No part of this video is used anywhere yet.
SRT: ⬇ SRT ⬇ Original file

.srt or .vtt (Hindi). The old file is backed up. After that the match for this video is rebuilt (may take a few minutes, keep the page open).

⬜ Not used yet · 00:00:02:07 – 03:05:14:00 (3:05:12)

00:00:02:07 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। अ सबसे पहले एक आपको शुभ समाचार प्रदान करना है। आदित्य [नाक से की जाने वाली आवाज़] वाहिनी की अपनी गौशाला लखनऊ में लक्ष्मणपुरी में प्रारंभ हो चुकी है और बेसिकली हमने इस गौशाला का निर्माण किया है जो जिनका कोई देखरेख करने वाला नहीं होती होता है। ऐसा जो गौवंश होता है जो हमें सड़कों पर मिलता है और कई बार उनको चोट होती है या उनको रोग होता है और उनको समय पर चिकित्सा नहीं प्राप्त हो पाने के कारण कई बार उनका शरीर भी छूट जाता है। शरीर नहीं छूटता है तो उन्हें बहुत सारे समय तक कष्ट का सामना करना पड़ता है। तो ऐसे सभी गौवंश जो हमें लक्ष्मणपुरी में हमने व्यवस्था कर ली है। ये

00:01:07:25 गौवंश को अब लक्ष्मणपुरी में यदि हमारी जानकारी में ऐसा कुछ आएगा तो हम अवश्य ही उनको एक संरक्षण प्रदान कर पाएंगे। तो यह गुरुदेव के कुछ वचन थे कि अपने जैसे 10 और खड़े करिए। पहले स्वयं स्वयं मैदान में उतरिए फिर अपने जैसे 10 अन्य को खड़ा करिए। तो उसी दिशा में यह हमारा प्रयास है और बहुत जल्द वीडियो इत्यादि के माध्यम से वहां की कुछ झलकियां आपको मिल जाएंगी गौशाला की। अभी फिलहाल आज हमारे साथ जो चर्चा में आ रहे हैं मयंक जायसवाल जी इनके साथ एक दो ढाई घंटे की चर्चा पहले पूर्व में हो चुकी है और उसमें कई सारी चीजें हैं जो स्पष्ट होती हैं उस चर्चा में भी उसी चर्चा को अभी कंटिन्यू किया जा रहा है और जिसने वह चर्चा नहीं देखी है तो वह उस चर्चा को अवश्य देख ले क्योंकि इस चर्चा में ऐसी कई बातें होने वाली हैं जो उस चर्चा से रिलेट हो करेंग तो इसलिए आप लोग उसको भी अवश्य देख लें। बहुत ही सारगर्भवित और अच्छी चर्चा

00:02:22:28 रही थी वो। जो भी पक्ष है जो कुछ समझना चाहता है अवतार विषय को लेकर के वो विरोध और प्रतिकार बाद की बात है मगर उससे काफी कुछ जानने को मिलेगा। निष्पक्ष होकर के देखें। जी जय श्री राम मयंक जी। आवाज आ रही है मेरी? हेलो जी जय श्री राम जी जय श्री राम अटक जी बताएं रहा है मेरा मेरा अटक रहा है या आपका अटक रहा है अटक रहा है अटक रहा है आपका पिक्चर अटक रहा है मैं मैं दूसरे फोन से आता हूं ये अटक रहा है मुझे सुनाई नहीं दे रहा हां जी हां जी नहीं मेरी साइड से मेरी साइड से मेरी साइड से आप दूसरे फोन दूसरे फोन से आ जाइए आप हां मैं एक काम करता हूं दूसरे पहुंचाता हूं। एक मिनट। हां।

00:03:26:04 आज सुबह एक बड़ी ही मार्मिक चर्चा हमने की थी जिसमें कि सरिता शर्मा जी थी जिन्होंने अपनी आपबीती सुनाई कि कैसे उनकी फूल सी बिटिया जो एकमात्र उनके जीवन का सहारा थी उसको धीरे-धीरे करके जहर भर के उसके मस्तिष्क में उसकी ही मां के विरुद्ध उसके के अपने पूर्वजों के विरुद्ध जहर भर के किस प्रकार से उस अकेली रहने वाली मातृशक्ति का जीवन का जो जीने का सहारा था वो उससे छीन लिया और विश्वास करिए जिसने वह चर्चा नहीं देखी वह अवश्य देखे और आपको हृदय आपका द्रवित हो जाएगा। यदि आप सत्य के पक्षधर होंगे तो आपके आंसू रुक नहीं पाएंगे और देखिए किस तरीके से वहां पर उस महिला की इकलौती संतान को उससे छीन लिया गया। संतान का किस तरीके से माइंड वाश किया गया। तो ये सब आप अवश्य देखें।

00:04:48:06 [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] ये कुछ सिद्धांत हमारे परंपरा प्राप्त वैष्णव सिद्धांत से मिलते हैं। फिर क्या करें? कुछ चीजें तो हमारी मुस्लिम से भी मिलती हैं। सबकी कुछ कुछ ना कुछ चीजें आपस में मैच कर जाती हैं। तो यह समस्या का कारण नहीं है। देखा जाता है कि गौ कौन से कारण है और प्राथमिक कौन से कारण है। जी मयंक जी जय श्री राम। जय श्री राम। अब अटक नहीं रहा ना अब तो? हां अब स्मूथ है जी [गला साफ़ करने की आवाज़] तो तो सबसे पहले तो मैं मतलब जहां तक हमारी चर्चा हुई थी उसको थोड़ा सा अप कर दूं क्योंकि पिछली बार मौका नहीं मिल पाया था तो मुख्य रूप से दो तीन बातें हुई थी एक तो आपके द्वारा ये कहा गया था कि ईश्वर जो है स्वभाव के विरुद्ध जा रहा है तो उसको मैंने क्लेरिफाई कर दिया था कि पैसे रहकर भी वो अपने स्वभाव में रह रहा है एक तो मुख्य ये बात थी एक दूसरी बात सहायता वाली थी कि ईश्वर आप बोल रहे थे कि जड़ प्रकृति की और आत्मा की सहायता ले रहा है। तो मैंने बताया निमित रूप से किसी कार्य में सहायता

00:06:03:13 नहीं ले रहा है। वो साधारण कारण और अपना इस तरीके से सहायता ले रहा है। साधारण कारण साधारण कारण और उपादान साधारण कारण के रूप में सहायता ले रहा है ईश्वर। हम एक तो ये बात थी थी और तीसरी बात मुख्य जो यहां पर आके अटकी थी अपनी कि शून्य क्रिया वाले विषय पे कि जिसको मैं विरोधाभास करके असंभव सिद्ध करना चाह रहा था उसको आप जो है शून्य क्रिया सिद्ध कर रहे थे। ठीक है? तो अब जो है कि अगर मैं उसको असंभव सिद्ध कर देता हूं। आप बोल रहे थे असंभव नहीं है शून्य। तो फिर वहां से मैं एक्सप्लेन करना चालू करता हूं। ठीक है? एक मिनट। एक मैं भी थोड़ा समराइज कर दूं। ठीक है। एक तो आपने जो हमारा मोटे-मोटे तौर पर तीन विषयों पर बात हुई थी। अ एक बात हुई थी कि भाई जब ईश्वर जो कुछ कर रहा है उसमें दूसरी चीजों का आलंबन भी ले रहा है। अब उस आलंबन लेने को आपने अभी नाम दिया है कि वो साधारण कारण के रूप में यूज करता है। इसलिए वो नहीं माना जाएगा। और उस दिन आपने कहा था कि ईश्वर

00:07:19:20 जड़ प्रकृति और चेतन जीव की जीव का क्या कहते हैं? आलंबन लेकर के और सृष्टि रचना करता है। और यह ईश्वर का कार्य है। इसमें वो किसी की सहायता नहीं लेता। आपने ये कह दिया है ना? मतलब जीव की सहायता लेकर और प्रकृति की सहायता लेकर सृष्टि रचना करना यह ईश्वर का कार्य है। अब यह जो दो सहायता आ गई सो आ गई। मगर अब इस सहायता को लेते हुए सृष्टि रचना करने में वो किसी की सहायता नहीं कर वो वो किसी की सहायता नहीं लेता इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। हां नियत रूप से और किसी की सहायता जी।

00:08:00:09 एक तो ये हो गया। दूसरा फिर हमने बात किया था लीला पर। ठीक है। लीला में बात यह आई थी। लीला में बात यह आई थी कि मैं उचित शब्द का उपयोग नहीं कर रहा था। मैंने कहा कि भाई स्वरूप विरुद्ध क्योंकि आप लोग लीला को स्वरूप विरुद्ध कहते हो तो मैंने उस चीज को लेकर के स्वरूप विरुद्ध आगे आगे करके बढ़ा। मगर आगे चलकर के फिर मैंने इसको क्लेरिफाई किया कि कुछ ऐसा आचरण जिससे कि सामने वाला दूसरा जो तत्व है वह भ्रमित हो सके। ऐसा आचरण ईश्वर करता है कि नहीं। तो वो हमने सिद्ध किया था उस उस समय भी कि ऐसा आचरण क्या कहते वो स्वरूप विरुद्ध है कि नहीं है ये तो बाद की बात है मगर ऐसा आचरण जिससे भ्रम उत्पन्न हो ये आचरण आर्य समाज का ईश्वर भी करता है ऐसे ही आचरण को हम लीला कहते हैं जिससे भ्रम उत्पन्न हो जाए सामने वाले को लगे कि भाई ये तो मैं ही कर रहा हूं। जैसे आपसे मैंने पूछा था कि भाई जब आप कोई कार्य कर रहे होते हैं तो उसमें थोड़ा आपने इधर-उधर की बात की थी मगर मूल वाली बात नहीं भ्रम वाली बात मैंने नहीं बोली थी भ्रम वाली बात आपने भ्रम आपने भ्रम नहीं बोली वो हमारे बीच में जब मैं अभी उस पर दोबारा बात कर लेंगे मगर ये वाली बात आई थी कि ईश्वर कुछ ऐसा कार्य करता है जिससे कि सामने वाला उसके उलट समझता है। इसी को हम लीला कहते हैं। अब यदि ऐसा आचरण आपने कहा ये आचरण करना भी ईश्वर का उसके स्वरूप

00:09:15:20 कार्य है इसलिए वो वो जो है स्वरूप विरुद्ध नहीं कहलाएगा तो बिल्कुल ठीक है अगर यह जो आचरण है भ्रम उत्पन्न करना वो ईश्वर के स्वरूप में है तो ठीक है यही हमारी लीला है इसी को हम लीला कह रहे हैं तो स्वरूप विरुद्ध हुआ ही नहीं फिर और तीसरा आपने वो शून्य क्रिया वाला कहा था तो शून्य क्रिया पर हम लोग काफी देर तक चले भी थे यह तीन चीजें हो गई इसके अलावा उप कुछ उपविषय भी थे जो उससे उत्पन्न हो गए जैसे कि एक आपने यह माना था कि जीव ही चेष्टा करता। जीव केवल चेष्टा करता है। उसके सारे कार्य ईश्वर ही करता है। एक ये आपने माना था। है ना? सारी क्रियाएं ईश्वर ही करता है। केवल जीव बस चेष्टा करता है। हम और इसी से निकल कर के फिर वो भी वो भी एक उपविषय आ जाता है कि अ बात ये है कि इंटेंशन क्या है? आसक्ति या भोग इंटेंशन है तो होने वाली क्रिया का दोष उस पर आएगा और यदि आसक्ति और क्या कहते हैं यह आसक्ति और भोग इंटेंशन नहीं है तो होने वाली क्रिया जो भी हो उसका दोष नहीं आएगा तो इस तरीके से उसी क्रिया से जुड़ा होने पर भी ईश्वर को दोष नहीं लगता। उसी क्रिया से जुड़े होने पर इंटेंशनली जुड़े होने पर इसको दोष लग जाता है जीव को। यह

00:10:31:03 दो उपविषय आ गए थे। और एक अनंत वाली बात भी हमारी अधूरी रह गई थी। ठीक है? अनंत वाली बात जो मैंने की थी वो भी अधूरी रह गई थी। तो अब हम सबसे पहले सबसे पहली बात जो अधूरी रह गई थी। एक बार बता अनंत वाली कौन सी बात अधूरी रह गई थी वो थोड़ा बता दें। जब मैंने पूछा था कि ये अनंत सामर्थ्यवान का अर्थ क्या है? तो आपने कहा कि अनंत सामर्थ्यवान का अर्थ है कि जो जो बल एक्सिस्ट करते हैं वह वह बल ईश्वर के अंदर अनंत रूप से हैं। असीमित रूप से। ठीक है? तो फिर जब मैं ये पूछ रहा था कि अवतार लेने का बल एक्सिस्ट करता है कि नहीं करता है? तो आप वो वाली बात अधूरी रह गई। वो एक्सिस्ट करता है कि नहीं करता? अब अब यदि अवतार को स्वरूप अब यदि अवतार को स्वरूप विरुद्ध कार्य कह रहे हैं तो इसका मतलब सीधा आ गया क्योंकि अवतार को आपने स्वरूप विरुद्ध कार्य माना हुआ है इसलिए वो अवतार नहीं ले सकता। ठीक है? तो अवतार लेने का वो जो बल है वो भी एक्सिस्ट नहीं करता और जब बल एक्सिस्ट नहीं करता तो उसका होने का जरूरी आवश्यक नहीं रहा। तो जो जो बल है उनका सबका सामर्थ्य है। ठीक है? ये है। ठीक है? है ना? कुल मिलाकर के जो पिछली चर्चा का आपका मैंने सार देखा तो उसमें

00:11:46:19 आपने ईश्वर के यह कार्य हैं या फिर मतलब कुल मिलाकर के सारी बात यही है ईश्वर के कार्य क्या है या ईश्वर का स्वरूप क्या है ये पहले हमने निश्चित कर लिया है हम प्रमाण के आधार पर प्रमाण के आधार पर हमने पहले निश्चित कर लिया कि ये ये ईश्वर का स्वरूप है। अब् हमने प्रमाण के आधार पर जो भी हमने हमने अपने अर्थ के आधार पर प्रमाण के अपने अर्थ के आधार पर हमने यह तय कर लिया कि ईश्वर के यह कार्य हैं। अब जो भी कार्य इसके विपरीत आएंगे वो सब जो है उसके स्वरूप के विरुद्ध होने के कारण स्वीकार नहीं किए जा सकते। है ना? यानी कि ईश्वर का अवतार निषेध इसलिए है या उसका जो है सर्वशक्तिमान इस तरीके से अवतार ले सकने वाला वाले होने के रूप में इसलिए निषेध है क्योंकि हमने हम पहले यह मान लें कि जो शास्त्रों का अर्थ आर्य समाज के अनुसार जो स्वीकारा गया है पहले हम उसको स्वीकार कर लें और अब क्योंकि इस स्वीकारे हुए अर्थ के विरुद्ध वो कार्य है तो अब क्यों एक यही यही है मैं मैं बता दूंगा आपको कैसे है ये क्योंकि [गला साफ़ करने की आवाज़] अब जो सारे कार्य हैं वह ईश्वर के जो अब जो कार्य

00:13:01:27 हैं वो क्योंकि ईश्वर के स्वरूप के विरुद्ध है तो इसलिए वो ना होना उसकी सर्वशक्तिमत्ता को भंग नहीं करता। ठीक है? ठीक है? ये ये है। अब ये स्वरूप अब ये बात है कि आपने ये नहीं बोला। मगर आपने ये बोला कि यह कार्य जो है ईश्वर का स्वरूप है। यह स्वरूप वाली बात बार-बार आई। जैसे कि जब मैंने पूछा कि भाई ईश्वर कार्य ईश्वर कर रहा है पर अ प्रतीति ऐसी हो रही है कि स्वयं मनुष्य ही कार्य कर रहा है। जबकि कार्य तो ईश्वर कर रहा है। तो आपने कहा इस तरीके से कार्य करना भी उसका स्वरूप है। जैसे मैंने कई बार इसको कहा कि भाई यहां पे तो ये मिथ्या आचरण हो गया ना। तो आपने कहा ये मिथ्या आचरण नहीं हुआ। मिथ्याचरण इसलिए नहीं हुआ क्योंकि इस तरीके से कार्य करना ही ईश्वर का स्वरूप है। मिथ्या मतलब जिसको मैं मिथ्या कह रहा हूं। फिर मैंने मिथ्या को खोला। मिथ्या को मैंने खोला कि भाई ऐसा आचरण जिससे कि भ्रम उत्पन्न हो जाए। तो भ्रम तो उत्पन्न हो रहा है। इसको तो मानना ही पड़ेगा। भाई कर ईश्वर रहा है। मगर मुझे लग रहा है कि मैं कर रहा हूं। है ना? तो भ्रम मानना पड़ेगा। इसको आप भ्रमित बोल रहा हूं। भ्रम अब एक-एक करके करते हैं। अब एक एक करके अब एक पिछली बार जहां पे अधूरी रखी थी उसको कंप्लीट कर दूं मैं। जो पॉइंट था

00:14:16:28 वाला शुरू शुरू से चलिए शुरू से पीछे से अधूरी है पीछे से अधूरी है वो ठीक है पर जो अटकी थी जहां पर आप बोल रहे थे असंभव नहीं है शून्य असंभव नहीं है शून्य उसको कंप्लीट कर दूं मैं असंभव शून्य का अंतर तो शुरू की भी बातें अटकी है ना आपने कहा था मैंने भी प्रश्न नहीं किया तो आए थे हम उस पे शुरू की बातें अटकी है सारी बातें अटकी थी ना उसप भी आएंगे पर ये जो चर्चा चल रही थी उसप कंप्लीट तो कर दूं मैं अगर आपको उस जो चर्चा चल जो चर्चा चर्चा शुरू में चल रही थी वह पहले कंप्लीट करी है ना तो वह तो कंप्लीट हो गई थी ना उसमें क्या बचा था आपको कंप्लीट नहीं आपने कहा था मैंने एक भी प्रश्न नहीं किया था तो मैंने कहा था ठीक है अब कर लीजिए भाई मैं तो पूछना चाह रहा था जब हम जब हम पहले जो टॉपिक चल रहा था वो था कि जब ईश्वर बिना ईश्वर सहायता ले रहा है तो फिर उसको सर्वशक्तिमान क्यों कह रहे हैं तो फिर आपने उसको कंप्लीट नहीं हो पाई फिर हम लीला पे आ गए लीला कंप्लीट नहीं हो पाई जब मैं वापस वहां जा रहा था तो फिर यह हुआ था मैंने एक भी प्रश्न नहीं पूछा है तो मैंने कहा था ठीक है आप पूछ लीजिए प्रश्न और फिर ऐसे करके हम वहां पर पॉइंट बताइए कौन से पॉइंट पे कंप्लीट नहीं होते आपको आप पहले शून्य वाला बता दीजिए चलिए शून्य वाला चलो ठीक है शून्य का ये था कि जो जिस प्रकार के मैं कार्य बताना चाह रहा था जो लॉजिकली कंट्राडिक्शन जिनको बोलते हैं लॉजिकल इंपॉसिबिलिटी

00:15:32:09 या विरोधाभास जिसे कहते हैं तो उनको आपने एक शून्य क्रिया का नाम दे दिया उनको शून्य क्रिया नहीं बोलेंगे उनको असंभव बोलेंगे ठीक है अब इसका कारण क्या है कि शून्य क्रिया और असंभव क्रिया की परिभाषा में भेद है। शून्य क्रिया उसको बोलते हैं मतलब शून्य क्रिया यानी फिजिक्स के सेंस में जिसको कहा जाता है वर्क डन जीरो वर्क डन ऐसा कुछ नल लक्षण बोलते हैं। तो यानी कि एक प्रयास हुआ लेकिन कोई कार्य ना हुआ है ना उसको बोलते हैं शून्य क्रिया। असंभव उसको कहा जाता है जो तार्किक रूप से संभव ही ना हो। कभी संभव ही होना मतलब संभावना ही नहीं है कुछ संभव होने की। उसको बोलते हैं असंभव। तो मैं जिस दिशा में ले जाना चाह रहा था बात को आपने उसको शून्य क्या नाम दिया। तो वो तो वहां अटक गई मैं बोल रहा था बार-बार असंभव है और आप बोल रहे थे नहीं है। मतलब कुल मिलाकर के इसमें भी प्रमाण आ गया। नहीं नहीं प्रमाण नहीं ना। अभी तक आप आप प्रमाण दे रहे हैं ना कि शून्य क्रिया का मतलब तो ये होता है जो हम बता रहे हैं। नहीं हम नहीं बता रहे। ये तो आप इसको मानते या नहीं पहले मैंने जो बोला ये बता दीजिए। मैं मैं इसको मैं बताऊंगा। फिलहाल मैं आपसे पूछ रहा हूं। इसमें आप प्रमाण ही तो ला रहे हो कि आज की फिजिक्स की टर्म्स ये हैं। देता हूं। आज की फिजिक्स की टर्म्स ये है। हां जो आपने शब्द उपयोग किया ना उस शब्द का अर्थ जो हिंदी आपने शून्य क्रिया उपयोग किया और मैंने जो असंभव उपयोग किया तो उसका जो हिंदी में जो अर्थ होता है उसी को लेंगे

00:16:47:18 ना और क्या अर्थ लेंगे हिंदी में सर्व का अर्थ क्या होता है सब कुछ तो फिर क्यों नहीं ले रहे सब कुछ ले रहे ले रहे कहां ले रहे हो आप कह रहे हो वो सब कुछ जो मेरे उसमें आता है सीमा में वो सब सर्वज्ञ में भी सब सर्वज्ञ में भी जो ज्ञान जानना संभव हो सब कुछ आ रहा है सर वो वही आ गया ना उसमें उसमें आपने जोड़ दिया ना उसमें आपने जोड़ दिया ना आप ऐसा ऐसा तो आपने भी मना करा था ना कि ये क्रिया ही नहीं है ये क्रिया है ही नहीं तो वहां क्रिया है ही नहीं वो वो बात बिल्कुल ठीक है वो क्रिया है ही नहीं आप मुझे बता दो क्या करना है इसीलिए तो मैं बता रहा हूं आपको तो अब मैं मैं इसको मैं इसको मैं इसको ऐसे ले लेता हूं आपने कहा कि वो शून्य क्रिया नहीं है। वो असंभव क्रिया है। ठीक है? असंभव है। असंभव असंभव। अच्छा ऐसी क्रिया को क्या कहेंगे जो पूर्व में हुई थी मगर अभी असंभव है। क्रिया तो एक्सिस्ट कर रही है। कभी हुई है दुनिया में मगर अभी असंभव है। होना उसको क्या कहेंगे? नहीं फिर जिसके द्वारा हुई थी उसमें सामर्थ्य अभी है या नहीं वो प्रश्न आ जाएगा। तो प्रश्न आएगा तो मगर क्रिया तो अभी है ना। असंभव नहीं हो पा रही ना। असंभव क्रिया

00:18:02:21 उसी को कहेंगे। असंभव क्रिया उसी को कहेंगे। सबसे पहले क्रिया का अस्तित्व माना जाएगा और क्रिया का अस्तित्व मानने के बाद उसमें असंभव लगेगा कि हो नहीं सकती। एक मैं पूरा कर लूं। पूरा कर लूं। मैं पूरा कर लूं। मैं पूरा कर लूं। सीधी सी बात है। मेरा क्लेम यह है। ईश्वर सब कुछ कर सकता है। आप हम आप हमें कार्य बता दो। हम कर देंगे। बताओ क्या कार्य है? करना है जो हां हां तो जो मैं कार्य बता रहा हूं उसको आप शून्य बोल रहे हैं। मैं असंभव बोल रहा हूं। वो वो कार्य वो कार्य नहीं है। एक शब्द है आपकी पंक्ति है। उसका कोई अर्थ ही नहीं है। वो कार्य मैं क्यों बोल रहा हूं भाई असंभव मैं तो कह रहा हूं। आप मुझे क्रिया दो मैं कर दूंगा। मैं क्यों बोलूं वो संभव है। वही तो मैं वही तो बोल रहा हूं। क्रिया होना ही संभव नहीं है। क्रिया वो क्रिया है ही नहीं ना। वो शब्द है आपका केवल। एक तो आप बता दीजिए शून्य क्रिया का अर्थ क्या होता है? वो बता दीजिए आप। मैंने शून्य क्रियाओं से कहा है जो क्रिया है ही नहीं जिसका अस्तित्व ही नहीं है। मैंने शून्य क्रियाओं से कहा असंभव का क्या होता है मतलब? क्रिया एक्सिस्ट करती है मगर वो हो नहीं सकती। क्रिया एक्सिस्ट करती है। क्रिया एक्सिस्ट क्रिया एक्सिस्ट करती है। लॉजिकली एक्सिस्टेंस है उस क्रिया का। ये आप बोल रहे हो। हां हां लॉजिकली एक्सिस्टेंस है उस क्रिया का। असंभव थोड़ी बोला जाएगा उसको।

00:19:18:09 क्या कहा जाएगा? लॉजिकल इंपॉसिबिलिटी को ही असंभव कहते हैं। मैं ये समझाना चाह रहा हूं आपको। तो यही देखिए यहां पर बात आ गई प्रमाण की कि आप मैं जो मैं जो शब्द उसे दे रहा हूं आप वो नहीं लेना चाहते हो दूसरा लेना चाहते हो आप जो देना चाहते हो मैं नहीं लेना चाहता हूं और क्या कहते हैं मैं दूसरा देना एक मिनट मैं दूसरा दे ये प्रमाण की बात है अब बात आ गई सीधीसीधी बात मेरा क्लेम है कि ईश्वर सारी क्रियाएं कर सकता है अब आप क्रिया मुझे दे दीजिए मैं बता दूंगा कर दिया कौन-कौन सी क्रिया करनी है आप आप ठीक है आप ये लाइन बोल रहे हैं अच्छी बात है आप ये बोलिए ना कि ईश्वर सारी क्रियाएं कर सकता है। सारी संभव क्रिया कर सकता है। अरे भाई तो क्रिया का मतलब ही संभव है। क्रिया का मतलब ही संभव है ना। असंभव असंभव नहीं कर सकता। सिंपल क्रिया वो क्रिया है ही नहीं जिसमें आप असंभव लगा दोगे। अगर आपका वाला संभव ले लिया जाए। अगर आपका वाला असंभव ले लिया जाए तो वो क्रिया है ही नहीं। क्रिया तो वही है जो संभव है। ठीक है? असंभव है ना? असंभव है ना? यानी वो जो संभव नहीं है। आप मैं ये आप थोड़ा शांति से सोचिए। जो संभव नहीं है उसी को तो असंभव कहते हैं। बात यह है कि वो क्रिया ही नहीं है। मैं क्यों बोलूं आपकी बात? वो क्रिया ही नहीं है ना। मैं यह कह रहा हूं। मैं ये कह रहा हूं आप मुझे आप सीधी बात है।

00:20:34:24 तार्किक रूप से क्रिया है ही नहीं। वो तार्किक रूप से जो क्रिया नहीं होती उसको असंभव कहा जाता है। मैं ये समझाना चाह रहा हूं आपसे। ये ये आपकी परिभाषा है। मैं तो उसे शून्य क्रिया कहता हूं। ये हिंदी हिंदी आप हिंदी डिक्शनरी इंग्लिश। हां तो भैया बात आ गई प्रमाण की ना? बात आ गई प्रमाण की हिंदी की डिक्शनरी आपको कहां से मिली? चलिए हिंदी की डिक्शनरी कहां से मिली? उदाहरण हिंदी की डिक्शनरी कहां से मिली? और मैं मैं पूछ रहा हूं हिंदी मैंने आपसे मैंने पूछा हिंदी की डिक्शनरी कहां से मिली आपको? अरे उस पे आ जाएंगे। एक थोड़ी सी बात और सुन लीजिए बीच में। मैं ये बोल रहा हूं आपने और मैंने बोल शब्द का उपयोग किया था। तो क्या आपने बोलर शब्द का उपयोग करते समय अर्थ समझाया था मुझे? नहीं समझाया था ना? यानी आप ये मान के चल रहे थे कि मुझे जो अर्थ पता है उस हिसाब से वो बात कर रहे क्योंकि क्योंकि बोतल शब्द के अर्थ में हम दोनों एकमत थे इसलिए नहीं समझाया। अब अर्थ में ही तो समस्या आ रही है। अब इस अर्थ में एक मत हो जाते हैं। शून्य क्रिया और किस अर्थ में? किस शून्य क्रिया और असंभव असंभव और शून्य पे। तो आप हो जाओ शून्य बना लो उसको। जिसका अस्तित्व नहीं है ऐसी क्रिया। हां। तो इसी को तो असंभव बोलते हैं। अब आप सामान्य हिंदी में ये आप बोलो भाई। हम नहीं बोल रहे ना। हम कह रहे हैं कि ऐसी कोई क्रिया नहीं है जो ईश्वर कर सके। अब जो क्रिया है आप बताओ तो सही कौन सी क्रिया

00:21:49:27 करनी है ईश्वर को? चलिए जैसे मान लो आप अपनी वो आप अपनी वो जो क्रिया है वो दोबारा बोल लो एक बार क्या क्रिया है वो जरा बोलो। क्रिया कोई भी विरोधाभास लीजिए जैसे कहा जाता है कि ईश्वर क्या वैश्या को कुमारी बना सकता है? क्या ईश्वर अपना अंत बता सकता है? क्या कुल मिलाकर के इसमें आप दो ऐसी बातें बोल रहे हैं जो एक दूसरे को कंट्राडिक्ट करके एक दूसरे को समाप्त कर देती है। ठीक है? तो क्रिया कहां से हुई? यह तो शब्द मात्र है। तो इसीलिए तो यह आपस में जो दो बातें एक दूसरे को घाटती है उसी को लॉजिकल कंट्राडिक्शन कहा जाता है। इसी को इसमें सामर्थ्य की बात कहां आ गई? आप हमें क्रिया दो ना इस पत्थर को सरकाना है। सरका देगा। आप हमें क्रिया दो भाई। हमें पंक्ति ठीक है। मैं समझ रहा हूं। आप समझ पा रहे हैं। मैं असंभव इसको बोलना चाह रहा हूं। मैं कह रहा हूं असंभव क्रिया जिसे आप कह रहे हैं वो है ही नहीं। वो क्रिया ही नहीं है। जिसको आपने असंभव कह दिया वो क्रिया ही नहीं है। क्योंकि क्रिया का तो मतलब ही है कि जो हो वो क्रिया है ही नहीं। शून्य है। उसका अस्तित्व ही नहीं है। अभाव क्रिया है। अभाव है उसका। हमारी देखिए मैं मैं बताऊं। मैं बताऊं। जैसे आपने कहा उस उस दिन की बात मैं आपको बता रहा हूं। क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा सके?

