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00:00:05:08 इसमें संदेह नहीं है कि दास बोध मुख्यत अध्यात्म संबंधी ग्रंथ है और इसमें यही प्रतिपादित किया गया है कि मनुष्य को समस्त सांसारिक विषयों का परित्याग करके अपनी दृष्टि और विचारों का इतना अधिक विस्तार करना चाहिए कि अपने समेत सारा संसार ब्रह्ममय दिखाई पड़ने लगे स्वयं अपनी आत्मा में 435 भगवत गीता स्वयं अपनी आत्मा में, लोगों की आत्मा में और विश्व आत्मा में किसी प्रकार का भेद ना रह जाए। आध्यात्मिक विचारों की यही चरम सीमा और यही परम लक्ष्य है। दास बोध का प्रतिपाद्य विषय क्या है? वही है जो शंकर परंपरा के द्वारा आपको अद्वैत का ज्ञान मिलता है। जो परमार्थ है। व्यवहार में तो द्वैत है। परंतु द्वैत व्यवहार में द्वैत पर चलके आपको प्राप्त क्या होने वाला है? परमार्थ में अद्वैत तो छत्रपति शिवाजी के जो गुरु थे समर्थ रामदास भी रामदास जी भी उन्होंने भी अद्वैत

00:01:12:14 का ही प्रतिपादन किया है अपने ग्रंथ दास बोध में यहां ये निश्चित हो गया आध्यात्मिक विचारों की यही चरम सीमा और यही परम लक्ष्य है। इस प्रकार भागवत का भी देखिए भागवत में भी 12व स्कंध में आया है ना कि अह यह स्पष्ट वचन है भागवत में श्रीमद् भागवत में कि इस भागवत का जो प्रतिपाद्य विषय है वो है जीव और ब्रह्म की एकता परमार्थ अच्छा

00:01:48:04 इस प्रकार का भाव स्वयं अपने लिए और समस्त संसार के लिए भी परम कल्याणकारक होता है और इसीलिए अध्यात्म संबंधी अन्य अनेक ग्रंथों की भांति दास दास बोध में भी इसी पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। इस जब मनुष्य यह समझने लगता है कि जैसी मेरी आत्मा है वैसी ही जीव मात्र की आत्मा है और हम सब में वहां एक परमात्मा या विश्व आत्मा निवास करता है। तब यह किसी के साथ राग द्वेष वैमनस्य आदि नहीं रख सकता और ना किसी को कोई हानि ही पहुंचा सकता है। यही कारण है कि इस ग्रंथ में श्री समर्थ ने अनेक स्थानों पर बहुत दृढ़ता पूर्वक यह उपदेश दिया है कि सब लोगों को सुखी प्रसन्न और संतुष्ट रखना चाहिए। हिंदू राष्ट्र का उद्देश्य क्या है? सुसंस्कृत सुरक्षित स्वस्थ संपन्न सेवा परायण व्यक्ति और समाज की संरक्षणा और तदानुसार अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए सबके हित का ध्यान रखते हुए हिंदुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा करना। हिंदू है तभी संसार सुरक्षित है। हिंदू जैसे ही हटेगा

00:03:03:15 वैसे वह स्वयं जो हिंदुओं से लड़ लड़ के अपना जीवन बिता रहे हैं ना फिर वो स्वयं आपस में ही एक दूसरे को नष्ट भ्रष्ट कर डालेंगे। वो थॉमस अलवा एडिसन वाला याद है ना? संसार में यदि कहीं पर भी बल्ब जल रहा है तो उसका कारण क्या है? व्यवहारिक धरातल पर थॉमस अलवा एडिसन। उसी प्रकार से संसार में जहां कहीं भी शांति है जहां कहीं भी धर्म अपने प्रत्यक्ष रूप से स्थापित है या फिर किसी और नाम से वहां पर वही सब चीजें हो रही हैं। उतने अंशों में वहां पर गुप्त या प्रकट रूप से सनातन का ही आलंबन लिया जा रहा है।

00:03:46:12 अपने साथ ही साथ आपने साथ ही साथ यह भी कहा है कि सब प्राणियों और जीवों को सुखी करने से ही परमात्मा प्रसन्न होता है। जन या जनता में ही जनार्दन है और सबको पहले उसी जनता रूपी जनार्दन की पूजा और सेवा करनी चाहिए। लोक कल्याण का कैसा सुंदर आदर्श है? यदि इस आदर्श पर ठीक तरह से लक्ष्य रखा जाए तो फिर संसार में कहीं दुख, कष्ट, संकट, संघर्ष, अनर्थ या पाप आदि के लिए स्थान ही ना रह जाए। इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग के दर्शन होने लगे। अनायास ही सारे संसार में राम राज्य की स्थापना हो जाए। धन्य है वह महापुरुष जो इस आदर्श पर ध्यान रखकर जीवन निर्वाह करते हैं और जो महापुरुष लोगों के सामने इस प्रकार के आदर्श रखते हो उनकी धन्यता का तो कहना ही क्या है

00:04:40:28 तो

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→ Used in: A · Video जब सभी स्वार्थी हैं, तो महापुरुष कैसे? DAASBODH LECTURES at 0:07 ↗

00:04:43:25 देखा जाए जितने भी आपने संभवत आहान जो मुख्य चैनल है आहान का उसका एक संदेश पढ़ा हो पीछे डिस्क्रिप्शन जो पढ़ा हुआ है चैनल का डिस्क्रिप्शन उसको जब आप करके आप जाकर के पढ़ेंगे ना तो उसमें एक बात लिखी हुई है जो मैंने काफी समय पहले लिखी थी 2000 शायद 11 या 12 में लिखी होगी जब मैं अपने सनातन संस्कृति को नष्ट होता हुआ देखता था तो दुख होता था मुझे दिशा नहीं मालूम थी मेरे अंदर था कि मैं रामचंद्र जी के पथ का पथ की स्थापना अपने समाज में कर पाऊं पर मैं दिशाहीन था मुझे गुरु तत्व प्राप्त नहीं था गुरु से अनभिज्ञ था तो उस समय समय जो चिंता मेरी थी उस चिंता को ही मैंने इस पंक्ति में व्यक्त किया था कि भगत सिंह सुखदेव राजगुरु इत्यादि जो क्रांतिकारी हुए ये भी स्वार्थी थे।

