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00:00:03:25 तो एक महत्वपूर्ण बात है कि आपने देखा होगा कि हमारे शास्त्रों में अलग-अलग जगह कहीं पर कई जगह लिखा होता है कि आप अ नाम जपिए या फिर कहीं पर लिखा होता है कि सहस्त्र नामों का जो पाठ करता है या फिर कहीं पर लिखा होता है कि जो है जो इस अध्याय का पाठ करता है तो इस तरीके से कई प्रकार से भगवान में लीन रहने की विधाएं बताई गई होती हैं। तो यहां पर भी चौथे दशक में उसी तरह की कोई बात की जा रही है। श्रवण भक्ति, कीर्तन भक्ति, स्मरण भक्ति, पाद सेवन भक्ति, अर्चन भक्ति, वंदन भक्ति, दास्य भक्ति, सख्य भक्ति, अह आत्म निवेदन भक्ति, सृष्टि वर्णन और चारों मुक्तियां। पांचव दशक में बहुत इंपॉर्टेंट चीज आ गई है। गुरु निश्चय गुरु का निश्चय कैसे सद्गुरु लक्षण सद शिष्य लक्षण उपदेश लक्षण अनेक प्रकार के ज्ञान शुद्ध ज्ञान बद्ध लक्षण मुमुक्षु लक्षण साधक लक्षण सिद्ध लक्षण ये सब आत्म चिंतन के विषय हैं। ये लक्षण पढ़ के हम आत्म
00:01:19:01 चिंतन कर पाएंगे। परमात्मा की पहचान छठा दशक परमात्मा की पहचान परमात्मा की प्राप्ति माया की उत्पत्ति माया का विस्तार माया और ब्रह्म ईश्वर का निरूपण सगुण भक्ति दृश्य जगत का मिथ्याभास गुप्त परमात्मा की खोज अनुभव की अनिर्वचनीयता अनुभव की अनिर्वचनीयता क्या है? इस पर आज हम अच्छा यह तो चैप्टर पता नहीं कब आएगा तब हम इस पर बात करेंगे सातवां दशक माया की खोज ब्रह्म निरूपण 14 मायिक ब्रह्म
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00:02:01:18 केवल ब्रह्म द्वैत कल्पना का निरसन मुक्ति के लक्षण साधन का निश्चय श्रवण महिमा श्रवण का निरूपण देहांत निरूपण
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00:02:15:01 एक मिनट हां
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00:02:50:16 केवल ब्रह्म द्वैत कल्पना का निरसन मुक्त के लक्षण साधन का निश्चय श्रवण महिमा श्रवण का निरूपण देहांत निरूपण तो ये सारी चीजें जो हमारी चल रही हैं ये अलंकार समाधि जो बात किया करते हैं। हमने बहुत सारे क्रांतिकारी खड़े किए हैं। अरे भैया संसार में ईश्वर का अस्तित्व हमने सिद्ध किया है। तो संसार में जितनी भी मानवता है उसके मूल में अगर जाओगे तो शंकर का सिद्धांत मिलेगा। उस सिद्धांत के बिना उस मानवता को माता को माता मानने वाले नियमों को आप स्थापित ही नहीं कर पाओगे संसार में। और यदि सतही स्तर की बात कर ले मूर्ति पूजक होने के नाते पुराण को मानने वाले होने के नाते की बात कर ले तो हमने ऐसे लोगों को खड़ा किया है और कहीं ज्यादा वृहद संख्या में जिनको आप भी प्रणम्य मानते हैं शिवाजी छत्रपति शिवाजी को कौन नहीं मानता प्रणम्य क्या ये लोग नहीं मानते आज एक हर्ष
00:04:05:18 मैंने थोड़ा सा विनोद की बात मैंने देखी आर्य समाज का जो सम्मेलन चल रहा है दिल्ली में उसमें कोई आए हुए थे ऐसे जो नाम चिन्ह व्यक्ति थे वो आए हुए थे उनसे कोई इंटरव्यू हो रहा था तो उनसे जब पूछा गया माइक लेकर के कि भाई अ आप क्या कहना चाहते हैं कार्यक्रम के बारे में तो वहां पर जो ऐसे लोग थे जो मुख्य अतिथि के रूप में वक्ता के रूप में आए थे। जिनका डायरेक्ट मतलब कोई कनेक्शन नहीं पर वो वहां एक अतिथि के रूप में आए। तो उनका सारा जो वक्तव्य था आर्य समाज को लेकर के वह इस बारे में था कि आर्य समाज बहुत बढ़िया क्रांतिकारी है। इस बारे में नहीं था कि आर्य समाज के जो दर्शन इत्यादि के सिद्धांत है वो बहुत बढ़िया है या उन्होंने जो दर्शन का सिद्धांत दिया है वो या अन्य जो उन्होंने धर्म और ब्रह्म की परिभाषाएं दी है उस संबंध में गढ़ता या कोई तात्विक विवेचना बहुत महान है। यह सब कोई नहीं बात करता है। वहां पर क्या बात होती है कि वो भैया देश के लिए लड़ने मरने वाले हैं। बहुत अच्छे हैं और इस तरीके की उनके संबंध में बात है।
00:05:21:06 तो अच्छी बात है। हमारा उन हमारे और उनके बीच इन बातों को लेकर के कोई मतभेद थोड़ी ना है। मतभेद है कि जब आप गढ़ में जब आप मूल में ही व्यक्ति को खोखला कर दोगे तो ऊपर से उसको कितना भी ड्रेस अप कर दो। मगर क्योंकि वह अंदर से खोखला है। वह ड्रेस अप करने के बाद भी व्यक्ति वह आपके काम नहीं आ पाएगा। अंतगत तो मूल में भी काम करने की आवश्यकता है ना। ड्रेसअप के साथ-साथ आपने तो कह दिया कि मूर्ति पूजा व्यर्थ है। तो जब व्यक्ति की मूर्ति पूजा के प्रति निष्ठा ही तुम भंग कर दोगे तो कितना भी उसको ड्रेसअप करके बना दो कि हमने देखो योद्धा खड़ा किया है। सनातन धर्म को बचाने के लिए, हिंदू धर्म को बचाने के लिए। उस योद्धा के अंदर आत्मा से निकलने वाली आवाज नहीं होगी कि मुझे मूर्ति की रक्षा करनी है। ठीक है? यूं ही कर दे अंतरात्मा से उसके नहीं आएगा कि मुझे मूर्ति की रक्षा करनी है। और वो भावना उसके अंदर आपने भरी है। तो उन पर भी बात होगी ना। अब रामपाल वाले आजकल कह रहे हैं कि हमने पाइप दिए हैं। पाइप दिए हैं। पाइप दिए हैं। अनाकोंडा के बराबर लंबे पाइप यही तो कह रहे हैं फराने हजार फुट यह फट यह फुट अनाकोंडा के बराबर लंबाई में पाइप दिए होंगे चार पांच अनाकोंडा
00:06:36:19 को मिलाकर के तो अनाकोंडा के बराबर पाइप दिए तो उस बात को लेकर के कोई थोड़ी ना विवाद है विवाद इस बात को लेकर है कि तुमने हमारे भगवान के बारे में उल्टा सीधा क्यों बोला विवाद इस बात को लेकर है कि तुम जो परंपरा से प्राप्त ज्ञान है वह अपने उनका उनका अपने मन मुताबिक अर्थ क्यों करते हो इन बातों को लेकर विवाद अब किसी व्यक्ति ने मंदिर में चंदा दे दिया, भूखों को खाना खिला दिया या और कोई कार्य अच्छा कर दिया और बाहर जाकर के किसी छोटी बच्ची के साथ कोई दुष्कर्म कर दिया। तो इसलिए क्योंकि उसने मंदिर में चंदा दिया है या उसने भूखों को भोजन कराया है। इसलिए उसके उस अमानवीय व्यवहार के लिए उसको सजा ना दी जाए। यह कहां का न्याय है? और यह अगर न्याय है तो तुम्हारा न्याय होगा। यह हमारा सनातन सिद्धांत नहीं है। ठीक है। कई अंशों में रावण भी अच्छा था। कई अंशों में दुर्योधन भी अच्छा था। हां। नहीं था क्या अच्छा? कई अंशों में अच्छा था। परंतु उस अच्छे होने के कारण क्या उसने जो पाप किया उसको भूल जाए? ये कौन सी बात है भाई? तो तुमने अगर क्रांतिकारी खड़े
