⬜ Not used yet · 00:00:02:19 – 00:45:54:00 (45:51)
00:00:02:19 ईश्वर के नाम का घोष और जय जयकार की गर्जना होती है। जहां निरंतर प्रेमी भक्तों के गायन, भगवत कथा, हरि कीर्तन और वेदों, आख्यानों तथा पुराणों का श्रवण होता रहता है। जहां परमेश्वर का गुण गुणानुवाद या अनेक निरूपणों की बातचीत होती है और अध्यात्म विद्या के भेदों और अभेदों का विवेचन होता है। यह अपनी सभा की बात हो रही है क्या? या फिर YouTube लाइव स्ट्रीम चर्चाओं की बात हो रही है।
00:00:36:02 जहां अनेक प्रकार के समाधान होते हैं। नाना शंकाओं की निवृत्ति होती। अब ये अपनी सभा नहीं है। अब ये गुरुदेव की सभा है। नाना प्रकार की शंका जो शंकाएं हैं उनकी निवृत्ति भी हो रही है ना। वो अपने पास उतनी अवेलेबिलिटी नहीं है। अ और वाग विलास से चित्त में ध्यान की मूर्ति बैठती है। जिसमें प्रेमी और भावुक भक्त गंभीर और सात्विक सभ्य रम्य रसाल गायक निष्ठावान कर्मशील आचारशील दानशील धर्मशील पवित्र और पुण्यशील शुद्ध हृदय वाले कृपालु योगी वीतरागी उदास जटाधारी नाथपंथी मुद्राधारी बाल ब्रह्मचारी योगीश्वर उरश चरण और तपस्या करने वाले तीर्थवासी मनस्वी महायोगी और लोक सेवक जनता के अनुसार चलने वाले सिद्ध साधु और साधक मंत्र यंत्र शोधक एकनिष्ठ उपासक गुण ग्राही संत सज्जन विद्वान वेदज्ञ शास्त्रज्ञ महात्मा प्रबुद्ध सर्वज्ञ समाधान और शुद्धि करने वाले योगी विद्वान ऋषिवर
00:01:49:15 उत्कट तार्किक कवीश्वर मनोजय के मुनीश्वर और दिगंबर पौराणिक विद्वान वैदिक भट्ट पाठक यजुर्वेदी उत्तम और बड़े श्रोतय याज्ञकिक अग्निहोत्री वैद्य और पंचाक्षरी परोपकारी भूत भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालों का ज्ञान रखने वाले बहुश्रत निराभिमानी निरपेक्ष शांति दया और क्षमाशील शील पवित्र तथा सत्वशील शुद्ध हृदय वाले ज्ञानशील और ईश्वर पुरुष आदि सभा नायक उपस्थित है। इतने लोग हुए भाई जिनमें नित्य और अनित्य का विवेक है। उस सभा की अलौकिक महिमा का वर्णन कैसे हो सकता है? जहां परमार्थी लोगों के द्वारा कथा श्रवण के उपाय होते रहते हैं। वहां लोगों के तरण का उपाय सहज ही हो जाता है। जहां उत्तम गुणियों की मंडली है। जहां सत्य और धैर्य आदि उत्तम गुणों वाले लोग रहते हैं। और जहां सदा सुख ही सुख रहता है।
00:03:04:24 जहां विद्या पात्र कला पात्र विशेष गुणों के सत्पात्र भगवान के प्रीति पात्र एकत्र होते हैं। जहां प्रवृत्ति वाले, निवृत्ति वाले और प्रपंची और परमार्थी, गृहस्थ और वानप्रस्थ, सन्यासी, वृद्ध, तरुण और बालक पुरुष और स्त्रियां सभी मिलकर अखंड रूप से अंतर्यामी भगवान का ध्यान करते हैं। यह जो सब परमेश्वर के भक्त हैं और जिनसे अकस्मात समाधान होता है, उन सबका मैं अभिवंदन करता हूं। उस सभा को मेरा नमस्कार है जिसमें नित्य और निरंतर भगवान का कीर्तन होता है। अनेक ग्रंथों में बड़े लोगों ने कहा है कि जहां भगवान की मूर्ति होती है वहीं उत्तम गति मिलती है। कलयुग में कीर्तन ही सबसे बढ़कर है और जहां वह कीर्तन हो वही सभा श्रेष्ठ है। वहां कथा सुनने से अनेक प्रकार के कष्ट और संदेह नष्ट हो जाते हैं। देखिए यह हम पढ़ चुके हैं और आप नहीं थे और हम पहले समास पर आ गए थे।
00:04:09:20 जिसमें मूर्ख के लक्षण है। है ना? ठीक है। एक बार रिवाइज हो जाएगा। तो यहां पर सभा में उपस्थित लोगों की अ महिमा गान करते हुए सभा के प्रति आपको एकाग्र बनाने का प्रयास किया गया है और इसमें एक अभी शब्द आया था पिछला जब हम पढ़ रहे थे निराभिमान निरभिमान निरभिमान शब्द इन दिनों मेरे जानकारी में फिर से आया है। उसका कारण है सत्यार्थ प्रकाश। सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद जी लिखते हैं कि
00:04:59:06 सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद जी लिखते हैं कि भक्ति करने पर भगवान जो है वो कुछ ऐसे देते नहीं है मगर हां भक्ति करने से निरभिमानता आती है। अब ये निरभिमानता आने का आशय क्या है? यहां पे क्या हुआ ना? अप्रत्यक्ष रूप से दयानंद जी ने अपनी बात का खंडन सा कर लिया। जैसे वह अगर यह कहते हैं या तो वह यह कहते हो कि तात्विक रूप से वह यह मानते हैं कि भगवान कुछ देते नहीं है बल्कि अपने कर्मों का फल प्राप्त होता है। यह बात तो ठीक है। तात्विक रूप से ऐसा ही होता है। मगर व्यवहारिक रूप से क्या है? हमारी जो इंद्रियां हैं उनके द्वारा प्राप्त होने वाली सूचना क्या है? यह तो अनुमान और शब्द के द्वारा हमें प्राप्त हो रहा है कि कर्मों का फल मिलता है। इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाली प्राप्त होने वाली जानकारी यह है कि जब हम भगवान से कुछ मांगते हैं तो भगवान देते हैं। सच्चे हृदय से जब उनकी भक्ति करते हैं तो भगवान देते हैं। मगर इस इंफॉर्मेशन को वो कट कर देते हैं। मगर दूसरी ओर वो अपने ग्रंथ में नर निरभिमानता लिखते हैं कि जब भक्ति करते हैं ईश्वर की तो निरभिमानता आती है। अब निरभिमानता का मतलब क्या है? कि हमें जो भी प्राप्त हो रहा है उसका कारण हम स्वयं