00:05:40:14 संसार में जितने भी लोग हैं वह सब स्वार्थी हैं। इस प्रकार से स्वार्थी है कि सबकी सबका जो भी वो कुछ कर रहे हैं कुछ भी कर रहे हैं उसमें उनका ये स्वार्थ निहित है कि भैया मुझे इससे खुशी प्राप्त होती है इसलिए मैं यह कर रहा हूं। मुझे आनंद मिलता है इसलिए मैं ये कर रहा हूं। तो वह जो है वह स्वार्थी है। तो सब लोगों की लड़ाई जो है वह मेरी होती है। मेरी लड़ाई जैसे कि किसी की किसी की लड़ाई कहां तक सीमित है? किसी की लड़ाई केवल उसके अपने शरीर तक सीमित है। कि भाई मुझे मेरे शरीर को कुछ ना हो जाए। किसी की लड़ाई उसके अपने जो परिवार है मेरी माता, मेरी बहन, मेरी पिता, मेरी पत्नी, मेरी बेटी, मेरा बेटा यहां तक सीमित है। या फिर किसी की लड़ाई उसके कुल खानदान तक सीमित है। मेरे चाचा, मेरे ताऊ, मेरे भतीजे, मेरी ब्याह चुकी बहने इस तरीके से और किसी किसी की लड़ाई फिर जो उसका जो कुटुंब का वृक्ष है उसके भी बाहर जहां वो रह रहा है। उसका नगर, गली, मोहल्ला वहां तक सीमित है। फिर किसी की लड़ाई अ नगर, गली, मोहल्ला

00:06:55:18 छोड़कर के उसमें भी सीमित है। प्रदेश में अगर भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी की लड़ाई क्षेत्र क्षेत्रवाद को छोड़कर के फिर वो देशगत आ जाती है तो मेरा देश भारत वहां तक सीमित है और किसी की लड़ाई पूरा संसार है मानवता है प्राणी मात्र है वहां तक सीमित है तो सबकी लड़ाई के पीछे एक वर्ड तो है चाहे वो सन्यासी हो चाहे गृहस्थ हो चाहे वो बिल्कुल कोई अ क्या कहूं दुर्व्यसनी स्मैक का सेवन करने वाला क्यों ना हो। सबकी लड़ाई के पीछे, सबके संघर्ष के पीछे शब्द एक ही है। मैं सबके पीछे एक ही शब्द है। मैं बस देखना यह है कि आपका ये मैं कितना बड़ा है। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि का मैं आपसे बड़ा था। तो वह आज कहीं ना कहीं स्वतंत्रता संग्राम इत्यादि के अगर उसमें देखा जाए तो वह आदर्श माने जाते हैं और उनका मैं देशगत था और शंकराचार्य रामानुजाचार्य इनका मैं पूरे मानवता के लिए था। संसार

00:08:10:24 के लिए था। श्री रामचंद्र जी का जो मैं था पूरे संसार के लिए था। प्राणी मात्र के लिए था। तो आपका यह मैं कितना बड़ा है यह देखने वाली बात होती है। तो हमें देखने में ऐसा लगता है जो वास्तविकता में देखा जाए तो जो मोक्ष प्राप्ति के लिए कार्य कर रहा है जो धर्म की रक्षा करने के लिए कार्य कर रहा है या जो सन्यासी हो गया हमारे मन में उनके प्रति आती है एक भावना कि भैया ये भी अपने सुख के लिए ही तो कर रहे हैं। बस इनका सुख जो है इसमें ना निहित हो के जिन चीजों में जिन निकृष्ट चीजों में हमारा सुख है उसमें ना निहित हो कर के इनका जो सुख है इन विभूतियों का सुख जो है वो सन्यास में है धर्म रक्षा में है या देश की रक्षा में है मानवता की रक्षा में है इत्यादि इत्यादि में है या इनका सुख जो है ईश्वर प्राप्ति में है भगवान की भक्ति में इनका सुख है तो फिर जब दोनों का ही मूल उद्देश्य सुख है तो वो धन्य क्यों और हम जो है निकृष्ट क्यों ये एक विचार आता है वो महापुरुष क्यों और हम सामान्य पुरुष क्यों इसलिए क्योंकि उनका सुख जिसमें निहित है उसमें सुख देख पाना

00:09:26:02 उसमें सुख की दृष्टि रख पाना अत्यंत कठिन होता है वो भावना व्याप्त जिसने कर ली वो महापुरुष है जो यह सामाजिक प्रपंच रूपी संसार से अलग होकर के अपने सुख को किसी और में देख पाए किसी और में चिंतन कर पाए। इसलिए शास्त्रों में ऐसी बात भी कही गई है और एक मैंने पता नहीं अभी कहां एक दो दिन पहले ही किसी शायद किसी आचार्य जी की वाणी सुनी थी मैंने उन्होंने कहा था और शास्त्रों में स्कंद पुराण में आया है कि यदि आप हर क्षण यदि आपकी जो जैसे होता है गोसिप कहते हैं जिसे आप अपने मित्रों के साथ बैठकर के गप्पे मार रहे हैं या इधरउधर की बातें कर रहे हैं। मगर वो इधर उधर की बातें किस बारे में है? रामायण के बारे में, भगवत गीता के बारे में। आपकी जो चर्चा का विषय है वो क्या है? चाय पीते समय कई लोग चाय पीते होंगे। यद्यपि निषेध है चाय का। मगर एक हमारे जो आज का जो सामान्य जनजीवन है उसमें चाय पीना या आजकल की भाषा में कहे तो स्नैक्स खा रहे हैं पी रहे हैं या जो भी है एक सामान्य समय है मगर वहां पर भी अगर बातें कर रहे हैं तो धर्म का निर्धारण हो रहा है कि भाई ये धर्म कैसे ब्रह्म ये कैसे अद्वैत