00:07:51:25 भी किए यद्यपि बात क्या हो रही है? क्रांतिकारी हमने तुमसे कहीं ज्यादा और बहुत बड़ी वृहत संख्या में खड़े किए हैं। और उसके बावजूद एक जो मूल तात्विक विषय है यदि कोई व्यक्ति आज मानवता को मानवता को मान रहा है। माता को माता की दृष्टि से देख रहा है तो उसके मूल में सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष है। और वो मिलता है अद्वैत से शंकर सिद्धांत से। उसको नकार के आप अपनी बिल्डिंग नहीं खड़ी कर पाओगे। उसको पहले नीचे बिल्डिंग जमा लो। उसके बाद उसके अंदर हमने एक कमरा बनाया है। इस कमरे के अंदर हमारे कोई नहीं आ सकता। ये आप कर सकते हो। परंतु आप यह कहो कि हम जो है उस बड़ी बिल्डिंग के बाहर हमने फ्लैट ले लिया है। तो बाहर जैसे ही जाओगे तो तुम्हारा वो जो कमरामरा है तो नष्ट भ्रष्ट हो जाएगा। आपको उस अपार्टमेंट के अंदर अपना एक फ्लैट लेना है तो ले लो। ठीक है? खूब रस रसगत भक्ति कर लो, खूब भेद कर लो कि हम तो केवल कृष्ण को मानेंगे। राम को भी नहीं मानेंगे। उसके अंदर रहते हुए खूब कर लो ये सब बात कि हमारे कमरे के अंदर तो केवल कृष्ण। मगर फिर आप जो है विरोध करने मत आओ। लोहा मत लो फिर
00:09:07:25 है ना पूरे पूरे अपार्टमेंट्स हम तो यह बात है कि हमने हरिहर बुक्का शिवाजी और ऐसे सभी क्रांतिकारी देशभक्त हमने खड़े किए हैं जो आर्य समाजी नहीं थे और हिंदू थे संख्या लगा लो कितनी है वो सब हमने खड़े किए परंपरा प्राप्त आचार्यों ने खड़े किए मूर्ति पूजक थे जो आर्य समाज नहीं था मूर्ति पूजक था वर्ण व्यवस्था को मानने वाला था मंगल पांडे नहीं थे क्या वर्ण व्यवस्था को मानने वाले क्रांति की शुरुआत किसने की किसने की क्रांति की शुरुआत मंगल पांडे ने की नहीं थे क्या मूर्ति को मानने वाले वर्ण व्यवस्था को मानने वाले थे ठीक है ये सब
00:09:57:25 मुझे फिर वही कहा जाता है कि फिल्मों का उदाहरण देता है एक मैंने फिल्म देखी थी कॉमेडी मूवी उसमें क्या होता है कि कुछ करतूत कर रहे हैं। नवयुवक हैं वो मिलकर के कुछ करतूत कर रहे हैं। ऐसे में जो घर के अभिभावक हैं मामा इत्यादि वो आने लगते हैं। तो नवयुवक जो करतूत कर रहे थे वो अक्षय कुमार था उसमें। तो ये लोग जो मिलकर के करतूत कर रहे थे तो मामा आने लगते हैं तो डर जाते हैं मामा आ रहे हैं। मामा आ रहे हैं। तो मामा जब आते हैं तो मामा को मामा बनाने के लिए अरे मामा आ गए अरे मामा आ गए अरे मामा आ गए इतना चिल्लाने लगते हैं मामा आ गए मामा आ गए मामा परेशान होकर पूछता है क्या हो गया भाई इतना क्यों चिल्ला रहे हो अरे मामा आ गए इतना चिल्लाओ पहले से कि जो मूल विषयों पर ध्यान देना व्यक्ति भूल ही जाए
00:10:58:16 है ना तो इतना जो है चिल्लाने लगते हैं कि मामा आ गए मामा आ गए। मूल विषयों पर व्यक्ति ध्यान देना भूल ही जाए। वाह मामा आ गए साहब। मामा आ गए। [हंसी] तो इसी तरीके से हट क्रांतिकारी हट क्रांतिकारी। अरे भैया है क्रांतिकारी तो ईश्वर सर्वशक्तिमान हो गया क्या? मोक्ष तुम्हारा परम स्वतंत्र हो गया क्या? और मैं वहां नाटक क्या देख रहा हूं? वहां पर आर्य समाज की ओर से आर्य समाज के पक्षधर के रूप में खड़ा होकर के कौन बात कर रहा है जो ये आचार्य प्रशांत जी हैं ये वाले मुरैना रहते हैं जो शायद एमपी में जिन्होंने खुद ये कहा है कि मोक्ष को लेकर के मैं दयानंद सरस्वती जी से संतुष्ट नहीं हूं। हो गया सिद्धांत ये सिद्धांत है जो खुद को प्रामाणिक कार्य समाधि कह रहा है गुरुकुल चला रहा है वो कह रहा है कि मैं अपने मोक्षों से संतुष्ट नहीं हूं और धर्म का पर्यावसान किस में है महाभारत में लिखा है धर्म का पर्यावसान है मोक्ष में जहां मोक्ष नहीं है वहां धर्म कैसे सिद्ध कर दे रहे हो तुम काहे
00:12:13:22 का धर्म जब तुम मोक्ष के लिए किसी और के पास जा रहे हो तो तुम्हारा धर्म कहां बचा भाई? और फिर जब तुम मोक्ष से तुम संतुष्ट नहीं हो, तुम्हारा धर्म सिद्ध नहीं हो रहा तो तुम वहां क्या पक्ष लेने के लिए खड़े हुए हो आर्य समाज का? क्या ये नाटक चल रहा है? और बस मूल विषयों पर ध्यान ना दें। और कोई आया तो वाह क्रांतिकारी मामा आ गए। मामा आ गए। मामा आ गए। मामा आ गए। ये चिल्लाते रहो। मूल विषयों पर बात ही नहीं करनी। मामा आ गए सब। मामा आ गए वो करतूत पे या वह जो जो गुण उसमें छुपी हुई चीजें उस पे मामा का ध्यान ना जाए तो पहले इतना चल लो मामा आ गए [हंसी] खैर चलिए विनोद हो गया मूल विषय पे वापस आते हैं
⬜ Not used yet · 00:13:05:22 – 00:24:28:02 (11:22)
00:13:05:22 अच्छा ये जो मैसेजेस हम लोग करते हैं ना बीच में इससे थोड़ा सा विघ्न पड़ता है तो बहुत आवश्यक हो तो करें अन्यथा फिर बाद के लिए अपनी चीजें रख लें कोई कॉपी पेन लेकर के कि मुझे यह बात कहनी है। नोट करते जाए। आठवां दशक है परमात्मा का निश्चय माया के अस्तित्व में संदेह निर्गुण से माया की उत्पत्ति सूक्ष्म पंचमहाभूत स्थूल पंचमहाभूत सत्संग और मोक्ष मोक्ष के लक्षण परमात्मा के दर्शन