00:06:14:14 को ना उसका क्रेडिट हम स्वयं को ना दें। तो किसको दें? ईश्वर को। तो यानी कि एक तरफ हम क्या कह रहे हैं कि ईश्वर से कुछ नहीं मिलने वाला। व्यक्ति को अपने कर्मों का फल ही मिलेगा। दूसरी तरफ हम क्या कह रहे हैं कि भले ही ईश्वर से कुछ ना मिल रहा हो। अपने कर्मों का फल ही मिल रहा हो। मगर मानना यही है कि ईश्वर से मिल रहा है। तो यह पता कर ले कि मानना क्या है? सोचने वाली बात मानना क्या है भाई? ईश्वर से मिलना माने कि ना माने? कर्मों का फल भी ईश्वर से ही मिलेगा और अगर भक्ति करेंगे तो कल्याण भी उन्हीं से ही मिलेगा। यह मानना है। अंतत गतवा कुछ और है। तात्विक विवेचना जो आपको बता दी। मगर वह क्या कह रहे हैं कि मानो भी वही तात्विक विवेचना। फिर वह यह कह रहे हैं कि
00:07:09:01 फिर वह यह कह रहे हैं जिनके क्वेश्चन है ना वो लास्ट में रख लीजिए अभी लास्ट में ले लेंगे। फिर वो ये कह रहे हैं कि नहीं नहीं ऐसा मत मानो कि स्वयं से किया है। तुमने स्वयं कुछ किया है। तुम्हें मानना यही पड़ेगा। तुम्हें मानना यही चाहिए कि भगवान ने किया है। तो जब हम मानना चाह रहे हैं कि सब कुछ भगवान ने ही किया है उस और से उस और अपना ध्यान ले जाना चाह रहे हैं। ना हमने कुछ अच्छा किया है ना हमने मतलब हमें हम अपने आप को जो अहम भाव है ना अहंकार जो गीता में मना किया गया है जो बाधक जो बंधन का वो है पर्याय है अहंकार तो उससे छूटने के लिए यही है कि भाई आप अपने आचार विचार में एक बात को डालें अपने आपको क्योंकि इंद्रियों से पता चल रहा है कि आपने किया है तो आप अपने आप को बताना शुरू करें कि नहीं मैंने नहीं किया है। विशेष तौर पर अच्छी चीज तो मैंने बिल्कुल नहीं की। तो किसने की है? ये भगवान ने की। तो क्या करें? भगवत कृपा से। भगवत कृपा से। भगवत कृपा से। यह कार्य कैसे हुआ? भगवत कृपा से। गुरु गोविंद और ग्रंथ की कृपा से। यह अपने को बार-बार बार-बार सुनाएं। जिससे कि आपका जो अहंकार है कि मैंने किया, मैंने किया, मैंने किया, मैंने किया। मैं मैं वो मैं नष्ट हो। जब
00:08:24:07 नष्ट होगा तभी तो आप जो है आत्म स्वरूप ज्ञान स्वरूप भगवान के साथ एक ही भूत हो पाएंगे। जब तक आपका अहंकार बचा रहेगा कि आप कुछ हैं तब तक आप जो है एक ही भूत थोड़ी ना हो पाएंगे। तब तक आपकी मुक्ति संभव नहीं है। और भगवान के प्रति आसक्ति भी तभी उत्पन्न होगी। जब दिन भर आपके चिंतन गुजेगा। चिंतन की डेफिनेशन भी बता दी गई है। भगवत गीता के अनुसार चिंतन की डेफिनेशन क्या है? चिंतन से उत्पन्न होती है आसक्ति। आसक्ति से उत्पन्न होता है क्रोध। क्रोध से उत्पन्न होता है भ्रम। हम और भ्रम से उत्पन्न होता है कष्ट। है ना? तो इस क्रम को समझें और यह एक बात है कि आर्य समाज के जो विद्वान है उन्हें ऐसा कहने से बचना चाहिए कि ईश्वर कुछ नहीं देता है क्योंकि सतही स्तर पर हमको यही मानना है कि ईश्वर कुछ दे रहा है। ईश्वर ही कर रहा है जो भी कर रहा है। यह व्यवहारिक सत्य है। जैसे कर्म्यवादी कारस्ते मा फले कदाच अंतत कथवा हम ईश्वर की
00:09:39:13 बात क्यों मानते हैं क्यों मानते हैं क्योंकि हमें संत सच्चित आनंद चाहिए मगर भगवत पाद शंकराचार्य जी लिखते हैं अपने ग्रंथ में कि हमें यह भी नहीं सोचना चाहिए भगवत कार्य करते समय शास्त्र वचन का कार्य शास्त्र वचनों का अनुसरण करते समय अनुकरण करते समय यह भी नहीं सोचना चाहिए कि हम मोक्ष के लिए कर रहे हैं। नहीं हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि शास्त्र ने कहा है वहां से भी अपने को ध्यान हटाना है। अद्वैत से हमें ध्यान हटाना है। इस चीज से ध्यान हटाना है कि भगवान सब जानते हैं। भगवान ने जो प्रारब्ध में लिखा होगा वही होगा। नहीं यहां से भी ध्यान हटाना है। फिर मोक्ष से भी ध्यान हटाना है। हमें मालूम सब पड़ गया। सब मालूम पड़ गया। अब क्या करना है? शास्त्र ने जो कहा है वो करिए और द्वैत का भाव है। ध्यान हटाना है। पृथ्वी गोल है। ध्यान हटाना है तो कहां लाना है? चपटेपन पर, द्वैत पर, भक्ति पर। इस पर ध्यान लगाना है। हम तब हम उस लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे जो लक्ष्य बहुत दुर्गम है। व्यवहार में ना आ सकने वाला। अब मैं उस परमार्थ की वंदना करता हूं जो साधकों का मुख्य स्वार्थ है। लोग जिसकी बात कर रहे थे वही आ
