⬜ Not used yet · 00:00:02:18 – 00:34:14:00 (34:11)
00:00:02:18 [घंटी की आवाज़][संगीत] मुख्य विषय पर बाबा की सन्यास और गृहस्थ के विषय में बाबा मुझे लग रहा है कि आज तक समझ नहीं पाया कि उसको चूज किसे करना है, विरक्तता को चूज़ करना है या फिर गृहस्ती को चूज़ करना है। इसलिए बाबा ने ऐसा इसमें अह क्या कहेंगे भाई? पंचर कर देने वाला ज्ञान दिया है। दिमाग को पंचर कर देने वाला ज्ञान कि आप फिर से झंडू बाब इत्यादि ले लीजिए हाथ साथ में। तो भैया बाबा सबसे पहले मैं संक्षेप में बता दूं बुलेट पॉइंट स्टार्ट हो रहे हैं यहां से कि सबसे पहले बाबा कहता है कि कर्म सन्यास या फिर कर्म सन्यास दो है। एक घर में रहकर हठ पूर्वक इंद्रियों पर संयम रखते हुए व्यक्ति रहे वो भी कर्म सन्यास है और या फिर वह जंगल में जाकर के रहे वो भी कर्म सन्यास है। और ये दोनों शास्त्र विरुद्ध है। अब देखते जाना बाबा ने क्या रायता फैलाया है। अब देखो इसके बाद कर्म योगी क्या है? कर्म योगी वो है जो घर में शास्त्र विधि पूर्वक भक्ति करे। यहां पे इंद्रियों का
00:01:17:22 निग्रह नहीं है। बस वो शास्त्र विधि पूर्वक भक्ति करे। यानी कि वह अगर नाम जप कर रहा है शास्त्र विधि पूर्वक कुल मिलाकर के एक ही बात है। नाम जप यानी कि वह यदि भक्ति कर रहा है तो वो घर में रह के कुछ भी कर रहा हो वो जो है कर्म योगी कहलाएगा। भले ही वह चोर हो। चोर कैसे सिद्ध होता है? क्योंकि यह पेज नंबर 103 पर यही कहते हैं आगे कर्म योगी के बारे में बताते हुए कि जो व्यक्ति शास्त्र विधि के शास्त्र विरुद्ध तरीके से भी घर पर रह के और जो है अ क्या लिखा है 103
00:02:02:16 हम दूसरी प्रकार के कर्म योगी वह होते हैं जो बाल बच्चों में रहते हैं तथा शास्त्र साधना शास्त्र विधि विरुद्ध करते हैं। यानी कि शास्त्र विधि विरुद्ध जो साधना कर रहे हैं वह भी कर्म योगी हैं। और शास्त्र विधि सहित जो साधना कर रहे हैं वह भी कर्म योगी हैं। तो अब अगर यह कहें ये लोग यानी कि सबसे पहले क्या सिद्ध हो गया कि व्यक्ति यदि रामपाल से नाम दीक्षा लेकर के चोरी भी कर रहा है। चोरी कर रहा है, व्यभचार कर रहा है, बलात्कार कर रहा है, कुछ भी कर रहा है। जैसे कि झूठ बोलना इत्यादि जो राघव दास इत्यादि अभिषेक का अभी हमने देखा तो यह लोग भी कर्म योगी हैं बाबा के जो राइफल लेकर खड़े होते हैं इनके यहां पर जो पकड़े जाते हैं जिन पर देशद्रोह का मुकदमा लगता है। ये सब ये सब जो है कर्म योगी है क्योंकि इन्होंने बाबा से नाम दी इच्छा ले रखी है। तो आपको अपने नाम के साथ कर्म योगी लिखने लगो। अब अच्छा लगेगा अलंकारिक। तो यह सब कर्म योगी है बाबा के अनुसार। शास्त्र विधि के अनुसार घर में रहकर साधना करने वाला उसको इंद्रिय निग्रह नहीं करना है। केवल शास्त्र विधि के अनुसार यदि वो घर में रह के वो कर रहा है तो भी वो कर्म योगी है।
00:03:17:20 और शास्त्र विरुद्ध अगर वह घर में साधना कर रहा है तब भी वो कर्म योगी है। यह बाबा का ज्ञान है। ठीक है? और ऊपर क्या कह रहा है कि कर्म सन्यास वो है जिसमें कि शास्त्र विरुद्ध कर्म सन्यास वह है जो घर में रहे या जंगल में जाकर रहे मगर वह शास्त्र विरुद्ध है। कर्म सन्यास दो प्रकार का होता है। एक सन्यास तो वह होता है जिसमें साधक परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर त्याग कर हटकर के जंगल में बैठ जाता है तथा शास्त्र विधि रहित साधना करता है। यह भी कर्म सन्यास है। शास्त्र विधि रहित भी कर्म सन्यास है। शास्त्र विधि रहित कर्म सन्यास भी है। शास्त्र विधि रहित कर्म योग भी है। सब कुछ है। शास्त्र विधि रहित कर्म योग भी है। और शास्त्र शास्त्र विधि के अनुसार भी कर्म सन्यास भी है। शास्त्र विधि के अनुसार भी कर्म योग भी है। यह इस बाबा का ज्ञान है। तत्व ज्ञान सब कुछ है। सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। देखो ध्यान से सुनो। कर्म सन्यास दो प्रकार के होते हैं। एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर त्याग कर हट करके जंगल
