके शिष्य पूर्ण क्षत्री ने नया मंदिर बनवाया जब तब माधवेंद्र पुरी को सेवा आपने गुरु दक्षिणा के रूप में सौंपी तत्पश्चात सन्यास भी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने माधवेंद्र पुरी जी से ही प्राप्त किया इसका स्पष्ट वर्णन हमें वल्लभ निजन में प्राप्त हो रहा है जो संस्कृत ग्रंथ बिल्कुल तो अच्छा इसमें एक चीज ये वाली आती है कि ये जो क्लेम करते कि मधवा संप्रदाय से है इस बारे में आपका क्या विचार है जो क्योंकि पीछे रा विचार देखने बिल्कुल अब इस बारे में मैं अपना विचार बताऊ उससे बेटर है कि राधारमण परिवार के गोस्वामी जी है श्रीवत्स गोस्वामी जी ये उन्हीं को सुन ले एक बार श्रीव गोस्वामी जी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हम लोग ब्रह्म मद्व गड़िया नहीं है हम लोग ब्रह्म मद्व गौड़ीय संप्रदाय नहीं है हमारा संप्रदाय का नाम है चैतन्य संप्रदाय ना तो हमारा ब्रह्म म से कोई रिलेशन है और ना तो हमारी पूजा पद्धति उनके उनसे ली गई है और ना ही हम

01:20:22:09 गौड़ वैष्णव है वो ये भी कहते हैं कि हम गौड़ या वैष्णव नहीं है क्योंकि जो नरोत्तम दास ठाकुर है उनके ग्रंथ में उन्होंने लिखा है कि गौड़ भक्त गौड़ देश के भक्त और उत्कल देश के भक्त दोनों चैतन्य महाप्रभु के आकर के नित्य करते गौड़ी भक्ति है तो क्या उत्कल देश के भक्त भक्त नहीं रह जाए तो इसलिए उन्होंने कहा कि यदि ऐसी बात हम खाली गड़िया कहेंगे स्वयं को तो महाप्रभु जी के भक्तो चैतन्य महाप्रभु के भक्त उत्कल देश के भीत नरोत्तम दास ठाकुर स्पष्ट लिख रहे हैं तो वो बात गलत हो जाएगी तो इसलिए हमारा संप्रदाय चैतन्य संप्रदाय होना चाहिए गौड़ी संप्रदाय कहना गलत ये मैं नहीं कह रहा हूं श्रीवत्स गोस्वामी जी कह रहे हैं जो राधा रमण परिवार के राधा रमण जी के सेवायत है जो राधा रमण जी की सेवा करते हैं और उन्ही का य प्रामाणिक होते उनमें से एक बिल्कुल बिल्कुल जो षड गो स्वामियों की परंपरा है उसम गोपाल भट्ट गोस्वामी जी की परंपरा में राधा रमण जी के घर के यह सदस्य हैं और प्रमाणिक गोस्वामी जी हैं और इन्होंने यह बात को प्रकट किया है कि हमारा ब्रह्म मद्व से हमारा कोई रिलेशन नहीं है क्योंकि एक दूसरी बात यह भी है कि गौड़ीय संप्रदाय में और इसकन में भीय गोपाल मंत्र दीक्षा की अखंड परंपरा हम देखते हैं लेकिन ऐसी गोपाल मंत्र की अखंड परंपरा मध संप्रदाय

01:21:37:10 में विद्यमान नहीं यदि ऐसी अखंड परंपरा होती तो सर्वत्र सभी को मध संप्रदाय में गोपाल मंत्र ही लेना देना चाहिए था लेकिन ऐसा दृष्टि कोच नहीं होता वहान जो टीका लगाता है वो भी मध संप्रदाय का टीका नहीं है वो भी मध संप्रदाय का तिलक नहीं है जी तिलक नहीं है जीव गोस्वामी जी ने तत्ववादी है तो अब इस विषय में जीव गोस्वामी जी एक तरीके से मधवा संप्रदाय का जो तात्विक विवेचना है उसका खंडन करते खंडन कर रहे बिल्कुल तत्ववादी जी तो फिर वो मध संप्रदाय यद आप उनको कहोगे स्वयं को ब्रह्म म गौड़ीय परंपरा कहोगे तो आप इनडायरेक्टली जीव गोस्वामी को गुरु द्रोही सिद्ध कर रहे हो और कोई नहीं आप स्वयं कर रहे हैं ये कह के हमारी तो ब्रह्म म परम अरे ब्रह्म गड़ी परंपरा तो गुरु परंपरा के अपने गुरु को उनके मत का खंडन करना य गुरु द्रोह कहा जाए और ये आपके एरर के कारण उपज रहा है क्योंकि आप ए गुरु द्रोही कहा भी जाएगा एट द एंड आपके पास व फिर जो ज्ञान आ रहा है व उस परंपरा से नहीं आ रहा क्योंकि आप अपना दे रहे हो गुरु ने कुछ और दिया था बिल्कुल गुरु ने तो वैसे भी कुछ दि प्राप्त ज्ञान तो नहीं कहेंगे उसे परंपरा नहीं ठीक है चलो

01:22:52:10 परंपरा चैतन्य महाप्रभु से भी प्रारंभ हो स है तो चैतन्य संप्रदाय कहा जाए ठीक है चैत संप्रदाय कहा जाए वो ठीक हैलिए ब्रम गड़िया का जो क्लेम है ये तो मतलब बात ठीक नहीं है और यह बात खैर मैं ना भी कहू तो इसको कहने वाले कई प्रमाणिक गौड़ी आचार्य स्वयं विद्यमान है वृंदावन के मंदिर में गलत नहीं हो तो लाल बाबू मंदिर है गड़िया मंदिर है वहां पर एक लेख लगा हुआ है खुदा हुआ अच्छा के पत्थर प कि गौड़ीय संप्रदाय का मध संप्रदाय से कोई संबंध नहीं है स्वतंत्र

01:23:30:01 ब कर लिखाया हमारा गौड़ी संप्रदाय का इनसे मधु संप्रदाय से रिलेशन नहीं है हम स्वतंत्र वैष्णव संप्रदाय क्या बात देख ले भया उस मंदिर जरूर जाऊंगा और जो पत्थर है उसको जरूर देख बिल्कुल बक य तो आपको नेट पर भी मिल ही जाएगा काफी प्रस बात है और ऐसा कहने वाले गोस्वामी परिवारों में आचार्य अभी भी विद्यमान है तो उसमें हमारे हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है य गोस्वामी परिवार ही इसको प्रमाणिक रूप से खंडन और युक्ति से इसका उत्तर देते हैं क्यों हम बडिया नहीं है ब्रह्म मद्व नहीं है क्योंकि जो परंपरा हमारी मंत्र दीक्षा की वोह असल में एक बात आपको य भी बताऊ कि माधवेंद्र पुरी जी मध संप्रदाय में दीक्षित थे ले लेकिन उन्होने गोपाल मंत्र कहां से लिया इसके बारे में

01:24:32:20 कहीं उले नहीं है ना तो गौड़ीय संप्रदाय में ना मध संप्रदाय ऐसी [संगीत] विड आवाज आ आवाज आपकी आवाज आगे पीछे हो गई क्या बोलिए नहीं शायद बीच में कुछ गच हुआ था अभी ठीक ठीक ठीक है तो यह पुरी जी के मंत्र दीक्षा जो ली थी माधव पुपा जी ने वह कौन से संप्रदाय से ली थी इस बारे में संदेह है मलब य हमें गौड़ी संप्रदाय में किसी भी ग्रंथ में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि गोपाल मंत्र दीक्षा इनसे ली थी अब गुरु तो रहे हो गुरु तो स के जो गुरु है उन्हे भी गुरु कहेंगे वैष्णव शास्त्र पढ़े उन्हे भी गुरु कहेंगे लेकिन गोपाल मंत्र दीक्षा ली स्प उल्लेख नहीं कौन सा मंत्र लिया मध संप्रदाय से इसका कोई उल्लेख नहीं है मध संप्रदाय में कई सारे मंत्र है एक मध मंत्र रत्नाकर नाम का ग्रंथ है मधवा चार्य द्वारा रचित कहा जाता है इसमें सभी मंत्रों का संग्रह है इसमें शिव जीी के मंत्र पार्वती जी के मंत्र सब नवग्रहों के मंत्र सभी मंत्र है वैष्णव मंत्र तंत्रोक्त मंत्र अ वैष्णव सभी मंत्र हैम इसमें गोपाल

01:25:47:28 मंत्र भी है लेकिन इससे अखंड परंपरा सिद्ध नहीं होती क खाली एक कले एक मंत्र वहा पर गोपाल मंत्र है इसका अर्थ यह नहीं है कि वो पूरा का पूरा किताब ही दीक्षा के स्वरूप दी जाती थी सबको यह बात ठीक नहीं है इसके प्रमाण इनका जो मंत्र है वह परंपरा से नहीं है मधवा चार जी की इनका जो तिलक है इसका उल्लेख कहीं नहीं है इसका उल्लेख नहीं है मधवा इनका जो तिलक है व मधवा परंपरा से नहीं हैन स्न की बात करें तो जो इनकी स्कोन की जो वर्णाश्रम व्यवस्था है वो मतवा परंपरा से नहीं है इनका जो तात्विक सिद्धांत है तात्विक सिद्धांत वर्णाश्रम में तो गड़िया के भी विरोधी है हा ब इनका जो तात्विक सिद्धांत है वो भी मधवा परंपरा से नहीं है जिसके बारे में खुल के गड़िया परंपरा कहती है कि हम मधवा संप्रदाय से नहीं है मगर इस कौन क्लेम करता है कि मधवा संप्रदाय से है

01:26:54:26 इसका मतलब ना तो धर्म आ रहा है मधवा संप्रदाय से इनका ना तो धर्म आ रहा है ना ब्रह्म आ रहा है दो फैक्ट है अथातो धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा तो दोनों में से इनका मधवा चार्य जी से कुछ नहीं आ रहा ना तो ब्रह्म आ रहा है ना धर्म आ रहा है जी हाद पुरी से अवश्य आ रहा है इतना त है माधव के साथ मा एक बात और कहूंगा जैसे मान लीजिए कोन के कई लोग दीक्षित है स्कोन से और आज भी मैं स्कोन से जब वार्तालाप करता हूं तो जो स्कोन से दीक्षित है वो आकर के अगर कुछ गलत चलत बातें बोल देते हैं तो लोग मुझे कहते हैं कि इसकन के ऑथेंटिक लीडर्स के पास जाइए इनसे क्यों बात कर रहे हैं अगर इसकन के विरोध में इसकन से दीक्षित व्यक्ति भी बोलेगा तो उसको यह नहीं माना जाएगा कि इसकन क्लेम कर रहा है क्योंकि वो इसकन से दीक्षित जरूर है यानी कि वो इकन का एक फॉलोअर है इकोन का एक स्टूडेंट है मगर इकोन की ओर से बोलने वाला एक ऑथेंटिक प्रीचर इकोन की ओर से बोलने वाला एक ऑथेंटिक स्पीकर या ऑथेंटिक लीडर नहीं है तो जब तक जब तक जो मधवा चार परंपरा है वह किसी

01:28:09:26 को अपने ऑथेंटिक लीडर के रूप में नहीं बोल देगी तब तक उसके द्वारा कहा जाने वाला जो वचन है वो यह नहीं माना जा सकता कि यह मधवा संप्रदाय का ही वचन है वो उसका एक फॉलोअर है वो उसका एक फॉलोअर है अब वो उसकी उसके मन की बात है कि वो जो सिद्धांत दे रहा है वो मधवा संप्रदाय का दे रहा है या उसने कोई और सिद्धांत प्रतिपादित कर लिए या जो भी है मगर बकुल मगर जब तक खूंटा गाड़ करके मधवा संप्रदाय की ओर सेय नहीं कहा जाएगा कि भैया यह आज से हमारे वो आगे उत्तराधिकारी है यह आज से हमारा जो सिद्धांत उसका प्रचार करने वाले हैं यह बताएंगे कि मधवा संप्रदाय का क्या है और क्या नहीं है बिल्कुल क्योंकि दीक्षा तो अभी अभी मैं अपनी बात करूं दीक्षा गुरुदेव से बहुत लोग दीक्षा लेते हैं बहुत सारे शिष्य गुरुदेव के तो ऐसा नहीं है कि सब लोग ऑथेंटिक वक्ता हो गए शंकर परंपरा की ओर से बोलने के रू वाले के रूप में और जो वो कहेंगे वही शंकराचार्य का मत है ये संभव नहीं हा ऐसा नहीं है जब तक उसकी वाणी मैच खा रही है शंकर शंकर सिद्धांतों के अंतर्गत तब तक ठीक है मगर यदि कहीं पर विरोध होगा तो ये नहीं विरोध होने के बावजूद भी हम कह रहे कि नहीं नहीं ये तो शंकराचार्य परंपरा से आया हमारे पास संभव नहीं मान लीजिए दीक्षित