00:13:43:25 रिसीव्ड ऑन फोन पे अनेक प्रकार के अनुभव ब्रह्म का निरूपण नवा दशक ब्रह्म का निरूपण आत्मज्ञान ज्ञानी के जन्म मरण का अभाव अजान और सुजान पिंड और ब्रह्मांड पांचों भूत और तीनों गुण विकल्प निरसन बद्ध का पुनर्जन्म ब्रह्म में ब्रह्मांड आत्म स्थिति दवा दशक अंतःकरण की एकता उत्पत्ति के विषय में शंका सृष्टि की उत्पत्ति उत्पत्ति निरूपण ब्रह्म पंच प्रलय ब्रह्म निरूपण साधु चमत्कार नहीं दिखलाते प्रतीति निरूपण पुरुष और प्रकृति फिर निश्चल और चंचल ये बहुत अच्छा वो आया है। साधु चमत्कार नहीं दिखलाते। जो लोग कहते हैं मधुमक्खियों की सेना ये यहां पे आ रहा है। यह पढ़ने में आनंद आएगा। मधुमक्खियों की सेना नागोक की सेना विश्वामित्र की धनुर विद्या अपने पर बात आएगी तो क्या करेंगे भाग जाएंगे अपनी बातें आएंगी भगवती पढ़ाने
00:14:58:26 आती है भगवती ने पूछा मांगो क्या मांगते हो मांग लो राष्ट्र हित में चीजें सारी मलेच्छ शक्तियों का नाश हो जाए मलेच्छ का नाश हो जाए मांग लो पर नहीं वो भगवती उनको पढ़ाने पढ़ा के जाती है क्या जो शंकराचार्य जी ने पहले ही पढ़ा रखा है वो पढ़ा के जाती है भगवती में हम आगे क्या है हम प्रतीति निरूपण पुरुष और प्रकृति निश्चल और चंचल 11वां दशक सिद्धांत निरूपण सृष्टि का क्रम शिक्षा निरूपण विवेक निरूपण राजनीति निरूपण महंत के लक्षण माया रूपी चंचल नदी अंतरात्मा का निरूपण उपदेश निरूपण निष्प्रह व्यवहार
00:15:47:06 देखो देखो परमार्थ और व्यवहार की बात यहां भी चल रही है। ध्यान दीजिए। 12वां दशक विमल लक्षण अनुभव का निरूपण भक्त निरूपण विवेक वैराग्य निरूपण आत्म निवेदन सृष्टि क्रम निरूपण विषय त्याग काल का रूप प्रयत्न संबंधी उपदेश उत्तम पुरुषों के लक्षण आत्मा और अनात्मा सारासार विचार उत्पत्ति निरूपण प्रलय निरूपण सृष्टि की कहानी लघु बोध अनुभव का विचार कर्ता का निरूपण
00:16:35:08 आत्मा का विवरण उपदेश निरूपण निष्प्रह लक्षण भिक्षा निरूपण काव्य कला कीर्तन लक्षण हरि कथा के लक्षण चातुर्य के लक्षण युग धर्म निरूपण अखंड ध्यान शाश्वत निरूपण माया का निरूपण चतुरों के लक्षण निष्प्रहता के लक्षण श्रेष्ठ अंतरात्मा ब्रह्म निरूपण चंचल के लक्षण चातुर्य विवरण प्रकृति और पुरुष के लक्षण सूक्ष्म जीव निरूपण पिंड की उत्प उत्पत्ति सिद्धांत निरूपण 16वा दशक वाल्मीकि स्तवन सूर्य स्तवन पृथ्वी स्तवन जल स्तवन अग्नि स्तवन वायु स्तवन महाभूत निरूपण आत्माराम निरूपण उपासना निरूपण गुणों और भूतों का निरूपण सत्रवा दशक अंतरात्मा का भजन शिव शक्ति निरूपण आध्यात्म श्रवण संशय का नाश देखो हमारे सारे मूल टॉपिक देखो घूमते हैं कि नहीं
00:17:50:19 संशय का नाश अजपा निरूपण देह और आत्मा का निरूपण सांसारिक गति तत्व निरूपण तनु चतुष्टय मूर्ख और साधु के लक्षण 18वा दशक विविध देवता सर्वज्ञ की संगति निष्प्रह शिक्षा दुर्लभ शरीर का महत्व समाधान का उपाय उत्तम पुरुषों के लक्षण लोगों का स्वभाव अंतदेव निरूपण निद्रा निरूपण श्रोताओं के अवलक्षण लेखन क्रिया अर्थभेद का ज्ञान 19वां अभागों के लक्षण भाग्यवानों के लक्षण शरीर का महत्व बुद्धिवाद यत्न निरूपण उपाधियों के लक्षण राजनीति निरूपण विवेक के लक्षण 20वां दशक पूर्ण और अपूर्णवाह फिर आ गया हमारा बाधित और अभाध्य हां
00:18:49:15 तीन प्रकार की सृष्टियां सूक्ष्म नाम आत्मा का निरूपण चारों पदार्थ आत्मा के गुण आत्म निरूपण देह क्षेत्र निरूपण सूक्ष्म निरूपण विमल ब्रह्म निरूपण ये है हमारी विषय सूची मुझे लगता है विषय सूची को पढ़ने में भी आनंद आया होगा देखो इस ऐसे करना चाहिए ग्रंथ का अध्ययन है ना विषय सूची को पढ़ के भी मन आनंदित हो गया। आप कभी भी कोई पुराण खोले, कभी भी अपना कोई धार्मिक सनातन ग्रंथ खोलें तो उसमें आप देखिए उसकी आप विषय सूची को ही आप पढ़ ले तो आपको लगेगा वाह। अच्छा ये भी है इसमें इतनी जानकारियां तो वही आपको मिलंगी विषय सूची में। खैर आगे बढ़ते हैं।
00:19:35:06 श्री गणेशाय नमः हिंदी बोध पहला दशक पहला समास ग्रंथ आरंभ निरूपण श्रोता पूछते हैं कि यह कौन ग्रंथ है? इसमें क्या-क्या बातें कही गई है और इसे सुनने से क्या लाभ होता है? इसका उत्तर यह है कि इसका नाम दात बोध है। इसमें गुरु और शिष्य का संवाद है और इसमें भक्ति मार्ग का विस्तृत वर्णन है। इसमें नवदा भक्ति और ज्ञान का वर्णन है। वैराग्य के लक्षण कहे गए हैं और आध्यात्म का निरूपण किया गया है। इस ग्रंथ का यह मतलब है कि भक्ति की सहायता से मनुष्य अवश्य ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। करता है। इसमें मुख्यत भक्ति, शुद्ध ज्ञान, आत्म स्थिति, शुद्ध उपदेश सायुज्य मुक्ति, मोक्ष प्राप्ति, ईश्वर के शुद्ध स्वरूप, विदेह, स्थिति, अलिप्तता, मुख्य देवता या ईश्वर, अच्छे भक्त, जीव और शिव, जीवात्मा और परमात्मा मुख्य, ब्रह्म और नाना मतों आदि का निश्चय या निरूपण किया गया है। इसमें मुख्य उपासना, नाना प्रकार के कवित्व और चातुर्य के लक्षण कहे गए हैं। माया की उत्पत्ति और पंचभूतों के लक्षण बतलाते गए हैं। और बतलाया गया
00:20:50:09 है कि कर्ता कौन है। इसमें नाना प्रकार के संशयों और शंकाओं का निवारण किया गया है और अनेक प्रकार के प्रश्नों का उत्तर भी दिया गया है। इस प्रकार की जो बहुत सी बातें इस ग्रंथ में बतलाई गई हैं। उन सब का वर्णन यहां नहीं संभव है। पूरा दास बोध दशकों में विभक्त किया गया है और हर एक दशक का विषय उसी उसी दशक के आरंभ में बतला दिया गया है। इसमें उपनिषद, वेदांत, श्रुति आदि अनेक ग्रंथों के मत दिए गए हैं और शास्त्रों के प्रमाण सहित आत्म प्रतीति या अपने अनुभव की बातें बतलाई गई। इसमें अनेक ग्रंथों के मत हैं जो मिथ्या नहीं कहे जा सकते। तथापि वह बातें अब अनुभव की सहायता से प्रत्यक्ष कर दी गई हैं। यदि मत्सर के कारण कोई इसकी बातों को मिथ्या कहे तो वह मानो समस्त धर्म ग्रंथों के मतों और ईश्वरीय वाक्यों का उच्छेद या खंडन करेगा। शिव गीता राम गीता गुरु गीता गर्भ गीता उत्तर गीता अवधूत गीता वेद वेदांत भगवत गीता ब्रह्म गीता हंस गीता