00:23:05:08 तो इसमें आपने ईश्वर कह के पत्थर ना उठाने वाली बात को काट दिया और पत्थर ना उठाना कह के ईश्वर वाली बात को काट दिया। इस तरीके से आपने कहा आपने अपनी आपने कहा कि क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? फिर आपने कहा कि ईश्वर को ऐसा नहीं करना है। ईश्वर ईश्वर को ऐसा सिद्ध करो। फिर कहा ईश्वर को ऐसा सिद्ध ना करो। ये आपने कहा। ठीक है? यानी आप ही कह रहे हो ये करो फिर कह रहे हो नहीं करो। यानी कि यह ऐसे करो कि कुछ ना करो। अब जब मैंने आपसे पूछा कि भाई इसमें क्रिया क्या है? मुझे क्रिया बताओ ना जहां पर फोर्स का उपयोग हो, किसी सामर्थ्य का उपयोग हो। वो सामर्थ्य बताओ। वो क्रिया बताओ जिसमें सामर्थ्य का उपयोग हो, बल का उपयोग हो, किसी प्रकार की शक्ति का उपयोग हो। आपने कहा मैं क्यों बताऊं? सिद्ध आपको करना है। इसका मतलब आपको भी नहीं पता है उसमें क्रिया क्या है। उसमें क्रिया क्या है? नहीं पता है। आप नहीं बता रहे हो ना कि भैया ये ऐसे करने पर ये होगा। आप नहीं बता रहे हो। आप कह रहे हो मैं क्यों बताऊं? एक मिनट पूरा कर तो आपने कहा कि मैं क्यों बताऊं सिद्ध आपको करना है। भाई मुझे वो करके दिखाना है। आपको बताना है करना क्या है? तो आपको बताना होगा ऑब्जेक्टिवली कि भैया यह कर सकता है क्या? तो आप

00:24:20:12 वो बताने से पीछे हट रहे। मैं क्यों बताऊं? इसका मतलब कि क्या ईश्वर ऐसी कोई क्रिया कर सकता है जो मुझे खुद ना ज्ञात हो। अगर मैं प्रश्न करता हूं तो क्या ईश्वर कोई ऐसी क्रिया कर सकता है जो मुझे खुद ना ज्ञात हो? यही तो हुआ। मतलब ईश्वर को कुछ ऐसा करना है कि आपको कुछ ना पता हो। ये आपका प्रश्न है। तो इसका मतलब क्या हुआ? ऐसे बहुत से कार्य हैं जो ईश्वर करता है जो आपको नहीं पता है। जिनका ज्ञान आपको नहीं है। हो गई क्रिया। देखिए आप शब्द कुछ भी आप बात ये है आप शब्द कुछ भी बोले उसके मूल में इंफॉर्मेशन आएगा। आप शब्दों को ना शब्द चेंज कर दीजिए मुझे मैं हट जाऊंगा इस टॉपिक से आप शब्द चेंज कर दीजिए आप उसको असंभव बोल कौन सा शब्द चेंज कर दूं शून्य को असंभव बोल दीजिए आप क्यों बोलू हां तो यही यहां अब हम अब हमको इस पे आना पड़ेगा ना कि शून्य का मतलब क्या होता है और असंभव का मतलब क्या होता है इसी पे आना पड़ेगा ना अभाव अभाव मेरा शून्य का मतलब है अभाव जिस क्रिया का अस्तित्व नहीं है अस्तित्व नहीं है और अस्तित्व हो भी अच्छा अस्तित्व नहीं है और अस्तित्व हो भी नहीं सकता अस्तित्व नहीं है। अस्तित्व हो भी नहीं सकता। ये फिर वही आ फिर वही अभाव क्रिया अब जितना पीछे जाओगे

00:25:35:15 मैं फिर दूंगा। फिर इसमें भी अभाव है। भाई जिसका अस्तित्व नहीं है उसका अस्तित्व हो नहीं सकता। दोनों बातें एक दूसरे को फिर काट रही है। देखिए देखिए मेरी बात सुन लीजिए। मेरी बात सुन लीजिए। उस दिन भी इस टॉपिक पे बहुत अच्छे से हो गई थी। आज भी हो गई है। अब आपको आगे करनी है चर्चा कि नहीं करनी है ये बता दीजिए। अब तक हमारे अब तक हमारे बीच में जो हुआ है वो वो जनता देख चुकी है। ठीक है? वो निर्णय कर लेगी कि शून्य क्रिया पे मैं गलत हूं। अभाव क्रिया पे मैं गलत हूं या आप गलत हैं। यहां कोई निर्णायक तो बैठा नहीं है। नहीं नहीं नहीं सही बात है। मैं मैं इस पे खाली एक लास्ट लाइन बोलता हूं। फिर अगले टॉपिक पे जाते हैं। इसमें सिर्फ इतना है कि यहां पर मतभेद हमारा जो है परिभाषा को लेकर के कि आप शून्य का मतलब क्या समझ रहे हो और मैं शून्य का मतलब और भाव का मतलब क्या? प्रमाण पे भी मैं ही जीतूंगा। प्रमाण भी मैं जीत जाऊंगा। यहीं पे यहीं पे यहीं पे खत्म करें ना इस टॉपिक को। मैं कह रहा हूं इस बात पे भी मैं आपको चित कर सक मतलब अगर एज ए आर समाजी आप मेरे सामने खड़े हो तो मैं इस पे भी आपको चित कर दूंगा। आप मेरे सामने प्रमाण लाएंगे मैं उसको चित्त कर दूंगा। अरे उसप तो आप चाहते हैं मैं लाऊं प्रमाण? आए उस पे या फिर आप अगले टॉपिक पे जाना चाह रहे हो। अगर आप प्रमाण लाना चाहते हो तो ला सकते हैं। फिर मैं पूछूंगा कहां से आया प्रमाण आपके पास? मैं आपसे पूछूंगा कि आप यदि वैदिक आप वैदिक हैं तो वेद

00:26:50:21 कहां से आया? बता दो। वेदों के प्रमाण की बात नहीं कर रहा हूं मैं। यह शून्य क्रिया और असंभव क्रिया हिंदी के शब्द है। भाई आज के जो वर्तमान के जो आचार्य गण हैं जो वेद ला के आपको दे रहे हैं उनकी जो परिभाषा है यदि आप कोई ऐसा प्रमाण ला रहे हैं जो उनकी परिभाषा को कट करेगी तो हम पूछेंगे ना फिर आप वैदिक कैसे? तो घोषित करो मैं भैया वेदों के बारे में। मैं अपनी तरफ से परिभाषा नहीं दे रहा हूं ना मैं। आपकी परिभाषा से ही बता रहा हूं। मैं अपनी तरफ से परिभाषा दूं तब आएगी ना वो बात तो मैं आपकी तरफ से प्रमाण ला रहे हैं ना प्रमाण ला रहे हैं ना आपका ही परिभाषा है आपका ही है मेरा नहीं है फिर प्रमाण की जरूरत क्या है जब मेरी परिभाषा है तो हां तो मैं वही दर्शाना चाह रहा हूं कि आप अपने परिभाषा के ही अभी आपने क्या अभी आपने क्या कहा कि मैं प्रमाण लाऊं प्रमाण का मतलब ही है कि आप कहीं से ला रहे हैं बताइए कौन सा है मेरा प्रमाण बताइए एक इसमें ये आता है अपने एक सेकंड में लिखा था शायद एक मिनट

00:27:47:22 हां नास्तिक आस्तिकवाद कृपात्री जी के द्वारा लिखी गई है। इसमें यह बात आती है कि ईश्वर वैश्या को इस जन्म में तो नहीं लेकिन मैं पढ़ चुका हूं मेरे भाई मैं पढ़ चुका हूं। ये किताब आपके पास कहां से आई है? ये बताइए। फस गए? आपके पास से आई है। आपके पास से आई है। मेरे पास तो इसकी इसका जो सही अर्थ है वो कौन बताएगा? आप बताओगे? तो फिर मैं सही अर्थ के पक्ष में जो परिभाषा बता रहा हूं वही इसका अर्थ है। लोग इसका इसका इसका जवाब देता हूं। इसका जवाब देता हूं। हां दो बात यह है कि आप ये कहना चाह रहे हो कि आप अगर मेरे ऊपर प्रश्न उठाना चाह रहे हो आपका ये मत है कि तो आपको मेरी बात से आप डिसए्री नहीं कर सकते। अल्टीमेटली पॉइंट नहीं नहीं नहीं। आपको अपने पक्ष में यदि मेरी सामग्री जो मुझसे प्राप्त हो रही है। आपको अपने पक्ष में यदि मेरी सामग्री का उपयोग करना है तो उस संबंध में अपनी प्रामाणिकता या तो बतानी होगी मुझसे स्वतंत्र हो के मुझसे स्वतंत्र हो के उस उस सामग्री का उपयोग करने के संबंध में अपनी प्रामाणिकता बतानी होगी और नहीं तो मेरी प्रमाणिकता को मान लो वरना बुलाओ मत बीच में काम खत्म बिल्कुल बिल्कुल इसका इसका इसका एक्सप्लेनेशन देता हूं सरल रास्ता मुझे मुझे स्वतंत्र होके अपनी तरफ से परिभाषा देने की आवश्यकता नहीं है क्यों नहीं है क्योंकि एक चीज होती है जिसको बोलते हैं अभगम

00:29:03:06 सिद्धांत या फिर दुर्जन दोष न्याय बोलते हैं शायद आप उसको यानी आपके ही मत या तो मैं अगर तुम्हारी कोई चीज मैं समझ गया दोष न्याय आप मेरे मान के चल रहे हो कि मैं आपकी बात मान के चल रहा हूं 10 10 15 सेकंड आप बोलने तो दीजिए कर लो कर लो कर लो इसमें होता क्या है शायद इंग्लिश मेंटेन सिटी बोलते हैं इसको इसमें क्या होता है कि सामने वाले की ही प्रमिस लिया जाता है उसकी किसी बात को मान भैया ये मैं जानता हूं यहां बैठे सभी दर्शक जानते हैं यहां बैठे सभी दर्शक जानते हैं ये 10 सेकंड आप बोलने नहीं दे रहे। 10 सेकंड में कंप्लीट हो जाएगी बाकी कुछ की बातें ले जा रहे हो ना उस दिन कितना कट टू कट चल रहे थे। अभी आप व्यर्थ आपने अभी भी एक्सटेंड किया ना वो मामला कुछ नहीं जीरो है वो। चलिए आप जानते हैं ना दुर्जन दोष ने न्याय ठीक है। ले लीजिए। तो आपने मेरी बात को एज इट इज थोड़ी ना लिया है। आपने किताब में पढ़ के उसका इंटरप्रिटेशन अपना निकाला है। मैं तो मैं इंटरप्रिटेशन वो है जिसके पक्ष में मैं बात कर रहा हूं। यानी अगर यहां पर असंभव शब्द इसका मतलब क्या है? इसका मतलब क्या है? असंभव शब्द आया है। नहीं शब्द आया नहीं कर सकता इस जन्म में। इस असंभव आया है। इसका मतलब ये है कि आप यहां उस असंभव शब्द का मतलब वही है अभाव क्रिया। उस असंभव का मतलब वही है अभाव क्रिया। आपका वाला असंभव नहीं। ठीक है। ठीक है। यानी अपने हिसाब से आप इंटरप्रिटेशन निकाल रहे

00:30:18:09 हैं कि इसका मतलब अभाव है। अपने हिसाब से नहीं। परंपरा प्रामाणिक रूप से कर्पात्री जी से जुड़े होने के वजह से मैं निकाल रहा हूं। आपको शंकराचार्य जी से मना करवाना पड़ेगा। उस संबंध में हां करपात्री जी ने कहीं पर भी शून्य अभाव अभाव क्रिया शून्य क्रिया बोला ही नहीं अरे भैया तो ऐसे तो वेदों में भी सर्वशक्तिमान बोला है अनंत अबाद बोला है ये नहीं बोला गया जिसके उसके स्वभाव के अनुसार वो कार्य कर सकता है बहुत सी बातें नहीं बोली है आप आप जस्टिफाई कैसे कर रहे हैं मैं वो जानना चाह रहा हूं यानी आप इसका शून्य असंभव का अभाव कैसे ले रहे हैं मैं जस्टिफिकेशन जानना चाह रहा हूं कैसे कर रहे हैं आप असंभव का अभाव ऐसे ही ले रहा हूं ना कि वो केवल एक शब्द मात्र जैसे कि धर्मनिरपेक्ष जैसे कहा जाए कि भैया ये जो क्या कहते हैं यह मैं एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति हूं। ठीक है? धर्मनिरपेक्ष का मतलब क्या हुआ? कि मैं सभी धर्मों को बराबर रूप से देखता हूं। कहां से देख लेगा? इस्लाम कह रहा है कि जो वैदिक है वो काफिर है। वेद कह रहा है कि जो दूसरे जितने भी मार्ग बनाए गए, वो सब गलत है मेरे अलावा। इसी प्रकार की बात बाइबल कर रही है। जैसे ही आपने सबको कहा, ये केवल एक शब्द बन करके रह गया और आपका धर्म हुआ ये किसी को ना मानने वाला। आपका धर्म अभी भी है। आपका अभी भी आप धर्मनिरपेक्ष नहीं है। आप हो गए किसी को भी ना मानने वाले। आपने सबको अमान्य कर

00:31:33:15 दिया। तो धर्मनिरपेक्ष एक शब्द बन करके रह गया केवल। उसका कुछ अर्थ नहीं है। जिस व्यक्ति ने कहा मैं धर्मनिरपेक्ष हूं। एक मिनट। जिस व्यक्ति ने कहा मैं धर्मनिरपेक्ष हूं। वो व्यक्ति स्वयं नास्तिक सिद्ध हो गया। किसी भी धर्म को ना मानने वाला। क्योंकि उसने कुरान की वो बात नहीं मानी कि वो काफिर है। कुरान को ना मानने वाले। वेद की वो बात नहीं मानी। भेद भी बहुत बराबर है। कट रही है बातें कट रही है। आप ये कहना चाह रहे हैं कि वो धर्म धर्मनिरपेक्ष की वजह से जो अनंत दूसरी दूसरी बातें एक दूसरे को काट रही है तो मान ही नहीं सकता। सही बात है। तो अब इसका यानी ये पॉइंट यहीं पे अब इस हिसाब से क्लोज हुआ कि आप उसका इंटरप्रिटेशन असंभव को अभाव के रूप में दे रहे हैं। ठीक है? भाई मेरी किताब आप लाए तो उसका इंटरप्रिटेशन मैं दूंगा ना। तीन बेर खाती थी वो तीन बेर खाती है। इसका इंटरप्रिटेशन कौन देगा? बेर शब्द का उपयोग दो बार हो रहा है। नहीं तो अब इस इस पर अगर आप भाई जाकिर नायक सुनिए फाउंडेशन की बात सुन लीजिए मेरी बात सुन सुन लेंगे मेरा मेरा एक पॉइंट सुन लीजिए इसका जस्टिफिकेशन आपका यही है ना कि भाई मैं जो बोल रहा हूं वही मानना पड़ेगा और मैं करपात्री जी के हिसाब से एक्सप्रेशन नहीं दूंगा जो मैं दूंगा वो फाइनल है अल्टीमेटली आपका पॉइंट यही है नहीं मैंने करपात्री जी के हिसाब से दिया है क्योंकि मैंने उनके परंपरा प्राप्त शिष्य से उस ग्रंथ को पढ़ा है आपने नहीं पढ़ा है प्रामाणिक

00:32:48:16 पद्धति से मैंने उस ग्रंथ को पढ़ा है जी के कर्पात्री जी के हिसाब से वहां अभाव कैसे लिया जाएगा वो बताइए जी का आपको नहीं पता ना मेरे भाई आपको कर्पात्री जी की किताब मिली है आपने उस किताब का अर्थ नहीं समझा है आपको तो पता है करपात्र जी तो बता तो दिया तो बता तो दिया उनका वहां पे उन्होंने वहां जो शब्द का उपयोग क्या आप एक्सप्लेनेशन नहीं दे रहे हो कि आप बहस कर रहे हो आप बेकार की बहस कर रहे हो आपको आगे चलना है रुक लेना हां आगे चलते आगे चलते हैं इस बात को यहीं पर कंप्लीट करके आगे हां अब आप मुझे अब आप मुझे बता दीजिए आपने माना था कि सर्वशक्तिमान वो है जो बिना दूसरे की सहायता के जो है कार्य करता है। ठीक है? हां नहीं सर बिल्कुल ठीक है।

00:33:36:04 अब आप मुझे ये बता दीजिए कि आपने कहा क्योंकि इन इन का आलंबन लेकर कार्य करना ईश्वर का स्वरूप है। इसलिए वो अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता के कर रहा है। ठीक? आलंबन एक बार थोड़ा सा मैं एक्सप्लेन कर देंगे तो अच्छा रहेगा। आलंबन का एग्जैक्ट मतलब क्या आलंबन क्या बताऊं किसी चीज का उपयोग करना और क्या हां ठीक है है ना और मैंने यहां पर ये भी कर दिया कि वो धर्म स्थापना करने के लिए चार ऋषियों के अंतकरण में ज्ञान देता है ये सोच कर कि ये आगे जो है इस ज्ञान को फैलाएंगे हां इस पे इसप जवाब दे दूं मैं इसी पॉइंट पे हां दे दो हां इसप इसप मुख्य बात ये आती है कि जैसे एक कोई ऋषि है अब उसने ध्यान समाधि लगाई और वेदों से ग्रहण अपना वेद ग्रहण किया ईश्वर से ज्ञान ग्रहण किया। ठीक है? अब वो जो ज्ञान ग्रहण कर लिया अब आगे क्या करना है? इस ज्ञान को कैसे-कैसे फैलाना है? धर्म की स्थापना कैसे करनी है? वेदों का मतलब जो भी सारी चीजें हैं वहां पर ईश्वर हस्तक्षेप नहीं करेगा। ईश्वर का कार्य केवल इतना ही है कि कोई ऋषि अपना योगस्थ हो चुका है। प्राप्त करने के योग्य हो गया है। समाधि लगा ली। उसको ज्ञान दे दो। इससे इसके आगे जितना भी काम है जो भी करेंगे भाई हम धर्म की स्थापना करते हैं अधर्म की स्थापना करते हैं अच्छा करते

00:34:51:06 हैं बुरा करते हैं तो सारा हमारे अंदर ही आएगा वो ईश्वर के अंतर्गत नहीं आएगा कि ईश्वर जबरदस्ती हमसे धर्म की स्थापना मैंने क्या कहा ईश्वर ने जब उनको ज्ञान दिया तो उसका वो क्या है उद्देश्य क्या है उद्देश्य हमारा भला है धर्म की स्थापना है बिल्कुल है धर्म की स्थापना है तो धर्म की स्थापना में ये है ना कि आगे ज्ञान को प्रवाह करें हां करें ठीक है तो ज्ञान का प्रवाह करें इसलिए उन्होंने ने चार ऋषियों को केवल दिया ना यानी कि ज्ञान के प्रवाह कराने के लिए वो चार ऋषियों पर डिपेंड हो रहा है ना सहायता ले रहा है ना चार ऋषियों की ज्ञान के प्रवाह के लिए तो मैं बता तो रहा हूं कहां तक कहां तक ईश्वर का कार्य मैं पॉइंट लगा रहा हूं कि भाई ईश्वर का ज्ञान देना ये पॉइंट है यहां तक ईश्वर का कार्य है आप क्या कर रहे हो कि आगे जो ज्ञान ज्ञान दे क्यों रहा है भाई ज्ञान देना है स्थापना का प्रवाह कराना है नहीं नहीं अब इस इसको एक्सप्लेन कर देता हूं। ज्ञान देने तक मैं एक्सप्लेन कर देता हूं। ज्ञान देने तक ईश्वर का जो है क्या कह लीजिए ईश्वर अपने ज्ञान दे रहा है उनको बेसिकली ज्ञान दे दिया। अब उस ज्ञान का आगे क्या करना है? उसमें ईश्वर ने उसमें भी उद्देश्य दे रखा है ईश्वर ने कि भाई इस ज्ञान को फैलाओ धर्म की स्थापना करो हर चीज करो। लेकिन ये करने के लिए आप स्वतंत्र हो। ये नहीं कि यहां पे मैं जबरदस्ती आपसे करवाऊंगा।

00:36:06:12 ये पॉइंट नहीं आ रहा है यहां पे। जबरदस्ती करवाने की बात नहीं है। बात यह है प्रवाह कराने का उद्देश्य है कि नहीं ईश्वर का या केवल उन चार ऋषियों को ही मोक्ष का ज्ञान देने का उद्देश्य है? नहीं नहीं प्रह प्रवाह कराने का उद्देश्य है। उद्देश्य है तो प्रवाह कराने के लिए चार चेतनाओं पर डिपेंड हो रहा है ना ईश्वर। हां हां ना बिल्कुल हो गया ना तो सहायता हो गई चार चेतनाओं की। नहीं प्रवाह करने अब इसलिए तो मैं आपको एक्सप्लेन किया कि सहायता कहां तक है? जहां तक भाई ज्ञान देने के लिए ज्ञान लेने वाला होना तो चाहिए। उस उस रूप में सहायता चाहिए। यह नहीं कि ज्ञान फैलाने में सहायता चाहिए। ज्ञान फैलाना ईश्वर का काम है ही नहीं। ये हमारा काम है। तो इसका मतलब प्रवाह उद्देश्य नहीं था। प्रवाह आप समझ ही नहीं रहे। प्रवाह ईश्वर चाहता है आप ज्ञान का प्रवाह करो। लेकिन आप अपनी स्वतंत्रता से करो। ये ईश्वर नहीं चाहता कि भाई मैं करवाऊंगा तुमसे। स्वतंत्रता से तो वो करेगा ही वो दूसरा जीव है। चेतन सत्ता है वो। आपने चेतन सत्ता माननी तो वो स्वतंत्रता से करेगा। वो मैं नहीं कह रहा हूं जबरदस्ती करवाएगा। जबरदस्ती की बात नहीं कर रहा हूं। ईश्वर का उद्देश्य केवल उन चार लोगों को एक मशीन की तरह ज्ञान देना मात्र है। या फिर ईश्वर का उद्देश्य चार लोगों को ही मोक्ष का ज्ञान देना मात्र है। या फिर ईश्वर का उद्देश्य यह है कि वो चार लोगों को

00:37:21:13 ज्ञान दे। आगे चार लोग ज्ञान का प्रवाह करें। अगर प्रभा अगर प्रवाह है देते समय अगर प्रवाह का उद्देश्य है देते समय तो यहां पर दूसरे चेतन की सहायता हो गई प्रवाह के कार्य में। यानी आप इस पॉइंट पर थोड़ा सा वो करिएगा। आप क्या प्रवाह कराने को ईश्वर का कार्य बोल रहे हैं? बिल्कुल धर्म संस्थापना के लिए ईश्वर का कार्य वही तो मैं बोल रहा हूं। मैं वही तो बोल रहा हूं। वो ईश्वर का कार्य नहीं धर्म संस्थापना करना। मेरे भाई बोल दो ना प्रभा कराना उद्देश्य नहीं है। मैं बात को [हंसी] क्यों करते

00:38:01:08 समझ पा रहे हैं। ईश्वर का काम है कि आपको उपदेश कर दिया। और ईश्वर ये चाहता है कि आप प्रवाह करो। ठीक है? लेकिन ईश्वर का काम यह नहीं है कि प्रवाह करवाए। मैंने क्लियर बता दिया आपको। तो वो ये वो प्रवाह कराने के लिए डिपेंड हुआ ना दूसरी चेतनाओं पे। अगर वो ये चाहता है कि प्रवाह हो और वो एक मिनट अगर वो ये चाहता है प्रवाह हो। प्रभाव हो, धर्म संस्थापना हो, प्रभाव हो और वो केवल चार ऋषियों को दे रहा है। केवल चार ऋषियों को ज्ञान दे रहा है। अगर वास्तविकता में वास्तविकता ये है कि यदि वो किसी की सहायता लिए बिना कार्य करता है दूसरी चेतना की। ठीक है? दूसरे चेतन की तो फिर उसको हर एक के दिमाग में उसी तरीके से ज्ञान दे देना चाहिए वेद का जैसे कि उसने उन चार ऋषियों को दिया और फिर उसके ऊपर है कि वो धर्मानुसार आचरण करे या ना करे मतलब हम लोग वेद के ज्ञान के साथ इनबिल्ट होने चाहिए अगर वो सहायता नहीं ले रहा है तो और अगर उस अगर स्थिति रखने के लिए धर्म धर्म का प्रवाह करने के लिए धर्म को फैलाने के लिए स्थापना के लिए अगर वह कह रहा है कि मैंने चार ऋषियों को दूंगा बाकी के चार ऋषि आगे बढ़ाएंगे तो वो डिपेंड हो रहा है दूसरे चेतन पर।

00:39:19:08 इसका अब मैं वही आंसर रिपीट करूंगा। फिर वही बात दिक्कत आ जाएगी। सेम बात बोलूंगा मैं कि ईश्वर का कार्य ज्ञान देना। ज्ञान का प्रवाह करवाना ईश्वर का कार्य नहीं है। ईश्वर का ईश्वर ने उपदेश किया है। ज्ञान का प्रवाह तुम करो। ज्ञान भाई ऐसा है। ईश्वर एक मशीन मैंने तीन आपको पॉइंट बोले। ईश्वर का कार्य है क्या कहते हैं मशीन के तरीके से चार लोगों को ज्ञान दे दिया जो उसके मैंने नहीं बोला मशीन वाले शब्द मत उपयोग करिए आप गलत उसमें जा रहा है अगर उसका कोई अर्थ नहीं है मैंने दूसरा ऑप्शन भी दिया कि भाई वो चार ऋषियों की मुक्ति के लिए उन्हें ज्ञान दे कि मैंने चार ऋषियों की मुक्ति के लिए उनको ज्ञान देना है क्योंकि वो मैंने मैंने योग्य समझे दूसरा पॉइंट भी दिया जब उसका कोई अर्थ नहीं होगा मशीन की तरह तब है जब उसका कोई उद्देश्य नहीं बस वो कर रहा है। ठीक है? उसको करना है वो कर रहा है। उसका स्वभाव है करना। तो उसका अगर आगे उससे कोई उद्देश्य नहीं है। जैसे यहां पर उद्देश्य जुड़ गया चार ऋषियों की मुक्ति। ठीक है? और इधर तीसरा मैंने विकल्प आपको दिया कि आगे जो प्रवाह वाला मामला है कि वो जो धर्म जो है प्रवाहित होगा कि नहीं होगा। अगर उसका उद्देश्य है तो यहां चार ऋषियों की सहायता ले रहा है धर्म के उसमें प्रवाह कराने में। तो इनमें से

00:40:34:12 तीन ऑप्शन में से अगर केवल ज्ञान देना है मुक्ति भी नहीं है ना प्रवाह है तो आप केवल ये बोल दीजिए कि केवल ज्ञान देना है मैंने चौथा ऑप्शन तो दे दिया आपको चौथा ऑप्शन यही है कि उनको हां चौथा ऑप्शन यही है उनको ज्ञान दिया और उनके द्वारा ज्ञान प्रवाह हो ऐसा ईश्वर ने उनको उपदेश भी दिया अब ज्ञान प्रवाह हो रहा है या नहीं हो रहा है उसमें ईश्वर को कोई ये नहीं है कि भाई मैं ये नहीं कह रहा आगे क्या हुआ देते समय ईश्वर का उद्देश्य क्या है प्रयोजन क्या है ज्ञान देने का बिल्कुल बिल्कुल ज्ञान प्रवाह करवाना बिल्कुल यही उद्देश्य है यानी कि प्रवाह करने के लिए वो यह सोच रहा है ना कि चार लोग करें नहीं करें वो बात अलग है वो तो उसकी इच्छा के विरुद्ध हो गई मैं बता देता हूं ठीक है मैं बता देता हूं प्रवाह करवाना और प्रवाह करना दो अलग-अलग बातें हैं। आप इस पे थोड़ा गौर कीजिए। ईश्वर चाहता है कि इनके द्वारा मैं प्रवाह करवाऊं। ईश्वर ये नहीं चाहता कि मैं इनके द्वारा प्रवाह यानी ईश्वर के कार्य में नहीं आएगा। वो ईश्वर के उपदेश में आ जाएगा। कार्य में नहीं आने वाला। कार्य में आने के लिए फिर ईश्वर को ही इन्वॉल्व होना पड़ेगा। ईश्वर वहां पर स्वतंत्र आपको छोड़ रहा है। ईश्वर इंटरफेयर नहीं कर रहा। ईश्वर के कार्य में नहीं आ रहा वो। जहां ईश्वर आएगा इंटरफेरेंस करने वो ईश्वर के कार्य में आएगा। प्रवाह करवाना और प्रवाह करने इसमें अंतर है। ठीक है? अब मैंने एक्सप्लेन कर दिया इसको। अब

00:41:49:13 बोलिए आप प्रवाह करवाना। प्रवाह करने में अंतर है। मैं ये पूछ रहा हूं जब वो ज्ञान दे रहा होता है चार ऋषियों को तो उसके मन में ये होता है। मैं मैं ज्ञान दे रहा हूं। इसका क्या अर्थ है? क्या नहीं है? इसका कुछ नहीं है। मेरा स्वभाव है। ज्ञान देना मैं दे रहा हूं। ये होता है या फिर या फिर या फिर ये होता है कि मैं स्वभाव है मेरा स्वभाव है धर्म स्थापना करवाने के निमित्त चार ऋषियों को ज्ञान दूं। यानी कि धर्म स्थापना में वो चार ऋषियों के द्वारा प्रवाह कराने के निमित्त वो उन पर आलम क्या कहते? उनकी सहायता पर डिपेंड हो रहा है। तो ये आ गया। वो क्या सोच रहा है उस समय? हां मैं बता देता हूं। ईश्वर यह चाहता है कि इन चार ऋषियों के द्वारा ज्ञान प्रवाहित हो। लेकिन लेकिन ईश्वर यह नहीं चाहता है कि अगर इन चार ऋषियों के द्वारा ज्ञान प्रवाहित नहीं हुआ तो इसमें मेरा इंटरफेरेंस हो या मेरा कुछ रोल हो। वहां पर ऋषि स्वतंत्र है। ऋषि को जो है क्या बोलना चाहिए? किसी प्रकार का ईश्वर ये नहीं कर रहा बाधित नहीं कर रहा कि आप जबरदस्ती करो। समझ रहे हैं मेरा पॉइंट समझ रहे हैं? इसका ईश्वर नहीं करवा। अपनी इसका अर्थ ये है कि ईश्वर की इच्छा ये है कि भाई ये कर दे तो अच्छा होगा। ऐसा है पर उन्होंने किया नहीं अब समझे बिल्कुल बिल्कुल अगर नहीं करे तो ईश्वर को ये चिंता नहीं है कि

00:43:04:14 ईश्वर टेंशन में आ गया अरे नहीं हो रहा ज्ञान प्रभावित धर्म नहीं हो रहा ईश्वर टेंशन में नहीं आएगा मैं ये बोलना चाह रहा हूं ठीक है ठीक है तो यानी कि वो ये चाहता है कि वो ऐसा करें करे करे तो अच्छा है नहीं करे तो इनके लिए बुरा है दोनों बातें हैं इसमें नहीं करें तो वो हमारे हमारे ऊपर डिपेंड करता है हमारे ऊपर डिपेंड करता है हम करें या ना करें तो उसके अंदर तो यह भाव आएगा ना जब वो नहीं करेंगे तो क्या भाव आएगा इस बात का कि भाई वो ऐसा करें धर्म स्थापना हो नहीं मतलब नहीं करेंगे तो क्या भाव आएगा वो पूछना चाह रहा हूं आपसे अगर चार ऋषि धर्म स्थापना आगे प्रवाह नहीं करेंगे जबकि वो ऐसा सोच के ही कर रहा है कि करें हां ठीक है ऐसा ऐसा सोच के ही कर रहा है ना कि करें तो जब उसका जब उसका उद्देश्य प्रवाह कराना हो गया उसका उद्देश्य ज्ञान देना मात्र नहीं था प्रभा भी था उसका उद्देश्य। उसका उद्देश्य प्रवाह था। ज्ञान देना मात्र नहीं था। हम ठीक है। हेलो आप अटक गए शायद। हेलो ये क्या हो गया? हेलो हेलो हेलो हेलो हेलो अटक गए क्या?