00:10:54:19 गया। यह योग सभी योगों से बढ़कर है। जो लोग आज पहली बार आए हैं वो अपने थोड़ा सा धैर्य रखें। अभी अंत में क्वेश्चन आंसर्स लिए जाएंगे, क्वेश्चंस लिए जाएंगे तो आप उसमें अपनी बात को पूछिएगा। योगों से बढ़कर है। यह योग सभी योगों से बढ़कर है। है तो परम सुगम पर उन लोगों के लिए बहुत दुर्गम है जो सत समागम का मर्म नहीं जानते। अनेक साधनों का फल तो उधार मिलने वाली चीज है पर यह ब्रह्म का नगद साक्षात्कार है। इसी से वेदों और शास्त्रों का सार ज्ञात होता है। यह परमार्थ चारों ओर फैला हुआ होने पर भी कहीं अणु मात्र भी नहीं दिखाई देता। लोग संसार से उदासीन हो जाने पर ही पर एक ही ओर देखते रहने के कारण कुछ देख नहीं सकते। आकाश मार्ग के गुप्त पंथ हैं। उन्हें केवल समर्थ योगी ही जानते हैं। दूसरों के लिए वह पंथ बहुत ही गुप्त हैं और सहसा उनका पता नहीं चलता। यह परमार्थ सार का भी सार और अखंड अक्षय तथा अपार है। चोर इसे किसी प्रकार चुरा नहीं सकते। उसे ना तो राजा का ना अग्नि का
00:12:09:22 ना आपत्ति का कोई भय परम ब्रह्म अपने साथ स्थान से नहीं हटता अपनी जगह नहीं छोड़ने देता छोड़ता कालांतर में भी नहीं टलता सदा जहां का तहां रहता है शाश्वत सत्य है यह ऐसी बड़ी अमानत है जो ना कभी लौटाई जा सकती है ना कभी घटती है बढ़ती है वह ना कभी खींचती है और ना अदृश्य होती है पर गुरु के अंजन दिए बिना वह दिखाई भी नहीं देता गुरु अद्वतार का उपनिषद गुरु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला
00:12:48:16 यह परम गण ज्ञान है इसलिए इसे परमार्थ कहते हैं। छिपा हुआ ज्ञान है। जिसने बहुत ध्यान पूर्वक ढूंढा और देखा उसी को यह अर्थ प्राप्त हुआ। औरों के लिए वर्तमान रहने पर भी जन्म जन्मांतर के लिए अलभ्य हो गया। इस परमार्थ की अपूर्वता यह है कि इसके लिए जन्म और मृत्यु कोई बात ही नहीं है। इसके द्वारा सायोजता की पदवी तुरंत ही मिल जाती है। इसके द्वारा विवेक से माया बाहर आ जाती है। सार और असार का ज्ञान होता है। और मन में परम ब्रह्म का ज्ञान होता है। जहां उस ब्रह्म का ज्ञान हुआ। उसमें यह ब्रह्मांड लीन हुआ। तहां पंचभूतों का खेल तुच्छ जान पड़ता है।
00:13:37:13 जो ही विवेक में शुद्ध आत्मा आती है त्यों ही प्रपंच में माया झूठी जान पड़ने लगती है। माया आ गई। है कोई माया के बिना? जो ही अंतःकरण में ब्रह्म स्थित होता है त्यों ही संदेह मानव ब्रह्मांड के बाहर चला जाता है और दृश्य पदार्थ पुराने जजर और बिगड़े हुए जान पड़ते हैं। तो मुक्ति का अनुभव करा रहे हैं। भाई मुक्ति कैसे जो इस प्रकार परमार्थ करता है स्वयं उसी का स्वार्थ सिद्ध होता है। श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ। इस परमार्थ का कहां तक और क्या वर्णन किया जाए? इस परमार्थ से ब्रह्मा आदि को भी विश्राम मिलता है और योगियों को परम ब्रह्म में तन्मयता प्राप्त होती है। सिद्ध साधु और महानुभावों के लिए यह परमार्थ विश्राम स्थान और अंत में सतोगुणी जड़ जीवों के लिए भी यह सत्संग के द्वारा सुलभ हो जाता है। यह परमार्थ ही जन्म को सार्थक करने वाला संसार से तारने वाला और धार्मिक परलोक दिखना दिखलाने वाला है। यह तपस्वी का आश्रय साधकों को आधार और भवसागर के पार ले जाने वाला है। परमार्थी मानव राज्य को
00:14:53:06 धारण करने वाला है और जिसमें परमार्थ नहीं वह भिखारी है। इसकी उपमा किससे दी जाए? अनंत जन्मों का पुण्य संचित होने पर ही परमार्थ का साधन होता है और स्वयं परमात्मा का अनुभव होता है। जिसने परमार्थ को पहचाना उसने अपना जन्म सार्थक कर लिया और नहीं तो उस पापी ने कुल का क्षय करने के लिए भी कोई कुल का क्षय करने के लिए ही जन्म लिया। जो बिना भगवान को प्राप्त किए संसार का काम करता है। उस मूर्ख का कभी मुंह भी नहीं देखना चाहिए। अच्छे लोगों को उचित है कि परमार्थ की सिद्धि करते हुए अपना शरीर सार्थक करें और ईश्वर की भक्ति करके अपने पूर्वजों का उद्धार करें। यह परमार्थ की महिमा गान गाई है। अभी तो हमारा जो मुख्य जो चैप्टर है ना वो मेरे ख्याल से आज हम लोग वहां तक पहुंच जाएंगे। मुख्य चैप्टर अगली बार से चालू हो जाएगा। आज इसको पूरा कर लेते हैं। दसवां समास ले। तो अभी ऐसा करते हैं कुछ क्वेश्चन आंसर्स कर लेते हैं। वैसे भी काफी दिनों बाद हम लोग एकत्रित हुए हैं। थोड़ा फ्लो में अब अगले
00:16:08:19 रविवार से ही चालू करते हैं। तो क्या प्रश्न थे? कोई पूछ रहा था। प्रकृति जो है मूल उपादान कारक जो पुराने लोग कृपया पुराने लोग हैं कृपया आज प्रश्न अपना रहने दे। जो नए लोग हैं उनके हम डाउट्स ले लेंगे। जी अनुरुद्ध शर्मा जी पहले आप बोले श्री राधे गुरु जी दंडवत प्रणाम गुरु जी ना कहे गुरु जी ना या तो जी कह ले या सम्मान प्रकट करना है तो भैया कह ले गुरु जी ना कह जी भैया जी भैया जी मेरा एक प्रश्न था मतलब बहुत समय से मैं इसे जानना चाह रहा हूं कि हमारे धर्म धर्म सनातन धर्म में बताया गया कि अगर धर्म के लिए हिंसा की जाती है तो वह धर्म युक्त होता है। लेकिन अब यह कैसे निर्णय लिया जाए कि कोई हिंसा की जा रही है वह धर्म युक्त है या अधर्म युक्त है? तो एक उदाहरण यदि आपके समक्ष प्रकट करना चाहूं तो अब जैसे कि मैं पाश्चात्य जगत में मैंने देखा था उनकी हिस्ट्री में कि वह दासों को जो है बेड़ियों से बांध के वगैरह रखते थे तो वह ऐसा कहते थे कि मैं ऐसा इसलिए करता हूं ताकि यह अपने कर्तव्यों सेित ना हो जाए और यह भाग ना जाए।
