No part of this video is used anywhere yet.
SRT: ⬇ SRT ⬇ Original file

.srt or .vtt (Hindi). The old file is backed up. After that the match for this video is rebuilt (may take a few minutes, keep the page open).

⬜ Not used yet · 00:00:02:21 – 00:21:29:00 (21:26)

00:00:02:21 नारायण समारंभाम शंकराचार्य मध्यमाम सदाचार्यता वंदे गुरु परंपरा तो दसवा समास है हमारा पठित मूर्खों के लक्षण ऊपर जो लक्षण बतलाए गए हैं उससे मूर्खों में भी चतुरता आ जाती है जो पीछे अब उन लोगों के लक्षण बतलाए जाते हैं जो सयाने और समझदार होकर कर भी मूर्ख होते हैं। ऐसे लोगों को पढ़ा लिखा मूर्ख कहते हैं। इससे श्रोता लोग दुखी ना हो।

00:00:39:06 अवगुणों का परित्याग करने से सुख प्राप्त होता है। पढ़ा लिखा मूर्ख वह होता है जो बहुश्रत और विद्वान तो होता है और बहुत अच्छी तरह ब्रह्म ज्ञान बतलाता है पर फिर भी मन में दुराशा और अभिमान रखता है। ऐसा व्यक्ति मुक्ति का प्रतिपादन करता हुआ भी सगुण भक्ति का खंडन या उच्छेद करता है और अपने धर्म तथा साधनों की निंदा करता है। अपने ज्ञान के आवेश में वह सबको दोषी या खराब बतलाता है। प्राणी मात्र के दोष ढूंढता है। यह वो है लोकेश वाला दंभी है ना यह दंभ जो है कहां पर आता है इसको हमें ध्यान रखना चाहिए। जब

00:01:28:16 कोई सामान्य व्यक्ति, सामान्य साधक, कोई सामान्य सत्य की खोज करने वाला किसी समर्थवान गुरु के श्री चरणों में पहुंच जाता है। वहां पर ये बहुत ज्यादा होता है। तो होता क्या है कि वहां पर पहुंच गए तो उसको ये दिखाई देता है। उसको तब ये पता चलता है भाई कि जो अब जितने भी और लोग हैं यह सब तो पता नहीं क्या बता रहे हैं। इन्होंने तो सब मतलब ऐसा बता करके रख दिया कि सब नगण्य नजर आ रहा है। तो उसको उस आचार्य चरणों को लेकर के कारण उसके अंदर दंभ भी आ जाता है। और दंभ के कारण वह हर एक के साथ रोकना टोकना और अनावश्यक रूप से जहां पर आवश्यकता नहीं भी है वहां पर भी सिद्धांत के द्वारा जो है दूसरों का दमन करना उन्हें डोमिनेट करना क्योंकि उनको नॉलेज हो गई है। इस कारण से जो व्यवहारिकता है उसमें रूखापन या फिर अहंकार इस तरह की चीजें आपको दिखाई देने लगती है। जबकि इस संबंध में गुरुदेव के वचन

00:02:43:18 प्राप्त है। हमें पता नहीं किस संबंध में मैंने ही प्रश्न किया था गुरुदेव से एक बार तो गुरुदेव ने बोला था कि अ किसी को भी एक दिन में घी नहीं पिला देना चाहिए सारा का सारा। अब यह क्या है कि आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे परंपरा प्राप्त आचार्यों से जुड़े हुए और मैं कहूंगा उनमें से एक अपने बाबूजी भी है ना वो जो परिसाधना वाले तो होता क्या है कि जब आप प्रामाणिक चीजों से जुड़ते हैं परंपरा प्राप्त अकाट्य सिद्धांत आपको मिलते हैं तो आपके अंदर एक दम आ जाता है। अब आप हर सामान्य व्यक्ति को उस चश्मे के द्वारा लगा करके देखने लगते हो। यह कर रहा है कि नहीं? अच्छा जनेऊ हो जाना चाहिए। आठ वर्ष की आयु तक जनेऊ हो जाना चाहिए। अच्छा नहीं हुआ इसका। अच्छा। तुम पते हो तुम ये हो, तुम वो हो। तुम यह नहीं कर रहे हो। वह दिन भर उसका यही समीक्षा लोगों की समीक्षा करते रहना उसका काम हो जाता है। खैर यह जो अपना जिन्न वाले बाबा है इनकी तो बात ही अलग है। खैर मगर जो एक सामान्य आचार्यों के जो शिष्य हैं और उनको जो है