00:04:32:26 में बैठ जाता है तथा शास्त्र विधि रहित साधना करता है। दूसरा घर पर रहते हुए भी हठ योग करके घंटों एक स्थान पर बैठकर शास्त्र विधि त्याग कर साधना करता है। यह दोनों ही कर्म सन्यासी हैं। यानी कि कर्म सन्यासी कौन है? जो शास्त्र विरुद्ध चल रहा है। ठीक है? अब जब कर्म योगी की बात आएगी तो कम से कम कर्म योगी को तो शास्त्र विधि के अनुसार चलने वाला मानना चाहिए ना। मगर कर्म योगी में शास्त्र विधि के अनुसार यह दोनों काम करें जंगल में रह के या घर पर रह के वह भी कर्म योगी है और फिर कर्म योगी वो भी है जो शास्त्र विधि विरुद्ध ये दोनों काम करे जंगल में रह के या घर पर रह के अरे कहना क्या चाहते हो कर्म योगी और कर्म सन्यासी में कोई अंतर नहीं है ये कहना चाहते हो और शास्त्र विधि में और शास्त्र विरुद्ध में कोई अंतर नहीं है ये कहना चाहते हो बाबा जी कहना क्या चाहते हो नहीं पता आगे देखिए इसका का क्या मामला होता है? एक इन्होंने वो बहुत फैलाई हुई है। ज्ञान गंगा का मैं एक पेज बता रहा हूं। वो आप निकालिए।
00:05:40:19 196 देखिए इस बाबा ने कितना तत्व ज्ञान दिया है। 196 197 पेज नंबर ज्ञान गंगा निकालिए। ठीक है? तब तक मैं पढ़ रहा हूं। तो कर्म योगी का समझ लिया आपने यानी कि कुल मिलाकर बाबा के अनुसार शास्त्र विधि के अनुसार करने में और शास्त्र विरुद्ध करने में कोई अंतर नहीं है और ना कर्म सन्यास में कोई अंतर है ना कर्म योगी में कोई अंतर है क्योंकि शास्त्र विधि द्वारा पूजा करने वाले को भी यह कर्म योगी कर्म सन्यासी दोनों कह रहा है और शास्त्र विधि विधि विरुद्ध शास्त्र विधि के अनुसार चलने वाले को कर्म सन्यासी कर्म योगी दोनों कह रहा है और शास्त्र विधि विरुद्ध चलने का चलने ने वाले को भी यह कर्म योगी और कर्म सन्यासी दोनों कह रहा है। ठोको ताली। ठीक है? अब यह तो इसकी खिचड़ी हमने देख ली। अब हम देखते हैं एक इनके द्वारा बहुत एक बात फैलाई जाती है। रुचि ऋषि की जो कथा है 197 पेज नंबर एक बहुत बड़ा खुलासा होने वाला है रुचि ऋषि को लेकर के यहां पर। तो आप चाहे तो यहां से कट लगा लें। एक घंटा 20 मिनट दिखाई दे रहा है। तो यहां से रुचि ऋषि वाले चैप्टर को आप लोग लेकर के डालिए। रुचि ऋषि के बारे में क्या किया है?
00:06:54:14 गीता ज्ञान ये श्राद्ध क्या श्राद्ध का विरोध कर रहा है यहां पर ये पेज नंबर 215 हां शास्त्र विधि विरुद्ध इसमें नीचे चलिए नीचे चलिए इसमें आएगी रुचि ऋषि की कथा श्राद्ध वाला आया कोई और आगे चलिए ऊपर जाइए ऊपर हां हां हां हां हां हां हां नीचे नीचे नीचे नीचे जाइए ये इसी का प्रमाण मार्कंडेय पुराण में मार्कंडेय पुराण में निकलता है जिसमें कि एक रुचि नाम का साधक ब्रह्मचारी रहकर वेदों के अनुसार साधना कर रहा था देखिए ब्रह्मचारी रहना वेदों के अनुसार मान लिया इसने पहली बात तो ब्रह्मचारी का मतलब क्या हुआ ब्रह्म के लिए आचरण करने वाला ठीक। तो ब्रह्म के लिए जो आचरण कर रहा है वेदों के अनुसार है आचरण यानी कि वेद विरुद्ध भक्ति नहीं है। अब यहां पर क्या है कि वो विवाह नहीं करना चाहते। इसका मतलब वो विरक्त है। तो यहां अभी क्या कह रहा है कि जो सन्यास होता है जंगल में जाकर के सन्यासी बनता है। वो जो है गलत है। ठीक है?