00:10:41:13 कैसे द्वैत कैसे भगवान श्री कृष्ण चंद्र की बातें चल रही है राम श्री रामचंद्र जी की लीलाओं की बातें चल रही है तो स्कंद पुराण मेंशन है यदि आपकी चर्चाओं का विषय भगवान है धर्म है तो आप कल्याणकारी पथ पर चल रहे हो और इसी बात को किनहीं महापुरुष की भी मैंने बात सुनी थी जिन्होंने कहा था कि यदि आप एकांत में बैठकर के भी श्री रामचंद्र इत्यादि का चिंतन कर रहे हो जहां पर आपको कोई व्यवस्था नहीं है उस समय उन्हीं का चिंतन करने की यदि आप कर रहे हो तो आप कल्याणकारी पथ पर हो और जब आप ऐसे कल्याणकारी पथ पे हैं तो आप उन लोगों की दृष्टि से महापुरुष हो जाते हैं, धन्य हो जाते हैं। क्योंकि आप का बिना किसी व्यवस्था के चिंतन में आज राम है। आपके बिना किसी व्यवस्था के चिंतन में आज कृष्ण है। धर्म है। रामो विग्रहवान धर्म। चलो मान लिया कि आपका क्या कहते हैं? विषय यह है कि हमको जो है धर्म का नाश करने वाले इत्यादि जो सनातना भाष है स्पॉन है आर्य समाज है या ये ब्रह्मा कुमारीज है इनको उत्तर देना है आपके अंदर वो एक जुनून है कि भाई इन्होंने ऐसी गलत बात क्यों कर दी है

00:11:56:19 जिसकी वजह से हमारे सनातन समाज को हानि हो रही है मानवता को हानि हो रही है यह बातें ये क्यों निर्गत कर रहे हैं और उसको लेकर के आपको जवाब देना वही जवाब देने का चिंतन यद्यपि ऐसा आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति जवाब जवाब दे। मगर यदि उसको लेकर के भी चिंतन चल रहा है। आपको दिन और रात वही दिख रहा है कि मुझे जो है धर्म स्थापना के लिए जो है इसका उत्तर निकालना है। कम से कम मैं समाज को ना दे पाऊं तो अपने घर के लोगों को तो बता पाऊं। ये भ्रांति है। स्त्रियों को यज्ञ पवीत नहीं कराना चाहिए क्योंकि स्त्रियों का जो संरचना है वो अमुक रूप से है। उनके लिए अमुक धर्म है और पुरुषों के लिए अमुक धर्म है। तो कितने विधिवत तरीके से सिस्टमेटिकली मैं यह बात इस बात की सिद्धांत की स्थापना कर पाऊं। इस बारे में आपका चिंतन चल रहा है। तो आप उन करोड़ों लोगों से कितने अलग हैं। कितने धन्य हैं आप। इतने स्तर पर भी कितने धन्य है आप जिनके मन में यह चिंतन चल रहा है कि Netflix पर कौन सी मूवी आई है या आज मॉल में कौन सी मूवी चल रही है या और बहुत सारे प्रपंच मैकडोनाल्ड्स पिज़्ज़ा या जो भी जिसमें भी आज सामान्य जन जीवन की आसक्ति है तो ये सोचने वाली बात है कि एन केन प्रकारन आपके मन में चिंतन किसका चल रहा है तो उन्हीं को धन्य कहा जाता

00:13:11:20 है जो इस प्रपंच रूपी संसार में जिनकी आसक्ति कम होती चली जाती है या रही नहीं जाती उनहीं को धन्य कहा जाता है। वही महापुरुष हो सकते हैं। तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु इनको धन्य क्यों कहा गया? क्योंकि इनकी आसक्ति किस में हो गई? इनकी आसक्ति हो गई स्वतंत्रता संग्राम में। जिनको मरने से भय ना लगा। हम इनकी आसक्ति हो गई ना उसमें। तो जो हम जैसे निकृष्ट लोग जो अपनी आसक्ति को हटा नहीं पाते हैं प्रपंच रूपी संसार से वह सामान्य रह जाते हैं और जो हटा करके और जिनका मैं बड़ा हो जाता है और मैं बड़े होने के रूप में परिणाम स्वरूप जिनका लक्ष्य बड़ा हो जाता है जिनके चिंतन का विषय वृहद होता चला जाता

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00:13:55:25 है वो महापुरुष और वो धन्य कहलाते हैं। है ना? तो ऐसे ही थे हमारे श्री समर्थ राम दास जी। परंतु यह आध्यात्मिक आदर्श बहुत ऊंचा है और सब लोग इस आदर्श तक तो ना पहुंच ही सकते हैं और ना इसके अनुसार काम ही कर सकते हैं और जो थोड़े से लोग ऐसे आदर्श तक पहुंच सकते हैं या इनके अनुसार काम कर सकते हैं उनके लिए भी एक और बात की जरूरत होती है और वह है भक्ति। भारतीय विचारशीलों ने बहुत कुछ सोच विचार कर अंत में यही निश्चित किया है कि मनुष्य को सत्य के मार्ग पर लगाए रखने के लिए सदा आस्तिक और सतचरित्र रखने के लिए यदि सबसे अधिक किसी चीज को सहायता किसी चीज से सहायता मिल सकती है तो वह भक्ति से ही मिल सकती है। यही बात अभी कुछ दिनों पहले मैंने अपने एक वीडियो में भी कही एक लाइव स्ट्रीम हो रही थी और उसमें कोई इस्लाम को मानने वाला व्यक्ति जो है हमारे धर्म के बारे में बहुत ही आपत्तिजनक कुछ वक्तव्य वहां पर कमेंट्स में लिख रहा था। मैं सदैव यही कहता हूं कि अपने जीवन की सभी विपरीत परिस्थितियों से गुरुदेव भी यही बताते हैं कि आपको आपके जीवन की सभी विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने में

00:15:11:18 सबसे अधिक जो लाभप्रद है वो है भक्ति। भक्ति का बल बढ़ाइए और जीवन में सरलता पाइए। विषम से विषम परिस्थितियों में भी आप चट्टान की तरह सीना तान कर खड़े रह सकते हैं। तो वह भक्ति के कारण इसलिए भक्ति का बल बढ़ाएं। तो वही समर्थ रामदास जी भी कह रहे हैं। सच चरित्र रखने के लिए मैंने इस बारे में बहुत से उदाहरण दिए हैं कि किस तरीके से आपके जीवन में भक्ति के कारण जो बल आता है उसके कारण आप ये निर्णय कर पाते हैं। जैसे मान लीजिए मैं एक छोटा सा उदाहरण दे दूं। मैंने किसी को कहा कि मैं आपको जो है अमुक

