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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] तो सभी को जय श्री

00:00:04:00 राम। मेरा नाम शिवश नारायण द्विवेदी। पूरी शंकराचार्य जी का एक अल्पज्ञ शिष्य। हमारे वीडियोस जो धर्म के प्रचार के संबंध में आपको हमारे अलग-अलग चैनल से प्राप्त होते हैं। आहान कॉल ऑफ धर्म सर्वशक्तिमान धर्म। तो जो हमारा एक अभियान है कि अध्यात्म के विषय में लोगों को जागरूक करना, अध्यात्म से जोड़ना, धर्म से जोड़ना, ईश्वर से जोड़ना उसी क्रम में हम विभिन्न जो विचारधाराएं हैं ईश्वर के संबंध में उनको आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। इसी क्रम में आज हम आए हैं ब्रह्मा कुमारी के वाराणसी के सेंटर में और हमारे साथ ब्रह्मा कुमारी के जो भाई जी होते हैं, वह हमारे साथ में इस समय विराजमान हैं। थोड़ा सा भाई जी आप अपना एक एक संक्षिप्त विवरण आप थोड़ा सा दे दीजिए। ओम शांति। मेरा नाम यश है और मैं पिछले 15 वर्षों से ब्रह्मा कुमारी संस्था से जुड़ा हुआ हूं और साथ ही साथ हम लोग यहां बनारस में महमूरगंज में सबको राजयोग मेडिटेशन की शिक्षा देते हैं और अपने जीवन में कैसे सकारात्मक परिवर्तन लाएं और ध्यान की विधि कैसे सीखी जा सकती है सहज रूप से यह हम लोग यहां पे निशुल्क सिखाते

00:01:19:13 हैं। बहुत ही सुंदर एक बात है कि आप लोग एक प्रयास कर रहे हैं धर्म से जोड़ने का समाज को और धर्म से जोड़ने का मतलब नैतिकता से जोड़ना, अपनी संस्कृति से जोड़ना तो अ ब्रह्माकुमारी के अनुसार ईश्वर को ले क्या अवधारणा है वो थोड़ा सा हमें बताइए। ब्रह्मा कुमारी संस्था जो है वह एक परमपिता परमात्मा जो कि निराकार स्वरूप में है उनको मानती है। जी तो यहां बताया जाता है कि हम सब एक आत्मा है जो इस शरीर को चला रही है। तो जैसे एक शरीर का पिता शरीर के जैसा दिखता है। पशु पक्षियों का पिता उनके जैसा दिखता है। तो जब हम आत्मा बिंदी स्वरूप है तो हमारा पिता भी बिंदु स्वरूप है। तो उसी बिंदु स्वरूप को हम लोग यहां पे परमात्मा शिव कहते हैं। अच्छा और प्यार से उनको बाबा बुलाते हैं। मतलब जो ईश्वर है वो निराकार है। इसके अलावा और कुछ ईश्वर के बारे में ईश्वर के बारे में यहां ये मान्यता है कि ईश्वर उसको माना जाए जो सर्वोपरि है। जिसका खुद का कोई माता-पिता ना हो। खुद का कोई गुरु ना हो। ऐसा शास्त्रों में भी माना गया है कि शिव परमात्मा का ना तो कोई माता-पिता है ना कोई गुरु है। वो स्वयंभू है। वो स्वयं

00:02:34:21 प्रकट होते हैं। प्रकट होना तो वो साकार हो जाएगा। मतलब स्वयं से ही है वो स्वयं से ही है। स्वयं से अपनी स्थिति में स्थित है। जी जी तो एक एक ये हो गया कि वो अजन्मे है एक तरीके से मतलब वो स्वयं से है। तो जैसे और होता है ना जो हम कि ईश्वर यह कर सकता है। ईश्वर सर्वव्यापक है। उसको कहते हैं स्वरूप भूत लक्षण। मतलब जो खुद में है जैसे सच्चिदानंद है। ज्ञान स्वरूप है। तो इस तरह से ब्रह्मा कुमारी की कुछ मान्यता जो ईश्वर के संबंध में हो। देखो निराकार है और सर्वोपरि है और कुछ जो आप मानते हैं उसके संबंध में उसके संबंध में यह मानते हैं कि वो जैसे आपने कहा कि वो निराकार के साथ-साथ सच्चिदानंद स्वरूप है तो यहां माना जाता है कि जैसे आत्मा हमारी सात गुणों से बनी है। वो सात गुण है ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, सुख, शांति, आनंद और शक्ति। तो परमात्मा इन सातों गुणों के सागर हैं। अच्छा। जैसे शरीर की कोई भी आवश्यकता हमारा शरीर का पिता पूरा करता है। या हमें धन चाहिए उसके लिए हमको लक्ष्मी जी के ध्यान बताया गया है। विद्या चाहिए तो हमें सरस्वती जी का ध्यान बताया गया है। एक तरीके से कहना चाहिए कि सच्चिदानंद सच्चिदानंद वही बात हो गई। आत्मा की जो सारी क्वालिटीज अगर आपको चाहिए तो उसके लिए आपको परमात्मा शिव

00:03:49:25 का ही ध्यान करना होगा। अच्छा जितने भी ऋषि मुनि तपस्वी हुए जी सब सब ने ये बताया कि उस निराकार ज्योति रूप को याद करो। सारे धर्मों में भी यही बताया गया। हिंदू धर्म में ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजते हैं। मक्का में संग अस्वद जो कि नूर इलाही भी वो लोग मानते हैं उसको पूजते हैं। क्रिश्चियन धर्म में गॉड इज लाइट कह के पूजते हैं। गुरु नानक ने एक ओमकार निराकार कह के पूजा। हम सबको इनलाइटमेंट हुआ। बुद्ध हो, महावीर हो तो वो इनलाइटमेंट किसका हुआ? कौन दिखा? तो ये माना जाता है कि वो निराकार स्वरूप परमात्मा शिव का ही। इसमें एक ये बात आती है जैसे आपने कहा सभी धर्मों में तो ये क्या ब्रह्माकुमारी के अनुसार ये जो कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने वाला धर्म है या बाइबल के द्वारा प्रतिपादित होने वाली नियमावली तो इसको भी ब्रह्माकुमारी धर्म कहता है। ब्रह्मा कुमारी इसका यह कहना है कि जो भी लोग आए इस धरा पे जो पवित्र आत्माएं थी उन्होंने कुछ ज्ञान बताया कुछ अच्छी-अच्छी बातें बताई और उनके चले जाने के बाद लोगों ने उसको धर्म का रूप दे दिया। जैसे कि अगर हम बात करें किसी मतलब धर्म नहीं है। मतलब यह एक वृक्ष की शाखाएं हैं। जैसे सनातन

00:05:05:03 धर्म इसको ऐसे क्लियर करते हैं। धर्म क्या है? ब्रह्माकुमारी के अनुसार धर्म क्या है? आत्मा का धर्म तो शांति है। तो जो भी धर्म या जो भी पद्धति एक मिनट आत्मा को जो चाहिए वो शांति है। वो शांति है। धर्म का मतलब है कि व्हाट टू डू धारणा। नहीं नहीं धारणा तो है ही है। मतलब कहने का मतलब है डूस एंड डोंट्स। हम क्या करना चाहिए और क्या नहीं हां अब अब अब क्या है कि जैसे आत्मा का आपने बताया धर्म वो आत्मा का लक्ष्य है शांति प्राप्त करना मुक्ति प्राप्त करना तो वो लक्ष्य को प्राप्त कराने के लिए डूस एंड डोंट्स हैं तो वही मैं पूछ रहा हूं कि आपके यहां पर क्या कांसेप्ट है धर्म को किस रूप में देखा जाता है जी वास्तव में यहां धर्म उसको माना जाता है जो हम अपने जीवन में धारण कर रहे हैं और जो शिक्षा हमें मिलती है कि हमें जीवन में क्या करना चाहिए चाहिए। किस पद्धति से करना चाहिए? हां। तो, वह क्यों करना चाहिए? उसका लक्ष्य क्या है? उसका लक्ष्य यही है कि हम अपने जीवन को भी खुशहाल जी सके और साथ-साथ उस परम सत्ता को पा सके। और उसके द्वारा हम मुक्त हो सके। बिल्कुल। तो ये हर धर्म का लक्ष्य यही होता है। अब कौन कितना पाप पा मगर दिक्कत ये है ना कि जैसे हमने कहा कि जिस काम को करके हमें मुक्ति मिले। महाभारत में भी लिखा है

00:06:20:09 कि धर्म का पर्यावसान मोक्ष में है। मुक्ति अब वो मुक्ति का स्वरूप है वह अलग-अलग है। वह थोड़ा सा आपका शायद अलग है। वो एक अलग विषय है। मगर अगर बात करें कि कुरान की तो जो ब्रह्मा कुमारी के अनुसार मिलने वाली मुक्ति है वो कुरान की मुक्ति नहीं है। बाइबल की मुक्ति भी नहीं है। तो यदि उन कार्यों को हम धर्म कह रहे हैं जो ब्रह्मा कुमारीज की ही मान लें जो भी आपका मुक्ति का कांसेप्ट है। तो यदि वह धर्म है जो ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार मुक्ति दिलाएगा तो फिर कुरान के अनुसार जो मुक्ति है वो अलग है। बाइबल के अनुसार जो मुक्ति है वो अलग है। फिर हम उसे धर्म कैसे कह सकते? ये एक थोड़ा सा कंफ्यूजिंग हो जाता है व्यक्ति के लिए। जी जैसे कि हर धर्म में जैसे कि अगर उनको रिलीजन मान लें या एक बिलीफ सिस्टम मान लें। जीवन जीने की एक कला मान लें। हां बिलीफ सिस्टम उन्होंने एक अपनी जीवन जीने की एक कला बनाई है। उसको उन्होंने नाम दे दिया क्रिश्चियनिटी या इस्लामिज्म जो किसी ने मजहब कहा, दीन कहा कुछ भी कह दिया तो आप मतलब इसका मतलब जो आप धर्म कह रहे हो आपका मतलब वो बिलीफ सिस्टम सिस्टम है। वो धर्म नहीं है। हां क्योंकि धर्म तो वही है ना जो अभी आपके सच्चाई का जो आपके हिसाब से अगर माना जाए तो धर्म तो वो

00:07:35:15 है जो कम से कम आपकी वाली मुक्ति दिलाए। हम जो आपका मुक्ति को कासेप्ट है। तो यह एक बात क्लियर हमारी हुई कि वो आप उसको लोकाचार में धर्म कहते हैं। बट वो धर्म है नहीं। इस्लाम वगैरह ये धर्म नहीं है। थोड़ा क्लियर करेंगे इस बात को। हम ऐसा नहीं कह सकते कि वो धर्म नहीं है। क्योंकि जैसे कि आज लोग स्पिरिचुअलिटी को भी पूरा सही तरीके से नहीं जान पाते। जैसे कोई व्यक्ति है जो बहुत भक्ति कर रहा है। वो मान रहा है कि मैं आध्यात्मिक हूं। मगर धर्म और आध्यात्म में जैसे थोड़ा सा डिफरेंस है। हल्की सी एक रेखा है। वैसे हम यह कह सकते हैं कि आज एक व्यक्ति का धर्म क्या है? तो यूनिवर्सल धर्म सबका एक ही है। मानवता शांति फैलाना। अब कोई व्यक्ति अपने धर्म को कहे कि हमारे धर्म में तो ऐसा कहा गया है कि ऐसा करने से ही मुक्ति मिलेगी। वैसा करने से ही मुक्ति मिलेगी। मगर क्या या मुक्ति ही यही है। जो वो बता रहे हैं। तो उसको सही से उस धर्म के बारे में बताया ही नहीं गया। तो फिर इसमें एक दिक्कत यह आती है कि हमको इस्लाम के बारे में मालूम पड़ा है कुरान से। हम क्रिश्चियनिटी के बारे में मालूम पड़ा है बाइबल से। उसके इत तो हमको कुछ मालूम नहीं है। अब कुरान में लिखा हुआ है कि 334

00:08:50:19 में लिखा है कि आप ने किसी को बहन बोल दिया। उसके बाद भी आप उसके उलट उसके साथ विवाह कर सकते हो। उसके साथ मतलब जो शारीरिक संबंध बना सकते हो इत्यादि। इस तरह की बातें क्योंकि वो मुंह की बातें हैं। आपका वाकायदा जो है विवाह नहीं हुआ है। और हमारे यहां क्या है कि जो भी बोलो उस पे अडिग हो जाओ। वचनबद्धता की बात कही गई है। प्राण जाए पर हां रघुल रीत सदा चली आई। प्राण जाए पर वचन ना जाए। तो अच्छा धर्म का पर्यावसान मोक्ष में इसलिए होता है जैसे कि हमने अगर झूठ बोला तो हमारे चित्त में दोष आया। वो संस्कार हमारे चित्त में बैठ गया। झूठ बोलने वाला और जितनी बार हम छिपाते हैं तो उससे हमारी कॉन्शियसनेस जिसको हमें फ्री कराना है मुक्ति वह कॉन्शियसनेस वीक पड़ती है तो हमने छिपाया अपनी बात से मुकरे कहे हुए वचन से मुकरे तो हमारी तो यह धर्म ही आत्मा कमजोर हो जाती आत्मा की कॉन्शियसनेस कमजोर हुई इसलिए कहा गया कि झूठ मत बोलो ठीक है तो यानी कि झूठ ना बोलना अपनी बात से ना पलटना धर्म में आ गया कौन सा धर्म जो हम अध्यात्म और उसको अलग कर रहे हैं ना जैसे ये तो लोक धर्म की बात है ऐसा कह देते हैं लोग मगर है है नहीं क्योंकि लोक धर्म में भी हर वो चीज जो बताई गई है वो उसका

00:10:05:20 परवसान उसी में हो रहा है अध्यात्म में कैसे हो रहा है जैसे हमको बोला गया कि हैंड वाश करो हम या हमको बोला गया कि शौचाचार इतने कुल्ले इतना ये सब तो उसमें क्या है कि आपका शरीर पवित्र हो जिससे कि आपका चित्त शुद्ध रहे आपको फील हो कि आप शुद्ध हो और जितना शुद्ध होगे जितना आप विकृतियों से बचोगे उतना ही ज्यादा आपकी कॉन्शियसनेस परमात्मा की तरफ परमात्मा की तरफ जाएगी मुक्ति की तरफ तो अब यह कांसेप्ट हो गया कि वहां पर इसके ठीक विपरीत कह दिया गया। जबकि वह मुक्ति में नहीं मुक्ति का विरोध हो रहा है। वहां पर छिपाने वाली बात और भी ऐसी कई सारी बातें हैं। अब हमने कहा कि वो लोगों की मान्यताएं अलग है। उनके धर्म में तो अच्छा है। तो यानी कि हमको उस ये जो चीज है जो अलग से जो उस कुरान में नहीं है। तो फिर हम लोग क्लेम कैसे कर सकते हैं कि वो कुरान में हमें पता है और वो जो कुरान में लिखता है वो नहीं है। वो थोड़ा सा कंफ्यूजन हो। जी। जैसे कई बार आपने देखा होगा कि हर व्यक्ति का देखने का नजरिया अलग-अलग होता है। जैसे वही भागवत, वही रामायण अगर अलग-अलग कथावाचक सुनाते हैं तो उनका अलग-अलग स्पष्टीकरण होता है। कुछ-कुछ विषयों के ऊपर कई बार वो चीजें भी हमें एग्जैक्ट सब लोग एक जैसी नहीं बताते। किसी की जैसे कि आपने वो कहानी सुनी होगी। इस मामले में