00:44:30:07 हां आपका शायद नेटवर्क का इशू था। अच्छा होगा। तो मैं ये कह रहा था कि उसका उद्देश्य सीधी सी बात है इसको मतलब थोड़ा सा शब्दों में ना उलझाया जाए। एक सीधी बात स्पष्ट दिखाई दे रही है कि अगर ईश्वर का उद्देश्य प्रवाह है तो वो डिपेंड हो रहा है देते टाइम। वो बात अलग है कि वो आगे करें कि ना करें उसमें वो इंटरफेयर करेगा कि नहीं करेगा। मगर प्रभा अगर उसका उद्देश्य है तो उन चार ऋषियों मात्र को ज्ञान देकर के डिपेंड हो रहा है वहां पर इंटरफेयर ना करने से डिपेंड ना होना सिद्ध नहीं होता कि वो इंटरफेयर नहीं करेगा तो डिपेंड ना होना सिद्ध हो जाएगा। एक मिनट एक मिनट अगर उसका उद्देश्य प्रवाह है। अगर प्रवाह नहीं है उसका उद्देश्य या तो ये है कि मुझे बस ज्ञान देना होता है तो मैंने चार को दे दिया। ये हो गया मशीन वाला कार्य और या फिर ये है कि मुझे इनकी मुक्ति के लिए ज्ञान देना है तो फिर ये हो गया वो वाला ज्ञान। ठीक है? ठीक है। ठीक। दे दो उत्तर। दो ईश्वर का उद्देश्य है प्रवाह कराना। परंतु इनकी इच्छा से ही प्रवाह करें। ये उद्देश्य है ईश्वर का। समझ रहे हैं आप? इच्छा जो ऋषियों की या मनुष्यों की इच्छा आएगी इसमें बीच में प्रवाह। दूसरे पर डिपेंड हो गया ना। हां। तो ये तो बोल ही रहा हूं मैं। इसमें समस्या क्या है?

00:45:45:10 तो मतलब दूसरे चेतन का अपने उद्देश्य में दूसरे चेतन का आलंबन हो गया ना फिर आप उसको आगे वाले पे लेके आएंगे उद्देश्य केवल इतना ही था कि ये जो है ज्ञान का प्रवाह करें ज्ञान देने तक ईश्वर का खुद का कार्य है आगे उनका कार्य नहीं है मैं एक्सप्लेन कर दिया हूं कितनी बार तो उसका उद्देश्य प्रवाह मान प्रवाह है लेकिन इनके हिसाब से प्रवाह करें ईश्वर उसमें ईश्वर का ये उद्देश्य नहीं है कि ये जबरदस्ती प्रवाह मैं करवाऊं या जबरदस्ती करें ही करें ईश्वर हां ये एक पॉइंट सुन लीजिए। ईश्वर का उद्देश्य ये नहीं कि करें ही करें। अगर ना करेंगे तो मेरा जो उद्देश्य भंग हो जाएगा। नहीं ईश्वर का है कि इनकी इच्छा से करें। मतलब मतलब कि ईश्वर ने जब उनको ज्ञान दिया तो ये सोच कर दिया कि ये ज्ञान आगे फैले या ना फैले मुझे कोई मतलब नहीं है। वो तो ऋषियों की कृपा रही। हां बिल्कुल हम सपुर्ण रहे। इसमें ना फैला तो हमारी मर्जी। अगर ऋषि अगर आगे नहीं बढ़ाते तो ईश्वर फिर दोबारा ज्ञान देता भी नहीं क्योंकि उसने दिया नहीं। ये तो ये तो दूसरी ये तो दूसरा विषय हो गया। मेरा पॉइंट ये है बाद में ज्ञान देना है ना देना वो दूसरा विषय मेरा पॉइंट सिर्फ इतना सा है कि अगर वो ज्ञान ना भी फैलाएं अगर स्वतंत्र इच्छा से ऋषि जो है या फिर ऋषि चल रहे ऋषि को हटा दो। आगे चलके आगे

00:47:00:14 भी तो चल ही रही ना। मतलब आगे भी हमारे तक तो ज्ञान आया है। इस बीच में भी अगर कोई ऐसा समय आता कि भाई यहां पे ज्ञान नहीं फैल रहा है या यहां ज्ञान इसमें समस्या आ जा रही है। वैदिक धर्म का नाश हो रहा है या अधर्म फैल रहा है कुछ भी तो वहां उस केस में भी हर केस में भी ईश्वर कभी भी चिंतित नहीं होगा। एक% भी मैं चिंतित ना होने की बात नहीं कर रहा हूं। चिंतित ना होने की [गला साफ़ करने की आवाज़] बात नहीं कर रहा। उद्देश्य ईश्वर कभी भी ये नहीं सोचेगा कि मेरा उद्देश्य जो है मैं कहां कह रहा हूं? मैं कह रहा हूं उसके चिंतित ना होने से उसका आलंबन ना लेना सिद्ध कहां से हुआ? अगर उसका उद्देश्य ज्ञान का प्रवाह है। आलंबन ज्ञान के प्रवाह में अगर उसके उद्देश्य ज्ञान का प्रवाह है तो उसके उसके उद्देश्य में दूसरा चेतन शामिल है। अब वो आगे चलकर के दे या ना दे अगर वो उसमें इंटरफेयर करेगा कि नहीं करेगा। इससे यह मतलब सिद्ध नहीं होता है कि वो डिपेंड नहीं है ज्ञान के प्रवाह के लिए उनके ऊपर। क्योंकि उसका डिपेंड है। मैं तो खुद ही बोलता हूं। डिपेंड है। डिपेंड है। डिपेंड है। ये तो शुरुआत ही बोल दिया था मैंने। डिपेंड हो। ठीक है। डिपेंड हो गया। अब आप अब ईश्वर डिपेंड कर रहा है चार ऋषियों के ऊपर प्रवाह के लिए। चार ऋषियों के नहीं। समस्त

00:48:15:15 मनुष्य के ऊपर डिपेंड कर रहा है धर्म की स्थापना के लिए। केवल चार ऋषि क्यों ले रहे हैं? चार ऋषि क्यों ले रहे? क्योंकि चार ऋषियों को उसने ज्ञान दिया ना पॉइंट धर्म स्थापना के लिए अगर समस्त उन पर डिपेंड करता अगर वो समस्त मनुष्यों पे तो वो समस्त मनुष्यों को ज्ञान देता ना फिर तो ये होता कि मैंने ज्ञान एक मिनट मैं ईश्वर [गला साफ़ करने की आवाज़] सर्वव्यापक है। सबके अंदर है। ठीक है? सबके मन में भी है। अंतकरण में तो ज्ञान दे रहा है। तो यदि वह सब मनुष्यों के ऊपर डिपेंड होता तो सब मनुष्यों के अंतकरण में ज्ञान दे देकर ही भेजता। नहीं वो वाली बात नहीं कह रहा था। मैं दूसरी बात बोल रहा था। मैं एक्सप्लेन कर देता हूं मैं क्या बोलना चाह रहा था। मैं बोल रहा था कि चार ऋषियों को दिया उसके बाद जितना भी सृष्टि बनी जितने भी मनुष्य आए वो सब में जिनके भी प्यास स्वतंत्रता इच्छा थी। सुनिए मैं कंप्लीट तो कर आप काट रहे हैं। कंप्लीट करने दीजिए ना। आप काट क्यों रहे मैं कंप्लीट कर देता हूं। थोड़ा सा बचा है आप जितने भी जितने भी मनुष्य के पास ये ऑप्शन था कि हम अच्छा कर्म करें धर्म की स्थापना करें धार्मिक काम करें या धार्मिक करें उन सबके पास ये ऑप्शन था कि वो करें या ना करें

00:49:30:21 सिंपल ठीक है उन सबके पास धर्म का आचरण करने का और ना करने का ऑप्शन है दुनिया के प्रत्येक मनुष्य के पास जिसको ज्ञान है उसी को वही बात आ आ गई ना इसका मतलब वो सब मनुष्यों पर डिपेंड नहीं है। सब मनुष्यों से प्रवाह नहीं करा रहा है। वैसे जिसको ज्ञान है ना है उसको ज्ञान लेने का तो ऑप्शन है। मैं वही तो कुछ समझाना चाह रहा हूं आपको। अच्छा सब मनुष्यों के पास ज्ञान लेने का ऑप्शन है। पक्का कर लीजिए आप। हां। सबके पास ज्ञान लेने का ऑप्शन है या नहीं है? वो इस दृष्टि से बोलिए कि भाई सब में जो जो मनुष्य जिन जिन के पास ऑप्शन है ज्ञान लेने का उनके पास ऑप्शन आ जाएगा कि मैं धर्म का करूं या अधर्म का करूं। यह बोला मैंने। सबके पास ज्ञान लेने का ऑप्शन है। मैं यह पूछ रहा हूं। ऑप्शन होना चाहिए ज्ञान लेने का। सबके पास सबके पास हर समय नहीं है। नहीं नहीं ये नहीं बोला। तो मैं पूछ रहा हूं। है क्या? नहीं है। नहीं है। बिल्कुल नहीं है। नहीं है ना? तो इसका मतलब ये कथन गलत है कि वो सब पर डिपेंड कर रहा है धर्म उसके लिए धर्म स्थापना के लिए। धर्म के प्रवाह के लिए। नहीं सबके पास। चार उसने चार ऋषियों को देखिए आप यहां पर वही बात आ रही है।

00:50:46:04 उसने चार जो सच्चाई है उसको एक्सेप्ट भी किया करें कहीं-कहीं पर उसने चार ऋषियों को जो दिया वो ये सोच के दिया आगे इसका प्रवाह करेंगे और उन्होंने किया और ये प्रवाह कराना उनका उसका कार्य था ईश्वर का कि प्रवाह हो प्रवाह हो और अगर अब इसप आओ हां हां इस पे इसप प्रवाह हो अगर आप कहना चाह ऐसा है कि वो ऋषि अगर ऐसा है कि वो ऋषि नहीं करने वाले हैं। नहीं करना भी उनके पास विकल्प है तो ईश्वर इसकी व्यवस्था करता। फिर नहीं करने का विकल्प भी है ऋषियों के पास यदि तो फिर उसका वो चुनाव गलत गलत कहलाता है कि उसने गलत लोगों को चुना उसके लिए अच्छा अच्छा अच्छा यानी यानी आप ये कहना चाह रहे हैं कि जिनके पास धर्म का ज्ञान आ गया उनके पास ये विकल्प नहीं बचता है कि वो धर्म का काम कर भी कर सके। विकल्प नहीं ना मैं चार ऋषियों की बात कर रहा हूं। जिनको जिनको जिनको ईश्वर ने चुना धर्म के प्रवाह के लिए आगे चलके ऋषियों ने जिसको चुना उसने किसको चुना वो बातें जिनको ईश्वर ने चुना धर्म की स्थापना के लिए मैं उनकी बात कर रहा हूं। हां उनको ईश्वर ने यही सोच के चुना कि ये योग्य है, अच्छी आत्माएं हैं, पुण्य आत्माएं हैं और ये जो है डेफिनेटली ये जो है प्रवाह करेंग इसलिए

00:52:01:06 उन्होंने उनको ही ज्ञान दिया और उन्होंने प्रवाह किया और इस कार्य के लिए ईश्वर डिपेंड कहलाया जो आपने भी माना। हां हां ये तो बोल ही रहा हूं मैं। हां। तो डिपेंड हो गया। तो बस ठीक है। अब अब मैं इस पे आता हूं। अब मैं यह पूछ रहा हूं आपसे कि आपने एक बात कही थी जब मैंने आपसे उदाहरण पूछा यहां पर बात थोड़ी सी पलट गई थी। बात यह हो रही थी कि हां जब मैंने कहा कि जब ईश्वर सृष्टि कर रहा है तो उसमें वो मिट्टी का भी उपयोग कर रहा है और आत्मा का भी उपयोग कर रहा है। ठीक है? मिट्टी का भी उपयोग कर रहा है, आत्मा का भी उपयोग कर रहा है, जीव का भी उपयोग कर रहा है। तो फिर आपने कहा कि इस तरीके से उपयोग करके सृष्टि बनाना ये ईश्वर का कार्य है और इस कार्य के लिए वो किसी की सहायता नहीं लेता। ठीक बिल्कुल। ठीक। हम तो अब मैं अगर ये कहूं कि ईश्वर की सहायता लेकर के हम मोक्ष को साधना या अपने जीवन को संचालित करना। ठीक है। ईश्वर की सहायता लेकर

00:53:16:07 के प्रकृति की सहायता लेकर के अपने जीवन को संचालित करना मोक्ष को साधना या जो भी क्रियाएं करनी है करना यह मनुष्य का कार्य है और इसमें वो और किसी की सहायता नहीं लेता इसलिए क्या मनुष्य भी सर्वशक्तिमान है नहीं है क्यों तो आप समानता दिखा दीजिए क्या समानता है ईश्वर का जो सामर्थ्य है अनंत मैं बताता हूं मैं बताता हूं मनुष्य को एक मिनट मैं अपने विषय को क्लियर कर दूं। आपने उसमें अभी लास्ट लाइन बोली उसमें एक प्रश्नवाचक वो था शब्द। ठीक है? हम अ जो मैं कह रहा था ना कि आपकी चीजें शुरू हो रही है प्रमाण से। ठीक है? कैसे शुरू हो रही है? कि जो भी चीज आपके सिद्धांत के बाहर जा रही जो भी मेरा तर्क सिद्धांत के बाहर जा रहा है उसको आप अपने सिद्धांत में शामिल कर ले रहे हो। जैसे कि भ्रमित करने वाला वो मैं वो मैं बताऊंगा जैसे उदाहरण दे रहा हूं भाई थोड़ा मुझे बोलने तो दो उदाहरण दे रहा हूं मैं जैसे कि भ्रमित करने वाले कार्य ईश्वर द्वारा होना सिद्ध हो गया। कार्य ईश्वर कर रहा है मगर जीव को लग रहा है मैं कर रहा हूं। ठीक है?

00:54:32:12 यहां तक कि थ्योरिकली ईश्वर को जान लेने के बाद भी लग रहा है मैं ही कर रहा हूं। वो बात अलग है कि अपने आप को बताते रहना है। ध्यान रखना है कि ईश्वर कर रहा है हम नहीं कर रहा। वो एक अलग मगर प्रथम दृष्ट्या में वो यही मान रहा है मैं ही कर रहा हूं। ठीक? तो जब ये वाली बात आई भ्रमित भ्रम उत्पन्न हो ऐसा कार्य ईश्वर करेगा। तो ये इस तरह से आचरण करना आपने कहा यह कार्य ईश्वर के स्वभाव में आता है। ष्ठी कर्म फल सिद्धांत के लिए कर्म फल सिद्धांत के लिए भ्रम उत्पन्न होने वाले कार्य भी कार्य करना भी ईश्वर के उसमें आता है। तो आपने तुरंत इसको अंदर ले लिया। अब जब मैंने कहा कि भाई ईश्वर जो है वह सृष्टि रचना करने के लिए जड़ प्रकृति की सहायता भी ले रहा है। चेतन जीव की सहायता भी ले रहा है। ठीक है? अब उसमें जब वो चेतन जीव की सहायता भी ले रहा है तो फिर भाई उसकी वो तो दोनों तरीके के जितने भी पदार्थ है जैसे आपके लोग कहते हैं मुझे चश्मे की जरूरत है जड़ जड़ जड़ की सहायता दो ये इस सहायता के कारण आप कहते हैं कि जीव बाधित है वो सर्वशक्तिमान है ईश्वर वो नहीं जबकि वो ले रहा है जड़ की सहायता भी ले रहा है चेतन की भी ले रहा है तो आपने कहा इस तरीके से उनका उपयोग करके सृष्टि रचना करना ये ईश्वर का कार्य है यहां फिर आ गया प्रमाण यहां फिर प्रमाण आ गया कि ईश्वर के कार्य क्या ये कौन बताएगा?

00:55:48:00 ईश्वर के कार्य क्या है? यह कौन बताएगा? या ईश्वर का स्वरूप क्या है? स्वभाव क्या है? कौन बताएगा? आर्य समाज या फिर प्रमाण आ गया। तो प्रमाण तो आप ही लेके आए पहले। नहीं ये प्रमाण कहां ले आया मैं पहले? सर्वशक्तिमान की परिभाषा से सर्वशक्तिमान की परिभाषा कहां से आई? मैंने पूछा क्या आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं? नहीं नहीं। आपने अपनी परिभाषा डाली ना कि ईश्वर जो कुछ भी कर सकता है ये प्रमाण आप लाए ना। आपने पूछा होगा ना? बिल्कुल वही से शुरू हुआ है। प्रमाण नहीं है। ये प्रमाण नहीं है। मैंने आपसे सीधे एक तार्किक क्वेश्चन किया। सीधे तार्किक प्रमाण एक्सप्लेन कर मैं बता रहा हूं। आप ये ये प्रमाण आप कैसे यूज़ कर रहे हो कि पहले आप आर्य समाजी हो जाओ। जब आप आर्य समाजी हो जाओगे तो आप ये मान लोगे कि ईश्वर का स्वभावगत कार्य एक मिनट ईश्वर का स्वभावगत कार्य क्या-क्या है? तो जो जो चीजें हम जो क्लेम करते हैं हमारे अगर विरुद्ध भी जा रहे वो चीजें हम स्वभाव में डालते जाएंगे हमारा ईश्वर बच जाएगा। ईश्वर वही कर रहा है जो उसका कार्य है। तो ये प्रमाण में आ गई बात। ठीक है? तो उस दिन आपने ये कहा था अब मैं पॉइंट मेन पॉइंट पे दोबारा आ जाऊं। उस दिन आपने ये कहा था कि

00:57:04:16 भाई ये जो चेतन और जड़ है इसकी सहायता से ये जो चेतन और जड़ है इसके आलंबन से सृष्टि रचना करना ये ईश्वर का कार्य है। इसमें वो किसी की सहायता नहीं ले रहे। तो अगर मैं यह कह दूं कि अपने जीवन को संचालित करना और अपनी इच्छा अनुसार मोक्ष को साधना अथवा ना साधना ईश्वर की सहायता से ईश्वर का आलंबन लेकर और जड़ प्रकृति का आलंबन लेकर यह मनुष्य का कार्य है तो फिर आपकी परिभाषा के अनुसार मनुष्य भी सर्वशक्तिमान सिद्ध हो जाएगा। अब बताइए इसका आंसर दे दूं मैं। दो दो चीजें इसमें एक तो प्रमाण वाली बात का पहले एक्सप्लेनेशन देता हूं मैं। आप प्रमाण कैसे लाए? बात यह है कि सर्वशक्तिमान आपने बोला और मैंने बोला। आप एक परिभाषा लेके चल रहे हैं। मैं एक परिभाषा लेके चल रहा हूं। तो ये मत बोलिए प्रमाण मैं लाया। प्रमाण से ही शुरू होगी दोनों की बातें। आप एक परिभाषा ले सुनिए सुन लीजिए। सुन लीजिए। इसका देना मैं कंप्लीट कर दूं। ये वाला पॉइंट कि क्योंकि भाई मैं भी सर्वशक्तिमान का एक मतलब लेके चल रहा हूं। आप भी एक मतलब लेके चल रहे हो। दोनों बराबर है वहां पे। ठीक है? अब दूसरा पॉइंट आपका क्या था कि जो मूल अपने मनुष्य जो है मूल प्रकृति का और ईश्वर का सहायता ले मोक्ष में जा रहा है तो वो भी सर्वशक्तिमान है। इसमें

00:58:19:20 डिफरेंस है एक डिफरेंस मेन डिफरेंस क्या है कि मनुष्य मनुष्य बोल रहा हूं सॉरी आत्मा स्वयं से जीवात्मा जीवात्मा की बात हो रही है। स्वयं से जीवात्मा जो है मूल प्रकृति में कंपन उत्पन्न कराने या फिर एक प्रकार का उससे कुछ बनाने में सामर्थ्यवान है ही नहीं। ईश्वर आएगा जीवात्मा के हिसाब मतलब भूत प्रकृति और जीवात्मा को लेके सृष्टि बनाएगा। उस सृष्टि में फिर सृष्टि बन गई। अब आएगा कि भाई अब तू कर्म कर। समझ रहे हैं? अब आप कर्म करो। ये वाली बात आएगी। इसमें ईश्वर में और इसमें मूल जीवात्मा में ये मेन डिफरेंस ये है कि जीवात्मा खुद से नहीं कर सकती। ईश्वर खुद से उसमें कंपन कराने में सामर्थवान है। और फिर ईश्वर ने ही आपका शरीर बनाया है। ईश्वर ने आपका शरीर बनाया। ईश्वर ने ही आपको मनुष्य बनाया है। ठीक है? फिर मनुष्य बनाया। फिर सारे ऑप्शन आए। तो आप डिपेंडेंट हो ईश्वर पे। आप स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकते। ईश्वर अपने अपने आप से कर सकता है। आप अपने आप से नहीं कर सकते। यही है मेन डिफरेंस। ठीक है? तो दोनों बातें मैंने एक्सप्लेन कर दी। अब आप बोल बात हो रही है डिपेंड तो ईश्वर भी है ना कि भैया आत्मा होगी तो मैं कुछ कर पाऊंगा। अगर प्रकृति होगी तो मैं कुछ कर पाऊंगा। तो ये डिपेंड वाली बात ये कट गई जो आपने कहा कि मेरा जन्म होगा।

00:59:34:24 आपने कहा ईश्वर ने आपका शरीर बनाया। ईश्वर ने आपका शरीर बनाया तो मैं जैसे ईश्वर पर डिपेंड हो गया कि ईश्वर ने क्योंकि बनाया तो मैं कुछ कर पाऊंगा। ठीक है? तो डिपेंड मैं हूं तो ऐसे तो ईश्वर भी अपने कार्य को करने के लिए डिपेंड होगा। पहली बात। दूसरी बात ये है। दूसरी बात ये है कि जीव चेतन है। तो वो साधारण कारण में कैसे कहलाएगा? कि वो साधारण कारण में उपयोग हुआ। तीसरा प्रश्न है। इसको आप अलग रख दीजिए ना। इसका भी दे दूंगा मैं उत्तर पर पहले ये वाला कंप्लीट हो जाता डिपेंड वाला कंप्लीट कर लेते हैं फिर इस पे आ जाएंगे अब डिपेंड वाली बात मैंने डिपेंड डिपेंड जो आपने जो कहा है ना उसका अभी पूरा नहीं हुआ है आपने एक तो कहा है डिपेंड और क्या कहा है मैंने बोला ना कि जो जीवात्मा है वो डिपेंडेंट है ईश्वर पे कि ईश्वर पहले मेरे लिए शरीर बनाएगा फिर शरीर का उपयोग करके फला फला तू ये बोला मैंने तो ऐसे तो ईश्वर भी डिपेंड है आत्मा पर कि आत्मा होगी तो मैं संसार बना पाऊंगा बिल्कुल बिल्कुल इसका जवाब और मैं कह रहा हूं और कुछ और भी कुछ कहा है आपने और भी कुछ कहा है आपने मतलब क्या बोला मैं और इसके अलावा दूसरा पॉइंट कहा है ना आपने इसके अलावा और क्या बोला यही तो बात चल रही है और क्या बात चल रही है

01:00:50:16 अरे भाई दो बातें कही है एक आपने डिपेंड होने वाली बात कही है एक कही है कि स्वतंत्र होकर कुछ नहीं कर सकता है ऐसा कुछ कहा था अपने से कुछ नहीं कर सकता ठीक है मैं रिपीट करता हूं मैं रिपीट कर देता हूं अपने से प्रकृति में बल लगाना जीवात्मा के लिए संभव नहीं है। ईश्वर कर सकता है अपने से। ये बोला था उन्होंने। तो बात ये हो रही है इसकी सहायता लेता है कि नहीं? बात ये नहीं हो रही है कौन सा काम ईश्वर कर सकता है। कौन सा काम मनुष्य नहीं कर सकता है। सहायता लेता है कि नहीं? बात ये हो रही है सहायता लेता है कि नहीं? देखिए आप आप पहले अपनी मैं बता रहा हूं। मैंने मैंने किस चीज पे आपका काउंटर किया है? आपने यह कहा है जो आपकी लाइव डिबेट है। जब मैंने कहा कि भैया ईश्वर तो इन इनका सहारा लेकर के काम कर रहा है। इसको थोड़ा सा ध्यान से सुनिए। जब आपने ये कहा कि ईश्वर इन अमुक अमुक पदार्थों का सहारा लेकर के काम कर रहा है। जब मैंने ये कहा तो आपने कहा कि इनका सहारा लेना ऐसा नहीं है कि इनका सहारा लेगा ही नहीं। इनका सहारा लेकर सस्ती बनाना ये ईश्वर का कार्य है और इसमें वो किसी की सहायता नहीं लेता। अब मैंने क्लेम क्या किया है? मैंने क्लेम किया है कि ईश्वर का सहारा लेकर मैं कह तो रहा हूं। आपने जैसे सहारा शब्द का उपयोग कर लिया ऐसे मैं भी तो

01:02:05:20 ले रहा हूं। तो मैं अब आप अब आप स्वतंत्र कर रहे हो तो मैं उधर स्वतंत्र करूंगा। फिर सहारा जो आपने कहा था वो बाद की बात है। मगर अभी आपने जो ये बात कही है कि इनका सहारा लेकर सृष्टि रचना करना इसमें वो किसी और का सहारा नहीं लेता। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। ये आपका क्लेम है। तो मैंने क्लेम कर दिया कि मनुष्य का काम है ईश्वर की सहायता लेकर। मैं तो कह ही नहीं रहा वो स्वतंत्र होकर कर रहा है। मैं तो खुद कह रहा हूं ईश्वर की सहायता लेकर। मगर क्योंकि ये उसका कार्य है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। हां बोल। मैंने उसके मतलब मैंने आपकी ही भाषा में जिस तरीके से आप सारे कार्यों को ईश्वर में लाते जा रहे हैं। ऐसे ही मैं मनुष्य के स्वाभाविक कार्य में उसको ले आया। हां जी। बताइए। ठीक है। ठीक है। मैं बताता हूं। निमित्त रूप से मुख्य शब्द ये है कि निमित्त रूप से जैसे कि मैं जो है इस फोन को या मूल प्रकृति से बनी हुई कोई भी चीज को खुद से बिना ईश्वर के निमित्त के खुद से मूवमेंट नहीं करा सकता। ईश्वर को किसी का निमित्त नहीं चाहिए। ईश्वर खुद से मूवमेंट करा सकता है। ये है मेन डिफरेंस। इसप थोड़ा सा मतलब मैं थोड़ा सा और इसप अच्छे से एक्सप्लेन कर दूं आपको। मतलब होता क्या है? मैं मैं नहीं नहीं एक्सप्लेनेशन जरूरी है क्योंकि वो बार-बार उसी पे रिपीटेशन आ रहा है। इसलिए थोड़ा सा शांति से चलते हैं। कोई इशू नहीं है। बात ये आ रही है। हां

01:03:21:01 तो मैंने जब ये फोन को इस ऐसे उठाया है ना ये एक कार्य हो गया। ठीक है? अब ये कार्य करने के लिए अगर अच्छा इस कार्य को एक कार्य है और एक है कि सूर्य जो है अह अपना अंतरिक्ष में घूम रहा है। ये एक कार्य है। है ना? ये दो कार्य का हम वो करेंगे। अह कंपैरिजन लेके चलेंगे। ठीक है? तो मैंने जब यह फोन ऐसे उठाया, यह मैंने कार्य किया, इस कार्य में मैं भी निमित्त हूं और ईश्वर भी निमित्त है। बिना ईश्वर के निमित्त के मैं फोन उठा ही नहीं सकता हूं। लेकिन सूरज उठाने में केवल ईश्वर निमित्त है। मैं वहां कुछ नहीं कर रहा हूं। ईश्वर का सहायता या कुछ भी और कोई अन्य चेतना सा तो है ही नहीं। सहायता कर सके। तो वहां पर ईश्वर स्वयं से जो सूर्य को घुमा रहा है, सूर्य को चला रहा है। जितने भी चीजें कर रहा है। वहां पर ईश्वर के अलावा और कोई उसकी हेल्पर नहीं है। मेरा हेल्पर निमित्त रूप से ही ईश्वर है। मैं बिना ईश्वर के निमित्त के फोन उठा ही नहीं सकता। यहां कुछ भी नहीं हो सकता। निमित्त के तो यहां पे मेन डिफरेंस जीवात्मा में और ईश्वर में डिफरेंस ये आ रहा है कि ईश्वर को और किसी का निमित्त के रूप में सहायता नहीं चाहिए। मेरे को चाहिए जीवात्मा को चाहिए। ये है मेन डिफरेंस। अब आप बोलिए मतलब निमित्त रूप से सहायता लेने वाली बात है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। आपका क्लेम वो पूरा मतलब थोड़ा अधूरा था। अधूरा था वो। नहीं नहीं ये ये बात मैंने पिछली लाइन में भी बोली थी और इस लाइन में भी बोली है। दोनों ये रिपीट की है मैंने। आपने वहां पर आपने वहां पर एग्जैक्ट

01:04:36:07 यही बोला है कि इन इनकी सहायता से सृष्टि रचना करना ये ईश्वर का कार्य है और इसमें वो किसी की सहायता नहीं लेता इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। यह आपकी शब्द नियमित शब्द वो आगे पीछे किया हो वह आगे पीछे किया हो जैसे एक बार मैंने मैंने कहा था ना उसके गर्भ में शून्य छिपा है तो आपने कहा छिपा है तो थोड़ी देर बाद परिभाषा आई थी मेरी तो आपको उसप थोड़ी सी आपत्ति हुई थी वो जो कंप्लीट परिभाषा है थोड़ी देर बाद मैंने आपको जब समझाई थी तो आपने कहा था अब आप ये छिपा हुआ ले आए गर्भ में छिपा है तो ये भी आपका वैसे ही है क्योंकि आपने वहां पर तो क्लियर हो गया ना अभी क्लियर है पॉइंट क्लियर नहीं हुआ है क्लियर तो अब बात करेंगे। अच्छा बोलिए। [हंसी] बात ये हो रही है सबसे पहली बात तो है कि जीव जो है स्वयं से कंपन नहीं करा सकता है और ईश्वर जो है कंपन करा सकता है। ठीक है? अच्छा एक बात और है कि

