Used:
SRT: ⬇ SRT ⬇ Original file

.srt or .vtt (Hindi). The old file is backed up. After that the match for this video is rebuilt (may take a few minutes, keep the page open).

⬜ Not used yet · 00:00:01:03 – 00:00:15:18 (0:14)

00:00:01:03 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। मेरी आवाज सभी को आ रही है तो अगर कोई दुविधा है तो कमेंट करके बता दें एक बार और

00:00:15:18 पुनः प्रारंभ हो चुका है। जो पाखंडी के द्वारा गीता का अनर्थ किया गया है।

⬜ Not used yet · 00:00:23:18 – 00:01:03:18 (0:40)

00:00:23:18 उसका सेकंड जो सीजन है हम लेकर आए हैं और पांचवे अध्याय से आज शुरुआत होनी है और चौथा अध्याय पूरी तरीके से हम लोगों ने पहले पढ़ लिया है और उसमें बहुत सारी विस्मयादि बोधक स्थितियां आती हैं जब आप आश्चर्यचकित हो जाते हैं और कहीं-कहीं पर आप अपनी हंसी रोक नहीं पाते हैं। इतनी ज्यादा फंटूष फंटूस गिरी दिखाई है रामपाल महोदय ने वो गरिमा गीता की को लिखते हुए और

00:01:03:18 मैं बस एक बात की चेतावनी आप लोगों को देना चाहता हूं कि आप लोग जो अपने दिमाग को पंचर करने का कष्ट सह सकते हैं वही इस सीरीज को देखें अन्यथा बूढ़े बच्चे और गर्भवती महिलाएं तो विशेष रूप से दूर रह क्योंकि बहुत ज्यादा हॉरर और वैसा भी है। इस तरह का जो भयावह ऐसा कष्ट होता है इसने जो शटर घोट की है गीता का अर्थ करते समय तो आप परेशान हो जाएंगे कौन सी गलती पर मैं बात करूं कहां

⬜ Not used yet · 00:01:37:20 – 00:04:44:12 (3:07)

00:01:37:20 से चालू करूं है ना तो आज का टॉपिक क्या है शायद आप लोगों को नहीं मालूम है टॉपिक मैं बता देता हूं एक बार रिवाइज करा देता हूं एक हमने सीरीज चालू की थी जिसमें कि रामपाल ने भग भगवत गीता का एक एक श्लोक का जो अर्थ किया है गरिमा गीता की नाम की जो उसने अज्ञान गंगा जैसी पुस्तक लिखी है तो हमने वहां पर उस पुस्तक को लेकर के एक एक कंपेरेटिव बात की करना शुरू किया था कि भाई ये एक एक श्लोक में देखिए किस प्रकार से झोल कर रहा है किस प्रकार से झूठ बोल रहा है तो वो हम लेकर के चल रहे थे उसके माध्यम से कुछ चीजें हो रही थी कि एक गीता का भी अध्ययन हो जा रहा था हमारा और रामपाल ने जो शटर घोट कर रखी है। उसका भी थोड़ा सा आनंद आ जाता था और तो कुछ है नहीं। ऐसा कुछ खास आनंद आने वाली बात है। तो वो आप ले सकते हैं। तो इसमें जब जैसे पिछले सप्ताह हमने जब किया सेशन तो उसमें 4 13 या 14 से स्टार्ट करके और 4 जहां तक वो चैप्टर है चौथा अध्याय वहां तक पढ़ा। तो जब आज शुरू करेंगे तो पांचवे

00:02:53:01 अध्याय से शुरुआत करेंगे। तो पिछली बार के जो सूत्रात्मक और जो मोटे मोटे पॉइंट्स थे अभी सबसे पहले रिवीजन में आपको बता देंगे। तो अब क्योंकि यह लास्ट एपिसोड बहुत दिन पहले हुआ था। करीब मेरे मुझे लगता है छ सात महीने हो चुके होंगे या उससे भी ज्यादा हो चुका होगा। तो आज हम आपको जहां पर वो लास्ट एपिसोड में जो यही 4.15 वगरा से जहां से छूटा है और 4 पॉइंट लास्ट तक मतलब चौथे अध्याय में जितने श्लोक होते हैं वहां तक मेरे ख्याल से 42 है तो वहां तक चौथे अध्याय के वहां तक श्लोकों की जो हमने एक समरी है वो मैं आपको दे दूंगा कि इन्होंने 4.13 से लेकर के क्या शटर घोट किए 4 42 तक उसके बाद फिर हम पांचवा अध्याय का पांचव अध्याय का अध्ययन शुरू करेंगे जो इसने जेलधाम वासी बाबा ने अब तो जेल कट्टू नहीं रहा फिलहाल जेल की सीमा से बाहर है तो उसने जो शटर घोट कर रखी है उसका आनंद लीजिए और जुड़े रहिए सीट की पेटियां बांध लीजिए कमर कस लीजिए क्योंकि बहुत से धमाके होने वाले हैं। अच्छा तो

00:04:08:16 मोटे मोटे पॉइंट्स मैं आपको बता रहा हूं। सबसे पहली बात है 43 में चार 13 हम सबसे पहली

00:04:44:12 बात है कि चार 13 में जो गीता कहने वाला है उसे कहा गया है अकर्ता। समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। अब अकर्ता इसलिए कहा जाता है क्योंकि आगे के श्लोकों में बता रहे हैं क्योंकि मेरी कर्म के फल में आसक्ति नहीं होती है। कर्मों में लिप्त नहीं होता मैं। यानी कि क्योंकि उनको कुछ भी पाना शेष नहीं है। कुछ भी ऐसा नहीं है। अगर भगवान श्री कृष्ण के अकॉर्डिंग देखें तो उनको कुछ भी शेष नहीं है कुछ प्राप्त करना। इसलिए कर्मों को करते हुए भी वह अकर्ता है क्योंकि कर्मों के जो फल प्राप्त होने उसमें उनकी बिल्कुल भी रुचि नहीं है। आसक्ति नहीं है। तो यह तो श्री कृष्ण के भगवान के पर्सेक्टिव से तो सिद्ध हो जाता है। पर यदि इनके काल के अनुसार देखें कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे करता जान तो उसमें आपको काल को काल को तो पाना है। को तो डेली सवा लाख वो जो जीव है उनको हत्या करनी है उनको खाना है उनको पीसना है उनकी दुर्गंध लेनी है जो भी है मैल खाना है उनका तो उसको तो खाना है तो वो अकर्ता नहीं हुआ तो यह चार 13 वाला इन्होंने खा लिया चार 13 वाला बाबा जी ने चार 13 के बारे में बात ही नहीं की जिसमें कि गीता कहने

00:05:59:15 वाले को अकर्ता कहा गया खैर ये इतनी लेवल की बात इनको समझ में आया तब तो उस पर बात करें इतनी गढ़ विषयों पर एक बात तो तब करेंगे ना जब समझ में आएंगे तो हर जगह एक ही बात ले आएंगे कि भैया तत्व ज्ञान क्या है कि उसका नाम किस प्रभु की भक्ति करनी है किस नाम को जपना है यही तत्व ज्ञान तत्व ज्ञान यही है ये हर जगह बस ये यही ले आएंगे यही इनका तत्व दर्शन है और इनको कुछ नहीं पता

⬜ Not used yet · 00:06:26:02 – 00:06:55:01 (0:29)

00:06:26:02 और फिर वही वाली बात कि बबीता हमारी माता है और हमको कुछ नहीं आता है ये नारा लगाया करते हैं फिर रामपाल जगहजगह और रामपाली खैर अ 43 का अर्थ करते समय इन्होंने चार

00:06:55:01 13 का अर्थ करते समय इन्होंने जो आसक्ति रहित वाली बात है गायब कर दी। अकर्ता वाली बात है वह गायब कर दी। गीता वक्ता का अकर्ता होना गायब कर दिया। और ठीक से देखा जाए तो 43 पर बात ही नहीं की है बहुत ज्यादा। 424 में क्या किया है इन्होंने? चार 24 का देखते हैं क्या किया है। चार 24 का इन्होंने शब्द अर्थ नहीं किया क्योंकि शब्दार्थ तो इनके पल्ले पड़ेगा नहीं। तो भाव यह है कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। क्योंकि वह तत्वज्ञानी साधक शास्त्र विधि रहित मनमाना आचरण नहीं करता इसलिए उसके वचन कर्म परमात्मा के गुणगान में करने में तथा सर्व समय प्रभु चिंतन में ही लीन रहता है। तो अपना पूरा घपड़ घसला इन्होंने कर दिया। जबकि चार 24 में कहा जा रहा है कि

00:07:56:21 जिस यज्ञ में करने वाला भी ब्रह्म है, सामग्री भी ब्रह्म है, क्रिया भी ब्रह्म है। तो ऐसे यज्ञ से फल स्वरूप प्राप्त होने वाला जो फल है वह भी ब्रह्म है। तो उसमें सब कुछ ब्रह्म ही है। यह बात कही जा रही है। यह इनके आउट ऑफ आउट ऑफ सिलेबस की बात है रामपाल के लिए। तो वह समझ कहां से पाएंगे हमारे तीरछादर्शी जी? तो यह सब बातें कर रहे हैं। दूसरी बात अब एक एक बात यह भी है कि यह कह रहे हैं कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। सारे कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। और यहां पर इसने भैया जो चौथे श्लोक में 23 24 चौथे अध्याय के 23 24 वे में ब्रह्म का अर्थ परमात्मा माना है। वैसे ब्रह्म को कहता है वह तो काल ब्रह्म है। मगर यहां पर ब्रह्म का अर्थ इसने परमात्मा मान लिया। अच्छा

⬜ Not used yet · 00:08:50:24 – 00:09:42:14 (0:52)

00:08:50:24 और दूसरी बात कि सारे कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। इसका अर्थ क्या है कि जो व्यक्ति भक्ति कर रहा है वो क्या सर्वशक्तिमान बन जाता है? कहने का अर्थ क्या है यहां पर? तो वो मुश्किल बात है समझ पाना। इसके बाद और विस्तृत में जानना हो तो आप हमारा चौथे चैप्टर का जो लास्ट एपिसोड है सेवंथ एपिसोड इस सीरीज का उसमें आप देख सकते हैं। है ना?

00:09:28:04 अच्छा फिर उसके बाद एक आगे चलते हैं तो वेदों व गीता जी में वर्णित साधना से पाप विनाश नहीं होते। तो यह कह रहा

00:09:42:14 है कि वेदों और गीता जी में वर्णित साधना इसने लिखा है। यहां देखिए इससे सिद्ध है कि वेदों व गीता जी में वर्णित साधना से पाप विनाश नहीं होते। भोगने पड़ते हैं। अन्य उपलब्धियां जैसे सिद्धियां व स्वर्ग महा स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। मतलब पाप नाश नहीं होते। अब पहली बात तो यहां पर फिर वही बात है कि यह सिद्धियां प्राप्त हो जाती है। यानी यह जो भौतिक संसार के जो फल है वो मिल जाते हैं। सांसारिक सुविधाएं आपको मिल जाती हैं। स्वर्ग महास्वर्ग भी मिल जाते हैं। परंतु पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती। अब बात यह आती है कि इन्होंने सूक्ष्म वेद के रूप में उसको भी कहा तो वेद ही है। तो फिर अगर वेद से मुक्ति नहीं मिलती तो फिर सूक्ष्म वेद से भी नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि वेद तो वो भी है। तो बाबा जी कुछ अपनी बातों को काउंटर करते चले हैं। खैर अब इन्होंने वेद में इन्होंने नेति नेति की बात की है कि भाई वेदों में लिखा है कि नेति नेति करके बताया जा सकता है। पूरी तरीके से नहीं बताया जा सकता। तो जब हम इनसे पूछते हैं कि भैया जब कबीर जहां पर खड़ा था वह जगह किसने बनाई तो ये भाग लेते हैं। कम से कम इनसे ज्यादा आगे तक तो हमारे आचार्य गण बहुत कोई

00:10:57:15 भी जितनी भी प्रामाणिक परंपराएं हैं सब सारी ऐसी परंपराएं जो जिनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं है। जहां तक यह बात करता है। कबीर पड़ा है अनामय अनामय लोक से आ जाता है। सतलोक में फिर वो सतलोक बनाता है। अनामय लोक किसने बनाया भाई?