01:29:25:04 हूं और मैं कल को जो है कहने लग कृष्ण एंड क्राइस्ट आर सेम तो वो लोग कहे हमारे हमारा जो ज्ञान है व शिवांस से नहीं आया वो तो शंकर शंकराचार्य जी से आया हैकरा तो ये गड़बड़ बात है जब तक पीछे से परंपरा जब तक पीछे से परंपरा घोषित नहीं करती कि वो हमारा उत्तराधिकारी है वो हमारा रिप्रेजेंटेटिव है तब तक हम ये नहीं कर सकते कि भाई हमारे पास उस परंपरा से प्राप्त ज्ञान है जबकि ना तिलक है ना सिद्धांत है ना क्या कहते हैं दूसरी चीज है ना धर्म ब्रम शर्ट में कहा जाए ना ही मध परंपरा का हमारे पास ब्रह्म है ना ही मध परंपरा का हमारे पास धर्म है आचरण भी नहीं है और अध्यात्म भी नहीं है जी जी खर इस बारे में तो जो श्रीव गोस्वामी जी है उनसे मैं एग्री करता हूं माधवाचार्य लेकिन सॉरी माधवेंद्र पुरी जो थे इनको पुष्टि मार्ग के ग्रंथों में भी माधव कहा गया है माधव माधव स नियुक्त तो ये माधव संप्रदाय के थे और इन्हीं से महाप्रभु जी ने जो वैष्णव शास्त्र पढ़े तो इसलिए महाप्रभु जी को भी वल्लभाचार्य जी को भी वैष्णव शास्त्रों के ऊपर स्पेशली भागवत के ऊपर मधवा चार्य का मत मान्य है तो जैसे मधवा चार्य अध्याय

01:30:40:13 तय प्रक्षिप्त वाद की बात करते हैं कि भागत में ब्रह्मा मोहन लीला जो है वह प्रक्षिप्त है तो इसको महाप्रभु जी भी समर्थन करते हैं कि ये अन्य पुराण से भागवत में आ गया है लीला है लीला है निश्चय तो श्री महाप्रभु जी ने तत्वार्थ दीप निबंध में भागवता प्रकरण में उस पर अपना व्याख्यान भी दिया है सुबोध में भी व्याख्यान इसका दिया है लेकिन तथापि इसको प्रक्षिप्त बोला है कि यह अन्य पुराण से यहां पर आ गया है श्रीमद् भागवत की सारस्वत कल्प की लीला का समाधि भाषा का यह भाग नहीं है और यह मूल रूप से मधवा चार्य का इसको महाप्रभु जी मान्य करते हैं लेकिन इस कौन नहीं बताइए करय थोड़ा

01:31:24:07 अधिक मध संप्रदाय के निकट महाप्रभु वल्लभाचार्य जी हो गए गा कहने वाले मध के इतने क्लोज नहीं है जितने श्रीमद वल्लभाचार्य शु जी जी इसमें इसमें एक जो रोचक तथ्य आ रहा है वय आ रहा है मधवा संप्रदाय से जो होने का क्लेम कर रहे हैं मधुवा संप्रदाय से जो भागवत आ रही है उसको जो य क्लेम कर रहे कि हम मधवा चार संप्रदाय के वो उस भागवत को ज की त्य नहीं मान रहे है ना और जो बचार वो ज की त्य मान रहे हैं और वो जो लोग बचार परंपरा से स्वयं को घोषित कर रहे हैं वो ज की त्य ना मान कर के वो भागवत पढ़ने के लिए जा रहे हैं शंकराचार्य के पास हा व श्रीधर स्वामी को मान रहे हैं लेकिन जीव गोस्वामी य भी उद्घोष करते हैं कि श्रीधर स्वाम्य द पिता श्री कृष्ण चैत की मैं उनकी स्तुति करता हूं जिनकी कृपा से मैं भागवत के उन अर्थों का भी प्रकट य पर कर शर स्वामी को अदित श्रीधर स्मिता या शीर स्मी स्पष्टीकरण नहीं दे पाए ठीक से उनको उनकी कृपा से मैं कर रहा स्वामी जी

01:32:41:18 सनातन चता उस वाले विषय पर आ जाता हूं पहले तो हम एक स्टेटमेंट लेले कि मधवा चार जी से जो भागवत आई उसको जयो की त्य नहीं माना है इकोन ने और इकोन के अनुसार चैतन्य महाप्रभु भागवत पढ़ने जाते हैं श्रीधर स्वामी जी के पास और वो ये भी कोट करते हैं चेतन चरता मृत में कि मैं उनकी वजह से उनकी श्रीधर स्वामी के कारण के द्वारा मैं कृष्ण को जान पाया हूं मेरे नजरों में वह जो है वह जगत गुरु हैं यह कोट किया गया है मगर एट द सेम टाइम वहां पर एक बात आती है जो मुझे थोड़ी सी ठीक नहीं लगी वो ये कि वहां पर जो वल्लभाचार्य जी है उनकी वहां पर अवमानना सी दिखाई देती है जैसे कि वो अपना ग्रंथ दिखाने गए और फिर चैतन्य महाप्रभु जी ने कुछ वक्तव्य कहे तो तो इस पर थोड़ा सा प्रकाश डाल दीजिए ये जो अवमानना दिख रही है चेतन चरता मृत में जी बिल्कुल मैं मानता हूं कि वहां पर भाई शंकर मत की वो हो रही है मगर मैं इस शर्त पर शंकर मत की जो

01:33:56:25 महिमा मंडन है शंकर मत का महिमा मंडन है इस शर्त पर स्वीकार करना मुझे ठीक नहीं लग रहा कि वहां पर एक और प्रामाणिक आचार्य हमारे वल्लभाचार्य जी उनका जो उनकी जो है अवमानना की गई है तो यह तरीका मुझे ठीक नहीं लगा मुझे मुझे वहां पर खुद ही फील हुआ कि यह कहीं ना कहीं मिलावट है इस तरह से नहीं बोल सकते तो वो थोड़ा सा आप बताए बिल्कुल असल में इसका सत्य यह है कि शंकर संप्रदाय की श्रीधर स्वामी थे यह बात आप कह रहे हैं यह बात हम कह रहे हैं लेकिन इकन वाले ये बात नहीं कह रहे हैं इसकन वाले कह रहे हैं श्रीधर स्वामी विष्णु स्वामी मतान आई थे ये बात विष्णु स्वामी संप्रदाय जो है मैं विष्णु स्वामी संप्रदाय वालों से भी बात कर चुका हूं वो भी उनको भी लाने वाला हूं मैं विष्णु स्वामी संप्रदाय वालों से भी बात कर चका वल्लभ संप्रदाय विष्णु स्वामी संप्रदाय का अनुवर्तन करते हुए महाप्रभु अल्फ चार्य जी ने हर जगह अपने हर लेख पत्र में आज भी महाप्रभु जी के लेख पत्र विद्यमान उन सब में महाप्रभु जी ने स्वयं विष्णु स्वामी मता अनुवर्ती वल्लभ यही लिखा है महाप्रभु जी स्वयं विष्णु स्वामी मता आई है वे जब एक बात कह रहे हैं हम विष्णु स्वामी मताने उन्होंने क स्वामी का नाम उल्लेख तक नहीं किया है निंदा तो छोड़िए नाम उल्लेख नहीं

01:35:11:27 किया है उनका और महाप्रभु कहीं किसी की भी निंदा नहीं करी सिवाय बस इतना आवश्यक है कृष्ण सत्य है कृष्ण को असत्य कहने वाला नरक गामी इतना महाप्रभु जी ने कहा है बस और रही बात श्रीधर स्वामी की तो पते की बात ये है कि श्रीधर स्वामी ने विष्णु पुराण की भी टीका लिखी है और उसमें वो स्वयं को शंकर मतानु घोषित करते हैं वे स्वयं को गुरु रूप में स्वयं के चित्सु काचार्य जी को चिस काचार्य जी का उल्लेख करते हैं शंकर संप्रदाय के आचार्य रहे थे जिन और चितक आचार्य जी ने जो भागवत पर टीका लिखी थी उसके आधार पर श्रीधर स्वामी ने भागवत की टीका लिखी श्रीधर स्वामी पूरी शंकराचार्य के पद पर भी विद्यमान रहे हैं कुछ शायद गलत नहीं तो 116 शंकराचार्य थे शायद जग में नहीं थे और थोड़ा सा कम है नंबर मेरे पास ग्रंथ से [संगीत]

01:36:13:18 देख अब जब वोह विष्णु स्वामी संप्रदाय के हैं और उनके अनुसार मान लीजिए स्मार्थ मत गलत है तब उनको शंकराचार्य पद पर बैठकर और शक मत के प्रचार को करने की रक्षा करने की और आगे उत्तराधिकार हों उत्तराधिकारी शंकर मत का घोषित करने की क्या आवश्यकता पड़ी फिर यह भी एक सवाल आ जाता है और एक सन्यासी के ऊपर झूठ बोलने का आक्षेप लग जाता है झूठ बोलने का आक्षेप आ जाता है और इस पर य व

01:36:47:28 केर झूठ करने का प्रयास करते हैं कि नहीं नहीं पूरी पीठ की जो परंपरा है वही खंडित है और माना नहीं जा सकता स्वामी शंकराचार्य उनकी परंपरा वो ऐसा करने का प्रयास करते हैं जबकि सत्य बात तो ये है श्रीधर स्वामी की श्रीधरी टीका जो थी वो प्रथम टीका नहीं है भागवत की क्योंकि श्रीधर स्वामी चवी शताब्दी में हुए हैं उनसे पूर्व च काचार्य लिख ही चुके हैं श स्वामी स्वयं कह रहे हैं मधवा चार्य भी भागवत पर टीका प्रारंभ कर ही चुके थे वो 11वी शताब्दी में हु है बोपदेव वो भी भागवत पर टीका कर ही चुके हैं वो बवी 13वीं शताब्दी में तो बोपदेव इतने सब टी काकार श्रीधर स्वामी होके थे और दूसरी बात य की मधवा चार्य के पश्चात मध संप्रदाय के आचार्य हुए हैं विजय ध्वजा चार्य इन्होंने शी टीका का शकर संप्रदाय के मायावादी टीका बोल उसका खंडन किया है म संप्रदाय में श्रीधरी टीका का खंडन किया अब यद आप

01:37:52:13 ब्रह्म श्रीधरी टीका मान्य होनी नहीं चाहिए इसी से य भी पता लग जाता है कि आप ब्रह्म मधु गड़िया नहीं है क्योंकि मध संप्रदाय में शरी नहीं है उन्होंने खंडन किया है श्रीधरी टीका का खर खंडन मंडन अपने भारतवर्ष की पुरानी परंपरा सम्मानजनक परंपरा रही है तो उसम कोई वैसा आशय लेकिन ऐसा ही खंडन विजय वीर राघवाचार्य ने किया श्री संप्रदाय के आचार्य वीर राघवाचार्य अपनी मतलब मचार वाले उसको मायावादी कहते हुए