00:15:50:21 दिनांक को मैं जो है आपसे मैंने धन लिया है। मैं आपको यह धन आपको वापस कर दूंगा या फिर वापस कर दूंगा। छोड़ दीजिए। मैंने किसी को कहा कि दान स्वरूप भेंट स्वरूप मैं आपको जो है धन यह दे दूंगा। इतना धन मेरे पास मैं इतनी दिनांक को आपको दे दूंगा। या फिर कोई मेरे अनुगत कार्य कर रहा है और उसका वेतन मान है मुझे उसको देना है। मगर कई बार होता क्या है कि जब वो राशि वो धन मेरे हाथ में आ गया जिस समय उस समय मेरे अंदर लालच आ जाता है। अरे आज नहीं किसी और दिन दे देंगे। जैसे वेतन किसी को देना है और मैं आज ना देकर के चार दिन के बाद दूं हो सकता है कि आज उसको कोई औषधि लेनी हो अपने घर में किसी के लिए कोई रोगी हो उसके यहां वो उस चिंता में बैठा हो और मेरे मन में लालच आ गया कि कुछ दिन और इस पैसे को देख लूं अपने पास ₹100 उसको देने हैं कुछ दिन और बाद दे दूं ऐसा लालच आ गया या फिर मैंने किसी को दान स्वरूप भेंट स्वरूप दे देने को कहा था कि ठीक है मैं तुम्हें इतनी मदद कर दूंगा परंतु जिस समय मेरे पास धन आ गया तो मैंने सोचा कि अरे क्या फायदा या मैंने कुछ और बहाने ढूंढे उसको ना देने के या फिर मैंने किसी से

00:17:05:25 लिया है और मेरे पास आ गया या फिर मुझे उसके लिए प्रयत्न करना है कोई कठिन कार्य करना है तो मेरे पास जब वो आ गया या कठिन कार्य के लिए तो मैं सोचूं कि क्या करना है उसके पास जाना है ये अभी-अभी मेरे पास हरी-हरी गड्डी है वो गायब हो जाएगी आता है निश्चित रूप से आता है विचार आपके पास हरी-हरी गड्डी यह आएगा जब वो गड्डी जा रही होगी ना तो हृदय में उसकी अभाव की अनुभूति होगी। उस अनुभूति से लड़ने के लिए उस विचार को परास्त करने के लिए आपके पास एक भावना होनी चाहिए और वही भावना है हमारे साथ श्री रघुनाथ तो किस बात की चिंता हमें जब ये विचार आते हैं निर्णय लेने की गड्डी कम करनी है कि नहीं करनी है यह धन इतना मोटा अमाउंट जाना है कि नहीं जाना है उस समय जब व्यक्ति विचार करता है नहीं रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन ना जाई तो व्यक्ति वहां पर धर्मज्ञ हो पाता है। क्यों हो पाता है? क्योंकि उसको मालूम है कि दुनिया इधर से उधर हो सकती है। मगर मेरे पीछे खड़े कौन है? राम। और ये राम के पीछे खड़े होने की भावना आपको आती है भक्ति से। यह जो भावना है मेरे पीछे खड़े हैं राम। यह भावना आपको भक्ति

00:18:20:26 से मिलती है। इसीलिए कहा जाता है कि भक्ति का बल एकत्र करिए। तभी आप अपने धर्म पर अ होकर के खड़े रह सकते हैं। आज हमने देखिए बहुत क्या कहते हैं? हमें ऐसे बहुत से वीडियोस प्राप्त हुए हैं अलंकार समाजियों के जिसमें कि वह गाली बक रहे हैं सीधेसीधे और गाली बक रहे हैं और बहुत गंदी गंदी अश्लील बातें वहां पर कर रहे हैं। हो सकता है कि जो सामने उनके प्रतिद्वंदी है उनका वो और भी ज्यादा निकृष्ट व्यक्ति हो। मगर गाली बकना मर्यादा नहीं है। यदि रावण ने मंदो सीता माता का हरण किया है तो श्री रामचंद्र जी ने मंदोदरी का हरण करने की मर्यादा को स्थापित नहीं किया है। आप गाली नहीं बख सकते। महाभारत के एक श्लोक का उदाहरण ले ले के क्योंकि कहीं भी किसी भी अंश में गाली को स्वीकृत नहीं किया गया। हर जगह गाली को निषेध किया गया है। तो ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी आप अपने धर्म पर कैसे टिके रह सकते हैं? विपरीत परिस्थितियों में जब आपके अंदर भक्ति का बल होगा तब आप अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दे कर देने पर भी धर्म की रक्षा के लिए धर्म के निर्वाह के लिए खड़े हो पाएंगे। तो इसीलिए कहा जाता है कि आपको

00:19:35:27 कोई सत चरित्र रखने के लिए सबसे सरल साधन है अच्छा चरित्र रखने के लिए तो वो है भक्ति। क्यों नहीं रह पाते ये अलंकार वाले? क्योंकि इनके पास भक्ति नहीं है। क्यों नहीं रह पाते ये इस्लाम को मानने वाले? क्योंकि इनके पास भक्ति नहीं। भक्ति है ही नहीं। तो जब भक्ति ही नहीं होगी तो आपके अंदर अपने धर्म के प्रति निष्ठा कहां से आएगी? और फिर वह सर्वशक्तिमान ईश्वर की जो आवश्यकता है वह क्यों है? जब तक ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं होगा, मोक्ष परम स्वतंत्र नहीं होगा तो आपका धर्म शाश्वत नहीं होगा। यह सब क्रम है। जब तक ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं होगा, उसके साथ एकत्व के रूप में प्राप्त होने वाला मोक्ष परम स्वतंत्र नहीं होगा तो आपका धर्म शाश्वत कहां से होगा? बदलेगा। अरे कर लेता हूं। अरे उसको चार दिन बाद दे दूंगा यार। 10 दिन और इस गड्डी के दर्शन कर लो। यह विचार आते हैं तो जो व्यक्ति अपने धर्म से चूकता है ना उसके पास भक्ति का बल नहीं है। यह मानना चाहिए तो फिर वो कालिया जिन अथवा परी की साधना में व्यस्त है। ऐसा फिर मान लेना चाहिए।