⬜ Not used yet · 00:11:14:02 – 00:11:31:22 (0:18)

00:11:14:02 जहां वह खड़ा है वह किसने बनाया? तो यह [गला साफ़ करने की आवाज़] तत्व ज्ञान की बातें इनसे करना मूर्खता है। जैसे दीवार में शर्मना इसके बाद आ जाते हैं 98 वे पेज पे। फिर

00:11:31:22 यहां पर इनका अपमान किया इसने। ने रजगुण, ब्रह्मा, सतगुण, विष्णु, तमगुण, शिव आदि आदि देवताओं की पूजा करने वाला वाले राक्षस को धारण किए हुए हैं। अब देखिए वही वाली बात है कि यह जो गुण है यह सीधे-सीधे इनको जो है जो भगवान है वही उनको गुण के रूप में एक व्यक्तित्व बना दे रहा है। गुण को अगर व्यक्तित्व बना दे रहा है तो यह गुण हमारे साथ भी चल रहे हैं। दूसरी बात यह भी है गुण के रूप में मतलब जो ब्रह्मा विष्णु महेश है वो सर्वव्यापी है। ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है। ब्रह्मा विष्णु महेश सर्वव्यापी है क्योंकि वह गुण है और गुण तो सब जगह व्याप्त है। सबके पास गुण है कुछ ना कुछ। दूसरी बात यह है कि गुणों से प्रभाव जो उत्पन्न होते हैं जैसे कि व्यभचार करना इत्यादि ये सब जो होते हैं। तो यह काल काल में भी इसकी स्टोरी के हिसाब से रामपाल की स्टोरी के हिसाब से काल में भी व्यभचार का प्रभाव उत्पन्न हुआ था। इसका मतलब कि काल भी सतरज या तम गुण से प्रभावित था। इसका अर्थ यह मानना पड़ेगा कि काल से पहले ब्रह्मा विष्णु महेश थे रामपाल के ही अनुसार तो इसका अर्थ ये हो गया कि काल ने इनको नहीं बनाया काल ने इनको उत्पन्न नहीं किया इनहीं के अनुसार ठीक है खैर यहां इसने अपमान किया है और

00:12:47:13 फिर चार के 31 32 श्लोक में लिखता है कि चार के श्लोक 31 32 में कहा है कि गीता अध्याय चार श्लोक 25 से 30 तक वर्णित शास्त्र साधना से बचे हुए साधक शास्त्र विधि अनुसार अर्थात नाम साधना करते हैं। तो यह जो यज्ञ का बचा हुआ जो होता है उसको यह कह रहा है कि वह जो शास्त्र विरुद्ध साधना है उससे बचे हुए जो चीजें हैं उससे बच के अब जो है उनका विरोध करके जो शास्त्र विरुद्ध साधना है वो कहां से कहां तक बताई है इसके अनुसार श्लोक 25 से 30 तक शास्त्र विरुद्ध चीजें बताई गई है कि क्या-क्या नहीं करना है तो उनसे बचा हुआ जो साधन है उसका जब आल लेते हैं तो आपको फल की प्राप्ति होती है।

00:13:44:02 अब बात यह आती है कि श्लोक 25 से 30 में यज्ञ करने को कहा गया है। तो यज्ञ तो शास्त्र सम्मत साधना है। फिर यज्ञ को इसने शास्त्र विरुद्ध कैसे कह दिया? यज्ञ का अर्थ जो है भक्ति भी है। है ना? पेज नंबर 40 पर इसने 3.1 में माना है यह बात रामपाल ने इसी में गरिमा गीता की तो क्या भक्ति शास्त्र विरुद्ध होती है? अच्छा बचे होने का अर्थ क्या है? बचा होना क्या बच गया है? कौन सा मटेरियल है जो बच गया है? जो बचा है उसका अमृत पान किया जा रहा है। निषेध

00:14:23:13 धर्म को जानने वाले मुक्ति नाम जप बिना यज्ञ करने को कौन बोला? अगर यह यज्ञ को नाम जप से अलग मानता है तो यह किसने कहा है कि अपने इष्ट का जो नाम है या मंत्र है वह जाप नहीं करना है। यदि यज्ञ करना है तो तो यज्ञ को इसने यहां पर शास्त्र के विरुद्ध खड़ा कर दिया यज्ञ को। यज्ञ को इसने शास्त्र के विरुद्ध खड़ा कर दिया। तो यह भी एक सोचने वाली बात है कि यज्ञ शास्त्र के विरुद्ध कैसा हो? कैसे हो गया? अच्छा

00:14:59:18 नाम जप बिना यज्ञ निष्फल होता है। कहां लिखा है? यह भी बात सोचने की है कि नाम जप के बिना जो यज्ञ है वह निष्फल हो जाता है। क्योंकि यज्ञ में जो मंत्रो उच्चारण होते हैं वह अपने आप में ही नाम जप होता है। दूसरी बात यह है कि काल ने जब तप किया था तो उसने कौन सा नाम जप किया था जिससे कि वह फलित हो गया था। काल को उसने उन्होंने कबीर जी ने जो मांगा था दे दिया था ना तो कौन सा वह था जो फलित हो गया था। अभी रहने दीजिए। जी अभी बुलेट पॉइंट्स चल रहे हैं। मैं बुलेट पॉइंट्स बता रहा हूं सातवें एपिसोड के। अच्छा इसके बाद आगे चलते हैं। तो

00:15:38:24 अगर काल ने जो तप किया और वो फलित हुआ तो इन्होंने कहा फलित किसका होता है? जो तत्वज्ञानी होता है। तो यहां से भी काल रामपाल के ही शब्दों में तत्व ज्ञानी भी सिद्ध हो जाता है। तो ये करना क्या कहना क्या चाहते हो रामपाल जी? कह रहे हो कि वो तत्व ज्ञानी नहीं है। फिर कह रहे हो तत्व ज्ञानी है। तुमने अभी बताया ना

⬜ Not used yet · 00:16:02:02 – 00:16:49:20 (0:48)

00:16:02:02 इससे पहले वाले में ही कि भैया जो साधन वाली बात अभी आई थी ना कि वो जो साधन होता है शास्त्र सम्मत भक्ति करते हैं। अभी बात चल रही थी ना तत्व ज्ञानी होते हैं। हम

00:16:42:07 ये 3132 में शास्त्र

00:16:49:20 विरुद्ध साधना से बचे हुए साधक शास्त्र विधि अनुसार नाम साधना करते हैं और यहां पर अभी कहीं पर इनको तत्व ज्ञानी भी कहा गया था तत्व ज्ञान के आधार पर है ना तो वो तत्व ज्ञानी होते हैं कौन जो जिनको फल की प्राप्ति होती है वो तत्व ज्ञानी होते हैं तो काल को तप के फल की प्राप्ति हो गई थी क्योंकि कबीर ने काल की बात मान ली थी तो कबीर दास जी ने जब काल की बात मान ली तो उसको फल उसका जो किया जाने वाला यज्ञ था वो फलित हो हो गया फलित हो गया तो इसका मतलब काल जो है वह तत्व ज्ञानी सिद्ध हो गया। बाबा जी के अनुसार ही काल तत्व ज्ञानी भी सिद्ध होता है। हम लोग पहले भी पहले के चैप्टर आप देखेंगे कई बार अपनी आप हसी को रोक नहीं पाएंगे। वहां पर भी कई बार काल तत्व ज्ञानी सिद्ध हुआ है। बाबा जी की किताब के अनुसार ही तो इस पर ठोको ताली।

⬜ Not used yet · 00:17:40:04 – 00:18:37:01 (0:57)

00:17:40:04 अच्छा अच्छा इसने एक बात और कही है 432 में कि 432 में इसने कहा है कि ब्रह्मन का जो अर्थ होता है वो ब्रह्म ब्राह्मण का जो अर्थ होता है 432 में इसने कहा है कि ब्रह्मन का अर्थ जो होता है वो वेद नहीं होता है। जबकि निरुक्त में ब्रह्मन का अर्थ वेद लिखा हुआ है। यह हम कई बार दिखा चुके हैं।

00:18:22:12 चार वेद भी काल को पूर्ण परमात्मा ने दिए थे। वह कबीर वाणी नहीं। स्वयं एक ही शब्द के अलग-अलग जो

00:18:37:01 यह क्या करता है कि खुद ही ब्रह्म का अर्थ यह कई जगह पर सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा मानता है और कहीं पर ब्रह्म का अर्थ कहेगा कि नहीं नहीं ये तो काल ब्रह्म है। ब्रह्म का मतलब काल ब्रह्म और जब बात होगी परम ब्रह्म की तो वहां परम लिखा होगा या सच्चिदानंद घन ब्रह्म की बात होगी तो वहां लिखा होगा। तो यह अपनी बात को ऐसे काटता चलता है। इसने कई जगह किताबों में अपनी किताब में ब्रह्म का अर्थ सच्चिदानंद घन ब्रह्म भी लिया है और कई जगह इसने किताबों में अपनी में ब्रह्म का अर्थ जो है काल ब्रह्म भी लिया है। तो ठोको ताली। अच्छा अब इससे और आगे चलते

⬜ Not used yet · 00:19:11:27 – 00:19:27:25 (0:16)

00:19:11:27 हैं। थोड़ा सा ये वाला जो मैं पढ़ रहा हूं ना यह पुराना भी है। तो इसलिए थोड़ा सा वहां से एज इट इज चीजें उठाना थोड़ा सा कठिन होता है। फिर भी मैं कोशिश कर रहा हूं। 433 से 35 में इसने क्या कहा है? विभिन्न यज्ञों के उस ज्ञान को यह सबसे जरूरी बात है

