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00:00:00:19 [संगीत] तो सभी को जय श्री राम। इस समय हम हैं भिलाई में। ब्रह्मा कुमारीज का यहां पर केंद्र है और हमारे साथ में हमारी दीदी बैठी हुई हैं। और जैसा कि आप सब लोग जानते हैं विभिन्न जो धार्मिक मान्यताएं हैं उनको लेकर के हम चर्चाएं करते हैं और वो आपके समक्ष रखते हैं। तो आज हम इसी क्रम में यहां आए हुए हैं। तो सबसे पहले मैं दीदी आप अपना थोड़ा सा परिचय दे दीजिए। यहां का और थोड़ा सा अपने बारे में कि आप मतलब आपका परिचय देते हुए यहां के बारे में थोड़ा सा बता दीजिए जनसामान्य को। ओम शांति

00:00:39:22 प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरी विश्वविद्यालय शाखा जो भिलाई के सरोदा पे है। संस्थान जो है वो माउंट आबू से रिले होती है। हमारा मुख्यालय माउंट आबू पर है और वहां से ही ऑल वर्ल्ड में यह सेवाएं होती हैं। वर्तमान समय मुख्यालय से जो हमारी संस्था है विश्व में वो 4500 से भी ज्यादा सेवा केंद्रों के माध्यम से मानव समाज कल्याण सेवा कर रही है। जहां विभिन्न वर्गों से सेवा होती है। समय-समय पर यहां सामाजिक कार्यक्रम के माध्यम से सभी विश्व की आत्माओं को परमात्म संदेश दिया जाता है। परमात्म संदेश से तात्पर्य कि आज हम भिन्न धर्मों से और भिन्न जातियों से जुड़े हुए हैं। लेकिन परमात्मा जो निराकार है वह निराकार परमात्मा इस सृष्टि पर अवतरित होकर के सत्य गीता ज्ञान जो हम आत्माओं को सुना

00:01:55:01 रहे हैं और इसी गीता ज्ञान को सुनकर के जो हम आत्माओं की सद्गति होती है और फिर सृष्टि में एक नव परिवर्तन आता है वो नव परिवर्तन होता है सतयुगी सृष्टि के आरंभ से और इसके माध्यम से ही यह जो हमारे सेवा स्थान है। यह अपने राजयोग की जो सेवा देते हैं। उस राजयोग में ही हमें यहां आत्मा और परमात्मा का परिचय मिलता है। और आत्मा परमात्मा के परिचय से ही हम मेडिटेशन के माध्यम से अपने अंतर जगत की यात्रा करते हैं और अंतर जगत की यात्रा करके ही हम उस परम सत्य से जुड़ पाते हैं। जहां हमें आत्मिक शांति सुख, आनंद और प्रेम की प्राप्ति होती है। अच्छा दीदी जी थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप बताएंगे कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार धर्म क्या है?

00:02:55:13 ब्रह्मा कुमारी के अनुसार से धर्म देहिक नहीं है। धर्म से तात्पर्य होता है धारणा। हम और धारणा सभी धर्मों की है। जो अपने धारणाओं में परिपक्व हो वही सही धर्म है। क्योंकि हमारा जो धर्म है वो है आदि सनातन देवी देवता धर्म जो सृष्टि के आदि से चला आया है। आदि सनातन आदि सनातन क्योंकि वर्तमान का जो समय चल रहा है परमात्मा के कहे अनुसार यह समय कल्याणकारी पुरुषोत्तम संगम युग का समय है और इसी संगम युग में परमात्मा एक मानव तन का आधार लेकर के ही सृष्टि की पुन स्थापना का कार्य कर रहे हैं। जिसे उन्होंने नाम दिया है प्रजापिता ब्रह्मा और इसी प्रजापिता ब्रह्मा के नाम से ही यह ब्रह्मा कुमारिस की जितनी भी शाखाएं हैं उसी नाम से ही चल रही नहीं नहीं जैसे मैंने पूछा ना कि धर्म किसे कहें? जैसे धर्म एक व्याख्या आई है भगवत गीता में कि अ तेरे लिए कर्तव्य

