⬜ Not used yet · 00:00:03:09 – 00:30:55:25 (30:53)
00:00:03:09 तो सभी को जय श्री राम जैसा कि आप सबको पता है कि आज हम जो यह बुलंद शहर के पास में एक शास्त्रार्थ हुआ है तो वहां पर जो करपात्री जी के जो सानिध्य में जो अध्ययन किया जिन्होंने और उनके सिद्धांतों को लेकर के शंकर परंपरा के सिद्धांतों को लेकर के जो आज आगे बढ़ रहे हैं उनका गुरुकुल है अपने निवास स्थान में भी वह करीब 30 से 40 शिष्यों को लेकर उनके साथ में ही रहते हैं वहां पर तो ऐसे एक आचार है डॉक्टर ज्ञानेंद्र शर्मा जी जो सोरो नाम की जगह है संभवतः जहां पर होने वाले जो शास्त्रार्थ है उसमें वो विजय हुए
00:00:58:27 और ई होने के साथ-साथ वहां पर कई आसपास के गुरुकुल से भी आए हुए लोग थे आर्य समाज भी वहां पर था तो एक बहुत ही रोचक वहां पर चीजें देखने को मिली तो आज हम उनसे उनका अनुभव और प्राप्त करेंगे उनका सानिध्य प्राप्त करेंगे और इसके साथ ही साथ बहुत सारे अन्य विषय भी है जिन पर वो हमें अपने वक्तव्य द्वारा अपना जो आशीर्वाद है वो कृपा है वो प्रदान करेंगे तो हम ले लेते हैं उन्हें
00:01:34:18 चरण स्पर्श आचार्य श्री आपका भया जय हो भैया जय हो जय हो तो आचार्य श्री हमारे बीच आ चुके हैं आचार्य श्री वैसे मैंने प्रयास किया आपका परिचय देने का जो दर्शक है उनको पर मैं स्वयं को उतना योग्य नहीं समझता हूं तो आप थोड़ा सा अगर कुछ अपने बारे में बता दे हमारे दर्शकों को जिससे कि हम फिर इस प्रवाह को आगे बढ़ाए हमारा जो है वंश सना वंश है उसमें लगभग सात पीढ़ियों से तो महाकाव्य बनते चले ही आ रहे हैं जी और सबसे प्रसिद्ध अपने बाबा हुए पर बाबा बाबा के भाई शास्त्रार्थ मारती करन अखला जी जो जो कभी शास्त्रार्थ में हारे ही नहीं और बहुत रोचक तथ्य है हमारे परम परिवारी परंपरा रही तीन हो चार हो सीधे काशी में जाकर अध्यन रत रहते
00:02:49:26 थे तो हमारे चार बाबा थे वो काशी में पढ़े गांव आए और पहले गांव में ये परंपरा थी जब कोई सनातन गांव प्रवेश करता था वहा के राजा जमी लोग बड़ा उनका आदर करते थे और भोजन इत्यादि व्यवस्था करते थे तो संयोग ऐसा हुआ कि भोजन के लिए जमीदार ने बुलाए तो संगीता का पाठ करते स्वाध्याय बलव करते विलंब हो गया और प जमीदारी का तो आप शासन समझते ही है जी तो वो नाराज हो गए और भोजन कराने के बाद बोले आचार्य जी हमारी जमीदारी में रहना है तो हमारी बात तो माननी ही पड़ेगी तो पर बाबा थे वो चार भाई थे इसमें दोनों तक्षण निर्णय कर लिया हम किसी की जमीदारी में रहना ही नहीं है परवा टीकाराम जी थे वो गंगा किनारे हमेशा रहे और हमारे य कवास है यह बड़ा सिद्ध क्षेत्र है तो गंगा किनारे ने विद्यालय बनाया और अयाचित वृत्ति से विद्यालय चला और सा स उसम विद्यार्थी रहे सबकी अलग अलग प कुटीर थी और पहले गांव की परंपरा थी ना जो है चाकी वगर हास
00:04:05:00 से चलाते थे ना उसमें पहला एक मुट्ठी आटा घड़े में डालते थे व घड़ा भर जाता था विद्या रखते थे खाली घर आ जाता था तो उसी समय दयानंद जी भी वहां थे और वो काल उनका अच्छा था जो सही है व कहना चाहिए और हमारे पर बाबा का और उनका दयान जी का कु सक भावी था व साधना कर रहे थे तो उसी समय जो है उसी काल में हमारे बाबा अखला जी का जो उत्पत्ति हुई वह भी एक अवंत का तीर्थ है देवी व झाड़ियों में हुई तो हमारे परवा बोले की जो है बच्चा बंधन कर झाड़ी में छोड़ गए उनके लिए तीन दिन बाद माता जी ने बहुत आग्रह किया तो झाड़ी में जो है शास्त्र जी जो है अंगूठा पीते हुए मिले और उनके बस पिता का आशीर्वाद रहा कवास में साधना कराई अवंत काद साधना कराई तो बाल्यावस्था से ही व संस्कृत बोलते थे अच्छा हा बाल्यावस्था से उनका यग पीत गोत्री में हुआ और इसके बाद काशी में शिवकुमार शास्त्री जी थे
00:05:20:02 पूरे भारतवर्ष में जो है महान विद्वान थे जब महाभाष्य का पाठ पढ़ाते थे शिवकुमार शास्त्री जी तो नाग लोक से जो है मनुष्य का रूप धारण महावास का अध्ययन करने आते थे ऐसे विद्वान शिवकुमार शास्त्री जी तो तीन वर्ष की अवस्था से वार्ता हमारे बाबा की तो त्रहा वार्षि का पंडिता की उपाधि शिवकुमार शास्त्री जी ने तो वो बड़े अद्भुत थे शास्त्र कभी नहीं हारे उस समय का उस समय आर समाज में दयान जी नहीं थे तो उन पर कुछ प्रभाव रहा तो कुछ वर्ष जो है वो आर्य समाज में रहे किंतु उने देखा कि यह लोग जो है मन मा ढंग से वेद की व्याख्या कर रहे हैं तो उनसे नहीं रहा नहीं रहा गया तो मैं आपको स्मर दिला हं उनकी माता जी ने जो पत्र लिखा शास्त्रार्थ महारथी कवित खिलान जी के लिए अरे भाई अब ये बताओ कि मरल से संगते नीच ही का कुल प कोहो श्रुति दूसर राध सला नियस तथा तदा भवे हे कोयल कौए के घोंसले में तब तक बच्चे रखती है जब तक उड़ने लाक ना हो
00:06:35:24 जाए और जैसे ही उने लाग हो जाते हैं तो कोयल जो है कौए के घोसे से बच्चा निकाल लेती है पालन पोषण भण पोषण कौवा करता है जब उसका फल हुआ तो कोयल वहां से उसके बच्चों को निकाल ले जाती है तो वही क ठीक है आपने उनके रहस्य को जान लिया अब आपका वहां रहना सही नहीं है कि सुरति दूस शति दूष लोग है आर्य समाज है यह लोग जो श्रुति मतलब वेद का जो रहस्य होना चाहिए वेद का जो अर्थ होना चाहिए उसके अनुसार ना करके मन मान ढंग से अर्थ करते हैं तो उस पत्र को देख कर के हमारे बाबा सनातन धर्म में आए थे फिर उने बहुत सनातन धर्म महाकाव्य और आ समाज का आपका द सत्या सत्यार्थ प्रकाश तो वैदिक सत्यार्थ प्रकाश लिखा मेरा वैदिक सत्यार्थ प्रकाश तो आ समाज अ हो ही गया तो बस उनका जो संकल्प है उनकी जो परंपरा थोड़ा हम लोग उसका प्रभाव है और अधिकांश जहां भी धन कपा महाराज थे उनको साथ में रखते थे और साक्षात सरस्वती कृपा थी हमारे
00:07:50:25 पर बाबा ने शिवा बीज का जो है अनुष्ठान कराया वंतिका में उने पुस्तक में लिखा है किंतु बाबा इतनी कंजूसी कर विधि नहीं लिखी उन्होंने इतना ही संकेत करके छोड़ दिया है सेवा बीज का हमने अनुष्ठान किया है और उसी का प्रतिफल है कि हमारा हम कहीं शास्त्रार्थ में नहीं हारे बहुत उने 121 पुस्तक लिखी है बड़ी अद्भुत पुस्तक हैं और बहुत उनका भ रहा और कपाती जी महाराज जी की जहा बात है वह तो भगवान आवेश के अवतार रहे और जो आपसे पूरे भारत व्याकरण की परंपरा है ना महाशय जी की वो महाशय जी ने जो है उनसे सन्यास लिया तो उनके शिष्य बोले हम तो कपा महाराज शास्त्र करते थे आपने उनसे सन्यास क्यों लिया नरवर के प्रधानाचार्य थे प्र विजय प्रकाश जी तो यहां धर्म महाराज र पढ़ते थे तो उनका उसे शास्त्रार्थ होता था और इसके बाद में उनके गुरु जी से बनारस में जाकर उनके गुरुजी सन्यास ले लिया इसके उसके बाद फिर वो जो हल्के हो गए तो उन्होंने कहा गुरु जीी हम तो बोले नहीं आप नहीं जानते हो य चक्र चूड़ामण
00:09:06:10 धर्म स्वा कर पात्र जी महाराज कोई साधारण पुरुष नहीं है भग आवेश के अवतार है जब मंच पर बोलते हैं तो इतने विशेषण लगते चले जाएंगे साधारण मनुष्य की कल्पना से परे होते हैं तो हमारा य था उनका जो सिद्धांत है उनका जो आचार विचार आचरण है वह जो है समाज में जाना चाहिए और वैसे बच्चों को पढ़ाते भी हैं कि जो उसमें लिखा है कि जो है आ चोति शास्त्रनी शास्त्रार्थ स्थापना दप सती जो है संत है सन्यासी है महात्मा है गुरु है आचार्य है व क्या काम करते हैं कि आच शास्त्र जितने भी शास्त्र है उनका जो जो रहस्य विधि है निषेध है उसका जो तत्व है उसको जान करके क्या कर आचार स्थापना दती अन्य जो संसार के जो लोग में उसकी स्थापना करते हैं ये नहीं है हम तो त्रिकाल संध्या करें त्रिकाल भजन करें और कुई चीज समाज में न जाए तो उसका उतना प्रभाव नहीं होता तो उन्होने कहा आचार्य स्थापना दप जो हमारे आचार्य है संत है महात्मा है
00:10:21:12 जो सनातन धर्म के पुरोधा है उनके जो आचार विचार जो आचरण है वो समाज में जाना चाहिए उनको प्रयास करना चाहिए जभी जो है लिखा स्वयं आच स्मात स्वयं में आचरण भी करें तस्मा आचार्य प्रते ज भी जाकर के आचार्य है और संत महात्मा पराव जो सं संज्ञा होती है व इसके द्वारा ही होती है बाकी व्यक्तिगत अपना सब कल्याण करते ही है प्रहलाद ने कहा जो है भगवान आपसे मैं यही जो है वरदान मांगता हूं कि आपकी जो माया है ना य मनुष्य को बहुत परेशान करती है और आप इस मनुष्य से अपनी माया को दूर कर लीजिए तो भगवान बोले कि अपना कल्याण करो ये संसार का आपने ठेका लेखा रखा है और तत्व ज्ञान की ज बात है व मुनियो जो मुनि है ऋषि है संत महात्मा है व संसार को उपदेश देंगे उनके तत्व ज्ञान हो मुक्त हो जाएंगे आपको तो मुक्त में करही देता हूं बो आपको महाराज बड़ा भ्रम है उन्होंने कहा कि जो है प्राय मु स मुक्त काम प्राय देव मुनि प्राया करके देवता है मनुष्य है ऋषि है म मनमा
00:11:36:15 चरती वो मन धारण करके गुफा में प्रवेश कर जाते हैं और भरता संसार में चले गए तो संसार हमसे न चिपक जाए इस भै से कंदरा में पहाड़ों में जाकर के अपने कल्याण के लिए भजन करते हैं उन्हें संसार के कल्याण की इच्छा नहीं रहती ये लगता है कहीं हम जो भटक ना जाए उनका कल्याण ऋषि महर्षि की अपेक्षा आप कृपा करेंगे ज भी होगा अन्यथा नहीं होगा हमारा यह है कि अपना कल्याण यद भी कंदराम गुफा व्यक्तिगत के द्वारा हो सकता है किंतु नहीं प्रहलाद जी यह कह रहे अपने कल्याण के साथ साथ दूसरे का भी कल्याण होना चाहिए वह कौन है वो सनातन धर्म है उस सनातन जो धर्म है उसका में एक बहुत बढ़िया श्लोक है उसका देख रहस्य क्या है लोकप का करय सनातन स्मिन धर्मे प्रतिष्ठित पदे भ भाव का नाम भेदन कर्म नियतम नमन यस्य सं सेव नाथ परम सर्म जन समिति य सनातन धर्म का रहस्य है लोको उपकार करनाय सनातनम