00:11:20:21 जो मैंने आपको बताया 33 चार हम इस मामले में जो इस इस्लामिक समाज है वो एक मत है। हम कि गोद लिया ऐसा था जो स्टोरी वो कुछ ऐसी है कि उनके हिसाब से ईश्वर को यह बताना था शिक्षा देनी थी हम कि अ गोद लिए हुए बच्चे सगे नहीं होते हम ये शिक्षा ईश्वर को देनी थी। हिंदुओं का आरोप यह है कि उनकी नजर खराब हो गई वह अपने गोद लिए हुए बेटे के यहां पर गए तो उनकी पत्नी वहां पर ऐसी मतलब भीगी हुई वस्त्रों में थी तो उनकी जो है दृष्टि वो खराब हो गई और जब उन्होंने उनको उस हालत में देखा तो उनका मन बदल गया वहां से और वह फिर उनके हिसाब से एक आयत आ गई ईश्वर का फरमान आ गया कि आप जो है अपने गोद लिए हुए बेटे की पत्नी से भी विवाह कर सकते हो यदि वह उसको तलाक दे दे तो ठीक है। अब इस मामले में वह आयत आई कि मुंह के बोले हुए रिश्तों का कोई मतलब नहीं है। इस मामले में हिंदुओं का यह आरोप है और इस्लामिस्ट का यह कहना है। मगर इसमें एक मत है कि मुंह बोले रिश्तों का मायना नहीं है। वो तो गोद गोद लिए हुए का सिस्टम वहां से बंद हो गया गोद लेना देना। और इस इस चीज के सहारे से उनका ब्याह भी हुआ। उस अपने

00:12:36:09 गोद ली हुई बेटी की बत्नी से। तो मोहम्मद जी की यह जो जीवनी से रिलेटेड यह जो आयत है इस आयत के इस अर्थ को लेकर के इस्लाम के सभी लोग एक मत हैं। उसमें ऐसा नहीं है कि कोई अलग-अलग बता रहा है। और ये जो चीज है ये हमारे यहां के बिल्कुल विपरीत जा रही है। और दूसरी बात जैसे कई कथावाचक अगर करते भी हैं तो उसमें एक सिस्टम है परंपरा का। तो उसके हिसाब से देख लिया जाता है। कोई उन परंपरा से बात कर रहा है तो वो मान्य है। परंपरा से बात नहीं कर रहा है तो नहीं मान्य। तो फिर हम लोग फिर उस चीज को धर्म माने कि नहीं माने कुरान को जी जैसे हम लोग देखते हैं कि जैसे अलग-अलग देश हैं तो सबके देश का जो कॉन्स्टिट्यूशन है जो वहां के नियम कायदे हैं वो अलग-अलग है तो हम तो अपने देश का मानते हैं ना उनके देश का तो हमें मतलब भी नहीं कि वो क्या कर रहे हैं उनके देश में क्या नियम कायदे हैं तो अगर हम धर्म की बात करें तो हम जिस धर्म के हैं और हमें जो चीजें बताई गई हम उसे पालन करें कोई धर्म में क्या बताया गया नहीं नहीं बात ये नहीं हो रही है कि उस धर्म में क्या बताया बातें हो रही है क्या हमें उसे धर्म मानना चाहिए कि नहीं हम आप क्या मानेंगे अगर धर्म नहीं बिलीफ सिस्टम जैसे आपने शुरू में कहा एक बिलीफ सिस्टम या फिर एक रिलीजन ये सब या उन्होंने अपना वर्ड जो दिया है मजहब दीन मगर यदि हम उसको धर्म कहेंगे तो धर्म का परवस स्थान तो मोक्ष है और वहां ऐसी चीजें बताई

00:13:51:10 जा रही है जो मोक्ष के विरुद्ध है मोक्ष का स्वरूप भी इसके विरुद्ध है इवन ईश्वर भी जो हमारा ईश्वर है उसके विरुद्ध है अब जैसे मान लीजिए कितने धर्मों में पुनर्जन्म नहीं माना जाता बिल्कुल हमारे धर्म में माना जाता है और कुछ चीज़ यूनिवर्सल नहीं माना जाता नहीं है वो यून हम हम उसको रियल हमारी जो चीज़ें हैं हम उसको ऐसे नहीं कहते कि वह हमारी मान्यता है हमारी जो चीज़ हैं हमारी हमारी ये मान्यता है वो यूनिवर्सल है। उनकी चीज़ें भी वो ये कहते हैं कि यूनिवर्सल है। मगर बात ये क्लियर तब हो जाएगी जब उनसे आमनासामना हो जाए। मान लीजिए कि वो सामने आ जाए तो क्लियर हो जाएगी कि भाई अगर हम पुनर्जन्म का सिस्टम नहीं मानेंगे तो क्या ईश्वर ने तब से कोई लॉटरी निकालिएगा कोई लंगड़ा पैदा हो रहा है? कोई अंधा पैदा हो रहा है। लॉटरी निकालनी माननी पड़ जाएगी ना। तो इसलिए मानना पड़ेगा। मानना पड़ेगा कि उसके कर्म ऐसे रहे होंगे जो उसको ऐसा जन्म मिला। नहीं तो वह ईश्वर को लॉटरी वाला मानना पड़ जाएगा। और यदि ईश्वर को मालूम है कि मुझे किसको क्या बनाना है तो उसके पास कारण होना चाहिए कि किसी को वो दुख दे रहा है। किसी को वो सुख दे रहा है। मान लीजिए ब्रह्मा कुमारी में सुख है। अब कोई एक अफ्रीका में ऐसा नीग्रो कहीं पैदा हो गया जो कभी जान ही नहीं पाया कि ब्रह्मा कुमारी क्या है? ब्रह्माकुमारी का ज्ञान क्या है? उसका जीवन समाप्त हो गया। हम् वह चला गया तो उसको तो भगवान ने उसके कर्म ऐसे रहे होंगे ना जो उसको वहां जन्म दिया गया नहीं तो आपके

00:15:06:16 सेंटर के बगल में जन्म दे देता हम है ना तो यह तब होगा जब उनसे बात करें तो अब दोबारा से आते हैं कि जब वहां पर ये जो बात है कि जब वहां पर हमारे जो यूनिवर्सल थॉट्स हैं एक तरीके से हिंदी में कहा जाए तो अकाट्य हमारे सिद्धांत अकाट्य हैं। तो फिर हम जो घुली मिली बातें कर रहे हैं या इसके विरुद्ध बातें कर रहे हैं। सीधी सी बात है कि जो भी ऐसा कार्य है जिसका पर्यावसान मोक्ष में नहीं है वो धर्म नहीं है। जिसका पर्यावसान मोक्ष में है चाहे वो लौकिक दृष्टि से हो चाहे दैय दृष्टि से हो। मगर जिसका पर्यावसान मोक्ष में है सुख शांति परम सुख परम शांति में है वही धर्म धर्म है वही नियमावली धर्म है वही नैतिकता धर्म है अब वहां पे ठीक इसके विपरीत जब कह दिया गया तो हम उसको धर्म कहें या जैसा कि आपने शुरू में एक वर्ड यूज़ किया बिलीफ सिस्टम या रिलीजन ये कहना चाहिए देखिए अब इसमें क्या है कि हम बिलीफ सिस्टम कह सकते हैं हम हम कह सकते हैं रिलीजन मगर हम किसी पे थोप नहीं सकते कि आप भी उसको बिलीफ सिस्टम ही कहो और आप उसको रिलीजन ही कहो ये हमारी मान्यता है ना कि हम उसको धर्म ना मान के हम उसको बिलीफ सिस्टम कह रहे। नहीं नहीं इसमें ये वाली बात आ जाती है। जैसे सबसे पहली बात है कि हम कौन हैं? हम हम राजनीतिज्ञ

00:16:22:09 तो है नहीं। हम ना ही हम अभिनेता हैं। अब जैसे ईश्वर निराकार है तो है। हम हम जब भी कहेंगे तो ईश्वर को निराकार ही कहेंगे। हम ब्रह्मा कुमारीज की ओर से बोल रहा हूं। तो अच्छा या कुछ 5000 साल वाली जो एक राउंड करके वो वही है। वही बोलोगे। ऐसा तो नहीं है कि उसमें आप मान लो कि उनका यह है कि एक ही बार दुनिया बनी खत्म वहां तो नहीं मानेंगे। तो यानी कि हम जो सच है वही बोलेंगे। तो फिर इसमें हम ये क्यों सोच रहे हैं कि भाई हम नहीं थोप नहीं सकते। हम थोप थोड़ी ना रहे हैं। हम तो अपनी बात कह रहे हैं कि हमारे हिसाब से वो धर्म नहीं है। है ना? तो अभी मैं पूछ रहा हूं कि ब्रह्माकुमारीज के हिसाब से वो धर्म है कि नहीं? ब्रह्माकुमारीज में एक चैप्टर पढ़ाया जाता है हम लोग को कल्पवृक्ष का। हम हम तो कल्प वृक्ष को बताया जाता है कि यह जो कल्प वृक्ष है यह 5000 वर्ष का एक वृक्ष है। तो जिसका तना जो है वो आदि सनातन देवी देवता धर्म अच्छा और उसके बाद द्वापर से द्वापर के लास्ट से कहें या जो भी तो फिर उसमें से अनेक शाखाएं निकली। तो ये जो शाखाएं हैं इस इसको जैसे कि एक शाखा निकली इब्राहिम। नहीं नहीं यह देखिए थोड़ा सा मैटर बदल जाता है। जैसे एक पिता है वह अच्छा है हम और वह बहुत धर्म धर्मज्ञ है। उसकी शाखाएं निकली

00:17:37:15 यानी उसके बेटे हो गए। हम अब वो एक चोर बन गया। हम और एक उसी के रास्ते पे चलता रहा। हम और एक जो है कुछ और बन गया। डाकू बन गया। हम और एक जो है वो भौतिकवादी बन गया। इंजीनियर बन गया। मैं तो भगवान भगवान को नहीं मानता ही। नास्तिक बन गया। तो हम यह कहते हुए क्योंकि यह उससे निकले हैं इसलिए यह भी धर्म है। चोरी करना भी धर्म है या नास्तिक बन जाना भी धर्म है। हम यह तो नहीं कह सकते ना। अगर उससे निकले भी हैं। है तो विरोधी ना। हैं कह तो ये रहे हैं ना कि भाई आप अपने मुंह की बात को बदल सकते हो। जबकि हमारे यहां सच पे अड़े रहना सिखाया जा रहा है। या तो फिर सच पे अड़े रहना धर्म नहीं है। जबकि हमारे यहां तो सच्चा ही धर्म है। अभी यहां क्या बताया जाता है? इस्लाम और मुस्लिम दो धर्म है। हम तो कुछ चीजें मुस्लिम तो इस्लाम को मानने वाले को कहते हैं। उस पे ईमान लाने वाले को जो आयतें आई हैं कुरान में उनको उन पे जो बिलीव करता है उसका प्रचार प्रसार करता है। रक्षा करता है उन सिद्धांतों की वो मुस्लिम मुसलमान माना जाता है। मुसलम में ईमान यहां बताया जाता है कि द्वापर युग में के [गला साफ़ करने की आवाज़] लास्ट में इब्राहिम आए तो उन्होंने इस्लाम धर्म की स्थापना की। फिर मोहम्मद साहब आए। उन्होंने इस धर्म का प्रचार प्रसार किया और इसको आगे तक ले गए। नहीं वो ठीक है निकला

00:18:52:16 उसी से है। वो सही कह रहे हैं आप कि निकला है। ऐसा हो सकता है कि मैं शिक्षा आप ही यहां पे हम आप मैंने देखा है कि शायद ब्रह्मा कुमारी से एक ब्रांच निकल गई है वो आध्यात्मिक विश्वविद्यालय ऐसे करके है ना? कोई शंकर पार्टी ऐसे करके पता नहीं कितने बन रहे हैं। वो यहां का विरोध कर रहे हैं कुछ चीजों में। हम तो जितनी जो जो चीजें वो विरोध कर रहे हैं फिर हम यह नहीं कहते कि वो ब्रह्मा कुमारी ही है। हम जबकि वो यहीं की यहीं की ब्रांच है। मगर वो ब्रांच विरोधी हैं। हम और केवल ये नहीं है कि वो जाके दूर रह रहे हैं। वो जो हमारा हमारा स्वरूपभूत अस्तित्व क्या है? हम स्पिरिचुअल बातें बता रहे हैं। हम तो अगर वह हमारी स्पिरिचुअल बातें बताने का विरोध कर रहे तो वह हम नहीं हैं। हम या तो वो हमारी और किसी चीज का विरोध करते कि देखो ब्रह्मा कुमारीज में ये फलाना घटना हो गई ये गलत हुआ। स्पिरिचुअल ज्ञान तो वही है मगर कुछ घटना हो गई तो हम मान ही रहते। हम अलग हो गए। ऐसा कुछ मगर वो जब हमारी उसी जो मूल बात है ब्रह्मा कुमारीज क्या है? ईश्वरीय ज्ञान और वो उसी का विरोध कर रहे हैं। फिर हम ये नहीं कहते वो भी ब्रह्मा कुमारीज नहीं मानते ना। तो फिर सनातन धर्म से निकलने वाले ही मान लिए जाए इब्राहिम इत्यादि। फिर उनको क्यों कहा जा रहा है कि वो भी धर्म है?

00:20:08:09 जी वो इसलिए कहा जा रहा है कि जैसे मान लीजिए कि किसी ने कोई उस धर्म मतलब कि देखा जाए कि कोई भी व्यक्ति कोई अच्छा काम करता है। हम ये नहीं कह सकते ना कि कुरान जिसने लिखी वो व्यक्ति ही गलत था। हो सकता है कि जिस जो उसका स्पष्टीकरण कर रहा है वो उस प्रॉपर वे में स्पष्टीकरण नहीं कर रहा। जैसे कुछ चीजें होती हैं। समय अनुसार संस्करण नए-नए निकलते रहते हैं। जैसे हमारे महाभारत की बातें हैं। मतलब जैसे कुरान जो लिखी गई वो ठीक थी। उसको आपको बताने वाले गलत हैं। हां। मतलब ये कह सकते हैं कि आपको किस रूप से कौन सी चीज दिखाई जा रही है। फिर कहा तो फिर कुरान की आयतों में छेड़छाड़ हुई है आपके हिसाब से या कुरान की आयतों के अर्थ में। हम ये नहीं कह सकते कि छेड़छाड़ हुई है। अगर हम ये कह सकते जैसे कि जो हमारा असली शास्त्र था जो कहते हैं कि जो महाभारत है तो आपने संदिग्ध दृष्टि बताई है ना कुरान पे नहीं कुरान पे नहीं हमने ये कहा है जैसे हमारा जो महाभारत जो शास्त्र सुनते हैं ये नहीं कह रहा मैं ये कह रहा हूं कि आपने कहा कि भाई वो शुरुआत अच्छी हुई हो हम और बाद में समय के अनुसार हो कुछ चेंज उसमें चेंजेस हो गए हो जैसे माने कॉन्स्टिट्यूशन तो उसमें चेंजेस जो आप मान रहे हो वो एग्जैक्ट उसकी आयतों में मान रहे हो या उसके अर्थ में मान रहे हो

00:21:23:25 अर्थ अर्थ में मान रहे हो तो अब इसमें ये दिक्कत आती आती है कि जो कुरान है हम वो हमें स्वतंत्र रूप से तो मिली नहीं है। हम हमें मिली है कुरान उन्हीं लोगों से जो उसका ये अर्थ बता रहे हैं कि मुंह बोले रिश्तों के कोई मायने नहीं होते। मुंह की बातों का कोई मायना नहीं होता। हम अब यदि हमें उन पे भरोसा नहीं है। हम है ना? तो फिर उनके द्वारा मिलने वाली कुरान पे भी भरोसा नहीं होना चाहिए। पता नहीं वो मोहम्मद ने लिखी भी कि नहीं लिखी। क्या उसमें काल्पना है और क्या वो है। तो हम तो फिर उसके बारे में कुछ भी नहीं कह सकते। हम्। हमें तो फिर यह कहना पड़ेगा हमें पता ही नहीं है भैया उसके बारे में क्योंकि वह लोग झूठे हैं। जो लोग किताब दे रहे हैं वह गलत अर्थ बता रहे हैं। तो वह लोग तो झूठ झूठ बोल रहे हैं। तो जब वो झूठ झूठ बात बोल सकते हैं अर्थ झूठा दे सकते हैं तो वो आयत भी झूठी ही दे सकते हैं। वो किताब भी झूठी दे सकते हैं। किसी भी धर्म के लिए हम ऐसा नहीं कह सकते कि ऐसा मुस्लिम धर्म के लिए ऐसा क्रिश्चियन धर्म के लिए हो सकता है हमारे जैसे बचपन में बच्चा छोटा होता है। उसके घर में ही कुछ-कुछ उसके बिलीफ सिस्टम उसके अंदर नेगेटिव बैठा दिए जाते हैं। नहीं नहीं अभी देखिए थोड़ा सा विषयंतर हो रहा है। विषय ये है कि अगर इस्लाम की जो किताब है उसके अर्थ में आयात में किसी भी चीज में छेड़छाड़ हो रही है तो फिर हम उसको लेकर के कोई भी क्लेम नहीं