00:22:04:00 पांडव गीता गणेश गीता यम गीता समस्त उपनिषद भागवत आदि अनेक ग्रंथों के मत इसमें दिए गए हैं। वे सब वास्तव में भगवत वाक्य हैं और बिल्कुल ठीक है। ऐसा कौन पथित है जो भगवत वचन में अविश्वास करे एक तरीके से यह ग्रंथकार के द्वारा स्वयं ग्रंथकार के द्वारा लिखी गई भूमिका है जो हम पढ़ रहे हैं। इसमें जो बातें कही गई है वह भगवत वाक्य ही है। उनसे रहित या भिन्न नहीं है। जो बिना पूरा ग्रंथ देखे झूठ-मूठ इस पर दोष लगावे वह दुरात्मा और दुराभिमानी केवल मत्सर के कारण ही दोष लगावेगा। अभिमान से मत्सर और मत्तर से तिरस्कार उत्पन्न होता है और तब क्रोध का भाव प्रबल हो उठता है। यह प्रत्यक्ष है कि ऐसा मनुष्य काम और क्रोध से विचलित हो गया है। अहम भाव ने उसकी बुद्धि पलट दी है। जो व्यक्ति काम और क्रोध में पीड़ित हो वह कैसे अच्छा कहा जा सकता है। अमृत पान करने पर भी राहु मर गया। परंतु अब इन बातों को जाने दो। जो जैसा अधिकारी होगा वह इससे वैसा लाभ उठावेगा। परंतु अभिमान
00:23:19:08 छोड़ देना सबसे उत्तम है। पहले श्रोता ने पूछा था कि इस ग्रंथ में कौन-कौन सी बातें कही गई हैं? इसलिए वह सब बातें संक्षेप में बतला दी गई हैं। अब इसे श्रवण करने का फल सुनिए। इसको श्रवण करते ही तुरंत आचरण बदल जाता है और संशय का समूल नाश हो जाता है। सुगम मार्ग दिखाई पड़ने लगता है और दुर्गम साधन की आवश्यकता नहीं रह जाती है। सायुज्य मुक्ति का रहस्य खुल जाता है। अज्ञान, दुख और भ्रांति का नाश हो जाता है और शीघ्र ही ज्ञान प्राप्त 15
00:23:54:19 यदि किसी की आवाज आ रही है म्यूट कर दे उनका म्यूट कर दिया भैया कंटिन्यू करें। हम जो लोग भ्रांत अवगुणी और बुरे लक्षणों वाले होते हैं वे भी अच्छे लक्षणों से युक्त हो जाते हैं और धूर्तों तार्किकों तथा विचक्षणों को समय का ज्ञान होने लगता है। आलसी भी कर्मण्य हो जाते हैं और पापी पश्चाताप करने लगते हैं।
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→ Used in: A · Video क्या शंकराचार्य भी दूसरे संप्रदाय के आचार्यों को सुनने से रोकते हैं? DAASBODH LE... at 4:08 ↗
00:24:28:02 भक्ति मार्ग की निंदा करने वाले उसकी स्तुति करने लगते हैं। संसार के बंधन में पड़े हुए लोग मोक्ष की कामना करने लगते हैं। अब देखिए कुछ लोग कहते हैं कि शंकर मत वाले ज्ञान मार्गी होते हैं। शंकराचार्य शंकर मत वाले हैं और उनके हिसाब से ज्ञान मार्गी है। भक्ति मार्ग के विरोधी हैं। और शंकराचार्य दास बोध पढ़ने को दे रहे हैं। और दास बोध कह रहा है कि इसमें भक्ति मार्ग के द्वारा मुक्ति बताई गई है। क्या इस वाले कभी कहते हैं दास बोध पढ़ो जाकर के? नहीं कहते। क्या इस वाले कभी कहते हैं कि ज्ञानेश्वरी गीता पढ़ो जो डायरेक्ट उनके संप्रदाय से संबंध ग्रंथ नहीं है उनको पढ़ने के लिए कभी इस वाले कहते हैं मैं पहली बार जब शंकराचार्य भगवान के दर्शन करने गया था उनके दर्शन मुझे सुलभ हुए थे तो उन्होंने जब मैंने अपनी शंका उनको व्यक्त की थी तो उन्होंने मुझको शंकर परंपरा का ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने मुझे कहा था कि रामानुज संप्रदाय के महान शास्त्रार्थ के मर्मज्ञ महान शास्त्रार्थी पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी का ग्रंथ क्यों और पुराण दिग्दर्शन आप ले लीजिए
00:25:43:15 और उसका अध्ययन करिए। बताइए ये इस वाले करते हैं क्या जाकर के उनका ग्रंथ ले लो इस कार्य के लिए करते हैं क्या यहां होता है रामानुजियों के यहां होता है शंकराचार्यों के यहां होता है जहां एक दूसरे के ग्रंथ पढ़ने को दिए जाते इसलिए कहते हैं कि इस वाले तोड़ रहे हैं हिंदुओं को आपस बांट रहे हैं इसलिए ये कहा जाता है वैष्णवता के नाम पर एक दूसरे से दूर कर दो। भाई को भाई से अलग कर दो।
00:26:21:20 आज भी मेरे पास वो ग्रंथ जो गुरुदेव के द्वारा बताया गया पहला ग्रंथ वो यह है। और कोई ग्रंथ नहीं बताया था गुरुदेव ने। यह बताया था। इसको कहते हैं सिद्धांत। उनको सत्य की रक्षा थी। सत्य की चिंता थी कि सत्य बोलना है। भले ही वो रामानुजाचार्य जी का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े। रामानुज परंपरा का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े पर उनको सत्य बोलना था सत्य निष्ठ थे ठीक है वहां ये भेदभाव नहीं था कि नहीं रामानुज परंपरा का ग्रंथ हम क्यों बताएं भाई अपने ही आचार्यों को बताएं जो सबसे उनको सुलभता से दिखाई दिया मेरे लिए अनुकूल हो सकता है वो ये ग्रंथ था वो पुराण दिग्दर्शन था जो पीछे रखा हुआ यह
00:27:09:25 ग्रंथ मुझे मेरे गुरुदेव ने सबसे पहले पढ़ने को दिए इस वाले इस वालों की तरह नहीं किया उन्होंने कि नहीं नहीं दूसरे के ग्रंथ मत पढ़ो दूसरे संप्रदाय के ग्रंथ मत पढ़ो इसको कहते हैं सिद्धांत और इसको कहते हैं निडरता अभय इसको ये भी कहते हैं कि पढ़ लेने दो पुराणिक दर्शन पढ़ लेने दो जिसको अपने सिद्धांत पर विश्वास होता है वो ये नहीं सोचता कि ये व्यक्ति कहीं भटक ना जाए कहीं यहां ना चला जाए कहीं वहां ना चला जाए ऐसे ही रामानुज परंपरा वाले भी बताते हैं कि अमुक कार्य के लिए आप अमुक ग्रंथ पढ़ लीजिए। शंकर परंपरा बताते हैं। कई जगह संदर्भ देते हैं शंकराचार्य का और सभी परंपरा प्राप्त आचार्य अपने वक्तव्यों में अपनी वाणी में कहीं ना कहीं दूसरे संप्रदाय के आचार्यों का संदर्भ देते हुए बात करते हैं। क्यों? रामानुज परंपरा वाले क्या रामानंद परंपरा का संदर्भ देते हुए रामचरितमानस का संदर्भ देते हुए बात नहीं करते। कई बार करते हैं? शंकर संप्रदाय वाले क्या रामचरितमानस जो रामानंदी परंपरा का ग्रंथ है उसका संदर्भ देते हुए बात नहीं करते हैं इस वाले नहीं करेंगे कभी भी वो हमेशा वही चिल्लाएंगे जीव गोस्वामी श्रील प्रभुपाद जी और कुछ और नाम होंगे गौरंग दास जी और