00:12:52:01 लोक के उपकार की जो भावना है व सनातन धर्म ही है अन्य मत मजहब है उनमें लोक के उपकार कि नहीं ईसाई है व अपने उसी की कल्पना करते हमारा ही भला हो कोई मत मज संप्रदाय अपने से संबंध रखते हैं केवल जो हमारा सनातन धर्म है ई संसार के कल्याण की भावना रखता है संसार में ऐसा कोई मत मज संप्रदाय नहीं है जो हमारे पूरे विश्व के कल्याण की भावना रखे विश्व के कल्याण की भावना तो केवल सनातन धर्म में है और सनातन धर्म के अर्थ किसी में नहीं है धर्म में प्रतिष्ठित भाव का नाम और धर्म की जो प्रतिष्ठा है वो सनातन धर्म मेंही है क्यों है कि भेदन कर्म नितम नेन यस्य सं सेव नाथ परम सर्म जना समिति भेदन कर्म नियतम जो हमारे ध कपा जी महाराज की घोषणा के स्व धर्मा चरण पर धर्मा च नि वतम अपने जो अपना जो धर्म है उसके द्वारा ही कल्याण होगा जो परम धर्म है उसके द्वारा कल्याण नहीं हो सकता है देवा लब्ध संतोषम देवताओं के द्वारा जो प्राप्त हो जा संतोष करना चाहिए व आत्म वि चरण अर्चन जो आत्म वेता है जो ऋषि
00:14:07:07 है महर्षि है तत्व ज्ञानी है उनकी चरण सेवा करके आप जो चाहो सो प्राप्त कर सकते हो किंतु उसमें स्वधर्मा चरण की आवश्यकता है उनको महाराज घोषणा थी और नरवर तो सबका वो रहा ही है उड़िया बाबा आपके हरि बाबा इत्यादि य रहते थे तो हा हा सब तपस्थली नर जो है सब तप ये तो सब महापुरुष है इनके तो गुरुदेव के जो जगत शंकराचार्य जी है उनके मुख से इनके बारे में सुना करते हैं जब कभी इनम से किसी ना किसी एक का जो नाम है वह आता रहता है उनके मु पर हा तो उसमें जो है अपने अलग अलग सिद्धांत थे हरि बाबा थे उ हरि बाबा बांध बनवाया 44 किलोमीटर का उधर के गांव जो बाढ में गंगा से बह जाती थ सरकार से कहा सरकार ने मना कर दिया हमसी आर्थिक व्यवस्था नहीं है किंतु बाबा जी ने हरि बाबा जी ने हमारे महाराज जी ने बना उठाया तो 44 किलोमीटर उस समय बांध बनवाया जिससे हजारों लाखों की संख्या में लोगों का कल्याण हुआ ऐसी विभूतियां थी अच्छा और बा मतलब अपने से अपने बल पर बांध निर्माण करवा लिया हा बिल्कुल अपने बल पर कराया और अन्नपूर्णा व्यवस्था बाबा जी ने संभाली
00:15:22:07 और कीर्तन करते करते हर की हर संकीर्तन करते करते बनाया तो उसमें हर महाराज जी का उसम थोड़ा निवेश था बोले के दुजे तर है अथवा स्त्रिया है माता है उनका तो केवल संकीर्तन से कल्याण हो जाएगा किंतु ब्राह्मण है क्षत्रिय है वैश्य है उनका संध्या वंदना आद की सह संकीर्तन से काम होगा अहा नि जम कर्म कृषण कृष्ण वाना आपने जो अपने कर्म को छोड़े केवल कृष्ण कृष्ण राधे राधे कहते रहे तो कल्याण नहीं होना है इन लोगों के लिए जो है साथ में जो अपना स्वधर्मा चरण जो वेद का विधान है जो वेद का सिद्धांत उसका परिपालन करते हुए भगवान नाम का कीर्तन करेंगे तो कल्याण होगा करते में य नाम त कयास उसके द्वारा बाद में जो है विष्णवे नम विष्णवे नम विष्ण न बोलते ही है तो उनका य घोषणा थी तो उसमें एक बार जो है आपका ओम जगदीश हरे है ना प्र का उच्चारण सभी माताए बोलती है तो कोठी पर सतना कथा थी जैसे भक्त लोगों ने हुआ शुरू हुआ प्रा उठ ग वो चले गए और या
00:16:37:12 बाबा जी से भी एक बार कीर्तन करा रहे थे बोले कि नहीं इसम जो है ओमकार का ना कर तो महाराज सब लोग मानते थे उनकी बात मालवी जी से उन्होने कहा मालवी जी का उनका व शास्त्र मतलब विचार विम हुआ आपके हरिद्वार में तो बोले किसकी जीत किसकी पराजय बोले के नहीं जीत पराजय का मामला नहीं महाराज का जो अनुभव है जो तपस्या है इसके सामने मनुष्य कौन टिक सकता है तो ऐसा करके समाज में नहीं कह सकते मालवी विश्वविद्यालय बनवाना था ना हम तो बात टाल गए तो धर्म स्वामी करपात्री महाराज का जो वक्तव्य होता था समझौता वाला नहीं जो है वह है एक बार की घटना है मैंने वीडियो में भी डाली है वो यब केदार घाट पर रहते थे तो साथ में जो है संत महात्मा दंडी महात्मा भी रहते थे तो वो गंगा स्नान ध्यान में जा रहे थे तो उने अपने शिष्य को देखा तो उन्होने कहा ये आप गलत कर रहे हैं ये तो शास्त्र के अनुकूल नहीं है तो शिष्य ने यही कहा कि गुरु जी मैं तो आपको शास्त्र मानता हूं आप आपको ही भगवान मानता हूं आप जैसा आचरण करते वैसा करता हूं मैं तो बड़ा क्रोध में बोले डाट कर के अरे ये धर्म स स्वामी करपात
00:17:52:21 जो शास्त्र नहीं है ये हाड़ मास का जो है पुंज है इससे गलती हो सकती है आचरण की बात करो तो शास के आचरण की बात करना आप पहले शस मिलान करि मुझ पर घटती है तो करना केव मुझ मत मानि ऐसा कोई कह सकता है किसी में सामर्थ्य नहीं है ऐसा शम कोपन पर जब कोई शिष्य गुरु से प्रश्न करे और गुरु जी उत्तर देने में सामर्थ्य वान ना तो क्रोध कर शांत कर देते हैं शेषम कोपन पूरे उसे बोलती बंद हो जाती है किंतु नहीं यह अदभुत धन कपाती महाराज में थी और उनका यही था का भेदन कर्मत ने जिसका जो कर्म है उसमें प्रवत होकर के वह कल्याण कर सकता है हमारी माता है उनका केवल धर्म जो है पति की सेवा से कल्याण हो जाएगा उ अन्य जब तब की आवश्यकता नहीं है जिनका सेवा धर्म है वह जो है अपने सेवा से अपना कल्याण कर सकते हैं और ब्राह्मण का जो धर्म है व ब्राह्मण भीत जो कर्म है उसके द्वारा क्षत्रिय का कर्म सुद्धे किससे संग्राम क्षत्रिय स्मत ब्रह्मचर्य तपो मंत्र ब्राहमम ित सर्वदा क्षत्र जो होंगे ध के द्वारा
00:19:08:00 कल्याण करेंगे वैसे व्यापार के द्वारा करेंगे और ब्राह्मण जो है वह तो ब्रह्मचर्य तप है सम दम दया दान सबसे विशिष्ट होने के बाद ही कल्याण कर सकता है सबसे बड़ा जो भरोसा है भगवान का ब्राह्मणों परही है क्यों उनके अंदर वो गुण है अब जैसे आपका फोन आ आया था उससे पहले जो है वहा से एक व्यक्ति ने बात की हमसे आसाम की शायद उन्होने कहा कि जो स्कोन वार है हरे कृष्णा वह जो है कर्म के द्वारा जाति का निर्धारण करते हैं वो कर्म ठीक है तो ब्राह्मण के लिए भी जो दीक्षा दे देते हैं ये क्या सही है मैंने नहीं ये सही नहीं है क्योंकि जो जाति है नित्य सति अनेक समत जाति जाति नित्य है और अनेक में स संबंध से रहती है जैसे ब्राह्मण में क्या जाती ब्राह्मण व ब्राह्मण में ही रहेगी व क्षत्रिय में रहेगी क्षत्र में क्या क्षत्रिय क्त्र में व वव व में रहेगा हा आप ये कहो कि जो है यदि ब्राह्मण है और कर्म नहीं करता है
00:20:23:01 तो वे जो है पतित की संगा आते हैं उसमें लिखा है त्र गोचरा यह भेद नहीं किया कवि शास्त्र ने त्र शन गोचरा अ शति माने वेद का जो पठन पाठ है स्त्री भी नहीं कर सकती है ना सेवा धर्म जिनका सेवा धर्म है वो भी नहीं कर सकते हैं और जो पतित ब्राह्मण है वह भी जो है वेद का स्वाध्याय नहीं कर सकता है और किसी अनुष्ठान में जो है वो पात श्राद्ध का भोजन भी नहीं कर सकता है तो कर्म भ्रष्ट होने से इससे जो है उसका बहिष्कार हो जाएगा किंतु उसकी व जाति नहीं रहेगी यह नहीं कहा जा सकता जाति तो नित्य वो कहीं जो है आने जाने वाली नहीं है यदि कर्म के आधार पर जाति का निर्णय करोगे तो व्यक्ति दिन में कितने प्रकार के क्रोध भी करता है पुरुष भी करता है व्यापार भी करता है तो दिन में चार जातिया बदलनी
00:21:14:04 चाहिए जी आचार्य मैंने इस बारे में ना यह जो कर्म से जो प्रचार करते हैं वर्ण का मैंने आज तक मतलब कई बार ऐसा हुआ कि एक तो यह जो आर्य समाज द्वारा इसका शुरुआत की जाती है मतलब अपने जो जो वेदों को मानने वाले होते हुए और कर्म के आधार पर जो है वर्ण को बताने का प्रयास करते हैं तो उसका पर्य अवसान किसम है कर्म पर आधारित भाई व्यवस्था यह होती है कि हम जब ब्राह्मण की आवश्यकता हो तो हमें ब्राह्मण प्राप्त हो जाए मगर जब हम जब ब्राह्मण को लेने जाए तो वो ये कह सकता है कर्म आधारित वण व्यवस्था में मैंने 15 मिनट पहले क्षत्रिय हो गया हूं और क्षत्रिय को लेने गए कि चलो भैया हमारी रक्षा कर दो तो वह कहेगा मैं पाच मिनट पहले ब्राह्मण हो गया हूं कर्म से अब अर्जुन को श्री कृष्ण ने कहा कि जा अर्जुन तेरा धर्म है युद्ध करना रक्षा करना तो अर्जुन वहां फ कहने लगेगा कि मैंने अभी अभी कथा वाचना शुरू कर दिया है और मैं जा रहा हूं कथा बाच तोव ब्राह्मण हो गए तो ये उत्तर पू मतलब एक ऐसा उत्तर जिससे कोई सामान्य व्यक्ति संतुष्ट हो सके कोई भी व्यक्ति नहीं देते
00:22:29:04 वो ना ये आर समाज ना ही स्कोन तो आचार्य श्री में जी जी उसमें ऐसा आर्य समाज देखिए ना ये दोले अपनी बात करता है वो देते कहते हैं हमारे जो है इनके जो आका है जिनको जो आदर्श मानते हैं कि जन्मन जायत शुद्र संस्कार दरते वेदा ब्यास विप त्र सत्री मुच और जबकि ये कहीं है नहीं पाठ है कि जन्मना ब्राह्मण गया संस्कारो दते वेदा ब्यास प्रतम त्र सत्र मु जन्मना ब्राह्मणो गया जन्म से ब्राह्मण है और संस्कार से दुज होता है द्या संस्काराम जन्मना जाति दज जिका योग संस्कार विवा संस्कार हो य पर मीमांसा करनी पड़ती है दो संस्कार का मतलब है कि योग संस्कार तक सब संस्कार जिसके हो गए हो ये नहीं है केवल पूरे जीवन संस्कार कर लेगा हो जाएगा वो उससे पहले जो है संस्कार विहित है शास्त्र में व यग प से पहले हो जाए और दो संस्कार हो जाए द बन जाएगा व और वेद का अभ्यास कर विप हो जाए तीनों
00:23:44:08 चीज मिल जाए स हो जाएगा और सत्री तो आज के युग में मुझे लगता है कि बड़ा कठिन है कौन सोत्री कौन सोत्री कहना बड़ा कठिन है पहले सोत्री ब्राह्मण होते थ सोतिया हो गया है तो जब सोत्री लोग सोने लगे तो सोतिया हो गई जो है अप भ्रम होते होते और यह है पाठ व का किंतु उन्होने अपने मन माने से क्या कर दिया जन्म जा शुद्र देखो जन्म से शुद्र होता इनकी बात इही से कट रही है हमारे जो जितने भी इस लाइ में जुड़े हुए थोड़ा ध्यान पूर्वक सुनेंगे तो आप कभी भी भ्रमित नहीं होंगे कि जन्मन जायते आप जन्म से शूद्र मान रहे हैं और संस्कार से आप क्या मान रहे हैं दज मान रहे हैं संस्कार से क्या मानने है दज तो देखि एक श्लोक