00:19:27:25 कि यह जो दावा करता है रामपाल तत्वदर्शी का वह करता है कि 434 में तत्वदर्शी के पास जाने को कहा है। हालांकि अगर आप दो 16 को देखेंगे तो उसमें तत्वदर्शी उसको कहा गया है जो यह बात जानता हो कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता। असत का कभी भाव नहीं होता। और यह बताने वाला वहां पर काल है 216 में क्योंकि काल ने गीता बोली है रामपाल के अनुसार। इसका मतलब काल यह बात जानता है कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी नाश असत का कभी भाव नहीं होता और सत्य का कभी अभाव अभाव नहीं होता। तो काल ये बात जानता है क्योंकि वो अर्जुन को ये बात बता रहा है। इसका मतलब दो 16 के हिसाब से काल तत्वदर्शी सिद्ध होता है। तो कई तरीके से काल जो है तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा है। कैसे कि जिसकी साधना फलित हो जाती है वो भी तत्वदर्शी होता है। क्योंकि उसके पास तत्व ज्ञान है। इसीलिए उसकी साधना सिद्ध हो गई। तो काल की साधना तो सिद्ध हुई थी ना। उसने तप किया था। कबीर ने उसकी बात मान ली थी। तो इस प्रकार से भी वह तत्वज्ञानी सिद्ध होता है। और भी पीछे आप रिकैप देखेंगे तो आपको कई जगह बहुत हास्यास्पद घटनाक्रम मिलेंगे और जो यह है ना रामपाल का काल यह तत्वदर्शी सिद्ध होगा। बहरहाल 4:34 का ये लोग बहुत डंका पीटते हैं कि

00:20:42:26 तत्वदर्शी कहा गया है। किसको? तत्वदर्शी के पास जाने को कह रहे हैं। अच्छा तत्वदर्शी के पास जाने को क्यों कह रहे हैं? क्या जानना है? तो 433 में ज्ञान यज्ञ की बात हो रही है। चार 34 से पहले ज्ञान यज्ञ की बात हो रही है। उसके बाद 434 में कहा जा रहा है कि विभिन्न यज्ञों के उस ज्ञान को तू तत्वद से जान। अब ज्ञान यज्ञ के लिए ही रामपाल लिख चुका है ज्ञान यज्ञ से भी मुक्ति नहीं होगी। पांच प्रकार के यज्ञ उनमें से किसी से भी मुक्ति नहीं होगी। तो जब ज्ञान यज्ञ से मुक्ति ही नहीं होनी है तो इसका मतलब और फिर ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला तत्वदर्शी है गीता के अनुसार तो फिर क्या यह लोग यह भी मानते हैं कि रामपाल के द्वारा मुक्ति नहीं होगी क्योंकि तत्वदर्शी तो वो सिद्ध हो रहा है रामपाल के अनुसार जो मुक्ति का ज्ञान नहीं दे सकता। दूसरी बात यह है कि 435 में ही यह कहा गया है कि जब तू तत्वदशी की शरण में जाएगा तो वह तुमको ऐसा ज्ञान देगा जिससे पहले तू पूरे संसार में पूरे संसार में मुझको और फिर बाद में स्वयं को देखेगा। तो यहां जो मोक्ष की जो धारणा होती है ना वो आती है। तो फिर क्या ऐसा कहीं पर आपने आज तक किसी रामपाली को देखा है क्या

00:21:57:27 कि वो यह देख रहा हो कि सब जगह ईश्वर है। वो तो ईश्वर को सब जगह नहीं मानते। उसकी शक्ति को मानते हैं। वो बात अलग है कि वही सिद्धांत फेल हो जाता है। मगर ये अभ्रामिक आईडियोलॉजी से चलते हैं। तो ईश्वर को सब जगह नहीं देखते। तो फिर यहां चार 35 वाला ज्ञान कहां चला जाएगा? तत्वदर्शी तो वही ज्ञान देगा जिसमें ईश्वर सब जगह दिखाई दे। ईश्वर तो सब सब में ईश्वर दिखाई नहीं दे रहा है। तो यहां भी इनका ज्ञान पिट गया। यह सारी बातें हो गई। दूसरी बात तत्वदर्शी की बात बता दूं। रामपाल की ही किताबों में कबीर की वाणी को प्रस्तुत करते हुए तत्ववेत्ता कहा गया है वशिष्ठ जी को। ब्रह्म पुराण में तत्व ज्ञानी कहा गया है व्यास जी को और अनेकानेक जगह तत्वदर्शी हमारे ऋषि महर्षियों को कहा गया है इस शास्त्र चोर शास्त्र की चोरी करने वाला इस शास्त्र चोर रामपाल को नहीं कहा

⬜ Not used yet · 00:22:50:24 – 00:23:22:09 (0:32)

00:22:50:24 गया है ना अच्छा चार 36 में क्या कह रहे हैं

00:23:22:09 तत्वदर्शी से नाम दीक्षा लेने की अच्छा हां एक बात और है 437 में इसने फिर ये कहा है कि तत्व ज्ञान को जानकर तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर साधना करने से साधक के पाप कर्म भस्म हो जाते हैं। मगर यहां पे तत्वदर्शी से नाम दीक्षा लेने की कोई संस्कृत अवेलेबल नहीं है। श्लोक में अपने मन से जहां जो चाहा वो ये ठोक देता है। इसके बाद आगे चलते हैं। तो इसने जो है चार 39 में क्या है कि इंद्रियों पर संयम करके उससे आगे का सूक्ष्म वेद वाला संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है। तत्व ज्ञानी कौन कौन करता है? तत्व ज्ञानी उस तत्व ज्ञान को तत्व ज्ञानी से प्राप्त करके साधक शीघ्र ही ब्रह्म साधना से होने वाली गति से दूसरी गति होने वाली परम शांति को प्राप्त हो जाता है। यह चार 39 में आ गया। तो अब इसने इंद्रियों पर संयम करने को स्वीकार कर लिया। तो यह क्या करता है? कई जगह पर इंद्रियों के संयम इंद्रियों को संयम में लाने का खंडन करता है। और उसको नाम देता है कि हट योग है। अपनी इंद्रियों पर संयम करो ना। यह हट ही हो गए तो इसका हमें अनुसरण नहीं करना है और फिर कहीं दूसरी

00:24:37:10 जगह मान भी लेता है। तो यह इनका ज्ञान है रामपाल का। ये इस किताब को जब आप पढ़ेंगे ना तो इस इतनी जगह दिमाग पंचर होगा। उसने हर दूसरी लाइन में खुद को ही काटा है। और किसी को नहीं काटा है। खुद को ही काटा है। ठीक है? अभी आगे देखिएगा मजा आएगा। आनंद आ जाएगा। अच्छा फिर एक इसका कुल मिलाकर के अर्थ है यह तत्व ज्ञान जो कहता है वह कहता है नाम दीक्षा को और 40 में

00:25:10:24 चार 40 में क्या कहता है यह विवेकहीन यानी जिसको तत्व ज्ञान नहीं मिला यानी कि नाम नहीं मिला तो इसका मतलब है कि तत्व का मतलब है इसका मतलब नाम दीक्षा तो अब यह पूरा वैदिक वांग में उठा के ये दिखा दें कि तत्व ज्ञान का मतलब नाम दीक्षा कहां पर लिखा हुआ है? मैं चैलेंज दे रहा हूं पूरे रामपाली गैंग को। तत्व ज्ञान का मतलब नाम दीक्षा कहां पर लिखा हुआ है? तुम बता दो मुझे। ठीक है? तत्व ज्ञान का मतलब भागवत में श्लोक आया है। मैं वहां से आपको बता दूं कि तत्व किसे कहते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] और जब तक वो संशय समाप्त नहीं होगा कि भाई अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह सब जगह होना चाहिए। अगर वह सब जगह नहीं है उसकी शक्ति है सब जगह तो फिर वो शक्ति या तो बराबर हो जाएगी फिर वही दूसरी चीजें हो जाएंगी। बहुत सारे क्वेश्चन रेज हो जाएंगे। इसको कहते हैं संशय और इस प्रकार के संशयों का निराकरण करता है गुरु तत्व ज्ञान देकर के। यह तात्विक बातें हैं कि भाई अगर ईश्वर एक जगह खड़ा है तो पूरी दुनिया में कंट्रोल कैसे कर रहा है? अगर आप कहोगे कि मन से सोच कर कंट्रोल कर रहा है तो यानी कि उसकी सोच पूरे संसार में फैली

00:26:25:27 हुई है। वो जो सोच है उसको ईश्वर के बराबर सामर्थ्यवान होना पड़ेगा। तो दो दो पदार्थ हो जाएंगे। दो तत्व हो जाएंगे। एक तो स्वयं ईश्वर और एक उसकी सोच क्योंकि आपने उसको अलग माना है या फिर यह मान लो कि ईश्वर ही सोच के रूप में सर्वत्र व्याप्त है तब तो मान लिया जाएगा मगर तुम्हें तो अब्राहमिक आईडियोलॉजी फैलानी है वो कुरान और बाइबल फैलानी है तो तुम क्यों मानोगे ये बात कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है तो इसलिए तुम अपनी ये अध कचरी सी और घटिया टाइप की ये जो फिलोसफी है उसी को कहते रहोगे यही तत्व ज्ञान है मुझसे नाम दीक्षा ले लो यह तत्व ज्ञान

00:27:05:25 ठीक है। अच्छा श्रीमद् भागवत में तत्व ज्ञान किसी और चीज को कहा गया है।

⬜ Not used yet · 00:27:16:28 – 00:27:39:25 (0:23)

00:27:16:28 इससे आगे चलते हैं। 442 में कहा गया है कि अब देखिए

00:27:39:25 अपने हृदय में उत्पन्न अपने संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर अब देखिए इसने मान लिया कि 4:42 में काल यह कह रहा है कि तू भक्ति कर और भक्ति करने के लिए कमर कस है ना देखिए क्या कह रहा है विवेचन देखिए यह कह रहा है 4:42 में एक मिनट 442 आप खोल दीजिए 101 पेज नंबर 101 पीडीएफ का यह 442 में कह रहा है कि गीता अध्याय चार के श्लोक 42 के अनुवाद में मेरे यानी रामपाल के अनुवाद के अतिरिक्त सर्व अनुवादों ने अपने अनुवाद में लिखा है कि युद्ध के लिए खड़ा हो जा जो गलत है। क्योंकि पूरे अध्याय चार में परमात्मा के तत्व ज्ञान तथा अज्ञान का विश्लेषण है। स्पष्ट किया है कि शास्त्र विरुद्ध अधूरे व मनमाने भक्ति कर्मों को तत्व ज्ञान से समझकर उनको त्याग कर पूर्ण परमात्मा द्वारा अपने मुख कमल से बताए तत्व ज्ञान को तत्वदर्शी संतों से समझकर कर्तव्य भक्ति कर्म कर अच्छा एक बात और है जैसे यह त्यागने की जो बात करता है ना कि मेरी भक्ति मत कर और या फिर यह 25 से 30 में कह रहा है कि इन इन कर्मों को त्याग दे तो

00:28:55:01 यह जो जो त्यागने की बातें कह रहा है वहां पर त्यागने जो संस्कृत होती है ना वो उपलब्ध ही नहीं होता है क्योंकि वहां पर तो उन कर्मों में गति करने के लिए कहा जा रहा है। उनको स्वीकार करने के लिए कहा जा रहा है। तो यह जो कहता है कि मुझे छोड़कर उसकी भक्ति कर या इन कर्मों को त्याग कर यह वाला कर्म कर। तो यह त्यागने वाली संस्कृत नहीं होती वहां पर। ठीक है? तो 442 में यह इस बात का विरोध कर रहा है कि उसने जो है युद्ध के लिए खड़ा होने की बात कही। अब देखिए इसके अनुसार काल जो है युद्ध करवाना चाहता था। क्योंकि उसको अपने खाने का इंतजाम करना था। तो खान काल जो है युद्ध करने के लिए नहीं कह रहा है। भक्ति करने के लिए कह रहा है। इसका मतलब अपने खाने का इंतजाम नहीं कर रहा है। कहीं पर कहेगा कि काल को अपने खाने का इंतजाम करना है इसलिए वो युद्ध करवाना चाहता है। कहीं पर वो श्री कृष्ण पर यह दोष लगाता है कि श्री कृष्ण जो है ठीक व्यक्ति नहीं थे। वो युद्ध करवाना चाहते थे। कहीं पर वो यह कहता है कि श्री कृष्ण तो अच्छे व्यक्ति थे। वही युद्ध नहीं करवाना चाहते थे। बल्कि काल प्रेत वश उनके अंदर प्रवेश करके वो युद्ध करवाना चाहता था। क्योंकि उसको अपना काम बनाना है

