⬜ Not used yet · 00:00:07:08 – 00:17:41:00 (17:34)
00:00:07:08 इसने बताया कि पंडित कौन होते हैं? इसके यहां के लोगों को पंडित से बड़ी नफरत है। मुझे कुछ ऑडियो प्राप्त हुई है। लखनऊ का जो वकील है ना दिनेश चंद्र छोकरा उसकी कुछ ऑडियो सुनी है। उसमें वो जब बात करता है अपने गुरु भाई से ऐसा गुरु भाई जो उनके पहले उनके खेमे में था अब अलग हो गया। तो जब वो बात कर रहा है तो कह रहा है यादव पंडित की गोदी में बैठ गया जाकर पंडित की बड़ी पंडितों से बड़ी चिढ़ है इन लोगों को फुअर लोगों को तो पंडित के बारे में यहां क्या लिखा है इसके बाबा जेल कट्टू ने वो भी सुन लो पांच श्लोक 18 में पंडित की परिभाषा बताते हुए बताया गया है कि जो समदर्शी ज्ञान योगी देखिए ज्ञान योगी तत्वदर्शी साधक पंडित तत्वज्ञानी यानी पंडित की परिभाषा पंडित को इसने माना है तत्व ज्ञानी पंडित कौन होते हैं? तत्वज्ञानी। और तत्व ज्ञानी कौन है? जो क्या कहते हैं? पंडित होते हैं तत्व ज्ञानी। जो तत्व ज्ञानी वो तो पूर्ण वो हो गए। पूर्ण संत हो गए। तो तू जिनकी गोदी में जाकर के बैठने को कह रहा है क्या उनकी गोदी में नहीं बैठना चाहिए? पूर्ण संत की गोदी में इस फोर्ड आदमी जो जो यहां का जो वकील है जो ऐसी बातें करता है द्वेष भावना रखता है जाति के आधार पर। है ना कि पंडित
00:01:22:16 और यहां कमेंट में भी कई पंडित पंडित कर रहे होंगे यह रहा यह रहा मिल गया अरे ऊपर निकल गया जरा ऊपर निकल गया जरा लाइए जरा उसको पंडित वाला अभी अभी हां पंडित को तो राक्षस बताया गया है जिसका मेरे पास बड़ा सबूत है लो भाई अरे देख ले तेरा जेलकट्टू बाबा यहां क्या कह रहा है पंडितों के बारे में तत्वज्ञानी है पंडित जा अपने जेलकट्टू दादा को बाबा को जाकर के आन मिलो सजना वाला जो पट्टा होता है ना थाने में रखा हुआ उससे उसका परिचय करा अपने बाबा का थाने में एक पट्टा होता है पुलिस के पास उसमें लिखा होता है आन मिलो सजना या लिखा होता है फिर कब मिलोगे वो पट्टा लेके अपने बाबा के पास जा और उसको परिचित करवाओ पट्टे पट्टे से ठीक है और या फिर उसको बिल से बाहर निकाल तो हम लोग हम में से कोई ऐसा योद्धा जाएगा और वो उसका परिचय करवाएगा उस पट्टे से वो तेरा बाबा ही लिख रहा है यहां पे पंडित कौन होता है ठोको ताली पंडित कौन होता है तत्व ज्ञानी अच्छा गौ 100 कुत्ते हाथी व चांडाल को एक समझता है। वह जीवित मुक्त कहलाता है। वह तथा भगवान प्राप्ति के लिए भक्ति में लग चुका है। जो ऐसा नहीं करता है वह बेशक बात बनाए। 84 लाख योनियों का कष्ट भोगेगा तथा इसने फिर अपनी आगे की जो है बकवास लिख दी है।
00:02:40:14 [गला साफ़ करने की आवाज़] आगे चलते हैं। इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज निकाली। 122 नंबर पेज है। उसमें इसने फिर आगे जो है 122 नंबर पेज पर पहला पैराग्राफ और उसकी लास्ट की दो लाइन कर्म योगी ब्रह्मचारी या गृहस्ती कार्य करते-करते साधना करने वाला भक्त कर्म सन्यासी भक्तों से श्रेष्ठ है तथा जो पूर्ण परमात्मा की भक्ति करते हैं वह सर्वोत्तम है। यहां पे फिर से यह गृहस्ती का पक्ष ले रहा है। वहां पर गृहस्ती का विरोध करता है। कहां पर? रुचि ऋषि की उसमें फिर सुखदेव जी की में गृहस्ती का पक्ष लेता है। फिर यहां पर पक्ष लेता है। तो यह कशमकश में है कि मुझे ड्रामा तो करना है विरक्त होने का और फिर मुझे जो है गृहस्ती वाले सुख भी चाहिए कि अप्सरा आए तो मैं छू लूं। ऐसी बातें करता है ये कि सुखदेव जी के पास अप्सरा आई। उसने उन्होंने छुआ नहीं। यानी कि छू लेना चाहिए। यानी इसका स्वभाव है। यानी कि काल के वश में यह भी है। अच्छा आगे चलते