01:38:25:01 मधवा चार वाले जिसको मायावादी कहते हुए और अलग कर रहे हैं खंडन कर रहे हैं उसको फॉलो करने का दावा फॉलो नहीं कर रहा है फॉलो करने का क्लेम करता है कौन श्रीधर स्वामी के टीके को प्रामाणिक मानता है और फिर कहता है कि हम मधवा संप्रदाय के हैं और जब यहां वो ये क्लेम कर देता है कि हम हमारे पास जो भागवत आई है वो सीदर स्वामी से आई है तो यहां पर एक कैची पॉइंट और है कि वो यह कहता है कि भैया श्रीधर स्वामी जो है वो क्या कहते विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे अरे तो फिर दिक्कत य आती है फिर आप अपने को विष्णु स्वामी संप्रदाय का घोषित कर दो अगर ऐसी बात है तो चलो वो बाद की बात है शंकराचार्य थे कि नहीं थे वो एक अलग बात है कि आप सारे सबकी आंखों में मिर्ची झोक दो आधा किलो मगर कम से कम अपने को विष्णु स्वामी संप्रदाय का तो कहो आप जिसका विरोध कर रहे हो उसका अपने आप को कह रहे हो सबका विरोध करके आपको आप उसी से कनेक्ट बता रहे यहां तक कि मैं तो देखता हूं कि ये कई जगहो पर भगवान श्री कृष्ण का भी विरोध करते हैं और खुद को उन्हीं का भक्त बताते हैं बिल्कुल जी अब इस पर यहां पर अब मैं एक बात य जरूर बताना चाहूंगा कि जी ध्वजा

01:39:40:15 चार्य वीर राघवाचार्य और वल्लभ संप्रदाय में वल्लभ संप्रदाय में तो श्रीधर स्वामी का नाम उल्लेख करके कभी निंदा तो कहीं की नहीं गई है लेकिन हां उनको शंकर संप्रदाय का स्वीकारा गया तीन वैष्णव संप्रदाय हैं वल्लभ संप्रदाय मधु संप्रदाय रामानुज संप्रदाय यह तीनों श्रीधर स्वामी को शंकर मतान शंकर संप्रदाय का मान रहे हैं और श्रीधर स्वामी स्वयं भी स्वयं को शकर संप्रदाय का कह रहे हैं लेकिन दृष्टि है उनको विष्णु स्वामी संप्रदाय वाला कह रहे हैं और विष्णु स्वामी संप्रदाय वाले हाथ जोड़ नहीं संप्रदाय वो स्वयं कह रहे श्रीधर स्वामी लिख रहे हैं श्रीमत चित सुख योगी मुख्य रचित व्याख्या रीम तन

01:40:25:18 आत्म प्रकाशा विधाम श्रीमद विष्णु पुराण सार वि करता यति श्रीधर यह श्रीधर स्वामी विष्णु में कह रहे हैं तो अब अपने गुरु का चितक योगी जो है श्रीमत चिस योगी उनका उल्लेख यहां पर कर रहे हैं और क्लियर कर दे रहे हैं कि मैं इस यहां के से बिलोंग कर रहा हूं तो जब श्रीधर स्वामी एक बात स्वयं कह रहे हैं वही बात तीन तीन वैष्णव संप्रदाय कह रहे हैं पूरी पीठ वो बात कह रही है कि नहीं हमारे शंकराचार्य पद पर रहे हैं तो उन्हें जबरदस्ती विष्णु स्वामी संप्रदाय का बोला जा रहा है और ये कहा जा नहीं नहीं तो जो है इन्होंने इन्होंने जो यहां पर शंकर मत का अनुसरण किया है जिन स्थानों पर वो तो केवल इसलिए किया है क्योंकि शंकर संप्रदाय का प्रभाव बहुत ज्यादा था तो शंकर संप्रदाय के लोगों को भक्त ने के लिए ऐसा किया है वो सन्यासी थोड़ी ना थे वो तो 10 वर्ष के बालक थे जो बात बात पर डर जाते थे जिनको प्राणों वो जीवन का मोह था सन्यासी थो नाथे ये भी आता है अगर द अगर ये दबाब की बात को स्वीकार करते हैं तो सन्यासी के लिए तो मोहो को त्याग देना वाली बात की गई तो आप्रामा सन्यासी हो गए वो अब इस बारे में तो क्या ही कहा जाए और यहां परर स्वामी

01:41:41:02 की भागवत व्याख्या में मायावादी जीव गोस्वामी जीव गोस्वामी कह रहे त माया वादन कबत लिपि ना यानी वो मायावादी कबत लिपि है उनकी श्रीधर स्वामी की श्रीधर स्वामी चरणा नाम शुद्ध वैष्णव सिद्धांता अनु गता चे तरही थाव देव लिखते जो शुद्ध वैष्णव सिद्धांत है हम उसी को मानेंगे बाकी नहीं माने ये फैक्ट आपकी बुक में दिया गया है ये आपने अलग से बोलाय नहीं मैं बुक में कोट करके पढ़ रहा हूं आपकी बुक की पीडीएफ का लिंक हम डाल देंगे मतलब नीचे कमेंट सेक्शन में एक बार एक बार पूरी फाइनल हो जाए तो अभी दर्शको को बता रहा हूं ये जो प्र जी की जो बुक है इसका पीडीएफ नीचे डाल दिया जाएगा डिस्क्रिप्शन में तो आपको य सारे फैक्ट मिल जाएंगे जी आप अपनी बात बोले जी सनातन गोस्वामी जी स्त कह रहे हैं सनातन गोस्वामी कह रहे वंदे चैतन्य देवम तम तद व्याख्या विशेषत योय में लोकान श्रीधर स्वाम्य द पिता यानी जिनम श्रीधर स्वामी अदीप रहे वे

01:42:56:03 यह बात का घटस्फोट कर रहे हैं स्वयं श्री सनातन गोस्वामी जी बृहद वषण तोषण नामक अपने ग्रंथ में तो भाई अब बात यहां पर ऐसी आती है कि जब जीव गोस्वामी और सनातन गोस्वामी जी भी एक बात कह रहे हैं और चैतन्य चरितामृथम प्रभु ऐसा बो मायावादी बाले सर्वनाश और वही दूसरे स्थान पर वीर राघवाचार्य और श्रीधर स्वामी की निंदा करने वाले वीर राघवाचार्य और ये अपने विजय ध्वजा चार्य इन दोनों को भी भागवत टीका परम वैष्णव बोल कर के सम्मान दिया जा रहा है तो फिर बात यहां पर प्रकट हो जाती है कि श्रीधर स्वामी की टीका का अस्वीकार अस्वीकार या फिर उसको जबरदस्ती उसको निंदा बोल करके जबक महाप्रभु जी ने निंदा करी नहीं है जबरदस्ती महाप्रभु जी को गाली देना एकमात्र का उद्देश्य उस अध्याय का दिखाई देता है क्योंकि जब आपको वीर राघवाचार्य से कोई कार्य क नहीं है जिन्होने श्रीधर स्वामी भयंकर निंदा करी है विजय द से कोई कलह नहीं है वो भी श्रीधर स्वामी का खंडन कर रहे हैं तो फिर आप ऐसे महाप्रभु वल्लभाचार्य जिन्होने श्रीधर स्वामी का उल्लेख ही नहीं किया है नाम उल्लेख ही नहीं किया है और जिनकी टीका पूरी नहीं हुई आज तक सुबोधिनी जी अपूर्ण है क्योंकि दशम मभु

01:44:11:10 ने अंतिम दो वर्षों में लिखा था और उसके पश्चात भगवत धाम पधारने की आज्ञा हो गई थी तो आप श भगवत धाम पधार तो वो तो हमेशा अधूरा ही रह गया सुबोध जी तो पूरी नहीं हु तो महाप्रभु जी सुना अनुन विन कैसे कर सकते हैं श्री चैतन्य यह ऐतिहासिक प्रश्न आता है और दूसरा यह कि जब सभी की वंदना की जा रही है जिन्होंने श्रीधर स्वामी की निंदा करी है उनको गुरु रूप में कहा जा रहा है तो महाप्रभु जी जिन्होने निंदा करी नहीं है उनको जबरदस्ती गालिया जा रही है वैश भीतर तार करि गणन कहा जा रहा है उनको कहा जा रहा है फल प्राय भट्ट नामा आदि सब व्याख्या फल प्राय भट्टे नामद सब व्याख्या की इनकी नाम आदि जितनी भी व्याख्या है सब फल्गु प्रा और वही आपके सभी विश्वनाथ चक्रवर्ती ले लीजिए अथवा रघुनाथ दस गोस्वामी जी की स्तुति ले लीजिए अथवा जीव गोस्वामी जी के आप अपने लघु वैष्णव तोषण बहत वैष्णव तोषण ये ले लीजिए सनातन गोस्वामी गोस्वामी इन सब में महाप्रभु जी को कोट किया जा रहा है लगातार तो फल प्र तो कैसे कैसे कोट किया जा रहा है यहा किसका अनुसरण कर रहे सबसे बड़ी बात जिसको प्रमाणिक दिखाया जा रहा है उसको जो अन्य वैष्णव संप्रदाय जो आपके सार प्रामाणिक है बल्कि वो वैष्णव संप्रदाय जिस वैष्णव

01:45:26:22 संप्रदाय से स्कन क्लेम कर रहा है खुद का होने का वो तक जिस टीका को त्याज्य मान रहे हैं तो आप उस टीका को प्रेस करने वाले को या तो वो नहीं कर सकते हो और उसके आधार पर वहां पर वल्लभ महाप्रभु को इस तरह का जो अवमानना वहां पर प्रकट की गई है यह मुझे लग रहा है कि वो जो आपसी वैमनस्यता निकालनी थी वो जो कुछ ऐसा है उसके कारण से भरा गया यह बात कहां से आई इसका मैंने इस पर रिसर्च किया तो इस बारे में ऐसा पता लगा कि माधवेंद्र पुरी के चंदन यात्रा कर जाने के पश्चात बंगाली ब्राह्मण श्रीनाथ जी की सेवा किया करते थे लेकिन कुछ समय पश्चात बंगाली ब्राह्मणों ने श्रीनाथ जी का जो द्रव्य आता था भेंट का द्रव्य आता था उसको अपनी कुटिया में ले जाना और अपने ऐश्वर्य के साधन जुटाने प्रारंभ कर दिया था तो श्रीनाथ जी ने ऐसा वार्ता में आता है कि अवधूत दास जी को स्वप्न में आकर कहा कि बंगाली मेरो द्रव्य चुराए ले जाते या को हमारी सेवा का तो अवधूत दास दस अधिकारी जी जो अष्टछाप के कवि थे महाप वल्लभाचार्य जी के सेवक थे उनको कहा कि बंगाली श्रीनाथ जी का द्रव्य चुरा रहे तो उन्होने कहा हमको अवगत है लेकिन को महाप्रभु जी ने रखा है तो ब्राह्मण है

01:46:41:26 हम तो शूद्र हम इनसे कैसे कहे कुछ तो उन्होंने कहा कि ठीक है या बात के लिए हम गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी को अल में पूछेंगे वो जैसी आज्ञा करेंगे वैसा करें तो वे विठ्ठल नाथ जी के पास जाकर पूछते हम ऐसा ऐसा अवू दास जी को श्रीनाथ जी ने स्वपन में आकर आज्ञा करी तो उन्होने क तुरंत इनको हटाना चाहिए यदि देव द्रव य लोग उपभोग कर रहे हैं तो ब्राह्मण के लिए देव द्रव्य का उपभोग करना ठीक नहीं तो उन्होने कहा ठीक है आप एक बार बीरबल और टोडरमल को बोल दीजिए तो गोस्वामी विठ्ठल नाथ जी ने बीरबल और टोडरमल यह गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे तो उनको उन्होंने पत्र लिखे कि भाई कृष्णदास जी यदि हटाए तो आप इनको एक बार ठीक तो जतीपुरा आकर के बंगाली ब्राह्मणों की जो कुटिया थी जिसमें श्रीनाथ जी का पैसा देव द्रव्य इकट्ठा किया ग के रखा गया था वैभव के साधन थे उनको कृष्णदास जी ने कहा कि ये अब जो वैभव संपत्ति के साधन है इनको वापस तो प्रभु के उपयोग में ले नहीं सकते ये अर्ध भुक्त हो चुके हैं और अर्ध भुक्त प्रभु के उपयोग में आ नहीं सकता ठाकुर जी के उपयोग तो इसको क्या किया जाए तो उन्होंने कहा अब इसको हम यद और ब्राह्मण इसका उपयोग करते रहेंगे तो इनका पतन होगा क्योंकि ये देव द्रव्य है देव द्रव्य का उपभोग महापा की तो उन्होंने कहा कि ठीक है इसको आंच लगा दी उन्होंने मतलब अग्नि के समर्पित कर दिया