01:05:36:24 सृष्टि क्या बिना जीवो के भी सृष्टि कहलाएगी? नहीं कहलाएगी। नहीं कहलाएंगे। यानी जीव चाहिए। अच्छा जीव चाहिए जीव चाहिए तो चेतन चाहिए। बिल्कुल तो ये तो निमित्त हो गया। कैसे निमित्त हुआ? अगर यहां पर आकर के जीव वैसा रह जाए। कुछ ना करना भी तो होता है ना। जड़वत व्यवहार कर दे। तो सृष्टि रचना संभव है नहीं है नहीं है संभव नहीं है नहीं चेतन पे डिपेंड हो गया ना हां बिल्कुल डिपेंड हो गया तो फिर सहायता हो गई तो निमित्त रूप से कहां डिपेंड हो रहा है मैं निमित्त निमित्त शब्द उपयोग किया मैंने स्पेसिफिकली वो निमित्त भाई निमित्त से आप मुझे बता दो निमित्त का अर्थ क्या ले रहे हो बताओ चलो निमित्त निमित्त का अर्थ जैसे जैसे उदाहरण के लिए कहा जाता है कि कुम्हार ने घड़ा बनाया। ठीक है? तो कुम्हार ने घड़ा बनाया। कुम्हार ने अकेले घड़ा बनाया और किसी अन्य कुम्हार का सहारा ना लेकर के अकेले घड़ा बनाया। तो घड़ा बनाने की जो क्रिया है उस क्रिया के अंदर कुमार ने और

01:06:51:25 किसी अन्य का सहारा नहीं लिया। बस यही निमित्त का मतलब ठीक है? तो ये तो केवल जो सृष्टि के जड़ पदार्थ जो हो रहे हैं या मनुष्य की देह बन रही है। ये तो केवल उतना है ना। आपने खुद माना ना कि जब तक व्यवहार नहीं चालू होगा क्रियाएं नहीं होंगी जीवों के द्वारा तब तक सृष्टि रचना संभव है नहीं है ये तो ये तो केवल ईश्वर का जो ईश्वर ने सृष्टि रचना की है उसमें से एक कार्य हुआ ना कुमार के द्वारा घड़े बनाने जैसा मगर मगर जब व्यवहार चाहिए तो वहां पर तो जो मनुष्य है उसकी जो जीव है उसकी इच्छा डिपेंड कर रही है ना चेतन की दूसरे हां हां तो तो डिपेंड हो गया ना सृष्टि रचना सृष्टि रचना केवल यह नहीं है कि जड़ पदार्थों को आकार दे देना केवल सृष्टि रचना ये नहीं है सृष्टि रचना में मनुष्यगत व्यवहार भी है जीवगत व्यवहार भी है प्राणीगत व्यवहार कह लो इतने सारे जीव जंतु बनाए ठीक है तो उनकी क्रियाओं में ईश्वर का निमित घुसाना चाह रहे हो आप ये करना चाह रहे हो कि जीव जो क्रिया कर रहा है उसमें ईश्वर नहीं नहीं नहीं मैं ये कह रहा हूं कि सृष्टि तो तभी कहलाएगी जब जीव इसमें चेतन रूपी कार्य करने वाला भी हो कार्य करे भी तभी तो सृष्टि

01:08:07:03 कहलाएगी। नहीं नहीं नहीं तब वो अब हां अच्छा ठीक है मैं एक्सप्लेन कर देता हूं इसको ईश्वर का आप बिल्कुल आप उसको आप यानी आप ये कहना चाह रहे हो कि अगर जो है जीव अपना कर्म वगैरह ना करे तो ईश्वर का कार्य अधूरा रह जाएगा। ये आप कहना चाह रहे हो। जीव अपने से कुछ भी कर्म ना करे तो ईश्वर का कार्य अधूरा रह जाएगा। ये कहना चाह रहे हो आप। ईश्वर का कार्य सृष्टि बनाना। अब जीव कर्म करे या ना करे उससे ईश्वर का उसमें ईश्वर का कार्य आएगा ही नहीं। उस यानी कि जीव यानी कि जीव के व्यवहार के बिना भी सृष्टि आप मानते हो तो ये कहो ना सृष्टि रचना यानी कि यानी कि जीव के व्यवहार के बिना सृष्टि का मतलब बता देता हूं। जीव का व्यवहार जो है एक तो जीव के व्यवहार के बिना जो सृष्टि आप जिसको लेके चल रहे हो वो ऐसा है कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई। जीव बनाए आत्मा डाल दी। अब यह सृष्टि हो गई। अब उस सृष्टि में कार्य करना है नहीं करना है वो सारा जीव पर डिपेंड करता है। उसमें ईश्वर का ये वो नहीं कि सृष्टि अगर जीव ईश्वर जो है सृष्टि नहीं कहलाएगी। ऐसा नहीं होगा। ठीक मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। हम

01:09:12:09 संसार को संसार तब कहा जाएगा जब उसमें जड़ पदार्थ जो बने हुए हैं वो भी हो और साथ में उसमें सांसारिक क्रियाकलाप करने वाले चेतन भी हो। मनुष्य इत्यादि प्राणी इत्यादि तब कहा जाएगा। तो यदि क्योंकि वह स्वेच्छा है कर्म करना ना करना हां ठीक है अगर वो क्या कहते हैं चेतन रूपी व्यवहार करेगा नहीं क्रियाकलाप इत्यादि नहीं करेगा तो क्या संसार का अस्तित्व संसार कहलाएगा ये जैसे मान लीजिए कि मान लीजिए एक व्यक्ति जन्म देता हूं हां हां बताइए बता दीजिए कि सृष्टि सृष्टि बनाना तक मतलब आपने क्या बोला था लास्ट टाइम कर्म करेगा नहीं करेगा वाली बात थी हां सृष्टि जो बनाई है ईश्वर ने सृष्टि बना दी सृष्टि बनाने तक यानी जीव का कर्म उसके बाद आएगा जीव कर्म अगर मान लो उदाहरण के लिए आपका एग्जांपल लेके जाता हूं मान लो जो सृष्टि बना दी मूल प्रकृति का लेके और जीव का आत्मा का लेके सृष्टि बना दी अब वो कर्म नहीं कर रहा है जैसा आपने वो बात बोली थी कर्म अगर नहीं कर रहा है वो ऐसे पढ़ा है वो वाली बात हालांकि हो नहीं सकता असंभव है लेकिन अगर फिर भी एक बार उसको लेके चले कर्म नहीं कर रहा है वो तो उससे वो सृष्टि नहीं है ऐसा नहीं कह सकते सृष्टि है वो तब भी

01:10:27:18 हालांकि असंभव है कर्म ना करना है वो मैं बता दूंगा फिर यानी कि यानी कि व्यवहार के बिना भी आप मानते हो कि ये संसार संसार ही है उसमें भले ही कोई व्यवहार हो या ना हो सृष्टि रचना रचना जब सृष्टि बन रही है तब वो मैं आपसे वही तो कह रहा हूं आप क्लियर आपने पहले क्या कहा था नहीं व्यवहार भी होना चाहिए तभी संसार कहलाया आपने खुद कहा रचना मैंने क्या कहा बिना व्यवहार के सुनिए आप अपनी बातों से थोड़ा पलट रहे हैं। एक मिनट भाई साहब आप अपनी बात से पलट रहे हैं। मैं इसीलिए पहले क्लियर किया कि क्या आप व्यवहार के बिना संसार मानते हैं? तो आपने कहा नहीं व्यवहार तो होना आवश्यक है। तब संसार अब आप कह रहे हैं व्यवहार के बिना भी संसार है। मैं बता देता हूं। हां बोल दूं इस पे। संसार और सृष्टि रचना। सृष्टि जब बन रही है तब तो जीवात्मा कुछ कर्म कर ही नहीं सकती। अभी तो बन ही रही है। अभी तो बनी ही नहीं है। मैं उससे उससे डिफरशिएट कर रहा हूं। संसार में तो फिर सारी चीजें आ गई। उसमें तो जीवात्मा का कर्म भी आएगा। बोल रहा सृष्टि रचना सृष्टि रचना पूछ रहा हूं। सृष्टि रचना पूछ रहा हूं। सृष्टि रचना बिना उसके संभव है। सृष्टि जिसमें बिना मैं बता देता हूं ना सृष्टि जब बन रचना का मतलब है सृष्टि अलग है। संसार अलग है। सृष्टि अलग है, संसार अलग

01:11:42:21 है। नहीं नहीं आप सृष्टि रचना संसार का एक पार्ट है। मैं बता देता हूं कैसे। अभी जो है धरती बन रही है। धरती की रचना हो रही है। तो अभी तो मैं कर्म कर ही नहीं सकता हूं। मैं कैसे कर्म करूंगा? बिना धरती बने कर्म करूंगा ही नहीं। तो अगर रचना हो जाएगी उसके बाद मेरा कर्म आएगा। ये पॉइंट था। क्लियर हो गया? भाई ये नहीं है कब क्या आएगा। मैं ये पूछ रहा हूं। यह संसार संसार तब कहलाएगा ना कि इसमें जब पहाड़ झरने नदियां इत्यादि के साथसाथ उनका मतलब प्रकृति के साथ-साथ उनका भोग करने वाला व्यवहारिक रूप से उपस्थित मनुष्य भी हो जो भोग कर रहा तब कहलाएगा ना संसार

01:12:24:09 हां बिल्कुल हां अगर मान लीजिए उसने मान लीजिए मैं कह रहा हूं पांच लोक बनाए और पांचों लोग जड़वंत व्यवहार कर रहे हैं मतलब वो लेटे हैं कुछ नहीं कर रहे हिल भी हिले भी नहीं रहे तो यह संसार कहलाया कहलाएगा आपके हिसाब से नहीं कहलाया नहीं कहलाएगा तो फिर इसका मतलब संसार का संसार को बनाने के लिए डिपेंड हुआ ना वो जीवात्मा पे हां बिल्कुल हुआ हां हो गया तो फिर अंतर क्या रहा जब वो जीव पर डिपेंड हो रहा है [हंसी] मैं बता देता हूं मैं बताता हूं निमित्त रूप से और जो है बनाने के लिए प्रयोजन रूप से साधारण कारण के रूप में ये डिफरेंस समझिए आप निमित्त कारण और साधारण कारण का अंतर समझिए आप निमित्त कारण उसको कहा जाता है कि भाई मैं बना रहा हूं ठीक है अब मैं किसी और की बनाने में सहायता नहीं ले रहा हूं किसी चेतन सत्ता की मैं घड़ा बना रहा हूं मैं खुद से घड़ा बना रहा हूं मेरे अलावा और कोई घड़ा बनाने वाला नहीं है वो बात संसार बनाई कहां संसार कहां जब तक जब तक उन्होंने संसार बनना अब आप शब्द चेंज कर रहे हो शब्द चेंज कर रहे हो मैं बताता हूं कैसे पहले आपने बोला था सृष्टि रचना यानी रचना मुझे नहीं मालूम था कि संसार बनना और सृष्टि रचना आपके लिए अलग-अलग है। नहीं मैं बता देता हूं। क्यों क्यों अलग-अलग है? क्योंकि पिछली बार जब बात हुई

01:13:39:13 थी अभी मैंने पूछा संसार और सृष्टि अलग है। तो आपने कहा आपने कहा कि भैया नहीं अलग है। फिर आप कह रहे हो अलग है। एक्सप्लेन कर देता हूं। मैं एक्सप्लेन कर देता हूं क्योंकि पिछली बार जब बात हुई थी तब सृष्टि रचना सृष्टि चलना फिर सृष्टि प्रलय करना। आपने ऐसे तीन तीन अलग शब्द उपयोग किए थे। इसलिए मुझे लगा आप केवल रचना की बात कर रहे हैं कि स्पेसिफिक स्टार्ट। नहीं नहीं तीन नहीं यूज़ किए मैंने। आप पीछे देख लीजिए। आप गलत कह रहे हैं आपने सृष्टि रचना की बात कर रहा हूं और प्रलय ईश्वर के कारण में ऐसा बोला था ना आपने ना पालन प्रलय बोला ही नहीं भाई पिछली लाइन में नहीं बोला आपने नहीं पिछली अभी मैंने प्रश्न किया है तो सृष्टि रचना का तो मैं वही मतलब समझूंगा ना मैं जो जानता हूं आप जो समझ रहे हैं वही मतलब समझूंगा ना मैं कौन सा भाई सृष्टि रचना है फिर पालन है फिर प्रलय यही समझूंगा ना मैं तो यह सृष्टि रचना का मतलब है मैंने कहा है हां बिल्कुल आपने बोला ईश्वर के कर्म में सृष्टि रचना पालन प्रलय आते हैं। ये आपने बोला है पिछली लाइव में ईश्वर के कर्म में ये तीन चीजें आती है और सृष्टि रचना का मतलब है पालन प्रलय ये तो आप कह रहे हो मैंने तो कहा ही नहीं है आप बताओ मुझे कहां कहा है मैंने अभी भी नहीं कहा है पिछली बार मैं आपने क्या कहा मैं बता देता हूं आपने बोला था ना कि भाई सृष्टि रचना पालन करना फिर प्रलय करना ये सारे ईश्वर के कर्म है ऐसा आपने बोला था कि

01:14:54:26 नहीं ऐसा मैंने नहीं बोला ऐसा आपने बोला था मैंने उसको सही किया था आप आप रचना में ही प्रलय आप पालन प्रलय सबको रचना में ही डाल दे रहे थे तब मैंने कहा था ये भी कर दो आपने अलग अलग अलग किए थे इन तीनों को यही तो बोल रहे हां हां तो आप रचना में इन पालक प्रलय को नहीं ले रहे थे ना पिछली बार तो मैं इस बार ले रहा नहीं ले रहा यानी यानी संसार अलग है ना यानी संसार ये है जहां क्रिया हो रही है और सृष्टि रचना सृष्टि वो है जो केवल जड़वत तरीके से बना दिया है ना हां हां सृष्टि रचना नहीं सृष्टि रचना वो है स्पेसिफिक बोलिए शब्द सृष्टि रचना वो है जो बना दिया और संसार बनाना क्या है संसार फिर आप संसार शब्द का उपयोग करेंगे ना ओवरऑल ले रहे हैं आप मैं बोल रहा हूं सृष्टि रचना में जीव का कर्म में इन्वॉल्वमेंट नहीं आएगा पालन या फिर उसके बाद आएगा बन गई उसके बाद आएगा मैं खाली ये बोल रहा हूं मैंने क्या पूछा है मेरे भाई संसार बनना क्या है सृष्टि रचना और संसार बनने में अंतर क्या है मैं ये पूछ रहा हूं रचना में और संसार रचना के अंदर केवल रचना आएगी संसार पूरे रचना पालन प्रलय सब आ जाएंगे। ये डिफरेंस संसार बनने में ये आ जाएगा। संसार

01:16:09:27 में सब आएंगे ना। संसार में मैं कह रहा हूं संसार बनने में ये सब आएगा कि उत्पत्ति प्रलय में रचना सेम सृष्टि रचना संसार रचना सेम बात हुई है। मैं तो सेम आ गई तो फिर आप अलग क्यों कर रहे हैं? संसार ओवरऑल में तीनों आएंगे। सृष्टि संसार रचना तो सेम सृष्टि रचना एक ही बात है। इसमें डिफरेंस क्या है? संसार बनना सृष्टि रचना एक है। बिल्कुल बिल्कुल तो अभी आप क्यों कह रहे हो कि भैया उसमें वो भी आ जाएगा। क्या कहते हैं उसका पालन और फिर सम्मार वो भी आ जाएगा। ये क्यों कह रहे हो फिर? संसार की आपने संसार पहले संसार पन्ना नहीं बोला था। आपने बोला था संसार संसार में सारे आएंगे। चलो खैर ठीक है। ठीक है। ठीक है। तो कुल मिलाकर के बात हो गई कि संसार बनाने के लिए ईश्वर को जीव की सहायता की आवश्यकता है। किस रूप में? नियमित रूप में या साधारण कारण के रूप में? अच्छा ये साधारण कारण कहां लिखा है ईश्वर का? जरा बताइए। कैसे कह रहे हो आप? साधारण कारण के रूप में वो यूज़ करता है। हमारे मत में कहां लिखा है? ये पूछ रहे हो आप। हां आपके मत में बता दो। वेदांत प्रकाश में लिखा है कि आत्मा का उपयोग साधारण कारण के रूप में होता है। हां साधारण

01:17:24:28 कारण नहीं आत्मा संसार बनने में बता देता हूं। एक्सप्लेन कर देता हूं थोड़ा सा। नहीं नहीं नहीं मैं देखिए देखिए थोड़ा भाग थोड़ा टॉपिक मत छोड़िए। सत्यार्थ प्रकाश में ये लिखा है कि जीव का उपयोग साधारण कारण के रूप में होता है। मैंने पढ़ा है उसमें वहां पे मुझे तो नहीं मिला है। हां ठीक है। मैं एक्सप्लेन कर दूंगा ना जीव साधारण कारण कैसे है? वो एक्सप्लेन कर दूंगा। हां तो वो एक्सप्लेन करो। फिर आप यह मत बताओ कैसे है। हां ठीक है मैं एक्सप्लेन कर देता हूं। साधारण कारण ऐसा है कि साधारण कारण के अंतर्गत आता है प्रयोजन। प्रयोजन का मतलब ये होता है कि किस उद्देश्य से आप काम कर रहे हो? जैसे कि मैं घड़ा बना रहा हूं। तो मैं घड़ा क्यों बना रहा हूं? मेरे को उसमें पानी पीना है। मेरे को उसको बेचना है। आदि आदि चीजें प्रयोजन में आ गई। तो वैसे ही मैं सृष्टि क्यों बना रहा हूं? मैं सृष्टि इसलिए बना रहा हूं ताकि जीवात्मा जो है अपना भोग करेगी। सिंपल साधारण कांड का मतलब था प्रयोजन।

01:18:16:02 साधारण कारण का मतलब क्या होता है? यह क्या बताया आपने? साधारण कारण में प्रयोजन आता है। मैं यह बोलना चाह रहा हूं। क्या आता है? प्रयोजन। तो इसमें इसमें क्या करूं? फिर मैं प्रयोजन आता है। प्रयोजन का मतलब प्रयोजन का मतलब बता दिया ना मैंने। प्रयोजन। तो इसका क्या करूं? मैं प्रयोजन का इससे हमारी बात का क्या सिद्ध हो गया? देखो जैसे कि मेरा प्रयोजन क्या है किसी कार्य को करने का? मैं कार्य क्यों कर रहा हूं? उस प्रयोजन अगर मेरा कोई प्रयोजन ही नहीं है। मैं सृष्टि बना रहा हूं बस तो ऐसे ही बना रहा हूं। मेरा कोई मतलब ही नहीं बनाने का। सृष्टि बना क्यों रहा हूं? क्योंकि एक कारण मौजूद है जो मेरा प्रयोजन बन रहा है। अगर जीवात्मा मौजूद ही ना हो तो [हंसी] आपको नहीं पता ये चीज प्रयोजन के अंदर जीवात्मा आती है। आप इस समय जलेबी बना रहे हो बातों की। कुछ नहीं कर रहे हो? नहीं कोई जलेबी नहीं। कोई जलेबी नहीं। जलेबी बना कोई जलेबी नहीं है। भाई मैं ये पूछ रहा हूं कि आप जो कह रहे हो कि साधारण कारण के रूप में उपयोग होता है तो इसमें क्या डिफरेंस आ रहा है क्योंकि वहां पर लिखा है वहां पे लिखा है बल समय इत्यादि ये सब साधारण कारण के रूप में उपयोजित होते हैं। इनमें से कोई भी चेतन नहीं है। प्रयोजन आता है

01:19:31:03 ना प्रयोजन तो प्रयोजन से साधारण कारण निमित्त हो जाएगा। निमित्त कारण साधारण हो जाएगा। ये मुझे बताइए कहां पर है आपकी परिभाषा? नहीं नहीं बोलिए। ये परिभाषा कहां पर है? साधारण कारण के अंदर प्रयोजन आता है। ये तो आपने पढ़ा ही होगा सिंपल। ये तो ये परिभाषा आप जो दे रहे हैं ये कहां पर है? चलिए ये बताइए। अरे साधारण कारण में प्रयोजन आता है ना। ये आप पूछ रहा हूं। आप जो कह रहे हैं साधारण कारण में प्रयोजन आता है। ये परिभाषा कहां पर है? सत्याचार प्रकाश में लिखा हुआ है। ये बताइए कहां लिखा है? पहले तो देखूं आपका क्या है? अरे मैं इसका सत्य प्रकाश का अच्छा अभी बताऊं क्या और क्या बताओ एक मिनट मैं वो देख रहा हूं टाइम लगेगा थोड़ा वाला क्या लिख रहे हैं ईश्वर सप्तम उल्लास में मुझे टाइम थोड़ा सा थोड़ा सा रुकिएगा मुझे पता नहीं था कि साधारण इसका देना पड़ेगा रेफरेंस एक मिनट नहीं साधारण का ही नहीं देना है जरा इसमें देखें कि उन्होंने निमित्त माना है क्या माना है बात की है कि नहीं मकी है ठीक हां प्रयोजन प्रयोजन आया है साधारण कार्ड में बता देता हूं। देखते हैं क्या कह रहे हैं ये।

01:20:45:22 [गहरी सांस लेने की आवाज़] [हंसी] एक मिनट आता हूं। एक मिनट। हां, एक मिनट के लिए कैमरा ऑफ कर रहा हूं। सब जीव के पुण्य पाप अथवा यथा योग्य व्यवस्था

01:21:41:22 देखिए व्यवस्था करने में भी वही है। देखो व्यवस्था उसका कार्य है। लो यथा योग्य व्यवस्था ठीक है। व्यवस्था करना भी उसका कार्य है। इसका मतलब कि जब वह चार मनुष्यों को वह करता है ना प्राणियों को जन्म देता है तो वहां पर व्यवस्था के लिए भी उनके ऊपर डिपेंड कर रहा है व्यवस्था करें। उसका कार्य व्यवस्था करना भी है। यह कह रहे हैं सत्यार्थ प्रकाश जो कि प्रक्षिप्त है। किसके अनुसार? अग्निव्रत जी के अनुसार यह सत्यार्थ प्रकाश भी प्रक्षिप्त है। [गला साफ़ करने की आवाज़]

01:22:36:07 कहां पर है ये वाली बात इसमें कि परमेश्वर जो है एक जगह यह लिखा है कि बल समय इत्यादि ये साधारण कारण है ईश्वर उसके सृष्टि रचना में मुझे लगता है सृष्टि रचना वाला विषय होगा अलग से ले आए आप प्रमाण ले आए हां ये है षष्टि उत्पाद उत्पत्ति 101 तुम्हारा माइक ऑफ था क्या मेरा माइक ऑफ हां

01:23:23:01 पीडीएफ है अच्छा साहब 131 पेज खोलिए। निमित्त कारण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है और परंतु इसका उपादान कारण प्रकृति है। जो ब्रह्म और जीव दोनों चेतना चेतनता और पालना आदि गुणों से व्याप व्यापक भाव से संयुक्त परस्पर मित्रता युक्त सनातन अनादि है और वैसा ही अनादि मूल रूप कारण और शाखा रूप कार्य युक्त वृक्ष अर्थात स्थूल होकर प्रलय में छिन्न भिन्न हो जाता है। वह तीसरा अनादि पदार्थ इन तीनों गुण कर्म और स्वभाव इन जीव और ब्रह्म में से एक को जी एक जो जीव है वह इस वृक्ष रूप संसार में पाप पुण्य फलों को अच्छे प्रकार से भोगता है और दूसरा परमात्मा कर्म कर्मों के फलों को ना भोगता हुआ चारों अर्थात भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है जीव से ईश्वर वो

01:24:25:08 हां बताइए आप बताइए तब मैं बाद में देख लूंगा अपना मैं पढ़ लेता हूं जब दो जब कोई वस्तु बनाई जाती है तब वो आपके पास फिजिकल बुक है ना मेरे पास पीडीएफ है ये तो दिक्कत आ रही है कैसे बताऊं अरे चैप्टर का उल्लास बताओ ना पहले कौन सा है एक मिनट पेज नंबर 245 245 खोल लीजिए शायद उसप से अरे मैं पूछ रहा हूं उल्लास तो बताओ आठवा समुलस आठवा 245 हम

01:25:14:02 खोल लिया तो तीसरे पैराग्राफ पे आ जाइए उपादान कारण वाला सेकंड पैराग्राफ इसके नीचे आ जाइए जब कोई वस्तु बनाई जाती है तब जिनजिन साधनों से अर्थात ज्ञान दर्शन बल हाथ और नाना प्रकार के औजार और दिशा काल और आकाश का साधारण कारण जैसे घड़े को बनाने वाला कुम्हार निमित्त मिट्टी उपादान और दंड चक्र आदि सामान्य निमित्त दिशा काल आकाश प्रकाश आंख हाथ ज्ञान क्रिया आदि निमित्त निमित साधारण और निमित्त कारण भी होते हैं। इन तीनों एक एक मिनट एक मिनट एक मिनट अ मुझे एग्जैक्ट थोड़ा सा हेडलाइन बता दीजिए इसकी पहुंच जाऊं मैं। पेज आपने 245 खोला है ना? मगर वह मेरे ख्याल से आपसे अलग है। वो थोड़ा सा पीछे से प्रश्नों के नाम बताइए। प्रश्न कौन सा है? क्या प्रश्न हो रहा है वहां पे? प्रश्न तो उसके पीछे वाले पेज पे एक मिनट

01:26:11:27 आठवें समुल्लास में आपको मैं आपको पेज भेज दूं क्या? ये जो मेरे पास फोटो है ये भेज दूं आपको WhatsApp पर? प्रकाश का ये जो फोटो है मेरे पास ये भेज दूं आपको WhatsApp पर। हां ये ज्यादा आसान रहेगा। जी। प्रश्न जगत के कारण कितने होते हैं? यह प्रश्न है। अगर आपने प्रश्न पूछा यह प्रश्न के हिसाब से बात हो रही है। एक मिनट किसी फोन से भेजना पड़ेगा ना इसको WhatsApp में। एक मिनट

01:27:17:15 देखिए WhatsApp पर डाला है हमने। उपादान कारण हेडिंग है। चलो

01:28:53:13 मुझे लग रहा है अद्वैत का खंडन चल रहा होगा यहां जहां पर ये बात है। हां वो खंडन चल रहा पर सिद्धांत तो बताया ना अपना तो मैं कहां कह रहा हूं कुछ अलग अष्टम समुल्लास समुल्लास तो आठवा ही है हां हां समुल्लास आठवा ही है यार ये वाला मिल ही नहीं रहा है।

01:29:50:07 नहीं तो ये जो मैंने स्क्रीनशॉट भेजा है ना ये आपको 70 प्रकाश में मिल जाएगा मतलब एक मिनट मैं [गला साफ़ करने की आवाज़] इस स्क्रीनशॉट को शेयर कर स्क्रीनशॉट को ही शेयर कर रहा हूं। मैं ऑपरेटर को शेयर कर रहा हूं। आप जरा इसको स्क्रीन पर दिखा दीजिए ऑपरेटर या [गहरी सांस लेने की आवाज़] मैं पढ़ लेता हूं रहने दीजिए पढ़ लेता हूं इसमें लिखा है जब कोई वस्तु बनाई जाती है तब जिनजिन साधनों से अर्थात ज्ञान दर्शन बल हाथ और नाना प्रकार के औजार और दिशा काल और आकाश साधारण साधारण कारण जैसे घड़े को बनाने वाला कुमार निमित्त मिट्टी उपादान और दंड चक्र आदि सामान्य निमित्त दिशा काल आकाश, प्रकाश, आंख, हाथ, ज्ञान, क्रिया आदि निमित्त, साधारण और निमित्त कारण भी होते हैं। इसमें सबसे पहली बात तो ये आ गई कि इसमें वस्तु बनाने की बात हो रही है। ध्यान रखिए। इसमें क्या? इसमें एक वस्तु बनाने की बात हो रही है जो आप कह रहे हैं। और कारणों को मैं एक्सक्टली लाइन बता देता हूं आपको। हम लिखा है ना इन तीन कारणों के बिना कोई भी वस्तु नहीं बन सकती और ना बिगड़

01:31:05:08 सकती। हां ठीक है। तो संसार वस्तु है क्या? बिल्कुल वस्तु है। अच्छा उसमें मनुष्य प्राणी नहीं है। ये वस्तु है मनुष्य। ये वस्तु नहीं है। क्योंकि ये मैं बता देता हूं वस्तु का मतलब क्या है? जी वस्तु मतलब कि यह है कि भाई जो नॉन फिजिकल है यानी जो चेतन से हटकर जितनी भी चीजें वस्तु है। सृष्टि रचना वस्तु में आएगी। बराबर सृष्टि रचना वस्तु में आएगी। जबकि सृष्टि तो वो है ना जिसमें मनुष्य व्यवहार भी हो। मैं बताता हूं जीवात्मा को नहीं बना रहा है ना। जीवात्मा तो पहले से है। मैं नहीं कह रहा जीवात्मा को बना रहा है। मैं नहीं कह रहा जीवात्मा को बना रहा है। मैंने कहा कि सृष्टि रचना सृष्टि तो वो है ना जिसमें मनुष्य व्यवहार भी हो कि केवल जड़वत जड़वत जो सृष्टि है वही वो है। अभी हम पीछे क्लियर करके आए हैं। आपने माना कि हां डिपेंड है बनाने में। क्लियर है ना? जो सृष्टि रचना है सृष्टि रचना है वो केवल जड़वत वस्तु नहीं है। उसमें मन जो जीव है उसका उसकी चेतना युक्त जो संसार है वही संसार है। जीव की चेतना विहीन संसार संसार ही नहीं है। तो वही तो मैं कह रहा हूं। वाली बात खत्म हो

01:32:20:09 गई। आप क्या हां क्या बनाता है ईश्वर आत्मा बना रहा है क्या मैं आत्मा बनाने की बात कहां कर रहा हूं जब संसार की बात करेंगे तो जड़ जड़ संसार बनाने की बात करेंगे कि उसमें व्यवहार करने वाला ईश्वर मनुष्य की भी बात करेंगे मैं पूछ रहा हूं बनाया बनाने की बात हो रही है बनाया किसको है बनाया तो जड़ से लेकर के परम कॉम्बिनेशन से सृष्टि बनाई है अब आप अगर जड़ की बात यानी कि जड़ पदार्थ को बनाने की बात करेंगे तो ठीक ठीक है कि उसमें ये लगा वो लगा मगर जब संसार बनाने की बात करेंगे तो उसमें वो उपादान कारण सिद्ध नहीं हो रहा है। फिर वो संसार बनाने में चेतन को बनाना आ ही नहीं रहा है। आप बता तो चेतन को कहां बना रहा? चेतन को बनाना कहां आ रहा है? चेतन का यूज़ हो रहा है ना भाई। हो रहा है। ठीक है। लेकिन चेतन को बना नहीं रहा है ना? कर्म। अच्छा ये बताइए। ये बताइए और इसमें एक उदाहरण ले लेता हूं। कर्म पॉइंट क्लियर हो जाए। प्रयोजन वाला क्लियर कर दूं मैं पहले। जो पॉइंट के क्लियर हो ही नहीं रहा है। इसमें वस्तु की बात कर रहे हैं। जड़वत वस्तु की बात हो रही है। फिर तो संसार को हमने तब माना है। संसार संसार को हमने तब माना है। संसार जब उसमें चेतना युक्त व्यवहार भी हो। जड़वत वस्तु व्यवहार नहीं करती है।