00:03:55:20 हैं। अब आ जाइए भाई। अभी ये सीधे पांच श्लोक 23 पे क्यों आ गया है? 51 19 की बात इसने की नहीं। 51 की बात हां देखिए अब इसने 51 की बात की पृष्ठ क्रमांक 51 18 की बात की पृष्ठ क्रमांक 119 पे उसके बाद इसने कुछ खिचड़ी पकाई और फिर इसके बाद इसने 5 19 20 21 22 इनकी बात ही नहीं की गायब पी गया वो सारी मीडिया खबरों की तरह पी गया अब सीधे आ गया यहां पर पांच श्लोक 23 में
00:04:48:19 और क्या करता है जिन जिन श्लोकों में से चोरी करनी होती है तो वैसे श्लोक श्लोक लिखेगा तो उसमें हेडिंग डालेगा कि पांच श्लोक 19 में ये कहा पांच श्लोक 20 में 21 में ये कहा मगर जब इसे चोरी करनी होगी तो क्या करेगा कहीं और से किसी और शब्दों से बात शुरू करेगा और पांच 19 20 21 की समराइज करते हुए बात बीच में घुसा देगा जैसे इसने यहां पर इसमें बीच में घुसाई क्या घुसाई है बीच में हर श्लोक में लिखता है अध्याय पांच के श्लोक 23 में बताया गया है कि और यहां पे क्या लिख रहा है यहां पे 5 19 20 21 की हेडिंग से शुरू ही नहीं है पैराग्राफ ऊपर देखो बड़ा करो
00:05:30:19 हां इसमें इसने इस पैराग्राफ के मध्य से ये बात शुरू की है कि पांच के श्लोक 19 से 21 में फिर प्रमाण है कि वही व्यक्ति को मुक्त समझो जिसमें निम्न लक्षणों जो गीता जी के श्लोकों में निम्न निम्नलिखित है। पांच श्लोक 22 में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए लड़ाई करना। फिर भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध कर यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग में मौज मारेगा। पांच के श्लोक 22 में कहा है कि हे अर्जुन कर्मों के संयोग से उत्पन्न भोग राज के लिए लड़ाई करना तथा फिर मौज मारना नाशवान है। ज्ञानवान व्यक्ति इससे दूर रहता है तथा अध्याय दो के श्लोक 37 में भगवान कह रहा है कि अर्जुन तू युद्ध कर यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग में मौज मारेगा और यदि जीत गया तो राज का आनंद लेगा। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां पर मतलब श्लोक 237 की बात को यहां 22 52 से काट रहा है यह और हालांकि इसने यहां पर भी 51 19 से लेकर के 52 तक का अनुवाद शब्दार्थ नहीं किया अपने मन से गड़बड़ जिम्म कर दिया। खैर आगे चलते हैं।
00:06:40:16 अब यहां पर बात यह है कि अगर यह 52 से 237 काट रहा है तो 237 से 52 क्यों नहीं काट रहा है? यह बाबा जी जेल कट्टू कभी इस बात का उत्तर नहीं दे पाएंगे। ठोको ताली। अब पांच श्लोक 23 पे आ जाते हैं। अच्छा 5:1 से लेकर 5:18 भी हमें पढ़ना है। 