01:47:57:01 उनकी कुटिया में कृष्णदास जी ने आग लगवा दी अच्छा जी जी कुटिया में जब कृष्णदास जी की उन्होंने आग लगवा दी तो बंगाली ब्राह्मण उस समय श्रीनाथ जी का श्रृंगार कर रहे थे और श्रृंगार वो सब धरती पर पटक करके आए अपनी कुटियां में आग भुजने के लिए कनाथ जी को अकेला छोड़ कर के तब इस बीच कृष्णदास अधिकारी जी ने अन्य गुर्जर ब्राह्मणों को श्रीनाथ जी की सेवा में पहुंचा दिया और स्वयं गिरिराज जी के नीचे लाठी लेकर के खड़े हो गए कि अब आप हमारे प्रभु को छोड़ कर के अकेले गए अब हम आपको वापस जो है यहां आने नहीं देंगे तो अब आपका अधिकार नहीं रहा हमने दूसरे ब्राह्मण सेवा में रख लिए ऐसा उन्होंने कहा और उसके बाद इन ब्राह्मणों ने कृष्णदास जी पर अटैक किया और कृष्णदास जी ने उन सबको वहां से भगा दिया एक मिनट जरा मुझे थोड़ा सा समय तो यह कारण रहा जिस वजह से इस तरह की मिलावट भरी बात फैलाई जाती है और यह जो बात कही जाती है खैर इनका इस तरह की स्कन के द्वारा इस तरह के ताश के पत्तों का महल खड़ा किया गया है कि आप वो जहां से छू दोगे वहीं से चरमरा के पूरा महल गिर जाता है आप मधवा मधवा चार परंपरा

01:49:12:09 से होने का दावा छू लो आप चैतन्य महाप्रभु को फॉलो करने का दावा छू लो आप गौड़ीय संप्रदाय से होने का दावा छू लो आप जो है भागवत को मानने वाला दावा छू लो श्रीधन स्वामी को विष्णु स्वामी संप्रदाय का होने वाला दावा छू लो है ना आप इनका जो दावा है परंपरा प्राप्त ज्ञान उसको छू लो इनका जो दावा है कि हम श्री कृष्ण जी की भक्ति करते हैं भगवान की वो छूलो इनका कोई भी क्लेम आप छूलो जैसे रामपाल की कहानी हुई है ना रामपाल का मामला यही है कि जो भी उसके क्लेम है वो कहीं से भी छू लो सब चरमरा जाते हैं तो ऐसा ही इनका चल रहा है बस ये है कि थोड़े आपको वेल टू डेट जरूर दिखेंगे वो अगर भौतिक दृष्टि से देखे तो व अंग्रेजी अंग्रेजी बोल रहे होंगे बस रामपाल वाले थोड़े आपको गवार उसमें ज्यादा मिलेंगे और इनमें थोड़े आपको पढ़े लिखे मिलेंगे बस इतनी सी बात जी जी अब तो यह हम लोग क पर

01:50:17:00 थे किस बात का किस का उल्लेख चल रहा था आप एक बार ही चल रहा था को फिर उन्होने भगा दिया बाहर जो ल लेकर के खड़े हुए इन्होने फिर भट हो ग बिल्कुल अकबर के दरबार में उन्होंने फरियाद करी कंप्लेन करी तो वहां बीरबल ने कहा कि श्रीनाथ जी जो है वल्लभाचार्य जी के ठाकुर हैं और उन्होंने बंगाली माधव पु जी को रखा था उनके संबंध से सेवा कर रहे थे अब उनका मन दूसरों को रखने का है तो उन्होंने दूसरे ब्राह्मण जब सेवा में रखे तो अकबर ने तबका ठीक है तो नौकर है तो नौकर को मालिक के सामने बोलने का कैसे हक है ऐसा कहके अकबर ने कहा ठीक है इनका केस बनता नहीं है इसलिए जाइए उनका दीक्षित जी का मंदिर अकबर गोस्वामी विट्ठलनाथ जी को दीक्षित जी बोला करता था और यह सभी इतिहासकार मानते हैं कि गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के प्रभाव से ही अकबर ने आगे चलकर के जजिया कर और तीर्थ यात्रा कर को समाप्त किया था और जतीपुरा और समेत पूरे व्रज मंडल में किसी भी प्रकार के जो वृक्षों को किसी प्रकार की हानि पहुंचाना निषेध किया था गौ हत्या का पूर्ण रूप से प्रतिबंध किया था और पूरा गोकुल और जतीपुरा गांव श्री विट्ठलनाथ जी को भेंट कर दिया था अकबर ने इसके

01:51:32:06 फरमान आज भी नाथ द्वारा में विराजित है आज भी अकबर के फरमान मरियम उज जमानी बेगम जो थी इनके फरमान यह आज भी मौजूद है जो कि विट्ठलनाथ जी के प्रति लिखे गए थे खर इसकी कथा दूसरी आती है यह मैंने बुक में कही है अब अच्छा ऐसा नहीं है कि चैतन्य चरितामृथम चैतन्य चरितामृथम ऐतिहासिक विवरण नहीं दिया गया है व चैतन्य भागवत का विरोध और विष चक्रवर्ती का भी विरोधी है और इसी तरह से एक और आती है बात जो कि स्वयं इनको स्वीकार पड़ी है भक्ति सिद्धांत सरस्वती को भी स्वीकारने पड़ी जसे चैतन्य चरितामृथम

01:52:17:10 चमत्कार ल दुई पुत्र आनी प्रभु चरण पड़ी इसमें इसका बैकग्राउंड ऐसा है कि जब चैतन्य महाप्रभु अडल में श्रीमत वल्लभाचार्य जी महाप्रभु जी से मिले तो चैतन्य चरितामृथम महाप्रभु के चरणों में रख दिया दुई पुत्र आनी प्रभु और यहां पर जो भक्ति सिधांत सरस्वती है भक्ति जो भी इतिहासकार है वो भी यही चीज कहेंगे कि जो दोनों पुत्र थे महाप्रभु जी के विट्ठलनाथ जी और गोपीनाथ जी उनका भी तो एक जन्म ही इस समय नहीं हुआ था केवल गोपीनाथ जी का जन्म हुआ था दई पुत्रा वाली बात यहां पर झूठी है ये बंगाली में लिखते हैं दई पुत्र गोपीनाथ और विट्ठले शवर महाप्रभु 1434 व 1435 शकाब दय प्रयाग उपनीत तत्काल विट्ठले शव जन्म है नाय द टू सनस ऑफ वल्लभाचार्य गोपीनाथ एंड विट्ठलेश न श्री चैतन्य विजिटेक इन द ईयर 1434 और 1435 शकाब विलेश्वर वाज नॉट यट बोर्न यह बात स्वयं प्रभुपाद जी भी लिख रहे हैं और यहां पर चैतन्य चरितामृथम उभर करके सामने आ गई है जिसे स्वीकारना

01:53:32:14 पड़ेगा ही पड़ेगा और पड़ा ही है अब इसमें आगे जाकर के इस अध्याय में और भी बहुत सारी बहुत सारी समस्याएं आती हैं जिनको मैंने डिटेल में वर्णन किया है सारी असंगति हों का यदि आप कहे तो हम उस पर जाए अथवा हम लोगन के आते जी आगे हम चलते स्न की जो आगे अन्य चीज क्योंकि बाकी तो आपकी जो बुक है उसका पीडीएफ का लिंक हम डाल देंगे यहां पर जिनको पढ़ना होगा

01:54:07:18 पढ़ेंगे अच्छा एक यह भी चीज जैसे जो परंपरा की बात चल रही थी यह भी चीज थी की स्कोन जब क्लेम करता है कि भाई जो क्या कहते हैं हम जो है एक संप्रदाय है तो इन्होंने अपना कुछ भी अलग से भागवत पर भाष्य किया जबकि संप्रदाय का एक तत्व होता है कि व भाष्य करता है नहीं भागवत भागवत भाष्य का जो भागवत का उन्होने ट्रांसलेशन और टीका करी है इंग्लिश में उसी को अपना भाष्य मानते नहीं तो वो तो कहते हैं ये कॉपी है उसकी श्रीधर स्वामी जी की अपना चिंतन थोड़ी ना बताते हैं नहीं पूरी श्रीधर स्वामी जी की कॉपी ये लोग नहीं करते हैं श्रीधर स्वामी जी कई जगहो पर जहां पर श्रीधर स्वामी ने शंकर मत का अनुसरण किया है वो तो नहीं किया है और कई ऐ स्थान भी है जहा पर श्रीधर स्वामी ने शंकर मत का अनुसरण नहीं किया है वे भी गौड़ी आचार्य को अमान्य है ऐसा स्पष्ट हमें सारा अर्थ दर्शनी देखेंगे विष चक जी प्रकट है क्या जब व्यवहार की बात चल रही होती है तो शंकर शंकर मत में भी जो भी सिद्धांत है वो सब मैच खाएंगे भक्ति वाले सिद्धांत जितने भी है शक मैच खाएंगे अन्य भक्ति संप्रदाय से जहां तात्विक विवेचन होगा केवल वही पर डिफरेंसेस ऑफ ओपिनियन आएगा जहा न हो बिल्कुल

01:55:22:18 भक्ति तो क्योंकि भक्ति तो भक्ति अपने आप में खैर अलग य थोड़ा सा मुझे एक वो फैक्ट जानना था कि मधुसूदन सरस्वती जी के साथ इनका जो क्या कहते हैं यह वल्लभ महाप्रभु जी का नहीं मधुसूदन सरस्वती जी के साथ बहुत अच्छे संबंध थे वल्लभ महाप्रभु के उनके बारे में थोड़ा सा बताइए शंकर संप्रदाय का और संप्रदाय का आपसी संबंध कैसा रहा वो थोड़ा सा असल में बात य है कि जो प्रामाणिक हमारे संप्रदाय हैं इन संप्रदायों में आज जो देखने को मिलती है वास्तव में कोई ऐसी दूरी है नहीं मगर वह जो देखने को दिखाई दे रही है सब अपने अपने उसम लीन है या मगन है तो इस बात का फायदा यह जो विदेशों से आने वाले तंत्र है मल तंत्र इस तरह के तंत्र जो रूप बदल कर आते हैं आजकल इसको नाम दिया गया मलेच्छ राज के भेजे हुए तत्व जी तो ऐसे जो तंत्र है तो इनको फायदा उठता है फायदा मिलता है तो मैं थोड़ा सा इस बारे में जानना

01:56:37:18 चाह रहा था कि वल्लभ संप्रदाय का शंकर संप्रदाय के साथ किस तरह का वोह है तो मधुसूदन सरस्वती जी और वल्लभ महाप्रभु जो है वोह समकालीन थे तो उनके बीच का थोड़ा सा मुझे आप बताए बिल्कुल ये अब असल में महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी हमारे संप्रदाय में प्रचलित अनुश्रुति के अनुसार कि महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने अपने पुत्र गोपीनाथ जी और द्वितीय पुत्र श्री विट्ठलनाथ जी प्रभु चरण को विद्या अध्ययन मधुसूदन सरस्वती जी के द्वारा करवाया था किंतु इस बात का उल्लेख हमें प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता है अनुसूची में प्राप्त होता है लेकिन प्राचीन एक गृह वार्ता है महाप्रभु वल्लभाचार्य ग्रह में जब निवास कर रहे थे तो उस समय के इड ग्रह नाम से रिकॉर्ड किए गए हैं गोकुल नाथ जी द्वारा उसमें माधव सरस्वती जी का नाम अवश्य आता है कि माधव सरस्वती जी जो थे वे महाप्रभु जी के समकालीन थे और महाप्रभु जी के मित्र थे उन्होंने ही महाप्रभु जी को य सुझाव दिया कि आप वाराणसी से पधार कर के