00:30:10:12 क्योंकि वह अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। यही सब लिखा है इसमें। यह टटपुंजिया और घटिया भाषा ही है इस संत की। इस तथाकथित संत की यही घटिया भाषा है। वो अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। ये सब इनकी किताबों में छपा है। है ना? तो वो अपना उल्लू सीधा करना चाहता है काल। तो कहीं पे श्री कृष्ण को जहां विलेन बनाना होगा वहां काल वाली बात अपनी ही छुपा लेगा। जहां पे काल को विलेन बनाना होगा वहां श्री कृष्ण वाली बात छुपा लेगा। दोनों ही इसके लिए सही नहीं है। और उसके बाद जब काल से भी युद्ध लड़वाना चाहता है तो यहां पर क्या कह रहा है कि काल युद्ध लड़ने को नहीं कह रहा। भक्ति करने को कह रहा है। दूसरी बात एक बात और है यहां पर आप ध्यान दीजिए कि खड़ा हो जा वाली लाइन दिखाइए जरा बड़ी करके खड़ा हो जा। युद्ध के लिए खड़ा हो जा। तो ये कह रहा है कि ये जो अर्थ किया है ना कि युद्ध के लिए खड़ा हो जा। यह युद्ध के लिए खड़ा नहीं होना है। भक्ति के लिए खड़ा होना है। ठीक है? अब आप एक बात बताइए भक्ति क्या बैठकर नहीं हो सकती है? क्या खड़े होकर के ही भक्ति होती है? इसका विधान कहां लिखा हुआ है? जो वो यह कहेगा कि भक्ति के लिए

⬜ Not used yet · 00:31:17:13 – 00:31:36:14 (0:19)

00:31:17:13 खड़ा हो जा। ऊपर से सेकंड लाइन। इसी पैराग्राफ की ऊपर से सेकंड लाइन। यह युद्ध वाली लाइन दिखाई है। पैराग्राफ ऊपर क्यों चले गए? उसी पैराग्राफ की पैराग्राफ सेम है। विवेचन के विवेचन वाला जो पैराग्राफ दिख रहा हां युद्ध के लिए

00:31:36:14 खड़ा हो जा। अब युद्ध के लिए खड़ा होना तो समझ में आता है। मगर भक्ति के लिए खड़ा हो जा। हम यह कहां से निश्चित होगा? ठीक है? तो यह जो अभी तक हम लोग पीछे पढ़ चुके तो लास्ट एपिसोड था उसका मैंने कुछ बुलेट पॉइंट्स बताने का प्रयास किया है। अब हम बात करते हैं पांचव अध्याय की। पांचवा अध्याय खोल

⬜ Not used yet · 00:32:07:20 – 00:33:56:09 (1:49)

00:32:07:20 दीजिए। अगला [गला साफ़ करने की आवाज़] तो पांचवे अध्याय में इसने पहले कुछ समरी की है। उसके बाद यह श्लोक बद्ध तरीके से चला है। इसने कहा है कि श्लोक नंबर 14 से 21 और 24 25 26 में पांचव अध्याय में यह जो है विशेष वर्णन है जिसमें कि जो गीता ज्ञान कहने वाला यानी रामपाल के हिसाब से काल है जो वो अपने से अन्य परमेश्वर की बात कर रहा है। क्यों कर रहा है तो इसने बताया है पांच श्लोक 14 का अनुवाद गीता ज्ञान बोलने वाले ने अपने से अन्य कुल के मालिक की महिमा बताई है। प्रभु यानी कुल का स्वामी सर्वप्रथम विश्व का सृजन करता है। तब ना तो किसी को कर्तापन का ना कर्मों का आधार होता है। ना कर्म फल के संयोग ही आधार होते हैं। परंतु सर्व प्राणी अपने स्वभाव वश किए कर्म का फल ही बरत रहे होते हैं। ठीक है? यह इसने किया है यहां अनुवाद।

00:33:25:18 [गला साफ़ करने की आवाज़] अब क्या है कि पहले हम पांचव अध्याय के 14व श्लोक का जो वास्तविक अर्थ है वो पढ़ लेते हैं। तो वो क्या है? ये अभी इसने क्रमबद्धता से चालू नहीं किया। पहले सारांश बता रहा है। उसके बाद यह फिर 5.1 से शुरू करेगा। तो पहले इसके सारांश को ही देख लेते हैं क्या है? तो परमेश्वर मनुष्यों

00:33:56:09 के ना तो कर्तापन की ना कर्मों की और ना कर्म फल के संयोग की ही रचना करता है किंतु स्वभाव ही बरत रहा है।

⬜ Not used yet · 00:34:03:20 – 01:00:55:27 (26:52)

00:34:03:20 ठीक है? और इसने यह कहा है कि प्रभु यानी कुल का स्वामी पहले सृजन करता है। अब जबरदस्ती डाल दिया कि पहले सृजन करता है। उसकी आवश्यकता नहीं थी। तब ना तो किसी को कर्तापन का ना कर्मों का आधार होता है ना कर्म फल के संयोग का ही आधार होता है। परंतु सर्व प्राणी अपने स्वभाव वश किए हुए बरत रहे हैं। ठीक है? अब अब देखिए 5:15 में ये जनाब क्या कह रहे हैं। यहां हंसने वाली बात आएगी। कह रहे हैं कि सर्वव्यापक सर्व का स्वामी यानी कि पूर्ण परमात्मा ना किसी का पाप और ना किसी के शुभ कर्म का प्रतिफल देता है। यानी निर्धारित किए नियम अनुसार जीव फल प्राप्त करता है। क्या लिखा? कि शुभ कर्म का प्रतिफल नहीं देता है परमेश्वर। यह आपके बाबा कह रहे हैं रामपाल। और फिर आगे क्या कह रहे हैं? किंतु अज्ञान के द्वारा ढका हुआ जिससे तत्व ज्ञान हीनता के कारण जानवरों के तुल्य सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं। अर्थात स्वभाववश शास्त्र विधि रहित भक्ति कर्म करके क्षणिक सुखों में आसक्त हो रहे हैं। जो साधक

00:35:19:01 शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म करते हैं उनके पाप प्रभु क्षमा कर देता है। अब आप देखिए शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म क्या है? शुभ कर्म। तो उसका फल दे रहे हैं। उनके पाप प्रभु क्षमा कर देते हैं। और चार लाइन पहले मूर्ख व्यक्ति क्या कह रहा है के किसी के भी ना किसी के शुभ कर्म का प्रतिफल देता है। अंडरलाइन करिए भैया जरा 5:15 का अनुवाद है 5:15 और उसकी सेकंड लाइन है कि परमेश्वर जो है किसी के शुभ कर्म का प्रतिफल नहीं देता। यह खुद ही कह रहा है ये मूर्ख व्यक्ति और फिर नीचे क्या कह रहा है कि जो शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म करते हैं उनके पापों को क्षमा कर देता है। यानी ये प्रतिफल देता है। एक जगह कह रहा है प्रतिफल नहीं देता है। फिर कह रहा है प्रतिफल देता है। इससे पूछ लो करता क्या है? अच्छा कहने का तात्पर्य यहां पर यह है भगवत गीता वास्तविकता में क्या कह रही है वो बता दूं आपको। तो भगवत गीता यह कह रही है कि वास्तविकता में केवल स्वभाव वश जो जीव है वह बरत

00:36:34:09 रहे हैं। ईश्वर किसी की रचना नहीं कर रहा है। किसी के कर्म की इत्यादि उसकी रचना वो नहीं कर रहे हैं। मगर यह जो लग रहा है यह अज्ञानता के कारण लग रहा है कि कोई कुछ कर रहा है। यह जो भावना आ रही है, यह माया से बद्ध होने के कारण आ रही है। यह यहां पर इन दो श्लोकों के कहने का तात्पर्य है। परंतु इसने तो मामला ही बदल दिया। दूसरी बात देखिए एक चीज और है। इसने जब व्याख्या की है ना 5:15 की तो 5:15 में

00:37:13:25 संस्कार ही बरत रहे हैं। हम 5:15 में यह कह रहा है संस्कार ही बरत रहे हैं। अब इस मूर्ख को अगर कहना ही था तो स्वभाव बरत रहे हैं। कहता संस्कार बरत रहे का क्या मतलब है? संस्कार तो वो हो गए ना जो माता पिता ने दिए हैं जो उसने सीखे हैं। और यहां बात हो रही तात्विक चिंतन की कि जीव अपने स्वभाव वश बरत रहा है कर्मों में और यहां पर तुम संस्कार कह रहे हो तो इनको इतनी ज्यादा इनकी गति है नहीं वो तत्व ज्ञानी तत्व ज्ञानी तत्वदर्शी का ढिंढोरा पीटते हैं और मुंह बाहर आ जाता है। मुंह सा बहा देते हैं। जरा सा दो चार कुछ तात्विक प्रश्न कर देंगे। चक्कर आ जाएंगे रामपाल को चक्कर बता रहा हूं मैं घर पहुंच गया दो चार यह वाले तात्विक सवाल कर दिए रामपाल से हो सकता है तुरंत रामपाल को एडमिट कराना पड़ जाए और फिर रामपाल जब होश में आए तो कहे मुझे भैया वही ले चलो वापस वहां सुरक्षित था मैं कहां ले आए तू है ना तो खुद ही कह रहा है प्रतिफल देता है और खुद ही कह रहा है प्रतिफल नहीं देता है तो अब जब कोई कहे कि हमारा उनकी भक्ति करने से यह मिल गया वो मिल गया तो उनके मुंह पर दे मारना जूतों

00:38:28:26 के जैसा अगर कोई तुमसे यह कहे अब कि अरे रामपाल जी की रामपाल जी महाराज की भक्ति करने से यह मिला वे मिला तो उसके मुंह पर दो जूते देना इसके रूप में क्या कि वो प्रतिफल नहीं देता है यह बता देना और दूसरा कि सांसारिक सुख सुविधाएं वेद जो हमारी पूजा भक्ति है उससे मिल जाती है जो रामपाल का ज्ञान है वो तो पूर्ण मुक्ति का है सांसारिक सुख सुविधाएं अभी हमने पढ़ा ना पीछे वेदों से मिल जाती है। ये स्वर्ग महा स्वर्ग इनको दिखा दो। 97 नंबर पेज दिखा दो। 97 नंबर पेज देख लो।

00:39:13:08 वेदों व गीता जी में वर्णित साधना से पाप विनाश नहीं होते। भोगने ही पड़ते हैं और अन्य उपलब्धियां जैसे सिद्धियां व स्वर्ग महा स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। यह है ऊपर से तीसरा पैराग्राफ हां इसी में जो जैसी के बाद विचार करें में विचार करें में आइए। विचार करें में नीचे की तीन लाइनें लीजिए। विचार करें वाला पैराग्राफ है ना इसमें नीचे की तीन लाइन

00:39:45:27 हां और और नीचे की हां यही यही अब देखिए इसमें लिखा है अन्य उपलब्धियां जैसे सिद्धियां स्वर्ग महा स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है तो यह जो भौतिक जो सांसारिक सुख है यह आपको उसी से मिलता है जो जिसके लिए मना भी कर रहा है उसी से मिलता है और यह जो आपको देता है वास्तविकता में तो वह भी इसको यह उसका भी फल प्रदान करने वाला नहीं हुआ क्योंकि शुभ कर्मों का प्रतिफल यह प्रदान नहीं करता है खुद ही कह रहा है ठीक है तो यह कहना क्या चाहता है? बहुत वो कठिन चीज है यह जानना कि रामपाल कहना रामपाल चाहता क्या है?