00:20:48:12 अच्छा। भक्ति ही मनुष्य में सबसे अधिक गुणों की स्थापना कर सकती है और संसार को अनेक प्रकार के अनर्थों से बता बचा सकती है। श्री समर्थ की सूक्ष्म दृष्टि से भला इतनी बड़ी बात कैसे छूट सकती थी। इसलिए उन्होंने धर्म मार्ग में भक्ति को बहुत बड़ा स्थान दिया है। उन्होंने जनसाधारण के लिए तो भक्ति की व्यवस्था दी ही है। पर साथ ही ऐसे लोगों के लिए भी भक्ति की आवश्यकता बतलाई है। जो संसार से सब प्रकार से विरक्त होकर उनके उच्च आदर्श तक पहुंच गए हो। उनकी आज्ञा है कि जो लोग परमात्मा तक पहुंच गए हो उन्हें उन्हें भी भक्ति यानी तत्वदर्शी संत सन्यासी विरक्त संत उन्हें भी भक्ति मार्ग का कभी त्याग नहीं करना चाहिए बल्कि सदा उस पर आरूढ़ रहना चाहिए। मनुष्य मात्र को सनमार्ग में लगाए रखने वाले इस दूसरे साधन का भी श्री समर्थ ने जो विवेचन और प्रतिपादन किया है वह भी उनकी लोक कल्याणकारिणी बुद्धि का एक अच्छा नमूना है। संसार के सभी लोग विरक्त त्यागी और वीतराग नहीं हो सकते। अधिकांश लोगों को संसार में रहकर गृहस्थ घर गृहस्ती के कामों में ही जीवन बिताना पड़ेगा। ऐसे अधिक से अधिक साधन करें।

00:22:04:00 ऐसे लोगों के लिए श्री समर्थ का आदेश है कि वह गृहस्थ आश्रम में रहकर ही परमार्थ का अधिक से अधिक साधन करें। उन्होंने इस गृहस्थ आश्रम का बहुत अधिक महत्व बतलाया है। इन लोक तथा परलोक के साधन का मुख्य आधार है। इससे सिद्ध है कि श्री समर्थ कभी यह नहीं चाहते थे कि सभी लोग घर बार छोड़कर सिर मुड़ा ले। क्योंकि ना तो सब लोग साधुओं का सा आचरण ही कर सकते हैं ना सब लोगों के त्यागी होने से संसार का काम ही चल सकता है। जो बने हुए साधु और महात्मा लोगों को चारों ओर ठगते फिरते हैं। उनसे भी श्री समर्थ ने सबको बहुत सचेत किया है। उन्होंने ऐसे पाखंडियों के बहुत से लक्षण बतलाए हैं और सबको ऐसे पाखंड तथा पाखंडियों से बचने के उपदेश दिए हैं। दिया है। एक सच्चा साधु और महात्मा इसके सिवा और कर ही क्या सकता है। एक सच्चे हिंदू के समान श्री समर्थ ने वर्णाश्रम धर्म पर अपनी पूरी आस्था प्रकट की है। क्या बात है? अब तो मुझे बहुत ज्यादा प्रेम हो रहा है धीरे-धीरे इनके चरित्र को जैसे जैसे जान रहा हूं। यदि सच पूछिए तो इस संबंध में

00:23:19:08 अच्छा गुरुदेव ऐसे ही नहीं कहते हैं कि वो पढ़ो, दास बोध पढ़ो। इसलिए कहते हैं इनमें और शंकराचार्य में क्या अंतर है बताइए? पर फिर भी वह वर्णाश्रम संस्था के अंधभक्त भी नहीं है। यानी वर्णाश्रम के नाम पर जो क्या कहते हैं? घृणा मूलक वर्ण वो जातिवाद की जो प्रचार इत्यादि कर दिया जाता है जिसके कारण जो व्यवस्था मूलक शास्त्र मूलक जातिवाद है उसकी लोग अवमानना करने लगते हैं तो इन्होंने वहां पर उस पर चोट की है ऐसी चीजों पर उन्होंने ब्राह्मणों को सबसे अधिक पूज्य अवश्य कहा है पर साथ ही साथ यह भी कहा है कि भगवान जातपात कुछ भी नहीं देखते बिल्कुल सही बात है हम भी यही कहते हैं कि जातपात का अर्थ व्यवहार में भगवान यानी परमार्थ में नहीं है।

00:24:14:28 वह केवल भाव के भूखे हैं। और यह दोनों बातें एक ही साथ एक सांस में कही गई है। इस प्रकार आपने मनुष्य मात्र के साम्य की भी स्थापना की है। वस्तुतः जो मनुष्य दूसरे मनुष्यों को अपने से छोटा, नीच, तुच्छ या हीन समझता हो। वह स्वयं कभी अब यह छोटा नीच तुच्छ या हीन यह सब बातों इन सब शब्दों का पर्यावरण किस में घृणा में अगर व्यवस्था में देखा जाए तो भाई क्या मुझे अपने से छोटे भाई को अपने से छोटा नहीं मानना चाहिए क्या यह समझना चाहिए कि उसका और मेरा जन्म दिनांक एक ही है तो इसका पर्यावसान कहां है घृणा मूलक नहीं होना चाहिए व्यवस्था मूलक होना चाहिए कि कोई अगर मुझसे पूछे कि आपका छोटा छोटा भाई आपसे कितना छोटा है तो मैं बताऊंगा कि भैया चार साल छोटा है कि पांच साल छोटा है कि छ साल छोटा है हम

00:25:10:26 अन्यथा जब सब कुछ देश काल परिस्थिति का भेद ही नहीं रखा जाएगा तो तो सबको मोक्ष ही प्राप्त हो गया फिर तो संसार है ही नहीं भेद है ही नहीं सब हां तो वस्तुत जो मनुष्य दूसरे मनुष्यों को अपने से छोटा नीच या हीन समझता हो वह स्वयं कभी मनुष्य हो ही नहीं सकता। गौरव अपने आपको दूसरे से बड़ा समझने में नहीं है बल्कि अपने आप को सबसे छोटा समझने और भूले हुए लोगों का हाथ पकड़ कर और उन्हें गले लगाकर ठीक मार्ग पर लाने में ही मनुष्य की महत्ता है। जनता को लोक कल्याण का यह प्रशस्त मार्ग दिखलाने में भी समर्थ नहीं चुके हैं। अभी मैं बहुत जल्द एक वीडियो लाने वाला हूं जो छूत अछूत की जो बात है। कहां पर लागू है और उसका कितना दुष्प्रचार किया जाता है। कितने अंशों में छूत अछूत और यह जो स्पष्टता स्पष्टता की बात है शास्त्रों से जो है वो कितने अंश में है? क्या एक तरफ से प्रत्येक शूद्र मात्र के लिए जो स्पष्टता का व्यवहार निषेध किया गया है। क्या है? तो इस पर मैं एक बहुत एक वृहद विषय एक वीडियो लाने वाला हूं।