00:08:10:07 उसको यह गलत कह रहा है। और मार्कंडेय पुराण में जब पितर उसको कह रहे हैं अपने पुत्र को प्रकट हो के कि भाई तू विवाह के मार्ग पर चल। विवाह के द्वारा होते हुए भी अगर तू अनासक्त भाव से संयम पूर्वक धर्म का निर्वाह करते हुए यदि तू वहां गृहस्ती का निर्वाह करेगा तब भी तू मुक्त हो जाएगा। यह पितर वहां पर कह रहे हैं तो यह उनका खंडन कर रहा है कि देखो एक व्यक्ति वेद विरुद्ध वेद के अनुसार चल रहा था तो उसके पितर आकर के उसको गलत दिशा में ले जा रहे हैं। उसका विवाह करवा रहे हैं। यानी कि विवाह करने की शिक्षा गलत है। रुचि ऋषि वाले प्रकरण में रामपाल ने यह माना है। और फिर यहां पे बार-बार कह रहा है कि विरक्त रहना गलत है और ब्रह्मचारी आजीवन रहना गलत है। जो विवाह करके जो चलेगा और वो नाम दीक्षा लेकर के जाप करते हुए वो सही है। वो बात और है कि उसमें आगे उसने ये भी माना कि चोरी भी करेगा वो भी सही है।
00:09:09:27 कर्म योगी कहा है उसको इसने। तो यह इसकी खिचड़ी है। अब देखिए अब इसको इसी किताबों से पहले दिखाता हूं कि इसने यहां पर यह कहा है कि पितर अगर तुम्हें विवाह करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि तुम जो है विवाह कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए गृहस्थ होते हुए भी तुम जो है वहां आगे पहुंच सकते हो। क्रमिक अभिव्यक्ति हो सकती है तुम्हारे जीवन में। क्रमिक विकास हो सकता है अध्यात्म का। तो यह पितर समझाने का प्रयास वहां पर कर रहे हैं रुचि ऋषि को। तो यह वहां पर पितरों का खंडन करने के लिए कह रहा है कि देखो देखो वो वेद के अनुसार चल रहा था तो यह उसको वेद के विरुद्ध ले जा रहे हैं। ठीक पितर पितरों को गलत साबित करने उसके चक्कर में खुद ही को गलत साबित कर लिया। इसका मतलब इसके अनुसार मार्कंडेय पुराण की जो रुचि ऋषि की कथा है उसमें इसने माना है कि विरक्तता ही सही है और जो गृहस्थ वाला आश्रम है वो गलत है। विवाह करना गलत है। अब यह जगह-जगह पर अपनी इस बात का खंडन करता है। देखिए कहां-कहां पे करेगा।
00:10:10:14 [गला साफ़ करने की आवाज़] कहां-कहां पर करेगा पेज पेज नंबर 36 निकालिए पेज नंबर 36 इसी का गरिमा गीता की पेज नंबर 36 में इस व्यक्ति ने विरक्तता को सही भी माना है और गलत भी माना है। जैसे मार्कंडेय पुराण में विरक्तता को सही माना है। तो पेज नंबर पेज नंबर 33 पहले 33 निकालिए। 33 तो पेज नंबर 33 में यह जो है फिर से
00:11:06:19 सन्यास का समर्थन कर रहा है। पेज नंबर 33 इतनी ज्यादा बेईमानी की है ना इस व्यक्ति ने। इतनी ज्यादा इतनी ज्यादा भ्रष्टता इतनी ज्यादा धूर्तता इतने झूठ बोले हैं कि उसमें यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि शुरू करें तो कहां से करें? किसको पकड़ के बात करें? किस बात को पकड़ के बात करें? यह निर्णय करना कठिन हो जाता है। इतना झूठ भरोसा है इसमें। सब कुछ कह दिया भाई। ए बी सी डी एफ जी एच आई जे के एल एम एन ओ पी क्यू आर एस टी यू वी डब्ल्यू एक्स वाई जेड। तो यह जब एप्पल की स्पेलिंग पूछी गई किस अक्षर से शुरू होती है तो मैंने पूरी ए बी सी डी पढ़ दी। उसी तरीके से इस बाबा ने हर चीज बोल दी जिससे कि कोई भी चीज मेरी सब कुछ मान ले। मैंने तो यह भी बोला है। तो इसने जो है घर गृहस्ती को जो है विरोध किया है। सन्यास को माना है रुचि ऋषि की कथा में। तो अब सबसे पहले तो हमने वहां पर देख लिया पृष्ठ संख्या 103 पे इसने ग्र गृहस्ती को श्रेष्ठ माना है और कर्म जो सन्यास है उसको जो है गलत माना है वहां पर वो ऐसे ही विरक्त हो के रह रहे हैं रुचि ऋषि तो उनको सही कह रहा है और यहां पर कह रहा है कि ऐसे रहना जो है वो गलत है घर में रहो घर में रह के इंद्रिय निग्रह