00:24:55:25 में तो एक श्लोक में जो है जाति भी जन्म से जाति का निर्णय कर रहे हैं और उसी श्लोक में आप जो है कर्म से दुज मानने हैं आप देखिए तो या तो आप जाति से जो है जाति को मानी जो है जन्म से जो जाति होती है ही जाति मानी जाती है अथवा कर्म से मानि है हमारे जिनका सेवा धर्म है जो शूद्र लोग है जो कह रहे हो उने ने क्या बिगाड़ा उनको जन्म से क्यों मानने आप आप जो है आर्य समाधि से प्रश्न करिए कि जन्मना जायते शुद्र संस्कारो दते कि जन्म से आप शुद्र मानने और कर्म से आप जो है छ ब्राह्मण मान रहे हैं तो ऐसी स्थिति में जो है या तो जन्म से मान कर्म से दोनों से नहीं मानना चाहिए दोनों से नहीं मानना चाहिए जी अध कचरा जो मामला है ना इनका यह गलत है जी जी इसमें इसमें इसमें आचार्य श्री इन्होंने क्या किया है ना पहले तो ये जो जन्म जाति
00:26:10:28 शूद्र वाली बात पूज्य गुरुदेव जो है जगतगुरु शंकराचार्य जी उनके सामने भी आया था तो उन्होंने भी मतलब इस पर यही कहा था कि अगर मान लो यह कहीं है भी शास्त्र में स्कंद पुराण का नाम लिया जाता है तो इस तरह से उन्होंने कहा था अगर है भी तो अन्य शास्त्रों का जो वक्तव्य है जो प्रमाण है उनका खंडन ना हो तो हमें इसका अर्थ लेना पड़ेगा कि शूद्र वत होता है जन्म से कोई भी शूद्र वत होता है मगर शूद्र ही नहीं होता है जैसे कई बार कई जगह पर भ्रूण की हत्या करने वाले को भ्रूण को खाने वाले को राक्षस कहा गया शास्त्र में उ प्र भी नहीं अब उसकी योनि राक्षस तो नहीं मान लेंगे तो हमें मानना पड़ेगा जो भ्रूण को खा रहा है वो राक्षस वत है वो राक्षस वत है तो ये उन्होंने अर्थ किया अच्छा इसमें ये सत्यार्थ प्रकाश में भी एक मंत्र है उसका हालांकि हमारे जो परंपरा प्राप्त आचार्य है वोह अर्थ नहीं लिया है जो इन्होंने किया मगर यह अपनी ही बात से ऐसे कट रहा है कि वहां पर इन्होंने कोट कर दिया कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सभी को वेद पढ़ने का अधिकार है
00:27:26:01 यजुर्वेद 26 दो अब हुआ क्या कि शूद्र तो वही है जो जिसका उपनयन संस्कार नहीं है जो वेद नहीं पढ़ता इनके हिसाब से इनके ही अनुसार शूद्र वही है जो द्विज नहीं है और जो वेद पढ़ता है व द्विज है तो इन्होंने अपनी ही बात को वहां काट दिया जहां कहा कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश शूद्र सभी को वेद पढ़ने का अधिकार है तो इसका अर्थ है कि इन्होंने वहां पर मान लिया ब्राह्मण क्षत्रिय वैश शूद्र यह जन्म से हैं इन्होंने स्वयं ही मान लिया क्योंकि शूद्र तो इनके इनकी जो जो इनकी थ्योरी है उसके अनुसार शूद्र तो वही है जो वेद नहीं पढ़ रहा है जो वेद में अधिकृत नहीं है जिसका उपनयन नहीं हुआ जो द्विज नहीं है और यदि कोई वेद पढ़ रहा है इनके यहां तो वो द्विज है अगर कोई वेद पढ़ रहा है तो वो द्विज है तो फिर जब शूद्र का किसी भी स्थिति में वेद पढ़ना सिद्ध ही नहीं हो रहा है तो इन्होंने अपना 26 दो के मंत्र में कौ ब छत्रीय व शूद्र कहा व किस आधार पर कहा तो वहा इन्होंने जन्म से माना अभी हम इनके इनका एक गुरुकुल है शाहजहांपुर में वहां पर जो आचार्य है आर्य
00:28:41:09 समाज के रक्षपाल देव आर्य उनके साथ भी हमने चर्चा मतलब उनका एक इंटरव्यू लिया तो उन्होंने इस बात को एडमिट किया उन्होंने मान लिया कि हां सबसे पहले किसी का भी जो वर्ण होता है व उसके माता पिता से ही माना जाएगा [संगीत] तो ये इन्होंने मान लिया अब वो अब वेद का हीय कोट कर रहे हैं जिस पर ये जन्म आधारित है अब वेद के कोर्ट के आधार पर ये नहीं कह सकते कर्म से बदलता है खैर तो मैं आचार्य शी थोड़ा सा मुख्य विषय पर ध्यान लाना चाहूंगा वो जो सोरो में जो अभी शास्त्रार्थ स्पर्धा हुई थी जिसमें कि आर्य समाज भी आपके समक्ष था और अन्य भी थे और वहां पर आप जो है विजय हुए तो उसका अनुभव कैसा क्या था कौन सा थोड़ा सा उस पर थोड़ा सा प्रकाश डाले कि किस एक किस क्रम में आप जो है आपको विजय विजय प्राप्त हुई वो कैसा था हा उसमें वो लोग प्रश्न कर रहे थे हम लोग उत्तर देते जा रहे थे उसमें ऐसा था कि सबके लिए 1515 मिनट का अवसर मिला था बोलने का और जो विपक्ष लोग था उसमें से किसी को प्रश्न करना है तो उसको उत्तर देना था और उस उत्तर से संतुष्ट भी
00:29:56:10 होना था वो तो लोगों ने प्रश्न किए हम लोगों ने उत्तर दिए और हमारा विषय सा विषय था वेदो खिलो धर्म मूलम यह विषय था और ऐसा होता है कि जो है उसमें निर्णायक मंडल में सभी तरह के लोग होते ही है तो वेद खलो धर्म हमारे सिद्धांत है उसमें यह है कि सनातन धर्म धर्म का जो मल है जो वेद जो है अखिल भाग ही धर्म का मूल है ये अन्य जो परंपरा है धर्मिल मंत्र भाग को ही वेद मानते हैं सतपति ब्राह्मण को ही वेद नहीं मानते हैं ई जो है शतपथ ब्राह्मण और वेद दोनों आपस में एक ही चीज है किंतु ये लोग नहीं मानते हैं तो हमने वहा यही कहा कि वेदो खिलो धर्म मूलम में जो है सनातन
✅ This part is already used · 00:30:55:25 – 00:31:01:25 (0:06)
→ Used in: B · Video बिना किसी काट छांट के सोरों वाले शास्त्रार्थ का पूरा वीडिओ #vedpuran #hindu @Dr... at 1:25:46 ↗
00:30:55:25 धर्म का जो मूल है व अखिल वेद है आखिर वेद से तात्पर्य है विधि मंत्र
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00:31:01:25 विधि अर्थवा इन तीनों के द्वारा जब आप अर्थ करोगे जब जाकर के वेदार्थ होगा किंतु वो तो केवल फिर हमने उदाहरण भी दिया उसमें जो है सा भाष में लिखा भी है इष्ट परिहार लोक वेदा वेद उसको कहेंगे जो इष्ट की प्राप्ति करे अनिष्ट का परिहार करे उसी का नाम वेद है प्रवृति मार्ग में ही वेद प्रवृत करता है परिवन निवृति मार्ग में है उसका जो परिवन है वह निवृति मार्ग में है और सबसे अधिक उनका जो अवतारवाद का खंडन करना था मूर्ति का खंडन करना था तो उसका हम लोगों ने खंडन किया कि आप उन्होंने अपने प्रवचन में यह कहा था कि निराकार की उपासना करते हैं जो निर्गुण है निराकार है उपासना करते हैं तो आप देखिए जो जिसके जो निर्गुण है और निराकार है जिसके आकार निकल गया है उसकी उपासना कर रहे हैं और उपासना क्या अर्थ है उप समीपे आसनम उप समीपे आसनम जो पास में बैठा उसकी उपासना करोगे निराकार निर्ण का उपासना से
00:32:17:24 आकाश पाताल की तरह विरोध हो गया नहीं हो गया यह भी कह रहे हैं कि नि निराकार भी कह रहे हैं उसम उपासना शब्द भी जोड़ रहे हैं उपासना की व्याख्या करोगे उप समप आसन में की उपासना के पास में है क्या बात अच्छा दूसरी बात ये कह रहे हैं कि य निर्गुण रा का सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान भी है तो हमने कही कि जो बद तो व्याघात क्यों है कोई एक बोले कि भाई मैं मेरे मुख में जुआ नहीं है इसलिए नहीं बोल पा रहा हूं मैं म मुखे जुआ नास्ति मेरे मुख में जुआ नहीं है जुआ नहीं है ये कैसे कह रहे मेरे मुख में जुआ नहीं है इसको कहते हैं बद तो व्याघात अपनी बात अपने से ही कटे अपनी बात जो है अपने से कट जाए उसका नाम है बद तो व्याघात तो हमने कहा रा का सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान है तो सगुण साकार होने में जो है क्या आपत्ति है जो सगुण साकार है उसम होने में क्या आपत्ति है जो सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान तो कुछ भी हो सकता है तो आप ये कहो कि सर्व शक्तिमान है ना के अल्प शक्तिमान विशेषण दीजिए उसके लिए जो है क्यों लिखा गुण ही अन भूतम सपास गुण गुण होते हुए गुण से अनुभूत रहता है वो
00:33:34:12 गुण होते हुए भी गुणों से अन भूत रहता है सभी जगह लिखा हुआ है तो फिर उन्होने वही उसम प्रश्न कर दिया कि यदि हम जो परमात्मा को मूर्तिया मानेंगे तो फिर वह अल्पज्ञ हो जाएगा म भ्रम आपके कि सर्वम खलम ब्रह्म जो पर परात पुरुषोत्तम परम परमात्मा है वो में विद्यमान है अणु अणु में विद्यमान है ऐसा कोई स्थान नहीं अण अयान महतो मया खूब उस पर विस्तार से चर्चा हुई और अंत तोवा फिर यह निर्णय हुआ कि समाज बैठा हुआ है वह किसको मानता है तो समाज ने जो है हमारी बात मानी मने य आज सगुण साकार रूप में नहीं मानो क्षेत्र में बैठे हुई भगवान बा का अवतार हुआ है तो वो भी कहा मानोगे आप नहीं मान सकते और फिर वो तो वो लोग तो जो है ना वो गन ऐसा अर्थ किया हम आपको बता भी नहीं सकते वो तो यह समझिए कि उस समय जो कान है कु सुनने में बड़ा अटपटा लगा और अवा बोलने लगे की उनकी भगवान वेद
00:34:49:16 व्यास की जो माता जी है जो मछली से उत्पन्न हुई है सत्यवती उससे व्यास जी उत्पन्न हुए हैं तो ऋषि गर्भ म जाती तो य इतना विनाश नहीं होता तो हमने उनसे कहा कि भाई देखिए दयान जी के कहने से अथवा किसी के कहने से व्यास जी को अस पड़ने वाला नहीं है व्यक्ति कोई किसी में कुछ भी कह सकता है उसको सिद्धांत नहीं मान सकते हमने पिता महने जो हमा रमा मह संवाद लिखा था उसम 27 श्लोक है तो मैंने इतना 27 श्लोक है उसको हम समाज में कह भी नहीं सकते अय व्यास जी पर आक्षेप कर रहे हैं और हम जो है आपके उन पर आक्षेप करने लगे और 27 शलोक सुनाने लगे तो आप नहीं सुन सकते बकला जाओगे फिर हमने एक शलोक सुना दिया था अत पुरातन जी नाम कुले सव दसी तनतम रमा महर्षि विचार ते काद लोकता तो यह लोक हमने सुनाया उस व्याख्या भी व की हमने तो कहने का तात्पर्य हु कि कोई किसी महापुरुष के संबंध कुछ कह दे मनुष्य तो व मानी नहीं जाएग जैसे वेद लो
00:36:04:20 हमारा प कहते तो कहा त संगत हा ये लोग अनित्य उने अनित्य है वा वा वेद अत्य हो जा फिर संसार में वेद में अनित्य का रहा प्रमाणिकता भी भंग हो जाएगी वेद की अगर उसको बोल हा प्रत्यक्ष अवा तस्मा वेद वेद जो किसी के द्वारा सिद्ध ना वेद के द्वारा सिद्ध होती है वही उस स्वत प्रमाण कहते हैं उदाहरण दिया था जैसे आख का देखने का काम है वो काम जो है कर्र नहीं कर सकती है ना का सूखने काम रसना नहीं कर सकती अप स्वत प्रमाण है ये ऐसे वे स्वत प्रमाण है किसी के द्वारा प्रमाणित नहीं है असम भावना विपरीत भावना यह सब अन्य में हो सकती है वेद में नहीं हो सकती अच्छा आचार्य श्री मैंने अक्सर यह देखा है कि जब इनकी कोई बात कटने लगती है तर्क और प्रमाण से युक्ति और प्रमाण से तो यह क्या करते हैं जो संवेदनशील बातें हैं हो सकती हैं जिससे कि जो आम जन है जिसको अभी ज्यादा गहराई