00:04:10:19 और अकर्तव्य की स्थिति में विषय में केवल शास्त्र प्रमाण है। तो जैसे हमको विवाह किससे करना है यह भी एक धर्म है। या विवाह करना है कि नहीं करना है यह भी एक धर्म है। पिता की आज्ञा माननी है कि नहीं माननी यह भी एक धर्म है। किसकी आज्ञा माननी है, किसकी नहीं माननी यह भी एक धर्म है। तो क्या करना है और क्या नहीं करना है। इस विषय में एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। कहा तो यह हमारा धर्म है। तो धर्म की उपयोगिता क्या है? मतलब धर्म को हम किसी को कैसे परिभाषित करते हैं? क्या है धर्म? जैसे आपने कहा विभिन्न धर्म तो जैसे आपके अनुसार क्या इस्लाम भी धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी भी धर्म है? क्योंकि वहां पर तो धर्म शब्द नहीं मिलता। दूसरे शब्द मिलते हैं तो फिर वह धर्म क्या चीज है जो जिसके कारण हम उसको भी धर्म कह रहे हैं

00:05:12:04 इससे कैसे समझाया जाए हम इसको इस तरह से देख देख लेते हैं जैसे कि आपने कहा ना ईश्वर निराकार है हम फिर दूसरी तरफ हम कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है हम है ना तो निराकार है। वह किसी और शरीर का उपयोग करता है। है ना? क्या वो स्वयं से अवतरित होता है? क्या परमात्मा के बारे में जो स्वयं परमात्मा ने बताया है जी कि मैं स्वयं हूं। हम मना स्वयं से जन्म लेने वाला। हम ना ही मैं जन्म किसी मानव रीति से जन्म लेता ना ही मैं मरता। माना वो परमात्मा जो जन्म और मृत्यु दोनों से परे है। अर्थात वो सर्वशक्तिवान है। नहीं नहीं ये तो बताया उसने परमात्मा ने कि मैं जन्म और मृत्यु से परे हूं। मगर क्या वो चाहे तो ये जो लीला रूपी संसार है प्रपंच रूपी संसार है। इसमें जैसे कि हम हम लोग हैं। हम भी आत्माएं आत्माओं के रूप में सनातन है। है ना? हां। है ना? मगर फिर भी हम लीला रूपी संसार में रूप लेते हैं। शरीर धारण करते हैं। है ना? तो उसी तरीके से क्या ईश्वर भी इस तरह

00:06:27:10 से शरीर धारण कर सकता है? नहीं। परमात्मा ने कहा कि मैं शरीर धारण कब करता हूं? जब मुझे इस सृष्टि का परिवर्तन करना होता है। तब मैं आकर किसी और शरीर में आता। किसी अपने से जैसे हम लोग अपने से शरीर में आ रहे हैं। वैसे परमात्मा नहीं आ सकता। परमात्मा ने कहा ना तो मैं पर काया प्रवेश करता हूं। पर काया प्रवेश तो इसमें इसमें वो जो टॉपिक है ना कि दूसरे चीजों को हम धर्म कैसे कह रहे हैं या फिर धर्म क्या होता है वो उससे रिलेटेड है। तो इसमें क्या है कि अ जब हमने यह कहा कि ईश्वर पर काया प्रवेश तो कर सकता है परंतु स्वयं से माता के गर्भ से प्रकट होकर नहीं दिखा सकता। तो इसमें फिर एक बाधा लग रही है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं रहा। क्योंकि सर्व का अर्थ है सभी। सभी कार्यों को करने की शक्ति जिसमें हो वो सर्वशक्तिमान है। जैसे हम कहें क्या ईश्वर उड़ सकता है? तो हां बिल्कुल उड़ सकता है। क्या ईश्वर गायब हो सकता है? तो गायब हो सकता है। क्या ईश्वर हर जगह हो सकता है? हां हो सकता है। क्या ईश्वर शेयर को हवा में उड़ा सकता है? बिल्कुल उड़ा सकता है। तो तभी उसको हम सर्वशक्तिमान कह रहे हैं। मगर यहां पे हम कह रहे हैं कि वो जन्म नहीं ले सकता। जी यहां हम इसको ऐसा भी कह सकते हैं हम कि