01:57:47:06 अड़ेलते मधुसूदन सरस्वती तो मधुसूदन सरस्वती जी मतलब सीनियर डिसाइल रहे माधव सरस्वती जी के और इन्हीं माधव सरस्वती जी के यहां जब गोपीनाथ जी और विट्ठलनाथ जी पढ़े तो मधुसूदन सरस्वती जी को भी वो गुरु रूप में ही देखते थे और मधुसूदन सरस्वती उनको अपने गुरु भता के रूप में देखते थे ये और मधुसूदन सरस्वती और महाप्रभु श्रीमंत वल्लभाचार्य जी में इतना प्रेम था कि महाप्रभु जी ने आज्ञा करी है गोपीनाथ जी प्रभु चरण ने आज्ञा करी है सुयान भक्तान प्रदर्श यानी अपने ठाकुर जी के दर्शन जो सुय हो और जो भक्त हो उन्ही को कराए जा सकते हैं अन्य को नहीं जो सुई नहीं है लेकिन भक्त है उसको भी आप बचे और जो सुई है लेकिन भक्त नहीं है उससे भी आप बचे महाप्रभु जी ने मधुसूदन सरस्वती जी को अपने ठाकुर जी के दर्शन कराए हैं क्योंकि मधुसूदन सरस्वती ने महाप्रभु जी के जो ठाकुर जी थे जितने स्वरूप विराज सबकी स्तुति करी उन सभी की स्तुति करी उनके दर्शन कर तो महाप्रभु जी ने उनको अपने दर्शन कराए ठाकुर जी के यानी इतना उन्हें सुई मान रहे हैं इतना उन्हें भक्त मान रहे हैं मायावादी होने के पश्चात अपने ठाकुर जी के दर्शन कराने और मधुसूदन सरस्वती जी ने इंटर्न महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की स्तुति करी है प्रचंड प्रचंड शंकर मता अनुय होते हुए भी अब जैसे इनके

01:59:02:13 बारे में प्रसिद्ध है कि व्यास तीर्थ जी ने तत्ववादी स्थापना करने के लिए न्यायाम ग्रंथ लिखा और तर्क तांडव ग्रंथ लिखा तो यह जो न्यायाम था यह बड़ा प्रचंड ग्रंथ था उस समय इस ग्रंथ को लेकर के अप्प दीक्षित ने ऐसा कहा है कि मधवा चार्य का तत्व जो था इसका कद्दू बहुत पहले फट चुका होता व्यास तीर्थ जी ने बचा लिया न्यायाम लिख कर के उस न्यायाम न उस समय मधुसूदन सरस्वती ने लिखा अद्वैत सिद्धि नामक ग्रंथ में लिख कर के जिसमें वो व्यास तीर्थ जी का खंडन कर रहे हैं अद्वैतवाद की स्थापना कर रहे हैं वे मधुसूदन सरस्वती ऐसे प्रचंड अद्वैतवाद वे महाप्रभु श्रीमद वल्लभाचार्य जी की स्तुति कर गए हैं करी है उन्होंने अपने आनंद मंदाकिनी नामक ग्रंथ में और और आनंद मंदाकिनी में वे लिखते है मधुसूदन सरस्वती जी यह श्री वल्लभ हृदय सदय सम्यक विराजते नम सही कृष्ण भावात्मक

02:00:04:09 भु वल्लभ के हृदय में जो कृष्ण विराजित है वे ही मेरे मानस में नित्य विराज वसतु में मान ऐसी स्तुति कर रहे हैं और आगे अगले श्लोक में लिखते हैं सद धरता स्वेम परम ऋषि करता हरि गुण विकर्ता चित्तस्य स्व गुण गण रोमांच निच पराक प्रायो निज जन निखिल दोषा शयाम स भरता में नित्य स भरता में नित्य जयति सततम श्री विठ्ठल हरि ये जो विट्ठल हरि ही यहां पर इन्होंने पद उपयोग किया है ये जो आनंद मंदाकिनी को पढ़ने वाले सभी रिसर्चर है जैसे आनंद मंदाकिनी डॉक्टर सुनीता शर्मा ने जयपुर से प्रकाशित कराई है इस पर अच्छा आलेख लिख कर के इस पर रिसर्च करके उसमें उन्होंने लिखा है कि यहां जो विट्ठल हरि ही आ रहा है यह गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी प्रभु चरण को इंगित कर रहा है उनको उनके प्रति सम्मान दर्शा रहा है स श्री विट्ठल हरि ऐसा कहते हुए सो इतना प्रेम इनके मध्य परस्पर था अब यह है शंकर मतान आई जो व्यास तीर्थ जी का विरोध कर रहे हैं व्यास तीर्थ जी कौन है महाप्रभु जी के वैष्णव शास्त्र पढ़ाने वाले गुरु माधवेंद्र पुरी के गुरु के यानी आप वो देख रहे रि

02:01:19:10 महाप्रभु जी के जो दादा गुरु के पद पर है उनका खंडन य कर रहे हैं लेकिन त् खंडन कर रहे महाप्रभु जी की भक्ति की स्तुति कर रहे और महाप्रभु जी उनकी भक्ति से इतने प्रसन्न है कि य भक्ति आप कर रहे हो तो ठीक है पर हमको आपको अपना शिष्य नहीं बनाना ऐसा नहीं कना कि आप हमारे संपदा हमारे सेवक वैष्णव बन हो आप भक्ति करें ठाकुर जी परस्पर प्रगा प्रेम के दर्शन हमें हो रहे हैं आनंद मंदा ग्रंथ य मधुसूदन सरस्वती जी का ग्रंथ मधुसूदन सरने रसायन नाम का ग्रंथ और लिखा है जिसमें वो भक्ति बताते हैं भक्ति के रस शास्त्र होने के बारे में बताते हैं और इन्हीं मधुसूदन सरस्वती का एक और श्लोक है जो बड़ा प्रसिद्ध है वल्लभ संप्रदाय में भी वंशी विभूषित करान अरविंद नेत्रा ये शायद आपने सुना हो भी लगभग इसमें उन्होंने लिखता लिखा है कि कृष्णा परम किम तत्वम हम न जाने कृष्ण से परे कोई तत्व है ऐसा मैं नहीं जानता ये लिख रहे हैं मधुसूदन सरस्वती जी जो शंकर भता आई सो ऐसी उनकी अनन्य भक्ति से महाप्रभु जी प्रसन्न थे कि ठीक है आप ऐसी अनन्य भक्ति कर रहे हैं तो आप बिल्कुल यही सबसे ठीक है उत्तम है आप बिल्कुल य भक्ति करें और ऐसा कोई कभी ऐसा कोई द्वेष भाव

02:02:34:16 का दर्शन नहीं हो रहा है य पर कि अन्य संप्रदाय के साथ में प्रेम दवे भाव का दर्शन तो यहां होता है भैया हम कोर्ट में जाएंगे और जो अपना मंदिर छुड़ाए और जो है कुछ ऐसी बा किसके अगेंस्ट आप जाए आप बिल्कुल जाए विषण चक्रवर्ती जी के अगेंस्ट जाए आप चैतन्य भागवत के ऊपर केस करें कि गलत है गलत कह रहे हैं ये लोग आप केस करें रघुनाथ दास गोस्वामी जी के ऊपर कि उन्होंने विट्ठलनाथ जी की स्तुति करी कैसे ये कैसे कह रहे हैं किय विट्ठलनाथ जी श्रीनाथ जी को ऐसा लाड़ लड़ा रहे कि श्रीनाथ जी मोटे हो गए हैं ये पुष्ट होते जा रहे मोटे होते जा रहे हैं इनको इतना प्रेम किया जा रहा है ऐसा कहने वाले आचार पर पहले आप केस करें उसके बाद आप वल्लभ संप्रदाय प आए तो ठीक रहेगा नहीं ठीक है वो केस में भी आज देख लेंगे है

02:03:23:12 लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर और हम तैयार है सीना लिए अपना इधर आए

⬜ Not used yet · 02:03:31:25 – 02:36:52:00 (33:20)

02:03:31:25 तो मैदान में ये लोग मैदान में ही तो नहीं आते ये लोग आते कहां है अद्भुत लीला है ठाकुर जी र क्या ठीक है अब इस बारे में फिर अब आगे आते हैं कि इस सब चीजों के बाद कई ऐसे वक्तव्य कह दिए गए जो ना तो प्रक्षिप्त ग्रंथों में लिखित हैं यानी जो चैतन्य ता जिसे प्रक्षिप्त कह रहे हैं ना तो उसमें लिखित है मन गंत कपूल कल्पित कहे गए और ऐसी गालियां जो कहीं नहीं प्राप्त हो रही वो चीजें न में अनफॉर्चूनेटली प्रभुपाद जी के द्वारा प्रकट हुई और उनके शिष्यों द्वारा बहुत बढ़ा दी गई उनको अब जरा यहां पर देखते कि कन से जो वल्लभ संप्रदाय का पर्टिकुलर संबंध था वो किस प्रकार का रहा है तो यह भी खैर पुस्तक में मैंने डिटेल में विमर्श तो किया है इसको आप शेयर कर पाएंगे क्याय निष्कर्ष भ्रमण कु शंका एव समाधान कौन से प्रश्न पर है बोल दीजिए हो जाएगा दिखाय

02:04:36:01 प्रभ अभी मेरे ख्याल से नहीं हो पाएगा व कुछ ठीक है ठीक है तो फिर मैं ही य बताता बता देता हूं य पर यहां परम आपके पास स्क्रीन है अगर बैक कैमरे से उसे दिखा सकते हैं अच्छा जीय बैक कैमरा होगा कैसे एक सवाल आ रहा है हमारे पास कि जब आप विदेशियों के कल्चर को ऐसा करते हो वैसा करते हो तो आप यह यूज क्यों करते हो विदेशियों के द्वारा पहली बात तो यह कि विदेशियों के मूल में भी हमारा विज्ञान है दूसरी बात यह है कि धरती पर गिरे हुए व्यक्ति को धरती का ही सहारा लेकर के उठना पड़ता है माया में फसे हुए व्यक्ति को ही जो पराशक्ति है भगवान की उसका सहारा लेकर के निकलना पड़ता है इसी प्रकार से अगर हम हर तरह से जो पैशा चिक उससे घिरे हुए हैं तो उस पैशा चिक जो वातावरण है उसी की चीजों का आलंबन लेकर के हम उस पैशा चिक वातावरण से निकलेंगे है ना

02:05:51:02 जैसे कि आकाश में जो हवाई जहाज जिसका उड़ना लक्ष्य है हवाई हवाई जहाज का आकाश में उड़ना लक्ष्य है धरती से अलग होना उसका लक्ष्य है पर धरती से अलग होने के लिए वह पहले धरती पर ही दौड़ता है उसी तरह से हम दौड़ रहे हैं ठीक है और बहुत सारी चीजें इसमें बाकी जो यह बातें कर रहे हैं अगर व इस कन से जुड़े हुए हैं तो यह ऐसी चीजें नहीं है जिनका उपयोग करना जो है वो हो जाए बाधित हो जाए ठीक है जिसका उपयोग हम नहीं कर सकते हम उपयोग कर रहे हैं उसके लिए यथोचित जो उन्होंने अपने जो मूल्य निर्धारित किए हैं अपने श्रम के वो मूल्य भी दे कर के कर रहे हैं मगर आप यदि आप इस कौन से हैं तो आप त्रिदन संन्यास भागवत ये सब क्यों ले रहे हैं जब आप शंकरा शंकर मत का खंडन करते हैं तो ये सन्यास सन्यास सन्यास आप सन्यास और ये

02:06:54:01 मेरा मत ऐसा है कि रही बात इसकी परिधान वगैरह की तो परिधान ऐसा कहना कि नहीं सब विदेशी ही है यह बात ठीक नहीं है सब प्रधान तो तो भारत में ही बन रहा है प्रधान का स्वरूप बस बदला हुआ है लेकिन है तो सब भारतीय ही भारत में जो आ गया हमारा जिन्होने बनाई है उन्होंने उन चीजों का एक मूल्य निर्धारित किया है हम उस मूल्य को दे रहे और ले रहे मगर सन्यास का कोई मूल्य नहीं होता है का कोई मूल्य नहीं होता है सिद्धांतों का कोई मूल्य नहीं होता है हा वो बिना परमिशन के ले भी रहे हो और उनको आप गालिया भी दे रहे

02:07:35:06 हो यह चीज वव अपरा अंतर्गत आ जाएगी खर अब यहां पर जरा आते हैं तो इस प्रकार से अतिहा सिक बातें करनाय र प्राचीन समय से ही प्रारंभ हो गया था जैसे भक्ति सिद्धांत सरस्वती के पिताजी भक्ति विनो ठाकुर ये संभ कायस्थ थे शायद इन्होंने इनसे ही गौड़ीय मठ प्रारंभ हुआ ऐसा आदि आचार्य है ऐसा कहा जाता है गौड़ी मठ की स्थापना भक्ति स सरस्वती ने की थी इनके पुत्र थे अभी सज्जन तोषण नाम के अपने मासिक पत्र में लिखते हैं कि श्री जीवा वंस श्री वल्लभाचार्य शड हि बुक तत्वार्थ जीव गोस्वामी एंड श्री जीव पॉइंटेड आउट मेनी इंपर्सनल थॉट्स इन हिस बुक एंड एक्सपोज द श्री वल्लभाचार्य ओपनि यानी वल्लभाचार्य जी के जो पुस्तक में तत्वा निबंध में कई जगहों पर मायावादी जीव गोस्वामी ने दिखाया वल्लभाचार्य को और उनकी डिसग्रेसफुल हो मायावा मायावा कोट करते हुए दिखाया मायावा शब्द का उपयोग करते हुए इंपर्सनल थॉट्स इंपर्सनल थॉट्स को ये वो कहते हैं