00:37:19:21 से ज्ञान नहीं है उन बातों का आलंबन लेने का प्रयास करते हैं अपने आप को मजबूत स्थिति में लाने के लिए बात बोलते हैं जैसे कि मान लीजिए कोई यही कहने लगे मतलब इस तरह की बातें जिसको कि परोक्ष रूप से बोलना उचित रहता है वह बातें भी ऐसे बोलने लगते हैं जिसका फायदा उठाने का प्रयास करते हैं मजबूत स्थिति में आने के लिए मैं जैसे कोई व्यक्ति उल्टी सीधी बातें जैसे करने लगता है उससे ही यह प्रश्न किया जाता है आपके माता-पिता ने कौन सी ऐसी क्रिया की जिससे कि आप उत्पन्न हुए तो इस बात को कोई व्यक्ति परोक्ष रूप से ही बोलेगा है सत्य वो क्रिया सत्य है मगर ये ऐसी बातों का फायदा उठाने लगते हैं कि इसकी वजह से व्यक्ति थोड़ा सा लज्जित भाव से थोड़ा धीमा पड़ेगा थोड़ा ढीला पड़ेगा अच्छा मेरे साथ क्या हुआ जैसे जैसे किसी आर्य समाजी से मैं बात कर रहा हूं तो वो इन बातों को ही लेकर के आता है कि भाई देखिए अगर वो ईश्वर है तो वो कपड़े कैसे चुरा सकता है कपड़े कैसे लेकर भाग सकता है या वो वामन जो अवतार था वो अगर ईश्वर था तो वह छल कैसे कर सकता है तो मैंने दोनों दोनों पर प्रश्न किया
00:38:35:19 एक बार मैं एक पहाड़ पर गया था तो वहां पर अचानक से ऐसी आंधी चली आचार्य श्री कि वहां की जो मातृ शक्तियां थी उनके जो वस्त्र थे वो निर्वस्त्र सी हो चली ऐसी आंधी चली अब मैंने उनसे जो हमसे तर्क कर रहे थे हमने पूछा कि यह कार्य किसका है जो वहां की मातृ शक्तियों को लगभग लगभग नगन अवस्था में पहुंचा दे रहा है आंधी के द्वारा प्राकृतिक आपदाएं ऐसी हो सकती हैं जिसके द्वारा ऐसी स्थिति आ जाए तो यह किसका कार्य है उनको मानना पड़ा कि भाई ये कर्मों का फल इसका अर्थ है कि किसी कारण से आपका ईश्वर भी ऐसा कर सकता है आपका ईश्वर भी ऐसा कर रहा है मातृ शक्तियों को हवा के द्वारा उनका कोई वस्त्र है वो उड़ रहा है अब मान लीजिए कि चलिए हम यहां की मातृ शक्तिया तो तब भी बहुत सा वैसा वस्त्र धारण करती है अगर जो दूसरे पाश्चात्य जगह है वहां की मातृ शक्तियों का वस्त्र तो और ज्यादा अजीब होता है तो ऐसी स्थिति में कोई प्राकृतिक आपदा में उसका वस्त्र भी उ तो वो तो ईश्वरीय कार्य माना गया तो उस स्थिति में भी तो ईश्वर वस्त्रों को हटा कर के वो उस नगन अवस्था में मातृ शक्तियों
00:39:50:24 का तो ऐसी स्थिति ऐसी चीजों का आलंबन लेते हैं अपने आप को मजबूत स्थिति में लाने के लिए यह नहीं सोचते यह कार्य हमारा ईश्वर भी कर रहा है बस वो व्यवहारिक रूप से नहीं है व्यवहारिक रूप से नहीं है कि ईश्वर नहीं किया और ये जो ये जो वामन अवतार का बताते हैं तो यह तो वो जो रक्षपाल देवार्य जी थे जो सजापुर में जिनका गुरुकुल है उन्होंने बोला था कि वो ईश्वर जो है छल नहीं कर सकता तो मैंने उनसे यही पूछा था कि कोई व्यक्ति कहीं पर खड़ा है और उसके ऊपर एक उल्का पिंड आकर गिर गया प्राकृतिक अब ये छल है कि नहीं है बोले छल मानना पड़ा छल है भाई उसको बता के थोड़ी ना गिरा उल्का पिंड बिना बताए गिर गया उल्का पिंड तो इसका अर्थ है कि आपके द्वारा माना जाने वाला ईश्वर भी छल करता है मगर आप बैंड मतलब आप जो है डंका पीटते हो कि हमारा ईश्वर नहीं कर स फिर उन्होंने बोला कि जिसके साथ जो छल करता है जो पाप करता है व तो ईश्वर उसको किसी भी प्रकार से सजा दे सता जो उसके लिए अचित होग तो वही तो हमारा ईश्वर कर रहा है बस आप आप जो है उसको सीमित कर रहे हैं और हम जो है असीमित ईश्वर कर
00:41:05:24 रहे हैं हमारा जो मुख्य बात होती है किसी से भी कि परंपरा के विरुद्ध जो भी कोई व्यक्ति धर्म का प्रचार प्रसार करने की बात कर रहा है तो हमारा सबसे पहला यही होता है कि क्या आपके द्वारा पूजित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है या नहीं सर्वशक्तिमान बहुत सारे आर समाजी बहुत कोन वाले बहुत सारे ब्रह्मा कुमारी यह रामपाल वाले इन सब से एक जो मुख्य क्वेश्चन हमने पूछा है कि इन सबका ईश्वर बाधित है सीमित है सर्वशक्तिमान नहीं है उसके अंदर बाधा है और जब बाधा हो गई तो व ईश्वर ही नहीं है और जब ईश्वर नहीं है तो जब ईश्वर नहीं है तो उसको प्राप्त करने के निमित्त बताई जाने वाली जो नियमावली है वो धर्म नहीं है त्रिकाला बाम सत्य त्व तीनों कारण बाना हु वही तो सत्य है जी तो ये ऐसे करते हैं कि सर्वशक्ति ये मैंने देखा था वो सर्वशक्तिमान विषय भी बड़ा रोचक सा था जो बात चली थी अवतार के विषय में वो उन्होंने बातें की थी हा उन्होने य कहा कि वो जो है मूर्ति मानेंगे तो अल्पज्ञ हो जाएगा मैंने कुछ भी नहीं सर्व शक्तिमान आप कह रहे हैं तो सर्वज्ञ
00:42:20:24 शक्तिमान दोनों वि अलग कर द तो बात मान लेंगे हम आपकी स शक्तिमान है परात पुरुषोत्तम सर्व शक्तिमान इसको विशेषण हटा दीजिए तो कोई आपत्ति नहीं है जी विशेषण लगाओगे निराकार में तो फिर संगति नहीं बैठेगी स संगति है ना छ संगति एक भी संगति नहीं बैठ पाएगी आपके आपकी कट रही है ये कभी कभी ये भी कहते हैं जो अपने कार्य स्वयं कर सकता है किसी बिना किसी की सहायता के वो है तो मैंने मैं कभी कभी भी पूछ लेता हूं तो फिर जब यह सर्वशक्तिमान है तो आत्मनिर्भर किसे कहेंगे आत्मनिर्भर व होता है जिसको किसी की सहायता के लेने की आवश्यकता नहीं है तो सर्वशक्तिमान आत्मनिर्भर है मगर प्रत्येक आत्मनिर्भर सर्वशक्तिमान नहीं है आत्मनिर्भर सर्वशक्तिमान आत्मनिर्भर भी है मगर प्रत्येक आत्मनिर्भर सर्वशक्तिमान तो नहीं हो सकता सर्व का विशेषण लगेगा या जैसे दयानंद जी लिखते हैं अनंत सामर्थ वान अनंत अनंत सामर्थ तो जब अनंत कह रहे हैं तो फिर अंत क्यों बता रहे हैं कि नहीं ये नहीं कर सकता ये इनका नहीं समझ में आता है
00:43:36:12 और नकारात्मक सोच है हमारे गए थे ना मनीष व विदेशों में तो उन्होंने जो है सभा में यह पूछा कि आपके यहां खरगोश के सिंह होते हैं बोले के नहीं होते हैं कछुआ दूध देता है कि नहीं देता है आकाश में फूल होते हैं कि नहीं होते हैं तो ऐसे नकारा कुछ होता ही नहीं है तो फिर क्या मतलब तुम्हारा जो है हमारे आ बताएंगे हम उसी ढंग के नकारात्मक प्रश्न करते जिसका उतर नहीं में हो जी उ जो कम बुद्धि वा लोग हो जाता देखो जैसे सबसे कहते हैं कि जो है भगवान श्री कृष्ण ने स्त्रियों के वस्त्र ह आप ये तो स्त्री शब्द संज्ञा ही गलत है क्योंकि छ वर्ष की अवस्था में जो है भगवान श्री कृष्ण ने गोपा के वस्त्रों का चिर किया छ वर्ष की अवस्था में उस एक वर्ष बाद उने गोवर्धन पर्वत उठाया उसमें सात वर्ष की अवस्था है उनकी आप आज भी छ वर्ष का बालक जो है उसे कौन सा ज्ञान है हमें स्वयं ज्ञान छ वर्ष तो हमने जो हमने बस्त नहीं पह ऐसी माता जी झगड़ डाल देती तो पड़ा उसको फेंक देती निकाल करके और उनमें अपनी वासना वासित इंद्रियों के द्वारा उनकी व्याख्या करना यह केवल इन्ही कामां के
00:44:51:12 द्वारा ही हो सकती है ये स्वयं कामां लोग है वही कल्पना करेंगे ऐसी क छ वर्ष का बालक जो है इस विषय में क्या ज्ञान रख सकता है अब एक जबक उसके दूसरे अर्थ है नूतन जल गोब चराय तस्म कृष्णाय नम संसार महीस जायो गोपा नाम बधु जो गोपों की स्त्री है उनके वस्त्रों को ह करने अज्ञान को ह करने वाले वो अज्ञान क्या था उनका कि जो है उसमें निर्वस्त्र होकर के जो है जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिए बड़े नियम है यदि आपने और वार्ता भी नहीं करनी चाहिए हसी मजाक भी नहीं करनी चाहिए तो हमारी जो गोपियां है तो स्नान निर्वस्त्र कर रही थी जबक ये लिखा है भोजन करते समय आपने बोला तो आपका जो तेज का यमराज कर लेते हैं और स्नान करते समय उच्चारण हुआ और विधि से स्नान नहीं किया तो आपका जो तेज है आपका जो बल है वो ब्रम देवता ग्रहण कर लेते हैं और हवन देते समय य आपने बीच में कोई हिंदी का शब्द बोल दिया और बात आपस में कर ली तो उसके फल का जो हरण है वो अग्नि देव कर लेते हैं ये हमारी शास्त्री विधि है
00:46:06:21 तो उनने कमी देखी भगवान के लिए तो उस अज्ञान को दूर करने केने वो लीला की तो वहां वस्त्रों से को लेना देना नहीं है पर इन् तो दोष दृष्टि देखनी है तो उसमें तो असूया असूया पर दोष कि नाम अस दसों के दूसर गु में दोष देखना है तो जी इसमें एक बात आती है आचार्य श्री महाभारत में मैं गलत हूं तो आप ठीक कर दीजिएगा कि वहां कहा गया है कि जो पुराण आदि स्मृति ग्रंथ है उनकी सीमा में उनके द्वारा जो व्याख्या की गई है उनकी व्याख्या की सीमा में रहकर हमें वेदों का अर्थ करना चाहिए वेद भी डरते हैं जो जो जो है स्मृति को पढ़े बिना जो उनका अर्थ करने जाता है उनसे वेद डरते हैं महाभारत में माद प्र जो मेरा जो अर्थ का अनर्थ करता है तो मुझे लगता है कि मुझ दंडे से प्रहार कर रहा है जी जी जी वही आप जो कह रहे हैं वही है जी अब अब क्या है कि इस तरह के जब श्लोक हम देते हैं तो इनके पास एक पुराना एक सिक्का रहता है परंपरा विरुद्ध लोगों का वो होता है प्रक्षिप्त जो भी इनके विरोध में जो शास्त्रों की कोई भी बात जाए
00:47:21:26 तो बात आ जाती है कि ये तो प्रक्षिप्त है ये तो प्रक्षिप्त है ये तो मिलावट है जी तो इसको आप कैसे देखते हैं जोय प्रक्षिप्त वाली प्रक्षिप्त वाद है इसको कैसे देखते हैं आप की तो कहा तो कुछ भी जा सकता है कि सिद्ध करना है दवा सिद्ध नहीं हो जब य स्वय में प्रक्षिप्त है जी उस नाने लिखा दया जी महाराज दया जीने 294 पृ लोक है जो है ना मास भक्ष दोष ति ताना नितु महा फला यह लिखा की जो है य 294 प पर पांडव गीता में है जब खोल कर देखा 294 क्या 300 प भी कही ना मिला तो इन दवारा ही इनके द्वारा ही प्रक्षिप्त है जन्मना जाद कहीं नहीं हैने प्रक्षेप किया है तो इनके द्वारा जो कारनाम है तो दूसरो को थोपना चाहते हैं य हमारे सनातन धर्म में तो एक अक्षर प्रक्षिप्त नहीं है किसी पुराण में जो ये तो अपना मन गण ज कोई बात नहीं कटती है तो कह देते नहीं ये तो प्रक्षिप्त है इसमें इसम इसमें ये देखिए इनका