00:28:24:28 चैतन्य महाप्रभु इनहीं सबके इर्दगिर्द बाकी गाड़ी घूमती रहेगी खैर कम टू द पॉइंट तो भक्ति मार्ग की निंदा करने वाले उसकी स्तुति करने लगते हैं। संसार के बंधन में पड़े हुए लोग मोक्ष की कामना करने लगते हैं। मूर्ख भी दक्ष हो जाते हैं और भक्ति मार्ग पर चलकर अभक्त भी मोक्ष प्राप्त करते हैं। इससे अनेक दोषों का नाश होता है और पतित लोग पावन हो जाते हैं। श्रवण मात्र से प्राणी प्राणी को उत्तम गति प्राप्त होती है। इसे सुनने से शारीरिक बुद्धि के अनेक भ्रम और संदेह तथा संसार के अनेक प्रकार के उद्वेग नष्ट हो जाते हैं। अधोगति का अंत हो जाता है और उनको शांति तथा समाधान मिलता है। जिसका जैसा भाव होता है उसे वैसा ही लाभ भी प्राप्त होता है। जो मन के मन में मत्सर रखकर प्रश्न करता है उसे मत्सर की ही प्राप्ति होती है। देखिए अगर वास्तविकता में देखा जाए तो लोग ज्ञान मार्ग के नाम पर भक्ति का विरोध करना कि भाई सिर्फ मतलब हमारे जो हमारी जो मुक्ति
00:29:40:04 वो ज्ञान से है इसलिए हम भक्ति नहीं करेंगे। तो यह तो ठीक नहीं है। परंतु भक्ति का नाम लेकर के ज्ञान की प्राप्ति होने के विषय में काउंटर करना या मना करना यह अपने आप में एक बहुत बड़ा कुचेष्टा कहेंगे इसे। क्यों? क्यों कहेंगे कुचेष्टा? क्योंकि परलोक की बात कहें या फिर इस्लोक की बात कहें। व्यक्ति ढूंढ तो ज्ञान ही रहा है। ज्ञान का मतलब समझ रहे हैं आप? यदि आपको रसगुल्ला खाना है, गुलाब जामुन खाना है तो क्या आपको वह जो मटेरियल है उससे मतलब है या उससे मिलने वाली जो सूचना है इंफॉर्मेशन ये मीठा है, गुदगुदा है उससे मतलब है। आपका मूल विषय क्या है? कि आपके दिमाग को आपके मस्तिष्क को वो खोवा है, जो उसके अंदर जो उसके अंदर मिठास है, वह सूचना मिलनी चाहिए। अच्छा यदि आपको जो रसगुल्ले की सूचना है वह किसी कुछ ऐसा इंतजाम कर दिया जाए कि आपको जो है किसी और टेक्नोलॉजी के द्वारा वह सूचना प्राप्त होने लग जाए रसगुल्ले की तो क्या आपको रसगुल्ले की नीड रह जाएगी? नहीं रह जाएगी। तो हम आफ्टर ऑल एट दी एंड
00:30:55:06 हर चीज में ढूंढ क्या रहे हैं? इंफॉर्मेशन तो आप ज्ञान मार्ग को सर्वदा कि भाई यह ज्ञान मार्ग ही है या इस इस तरह की बातें करके ज्ञान मार्ग को सर्वदा खंडित नहीं कर सकते। क्योंकि एट द एंड भगवान को सामने देख के भी आपको सोचना चाहिए कि भगवान मेरे सामने हैं। इस बात की सूचना अंतिम लक्ष्य आपका क्या है? सूचना ज्ञान इंफॉर्मेशन आजकल देखो बहुत ये पूरा अद्वैत दर्शन आपको दिखेगा। इसमें फोन पे से लोग पैसे दे रहे हैं। लोग ले रहे हैं। बने बेवकूफ चले जा रहे हैं। ये क्या हुआ भाई कि भैया मुझे ₹50 चाहिए। व्यक्ति ने कुछ किया। एक आवाज आई टिंग टिंग टिटिंग और पैसे उसमें चले गए। सामने वाला खुश हो गया। अब हुआ क्या? केवल इंफॉर्मेशन मिली कि हां तुम्हारे पास पैसे आ गए। केवल इंफॉर्मेशन मिली कि तुम्हारे पैसे कट गए। इतना ही तो हुआ। इंफॉर्मेशन का आदान प्रदान हुआ। उसके अलावा उस व्यक्ति को भौतिक रूप से कुछ मिला क्या? वहां पर इंफॉर्मेशन मिल गई। व्यक्ति संतुष्ट हो गया। इसी प्रकार से यदि इंफॉर्मेशन अमुक अमुक चीजों में हमें ठंड लग रही है। हमें गर्मी लग रही है। हमें सुख हो रहा है। सुख मिल रहा है। यदि हमें इंफॉर्मेशन मिलने लग जाएगी तो क्या हमें भौतिक भौतिकता की आवश्यकता रह जाएगी?
00:32:10:24 नहीं रह जाएगी। तो हम मूल रूप से किसे ढूंढ रहे हैं? इंफॉर्मेशन को। तो सतही स्तर पर भी जब हमारे संशय निराकरण होने लगता है तो वह हृदय में संतोष पहुंचता है कि फिर वो जो भौतिक ताप हमें दिख रहे होते हैं वो कम होने लगते हैं। सामान्य व्यक्ति के स्तर से भी मैं आपको दिखा रहा हूं। बता रहा हूं जब हमारे अंतःकरण से हमारी अंतरात्मा से निकलने वाले जो प्रश्न है और वो प्रश्न कौन से मैं कई बार अपने वक्तव्यों में आपको बता चुका हूं। असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिगमया मृत्यम गमया जब हम इस पर बात करने लगते हैं इसका जब हमें निराकरण प्राप्त होने लगता है तो हम बहुत संतोषमय हो जाते हैं बहुत संतोषमय इतने संतोषमय हो जाते हैं कि धीरे-धीरे उस संतोष के कारण हमारे पास वो क्षमता भी आ जाती है कि कोई समसी लेकर के हमारी आंख निकाल रहा है ना आंख तब भी हम लोग उस समय विचलित नहीं होते क्योंकि हमारे हृदय में वह संतोष होता है। एक बस इसमें कुल मिलाकर बात यह है कि हम अपने अंतरात्मा की अपने जो अंतःकरण से निकलने वाली वो आवाज है अथातो धर्म
00:33:26:00 जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा आत्म जिज्ञासा उस आवाज को हम कब सुन रहे हैं? जैसे भगवत गीता में एक बात आती है और कई शास्त्रों में एक बात आती है कि अश्रद्धावान को इसका श्रवण ना कराया जाए। जिसकी श्रद्धा नहीं है उसको इसका श्रवण ना कराया जाए। यह शास्त्रों में कई बार आया है। अच्छा तर्क तर्क की बात क्या होती है? अब जैसे हम लोग क्वेश्चन करते हैं स्कॉन वालों से तो हम कहते हैं कि भाई ये सवाल क्या है? ये सवाल क्या है? कि नहीं नहीं तुम अवक्त हो। तुमसे बात करना बेकार है। अश्रद्धावान इसलिए तुमसे बात करना बेकार है। आजकल निग्गू फॉलोवर्स निग्गू एंड कंपनी भी वही कर रही है। तो यदि अश्रद्धावान को उत्तर नहीं देना श्रद्धावान से बात करना व्यर्थ है तो किससे बात की जाएगी? क्योंकि जो भी व्यक्ति जब तक शास्त्र को नहीं जानता है, जब तक भगवान को नहीं जानता है, जब तक कुछ नहीं जानता है, उससे पहले तक वह अश्रद्धावान ही तो है। क्या गीता को जानने से पहले किसी व्यक्ति का गीता के प्रति भावनाएं होती है? क्या श्रद्धा की? भगवान को जानने से पहले भगवान के प्रति भावनाएं कैसे होंगी?