00:22:39:01 कर सकते क्योंकि वो जिससे हमें मिली है हमें डायरेक्ट तो ऊपर वाले ने दी नहीं है उनके हिसाब से जो अल्लाह है उसने तो हमारे पास फरिश्ता भेजा नहीं है और आयतें हमको तो रटी हुई नहीं है। हमको आयतों के लिए उन्हीं के पास जाना पड़ेगा। इंटरनेट से लेंगे तो इंटरनेट पे उन्होंने ही डाली है। उनकी एक चेन ऑफ़ नरेशन होगी कि मोहम्मद ने इसको दिया और फिर उन्होंने इसको दिया। फिर उन्होंने इसको दिया। फिर उन्होंने इसको दिया। इस तरह से आज वो जो है छप रही है बुक्स के फॉर्म में और फिर वो उसको इंटरनेट पे भी डाल रहे हैं। वहां से हमको मिली। अब हम कहीं से कोई भी किताब खरीदें। मगर वो किताब कुरान ही है। अगर यह बात आ जाएगी तो हमें कहीं ना कहीं उनके किसी स्कॉलर से जाकर के वेरीफाई कराना पड़ेगा। ये कुरान ठीक है ना? है ना? तो जब हम उसकी वेरिफिकेशन के लिए उस पर डिपेंड करते हैं। इसका मतलब कुरान हमें उसी से मिल रही है। कहीं से भी लें। जैसे थॉमस अलवा एडिसन हम उसने बल्ब बना दिया। अब हम बल्ब तो ले रहे हैं परचून की दुकान से। हम कह रहे हैं हम थॉमस अलवा एडिसन को जानते ही नहीं है। तो ये गलत है। इनडायरेक्ट वे में हम थॉमस अलवा एडिसन से ही बल्ब ले रहे हैं। उसके द्वारा एक परंपरा से वो बल्ब हम तक पहुंचा। तो उसी प्रकार से जो कुरान है उनकी परंपरा के द्वारा हम तक पहुंची। अगर हम में देने वाले पर बिलीव नहीं है जो बता रहा है नहीं मुंह बोले रिश्तों का मायना नहीं

00:23:54:14 हम कह रहे हैं नहीं है तुम गलत बता रहे हो मोहम्मद जी ने तो अच्छा बताया था तो मोहम्मद जी ने हमको तो बताया नहीं डायरेक्ट मोहम्मद जी ने तो अपने उन लोगों को बताया जिन्होंने तो यदि हमें उन पे बिलीव नहीं है तो हम मोहम्मद पे क्लेम कैसे कर सकते हैं और अगर बिलीव है तो फिर उनके अर्थ को मना कैसे कर सकते हैं ये वाली बात आ जाती जी तो कई बार क्या होता है ना कि जैसे हम उनकी कोई चीजों को नहीं सत्य मान रहे हैं और कह रहे हैं ये गलत चीज है हम तो वह भी तो हमारी कई चीजों को गलत मानेंगे। तो यह यूनिवर्सल कौन बताएगा कि क्या देखिए मानने की बात तो यह है कि वह क्या मानते हैं आईएस आईएस वाला मानता है कि भाई गोली मारो हम तो हम ये सोच कर कि वो हमारी चीज को गलत मानेंगे गोली ना मारो हम हम लोग तो ये कहते हैं ना गोली ना मारो तो हम वो आईएस आईएस हमारी चीज अब जैसे हमारे धर्म में क्या शाकाहार सर्वोपरि है बिल्कुल हमारे धर्म के लोग इन्होंने तो हम लोग ये सोच के कि वो लोग हमारी बातों को माने इस वजह से ये कह रहे हैं क्या कि तुम्हारा भी धर्म धर्म थोड़ा सा इसको अभी तक तीन चार बातें क्लियर हुई हैं कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार इस्लाम भी धर्म है। बट ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार जो इस्लाम की का वास्तविक स्वरूप था वो बदल दिया गया है। ऐसा ही है ना? वास्तविक स्वरूप जिन्होंने स्पष्टीकरण किया।

00:25:09:25 उन्होंने बदल दिया। उन्होंने जैसे मान लीजिए हमारे धर्म में एक बच्चा है। अब उसको क्या बता रहे? नहीं नहीं मैं अभी एक टैगलाइन फिट कर रहा हूं कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार इस्लामी धर्म है और इस्लाम का वास्तविक स्वरूप बदल दिया गया है। यह टैगलाइन नहीं दे सकते क्योंकि यह कंट्रोवर्सी हो सकती है क्योंकि कोई व्यक्ति कहेगा क्या आपने कुरान पढ़ी है जो कि मैंने पढ़ी भी नहीं और कुरान में क्या आयतें हैं क्या-क्या लिखा है वो तो जब ये तो तब हो सकता है जब मैंने उसको पूरा स्टडी किया हो पूरा रीड किया हो पूरा उसप रिसर्च किया हो तब हम कोई स्टेटमेंट दे सकते हैं। नहीं तो आपने अपना तो पढ़ा है ना ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार कुरान क्या है? ब्रह्माकुमारीज में कुरान की बात नहीं होती। ब्रह्माकुमारी में यह बात होती है कि जैसे विभिन्न धर्मों के जो धर्म पिता थे सब ने इशारा उसे एक निराकार की ओर नहीं वही तो बात है क्वेश्चन यहीं से शुरू हुआ था कि हम किसी चीज किसी नियमावली को धर्म कहते किस स्थिति में हैं अगर वहां पर मोक्ष है तो धर्म है अगर मोक्ष नहीं है नहीं है तो हम कैसे प्रूव कर सकते हैं अब जहां पे ये नहीं कहा जा रहा है जो आपकी जो बिलीफ है आपकी चीज यूनिवर्सल है कि केवल आपका सेल्फ का मान्यता है यूनिवर्सल है ना ट्रुथ यूनिवर्सल ठीक है? तो जब वो यूनिवर्सल ट्रुथ है तो वो ट्रुथ वहां नहीं बताया जा रहा ना। जैसे हमारा हमने जान लिया कि हमें पानी चाहिए

00:26:25:20 और कोई दूसरा कह रहा है कि ये ये करोगे तो तुमको शराब मिल जाएगी। हमने यह ढूंढ लिया हमें क्या चाहिए? हमें हमें शांति मिलेगी पानी से। हमारी प्यास पानी से बुझेगी। और कोई यह बता रहा है कि आप यह कार्य करोगे तो आपको शराब मिल जाएगी। तो फिर हम अपनी चीज अपनी जो नियमावली है पानी को प्राप्त कराने वाली उसको जो नाम दे रहे हैं धर्म वही नाम हम शराब को प्राप्त कराने वाली नियमावली को कैसे दे रहे हैं हमें तो पता चल गया ना कि वहां शराब है पानी है ही नहीं ये चीज अच्छा ठीक है इसको टॉपिक को हम लोग थोड़ा सा चेंज करते हैं लाइट करते हैं तो ये थोड़ी सी क्लेरिटी हमने की इस पे थोड़ा सा बातें हुई अच्छा एक चीज और है मोक्ष की बात तो छोड़ देते हैं अह जो ब्रह्मा कुमारीज का जो ईश्वर है वह सृष्टि निर्माण करता है। क्या-क्या मतलब उसके कार्य जो करता है वह क्या करता है? थोड़ा सा इस यहां बताया गया है कि जो परमात्मा है जी जी उसके तीन कारण जी स्थापना का भी हां पालना का भी विनाश का भी। अच्छा अच्छा तो जो निराकार शिव है उत्पत्ति स्थिति संहार। हां। ठीक है? तो जो परमात्मा है वो अपने ये तीन कार्य के लिए उन्होंने जो नियुक्त

00:27:40:26 किए हैं एक मिनट आप तीनों कार्य बताइएगा क्या-क्या है? स्थापना, पालना और विनाश स्थापना, पालना और विनाश वही उत्पत्ति, स्थिति, संवाद। जी। ठीक है। तो उस कार्य के लिए तीन लोग नियुक्त हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश। ब्रह्मा, विष्णु, महेश। अच्छा। अच्छा। मगर ये कार्य परमात्मा का है जो ये तीनों लोग तीनों लोग करते हैं। तो अब इसमें एक बात आती है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश विनाशील है, विनाशी हैं या वो शाश्वत है तीनों। ये तो कह सकते हैं वो तीनों शाश्वत है। उनका विनाश नहीं होता है। वो सदा है। तो फिर तत्व चार हो गए। ईश्वर प्रकृति, जीव और ब्रह्मा, विष्णु, महेश तो जीव, प्रकृति, ईश्वर और ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये हो गए। छह तत्व हो गए। ब्रह्मा, विष्णु, महेश का सूक्ष्म शरीर है। नहीं तत्व तो हो गए ना छह। तत्व तो हो गए ना? अच्छा तो यह जो ब्रह्मा विष्णु महेश हैं जो जैसे मान लीजिए ब्रह्मा जी की ओर से देखते हैं तो वह बिल्डिंग बना रहे हैं मान लीजिए एक उदाहरण ले लें कि जैसे जैसे कि प्रलय के बाद मिट्टी के कण हैं प्रकृति के तो वो उनको एकत्रित कर रहे हैं ब्रह्मा जी हम तो एकत्रित

00:28:56:09 करने में एक शक्ति का उपयोग होता है जैसे मैंने किसी को धक्का मारा तो क्योंकि मेरे अंदर अंदर खाना खाने की वजह से सूर्य सोया आने वाली जो प्लांट्स के द्वारा ईटिंग के द्वारा जो शक्ति है वह आई और मैंने किसी को पुश किया या फिर मैंने किसी को पुल किया तो जो ईश्वर हैं मतलब ईश्वर नहीं ब्रह्मा जी जो ईश्वर जिन जिनको ये कार्य देते हैं तो [गला साफ़ करने की आवाज़] उनके पास ये जो पुश और पुल करने की जो शक्ति है यह स्वयं से है या ईश्वर ने दी है यह शक्ति भी उन्होंने योग से प्राप्त हुई है। ब्रह्मा जी ने परमात्मा के ध्यान से मतलब उनका स्वरूप शाश्वत नहीं है। शाश्वत मतलब उनका स्वरूप है मगर शक्ति तो हमें चाहिए ना कोई भी कार्य करने के लिए या मतलब निर्देश मतलब ब्रह्मा जी ब्रह्मा जी के पास एक समय होता है जब शक्ति नहीं थी हम है ना और फिर वो ईश्वर से वो शक्ति प्राप्त करते हैं। क्योंकि ब्रह्मा जी विष्णु जी और शंकर जी तीनों को ध्यानस्थ अवस्था में दिखाया। आप देखेंगे जब भी उनको तीनों को ध्यानस्थ अवस्था में दिखाया तो ध्यानस्थ मतलब किसके ध्यान में वो है किससे प्राप्ति कर रहे हैं? किसके निर्देशन पे कार्य नहीं इसमें नारद जी ने नारद पुराण में एक वह आया है श्लोक उसमें

00:30:11:20 भगवान शिव से पूछते हैं विष्णु भगवान शंकर भगवान से स्वरूप साकार वो खैर मान्यता अलग है मगर मैं आपको बता दे रहा हूं उसमें वो पूछते हैं कि तुम किसका ध्यान कर रहे हो तो वो कहते हैं हे गोविंद मैं किसी का ध्यान नहीं करता मैं तो नास्तिकों को प्रवृत्त करने के लिए केवल लीला मात्र करता हूं मुझे किसी का ध्यान करने की आवश्यकता नहीं है परंतु मुझे देखकर के नास्तिक भी धर्म से जुड़ जाए प्रभाव प्रभावित हो जाए कि हमें भी ध्यान करना चाहिए। तो इस कारण से मैं ध्यान करता हूं। यह उनका शब्द है। खैर इसमें ये चीज आती है कि उन्होंने ध्यानस्थ होकर के शक्ति प्राप्त की है। तो जैसे मान लीजिए कि ब्रह्मा जी एक जगह खड़े होकर के या जैसे पालन की बात है तो पालन की पूरी सृष्टि का पालन करते हैं तो उसमें कई सारी क्रियाएं हैं। वो करनी होती हैं विष्णु भगवान को विष्णु स्वरूप को। तो वह जो क्रियाएं करनी होती है तो विष्णु भगवान सब जगह पहुंचपहुंच के करते हैं या उनकी शक्ति कर देती है। वह खड़े रहते हैं। कैसे करते हैं? यहां भी बताया गया जो विष्णु जी का स्वरूप है तो उसमें चतुर्भुज दिखाया हम चार भुजा वाले तो विष्णु जी का जो असल कार्य है वो सतयुग से शुरू होता है जब सृष्टि पे सतयुग होता है हम और सतयुग में जो राज्य होता है वो लक्ष्मी और नारायण का होता है।

00:31:27:13 नहीं नहीं वो ठीक है। तो लक्ष्मीारायण का जो कंबाइंड स्वरूप है वो विष्णु है। ठीक है। उनका कार्य साकार में होता है। इस धरा पे पालना करने का। साकार में होता है। जैसे मान लीजिए कि विष्णु भगवान इस समय अ इन भारत के किसी हिस्से में हैं। साकार हैं क्योंकि है ना? तो उसी समय अमेरिका में कोई पालन की आवश्यकता पड़ी वहां पे कुछ पुश और पुल की क्रिया होनी है। वर्क तो उस वर्क को वो कैसे करते हैं? अपनी शक्ति से केवल कर देते हैं या फिर वहां तुरंत पहुंचते हैं। देखिए परमात्मा ने जो ये तीनों को कार्य दिया है वो पूरी सृष्टि की पालना कर रही है और पूरी सृष्टि की स्थापना मैं वही तो कह रहा हूं एक देश में या एक व्यक्ति जो भी कर रहा है वो खुद कर रहा है। उसमें उनका कोई रोल नहीं है। नहीं नहीं कहने का मतलब यह है कि विष्णु भगवान जो हैं वो जैसे मान लीजिए एक एग्जांपल ले रहा हूं कि सृष्टि के पालन में उन्हें सोफे को पुश करना है। उसकी स्थिति सेट करनी है। पालन के उससे दृष्टिकोण से तो उन्होंने क्या किया कि वो यहां बैठे हैं और उन्होंने केवल देखा और वो पुश पुश हो गया और एक ये है कि वो उठ के खुद गए अपने हाथों से उन्होंने पुश किया तो इसमें से किस तरह से करते हैं वो पूछ रहा हूं। एक्चुअली में क्या होता है कि जैसे कि

00:32:43:08 हम विष्णु जी को ले लें तो उनका कार्य भी क्या है ना बहुत बड़ा है। ये बड़े के हिसाब से बता दीजिए। जैसे जुपिटर को कहीं सेट करना ये बड़ा कार्य हो गया। मैंने बहुत छोटा इसलिए बताया कि जल्दी एग्जांपल सेट हो जाए। जुपिटर को सेट करना किसी अंतरिक्ष के किसी मंडल में, सौरमंडल में, किसी कक्ष में या ये ऐसा बड़ा कार्य पुष्प पुल तो होगा ना। प्राकृतिक जड़ पदार्थ हैं जब वो निर्मित होंगे तो उनकी स्थिति को स्थाई रूप से संरचना प्रदान करने के लिए कितने भी वर्षों के लिए उनको पुश या पुल करना पड़ेगा और उसमें एक फोर्स काम करेगी। तो वहां पर पुश और पुल वो बैठे-बैठे कर देते हैं या फिर वो जाते हैं खुद अपने से करते हैं। नहीं खुद क्यों करेंगे? तो केवल वो शक्ति से जैसे यहां बताया गया जो सृष्टि पूरा चक्र चल रहा है। उनकी शक्ति मतलब सब जगह है। ये परमात्मा की शक्ति और ये सारा कुछ जो विधान चल रहे परमात्मा की नहीं वो तो इनकी है ना। इनका कार्य मेन इनको परमात्मा से मिली हो। तो इसका मतलब यह कहा जाए कि जो विष्णु भगवान के पास जो शक्ति है अच्छा वो शक्ति उतनी कैपेबल है जितनी परमात्मा के पास है या थोड़ी बहुत कम ज्यादा है। नहीं परमात्मा के पास तो सर्व परमात्मा की बैटरी कभी डाउन नहीं होती