00:26:26:12 तो ऐसा नहीं है कि सबको एक तरफ से शूद्र मात्र को जो है छुआछूत निषेध कर दिया है। शूद्र वर्ण में आने वाले अमुक कार्य को करने वाले जो संलग्न है अभी भी उसमें अस्पष्टता दी गई है और उसमें अस्पष्टता पतित ब्राह्मणों की भी दी गई है जो अपने धर्म से चूक चुके हैं या फिर उन लोगों की भी दी गई जो है तो उच्च कुल में मगर उन्होंने निषेध भक्षण कर रखा है उनके साथ भी अस्पष्टता का दिया गया है प्रावधान तो इस पर एक हम बहुत जागरूकता वाला वीडियो लाने वाले हैं। अच्छा

00:27:04:00 अब जैसे आदित्य वाहिनी है, हिंदू राष्ट्र अभियान है। इन सब में क्या ऐसा कहा गया कि आपको शूद्रों को अपनी सेना में भर्ती नहीं करना है? नहीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी का स्वागत है। सभी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर के धर्म की रक्षा के लिए खड़े होना है हमें। तो वो स्पष्टता, अस्पष्टता की बात कहां पर लागू होती है? और जो ये विरोधी लोग हैं सनातन विरोधी इन्होंने किस तरीके से इन शब्दों को बुनाया है इस पर एक वृहद वीडियो लाने वाले हैं। संसार में रहने वालों के लिए लोकमत का आदर करना बहुत ही आवश्यक होता है। देखिए लोकमत की बात भी है। इसमें मैं क्या कहूं बिल्कुल ऐसा लग रहा है कि गुरुदेव ही है। ग्रंथ में गुरुदेव ही है। लोकमत का आदर करना भी बहुत आवश्यक होता है। जो लोकमत को तुच्छ समझता है और उसकी उपेक्षा की दृष्टि से देखता है। वह बहुदा उदंड और स्वेच्छाकारी हो जाता है। श्री रामचंद्र ने क्या कहा था? सीता माता के परित्याग के समय वो जानते हैं कि सीता माता निर्दोष है। परंतु लोकमत की रक्षा करने के लिए ऐसी प्रजा की रक्षा करने के लिए ऐसे ऐसी प्रजा के कष्ट को हरने के लिए जो अपने स्वधर्म निष्ठ है। जो अपने स्वधर्म का पालन करती है। पूरी तन्मयता के साथ उसके कष्ट को हरने

00:28:19:03 के लिए अपनी निर्दोष पत्नी को भी जो है कष्ट दिया और निर्दोष पत्नी को कष्ट देने के रूप में स्वयं भी कष्ट को प्राप्त किया। ऐसा तो नहीं है उन्होंने दूसरे दिन विवाह कर लिया हो। कर सकते थे मगर नहीं किया। उन्होंने अपने को भी उस विरह की अग्नि में जलाया जिस कष्ट की अग्नि में सीता माता जली। परंतु उन्होंने अपनी प्रजा को कष्ट नहीं दिया। तो अपनी पत्नी से दूर रहने की स्थिति में भी एक पत्नी व्रत धारण पूर्वक कैसे अपनी पत्नी को समर्पित जीवन जीना चाहिए यह भी हमें श्री रामचंद्र जी से सीखने को मिलता है। इसीलिए चाहे दुनिया में दुनिया इधर से उधर हो जाए पर एक मुसलमान स्त्री भी अपने मन में ये कामना करती है कि मुझे पति मिले तो राम जैसा मिले। मुझे पति ये इन जैसा ना मिले। खुदा के संदेश वाहक जैसा इतना तो करती है ना नहीं तो वह तो फिर कहेगा उन्होंने तो कह दिया है उनकी ओर से कि संसार की प्रत्येक स्त्री मेरे लिए वो है हलाल

00:29:35:03 वैध है तो उनका तो कहना ही क्या है खैर तो यही विचार यहां भी प्रकट हो रहे हैं जो रामायण में श्री रामचंद्र जी ने कहा है और समाज पर अनेक प्रकार के अत्याचार करने लगता है। यदि यह सब बातें ना हो तो भी उसके द्वारा समाज का कुछ ना कुछ अपकार अवश्य होता है। अतः समर्थ की यह भी आज्ञा है कि लोकमत के विरुद्ध कभी कोई कार्य नहीं करना चाहिए। सामंजस्य बैठाकर चलना चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि लोक मत के विरुद्ध आचरण करने करना ही सबसे बड़ा पाखंड है और पाखंड सदा अवस्थाओं अवस्थाओं में त्याज्य है। मतलब यह है कि श्री समर्थ ने आचार और विचार दोनों की ही शुद्धता पर बहुत जोर दिया है। मनुष्य को जन्म से मरण पर्यंत अपना आचार और विचार दोनों को कैसे रखना चाहिए यही इस दास बोध में बतलाया गया है और बहुत ही विषद रूप से बतलाया गया है। ज्ञान की सबसे अधिक सीमा अधिक महिमा बतलाई गई है क्योंकि आचार और विचार दोनों की ही शुद्धि उसी से होती है और इस ज्ञान की प्राप्ति का उपाय उन्होंने सद्गुरु की प्राप्ति और सेवा बतलाया है। बात भी बहुत ठीक है। लोग अनेक प्रकार के ज्ञान

00:30:50:12 प्राप्त करते हैं। पर समर्थ उन ज्ञानों को ज्ञान नहीं मानते। और यदा यदि विचार पूर्वक देखा जाए तो वह ज्ञान है ही किस काम का जिससे इहोक और परलोक दोनों ना सुधरे। इसी बात को संशय आत्मा विनश्यति भगवत गीता चार चार 40 संशय ज्ञान के अभाव में क्या होता है जहां ज्ञान नहीं है वहां क्या है अंधकार अज्ञान संशय और संशय आत्मा विनश्यति जिसके मन में संशय है वह ना तो इस लोक में सुखी रह सकता है परलोक की तो बात ही क्या प्राय कहा जाता है कि आधुनिक पाश्चात्य जातियों ने ज्ञान का भंडार बहुत अधिक बढ़ाया है। उसकी अनेक प्रकार से वृद्धि की है। पर उस ज्ञान का उपयोग कैसे कामों में होता है? एक दूसरे को काटने, मारने, लूटने और दबाने में ही ना विकास विमर्श गुरुदेव का अद्भुत ग्रंथ है। विकास के नाम पर आपने टेक्नोलॉजी तो ले ज्ञान से मगर उसका पर्यावसान किस में हो रहा है? ना मिट्टी सुलभ है, ना पानी सुलभ है, ना हवा सुलभ है, ना हंसी सुलभ है। क्या सुलभ है? स्मार्ट सिटी के नाम पर बताइए