00:34:41:10 नहीं होती। तो इसका मतलब क्या है? फिर शास्त्रों ने क्या गलत कहा है? क्या शास्त्रों ने यह लाइन गलत लिखी है? कि अश्रद्धावान को मत पढ़ाना यह शास्त्र नहीं गलत नहीं लिखी है। इस लाइन का सही मतलब क्या है? सही इस पंक्ति का सही अर्थ क्या हो सकता है? तो वो अर्थ यह यह है कि अश्रद्धावान सभी हैं। परंतु ये आत्मा से निकलने वाले जो प्रश्न है इन प्रश्नों पर कौन ध्यान दे रहा है? असतो मा सदगमया तमसो मागया इन पर ध्यान कौन दे रहा है जो इन पर ध्यान दे रहा है उसको ये ग्रंथ आप पढ़ा सकते हैं वो श्रद्धावान है यानी कि जो अपनी आत्मा की आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है भले ही उसने गीता अभी नहीं जानी है भले ही भगवान के बारे में नहीं जानता है पर वो श्रद्धावान है क्यों क्योंकि वो आत्मा की आवाज सुन रहा है वो वो खोज रहा है कि पहले मुझे मेरा गंतव्य बताओ क्या गंतव्य है अथो ब्रह्म जिज्ञासा उसके बाद उस गंतव्य तक किस प्रकार की गति के द्वारा पहुंचा जा सकता है वह बताओ अथातो धर्म जिज्ञासा तो जो इस प्रकार से अपनी आत्मा की आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है वो कोई
00:35:56:16 भी हो सकता है वो मच्छ भी हो सकता है अब कोई व्यक्ति है जिसको इससे मतलब ही नहीं है कि भैया ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं अगर ईश्वर ने सृष्टि बनाई तो उस समय वो कहां था कहां खड़ा था या इन विषयों पर उसका चिंतन नहीं उसके मन से आवाज ही नहीं आ रही है। यह सब बातें वह सोच ही नहीं रहा है कि मैं 70 साल का हो जाऊंगा तो भोग कैसे करूंगा? रसगुल्ला कैसे खाऊंगा? या जो बॉडी बिल्डिंग मैं आज कर रहा हूं तो अपनी बॉडी कैसे मेंटेन करूंगा? या अगर मैं काम वासना से युक्त हूं तो उस समय अपनी लालसाओं को पूरा कैसे करूंगा? मेरे दांत टूट जाएंगे। मैं वैसा नहीं दिखूंगा। मेरे झुर्रियां आ जाएंगी। वह इन सब बातों पर जब नहीं ध्यान दे रहा है कि कुछ इसके पार भी है या यही अंत है। जब मैं अकेला पड़ जाऊंगा कोई नहीं होगा मेरे पास। उस समय मैं क्या करूंगा इन सब विषयों पर जो चिंतन नहीं कर रहा है और वह क्या क्या कर रहा है? वो यह देख रहा है कि भाई एसी है कि नहीं? टीवी है कि नहीं? मेरे पास कार है कि नहीं? स्कूटर है कि नहीं? वो इन सब चीजों पर ध्यान दे रहा है। तो और फिर आप उससे कहने जाओ कि तुम्हें पता है ईश्वर सब शक्तिमान है कि नहीं? तुम तुम क्या कहते हैं? तुमको इससे मतलब है ईश्वर सर्वशक्तिमान से। परम स्वतंत्र मोक्ष से तो वो क्या कहेगा भैया मैं एसी लेने जा रहा हूं नया एलजी
00:37:12:02 का मुझे माफ कर दो तू ऐसे पकाऊ लोग आपको मिलेंगे कि नहीं पकाऊ मतलब जिनके लिए आप पकाऊ ये बातें करने वाले जिनके लिए पकाऊ है वो आपको बहुत मिलेंगे वो सब अश्रद्धावान है तो पहले उनको टटोलिए कि वो अपनी आत्मा की आवाज सुन रहे हैं कि नहीं और यदि वो सुन रहे हैं उनको उन सवालों से मतलब है तब उनको बताइए यदा यदा धर्मस गन भवती भारत अभसम तदा सजा तब उनको बताइए
00:37:47:20 भगवान की शक्ति के बारे में ईश्वर के बारे में ग्रंथ के बारे में तो इसलिए यह वाला जो एक संशय बना रहता है कि अश्रद्धावान को नहीं पढ़ाना ग्रंथ देना है या बात बतानी है भगवान की या यह है यह वो है ऐसे नहीं होता है। आपको यह जानना होगा कि वह अपनी आत्मा की आवाज जान सुन रहा है कि नहीं। आपको उसके प्रश्नों से समझ में आ जाएगा। ठीक है? तो अश्रद्धावान कौन है? वहां पर उस परिपेक्ष में जो अपनी आत्मा की आवाज नहीं सुन रहा है। जिसको उन प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं है। दूसरा समास गणेश स्तुति। गणनायक कर्म सिद्धि फलदायक अज्ञान और भ्रांति का नाश करने वाले बोध रूप। देखिए बोध रूप यानी ज्ञान रूप। गणेश जी को नमस्कार है। बस शंकराचार्य भगवान ने क्या किया कि हम जो यह कह रहे हैं ना फाइनली हमको इंफॉर्मेशन चाहिए इंफॉर्मेशन तो शंकराचार्य भगवान ने कह दिया फाइनली जो इंफॉर्मेशन आपको मिल रही है ये है ईश्वर का अंतिम स्वरूप उन्होंने इस इस इंफॉर्मेशन से अलग नहीं किया भगवान को नहीं तो नहीं तो क्या होता कि ईश्वर से भी बड़ी कोई चीज हो जाती इस दुनिया में समझ रहे हैं जो लोग कहते हैं ना कि हम बहुत बड़े भक्त
00:39:02:26 हैं वो अपने ईश्वर को छोटा कर रहे उनसे बड़ा ज्ञान है जो व्यक्ति को चाहिए और ईश्वर मात्र एक साधन बन के रह जाता तो शंकरा आदि शंकराचार्य जी ने क्या सिद्धांत स्थापित किया ये जो ज्ञान तुम्हें मिल रहा है ये ईश्वर का फाइनल जो रूप जो तुमको चाहिए जो ज्ञान स्वरूप प्रबोध रूप गणेश जी को नमस्कार
⬜ Not used yet · 00:39:25:10 – 00:51:40:00 (12:15)
00:39:25:10 आप कृपा कर मेरे हृदय में विराजे सदा वही वास करें और मुझ वाक्य शून्य से कुछ कहलावे आपकी कृपा कृपा से जन्म जन्मांतर की भ्रांति का नाश होता है और विश्व भक्षक काल भी दासत्व करने लगता है। आपकी कृपा का प्रवाह होते ही बेचारे विघ्न कांपने लगते हैं। यह सब उन्होंने अपनी भाषा शैली में मराठी में लिखा होगा तो एक गीत जैसा होगा। परंतु हम हिंदी में पढ़ रहे हैं। कांपने लगते हैं और आपका नाम लेने से ही वह तितर विितर हो जाते हैं। इसी से आपका नाम विघ्न हर है। आप हम अनाथों के नाथ हैं। हरि से हर तक सभी देवता आपकी वंदना करते हैं। पंच देवोपासना आ गई। बता दो हमने शिवाजी छत्रपति शिवाजी को हमने खड़ा किया है। तुमने कितने वो छत्रपतियों को खड़ा किया है बताओ।