00:03:59:15 विद्वान भी हैं। तो कई उसमें कई परिस्थितियों में ऐसा दम आ जाता है। वो यह निश्चित करना भूल जाते हैं कि हमको यह जो बात है हां, है ना? तो वो यह तय करना भूल जाते हैं कि यह जो बात है, इसको कहां पर हमें कठोरता के साथ रखना है और कहां पे हमें विनम्रता पूर्वक निवेदन पूर्वक रखना है। कहां पे हमें इन दोनों के बीच की स्थिति में रखना है। इसी को गुरुदेव ने कहा था दर्शन विज्ञान और व्यवहार। बहुत कई वर्ष पूर्व जब मैं उनके आश्रम में गया था प्रयागराज जोशी। तो आज वो जो उनका वह वक्तव्य है ना वह शायद थोड़ा सा धुंधला गया है। फेड हो गया है। कागज में छपा हुआ वक्तव्य है। जो व्यक्ति अपने अपनी बात को दर्शन विज्ञान और व्यवहार में सामंजस्य पूर्वक रखता है। सामंजस्य बनाते हुए अपनी बात को रखता है वह कभी भी असफल नहीं होता है। यह उन्होंने कहा उस उनका यह कोड जो है वहां पर लगा हुआ है। अभी भी लगा है पर वह मतलब फेड हो गया क्योंकि कागज में लगा था ना सीधेसीधे पेपर में फेड हो गया मगर यहां से कभी फेड नहीं हुआ वो वक्तव्य यहां छप गया है और यही कारण है कि

00:05:14:21 हम लोग इतने मोर्चे संभाल रहे हैं और इस हद तक हम बोल रहे हैं बड़ी-बड़ी बड़े-बड़े जो तंत्र हैं जो अच्छे खासे फैले हुए हैं उनसे भी लोहा ले रहे हैं। परंतु कहीं पर भी ऐसी चीज हमने नहीं निर्गत कर दी अपने द्वारा जिससे कि हम फंस जाएं। यह उस वक्तव्य का ही एकमात्र वो है प्रभाव। हमने उसको गांठ बांध ली। कैसे बोलना है अपनी बात को? तो यह हमें ध्यान रखना चाहिए। जब हम सामर्थ्यवान हो जाते हैं कि हमारा जो व्यवहार है वह कैसा रहे। सामर्थ्यवान का एक व्यवहार कैसा रहे। आप सामर्थ्यवान गुरु के सानिध्य में आ गए। उसके बाद जो है आपको ऐसी चीजें प्राप्त हुई कि जो कहीं और से प्राप्त नहीं हो सकती। तो आपका नजरिया ही चेंज हो गया। दूसरों को हीन भावना की दृष्टि से देखने लगे। लोकेशणा आ गई। दंभ आ गया तो वो दंभ और लोकेशना नहीं आना चाहिए। आपके अंदर इस इसमें गुरुदेव ने देखिए एक बार बात कही थी। गुरुदेव का एक तरीका देखिए। गुरुदेव जब कोई महिला मातृ शक्ति उनके पास आती और बोलती है कि क्या मैं गायत्री मंत्र का जाप कर सकती हूं तो गुरुदेव ये नहीं कहते वहां पर

