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00:00:01:22 अपने मन से जो आपको सहज शब्द भगवान का स्मरण में आए या प्रिय लगे उसे आप करिए और एक तरफ ऐसी भी विधा है कि आप गुरु मंत्र ले और जहां तक सहज शब्दों में राम शब्द पे ज्यादा ज्यादा जोर है कि काम किया हर बात में कि राम राम बोलो काम हुई वाल्मीकि जी
00:00:36:07 क्या में बोरान क्या सह रूप से जो सप्त लगे वो होना चाहिए या दुमंत होना चाहिए ठीक है बैठिए बैठ बैठ बिजली का आविष्कार किसी वैज्ञानिक ने किया। प्रकृति प्रदत्त विद्युत बादल के माध्यम से दृष्टिगोचर होती है क्या? वह चंचल होती है। क्षण भर रहती है। जो प्रकृति प्रदत्त विद्युत की अभिव्यक्ति की विधा है। उसका वैज्ञानिकों ने अपने ढंग से अध्ययन किया, अनुशीलन किया। और
00:01:34:02 आजकल विद्युत के 50ों प्रयोग हो गए। प्रकाश इत्यादि फैक्ट्री आदि का संचालन आदि। अब कोई विद्युत का विशेषज्ञ होना चाहता है। यह लौकिक विद्या है। किसी व्यक्ति विशेष मनुष्य विशेष के द्वारा आधुनिक विधा से यांत्रिक विधा से विद्युत का आविष्कार किया गया। लेकिन उसमें भी गुरु की आवश्यकता है। नहीं तो करंट लग जाए, मर जाए। बांध बांधने आदि की जो प्रक्रिया चली है वैज्ञानिकों ने कालक्रम से उसको विकसित की
00:02:16:26 कंप्यूटर 20 साल पहले वाले कंप्यूटर और आज वाले कंप्यूटर में अंतर है। पांच सात साल पहले वाले मोबाइल और आज वाले मोबाइल में अंतर है। तो लौकिकी जो विद्या और कला है उसके लिए भी विशेषज्ञ गुरु की आवश्यकता है। तो अध्यात्म पद पर आखिर राम नाम क्यों जपे? राम तत्व को पाने के लिए ना भगवत तत्व को पाने के लिए इतना जो गंभीर मार्ग है क्या? इतना जो अध्यात्म का गंभीर मार्ग है मोक्ष तक पहुंचाने वाली पगडंडी है। उसका ज्ञान बिना गुरु के कैसे हो सकता है? तो सहज का अर्थ होता है
00:03:03:27 सहज शब्द को समझने की आवश्यकता है। जिन्होंने पूर्व जन्म में भगवान के जिस नाम का अधिक जप किया है। उसके संस्कार के वशीभूत होकर इस जन्म में उनका मन स्वाभाविक रूप से भगवान के उस नाम पर और उस रूप पर आकृष्ट होता है। यह सहज हुआ। सहज का अर्थ यह है। सहज का अर्थ मनवाना नहीं होता। अब कोई महामृत्युंजय मंत्र जपने लग जाए, ओम ओम जपने लग जाए तो उसका तो विनाश हो जाएगा, विस्फोट हो जाएगा। अनु बम से भी अधिक शक्ति मंत्र में है। इसीलिए सामान्य जो भगवान के नाम है राम, कृष्ण, शिव यह मारक नहीं होते। तारक होते हैं। लेकिन उनमें भी अगर दीक्षा प्राप्त हो राम नाम की दीक्षा प्राप्त हो तो गुरु ने जिस मंत्र को बहुत जपा है सिद्ध गुरु के मुख से वह निकलेगा तो उनकी निष्ठा नाम में होगी। उस नाम को जब हम सुनेंगे तो हमारे जीवन में क्या वो नाम
00:04:19:08 बहुत शीघ्र अधिक फल देगा। अपने आप हम नाम का जप करेंगे तो पालते पालते जपते जपते जपते जपते नाम में ऐसा बल और वेग उत्पन्न करने की क्षमता आएगी। लेकिन गुरु मुख से अगर हम नाम लेते हैं तो गुरु की जो सिद्ध दृष्टि है, गुरु का जो तप है उस नाम के माध्यम से हमको प्राप्त होता है। इसलिए आज ना सही कल परमार्थ के पथ पर चलने के लिए उचित गुरु की तो आवश्यकता है ही। गुरु से बचकर के इस मार्ग पर कब तक चल पाएंगे? क्या सामान्य पगदंडी नहीं है? मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से भी अतीत प्रकृति पार प्रभु जो परमात्मा है पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन, आकाश, अहतत्व, मातत्व, अव्यक्त इससे भी परे जो परमात्मा है उन तक पहुंचने के लिए आज ना सही कल गुरु की तो आवश्यकता है ही। लेकिन सामान्य नाम राम कृष्ण शिव जिसके प्रतिित सहज आकृष्ट हो उसके जपने में कोई हानि नहीं है। यह कहा गया और 101 मिनट महाराज जी क्या गुरु दीक्षा