02:08:45:21 मायावादी वल्लभाचार्य अमेंडेड द मेजर पोर्शन ऑफ हिस बुक अकॉर्डिंग टू द गाइडेंस ऑफ श्री जीव यह सज्जन तोषण के पत्र में इन्होंने लिखा है अब हम इस बात को हम पहले देख चुके हैं कि जीव गोस्वामी वृंदावन आए ही कई वर्षों बाद है इनकी का वल्लभाचार्य जी का दर्शन करना भी असंभव है तो भक्ति र साम सिंधु पर डिबेट भी नहीं हो सकती और ही यह हो सकता है तत्वार्थ दीप महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का सबसे प्रथम ग्रंथ है जो आज भी प्राप्त है और महाप्रभु जी ने कभी भी वो दोबारा नहीं लिखा तो ये एक तरह से यहां पर एक मिस इंफॉर्मेशन का प्रचार कर दिया गया ये अपने गसु क्या है महाप्रभु जी मिला कोई इनको कोई कुल मिलाकर वल्लभाचार्य जी से इनको कोई द्वेष था मामला जो ऐसी चीज मिलाई गई है उसम ग में यहां पर डिसग्रेसफुल क्या है केदारनाथ दत्त जी द्वारा ऐसी असत्य कल्पित बातों का प्रचार प्रसार डिसग्रेसफुल है महाप्रभु जी ने जो ग्रंथ अपने सबसे पहले लिखा सबसे प्रारंभिक जो ग्रंथ लिखा तत्वा निबंध उसमें डिसग्रेसफुल ओपिनियन आ रही सीधी सी बात है जो चीज संभव नहीं है ऐतिहासिक रूप से जीव गोस्वामी का मिलना ही जब संभव नहीं है तो ये कैसे बात संभव है झूठी बात क्यों प्रचारित की जा रही है यह प्रश्न यहां पर उठता है

02:10:00:24 अच्छा एक लेख में अपने ये केदारनाथ दत्त जी जो है भक्ति विनोद ठाकुर ये सभी वैष्णव संप्रदायों की भी निंदा कर गए ये क्या लिखा है उन्होंने कि चतु वैष्णव संप्रदायों की त्रुटिपूर्ण व्याख्या करते हैं और कहते हैं मधवा चार्य का सिद्धांत जो है वो एक बीज की भाति अपस्फीति प्रस्फुटित नहीं हुआ है भक्ति का अब प्रस्फुटित है रामानुजाचार्य कावा केदारनाथ दत्त जी जीव गोस्वामी नहीं यानी भक्ति विनोद ठाकुर यानी जी के दादा गुरु भक्ति विनोद ठाकुर यह अंग्रेजों के मजिस्ट्रेट थे और प्रारंभ में मांसाहार भी उन्होंने किया है उसके पश्चात य जब वैष्णव हो गए तो उन्होने कं धारण करने लगे और उन्होने नि त्याग किया था लेकिन ये लिख देखा जाए कि मधवा चार्य का सिद्धांत बीज की तरह अपस है रामानुजाचार्य का सिद्धांत एक कली की भाति अप्र फलित है जैसे कली है लेकिन प्रफुल्लित नहीं अप प्रफुल्लित है निंबार्काचार्य का सिद्धांत एक पुष्प की भाति फल रहित होने से

02:11:09:01 असंपर्क चार्य का और वल्लभाचार्य का सिद्धांत तो यत्र तत्र उ घास की तरह स्पष्ट है जिसमें साध्य और साधन क्या हैय पता नहीं लग रहा है अब महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ऐसे आचार्य जिन्होंने सोडस ग्रंथ से लेकर के तत्वार्थ दप निबंध में स्पेशल एक साधन प्रकरण लिखा है कि हमारा साधन क्या है उन्होंने अपने दोनों पुत्र पुत्र द्वय को ठाकुर जी की सेवा का संपूर्ण साधन किस प्रकार के भाव से सेवा करनी पूरा उन दोनों को सिखाया है किस प्रकार से सेवा करनी सब महाप्रभु जी बता रहे हैं अब यह स्पष्ट होता है महाप्रभु जी को पढ़े तो कि केदारनाथ दत्त जी ने यहां पर अपने अधूरे अध्ययन के द्वारा जनित जलपा लाप की और कुछ नहीं किया क्योंकि वल श्री वल्लभ ने अपना सिद्धांत जो है सभी ग्रंथों में बताया है अपने प्रथम ग्रंथ तत्वा दप निबंध में बताया है साधन प्रकरण में बताया है निरोध लक्षण आदि में भागवत टीका आदि में सुबोधिनी में भी बताया है सिद्धांत मुक्तावली जो सोडस ग्रंथ में आता है उसमें भी सिद्धांत बताया है और किस भावना और किस रीति से भगवत सेवा की जानी चाहिए यह भी अपने दोनों पुत्रों को सिखाया है और इसे दोनों ने बाद सेवा शकी नाम से लिपिबद्ध भी किया है एक ही सेवा श्लोकी के शलोक हमें प्राप्त होते हैं जो दोनों ने यानी जब ठाकुर जी को जगाए तो

02:12:24:02 किस भाव से जगाना जैसे वो श्लोक है उद सविता नाथ प्रिया स जाग की सविता के नाथ जो उदय हो चुके सविता उदय हो चुके सूर्य उदय हो चुके हे नाथ तो आप प्रिया के से जागे प्रिया जी के संग आप जागे प्रियाज के साथ उद सविता नाथ प्रिया जाग अंगी कुरु मत सेवा मेरी सेवा को आप स्वीकार करें स्की माम तो यह भाव परक मंत्र यानी इस भाव के साथ ठाकुर जी को मंगला में जगाना चाहिए महाप्रभु जी ने अपने दोनों पुत्रों को सिखाया है दोनों ने यही श्लोक लिखा है सीधी सी बात है महाप्रभु जी ने ही रचना की श्लोक तो इस प्रकार के भावों के साथ आपको सेवा करनी है महाप्रभु जी ने पूरी सेवा श्लोकी दोनों पुत्रों को सिखाई उ सब क्लियर है यहां यदि कुछ क्लियर नहीं है तो इन्ह क्लियर नहीं था केदारनाथ दत्त जी खैर इसके आगे इसी तरीके इसी परिपाटी का अनुसरण करते हुए भक्ति विधान स्वामी जी भी कई बार बहुत अनर्गल चीजें कह गए और सभी के लिए कह गए खाली पुष्टि मार्ग के लिए नहीं जैसे इनका 31 मार्च 1975 स्टेटमेंट जो दे रहे वाले इनका गौड़ीय संप्रदाय से कोई मतलब नहीं है य अपने दे रहे ये यह गौड़ी संप्रदाय को तो अप संप्रदाय कहते हैं भक्ति विनोद ठाकुर जो थे उन्होंने कहा कि यह सब जो है जितने भी

02:13:39:06 षट गो स्वामियों के आज वंशज है यह सब के सब हो चुके हैं यह मूल गौड़ वैष्णव नहीं है मूल ग वैष्णव हमसे हम है हम जो को जने दे रहे हैं कक वैव तो सबको जने का अधिकार हो गया इनकी जोय खिचड़ी है इनकी खिचड़ी देख के कभी कभी मन करता है जैसे ज्यादा उसम डीप में जाने लोगो एक कोई ईटा लो अपने सर पर मार लो क्या कर प्रभु लीला है खर कलुक बढ़ रहा है कलुक बढ़ाने की ठाकुर जी लीला कर रहे हैं जी आगे ये कह रहे हैं तमाल कृष्ण गोस्वामी एक तमाल कृष्ण प्रभुपाद के शिष्य थे इन्होंने बोला प्रभुपाद से इन चैतन्य चरिता वेरी क्लियर ट वन डज नॉट एक्सेप्ट लर्ड चैतन्य महाप्रभु देन ही कैन नॉट एक्चुअली वशिप कृष्णा प्रप प्रभुपाद कहते ट्स फैक्ट अब तमाल कृष्ण बोल रहे ना जस्ट टू कैरी ऑन विद अचिता अंद महाराज पॉइंट इट वड सीम ट द रामानुज एंड द मधवा मधवा दे डू नॉट एक्सेप्ट चैतन्य महाप्रभु एस सुप्रीम पर्सनालिटी ऑफ गड हैड सो हाउ कैन दे पॉसिबली वो कैसे सेवा कर सकते हैं कृष्ण की क्योंकि म रामानु चैतन्य महाप्रभु कृष्ण तो मानते नहीं प्रभुपाद

02:14:54:19 कह रहे देरर दे कैन नॉट अंडरस्टैंड हायर रसा दोनों वैष्णव संप्रदाय हायर रसों को नहीं समझ सकता अंडरस्टैंड नहीं कर सकते प्रभुपाद क उन्नत उज्जवल रसम दे कैन नॉट अंडरस्टैंड कमाल दे कैन अंडरस्टैंड शांत रस प्रभुपाद बोले यस दास रस बट नॉट सख नॉट मोर देन ट दे कैन नॉट मेडिट देर इ नो पैटरनल रस और माधुर इन देयर कम्युनिटी यह प्रभुपाद कह रहे हैं अब यहां पर श्री अंडल कौन थी अलवार संत कौन हुए हैं उन्होंने कैसे पद लिखे हैं यहां इनसे तो अनभिज्ञता दिख ही रही है और श्री संप्रदाय के आचार्य जो सुंदर माधुर्य भाव युक्त जो स्तुति लिखी है उससे भी अनभिज्ञता दिख रही है अपने संप्रदाय की भक्ति और परंपरा पर अनन्य अति श्रद्धा होना बहुत अच्छी बात है निश्चय अच्छी बात है किंतु इसके लिए अन्य भक्ति पर मार्गी परंपराओं पर अनर्गल टिप्पणी करना उने नीचा दिखाना ये शोभ नहीं कहा जाता और सत्य तोय पना फिर उन बातो को पब्लिक भी कराना चलिए मान लीजिए कि आपका कुछ ऐसा हुआ कि आप में वि बात हुई तो आपने अपने अंतरंगता में अपना आपने जो भी बोला फिर उसको आप प्रचार भी

02:16:09:20 कर रहे हो हा आप उसका प्रचार कर रहे हैं और इसी सेक्टर में मधवा चार को इस प्रकार से बोला तो विश्वेश तीर्थ स्वामी जी जो थे उडपी म के गादीपति आचार्य वो विश्वेश दर स्वामी जी शायद आप जानते हो राम मंदिर के लिए उन्होंने बहुत योगदान दिया है विश्वेश तीर जी ने तो उनको इकोन को लेटर लिखना पड़ा था उन्होंने य लेटर लिखा कि वी आर वेरी मच पेन टू नोट ट यू हैव बीन अंडरटेकिंग पब्लिक प्रोपेगेशन ऑफ सम इमेजिनरी फैब्रिकेशन फैब्रिकेटेड इंसीडेंट सच ट द स्टोरी ऑफ गौरांग च वुड डिसग्रेस द एस्टीम पर्सनालिटी ऑफ जगतगुरु श्री मधवा चार इट हैज