00:07:42:26 परमात्मा निराकार है और बाकी सभी जो आत्माएं हैं उनमें कोई देव आत्मा है कोई धर्म आत्मा है कोई महान आत्मा है कोई पाप आत्मा है और कोई पुण्य आत्मा है हम हम कभी भी पुण्य परमात्मा नहीं कहते या पुण्य धर्मात्मा नहीं कहते या पुण्य महात्मा त्मा नहीं कहते। परमात्मा से तात्पर्य कि वह सर्वोपर है। सर्वोच्च है। और बाकी जो आत्माएं हैं चाहे वह देव आत्मा हो, धर्मात्मा हो, महान आत्मा हो, पुण्य आत्मा हो या पाप आत्मा हो ये हम सभी आत्माएं जो है जो माता के गर्भ में से जन्म लेती है, मृत्यु को प्राप्त करती हैं और फिर जन्म लेती है। और परमात्मा जो कि निराकार है, वो इस जन्म मरण के चक्कर से परे है। बहुत त्मा अलग है और देव आत्मा अलग नहीं वो तो है यदि वो चाहे वो चाहे तो वो कर सकता है ले सकता है जन्म या नहीं ले सकता है परमात्मा चाहे तो जैसे उसका मन हुआ कि भाई मैं लीला में आऊं खेलूं कूदूं या मतलब अपने मन से ये नहीं कि उसको बाध्य है कि अभी आज जैसे हम लोग अपनी मृत्यु को कंट्रोल नहीं कर सकते

00:08:58:14 मगर वो चाहे कि मैं अपने इच्छा अनुसार जब चाहूं तब शरीर को त्यागूं मैं अपनी इच्छा अनुसार जब चाहूं तब आऊं। हमारे कंट्रोल में जन्म मृत्यु नहीं है। उसके कंट्रोल में है। तो क्या वह इस कंट्रोल के साथ आ सकता है या नहीं? और नहीं आ सकता है। अगर मान लिया कि उसने कहा है कि मैं नहीं आ सकता। फिर उसको हम सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? परमात्मा को सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? हम जैसे हम कहते हैं सर्वज्ञ। सर्वज्ञ का मतलब है ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसको ज्ञात ना हो। है ना? हम कहते हैं सर्वव्यापी। तो सर्वव्यापी का अर्थ यह है हम उसको नहीं कहते। मान लीजिए हमने कहा आप नहीं कहते हैं कई आईडियोलॉजीस कहती भी हैं। तो मान लीजिए किसी ने कहा सर्व्यापी तो सर्वव्यापी का अर्थ आएगा कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहां पर वो व्याप्त ना हो। तो जब हम कह रहे हैं सर्वशक्तिमान तो ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वो ना कर पाए। कारण हां परंतु यहां पर एक प्रॉब्लम आ रही है कि वो जो है जन्म नहीं ले सकता। जी परमात्मा ने स्वयं भी कहा है ना कि मैं स्वयं हूं। मैं सर्वशक्तिमान हूं। लेकिन मैं अगर मैं भी जन्म ले लूं अगर मनुष्यों की भांति मैं भी जन्म ले लूं तो फिर मनुष्यों में और फिर मुझ परमात्मा में अंतर अंतर ये रह जाएगा कि मैं जब चाहूं तब मरूंगा मनुष्य जब

00:10:13:18 चाहे तब नहीं मरता है। मैं जब चाहूं तब उत्पन्न होऊंगा। मनुष्य जब चाहे तब नहीं उत्पन्न होता है। उत्पन्न जी जो परमात्मा के ज्ञान के आधार पर जो परमात्मा से हम आत्माओं को ज्ञान मिला है तो उन्होंने जो बताया कि सृष्टि रूपी ड्रामा ये सृष्टि रूपी नाटक रंगमंच जो कि 5000 वर्ष का एक बना बनाया नाटक रंगमंच है जो एक ड्रामा की भांति चल रहा है। सिर्फ ब्रह्मा में परमात्मा का इस सृष्टि पर आना भी नो होता है लेकिन वो होता है परकाया प्रवेश परकाया प्रवेश वो तभी करते हैं जब कलयुग के अंत में अति धर्म ग्लानी का समय होता है तब वो परकाया प्रवेश करते हैं और फिर वो आकर के हम आत्माओं को यहां जो पुण्य आत्माएं होती है वो स्वयं अपना भी परिचय देते हैं और फिर वो यही कहते हैं कि जो गीता में लिखा हुआ है गीता में जो लिखा हुआ है यदा यदा धर्म से भारत धर्मस तदात्म तो इस सृष्टि रंगमंच पर कल्प में एक बार आता हूं 5000 इसमें कल्प की बात तो नहीं आई है हां मतलब ये पूरा वो कहते हैं जब जब धर्म की हानि होती है तबतब मैं जो है अधर्म का नाश करने