00:06:29:27 कि आपको आपको अधिकार नहीं है नहीं तुम नहीं जप सकती ऐसे नहीं बोलते क्या बोलते हैं कि अपने ऊपर कल्याण करने की भावना से आपको इसके प्रयोग से बचना चाहिए इतना अच्छा बोला और इसके प्रयोग से बचते हुए आपको दूसरा वो देते भी हैं इसका जो मानस में रामचरितमानस में जो भावार्थ किया है उसको जपना जनक सुता जग जननी जान जनक सुता जग जननी जानकी अतिशय प्र करुणा निधान की ताके चुप पर कमल मनाऊं जासु कृपा निर्मल मति पाव निर्मल मति पा तो अब इसमें क्या हुआ कि व्यक्ति को अचानक से ये भी नहीं लगा कि मेरे पास कुछ था और वो चला गया जब हमने उससे कुछ लिया तो एट दी सेम टाइम उसको कुछ दिया भी। पहली बात दूसरी बात को रखने का ढंग क्या है कि यू मतलब आपको नहीं करना चाहिए अपने ऊपर कल्याण की भावना से ये नहीं है नहीं तुम स्त्री हो तुम तुम नहीं कर सकती ताप ऐसे नहीं इसको कहते है दर्शन विज्ञान और व्यवहार तो कई बार आपको ऐसे बड़े-बड़े आचार्यों से जुड़े हुए शिष्य मिल सकते हैं जो दंभ के कारण क्या बोलेंगे

00:07:45:15 नहीं तुम्हें अधिकार नहीं है। तुम ये नहीं कर सकते। अब जो व्यक्ति अभी आपका अपना हुआ नहीं है। जिसने अभी आपका अधिकार अपने ऊपर आपकी सत्ता स्वीकार नहीं की है। हां जो अभी आपको जान रहा है। यदि आप उसको प्रारंभिक स्तर पर ऐसा इस तरह से कठोर वचन बोलोगे आदेश पूर्वक बोलोगे। क्या वो आपका आगे का दर्शन सुनेगा? क्या वो आपकी जो वो सौंदर्यता है वो देखने का उसका मन होगा। उसकी अनास्था तो वही उत्पन्न हो जाएगी आपके प्रति। वो क्यों आगे आएगा? तो हमें जो है यह ध्यान रखना चाहिए कि इसी संदर्भ में गुरुदेव ने कहा था कि अ सारा घी एक दिन में नहीं पिलाया जाता और मैंने अपने कई लाइव में कई लोगों के साथ जो अनुभव है उसमें बताया है कि अ किस तरह से अच्छा कई लोग यहां पर भी उपस्थित हैं। यहां पर कई लोग उपस्थित है जो मेरे साथ कई वर्षों से जुड़े हुए हैं और बहुत दिनों से साथ में कार्य भी कर रहे हैं और ऐसे भी कुछ लोग हैं जिनमें जिन्होंने अभी तक गुरुदेव के प्रति पूर्ण निष्ठा है परंतु अभी तक उनसे दीक्षा नहीं ली है पूर्ण निष्ठा होती तो आप बताइए जो ऐसे लोग हैं यहां पर जो काफी दिनों से जुड़े