00:33:58:16 है। हर व्यक्ति उन विष्णु भगवान की होती है। सभी का सब ध्यानस्थ अवस्था है। परमात्मा तो ये भी हर 5000 साल में ब्रह्मा विष्णु महेश भी ध्यान करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं। अच्छा तो चलिए इस पे आ जाते हैं। विष्णु तो परमात्मा की शक्ति एक तरीके से पूरे उसमें संसार में व्याप्त है। वो बात अलग है कि उस शक्ति का उपयोग विष्णु भगवान कर लेते हैं। यही माना जाएगा। है ना? परमात्मा की जो शक्ति है वह पूरे में व्याप्त है। विष्णु भगवान उस शक्ति का उपयोग कर लेते हैं। और परमात्मा यह भी कहते हैं आप जैसे हर व्यक्ति अपने खुद के लिए वो ब्रह्मा भी है, वो विष्णु भी है और वो शंकर भी है। मतलब हर व्यक्ति मतलब हर व्यक्ति कुछ क्रिएट कर रहा है। तो जब वो क्रिएट कर रहा है वो ब्रह्मा है। वो तो उपाधि क्रिएट कर रहा है। वो विष्णु भाई क्रिएट किया। बच्चे को जन्म दे रहे हैं तो ब्रह्मा हो तो गए। कहते तो गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देव महेश्वर चाहे आप एक संकल्प भी रच रहे हो आप एक कर्म भी कर रहे हो आप कुछ भी कर रहे हो आप ब्रह्मा हो और आप सब पालन पोषण कर रहे हो सबका देखभाल कर रहे हो बस अंतर सिर्फ इतना ही है कि हम ब्रह्मा अकॉर्डिंग टू ब्रह्मा कुमारीज ब्रह्मा विष्णु महेश के आगे हम बहुत सीमित शक्तियों वाले हैं। जिस प्रकार से ब्रह्मा विष्णु महेश ईश्वर जो अलग है शिव बाबा

00:35:14:02 ब्रह्मा कुमारी के अनुसार उनके आगे वह लोग सीमित शक्तियों से युक्त है ना यही है ना हां उनके पास भी शक्ति उन्हीं से आई हमें भी उन्हीं से देनी जी जी अब हम तो हमें ब्रह्मा विष्णु महेश से नहीं लेनी शक्ति तो इस सोर्स वही है सुप्रीम सोर्स वही इसका मतलब कुल मिलाकर के ईश्वर की शक्ति सब जगह व्याप्त है सब जगह क्या ईश्वर की शक्ति से ही सारा कार्य हुआ तो सब जगह व्याप्त हो गई हां मगर हम उस पे लेना है। जैसे मान लीजिए सूरज निकला मगर आप घर में हो और आप सूरज के पास जाओगे नहीं तो आपको सूरज की किरणें कैसे मिलेंगे? नहीं मैं समझ गया। मैं समझ गया। मेरा मैं दूसरे मैं दूसरे वे पे जा रहा हूं। तो अब दिक्कत एक ये आती है कि ईश्वर एक जगह है। हम एक देश है और उसकी शक्ति सब जगह है। हम है ना? और तभी दुनिया में ये सारे कार्य हो रहे हैं। पुश और कुल वाले। तो फिर यह बात आती है कि कि शक्ति जहां पर ईश्वर नहीं है और शक्ति है तो वहां पे क्या ईश्वर की पावर कम मानी जाएगी? ईश्वर नहीं है और शक्ति है। जैसे ईश्वर मान लीजिए यहां पे है इस जगह पे और यहां से 1 कि.मी. दूर ईश्वर नहीं है। वास्तव में ईश्वर इस धरती पे नहीं। धरती पे ना हो कहीं पे भी हो। एक देशीय तो है ना क्योंकि साकार है। साकार है तो

00:36:29:03 एक देश है। किसी एक देश में है। ईश्वर तो निराकार है ना। निराकार है। हां सा सॉरी ईश्वर निराकार है। परंतु सर्वव्यापक है कि नहीं? नहीं नहीं है ना? तो एक देश ही है। और वो देश इस धरती पे नहीं है। वो देश परमधाम जिसको हम लोग कहते हैं वो इस सृष्टि से बहुत समझ गए। हां। तो यानी कि इस सृष्टि में ईश्वर नहीं है। वो अपने परमधाम में है। वो एक देश में है। सर्वव्यापक सर्वव्यापक नहीं है। उसकी जो शक्ति है वो सब जगह है। तो अब ये मैं कह रहा हूं कि जहां पे ईश्वर बैठा है वहां पे उसका जो आधिपत्य है वो ज्यादा होना चाहिए क्योंकि यहां पे वो नहीं है। उसकी शक्ति मात्र है। हम या फिर पूरा दोनों जगह सेम है। वह सुप्रीम है ना तो उसका अंतर नहीं होता कि वह कहीं है तो शक्ति है और कहीं नहीं है तो शक्ति नहीं है। ऐसा नहीं है। तो फिर अंतर क्या रहा शक्ति और शक्तिमान में? आप समझिए मेरी बात को। शक्ति सर्वव्यापक है। ठीक है। निराकार शक्ति भी है। निराकार ईश्वर भी है। ईश्वर एक जगह है। शक्ति सब जगह है। शक्ति जो उससे लेनी है ना। नहीं नहीं नहीं जो वो काम खुद कर रहा है। अभी हमारा तो रोल है ही नहीं। अभी जो उसके खुद के काम है उसके क्या काम जैसे आपने

00:37:44:04 बताया ना उत्पत्ति स्थिति संभार इसमें शक्ति चाहिए तो उसने किस चीज की उत्पत्ति की उसने सतयुग की और स्वर्ग की उत्पत्ति की स्वर्ग की उत्पत्ति करने में पुष और पुल का वर्ग हुआ ना हां ताकत लगी ना एक शक्ति का उपयोग हुआ यानी जहां पर स्वर्ग बना जहां पर सतयुग का निर्माण हुआ वहां पे शक्ति लगी हम और वो पूरे संसार में उसकी वो निराकार रूप में शक्ति व्याप्त है। ठीक है? तो हम यह माने कि जहां पर ईश्वर की शक्ति है वहां पर उसका कंट्रोल कम है और जहां पर वह स्वयं है वहां उसका कंट्रोल ज्यादा है। क्योंकि जहां पर ईश्वर नहीं है जहां पर उसकी शक्ति नहीं है वो जहां पर ईश्वर स्वयं नहीं है वहां पर उसका कंट्रोल थोड़ा कम है। क्या हम यह माने? वास्तव में इस दुनिया में जो भी चीज चल रही है वो प्रत्येक मानव के कर्मों के आधार पे चल रही है। नहीं नहीं वो अलग हो गया। मैं स्वर्ग की बात कर रहा हूं। जैसे स्वर्ग बनाया, सतयुग बनाया, जो भी बनाया तो उसमें ईश्वर तो यहां बैठा है। स्वर्ग बहुत बड़ा है। ठीक है? वहां पे ईश्वर की शक्ति है। ईश्वर नहीं है। तो जहां ईश्वर बैठा है, बैठा है वहां उसका कंट्रोल ज्यादा है और जहां पर वो स्वयं नहीं है। तो क्योंकि शक्ति है स्वयं तो है नहीं तो वहां कंट्रोल कम होना चाहिए। ईश्वर वास्तव में किसी चीज को कंट्रोल करता भी नहीं। भाई स्वर्ग को बना रहा है ना ये कंट्रोल हो गया ना। वो हमें

00:38:59:08 ज्ञान देता है जिससे हम अपने अंदर का बदलाव करते यानी ईश्वर उत्पत्ति स्थिति संहार नहीं करता केवल ज्ञान देता है। नहीं ज्ञान से वो हमारे अंदर अच्छे-अच्छे दिव्य गुणों की उत्पत्ति करता है और दुनिया में जो स्वर्ग बनता है वो तो प्रकृति बनाएगी। प्रकृति का परिवर्तन होगा विनाश होगा तब नई दुनिया बनेगी। ईश्वर ऑर्डर नहीं करता कि स्वर्ग बनाओ, महल बनाओ। तो फिर ईश्वर उत्पत्ति नहीं करता है। करता है ना उत्पत्ति मतलब वो हमें सतयुग बनाने का ज्ञान देता है। मतलब अपने संस्कारों को हम कैसे ईश्वर प्रकृति को सतयुग बनाने का ज्ञान देता है। नहीं मनुष्य आत्माओं को तो मनुष्य बनाते हैं स्वर्ग को। मनुष्य अपने को उस युग में जाने के लायक बनाते हैं। नहीं तो वो युग जहां वो जाएंगे वो तो निर्मित कहां से कौन करता है उसे? वो तो प्रकृति करेगी। वो स्थान तो प्रकृति तो प्रकृति को ईश्वर ने ज्ञान दिया। प्रकृति वाइब्रेशन से शुद्ध होती है। वह कार्य करने के लिए तैयार होती है। जैसे मान लीजिए कहीं भी सफाई करनी है। मतलब प्रकृति स्वर्ग अपने आप बना लेती है। हां प्रकृति मनुष्य के वृत्त प्रकृति कहने का मतलब ये हुआ ना कि ईश्वर फिर उत्पत्ति स्थिति सम्मार नहीं कर रहा है। ईश्वर आके ही ज्ञान देता है ना कि स्वर्ग बनेगा कैसे? वो तो हमको देता है ना ज्ञान कि जड़ पदार्थों को देगा। तो हमें देगा तो उसने प्रकृति तो जड़ होती है ना। तो ब्रह्मा का भी कार्य जो इस उत्पत्ति का है, उसका उनका

00:40:14:09 भी कार्य ऐसे ही है कि वो मनुष्य आत्माओं को नई जीवन में नहीं नहीं मैं वो नहीं कह रहा निर्माण की बात कर रहा हूं। उत्पत्ति करता है कि नहीं करता ईश्वर किस चीज की? जैसे आपने बताया सतयुग और स्वर्ग की हम करता है ना तो युग तो बनेगा तो अपने आप ही ना बनेगा। उसके लिए वो टाइम की बात नहीं कर रहा हूं मैं। जो उसमें स्वर्ग होता है ना जैसे कि अच्छा सब कुछ होता है। वायुमंडल अच्छा होता है। ये सब होगा ना तो इसको सेट ईश्वर करता है या अपने आप सेट होता है। ये ये कह रहा हूं। इसमें तीन लोग का रोल है। तो उनको शक्ति ईश्वर ही तो दे रहा है। तो बात तो वही होगी कि उसी शक्ति से हो रहा है काम। उसकी शक्ति भी लगती है। और साथ में प्रकृति और मनुष्य आत्मा तीनों का मिलके ये सतयुग का स्टार्टिंग होता है। नहीं नहीं। अकेले ईश्वर के उससे नहीं होता। मतलब ईश्वर उत्पत्ति करता है कि नहीं करता है इसकी? उत्पत्ति तो वही करता है। मगर वह हम सबके सहयोग से हम तो उसमें जा रहे हैं ना। मनुष्य तो उस मनुष्य का काम है उसमें जाना। अब रही बात ब्रह्मा विष्णु महेश की तो वो उनसे ही पावर लेकर के कर रहे थे। यानी कि शक्ति उनकी है। है ना? वो केवल आपने जैसे ये कहा ना कि जहां वो है उसकी शक्ति मैं मैं आ रहा हूं। मैं उस पे आ रहा हूं। तो अब बात ये है कि जैसे उन्होंने कहा कि वो कर दो जाकर के स्वर्ग का निर्माण कर दो। मान लीजिए ब्रह्मा जी कर रहे हैं। ऐसा होता है। ब्रह्मा जी कर रहे हैं।

00:41:29:10 तो अब ब्रह्मा जी तो सर्वव्यापी है नहीं। उन और ईश्वर की शक्ति सर्वव्यापी है। तो ब्रह्मा जी जहां-जहां पे चाहेंगे वहां वहां पे वो जो है निर्माण कर लेंगे क्योंकि उसकी शक्ति सर्वव्यापी है। क्योंकि उन्होंने अथॉरिटी दी है कि तुम मेरी शक्ति का इस काम में यूज़ कर सकते हो। दूसरे काम में विष्णु जी करेंगे। यूज़। यही तो बात हो गई। यही है ना क्लेरिटी? तो अब बात यह आती है कि अब हमें दो तत्व प्राप्त हो गए। एक ईश्वर की शक्ति और एक स्वयं ईश्वर। तो ईश्वर की शक्ति सब जगह मानी हमने कि है जो पुश पुल करेगी और भी जितनी भी क्रियाएं होंगी वह सब करेगी और निराकार है। अब दोनों में क्या है? यह एकदेशीय है और यह सर्वव्यापी है। शक्ति सर्वव्यापी है। ये एकदेशीय है। अब जो सर्वव्यापी शक्ति है वो कहीं ना कहीं कुछ अंतर होना चाहिए। तब हम यह कह सकते हैं कि यह शक्ति है और ये शक्तिमान है। कुछ भी अंतर नहीं है तो हमें कहना पड़ेगा यह भी शक्तिमान है। तो अंतर क्या है कि भाई जो स्वयं ईश्वर है वो ज्यादा होना चाहिए। जो शक्ति है वो कम होनी चाहिए। तो क्या ऐसा है कि जहां पे ईश्वर बैठा है उसका कंट्रोल ज्यादा है और जहां वो नहीं है उसका कंट्रोल कम है। ये मेरा प्रश्न है। हां जहां ईश्वर है वहांकि उसके वाइब्रेशन है तो वहां का ओला और वहां की जो वाइब्रेशन है वो तो ज्यादा होगी

00:42:44:12 और जहां पे वो नहीं वाइब्रेशन नहीं उसका कंट्रोल उसका कंट्रोल एक्चुअली जहां परमात्मा रहता है ना वहां तो कुछ कंट्रोल करना ही नहीं है। वहां कुछ ऐसी चीज ही नहीं। करना है या नहीं करना है वह तो एक अलग बात हो गई। जैसे मैं यहां बैठा हूं मुझे कुछ नहीं करना है। मगर मुझे मालूम मेरे सामर्थ्य में क्या-क्या है। क्या-क्या मैं कर पाऊंगा। तो वही मैं पूछ रहा हूं कि जहां परमात्मा स्वयं होता है वहां पे उसका अधिकार कम ज्यादा होता है। कंपैरेटिवली टू जहां पे वो नहीं होता उसकी शक्ति होती है वहां पे ज्यादा होता है। हां। हां तो इसमें जैसे हम ऐसे समझ सकते हैं जहां माता-पिता खड़े हैं हम तो वहां सब चीज एक्यूरेट चलती है। मगर जहां वो नहीं और सिर्फ बच्चे हैं तो वहां [गला साफ़ करने की आवाज़] सब चीज थोड़ी ऊपर नीचे तो चलती है। यानी कि ईश्वर की सत्ता समान रूप से सब जगह नहीं है। ईश्वर की सत्ता समान रूप से सब जगह नहीं है। जैसे कि एक मात-पिता के बच्चे समान रूप से नहीं होते। उसी के बच्चे हैं। नहीं बच्चे नहीं। ईश्वर की सत्ता तो सत्ता तो बच्चों के अंदर ही होगी। बच्चों के अंदर क्यों होगी? जैसे कि मान लीजिए कोई ज्वालामुखी फट रहा है हम या फट रहा है या नहीं फटना है जो भी उसमें उत्पत्ति में आता है। इसमें बच्चों का कोई रोल नहीं है। इसमें तो प्रकृति के साथ व्यवहार है किसका? ईश्वर का है ना कि उसको फटना है कि नहीं फटना है? कितनी अग्नि जलवानी है, कैसा ज्वालामुखी बनवाना है। तो