00:05:34:19 लेने की कोई खास उम्र होनी चाहिए? जहां गुरु लोग रहते हैं उसका नाम विद्यालय है या नहीं? आधुनिक व्यक्ति स्कूल में जाते पहले कॉलेज में तो नहीं जाते प्राइमरी स्कूल में जाते उस समय खास आयु कुछ होती होगी पहले तो पांच साल के बाद ही जाते थे आजकल तो दो साल के बच्चों की पीठ पर बस्ते ला दिख जाते
00:06:07:20 मैंने संकेत किया प्राइमरी की पढ़ाई भी प्राइमरी पढ़ाई है मिडिल की हाई स्कूल की इंटर की विश्वविद्यालय डिग्री कॉलेज की पढ़ाई भी पढ़ाई है तो खेलने कूदने की जो आयु पांच वर्षों तक निर्धारित की गई हमारे यहां उसके बाद गुरुओं से ही आगे बढ़ा जाता है। प्राइमरी के गुरु, मिडिल के गुरु, हाई स्कूल के गुरु, इंटर के गुरु या हाई सेकेंडरी टेस्ट के गुरु कॉलेज के भी गुरु प्रह्लाद जी को गुरु तो कब मिल गए? मां के गर्भ में ही। याद उनकी माता की माता के गर्भ में थे। तभी नारद जी का उपदेश मिल गया। और जड़ भरत को तो एक जन्म नहीं दो जन्म पहले गुरु मिल गए थे। श्रीमद् भागवत का पांचवा स्कंध भगवान ऋषभदेव जी उनके पिता भी थे। भगवान विष्णु के अवतार भी गुरु भी थे। जिनके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। ऋषभदेव जी से ज्ञान विज्ञान प्राप्त किया था। प्रारब्ध के कारण एक जन बीच में मृग का हो गया।
00:07:22:26 फिर ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए। मृग के शरीर में गुरु बनाने की आवश्यकता नहीं हुई। ब्राह्मण के शरीर में गुरु बनाने की आवश्यकता नहीं हुई क्योंकि गुरु ने जो काम गुरु को जो काम करना था ऋषभदेव जी के रूप में कर चुके थे वो उपदेश फलीभूत हो गया जड़ भरत के शरीर में उपनिषदों में आता है वामदेव जी मां के घर में ही जीवन मुक्त हो गए पूर्व जन्म में जो उन्होंने सिद्ध गुरु का संग किया था उपदेश प्राप्त था प्रारब्ध के कारण मां के घर में आना पड़ा अंतिम सांस से पहले भी कोई गुरु मिल जाए तब सचमुच में गुरु के नाम पर गुरु ही मिले। जिस आयु में मिल जाए उसी आयु में अब कभी-कभी ऐसा होता है मान लीजिए चार साल पांच साल के बच्चे को किसी से दीक्षा दिला दी और बच्चे भूल गए कौन गुरु क्या मंत्र ऐसा भी होता है लेकिन गुरुओं के विस्तार होते हैं और भगवत तत्व ब्रह्म तत्व को प्राप्त कराने वाले गुरु बहुत पूजी होने के बाद उनकी पहचान होती है। उन तक पहुंच होती है। इससे पहले कुल गुरु आदि
00:08:38:04 जिनसे धर्म अध्यात्म के मार्ग पर दो कदम भी आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो वो गुरु होते जाते हैं। और जो गुरु भवसागर से तार देते हैं वो तो करोड़ों लाखों जन्मों में कभी प्राप्त होते हैं। बहु नाम जन्मना मनते ज्ञानवान मम प्रपद्यते गुरुओं के स्तर भी होते हैं। कम से कम गुरु के उपदेश को सुनने समझने की क्षमता आ जाए और विशेषकर माताओं को ध्यान में रखना चाहिए गुरु के नाम पर घर में विवाद ना हो जाए घर को नरक ना बना दे गुरु के नाम पर सत्संग के नाम पर घर में तालमेल बैठाकर बचपन में पिता हैं बड़े भाई हैं ससुराल में फिर सास ससुर पति हैं गुरु गुरु के नाम पर बवाल ना मचे इसका भी ध्यान रखना चाहिए। बस महाराज जी जब हम दीक्षा लेते हैं तो दीक्षा लेने के बाद अब भरा क्या कदम है गुरु के रखना चाहिए कि बैठिए गुरु से लाभ उठाना हो तो ज्यादा घुलना मिलना नहीं चाहिए और ज्यादा दूरी नहीं