00:40:27:06 अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] ठीक है। अब थोड़ा सा आगे चलते हैं। और बेचारा संस्कार का अर्थ नहीं बता पाया। संस्कार शब्द आ कहां से गया यहां पे? ये जो इसने लिखा है वापस आ जाइए। वही पांचव अध्याय 102 नंबर पेज पर। ये संस्कार शब्द आ कहां से गया? तो यह बताता है यहां पर कि इनकी संस्कृत का ज्ञान कमजोर है। शुद्ध हिंदी का ज्ञान ही कमजोर है। संस्कृत तो दूर की बात है। तो इन्होंने संस्कार ही बरतता है। स्वभाव ही बरतता है। लिखा हुआ है। उसको कर दिया संस्कार। ठीक है? अब 16 वे श्लोक पर आते हैं। परंतु जिनका वह अज्ञान पूर्ण परमात्मा के द्वारा संत रूप में प्रकट होकर आत्मज्ञान तथा परमात्म ज्ञान रूपी तत्व ज्ञान बताया जाता है। जिसे तत्वदर्शी संत आगे प्रचार करते हैं। अच्छा एक बात और है कि रामपाल से जिसजिस ने नाम दीक्षा ले लिए ये सब तत्वज्ञानी हो गए। क्योंकि तत्व ज्ञान का अर्थ क्या है? नाम दीक्षा तो ये सब तत्व ज्ञानी हो गए। जिन जिन को नाम मिल गया है तो ये हुक चुल्लू जैसे मुंह के जो आते हैं और यहां पर रो के चले जाते हैं। ये सब तत्व ज्ञानी है इनके हिसाब से रामपालियों के हिसाब से हां ये भी सोचने वाली बात है। सब तत्वज्ञानी है और

00:41:42:09 फिर कहेंगे नहीं रामपाल ही कहेगा इस समय धरती पर एक ही तत्वदर्शी है वो मैं हूं। ये भी रामपाल कहता है। इनहीं किताबों में कहता है। भाई कहना क्या चाहते हो? अगर नाम दीक्षा का मतलब तत्व ज्ञान है तो जिसको तुमने नाम दीक्षा दे दी वह तत्व ज्ञानी हो गया। फिर यह क्यों कह रहे हो कि इस समय धरती पर मैं ही एक तत्व ज्ञानी हूं। वो कितने करोड़ शिष्य बताते हैं ये लोग? 15 करोड़। तो यानी कि 15 करोड़ तत्व ज्ञानी है। तत्वदर्शी है। [हंसी] खैर आगे चलते हैं। इनके तत्व ज्ञान का कीमा बनाते हैं। तो

00:42:21:25 व्यक्ति देखो एक ही पैराग्राफ में कितना झूठ बोल सकता है। एक उसी पैराग्राफ में कह रहा है कि मैं फल नहीं देता। उसी पैराग्राफ में कह रहा है फल देता हूं। क्या भांग पी के लिखी है क्या ये किताब? फिर दूसरों पर भांग पीने का आरोप लगाते हो? बताओ। भांग पी के कि भांग खा के? खा के खाते होंगे। पता नहीं कैसे यूज़ होती है। खैर चलिए ठीक है। अब आगे जो है परंतु जिनका बार-बार तत्व ज्ञान घुसेड़ दिया है और तत्व ज्ञान का मतलब है नाम दीक्षा। जबकि

00:43:01:13 यहां पर तत्व ज्ञान का अर्थ होता है कि तात्विक विवेचना जो होती है कि तत्व कितने हैं और यदि दो हैं तो दो पे दो के अनुसार इस संसार को देखने का प्रयास करना और उसमें क्या बाधा आएगी उस पर उस पर चिंतन करना यह सब तत्व ज्ञान है भागवत से मैं आपको दिखाता हूं तत्व ज्ञान क्या है [गहरी सांस लेने की आवाज़] देखिए भागवत पहले ही उसमें चैप्टर में तत्व ज्ञान क्या है यह लिखा हुआ है।

00:43:56:04 प्रथम स्कंद प्रथम अध्याय यह देखिए तत्व ज्ञान क्या है?

00:44:34:24 तत्व वित्त लोग ज्ञाता और गेय के भेद से रहित अखंड अद्वितीय सच्चिदानंद स्वरूप ज्ञान को ही तत्व कहते हैं। तत्व ज्ञान का अर्थ नाम दीक्षा नहीं है। ज्ञाता और गेय यानी कि अ जाना जाने वाला जो पदार्थ है और ज्ञाता यानी कि जानने वाला के भेद से रहित इन दोनों भेदों से रहित अखंड अद्वितीय सच्चिदानंद स्वरूप ज्ञान को अखंड अखंड अद्वितीय सच्चिदानंद स्वरूप ज्ञान को तत्व ज्ञान कहते हैं। समझ में आया? कहां लिखा है? नाम दीक्षा है। उसी को कोई ब्रह्म, उसी को कोई परमात्मा और उसी को कोई भगवान नाम से पुकारता है। लो सब खंडन हो गया यहां पर प्रथम स्कंद भागवत का और अध्याय दो और श्लोक क्रमांक है 11, उसी को ब्रह्म, उसी को परमात्मा और उसी को भगवान शब्द से पुकारते हैं। लो

00:45:50:07 हो गया। अच्छा बीच में थोड़ा सा एक ब्रेक ले लेता हूं। मैं एक इनकी कॉमेडी दिखाता चलूं आपको। जिनको नहीं पता है उनको बता दूं कि रामपाल ने और क्या-क्या इसमें कर रखा है। भांग से प्रभावित होकर के किया है या कैसे किया है। वह तो नहीं कह सकते मगर क्या-क्या किया है वह आपको बता रहा हूं। हां प्रश्न क्रमांक 59 निकालिए इसी का प्रश्न क्रमांक एक ये एक ब्रेक वाला है ना कॉमेडी होनी चाहिए ना बीच-बीच में हाई हाई लेवल की कॉमेडी तो वो जरा देख लीजिए हाई लेवल की कॉमेडी प्रश्न क्रमांक 59

00:46:41:06 संसार के नर नारी सनक सनंदन सनातन तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी उनके पिता ऋषि पाराशर जी प्रहलाद जी 59 निकला बड़ा कर दीजिए उसको बहुत कॉमेडी वाली बात बताने जा रहा हूं आप लोग ध्यान से देखिएगा प्रश्न बुक का नाम है गरिमा गीता की रामपाल इसमें भांग से प्रभावित होकर के लिख रहे हैं या नहीं लिख रहे हैं यह तो जनता निर्णय करे मगर अगर प्रश्न क्रमांक 59 पर लिख रहे हैं रामपाल कि संसार के नर नारी सनक सनंदन सनातन तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी उनके पिता हां यही भावार्थ में ही पढ़ रहा हूं दूसरी लाइन से संसार बड़ा करिए इसको संसार के नर नारी सनक सनंदन सनातन तथा संत कुमार तथा नारद जी व्यास जी उनके पिता ऋषि पाराशर जी प्रहलाद तथा मुनि ऋषि जो स्वयं परमात्मा कबीर जी ही थे।

00:47:57:08 यह सब कबीर थे। लो भाई हो गया जैकपॉट। व्यास जी भी कबीर है। सनक सनंदन भी कबीर है। तो फिर व्यास जी से ज्ञान लेने वाले फिर मूर्ख कैसे हो गए? क्या पागल आगल हो क्या यार? कहां बैठकर के लिखते हो ये किताबें? भूसा भरा है क्या दिमाग में? अरे भैया जो ले चल रहे हो कम से कम उसको तो पकड़े रहो। ये है इनका तत्व ज्ञान।

00:48:33:03 संसार के नर नारी सनक सनंदन सनातन तथा सनत कुमार तथा नारद जी व्यास जी उनके पिता ऋषि पाराशर जी प्रह्लाद तथा मुनि ऋषि ये सब कबीर परमात्मा ही थे। ठीक है। बताइए। चलिए अब आ जाते हैं दोबारा से वहीं पर जहां पर हम लोग थे। कैसी लगी ये कॉमेडी? बहुत हाई लेवल की कॉमेडी होती है इस शो में। है ना? सब लोग आनंद ले। तो अब आ जाते हैं दोबारा से पांचवे अध्याय पर जो चल रहा था। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अब एक बात यहां ध्यान रखने की है कि यहां पर इन्होंने कहा है क्योंकि वो थोड़ा सा थर्ड पर्सन के रूप में बात कर रहे हैं ना। भगवान श्री कृष्ण वहां पर यह कह रहे हैं कि वो परमात्मा, वो परमात्मा। तो इसलिए यह कह रहा है रामपाल यहां पर कि इन्होंने पांचव अध्याय में और यह जो श्लोक है 14 से 21 और 24 25 26 में अपने से अन्य परमात्मा की भक्ति की बात की है। उनकी विवेचना की बात की है। यानी कि अगर इस तरह से बात कर बात करते हैं हम किसी से कि अगर तुझे उसको पाना है जिसको तू प्यार करता है या उसको पाना

00:49:48:12 है जिसकी तू भक्ति करता है तो तुझे यह करना पड़ेगा। अब वह बात अलग है कि जो भक्ति वो करता है वह उसी करता है जो यह बात बता रहा है। यह तो हो गई एक बात। इसको मैं समझा देता हूं। अब आ जाइए भाई पृष्ठ क्रमांक खोलिए। 63 63 खोलिए। यहां पर भी बड़ी जबरदस्त बात आने वाली है। सामने बिल्कुल आपके दिल को छू लेगी। 63 नंबर पेज पृष्ठ क्रमांक मतलब [गला साफ़ करने की आवाज़] कहने का यह है कि अगर श्री कृष्ण जी ने यह कह दिया कि वह परमात्मा ऐसा है, वह परमात्मा ऐसा है जिसको तू ढूंढ रहा है वो ऐसा है। तो इसका मतलब वो स्वयं परमात्मा नहीं है। तभी तो ऐसा कह रहे हैं कि वह परमात्मा ऐसा है। है ना? अपने से अलग किसी की बात कर रहे हैं। तो यहां देखिए प्रश्न क्रमांक 63 पर जनाब क्या लिख रहे हैं?