00:48:36:26 जो आपने जो एक अभी दोगलापन कहा था कि एक तरफ कहते हैं पुराण को मानते नहीं है और पुराणों से ही उधत होने वाला है जन्मन जाते शूद्र इनको ये स्कंद पुराण में कहीं पर है हां अगर है तो तो किसी किसी नहीं है वहा पाठ नहीं है जन्म ब्राह्मण गया अपने मनमा ढंग से फिट कर देते मगर मगर जब ये जन्म जाते शूद्र बोलते तो उसम शास्त्र का नाम ही स्कंद पुराण बताते हैं ये लोग भी जब उधत करते हैं उसे तो किसी शास्त्र का नाम नहीं बोलते बोलते हैं तो स्कंद पुराण बोलते हैं तो अगर स्कंद पुराण में चलो मिल भी गया तो ये पुराण का पुराण को मानने वाले कहां से हो गए फिर ये हां इसका खंडन करते हैं पुराण का खंडन करते हैं ये और मैंने देखा है मैंने देखा है जितने लोग ये आर्य समाज को मानने वाले हैं ये अपनी बात को रखने के लिए मतलब वहां पर उन बातों का ही आलंबन ले लेते हैं जिन बातों का थोड़ी देर पहले खुद ही खंडन कर रहे थे जैसे कि मैंने देखा आपका जो चल रहा था स्पर्धा चल रही थी जब तो वहां पर वो लोग आपको रामचरित मानस का जो है प्रमाण के रूप में कर दे रहे थे रामचरित मानस अब रामचरित
00:49:52:07 मानस इनके लिए प्रमाण कैसे हो गई और अगर प्रमाण है तो फिर उसमें तो खूब सगुण सकार की भक्ति खूब बताई है गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज जी ने बताइए एक तरफे निग कोई भेद नहीं है किंतु निगम तो के जो है निर्गुण का तो एक बार प्रतिपादन हो सकता है कि सण का नहीं हो सकता वो बहुत कठिन है निर् निराकार में क्या कहना है बस बात खत्म य सग साकार के भ्रम के प्रतिपादन की जहा बात होती है वहा जो पसीने छूट जाते हैं जी और ये का जो जैसे एक उदाहरण के बताता हूं मैं जो है इनका कोई सिद्धांत नहीं है कोई योग्यता भी नहीं अपने ढंग से इन्होने व्याख्या की है एक जो है उसमें
00:50:42:06 वो एक ममम तवा करके मंत्र आया था उसम तो उसम ये लिखा था जो है य आपका ऋगवेद का मंत्र है ये इमाम त्वा मिंद्र म सुता स्याम पुत्रा आद पति मेका दशम क इसका अपना जो है अर्थ है कि विवाह के समय में इस मंत्र के द्वारा पति इंद्र से प्रार्थना करता है विवाह होता है ना प पत्नी दोनों साथ में रहते हैं तो पति जो अपने पत्नी के लिए प्रार्थना करता है ब सीधा स्पष्ट है में आप देखि अपने ढंग से कैसे लगाते य लोग कि हे इंद्र इस मेरी पत्नी को तुम सुपुत्र जब आपके सामने आपसे प्रार्थना करता हूं तोय मेरी पत्नी है तो उसको पुत्र देना तो सुपुत्र देना और सुभ बनाओ और इसमें द पुत्र करने का बल दो क्योंकि जो इसमें जो है द पुत्र करने का बल दो इसके पति अर्था मुझको भी दीर्घायु बनाओ जब यह बात पूरी होगी तो इसका आशय
00:51:57:14 है कि एक कुटुंब में एक स्त्री हो गई एक पुरुष हो गया और 10 पुत्र हो 12 संख्या ई केवल तो पुत्रा विदा मही बहु लिखा भी है अधिक से पुत्र होने चाहिए 10 संख्या तो सीमित कर दिया है और वैसे केवल शब्दार्थ इसका करोगे तब भी बन जाएगा सामर्थ्य मान इंद्र स्त्री को तुम सौभाग्यवती सुपुत्र करो इससे दु पुत्र दो और 11 पति की रक्षा हो 12 संख्या हो गई अब इनका अर्थ देखिए आप संक्षिप्त में कह देता हूं मैं विधर्मी क्या कहते हैं व तुम 10 पुत्र 11 पति दो उसका अर्थ कर दिया उन्होने पति मेकम दशा कृति कैसे अर्थ रहे जो मतलब ये इन्होने अपने इन्होने ये इन्होने अपने भाष्य में लिखा है 10 द पुत्र हा अपने इन दया जी की भाष में दयान जी के द्वारा कथित है ओ एक पुत्र और 11 पति हा अर्थात 11 पतियों से भी एक एक पति से 10 द पुत्र अब लगाओ तो 100 संख्या बन गई ना
00:53:12:16 तो पूरा कौ मतलब पूरा कौ भी पैदा करना चाह रहे हैं एक स्त्री से जो [हंसी] है चलिए हा तो ये मैं कह रहा हं तो इनका जो अर्थ है ना व शति दूक शति दूक है शति माने वेद है उसका जो है अपना अन ंग से प एकम दशा का अर्थ कर रहेला जी नेका खंडन किया है सब तो उन्होने वेद भाष्य भूमिका में सब इनके जो अर्थ के अनर्थ कि खंडन किया उने उन्ही का
00:53:48:14 खंडन ये एक क्या कहते हैं यह हिंदू शब्द पर भी बड़ी वो करते हैं और समय आने पर हिंदू शब्द भी बोलते हैं मतलब हिंदू बोलते भी हैं और यह भी कहते कि हिंदू शब्द जो है प्रामाणिक नहीं है अभी हुआ क्या था कुछ समय पूर्व उत्तराखंड में कहीं पर जगतगुरु शंकराचार्य जी का शिर शिविर था वहां पर प्रवास था तो वो उनकी सभा चल रही थी प्रश्न उत्तरी वाली तो उसमें एक आगंतुक जो द्वेष भावना से संभवत घुसा हो आर्य समाज से था उसने जाकर के प्रश्न किया हिंदू शब्द पर हिंदू शब्द वैदिक कैसे आप बताए तो जो प्रश्न उत्तर होता है अगर हम प्रश्न करता है तो उसमें जो उत्तर सामने से दिया गया उसको लेकर के शांत हो जाना होता है शास्त्रार्थ का भूमिका ही बिल्कुल अलग होती है जी तो गुरुदेव ने उसको यथोचित जो समाधान था वो दे दिया अब यदि वो संतुष्ट हुआ उसको नहीं मानना वो तो पहले से सोच के ही गया था कि नहीं मानना है तो जब वो संतुष्ट नहीं हुआ तो वहां से बाहर आने के बाद उसको इन आर्य समाधि हों ने नाम दे दिया है
00:55:04:03 कि भैया वहां पर एक शास्त्रार्थ हुआ था जिसमें शंकराचार्य जो है हार गए हिंदू शब्द पर ये उनका छल रहता है छल और अब हा ये छल है पुरा महादेव का यज्ञ हुआ वहा उस समय तो जो है परम शास्त्र के परम बतरा जो रंजन थ महाराज जी थे उसमें और उन्ही का व्याख्यान होता था उन्ही का शास्त्रार्थ होता अगवे जीने चैलेंज कर दिया उनके लिए आपसे शास्त्रार्थ करेंगे आपने सती प्रथा समर्थन कर दिया और सती प्रथा का क्या उसमें जो मंत्र है विस्तार से चर्चा होगी उस एक विधि होती है ज अवाम गवाल सन्यास पल पत्र देवरा पत्र पति कलो पंच वहा अवाल गवाल अद का अर्थ स्पर्श करना है तो पहले जो वेदों में जो वेद है जो वेद का अर्थ है उसमें ऐसा घर के बुजुर्ग भी जाते हैं अन्य भी जाते हैं तो महिला पति के साथ जाती थी और उसपे पति के साथ ही मतलब सती होने का प्रयास करती थी मतलब तो वहां स्पर्श करने का विधान है तो वहां के जो उनके माता-पिता है बुजुर्ग हैं तो उसको समझाते
00:56:19:16 थे कि भाई तुम्हारा भी आपके पुत्र है इनकी रक्षा करने का भार है आप पति के साथ सती मत होइए अपना कर्तव्य का पालन करिए इसके बाद में सुभाग मूर्ति से म ये मंत्र का अर्थ है वहां पर जो सती प्रथा वीडियो डाला सब विस्ता से बात कही है किंतु विधर्मी ने कहां से कहां जो है वो तो सती प्रथा में जो है आज भी पति के साथ में जो है पत्नी के लिए चिता में जल जाना चाहिए ज ऐसा अर्थ था ही नहीं महाराजा ने अपने ढंग से अर्थ किया अब भी है वो हमने वीडियो में से स्पष्ट किया है तो वो सती प्रथा का लेकर के उसके बहाने मैं ये करूंगा वो करूंगा हमें उन्होने पहले कह दिया दो चार किलोमीटर रह जाएंगे तो स्वय भाग जाएंगे कि अपना प्रचार कर लिया लोगों ने विशेष व्यक्ति का नाम ले लेकर प्रचार कर लिया इतना नका यही रहता है शंकराचार्य से प्रश्न किया हिंदू के विषय में उत्तर मिल गया अब जो देखने वाले होंगे कि सा प्रश्न भी किया है और ने उत्तर भी दिया है इसका मतलब शास्त्रार्थ हुआ ही है और उसम व्यक्ति देखता तो है नहीं ज्यादा बोले हा हा निरुत्तर हो गए होंगे शंकराचार्य जी इतना समय लोगों पर तो 990 प्रत लोगों से अपनी बात जो है ना वो छल के द्वारा जो सिद्ध कर ही देते हैं ये लोग
00:57:34:25 इसमें इसमें आचार्य शी ये चीज आती है कि भाई अगर वह शास्त्रार्थ था जबकि अभी कुछ दिन पहले हमें शास्त्रार्थ के खूब सारे वो आए थे निमंत्रण जब ये हमारी चीजों से थोड़ा गड़बड़ा गए थे इन्होंने हमारे बारे में एक पर्चा भी लिखवा दिया और फतवा जारी कर दिया कि ये व्यक्ति से दूर रहे करपात्री जी का जो परम भक्त है ये और जो है आर समाज को नीचा दिखाना चाहता है इसके साथ चर्चा ना करें किसी उच्च कोटि के विद्वान को ही बिठाए यह भी उसमें अंकन मैंने कहा मैं तो एक बहुत तुच्छ सा एक शिष्य हूं जब मेरी कारण इनको लिखना पड़ रहा है कि एक उच्च कोटि के विद्वान को बिठाए तो जब हमारे यहां के विद्वान आएंगे तो इनका क्या हाल होगा मैं मेरा तो बहुत बिल्कुल जमीनी स्तर का मामला है तो तो है क्या कि ये अपने जो इन्होंने हमको को जो निमंत्रण भेजे थे हम वो शास्त्रार्थ के लिए उनमें यही बात लिखी थी कि शास्त्रार्थ का निमंत्रण लिखित में होता है शास्त्रार्थ के बारे में कोई भी चीज जो डिसाइड होती है वो लिखित में होती है पर जब ये अपनी ऐसे अफवा उड़ा रहे हैं शंकराचार्य शास्त्रार्थ में हारे तो ये ये नहीं बता रहे कि वो कहां पर उसका निमंत्रण गया था कौन उसका निर्णायक बना था
00:58:50:20 कहां पर वो होना सुनिश्चित हुआ था कौन सा पत्राचार हुआ था उस शास्त्रार्थ के निमित्त वो नहीं बताते क्योंकि वो तो मतलब नियम और सिद्धांत दूसरे के लिए है अपने लिए वही नियम और सिद्धांत नहीं है और महाभारत में आया है कि आप दूसरों से उसी प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा करें जो स्वयं को स्वयं के लिए अपेक्षा करें तो वही धर्म है वही धर्म है आत्म प्रकला परे समाच जो अपने प्रक लगा उसका दूसरे के साथ व्यवहार ना करें जी जी जी सितो को जो दूसरों पर मढ रहे हैं उन्हीं सिद्धांतों को खुद खंडित करते हैं और इस तरह की झूठी अवाए फैला देंगे कि व्यक्ति य भूल ही जाएगा जैसे कौवा कान ले गया कौवा कान ले गया कौवा कान ले गया तो लोगों ने सोचना ही भूल गए कि कान मेरा यहीं पर तो नहीं है कहीं तो ये ऐसे ही इन्होने एक एक अवा य भी फला फैलाने का प्रयास किया है कि युधिष्ठिर में मानस कोई थे इनके आ के बहुत बरी विद्वान जिन्होंने कपाती जी को शास्त्र में पराजित किया था तो इस बारे में कुछ संज्ञान में हो तो आप थोड़ा प्रकाश डाल द नहीं नहीं ये केवल भ्रम है और देखो कहां