01:33:35:18 इसमें उदाहरण दिया है। वस्तु का उदाहरण दिया है। हां बताओ कहां उदाहरण है? बताओ उदाहरण कौन सा है जिसमें वो वो है? इन तीन कारणों के बिना कोई वस्तु नहीं हां तो चेतन सत्ता कौन सी है? इसमें से उपादान वो साधारण कारण में जब मैंने एक्सप्लेन कर दिया चेतन सत्ता बनाने में चेतन सत्ता नहीं बना रहा है। मैं कहां कह रहा हूं चेतन सत्ता बना रहा है। मैं कह रहा हूं जब ये संसार बना रहा है। संसार केवल जड़वत व्यवहारिक संसार को नहीं माना जब तक उसमें व्यवहार ना हो। चेतन युक्त व्यवहार तब संसार संसार है। और इसको मैं इसको और एक्सप्लेन कर दूंगा।

01:34:15:03 ईश्वर का ईश्वर जो है ईश्वर का कर्म फल सिद्धांत है। है ना? एक बार रिपीट करिए थोड़ा सा ये लाइन इस लाइन को रिपीट कर दीजिए। ईश्वर का कर्म फल से कर्म फल देता है ना ईश्वर? हां हां बिल्कुल। हां। तो किसी छोटे बच्चे का अभी अभी जन्म हुआ है। ठीक है? उसकी हत्या कर दी। हत्या हो गई। क्या ऐसा हो सकता है कि ईश्वर किसी जीव का यह फल दे उसे कि उसका जन्म होते ही उसको मृत्यु को प्राप्त हो जाए। वो क्योंकि उसने पूर्व जन्म में पाप किए थे। कर्म फल वाला दूसरा टॉपिक आ जाएगा ना इस टॉपिक। नहीं नहीं मैं मैं अभी चेतन की सहायता और आपको सिद्ध कर रहा हूं अपने कार्यों में टॉपिक दूसरा व्यवस्था में आ जाएगा नहीं क्योंकि पहले आप प्रयोजन वाले पे आ रहे थे ना कि प्रयोजन कैसे है कैसे नहीं तो वो मैं एक्सप्लेन करने पे आया था फिर अब आप कर्म पे जा रहे हो कहां एक्सप्लेन हो रहा है भाई साहब आप यहां वस्तु बनाने की बात कर रहे हो मैं चेतना युक्त व्यवहारिक संसार बनाने की बात कर रहा हूं अगर केवल जड़वत

01:35:30:07 संसार है तो ठीक है ये वाली बात आपकी ले ली मगर जब उसमें मनुष्यों का व्यवहार है, क्रिया है जहां पर तो वहां पर तो चेतना की सहायता हो रही है और संसार उसी को कहा जाएगा जहां व्यवहार हो। तो संसार बन ही नहीं रहा है। व्यवहार के बिना मनुष्य की वो जीव की इच्छा के बिना संसार हो ही नहीं रहा कंप्लीट। जब उसने इच्छा की क्रिया की तब वो संसार संसार हुआ। बनाना मैंने एक्सप्लेन कर अगर आप ये कहे अगर आप यह कहे अगर आप यह कहें कि वो पृथ्वी सूर्य चंद्रमा इत्यादि जो जड़ प्रकृति है इसका निर्माण जो जड़ सृष्टि है इसका निर्माण यहां तक कि जीव की जो बॉडी है मनुष्यगत या किसी भी प्राणीगत जो उसकी देह है उसको भी बनाने में किसी की सहायता नहीं लेता तब तो चल जाएगा मगर हम संसार उसको ले चल रहे हैं। आपने पहले भी कह दिया है हम संसार उसको लेकर के चल रहे हैं जिसमें व्यवहार भी हो चेतना युक्त तो चेतना युक्त व्यवहार जहां पर हो वही संसार है तो ऐसे संसार को बनाने के लिए दूसरे चेतन की सहायता है वहां पर उसकी इच्छा भी है उसकी इच्छा है तो व्यवहार कर रहा है ठीक है फिर रिपीट करूंगा कर तो दिया ठीक

01:36:45:08 है अब मैं फिर वही बात बोलूंगा कि बनाना ना बनाने वाले फिर क्या आप आप दूसरा टॉपिक जिस टॉपिक का एक्सप्लेनेशन चाह रहे हैं वो वाला कंप्लीट हो गया अपने प्रयोजन वाला हो गया पूरा पूरा कहां हुआ यहां पे जीव की सहायता हो गई ना संसार में आपने जो प्रमाण दिया है आपने जो प्रमाण दिया है वो प्रमाण लागू हुई पहली बात तो मैं अभी इस पे जा ही नहीं रहा हूं कि भैया ये आपका अर्थ है कि मेरा अर्थ है वो तो छोड़ दीजिए आपने जो बात कही है तो जड़ जड़ संसार की रचना के लिए बात हो रही है। इसमें तो आप जो उसको कह रहे हैं ना वो साधारण कारण है। वो निमित्त कारण नहीं है। तो यहां पे जीव के निमित्त कारण होने के संसार चेतना युक्त संसार बनने में प्रमाण की आवश्यकता कहां पर पड़ती है? ठीक है? मैं आपको बता दूं मेरे जीवन का एक एक्सपीरियंस छोटा सा। अच्छा लगेगा। थोड़ा लाइट हो जाएगा वातावरण भी। ठीक है? प्रमाण की आवश्यकता कहां पर पड़ती है? जहां पर जैसे मान लीजिए मैंने कहा कि ईश्वर जो है विद्या और अविद्या दोनों ही समान रूप से ब्रह्म में अनादि काल से हैं। ब्रह्म जो है विद्या दोनों चीजें

01:38:00:14 उसके पास है। ठीक है? विद्या और अविद्या। अब सामने वाले ने कहा नहीं नहीं जहां विद्या है वहां विद्या कैसे हो सकती है? मैंने कहा भाई हो सकती है। मैंने कई प्रकार से तर्क भी दिए। मगर जब हम दोनों की बात इस तरह से अटक जाती है तब हम कहते हैं कि भाई प्रमाण से देख लेते प्रमाण में लिखा है कि नहीं लिखा है। ठीक है? तो अब मेरी और आपकी बात अटकी कौन सी बात अटकी? कि भैया जो जीव है उसको आप कह रहे हो साधारण कारण मानो। मैंने कहा कि भैया वो तो साधारण कारण तो सेट हो ही नहीं पाएगा। उस पर साधारण कारण तो ऐसे पदार्थ है जो जिनकी जो चेतना विहीन चेतना विहीन टाइप के हैं। चेतन सत्ता नहीं है साधारण कारण में कहीं भी सांकेतिक रूप से भी तो फिर हमने प्रमाण खोला अब प्रमाण जब आपने दिखाया तो दो वहां पर दिक्कतें आई पहली कि वहां पर बात ही हो रही है जड़ पदार्थ के बनने की वस्तु के बनने की जिसके लिए साधारण कारण की बात हो रही है। ठीक और मैंने जो आपसे प्रश्न किया वो किया है एक मिनट मैंने जो आपसे प्रश्न किया वो चेतना युक्त व्यवहारिक संसार का या चेतना युक्त व्यवहारिक सृष्टि का वो किया है प्रश्न और यहां पे जड़ सृष्टि की बात दूसरी बात उसमें

01:39:15:20 जो साधारण कारण के लिए उन्होंने उदाहरण दिए ना वो ठीक विपरीत सिद्ध होते हैं जीव के जीव के ठीक विपरीत सिद्ध होते हैं वो इनमें से कोई भी नहीं जो भोग कर रहा हो अपने आप में सब अल्टीमेट है और फिर आप इनसे कह रहे हो कि इनके आधार पर मान लूं। आप मुझे दयानंद जी का ही दिखा दीजिए। दयानंद जी ने कहीं पे मान लिया हो कि जीव जो है वो साधारण कारण में आता है। दिखा दीजिए। मैं बता देता हूं। मेरी आवाज आ रही है क्लियर? तो आपने बोला कि बना रहा है। उसका कारण बताइए मुझे क्यों बना रहा है?

01:39:57:15 हम क्या क्या क्यों बना रहा है मेरी आवाज नहीं आ रही क्या क्यों बना रहा है हेलो कट रही है क्या आवाज तो नहीं कट रही मेरी देखिए मेरे साथ नाटकबाजी मत करिए ये सब मैं बहुत नाटकबाजी नहीं कर रहा हूं ये जो आप कर रहे हो ना इस समय ये सब मैं धुरंधर हूं फिर मैं जब आऊंगा इन सब चीजों पे फिर आपको नहीं कर रहा हूं सहन नहीं होगा मैं समझ रहा हूं ये सब चीजें मेरे साथ मत करिए मेरी आवाज कट रही है क्या मैंने बोल भी दिया क्या उसके बाद कट रही है क्या सब नाटक मेरे साथ मत करिए चलो मैं फिर से फिर से बोल देता हूं फिर से बोल देता हूं हां फिर से बोलिए रिपीट कर ये आपने पिछली लाइव में भी किया था मैंने इग्नोर कर दिया था जानबूझ के किया था अरे जेनुइनली आपको समझ में आ रहा है पूछ रहा हूं जेनुइनली नहीं पूछ रहे थे आप पूछने के बाद बार-बार पूछ रहे थे जब मेरी मेरी आवाज स्पष्ट आपको सुनाई दे गई उसके बाद भी ये होता है सामने वाले को आपको को ये कैसे पता कि मुझे स्पष्ट सुनाई या नहीं सुनाई आपको कैसे पता वो हो जाता है समझ में आ जाती है कुछ चीजें तो वही तो आप अंदाजा लगा रहे हैं वही तो बोल रहा हूं तो मैंने इसलिए मैंने अंदाजा लगाया क्योंकि मैंने पिछली वाली लाइव में भी उसको इग्नोर किया था और आज आपने वही हरकत

01:41:12:24 दोबारा की है। एक बार आप एक बार आपने पूछा ठीक है। एक बार आपने पूछा आपने ठीक है। उसके बाद भी आपने पूछा रुक के पूछा आप आपने रिसोंस नहीं दिया ना आपने कोई चलिए ठीक है ठीक है आप सत्यार्थ प्रकाश पे हाथ रख के कह दीजिए ईश्वर साक्षी है कि मैंने आपको दूसरी भावना से नहीं कहा है वो कह दीजिए चलिए हां फिजिकल तो पीडीएफ है पीडीएफ पे चलेगा छोड़ो खैर फिजिकल नहीं है वो में है मेरे पास बोल देता हूं

01:41:44:28 कुछ नहीं है बताइए तो अल्टीमेटली पॉइंट पॉइंट निकल के ये आ रहा है कि जड़ जो बना रहा है यानी जड़ का उपयोग जड़ जड़ बना रहा है ये बोला तो भाई बात ये आएगी कि क्यों बना रहा है अल्टीमेटली पॉइंट ये आएगा क्यों बना रहा है तो उस क्यों में ज्ञान आएगा जो बना रहा है मैंने तो कहा ही नहीं मैं बोल रहा हूं आपने बोला ना इसमें आपने बोला ना इसमें कैसे आएगी जीवात्मा कैसे आएगी मैं वो उसप लाना चाह रहा हूं कैसे आएगी तो ये अल्टीमेटली इसप आप सबसे पहला क्लेम ये कर रहे है अल्टीमेटली बात इसपे आएगी क्यों बना रहा है? तो पहले इस क्यों बनाने को बनाने के अंदर ही जीवात्मा आएगी? इस क्यों बनाने को सिद्ध करिए पहले ये कहां से आ गया? एकदम से क्यों बना रहा है? जी

01:42:30:07 मैंने सबसे पहली लाइन क्या बोली थी? प्रयोजन। प्रयोजन का मतलब क्या है? कि क्यों बना रहा है? वो मैंने पहले ही बोली थी बात। अब क्यों बना रहा है कि अंदर जीवात्मा कैसे आएगी? ये पॉइंट है ना? तो जो साधारण कारण के अंदर जो चीज आई है वो है ज्ञान और प्रयोजन। ठीक है? तो प्रयोजन प्रयोजन क्या होता है कि भाई मैं किस उद्देश्य से कोई कार्य कर रहा हूं मैं सृष्टि बना रहा हूं तो क्यों बना रहा हूं उस क्यों के अंदर जीवात्मा आएगी कि जीवात्मा एक्सिस्ट करती है इसीलिए मैं इनके लिए बना रहा हूं वो क्यों वाली बात तो ये क्यों ऐसे क्यों ऐसे आएगा जी इसमें प्रयोजन इसमें प्रयोजन वाली जो आप बात कह रहे हैं एक मिनट

01:43:26:00 इसका मतलब साधारण कारण वो है जिसके लिए वो चीज बनाई जाए। अगर इस तरीके से आप जोड़ेंगे हां प्रयोजन में इसका मतलब इसका मतलब कि ये औजार भी साधारण कारण है। इसका मतलब औजार के लिए सृष्टि बन रही है। मैंने बोला ना ज्ञान के अंदर प्रयोजन आएगा। वह साधारण कारण वह भी है और वह भी साधारण कारण है। साधारण कारण दे रखे ना मेंशन प्रयोजन अपने आप में साधारण कारण है। प्रयोजन अपने आप में साधारण कारण है। ये कहां लिखा है? ज्ञान के अंदर प्रयोजन कहां से आ गया भाई? ज्ञान तो ये है कि भैया इस चीज की नॉलेज होनी चाहिए। कैसे बनानी है, क्या करना है? ये ज्ञान है। प्रयोजन कहां से आ गया? नॉलेज है वो तो

01:44:14:19 जबरदस्ती। एक मिनट। ज्ञान के अंदर प्रयोजन नहीं आ रहा है। ज्ञान के अंदर प्रयोजन नहीं आ रहा है। ठीक है। आपकी आवाज नहीं आ रही है। [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] मैं यह बोल रहा हूं कि ज्ञान शब्द आया है। ज्ञान के अंदर ही प्रयोजन आएगा। मैं यह कहना चाह रहा हूं।

01:44:48:21 ज्ञान के अंदर ही प्रयोजन आया है। तो वह कैसे आया है? ज्ञान के अंदर प्रयोजन बताइए मुझे। हां एक्सप्लेन कर देता हूं। हां हां एक्सप्लेन कर देता हूं। ज्ञान के अंदर ही प्रयोजन ऐसा आता है कि ज्ञान में क्या होता है? उदाहरण के लिए आप कोई कार्य कर रहे हैं। तो ज्ञान में क्या-क्या आता है? मैं किससे ये कार्य कर रहा हूं? मैं कैसे ये कार्य कर रहा हूं? और मैं क्यों ये कार्य कर रहा हूं? ये सारी चीजें ज्ञान के अंदर ही आएंगी। तो क्यों? मैं क्यों कार्य कर रहा हूं? मैं इसलिए कर रहा हूं ताकि जीवात्मा का अ जो है संसार बनाओ और जीवात्मा भोग करे। मैं इस क में जो है ज्ञान के अंदर प्रयोजन आ गया। फिर ठीक है। प्रयोजन के अंदर जीवात्मा आ गई। अरे भैया इससे जीवात्मा साधारण कारण कैसे सिद्ध हो गई? साधारण कारण में ज्ञान आया नहीं आया। आपने माना अभी ज्ञान आया। साधारण कारण आपने लिखा है यहां ज्ञान। ठीक है। और उसमें वो प्रयोजन आ गया कि मुझे मालूम है क्यों कर रहा हूं। ज्ञान में हां ज्ञान में प्रयोजन आ गया और प्रयोजन में जीवात्मा आ गई।

01:45:49:03 प्रयोजन में जीवात्मा कैसे आ गई? प्रयोजन क्या होता है? मैं एक मिनट एक मिनट एक मिनट एक मिनट मैं मैं पूछ मैं सवाल पूछता हूं। मैंने कहा कि मैं आपके लिए मैंने कहा कि मैं आपके लिए कोई कार्य कर रहा हूं। ठीक है? हम आपके लिए कोई कार्य कर रहा हूं। ठीक है ना? तो इसका मतलब यह है कि आपका उपयोग करना वो आपकी सहायता लेना नहीं होगा। मान लीजिए मैं आपको बर्थडे पर आपको जो है एक मिनट मान लीजिए कोई बर्थडे पर किसी को गिफ्ट देता है तो मैं गिफ्ट क्यों दे रहा हूं क्योंकि भैया मुझे ज्ञान है कि मुझे आपको देना है आपका बर्थडे है आज। अब उस गिफ्ट देने के लिए अगर अगर उस गिफ्ट देने के लिए मैंने आपका यूज कर लिया। आपका ही उपयोग कर लिया। यूज कर लिया आपका। और उसमें आपकी निर्णायक क्षमता का भी उपयोग है। ऐसा उपयोग नहीं है। नॉर्मल उपयोग नहीं है। आपकी निर्णायक क्षमता का भी उपयोग कर लिया मैंने। और मैंने आपका यूज़ कर लिया तो ये आपकी सहायता नहीं ले ली मैंने।

01:46:57:10 मैं बोल दूं। अब हां निर्णायक में उपयोग नहीं आएगा। वो मैंने एक्सप्लेन कर दिया ना। क्योंकि निर्णायक में ईश्वर का कार्य नहीं है। निर्णय निर्णय लेना में ईश्वर का कार्य आएगा ही नहीं आएगा क्योंकि वो कार्य ईश्वर का है ही नहीं। वो कार्य आपका है। निर्णय लेने के अलावा जितने भी कार्य उस सब में ईश्वर आएगा। ये मैंने पहले बताया था एक्सप्लेनेशन में। तो मेरे भाई मैंने आपको शुरू ही वहीं पे किया है। यह निर्णय जीव के पास है ना कि मैं हरकत करूं कि ना करूं। हां। तो मैं इस संसार की बात कर रहा हूं जहां हरकत है, जहां क्रिया है, जहां व्यवहार है, जड़वत संसार की रचना मैंने नहीं कहा। उसमें ठीक है वो जीव को उपयोग किया और बना दिया मनुष्य। मगर मैं जिस संसार की बात कर रहा हूं, वहां क्रिया है। जिसके बिना आपने माना संसार को संसार कहा ही नहीं जा सकता है। जहां क्रिया नहीं है। हां। तो चेतन क्रिया युक्त संसार की रचना करने के लिए ईश्वर इस पर डिपेंड कर रहा है जीव पर। जीव जहां अपने साधारण कारण अगर मान भी ली जाए अपनी डेफिनेशन तो वो जड़वत संसार बन रहा है। बन गया। मगर व्यवहार के बिना वो संसार नहीं है। वो अभी भी जड़ है।

01:48:12:12 दुनिया व्यवहार जहां पर है वही संसार है। और ये बात आपने मानी है। हां तो डिपेंड है। तो डिपेंड है। तो जब डिपेंड है तो डिपेंड है तो फिर ये कहां से सिद्ध हुआ कि वो सहायता नहीं ले रहा है। और दूसरी बात चलो ठीक है। ये ये हमारा काफी देर हो गया। इसमें मेरा एक अवतार को लेके अवतार विषय पे आप आ नहीं पाए अभी तक। उसप मेरा पॉइंट था। अगर ये वाला कंप्लीट आपका हो गया हो तो हम उसप आ जाए। मैंने एक्सप्लेनेशन दे दिया जितना दे सकता था मैं। इसमें इसमें चीज और बाकी है। आप मुझे यह बता दीजिए कि कर्मों का फल देना ईश्वर का कार्य है?

01:48:59:27 हां हां बिल्कुल हम तो क्या ईश्वर ऐसी व्यवस्था भी कर सकता है जैसे कोई छोटा बच्चा हुआ और 5 वर्ष की आयु में ही उसकी मृत्यु हो जानी है धोखे हो जानी है ये पहले से तय है ये पूछ रहे हो आप ये उसके कर्मों का फल है पूर्व जन्म के छोटा सा है नहीं नहीं ये ये कर्मों के फल में नहीं आया आएगा। यह कर्मों के फल में नहीं है। अच्छा किस में आएगा ये? यह स्वतंत्र इच्छा है। जी। मान लीजिए मैं किसी पांच साल के बच्चे को जाके मार देता हूं। ये वही सवाल है। मैं हत्या की बात नहीं कर रहा। मृत्यु की बात कर रहा हूं अभी। हां मृत्यु मृत्यु चल रही है। मृत्यु ले लीजिए। किस कारण से? मतलब कारण क्या है मृत्यु का? कैसे मरा वो? मतलब तो थोड़ा स्पेसिफाई करिए। किसी भी कारण से मरा। मैं अभी केवल मृत्यु के बाद क्या मृत्यु करा सकता है कि नहीं करा सकता है? नहीं नहीं करा सकता। जानबूझ के मृत्यु नहीं करा सकता। अरे भाई उसके पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर उसकी मृत्यु नहीं हो सकती। जल्दी नहीं हो सकती। तो मतलब अगर कोई प्रलय में मर गया बच्चा तो ये किसको जाएगा ये मामला? ये

01:50:16:09 तो वो हुआ ना दुर्घटना थी। तो इसमें ईश्वर ईश्वर कारण नहीं है। नहीं ईश्वर इसमें ये ईश्वर ने जानबूझ के दुर्घटना। अब आप बहक रहे हैं। आपके सारे आचार्य बोल चुके हैं। इसमें ईश्वर कारण है। अग्निव्रत जी से पूछ लो। मैं तो आप मेरी बात मैं क्या करूं जब आप अपने सिद्धांतों को ही छोड़ दे रहे हैं। नहीं नहीं नहीं मैं एक्सप्लेन कर रहा हूं। कर्म कर्म फल कर्म फल एक्सप्लेन कर देता हूं मैं। कर्म फल एक्सप्लेन कर देता हूं। आप कर्म फल एक्सप्लेन मत करिए भैया। आप मुझे ये बताइए कि कोई बच्चा अभी जन्मा है। साल दो वर्ष साल दो साल का है और जो है वो सुनामी आ गई। कुछ ऐसी प्राकृतिक घटना हो गई। खत्म हो गया। तो इसमें उसके पूर्व जन्मों का कर्म का फल नहीं था। नहीं था। ठीक है। तो अब यहां पर चर्चा हमारी बहुत हद तक हो गई है। यहां अब अब आप आर्य समाज के सिद्धांत पर जा रहे हैं। अवतार पे भी करेंगे। अवतार पे भी करेंगे। ठीक है? अवतार पे भी करेंगे। अब

01:51:19:10 चलिए आप पूछ लीजिए अवतार के संबंध में। एक मिनट तो एक जो जैसे ईश्वर का गुण कहा जाता है वो गुण है ईश्वर का कि ईश्वर जो है व्यवहारिक सत्ता में ही कम से कम बिना किसी रोकटोक के बिना किसी बाधा के झूठ भी बोल सकता है छल भी कर सकता है भ्रम में भी डाल सकता है हर चीज कर सकता है ईश्वर है ना ये ईश्वर के कैपेबिलिटी सामर्थ्य में आता है किसी भी प्रकार का छल करना आपके साथ और किसी के भी साथ करना ईश्वर हमें ये कोई बाधा नहीं किसके साथ चल करेगा किसके साथ नहीं भरेगा। ठीक है? यह बात है। अब बात यह आती है कि जो हमको ईश्वर के द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है या फिर ईश्वर के द्वारा कोई भी जानकारी प्रदान की जाती है किसी भी प्रकार की तो उस जानकारी पर उस ज्ञान पर संशय रहित रूप से भरोसा होने के लिए हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ने इसमें जो है छेड़छाड़ नहीं करी है। इसका मतलब यह है कि ईश्वर के द्वारा अगर यह बोला जा रहा है कि भाई मैं कभी भी कहीं पर भी कुछ भी झूठ बोल सकता हूं और फिर वो जो है ईश्वर एक फला फला हमको एक प्रकार से कोई चीज दे रहा है। ज्ञान दे रहा है। तो अब दिक्कत ये आ रही है कि क्या ईश्वर ने यहां झूठ नहीं बोला होगा? अगर ईश्वर ने यहां झूठ नहीं बोला होगा। यानी क्या ईश्वर यहां झूठ बोलने का सामर्थ्य

01:52:34:16 रखता था या नहीं था? अगर ईश्वर में यहां झूठ बोलने का सामर्थ्य था तो यानी वो संशय में चला गया ज्ञान। और यदि ये बोल दो नहीं ईश्वर में यहां झूठ बोलने का सामर्थ्य ही नहीं था। ईश्वर में सामर्थ्य नहीं तो बाधा आ जाएगी। आप वो फिर आपकी परिभाषा जो होती है बाधा वाली वो आ जाएगी कि भाई ईश्वर में ईश्वर में बाकी चीजें करने का तो सामर्थ था। लेकिन यहां पर भरोसा क्यों है? मैं कंप्लीट कर दूं पॉइंट पॉइंट कंप्लीट कर देता हूं तो इसमें यह आ जाएगा कि दो दो चीजें निकल रही है इसमें से कि या तो आप ये बोल दो कि भाई ईश्वर ने जो है यहां पर छेड़छाड़ करने का या इसमें जो गलत चीज वैदिक ज्ञान हर हर प्रकार का ज्ञान वैदिक ज्ञान और चलो वैदिक ज्ञान और हर चीज में ही आ जाएगा इसका संशय तो क्योंकि ईश्वर जो है छेड़छाड़ कहीं पे भी कर सकता है केवल वैदिक ज्ञान में नहीं आपके दिमाग में या अन्य मनुष्यों के दिमाग में या उनको भ्रम में डाल सकता है। ये सारी चीजें आती है आपके अनुसार पूर्ण में। तो अब बात ये आती है कि अगर हम ये माने कि भाई यहां ईश्वर छेड़छाड़ नहीं करेगा तो बाधा आ रही है। अगर ये माने कि यहां छेड़छाड़ करेगा तो फिर वो ज्ञान सारा का सारा संशय में चले जाएगा। यदि वो संशय में जाता है ज्ञान तो संशय में जाने की वजह से फिर उसको प्रमाण के रूप में हम उपयोग नहीं कर पाएंगे। तो ये दो चीजें निकल के आ रही है। अब आप बता दीजिए इसका सॉल्यूशन क्या है आपके पास?

01:53:47:24 [गला साफ़ करने की आवाज़] पहली बात तो यह है कि छल करना। ठीक है? छल करने से अगर शुरुआत करें तो यह बात वहां भी पूछी थी मैंने अग्निवत जी से जब चर्चा हो रही थी और मैंने जो इस तरह से जो मृत्यु हुई यह ईश्वर का कार्य अग्निवत जी मानते निर्विवाद रूप से सब मानते हैं। जो अच्छे-अच्छे आर्य समाज के जो वह हैं कि इस तरीके से मृत्यु होगी है ना वह ईश्वर का ही कार्य है। तो इस प्रकार से इस रूप में और जब सारे कार्य ईश्वर ही कर रहा है तो हमें फीलिंग ये क्यों आ रही है कि हम जो है क्या कहते हैं? हम कर रहे हैं। ठीक है? तो यहां पर भी भ्रम उत्पन्न करने वाला मामला हो गया। मगर क्योंकि कर्म फल देना है तो इसलिए उसको यह फील होने देना है। उसको स्वतंत्र छोड़ना है कि तुम क्या सोचो। तो इसलिए वो फील वो होने मतलब कि ऐसा कृत जिससे कि भ्रम उत्पन्न हो जाए। ऐसा कृत ईश्वर के स्वरूप में आपने भी माना हुआ है।

01:55:03:03 ठीक है? ठीक है ना? भ्रम नहीं पूरा बोल लो। फिर आप बोलना भाई आपके आचार्यों ने माना। अब आप नहीं मान रहे तो मैं क्या करूं? बात किससे करूं? फिर मैं वो वाली बात हो जाएगी। ठीक है? अब वो बात अलग है कि वो जो बच्चा जो प्रलय में जिसकी मृत्यु हुई है प्रलय के कारण या और किसी के कारण। अच्छा ये बताइए मैं इसको ऐसे पूछ लेता हूं कि दंड जो होता है वो केवल यही है कि उसको मृत्यु हो उसको चोट लगे या फिर धोखा प्राप्त करने की फीलिंग भी दंड के रूप में दे सकता है ईश्वर दंड ऐसा भी हो सकता है जिसमें किसी को धोखा मिलने का दुख हो ऐसा दंड मिल सकता है नहीं धोखा नहीं मैंने मैंने ये कह रहा हूं किसी व्यक्ति को किसी जीव ने कोई ऐसा क्या ऐसा कुछ कर्मों कर्म है जिसके कारण उसको धोखा प्राप्त हो। दंड स्वरूप दंड स्वरूप धोखा

01:56:02:02 इसमें एक टेक्निकिटी है ना दंड मतलब कि जैसे जैसे मैं बता रहा हूं कई प्रकार के कष्ट हैं। ठीक है? मैं रोगी हूं इस बात का कष्ट। ठीक? या मेरी मृत्यु हो रही है। मेरे दर्द हो रहा है इस बात का कष्ट। या मैं फलानी चीजें प्राप्त नहीं कर पा रहा हूं। आसक्तियां हैं। इस बात का कष्ट बहुत सी चीजें हैं। ऐसे ही एक कष्ट होता है जब हमें कोई बेवकूफ बनाता है। ठीक है? होता है ना कष्ट। जब हमें कोई झूठ बोल देता है तो हमारी भावनाएं आहत होती है ना। जब हमें धोखा प्राप्त होता है। तो एक प्रकार का कष्ट होता है हमें। तो क्या किसी व्यक्ति के दंड में धोखा मिलना आ सकता है या नहीं आ सकता है? उसका कारण यह हो सकता है कि उसने पहले बहुतों को कष्ट दिया हो। यही वाला यह बताइए।

01:56:53:22 फिर इसमें मैं एक प्रश्न इसमें क्लेरिफिकेशन के लिए पूछना पड़ेगा मुझे कि क्या वो धोखा आप ईश्वर के द्वारा ईश्वर दे रहा है वो धोखा या मनुष्य दे रहा है वो धोखा ये प्रश्न है। ये तो बाद की बात है मेरे भाई। मैं कह रहा हूं ईश्वरीय व्यवस्था में अगर आप मैं ये बताइए ईश्वरीय व्यवस्था में कर्म फल में कौन-कौन से दंड आते हैं? यह निश्चित कर दीजिए। चलिए, यह भी दूध का दूध और पानी पानी हो जाए। आप कितना भी आप आप खुद घुमा लीजिए। मैं चीज़ निकाल लूंगा आपसे। नहीं नहीं मैं घुमा नहीं रहा हूं। देखिए इसमें इसमें ये घुमाना ही है भैया। आप आप इस चीज से बच रहे हैं। धोखे का कष्ट उसको होगा कि नहीं? अब मैं पूछ रहा हूं। ईश्वर को कौन-कौन से कष्ट दे सकता है कर्म फल सिद्धांत में? यह बताइए। ये आप कर्मफल सिद्धांत पे आ रहे हैं। आप फिर से उसी टॉपिक पे आ रहे हैं। अब अब सुन लीजिए। बात यह है कि यह पहली बात आप यह बोल रहे हैं कि क्या ईश्वर धोखा दे सकता है या नहीं? मैं यह नहीं बोल रहा हूं मेरे भाई। मेरा प्रश्न सुनिए। मेरा प्रश्न है। मैंने क्या कहा? मैंने ये पूछा है आप वो कष्ट बता दीजिए। कौन-कौन से कष्ट हैं जो कर्म फल के अनुसार मिलते हैं। अरे फिर आप कर्म फल में जा रहे हैं। टॉपिक चेंज क्यों कर रहे हैं आप? अरे भैया ये टॉपिक उपविषय है ना। वहीं से उत्पन्न हो रहा है ना।