00:11:28:21 के लिए साधु भक्तों के उद्धारगणी परित्राणाय साधु नाम जी है ना विनाशाय चतुष्कताम तो वो तब तब मैं अपना स्वयं का सृजन करता हूं वहां पे ये भी नहीं कहा कि मैं परकाया में प्रवेश करता हूं। वहां पे कहा मैं सृजन करता हूं। अपने आप का स्वयं रूप बनाता हूं। तो परमात्मा ने यह भी कहा ना कि धर्म की ग्लानी केवल एक बार होती है। सतयुग और त्रेता युग में धर्म ग्लानी नहीं हुई। द्वापर और कलयुग के बीच में भी नहीं हुई। ये कलयुग अंत में नहीं दीदी वो जो विषय चल रहा है ना वो यह चल रहा है कि ईश्वर ये मनुष्यों की भांति अवतार ले सकता है कि नहीं? परकाया प्रवेश नहीं मगर मनुष्यों की भांति शरीर धारण कर सकता है कि नहीं अगर नहीं कर सकता है वो अलग बात है मगर नहीं कर सकता है तो फिर उसकी ये जो सर्वशक्तिमत्ता है उसमें क्वेश्चन उठ जाता है जैसे अगर दुनिया में कोई भी एक कार्य है जो वो नहीं कर पा रहा है तो उस पे फिर क्वेश्चन आ जाता है वो सर्व शब्द हट जाएगा फिर सर्व का मतलब तो सर्व ही है कि वो सब कुछ कर सकते हैं जी तो वो सब कुछ तो कर भी रहे हैं तो वो जन्म कहां ले रहे हैं अच्छा वो जन्म इसलिए नहीं ले रहे क्योंकि वो निराकार है तो इसका मतलब वो नहीं ले सकते ना बाधित हो गए ना तो वो कोई परया प्रवेश तो कर रहे हैं ना नहीं तो जन्म नहीं ले

00:12:43:22 रहे ना हां जन्म नहीं ले रहे हैं जन्म मरण के चक्र से परे तो तो कहना चाहिए जो ये जो विशेषण है ना सर्व ये एक विशेषण है ये तब लग रहा है जब सर्व मतलब जिसमें सब हो गया सब हां या तो जैसे हम सर्वज्ञ कहेंगे तो हम कहें कि क्या ईश्वर ये जानता है कि नाली में कौन सा कीड़ा चल रहा है अब हम कह दे कि वो नाली में जानना उसका काम नहीं है हम कह दे वो अच्छी अच्छी चीज नहीं है। उसको क्यों जाने ईश्वर? तो मगर वो अगर नहीं जानता है कि नाली में क्या है तो वहां पर सर्वज्ञता नष्ट हो जाएगी। ये मानना पड़ेगा कि नाली की चीजें भी उसको पता है। यानी कि अच्छी और बुरी सब चीजें उसको पता है। इसीलिए अगर कोई छोटा काम है या बड़ा काम है। अगर छोटा भी है तो भी उसको करना होना चाहिए। तभी वह सर्वशक्तिमान होगा। इसको एक इसको एक एक तरीके से और देख सकते हैं। हम लोग यह कैसे किसी को सिद्ध करें कि ईश्वर है। ईश्वर है। हम ईश्वर की शक्तियों को अनुभव करके यह कैसे पता चलेगा कि उसी की शक्ति है? जैसे जो लोग कहते हैं मैं ईश्वर को नहीं मानता तो हम उसको क्या कहें? जिस प्रकार देखा जाए यह फैन चल रहा है हम हम इस फैन के नीचे बैठे हुए हैं जी और हमें ठंडी हवा लग रही है जी