00:09:53:06 रखनी चाहिए दो परहेज क्या जो गुरु से घुल मिल जाते हैं यारी दोस्ती करने का प्रयास करते हैं समझते हैं डायरेक्ट मेरा प्रवेश हो गया सीधे वो चार खाने चित्त हो जाते हैं गुरु के साथ जो परिकर रहते हैं उनको सम्मान नहीं देंगे स्नेह नहीं देंगे उनको अपने से हीन समझेंगे गुरु के पास आप कभी पहुंच नहीं सकते भगवान शिव के परिकर हैं उनको अंगूठा दिखाकर शिव जी तक कभी भी पहुंच ही नहीं सकते। सबसे बड़ी नादानी यह होती है कि गुरु के परिकर को कुछ ना गिने और समझे कि हमारी सीधी गति है गुरु तक। बड़ी मूर्खता है वो और साथ वालों का अपमान कर दिया तो समझिए कि गुरु का ही अपमान हुआ। तो पहले गुरु के पास जो रहते हैं बड़े पुण्य आत्मा है, तपस्वी हैं, महात्मा हैं तब टिक पाते हैं। सचमुच के जो गुरु हैं, उनकी सेवा में इधरउधर वाला व्यक्ति टिक सकता है क्या? हम लोगों के पास अहंकारी आलसी कोई टिक सकता है। एक दिन भी नहीं टिक सकता और डरपोक टिक सकता है। मैं जैसा बोलता हूं हर समय बम गोले बारूद का भय
00:11:09:08 रहता है। तो उस भय को भी कुछ नहीं गिनते। वह तो साथ में रहते हैं। इसीलिए सुनिए जल के से बहुत दूर रहेंगे तो प्यास की निवृत्ति नहीं होगी। स्नान आदि नहीं होगा। जल से ज्यादा मैत्री कर लेंगे तो डूब जाएंगे। अग्नि से ज्यादा दूरी रखेंगे तो सर्दी का निवारण नहीं होगा। भोजन का निर्माण नहीं होगा। ज्यादा घुल मिल जाएंगे जल घुल जाएंगे। ऐसे इसी प्रकार अग्नि
00:11:47:06 जल के सेवन की जो विधा है ठीक उसी प्रकार गुरुओं का सेवन करना चाहिए। मर्यादा का अतिक्रमण ना करके शील, स्नेह, संकोच, आस्था का परिचय देकर फिर गुरु से लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। हम और वह जो बतावे उसके अनुसार साधन करें। पूज्य स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के पास एक व्यक्ति आया। महाराज कोई ग्रंथ बताइए। उन्होंने कहा पंचदशी पढ़ लो। पांच दिन बाद आया पंचदशी पढ़ ली महाराज और कुछ बताइए उन्होंने कहा बाबा तुम जाओ हमारे पास मत आओ पांच दिन में जिसने पंचदशी पढ़ ली वो क्या पढ़ ली तो गुरु ने बताया कोई साधन तीसरे दिन आए महाराज वो मंत्र हमने जप लिया कोई नया मंत्र दे दीजिए यह सब नहीं अनुशासित रहकर सुशीलता का परिचय देकर और अपने दायित्व का निर्वाह करके फिर गुरु का सेवन करना चाहिए कठिन काम है आचार्य उपासनाम के पहले भगवत गीता के 13व अध्याय में कई घाटियां बताई गई अमानित सब पांचवे स्थान पर है आचार्य
00:13:02:09 उपासनम मान आदि से रहित होकर ठीक है अहिंसा क्षमा शांति इन सब गुणों को पहले अर्जित करें फिर आचार्य से लाभ उठाने का प्रयास करें मंत्र जप करें अपने दायित्व का निर्वाह करें और अपनी सीमा में साधन का अनुष्ठान करें और हमेशा शील का परिचय दें। शील का त्याग करके कोई ईश्वर गुरु से लाभ नहीं उठा सकता। आगे कोई प्रश्न व्यवस्थित हो
00:13:45:09 [संगीत]
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गुरु क्यों ज़रूरी है? | दीक्षा, मंत्र और सच्चे गुरु की पहचान
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