5 18 क्या है? हमारा 5 18 क्या कह रहा है? ये भी आप पढ़ते चलो। वह ज्ञानी जन विद्या और विनय युक्त ब्राह्मण में कौन ज्ञानी जन जो तद रूप काम करते हैं जो इसको ले चल रहे हैं एक एक श्लोक का जो श्लोकों के अनुसार जो कर्म कर रहे हैं तो उनको ज्ञानी जन कहा गया जो परमात्मा में स्थित हो जाते हैं पूर्ण शांति को प्राप्त कर जाते हैं जो कि पांच 17 में कहा गया है ना अपुनरावृति यानी कि दोबारा पुनरावृति नहीं होती तो वो कौन है वो ज्ञानी जन जो विद्या और विनय युक्त ब्राह्मण में तथा गौ हाथी कुत्ते और चांडाल में समदर्शी होते हैं। व्यवहार अलग हो सकता है। परंतु सब में ही परम तत्व को देखने का प्रयास करते हैं। तो वह जो है परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं। यहां ये कहा गया है। जबकि इसने क्या कर लिया? इसने पंडित किसको कहा है? इसने पंडित उसको माना है जो पूर्ण भक्ति में लग चुका है। यानी कि इसने तब भी यह नहीं माना कि वो जो है मुक्त
00:07:56:00 हो जाएगा। उसको मुक्त होने वाला नहीं कहलाएगा। वो नहीं माना इसने। अब इसने 51 में क्या कहा है वह भी देख लेते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] 51 51 19 का हमारा अर्थ है जिनका मन समभाव में स्थित है यानी कि हार और जीत में जीत का लालच हार का भय ये दोनों चीजें नहीं होनी चाहिए। तो जिनका मन समभाव में स्थित है उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि उनको अब राग द्वेष नहीं है इसलिए उनको कोई कष्ट नहीं है जब कष्ट नहीं तो जीत लिया संसार को तो संपूर्ण संसार जीत लिया है क्योंकि सच्चिदानंद घन परमात्मा निर्दोष और सम है। इसका मतलब जब आप सम स्थिति में पहुंच गए तो आप जो है एकत्व में है। किसके साथ एकत्व में है? ईश्वर के साथ। इससे वह सच्चिदानंद घन परमात्मा में स्थित है। आप देखिए ये कितना अंतर करता है। 5:19 से लेकर 22 तक इस फूल में बकवास कर दी। शब्दार्थ तथा इसने कोई अनुवाद नहीं किया। अपने मन से जो मन आता है लिखता है। ठीक है? जो पुरुष 20वें का पढ़ रहा हूं। जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता है। यानी समदर्शिता क्या है? जो पुरुष यह समदर्शिता वहीं से चल
00:09:11:03 रही है जिसके मन में अहंकार ना हो जो गुण ही गुण में बरत रहे हैं ऐसा समझे जो गौ पांच 18 जो इनमें अंतर ना करता हो गौ कुत्ते हाथी चंडाल में ब्राह्मण में समदर्शिता रखता हो तो वही आगे चल रही है जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित ना हो और प्रिय को प्राप्त होकर जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित ना हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्वग्न ना हो वह स्थिर बुद्धि संशय रहित ब्रह्मवत्ता कौन ब्रह्मवेत्ता
00:09:47:13 51 19 520 है इसने क्या कहा है 520 में 19 से 21 में प्रमाण है कि लिखित में देखिए अपने मन से यहां पर ब्रह्मत्ता कहा जा रहा है संशय रहित कहा जा रहा है कहां ले जाओगे इन शब्दार्थों को क्या यह रामपाल के फहड़ चेले चिलए भगत क्या यह संशय रहित हैं? एक सवाल में एक प्रश्न में गीले गीला होने लगती गीली होने लगती इनकी पतलू ऐसे ऐसे तो लोग हैं। और क्या कह रहे हैं? यहां संशय रहित वाली बात को काट ही दिया। ब्रह्मवित्ता संशय रहित कौन है? जो ब्रह्मवित्ता है। ब्रह्म की बात करता है। लो इनके इनके अनुसार तो ब्रह्म से मुक्ति नहीं होगी। मगर ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म की बात करने वाला वही संशय रहित है और वही सच्चिदानंद घन ब्रह्म परमात्मा में एक ही भाव से नित्य स्थित है और वहां क्या कह रहा है फड़ अपनी कुछ अलग ही बकवास चला रहा है 21 में क्या कहा जा रहा है बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अंतःकरण वाला देखिए 21 में बहुत जरूरी बात है बाहर के विषयों में अंतःकरण बाहर के विषयों