00:17:23:27 तो इस कारण से अगर उस दृष्टि से देखा जाए तो वह अपने परिवार के प्रति धर्म को धर्म का पालन करते हुए उनके साथ ऐसी हिंसा कर रहे हैं। तो लेकिन ये तो अधर्म हुआ तो ये सुनने में तो लगता है कि ये धर्म है लेकिन देखिए कई बार प्रज्ञा शक्ति की कमजोरी की वजह से हम लोग अपने सामने सत्य होता है। पर उसको देख नहीं पाते। जी मैं एक बार बैंक में गया था। कुछ पैसे जमा करने थे। चेक से पैसे आए थे। जी। ठीक है। तो वहां का जो मैनेजर था वो जो चेक था वो था बिहार का और मेरा अकाउंट और कहीं का था और मैं पंजाब नेशनल बैंक की एक ब्रांच में उस चेक को लगाने के लिए गया था कि सर यह चेक यहां से कैश हो जाएगा। तो मैंने औपचारिकता के लिए मात्र उसके मैनेजर से यह परमिशन मांगने में गया। मैनेजर ने मना कर दिया नहीं नहीं ये तो दूसरी ब्रांच का है। यहां से कैसे होगा? ये है वो है। उसने मना कर दिया। मैंने कहा यह क्या सेंट्रलाइज़्ड जब सिस्टम है तो पूरी इंडिया में पूरे भारत में हम कहीं भी
00:18:40:04 अह चेक से हम अपना कैश ले सकते हैं। जी तो ये बात मुझे कुछ ग्रहण नहीं कर पाया। स्वीकार नहीं कर पाया। और फिर मैंने क्या किया जो कैश की लाइन होती है ना उसमें लग गया। और कैशियर ने कोई बात नहीं पूछी। कोई आपत्ति प्रकट नहीं की। और जो उसमें कैश पेमेंट करना था वो उसने मुझे कर दिया। फिर मैं ऐसे हिलाते हुए गया उस वो जो मेरे हाथ में रुपए आए थे ना वो ऐसे हिलाते हुए गया। मैंने सर ये तो दे दिया। आप झूठ बोल रहे थे। उसको मैंने बताया मैनेजर को। तो ये क्या है कि कई बार हम लोग टेबल के पीछे जाने का प्रयास नहीं करते हैं। बस इस ये टेबल आखिरी है हमारे लिए। हमने सोचा ही नहीं कि हमारे लिए टेबल आखरी है कि नहीं। उसने जो टेबल ने कह दिया वही हमारे लिए अंत है। उसके पीछे का हम सोचते ही नहीं है। तो बैंक में जाने के बाद अगर कोई वहां का सरकारी कर्मचारी हमको कोई झूठी बात भी बता देगा तो हम पूरी तरीके से उस पर निर्भर हो जाते हैं। हालांकि आजकल जागरूकता बढ़ गई है कि भाई इसने जो बोला है यही यहां का नियम है। उसने हमको भटकाया था और क्यों भटकाया था? उसके बैंक का काम कम हो जाए। एक चेक कम लगे उसके बैंक में। बस उसने भटका दिया। जबकि वो नियम
00:19:55:10 नहीं था। तो अब मैंने यह कहानी आपको क्यों सुनाई? जैसे उसने यह कहा कि भाई मैं यह चाहता हूं कि वह उसकी निष्ठा अपने कर्तव्य से ना चूक जाए। किसका कर्तव्य क्या है? यह तय कौन कर रहा है? शास्त्र तो वहां शास्त्रों का अनुगमन है। नहीं नहीं है। नहीं हो गया निर्णय। जी गुरु जी और यानी कि यानी कि वहां होने वाली हिंसा धर्म नहीं थी। हम तो भैया धर्म तब है जब शास्त्र वचनों के आधार पर शास्त्र के वचनों की रक्षा के लिए शास्त्र के द्वारा प्रतिपाद्य धर्म सिद्धांतों की रक्षा के लिए हिंसा हो
00:20:38:14 हिंसा है और उसमें फिर भगवत रामानुजाचार्य भगवान ने तर्क दिया कि एक डॉक्टर आपको एक आपको सुई भी चुबो दी जाए ना। एक डॉक्टर आपका मांस काट लेगा। मगर उसका क्योंकि उद्देश्य धर्म है। आपका मांस काट लेगा। आपके उसमें सुइयां घुसेड़ेगा बार-बार सिलने के लिए। मगर वो हिंसा भी हिंसा नहीं है। वो धर्म है। क्यों? क्योंकि वो आपके हित के लिए आपका उसका उद्देश्य वहां धर्म पूर्वक उद्देश्य है। तो वो भी अहिंसा कहलाएगी। हिंसा नहीं है। जी और वही पर दूसरा कोई व्यक्ति आपके जरा सा चुकोटी भी काट लेगा वो भी हिंसा कहलाएगी। ठीक है जी भैया जी अभी बस एक अंतिम प्रश्न और था जैसे कि मैंने शास्त्रों का थोड़ा अध्ययन किया तो वहां पर बताया गया कि एक पत्नी का मुख्य कर्तव्य होता है पतिव्रता होना। तो जैसे कि वहां पर एक कहा गया कि पत्नी को पति के सोने के बाद सोना चाहिए और उठने से पहले उठकर घर की क्रियाओं में संलग्न हो जाना चाहिए। तो यहां पर