00:43:59:15 इसमें तो उसकी शक्ति है ना वहां पे। तो इसमें बच्चों का कोई काम नहीं है। तो वो मैं बता रहा हूं कि ईश्वर की जो सामर्थ्य है वो सब जगह एक जैसी है। बराबर है। उसका जो इसमें हम आपको कंट्रोल एक चीज बताना चाहेंगे। ज्वालामुखी फटना है कि नहीं फटना है? सुनामी आनी है कि नहीं आनी है? बाढ़ आनी है कि मैं ये नहीं कह रहा प्राकृतिक आपदाओं पे मत जाइए। आपदाओं में भी दूसरे मैं वही मैं जानता हूं। आप ये कहोगे मैं वो नहीं कह रहा। वो मैंने केवल एक उदाहरण लिया है। मैं किसी भी क्रिया की बात कर रहा हूं। दुनिया में कहीं भी कोई भी ऐसी क्रिया जहां पर मनुष्यों से कोई मतलब ही नहीं है। वो तो प्रकृति तो भी मनुष्यों का रोल है। यानी कि सतयुग बन रहा है मनुष्यों के कारण। हां। मनुष्यों का ही रोल है। सतयुग भी मनुष्य बनाता है। कलयुग भी मनुष्य बनाता है। तो इसका मतलब ईश्वर उत्पत्ति नहीं कर रहा है ना। ईश्वर उत्पत्ति का ज्ञान देता है। जैसे मान लीजिए। तो मैं वही कह रहा हूं। गीता में आपने देखा। मैं मैं समझ गया। वो थोड़ा सा ईश्वर जी ने लड़ाई नहीं उन्होंने बताया। मैं ईश्वर केवल ज्ञान देता है। हां। यानी वर्क नहीं करता। ज्ञान और शक्ति दोनों देता है। तो वही शक्ति वाला मिस हो जाता है। आपको ज्ञान दिया। फिर आपको उस कार्य को करने की शक्ति दी। मगर करेगा नहीं वो। ठीक है। शक्ति दे दी। हां। अब जो मुझे शक्ति दी है तो मैं तो जहांजहां पर मैं हूं मैं वहीं पे काम कर पाऊंगा। शक्ति भले ही भगवान ने दी है। अपने वाइब्रेशन से भी काम कर सकते

00:45:14:19 हैं। एक जगह बैठे-बैठे भी पूरी दुनिया में। आप किसी भी पूरी दुनिया में अपने मानसिक जिसको कहते हैं मनसा सेवा हम लोग कहते हैं। अपने वाइब्रेशन अपने थॉट से भी आप बहुत काम कर सकते हैं। यानी कि मैं जहां पर हूं मैं जहां पर हूं और जहां पे मेरी शक्ति है हां ठीक है? ईश्वर से आई है वो शक्ति और मेरी शक्ति से मैं पूरी दुनिया में कार्य कर सकता हूं। ठीक है? हम अब जब मैं कार्य कर सकता हूं। ईश्वर ने उत्पत्ति ईश्वर को उत्पत्ति इसलिए कह रहा है क्योंकि उत्पत्ति करने की ये जो शक्ति है पूरे संसार में उन्होंने वो उन्होंने दी तो बात तो वही हो गई ना कि उनकी ही शक्ति पूरे संसार में तो उसी को तो मैं यूज़ कर रहा हूं। ये तो मैंने शुरू में कहा था आपसे उनकी शक्ति पूरे संसार में मानी है ना यूज़ कर रहा हूं। मैं उसको यूज़ कर रहा हूं। तो अब मैं फिर से पूछ रहा हूं कि जो ईश्वर की शक्ति पूरे में है सर्वव्यापी वो ईश्वर के बराबर है या ईश्वर से थोड़ी कम है क्योंकि बराबर है तब तो वो ईश्वर से अलग है। वरना हमें मानना पड़ेगा कि ईश्वर स्वयं है। अगर कम है अगर वह शक्ति कम है ईश्वर से थोड़ी सी तो अलग है ईश्वर से और अगर बिल्कुल बराबर है एक पॉइंट भी अंतर नहीं है तो हमें मानना पड़ेगा कि ईश्वर ही शक्ति के रूप में सर्वव्यापक है। ये बात है। जैसे कि

00:46:30:00 ईश्वर तो फिजिकल में है। जैसे हम जानते हैं वो शक्ति तो उसकी चारों तरफ है ना। वही तो मैं कह रहा हूं। अंदर है ना। मगर हम ये नहीं कह सकते कि पावरफुल कौन है? ईश्वर की ईश्वर की शक्ति क्योंकि हम अलग कर रहे हैं। हां अलग कर ऐसा होता है कि देवी भागवत में एक वाक्य आया है। शक्ति और शक्तिमान में कोई भेद नहीं होता। शक्ति शक्तिमान को द्वैत भाव में नहीं डालती। मतलब ये दो तत्व नहीं होते। जैसे मेरे हाथ ने कोई काम किया तो यह नहीं कहा जाएगा मेरे हाथ ने किया। हां मैंने नहीं किया हाथ ने किया। हां। तो उसी तरीके से मगर जब हम कहते हैं ये हाथ अलग है तो फिर कंपैरिजन आएगा कि जो काम अभी भी मैं कर सकता हूं वो मेरा हाथ नहीं कर सकता। तो शक्ति अलग है तो फिर ये क्वेश्चन आएगा कम ज्यादा का और शक्ति अलग नहीं है तो ये माना जाएगा ईश्वर शक्ति के रूप में सर्वव्यापक है। तो मैं वो आपसे पूछ रहा हूं। तो एक्चुअली इसमें यह बताया जाता है ना जी कि शक्ति क्या है कि आपने जैसे भोजन खाया भोजन खा के आपको क्या मिली शक्ति मिली पावर मिली ना कार्य करने की जी तो परमात्मा भी कहता है कि मैं सर्वशक्तिवान हूं तुम मेरे से शक्ति लेने वाले हो मास्टर सर्वशक्तिवान नहीं वो कहते हैं मैं उसी कहने के आधार पे जो निर्णय आ रहा है उस पर अगला मेरा अगला एक क्रम में एक प्रश्न है कि

00:47:45:08 ईश्वर सबको सबको शक्ति दे रहा है। यानी उसकी शक्ति सब जगह व्याप्त है। सबको दे रहा है मगर सब ले रहे हैं कि नहीं? वो तो एक अलग कांसेप्ट हो जाएगा। सब ले रहे हैं कि नहीं ले रहे और लेने की विधि भी तो जानना पड़ेगा। वो भी एक अलग कांसेप्ट हो जाएगा। मगर वो उसकी शक्ति सब जगह है। तो क्वेश्चन यही है कि शक्ति शक्ति सब जगह नहीं शक्ति परमात्मा के पास है और हम सब ध्यान करके उससे शक्ति खींचते हैं। जैसे छोड़ता है। हां। जैसे अब्सॉर्ब यानी कि फिर वही बात आ गई कि यानी कि जहां पर विष्णु भगवान है अगर वह यहां है तो दूसरी जगह उनका कंट्रोल नहीं है। हम नहीं है ना उनको वास्तव में कंट्रोल करना भी नहीं है ना क्योंकि सेम टाइम सारा जैसे मान लीजिए रूल्स बन गए लॉ बन गया सब चीज ऑटोमेटिक चल रही है। एक मशीन का बटन आपने दबा दिया सब चीज ऑटोमेटिक चल रही है। क्योंकि उस मशीन को चालू होने में और बंद होने में और जो कार्य अभीष्ट है वो करने में हमारी चेतना उसके साथ जुड़ी है। हमने उसको दबाया है और हम ये जानते हैं कितनी देर में कितना क्या काम करेगी और अगर हमारी चेतना उससे अलग हो जाए तो वो विनाशकारी हो जाएगी। जैसे रिवॉल्वर रिवॉल्वर को आप कहीं पे यूं ही किसी बच्चे को दे दो तो हत्या कर देगा वो तो बच्चा उसको नहीं मालूम अपना ही नुकसान पहुंचा ले। है ना? तो हमारी चेतना उस मशीन के साथ लगी होती है। तब ये माना जाता है। तो कहने का मतलब यही है

00:49:00:24 कि वो जो प्रकृति का कार्य अपने आप हो रहा है उसमें ईश्वर का इनवॉल्वमेंट मानना पड़ेगा ना। हम मानेंगे क्योंकि सारा खेल ही प्रकृति पुरुष का है। पुरुष कौन? परमात्मा और प्रकृति दोनों मिलके ये सारा खेल रचा हुआ है। हां। तो प्रकृति को शक्ति कहिए प्रकृति यानी कि यानी कि भगवान शक्ति भगवान से अलग है। भगवान उसको ऑर्डर देता है वो काम करती है। शक्ति वास्तव में कोई फिजिकल रूप में नहीं है। एक फोर्स है ना बल। वो बल कहां है? हम सबके अंदर है ना? बाहर तो नहीं है ना। जहां पे मैं वही तो बात बार बार-बार आपसे कह रहा हूं। जहां पे पहाड़ बन रहा है। सतयुग में घाटियां बन रही हैं। पेड़ उग रहे हैं। प्रकृति ऑटोमेटिक बना रही है। हां। तो उसको ऑटोमेटिक बना रही तो वो शक्ति है ना उसके पास तब तो बना रही है ना पुश और पुल दुनिया में हो रहा है तो यानी कि वो शक्ति नाम की कोई पदार्थ है वहां पर जो वो काम क्रिया करवा रहा है ठीक है वो जो पदार्थ है शक्ति नाम का प्रकृति क्या हो गई जड़ तत्व कि ये ये ये जो है परमाणु हैं हां ये ये सब हो गए जड़ तत्व और शक्ति क्या हो गई कि फोर्स कि किस उनको क्या शेप देना है इसके लिए स्पोर्स चाहिए इन इन प्रकृति के पदार्थों को निर्मित करने के फोर्स चाहिए। अब ये जो फोर्स है, यह या तो प्रकृति का अपना हिस्सा होना

00:50:15:27 चाहिए। है ना? कि वो कुछ भी अपने हिसाब से कर सकती है और या फिर ये भगवान का हिस्सा होना चाहिए। नहीं डिसाइड करते। जैसे मान लीजिए लोगों मैं यह नहीं कहता हूं कि वह करते हैं कि नहीं करते हैं। मैं यह कह रहा हूं कि अगर उनकी ही शक्ति यह सब कार्य करा रही है तो फिर शक्ति और शक्तिमान में क्योंकि आपने अंतर माना है कि शक्तिमान सब जगह नहीं है पर शक्ति सब जगह है। तो यदि आपने अंतर माना है तो फिर हमें ये मानना पड़ेगा कि ईश्वर का जो सत्ता है वो सब जगह एक जैसी नहीं है। हम कमब है क्योंकि वो स्वयं नहीं है वहां पर। यह चीज है। अच्छा ठीक है। दूसरा करते हैं। इसको हटाते हैं। काफी

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00:50:55:20 अच्छा जा रहा है। बहुत बढ़िया चीजें समझ में मिल गई। अ ये जैसे हमने कहा कि ईश्वर सर्वश वो सर्वव्यापक नहीं है। अब ईश्वर सर्वशक्तिमान है। है तो ये सर्वशक्तिमान का अर्थ क्या लेते हैं हम? सर्वशक्तिवान का अर्थ होता है कि जो शक्तियां आत्मा को चाहिए वह उसके पास है जो उसे लेती है। सर्वव्यापी का अर्थ है कि सबके अंदर होना सब कण-कण के अंदर विराजमान होना वो नहीं है। वो नहीं है। जैसे मान लीजिए हम पीएम को ले लें या प्रेसिडेंट को ले लें। हम कह सकते हैं उनके पास इतनी शक्ति वो सारा रूल्स बना सकते हैं। कुछ भी कर सकते हैं। मगर हम ये कह कि वो सबके सब जगह है। हर जगह इसलिए तो क्राइम होता है। वो सब जगह नहीं हो सकते। नहीं तो ऐसा माने ईश्वर को क्या जो बाधित मतलब एक होता है ना कि ईश्वर वही है जो ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। ईश्वर सभी नियमों को बनाने वाला सर्वियाक है। सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म तैत्री उपनिषद तो जैसे हमने प्राइम मिनिस्टर से तुलना की। प्राइम मिनिस्टर नहीं चाहता कि कहीं पे दंगे हो पर हो गए। हम प्राइम मिनिस्टर नहीं चाहता कि कहीं डकैती हो पर हो गई क्योंकि वह सब जगह नहीं है। हम उतनी पावर के साथ हो सकता है प्राइम मिनिस्टर खुद खड़ा है मगर वो बेचारा नहीं रोक पाया कोई चीज ऐसी हो गई

00:52:10:21 है ना तो इसलिए तो क्या ऐसा ही ईश्वर को माने कि उसके इच्छा के विरुद्ध भी चीजें हो सकती है दुनिया वास्तव में क्या है कि उसने ये सारे रूल्स तो बना दिए मगर वो साथ ही साथ वो डिटच्ड ऑब्जर्वर भी मतलब वो कभी भी किसी भी चीज में इंटरफेयर नहीं करता मैं समझ गया इंटरफेयर नहीं करता है अभी बात ये हो रही जैसे आपने कहा ना कि प्राइम मिनिस्टर जैसे होता है रूल्स बना दिया अपना बैठा है तो प्राइम मिनिस्टर कई बार ऐसा होता है जो दंगे नहीं होने चाहिए पर वो हो रहे हैं दंगे तो क्या ऐसा ही ईश्वर को माने या ना माने कि ईश्वर को माने कि वो नहीं चाहता फिर भी हो रहा है हां कि उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ हो जाए हां माता-पिता तो कभी नहीं चाहता कि कभी कोई चीज खराब हो हम मतलब बच्चों के जीवन में या बच्चों के साथ तो वो हम सबका पिता तो वो भी नहीं चाहता कि कभी ऐसी दुनिया में कोई खराब हो मगर हमारा ही कर्म अगर ऐसा है नहीं नहीं हमारा कर्म है मगर यदि माता-पिता चाहे जैसे बच्चा बिजली के बोर्ड में हाथ डालने जा रहा है तो माता-पिता उसके रोक रोक देते हैं कई बार क्यों क्योंकि माता-पिता त्रिकालदर्शी नहीं है हां और माता-पिता मोहश है यानी कि ईश्वर चाहे तो रोक तो सकता है रोकता नहीं है नहीं क्योंकि वो त्रिकालदर्शी है और वो नष्ट मोह है। नहीं नहीं मैं यह कह रहा हूं ईश्वर जानता है कि इसकी

00:53:25:25 यह कारण है यह अच्छी चीजें हैं त्रिकालदर्शी और मुझे पता है ये सब तो अज्ञानता है जो ये जिसमें फंस रहे हैं तो इसलिए वो रुको रोकता नहीं है इंटरफेयर करता नहीं है मगर वो कर सकता है हां कर सकता है ना तो यानी कि वो मगर वो करेगा तो ये जो मैं ये नहीं कह रहा करेगा करेगा तो जाइएगा जैसे मान लीजिए कि एक बच्चा एग्जाम देने बैठा है हम क्लासरूम अगर वहां पे जो इनविजिलेटर है वो वो उसका पिता ही हो। मगर क्या वो बता देगा अपने बच्चे को कि तुमको ये आंसर त्रिकालदर्शी पे तो ये वाली बात फिट ही नहीं बैठेगी। उसको तो पता है कि आगे क्या होना है। त्रिकालदर्शी का ये अर्थ है कि आपके संग जो हो रहा है ना उसको उसका कारण भी पता है कि क्यों हो रहा है आपके संग वो? त्रिकाल का मतलब क्या है? भविष्य भी पता है ना। भविष्य भी पता है पास्ट भी पता है। तो फिर उसे पता है बच्चा पास होगा कि नहीं होगा। नहीं हम इसके लिए यह बता रहे हैं कि जैसे माता-पिता इंटरफियर नहीं करते। परीक्षा लेने की बात है। अगर यदि परीक्षा लेने की बात है तो परीक्षा लेगा तो वो जिसको पता नहीं होगा इसको ज्ञान है कि नहीं ज्ञान है। मगर वो तो सर्वज्ञ है। सर्वज्ञाता है। उसके ऊपर तो परीक्षा लेने वाली बात फिट ही नहीं बैठेगी। परीक्षा नहीं ले रहा है। वास्तव में क्या हो रहा है ना वो हमारे कर्मों का हमारे पर रिटर्न आ रहा है। जैसे हमने कुछ किया। देखिए वो चीज बदल जाती है। बात आई थी परीक्षा वाला उदाहरण आपने दिया तो मैंने ये प्रश्न मैंने ये