00:09:00:21 मैंने कभी किसी से कहा हो कि तुम मेरे गुरुदेव से दीक्षा ले लो कभी किसी से कहा केवल केवल सिद्धांत बताएं। फोन आता है गुरु गुरु कौन होना चाहिए? तो क्या करते हैं? सिद्धांत बताते हैं। आप उस सिद्धांत के अकॉर्डिंग अपने हिसाब से चुनिए। विकल्प पूछोगे तो विकल्प भी बता दूंगा। उसमें से एक विकल्प होगा हमारे गुरुदेव। ठीक है? मगर ऐसा नहीं है कि हमारे ही क्या कहते हैं? हमारे मेरे ही जिन जिनको मैं गुरु मानता हूं, जिनको मैंने जिनसे मैंने मंत्र लिया उनको आप भी ले लो। वरना आप खराब हो, आप ये हो, आप वो ना। ऐसे नहीं। तो गुरुदेव जिस तरह से सिखाते हैं, गुरुदेव जिस तरह से दृष्टांत बताते हैं और गुरुदेव जिस मार्ग को प्रशस्त करते हैं, उसी पर चलने का प्रयास करना चाहिए और यह जो सगुण भक्ति का खंडन दूसरी परंपराओं का अनादर, प्रामाणिक परंपराओं का अनादर, प्रामाणिक आचार्यों का अनादर अगर अपने मत मत की पुष्टि भी करनी है तो करिए। परंतु उसमें दूसरे के दूसरी किसी संप्रदाय आचार्य या उनका या उनकी विधि विधान का उनकी भक्ति का जो है अनादर पूर्वक नहीं करना चाहिए। तो यह दंभ के कारण करते हैं। मेरा एक निजी व्यक्तिगत अनुभव था तो

00:10:16:04 इसलिए बताना आवश्यक था और यहां पर कई लोग हैं आहान के जो साथ में कार्य कर रहे हैं और हम लोग इन स्थितियों से जूझे हैं और ऐसा ही कोई ऐसे ही गुट से निकला हुआ कोई व्यक्ति जब अपने आप को स्वयंभू बना लेता है तो वह बन जाता है। जैसे कोई विकृति फैलना चालू हुई, चालू हुई, चालू हुई। फिर एक दिन उस विकृति ने एक प्रॉपर एक स्वरूप ले लिया। जैसे किसी के अंदर कोई विक्षिप्तता आई, पागलपन आया और उस पागलपन ने फिर एक दिन कोई रूप धारण कर लिया तो वैसा ही वो रूप हो जाता है कालिया चिन्ह वाले बाबा का। वो हो गए सब। हालांकि उनके में केवल दंब नहीं है। उनके में योजनाबद्ध वो भी है, षड्यंत्र भी है, द्वेष भी है। बहुत सी चीजें हैं। उसमें पक्षपात भी है। खैर आगे चलते हैं। तो अपने ज्ञान के आवेश में वह सबको दोषी या खराब बतलाता है और प्राणी मात्र के दोष ढूंढता है। यदि उसके शिष्य से कोई अवज्ञा हो जाए या उस पर कोई संकट आ पड़े तो वह अपने कठोर शब्दों से उसे और भी दुखी कर देता है। वह रजोगुणी कपटी कुटिल अंतःकरण वाला और धनवानों की स्तुति करने वाला है। वह बिना किसी ग्रंथ को पूरी तरह से देखे ही उसके दोष बतलाने

00:11:31:13 लगता है। और यदि उससे गुण की कोई बात कही जाए तो उसमें भी अवगुण ही ढूंढता है। वह लक्षण सुनकर मन में बुरा मानता है। मत्सर के कारण झगड़ा करता है और नीति तथा न्याय की जगह उद्धत व्यवहार करता है। वह अपने ज्ञान के अभिमान में हट या दुराग्रह करता है। क्रोध को रोक नहीं सकता और उसके कार्यों तथा बातों में अंतर होता है। वह बिना अधिकार के वक्ता बनना और उपदेश देना चाहता है। बिना अधिकार के वक्ता और उपदेश कहां जा रही लाइन हमें