00:11:02:19 में आसक्ति रहित अंतःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यान जनित सात्विक आनंद है उसको प्राप्त होता है। तदंतर वह सच्चिदानंद घन ब्रह परम ब्रह्म परमात्मा के ध्यान रूप योग्य में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनंद का अनुभव करता है। अब यहां पे 5:21 को इसने क्यों नहीं खोला? पता है आपको क्यों नहीं खोला? इसलिए नहीं खोला कि यहां पे ब्रह्म के साथ योग युगात्मा शब्द आया है ब्रह्म के साथ और उसके लिए कहा जा रहा है कि उसको अक्षय अक्षय सुख की प्राप्ति होती है 5:21 में यहां भी मुक्ति मिल गई अक्षय सुख प्राप्त होता है कौन किसको प्राप्त होता है जो ब्रह्म ब्रह्म योग युगात्मा युक्त आत्मा ब्रह्म योग से युक्त युक्त है जो आत्मा वो उसको अक्षय सुख की प्राप्ति होती है इसलिए इसने किसने छोड़ा है ये? क्योंकि यहां ब्रह्म की बात आ रही। ब्रह्मवित्ता की बात आ गई। संशय रहित तो ये कभी कर ही नहीं सकता। इसके चपड़ू चेलों को आपने देखा होगा कैसा सूखा सा मुंह लेकर आते हैं मेरे सामने। संशय रहित तो ये कभी कर ही नहीं सकता। और यहां पर ब्रह्म योग युक्त आत्मा को अक्षय सुख प्राप्त करने वाला कहा गया। इसलिए यह जो है जेलकट्टू इन चीजों
00:12:17:25 के बारे में खोल खोल कर बात नहीं करता। फिर 22 में क्या कहा गया है? जो यह इंद्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाला सब भोग है। वे यद्यपि विषय पुरुषों को सुख रूप भासते हैं तो भी वे दुख के ही हेतु है और आदि अंत वाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन बुद्धिमान विवेक पुरुष में पुरुष उनमें नहीं रमता। अब एक बात है यहां पर जो इसने अर्जुन को इस अर्जुन को कहे गए इस वाक्य का खंडन करने का प्रयास किया है कि भाई अर्जुन अगर तू युद्ध में जीत गया तब तो तू राजमल का सुख भोगेगा ही और अगर हार भी अगर तू इसमें जो वीरगति को प्राप्त भी हो गया तब भी तू जो है स्वर्ग जाएगा तो भैया एक कायर और पीठ दिखाकर भागने वाले से तो उत्तम गति वहां पर बताई जा रही है ना कि कम से कम तेरी अपकीर्ति तो नहीं होगी। इस बारे में वहां बात कर रहे हैं कि तुझे इस युद्ध को लड़ने में कितने वह हैं। अगर इस बात को लेकर के चल रहे हैं कि इस युद्ध को लड़ने से मुझे क्या फायदा होगा और व्यवहारिकता को लेकर के चल रहे हैं। उस व्यवहारिक ज्ञान के अनुसार वो बता रहे हैं कि अगर तू जीत गया तब तो तुझे यहां का सुख मिलेगा और तू अगर हार भी गया यानी कि वीरगति को प्राप्त हो गया। हारने का मतलब वीरगति को प्राप्त होना तो भी तुझे स्वर्ग मिलेगा क्योंकि तू क्षत्रिय