01:00:05:24 राजा भोज आगे तो नहीं कहेंगे हम आप स्वय समझ लीजिए कोई तुलना नहीं है ये तो केवल जो है एक बस इनका भ्रम प्रचार है ऐसा कुछ नहीं है हा आप उनकी बात कहेंगे य ममास है भीमसेन शास्त्री जी भी है ये सब आर समाज के प्रोधा मानते हैं हम जब धर्म संघ विद्यालय में पढ़ाते थे तो उस समय भीमसेन शास्त्री ने बहुत बढ़िया भैमी टीका लिखी है तो हम लोग आपस में विचार विन करते थे हमारे जैसे बैकुंठ जी हैं बहुत अच्छे वैद ज्ञ है और कवास में वेद के विद्यालय उन कई विद्यालय हैं और ऐसा कोई वेद विद्यालय उनका छात्र ना हो तो हम धर्म संघ में पढ़ाते थे वो भी वहां लाल बहादुर में गुरुजी के यहां पढ़ते तो सास चर्चा होती थी तो अंता दे वच्चे प जो है एक सूत्र अंता दिव तो वो टीका लेकर आए तो बोले भाई साब हम लोग जो विचार कर रहे हैं वो तो इससे अर्थ नहीं लगता भ टीका से और है नहीं उसमें जो है तो हमने अर्थ ने बताया तो व बैकुंठ जी भीमसेन शास्त्री जी के यहां उसको लेकर गए कि अंता दव कास अर्थ लिखा है उसके अनुसार यह सि सिद्ध हो ही नहीं सकती
01:01:21:03 इस जन्म में नहीं सात जन्म में नहीं होगी ऐसा वैकुंठ जी ने कहा तो वो फिर लेकर बैठे पू अत परा ऐसे घुमाते रहे उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि अगले जब अगला संस्करण निकलेगा तो आपका बताए जो अर्थ है वही इसमें लिखा जाएगा क्या बात है तो यह है कि बस कुछ भी कह सकते हैं ये लोग दयानंद जी के बारे में भी उड़ा रखा है कि दो दो ती स पंडितों को जो है इन्होने हरा दिया कि फलाने शास्त्रार्थ में फलाने व उसम तो अच्छा मैंने देखा कि इनका जो ताना बाना खड़ा है वो या तो बुराई करने पर ही खड़ा है कि तुम सती प्रथा को मानते हो तुम वेदों में बलि मानते हो तुम जो है तुम जो है स्त्रियों को यज्ञ पवित का अधिकार नहीं देते तुम इस मतलब दूसरे की बुराई करने के आधार पर ही हमारा अस्तित्व है हमारा अपनी कोई सौंदर्य नहीं है देखो ये जो है ना इतनी अल्पज्ञ है इनम जो ये कह बली का मतलब समते सिर काट देना इनका अर्थ बलि का मतलब यही तो बकरा की बली हो गई तो बकरा को जो है काट कर चढ़ा दिया ये तो बली का अर्थ करते हैं बल मंत्री नमस्कार बलि का अर्थ पूजा है हमारे य शास्त्र में वेद में
01:02:36:03 बली का अर्थ होता है पूजा तो पूजा किसकी नहीं की जा सकती है हमारे यहां तो जो है स सभी प्राणियों भगवान के दर्शन करते हैं जी भगवान ने जो शुक्र अवतार लिया भगवान ने अमस्या अवतार लिया वो तो किसी से भेद करते ही नहीं है तो वहा बलि का अर्थ पूजा है अवाल उसम लिखा जो है कि लोके विवा मध्य सेवा नित्या जंतु प्रेरणा वव विरास रास निव ष क्योंकि व्यक्ति की मैथुन में शराब पीने में और मांस भक्षण में रागता प्रवृति होती है उसका जो शास्त्र है ना वो सीमित करता है उसका विधान नहीं करता है परिस के द्वारा भाई रात दिन आपकी मांस खाने में प्रवृति है तो पंच पंच नक्षा कह देगा और आप जो आपको जो स्त्री से संयोग की इच्छा है तो विवाह के द्वारा संयोग करि कोई आपत्ति नहीं है और आपके लिए शराब का है तो जो सौत मण याग में जो विधान है उसका करिए यद गता सुराया तो दूसरा शलोक लिखाने पहला बकवास करेंगे ये लोग उसके नीचे का शलोक नहीं उसम लिखा है
01:03:51:03 ता सुराया केवल सुना लिखा है व केवल सुघना मात्र है भक्षण नहीं है तो इनके शास्त्र में उनका शराब पीना का विधान है य तो महान पतित है तो काट काट करके जनता के सामने शब्द ले जाती है ना बुराई बुराई मतलब अपनी सौंदर्य का प्रचार नहीं करके यह जो परंपरा प्राप्त जो सिद्धांत है उनकी बुराई करके अपना इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करते हैं जैसे कुछ कुछ जो क्रिश्चन मिशनरी जैसे ध्वनित होता है ना अरे तुझको इन्होंने दूर रखा है तू यह है तू वो है जैसे जो पीड़ित पक्ष होता है प्रताड़ित पक्ष होता है उसको पकड़ लेंगे और उसको कहेंगे या पिछड़ा पक्ष होता है उसको पकड़ लेंगे और कहेंगे भैया इन्होने तेरे साथ यह किया वो किया तू हमारे में आजा तो यह वो हो गए धर्मा भाषी और यह हो गए सनातना भाषी सनातना भाषी सनातन का आभास है सनातन है नहीं तो अंदर सनातन की सीमा के अंदर दिखने वाले जो लोग हैं भाषी ये तरह से आभास भी ना कहा जा तो और अच्छा है इनको तो केवल जो रज्जू में सर्व की भ्रांति
01:05:06:07 तो अधिष्ठान में तो एक बत बिना रजू के भ्रांति हो जाती है परम धर्म आस अधर्म शाखा पंचे धर्म ये केवल धर्मा भास कह लो कुछ ना कुछ तो कहना ही पड़ेगा कोई ना देना ही पड़ेगा ये हिंदू शब्द की अगर बात करूं तो ये लोग कभी कहते थे कभी कहते मिलेंगे कि 400 साल पहले तक हिंदू शब्द नहीं बोला जाता था फिर कभी कहते मिलेंगे कि 600 साल पहले तक हिंदू शब्द नहीं बोला जाता था कभी कहते मिलेंगे 1400 साल और जब इनको यह पता चल जाता है कि 1400 साल पहले के भी प्रमाण प्राप्त है सिद्ध है तो फिर ये कहने लगेंगे कि राम कृष्ण ने कब स्वयं को हिंदू बोला अच्छा राम कृष्ण बहुत सी ऐसी चीजें करते हैं जिसका आलंबन खुद नहीं लेते जैसे मैंने प्रश्न किया एक बार एक आर्य समाजी से तो मैंने कहा कि भाई क्या कहते हैं ये जब राज गद्दी पर राज राज्याभिषेक होना है तो यह बताओ कि कौन सी चुनावी प्रक्रिया हुई क्योंकि कर्म के आधार अगर हम क्षत्रिय
01:06:21:08 स्वीकार करते हैं तो हमें कर्म चेक करने है कि कोई श्रीराम से भी ज्यादा गुणवान व्यक्ति हो है ना तो हम तो फिर प्रतिस्पर्धा करेंगे ना कि कौन गद्दी पर बैठेगा चुनावी प्रक्रिया कि कौन गद्दी पर बैठेगा जो कर्मों जो जिसके आचरण सबसे ज्यादा उचित हो राजगद्दी के लिए उसको माना जाएगा मगर वहां तो निर्विवाद रूप से सबसे पहले श्री राम और श्री राम अगर वनवास गए तो बिना पूछे अगला जो उनसे छोटे हैं भरत बना दिया गया तो यह तो वंशवाद है यह तो वंशवाद है तो ये आपकी थ्योरी में कहां फिट बैठ जाता है जब आप कर्मानुसार चलेंगे तो यह तो जन्म से माना जा रहा है यहां पर सीधे-सीधे बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल हा तो यहां पर वो राम और कृष्ण को चेक नहीं करेंगे कि यह चीज अच्छा जैसे मैंने आपके में देखा वो एक प्रसंग ले रहे थे बार-बार कि आपने कभी देखा है क्या कि चार प्रकार के चार हाथ पैर हो जिसके ऐसा कोई इंसान देखा है क्या ऐसी बातें बोल रहे थे और खुद ये नहीं सोचते आप भाई ईश्वर है तो कहीं से जहां से उसने सृष्टि की रचना की वहां पर आपको ईश्वर को चमत्कार करने वाला मानना पड़ेगा इसमें क्या संदेह
01:07:36:21 है तो आपके य जो तिब्बत में आलू से मनुष्य उपज रहे हैं जो तो वो नहीं सोचते कि कौन से इंसान तुमने देखे जो आलू से इंसान बने वो नहीं सोचते इसम थोड़ा सा कुछ बोले थोड़ा दर्शकों को कुछ बताए इस मामले पर नहीं बात ये है कि वो जो परात्पर परम परमात्मा है वह सगुण साकार में जो चाहेगा वह रूप होगा इनका जन्म कर्म बड़ दिव्य होता है यह लोग जो है यह समझते हैं कि परमात्मा का जन्म गर्भ से हुआ है ऐसा नहीं व चर्चा चली हु थी और तुलसीदास जी का जो है वह रामायण का भी उन्होंने प्रमाण दिया बहम ने कहा कि उसम तो यदि आप ऐसा मानोगे तो आगे भय प्रकट कपाला दन दयाला कौशल हित प्रकट शब्द आया गर्भ से उत्पन्न उत्पत्ति आई कहां है जो आपके पक्ष में है तो वो रावण में सही है और विपक्ष में चला गया तो रावण ठीक नहीं है ऐसा अधिक चरा मामला नहीं माना जाएगा और हमा जो सनातन आपका जो आर समाज है व कितने समय आर समाज हो या जैन हो बौद्ध हो तो हमने जो है उसकी श्लोक भी बोला था वो जो है दबा
01:08:51:27 देती है ना उसम जो है लिखा उसम अध्या वि प्रतम जगत तत मनुष्य जना जनम मता नाम आद्यम जनम ना दिगंतर ततर मतान जने निट माते आपके जितने भी मत मज संप्रदाय है जो व्यक्ति का जो जन्म है उसी जन्म से उनका समय निर्धारित होता है आप इस्लाम धर्म में तो जोको उत्पत्ति करने वाला है वही उसका उतना ही काल माना जाएगा दयानंद जी का भी जो है उतना ही आ समाज का काल माना जाएगा बौद्ध का जो जन्म दिन उतना ही काल मान जाएगा किंतु हमारा जो सनातन धर्म है धर्मो पय सनातन एव मन यमाम गता नाद जन परच संपता विचार थोड़ा इसमें विचार करेंगे तो सृष्टि के हर गण के अनुसार जो हमारा इस सम काल चल रहा है तो उसमें एक अरब 8 करोड़ और 2 खज
01:09:56:10 2000 के लगभग हमारा जो सृष्टि का एक क्रम है के अनुसार तो इसका तो जो है गत लग गया किंतु ऋषि महर्षि एक बार सभा की यह पता लगा कि सनातन धर्म इसका जन्म दिवस कब से है उसी पर लिखा धर्मो प्यम सनातन ए मन समाम तो गणता गत की सभा हुई जो गत है उनकी क्या हुई सभा हुई यमा नेता और सभा करते करते बहुत दिन बीत गए अध्या जन परच संप्रा प्रता वि विचार आज तक व जन्म दिवस नहीं निकाल पाए कि सनातन धर्म का कितना काल है गणित के अनुसार इसका जन्म दिवस क्या है इसका आदि क्या है इसका अंत क्या इसका मध्य क्या आज तक पता नहीं चला अन्य का बताओ जिसका हम जो है बता देंगे आपके लिए इसका जन्म दिवस कब है जी जी हमारा तो जो है ना जो वेद में प्रतिपादक को सनातन धर्म है तो प्रतिपाद्य प्रतिपादक से पहले वेद से ही पहले कल्पना की जा सकती है इसकी जो है हमारा सनातन धर्म वेद के द्वारा प्रतिपाद्य है ना तो प्रतिपाद्य वस्तु प्रतिपादक से पहले होगी तो प्रतिपा बहुत बढ़िया बत
01:11:11:22 बहुत अच्छी बात आपने बताई आपने जो बात कही ना उससे एक बात और मुझे याद आ गई कि भाई ये लोग जो ये कर्मा आधारित बात पर चलते हैं अलंकार हम लोग इन्ह अलंकार भी कहते हैं अलंकार समाजी यह लोग पौराणिक कहते हैं ना केवल तो उसमें ऐसा ध्वनित होता है कि भाई यही एक वेद को मानने वाले हैं और दूसरा सिर्फ पुराण तक सीमित है जबकि हम वैदिक पौराणिक है वैदिक भी है पौराणिक भी है स्मृति को भी मानने वाले हैं तो हम लोग अलंकार समाजी भी कहते हैं इहे तो इनकी ये जो बात है जो जो दोहरी बातें हैं वो ऐसे मिल जाती जैसे यह लोग कहेंगे भाई कर्म से ही जांच होगी अब जब कर्म से जांच होगी तो यह जो वो अभी कौन सा एक बिल पास हुआ था कि रोहिंग्या मुसलमानों को अंदर नहीं आने देंगे तो इनको कैसे मालूम कि हर रोहिंग्या मुसलमान जो है वह गलत है बॉर्डर पर जाकर के खड़े हो जाओ सबके कर्म चेक करो और फिर अंदर आने दो जिसको आना है वो कह देगा मैं हो गया मैं हो गया पूजा करने वाला और मुझे अंदर ले लो आप भारत में जगह दे दो मुझे तो यह