00:50:40:12 बड़ा वाला पैराग्राफ है। इसमें बीच में आइए। नीचे आइए जरा। हां। इसमें अकाल मूरत वाली जो लाइन है ना हां। जैसे अकाल मूरत वह परमात्मा हां यही यही अकाल मूरत शब्द स्वरूपी राम इसके बाद वाली लाइन को कवर करिए अकाल मूरत शब्द स्वरूपी राम यह सब हो गया सत्पुरुष यह नाम मुक्ति प्राप्त करने के नहीं है ये वो हो गया जैसे अकाल मूरत वह परमात्मा अब लो यह कबीर जी बोल रहे हैं जैसे अकाल मूरत वह परमात्मा जिसका काल ना हो यानी अविनाशी सत्पुरुष वह सच्च सच्चा परमात्मा जिसका नाश ना हो यानी अविनाशी। यानी अब यहां पर कबीर जी भी अपने से अन्य किसी परमात्मा की बात कर रहे हैं। ये सिद्ध हो गया। अब दूसरा इसी से पहले वाला पेज भी देख लीजिए। आए हैं तो उसको भी लेते चले।

00:51:48:21 बिल्कुल लास्ट लाइन इससे जस्ट पहले वाला पेज और लास्ट लाइन। हां ये लास्ट लाइन बस इसमें देखिए सेकंड लाइन में क्या लिखा है? लास्ट पैराग्राफ में शब्द सप्त पुरुष का भी है जो कि शब्द पुरुष का सत्पुरुष का प्रतीक है वह निरंजन काल का प्रतीक भी शब्द ही है। एक ही शब्द मतलब जो शब्द सत्पुरुष का प्रतीक है मतलब जो इनका जो सत्पुरुष यानी परमेश्वर जो शब्द सत्पुरुष का प्रतीक है वही शब्द काल का भी प्रतीक है। यानी कि काल का जो शब्द है वही शब्द सत्पुरुष का है। शब्द पुरुष का सत्पुरुष का जो शब्द है वही काल का है। इनमें कोई भेद नहीं है। ठीक है? दोनों का एक ही शब्द है भाई। ठोको ताली। भांग पी के लिखो किताब।

00:52:38:14 अच्छा ठीक है अब पांचव पे वापस आते हैं तो अब इन्होंने पांचवे श्लोक में आत्मज्ञान परमात्म ज्ञान सबको वही बता दिया नाम दीक्षा तत्व ज्ञान वही जो काल ब्रह्म है उससे परम वह तत्व ज्ञान है बस बाकी कोई तात्विक समीक्षा नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] उस तत्व ज्ञान के आधार से भक्ति करके साधक पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाता है और पुनरावृत्ति यानी जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर पूर्ण मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। ठीक है? अब देखिए पांचव के पांचवे अध्याय के 17व श्लोक में तत्व ज्ञान का जो अर्थ ये ले चल रहे हैं वो ले चल रहे हैं नाम। मैंने तत्व ज्ञान का शास्त्रोक्त अर्थ आपको बता दिया। इनको पूरे रामपालियों को चैलेंज है। यह कहीं पर भी तत्व ज्ञान का मतलब नाम दीक्षा दिखा दे और अगर दिखा भी देंगे तब भी अपने ही सर पर वो फोड़ेंगे क्योंकि जितनों के पास नाम दीक्षा है सब तत्व ज्ञानी कहलाएंगे। ये भी तुम समझ लेना। महामूर्खों तुम अपने सर

00:53:53:18 पे ना मटका मटका डाल के चला करो। ना चेहरा दिखाओ। मटके में तो छेद कर लो और अपने वास्तविक स्वरूप को प्रस्तुत करते हुए चला करो जिससे जनता तुम्हें उसी रूप में समझे जो इंसानी चेहरा दिखता है तब थोड़ा बहुत समझदार समझ लेता होगा तुम्हें व्यक्ति तुम मटका या हेलमेट इत्यादि लेके ही चला करो कि यह है हम कि कुछ गिरेगा ना पानी तो सरक जाएगा नीचे चिकने घड़े कुछ नहीं जाएगा उस मटके के अंदर और या हेलमेट लगा लो मटका ना मिल रहा हो तो इतनी बड़ी बड़े बेवकूफ लोग कि तत्व ज्ञान का मतलब है नाम दीक्षा। जितनों की नाम दीक्षा हो गई सब तत्व ज्ञानी हो गए। और फिर तुम्हारे बाबा जी कह देते हैं मैं ही एक तत्व ज्ञानी हूं। अरे तुम अकेले नहीं हो। 15 करोड़ तत्व ज्ञानी है तुम्हारे हिसाब से। दो ठोको ताली बेवकूफ कहीं के। अच्छा [गला साफ़ करने की आवाज़] आगे चलते हैं।

00:54:56:16 तत्व ज्ञानी साधक सब जीवो को समान दृष्टि से देखता है क्योंकि सबकी आत्मा एक जैसी है। जो कर्मों के अनुसार अन्य शरीरों को धारण किए हुए हैं। अब यहां पे हमारे पास तो व्यवहार परमार्थ का भेद है। तुम्हारे पास तो नहीं है। अब वो व्यवहार परमार्थ तुम्हारे से ऊपर की बात हो जाएगी जरा। मगर सबको क्या नाम दीक्षा जितने लिए हुए हैं वह सबको एक दृष्टि से देखते हैं। माता बहन और पत्नी को एक दृष्टि से देखते होंगे। फिर भाई रामपाल ये सुन लो सच्चाई सब लोग। रामपाल के द्वारा नाम दीक्षा जिसजिस ने ले रखी है वह रामपाल की लेखनी में लिखा हुआ है कि वो लोग जो है सबको समान दृष्टि से देखते हैं। तो इसका अर्थ तो यह मानना पड़ेगा कि जितने रामपाल है अपनी माता बहन पत्नी को एक दृष्टि से देखते हैं। यही तो मानोगे ना ऐसे ही तो अर्थ करते हो ना हमारे शास्त्रों का तुम भी वैसे ही अर्थ हम कर रहे हैं कि तुम लोग माता बहन और पत्नी में अंतर की दृष्टि नहीं रखते हो। समान दृष्टि रखते हो। है ना? ठोको ताली।

00:56:01:22 बहुत मजाक उड़ाया ना कि अग्नि पुराण में ये लिखा है। यहां लिखा है। मिल जाओगे ना जिस दिन बैंड बज जाएगा तुम लोगों का। चलो खैर आगे चलते हैं। अच्छा अब देखिए यहां पर एक और बढ़िया चीज आती है। पांच 19 में क्या कह रहे हैं। जिनका मन इस प्रकार स्थित है। अब जिनका मन मन कौन है? मन तो काल है। हम लोग पहले देखा आए हैं पीछे। मन का मतलब है काल। तो जिनका मन यानी काल बहुत सारे हो गए। जिनका मन इस प्रकार स्थित है। यानी कि काल बहुत सारे हैं और सबके पास अपना अपना एक काल है। तो अब जनता काल से प्रभावित नहीं है। काल जनता से प्रभावित है। जीव से प्रभावित है। [हंसी] अरे भाई। अरे मैं क्या करूं भाई? इतना बड़ा कार्टून कैरेक्टर लिखा है इन्होंने।

00:57:03:08 खैर चलो जिनका मन इस प्रकार से स्थित है। अब इनका पूरा जो जहां पर इन्होंने हमारी गायत्री माता को अपमानित किया है ना कि तेरे कई सांड पति होंगे। ये सब लिखा है उनके बारे में। वहीं पे यह वाली वार्ता चल रही है कि मन ही काल है। मन ही यह है, मन ही वो है। अब अगर काल मन है तो सबके पास अपना अपना एक काल है। है ना? तो काल से प्रभावित लोग नहीं है। यह जीव जो है रामपाल के वह काल उनसे प्रभावित है। आगे चलते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] कॉमेडी शो है ये। इसको आप वो ना समझे कि यहां पर कोई वॉर हो रही है या कोई वो गंभीर मामला है। ये कॉमेडी शो है। हां। मगर ऐसी कॉमेडी है जिसमें दिमाग पंचर हो सकता है तो थोड़ा सा सीट की पेटी को बांध के रह और [हंसी] और अपना जो कुछ बाम ले ले कुछ सर्द में दर्द भी हो सकता है तो जिनका मन इस प्रकार स्थित है वह संसार में रहते हुए भी निर्दोष होकर ब्रह्मणी सच्चिदानंद गण ब्रह्म में स्थित है यह मैंने मन की बात बता दी मन तो काल है आगे जो तत्व ज्ञान के आधार से सुख दुख को परमात्मा की रजा समझता है अब देखिए

00:58:18:14 ऊपर इसने माना कि परमात्मा जो है रामपाल का परमात्मा किसी शुभ कर्म का फल नहीं देता है। यह रामपाल ने मान लिया। अब नीचे देखिए क्या हो रहा है जो तत्व ज्ञान के आधार से सुख दुख को परमात्मा की रजा समझता है। मतलब ये परमात्मा की इच्छा है तो मुझे इससे कोई मतलब यानी कि सुख दुख उनको होता है। दुख भी होता है। ठीक है? जो तत्वज्ञानी है उनको भी दुख होता है। यानी जो रामपाली है वह भी दुखी है। कष्ट में है। तत्व ज्ञानी भी कष्ट में है। रामपाली भी कष्ट में रामपाल भी कष्ट में हो गया। वह ब्रह्म वित्त परमात्मा के ज्ञान को जानने वाला साधक सच्चिदानंद ब्रह्म में स्थित है। फिर पांच 24 का अनुवाद कर रहे हैं। तत्वज्ञानी साधक अंतरात्मा से पूर्ण परमात्मा से जुड़ा है। वह योगी साधक शांत ब्रह्म यानी परम शांति युक्त परमात्मा अर्थात सच्चिदानंद घन परमात्मा को प्राप्त होता है। अब देखिए यहां पे ब्रह्म का अर्थ इसने मान लिया सच्चिदानंद सच्चिदानंद घन ब्रह्म मान लिया ना और हम कहीं पर कहे कि

00:59:33:18 यहां ब्रह्म लिखा है तो कहे नहीं नहीं नहीं नहीं ये तो काल ब्रह्म है। ब्रह्म ही फाइनल जो स्तर है ना तत्व का जो आखरी स्वरूप माना गया है वो ब्रह्म ही है। निरुक्त के अनुसार वह फिर हमारे यहां व्यवहारिक लीला लीलात्मक वर्णन में आ जाता है कि तुम और जैसे मान लीजिए ब्रह्म के कई रूप है तो उसमें से किसी एक रूप की महिमा गान करनी है तो कह देते परम ब्रह्म। मगर जिसको ब्रह्म कह दिया वो ब्रह्म ही है। फिर तात्विक दृष्टि से उनमें कोई भेद नहीं है। ठीक है। मगर क्या हुआ यहां पर? इन्होंने ब्रह्म का अर्थ यहां सच्चिदानंद घन ब्रह्म मान लिया। अच्छा फिर अब यह इसमें 525 के अनुवाद में जबरदस्ती शास्त्र तत्वदर्शी संत से दीक्षा लेकर शास्त्र विधि अनुसार साधना करने से जिनके सब पाप नष्ट हो गए। यहां पाप नष्ट होने की बात नहीं हो रही है। संशय नष्ट होने की बात हो रही है। और यहां पे तो बड़ा तात्विक वो जो फिलोसफिकल बात आई है। क्या जिसकी द्वैत रूपी बुद्धि नष्ट हो जाती है। यह आया यहां पर देखिए वास्तविक श्लोक में क्या है?