00:13:59:01 तो हम केवल फैन को देख रहे हैं ना क्योंकि वो स्थूल है जी लेकिन हवा को तो नहीं देखा जा रहा है उसकी हम महसूस तो कर रहे हैं ना तो उसी प्रकार परमात्मा है ना तो परमात्मा को हम अनुभव करते हैं ना परमात्मा की शक्तियों को हम अनुभव करते हैं ना लेकिन परमात्मा दिखाई नहीं दे रहा है। इसका यह मतलब तो नहीं कि परमात्मा नहीं है। नहीं वो तो दिखाई देना और ना देना तो इस पर निर्भर करता है कि भगवान ने हमें जो इंद्रियां दी हैं उसमें से एक इंद्री उसने नहीं दी देखने वाली जो ईश्वर को देख सके। मान लीजिए कि ईश्वर को देख सकने वाली इंद्री नहीं दी तो नहीं देख पा रहे। अभी वह दे दे तो हो सकता है देख ले तो उसके ऊपर कंट उसके ऊपर वो है सामर्थ्य कि वह चाहे तो अपने आप को दिखाए वो चाहे तो ना दिखाए वह तो एक अलग बात है। मगर एक व्यक्ति जैसे हमने कहा पंखा चल रहा है तो पंखा चलने से सिद्ध होता है कि इसके पीछे कोई शक्ति काम कर रही है। उसी प्रकार से उसी प्रकार से पूरी सृष्टि का संचालन हो रहा है। तो इसका मतलब है कि कोई पीछे शक्ति है। मगर इसमें दिक्कत ये आती है कि पीछे शक्ति है तो हम उस पीछे वाली शक्ति को शक्ति माने। ईश्वर माने कि यह सोचे हो सकता है इसके भी पीछे कोई शक्ति होगी फिर उसके भी पीछे कोई शक्ति होगी जी जैसे मान लीजिए शक्ति तो एक ही होगी हां शक्ति तो एक ही होगी ना हां और उस शक्ति को हम सर्वशक्ति

00:15:14:07 भगवान का नाम देंगे ना नहीं ठीक है दे दिया मगर हम ये कैसे माने कि वो शक्ति ही हमारा गंतव्य है मतलब कि मेरा जैसे मान लीजिए भगवान है आपने कहा कि जो शक्ति सबसे लास्ट में इस पूरी सृष्टि को संचालित कर रही इसके पीछे कोई नहीं है। वही है। तो वो हमारा ऐ है। उसके बीच में मेरा संबंध है। मेरा और उसमें ये कैसे माने? जैसे मान लीजिए मान लीजिए कि इस दुनिया में कोई बहुत अमीर है। बहुत अमीर है। उसके पास बहुत पैसा है। तो मुझे क्या उससे मेरा संबंध स्थापित होना चाहिए ना। तभी तो मैं उसकी ओर आगे बढूंगा। तो वो कैसे हो?

00:15:54:14 संबंध स्थापित करना। परमात्मा कहते हैं मैं परमात्मा और हम सब उसकी संतान आत्मा तो आत्मा का अपने पिता परमात्मा से संबंध ना होना ये तो कोई बात नहीं है। नहीं नहीं ये तो परमात्मा कह रहे हैं। फिर जो नास्तिक है ना जी हां उसको पहले मानना पड़ेगा कि परमात्मा है और ये जो कह रहा है वो सही कह रहा है। तब वो मानेगा इस बात को। नास्तिक अगर अपने मन में यह सोचे कि अगर मैंने इस सृष्टि पर जन्म लिया है, जन्म लिया है जी तो वो माता के गर्भ से जन्म लिया हुआ है। जी है ना? लेकिन माता के गर्भ में मैं जो आत्मा आई हूं वो कहां से आई है? उसका भी तो अपना कोई स्थान होगा ना। जब हम ये कहते हैं जब हम किसी से परिचय प्राप्त करते हैं तो हम कहते हैं कि भाई आप कहां से आए हैं? तो वह अपना स्थूल परिचय देते हैं। हम उनसे पुनः कहते हैं कि हम आपको पूछ रहे हैं। तो वह पुनः अपने शरीर का ही परिचय देते हैं। लेकिन वो शरीर ना हो के वो एक आत्मा है। जब हम कहते हैं कि नहीं आप एक आत्मा है तो आत्मा कहां से आई है? अब वो कहेगा कि मैं आत्मा तो भगवान के घर से आई हूं। तो अब वो भगवान रहता