00:12:21:20 मत करो इंद्रिय निग्रह मतलब अपने आप को संयमित रखने का प्रयास मत करो बस भक्ति करो यानी कि रामपाल ऐसे ही रहता होगा बबिता इत्यादि ऐसे ही रहता होगा। वहां पर संयम की आवश्यकता कोई नहीं है। इसीलिए ऐसे कह रहा है। इसीलिए जो वीडियो का टाइटल है वो यह रखा गया कि भाई क्या काम वासना अभी भी बाकी है या अभी जो शारीरिक बदलाव होते हैं, वृद्धावस्था आ जाती है। उसमें जो है कई विषयों को लेकर के असामर्थ्यता आ जाती है। उसके कारण क्या वो चीजें नहीं है कि अभी भी वही है क्योंकि इसके लेख को देख के ऐसा लगता है गरिमा गीता की में जो इसने वो हुआ दिया है ज्ञान तत्व ज्ञान उससे ऐसा समझ में आता है कि इस इसका जो चरित्र है ना वो समझ में आता है इसका खुद का चरित्र कैसा है कभी यह सोचता है कि विरक्त हो जाओ कभी ये सोचता है गृहस्थ हो जाओ कभी यह सोचता है कि इंद्रियों का निग्रह करो कभी यह सोचता है ना करो तो जब ये पढ़ाने बैठता है तो करो इंद्रियों विषयों का इंद्रियों का निग्रह मगर जब ये जो है घर जाता होगा या फिर जो इनके जो कुछ क्या-क्या मिले थे कोई कोई कहता है गुफा है मीडिया में ऐसा कुछ बताया गया कि इसका कुछ अपना एक कमरा था तो उसमें जाता होगा तो इंद्रियों का निग्रह मत करो ये सब चीजें शायद होती होंगी जिस कारण से इसने बार-बार अपनी ही बात को काटा है। रुचि ऋषि में इसने सन्यास
00:13:37:01 का समर्थन और गृहस्थ का विरोध किया है। अब यह क्या कह रहा है? सबसे पहले तो पृष्ठ क्रमांक 103 पे इसने सन्यास का विरोध और गृहस्थ जीवन का समर्थन किया है। हालांकि जो संयमित जीवन के अनुसार और शास्त्रोचित जो निर्देश दिए गए उनके अनुसार चलने पर हमारी गीता हमारे शास्त्रों के अनुसार दोनों ही मार्ग फलदायक है। ये गीता में भी लिखा हुआ है। मगर इसने जो है क्या किया है? सन्यास का समर्थन रुचि ऋषि वाली में और गृहस्थ का विरोध और पृष्ठ क्रमांक 103 गरिमा गीता की वहां पर इसने क्या किया है कि सन्यास का विरोध और गृहस्थ का समर्थन इसके बाद ये यहां पे नहीं रुकता है। इसने जो है फिर से एक तरफ ये हट पूर्वक इंद्रिय निग्रह करना मना करता है। यही कर्म कर्म योगी वाले में और और भी जगह-जगह मगर फिर यह पेज नंबर 33 पे गरिमा गीता की पेज नंबर 33 वहां क्या होता है ये पेज नंबर 33 है ना हां ये ये जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला वह परमात्मा के स्मरण में स्थिर नहीं हो सकता क्योंकि उसका मन वश में नहीं है। मन वश में होना चाहिए। पहली बात यह ध्यान रखिए इंद्रिय निग्रह मन वश में होना चाहिए। उस अयुक्त यानी
00:14:52:02 परमात्मा पर ना टिके। मन वाले पुरुष में अब देखिए एक जगह विरक्तता का विरोध करता है। फिर एक जगह समर्थन करता है। फिर एक जगह इंद्रिय निग्रह का विरोध करता है। फिर दूसरी जगह समर्थन करता है। यह तत्व ज्ञानी बाबा हैं। अच्छा तो उसकी बुद्धि स्थिर नहीं है। उस देखो यहां इसके ही अगले पैराग्राफ में ये कह रहा है क्योंकि पूर्ण संत रूपी केवट नाव के साथ नहीं है तो उस नाव को जल में वायु हर लेती हैं। यानी अपनी इच्छा अनुसार भटकाती हैं। वैसे ही पूर्ण संत के अभाव में तत्व ज्ञान ना होने से जल में नाव की भांति विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस इंद्रिय के साथ लगा है वह एक ही इंद्रिय उस अभक्त की बुद्धि को हर लेती है। तो यहां क्या हुआ? इंद्रिय निग्रह करना चाहिए। यहां बाबा जी ये मान रहे हैं। वहां पे कह रहे हैं नहीं नहीं इंद्रिय निग्रह नहीं होना चाहिए। इंद्रिय निग्रह नहीं करना केवल नाम जपो। यहां इंद्रिय निग्रह का समर्थन कर रहा है कि इंद्रिय निग्रह होना चाहिए। अब मैं आपसे पूछता हूं सब बातें छोड़ दो। अगर क्या नाम जब जप रहे हो अपने ईश्वर का नाम जप रहे हो तो क्या फ्रीलांस रहने चाहिए क्या फ्री? चाहे जहां पे जिस भी इंद्रिय को विषय देना है उसका भोग का विषय है उसको करने का प्रयास करना चाहिए। बाबा ऐसा
00:16:07:06 ही रहता है क्या? मैं रामपालियों से पूछ रहा हूं। क्या अपने घर में ऐसे ही रहते हो? कहीं पर भी संयम नहीं करते हो। किसी भी क्षेत्र में संयम नहीं करते हो। बाबा का तो नहीं पता है। उसके बारे में तो बहुत सी चीजें हैं। मगर तुम लोग क्या करते हो? तुम बताओ। इंद्रिय निग्रह करते हो ना? संयम करते हो ना? ठीक है? ये हो गया। अब देखिए विरक्तता का विरोध, विरक्तता का समर्थन। इंद्रिय निग्रह का विरोध, इंद्रिय निग्रह का समर्थन। अब