00:12:11:01 शंकराचार्य के यहां पर मंचन करने को नहीं मिलेगा तो हम ऐसा करते हैं अपनी पीठ बनाते हैं अपनी परंपरा बनाते हैं और माताजी से हम ले लेते हैं वो परम अक्षर सूत्र ब्रह्मसूत्र की जगह विकल्प वैकल्पिक ब्रह्मसूत्र शारीरिक भाष यदि वह श्रोता है तो अपनी बहु शुद्धता और वाचलता वाचालता से वक्ता के दोष बतलाता है। वह दूसरों के तो दोष बतलाता है पर उसे यह नहीं पता होता कि यह सब दोष स्वयं मुझ में वर्तमान वर्तमान है। विद्यमान होना चाहिए था। वर्तमान सबके वह चाहे अध्ययन करके सब विधाओं वह चाहे अध्ययन करके सब विद्याओं का ज्ञान भी प्राप्त कर ले। पर अपने ज्ञान से लोगों को संतुष्ट नहीं कर सकता। वह उसी प्रकार माया के फेर में फंसता है जिस प्रकार स्पर्श सुख के लोभ से हाथी ऊन की डोरी से बंधता है। या जिस प्रकार फूलों के रस के लोभ से भरा मृत्यु मुख में पड़ता है। वह स्त्रियों के साथ रहता है। उन्हीं को ब्रह्म ज्ञान बतलाता है और निंदनीय वस्तु अंगीकार करता है। वह अपने मन में उन्हीं बातों को दृढ़ता

00:13:26:04 पूर्वक धारण करता है जिनसे मनुष्य तुच्छ बनता है और अपने शरीर को ही सब कुछ समझता है। वह श्रीपति या भगवान को छोड़कर मनुष्यों की स्तुति करता है अथवा जो उसके सामने आ जाए उसकी कीर्ति का वर्णन करने लगता है। वह स्त्रियों के अवयवों और अनेक प्रकार के नाटकों तथा हावभाव आदि का वर्णन करता है। अथवा ईश्वर को भूल जाता है। वह अपने वैभव के अभिमान में जीव मात्र को तुच्छ समझता है। पाखंड पूर्ण मत का स्थापन करता है। यानी कि अवैदिक चीजों का स्थापन करता है। यदि कोई व्यक्ति विद्वान, वीतराग, ब्रह्म ज्ञानी और महायोगी होने पर भी संसार को उसका भविष्य बतलाने लगे तो वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख होता है।

00:14:14:09 पढ़ा लिखा मूर्ख कोई बात सुनकर मन में उसके दोषों का ही विवेचन करता है और दूसरों उसकी अच्छी बातों को देखकर मत्सर करता है। वह भक्ति का साधन या भजन नहीं करता है और ना उसमें वैराग्य ही होता है। जो बिना क्रिया के ही ब्रह्म ज्ञान छांटता है, वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख होता है। वह तीर्थ, क्षेत्र वेदों और शास्त्रों आदि को थोड़ा अलग-अलग वैरायटी के मूर्ख भी हैं। है ना? एक जैसे ही नहीं है। लगातार क्षेत्र वेदों और शास्त्रों आदि को नहीं मानता। और पवित्र कुल में भी जन्म लेकर अपवित्र होता है। जो केवल अपना अनादर करने वाले से प्रेम करता है। बिना किसी की कीर्ति देखे ही उसकी स्तुति करता है। तुरंत ही उसकी और तुरंत ही उसकी निंदा करता हुआ अनादर भी करने लगता है। वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख होता है। अब स्तुति और निंदा का देख लीजिए। यह भी सिद्ध हो रहा है जिन्न वाले बाबा जी पर। कई लोगों की स्तुति करे बैठे थे और थोड़ा सा विपरीत परिस्थितियां आई तो ये शंकराचार्य होने के योग्य नहीं है। ये ये है ये पतलूून पहनता है। ये पेंट पहनता है। ये राक्षस

00:15:29:13 है ये है वो है। सब चालू कर दिया। इसीलिए ऐसी बातें बोलने से बचना चाहिए जिनको हम परिवर्त जिनको हम बाद में जाकर के अस्वीकार करना हो। ऐसी बातें नहीं बोलनी चाहिए। और मेरा यह प्रयास रहता है। मैं हालांकि इसको सिद्ध पुरुष तो नहीं हूं पर यह मेरा प्रयास रहता है कि मैं बात वही बोलूं जिसको बदलना ना पड़े क्योंकि वो श्री राम जी की कुछ शिक्षाएं हैं ना उनका पालन करने का मन करता है। श्री राम जैसा बनने का मन करता है। तो इसलिए ऐसा है। हालांकि बन तो नहीं पाएंगे। उसके लिए तो अनंत जन्मों भी लग जाए तो बन नहीं पाएंगे। मगर फिर भी कुछ कर पाए उनके जैसा। तो आगे जो है