00:40:21:15 यही सब चला करता है। इसी बात का कंपटीशन है। हमारा सिद्धांत इसलिए मान लो कि हमने अनाकोंडा के बराबर पाइप लगा दिए। साहब इसलिए हमारा सिद्धांत मान लो। वेदों में प्रमाण है कबीर भगवान है। वाह। मंगल निधि का वंदन करके जो कार्य किए जाते हैं उनमें सभी सिद्धियां प्राप्त होती है और विघ्न बाधाएं मार्ग में नहीं आती। आपका ध्यान करते ही परम समाधान होता है। सब अंगों को छोड़कर मन की मन केवल आंखों में आ बसता है। बाकी सब अंग पंगू हो जाते हैं। आपका सगुण रूप भी बहुत ही सुंदर है। आपके नृत्य करते ही सब देवता स्तब्ध हो जाते हैं। वे सदा आनंद से मत होकर घूमते रहते हैं। और हर्ष से सुप्रसन्न वंदन वन रहते हैं। आपका भव्य रूप और भीम मूर्ति महा प्रचंड है। विस्तर्ण और उन्नत मस्तक सिंदूर से चर्चित है। गंड स्थल से नाना प्रकार की सुगंधियां निकलती है और भ्रमर वहां आकर गुंजारते हैं। सूंड सरल और कुछ मुड़ा हुआ है। अभिनव कपोल शोभित है। अधर लंबा है। जिसमें क्षण क्षण
00:41:37:06 पर तीक्षण मद टपकता है। 14ों विद्याओं के स्वामी छोटी-छोटी आंखें हिला रहे हैं और कोमल तथा लचीले कान फड़फड़ा रहे हैं। रत्न जटित मुकुट झिलमिला रहा है। जिस पर अनेक प्रकार के रंग चमक रहे हैं। कुंडलों में जड़े हुए नीलम चमक रहे हैं। दृढ़ और शुभ्र दांतों में सोने के जड़ाऊ कड़े पड़े हैं। जिनके नीचे छोटे-छोटे स्वर्ण पत्र चमक रहे हैं। तोंद थलथला रही है और उस पर सांप का पट्टा पड़ा हुआ है। क्षुद्र घटिका मंद मंद झनकार रही है। चतुर्भुज लंबोदर स्वरूप है। कमर में पीतांबर है। तोंद पर सांप का फन फड़फड़ा रहा है। जो फुबकार रहा है। वह फन हिलाता हूं और जीभ लपलपाता है। नाभि कमल पर कुंडली मार कर बैठा हुआ है और टक लगाकर देख रहा है। अनेक प्रकार के फूलों की माला गले में पड़ी हुई उस नाग तक लटक रही है। हृदय कमल पर रत्न जटित पद पदक है। परस और कमल शोभित है। और तीक्ष्ण अंकुश चमक रहा है। एक हाथ
00:42:52:14 में गोल मोदक है। जिस पर आपकी बहुत प्रीति है। नट लोग अपनी नाट्यक कला दिखलाते हुए अनेक प्रकार के नृत्य कर रहे हैं। ताल और मृदंग आदि बज रहे हैं। चारों ओर नृत्य काल में होने वाली प्रतिध्वनि हो रही है। उन्हें क्षण भर भी स्थिरता नहीं है और वह चपलता में अग्रगण्य है। सजी हुई और अच्छे लक्षणों से युक्त मूर्ति सुंदरता की खान है। नपुर झुनझुन बज रहे हैं और पैजनी की झकार हो रही है। घुंघरूओं से दोनों पैर सुशोभित है। गणेश जी के कारण शिव जी की सभा की भी शोभा बढ़ गई और दिव्य अंबर की छटा छाई हुई है। आपके साथ साहित्य में निपुण आठ नायिकाएं भी हैं। ऐसे सर्वांग सुंदर और सब विद्याओं में अग्रगण्य गणेश जी को मेरा साष्टांग नमस्कार है। गणेश जी के ध्यान का वर्णन करते ही भ्रांत लोगों की मति भी प्रकाशित हो जाती है। उनका गुणानुवाद करने वाले पर सरस्वती प्रसन्न होती है। जिनकी वंदना ब्रह्मा आदि तक करते हो उनके सामने बेचारा मनुष्य क्या चीज है? भगवान श्री कृष्ण ने भी इनकी
00:44:07:15 वंदना की है। ध्यान रखिएगा कहां पर है? ब्रह्म वैवर पुराण में भगवान गणेश जी से सब कुछ प्रकट हो रहा है। है ना? जो यह इस वाले कहते हैं कि भैया श्री कृष्ण से ही सब कुछ प्रकट हुआ है तो वहां ब्रह्म वैभव पुराण में उनसे भी प्रकट होता है। जिनकी अतः मंदमती लोगों को गणेश जी का चिंतन करना चाहिए। जो लोग मूर्ख, बुरे लक्षणों से युक्त और हीनों से भी हीन होते हैं। वह भी सब विषयों में दक्ष तथा प्रवीण हो जाते हैं। वह परम समर्थ हैं और सभी मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं। यह अनुभव सिद्ध है कि उनका भजन करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं। कलयुग में चंडी और विनायक ही मुख्य देवता कहे गए हैं। ऐसे मंगल मूर्ति गणेश जी का मैंने मन में परमार्थ की कामना करते हुए यथामति स्तवन किया। तो
00:45:03:22 आप देखिए यह जो हमारे धर्म ग्रंथों में इस तरह से एक एक बात एक भगवान के एक-एक अंग प्रत्यंग पर बात करते हुए चर्चा की जाती है। उसकी आवश्यकता क्या है? उसकी आवश्यकता यही है कि अभी देखिए जब हम लोग यह बातें कर रहे थे और धीरे धीरे धीरे धीरे जब हम ध्यान से वह बातें सुन रहे थे तो हमारे मन में वही चिंतन चलने लगा जो हम पढ़ रहे हैं और मन में एक भावनाएं भगवान के प्रति उमड़ आई। भगवान के प्रति दुलार या स्नेह या जो भी है जो भी हम उन्हें अर्पित कर सकते हैं वो सारी भावनाएं उमड़ आई। जो भी कोई ध्यान से सुन रहा होगा वो उसमें डूबने लगा होगा। तो इसीलिए भगवान की जब व्याख्या करते हैं, उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं तो एक एक बारीक से बारीक चीजों पर भी बात की जाती है। अब क्या है कि हमारे कई धर्म धर्म ग्रंथ ऐसे हैं जिसमें कि इन बातों को ऐसे ना बता करके कि आप ऐसे हो। ऐसे ना बता करके भगवान को चित्रित करने के लिए कि भगवान कैसे दिखते थे। इसे चित्रित करने के लिए उन्होंने कथाओं के रूप में कि भाई उसने उसको देखा तो उस समय वह ऐसे दिख रहे थे।