00:16:43:03 अब मैं आपको दिखाता हूं इसी में 36 पेज नंबर पे देखिए। अब मैं आपको सन्यास का यहां पर समर्थन दिखाता हूं। देखिए इसमें देखिए क्या लिखा है? इसमें लिखा है 36 इसमें लिखा है [गला साफ़ करने की आवाज़] कि रात्रि में दो प्रकार के व्यक्ति जागते हैं। एक तो सांसारिक भोगों की इच्छा वाला सोते हुए भी स्वप्न में उन्हीं में भटकता रहता है। दूसरा परमात्मा की भक्ति में लगा स्थिर बुद्धि वाला साधक रात्रि में स्वप्न में भी परमात्मा में विचार विचार करता है। आगे क्या लिखा है? भावार्थ जो सांसारिक व्यक्ति भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए दिन भर भटकता है। यह जो भौतिक पदार्थों की प्राप्ति है ना यही जो माया के पीछे पड़े रहने का खंडन किया है गीता में वही है भौतिक पदार्थों की जो भक्ति करते हैं माया की भक्ति करते हैं माया को ढूंढते रहते हैं वो खंडन किया तो उसको ये लोग बनाते ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति मना की गई है हालांकि खैर इधर आ जाते तो जो सांसारिक व्यक्ति भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए दिन भर भटकता है यानी नहीं भटकना चाहिए भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए नहीं भटकना चाहिए संयमी साधक की इच्छा उन पदार्थों की नहीं होती ठीक है? यानी कि विरक्तता भौतिक पदार्थों के लिए विरक्तता का यहां समर्थन आ
00:17:58:07 गया। उसके लिए वह दिन भी रात्रि के समान है। अन्य लोग तो सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए सजग रहते हैं। परंतु स्थिर बुद्धि वाला उनसे मुख मोड़े रहता है। अब भाई भौतिक पदार्थों से मुख मोड़ने वाला विरक्त हो गया ना। भौतिक पदार्थों से मुख मोड़ने वाला विरक्त हो गया। तो भौतिक पदार्थ तो भोजन भी है। तो भोजन से मुंह मोड़ने वाला व्रत हो गया। व्रत का तो खंडन है पर तू तो समर्थन कर रहा है यहां पर तेरे जूता ही तेरा ही जूता सदैव तेरे सर पर मारूंगा जो जो आएगा ना हमारे धर्म का अपमान करने हमारे भगवान का अपमान करने उसी का जूता उसके सर पर पड़ेगा ये देख और जिसने भी अपनी मां जिसको भी उसकी माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया है वो आकर के बात करे सामने से
00:18:48:24 तो यहां पे इसने व्रत का अविरक्तता का पुनः समर्थन कर दिया। अब इस बाबा से कोई पूछे भाई तू विरक्तता का समर्थन करता है कि विरोध करता है? क्या ऐसा है कि बबिता के सामने आते ही तुझे गृहस्ती याद आने लगती है और जैसे ही जनता को बेवकूफ बनाता बनाना होता है मंचों से तो तुझे वहां पर विरक्तता याद आ जाती है। कर्म योगी में तू कहना क्या चाहता है कि शास्त्र विरुद्ध कर शास्त्र विरुद्ध चीजें करने वाला तो कर्म सन्यासी हो गया। मान लिया तो इसका मतलब कर्म योगी क्योंकि कर्म योगी और कर्म सन्यासी में अंतर है तो कर्म योगी अगर तूने कर्म सन्यासी शास्त्र विरुद्ध वाले को माना है तो भैया कर्म योगी तू उसको मान ले भाई हमें झंडू बाम नहीं लगाना पड़ेगा सर पे तो कर्म योगी तू उसको मान ले जो शास्त्र विधि के अनुसार तेरी वाली अभी तो तेरी वाली के अनुसार बात कर रहा हूं तो तू उसको मान ले कर्म योगी जो शास्त्र विधि के अनुसार चले मगर तू कर्म योगी में भी यह घुसेड़ दे रहा है कि कर्म योगी में इसने क्या घुसेड़ दिया 103 कर्म योगी में फिर तू कह रहा है कर्म योगी दो प्रकार के हैं। एक तो बाल बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्र विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या ना शादी करवा के घर पर या किसी आश्रम में रहता हुआ सांसारिक कर्म अथवा सेवा करता हुआ शास्त्र विधि अनुसार भक्ति करता है। यानी कि विरक्त और
00:20:04:00 गृहस्थ दोनों कर्म योगी हैं। और ऊपर वाले पैराग्राफ में विरक्त और गृहस्थ दोनों कर्म सन्यासी हैं। बस यहां दोनों पैराग्राफ में अंतर यह है कि ऊपर वाला शास्त्र विधि विरुद्ध साधना कर रहा है और नीचे वाला शास्त्र विधि सहित साधना कर रहा है। मगर इसने क्या किया? तीसरा एक पैराग्राफ और लिखा। 103 नंबर का पेज दिखा दो आप यहां। 103 नंबर। इसने क्या किया? यहां पे कर्म योग में नीचे लिखा है। दूसरी प्रकार के कर्म योगी वह होते हैं जो बाल बच्चों में रहते हैं तथा साधना शास्त्र विधि विरुद्ध करते हैं। अरे मेरे भाई तो वो तो कर्म सन्यासी है ना। शास्त्र विरुद्ध वाला तो कर्म सन्यासी है ना तो यहां पर भी घुसेड़ दिया कर्म शास्त्र विरुद्ध विरोध को पागल है क्या भांग खा के लिखी है क्या ये किताबें इसका विवरण लिखा है ना ये देखिए इसका घोंचूपन देखिए कर्म सन्यास का विवरण कर्म सन्यास दो प्रकार के होते हैं एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर त्याग कर हटके जंगल में बैठ जाता है। यानी कि घर त्याग कर नहीं रहना चाहिए। यह वह वाला खंडन है। जो वहां पर रुचि ऋषि की तपस्या में रुचि ऋषि का समर्थन कर रहा है। पितरों का विरोध करने के लिए यहां पर रुचि ऋषि पितरों का समर्थन कर रहा है व्यक्ति। पित पितर कह रहे हैं ना गस्थ