00:16:30:04 जिसका नियम ही यह हो कि पिछली बातें तो कुछ और अगली बातें कुछ और जो कहता है कुछ और तथा करता है कुछ। वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख है। जो प्रपंच या माया का तो आदर करता है और परमार्थ का अनादर करता है। और जो जानबूझकर भी अंधकार में फंसता है वह भी पढ़ा लिखा मूर्ख। तो पढ़ा लिखा मूर्ख यथार्थवाद को छोड़कर केवल दूसरों को प्रसन्न करने वाली बातें कहता है और पराधीनता में जीवन बिताता है। वह ऊपर से दिखलाने के लिए ढोंग रचता है। ना करने योग्य काम करता है। उचित मार्ग से हट जाने पर भी हट करता है। वह दिन रात अच्छी-अच्छी बातें सुनने पर भी अवगुण नहीं छोड़ता। और यह नहीं जानता कि मेरी भलाई किस बात की। कथा निरूपण में अच्छे-अच्छे श्रोताओं के आकर बैठने पर उनके संबंध की शद्र बातें उनके दोष बतलाने लगता है। यदि उसका शिष्य अनाधिकारी होता है और उसकी अवज्ञा करता है तो वह उससे भी आशा रखता है। अब देखिए फिर आगे क्या बात आ रही है। मैंने एक बात यह कही थी कि

00:17:42:02 अन्य संप्रदाय और जो प्रामाणिक आचार्य उनका जो है कोई बात देख के वो उससे भी पीछे नहीं हटता अनादर करने से। तो अभी ऐसी बहुत सी स्थितियां आई थी जब जो है जो हमारा बहुत कट्टर विरोधी है उनको ऐसे आचार्यों की शरण प्राप्त थी जो दूसरे संप्रदाय के प्रामाणिक और वरिष्ठतम आचार्य हैं। पर फिर भी हमने कहीं पर भी अपनी मर्यादा को लांगा नहीं। हमने कहीं पर भी वह जो आचार्य गण हैं जिनकी शरण उन्हें उसे प्राप्त है। हमने कहीं पर भी उनका अनादर उनके लिए अनादर पूर्वक एक शब्द भी नहीं कहा। हां हमने कुछ चीजें बताई मगर उसमें ना तो उनकी शिक्षा के प्रति ना उनकी प्रामाणिकता के प्रति ना उनकी धर्म ब्रह्म की व्याख्या के प्रति कहीं पर भी विरोधा विरोधपूर्ण कोई बात नहीं कही। तो इसमें आगे अगर हम चले कि

00:18:43:06 यदि कथा श्रवण के समय यदि कथा श्रवण के समय किसी से कोई दोष हो जाए मैं इस समय 37वा पे पृष्ठ संख्या पे हूं। है ना? 37वीं पृष्ठ संख्या बुक के अनुसार तो हो जाए तो वह क्रोध पूर्वक चिड़चिड़ाने लगता है। वह अपने वैभव के अभिमान में सद्गुरु की उपेक्षा करता है। अथवा अपनी गुरु परंपरा छिपाता है। क्या छिपाता है? क्या छिपाता है? गुरु परंपरा। पठित मूर्खों के लक्षण तो पर्टिकुलर किसी एक व्यक्ति की ओर इशारा कर रहे हैं। वैसे जितने भी जो वर्णाश्रम विरुद्ध या फिर प्रामाणिक परंपराओं के विरुद्ध से जो तंत्र है तैयार होते हैं। वो भले ही झूठी परंपरा तैयार हो या फिर तंत्र तैयार हो। वह सब देखिए कि वह अपने गुरु का नाम नहीं बताएंगे। वह अपनी परंपरा नहीं बताएंगे। तो यहां क्या कहा जा रहा है? वह अपनी परंपरा छिपाता है। क्यों छिपाता है? क्योंकि इसलिए छिपाता है क्योंकि अगर उसने अपने गुरु का नाम बताया तो उसकी पोल खुल