01:12:26:27 कोई आधार तो नहीं है हमारे भारत में बुलाने का बाहर के लोगों को वहां पर ये खुद ही की थ्योरी का खंडन करते हुए फिर वह जो बिल पास कर रही है उसका समर्थन करते हैं कि नहीं नहीं रोहिंग्या मुसलमान को हम अंदर नहीं आने देंगे अरे भाई क्यों पहले उसका कर्म देख लो हो सकता है वो भी पांडित्य कर रहा हो वो भी वेद पढ़ रहा हो अगर ऐसा करने लगे तो उनको भी ले लो आप अंदर तब नहीं ऐसा करेंगे तो ये तो चीजें है इसमें आचार्य श य मैं पूछूंगा एक बात कि अ यह जो इस बारे में मतलब जैसे जो आखरी में मैंने देखा कि जो पूरा जो जो आपका शास्त्रार्थ स्पर्धा चली उसमें जो निर्णायक मंडल था मतलब वह कौन से पहलू थे जिनके आधार पर निर्णय कर सके वह कि आप विजेता है वह कौन से घटक थे जिसके कारण मतलब ये जो विजय आपको प्राप्त हुई हां एक तो ये था प्रश्न उतर था और उसमें एक शालीनता थी हम लोग बात जो है सीधे सच्चे ढंग से रख रहे थे बाकी वो लोग जो है कटता भाष कट भी थी अपने पर नियंत्रण भी नहीं था दूसरा यह भी था कि उनका जो प्रश्न करते थे उसका उत्तर
01:13:42:07 जो है हम लोगों के द्वारा देने के बाद हम प्रश्न करते थे उत्तर नहीं होता था यदि उस पैनल में जो है आर्य समाज की मानसिकता वाले अधिक लोग थे और मैं समझता हूं उसम बहुत विशिष्ट विद्वान भी थे आपके जो है राजस्थान विश्वविद्यालय कुलपति थे वहां के प्रोफेसर थे एक तो वो जो है मंत्र पर तंत्र पर बहुत बड़ा रिसर्च कर रहे हैं वो भी थे तो हम लोगों का यह था कि जो है इसको शास्त्रार्थ ना देकर के बाद संवाद दिया जा सकता है शास्त्रार्थ में आमने सामने टक्कर होती है जब पता लगता है कौन कितने पानी में है ये तो अपना बीच में से कुछ ना कुछ बोलते रहते थे कि तारतम नहीं था उसमें तारतम्य नहीं निंदा ज्यादा थी हम ये कह रहे हैं आप ठीक है महर्षि दयानंद जी है आपके आराध्य पास करय मानिए उनके लिए किंतु हम ऋषि महर्षि हों की निंदा करें उनकी आलोचना करें यह सहन नहीं है हम आपकी दयानंद जी की आलोचना निंदा करें अपने भाषण प्रवचन में तो बात मानी जाए कुछ कहो हमने किसी का नाम मैंने देखा था एक जगह थोड़ा सा मर्यादित हो रहे थे सुन ले इस तरह से तू तड़ाक की भाषा पर आ गए थे हा और अनियंत्रित से हो गए
01:14:57:07 थे जो निर्णायक मंडल है वो कह रहा है कि आप थोड़ा संयम भरती मर्यादित हो जाइए तो वो खड़े होकर के मैं ओपन चैलेंज दे रहा हूं यह सब चीजें वो कर रहे थे देखा था मैंने तो तो वो अहंकार था उका कुछ नहीं है वो तो केवल क्या करेंगे वो जो है कोई मतलब ही नहीं है खैर अच्छा मैंने एक चीज और देखी यहां पर मैंने यह देखा कि यहां पर मतलब प्रॉपर तरीके से आमंत्रित हुए दोनों पक्ष और वहां लिखा है कि वह शास्त्रार्थ हो रहा है शास्त्रार्थ स्पर्धा लिखा हुआ है उसके बाद जब आप वि विजय घोषित होते तो उसमें जो आर्य समाजी पक्ष है वो यह निकाल रहा है कि वो शास्त्रार्थ नहीं था या वो विषय अलग था वो यह था वो वो था और जहां पर एक व्यक्ति प्रश्न पूछने गया है उसको शास्त्रार्थ का नाम देकर तो कितना बड़ा यह जो है जो कहेंगे इसको त्र चरित्र कि एक जगह पर शास्त्रार्थ दूर दूर तक का कोई संबंध नहीं है उसको शास्त्रार्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हो और कह रहे हो कि शास्त्रार्थ में हार गए कौन जगतगुरु शंकराचार्य और दूसरी तरफ जहां पर शास्त्रार्थ लिखा हुआ है आप हारे
01:16:12:14 हुए घोषित हुए हो सामने वाला वि विजय को विजय को प्राप्त हुआ है और वहां पर आप कह रहे हो कि नहीं नहीं यहां विषय दूसरा था य ये था वहा वो था वहा निर्णायक ये भी ये भी हमको सुनने को मिला कि व निर्णायक दूसरा था बताइए नहीं नहीं सभी थे पांच पैनल के थे सब और अधिकांश जो है ना वो हमारे आर समाज की मानसिकता के लोग थे किंतु वो वहा शकर क्षेत्र भगवान का आशीर्वाद है कृपा है तो हा उनकी कृपा से जो है भगवान की कृपा से सब रहा और शास्त्रार्थ नहीं था तो फिर आए क्यों आप निमंत्रण तो शास्त्रार्थ का था ना जी जी जी जी और नहीं साथ चले जाते फिर आप जो है नहीं वो ये मानते हैं व अपनी बारी आने पर ठीक ठीक अपनी बारी आने पर य उसे शास्त्रार्थ मानते हैं कि आप चलती हुई सभा है जो किसी संत की उसमें जाकर के प्रश्नोत्तरी कर लोगे वो शास्त्रार्थ में आपने हरा दिया और जहां पर शास्त्रार्थ के नाम पर आयोजन हुआ है वह शास्त्रार्थ नहीं है यह सिद्धांत है आर्य समाज का हा यदि प्रथम आते ये प्रथम आते तो वो हेडलाइन लिकड़ जाते कि हां आर समाज ने को जीत लिया जो
01:17:27:19 सोरो है बहुत विशिष्ट परंपरा बहुत विद्वान लोग रहते हैं इससे पहले हम जब पहुंचे थे उससे पहले वहा के विद्वान का प्रवचन हो रहा था बड़ा गंभीर प्रवचन था और 15 वो भी बोले और किंतु वो है ना ये होला मचाने लगते हैं तो हम तो ये चाहते हैं जैसे हमारे महाशय जी थे उनके सोरो में जो विद्यालय था धर्मानंद जी अंग्रेजों के समय का था इतने विशिष्ट विद्वान थे वो धर्मानंद जी जी तो ये समझिए अंग्रेजों डीएम वगैरह उस समय होते थे उन्होंने आजीवन प्रधानाचार्य के लिए लिख गए थे आजीवन प्रधानाचार्य रहेंगे वहां के महाविद्यालय के जो प्रधानाचार्य रहे तो हमारे विद्यालय के प्रधानाचार्य महास जी के शिष्य सवर के प्रधानाचार्य जी महाशय जी के शिष्य और धर्म स महाविद्यालय वृंदावन हरिवंश जी है वो भी जो है महाशय जी के शिष्य हमारा पूरा विद्याम से एक ही है और हमको जब प्रथम पुरस्कार मिला तो हमने यह समझा सोर को ही मिला है कि हमारे न्याय इसका आ आशय है हमारा शरीर है उसका जो है अंग कौन है हमारा हाथ है उसका अंग कौन है अंगुली है तो हमारे शरीर के अंग से अंगली भिन्न नहीं मानी जाती वैसे जिस विद्या वंश से हम जुड़े हुए उसी विद्या
01:18:42:24 वंश से सर जुड़ा हुआ है तो हमको जो प्रथम स्थान मिला व सर के प्रथम स्थान है क्यों तद भिन्ना भि भिन हमसे भिन्न नहीं है विद्या दोनों का एक ही है किंतु उस समय ला ज्यादा मचा गए तो इसलिए जो है वो अपने को दूसरा स्थान ले गए बाकी सर का दूसरा स्थानी था उनके उनकी टीम बहुत अच्छी थी और बहुत अच्छा बोले वो ऐसी बात नहीं है कि कभी कभी ऐसा होता आधी में जो है ना वो कुछ चीज उड़ जाती है ऐसा होता हो जाते अंत में जो उनका रोष देखा ना वो जो अपनी पराजय को स्वीकार ना कर पाने की जो जो सदैव रही है इनकी उसमें देखा मैं तुम्हें चैलेंज देता हूं यह है वो है तो अभी देखिएगा मेरे साथ तो हुआ भी है और मैं आपको एक आप तो खैर अनुभवी है आप वरिष्ठ है पर मैं आपको एक जो अपना जो अनुभव है यह वाला यय चैनल वाला क्योंकि इसके माध्यम से हमने प्रचार प्रसार किया और हमने काफी बार पूछा लो इनके गण में जा जा कर के आर्य समाज मंदिर में जा जा कर के अरे एक बात की बात बताऊं एक बार हम इनके आर्य समाज मंदिर में चले गए और हमने साधारण सा प्रश्न कर लिया कि
01:19:58:01 आपके पास ये जो आप कह रहे हैं कि हम वेदों को मानने वाले हैं तो यह वेद मंत्र कैसे आए आपके पास अब आपको अगर वेदों आपको वैदिक होना है तो आपको मानना पड़ेगा कि गुरु शिष्य परंपरा से हमारे पास आए तो आपकी तो अपनी कोई गुरु शिष्य परंपरा है ही नहीं और जिसकी है उस पर आप अविश्वास प्रस्तुत कर रहे हैं कि हम यण को नहीं मानते शंकराचार्य को नहीं मानते तो वो जो दो अरब सा दो अरब वर्ष पूर्व जो चले आ रहे हैं वेद श्रुति परंपरा से तो वो आपके पास आप यदि शंकराचार्य जो परंपरा प्राप्त आचार्य हैं उनको यदि मानने वाले हैं आप तब तो आप वैदिक है वरना आप जो वेदों का अर्थ अगर उनका नहीं मानेंगे जिससे आपको वेद के मंत्र प्राप्त हुए हैं तो फिर आप वेदों को मानने वाले कैसे अ अपने आप को सिद्ध कर पाएंगे क्योंकि मेरे से ही आपको वेद का मंत्र मिला और मेरे से ही आपको वेद का अर्थ मिला आपने मंत्र को मान लिया आपने अर्थ को नहीं माना जब अर्थ को नहीं माना तो फिर आपका मेरे ऊपर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता जब मेरे पर विश्वास नहीं तो मुझसे प्राप्त होने वाले मंत्र पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता
01:21:13:22 और यदि मंत्र पर विश्वास है तो फिर वेद के अर्थ पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता ना होना सिद्ध नहीं होता तो मैंने ये कुछ समीकरण में इसी समीकरण में मैंने मंद में जाक पूछ लिया अब भाई इन्होंने इतना मेरे ऊपर व्यक्तिगत षडयंत्र करना व्यक्तिगत मेरे परिवार के बारे में मतलब बातें करना अलग अलग तरीके की उपाधियां देना और टी का टिप्पणी मतलब व्यक्तिगत धमकियां देना कोर्ट तक की धमकी तक बात पहुंच गई और तो और जिस व्यक्ति से मैंने सर्व प्रथम य पूछा था कि आर्य समाज की परंपरा क्या है उसका मेरे पास फौन आता है वो आ जी मेरे को फोन कर रहा है वो बोल रहा है भैया मेरी नौकरी चली जाएगी मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं लोग मेरे को नौकरी से निकाल देंगे आप वो वीडियो हटा दीजिए पर गुरुदेव ने सिखाया था हमको के जो कर्तव्य का निर्णय जो होता है व्यक्तिगत नहीं होता है भले ही संबंधों का त्याग करना पड़े मगर सिद्धांतों का त्याग ना करना तो ये जो पूरी भा भावुकता वाली पंक्तियां है कि मेरी छोटे-छोटे बच्चे हैं पर हमको समाज के सामने समष्टि रूप से देखे तो हमें सिद्धांत लाना है