00:54:40:26 परीक्षा का उदाहरण क्यों दिया? कि वो इंटरफेयर क्यों करेगा? हां इंटरफेयर नहीं करेगा। ठीक है वो मैंने आपका मान लिया। बात ये है कि अ जैसे ईश्वर जो है वो क्योंकि त्रिकालदर्शी है इसलिए वो इंटरफेयर नहीं करता है मगर वो चाहे तो कर सकता है ये तो मानना पड़ेगा ना यानी वो सर्वशक्तिमान है वो सब जगह सब कुछ कर सकता है यहां पर भी वो वाली बात आ जाएगी उसी शक्ति है कि शक्तिमान वो द्वैत भाव वाली तो यानी कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है वो किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है ये हम हमें मानना पड़ेगा है ना या फिर है एक बार आप मुझे क्लियर कर जैसे मान लीजिए जिसने कॉन्स्टिट्यूशन बनाया और वही तोड़े तो कैसा लगेगा तो भगवान है ये एक अलग चीज है सम्मान की वजह से वो नियम नहीं तोड़ता है मगर वो तोड़ सकता है तोड़ सकता है तोड़ सकता है जैसे लिखा है कृष्ण जी को यशोदा जी ने ओकली में बांध दिया क्या बांध सकती थी क्या वो वो एक तरीके से उसकी लीला हो गई कि यहां मैं अपने कॉन्स्टिट्यूशन के नीचे बांध दूं वो उसकी लीला हो गई मगर वो इतना सर्वशक्तिमान है कि वो तो कुछ वो कुछ भी कर सकता इसका मतलब ईश्वर अवतार भी ले सकता है शरीर धारण कर सकता है शरीर शरीर धारण करता है मगर उसका जो अवतार लेने का प्रक्रिया नहीं दूसरे परकाया प्रवेश नहीं कहते प्रवेश नहीं नहीं स्वयं से नहीं तो यानी कि यहां ये कार्य नहीं कर सकता वो नहीं

00:55:56:00 क्यों नहीं क्योंकि संसार में कोई ना तो ऐसी मां है ना ऐसा पिता है जो ईश्वर को जन्म दे सके तो जो काम कोई नहीं कर सकता वही तो ईश्वर कर सकता है तभी तो वो ईश्वर है नहीं माता-पिता तो जन्म देंगे ना तो परमात्मा अभी हमने हम अभी हमने नहीं परमात्मा अजन्मा होते हुए भी लीला पूर्वक किसी माता के गर्भ से प्रकट होकर अवतार ले सकता है। जैसे चलिए ठीक है। यह बताइए हमारी जो कर्म बंधन ही बंधेगा। यह यह जरूरी नहीं है ना। क्यों? अगर माता माता का ऋण हो गया उसप जैसे मान लीजिए मां का जन्म लिया तो ठीक है। ऋण ऋण वाली बात बता दे थे कि वो भगवान के शरीर में घुसे। श्री कृष्ण के शरीर में तो श्री कृष्ण का ऋण आ गया। श्री कृष्ण वाले ऋण आ गए उनके ऊपर। फिर कौन घुसे? परकाया प्रवेश तो परमात्मा किसके तन में प्रवेश कर श्री कृष्ण के तन में किया ना मगर तो श्री कृष्ण क्योंकि जन्मे थे माता के ऋण उनप था तो उनका ऋण आ गया उसमें भगवान ने ये भी कहा मैं साधारण तन में प्रवेश कर कृष्ण का ऋण था कि नहीं कृष्ण का तन साधारण नहीं था तो तो उसमें किया प्रवेश कृष्ण जी की तो आत्मा ने प्रवेश किया ना तो कृष्ण जी परमात्मा नहीं नहीं तो किस में प्रवेश किया आपके हिसाब से ब्रह्मा में प्रवेश किया तो

00:57:11:06 ब्रह्मा ब्रह्मा जी पर कोई ऋण है किसका किसी का भी ब्रह्मा जी तो उनके माता-पिता का ऋण होगा ब्रह्मा जी के तो ब्रह्मा जी के मातापिता का ऋण ब्रह्मा जी पर है ना मगर परमात्मा का ऋण किसी पे नहीं है परमात्मा प्रवेश किया ब्रह्मा में ब्रह्मा में प्रवेश किया तो जब ब्रह्मा जी के शरीर पे शरीर में उन्होंने वो किया उनका सहारा लिया उनके शरीर का तो ऋण आ गया ना उनके ऊपर परमात्मा के ऊपर क्यों इसलिए क्योंकि वह उनके शरीर को यूज कर रहे हैं। तो परमात्मा अगर किसी के शरीर को यूज़ कर रहे हैं वह भी किस लिए ज्ञान देने के लिए? तो इसका मतलब अगर सही वजह हो तो हम ऐसे कार्य भी कर सकते हैं जिसमें कि ऋण भी आ रहा हो तो वो नगण्य हो जाएगा। तो इसका मतलब वो जन्म भी ले सकते हैं। फिर अगर ज्ञान देने के लिए ही कर रहे हैं। अच्छा ये बताइए परमात्मा जन्म क्यों लेंगे? सृष्टि क्यों बनाएंगे? नहीं। जैसे मान लीजिए पर काया प्रवेश किया तो ज्ञान सुनाने के लिए। मैं कह रहा हूं हम परमात्मा में एक बाधा लगा रहे हैं कि वह क्यों लेंगे मैं मैं पर प्रवेश का बताया वो वो ईश्वर का स्वरूप है। ईश्वर का स्वरूप है कि वो अपनी असीमित शक्तियों से अनंत कार्य करते हैं। अनंत क्रियाएं करते हैं। तो हम उसकी किसी भी

00:58:26:07 क्रिया पे हम ये अगर कह देंगे कि वो ऐसा क्यों करेंगे? ये तो परमात्मा तो सच्चिदानंद स्वरूप है। उसको तो कुछ भी जरूरत नहीं है। उसको तो ज्ञान देने की भी जरूरत नहीं है। वो तो अपने आप में स्वरूप में निश्चित है। मगर वो भी इस श्यामा के बंधन में बंधा है कि कल्प के अंत में कुल मिला के उसको आना पड़ता है। ठीक है। कुल मिला के ये बात आ गई कि वो सब कुछ नहीं कर सकता। नहीं कर सकता ना। तो अभी आपने कहा था सब कुछ कर सकता है। तो हमने ये भी तो कहा था ना कि वो भी रिस्पेक्ट की वजह से कुछ चीजें नहीं करता है। मगर नहीं नहीं मैं वही पूछ रहा हूं। क्या ऐसा है कि वह अवतार ले सकता है पर लेता नहीं है? ऐसा है क्या? अवतार का कारण भी तो होना चाहिए। मैं देखिए जब मैंने यह पूछा आपसे ना कि अब क्या वो ऐसा है? हां वो कुछ भी कर सकता यानी अवतार ले सकता है। वो करता नहीं है। वो ब्रह्मा कुमारी की मान्यता है। यानी कि ईश्वर वो सर शक्ति शक्तिमान वाला भेद तो रह गया। एक वो जो धर्म पर हमारी बात हुई कि उसको कैसे कहा जाए वो थोड़ा सा अनक्लियर था। मगर अभी ये बात आ रही है कि वो अवतार ले सकता है। शरीर धारण कर सकता है। पर वो लेता नहीं। यह बात क्लियर हो गई। अब यह जो चीज है कि वह लेता नहीं है। यह हमको कहां से मालूम पड़ी है कि वह लेता नहीं है। क्योंकि अब यह बात आ गई कि थ्योरी है कि नहीं ये लेने वाली क्योंकि उसका कॉन्स्टिट्यूशन क्या है? जिस कॉन्स्टिट्यूशन के कारण हम कह रहे हैं कि वो

00:59:41:13 लेता नहीं है। क्योंकि वो ले तो वो सकता है। क्योंकि भगवान ने खुद कहा है कि मैं जन्म मरण से परे हूं। मैं अभोक्ता हूं। मैं अयोनिज हूं। भगवान ने अयोनिज मतलब मैं मैं समझ गया। भगवान ने यजुर्वेद के 31व अध्याय के 29वें मंत्र में कहा है कि भगवान अपनी माया के द्वारा विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं और गर्भ के मध्य में विचरते हैं। यदा धर्मस भवती भारत अभक्तान धर्मस तदात्म सजाम में हम उन्होंने नहीं कहा प्रका प्रवेश सजाम में हम मैं खुद का सृजन करता हूं। अपने रूप का सृजन करता हूं। अच्छा एक बात और आती है कि कि उसका कोई पिता होगा फिर अगर वह जन्म लेगा तो आत्मा का कोई पिता नहीं है मगर वह तब भी शरीर धारण करती है आत्मा का भी तो कोई पिता नहीं है ना सारी आत्माओं का पिता परमपिता है नहीं बायोलॉजिकल पिता तो नहीं है ना कि किसी की कोख से वो निकले नहीं देखिए आत्मा तो अविनाशी अनाविनाशी अनादि मगर उसका पिता है तो किस रूप से पिता है वो मतलब क्या ऐसा है जिसके कारण उसको पिता कह रहे हैं क्योंकि उस जैसे पिता एक तो होता है जन्म देने वाला हां और वो वो क्यों पिता है? क्योंकि उसने हमें ज्ञान दिया। यानी कि ये वाला पिता नहीं है ना जन्म देने वाला। नहीं पर आत्मा को तो जन्म दिया ही नहीं जा सकता। तो नहीं है ना? फिर भी वो जन्म ले रही है ना। आत्मा शरीर धारण कर रही है ना?

01:00:56:28 हां। तो ये वाली बात जो है कि वो अगर वो जन्म लेगा तो पिता जो है माता-पिता मानने पड़ेंगे उसके। तो ये ऐसे तो आत्मा भी जिसका कोई पिता नहीं है वो वाला। जन्म देने वाला जिसका कोई पिता नहीं है क्योंकि परमात्मा जन्म लेता इतने वर्ष तो उसको पालना लेने में बीतते मात पिता की फिर गुरु से शिक्षा जो परम सतगुरु है वो क्या किसी गुरु से शिक्षा लीला रूप में जैसे आपने कहा ना जो परमात्मा कर सकता है जो महात्मा कर सकता है वो परमात्मा नहीं करेगा कृष्ण जी देवात्मा बात खुल कुल मिला के बात वही आ गई कि हमको वो इसलिए नहीं करेगा क्योंकि थ्योरी नहीं है क्योंकि वो कर तो सकता है मतलब टेक्निकली वो कर सकता है बट क्योंकि हमें बताया गया स्क्रिप्चर के द्वारा वाणी के द्वारा किसी ने कहा है कि वह ऐसा नहीं कर सकता है। तो आपने जैसे कहा कि उसने खुद कहा है कि वो अयोनिज है। तो मैंने आपको खुद बताया कि जैसे भगवत गीता में लिखा है कि वो जो है यदाई धर्मस्य यजुर्वेद में है। ऋग्वेद में है। छठवें मंडल में बहुत सारी जगह उसके स्वरूप का वर्णन है। विराट स्वरूप का वर्णन तो बार-बार है। तो फिर हम ये अच्छा दूसरी बात यह है कि ईश्वर के दो स्वरूप है। मैं ये बताता चलूं आपको अकॉर्डिंग टू जो परंपरा प्राप्त सनातन धर्म है। उसमें क्या है? दो स्वरूप है ईश्वर के। एक पारमार्थिक स्वरूप

01:02:12:02 है जो व्यवहार में नहीं आ सकता। मांडूक्य उपनिषद में लिखा है कि भगवान व्यवहार में ना आने वाला है। मगर आप भगवान तो यहां पे ज्ञान दे रहे हैं। व्यवहार में आ रहे हैं। है ना? यानी कि भगवान का दूसरा कोई स्वरूप है। जैसे वो धक्का लगा रहे हैं तो यह भी व्यवहारिक है। मगर व्यवहार में ना आ सकने वाला जो वाणी का विषय ही नहीं हो सकता। ऐसा भी स्वरूप है भगवान। हम तो क्या होता है कि भगवान व्यवहार में ना आने वाला है। व्यवहार में आने वाला रूप धारण करता है। है ना? तो अब जब व्यवहार में ना आने वाली बात की जाएगी तो उसके हिसाब से सब बातें बताई गई हैं। फिर व्यवहार में आने वाली मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी योग माया को अपने संगीभूत करके प्रकट होता हूं। तो क्या है कि दोनों तरह के वचन हमें प्राप्त है। तो एक पारमार्थिक धरातल का जैसे कि इसको एग्जांपल से ऐसे समझ सकते हैं। जैसे हमको भूख लगी है। तो हम ढूंढेंगे खाना। अब खाना क्या है? सगुण साकार। साकार स्वरूप डबल रोटी, रोटी, दाल, चावल ये खाएंगे हम। अब हमें चाहिए क्या था? वास्तविकता में भूख लगी थी तो निराकार कैलोरी। क्या मिला हमको? निराकार कैलोरी। अब वास्तविकता में तो हमको कैलोरी चाहिए। मगर कैलोरी के लिए हम हवा में हाथ पैर नहीं मार सकते। ऐसे ही जो परमात्मा का परम स्वरूप है, है ना? जो व्यवहार

01:03:27:10 में ना आ सकने वाला प्रपंच रूपी संसार में वही भगवान जो हैं वो सच्चिदानंद स्वरूप भगवान अवतार धारण करते हैं। हमारे व्यवहार का विषय बनते हैं। जिससे कि हम उनकी भक्ति कर पाते हैं। जैसे कि आप भी आपने माना बिंदु स्वरूप बिंदु भी एक आकार है। आकार हो गया ना? तो यानी कि हमको आकार की आवश्यकता है। आकार को प्राप्त करके हम लोग निराकार को प्राप्त करेंगे। ऐसा मगर हम यह कह दे कि नहीं नहीं वह अवतार ले ही नहीं सकता। तो फिर बात आ जाती है स्क्रिप्चर्स की। तो स्क्रिप्चर्स में यह भी लिखा है कि वह अवतार लेते हैं। तो फिर हम ऐसा क्यों मानते हैं कि अवतार नहीं लेते। ये बात है। उनका दिव्य अवतार है ना। दिव्य अवतार मतलब परकाया प्रवेश के द्वारा। नहीं नहीं सीधे सीधे मां के गर्भ से प्रकट होना। तो ये शिवजी के लिए लिखा है। सबके लिए लिखा है। शिव जी ने क्या कब ऐसा किया? शिवजी के लिए लिखा है। हनुमान जी के रूप में आए ना। प्रकट हुए नहीं शिव जी का जो स्वरूप है बिंदु स्वरूप शिव जी का जो बिंदु स्वरूप है वो उन्होंने शिव पुराण में ही शुरू में ही लिखा है ये मेरा जो है ये वाला रूप है निराकार तो और मैं ही उसको तो किसी ने जन्म नहीं दिया ना स्वरूप है हां जन्म नहीं दिया नहीं वो मैं कह रहा हूं वो अवतार लेता है कि नहीं वो जन्म नहीं दिया वो ठीक है वो व्यवहार में ना आ सकने वाला ठीक है अब वो व्यवहार में आ सकने