00:17:09:22 कहां है? तब वो भगवान तो इस पारबह्म के पार में रहता है। अर्थात इस सृष्टि से परे रहता है। नहीं नहीं इसमें इसमें दीदी ये बात है ना जैसे किसी ने मान लिया कि आत्मा है। ठीक है। हम उससे कह रहे हैं कि अब आत्मा कहां से आई है? तो ये सवाल तो जो आपने कहा ना जो समस्त सृष्टि के पीछे संचालित करने वाली जो शक्ति है उससे भी कहा जाता है। कहा जा सकता है कि तुम कहां से आई हो? कोई देखो कोई एक भी व्यक्ति हो सकता है ना। कोई एक ही व्यक्ति हो सकता है। अगर हम यह कहते हैं कि परमात्मा है तो परमात्मा एक ही होगा। परमात्मा एक ही होगा। आप बहुत सारी देव आत्माओं को देख लीजिए। आप बहुत सारी धर्मात्मा हो सकती हैं। महान आत्मा पुण्य आत्मा हो सकती हैं। लेकिन बहुत सारे परमात्मा नहीं हो सकते हैं। परमात्मा एक ही मेरा क्वेश्चन अलग है। मैं ये कह रहा हूं कि परमात्मा एक है। हमने मान लिया कि कोई एक शक्ति है जो इस पूरे संसार को चला रही है। ठीक है? मगर मेरा जो नाशिक वो नहीं मान मेरा मेरा उससे संबंध क्या है जो मैं उसकी पूजा करूं उसकी बातें मानू मेरा क्या संबंध है उससे ये कैसे सिद्ध होगा वो वो वो तो वो वो वो तो यह कह देगा जैसे बुद्ध बौद्ध दर्शन

00:18:24:24 जो कहता है वो कहता है भाई प्रकृति सब कुछ है प्रकृति चला रही है अपने आप चल रहा है और जो है आप यह करोगे तो यह होगा यह करोगे तो यह होगा बात खत्म कोई ईश्वर ईश्वर नहीं है यह नास्तिकों का दर्शन भी कहता है बौद्ध दर्शन नास्तिक दर्शन है ही तो अब यदि मैंने मान लिया प्रकृति चला रही ठीक है चला रही उससे मेरा कोई रिलेशन नहीं है जब तक हम रिलेशन नहीं सिद्ध करेंगे तब तक ईश्वर सिद्ध नहीं होगा और जब तक ईश्वर नहीं सिद्ध करेंगे तब तक धर्म सिद्ध नहीं होगा और जब तक हम धर्म सिद्ध नहीं करेंगे तब तक हम ये पहचान नहीं पाएंगे कि इस्लाम और ईसाइयत को हम धर्म कहें ना कहें ये पॉइंट मतलब वहीं से कनेक्टेड है ये बात इसलिए आवश्यक है कि हम मतलब पहले ये जाने कि हम ये समझ पाए कि क्या कहते हैं कि ईश्वर सिद्ध कैसे होता है? अब जैसे हमने कहा एक्चुअली मेरी जानकारी में जो है ईश्वर नास्तिक से ही शुरू होती है सारी यात्रा। ईश्वर को सिद्ध करेंगे जब आप अगर सिद्ध करेंगे अगर सिद्ध नहीं करना केवल परमात्मा ने कहा है मान लो तो फिर तो वो वाली बात है कि जिसको मानना है मानेगा। जिसकी आस्था हो गई आपकी बातें उसको अच्छी लगी वो प्रभावित हुआ तो उसने मान लिया। मगर वो ठोस जो एक होता है ना कि उस फिर तस से मस ना होने वाली बात वो वाली बात नहीं हो पाएगी उसमें तो हम लोगों की जो व्याख्या है वो असुतो मा सद्गमया

00:19:39:25 तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यु मा मृतम गम से शुरू होती है एक जीव के अंदर एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी कभी ना मरने की प्यास है हम अखंड ज्ञानी बन जाने की प्यास है कोई आया तो कौन आया अपने आप सोचने लगे कल पाकिस्तान इंडिया में कौन जीतने वाला है अपने आप सोचने लगे और इसके साथ ही साथ सदा आनंद ंदित रहने की प्यास है। हमारे अंदर सच्चित आनंद की प्यास है। इसका मतलब जैसे हमारे अंदर ऐसी कोई प्यास नहीं है जिसका विषय इस दुनिया में ना हो। उसका निराकरण करने वाला। जैसे हम हमारे अंदर भूख है तो दुनिया में खाना है। हमारे अंदर प्यास है। दुनिया में पानी है। हमारे अंदर देखने की क्षमता है तो दुनिया में दृश्य है। सुनने की क्षमता है तो दुनिया में आवाज है। तो जिस प्रकार भूख होने से ही सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कुछ है जो आपकी भूख मिटा सकता है। प्यास होने से ही सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कोई आपकी प्यास मिटाने वाला तत्व है। उसी प्रकार से सच्चित आनंद की प्यास होने से ये कभी ना मरने की प्यास, अखंड ज्ञानी की प्यास और आनंद की प्यास। तो सच्चिदानंद की प्यास से ही सिद्ध हो जाता है कि दुनिया में सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व है। अच्छा इस प्यास को अगर हम थोड़ा निचोड़ करके देखें तो नास्तिक भी कभी-कभी ये सोचता है कि बारिश ज्यादा हो रही है तो कम हो जाए। जबकि वो सुपर