01:22:29:02 तो हमने नहीं हटाया उन्होंने हमसे फोन मैं यह देख रहा हूं कि कितने मतलब जो कहते हैं ना दया ये कितने निर्दय हो सकते हैं जो अपने ही व्यक्ति जिसने अपने जीवन भर इनको अपनी सेवा प्रदान की किसी भी रूप में और उसको धमका रहे हैं कि तुमने जो है उसको इंटरव्यू क्यों दिया और उस इंटरव्यू के कारण आर समाज का वो हो रहा है तो आप जो है आपको हमन उसने वही बात बोली जो ये उसको सिखाते रहे उसने वही बात बोली जोय उसको सिखा उसने कहा आर्य समाज गुरु परंपरा को नहीं मानता आर समाज में कोई गुरु परंपरा नहीं है उन्होंने ये कहा इन्होंने उसको ऐसा कर दिया कि वह व्यक्ति आर्य समाजी होते हुए हमको फोन करके यह इनके लिए शर्म की बात है ये इनके लिए शर्म की बात है कि उनका व्यक्ति हमको फोन करके मतलब एक तरीके से कुछ मांगना पड़ रहा है उसको हमसे भैया आप हमारी मदद करिए रक्षा किससे करनी है आर्य समाज से ये स्थिति है तो मैं वही कह रहा था कि अभी आपका जो ये जो शास्त्रार्थ में विजय को प्राप्त हुए ये आप पर भी ऐसा हो सकता है वैसे तो अभी तक किया भी होगा कि व्यक्तिगत हमला करें आपके बारे में टीका
01:23:44:07 टिप्पणी चालू हो यहां वहां अवाय फैलाए आपके विरोध में षड्यंत्र हो तो इन सबके लिए मैं पहले से ही आपको बताऊंगा कि भाई मैं तोसे गुजर आप को तो खैर आप तो बड़े हैं तो आप ही मुझे बताने वाले हैं फिर भी मैं बताऊंगा कि यह सब चीजें ये लोग करेंगे और इन्होंने कई बार की है इसलिए हा ना बिल्कुल जब एक बार रामदेव जी ने जब बहुत ऐसा वक्तव्य दिया ब्राह्मणों के प्रति अन्यों के प्रति तो हमारा जो पुत्र है वो सोशल मीडिया में उसने वीडियो बनाया और 36 चैनल ने जो है उसको प्रसारित किया करोड़ों लोगों ने देखा उनके व्यापार को हानि हुई तो कमेटी उन्होने कहा किय वाले उन्होने जो है सब कुछ आपकी छवि खराब कर रखी है तो सबसे अधिक जो हम लोगों के जो वीडियो था बहुत ही मतलब प्रचारित हुआ करोड़ों लोगों ने देखा देखिए अच्छा ये लोग हा फिर यह लोग जो है उस वीडियो को डिलीट कराने के लिए वहा दिल्ली जाते हैं कोर्ट में हाई कोर्ट में अच्छा हा और भाई इनके पास पैसा है एक से अच्छे लोग थे सब तो हमारे भाई साहब भी जो सुप्रीम कोर्ट से वकालत की हु देखा कि इसमें ऐसा कुछ बात है नहीं को जो इसे
01:24:59:09 निकाला जाए तो इनके जो है वकीलों ने बहस की यूट के तरफ से जो वकील थे उन्होंने बहस की उन्होंने यह कहा कि इन्होंने जो है मंत्र और पुराण धर्मशास्त्र से आपकी बात को काटा है और गलत सिद्ध किया है और आप जो उसी आधार पर उनकी बात को काट दीजिए तो आपका भीय चलाएगा वही हां आप इन की बात का खंडन करें य ना चलाए तो य का दोष है और यह कहां तक संगत हो जाएगी बात जो है शास्त्र का सिद्धांत दे करके जो है आपकी बात को का खंडन किया जा रहा है उसको हम इसको नहीं निकाल सकते य ने नहीं माना व वीडियो आज तक भी चल रही है और हां यह कह आती थी हम यह करेंगे वो करें को धर्म रक्षित रक्षता है इन लोगों से किसी से भय नहीं है हम धर्म रक्षा धर्म हमारी रक्षा करेगा और दूसरा त कहा विरोध है विचारधारा का तो विरोध है शास्त्र का अपने ंग से मनमान ढंग से आप जो है प्रयोग करते हैं उस खंडन करते हैं इसको ऐसा मान लीजिए हमने कहा कि हम मूर्ति पूजा का हम भी मूर्ति पूजा खंडन करते हैं किस परिस्थिति में करते हैं भगवान ने स्वयं कहा है कि जो है कि
01:26:15:06 कि जितने भी प्राणी है उस मेरा दर्शन कीजिए संसार में और उनमें अपनी आत्मा मुनका दर्शन की ऐसी स्थिति हो जाए तो फिर वो जो है मूर्ति पूजा नहीं करनी चाहिए न त समान त पर भूत भगवान की मेरी पू मेरी मूर्ति पूजा जबी तक विहित है जब तक सही प्राणी मेरा दर्शन ना हो हम का मूर्ति पूजन मान रहे है कि उस स्थिति में जाकर के मान रहे है तुम पहले में खंडन करने लगते हो आप ये कहते हो जो तत्व ज्ञानी ब्रह्म जाना ब्राह्मण के जो है बहुत ये तो बहुत व्याख्या करते हैं कि जो ब्र को ब्रह्म को जाने ब्राह्मण हो जाएगा अरे ब्रह्म जाना ब्र बनेगा ब्राह्मण बन कहां से जाएगा तो व्याकरण काही बोध नहीं है बस कुछ शब्द उन्होने सुन लिए रट लिए उसके लिए कहने लगते हैं तो मुझे तो जो है कि ऐसा लगता है कि इनके विषय में विशेष ज्यादा चर्चा करना भी जो है अपने समय को बद करना है क्योंकि सिद्धांत नहीं है सिद्धांत होना तो अच्छा चार सिद्धांत होता है कुछ ना कुछ कोई भी आप दर्शन उठ के कुछ को सिद्धांत नहीं है अच्छा सिद्धांत
01:27:30:06 से मुझे एक बात याद आई आचार्य श्री वैसे यह हमारा विषय नहीं है यह लोग एक जगह कह देते हैं कि ब्रह्म और जीव और प्रकृति में स्वरूप भेद है स्थान भेद नहीं है तो ये अप्रत्यक्ष रूप सेय अद्वैत को ही दूसरे शब्दों में मान रहे हैं क
01:28:08:06 कैसे ये है की वैसे हमारा सिद्धांत है मुक्ति स्वरूप व्यस्थ जी जी ये कुछ दिखा रहे है आपको ये ये आचार्य श्री कीय फेसबुक आईडी है आप यहां से आचार्य श्री से जुड़ सकते हैं और इनका गुरुकुल है संपर्क करके आप जो है जो भी धर्मा अनुष्ठान के निमित्त आप जो है जुड़ना चाहे आचार्य श्री से जुड़ सकते हैं और उनका पूरा यहां पर आपको फेसबुक दिख रहा है संपर्क कर सकते हैं इनका गुरुकुल है बहुत सारे यहां पर आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसे ही आचार्य निर्मित हो रहे हैं जिनका निर्माण हो रहा है इस समय अध्ययनरत है बहुत सारे बच्चे हैं वहां पर और काफी बाल्यावस्था में भी है और किशोर अवस्था में भी है तो आप यहां से जो पूज आचार्य श्री है इनका सानिध्य प्राप्त कर सकते हैं किसी प्रकार से आप जो है इनके गुरुकुल का विकास देखना चाहते हैं तो उसके निमित्त भी इनसे आप संपर्क कर सकते हैं और बहुत अच्छा लगा आचार्य श्री आपका जो है हमें यह व्याख्यान प्राप्त हुआ इतना आपने समय निकाला आप जिस समय मैंने आपको संपर्क किया था उस समय
01:29:23:08 भी आपके यहां को अध्ययन कार्य ही हो रहा था इसमें जो वहां के आपके शिष्य गण थे उस समय पीछे से आवाज आ रही थी और फिर भी आपने वेद का स्वाध्याय हो रहा था उस समय जो है जी जी वेद का उस समय स्वाध्याय हो रहा था ये इग्राम है क्या अच्छा यह आपका य चैनल है शायद हा हाय चैनल है हा दोन एक तो म हा एक तो है दोनों ही जो है तो अभी हो सकता है मुझे दिख रहा है एक करोड़ हमारी एक करोड़ व्यक्ति तक हम लोगों ने जो है अपना सनातन धर्म पहुंचा दिया है बहुत बढ़ महाराज को एक करोड़ व्यक्तियों तक पहुंचा दिया है ये ऐसा उसम लिखा हुआ आ रहा है साथ सोशल मीडिया ने जो है ये अभी की होगी रिसर्च तो एक करोड़ लोगों तक हमारा ये वक्तव्य पहुंच चुका है और हम चाहते हैं कि जो है एक अरब तक तो कम से कम पहुंचे हीस बिल्कुल बिल्कुल भगवान से सता है जी जी जी आचार्य श्री का य चैनल है अभी जो आपको दिखाया गया तो आप आचार्य श्री का जो ज्ञान ज्ञान है उसको प्राप्त करने के निमित्त आप वहां
01:30:38:13 पर जुड़ सकते हैं उन्हें फॉलो कर लीजिए और हम आचार्य श्री से यही आशीर्वाद मांगेंगे कि हम जो अभियान लेकर के चल रहे हैं हिंदू राष्ट्र के लिए और जिसके लिए हम जो है सनातन समाज को जागरूक करते हुए उनका जो सार्वभौम सिद्धांत है वास्तविकता में सनातन धर्म क्या है यह बताते हुए जो समाज में एकत्व लाने का प्रयास कर रहे हैं वो उस प्रयास में हम लोग सफल हो पाए आशीर्वाद हमें प्रदान करें और जी में जो है एक लोक के साथ संघार करते हैं इस विषय का जो है जी जी बल सत भव भूत भारते धर्म भाव प्रसन भूते भारती प्रताप प्रत धर्म चर्चा नित बाधा पामर संप गीत बिल सत भूते भारते धर्म भावा हमारे भारतवर्ष के प्रत्येक घर में प्रत्येक घर घर में जो है सनातन धर्म की विजय पताका फराई जाए भारत बिल सत भव भूत भारते धर्म भावा भारत में जितने भी घर है विश्व
01:31:53:26 जितने भी घर में घर घर हमारे सनातन धर्म की गुज होनी चाहिए और प्रसन भ भारती प्रतापा धर्म चर्चा के साथ साथ हमारा प्रताप भी बढ़े हमारा सौर्य तेज है तपस्या है जो कुछ है व रा दिन दना रात चना बढ़े और प बंद धर्म चर्चा जो आप सा चर्चा हुई यह धर्म चर्चा घर घर फैले जी धर्म चर्चा आध्यात्मिक चर्चा चली जो धर्म की चर्चा चली है जो भव बंधन को काटने वाली है मुक्ति को देने वाली है ये जो चर्चा है वो भी घर घर में चले केवल शौर्य से काम नहीं चलेगा क्योंकि हमारा जो भारतवर्ष आध्यात्मिक प्रधान भारत वर्ष है और निप तत मत बाधा जो जो है निप तत मत बाधा जो मतवाद है देखो जो जो मत होता है ना व अपने मन माने ढंग से हो जाता है कि मते इष्टम मान इष्टम मान अभिम मान अमत जो अपने अच्छा लगता लो बना लेते हैं उसका पतन हो पामर ही संप गीता पामर माने मूर्खों के द्वारा बनाया गया है वो मत मत मत मजब है संप्रदाय तो अपने जो व्यक्ति आकांक्षा को लेकर अपने मनमा से बना देते हैं
01:33:08:26 उनका जो विनाश हो और सनातन धर्म की जय हो जय बहुत बहुत आपका आभार बहुत सारा आपके चरणों में बार-बार प्रणाम आचार श्री जो आपने हमें जो है अपने जो है कृतार्थ वो आपका ये वक्तव्य व्याख्यान प्रदान किया और इतना समय दिया आपका बहुत-बहुत आभार और दर्शकों से मैं कहूंगा यह थे हमारे आचार्य श्री जो सोरो में अभी कुछ दिन पूर्व जो शास्त्रार्थ स्पर्धा आयोजित हुई थी जिसमें कि यह प्रथम स्थान पर इनको जो है विजय प्राप्त हुई और सामने इनके आर समाज भी था जो कि इनसे पराजित होते हुए द्वितीय स्थान उसको किसी प्रकार से प्राप्त हो गया और बहुत ही रोचक कुछ दृश्य है जो आचार्य श्री के जो फेसबुक है उस पर भी पड़ा है और भी कहीं से उसकी वो कुछ दृश्य मिल जाएंगे बाकी जो सर्वशक्तिमान वाली जो हमारी कहानी है वो उस शास्त्रार्थ में भी आपको देखने को मिलेगी ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है उसके सामने आ यदि आपने बाधा लगा दी तो आबाद नहीं है अनंत सामर्थ्य वान नहीं है सर्वशक्तिमान नहीं है व श्
01:34:24:00 ही नहीं है और जब वह ईश्वर ही नहीं है तो फिर वह उसे प्राप्त करने के निमित्त जो आपको धर्म के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है वह धर्म नहीं धर्मा भास तो बहुत बहुत आभार आचार्य श्री आपका आने का और सभी को जय श्री राम जय श्री राम सनातन धर्मो विजयते राम सनातन धर्मो विजयते सताराम
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शास्त्रार्थ विजेता आचार्य ज्ञानेन्द्र शर्मा जी #aryasamaj #gurukul #vedpuran #hindu
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