01:00:48:28 हम जिनके सब जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं। जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं।

01:00:55:27 जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रथ है और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है। वह ब्रह्मवेत्ता

⬜ Not used yet · 01:01:10:00 – 01:18:24:00 (17:14)

01:01:10:00 वह ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। तो अब इसमें जो मूल बात है ना जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं। इन्होंने यह कहा है और जबकि यहां पे छिन द्वैधा ये शब्द आया है। छिन द्वधा तो इसका मतलब है यहां पर जिसका द्वैत रूपी संशय नष्ट हो गया है। भगवत गीता यह कह रही है द्वत जब तक द्वत है तब तक कहीं ना कहीं कटिंग हो जाएगी तत्व की। इसलिए जब तत्व का चिंतन करोगे तब एक समय आना पड़ेगा अद्वैत जिसमें कबीर जी ने कहा प्रेम गली अति साखरी जा दो ना समाए यह सब तुम्हारे बुद्धि में ना आए प्रेम गली अति साकरी जा में दो ना समाए और ये सब तुम जैसे लफंडरों की बुद्धि में ना आ पाए। खैर कुल मिलाकर के यहां पर यह जो आपके तत्वदर्शी बाबा जी हैं यह द्वैत शब्द को खा गए जिस पर यहां पर बात की गई है कि द्वैत रूपी जो संशय है उसका नाश हो जाने की बात कही है। उसी से पाप नष्ट होंगे और उसी से संशय नष्ट होंगे। तो यहां तक ये पांच 25 का हो गया। अच्छा एक बात और है थोड़े से मैं कॉमेडी

01:02:25:01 तरीके से पकड़ने का प्रयास करता हूं इसको रामपाल को इसने लिखा है काल ब्रह्म तो उग्र अगले में लिखा है देखिए ये फर्स्ट पैराग्राफ में चौथी लाइन को अंडरलाइन करिए काल ब्रह्म तो उग्र अब ये बताइए कि काल ब्रह्म को बनाया किसने ये ऐसे ऐसे ऐसे पोंदू चंद है कह रहे हैं कि काल ब्रह्म उग्र है जबकि जो हमारे वो है ईश्वर जो है कबीर वो परम शांत है तो काल ब्रह्म को बनाया किसने है तो जो काल ब्रह्म को बनाने की शक्ति थी जिसके कारण काल में उग्रता आई है वो शक्ति तो ईश्वर में माननी पड़ेगी ना कि है तभी तो काल बन रहा है तभी तो उसमें उग्रता है अरे भैया सर्वाधार का मतलब क्या होता है कुछ मालूम है ईश्वर के बारे में बदनाम दीक्षा ले लो घंटी बजा लो नाम दीक्षा की मालूम ना तालुक अरे भाई जो भी चीज आप बना रहे हो जो भी संसार में स्थित है उसका आधार तो ईश्वर को मानना पड़ेगा कि अपने आप आ गया उग्रता तो निकल के कहां से आई उग्रता ईश्वर से आएगी तो ईश्वर को तुमने उससे रहित कैसे

01:03:40:09 मान लिया जितना जो भी कुछ तत्व है दुनिया में वह सब ईश्वर से ही तो आ रहा है सर्वाधार ठीक है यह सब इतने लेवल की बातें कभी सोचनी नहीं है। चंदा मामा की कहानियां जैसा सुना दो बस जन्नत की कहानियां तो काल ब्रह्म तो उग्र प्रभु है। तो इसका मतलब कि जो ईश्वर है वो पूर्ण नहीं है। कबीर जो है वो पूर्ण नहीं है। उसमें उग्रता का अभाव है। उग्रता नहीं है। उग्रता एक्सिस्ट करती है मगर उसके पास नहीं है। कबीर के पास क्योंकि वो उग्रता तो काल के पास है। कबीर के पास उग्रता है नहीं तो पूर्ण नहीं है। उग्रता की कमी आ गई ना। ठोको ताली।

01:04:27:20 अच्छा आगे फिर देखिए पांच 26 में फिर वही विकार रहित व मन जीते ज्ञान ज्ञानी आत्मा के लिए सब और पूर्ण परमात्मा ही विद्यमान है। तो यानी मन जीते यानी काल को जीता हुआ। काल को जिसने जीत लिया है तो काल को जीत लिया। फिर तो इस लोक में रहना नहीं चाहिए। वो तो सतलोक जाना चाहिए। काल को हरा दिया। यानी कि जैसे ही कोई व्यक्ति नाम दीक्षा लेगा वह उसको तुरंत टिकट कट जाना चाहिए। क्योंकि उसने मन को जीत लिया। काल को जीत लिया। वो तत्व ज्ञानी हो गया है। तो तत्व ज्ञानी हो गया तो मन को जीता हुआ हो गया तो वो तो तुरंत टिकट कर लेना चाहिए। तो भाई चले जाओ ना। सतलोक यहां क्या कर रहे हो? [हंसी] अपनी 15 करोड़ सेना को ले जाओ। सतलोक अभी चले जाओ। क्यों नहीं जा रहे? तुम तो मन को जीते हुए हो।

01:05:19:17 [खांसने की आवाज़] [गला साफ़ करने की आवाज़] इस पगले को यह तक नहीं पता है कि वहां पर चित्त शब्द आया है और चित्त में और मन में बहुत अंतर है। मन तो इंद्री है। 11वीं इंद्री माना गया है मन को। इस इस मूर्ख को यह तक नहीं मालूम कि मन औरित में कितना अंतर है। वहांित शब्द आया तो उसके लिए मन लिख दिया। खैर आज के लिए इतना पर्याप्त है। और अब जो 5.1 से क्रमबद्ध जो इसने लिखा है वहां कचरा किया है वो हम अगले उसमें पढ़ने का प्रयास करेंगे भाई। क्योंकि बहुत साहस चाहिए होता है रामपाल की लेखनी को पढ़ने का। है ना? गुर्दा चाहिए गुर्दा रामपाल की लेखनी को पढ़ने का उसको झेलने का दिमाग पंचर हो जाए ऐसी चीजें तो जिसको अपने दिमाग को पंचर करना है वो इस सीरीज में बना रहे है ना और जुड़ा रहे अ यदि कोई रामपाल को मानने वाला व्यक्ति है और वह रामपाल के पक्ष को यहां रखना चाहता है तो वह आ सकता है लिंक दे दीजिए थोड़ी देर के लिए बात कर लेंगे जी लिंक दे दिया गया है।

01:06:35:27 क्लेम मत करो। आके तर्क करो। तर्क और प्रमाण पर बात करो। केवल दावा मत करो। भूसा भरा है दिमाग में। भूसा बेवकूफ। पता नहीं क्या भांग खा के कौन से नशे में यह सब किताबों में कचरा भरा हुआ है और इसने जो स्टेटमेंट्स दिए ना रामपाल ने मूर्ख मूर्ख अपनी ही बात को काट रहा है खुद ही कह रहा है पुराण को नहीं मानता फिर पुराणों की बात बता करके कह रहा है तो नाशवान है ब्रह्मा विष्णु महेश अभी देख लो लेटेस्ट इंटरव्यू में नहीं पुराण को नहीं मानता फिर कह रहा है नहीं पुराण के हिसाब से ब्रह्मा विष्णु महेश नाशवान तो क्या बताना चाह रहा है? नाशवान नहीं है और पुराण में कह दिया गया नाशवान है। यह बताना चाह रहा है। शास्त्रवाद जी जय श्री राम। जय श्री राम भैया। हां आप लाइव आ के जो आप बता रहे इतना बढ़िया-बढ़िया बात। [हंसी] इसकी तो पूरी पोल पट्टी खुल गई। अब ये क्या बताएगा भाई? इतने सारे तत्वदर्शी को कैसे कौन झेलेगा? 15 करोड़ तत्वदर्शी है भाई। 15 करोड़ तत्वदर्शियों को कौन झेल पाएगा अब? आओ

01:07:51:01 भाई कोई रामपालियों और बताओ क्या तुम तत्वदर्शी हो? पता है भैया हम अभी इनका एक जो ग्रंथ है ये लोग का जो किताब है जिसको ग्रंथ बोलना तो चाहिए नहीं गीता का। ठीक है गीता में गहरी नजर। हम बोलते हैं भाई उसने गीता में गहरी नजर लगा दी है। [हंसी] ग्रहण लग गया है ग्रहण। गीता में ग्रहण [हंसी] गीता में गहरी नजर उस पे जो पन्ना आप खोलिएगा वहां पे आपको 21 ब्रह्मांड शब्द मिलेगा ही मिलेगा लगभग हां हम इस ब्रह्मांडों का स्वामी हां अब हम जब इनसे सीधा पूछे ऐसे ऐसे लोगों से शास्त्रार्थ करने जाएं आचार्य गण बताइए इतने तटपुंजिया लेवल की बातें हैं ऐसे लोगों से शास्त्रार्थ होगा अच्छा वो लिंक डाल के पिन कर दो जिसको आना हो आ जाए हम तो आज पहाड़ी जी नहीं है उनके उनका बड़ा मन था ये सीरीज दोबारा चालू हो पाी जी का बड़ा मन था सबका मन है भैया ये वाला सीरीज में जो आप मिला के बताते हैं ना कि भाई कहां पे क्या लिखा है पहले क्या लिखा है बाद में क्या लिखा और दोनों के बात आपस में कैसे कट गई वो जबरदस्त लगता है इनका अपने ही बात से

01:09:06:02 मेल नहीं खाता है ना कोई कोई चीज हम आज देखो ये लोग ढिंढोरा पीटते घूमते हैं ना कि हमारे रामपाल की भक्ति करने से ये मिल गया हमको। अरे भैया रामपाल कुछ नहीं देता है। मना कर रहा है वो तो बिल्कुल मना कर रहा है। हमारे में आया था एक आया था आज ये ये किसके लिए लिख रहे हैं? बार-बार ये कमेंट बार-बार आ रहा है। किसके लिए लिख रहे हैं ये? हां समझ में नहीं आ रहा ना? नहीं अब लग रहा है जी जी बोलिए बोलिए। जी हमारे पास आज आज के लाइव में एक व्यक्ति आया था वो बोल रहा था कि हां सब सही है। रामपाल जी का ज्ञान सब सही है। हमने पूछा आप मेरे को बस आप सब कहां पे लिखा है? 21 ब्रह्मांड का जिक्र हमारे सनातन धर्म शास्त्र से दिखा दीजिए। बस इतना सा प्रमाण दिखा दीजिए। फिर वो लगता है सतलोक चल गया। फिर आया नहीं फिर। [हंसी] सतलोक चल गया वो। खोजने चल गया। कहां है आखिर किस ब्रह्मांड? कहां है भाई? वो बोलता है रुकिए रुकिए हम बता रहे हैं रुकिए बता रहे हैं ऐसा उसने दो तीन बार बोला फिर चल गया फिर आया नहीं दोबारा यही होता है सतलोक पूछ लो फिर सतलोक चल जाते हैं ये लोग सतलोक ये देखिए ब्रह्मांड का है अरे पहले मैं