00:21:19:08 ग्रस्त हो जाओ। विवाह करके कर लो। कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए कर लो। तो यहां पे पितरों का समर्थन कर रहा है। क्या कह रहा है? घर त्याग कर हट के जंगल में बैठ जाता है तथा शास्त्र विधि साधना करता है। दूसरा घर पर रहते हुए भी हठ योग करके घंटों एक स्थान पर बैठकर शास्त्र विधि त्याग कर साधना करता है। दोनों ही कर्म सन्यासी यानी कि शास्त्र विरुद्ध तरीके से चलना कर्म सन्यास है। तो जाहिर सी बात है कि कर्म योगी की जब बात बताओगे तो शास्त्र विधि सहित चलना कर्म योगी होगा। मगर वहां ये क्या कह रहा है? यह भी दो प्रकार का होता है। एक तो बाल बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्र विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या ना शादी करता करवा करके घर पर या किसी आश्रम में रहता हुआ सांसारिक कर्म अथवा सेवा करता हुआ शास्त्र विधि अनुसार साधना करता है। ये दोनों कर्म योगी हैं। मगर अब दूसरी प्रकार के कर्म योगी वह होते हैं जो बाल बच्चों में रहते हैं तथा शास्त्र विधि विरुद्ध शास्त्र साधना शास्त्र विधि विरुद्ध करते हैं या शादी ना करवाकर किसी आश्रम में सेवा करते हैं तथा साधना भी शास्त्र विधि के विपरीत करते हैं पागल है क्या फिर कर्म सन्यास कहां ले जाएगा अलग से तूने कर्म योगी में भी कर्म सन्यास वाली चीजें डाल दी
00:22:30:14 ठीक है बुलेट पॉइंट्स में आगे चलते हैं अब बुलेट पॉइंट्स में हम लोग आ जाते हैं। आगे चलते हैं। तो पांच दो की व्याख्या करते हुए यह व्यक्ति यह व्यक्ति पांच दो की व्याख्या करते हुए कहता है कि भाई यहां पे पांच दो के उसमें इसने लिखा है कि 16 से 23 तक गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा है शास्त्र विधि अनुसार ये वो तो जो साधना त्यागने की है पांच दो के उसमें लिखा है अर्थात ना करने वाली है तथा जो करने वाली है उनके लिए शास्त्र को प्रमाण मानना चाहिए तो यहां पर जो त्यागने की साधना है वो गीता हमारे शास्त्रों में बताई गई रामपाल के अनुसार तो बात यह है कि जिसको त्यागने को कहा गया है उसको करने को कहां पे कहां कहां पर कहा गया है यह बात फिर बाबा जी को बतानी होगी विद प्रूफ जो वो बता नहीं पाएंगे वो अपने जीवन भर की पाइप बांट दें खीर बांट दें किडनी बेच के बांट दे गुर्दा बेच के बांट दें जो भी कर ले मगर वो बता नहीं पाएंगे आगे आ जाइए पृष्ठ संख्या 108 फिर इसने पांच [गला साफ़ करने की आवाज़] तीन में सन्यास का समर्थन किया। देखिए पांच तीन में सन्यास का समर्थन कैसे किया है। अह पांच
00:23:46:14 तीन में इसने सभी का समर्थन कर दिया। सन्यास का भी, जंगल में रहने वाले का भी, विरक्त का भी, गृहस्थ का भी सबका समर्थन कर दिया। जबकि एक तरफ कहता है कि जंगल में रह के साधना करना ये शास्त्र विरुद्ध है। त्याग कर साधना करना। जबकि मार्कंडेय वाले में कहता है कि भाई रुचि जी सही कर रहे थे रुचि ऋषि। यह कहना क्या चाहता है? यह सोचने में ही आप पागल हो जाओगे। तो 108 पर पृष्ठ संख्या और सबसे नीचे से सेकंड पैरा सेकंड लास्ट पैराग्राफ यह भावार्थ कर रहा है अध्याय पांच श्लोक तीन में शास्त्र विधि अनुसार साधना करने वाले कर्म योगी का विवरण है। ये अब ध्यान से सुनिएगा यहां पर ये बात क्योंकि बहुत दिमाग लगाना पड़ेगा क्योंकि इसने इतने झूठ बोले हैं ना उन झूठों को समझने में भी उन असत्य भाषणों को समझने के लिए भी बहुत आपको ब्रेन चाहिए। ये सामर्थ्यवान जो उनको धारण कर पाए क्योंकि इसने इतने झूठ बोले हैं कि आप यह नहीं समझ पाओगे कौन सी जगह से झूठ को पिक करना है। तो इस अब ये क्या कह रहा है 5 तीन में शास्त्र विधि अनुसार साधना करने वाले कर्म योगी का विवरण है। जो श्रद्धालु भक्त चाहे बाल बच्चों सहित या रहित यानी गस्त या विरक्त या किसी आश्रम में रहकर सतगुरु