01:58:09:06 आप मना कर रहे हो? नहीं आप आप आप कर्मफल का विषय शुरू कर रहे हैं। मैं ये इसलिए शुरू सुनिए मैं बता रहा हूं। मैं रिलेट कर रहा हूं। मैं रिलेट कर रहा हूं। विषय क्यों शुरू कर रहा हूं? मैं रिलेट कर रहा हूं। अच्छा इसलिए शुरू कर रहा हूं क्योंकि आपने एक बात कही है। आपने एक बात कही है मुझसे कि भैया ईश्वर वो सब कुछ कर सकता है। छल भी कर सकता है। तो आप तो ऐसे मानते हो तो फिर छल हो जाएगा। संशय बुद्धि। संशय बुद्धि का निराकरण है हमारे पास। कोई व्यक्ति सकारात्मकता सुनेगा। अकाट उत्तर उसमें भी देंगे। वो कोई दिक्कत नहीं है। मगर जहां से बात शुरू हुई है तो उन बातों को एक एक चीज को खोलते चले ना तो आपने जब छल की बात की आपत्ति जताई एक तरीके से कि आपकी व्यवस्था में छल नहीं है तो इसलिए जो है आपके यहां पर तो जो है वो ईश्वर की वाणी पर जो है विश्वास सिद्ध है। तो हमारे में तो छल है तो ईश्वर की वाणी पर विश्वास कैसे हो? ये वाली बात आ जाएगी। यही सवाल हां हां ठीक है। यही सवाल था। तो अब मैंने पहले तो मैं ये बता रहा हूं कि भैया आपके यहां पे छल कैसे हो सकता है? अब छल होने में आपने आपके आचार्य स्वीकार करते हैं कि प्रलय इत्यादि के विषय में क्या कहते हैं? आपने मान लिया कि ये जो है कर्म फल नहीं है ईश्वर का। आप अलग हट गए। प्रामाणिक आचार्यों से आप अलग हट गए। अगर मैं चाहूं यहीं पर इस चर्चा को खत्म कर सकता हूं। यहीं पर

01:59:25:03 कि भैया पहले अपने आचार्यों से आप लेकर के आइए तब बात करेंगे। ठीक है। फिर भी मैंने हम [गला साफ़ करने की आवाज़] जब आप आर्य समाज के विरुद्ध जा रहे हैं। एक मिनट जब आप आर्य समाज के विरुद्ध जा रहे हैं तो मैं किसके साथ टाइम वेस्ट कर रहा हूं ये तय करना पड़ेगा ना? नहीं नहीं नहीं जा रहा हूं। विरुद्ध नहीं जा रहा। अब बात ये आ रही है कि आप ये बोल रहे हैं कि वो आचार्य विरुद्ध नहीं जा रहे आप जा रहे हैं या आप जा रहे हैं वो नहीं जा रहे इस पर बात आ रही है। ठीक है तो ठीक है तो ठीक है इसका मेरे पास उत्तर है नहीं हां हां पूरा सुन तो इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं बताऊंगा फर्क पड़ता है मैं बता मैं बता देता हूं इससे इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप अब इस पे आ गए कि आर्य समाज क्या मानता है इस पे आ गए अरे भैया मैं आर्य समाज के साथ ही तो बैठा हूं मैं किसके साथ टाइम वेस्ट कर रहा हूं कोई अगर सड़क पे चलता हुआ मुझसे कहेगा भैया शक्तिमान है तो मैं उसको टाइम मैं मैं बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं आर्य समाज क्या मानता है मैं बता रहा हूं ना आर्य समाज क्या मानता है मैं ही तो बता रहा हूं तो मैं उस पे काउंटर कर रहा हूं ना आपको मैं मैं सिद्ध करूंगा कि आप आप प्रामाणिक नहीं है आर्य समाज की ओर से वो प्रामाणिक है इसीलिए तो आर्य समाज की व्यवस्था खराब है जो आज आप जैसे लोग आचार्यों को ठुकरा सकते हो

02:00:41:10 इसीलिए तो हम लोग कहते हैं ऐसे शब्द ऐसे शब्द ना बोलिए मैं बता रहा हूं मैं बता रहा मैं बता रहा हूं मैं उसको रिलेट करते हुए बोल रहा हूं ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं कर रहा हूं सुनिए तो आपके पास सत्यार्थ प्रकाश कहां से आई यह बता दीजिए। आपके पास सत्यार्थ प्रकाश कहां से आई यह बता दीजिए। उस [हंसी] आप उनको अप्रामाणिक कह रहे हैं ना आप उनको अप्रामाणिक कह रहे हैं ना। आप आप अपना पॉइंट तो बोलने दीजिए मुझे कंप्लीट तो कर लूं बात। भाई साहब आप कह रहे हैं वो प्रामाणिक नहीं है। देखिए दो घंटे पहले ही हो चुके हैं। ठीक है। मेरे पास बहुत सारे टॉपिक्स है। व्यर्थ की बातें अगर आप ये कह रहे हैं मैं प्रामाणिक हूं वो प्रामाणिक नहीं है। आपने यह बात पे अटकी है ना? मैं तो उसको लेट गो कर रहा था। मैं उसको लेट गो कर रहा था। आप आप कई बार कंप्लीट कर चुके हैं। मैं तो उसको लेट गो कर रहा था। आपने कहा नहीं नहीं नहीं। अब आप ये कह रहे हैं मैं प्रामाणिक तो फिर ये फैसला होगा कैसे कि कौन प्रामाणिक है? आर्य समाज की ओर से पहली बात। दूसरी बात। मैं आपको तो अप्रामाणिक अभी के अभी सिद्ध कर रहा हूं। आपने खुद कहा मैं आधिकारिक तौर से कहीं से जुड़ा नहीं हूं। ये एक आधिकारिक किताब है। कहां से आई आपके पास? हां मैं बोल लूं। बताइए। हां। अब इसमें इसमें ये बात आ रही है कि आप ये बोलना चाह रहे हो कि जो दोष

02:01:56:14 मैं आपके यहां दिखाना चाह रहा हूं। आपके यहां जो दोष मैं दिखाना चाह रहा हूं। वो बोल रहे है कि आपके यहां भी दोष है। यही है ना आपका मेन पॉइंट। नहीं नहीं ना मैं आपके एक-एक शब्द का उत्तर दे रहा हूं। भाई साहब आपके एक एक शब्द का उत्तर देता चल रहा हूं। आप मेरी बात सुनिए। अब मुझे प्लीज आपको म्यूट करना पड़ेगा। मेरा टाइम आप वेस्ट करा रहे हैं। अब आप वो वो मयंक जैसवाल अब नहीं रह गए जिससे मैं कट टू कट बात कर रहा था वो केवल उतनी ही देर कट टू कट रहता है जब वो वाली बात चल रही होती है जब वो जिसके लिए वो प्रिपेयर हो के आया था वो सर वो क्या ईश्वर ईश्वर पत्थर वाली बात ठीक है अभी मयंक जैसवाल बदल रहा है अब सुनिए क्या है बात

02:02:40:00 आपने होता क्या है जैसे आपने कहा छल कर सकता है ठीक है बुराई हो सकती है होता क्या है कि जैसे मैंने आपको डायरेक्ट मेन जो आपका मूल सवाल है उसका आंसर दे दिया छल वाली बातों का नहीं दिया और मेरे भी दिमाग से उतर गया क्योंकि मैंने उत्तर दे दिया बाद में तो होता क्या है फिर मैं भूल जाऊंगा और आपके द्वारा ये लगाया गया जो ये जो बात आपत्ति प्रकट की गई है रह जाएगी और मुझे लगता है कि यदि ऑन लाइव में ये आपत्ति जताई गई तो मुझे इसका निराकरण प्रस्तुत करना है। बिल्कुल। ठीक है। जैसे आपने जब मैंने पूछा था कि जीव चाकू मार रहा है तो जीव तो केवल चेष्टा करता है। चाकू ईश्वर ही मारता है। सारे कार्य ईश्वर ही करता है। आपने माना आपने माना ना? सारे कार्य ईश्वर करता है। केवल जीव चेष्टा करता है। चेष्टा सारे कार्य ईश्वर करता है। ठीक? इसका अर्थ क्या है? जितना भी पाप पाप से पाप है उस सब में जीव की चेष्टा है और ईश्वर का मुझे इससे आपत्ति नहीं है। मगर क्या होता है जब यही सत्य नग्न सत्य हम बताते हैं तो क्या होता है कुछ लोग क्लिप निकालते हैं क्लिप निकाल के बताते हैं देखिए देखो इसका ईश्वर

02:03:55:08 ये है समझ रहे हैं तो ऐसी क्लिप्स ना निकले इसलिए मैं आपकी एक एक बात एक एक शब्द जो आपने आपत्तिजनक बोला है उसका आंसर दे रहा हूं और ऐसा नहीं है कि आपका जो मूल प्रश्न है उसका आंसर नहीं मिलेगा मगर थोड़ा धैर्य रखिए जब आपने प्रश्न किया है तो ये क्यों मैंने बोलना शुरू किया नहीं मतलब मतलब आप जो है ऐसा कर रहे हैं बस खत्म। अरे अब दूसरी बात जब मैंने आपके छल और धोखे वाली बात पर विवेचना करना शुरू किया क्योंकि ये आध्यात्मिक विषय होते हैं। एक-एक शब्द पे ही घंटों लग सकते हैं और मुझे लगता है कि आप प्रिपेयर होके चला करें। मैं चाहूंगा कि चला करें। जब आप बोल रहे हैं तो बोल रहे हैं। ठीक है। फिर जब मैं उसको खोल रहा हूं तो मुझे खोलने दीजिए। और असल में क्या है कि यह जो बात है छल करने की या मिथ्या यह आर्य समाज जब से अस्तित्व में आया है तब से लेकर अब तक ये उन समस्याओं में से एक समस्या आर्य समाज के द्वारा उठाई गई है। इसलिए मैं उसको पकड़ करके और उत्तर दे रहा हूं। ठीक है? अब मैंने इस बीच एक बात कही कि भाई आप जो है ये वाले जो कार्य हैं ये ईश्वर के मान ही नहीं रहे हैं। आपने कहा नहीं मान रहा हूं ये नहीं है उसके कार्य। ठीक है। मैंने कहा कि आपके यहां के जो प्रामाणिक आर्य समाजी हैं, प्रामाणिक रूप से जो संस्थागत हैं, संस्थाओं

02:05:10:12 से जुड़े हुए हैं, जहां से किताबें छप रही हैं, वहां पर जिनका अधिकार है, आप उनके विरुद्ध जा रहे हैं। आपने यहां पर आपत्ति जता दी, मैं विरुद्ध नहीं जा रहा हूं, वो लोग विरुद्ध जा रहे हैं। ठीक है? तो, इसका मतलब फिर वही बात आ जाती है। मैं कई बार ये वाली बात आर्य समाज से कह चुका हूं कि आपके यहां की व्यवस्था देखिए। कल को कोई खड़ा होकर के आपकी बातों को भी चैलेंज कर देगा और वो हो रहा है। आसानी से चैलेंज हो रहा है। कोई भी एक दूसरे की बात को कर सकता है। कोई व्यवस्था है ही नहीं। आर्य समाज को मानो मगर किसको मानो यह पता ही नहीं है। सबके सिद्धांत अलग है। एक मिनट मुझे पूरा करने दीजिए। अब मुझे आप ये बता दीजिए ये सत्यार्थ प्रकाश आपके पास आई कहां से? बताइए। आप आप जो है आर्य समाज की प्रमाणिकता पे आ रहे हैं। मैं बोल रहा हूं आप पहले संशय का निवारण तो कर दीजिए। उस पे भी आ जाएंगे हम। आपने कहा कि आर्य समाज की ओर से मैं प्रामाणिक बात बोल रहा हूं। वो जो बोल रहे हैं गलत बोल रहे हैं। तो आपको प्रमाणिक आपने खुद बोला आप मैं बता देता हूं। आपने खुद बोला कि आर्य समाज की ऊपर तरफ से कोई व्यक्ति स्पेसिफिक नियुक्त नहीं है। आपने ये बात बोली क्योंकि आप बोलते ही हो अक्सर। ठीक है। स्पेसिफिक व्यक्ति नियुक्त नहीं है। हां। अब बात ये आ जाती है कि अगर मेरे सिद्धांत का आलंबन लेकर के खुद की पुष्टि करेंगे।

02:06:25:13 अरे भैया मैं तो यह ब्लेम कर ही रहा हूं। मगर फिर भी जब मैं किसी फिर भी जब मैं किसी आर्य समाजी को आर्य समाजी मान करके बैठूंगा तो उसको किसी ना किसी तरीके से तो प्रमाणिक रूप से मानूंगा ही ना यहां पर वो तो मेरा क्लेम है उनके ऊपर आरोप है। आपत्ति है उनकी व्यवस्थाओं को लेकर के। हां, ठीक है। तो आप उसे ये दर्शाना चाह रहे हैं कि मैं गलत अर्थ ले रहा हूं। अल्टीमेटली पॉइंट यही है ना आपका? मैं आपसे सीधे-सीधे एक प्रश्न कर रहा हूं कि जहां से छापी जा रही है उन लोगों की व्याख्या आप नहीं मान रहे हैं। आप कह रहे हैं भाई मैं इसकी अपनी व्याख्या दूंगा। तो यह किताब आपके पास आई कहां से है? बस अब ये बताइए उन लोगों की व्याख्या उन लोगों की व्याख्या मान के ही मैं ये बात बोल रहा हूं। तो अग्निव्रत जी ने और कई आचार्यों ने यह बात स्पष्ट रूप से मानी है कि ये जो प्रलय इत्यादि वाला उल्का पिंड गिर जाना यह सब कार्य ईश्वर के होते हैं। कार्य ईश्वर के होते हैं लेकिन कर्मों का फल नहीं होता। मैं स्पेसिफाई कर रहा हूं ना यहां पर कर्मों का फल नहीं है। कार्य है कार्य है। कार्य है बिल्कुल है। बिल्कुल है [हंसी] भाई। भाई मतलब करने में कार्य मतलब एक एक मिनट एक मिनट एक मिनट। मतलब कि हम् अह

02:07:41:20 मतलब कि कोई बच्चा जन्म लिया है और ईश्वर ने वहां पर उसको प्रलय से वो मर गया तो वो जो है कार्य था ईश्वर का मगर उसके पीछे मोटिव ये नहीं था कि मुझे इसको इसके कर्मों का फल देना है मोटिव नहीं था यूं ही मार दिया यूं ही मार दिया बिल्कुल यूं ही मार दिया मार दिया मैं बता देता हूं इसका इसका आंसर दे देता हूं मैं ईश्वर ने जो सृष्टि रचना कर रखी है और जो नियम बना रखे हैं विज्ञान उदाहरण के लिए कोई सुनामी उठी सुनामी कैसे उठेगी पीछे से लहर चल पड़ी बड़ी लहर चल पड़ी तो सुनामी आएगी आगे अब सुनामी वहां से चल पड़ी अब यहां पे इंसान खड़े हैं बच्चे हैं जो भी आपने बताया उदाहरण के लिए वो खड़े हैं अब ईश्वर जो है अब सुनामी तो चल पड़ी है अब ईश्वर जो है उन बच्चों को बचाने के लिए सुनामी रोक दे ऐसा तो हो नहीं सकता यानी वो एक्सीडेंटल रूप में मरेंगे ही मरेंगे लेकिन वो कर्मों का फल नहीं है मैं ये बोलना चाह रहा हूं तो मतलब यूं ही मर गए ना वो यूं ही मर गए हां एक्सीडेंट एक्सीडेंट यू मर गए हां हां बिल्कुल

02:08:38:26 तो ये शुरू में बोल देना था भाई यूं ही मर जाते हैं। मतलब आपके ईश्वर का वहां पर भी कोई हस्तक्षेप नहीं है। यूं ही भी मरते हैं संसार में लोग। यूं ही भी मरते हैं संसार में लोग। एक्सीडेंट एक्सीडेंट में मरते हैं यूं ही। हां यूं ही मरते हैं। तो आपके जो आचार्य गण है वो नहीं मान रहे कि यूं ही मरते हैं लोग। आपके योगेश भारद्वाज जी हैं। योगेश भारद्वाज जी हैं। एक मिनट एक मिनट एक मिनट। योगेश भारद्वाज जी हैं। योगेश भारद्वाज जी क्यों नहीं आना चाह रहे आप? भाई भाई आप इस आप अगर इसको पकड़ोगे कि मैं जो है प्रमाणिक हूं वह प्रमाणिक नहीं है या फिर मैं कह रहा हूं कर्मों का फल नहीं है। योगेश भारद्वाज जी योगेश भारद्वाज जी ऐसी चर्चा से जुड़े हुए हैं। स्वयं वहां पर इनवॉल्व है जो यह वक्तव्य निर्गत हो रहा है वहां पर कि भैया अगर ऐसा है तो उसके पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण हमें मानना पड़ेगा कि उसके साथ ऐसा हुआ। आप कह रहे हो नहीं पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण नहीं हुआ। इसका मतलब वो जो सुनामी आई एक तो अपने आप आई और दूसरी बात यह है कि ईश्वर का कार्य कैसे हो गया फिर ये फिर तो दुनिया के समस्त कार्य जितने भी हो रहे हैं वो विज्ञान जनित हो जाएंगे उसमें फिर कण फल व्यवस्था ईश्वर की रही नहीं जाएगी कहां पर लागू हो रही है बता दो कनफल

02:09:53:27 व्यवस्था ला दो कहां पर हो रही है लागू आप नए-नए विषय खोल रहे हैं आप मुझे रुकिए आप जो मूल सवाल है उसका आप जलेबी बना रहे हैं आप जलेबी बना रहे हैं नहीं बना रहा हूं लेकिन मैं मैं एक्सप्लेन करता हूं थोड़ा आप मुझे इंटरप्ट इंटरप्ट मत करिएगा। हो क्या रहा है? यहां पर हो क्या रहा है? मैं थोड़ा अपने हिसाब से एक्सप्लेन दे देता हूं। मैंने एक संशय वाला प्रश्न उठाया कि ईश्वर छल कर सकता है तो ईश्वर पे सं अरे भैया मैं समझ गया हूं। इतना लंबा क्यों पीछे जा रहे हो? अरे मैं नहीं कर रहा हूं। सुन तो लो यार थोड़ा सा प्लीज। मैं थोड़ा एक्सप्लेन कर रहा हूं। रिलेट कर रहा हूं। तो आप क्या कर रहे हैं कि देखिए आपके यहां भी ये है। आपके यहां भी ये दोष है। मान लेते हैं। मान लेते हैं। अब सिद्धांत से अगर अरे मेरे भाई मैं आपको मैं दोष नहीं बता रहा हूं। मैं आपको बनवा रहा हूं कि आप जो आपत्ति जता रहे हो ना छल की वो आपके यहां भी है तो आप उसको छोड़ के अपना कोई अस्तित्व स्थापित नहीं कर पाओगे। फिर मैं फिर मैं आपकी समस्या का निराकरण भी दूंगा मगर मुझे इसका आंसर देने दीजिए कि आर्य समाज में भी ईश्वर कर रहा है और उसमें भी एक 15 सेकंड में कर दूंगा। उसमें भी एक उपविषय निकल आया कि आप यह ताल ठोकने लगे कि आप जो है वह हैं आप जो बता रहे हैं सही बता रहे वो लोग सही नहीं बता रहे। फिर जब मैंने इसको पकड़ा

02:11:08:28 तो इसने कहा नहीं नहीं वो कर्म फल जो है वो नहीं देता है मगर वो जो है कार्य करता है ईश्वर का कार्य है। तो ईश्वर का कार्य अगर फिर अच्छा एक मिनट एक मिनट अब ये आपने कहा विज्ञान के कारण हो रहा है। ठीक है तो इसमें ईश्वर का कार्य कहां से हो गया? अब मैंने जब उस प्रश्न किया तो आप कह रहे आप कैसे बदल रहे हैं? हां मैं बता देता हूं। विज्ञान इसका सवाल का जवाब देता हूं। विज्ञान भी विज्ञान के नियम ही ईश्वर धारण किए हुआ है। ठीक है? तो ईश्वर कार्य से अब बात मुख्य विषय जो चल रहा है उसमें मुझे आप ये बता दो कहां पर ईश्वर कर्मों का फल देता है। मैं ये पूछूंगा मुझे पूछने दो। ईश्वर ईश्वर मैं पूछ रहा हूं। ईश्वर कर्मों का फल देता है तो कैसे देता है? एक उदाहरण दे दो। ऐसे देता है उदाहरण दोति आयुति आयु भोग के रूप में देता है। किस में जाति आयु भोग

02:12:04:28 जाति आयु भोग थोड़ा प्रैक्टिकली इसको एक्सप्लेन कर दीजिए। आपने कर्म किए इस जन्म में उसके हिसाब से आपके संस्कार बन गए। अब उस संस्कारों के हिसाब से आपका अगला जन्म किस गर्भ में होगा? मनुष्य का भी हो सकता है या किसी अन्य जीव का भी हो सकता है। वह सारे गर्भ ऑप्शन अवेलेबल है। आपने जो कर्म किया उस हिसाब से आप जाति यानी मनुष्य या जानवर या जो भी है जाति है ना आयु यानी अपना ये क्या बोलते हैं शारीरिक मतलब आपका शरीर कितना अच्छा होगा या नहीं होगा ये चीजें है ना और भोग यानी कितना अच्छा ये पूछने में दिक्कत हो रही है कि वो कितना जिएगा नहीं नहीं कितना नहीं ये नहीं आएगी बात ये नहीं आएगी इसमें आयु आयु में ये नहीं आएगा आयु में आएगा कि आप कितनी आयु जी सकते हैं कितना जिएगा दोनों अलग-अलग स्टेटमेंट है। कितनी जी सकते हैं और कितना जिएगा दोनों अलग-अलग बातें हैं। यानी कि उदाहरण के लिए उदाहरण के लिए उदाहरण अगर आप मान लीजिए एक समझ गया आप अगर देता हूं आप हर बार काट रहे हो ये गलत बात है। बोलिए बोलिए बोलिए बोलिए उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति है जो स्वस्थ पैदा हुआ है तो सामान्य तौर पर वो 80 100 80

02:13:20:07 90 100 तक जिएगा अब इसमें 80 90 100 तक जिएगा इतनी ये आयु लेकिन बीच में भी मर सकता है ये दोनों बातें आई। ठीक है? अब ये हो गया आयु। अब भोग का मैंने बता दिया कि भोग में जो है अपना ये चीजें आ जाएंगी। क्या-क्या व्यवस्था अवेलेबल है वो सारी भोग में आएगी। ठीक है? अभी जाती भोग में एक्सप्लेन कर दिया। अब ये पॉइंट कंप्लीट हो चुका है। अब आप मुझे अब हो क्या रहा है कि आप जो है जो आक्षेप लगाया है उसका उत्तर आप ऐसे दे रहे हैं कि आर्य समाज में भी ये दोष है। आपने खुद बोला अभी अभी इंटरप्ट मत करिएगा। मुझे बोलने दीजिए कि आर्य समाज में भी ये दोष है। यानी आप ये बोलना चाह रहे हो कि देखो आर्य समाज में भी दोष मैंने आपको इस बात का उत्तर दे दिया। आप रिपीटेटिव मत करिए। मुझे भी रिपीट करना पड़ेगा। आपके दुर्जन तोष न्याय वाले सवाल का मैंने उत्तर दे दिया है। आप रिपीट करेंगे। मुझे भी रिपीट करना पड़ेगा। मैं इतना मैंने घी नहीं पिया। मैं बार-बार रिपीट करूं। नहीं आपने उत्तर नहीं दिया। आपने बोला आपने आपने आपने उत्तर नहीं दिया। उत्तर दिया है। आपने नहीं दिया। आप जो ये दुर्जनोष न्याय वाली बात कह रहे हैं। इस दुर्जनोष न्याय वाली बात का उत्तर दिया है मैंने। समझिए। ये जो दुर्जनोष वाला आप आक्षेप उठा रहे हैं ना। मैंने इसका उत्तर दिया है कि मैं क्यों दे रहा हूं एक एक बात का। मेरे पास उस बात का भी निराकरण है। पर मैं इस बात को छोड़ना

02:14:35:20 नहीं चाहता हूं कि आपने छल होने की वो जताई है। ऐसा नहीं है कि इससे स्वतंत्र हो के आपसे स्वतंत्र हो के मेरे पास उस समस्या का निराकरण नहीं है। मगर आपको तब तक सुनना पड़ेगा और आप अगर बीच में किसी किसी जगह पर मुझे काटोगे तो उन बातों को भी लेकर चलना पड़ेगा। ये बात है। खत्म नहीं हुई ये बात। तो आप निराकरण दीजिए ना। इसका मतलब कुल मिलाकर के ये है। इसका मतलब कुल मिलाकर के ये है कि ईश्वर जो कर्मों का फल देता है आर्य समाज के अनुसार वो केवल जन्मांतर में देता है। दैट्स इट। जब जीव को दोबारा जन्म देगा तो उसमें उसको पिछले कर्मों के अनुसार वो मिल जाएगा। है ना? ठीक है। ठीक है। हां। अच्छा। बाकी और कहीं पर किसी प्रकार का कष्ट होना इत्यादि होना भांतिभांति प्रकार के कष्ट होना इन सब में ईश्वर का वो नहीं है। ईश्वर काफेंस नहीं है इन सब में नहीं है। नहीं है तो उसने जब मतलब ये सब ईश्वर के कार्य नहीं है।

02:15:49:18 क्योंकि आपने एक स्टेटमेंट दिया है ना कि ये ईश्वर के कार्य हैं। ईश्वर का कार्य तो सृष्टि स्थिति वो है प्रलय ठीक है तो उसमें ऑब्जेक्टिवली स्थिति में आता है प्रलय इत्यादि ये सुनामी इत्यादि ये स्थिति में आएगा क्योंकि समार तो है नहीं ये हां मैंने इसका जवाब दे दिया आपको जस्ट पहले जवाब दिया ये किस में आएगा ये स्थिति में आएगा ये आएगा यहां तो यानी कि हां ये स्थिति में आता आता है कि ईश्वर जो है ईश्वर ने वैज्ञानिक नियम बनाए हैं। फिर प्रकृति अपने आप चल रही है। वहां पर ईश्वर का कोई वो कार्य नहीं है। तो यानी जो फोर्स इत्यादि वहां पर है जो फोर्स इत्यादि है वो वहां पर ईश्वर नहीं कर रहा है। प्रकृति स्वयं से कर रही है।

02:16:42:00 ये कब बोला मैंने? मैंने स्टेटमेंट ये दिया है कि विज्ञान के नियमों को ईश्वर ने धारण कर रखा है। मैंने यह बोला एक्सैक्ट। ठीक है। हां तो कहने का अर्थ यह है विज्ञान के नियमों के रूप में उस बच्चे को मारने वाला ईश्वर ही है। पर वहां पर वह जो है विज्ञान के नियमों के अनुसार व्यवहार कर रहा है। यानी जड़ जड़ प्रकृति कैसे व्यवहार करती है। उसके अनुसार कर रहा है। वहां पर उसका कोई वो नहीं है। विज्ञान के अनुसार जड़ हां बिल्कुल जड़ प्रकृति को विज्ञान के अनुसार व्यवहार करवा रहा है। उसमें ईश्वर का मोटिव नहीं है कि उनको सबको मार डालू। कोई मोटिव नहीं है। वो एक्सीडेंटल मौत है। हां। तो एक तो यह आ गया कि ईश्वर भांतिभांति के जो है वह जो नहीं कराता है। अलग-अलग प्रकार के कष्ट नहीं कि तूने एक तूने इसके साथ चोरी की थी ना तेरे घर में भी चोरी होना है। ऐसा कुछ नहीं है वहां। है ना? बहुत बढ़िया। ये सब आप लोग देख रहे हैं ना? ठीक है। अच्छा अब इसमें एक बात आती है कि जब प्रलय होगी सृष्टि में प्रलय होगी जब उस समय कुछ लोग जीवित होंगे समार होगा जब समार

02:17:57:27 आप इस विषय को एक्सटेंड कर रहे हैं पर जो मूल विषय उससे आप आगे आ चुके हो सर जवाब नहीं दिया आपने अभी तक आप देखिए आप अगर बार अबकी बार आपने यह बात कही ना कि आपने जवाब नहीं दिया मूल विषय का तो मुझे आपको हटाना पड़ेगा अगर आपने कोई टॉपिक पे मुझे काउंटर किया अगर आपने कोई टॉपिक पे मुझे काउंटर किया तो मैं उसकी बाल की खाल निकालूंगा ना तो आप जवाब दीजिए या तो वो या तो उसमें लेट गो कर रहा था तो करने देते लेट गो मतलब मैं उसमें आगे बढ़ रहा था आपने कहा नहीं नहीं मैं प्रमाणिक हूं मैं सिद्ध कर सकता हूं मैं हूं मैं सही बोल रहा हूं तो मैंने कहा ठीक है चलो चलो चल रहे है हां तो ठीक है ना ठीक है बोलिए हां तो अब आप बार-बार ये बात मत लाइए आप उसका प्रश्न का उत्तर मैं जब तक इसको इसको इसको पूरा खींच नहीं लूंगा। मैं अटका रहूंगा अब यही। ठीक है। ठीक है। हां। अब आप मुझे बताइए जब प्रलय होती है तब कुछ लोग जीवित होते हैं ना। वो भी एक्सीडेंटल बहुत है। सम्महार करना। प्रलय प्रलय यानी कौन से प्रलय की बात कर रहे हैं आप? सम्मार समार उत्पत्ति स्थिति सम्मार। पूरी दुनिया के प्रलय एक साथ। हां। इसकी बात कर

02:19:13:15 हम उस समय कोई जीवित हो ही नहीं सकता। उस समय कैसे जीवित रहेगा? प्रलय हो गई तो तो मतलब पहले सब अपनी मौत मर चुके होंगे उसके बाद प्रलय करता है ईश्वर। नहीं नहीं प्रलय होगी तब मर जाएंगे सारे। ये बोल रहा हूं। पहले कैसे मर जाएंगे? तो वो कार्य तो डायरेक्ट ईश्वर का हो गया ना। मारने के लिए हो गया ना? नहीं वो भी विज्ञान का ही नियम है। वो विज्ञान का नियम है। हंसी आप हां तो कितने अच्छा विज्ञान का नियम है तो कितने सालों बाद प्रलय हो जाएगी फिर बता दीजिए नियम है तो भाई हर हर कल्प में जो जितने समय में ये बनेगी सृष्टि जितने समय सृष्टि चलेगी जितने समय में प्रलय होगा ये सारी चीजें फिक्स हैं।

02:19:58:14 तो कितने समय तक सृष्टि चलेगी? कितने समय तक मैंने फिक्स आंसर दे दिया ना आपको कि सारा समय फिक्स है। हर कल्प में सेम रिपीट है। जैसे आपका जैसे आपका परांत काल फिक्स है ना फिक्स है ना हर हर मैं बोल तो रहा हूं सारी चीजें फिक्स है। कल्पों में रिपीट होगी सेम। फिक्स भैया फिक्स जब आप कर रहे हो तो मुझे प्रमाण चाहिए होगा ना। प्रमाण दो कहां पर है? नंबर आप आप नंबर चाह रहे हो ना कि नंबर क्या दूं मैं? ये चाह रहे हो आप। हां नंबर है कहीं पर मेंशन नंबर से फर्क ही नहीं पड़ता। अगर मैं मेंशन बता भी तो क्या फर्क पड़ेगा नंबर से?