00:32:03:06 उसी प्रकार तो वह ज्ञान किसी कार्य का नहीं है तो फिर ऐसे ज्ञान में मानव जाति का उपकार हुआ या उपकार यदि उपकार हुआ तो ऐसे ज्ञान की आवश्यकता ही क्या है ऐसे ज्ञान से तो ना होना कहीं अच्छा है फिर कुछ ज्ञान ऐसा भी होता है जो लोकोपकार के लिए उपयोगी हो सकता है लोग इस प्रकार का ज्ञान साधारण शिक्षकों और पुस्तकों आदि से प्राप्त कर लेते हैं। पर फिर भी उसका ठीक-ठीक उपयोग करना नहीं जानते। इसलिए श्री समर्थ ने कहा है कि सच्चा और वास्तविक ज्ञान वही है जो इहलोक और परलोक के साधन में पूर्ण रूप से सहायक हो। इसके सिवा जितना ज्ञान है वह सब अज्ञान की कोटि में रखने के लायक है। और फिर ऐसे ज्ञान का वास्तविक उपयोग तभी हो सकता है जब वह सद्गुरु से प्राप्त किया जाए। अब चाहे प्राचीनों की दृष्टि से देखिए चाहे अर्वाचीनों की दृष्टि से चाहे पौवाकात की दृष्टि से देखिए और चाहे पाश्चात्यों की दृष्टि से सद्गुरु की आवश्यकता हर प्रकार से सिद्ध होती है। और समर्थ की आज्ञा है कि ऐसा ही सद्गुरु ढूंढना चाहिए। उसकी शरण में जाना चाहिए। उससे ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। अपने

00:33:18:09 दैनिक जीवन व्यवहारों में उस ज्ञान का उपयोग करना चाहिए। और संसार के सब लोगों में उस ज्ञान का प्रचार करना चाहिए। साधारणत धार्मिक आचार्य और समाज सुधारक राजनीति के अनभिज्ञ हुआ करते हैं। अथवा कम से कम राजनीति के साथ कोई संपर्क नहीं रखते। पर श्री समर्थ में यह बात नहीं थी। वे राजनीति के बहुत बड़े ज्ञाता थे और लोगों को समय-समय पर राजनीति के गढ़ तत्वों का उपदेश देते रहते थे। इस दास मोद में भी दो तीन समासों में राजनीति संबंधी अनेक ऐसी बातें बतलाई गई हैं जो सभी कालों, सभी देशों और सभी जातियों के लिए समान रूप से उपयोगी रही हैं। भविष्य में भी रहेंगी। श्री समर्थ को राजनीतिक विषय को हाथ में लेने की आवश्यकता कदाचित देश की उस समय की दुराव दुर्वस्था के कारण पड़ी पड़ी थी। उन्होंने धर्म प्रचार और लोक कल्याण का कार्य आरंभ करने से पहले सारे भारत में भ्रमण किया था। उसका कोना कोना छान डाला था। अतः सारे देश और समाज की हीन अवस्था उनके लिए करतलगत हो रही थी। ऐसी अवस्था में यदि यह राजनीति की ओर ध्यान ना देते तो उनका उद्देश्य

00:34:33:20 कभी पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हो सकता था। संयोग से उन्हें छत्रपति महाराज शिवाजी के समान योग्य शिष्य और कार्यकर्ता भी मिल गए थे। अतः उन्हें राजनैतिक तत्वों पर और भी गढ़ विचार करने का बहुत अच्छा अवसर मिला। बल्कि हम कह सकते हैं कि उन्होंने इस बात की बहुत बड़ी आवश्यकता उन्हें इस बात की बहुत बड़ी आवश्यकता आ पड़ी थी। यदि इन सब बातों का विचार करते हुए हम श्री समर्थ की राजनीति में भी अन्य विषयों की ही भांति परम दक्ष तथा निपुण पाते हैं। श्री समर्थ को राजनीति में भी अन्य विषयों की भांति परम दक्ष तथा निपुण पाते हैं। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तात्पर्य

00:35:16:04 यह है कि चाहे जिस दृष्टि से देखिए समर्थ छोटे बड़े सभी विषयों के उभट विद्वान और परम ज्ञाता थे। वे सभी विद विद्याओं और कलाओं के पूर्ण थे। कलाओं से परिपूर्ण थे। और संसार के इस प्रकार के पूर्ण पुरुष देवता और अवतार माने जाते हैं। ऐसे ही महापुरुषों के उपदेश और शिक्षाएं छोटे बड़े शिक्षित अशिक्षित स्त्री पुरुष और बाल वृद्ध सबके काम की होती है। श्री समर्थ के इन उपदेशों और शिक्षाओं आदि का महत्व इसलिए और भी अधिक हो जाता है कि वह बहुत ही तौली हुई और विचार पूर्ण और उनमें की अधिकांश बातें स्वयं श्री समर्थ की अनुभव की हुई होती हैं। गुरुदेव ने कई अपने प्रवचनों में और वक्तव्यों में बताया है कि एक आदर्श जो आचार्य गण होते हैं या मुख्य रूप से अगर शंकराचार्य की बात करें तो उनका मुख्य कार्य क्या है? आचार्य के रूप में उनका मुख्य कार्य होता है कि जो काल क्रम से विलुप्त ज्ञान विज्ञान है उसको जो है अपने तपोबल के द्वारा पुन उद्भाषित करना और