00:25:02:12 व संगत की सेवा में रहत है। सर्वथा सर्वथा राग द्वेष रहित होता है। वास्तव में वही सन्यासी है। यह लिख दिया। यानी कि इसने गृहस्थ वाला विरक्त वाला दोनों को इसने अब यहां मान लिया। दोनों ठीक है। एक तरफ गलत कहता है। एक तरफ सही कहता है। आगे पांच श्लोक चार में कहता है ज्ञान योगी व गृहस्ती। यहां पे ज्ञान योगी यानी ईशांख योगी यानी वो बात हो रही है सन्यास और वो कर्म योगी की अपनी गीता के अनुसार। तो अब यह कह रहा है पांच श्लोक चार में ज्ञान योगी व गृहस्ती दोनों की एक ही उपलब्धि बताई गई है। यह रामपाल खुद कह रहा है श्लोक पांच चार की व्याख्या करते समय कि गीता में ज्ञान योगी यानी कि कर्म सन्यास वाले की और कर्म योगी यानी गृहस्थ की एक ही उपलब्धि बताई है गीता में। रामपाल के अनुसार इसको नोट कर लो आप। अभी आगे मजा आएगा। फिर यदि कोई कहता है कि ज्ञान योगी श्रेष्ठ या गस्थ श्रेष्ठ है तो वह पंडित नहीं है। अब यहां पर देखो इसको चयन नहीं पड़ रहा है। इसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि ज्ञान योगी शास्त्र विरुद्ध है या गृहस्ती शास्त्र विरुद्ध है। यानी कि इसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा कि ज्ञान योगी जो होता है यह ज्ञान योगी जो होता है वो शास्त्रों के विरुद्ध साधना करने वाला होता है। यह नहीं लिखा गीता में। मगर इसने
00:26:17:18 दोनों को ही बेकार कह दिया। ना ही इसमें यह लिखा है कि गस्ती जो होता है वह शास्त्र विरुद्ध साधना करने वाला होता है। मगर इसने गस्त को भी अमान्य कर दिया। फिर खुद कहता है कि यदि भक्ति शास्त्र विधि अनुकूल नहीं है तो वह चाहे गस्ती हो या ज्ञानी हो दोनों ही असफल है। यानी कि अगर शास्त्र के अनुसार होगी तो चाहे वो गस्ती हो और चाहे वो विरक्ति हो दोनों ही फिर सही हो जाएंगे। तो भाई इसमें मना कौन कर रहा है कि यहां उन गस्तों की बात हो रही है जो शास्त्र विधि विरुद्ध है। मगर इसको तो अपना पेच लड़ाते चलना है। अच्छा फिर से आगे जाकर के कह रहा है कि
00:26:57:22 अब देखिए पहले इसने माना कि दोनों की एक ही उपलब्धि बताई है। ठीक है? फिर आगे आगे बता रहा है इसी श्लोक में पांच चार में ही यह कह रहा है कि पांच श्लोक चार में दोनों की उपलब्धि एक बताइए। फिर आगे कह रहा है स्वयं भगवान कह रहे हैं कि शास्त्र विधि रहित साधना कर्म सन्यासियों से कर्म योगी उत्पन्न है। अब यहां पर दोनों की उपलब्धि अलग-अलग मान रहा है।कि कर्म सन्यास कर्म सन्यास में त्याग का अभिमान होना स्वाभाविक है। इसका कोई प्रमाण नहीं है। कर्म सन्यास में त्याग का अभिमान होता है। कोई सन्यास नहीं। कोई प्रमाण नहीं है। ठीक है? अध्याय पांच के श्लोक पांच में कहा है कि ज्ञान योगी तथा कर्म योगी एक ही स्थान प्राप्त करते हैं। यह इसने माना है अध्याय पांच के श्लोक चार और पांच में इसने यह माना है कि कर्म योगी और ज्ञान योगी यानी कि कर्म सन्यासी एक ही स्थान प्राप्त करते हैं। जिनकी साधना यदि शास्त्रानुकूल है और जो कोई ऐसा जानता है उसे ही ज्ञान कहते हैं। उसे ही ज्ञान। ठीक? अब इसने आगे क्या कहा है? इसी बात के बारे में अगले प्रश्न पर आइए आप 109 109 में नीचे आ जाइए विशेष
00:28:14:26 अब ये विशेष में क्या कह रहा है विशेष में ये कह रहा है कि गीता जी के अन्य अनुवादकर्ताओं ने जो गीता अध्याय पांच श्लोक चार में लिखा है कि सन्यास और कर्म योग द्वारा एक ही फल मिलता है। ठीक है? यह गलत अनुवाद है क्योंकि अध्याय पांच श्लोक छ के आधार से गलत सिद्ध होता है। भाई तूने ही तो अनुवाद किया है। दोनों की उपलब्धि एक है। हालांकि वही अनुवाद सही है। अनुवाद से अनुवाद क्यों काट रहा है भाई तू? दोनों की उपलब्धि एक है। तूने उसमें बड़ा छोटा किया है। दोनों से एक ही दोनों को एक ही उपलब्धि पे ले जाने वाला बताया गया है। ठीक है? गीता के अनुसार। अगर तूने खुद अभी कहा कि ये पांच श्लोक चार में ज्ञान योगी व गृहस्ती दोनों की एक ही उपलब्धि बताई गई है। फिर इसी प्रश्न में ऊपर कहा है 109 में ऊपर दिखाइए। देखिए इसके पंचर दिमाग को पंक्चर कर देने वाला ज्ञान सबसे पहला पैराग्राफ उसकी लास्ट की दो लाइनें