00:21:53:15 मेरा यह प्रश्न है जैसे कि मैं मम्मी को भी देखता हूं तो यहां पे पत्नी पत्नी को तो विश्राम करने का समय पति की तुलना में कम मिलेगा ना और ये नींद भी उनकी पूरी नहीं हो पाएगी इस दृष्टि से। क्यों? दिन में विश्राम करने का समय नहीं मिल जाएगा। जब पति बाहर आजीविकोपार्जन के लिए बाहर जाएगा पत्नी के जो नित्य कर्म होंगे घर के दफाई इत्यादि के लालन पालन पोषण के उसके बाद उसके पास काफी पर्याप्त समय उसको मिल सकता है यदि वो एक अच्छी गणी अनुशासित तो उसको बहुत समय मिल सकता है वो दिन में अपनी नींद की पूर्ति कर सकती है और और यह आवश्यक नहीं है कि यदि पति ज्यादा सो रहा है तो पत्नी के घंटे कम हो गए। मान लीजिए पति अगर आठ घंटे सो रहा है और उससे पहले जगने के कारण पत्नी को 7 घंटे की नींद मिल जा रही है तो वो भी पर्याप्त है। यदि पति छ घंटे सो रहा है और उससे पहले उससे उसके बाद सोने और उसके पहले जागने के कारण पत्नी को 6:30 घंटे की या पति की अगर छ है तो उसको 5:30 घंटे की नींद मिल जा रही है। तो इससे कौन सी गाज गिर गई? हां समझ गया। केवल
00:23:09:10 सामंजस्य बिाने का आपके पास वो होना चाहिए। नजरिया जी मतलब ये नेगिजिबल अमाउंट है बस उतना कुछ नहीं। हम ऐसा कुछ खास नहीं है। जी जी धन्यवाद भैया। और दूसरी बात यह है कि जैसे कि मेरे जैकेट का जो मैंने अभी पहन रखा है सर्दी का उपाय है ना इसका जो कलर है ना इसको पहचानने के लिए इसको पहचानने के विषय में आंख ही प्रमाण है। अगर मैं यह कहने लगूं कि नहीं मैं कान से पहचानूंगा इसका कलर तो गलत होगा। और अगर आप कुछ बोल रहे हैं उस विषय में मेरे कान ही प्रमाण है। अगर मैं कहने लगूं कि भाई मैं आंखों से प्रमाणित करूंगा कि आपने क्या कहा तो वो गलत होगा। इसी प्रकार से डस एंड डोंट्स में शास्त्र ही प्रमाण होते हैं। अती्द्रिय विषय जो भी लिखा गया है सोच समझ के ही लिखा गया है। कई चीजें हैं जो हमारी समझ में आ सकती हैं। है ना? हम लोग तर्क की पराकाष्ठा तक गए हैं सनातनी पर आप यह कहो कि नहीं यह
00:24:24:12 भी समझाओ तो कई अती्द्रिय विषय भी है वो इंद्रियों के द्वारा समझने योग्य है ही नहीं वहां पर शास्त्र ही प्रमाण है गुरु जी तो उन्हें सॉरी भैया जी तो उन्हें समझने के लिए प्रज्ञा शक्ति की वृद्धि करनी पड़ेगी ना हमें मतलब एक व्यक्ति को प्रज्ञा शक्ति की वृद्धि तो मुक्ति का हेतु है ना अच्छा हां जी सब हां जो शास्त्र आज समझ में नहीं आ रहे हैं वो जो जो आ सकते हैं भविष्य में आने लगेंगे ये है मगर ऐसा नहीं है कई विषय ऐसे हैं जो अती्द्रिय है वो आपको इंद्रियों के द्वारा उनका भान नहीं हो सकता
00:25:05:15 ठीक है विनीत सोनी जी आप पूछे प्रश्न अपना जय श्री राम भाई जय श्री राम जो इंसान को दुख मिलता है या फिर उसको किसी भी तरह का दुख मिल रहा है तो क्या उसके वह उसकी कर्म की ही सजा है या फिर अगर दुख मिल रहा है तो कोई कर्म कट रहा है जो पहले कभी गलत किया हो हम दुख का मतलब है आपने कोई गलती की है तो बिना गलती के दुख नहीं मिलेगा ऐसा नहीं है कुछ परमानेंट दुख है ही है जैसे मृत्यु आनी ही है और अगर मूल में जाएंगे तो मृत्यु वाला जीवन भी आपको आपके कर्मों का फल ही तो है जो फसे हो जो मृत्यु वाला जीवन प्राप्त है या फिर प्रकृति के बोझ में आप हो, प्रकृति के दायरे में आप हो तो यह जीवन भी आपको कर्मों के फल के अनुसार ही मिला है ना। नहीं तो मोक्ष ना मिल जाता। तो यही कहना ही होगा कि कर्मों के ही कारण है। प्रारब्ध है। ये जो सभी दुख है वो कर्मों का ही फल है। हां।
00:26:09:13 अब इसमें यह अती्द्रिय विषय है कि पूर्व जन्म के कर्म कर्मों का फल कौन सा वाला है? इसी जन्म के कर्मों का फल कौन सा वाला है? यह अती्द्रिय विषय इसलिए अपने कर्मों को सुधारने पर ध्यान दें और प्रारब्ध की जानकारी इसलिए नहीं दी जाती कि उनके अनुसार आप जो है अपने वर्तमान को प्रभावित कर उस तरह से कार्य करें। प्रारब्ध की जानकारी क्या कहते हैं? ईश्वर इत्यादि जो जटिल विषय हैं उनको समझने के लिए होती है मात्र जिससे कि हम मोक्ष की कामना कर पाए। उनको लागू करने के लिए नहीं होता है कि इसी जन्म में लागू कर लो। जैसे कि मान लो कहा गया कि आपको तो आपके कर्मों का फल मिलना ही है तो फिर कोई भी कर्म करने की आवश्यकता क्या है? हम तो आपने लागू कर लिया प्रारब्ध को यहीं पे। आवश्यकता क्या है? आवश्यकता वो है जो व्यवहार है। इंद्रियों से प्राप्त होने वाली जानकारी क्या है कि आजीव को पार्जन करना है तो हमें भोजन मिलेगा। यह इंद्रियों से प्राप्त होने वाली जानकारी है। इसके अनुसार आपको कर्म करना है। प्रारब्ध के अनुसार नहीं। प्रारब्ध के अनुसार जो मिल रहा होगा मिलता रहेगा वो