00:13:33:08 और कर्तव्य कर्म करते हुए वो हुआ है। तो अगर तू तत्व ज्ञान जो तत्व ज्ञान है ब्रह्म के साथ एकत्व वाली बात को नहीं अभी समझ पा रहा है और केवल व्यवहारिकता के अनुसार देख रहा है। तब भी तेरी गति श्रेष्ठ होगी। उस कायर नपुंसक कहलाने वाले पुरुष की अपेक्षाकृत जिसकी स्त्रियों की गरमा भंग कर दी जाती है। जिसकी अपकीर्ति होती है जिसके कुल का नाश हो जाता है। ये वहां पर समझा रहे हैं। व्यवहारिक ज्ञान के अनुसार होने वाला फायदा बता रहे हैं। जैसे ये जैसे ये जेल कट्टू बताता है कि मैं बिजली के तारों से छुड़ा लूंगा। यह खुद भी तो बताता है भाई। यह भी तो भौतिक संसार का लालच देता है। गेहूं, शक्कर, आटा, चावल। तू क्यों देता है भौतिक संसार का? हम तू क्यों छोड़ता है अपने चेले पीछे गन मशीन लिए दो आदमी खड़े हुए हैं। क्यों छोड़ता है भाई अपने पहले तेरे पीछे भी रहते थे गन मशीन लिए हुए व्यक्ति अब तेरे चेलों के पीछे भी रहते हैं। यानी कि तू भी उनसे कह रहा है कि युद्ध कर और भोग किनको भोग वो बात अलग है। वो स्त्रियां चिपका चिपका के भोगते हैं बेचारे। [हंसी] ठोको ताली। खैर आगे चलते हैं। अब 523 में क्या कह रहा है यह? अब इसका पढ़ लेते हैं। 5 23 [गला साफ़ करने की आवाज़] 52 में
00:14:48:12 पूर्ण मुक्ति बताई गई है और 5:21 में पूर्ण मुक्ति बताई गई है। इसने यहां पर कहीं भी पूर्ण मुक्ति की बात नहीं की है। ठीक है? 5:21 में पांच श्लोक 23 में बताया गया है कि योग योगी की व्याख्या इस प्रकार है कि जो अपने काम क्रोध को जीत लेता है वही योगी परमात्मा और वही सुखी है। ठीक। फिर इसके बाद ये कह रहा है विचार करें। यह मन तथा इंद्रियां तो शंकर जी जैसे योगी से भी नहीं जीते गए। अन्य प्राणी अर्जुन जिसने दो-दो शादियां करवा रखी हैं। रखी थी। जैसे साधक कैसे योग युक्त परमात्मा को प्राप्ति हो सकता है। अब देखो भाई इसकी इस बात को काटते हैं कि अर्जुन जो है परमात्मा को प्राप्त हो सकता है कि नहीं? है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] ठोको ताली। इस फवड़ की बात का तो सारा इंतजाम इसकी ही किताबों में दिया गया है। मेरे ख्याल से
00:15:48:09 प्रश्न क्रमांक अर्जुन को मोक्ष 99 प्रश्न क्रमांक 99 निकालिए भाई। हम ये देखिए पृष्ठ क्रमांक 99 अब ये कह रहा है अर्जुन को मोक्ष नहीं मिल सकता। जबकि ये खुद ये फर्ड खुद ही कह रहा है कि अर्जुन को मोक्ष मिला। देखिए 99 99
00:16:30:19 इसी में नीचे जाइए बस पहले पैराग्राफ की लास्ट की तीन लाइन पहले पैराग्राफ की लास्ट की तीन लाइन ऊपर ऊपर ऊपर चला गया हां देखिए लास्ट की तीन लाइन ये अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमात्मा को पहली बात तो अर्जुन को कोई तत्वदर्शी मिला नहीं भाई है ना वो तो काल से ज्ञान ले रहा था रामपाल के अनुसार तो अर्जुन यज्ञ में प्रतिष्ठित पूर्ण परमा पूर्ण पूर्ण परमात्मा को इष्ट रूप में मानकर यज्ञ करता है तथा यज्ञों के साथसाथ वास्तविक नाम का सुमिरण करके यानी कि उसको तत्वदर्शी मिल गया था। पूर्ण मोक्ष रूपी अमंत शायद अनंत होगा को प्राप्त हो जाता है। अर्थात पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं। यानी अर्जुन को मुक्ति मिल गई। ठोको ताली दोद पत्नियां करने वाले। अब बता फुअर तेरी कौन सी बात मानी जाए? एक तरफ तू कह रहा है अर्जुन जिसने दो-दो शादी करवा रखी है। उस जैसे साधक कैसे योग युक्त परमात्मा प्राप्ति हो सकती है। हैं इसको कहते हैं पागल फूहड़। ठीक है ना?
00:17:39:24 [संगीत]
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अर्जुन को पूर्ण मोक्ष मिला! अब बता रामपाल, तेरी कौन सी बात मानें?
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