00:29:19:10 अध्याय पांच। यह अध्याय पांच लिखा है। सेकंड लाइन उसको अंडरलाइन करिए जरा। यह तू अनुवाद कर रहा है फड़ कहीं के। यह देख यह रामपाल ने अनुवाद क्या किया है? अध्याय पांच के श्लोक पांच में कहा है कि ज्ञान योगी तथा कर्म योगी एक ही स्थान प्राप्त करते हैं। यह कहा है। यह माना है रामपाल ने। अब नीचे विशेष में यह क्या कह रहा है? ही स्थान प्राप्त नहीं करते।
00:29:55:13 ठीक है? अध्याय पांच के श्लोक चार और पांच दोनों में रामपाल ने माना कि दोनों कर्म योगी और कर्म सन्यासी एक ही स्थान पे आप प्राप्त करते हैं या ज्ञान योगी और गृहस्थ दोनों एक ही स्थान प्राप्त करते हैं। यह मान लिया रामपाल ने। फिर खुद रामपाल ही कह रहा है कि गीता के जो अनुवादक हैं अन्य उन्होंने गलत किया है क्योंकि दोनों एक ही स्थान प्राप्त नहीं करते। सन्यास मार्ग तो शास्त्र विरुद्ध है। अब यहां सन्यास मार्ग शास्त्र विरुद्ध हो गया। यानी रुचि ऋषि वहां पर पितरों की बात ना मान के सही कर रहे थे। ठोको ताली। ठोको ताली। आवाज नहीं आ रही तालियों की। तो भाई यह इसका सब पंचर कर देने वाला दिमाग वह है। इसमें जाते-ते कुछ तर्क और दे दूं मैं कि यदि
00:30:46:04 आप किसी के अनुवाद पर निर्भर हैं तो आपको बाद वाला अनुवाद कुछ और लग रहा है। यह वाला कुछ आपने यह निर्णय कैसे लिया कि बाद वाले के अनुसार इसको बदलना है। यह यह क्यों नहीं हो सकता कि इसके अनुसार बाद वाले को समझे? यह निर्णय कैसे होगा? इसीलिए कहा है ना अर्ध कुकुट नय नहीं कर सकते। सभी शति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा साधु सम्मत धर्म है। एक भी श्लोक को काट नहीं सकते। श्लोक को काटोगे तो उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न आ जाएगा। सब कौन समझाया इन भुओं को? इनको समझाते समझाते मेरे सर में दर्द हो जाता है।
00:31:29:01 तो ये आज का रुचि ऋषि वाला हो गया। राघव ने जो चैलेंज के बारे में बेवकूफ बनाया गवर्नरों को वो हो गया। और जो जिन बातों को लेकर के हम लड़ रहे हैं इस तंत्र से अपराधिक तंत्र से उन चीजों को डिफेंड करने के लिए जो उसने अपने गवर्नरों को मूर्ख बनाने के लिए उल्टे सीधे प्रमाण प्रस्तुत करें उसका निराकरण हो गया। साथ ही साथ जो पिछले सप्ताह हमने एपिसोड जो नाइन है इस श्रृंखला का उसमें जो अध्ययन किया था उसके बुलेट पॉइंट्स आज मैंने आपको यहां सुना दिए। तो एक पुतला दहन कार्यक्रम वो आप सबको पता चल गया। एक बात फिर से बोल दूं रामपाल को नहीं रामपालियों को पकड़ो। यह मन में डाल लो आप। इस तंत्र को नष्ट करना है हिंदू विरोधी तंत्र को तो रामपाल को नहीं रामपालियों को पकड़ो। अपने घर के आसपास रहने वाले रामपालियों का टोटल बहिष्कार करो। टोटल बॉयकॉट रामपाल बॉयकॉट मूवमेंट उसको समर्थन देने वाला व्यक्ति जहां भी किसी आप जैसे किसी धर्मनिष्ठ व्यक्ति के पास रह रहा है उसके घर के पास जाकर के आप विरोध
00:32:44:02 प्रदर्शन करिए उसके बारे में वहां के समाज को बताइए वहां के समाज को अपील करिए उसका बहिष्कार करने की क्रांति आएगी आप ला सकते हो उसके घर के आसपास आपको केवल यह जानकारी वाले पर्चे चिपकाने हैं कि रामपाल कौन है? वह क्या कर रहा है? और यह व्यक्ति उससे जुड़ा है। और इस प्रकार इस व्यक्ति से जुड़ने वाला व्यक्ति कौन सिद्ध होगा? यह आपको केवल बताना है। अपने घर के आसपास दुर्गा मां को गाली देने वाले का समर्थन करने वाला चैन से नहीं रहना चाहिए। उसको रात में चैन से नींद नहीं आनी चाहिए। और उसके लिए लाठी भाले की नोक पर नहीं गोली बारूद के नोक पर नहीं केवल संविधान की सीमा में रहते हुए आपको अपनी बात को रखना है। ध्यान रखिए आपके घर के पास आपके गली मोहल्ले में आपकी जानकारी में दुर्गा मां को गाली देने वाले का समर्थक चैन से नहीं रहना चाहिए। अभी से प्रण ले लो सारे के सारे और यह टॉपअप है सोने पर सुहागा। यदि वहां के दल इत्यादि आपके साथ हो जाते हैं तो आप एक अच्छा सा प्रदर्शन करिए और इसका पुतला अच्छा मत
00:33:59:15 बनाना। ऐसा ही सड़ा हुआ सा बनाना। पुतला बहुत सुंदर मत बना देना। तो ऐसे ही पुतला बनाइए और उसको जो है जलाइए। अपना विरोध दिखाइए। अपना रोष प्रकट करिए। ठीक है?
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पाखंडी रामपाल का खुद की किताबों में ही खंडन भाग 9 -अध्याय 5
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