00:27:24:21 तात्विक चीजें हैं। वो इसलिए बताई जाती है जिससे कि आपका आपकी धर्म और ईश्वर में निष्ठा हो सके। इसलिए वो सच्चाइयां आपको बताई जाती हैं। है ना? उनके अनुसार व्यवहार में नहीं लाना होता है। जी तो क्या यह बोलना सही रहेगा कि मतलब दुख मिलेगा ही नहीं क्योंकि आपको दुख मिल रहा है तो आपको आपने कुछ ना कुछ बुरा कर्म किया ही है इसलिए आपको दुख मिल रहा है। वरना आपको दुख मिलता ही नहीं। बिल्कुल बिल्कुल मगर आप मगर आप नकारात्मकता से भी बचे ना जिस चीज का चिंतन करेंगे उसी चिंतन के कारण उसी प्रकार का व्यक्तित्व का निर्माण भी हो जाएगा। इसलिए यह कहना प्रारंभ करिए कि भाई यह तो कष्ट कम है। भगवान ने हमें बहुत सुख दे रखा है। जो इतने आसानी से जीवन निकल रहा है। भगवान की कृपा है। जो इतने कम कष्ट मिल रहे हैं। इस प्रकार का चिंतन करेंगे जब तो इस प्रकार के चिंतन से सात्विक आसक्ति होगी। सतोगुणी आसक्ति होगी। ईश्वर इत्यादि विषयों में ज्यादा चिंतन रहेगा। ज्यादा गति रहेगी। उसके कारण धीरे धीरे धीरे धीरे प्रज्ञा शक्ति मजबूत होती चली जाएगी। प्रारब्ध अथवा इस जन्म के जो कर्म होंगे उनके फल भी यदि मिल रहे होंगे तो आपको कब आए और कब गए पता ही नहीं
00:28:39:22 चलेगा। हम है कि नहीं? जगदंबा आंख निकाल रहे हैं संभाजी की। संभाजी क्या कह रहे हैं? जगदंबा कैसे प्रज्ञा शक्ति मजबूत है ना आंख निकाल रहे हैं मगर वो जगदंबा कह रहे हैं ठीक है तो ऐसा नहीं है रियल में होता है ना ऐसा तो ये विल पावर कहां से आती है चिंतन से अच्छा चिंतन करेंगे तो अच्छी विल पावर होगी और नकारात्मक चिंतन करेंगे तो नकार घटेगी विल पावर आपकी और इसी का खेल है विल पावर या प्रज्ञा शक्ति या इसी का पूरा खेल कॉन्शियसनेस ये पूरा जो साम्राज्य है सब कुछ कॉन्शियसनेस के इधर-उधर घिरा हुआ है। ठीक है चलिए जी
00:29:34:24 वैभव और राज जी का और ले लेते हैं। अभी बस जितने लोगों का है ना हैंड रेज उतने लोगों का ले लेते हैं। उसके बाद जो है फिर अब नेक्स्ट वीक मिलेंगे। ठीक है। वैभव और राज जी आपका ले लेते हैं। वैभव जी आप बोले। आज बी वाले बहुत लोग आए हैं। वैभव, विनीत, विशाल और और भी हैं। कौन? और नहीं है। अच्छा वो एक साथ दिख रहे हैं। वैभव, विनीत, विशाल। वैभव जी बोले
00:30:17:18 राज जी आप बोलिए राज कमल जी आप बोलिए शिवश जी जय श्री राम जय श्री राम शिवश जी मेरे दो सवाल है दो प्रश्न है आपसे सवाल तो उर्दू का वर्ड है तो मैं उसे आई एम सॉरी टू यूज़ दैट वर्ड कोई बात नहीं आ जाते हैं उर्दू के वर्ड जी जी जी एक तो मैं आपसे ये जानना चाह रहा था किसी को गुरु गुरु बनाने का प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? कैसे आप आइडेंटिफाई करेंगे कि कोई सही गुरु है या नहीं है? ये तो मेरा प्रश्न नंबर एक है। दूसरा मेरा यह है कि नित्य दिन प्रतिदिन के कार्यों से समय निकालकर प्रतिदिन भक्ति के मार्ग पर क्या-क्या नित कर्म करने चाहिए जो कि महत्वपूर्ण है करना और जिससे कि हम अपने मन को भी शांत और प्रसन्न रख सके।
00:31:11:20 गुरु बनाने के लिए प्राथमिकताएं सुन लीजिए। लक्षण संपन्न सन्यासी होना चाहिए आपका जो गुरु विरक्त होना चाहिए। यदि विरक्त नहीं है गृहस्थ है कोई व्यक्ति और यदि वह किसी विरक्त के सीमा में रहकर आपको शिक्षा दीक्षा दे रहा है तो वह भी आपका गुरु बनने के योग्य है परंतु अंतिम निर्णायक आपके धर्म का वो एक सन्यासी या विरक्त होना चाहिए विरक्त ठीक है सन्यासी विरक्त होता है अर्थ क्या होता है विरक्त सन्यासी जिसका जिसने घर बार को त्याग दिया हो जी जी और कहना चाहिए कि अगर शास्त्र सम्मत्ता से चले तो जिसने ऑफिशियली जो है सन्यास ग्रहण किया हो किसी गुरु से ऐसे अपने मन से वाले वालों से भी बचे यद्यपि वो भी है परंतु सबसे ज्यादा जो उनमें भी सन्यासियों में जो प्योर है वो वो सन्यासी है जो ऑफिशियली सन्यासी अब ये जो सन्यासी हैं इनकी सीमा में यदि कोई और व्यक्ति आपको ज्ञान विज्ञान दे रहा है वो भी आपका गुरु बन सकता है।
00:32:27:01 इनकी सीमा में यदि कोई और विरक्त है जो आपको ज्ञान विज्ञान दे रहा है वो भी आपका गुरु बन सकता है। मगर वो किसी ना किसी ऐसे प्रामाणिक सन्यासी की सीमा में वो ये सब सन्यासी हैं। शंकराचार्य रामानुजाचार्य मधवाचार्य नारकाचार्य ये सब सन्यासी हैं। ठीक है? इसमें गडिया गिया वैष्णव में या राधा वल्लभ ये वल्लभ संप्रदाय है संभता उसमें शायद सन्यास को जो है कट किया गया है। परंतु अगर शास्त्र को देखेंगे शास्त्रों की अंतिम बात जो है वो सन्यास पर जाके ही रुकती है। वहां पर भी जहां पर गृहस्थ है वहां पर भी विरक्तता ही है। भगवत गीता में विरक्तता ही कही गई है वो हथियार जिससे कि प्रकृति का जो पेड़ है उसकी शाखाएं उसको काटा जाता है। विरक्तता ठीक है जी तो पहला लक्षण है सन्यासी दूसरा लक्षण है परंपरा से हो परंपरा आप समझ ही गए होंगे अगर आप हमारा चैनल देख के पहुंचे यहां तक जी जी समझ गया तीसरा लक्षण है श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा दें। जैसे अभी कुछ दिन पहले एक विवाद हुआ कि अवतार होगा तो उसको पहचाना कैसे जाएगा कि शास्त्र