01:04:42:19 वाला बनता है ना यहां की जो मान्यता है वो है कि परमा परमात्मा जैसे मैं आपको एक बात बताऊं जैसे हमने कहा भगवान शक्तिमान है मान लीजिए और उसने हमें ज्ञान दिया ज्ञान ले देने के लिए उसने एक काया में प्रवेश किया ठीक है तो प्रवेश किया यानी कि एक इनविज़िबल पावर आई और एक शरीर में घुसी और उसको घुसने से कोई रोक नहीं सकता है वो ऐसी पावर है घुस गई ठीक है तो अब क्या है इसका मतलब उसने एक निश्चित देश काल परिस्थिति में एक बिहेव किया है, व्यवहार किया है। तभी तो वह घुसी। हम तो इसके साथ ही साथ जैसे मान लीजिए ब्रह्मा को शक्ति दी तो ब्रह्मा ने यह सरकाया, वो सरकाया, कुछ सरकाया, प्रकृति बनाई, कुछ बनाया। तो वहां पे भी उसकी पावर यूज़ करते हैं ब्रह्मा जी। हम उसकी ईश्वर की। तो यह जो है यानी कि जो ईश्वर है वह चाहे तो किसी के टकराने का विषय बन सकता है और किसी के टकराने का विषय नहीं भी बन सकता है। वह उसके ऊपर है। है ना? जैसे मान लीजिए ईश्वर चाहे तो कुछ धरती इधर से उधर सरक गई। यानी कि धरती के टकराने का विषय ईश्वर बना और नहीं चाहता तो नहीं भी सर की। जैसे आपने कहा सब कुछ कर सकता है वह बात अलग है अवतार

01:05:57:25 पर बात हो रही है तो यानी कि ईश्वर टकराने का विषय बन सकता है तो ईश्वर जब टकराने का विषय बन सकता है तो ईश्वर प्रकाश के मार्ग में टकराने का विषय भी तो बन सकता है सन से जो लाइट आ रही है उसके बीच में भी वह ऐसी बाधा उत्पन्न कर सकता है कि वो लाइट उससे टकरा जाए और जब ऐसा होगा तो वो आंखों का विषय बन जाएगा अवतार हो जाएगा उसका सगुण साकार सगुण निराकार निराकार रहते हुए भगवान चीजों से टकरा रहे हैं अपनी शक्ति के रूप में है ना वह कार्य कर रहे हैं बिहेव कर रहे हैं निश्चित देश काल परिस्थिति में तो जब वह कार्य कर रहे हैं और टकरा रहे हैं तो वो प्रकाश से भी टकरा सकती है और जब टकराएंगे प्रकाश से हम लोग कब किसे देखते हैं हम लोग तब किसी चीज को देखते हैं कि वो उस पर पड़ी और टकरा के वापस हमारी लाइफ अच्छा दूसरी बात है गर्भ से प्रकट होने की तो होता क्या है कि भगवान वास्तविकता में केवल प्रकट मात्र होते हैं मगर व्यवहारिक सत्य हमारा यह होता है कि भगवान ने माता के गर्भ से जन्म लिया कोई कह नहीं व्यवहारिक सत्य क्या है? मां से जन्मे मगर पारमार्थिक सत्य क्या है? भगवान तो वहां प्रकट हो गए। बस वो कोई वैसे उस तरीके से नहीं आए बायोलॉजिकली। वो तो प्रकट मात्र हुए हैं। तो वो खाली प्रकट हो रहे हैं और प्रकट हो रहे हैं परमार्थ की दृष्टि से और व्यवहार की दृष्टि से भगवान का जन्म हो गया। अब व्यवहारिक सत्य क्या है? यह

01:07:12:28 भाई है, बहन है। यह सब व्यवहारिक सत्य है। वास्तविक सत्य क्या है? कि हम तो परमा परमपिता के बच्चे हैं। यह परमार्थिक सत्य है। अच्छा इसको भी हम ठुकरा नहीं सकते। व्यवहारिक सत्य को है ना? जैसे कि मान लीजिए पृथ्वी गोल है। यह क्या हो गया? एक ऐसा सत्य जो हमें थर्ड आई के द्वारा पता है। हमने खुद इसको देखा नहीं है। थर्ड आई सेटेलाइट के द्वारा जो कैमरे लगे हुए हैं उससे हमने देखा कि पृथ्वी गोल है। है ना? और हमारी नजरों से देखा हुआ सत्य क्या है? कि पृथ्वी फ्लैट है। है ना? अब हम बिहेव कैसे कर रहे हैं कि पृथ्वी फ्लैट है। हम किसी को रास्ता यूं बताते हैं क्या? तो हम तो ऐसे ही बताते। तो एक सत्य यह है कि भगवान जन्म लेते हैं। व्यवहारिक सत्य एक पारमार्थिक सत्य है भगवान केवल प्रकट और अप्रकट होते हैं। उसी को भगवान का जीवन लीला इत्यादि सब नाम दिया जाता है। तो ये कुछ बातें थी। तो कुल मिलाकर के अब दोबारा से आ जाते हैं कि भगवान सब कुछ कर सकते हैं पर वो अवतार नहीं ले सकते। ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार। हम्म। अवतार नहीं लेते क्योंकि उनको आवश्यकता नहीं है। भगवानता [नाक से की जाने वाली आवाज़] है। हां वो वही करते वो हो गया। जी जी जी हां वो याद हो गया तो अब बात आ जाती है कि हम ये ऐसा इसलिए मानते हैं ले तो सकते हैं पर वो लेते नहीं है क्योंकि हमें भगवान ने

01:08:28:02 यही बताया है तो अब मैंने आपको बताया कि भगवान ने ये भी बताया है तो इसमें अब दिक्कत क्या है भगवान के अवतार को मानने में देखिए आपने कहानी कथा सुनी होगी जी एक बार पांच सूरदास हम एक स्थान पे गए ठीक है वहां खड़ा था हाथी और किसी ने हाथी का टटोला टटोला हां हाथी का पैर पकड़ा पैर को खंभा समझा किसी को किसी ने पकड़ा किसी ने पूछा तो इसका मतलब आप यह मानते हैं कि आपने कोई एक हिस्सा पकड़ा है तो हम दूसरी बातें भी तो नहीं कह सकते। देखिए भाई वो व्यक्ति है वो व्यक्ति पॉजिटिव नहीं कह सकते तो हम नेगेटिव भी नहीं कह सकते तो न्यूट्रल रहे तो न्यूट्रल है तो हम धर्म कह रहे हैं ना उसे हां न्यूट्रल की बात है ना अरे आप धर्म नहीं तो हम क्या कहें हां वो बिलीफ सिस्टम तो वो लोग भी कहेंगे हिंदू इज अ बिलीफ सिस्टम तो वो तो कह ही रहे हैं तो ठीक है तो वो तो सीधे-सीधे कह रहे हैं धर्म क्या सिखाता है अच्छा दूसरी बात सुनिए तो धर्म ये भी धर्म ये भी देखिए सच बोलना तो सिखाता है सच ये है कि वो धर्म नहीं है अब हम कह रहे हैं कि वो बुरा मान जाएंगे इसलिए हम कहेंगे अच्छा देखिए सच बोलना सिखा सुनिए तो मगर जब फिर से बोला गया 1 मिनट 1 मिनट जैसे आपने कहा कि जैसे आपने यह कहा कि भाई वो वो वो भी कहने लगेंगे इसका मतलब हम वो बात कहते हैं जो कि जिसके कारण उनकी प्रतिक्रिया ना आए।

01:09:43:08 ये बात हो गई। अच्छा जैसे आपने कहा ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। तो ऐसे में जो अवतार को मानने वाले लोग हैं वो भी तो कुछ कह सकते हैं। पर हमने वहां पे तो नहीं सोचा इस बारे [गला साफ़ करने की आवाज़] में। दूसरी बात धर्म क्या होता है? जैसे हमने कहा ना यूनिवर्सल ट्रुथ हमारे धर्म को सनातन इसलिए कहा जाता है देश कृत कालकृत परिस्थिति कृत चालू हो गया हां देश कृत कालकृत परिस्थिति कृत किसी भी बाधा से बाधित ना हो जो हर देश में हर काल में हर परिस्थिति में एक समान रहे उसको सनातन कहते हैं। अब हमने कहा क्योंकि वो प्रतिक्रिया देंगे। इसलिए हम ये नहीं कह सकते कि वो धर्म नहीं है। तो यह बात तो फिर सनातन से अलग हो जाएगी। यूनिवर्सल ट्रुथ तो यूनिवर्सल ट्रुथ देखिए बात ऐसी है। दिक्कत यही है ना। वो आप सही कह रहे हैं दूसरी दृष्टिकोण से मैं आपकी बात को समझता हूं। मगर धर्म के साथ हम खिलवाड़ नहीं कर सकते। धर्म के साथ हम समझौता नहीं कर सकते। 2 2 4 अब कोई कह रहा है 5 1/2 होता है टू 4.5 होता है तो हम नहीं मान सकते ना वो तो 2 2 4 होता है। उसके साथ हम किसी वजह से कि वो ऐसा करेगा वो ऐसा प्रतिक्रिया दे देगा तो हम अपनी चीजों को बदलाव कर दें। बदल दें तो फिर तो उससे दिक्कत आएगा। उससे भटक सकता है व्यक्ति। हम बदलाव ना करें मगर हम बहस ना करें। मतलब हम उसको बदलाव कर रहे हैं ना नहीं हम उसको यह ना प्रूफ बहस ऐसे हो रही है देखिए प्रूफ करने में ना लगे

01:10:58:12 रहे कि देखो मेरी यह मान्यता और तुमको भी यह मान्यता माननी पड़ेगी नहीं नहीं मैं देखिए मैंने तो पहली बात उस चीज को स्किप कर दिया मैं एक बात बता रहा हूं कि हमने बदलाव नहीं किया हम तो मौन है और हमें जो सही लग रहा है हम कह रहे हैं भाई ईश्वर यह है मोक्ष यह है धर्म यह है हमने ये कह दिया यहां पे ये बताया जाता है दुनिया में हर चीज एक्यूरेट होती है सुनिए तो अब क्या है कि ब्रह्मा कुमारी ने मान लीजिए यह कहा कि वह धर्म है। अब उससे क्या हो रहा है कि कहीं जगह कोई जैसे मान लीजिए ब्रह्मा कुमारी का बिलीफ सिस्टम ही सही है। मैं अभी आपकी बिलीफ सिस्टम की बात कर रहा हूं। वो धर्म है। तब भी तो लोग कंफ्यूज होंगे ना। कुरान को धर्म समझने लगेंगे। समझिए मेरी बात को क्योंकि वो अच्छा लग रहा है उन्हें। और वो दोनों उनको पढ़ नहीं पाए पूरा का पूरा कि वो क्या था, क्या नहीं था। अब वो तो ऐसे ही कह रही थी जिससे मुसलमानों को बुरा ना लगे। इसलिए कहा था उन्होंने तो वो इस चीज को जान नहीं पाए। वो जाकर के उसको भी धर्म समझने लगे। उसको फॉलो करने लगे। आप जानते ही हैं आगे क्या-क्या हो रहा है। समझ रहे हैं ना मेरी बात? मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूं कि जैसे किसी लड़की है, बेटा है, बिटिया है, युवा है। उन्होंने मान लीजिए सुना। शिवानी जी को सुना और वो अच्छा लग रहा है। शिवानी जी के प्रवचन अच्छे लग रहे हैं उन्हें और उन्होंने इस्लाम भी धर्म है। अब वो शिवानी जी को तो जान नहीं पाई। पर उन्होंने यह सुन लिया था कि धर्म

01:12:13:18 है। पूरी तरीके से जान नहीं पाई। और धीरे-धीरे उनकी जो मेंटालिटी थी वो यह चीज नहीं जान पाई कि शिवानी दीदी ने तो ऐसे ही कह दिया था जिससे कि उनको बुरा ना लगे। यह चीज है। तो वहां पे आ जाते हैं जहां पे हमारा चल रहा था सर्वशक्तिमान वाला कि फिर जैसे ये स्क्रिप्चर्स की बात चल रही थी कि भगवान जो है कर तो सकते हैं करते नहीं है। तो ये जो बात है कि करते नहीं है। हमने आपको स्क्रिप्चर्स के भी उदाहरण दे दिए और फिर दोनों तरह के वचन क्यों आए हैं वो भी आपको बता दिए। फिर अवतार को मानने में क्या दिक्कत आ रही है? मतलब कहने का मतलब यह है मैं ये जानना चाह रहा हूं कि आपका कोई और भी स्क्रिप्चर है इस वेद इत्यादि के अलावा क्योंकि वेद में तो दिया गया है। पुराणों में भरभर के दिया गया है। गीता में भरभर के दिया गया है। तो इसलिए मैं जानना चाह रहा हूं कि क्यों आप ऐसा कह रहे हैं कि अवतार नहीं लेता। हम लोग क्या-क्या जो स्क्रिप्चर है उसको मुरली कहते हैं। हां मुरली तो मुरली आपका स्क्रिप्चर है। इसलिए आप ऐसा कह रहे हैं कि जो है वो अच्छा तो मुरली भगवान सोच समझ के बताते हैं। आपको देते हैं स्क्रिप्चर के रूप में कैसे? मुरली क्या है? वास्तव में जो लोग जिनको ब्रह्मा बाबा कहते हैं हम उनके तन के द्वारा परमात्मा शिव जो निराकार है

01:13:28:21 उन्होंने जो भी वाक्य महावाक्य उच्चारण किए उसको ही मुरली कहते हैं। तो ये जो मुरली है ये भी दो प्रकार की है। एक साकार मुरली है और एक अव्यक्त मुरली है। तो साकार मुरली वो है जब ब्रह्मा बाबा थे यानी 1936 से ले 1969 तक जो उनके मुख से मतलब लेखराज जी जिनको आप ब्रह्मा कहते हैं उनके द्वारा जो महावाक्य उच्चारण किए वो साकार मुरली है और 1969 से ले 2017 तक जो हृदय मुनि दादी के द्वारा जो परमात्मा ने महावाक्य उच्चारित की उसको अव्यक्त मुरली कहते हैं। तो ये ब्रह्मा कुमारी का पूरा ज्ञान है। जिसके आधार पे यहां की क्लासें मेडिटेशन इसका मतलब यह माना जाए कि वेद में कुछ भी लिखा है वो तब मतलब उसके इत भी यदि मुरली जा रही है तब भी हम जो है मुरली को ही मुरली की बात को मानेंगे और वेद की बात अगर मुरली के विरुद्ध है तो हम वेद को वहां पर महत्व नहीं देते हुए मुरली में हर बातों का स्पष्टीकरण वेदों का भी उपनिषद नहीं वेद वेद उपनिषद और यहां पे मैं ये कह रहा हूं कि जैसे वेद में दिया गया भगवान अवतार लेते हैं पर मुरली आपको बता रही नहीं लेते परकाया प्रवेश ही करते हैं तो आप ब्रह्मा कुमारी के अनुसार फिर वो मुरली ही श्रेष्ठ है वहां पर आप वेद को छोड़ देंगे ऐसा माने

01:14:44:12 वेद उपनिषद पुराण तो बहुत पढ़े और साथ ही साथ जिसने जैसा स्पष्टीकरण वो हमने माना ना आज वेद उपनिषद पुराण में भी जो चीजें लिखी है तो वो भी तो आधारित किसी के स्पष्टीकरण पे ही है कि उसने किसको किस तरीके से हमें बताया पढ़ाया सिखाया मैं कह रहा हूं वेद में लिखा है कि वेद पढ़े पूरे हां तभी उसका हर चीज़ का स्पष्टीकरण बिल्कुल हर चीज़ का स्पष्टीकरण आप पूछ सकते हैं। बात यह है वेद में भाई मैंने पढ़े हो ना पढ़े हो वो तो एक अलग मैटर है। मगर बात ये कह सकते हैं स्पष्ट ये बोल सकते हैं कि अगर एक लाइन भगवान ने लिखी मैं अभी उस पे आ रहा हूं। भगवान ने लिखी। इसका मतलब मुरली भगवान ने लिखी इसलिए आप मानते हैं। अच्छा आप आपने देखा है वो मुरली आते हुए आपके पास। आपको कैसे मिली वो मुरली? क्या? वो मुरली आपको कैसे मिली? अव्यक्त मुरली तो हमने लाइव सुनी। भगवान की मुरली आपने लाइव सुनी है। भगवान को बोलते हुए आपने लाइव देखा है कि ब्रह्मा जी को बोलते हुए देखा है। जब गुलजार दादी के तन में आते थे। गुलजार दादी के तन में आते थे। वो आपने अपनी आंखों से देखा। मगर कई ऐसे भी लोग होंगे ना जो उनकी मुरली को लिख के उनके पास प्रिंट मीडिया में आ रही होगी। किसी तरीके से आ रही होगी। वो उसी समय जैसे बाबा बोलते हैं वो तुरंत का तुरंत शब्द द