00:46:19:10 उन्होंने वो ये उन्होंने यह देखकर उनकी पहचान की। इस तरीके से कथा के रूप में सीधे सीधे ना कह करके कथा के रूप में उसको कथा का एक अंश बना देते हैं। फॉर एग्जांपल रामायण में भगवान जो हनुमान है हनुमान जी हैं वो सीता माता को देख के उनकी उनके पूरे शारीरिक वर्णन उनका कर रहे हैं। जब वो वर्णन वहां पर किया गया है हमारे शास्त्रों में। वो क्यों कर रहे हैं? क्योंकि उन्हें सीता माता को पहचानना था कि सीता माता को मैं ढूंढने आया हूं। राक्षसियों के बीच में कोई स्त्री बैठी हुई है। यही वो सीता माता है जिनको मैं ढूंढ रहा हूं। इन्हीं को मुझे राम जी द्वारा दी गई जो मुद्रा है वो प्रदान करनी है। तो यह कैसे निश्चित हुआ? तो उसके लिए उन्होंने वहां से जब वह चले थे तो उन्होंने सुना था कि सुंदर है। वह एक राजकुमारी है। तो एक राजकुमारी सुंदर स्त्री का उस स्त्री के शरीर का अंग प्रत्यंग किस प्रकार से हो सकते हैं। सारी वहां पर बहुत ही स्पष्टता के साथ वहां हनुमान जी के मन में चलने वाले विचारों को व्यक्त किया है वाल्मीकि रामायण में। अब यहां पर क्या होता है कि लोग इस परिपेक्ष से ना समझते हुए एक अपने से वह निकाल लेते हैं कि भाई देखो यहां हनुमान जी देखो क्या सोच रहे हैं जबकि
00:47:34:16 वास्तविकता क्या है कि जब भी हम अपने घर की किसी भी स्त्री को ढूंढने जाएंगे अपने घर की जिसको हम जानते हैं और हम जाएंगे कि भाई वो वहां मंदिर में है या हम जाएंगे वो मेले में है कहीं भी जाए ढूंढने जाएंगे या लेने जाएंगे कुछ भी हो उनकी पहचान के लिए जो सबसे पहली पहचान होगी हमारे पास हमारे घर की मातृशक्तियों के लिए। वो पहली पहचान क्या होगी? पहली पहचान होगी कि वह एक स्त्री है। हम एक स्त्री को ढूंढने आए हैं। तो सबकॉन्शियसली हमारे माइंड की जो लेयर्स हैं उसमें कहीं ना कहीं वो निहित होगा जो स्त्री से संबंधित जो उसके शरीर विशेष की पहचान होते हैं वो सब वहां पर उस सबकॉन्शियसली वहां पर हमारे मन के अंदर उस लेयर में व्याप्त है। तभी हम यह निश्चित कर पा रहे हैं ऊपरी तौर पर कि हम एक स्त्री को ढूंढने आए और वह हमारी माताजी बो रही क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे माता जी के शरीर की बनावट कैसी है। मगर इसमें दृष्टिकोण बदल करके लोग जो दुष्प्रचारक होते हैं वो सनातन धर्म ग्रंथों की ऐसी जो बातें लिखी हुई है स्पष्टता के लिए समझने के लिए उन बातों का दुष्प्रचार करते हैं। अब उनसे भी पूछा जाए कि भैया तुम आंख बंद करके जाते हो। कैसे निश्चय करते हो तुम्हारी माताएं? तुम अपनी माता
00:48:49:22 के लिए कैसे निश्चय करते हो वह माता तो निश्चय वो कहेगा मैंने चेहरा देखा है उनको देखा है तो उनको क्या क्या देखा है तो उसमें सब आ जाएगा फिर तो वो सत ही जो हमारे मस्तिष्क की लेयर्स है बुद्धि की जो लेयर्स है उसमें एक लेयर में पीछे वो भी है कि वो एक स्त्री है और स्त्री के शरीर विशेष की ये पहचान होती है वो सारी बातें भी वहां पर हनुमान जी ने सोची अपने मन में परंतु उनका उद्देश्य दूसरा नहीं था परंतु दुष्प्रचार के रूप में वो प्रस्तुत किया जाता है विरोधियों के द्वारा। तो हमें जान इसीलिए कहते हैं ना कि मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले, सारे पुराण पढ़ ले, सारे उपनिषद पढ़ ले, जब तब वृत दान, पुण्य, यज्ञ, तीर्थ यह सब व्यर्थ है। यदि कोई प्रामाणिक आचार्य गुरु नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि यह भी कहा लिखा हुआ है शास्त्रों में कि ये सभी चीजें गुरु के बिना मति भ्रष्ट कर देने वाली है। अब वो गुरु वो पर्सपेक्टिव तो पता नहीं है। हनुमान जी ने ये कैसे सोचा? अरे सीता माता के बारे में कैसे सोचा? भाई तुम भी सोच रहे हो तुम्हारी भी मस्तिष्क की ऐसी एक लेयर है जिसमें शरीर विशेष के बारे में बात हो रही है तुम्हारे अंदर। ठीक है? तो अगर हम हमारे ग्रंथों में इस तरह से भगवान के एक एक अंग को लेकर के बात नहीं की जाएगी
00:50:05:01 तो हम कैसे उनके सगुण साकार की कल्पना कर पाएंगे। फिर कैसे उनकी मूर्ति बनेगी? आप देखिए जो पूरी के शंकराचार्य जी वर्तमान जगतगुरु शंकराचार्य पूरी पीटाधीश्वर जी उनका जो ग्रंथ है भगवत पाद आदि शंकराचार्य उसमें जब वो चैप्टर आता है मंडन मिश्र जी वाला जो ब्रह्मा जी अवतरित हुए हैं मंडन मिश्र के रूप में और उनकी पत्नी के रूप में सरस्वती माता- अवतरित हुई है। तो वहां पर गुरुदेव ने जो उभय भारती उनकी पत्नी के रूप में जो अवतरित हुई है उनका भी विवेचन इसी प्रकार से किया है स्पष्ट। क्यों? हम कैसे कल्पना करेंगे कि भाई वो ऐसी दिखती थी। कैसी दिखाए उन्हें? अगर कल को कहीं मूर्तित्र बनाना है, मूर्ति बनानी है, कुछ करना है या उनका ध्यान ही करना है। तो हम कैसे निश्चित करेंगे कि वो कैसे कैसी दिखती थी? वो वो बहुत ज्यादा पतली दुबली थी या बहुत ज्यादा क्या कहते हैं? हष्टपष्ट थी। कैसी थी? तो इसके लिए इस प्रकार से एक एक चीज पर बात की जाती है भगवान से जुड़ी हुई। तो मुझे लगता है कि आज का काफी हो गया है। 958 हो चुके हैं। तीसरा समास यानी शारदा स्तुति से हम अगला सेशन प्रारंभ करेंगे। अब दो
00:51:20:02 चार दो तीन बातें कर लेते हैं आपस में और फिर हम लोग विराम लेंगे। जी जिनजिन को प्रश्न है ना वो सब अपने हैंड रे कर एक-एक करके हम देख लेंगे किस-किस का हैंड रेज है। [संगीत]
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क्या ज्ञान और भक्ति एक दूसरे के शत्रु हैं? Dasbodh Lecture #2
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