02:16:49:25 क्रिएटेड्रॉअर्नेविगेटर बज फॉर क्राइसिस एंड हारमोनियसली एडवाइज यू टू विड्रॉ द स्टेटमेंट्स ऑफ सच बेसलेस मैटर्स एंड टू एश्योर दैट इट विल नॉट बी कंटिन्यूड इन फ्यूचर येय उने विनती करनी पड़ी खैर इसको हटाया नहीं गया और ये आज भी जारी है ये लेटर आपकी बुक में भी है ना आपकी बुक में भी लेटर बिल्कुल विश्वेश तीर्थ जी का लेटर ही बुक में तो जो लोग भाई अभी हम मधवा चार्य जी के पास भी जाने वाले हैं मधवा चार्य विष्णु स्वामी संप्रदाय और अभी वल्लभाचार्य जी के जो इस समय के आचार्य गण है उनके पास भी जाएंगे वल्लभ संप्रदाय के और रामानु संप्रदाय का आप देख ही चुके हैं मगर फिलहाल मधवा चार्य जी की तरफ से मधवा चार्य संप्रदाय की तरफ से एक लेटर दिया गया कि आप यह जो मन गंत स्टेटमेंट दे रहे हैं देना बंद करिए उनकी ओर से कोई प्रामाणिक नहीं माना जाता है इस कन को जीय लेटर य है दिख रहा हो लेटर तो जी जी दिख रहा है आप जूम कर दीजिए थोड़ा ये है उडपी श्री कृष्ण मठ उडपी द्वारा ये लेटर लिखा गया है नारायण मिनट

02:18:03:28 ये यह लेटर लिखा गया है श्री विश्वेश तीर्थ स्वामी आप लोग देख सकते हैं यह स्क्रीन पर लेटर है जो लिखा हुआ है उडपी मठ सेन के लिए वी आर वेरी यह देख लीजिए ी म से लेटर दिया गया है री मच प नोट ट य हैव बीन अंडरटेकिंग पब्लिक प्रोप इमेजिनरी फैब्रिक और यह लिखा है विश्वे अब र इसके आगे देखते आगे तमाल कृषण जो है कह रहे हैं ए अ हमारे ऊ परर ल् एकली चैतन्य महाप्रभु दे सेलर महाप्रभु एंड दे वशिप इन अब य एक बात बताना चाहूंगा कि महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के बड़े भाई श्री राम कृष्ण भट्ट जी ने बद्रीनाथ के तीर्थ पुरोहित वासुदेव तैलंग को एक लेख पत्र लिखा था 1511 ईसवी तब चैतन्य महाप्रभु ने नया नया सन्यास लिया ही था जगन्नाथ पुरी नहीं पहुंचे छ वर्ष बाद पहुंचेंगे जगन्नाथ पुरी और उसके कुछ वर्षों बाद चैतन्य महाप्रभु नाम से प्रसिद्ध होंगे अभी नहीं थे इस लेख पत्र में लेकिन महाप्रभु जी के बड़े भाई राम कृष्ण भट्ट जी

02:19:19:09 वे श्री वल्लभाचार्य को महाप्रभु के नाम से संबोधित कर रहे हैं और वे कह रहे हैं श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु नाम नियोग तो बुद्धिमता विभव श्री राम कृष्ण भट्ट तम लेख तानी उके बड़े भाई तन महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु के बड़े भाई वल्लभाचार्य जी के बड़े भाई जो थे राम कृष्ण भट्ट जी उन्होंने लेख पत्र लिखा है जब बद्रीनाथ की तीर्थ यात्रा करी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के साथ में तो उस लेख पत्र ये अपने तीर्थ पुरोहित को लिख पत्र लिखते हैं जो तो वहां पर उन्होंने उनको वृत्ति पत्र जो दिया जो दक्षिणा दी उसके साथ में वृत्ति पत्र लिखा और इस वृत्ति पत्र में महाप्रभु जी को उन्होंने वल्लभाचार्य महाप्रभु नाम नियोग तो बुद्धि मताम विभाव इसको मैं आपको दिखाता हूं यह यहां से प्रारंभ होता है गोभी वतम प्रकृति सुंदर मंद हास भाषा यह वो वृत्ति पत्र है समल सित मंजुल वक्र श्री नंद नंदन मंडित मंडला बा अब आगे इसमें वर्णन दिया गया कुल का ग्राम काकरवा दक्षण पंच द्रा के बड़े भाई वल्लभाचार्य जी के लिए बता रहे

02:20:35:01 बिल्कुल अभी अपने कुल का परिचय दे रहे भव तलंग जाति प्र भारतवज कु गुणा स्तम सूत्र स ग्र राष् ततर सोम यजत फिर उस सोम यज्ञ में साक्षात अग्नि से नारायण प्रकट यज्ञ यज्ञ ञ नारायण साक्षात विष्णु विप्र वंशा तस्मा लोके सो मया उसके बाद स सोज जब होंगे तो आपके यहां पर हमारा प्राकट्य होगा ऐसी आकाशवाणी तो ततो भव भव लक्ष्मण भट्ट नामा महानुभाव विष वष श्री वल्लभाचार्य नरा नि ब्रम निग तत्व अब यहर जी लक्षमण भट्ट जी के प्रकट हुआ वैष्णव सकल समत संप्रदाय यो वल्लभाया तनो मिन बाल्य विहाय निज देश समुद वे श्रीमद ्र स्वयं वास समं हास की ब्रज में महाप्रभु जी ने पदार्पण किया वृंदावना महीराज रम श्री गोकुले विमले च शोभ मानम आम याम तरंग समीर गोलोक तो मस्तम सुरा यानी जो गोलोक से भी अधिक जिसको कहा गया है उस वृंदावन में तत्र स्वयंवर सगत वहां पर स्वयं श्री कृष्ण महाप्रभु जी के सामने प्रकट

02:21:50:02 हुए हृद विद्या विद्युत मान भव ताप हीन और महाप्रभु जी के हृदय को विद्या से आलोकित करके सबका ताप हरा यहां जिस विद्या की बात की जा रही है वह है ब्रह्म संबंध की मंत्र दीक्षा जिसके अंदर भव ताप के सूचन का शब्द भी आता है ताप हीन शब्द जो है उसमें प्रयुक्त होता है तो यहां ब्रह्म संबंध मंत्र भगवान ने प्रकट होकर महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को दिया इसका वर्णन इनके बड़े कर 1511 ईसवी में यानी चैतन्य महाप्रभु के सन्यास के जस्ट एक वर्ष बाद का ये लेख और यहां पर उन्होंने संवत भी लिखा है सोहम श्री बद्री वना तगम शुक्रे शकाब तथा देवा भूपति मिति स नरम नारायण तु तत्र व्यास मुनी संगति भूला कमिक में शभ अ श्री वासुदेवा पहित वित्तो मया तैलंग वंश संभू स्वाध्याय चार च य उन्होने अपने पुरोहित के बारे में की वासुदेव तैलंग जो है वल्लभाचार्य महाप्रभु नाम नियोग तो बुद्धिमता तो यहां पर य जो वल्लभाचार्य महाप्रभु नाम जो पद का उपयोग किया गया है ये इतना सिद्ध कर रहा है कि 1511 ईसवी में श्रीमद वल्लभाचार्य जी महाप्रभु नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे पुष्टि मार्ग में

02:23:05:03 तो महाप्रभु कहा जा रहा था और ये चैतन्य महाप्रभु के पहले की बात है जिसका ऐतिहासिक प्रमाण स्वरूप पत्र आज भी एज इट विद्यमान है बद्रीनाथ जी के तीर्थ पु के वंशजों के पास इसका दर्शन कई गोस्वामी बालकों ने स्वयं किया है आज भी य पत्र विद्यमान है और वे इसकी सेवा करते हैं क्योंकि वल्लभाचार्य जी के हस्ताक्षर है सो यह ऐतिहासिक प्रमाण आज भी विद्यमान है महाप्रभु जी के बड़े भाई का लिखा हु अब इसमें महाप्रभु जो पद उपयोग हुआ है ये बता रहा है कि भारतवर्ष में वैष्णव चार्य को सबसे प्रथम महाप्रभु कहा गया तो वे श्री वल्लभाचार्य जी इनके पश्चात श्री चैतन्य को भी महाप्रभु कहा गया फिर तत्पश्चात श्रीहित हरिवंश जी जब वृंदावन पधारे तो श्रीत हरिवंश ने भी कहा मैं एक बात यह कहूंगा कि मतलब जो इसकन ये क्लेम करता है कि वो जो श्री राधा कृष्ण के युग्म अवतार है चैतन्य महाप्रभु तो मतलब बाकी के जो वैष्णव संप्रदाय है वोय नहीं मानते जिनको वो प्रमाणिक मानता है बिल्कुल गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी यही बात महाप्रभु वल्लभाचार्य के लिए कह रहे हैं और इसीलिए उ महाप्रभु बता रहे जैसे श्री भागवत पियूष सबद मथन

02:24:20:12 त सार भूत रास स्त्री भाव पूरित रास स्त्री के भाव से पूरित विग्रह जिनका है रास स्त्री यानी श्री राधा जी मुख्य रास उनके भाव से पूरित विग्र और आगे गोस्वामी श्री विठ्ठल नाथ जी कहते हैं वस्तुत कृष्ण श्री वल्लभ स् कृष्ण का ही स्वरूप है तो मार्ग में यह बात मान्य है और य गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी कह और इन्ही गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी की स्तुति रघुनाथ दास गोस्वामी कर रहे और यद यह गलत क तो रघुनाथ दास जी उनकी स्तुति कैसे कर सकते थे जब रघुनाथ दासवा बारे में आपकी इस बारे में क्योंकि मैं अभी देख रहा हूं कि आपका जो है प्रभुपाद जी को लेकर के काफी अच्छी एक्सपर्टीज है मैंने अभी देखा आपका उनका क्योंकि पहले से उनका काफी हिस्ट्री भी पता है तो इस बारे में आपका क्या मतलब कहना होगा कि प्रभुपाद जी जो लिख गए सो लिख गए जो उस समय लिखा गया जो भी है अभी क्या आपको ऐसा लगता है इसकन उनके भी अगेंस्ट जा रहा प्रभुपाद जी के अगस्ट यह बात मैं नहीं कह रहा हूं यह बात ना मैं इस बारे में बोलना चाहूंगा यह बात स्वयं स्कन वाले कह रहे आप स्कन बेंगलोर अथवा य जो अभी दो अंग्रेजों का जो वीडियो चलाया गया इसम जो पहले वाले थे

02:25:35:13 बीजी नरस स्वामी यह बात बीज नरस स्वामी कहते ये बात बंगलोर ते हम बे पढ़े तो ठीक है ये इ के निपट ले तो ज्यादा ठीक है ये बात गड़िया मठ वाले कहते हैं यह बात अन्य लोग कहते हैं कि बंगलोर वाले सब प्रमाण बताते हैं कि प्रभुपाद के जो ग्रंथ थे उनको इन्होंने बदल दिया व ए इट नहीं मैंने भी देखा है कि कई जगह गीता में ट्रांसलेशन जो 1972 वाला जो एडिशन है उसम और आज की जो इनकी भगवत गीता उसम चेंज हो रहा है चीज चेंज हो रही है का काफी उसम अंतर आ चुका है सो वो प्रभुपाद का एज इट तो नहीं रह गया है और इवन जब विडंबना य है इवन जब प्रभुपाद ने लिखा था तो भी वो विषण का क्योंकि वो तो वर्ण व्यवस्था की बात कर रहे हैं वो जन्म से जिस चीज की बात कर रहे प्रभुपाद ने उसको हटा दिया बात ये बात सही हो सकती है कि हा चलो विदेशों में मले हो मले में बात करेंगे तो गड़बड़ हो जाएगी तो इसलिए इसकी बात ना करें लेकिन चीज यहां पर बताना जैसे इसकन वालो से आप पूछेंगे कि क्राइस्ट को क्यों आप कृष्ण के तुल्य कह रहे तो बहुदा

02:26:50:27 यही उत्तर आता है कि भाई वो क्रिश्चन कंट्री में प्रचार प्रसार कर रहे हैं तो क्रिश्चन कंट्री में प्रचार प्रसार करने के लिए कुछ तो पॉजिटिव बोलना पड़ेगा ताकि वो सुने तो सही आ कर उनको कृष्ण की तरफ लाने के लिए बोला है वैसे नहीं बोला है इसको ये इसको लिटरल सेंस में नहीं लेना चाहिए कि प्रभुपाद ने क्राइस्ट को कृष्ण के तुल्य बोल दिया ये तो उन्होंने वहा भक्ति का प्रचार प्रसार करने के लिए बोल दिया अब यदि ऐसी बात है तो कौन सी बात प्रभुपाद ने वही के लिए बोली है इसका निश्चय कौन करेगा और कैसे होगी मैं भी यही कहता हूं अगर हम खुद कह रहे हैं मैं भी यही कहता हूं कि यदि हम खुद कह रहे हैं कि उन्होंने किसी कारणवश झूठ बोला तो तुमको झूठ नहीं बोला जा रहा है किसी कारण बस ये कैसे पता चलेगा बिल्कुल नहीं क्रेडिबिलिटी सवाल हो जाता है जो बाकी बातें वो सत्य कैसे हैं ये कैसे पता लगेगा और भी और भी फिर बहुत सारी चीजें हैं फिर आप जब लोगों को खुश करने के लिए कर रहे हो तो लोगों को खुश करो ना यहां पर वो किताबें क्यों ला रहे हो आप हां फिर मतलब फिर यहां के लिए वो चीज अलग होनी चाहिए