00:20:54:28 सुप्रीम अथॉरिटी में विश्वास नहीं कर रहा है। मगर वो सोच रहा है कि बारिश कम हो जाए। और क्या कहते हैं? धूप ज्यादा पड़ रही है तो कम हो जाए। नास्तिक भी ऐसा सोच लेता है। इसका मतलब उसके अंदर भी सच्चिदानंद को ढूंढने की चाह है। और यह जो वो सोच रहा है ना ये बार-बार प्रकृति के नियमों के विपरीत है ना? तो इसका मतलब वो प्रकृति के सभी प्रकार के नियमों को तोड़ देने की चाह उसके अंदर विद्यमान है। और इसी से सिद्ध होता है कि इस संसार में कोई ऐसा है जो प्रकृति के सभी नियमों को तोड़ देता है। तो यहां से ईश्वर तो सिद्ध हो गया। मगर जो हम वो वाला ईश्वर जो प्रकृति के सभी नियमों को ना तोड़ पाए वो वाला ईश्वर यहां से सिद्ध नहीं होगा। अच्छा हां ये दिक्कत है। ईश्वर तो सिद्ध हो जाएगा मगर तब हमें कहना पड़ेगा कि हां प्रकृति के सभी नियमों को तोड़ मां की कोख से भी आएगा। राम मतलब वो एक अलग वो आ जाएगी। राम में भी आएगा कृष्ण बन के भी आएगा। अब जब हम ये डिसाइड कर लेते हैं कि क्या कहते हैं? ईश्वर क्या कहते हैं? कैसे सिद्ध हुआ? तो इससे वह ईश्वर सिद्ध हुआ जो सब कुछ कर सकता है। फिर वहां बाधित ईश्वर नहीं है। अब जब हमने यह देखा कि बाधित ईश्वर सिद्ध हुआ उसके बिना नास्तिक नास्तिक अवधारणा खत्म ही नहीं हो सकती। बाधित ईश्वर के बिना बुद्धिज्म को हराने

00:22:10:00 वाला भी सर्वशक्तिमान ईश्वर अद्वैत का ही था शंकराचार्य जी का। तो जब हमें यह पता चल जाता है कि बाधित ईश्वर ही है। अबाध्य ईश्वर ही है जो नास्तिकता को खत्म कर सकता है। अब देखते हैं कि जैसे हमने कहा कुरान भी धर्म है। तो धर्म यहां से क्या सिद्ध हुआ है? धर्म यहां से ये सिद्ध हुआ कि जीव की चाह का जो वास्तविक विषय है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसको प्राप्त कराने वाली विधा का नाम धर्म है। कि आप यह करोगे तो ईश्वर प्राप्त होगा। आपका सच्चिदानंद जिसको आप खोज रहे हो और यह नहीं करोगे तो प्राप्त नहीं होगा। तो यह तो हमने सिद्ध कर लिया। अब बात यह आती है कि कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर क्या वही है? वैसा ही है जैसा यहां से हो रहा है। तो पता चलता है कि कुरान खुद कह रही है कि मेरा ईश्वर यह नहीं कर सकता। मेरा ईश्वर वो नहीं कर सकता। बाइबल खुद कह रही है मेरा ईश्वर यह नहीं कह सकता। तो फिर उसके द्वारा बताया गया उस बाधित एंटिटी को प्राप्त कराने वाली जो विधा है। उसको फिर धर्म नहीं कह पाएंगे। ये छोटा सा मेरा वो था। इसमें थोड़ा सा प्रकाश डालें। जी चल

00:23:12:16 किरण दीदी आप क्लियर करेंगे? हां दीदी आप आ जाइए। और अच्छे से एक्सप्लेन कर दो भाई साहब के प्रश्न उत्तर को। वो क्लिप दे दीजिए दीदी को। देवता धर्म के बाद अब्राहम आया जिसने अपने आखरी बल से पवित्रता की शक्ति से इस्लाम धर्म

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00:23:54:14 [संगीत]

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 23:56 · 21 Feb 2026

सवाल सुनकर चुप क्यों हो गए ब्रह्माकुमारी?

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