02:20:37:15 मैं फर्क ये पड़ेगा कि वहां पे ये देखना होगा वो वो जो प्रलय हो रही है वो ईश्वर प्रलय कर रहा है या फिर वहां पर कौन सा ऐसा विज्ञान का वो है जिसके कारण वो हो रही है। और अगर वो विज्ञान है तो उसका वो वहां पर लिखा होगा इतने साल में पृथ्वी इस तरीके से फट जाएगी या सूरज इस तरह से फट जाएगा। उसका प्रमाण होना नहीं तो मानना पड़ेगा। नहीं तो मानना पड़ेगा। जैसे विज्ञान के नियमों के विरुद्ध निय विज्ञान के नियमों की सीमा के बाहर जाकर के जड़ पदार्थों को इकट्ठा करके उसने मनुष्य का देह बनाई चार ऋषियों को बनाया उसी प्रकार से वो विज्ञान की सीमा के बाहर जाकर के प्रलय कर देगा लय कर देगा संसार का नहीं तो मुझे बताओ कि भैया कहां लिखा है कि इतने में सूरज फट जाएगा जिसके कारण पूरी मानव जाति समाप्त हो जाएगी विज्ञान के नियम है हां हां मैं बता देता हूं आपने पूछा कि कितने समय में मैं बोल रहा हूं कि अगर मैंने फिक्स बोल दिया फिक्स हर समय बाद रिपीट होगा तो नंबर बता नंबर भी है नंबर बताने की आवश्यकता नहीं है मैं बोल रहा हूं नंबर बताने की क्या आवश्यकता है मैं बोल रहा हूं मेरा मोटिव ये नहीं है मेरा मोटिव ये नहीं है मेरा मोटिव मैं बता रहा हूं आप गलत जा रहे हैं मत दीजिए उदाहरण मत दीजिए गलत जा रहे हैं मेरा मोटिव ये पूछना है कि मेरा मोटिव ये पूछना है कि अगर यह फिक्स है कि

02:21:52:16 विज्ञान के नियमों के कारण ही होगा तो फिर इस बात का प्रमाण चाहिए ना हमें कि भैया इतने साल में पृथ्वी फट जाती कोई ऐसा वैज्ञानिक कारण जिससे कि प्रलय मान सके हम वो क्या वैज्ञानिक कारण है प्रमाण यानी आप आर्य समा जी मत पूछ रहे कि आर्य विशेषण ने क्या लिखा है इसमें ये पूछ रहे हैं आप हां हां हां यही बता दीजिए पहले उन्होंने तो फिक्स बोल ही रखा है क्या ये फिक्स है इतने टाइम में बात प्रलय होगी ही होगी ये बोल रखा है उन्होंने अरे भैया मैं पूछ रहा हूं कौन सी वैज्ञानिक क्रिया होगी जिससे कि वो पूरा लीला समाप्त होगी वो पूछ रहा हूं ये हां इसका इसका आंसर ये है कि जो मूल प्रकृति होती है उसके द्वारा संसार बनाना अपना धारण और प्रलय जो मूल प्रकृति की जो क्षमता है उस क्षमता अनुसार कि भाई इतने इतने समय तक मूल प्रकृति के द्वारा सृष्टि बनने मतलब सस्टेन होगी और जो क्षमता क्षमता होती है मूल प्रकृति की उस क्षमता के बाहर जब मैं कह रहा हूं मैं आपसे पूछ रहा हूं कौन सी घटना होगी प्राकृतिक घटना वैज्ञानिक नियमों के अनुसार जिससे सृष्टि प्रलय होगी अगर अगर अगर ये चीज फिक्स अगर यह चीज वैज्ञानिक नियमों के आधार पर है तो अगर ये चीज वैज्ञानिक नियमों के आधार पर है तो मुझे वो घटना बताइए किस घटना को प्रलय मानेंगे आप?

02:23:08:19 देखिए मैं इसका जवाब देता हूं। ना तो मुझे समझ बताने की आवश्यकता है ना मुझे कौन सी वैज्ञानिक नियम बताने मैंने क्या बताया है? क्योंकि आप ईश्वर के कार्य को क्योंकि आप ईश्वर के अह प्राकृतिक नियमों से परे कार्य को उसमें जोड़ रहे हैं। वैज्ञानिक नियमों से तो मैं वैज्ञानिक नियमों से जोड़ रहा हूं तो आप मुझे बता दीजिए कौन सी घटना घटित होगी? बादल फट जाएंगे वो सूर्य फट जाएगा, पृथ्वी फट जाएगी किससे होगी प्रलय वो बता दीजिए। ये ये कौन सी घटना घटित होगी मुझे नहीं पता। तो फिर आपकी बात कैसे मानी जाए? वैज्ञानिक नियमों के आधार पे होगी वो। हां तो मैं मैं कितनी बात बोल रहा हूं वो उस पर ध्यान से सुनिए। मैंने सिर्फ इतनी बात बोली है कि निश्चित समय के आधार पे रिपीट होगा। आर्य समाज का मत यह है और यही है जो मूल प्रकृति का नियम है। मूल प्रकृति इसी हिसाब से काम करती है। निश्चित समय है। यह मत है। ठीक है? आपने कहा कि वो कार्य ईश्वर का नहीं है। आपने कहा वो कार्य ईश्वर का नहीं है। कि प्रलय के समय पर अमुक अमुक लोग मर जाएंगे। हां हां। वो भी वो भी इसके अंदर उसको भी आप एक्सीडेंटल बहुत मानेंगे। दृष्टि सोचिए सोचिए। अच्छा एक बात बताइए प्रकृति

02:24:23:20 का अपना एक समय है जब वो चालू हो रही है। ईश्वर ने बना दिया। फिर प्रकृति का अपना एक समय है। तो फिर प्रलय में ईश्वर का हाथ कहां रह गया? जब उसका अपना एक समय है तो? फिर प्रलय करेगा तभी तो अगली सृष्टि बनाएगा। ईश्वर का हाथ कहां है प्रलय करने में? वो तो अपने आप फट रही है अपने उसके हिसाब से फट नहीं फट नहीं रही है ना वो तो बता रहा हूं फटना नहीं मैंने फटना नहीं बोला है समय निर्धारित ठीक है अब आप अपना उत्तर ले लीजिए समझ गया मैं खूब खींच लिया आप अपना उत्तर ले लीजिए हां सुनिए

02:25:03:01 अ हमारा जो विश्वास है वो सीधेसीधे ईश्वर ईश्वर की वाणी पर नहीं है। हम उन वेदों पर विश्वास करते हैं जो यह क्लेम नहीं करते हैं कि हमें ईश्वर ने रचा। वेदों का कोई कर्ता नहीं। अपारुषय माना है। वेदों को अपौरुषय जो वेद वाणी है वो ईश्वर के सांस में विद्यमान है। के कब से जब से ईश्वर है। अनादि ईश्वर ने रच दिया होता। जिन शास्त्रों को ईश्वर रच देगा तो उसमें भी वो बुद्धि आ जाएगी। प्रमाण्य अप्रमाण्य वाली। ठीक है? तो हम उन वेदों पर विश्वास करते हैं जिनको ईश्वर ने नहीं रचा है। इस संबंध में ब्रदार उपनिषद का एक दृष्टव्य है वो है। दूसरा अध्याय शायद वहां पर है। ठीक है? तो ईश्वर के स्वास रूप में स्थित जो वेद आदि शास्त्र हैं उन पर हमारा विश्वास है। इसीलिए हमारे यहां पर जब बुद्ध के रूप में ईश्वर आते हैं यज्ञों की रक्षा के लिए वेदों का वेदों के इत बात करते हैं तो हम उनको ईश्वर के रूप में प्रणाम तो करते हैं। मगर उनकी दी हुई शिक्षा को ग्रहण नहीं

02:26:18:02 करते। हम दूर से नमस्कार करते हैं। ठीक है? और अब बात आती है कि वेद और फिर वेद के बाद जितने शास्त्र वेद के अकॉर्डिंग रहेंगे यानी ईश्वर की ईश्वर के अवतार द्वारा लेने अवतार लेने के बाद वो सारी वाणियां जो वेद के अविरुद्ध है वो सारी ग्रहण हो जाती हैं। अब ये जो अविरुद्ध है कि नहीं है ये कौन बताता है? परंपरा प्राप्त गुरु। अब बताइए आप। ठीक है? ठीक है। तो क्योंकि इस संशय रहित तरीके से इस पर भरोसा करने का कारण यह है कि यह ज्ञान ऐसा है जो ईश्वर भी रचना नहीं कर रहा है। यानी ईश्वर आपको दे रहा है। रचना नहीं कर रहा। बना नहीं रहा है। ईश्वर एट द टाइम। यही है ना पॉइंट। अनादि हां अनादि है। अनादि बिल्कुल सही। तो अब इस पर पॉइंट ये आ जाएगा कि ये ज्ञान अनादि है। ये ज्ञान वही वाला है जो ईश्वर का अनादि वाला ज्ञान है या ये ज्ञान ईश्वर ने झूठा दे दिया। इस पर सवाल आ जाएगा फिर। ये कौन सा वाला ज्ञान है? सवाल सवाल नहीं आएगा। सवाल नहीं आएगा क्योंकि हम वेदों को प्रमाण मानते हैं। सवाल नहीं आएगा। वेद ने कहा मैं अनादि हूं इसलिए अनादि है। बात खत्म। हां तो वही वही तो मैं बोल रहा हूं। जैसे आपके पास जो वेद है उस वेद को प्रमाणिक आप क्यों मान रहे हो? क्योंकि ईश्वर ने उसको नहीं रचा है। ये भी स्वास रूप में प्रकट हो।

02:27:33:25 रचे नहीं गए। ईश्वर ने बुद्धि पूर्वक उसको नहीं रचा है। बुद्धि पूर्वक हां बिल्कुल सही। यानी यह अनादि है। जैसे हर कल्प में चलते आ रहे हैं वैसे ही वाले वेद है। ये तो अब यह बात यह आ जाएगी कि यह वही वाले वेद हैं जो हर कल्प में ईश्वर के द्वारा रचे गए हैं। ये वही वाले वेद है। इस पर आप कैसे भरोसा करोगे? कर हम बता तो रहे हैं। श्रद्धा है हमारी ना। हमारी श्रद्धा है वेद में कि हां भैया इस पर हमें विश्वास है। ये सच ही बोल रहा है। और उसी ने बोला है। जिस पर हमारी श्रद्धा है वही बोल रहा है। मैं जो है अनादि हूं मैं वही वाला हूं। यहां से शुरू होता है। वहां पे यह प्रश्न यह प्रश्न हम जो है विधर्मियों से कर चुके कई बार और ये रामपाल इत्यादि जैसों से भी करते हैं। ब्रह्मा कुमारी इत्यादि जैसों से भी करते हैं जो ये दावा करते हैं कि हमारे पास ईश्वर ने स्वयं आकर के ज्ञान दिया। ठीक है? तो हमारी जो श्रद्धा है वो केवल इस बात पे नहीं टिकी हुई है कि वो क्या कहते हैं? के केवल तर्क है। केवल तर्क पर नहीं टिकी है। उसमें फिर विश्वास भी है। श्रद्धा भी है। जैसे एक मां के प्रति श्रद्धा होती है। तो हमारे वेदों ने कहा है हम अनादि इसलिए हम मानते हैं अनादि। बात खत्म। विश्वास श्रद्धा हां इसमें हां इसमें समस्या क्या आ रही है? मेन जो समस्या यह आ रही है

02:28:49:03 कि यह जो वेद है यह ईश्वर के द्वारा मतलब जो सत्य वाले वेद है ये उसी पर आपकी श्रद्धा है। लेकिन दिक्कत ये आ रही है कि एक जगह पर ऐसा भी आ रहा है कि ईश्वर जो है आपको झूठा ज्ञान भी दे सकता है। तो ये वो झूठा ज्ञान नहीं है। ये कैसे वेरीफाई करोगे आप? गुरु गुरु गुरु बताएगा झूठा ज्ञान नहीं गुरु के द्वारा हमारी श्रद्धा है तो ईश्वर हां तो ईश्वर तो गुरु के साथ भी शल कर सकता है गुरु के ज्ञान गुरु के दिमाग में गलत ज्ञान डाल सकता है तो हमारी श्रद्धा है ना वहां पर कि नहीं इसके साथ ऐसा नहीं हुआ श्रद्धा आपकी इस बात पर है कि गुरु ने सही ज्ञान दिया ठीक है बिल्कुल सही बात है तो श्रद्धा आपकी इस बात पर ऐसा नहीं हुआ गुरु के साथ ईश्वर ने छल नहीं किया यह श्रद्धा है नहीं तो इसमें फिर यह श्रद्धा मानने के लिए आपको यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर चल नहीं कर सकता था। सामर्थ्य नहीं था ईश्वर में छल करने का। नहीं ये कहां मानना पड़ेगा? ईश्वर ने इनके साथ ऐसा नहीं किया। ईश्वर में तो सामर्थ है तभी तो कुरान बनी दुनिया में। ईश्वर की सत्ता के बाहर आप मानते हो। प्रलय इत्यादि हम थोड़ी ना मानते हैं। अल्टीमेटली बात ये आ रही है कि ईश्वर में सामर्थ्य तो था कि इनके साथ छल कर सकता था। लेकिन नहीं किया। हमने ये माना है कि इनके साथ नहीं किया। ईश्वर ने ये माना आप क्यों अपने वर्ड मेरे ऊपर चिपका रहे हो? नहीं नहीं मैं

02:30:04:04 चिपका नहीं रहा हूं। मैं खाली क्लेरिफाई कर रहा हूं कि सामर्थ्य को था सामर्थ्य मान रहे हो आप। हां सामर्थ्य मान रहे हैं। मगर नहीं किया यहां नहीं किया। इनके साथ नहीं किया ऐसा पॉइंट पॉइंट कंप्लीट कर देता हूं। सामर्थ्य था लेकिन फिर भी नहीं किया। इस बात को आप वेरीफाई नहीं कर सकते। किसी भी तरीके से तो मैं कह तो रहा हूं। सिर्फ तर्क नहीं है। श्रद्धा की श्रद्धा भी है। कह तो रहा हूं। अगर यह बात आप बोल अगर यह बात आप बोलते हो यही बात अगर मुसलमान बोले कि मेरी भी कुरान पे श्रद्धा है ये वाला जो ज्ञान है ईश्वर के द्वारा दिया गया सही ज्ञान है तो आप उसको कैसे काटोगे उसके ईश्वर को सर्वशक्तिमान असिद्ध करके दूसरी बात नहीं तो सर्वशक्तिमान इस आता था एक पॉइंट एक मिनट एक मिनट एक मिनट भाई साहब एक मिनट भाई साहब उसके ईश्वर को जीव की चाह का वास्तविक अभिषय सिद्ध करके कि जीव जिस ईश्वर को ढूंढ रहा है वो है ही नहीं दूसरी बात दूसरी बात हमारी वो ईश्वर ने दिया है। वो ये ये भूल करके खुद बैठे हुए हैं कि ईश्वर ने बुद्धि पूर्वक ये ज्ञान दिया है। और बोलो ये भूल करके वो खुद बैठे हैं। तो जो जो तीन बातें तीन बातें आपने बोली कि इन आधार पर हम उनको काट रहे हैं और अपना सही बता रहे हैं। तीन जो बातें हैं तीन जो बातें हैं ये बातें सही है। ये मानने के लिए आपको उन सातों पे डिपेंड होना पड़ रहा है। और शास्त्रों पे ही संशय चल रहा है। अभी

02:31:19:10 आप डिसाइड करिए। मुझे बोलना मैंने कहा ना केवल तर्क नहीं है श्रद्धा भी है मेरे भाई बार-बार रिपीट कर रहे हो आप मुझे मालूम है आप यही करते हो आपने वहां भी यही किया था मैंने कह दिया खुल के स्पष्ट उस पॉइंट पे कुरान कुरान वाले पॉइंट पे आ रहा हूं कि आपने बोला आप कुरान को इसी आधार पे काट रहा हूं मैं तीन आधार बताए कि उनके जो ईश्वर ने रचना है या उनके ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है आदि आदि जो तीन कारण थे ये तीन कारण कहां से आए असतो मा सद्गम अंदर से आए तर्क से आए तर्क से जब कोई जो नास्तिक व्यक्ति कोई प्रश्न करता है तो वह क्या वेदों से देखकर करता है? सही बात है। सही बात है। तर्क से करता है। सही बात है। तर्क से करता है। तर्क से बिना वेदों की सहायता के तर्क के आधार पर उसको काट देंगे। हां। तो ये जो कारण आपके पास तर्क से आए हैं। ये कारण सही है। ये कारणों में ईश्वर ने छल नहीं कर रखा है। आपके दिमाग में गलत तर्क नहीं डाले हैं। ये कैसे वेरीफाई करोगे आप? श्रद्धा श्रद्धा

02:32:23:15 सुनिए सारी चीजें टिकी इस बात पे कि हमें मोक्ष चाहिए हमें मोक्ष चाहिए सुख दुख से मुक्ति चाहिए इसी बात पे तो टिकी है अब जो ईश्वर है अब जो अब जो ईश्वर है वो इस बात पे सिद्ध नहीं हो रहा है अब आप कह रहे हो ये जो मेरे अंदर फीलिंग आ रही है ये भी तो गलत हो सकता है तो ना तो धर्म का अस्तित्व सिद्ध हो रहा है ना तो इस बात से धर्म का अस्तित्व सिद्ध होगा असिद्ध होगा कुछ भी सिद्ध नहीं होगा फिर तो इससे आपने क्या कर लिया संशयात्मक संशयात्मक स्थिति आ जाएगी ना कि जो वेदों के ज्ञान है उस संशय आ जाएगा आपको फिर तो मैंने उसको दिया तो है भाई कि हमारे पास तर्क के साथसा श्रद्धा है मगर तर्क की पराकाष्ठा पे खड़े हुए हैं हमारे वो हटा हैं क्या तर्क मैं बताता हूं क्यों क्यों क्यों हटाना पड़ेगा मैं उसका आंसर दे देता हूं मैं बोल रहा हूं आप श्रद्धा प्लस तर्क दो बातें लेके चल रहे हो मैं बोल रहा हूं कि तर्क इसलिए हटा सुनिए सुनिए तर्क की पराकाष्ठा [हंसी] हां तर्क की पराकाष्ठा ठीक है तर्क की पराकाष्ठा ठीक है तो जब तर्क की पराकाष्ठा पे हम जा रहे हैं कि तर्क पराकाष्ठा में क्या निकल रही है अपना सर्वशक्तिमान ईश्वर स्वतंत्र मोक्ष आदि आदि चीजें तर्क परकाष्ठा में निकल रही है तो उस तर्क की पराकाष्ठा में भी जब जा रहे हैं तब भी आपका आंसर श्रद्धा ही है अल्टीमेटली तो एंड ऑल बी श्रद्धा है तर्क को हटाना

02:33:38:21 तर्क के अंदर जब हम जा रहे हैं तो श्रद्धा ही निकल रही है उसके अंदर भी तो वो वो वो फिर हम जब उनसे वो करेंगे तो वहां पर जनता जनता डिसाइड कर लेगी किसकी बातें तार्किक रूप से सिद्ध होती है किसकी नहीं होती बात खत्म आपको क्या टेंशन है कि विरोधी तार्किक रूप से तार्किक रूप से सिद्ध हो अरे भैया जनता डिसाइड कर लेगी कि इसने जनता ये डिसाइड कर लेगी कि इसने श्रद्धा कहा है तो वो कहां तक सही है कहां तक सही नहीं है जनता ये डिसाइड कर लेगी समझ गए ना हम जब अपनी बातें ये वाली रखेंगे तो जनता डिसाइड करेगी हमने तो उनके हमने तो जब भी उनके टेप ही लगाया है हां ठीक है ठीक है यानी इसका मतलब यह है कि जब आप यह सिद्ध करने जाओगे कि कुरान का ईश्वर सही है या आपका ईश्वर सही है तो जनता ने जो निर्णय दिया वो सही हो जाएगा। नहीं निर्णय तो वही सही होगा जो हमारा है। मगर हमने कहा वहां पर जो जनता होगी डिसाइड कर आपका सही इसलिए होगा क्योंकि आपके आपका आपके ऊपर श्रद्धा है अपने आप वाले पे। यही इसीलिए कहा है ना श्रद्धा भी है तर्क भी है। श्रद्धा भी है तर्क भी है। क्योंकि हमारा जो ईश्वर है क्योंकि हमारा जो ईश्वर है मैं बता रहा हूं क्योंकि हमारा जो ईश्वर है वो जीव की चाह का वास्तव हम ईश्वर को ढूंढ क्यों रहे हैं? क्यों ढूंढ रहे हैं? जब चालू ही यहां से हो रहा है। क्या कहते

02:34:53:25 हैं? जब चालू ही यहां से हो रहा है कि भैया असतम असत सच्चिदानंद की चाह। सच्चिदानंद की चाह से हम ढूंढ रहे हैं। तो जब हमने ये मान के शुरुआत की है कि हम सच्चिदानंद की चाह से ही ईश्वर और धर्म की सिद्धि करें। अब आप कह रहे हो कि इसको भी बदल देगा तो। अगर वह इसको भी बदल देगा। इसने गलत आपको जो है गलत वो दे दी है तो आप बताइए उदाहरण के क्या दे देगा कौन सी चाह दे देगा फिर वो दूसरी हमारी क्या चाह हो सकती है इससे ठीक है ठीक है आपने बताया कि तर्क के आधार पे आपने ये जाना मैं मैं पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं सच्चिदानंद की चाह के इत कौन सी चाह हो सकती है अब ये बताइए जो वो बदल बदल देगा मैं ये बोल रहा हूं कि सच्चिदानंद की चाह ईश्वर की है यह बात आपने तर्क से मानी है तर्क दोनों से हां तर्क से ही मानिए तर्क तर्क से मानिए अब जब हम तर्क पे जा रहे हैं कि क्या ईश्वर आपके दिमाग में गलत तर्क डाल के गलत चाह डाल सकता है तो उस पे आपकी श्रद्धा अरे मेरे भाई तो इसका कोई विकल्प ही नहीं है ना इसका कोई विकल्प कहां है अच्छा इसका इसका कोई विकल्प नहीं है निर्णय कैसे लिया आपने बताओ आप कौन सा हो सकता है विकल्प आपने बुद्धि से लिया ना निर्णय

02:36:09:10 आप मुझे बता दो विकल्प कौन सा हो सकता है? सच्चिदानंद की चाह के अलावा आप भाई साहब आप आप बकवास कर रहे हैं। आप बकवास कर रहे हैं। कुछ नहीं कर रहे हैं। नहीं हमारी हमारी चर्चा भी सुन ली लोगों ने। विकल्प मैं विकल्प दे देता हूं। विकल्प देता हूं। विकल्प विकल्प दीजिए। विकल्प दीजिए। विकल्प देता हूं। विकल्प ये है कि सच्चिदानंद की चाह होना ये सही बात है। विकल्प मैं देता हूं। इसका उल्टा ईश्वर चाहता है कि हम सच्चिदानंद की चाह ना करें और भटकते रहे संसार में। यह विकल्प है। क्या? तो मेरे अंदर तो है ना सच्चिदानंद की चाह तो ये चाह झूठी है ना मैं वही तो मेरा क्लेम ही है कि चाह झूठी है आप कैसे सही मान तो सच्ची चाह बताइए फिर आप सच्ची चाह बताइए मैंने बता देखिए ऑप्शन क्या है हमारे पास दो ऑप्शन है एक तो सच्चिदानंद की चाह होना और एक सच्चिदानंद की चाह ना होना ये दो ऑप्शन है क्लियर बात है यानी कि यानी कि आप ये कह रहे हैं कि मेरे अंदर मेरी मैं मैं समझ गया मैं समझ गया मैं समझ गया यानी कि आप यह कह रहे हैं कि मेरे अंदर जो वास्तविक चाह है वो मरने की होनी चाहिए और मूर्ख होने की होनी चाहिए। ये वास्तविक चाह हो सकती है मेरी। मैं इसी इसी पे यही कह रहे हैं ना इसी कंप्लीट कर दूं मैं अपना पॉइंट कंप्लीट कर दूं। दो चाह है हमारे अंदर। एक है सच्चिदान दो ऑप्शन है। चाह है तो आपने प्लीज कहा ना भाई देखो मैं देखो ढाई घंटे हो चुके हैं। आपने

02:37:25:10 मैं भाई मैं आपकी बात को मैं कंप्लीट कर रहा हूं। प्लीज आप आप क्या है ना अनर्गल बातें कर रहे हैं। मैं इसलिए कंप्लीट कर रहा हूं क्योंकि आप रिपीट कर रहे हैं। आप रिपीट कर रहे हैं। आप रिपीट कर रहे हैं। मैं इसलिए कंप्लीट कर रहा हूं। सुनिए मैं आपकी मैं आपकी बात से जो समझा हूं अगर गलत बोलूं तो आप बताइएगा। मैं टोकूंगा भैया। बहुत देर हो गई आपके साथ। आप तो मगजमारी करने ही आए हो तो वो दिखाई दे रहा है। ठीक है। चलो मैं आपकी बात बोल रहा हूं। अगर वह गलत हो तो आप बोल दीजिएगा। ठीक है? आपने कहा कि हो सकता है हमारी चाह कुछ और हो। सच्चिदानंद के विपरीत हो और ईश्वर ने बदल दी हो। ठीक है? ठीक है ना? तो अब यहां पर बात आ जाती है हां। ठीक है। अब यहां पर बात आ जाती है कि इसका जवाब कई प्रकार से होता है कि ईश्वर हमारी मूल चाह बदल सकता है कि नहीं बदल सकता। यही बात आती है ना हमारी आंतरिक मूल चाह बदल सकता है कि नहीं बदल सकता यही बात आती है तो यह फिर हो जाएगा पारमार्थिक विषय वही व्यवहार और परमार्थ का अंतर और इसमें फिर वही शून्य क्रिया आ जाएगी मैं कहूंगा

02:38:40:21 बदल नहीं सकता क्योंकि ईश्वर वही है जो इस चाह जो इस एक मिनट गलत बात है हां बोलिए बोलिए आप बोलिए आप अपना प्रश्न सही [हंसी] से कर जो गलत कंक्लूजन दे रहे हो बता देता हूं कैसे कि आपने यह मान रखा है पहले से यह सच्चिदानंद की जो चाहें सच्ची है मैं इसी पे आ रहा हूं कि यह जो मान रखा है ये कैसे माना अब इसमें बात ये आ रही है कि ये मानने के लिए आप जो आ रहे हैं कि भाई मैंने अपनी बुद्धि से तय किया मैंने तर्क कैसे किया जो जो चीजों से आप मान रहे हो वो सारी चीजें ईश्वर के कंट्रोल में कि उन चीजों में ईश्वर छेड़छाड़ कर सकता है तो फिर कैसे मानोगे वेरीफाई कैसे करोगे मूल प्रश्न ये है ये नहीं कि सच्चिदानंद की चाह है ये तो आप मान सकते हो ये नहीं मान सकते हो आप इसी पे आ रहा हूं ये नहीं मान सकते हो आप सच्चिदानंद की चाह है ये बात आपका निर्णय तक कैसे पहुंचे? इस निर्णय तक पहुंचने का प्रक्रिया बताइए मुझे। कैसे पहुंचे इस निर्णय तक? इस निर्णय तक पहुंचे क्योंकि मेरे अंदर से उसका आभास आता है कि सच्चिदानंद की चाह है मेरे अंदर और हर जीव के अंदर आभा। आपके हां हां हां इसी पे आ रहा हूं। इसी पे आ रहा हूं। तो आपके अंदर जो अंदर से आभास आता है। ये आभास सच्चा है। ये बात कैसे वेरीफाई करी आपने? तो यहां पर यही बात आ गई ना कि वो इसको भी बदल सकता है कि नहीं? पहली बात तो ये आ गई ना। नहीं ये बदल बदलने की बात नहीं है। मैं बोल रहा हूं कि ये है ही नहीं। और भी कुछ हो सकती है। बदलने की तो बात ही नहीं। तो बाद में जब [हंसी] भी और भी कुछ चलो उसमें

02:39:56:04 चलो उसमें और भी कुछ का जवाब दे देता हूं। हालांकि यहां पे अब चर्चा तुम्हारी बकवास हो गई है आपकी कुछ नहीं बचा है मगर फिर भी मैं जवाब दूंगा बकवास नहीं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आप आप भाई साहब आप बकवास ही कर रहे हैं इस समय इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आप आप चलिए मैं बकवास शब्द को वापस ले लेता हूं बकवास मैं बकवास शब्द को वापस ले ले रहा हूं मैं असली वापस ले रहा हूं चर्चा चल सके मैं वापस ले लेता हूं ठीक है और आप क्योंकि इस समय जो वो तो काफी पहले ही दूर जा चुके हैं अलंकार समाज के। मैं इस समय आगे आगे बढ़ता हूं। अह हम आपने कहा विपरीत हो सकती है। यह ना हो के कुछ और हो सकती है। ठीक है? तो अब जब कुछ और हो सकती है तो वो क्या हो सकती है? वो आप मुझे बताइए। तो आपने कहा कि विपरीत उल्टा हो सकती है। तो आप यह कह रहे हैं कि हमारी चाह हो सकता है ऐसी हो वास्तव में कि मैं मरना चाहता हूं। ये कह रहे हैं ना आप या फिर मैं बुद्धू बनना चाहता हूं या फिर मैं दुखी होना चाहता हूं। हो सकता है हमारी जो मूल चाह हो वो ये हो। ये आप कह रहे हैं। हां हां हां ठीक है। तो यहां पे हमारा ये डिस्कशन ये अब तक आपने ये कहा कि हो सकता है हमारी चाय ये हो सकती

02:41:11:08 है। जनता हमने हमारा डिस्कशन देगा। अब वो जनता डिसाइड कर लेगी। हमारी चर्चा इसलिए नहीं है कि यहां से यहां पर जो है कोई निर्णय किया जाए। हमारी चर्चा इसलिए है कि कोई देखे और उससे अपना लेके ज्ञान जाए। समझ गए ना? यहां तक हो चुकी बात हो चुकी ना? आपका कहना यह है कि हमारी चाय यह भी हो हमारी बात हमारी चाह वास्तविक यह भी हो सकती है कि हम बुद्धू बनना चाहते हैं। आपके अनुसार आप यह कह रहे हैं संभावना सच्चिदानंद की चाह बुद्धू बनना चाह या और ऐसी कोई चाह जो हमको पता ही ना हो। ऐसी जितनी भी संभावना है कुछ भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता है। तो जब तो भैया वही बात है ना जब लॉजिकली हम देखना शुरू करते हैं तार्किकता से हम देखना तो हमें कोई विकल्प दूसरा मिलता ही नहीं है। और जो आप विपरीत चाह बता रहे हैं जो आप विपरीत चाह बता रहे हैं सच्चिदानंद के विपरीत चाह जो उसमें भी सच्चिदानंद है उसमें भी आनंद तो है ना भाई चाह का मतलब क्या है चाह का कि हमें चाहिए क्या उस चाहने से हम संतुष्ट होंगे तो आनंद तो उसके गर्भ में भी आ गया कुछ भी ले आओगे उसके गर्भ में आनंद आ जाएगा हां ठीक है मैं बोल ठीक है ठीक है आपने लॉजिक ये भाई