00:33:42:07 में यदि उनका अवतार होना लिखा है तो यह भी लिखा है कि वो जो है भूल गए थे तो कैसे यदि भूल गए मान रहे हो तो फिर अवतार भी मानना पड़ेगा यदि अवतार पर विश्वास नहीं तो भूल भूल गए पर विश्वास कैसे यहां तक कि राम पर विश्वास कैसे तो अर्ध कुकुट न्याय नहीं कर सकते ऐसी बात निकालनी पड़ेगी जिसमें दोनों बातें रह जाए भूलना भी आ जाए और अवतार होना भी आ जाए। तो दोनों बातें क्या है कि भगवान जो परम तत्व है मनुष्यों के बीच में उत्पन्न होकर लीला जब करता है तो वो इस तरह का अभिनय अगर परमार्थ की ब्रह्म की दृष्टि दिव्य दृष्टि से देखें तो वो अभिनय करता है और मनुष्यों के बीच में मनुष्य दृष्टि से वो एक मनुष्य ही होता है। ठीक है? जी। अब जितने लोगों को वो दिव्य दृष्टि मिलती जाएगी उनके लिए वो अवतार होते चले जाएंगे। जिनके जितने लोगों को दिव्य दृष्टि नहीं मिलेगी उनके लिए वो क्या रह जाएंगे सामान्य मानव मनुष्य जिसके बारे में भगवान ने कहा कि मेरे ब्रह्म भाव को भूल जाते हैं उन्हें मानव देह में देखकर वो मूर्ख है मूर्ख होते हैं दिव्य दृष्टि नहीं होती उनके पास तो सामंजस्य की शिक्षा साधु सम्मत
00:34:57:08 धर्म धर्म और लास्ट जो पॉइंट है वो क्या है कि गुरु वही जो अपने शिष्य का संशय रूपी अंधकार दूर कर दे। गुरु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला। अज्ञानता रूपी अंधकार से निकालने वाला ही आपका गुरु होगा। ठीक है। चलिए हां जी। नाथ संप्रदाय भी प्रमाणिक। आपने दूसरे प्रश्न का मुझे नहीं बताया। मैंने आपसे पूछा था कि नित जो प्रश्न का उत्तर वैसे यह क्लास का विषय नहीं है मगर मैं बता देता हूं सवा घंटे की भक्ति नाम जप इत्यादि के रूप में आप प्रतिदिन चालू कर दीजिए और मैं ये सभी भाइयों से दोबारा विनती कर रहा हूं आपके जीवन के जितने भी रोग दोष क्लेश हैं सब कुछ शांत हो सकते हैं भगवान का पैर पकड़ लो आज से अभी से ठान लो भगवान के पीछे पड़ जाओ नहीं छोड़ेंगे पैर तुम्हारा जय भद्रकाली वाले बन जाओ पकड़ लो उनका पैर भगवान मजबूर हो जाएंगे विवश हो जाएंगे आपके सारे रोग दोष क्लेश को शांत कर सकने की क्षमता रखते हैं सम अनंत सामर्थ्यवान है
00:36:12:16 सवा घंटे की भक्ति करने लग जाओ मित्रों बंधुओं आप देखो आपके जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन मुझे ऐसा लगता है कि शायद आप लोग मुझसे कुछ प्रेरणा लेते होंगे मैं कुछ भी नहीं हूं। मैं जानता हूं ना मैं कितना बड़ा पापी हूं। मेरे से ज्यादा आप लोग मुझे नहीं जानते हैं। मैं कितना बड़ा निकृष्ट व्यक्ति हूं। ये मैं जानता हूं ना। मैं बता रहा हूं मेरे जीवन को उन्होंने ही बदला है। मेरे जीवन को राम ने ही बदला है। आप लोग राम के पीछे पड़ जाओ। भगवान के नाम के पीछे पड़ जाओ। यहीं से शुरुआत करो। ठीक है
00:36:55:06 जी शिव जी बहुत-बहुत धन्यवाद जी और ये जो जानकारी आपने मुझे उपलब्ध कराई है इस पर मैं जरूर अपना आने वाले जीवन का यू नो कुछ अपना समय व्यतीत कर बिल्कुल और किसी प्रकार का यदि वो उसको क्या कहते हैं कंपनी सत्संग अगर आपको प्राप्त करने की इच्छा है तो आहान द्वारा नामास्त के सेशन आयोजित करवाए जा रहे हैं। वो इसीलिए कि आप अपने जीवन का पहला कदम बढ़ा सके। यह जो संसार है ना वह आपको हर क्षण खींचने में लगा हुआ है और पता है संसार की समस्त जानकारियां जो आपके पास आ रही है इंफॉर्मेशन वो सारी जानकारियां इन केन प्रकारन प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से आपको ये बताने में लगी हुई है ईश्वर नहीं है ईश्वर नहीं है ईश्वर नहीं है और इस इन जानकारियों से ही हमारी प्रज्ञा शक्ति घटती है अब ऐसे में यदि हम ईश्वर का चिंतन नहीं करेंगे तो प्रज्ञा शक्ति घटते घटते घटते घटते खत्म हो जाएगी। ये मैं तात्विक विवेचना बता रहा हूं। भक्ति से क्या प्राप्त होता है? तो जब हम सत्य का चिंतन करते हैं, सत्य का चिंतन करते हैं, माया रूपी झूठ का चिंतन छोड़ते हैं। कुछ समय
00:38:10:07 के लिए तो प्रज्ञा शक्ति पीक पे जाती है। फिर क्या होता है? छोटी छोटी बातों में हमारी बुद्धि इतनी शार्प होती चली जाती है। हमारी निर्णायक क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि कहना ही क्या है? आपका जो नुकसान हो सकता होगा, आप जो बीमार पड़ सकते होगे, आप जो अस्वस्थ हो सकते होगे, आपके गलत निर्णय कम हो सकते होंगे। जिसके कारण आपके जीवन में विप्लव आ सकता होगा, उन सब से आप बचते निकल जाओगे। क्यों? क्योंकि राम का नाम जप रहे हो। तो सत्य के पीछे पड़ जाओ। असत आपसे वैसे ही भागने लगे बुलंदशहर में या नोएडा में आपका कोई रिप्रेजेंटेटिव है आहान संस्था के नोएडा में हमारे पंडित जी रहते हैं श्वेतांग जी और बुलंदशहर में बुलंदशहर के आसपास तो है हाथरस में है बुलंदशहर में इनको पता होगा प्रथम जी आपको ज्ञात है बुलंदशहर में हूं ठीक है तो आप इनसे संपर्क करिएगा ये आपको बताएंगे जो भी जी जी जी बहुत-बहुत धन्यवाद। जय श्री मैडम कौन सेक्टर?