01:15:59:27 लिखा जाता है। शब्द शब्द। अच्छा इसको क्लियर कर लेते हैं। इसका मतलब आपका क्वेश्चन है कि वेद भगवान ने नहीं लिखे हैं। इसलिए हमारा वेद से आगे भगवान का वाक्य प्रमाण्य हो जाता है। तो वही मेरा क्वेश्चन है कि जब मुरली कुछ कहेगी और वेद वेद जो है इधर जा रहे होंगे। हम वहां पे वेद को स्वीकार नहीं करते। हम लोग किसी चीज के स्वीकार ना स्वीकार्य की बात नहीं करें। हम लोग यह बात करें कि जिस चीज में हमें हमारा मन मानता है जिससे हमें शांति मिलती है जिस अच्छा यह बताइए स्वीकार ना स्वीकार की बात कैसे नहीं करेंगे आपने बोला ना कि शांति चाहिए इस चीज को स्वीकार करते हैं कि नहीं करते स्वीकार कर लिया इसका मतलब स्वीकार और अस्वीकार है ना दुनिया में जैसे मान लीजिए हम ये कहें कि हम ये मान रहे हैं तो हम वो नहीं मानते हमें ये लाइफस्टाइल पसंद है तो हम ये मान रहे हैं तो जब आप एक लाइफस्ट मतलब ये केवल एक मान्यता है ये ट्रुथ नहीं है फिर ऐसा मान रहे मान रहे मतलब हर व्यक्ति हर कुछ मान रहा है और उसका माना हुआ उसके हिसाब से तो सत्य ही है। नहीं तो हमारे हिसाब से तो चोरी कर रहा है वह गलत है ना। आपके हिसाब से गलत है। उसके हिसाब से गलत ही है। उसके हिसाब से उससे जब उससे जब उससे जब बात होगी तो वो सिद्ध हो जाएगा। जैसे मान लीजिए यहां पे एक देखिए हम उस सत्य की बात कर रहे हैं जो यूनिवर्सल है जो सनातन है। उसके हिसाब

01:17:15:01 से अगर वह मान भी रहा है उसको सत्य तो वो उससे हमें क्या मतलब? हमारा सत्य तो सनातन है ना या हमारा केवल बिलीफ है। वही तो मैं पूछ रहा हूं। देखिए यूनिवर्सल जो है वह माने ना माने हम उसको हम उससे मतलब मजबूर नहीं कर सकते कि तुम मानो। हां मैं कहां मजबूर पूछ रहा हूं? मैं पूछ रहा हूं। आपका बिलीव क्या है? हो सकता है वो व्यक्ति कहे कि नहीं चोरी करना ही सही हो तो आप क्या कर सकते हैं? वो वो यूनिवर्सल ट्रुथ नहीं है ना। आपके हिसाब से ना वो माने कि नहीं ये सही है। तो मैं किसी का हिसाब थोड़ी ना पूछ रहा हूं। ब्रह्मा कुमारी अनुसार यूनिवर्सल ट्रुथ क्या है? मुरली या वेद मैं ये पूछ रहा हूं। जो आपको सही लगे आप उसको मानो। मतलब जो जिसको सही लगे उसको मानना चाहिए। हां उसको करना चाहिए। हमें किसी के तो यानी कि अगर अगर कोई व्यक्ति हमारे आसपास ऐसे निठारी हुए हम लोग जैसे कहते हैं कि हमने ये नहीं जैसे कोई जैसे आपने चोरी का ही वो लिया उदाहरण तो सुनिए तो जैसे आपने चोरी का ही उदाहरण लिया और आपने कहा कि वो उसके हिसाब से सही है। तो आप जब वो चोरी कर रहा होगा आपकी संपत्ति तो उसे रोकोगे ना हम क्योंकि वो सही नहीं कर रहा। आपके पास अधिकार है सही ना जो सही ना हो रहा हो उसको रोकने का। हम नैतिक अधिकार है मौलिक तो उसको रोकोगे ना आप हम है ना वही पूछ रहा हूं फिर क्यों रोकोगे जब वो सही कर रहा है तो

01:18:30:09 देखिए कोई चोरी कर रहा है उसको रोकना ठीक है मगर आप उसके दिमाग में ये नहीं बैठा सकते मैं ये नहीं कह रहा हमें बैठाना क्या है मैं पूछ रहा हूं चोरी करना गलत है कि नहीं आपने कहा कि वेद आपके हिसाब से राइट नहीं है और मुंडी राइट है मेरा ये नहीं कहना कि क्या राइट है क्या रॉन्ग है मेरा ये कहने का मतलब है कि हर व्यक्ति जिस चीज को मान रहा है। उसके हिसाब से वो राइट है। हम यह नहीं कह रहे कि यही राइट है वही रॉन्ग है। हम ऐसा नहीं कह रहे। नहीं बात यह है। अभी शुरू में हमने कहा था कि धर्म वो है जो मोक्ष दिलाएं। अब यदि भगवान अवतार लेते हैं ये बिलीफ मोक्ष दिलाने वाला बिलीफ है या भगवान पर काय प्रवेश करते हैं अवतार नहीं लेते। ये बिलीफ मोक्ष दिलाने वाला बिलीफ है। यदि तो फिर अह हमको ये कहना पड़ेगा कि भाई जो अवतार लेने वाला बिलीफ है वो मोक्ष नहीं दिलाएगा। हमको कहना पड़ेगा ना। साफ सुथरी बात कहनी पड़ेगी जिससे कि धर्म की स्थापना हो। चलिए खैर काफी सारी चीजें हो गई। अभी एक लास्ट चीज आ जाती है। आपने कहा कि भगवान ने लिखे कि नहीं लिखे। तो यानी कि हम यह मानते हैं कि यह भगवान ने स्वयं बोले हैं। इसलिए मुरली पे हमें बहुत ज्यादा श्रद्धा है। ठीक है? तो अब एक बात आती है। हमने कहा था कि भगवान चाहे तो सब कुछ कर सकता है। है ना? तो भगवान तो फिर झूठ भी बोल सकता है। उसकी सामर्थ्य तो है झूठ बोलने

01:19:45:13 की। है ना? तो फिर हम फिर यह बिलीव कैसे करें कि जो भगवान हमको बोल रहे हैं वह सत्य ही बोल रहे हैं। जैसे कि मान लीजिए कुछ भी दुनिया में भगवान के बिना हो ही नहीं रहा है। भगवान की शक्ति से हो रहा है। वो झूठ इसलिए नहीं बोल सकते क्योंकि वो सत्यम शिवम सुंदरम सत्य स्वरूप है। तो यानी कि वो सब कुछ नहीं कर सकते। सब कुछ नहीं कर सकते ना। तो आप इसको दूसरे वे में ले रहे हैं ना कि आप एक तरफ कह रहे हैं कि वो सब कुछ नहीं कर सकते। मतलब हम लोग अपने जो मनुष्य के विकारों से अभी हम कहे कि वो विकार में जा सकते हैं वो विकारी बन सकते हैं। वो लोभी बन सकते हैं। तो हम विकारों से भगवान को क्यों छोड़ेंगे कि एक तरफ वो जैसे आपने कहा ना भगवान कर सब कुछ सकते हैं पर लीला रूप में वो जो है अपने ही नियमों के नीचे बाधित होकर प्रस्तुत होते हैं। है ना यानी कि लीला में वो कर सकते हैं। वो ड्रामा के बंधन में बंधे हैं और वो अपनी पोजीशन में ही रहकर हर कार्य करते हैं। वो अपनी पोजीशन से नीचे आके कोई भी कार्य नहीं कर सकते। नहीं आपने झूठ की बात बोली तो वो झूठ बोल सकते हैं। क्या ये झूठ बोलना भगवान की पोजीशन को शोभित है? मैं बता रहा हूं कैसे शोभित नहीं है कि ये सब कुछ एक ड्रामा है। वास्तविकता नहीं है। ठीक है? माया है। प्रपंच रूपी संसार है। वास्तविकता में ना कोई मर रहा

01:21:00:16 है ना कोई मार रहा है। जो थे वह सब उन्होंने भगवान ने कहा ना गीता में। तो वास्तविकता में क्या है? हम लोग वो हैं जो यह सोच रहे हैं कि वाकई में मुझे दर्द हो रहा है। वाकई में मैं मर रहा हूं। वाकई में यह झूठ बोल रहा है। वाकई में कुछ गलत हो रहा है। कुछ सही हो रहा है। अच्छाई और बुराई इनसे परे ईश्वर क्यों है? अच्छा एक नास्तिकों के द्वारा एक काउंटर आता है कि भाई अगर ईश्वर है तो वो मरा क्यों? भगवान चाहे तो रोक सकता है। मगर वास्तविकता में ना कोई मर रहा है ना कोई मर रहा है। वो एक केवल ड्रामा है। एक प्रपंच रूपी संसार है। तो ऐसे में भगवान के लिए कुछ अच्छा बुरा है ही नहीं। वो तो जानता है ये पगले लोग हैं। ये बंधन में है। ये लोग इस ड्रामे को सत्य समझ रहे हैं और ड्रामे से मुक्ति पाना ही मोक्ष है। ठीक है? तो वो सत्य समझ रहे हैं इसको। तो जब भगवान को ये मालूम है ये कुछ गलत है ही नहीं। ऊपर नीचे कुछ है ही नहीं। सब कुछ माया शून्य है। ब्रह्मे तन गंतव्यम ब्रह्म कर्म समाधिन यह चार 24 भगवत गीता तो भगवान के अनुसार तो भगवान जानता है कि ये सब माया है। तो भगवान के नजरों में ना कुछ अच्छा है ना कुछ बुरा है। तो अगर ऐसी सिचुएशन में भगवान आकर के यूं ही कुछ करके दिखा भी दे जैसे पिता घोड़ा बन के दिखा दे। बच्चा रो रहा है खामखा की चीज के लिए और पिता भालू बन करके दिखा दे। उससे उसका नीचे आना सिद्ध

01:22:15:20 नहीं होता। बल्कि यह सिद्ध होता है कि वह भालू बनके दिखा सकता है। यह सिद्ध होता है। तो कहने का अर्थ है कि अच्छाई और बुराई का अस्तित्व हमारे लिए है। भगवान के लिए नहीं है। भगवान के लिए सब कुछ ड्रामा मात्र है। शून्य कुछ नहीं है अच्छा बुरा। तो इसलिए भगवान झूठ भी बोलेगा हमारी नजरों में। भगवान कुछ नहीं कर रहा है। वो झूठ भी हमारे लिए है। तो इसलिए हमें जो वो वाला दोष है ना भगवान पे नहीं लगेगा। और अगर हम ऐसा मान लेंगे तो वो नास्तिक वाला जो चीजें हैं कि भगवान है तो हत्या क्यों हो रही है ये सब लग जाएगा। ये चीजें हैं और ठीक है बहुत सारी चर्चाएं हमारी हो चुकी है। मेरा कहने का मतलब यह था कि वेद जो है वो अपौषय हैं। अपौषय मतलब स्वास रूप में हमें हमारे ऋषियों को प्राप्त होते हैं। वेद शायद यह ऋग्वेद में आया है। है ना? ऋग्वेद में नहीं ब्रदरिक उपनिषद में वेद जो है स्वास रूप में होते हैं। स्वास का मतलब यह होता है कि हम दो प्रकार के कार्य करते हैं। एक जो हमारे स्वभावगत कार्य हैं। वह हम चाहे भी मतलब हमारे बिना इच्छा के ही वह हो रहे हैं। उसमें हमारा बुद्धि का प्रयोग नहीं होता है। और दूसरे कार्य होते हैं इसमें हमारे बुद्धि का प्रयोग होता है। जिसमें हम प्रयास पूर्वक हम कुछ करते हैं। तो जब हम प्रयास पूर्वक हम कुछ करते हैं तो हम चाहें तो जैसे मान लीजिए मेरे सामने दो

01:23:30:21 लोग हैं। मैं चाहे तो इनको बुलाऊं, मैं चाहूं तो इनको बुलाऊं। ठीक है? और जो मेरे स्वभाव सिद्ध कार्य हैं वह मैं उसमें कोई बुद्धि नहीं है। अपने आप हो रहा है। जैसे मैं सांस ले रहा हूं। बच्चा माता के गर्भ से जन्म ले रहा है। सांस ले रहा है। तो भगवान के से जो वेद प्राप्त होते हैं हमारे ऋषियों को ब्रह्मा जी को सर्वप्रथम होते हैं। तो वो प्राप्त होते हैं। अपौषय ग्रंथ सनातन ग्रंथ को कभी लिखा नहीं भगवान ने। अपौष है स्वास रूप में प्राप्त होते हैं। स्वास रूप मतलब कि भगवान ने प्रयास पूर्वक नहीं दिए हैं। बुद्धि पूर्वक नहीं दिए हैं। बिना बुद्धि के जो स्वभावगत कार्य है उसमें उनको वेद प्राप्त इसलिए सनातन धर्मियों के हिसाब से वो जो वेद है वो फाइनल अथॉरिटी इसलिए शब्द प्रमाण अंतिम क्योंकि वो अपौरुष है और बाद में जितनी भगवत गीता रामायण वो सब क्योंकि वेद सम्मत चलती है तो इसलिए वो जो है हमारे लिए मान्यता जाती है। मनुस्मृति का एक कोट किया है। रामायण में श्री राम ने कि जो अह मनु महाराज के संविधान को मानते हैं और मनुस्मृति में लिखा है कि वेद विरोधी नास्तिक वेद के एक भी मंत्र को जो वो कर दे विरोध कर दे एक भी मंत्र को छोड़ दे कि मैं नहीं मानता तो वो उसको नास्तिक तक कह दिया है। यानी राम जी ने नास्तिक माना है वेद को ना मानने वालों को जगह-जगह पे इसका विवरण है। तो क्योंकि वेद अपौरुष है।

01:24:45:25 अब क्योंकि हमने कहा कि भगवान सर्व सामर्थ्यवान है। यहां पे वो कुछ भी कर सकते हैं। तो हमने यह भी माना जैसे लीला की उन्होंने हमारी जो सनातन की जो शंकराचार्य परंपरा है रामानुजाचार्य परंपरा है उसमें भगवान लीला करते हैं। तो लीला करते हैं तो भगवान ने मोहिनी का रूप भी लिया छल कर दिया। है ना? कई जगह भगवान ने ऐसी लीलाएं की उसमें उन्होंने असत्य भी बोल दिया। तो इसलिए भगवान जब डायरेक्ट खुद हमें कुछ कहेंगे वो हमारे लिए मान्य नहीं है। इसी कारण से बुद्ध के अवतार में उन्होंने यज्ञों से दूर करने के लिए यज्ञों का विरोध किया। दशावतार में से एक मगर हमने बुद्ध को नहीं माना। हमने जितने अंशों में उनको भगवान तो माना मगर हमने जो है उन्हें दूर से प्रणाम किया और हमने जो है वेद को ही सर्व क्योंकि वेद अपौरुष है। अपौष इस कारण से वेद हमारे लिए सुपीरियर अथॉरिटी हो जाते हैं। खैर तो बहुत सारी चर्चा हो गई है और भैया ने बहुत सारा भाई जी ने समय दिया ब्रह्मा कुमारी की ओर से और बहुत-बहुत धन्यवाद आपको।

01:26:00:24 [संगीत]

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 1:26:02 · 26 Apr 2026

ब्रह्माकुमारी के सिद्धांतों पर सारगर्भित चर्चा #ब्रह्माकुमारी #BrahmaKumaris #BK

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