02:27:53:13 दूसरी बात व वाली किताब छाप रहे हो उसम उसमें लिख दो आप क्रिश्चन प्रभावित किताब क्रिश्चन प्रभावित सामग्री यह मत लिखो सनातन आप प्रचार कर रहे हो क्रिश्चन प्रभावित सामग्री का और आप कह रहे हो कि हमने दुनिया भर में जो है सनातन का प्रचार कर दिया य तो अच्छा एक बात बताइए मैं मेरा क्वेश्चन य पर य होता है इस बात के लिए अगर आप मुस्लिम कंट्रीज में है और मुस्लिम वाले आपसे जब यह प्रश्न करेंगे कि आपने इसमें जो है उनके चीजों को प्रेज क्यों किया है हिंदुओं की चीजों को प्रेज क्यों किया है अगर अल्लाह हमारे अल्लाह को ही आप पूछ रहे हैं तो आपने हिंदुओं की चीजों को प्रेस क्यों किया तो ये वहां उनका मुंह बंद कराने के लिए क्या बात कहेंगे अरे वो तो हिंदू कंट्रीज में हम लोगों को प्रचार करना था इसलिए बातें लिखी गई है वरना वास्तविक तो हम तुम्हारे अल्लाह को ही मानते हैं जबकि बात ऐसी है कि उन लोगों में बहुत ज्यादा निष्ठा है अपने अल्लाह के प्रति कभी ऐसा नहीं कहे यहां ये सन्यासी के लक्षण नहीं है ये अगर आप सन्यासी एक तरफ कह रहे हो तो आपका कोई भी सिद्धांत ये नहीं कहता है कि आप जो

02:29:08:14 है धर्म का अपार्ट करके धर्म का प्रचार करो क्योंकि जब आपने धर्म का जब आपने धर्म का अर्थ ही कर दिया तो फिर धर्म धर्म आपने मन प्रचार कर दिया हा खर लेकिन इस बारे में भी इतना तो ठीक है कि भगवन नाम का प्रचार प्रसार तो हुआ ले वो तो भगवत नाम के साथ में जो गायत्री और जनेऊ और सन्यास और ंड इनका जो चला गया है यह मतलब एक तरफ य पुण्य गए हैं तो एक तरफ पापा आचरण पाप का भी मार्ग खुल गया है और

02:29:47:00 जिसका पूरी एक स्ट्रेटजी है कि अंत तो गत्वा हमारा ही ऐसा देश है जो धर्म से नहीं चल रहा ज्यादातर देश धर्म से ही चलते मतलब उनके यहां की जो मान्यता होती है उनसे वह देश चलते हैं ज्यादातर तो अभी क्या है कि हमारा ही एक ऐसा देश है जो जिसमें धर्म को साइड कर दिया अपना एक नया वो किया तो अब उसमें क्या है कि इनको मालूम है कि धार्मिक सत्ता अगर हमने हतया ली तो पूरा हमारे पास आ जाएगा फिर से तो धार्मिक सत्ता हटने का एक तरीका भा ये लोग इन लोगों के य तो वर्ण व्यवस्था है दूसरा वो काम करता ही नहीं है सब स्वा स्वा कर्मणा वाले लोग हैं अपने अपने स् का कार्य तो इसको तोड़े कैसे कि नहीं वर्ण व्यवस्था जन्म से नहीं कर्म से और जब उस पर बात करने जाते हैं तो बहुत सी चीजें चलिए आपने बहुत सारा समय हमें दिया है और आपने बहुत ही सुंदर सा वो ग्रंथ लिखा है उसको हम इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन में भी डाल देंगे और मेरे ख्याल से आपने हमें लगभग ढाई घंटे दे दिए अभी वो ग्रंथ वैसे पूरी तरह से रेडी नहीं है तो मैं चाहूंगा मैं रेडी करके उसको आपको भेज दूं तो तब आप उसको अवश्य ले एंड अभी आगे मैं और बताना चाहूं क्योंकि इसके आगे जो

02:31:02:12 बाद में बाद में जो आप और अन्य चीज जोड़ेंगे उसम वो जोड़ते रहिएगा अभी हम पीडीएफ के रूप में ठीक है संभव है लेकिन इसका कुछ मतलब ऐसा भी कुछ बात जहा तक है इसको एक बार प्रूफ रीडिंग ग आश्वस्त लेंगे उसके बाद ही आप आश्वस्त लेंगे उसके बाद दीजिएगा तो हम उसको है हा जी जी क्योंकि चीज जो है प्रामाणिक जानी चाहिए अगर उसमें कुछ आप अच्छे से चेक कर लीजिएगा कुछ अगर ऊपर नीचे हो तो उसको आप आश्वास स कर ली मैं आपको इमेजेस ये कुछ कुछ भेज देता हूं जिनको डालना मुझे आवश्यक लग रहा है कि जिसमें और उनके वक्तव्य और उनके शिष्यों के वक्तव्य हैं जो हम य ले नहीं पाए तो मैं आप बिल्कुल मैं आपको ये इमेजेस भेज देता हूं एक साथ करके आप इनको अवश्य डालने ये तो जो जरूरी जो जरूरी इमेजेस है या वो जो लेटर था उपी मट से निकला इस तरह की जो सामग्री है वह आप एक पीडीएफ के रूप में हमें दे दीजिएगा तो हम उस पीडीएफ को लिंक दे देंगे यहां पर तो जो भी लेना चाहेगा वहां से डाउनलोड कर लेगा बिल्कुल ठीक ठीक ठीक क्योंकि इसमें आगे

02:32:17:27 पाद के शिष्य ने और प्रभुपाद ने कई जग पर जो बात प्रचारित कर जैसे राधा जी का इनके कोई रोल नहीं है य लोग राधा जी को नहीं मानते और वल्लभाचार्य जीने कहीं राधा जी का नाम नहीं लिखा है इस बात का स्पष्टीकरण है शीम वल्लभाचार्य राधा जी का नाम लिखा है स्तुति भी की है वे माधुर्य भाव में भी स्तुति कर रहे हैं संपूर्ण बाल वदेश्वर पूर्ण काम विवत तमाश विम देही दस्यम ऐसा भी आदास की स्तुति महाप्रभु कर तो महाप्रभु जी ऐसा कहते स सदा सर्वदा सर्व भावे भजनी और जा सर्व भावों को भजना चाहिए और यही आप के ग्रंथों में प्रकट होता है तो य महाप्रभु जी ने राधा जी का भी नाम उल्लेख किया है स्पष्ट रूप से अपने समस्त ग्रंथों में किया है तत्वा दवाद विं तो नहीं पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम है सुबोधिनी जी है इन सब में हमें प्रकट रूप से राधा जी का नाम मिलता है तो इससे हमें कई सारी चीज क्लियर होती है कि बहुत से मिसकनसेप्शन मिस इंफॉर्मेशन फैलाई गई है और अ महाप्रभु जी प्र प्रसिद्धि के द्वेष वष किया गया है या फिर

02:33:33:01 अपने संप्रदाय के प्रति श्रद्धा तिरेक वष किया गया है य तो प्रभु जाने लेकिन असत्य तो असत्य होता है और गलत तो गलत जी कई बार प्रभुपाद ने य भी कहा है कि इनिशियली वल्लभाचार्य वास वेरी मच डिवोेडली प्रॉपर रिस्पेक्ट फम लेटर ज विष्णु स्वामी संप्रदा अब यह बात पूरी तरह से असत्य है क्योंकि महाप्रभु जी के प्रारंभ से लेकर के अंत तक लेख पत्र विन आठ से अधिक लेख पत्र श्री महाप्रभु जी विद्यमान है जिनम आपी स्वयं को विष्णु स्वामी मतानु ही लिख रहे प्रारंभ से 1490 का भी है 1492 का भी है 1511 का भी है उजागर चौबे के मथुरा में है वो है वो जैन के तीर्थ पुरोहित को दिया गया है बद्रीनाथ के तीर्थ पुरोहित जगन्नाथ पु तीर्थ पुत द्वारका के तीर्थ पुत इन सबको दि ग वित् पत्र है तत्वार्थ दप निबंध में स्वयं को विष्णु स्वामी मतान कह रहे हैं तो ये चीज कहना कि बाद में विष्णु स्वामी मतान हो गए ये मिथ्या है और झूठी कपोल कल्पित बात नहीं सो ऐसी बातों का त्याग करना चाहिए और अ इना क यदि आपको किसी भी किसी भी व्यक्ति को ऑथेंटिक चीजों का अध्ययन करना है तो आप संस्कृत ग्रंथों को पकड़े आप षड गो स्वामियों के संस्कृत ग्रंथों को पकड़े आप विश्वनाथ

02:34:48:03 चक्रवर्ती जी की सारा दर्शनी आप विश्वनाथ चक्रवर्ती जी के गोपाल देवाक को पकड़े आपको पता लगेगा कि शना जी का प्राकट्य कैसे हुआ विश्वनाथ चक्र जी ने लिखा है प्रकट नि शता वल्लभाचार्य आप जीव गोस्वामी जी के संस्कृत ग्रंथों को पढ़े आपको पता लगेगा जीव गोस्वामी जी ने महाप्रभु अचार्य जी को प्रमाणिक मान कर कई स्थानों पर कोट किया है इन्होने कोट किया है विष्णुनाथ चक्रवर्ती जी ने कोट किया और व्याख्या भी करी है विना चक्रवर्ती जीने सारा दर्शन महाप्रभु अचार्य की सुबोध की व्याख्या कर रहे तो इतना जब उन आचार्यों में प्रेम रहा था तो आपको ऐसे ग्रंथों को पकड़ना ना कि मन गंत कहानियों को आपको पकड़ कर प्रचारित करना चाहिए और यही बात यदाय के बारे किसी को जानना है तो महाप्रभु जी के गोस्वामी श्री विट्ठलनाथ जी प्रभु चरण के जो गोकुलनाथ जी रचित 84 वैष्णव वार्ता दो वैष्ण वाता के प्रमाणिक ग्रंथों को आपको पकड़ना चाहिए हर कुछ जो यहां वहा से छप गए हैं बिना किसी मैनु स्क्रिप्ट के अध्ययन किए हुए ऐसे ग्रंथों से दूरी बनाए रखनी चाहिए तोही उचित है संस्कृत ग्रंथों को पकड़े तो कुछ बिगाड़ नहीं होगा ठीक रहेंगी बा ठीक है तो मैं आपको यह भेज देता हूं इनको आप जी जी आप हमें भेज दीजिएगा य चीज तो हम इसका जो है उपलब्ध करा देंगे दर्शकों को और आपने इतना सारा समय निकाला आपने हमारे लिए दर्शकों को काफी सारे तथ्य

02:36:03:12 जो है उन पर प्रकाश डाला इसके लिए मैं आपका अभिनंदन करता हूं आपको आगे भविष्य में भी इस तरह की वार्ता आपके साथ होती रहे तो उसके लिए मैं मतलब प्रयासरत रहूंगा और दर्शकों को अगर कुछ प्रश्न वगैरह हो तो आप हमें लिखिए तो अगली किसी दिन वार्ता इनकी लेकर के दोबारा से इनको आपके सामने आएंगे और समय देने के लिए सभी का आभार देखने के लिए सभी का यथोचित अभिवादन और आज की क्योंकि जो पूरा समर्पित है वल्लभ महाप्रभु के लिए तो उनके चरण वंदना करते हुए मैं इस लाइव स्ट्रीम को आगे बढ़ाता हूं समाप्त करता हूं सभी को जय श्री राम जय श्री राधे और जय श्री नाथ जी भगवान जय श्री वल्लभाचार्य जय श्रीव

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 2:36:54 · 07 Mar 2025

Iskcon In The Light Of Vallabh Sampradaya | श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय | कश्मीर शैव वल्लभ सम्प्रदाय

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