00:39:17:22 हां अभी अभी क्लास की बातें कर ली जाए। बाकी आप एडमिन से बात करिएगा। है ना? ठीक है। जी भैया हम देख लेंगे जो भी बात होगी। वो भैया फोन आ रहा है। आप देख लीजिए यहां पे। ठीक है। एक प्रश्न और ले लें। इनका वैभव जी तो बोले नहीं। विशाल जी का ले लेते हैं। पंकज जी आप क्षमा करें। अगली बार आपका प्रश्न हम लेंगे। हां। जी भैया कोई। विशाल जी का हाथ हैंड रेज था। विशाल जी बोले। जी भैया जय श्री राम जय श्री राम जी भैया प्रश्न यह था मेरा कि जैसा कि अभी कर्म कर्मों के फलों पर चर्चा हो रही थी तो मेरा इसमें यह प्रश्न था कि जैसे कि अगर हमारे बुरे कर्म का फल हमें मिल रहा है अच्छा या बुरा तो ये एक मतलब ये एक बात हो गई और दूसरी तरफ अगर हम यह कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है ऑल नोइंग है ऑल कंट्रोलेबल है तो उस हिसाब से देखा जाए तो वो भी तो ईश्वर की इच्छा से ही हो रहा है जैसा कि हम बुरा कर्म कर रहे हैं तो इसमें ईश्वर का हस्तक्षेप होगा तभी तो हमेशा कर रहे होंगे। इसका उत्तर दिया हमने क्या इसका उत्तर तो हमने दे दिया ना पारमार्थिक सच्चाइयों के आधार पर अपने व्यवहार को मत बिगाड़ो। पारमार्थिक सच्चाइयां पारमार्थिक विषय बताने का उद्देश्य भगवान
00:40:33:15 धर्म और ब्रह्म में निष्ठा जागृत करना है। परमार्थिक वास्तविकता बताना बताने का उद्देश्य आपके व्यवहार को प्रभावित करना नहीं है। जैसे कि पृथ्वी गोल है। इसका क्या आप व्यवहार में लेते हो अपने इस जानकारी का? समय आने पर क्वेश्चन का आंसर दे देते हो। जनरल साइंस का पेपर होगा तो पृथ्वी गोल है कि नहीं हां बोल दोगे मगर जब मोटरसाइकिल चलाओगे किसी को रास्ता बताओगे तो कैसे बताओगे गोल के रूप में बताओगे कि चपटे के रूप में बताओगे चपटे के रूप में हां तो वो जो दूसरा पर्सपेक्टिव है वह तात्विक विवेचना दूसरे विषयों में गति प्राप्त करने हेतु है और जो आपका पर्सपेक्टिव है वह आपके व्यवहार के व्यवहार का हेतु उसके अनुसार व्यवहार करिए। तो भगवान करा रहे हैं। भगवान सब जानते हैं। सब तात्विक चीजें हैं। यह आप जानिए। क्यों? इसलिए जिससे कि भगवान की सर्वशक्तिमत्ता का भान हो पाए। जिससे कि भगवान में निष्ठा हो पाए। भगवान का जो जो आतुल्य है बल है उसको आप पहचान पाए। उनसे प्रेम हो पाए। इसलिए बताया जा रहा
00:41:48:16 है। मगर उसके आधार पे अरे मुझे अब क्या करना? भगवान ही तो करा रहे। मेरा क्या दोष? नहीं। दोष यह है कि यह जो आपको जानकारी प्राप्त हो रही है ना भगवान वाली वह इंद्रियों से प्राप्त नहीं हो रही है। वह जानकारी आपको या तो शब्द प्रमाण से प्राप्त हो रही है या अनुमान प्रमाण से प्राप्त हो रही है। वो आप फील नहीं कर रहे हो। फील आपको क्या हो रहा है? अहंकार मैं ही कर रहा हूं। गलत मैं ही कर रहा हूं। तो आपको फल किस हिसाब से मिलेगा? मैं ही कर रहा हूं के हिसाब से। ठीक है? इंद्रियों से प्राप्त होने वाली जानकारी क्या है? कि पैसे कमाऊंगा। आजीव कोपार्जन करूंगा तो भोजन प्राप्त होगा। यह है इंद्रियों से प्राप्त होने वाली जानकारी और शब्द प्रमाण के अनुसार अनुमान प्रमाण के अनुसार अनुमान प्रमाण क्या कोई तो सत्ता है जो सब सर्वज्ञ है। तो भैया जब सर्वज्ञ है तो उसकी जब वो सत्ता है तो उसकी ही सीमा में सब कुछ हो रहा है। ये अनुमान हो गया। और शब्द क्या हो गया? शास्त्रों ने कह दिया, गुरुजनों ने कह दिया ईश्वर सर्वशक्तिमान है। वह सर्वज्ञ है और उसकी सीमा के बाहर कुछ नहीं है। यह शास्त्र के वचन मगर इनका इनका पर्यावसान किस में है? इनका पर्यावसान है भगवान की भक्ति। भगवान के प्रति निष्ठा धर्म के प्रति निष्ठा जागृत करने के लिए। इसलिए नहीं कि शत्रु आपके
00:43:03:18 घर की स्त्री पर आक्रमण कर रहा हो। आप खड़े हो। यह भी भगवान की मर्जी से हो रहा है। इसमें इसका नहीं है। इसका भी खंडन कर दिया। रामायण में देखिए वाल्मीकि रामायण में वचन है जो लोग भाग्य के भरोसे रहते हैं वो लोग नपुंसक होते हैं। ठीक है? जी ये वैसा ही हो गया जैसे कि वो ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या में जैसे बोला गया है कि परमार्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सब ये मिथ्या ही है एक तरह से लेकिन हम हम अभी रहते हैं व्यवहारिक संसार में तो हमें व्यवहारिक संसार के अनुसार ही करना आप क्योंकि ब्रह्म नहीं हो ना। ब्रह्म दृष्टि से वो यह मिथ्या है। आपकी दृष्टि से मिथ्या नहीं है। अब ब्रह्म दृष्टि बताई क्यों? जिससे ब्रह्म में निष्ठा हो पाए। है ना? बताना आवश्यक इसलिए नहीं तो बिना बताए भी काम चल जाता। अगर हमारे जैसे लोगों के अंदर असतो मा सद्गमया जैसी कुलबुलाहट ना हो तो ब्रह्म जो पारमार्थिक धरातल है बताने की आवश्यकता ही नहीं है। केवल द्वैत बताकर भक्ति करवाकर भी मुक्ति पाई जा सकती थी। मगर हम जैसे लोग आ जाते हैं। वहां मा सद्गमया। अद्वत का उपनिषद गुरु वही जो संशय को दूर कर दे तो तब बताना पड़ता है भाई ब्रह्म दृष्टि से तो यह सब मिथ्या है ठीक है इसलिए कई आचार्य ऐसे भी हुए जिन्होंने उस लेवल से आगे
00:44:18:24 की बात नहीं की ब्रह्म दृष्टि की बात नहीं की तो ऐसे भी आचार्य हुए इसीलिए तो अलग-अलग संप्रदाय बने और उन्होंने जो है शंकराचार्य जी ने पूरी बात की वो हम जैसे लोगों के लिए कर दिया नहीं भाई जब भगवान जो निर्गुण निराकार है तो उसने सृष्टि की रचना कैसे की क्योंकि वो जैसे ही कहीं पर धक्का लगाएगा तो वो कम ज्यादा हो जाएगा देखा था अभी लास्ट वाली लाइव चर्चाएं आपने देखी हो तो समझ निर्गुण से सगुण कैसे हो रहे हैं भगवान तो मानना पड़ेगा ना कि माया जगत में अवतार लेते हैं सगुण अवतार नहीं तो परिवर्तनशील हो जाएंगे नित्यता में वो आ जाएगा बाधा आ जाएगी हम शाश्वतता भंग हो जाएगी। ठीक चलिए। अच्छा एक लास्ट बात करके जी कुछ कह रहे हैं? नहीं अगर जल्दी है तो ठीक है हम अगले संडे को पूछ लेंगे लेकिन एक प्रश्न था। चलिए कोई नहीं अगले संडे अगले रविवार को कर लीजिएगा। सभी को जय श्री राम। जय श्री राम भैया। जय श्री राम। जय जय श्री जय श्री राम जय श्री राम
00:45:52:10 [संगीत]
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प्रार्थना की उपेक्षा से हानि एवं शरणागति से सर्व-कल्याण की सिद्धि Dasbodh Lecture #6
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