00:19:58:09 सकती है। खैर वह ज्ञान का उपदेश करके अपना मतलब निकालता है। कृपणों के समान धन संग्रह करता है और धन संग्रह के लिए परमार्थ का उपयोग करता है। वह दूसरों को तो अच्छे उपदेश देता है पर स्वयं उसके अनुसार आचरण नहीं करता और फिर सदा ब्रह्म ज्ञान की पधारता है और गोस्वामी कहलाकर भी पराधीन रहता है। वह भक्ति मार्ग का नाश करता है। स्वयं अपनी हानि करने वाला काम करता है। यदि उसके हाथ से गृहस्ती आदि सब कुछ निकल जाए तो भी उसमें परमार्थ का लेश नहीं होता अथवा वह ब्राह्मणों तथा देवताओं का द्वेषी होता है। पढ़े लिखे मूर्खों के यह लक्षण या अवगुण इसलिए यहां बतलाए गए हैं कि लोग इनका परित्याग करें। भाई इसमें से जो भी बात हमारे ऊपर भी लागू हो रही हो उसे अवश्य त्याग दें। ये नहीं कि हम किसी और के बारे में ही सोचे। इसमें से कई बातें हैं जो हमसे भी होकर गुजरी होंगी। तो उसका चिंतन मनन अवश्य करें। और आत्मचिंतन अवश्य किया करिए। बहुत लाभदायक होता है।

00:21:02:12 यदि इसमें कोई त्रुटि रह गई हो तो विचक्षण लोग इनके लिए मुझे क्षमा करें। जो लोग इस संसार में सुख मानते हैं, वे परम मूर्खों से भी बढ़कर मूर्ख हैं। इस संसार के दुखों से बढ़कर कोई दुख नहीं है। अगले समास में संसार के इन्हीं सब दुखों का निरूपण किया गया है और यह बतलाया गया है कि गर्भ में आने और जन्म धारण करने पर मनुष्यों को कैसे-कैसे दारुण दुख भोगने पड़ते हैं। ठीक है?

Plans for this video (0)

No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.

🤖 Ask AI for suggestions

AI reads the remaining (unused) parts of this video and gives ideas for new videos: from where to where, hook, and what to remove from the middle. Suggestions follow the RULES and appear here as "AI Suggestion". You can review, edit or approve them.

  • ⬜
    Hindi SRT Required

    YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)

  • ⬜
    English SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.

  • ⬜
    Title (per Rules)

    Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.

  • ⬜
    Description

    YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.

  • ⬜
    End Screen

    YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.

  • ⬜
    Cards

    YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.

  • ⬜
    Playlist Automatic

    YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.

  • ⬜
    Thumbnail

    YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.

"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.

Playlists

Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).

B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 21:49 · 20 Feb 2026

समझदार और पढ़े-लिखे होकर भी यदि ऐसे लक्षण दिखें, तो क्या उन्हें मूर्ख कहा जाए? Dasbodh Lecture #7

0%
☁️ Drive Not in Drive yet

🔗 This video is made from parts of these videos

A · Live Live discussion #ram #krishan #shiv #puranved #vedpuran
Open at 01:46:26:27

Notes

Description

(empty)

History

No changes yet.

✂️ Clip Cutter

⌨️ Keyboard shortcuts

Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop

▶

Start

End

🔍 zoom
Already used Plan clips
⚠️ () of this clip is already used in another video (green part). Fine if on purpose, otherwise change the times.
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)

Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".

Clips () · Total

Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.

Hook, full note for editor, status