01:10:21:08 पूछता पहले मैं ये पूछता था कि भाई जो ईश्वर होता है वो अजर अमर होता है तो ये तुम्हारा कबीर बूढ़ा क्यों है और अब तो रामपाल भी बूढ़ा है ये क्या चक्कर है तो वो लोग भाग आते थे इधर-उधर की बातें कर करके। बिल्कुल। आज भी यही हुआ है। आज जो है युगल जी का चैनल जो है उस पर हम लोग दिन में 2:30 बजे लाइव आते हैं। तो वहां पर एक व्यक्ति आया तो हमने उसे पूछा भाई कबीर परमेश्वर है। बोला हां हम बोले कि अजर हमारा अविनाशी है। बोला हां तो बोले अजर है। बोलता है हां बोलते हैं भाई देखो फोटो देखो। आप ही का वाला पूरा सीन वहां पे कॉपी हो गया भैया आज वाले में। ठीक है हम तो वो फोटो देखता है क्या बोलता है तो आप लोग बना दिए हैं हम [हंसी] फिर इसका मतलब कबीर है उसके चैनल पे भी तो वही फोटोस हैं हां फिर उसका जो चैनल था ना संत रामपाल जी का जो चैनल ऑफिशियल चैनल है उस पे हम लोग थंबनेल पे दिखा दिए देखो ये फोटो तो हमने नहीं लगाया ये तो तेरा बाबा लगा रहे हैं तो फिर वो वो चुप हो गया हां यही है फिर वो बोले अजर है तो बोलता है हां अजर है तो बोलता है अब अजर ऐसे सिद्ध करो तो बोलता है अजर अजर का अर्थ क्या होता है? हम लोग पूछे तो बोलता है अजर का अर्थ होता है अमर।

01:11:36:25 [हंसी] फिर बोले रामपाल दास जी महाराज परमेश्वर परम अक्षर ब्रह्म के उन अवतारों में से एक है जो आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा अधर्म का नाश करते हैं। अच्छा एक बात और समझो। ये रामपाल कल के स्टेटमेंट में बोला है कि मैं तो अपने आप को भगवान नहीं कहता। कहा है ना इसने? ये कहा है ना कल के स्टेटमेंट में? हां दास बोलता है। मैं तो मैं तो अपने आप को भगवान नहीं कहता। जबकि एक जगह पर इसने स्वयं माना है कि कबीर जो है आपके सामने इस समय अभी तो ये किताबों में तो लिखा ही है। बाकी कबीर जो है इस दास के रूप में आपके सामने खड़ा हुआ है। इसने बोला है ऐसे एक उसमें

01:12:20:12 जी यह तो बात है। अरे इनका बहुत अलग चलता है। यह लोग तो बोलते हैं कि इनका एक वीडियो है। उन्हीं के ऑफिशियल ऑफिशियल चैनल्स पे डाला हुआ है कि जी कबीर दास जी उनको मिले थे संत रामपाल को और वो रामपाल को अपना मंत्र दीक्षा देकर सतलोक भेज दिए। अब जो यहां पर है रामपाल वो उसका ही वेश में है। वो कबीर ही खुद रामपाल बन के बैठा है यहां पर। [हंसी] हां हां। तो अब अब इसमें एक प्रॉब्लम और आ गई है। देखो एक ऐसा नियम होता है कि जैसे किसी ने किसी को गाली दे दी या कुछ अपशब्द कह दिया, अपमान कर दिया। तो यदि वह व्यक्ति जीवित है तो कोर्ट कचहरी की कारवाई उसको स्वयं को ही करनी होती है। ठीक है? कोई और उसके एंड से नहीं लड़ सकता है क्योंकि वो जीवित है। अगर वो नहीं है तो कह सकते हैं कि हमारी आस्था को ठेस पहुंच रही है और इन्होंने हमारे इनके लिए यह कहा है। ठीक है? अब बात यह आती है कि अगर कोई व्यक्ति आज के डेट में रामपाल को कुछ कह देता है कि रामपाल फलाना ढिमका तो रामपाल के नाम से यह अर्जी नहीं जा सकती कोर्ट में। कि भैया इन्होंने रामपाल को कुछ कहा क्योंकि रामपाल तो सतलोक में है। रामपाल रामपाल कहां है? यहां तो कबीर है।

01:13:35:13 अब सतलोक से गवाही देने आए वो तब हम मानेंगे। ये तो कबीर है। यहां तो कबीर है। रामपाल तो सतलोक जा चुका है। तो इसका मतलब ये इन्होंने ये करके कि कबीर यहां पर है। रामपाल यहां पर नहीं है। जो लोग रामपाल को गाली देना चाहते हैं। मैं गाली का समर्थन मैं नहीं करता। मगर जो लोग रामपाल को गाली देना चाहते हैं, झूठों से उसका पूजन करना चाहते हैं, जो भी अपमान करना चाहते हैं इस प्रकार से तो इन्होंने उनके लिए मार्ग खोल दिया है यह कहकर कि रामपाल तो भैया वहां पर ऑफिशियली कहा है इन्होंने ऑफिशियली कि असली रामपाल तो वहां जा चुका है और जो है यहां पर जो है कबीर है तो अगर हम अगर हम अगर वो यह ले जाएगा नहीं इसने यहां वाले के लिए कहा है तो हम यह कहेंगे यह तो कबीर है ये तो कबीर है तो तुम किस वाले की बात कर रहे हो? हम तो उसकी बात कर रहे हैं जो जो सतलोक में है आप उसके लिए बात करो तो बड़ा उसमें मतलब माथा मथैया हो जाएगा वो व्यक्ति की कंप्लेंट दर्ज ही नहीं होगी। पुलिस वालों पुलिस वाले आएंगे उसके पास क्यों तुमने ऐसा क्यों कहा रामपाल के लिए कि भैया रामपाल तो सतलोक में आपको शिकायत किसने दे दी? [हंसी] समझ रहे हो? बिल्कुल बिल्कुल

01:14:50:24 है कोई रामपाल जी का शिष्य आ जाओ भाई ऊपर एक बार चर्चा हो जाए भैया से तुम्हारी किसी की मां ने उसको निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया हो जो रामपाल की बातों को सही समझता हो तो वो आए यहां पर मरदित शब्दों में हमसे बात करे चर्चा करे अपने रामपाल का अगर ज्ञान उसको ज्ञान लगता है तो बिल्कुल ठीक है बस कुछ एक दो मिनट और देखेंगे अगर कोई आता है और यहां संजीव करके कोई आए भाई अपना चेहरा दिखाएं जिससे कि आपको ऊपर लिया जा सके। जी जी संजीव जी

01:15:27:25 चेहरा दिखाइए ऊपर आइए। इस चैनल का नियम दीजिए। इस चैनल का नियम है। भाई चेहरा दिखाओगे तो आप आओगे ऊपर स्टेज पर। यह कौन लिख रहा है? रामपाल जी महाराज के शिष्य पूरी हलवा खीर लट्टू कचौड़ी जलेबी खाते हैं। हां वो खीर खीर वो नहाई हुई वाली है। कौन सी खीर खाते हैं? अब यही बताएंगे।

01:16:04:09 जय श्री कृष्णा। जय श्री कृष्णा। हां भाई। ठीक है। दिखा दो। आ जाओ। चल गए। मुझे लग वह दिखा नहीं पा रहे हैं। वो कुछ होगी वह अपनी मंशा लेके आए होंगे। यहां चलती नहीं दाल गलती नहीं यहां जल्दी किसी की है ना। ये थोड़ा सा ये बहुत ही वैसा एरिया आ जाता है ना डेंजर जोन तो यहां पे गुर्दा चाहिए। यहां आने के लिए गुर्दा चाहिए और गुर्दा किसी बाजार में नहीं बिकता है। गुर्दा जो एक पुरुष होता है वो अपनी माता के गर्भ से लेकर के जन्म लेता है। है ना? हम तो यहां अनिकेत जी चाहिए। अनिकेत जी लिख रहे हैं कि विष्ठा वाली भैया खीर

01:16:50:00 आप देखो ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति होता है तो उसको कभी-कभी जैसे नॉर्मल है तो तो कोई बात नहीं मगर कभी-कभी उसको दस्त भी होते हैं लूज मोशंस भी होते हैं और मान लो कि उस दिन उसको नहलाया गया और वृद्ध तो है ही रामपाल आयु में तो है ही ज्यादा कंट्रोल नहीं रहा थोड़ा बहुत वो दस्त वगैरह कुछ लूज मोशन वगैरह पदार्थ ऐसा कुछ बाहर आया उसी समय खीर से नहाया हुआ और फिर वो खीर आई और फिर वो प्रसाद में बढ़ गई तो वो विष्ठा भी आ गई खीर में मिलकर के है ना तो ये सब चीज है अगर यदि ऐसा हुआ तो ऐसा भी हो जाएगा [हंसी] ये लोग क्या ही बताएं भाई ये क्या सच्चाई है क्या झूठ है इसमें ठीक है कोई आ तो नहीं रहा है किसी चलिए फिर सभी को जय श्री राम नहीं है नहीं वो माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध नहीं पिलाया इनमें से किसी को किसी की ठीक है भाई जय श्री राम सभी को और इस सीरीज के साथ बने रहिएगा। बीच मतलब हमारे चैनल पर अक्सर क्या रहता है? बहुत गंभीरता बनी रहती है। है ना? बिल्कुल आक्रामक सी चीजें होती हैं और गंभीर विषय रहते हैं। बहुत ज्वलंत विषय रहते हैं। तो बीच में हफ्ते में सप्ताह में एक दिन ऐसा आएगा जब थोड़ा सा आप लाइट फील करेंगे और थोड़ा सा आपको कॉमेडी में मगर ये ध्यान रखना ये

01:18:05:15 जो आजकल की वो सड़क छाप कॉमेडी नहीं है। इसमें बहुत अपर लेवल की कॉमेडी है। दिमाग पंचर हो सकता है। तो बाम वगैरह लेके आए। ठीक है? सभी लोग जय श्री राम सभी को। जय श्री राम शास्त्र जी जय श्री राम जय श्री राम

Plans for this video (0)

No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.

🤖 Ask AI for suggestions

AI reads the remaining (unused) parts of this video and gives ideas for new videos: from where to where, hook, and what to remove from the middle. Suggestions follow the RULES and appear here as "AI Suggestion". You can review, edit or approve them.

Live: Required tasks are not set on the Rules page yet.

  • ⬜
    Hindi SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)

  • ⬜
    English SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.

  • ⬜
    Title (per Rules)

    Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.

  • ⬜
    Description

    YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.

  • ⬜
    End Screen

    YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.

  • ⬜
    Cards

    YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.

  • ⬜
    Playlist Automatic

    YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.

  • ⬜
    Thumbnail

    YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.

"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.

Playlists

Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).

A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:18:50 · 26 Aug 2026

पाखंडी का गीता ज्ञान भाग 8 अध्याय 5

% not set
☁️ Drive Not in Drive yet

🔗 This video is made from parts of these videos

A · Live गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन अध्याय 4 Ep-7 #satlokashram
Open at 00:45:48:26 Open at 00:47:11:25 Open at 00:49:12:21 Open at 01:20:29:10
A · Live रामपाल के चेलों का दोगलापन #तत्त्वदर्शीसंत #rampaljimaharaj
Open at 00:23:32:13 Open at 01:08:20:28

Notes

Description

(empty)

History

No changes yet.

✂️ Clip Cutter

⌨️ Keyboard shortcuts

Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop

▶

Start

End

🔍 zoom
Already used Plan clips
⚠️ () of this clip is already used in another video (green part). Fine if on purpose, otherwise change the times.
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)

Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".

Clips () · Total

Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.

Hook, full note for editor, status