02:42:26:12 साहब ये ये चर्चा हो चुकी है। आप आगे आगे आगे आगे चर्चा करें। ये चर्चा हो चुकी है। ये आगे चर्चा आप भाई साहब आप ये चर्चा हो चुकी है। आगे चर्चा करनी है तो आप बताइए। ये चर्चा हो चुकी है। आगे चर्चा करनी है पर इसको कंप्लीट तो कर दूं मैं। करिए। चलिए करिए। कंप्लीट ऐसा कर देता हूं। अंतवा आपने जो ये बताया कि हम इस चाह ये चाह सच्ची है। हम ऐसे पहुंचे लॉजिकली हम पहुंचे। लॉजिकली का मतलब ये है कि आपने संसार में सारे जीव देखे हैं और किसी जीव में भी ऐसी चाह नहीं मिली जो मूर्ख बनना चाहे जो मरना चाहे एक मिनट एक मिनट हेलो हां आपका मैं क्या हुआ बोलिए बोलिए आपका चेहरा नहीं दिखाई दे रहा मैं ये बोल रहा हूं कि हां मैं ये बोल रहा हूं कि अंत बतवा ये बात निकल के आ रही है कि आपने जो है संसार में कभी भी ऐसा कोई जीव नहीं देखा होगा जो मूर्ख बनना चाहे जो मरना चाहे या सच्चिदानंद उल्टा जो मैंने बताया उस प्रकार का व्यवहार करना चाह सीधी बात नहीं देखा अब बात ये आती है कि आपने ये निर्णय लिया कि ये जो प्रत्यक्ष था मेरा कि मैं देख रहा हूं हर जीव आज जीना चाह रहा है हर जीव अनंत काल तक जीना चाह रहा है अनंत सुख भोगना चाह रहा है जितने भी चाह है ये मैंने देखी ये इसका मैंने प्रत्यक्ष किया इस प्रत्यक्ष के आधार पर मैंने बुद्धि पूर्वक ये

02:43:41:13 निर्णय किया कि इस चिदानंद की जो चाह है वो सच्ची है अल्टीमेटली ये बात आ रही है तो फिर सवाल मेरा उसी पे आ जाएगा कि आपने जो बुद्धि पूर्वक प्रत्यक्ष के आधार पर तर्क लगा के निर्णय किया और जिन बुद्धि पूर्वक भी किया है और जिन माता पिता या गुरु गुरु माता पिता के तुल्य गुरु और शास्त्र इत्यादि है उनके वचनों से भी उसको लिया है। बुद्धि पूर्वक प्लस जिसमें मेरी श्रद्धा है उनसे भी लिया है। जी ठीक है। ठीक है। ठीक है। तो बुद्धि पूर्वक श्रद्धा और प्रत्यक्ष के आधार पर आपने तर्क पूर्ण ये निर्णय लिया कि सब जीवों की ये चाह है। यानी आपने अंतत गतवा निर्णय अपनी निर्णय तो बुद्धि से ले लेगा। बुद्धि के बिना निर्णय कैसा है? से श्रद्धा जिसमें उसका श्रद्धा जिसमें उसकी बात माननी है वो भी एक तर्क है। हां हां वो भी वो भी वो भी मान रहा हूं वो भी ले चल रहा हूं। वो आदमी इंक्लूड है उसको अलग नहीं कर रहा वो बात ठीक है जल्दी करिए थोड़ा जल्दी करिए 2 घंटे 44 मिनट हो चुके हैं तो हां तो अब बात ये आ रही है कि बुद्धि पूर्वक श्रद्धा से जो चीज आपने मानी है अंत तो बताओ बुद्धि पूर्वक ये निर्णय लिया अब ये जो निर्णय लिया है इसमें ईश्वर ने अगर छल किया तो आपके पास ये कोई तरीका नहीं है इसको पता लगाने का कि ईश्वर में छल कर सकता है इस निर्णय में ये कंक्लूजन दे रहा हूं यानी कि ईश्वर के छल करने की संभावना को स्वीकार करना है ना यहां पे

02:44:56:28 हां हां हां हां तो पहली बात तो ईश्वर छल कर ही नहीं सकता। उसमें आ जाएगी वो वाली बात कि आपकी चाह जो वास्तविक चाह पारमार्थिक दृष्टिकोण से मूल चाहे वो बदल सकता है कि नहीं। एक तो वो वाली बात आ जाएगी कि बदल सकता है कि नहीं बदल सकता है। दूसरी बात मैं इसको इसको नहीं ले जाऊंगा आगे। मैं यह कहूंगा कि अगर हमारी कुछ और चाह हो सकती है। कुछ और चाह हो सकती है ना जिसको बदला है ईश्वर ने। हेलो हां हां हां हां हो सकती है तो मैं ये कह रहा हूं वो जो भी चाह होगी उसके मूल में सच्चिदानंद फिर निकल आएगा बताइए आप कोई भी चाह बताइए आप मैं उसमें आनंद निकाल दूं यानी यानी अल्टीमेटली पॉइंट ये है कि अगर कोई भी विकल्प मैं दूं उसमें अल्टीमेटली सच्चिदानंद निकल के आ जाएगा ठीक है ये निर्णय है आपका हम तो ये निर्णय ये निर्णय आपने बुद्धि पूर्वक लिया है अबे भैया बकवास मत करो ठीक है इतना घी नहीं बकवास नहीं आपको अब अगले विषय पर बात करनी है। अगले विषय पर बात करनी है।

02:46:06:07 अगले विषय पे बात करेंगे अब। आप जितने विषय एक मिनट एक मिनट एक मिनट एक एक मिनट भाई साहब। ठीक है आप जाइए जा सकते हैं। ये व्यक्ति अंत तक होते यही लेकर के आए हैं। दो चीजें लेकर के आए थे। एक ले आए थे इनके यह जो अपने से ले आए हैं। एक लेकर के आए हैं क्या कहते हैं वह एक लेकर के आए थे कि भैया ईश्वर पत्थर हम और ईश्वर पत्थर में खूब हमने इनको बता दिया कि भैया आप यह कह रहे हैं कि क्या ईश्वर कोई ऐसा कार्य कर सकता है जो मैं भी नहीं जानता तो कौन सा कार्य करने को कह रहे हो जब तुम जानते नहीं हो। फिर जो है दूसरा इनका जो खंभा था बहुत बड़ा वह यही था कि वेदों पर विश्वास कैसे करेंगे? हमने कह दिया श्रद्धा है तर्क की पराकाष्ठा है। समझा दिया वेद अपोष है ये मान के हम चलते हैं। अब भैया इसमें बार जब मैंने इन्होंने कहा सच्चिदानंद के विपरीत कोई इच्छा होगी। मैंने कहा उसके भी घर में आनंद निकल आएगा। तो जितनी बार विपरीत करोगे उसके आनंद तो फिर ये लूप बार-बार रिपीट करने का क्या मतलब है? फिर विषय को बेकार की बात कोई और दूसरी बात

02:47:21:08 खुद स्वयं खुद स्वयं आर्य समाज के आचार्यों के विरुद्ध जा रहे हैं। भैया वो जो मार रहा है वो ईश्वर नहीं मार रहा है। अच्छा एक चीज और जानने को मिल रही है कि ईश्वर जो है वो केवल आपको जो है वह देगा। अगला जन्म उसमें ही वह आपका कर्म फल का निर्णायक है। अभी मैं यह चीजें तो लाया ही नहीं क्योंकि उस पर मैं खोल रहा था जितनी बार वह एक्सटेंड कर रही थी बात कि भांतिभांति प्रकार के जो भोग होते हैं वो तो व्यक्ति मोक्ष में भोगता है। निश्चित रूप से भोगता है। भांतिभांति प्रकार के भोग ठीक है। मगर भांतिभांति प्रकार के दुख नहीं भोगता ईश्वर की इच्छा से। वहां तो भोग भुगवाता है ईश्वर। मगर यहां पर दुख नहीं भोगता है। दुख आप अगर उसका कोई वह है

02:48:13:15 क्या कहते हैं कर्म फल सिद्धांत इनका यह है कि वो उसको वैसी योनि मिल जाएगी बस अगर उसको दर्द उसने किसी को दिया है वो दर्द उसको दोबारा मिलेगा कि नहीं मिलेगा कोई गारंटी नहीं है ये इनके ईश्वर का सिद्धांत ये इसने माना है मुझे नहीं लगता और आर्य समाझी मानते होंगे ये इसने माना है जैसे किसी ना किसी को दर्द दिया पिन चु हम ये मानते ये जो पिन भी अगर आपने किसी को चुबो दी ना तो वो भी वो भी उस वो दर्द भी आपको रिपीट में आना है। वो भी व्यास सहित हम यह मानते हैं। और यह व्यक्ति क्या कह रहा है वो सिर्फ योनि दे देगा। वो उसका काम है भोगे भोगे नहीं भोगे नहीं भोगे वो दर्द उसको मिला कि नहीं मिला रिपीट रिपीट रिपीटेड वो कुछ नहीं पता है। मतलब इनके यहां पर क्या है जो कुछ भी यह हो रहा है इसमें जीव ईश्वर का कुछ है ही नहीं क्योंकि इन्होंने जो अपना वेदों का अर्थ कर रखा है उसके अनुसार ही बात करते जाएंगे। ठीक है और अंत में फिर अब यह वेदों की बात लेकर आए जो श्रद्धा है मैंने जब कह दिया एक बार अच्छा अंत तो श्रद्धा है भाई श्रद्धा है तरकी पराकाष्ठा है जब वो श्रद्धा अपनी लाएंगे तो लोग उसमें लॉजिक देखेंगे जैसे अभी हमारी आपकी बातों पे देख रहे हैं अच्छा फिर जब मैंने कह दिया वो लोग डिसाइड अच्छा लोग डिसाइड करेंगे तो वो बार-बार अपनी वो वाली बात को छोड़

02:49:28:16 लेके जाना चाहता है कि वो ये अतवा तुम्हारी श्रद्धा है तो ठीक है तुम यही मेरी श्रद्धा तार्किक िक चीजों में है कि अतार्किक चीजों में ये तय करेगी जनता और जिसका पक्ष मजबूत होगा उसको उसको फॉलो किया जाएगा। लो [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] जी पाड़ी जी जय श्री राम जय श्री राम हर हर महादेव जी कैसे हो आवाज आ रही बस कृपा है कृपा है ये कौन है चर्चा बहुत अच्छी रही और लास्ट में आते-आते वो बोलते हैं ना वही खिचड़ी पक गई फिर खिचड़ी नहीं मैं मैं असल में यह जो रूप होता है ना मूर्ख ता वाला रूप यह समाज के समक्ष लाना चाहता हूं। इसलिए मैंने कहा कि भाई विपरीत चीज बताओ। तो जब सच्चिदानंद की विपरीत चीजें निकालेंगे तो अगर सत्य का मतलब अमरता है। यानी व्यक्ति मरना चाहता है तो फिर भाई लोग पीटेंगे ताली इस बात पे कि आर्य समाज को माना जाए कि ना माना जाए। कि जीव की वास्तविक चाय ये भी हो सकती है। संभावित जी है ना? हम तो कह रहे हैं विकल्प है ही नहीं। ये कह रहे हैं विकल्प है। यह कह रहे हैं ना विकल्प का अस्तित्व है। हम नहीं कह रहे विकल्प का अस्तित्व है। और जब जिस फिर विकल्प का अस्तित्व ही नहीं है तो ईश्वर वो चाह को वो चाह

02:50:43:25 को बदलने वाली बात फिर वो वही वाली बात हो जाएगी शून्य क्रिया वाली अभाव आप क्रिया है ना जी। आज भी बहुत से जगह वही हुआ जो आधुनिक युग के वैदिक वैज्ञानिक क्या है हमारे अग्निवरत जी के जैसाई इन्होंने दो-तीन जगह अपनी बात को बदला बहुत जगह पहले कुछ कहा [गला साफ़ करने की आवाज़] उसके बाद उसमें कुछ और ऐड किया फिर कुछ और ऐड किया लास्ट में जो पहली वाली जो बात कही थी उसको हटा ही दिया और वो लास्ट वाली बात को आपके सामने समक्ष रखा एक दूसरी बात ये कह रहा है कि ये कह रहा एक एक व्यक्ति यह कह रहा है देखो कि इसने जो यह किया वह किया अब पगले उसने कई जगह आर्य समाज के सिद्धांतों को छोड़ दिया है मगर तुम्हें इससे मतलब नहीं है कि आर्य समाज के सिद्धांत जीते कि नहीं जीते तुम्हें इससे मतलब है कि कोई भी बकलोल कोई भी बकवास करने वाला व्यक्ति आकर के कुछ भी कर गया और अगर वो कर गया और उसमें तुम ऐसा सोच रहे हो कि तुम्हें लग रहा है कि वह विजय हो गया तो वो आर्य समाजी है। आर्य समाजी जितना यह जरूरी नहीं है। जो जीतेगा वही आर्य समाजी है। भले ही वह अद्वैती बन के जीत जाए, भले ही वह पागल बनके जीत जाए। है ना? अच्छा जी जी। अच्छा उस

02:52:01:03 दिन अग्निव्रत जी ने ईश्वर छल करता है। ये स्वीकार किया था। उल्कापिंड गिर के मरा मारा। ये स्वीकार किया था उन्होंने। ईश्वर का कार्य है। मृत्यु मृत्यु देना। ये छल है। ये ये स्वीकार किया था उन्होंने। नहीं छल नहीं स्वीकार किया था वो तो बात ही नहीं हो पाई मगर उल्कापिंड गिरने के विषय में स्वीकार किया दोनों आपने कहा था ना कि ये छल हुआ ना उसके साथ तो उन्होंने स्वीकार नहीं किया छल नहीं है तो लास्ट में जातेते ये आर्य समाज के विरुद्ध भी चला गया है कि हां वो छल कर रहा है हां और क्या बात और वो ये कह रहा है ईश्वर ने एक बार सृष्टि चालू कर दी है उसके बाद ईश्वर का कुछ कार्य नहीं है फिर ये भी कह रहा है कि ईश्वर ही करवा रहा है क्योंकि ईश्वर ने वैज्ञानिक नियमों को धारण कर रखा है। मतलब वो करवा रहा है ना, कार्य कर रहा है ना वहां पे। मगर वो वो जब बच्चा मर रहा है उसके कारण वो जब मार रहा मर रहा है बच्चा तो वहां पर जो है उसका कुछ ये सोचना नहीं है कि इसको पूर्व जन्मों के कर्मों का फल मिल रहा है कि नहीं मिल रहा। अच्छा अब सोचिए कि जो बच्चा सुनामी की वजह से मर गया। ठीक है? उस बच्चे को अभी-अभी अभी-अभी जन्म दिया है ईश्वर ने वो शरीर में आया। क्यों दिया भाई? जहां पर सुनामी आने वाली है। जी

02:53:16:12 जहां पर सुनामी आने वाली है वह विज्ञान के नियमों को धारण कर रखा है। उसको मालूम है यहां पर सुनामी आने वाली है। तो उसने क्यों दिया बच्चे को वहां पर जन्म? क्या कहोगे इसको? वो तो ऐसी जगह जन्म देगा ना जहां पर वो आयु भोग सके। और ये सुनामी जहां पर सुनामी आने वाली है वहीं पर बच्चे को जन्म क्यों देगा? फिर आयु कहां रह गई उसमें? कि इतनी आयु होती है उसकी। यानी वह अंधे में देगा जन्म कि भैया तू यहां चला जा अपने मन से। वहां सुनामी आ गई। मर गया। बच्चे ने कुछ नहीं किया। वो आया वो मर गया। ये इनका ईश्वर है आर्य समाज जी का। जी बोलिए। जी। सबसे ज्यादा वो ये व्यक्ति कहां पर फंसा है? जिस समय आपने कहा कि वेद कि वो चार ऋषियों को ज्ञान दिया। वो किस लिए? शिक्षा का परवाह करने के लिए। वहां पर ये बहुत तगड़े तरीके से फसा है यह व्यक्ति

02:54:13:08 और ऐसा ऐसा होता है मैंने एक शिक्षा हासिल की थी कि भैया सिद्धांतवादी व्यक्ति से जीतना आसान है मगर सिद्धांत विहीन से जितना मुश्किल है। समझ रहे हो? जैसे नंगे नंगा होता है ना नंगा जो नंगा ही करने लगे। मान लो एक होता है ना शब्द नंगा नंगपन जी जी तो उससे आप कैसे जीतोगे जो कपड़े उतार के फाड़ के चिल्लाने लगेगा

02:54:46:12 हां तो वो वाली बात है कि जिसके सिद्धांत ही नहीं है वो अपने हर सिद्धांत को बदल दे रहा है उसका उसका उद्देश्य यहां पर किसी सत्य का अनुसंधान या किसी सत्य की स्थापना नहीं है ना ही आर्य समाजी पक्ष की स्थापना है उसका उद्देश्य है कि मैं ऐसी कैसे एन केन प्रकार बातें करूं कि जिससे कि यह दिखाई दे कि भैया इसके पास उत्तर नहीं है और इनके पास कोई उत्तर नहीं है। हमारी बात का हर चीज मान ले रहे हैं। डिपेंड है डिपेंड है। डिपेंड है। बिल्कुल लास्ट लास्ट में करी ना उसने बिल्कुल ना जिसका सर ना पाव ये खुद अपनी आंखों से देखता है संसार में कि कोई जीव मरना हमें यही हमें जो इसने अंत में ये बातें की है यही रूप दिखाना हमारा उद्देश्य है। चर्चाओं का उद्देश्य यही है कि आदमी इतना इतने उस पर आए लेवल पे ऐसी बातें करने लग जाए। जी बोलिए बोलिए हां तो ये जो लास्ट में जो इसने कहा कि जो सतचिदानंद की जो प्यास है उसके विपरीत भी उसकी प्यास हो सकती है पर यह व्यक्ति अपनी निजी लाइफ में भी रोज देख रोजाना देखता होगा कि एक व्यक्ति अगर लास्ट घड़ी में भी पहुंचा है फिर भी उसको हॉस्पिटल ले जाते उसको हॉस्पिटल दवाई खाता है आपने देखा होगा उसने देखा होगा फिर भी वो एक उतर के दे रहा है हम

02:56:01:15 देखने के बाद भी तो वही तो मैं कह रहा हूं कि अब जैसे हम कहे कि भैया दुनिया के समस्त ईश्वरों के अंदर जो है वो समस्त जीवों के अंदर ईश्वर ने चाह बदल दी होगी तो ये तो वही आ गया ना स्वभाव वो वो वाला कार्य अभाव शून्य क्रिया वाला मैं वो भी बोल रहा हूं तब भी उसको समझ में नहीं आ रहा है अभाव क्रिया भी सिद्ध हो रही है उसका विकल्प भी असिद्ध हो रहा है और यह भी सिद्ध हो रहा है कि जब भी तुम कुछ बोलोगे तो उसमें सच्चिदानंद ही निकलेगा आनंद अनंतानंद अनंतानंद चाहिए जो भी चाहिए इसके विपरीत और अनंतानंद को भोगने के लिए अनंत ज्ञान चाहिए। अनंत ज्ञान को धारण करने के लिए अनंत अपना अस्तित्व चाहिए। हो गया सच्चिदानंद तीनों बिल्कुल बिल्कुल जो तुम चाह रहे हो जब तुम्हें वो चीज मिल गई तो आनंद तो आएगा। अगर तुम मूर्ख बना रहने मूर्ख बने रहने की चाह है और वो तुम्हें मिल गई तो उसमें भी आनंद ही है। एक भटकती आत्मा बहुत दिनों से देख रहा हूं। विजय कुमार नाम की वो बड़े परेशान रहता है। हर वीडियो पे इधर-उधर जाकर के कमेंट करता है। हां शास्त्र जी जय श्री राम। [गला साफ़ करने की आवाज़] जय श्री राम भैया। जय श्री राम। ये व्यक्ति बड़ा ये वाला ये व्यक्ति बहुत बुरी तरह फंसा है। जब कर्मफल सिद्धांत पे आप उसको पटके बढ़िया से

02:57:16:24 वो बोलता है कि कर्मफल क्या है? जाति आयु भोग और आयु में फंस गया। बोलता है कि आयु पहले से जो है उस फस गया [गला साफ़ करने की आवाज़] ना वो आयु पे आयु वो क्लियरली नहीं बोल पा रहा है मेरा आवाज मतलब ईश्वर केवल जन्मांतर में आपको उचित योनि दे देता है बाकी आपको वो कष्ट मिलेगा कि नहीं मिलेगा जो आपने दूसरों को दिया है यह बात समझ लीजिए आज हम एक चींटी को मारते तो हम कहते हैं कि जिसका फल तुम्हें मिलेगा ये जो दर्द है तुम्हें मिलेगा जरूरी नहीं है वो योनि में गया वो दर्द मिला कि नहीं मिला कोई डजंट मैटर यह इनके हिसाब से हालांकि मुझे नहीं पता कि आर्य समाजियों का सिद्धांत है कि नहीं वो कुछ भी बोल रहा था वो लड़का नहीं नहीं ये रामपाल के रामपाल का छोटे भाई हैं पता है ना कि वो उनके जो समय-समय पर सिद्धांत बदलते रहते हैं कभी वो आपके सिद्धांत पकड़ लेंगे खुद को सही करने के लिए कभी इस्लाम के सिद्धांत पकड़ लेंगे सेम इनका भी यही है और कुछ अभी आप देखो अभी आप देखो अभी मेरा ब्रह्मास्त्र तो मैंने खोला ही नहीं था। ब्रह्मास्त्र तो अभी निकाला ही नहीं है। पहले मैं इनहीं को देख ले रहा हूं कि भैया ये जो

02:58:31:25 बोल रहे हैं मेरा क्या होता है कि सामने वाला जो क्लेम कर रहा है ना केवल उसी बात पर अटके रहो जो वो क्लेम कर रहा है। अपने पास तो है ही है। फिर वो ब्रह्मास्त्र भी निकाला ही नहीं था। सृष्टि रचना ईश्वर का धक्का पुष्प पोल ये सब तो अभी हुआ ही नहीं। है ना? उससे पहले ही व्यक्ति अपना डामाडोल हो गया। नहीं शुरू शुरू में बहुत अच्छी चर्चा चल रही थी। वो तर्कों के साथ ही चल रहे थे। पर अंतिम में आतेआते पूरा मतलब कि खिचड़ी पका दी। एक जगह नहीं टिके वो। सही कहेंगे क्योंकि सही को निष्पक्ष तरीके से दूसरी बात। दूसरी बात ये भी है कि किसी विषय पे हम लोग बात कर रहे। एक दो बार हमने बात कर ली। अब उसमें बार-बार इस तरीके से वो करना कि भैया मतलब श्रद्धा ही है ना। मतलब समझ रहे हो आप? अपनी बात को बड़ी जैसा प्रस्तुत करना करने का प्रयास दिखाना वहां पर बार-ब भाई मैंने जब यह कह दिया चलो ठीक है तुम्हारी और मेरी बात सुन ली लोगों ने। अब आगे बात करो अब भैया मैं पूछता हूं प्रश्न ईश्वर धक्का मैं तब तक नहीं मुझे तो यही क्योंकि वो उनके पास पिछली चर्चा में भी यही था। पिछली चर्चा में क्या कहते हैं? ये क्या

02:59:46:26 कहते हैं? क्योंकि पर अटक गए थे। क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है इसको स्वयं नहीं उठा सकता। और फिर इसी मैंने जब अभाव क्रिया कहा, शून्य क्रिया कहा उसके बाद करते करते फिर वो रिपीटेटिवली शून्य क्रिया का ही दूसरा उदाहरण ले आए कि ईश्वर ऐसा कर सकता है। ईश्वर वैसा कर सकता है। दूसरा उदाहरण भाई जब एक विषय पर बात हो गई है और उस पर हम लोग अभी ये कर रहे हैं भैया यहां तक चर्चा देखी सबने। आगे वो देखेंगे। अब अगला प्रश्न किया जाए तो वो जो है दूसरे उदाहरण वही तब भी ऐसे ही समाप्त हुई थी चर्चा। आज भी वही हुआ। जी मुझे लग रहा है कि उनको फील हो गया था कि नहीं कहीं ना कहीं मैं मैंने कुछ गलत बोल दिया या कुछ गलत तरीके से मैंने कुछ पेश कर दिया तो उसी को जस्टिफाई करने के लिए बार-बार उस विषय को घुमा रहे थे। वो मुझे ऐसा लगा। हम [गला साफ़ करने की आवाज़] कुल मिलाकर के अगर आर्य समाज को जीतना है तो उसे आना पड़ेगा ऐसे कि पहले तो वो क्या कहते हैं ये वो विकल्प ढूंढेगा कि सच्चिदानंद के विपरीत भी कोई चाह है हो सकती है जो ईश्वर दे सकता है जबकि सच्चिदानंद के विपरीत कोई चाह का अस्तित्व है ही नहीं तो देना अभाव क्रिया हो जाएगा फिर वही ईश्वर का देना सिद्ध होगा कि नहीं होगा ये है इनका अंत

03:01:03:09 [हंसी] लास्ट का बिल्कुल भैया आर्य समाज के सिद्धांत को जोड़ दिया उसने। जी बोले पहाड़ी जी जी मतलब कि अंतिम में आके आतेआते कॉमेडी हो गई कि कोई मूर्ख बना रहना चाहता है। मतलब कि कुल मिला के लास्ट में तर्क खत्म हो गए तो कुतर्क में आ गए। फिर ठीक है। ठीक है शास्त्रवाद जी आप बोलिए। जी जी जी मैं तो वो बोल रहा हूं जब वो साधारण कारण पे आ गया था। जीव को लेकर के साधारण कारण को जिसका वो प्रमाण भी नहीं दे सका अच्छे से हम वो वस्तु को जीव को वस्तु बता रहा है। हां और मैं उसको बोल रहा हूं मैं भाई चेतना युक्त व्यवहारिक संसार की बात कर रहा हूं। तुम बार-बार सृष्टि रचना वो जो केवल जड़ रूप में सृष्टि का निर्माण क्यों बता रहे हो? या तो तुम कह दो कि सृष्टि रचना चेतना युक्त व्यवहार नहीं है। सृष्टि रचना केवल जड़ जैसा एक व्यवहारिक ढांचा खड़ा हो जाना है। बोल दो फिर आगे चीजें उससे खुलें। ये बात है। ठीक है। सभी को चर्चा अच्छी लगी हो बताएं कैसी लगी। और परिश्रम किया था व्यक्ति ने। मगर उसकी दिशा में वही था। वहां तैयारी उसकी वही

03:02:18:19 थी कि भाई कोई सिद्धांत सिद्ध नहीं करना है। केवल इसको जो है शिवश नारायण द्विवेदी को ही दिखाना है। भैया तुम गलत हो बस ना तो आर्य समाज को सिद्ध करना ना कुछ और ठीक है शास्त्रवा जी कुछ कहना हो तो यही तो यही तो इन लोगों का रहता है भैया आप इन लोगों के लिए वो कांटा बन चुके हैं कि जिसको हटाना है मार्ग से तो वो आपके ऊपर ही वो करते हैं कि उनको अपने अपने ही सिद्धांत से कोई मतलब नहीं रहता है वो आ के जो तो बोल के चल जाएंगे आपके ऊपर जो भी है वो बोल के चल जाएंगे और अपने आप को जीता हुआ समझेंगे या फिर हारा जबकि वास्तविकता क्या जनता सब स्वयं बता देगी। [हंसी] ये देखो एक शैतानगिरी में स्नातक बनो। ये सब इनके श्राप चल रहे हैं। श्राप को मानते हैं क्या ये? आर्य समाज नहीं। [हंसी] अच्छा अच्छा इन लोगों के मोक्ष पे भी अच्छे खासे बात हो सकते हैं। इन लोगों का मोक्ष तो कुछ है ही नहीं। भोग भी काम मिलाकर कुल मिलाकर अंत में आर्य समाज को नास्तिक नास्तिक बनना पड़े बनना पड़ा। ये वाली बातें सच्चिदानंद के खिलाफ जा सकता है और ये सब नास्तिकता वाली बात है ना। चलिए

03:03:34:04 बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल ठीक है। और एक और एक और हां एक और बात एक और बात है भैया जब वो अभाव क्रिया को लेके आ रहा था और अभाव क्रिया को बोल रहा था ये क्रिया है कि नहीं है? है है बोल रहा है उसको खुद नहीं पता है कि भाई असंभव क्रिया और क्रिया शून्य क्या होता है शून्य क्रिया जब आपने दो बार उसे बता दिया फिर भी उसी बात पे अटका नहीं असंभव है असंभव है असंभव है जबकि भाई जो क्रिया हो वो ना हो सके उसे असंभव कहते हैं पर जो क्रिया का अस्तित्व ही नहीं है वो उसमें करना ही कुछ नहीं है तो फिर शून्य क्रिया ही होती है यही तो बात है लेकिन ये समझते नहीं हो ये लोग को ये दिखाना है कि भाई आपका पे सर्वशक्तिता का सिद्धांत कमजोर है बस इतना ही दिखाना है उसके लिए जो करेंगे कुतर्क हां कुतर्क करते रहेंगे और कुछ नहीं चलिए ठीक है जय श्री राम सभी को जी जय श्री राम विजय कुमार क्या कह रहा है देखो शिवश आप हो गलत [हंसी] इसको रात में नींद नहीं आती लग रहा है इसको बिल्कुल बिल्कुल कैसे नींद आएगी आज आज की जो धुलाई हुई है उसकी उसको देख के आज तो इसको नींद आने वाली नहीं है ऐसे भी चलिए जय श्री राम जय श्री राम

03:05:12:06 [संगीत]

Plans for this video (0)

No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.

🤖 Ask AI for suggestions

AI reads the remaining (unused) parts of this video and gives ideas for new videos: from where to where, hook, and what to remove from the middle. Suggestions follow the RULES and appear here as "AI Suggestion". You can review, edit or approve them.

Live: Required tasks are not set on the Rules page yet.

  • ⬜
    Hindi SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)

  • ⬜
    English SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.

  • ⬜
    Title (per Rules)

    Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.

  • ⬜
    Description

    YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.

  • ⬜
    End Screen

    YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.

  • ⬜
    Cards

    YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.

  • ⬜
    Playlist Automatic

    YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.

  • ⬜
    Thumbnail

    YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.

"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.

Playlists

Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).

A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 3:05:16 · 19 Jul 2026

अवतार और सर्वशक्तिमान Discussion continue

% not set
☁️ Drive Not in Drive yet

Notes

Description

(empty)

History

No changes yet.

✂️ Clip Cutter

⌨️ Keyboard shortcuts

Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop

▶

Start

End

🔍 zoom
Already used Plan clips
⚠️ () of this clip is already used in another video (green part). Fine if on purpose, otherwise change the times.
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)

Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".

Clips () · Total

Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.

Hook, full note for editor, status