00:36:32:12 अ एक उनकी भाषा में तो मुझे नहीं याद है मगर एक उनका आता है कार्य जो उन्होंने बताया है कि सिस्टमेटिकली उसको कहते हैं वो सूत्र सूत्र शैली में देना तो काल क्रम से विलुप्त है उसको पुन्हा परिभाषित करना और जो है उसको जो है सूत्र शैली में देना। एक कार्य और है जो मुझे अभी विस्मरण हो गया है पर बहुत ही सूत्रात्मक है तो कुछ वही भाव यहां पर भी आ रहा है श्री समर्थ रामदास जी कि तौली हुई चीजें जैसे उन्होंने सूत्रात्मक शैली में जैसे गुरुदेव भगवान ने कितने सरलता से सूत्रात्मक शैली में बता दिया कि जीव की चाह का जो वास्तविक विषय है उसी का नाम सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है। उसी का नाम भगवान ये सूत्रात्मक शैली कहते हैं। सिद्धांत समझ में आ गया। बहुत लंबी चौड़ी बातें नहीं करनी पड़ी। मेरे जानकारी में एक व्यक्ति थे जो इस के बहुत प्रबल प्रचारक थे और वह मेरे को सदैव पेन कॉपी लेकर के कृष्ण का एक्सपेंशन ये है कृष्ण का एक्सपेंशन वो है यह सब बातें बताने का प्रयास करते थे। एक बार उन्होंने मुझसे मेरी क्योंकि मैं गुरुदेव को गुरुदेव का अनुसरण कर रहा था उन दिनों और उनको सुनता था। उनके उनकी चीजें पढ़ता था। उनकी

00:37:47:18 बताई हुई चीजों को करने की कोशिश करता था। तो उन्होंने एक दिन मेरी योग्यता का आकलन करने के लिए मुझसे पूछ लिया कि बताओ अच्छा तुम धर्म क्या है? एक इस वाले व्यक्ति ने एक शंकराचार्य के अभी-अभी बने अल्पज्ञ शिष्य से है ना अभी तो मुझको तब भी काफी समय हो गया छ सात वर्ष होने जा रहे हैं। मगर उस समय जब मैं नवीन था उस रास्ते में और अल्पज्ञ था। बहुत कम सुन पाया था गुरुदेव उस समय एक वरिष्ठ सीनियर व्यक्ति इसका पूछ रहा है। उस समय मुझे यह भी यह दिशा भी प्राप्त नहीं हुई है कि मुझे अपने जीवन में धर्म के लिए ही समय बिताना है। यह भी नहीं है। एक गृहस्थ व्यक्ति जिसके उद्देश्य में यही है कि मकान कैसे बनना है या मकान बनना ना भी हो तो अपने जीवन को देखना है। दाल भात का इंतजाम कैसे करना है। रोटी कपड़ा और मकान इन सब में पूरा ध्यान है। उस समय पर शंकराचार्य के एक अल्पज्ञ एक अभी-अभी नवीन शिष्य से एक इसन के सात आठ 10 साल पुराने अनुगामी ने प्रश्न किया अच्छा बताओ धर्म क्या है? तो उस नवीन शिष्य ने वहां पर उसको बता दिया सूत्रात्मक शैली

00:39:02:19 में कि जीव की चाह के वास्तविक विषय को परिभाषित कर सकने वाले वेदाद शास्त्रों द्वारा जीव की चाह के वास्तविक विषय को प्राप्त कराने के निमित्त बताई गई मर्यादा का नाम धर्म है। और जो वो स्कॉन का अनुगामी था पेन कॉपी लेकर एक्सपेंशन बता रहा था। उसका मुंह इतना बड़ा खुल गया। ये क्या था? और फिर वो क्या बोलता है मालूम है? फिर वह बोलता है इतनी क्रष्ट वाली नहीं चाहिए सरल वाली परिभाषा चाहिए धर्म की

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00:39:35:20 ठीक है तो इसको कहते हैं तौली हुई सूत्रात्मक शैली में जब आपको सिद्धांत प्राप्त होते हैं जिनका ईश्वर जगत बनाता ही नहीं बनता भी है उन्हीं का ईश्वर श्री राम कृष्ण आदि के रूपों में अवतार लेता है। गुरुदेव से यदि कोई स्वतंत्र रूप से बात करने की अह अगर जैसे उनका दिन होता है राष्ट्रीय राष्ट्रीय उत्कर्ष दिवस या उनका वो है प्राकट्य उत्सव है तो स्वतंत्र रूप से जब भी गुरुदेव बोलना चालू करते हैं तो उनका जो प्रवचन होता है वो इन्हीं पांच सिद्धांतों के इर्दगिर्द होता है। उनके उनके द्वारा निर्गत जो सर्वोच्च न्यायालय में जो दिया गया संभाषण है उसी का उसी का जो है परवसान इन पांच सिद्धांतों में आप कभी देखिएगा चालू होता है जीव की चाह के वास्तविक विषय यानी नास्तिकता के खंडन से और खत्म होता है श्री रामचंद्र जी पर आकर गुरु प्रामाणिक गुरु आचार्य यहां पर आकर के उनका वो समाप्त होता है तो उसको आप देखिएगा आपको यही ध्वनित होंगे यही सिद्धांत सब ध्वनित होंगे जिसको हमने और सामान्य जन के लिए और जो है उनकी भाषा में ये क्या कहते हैं संसार का प्रत्येक मनुष्य भगवान कोई ही ढूंढ रहा है। फिर वह भले ही स्वयं

00:40:50:26 को नास्तिक ही क्यों ना कहता हो। इस तरीके से और बिल्कुल बच्चों वाली भाषा में उसको प्रस्तुत करने का प्रयास किया। तो यह होती

00:41:01:01 है सूत्रात्मक शैली की उपयोगिता। ऐसे सूत्रात्मक शैली में आप देखिएगा जिनके यहां पर बिखराव है। वहां पर ऐसे आपको सिद्धांत नहीं मिलेंगे। इतने जटिल विषयों में इतने जटिल विषयों में गए। नास्तिकता को कैसे हराया जाए? जीव की चाह के वास्तव के विषय का नाम ही ईश्वर लोहार गई नास्तिकता विधर्मी ईश्वर को कैसे बाधित ईश्वर को कैसे हराया जाए ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है लोहार गया विधर्मी नास्तिक विधर्मी ग्रंथों को कैसे हराया जाए कि ईश्वर के विषय में केवल वही शास्त्र प्रमाणिक जिन्हें ईश्वर ने भी ना रचा हो अपुरुष ग्रंथ तो यह होता है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान विज्ञान को फैलाना प्रचारित करना तो उसी को यहां पर कहा जा रहा है तौली हुई विचार

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00:41:45:27 श्री समर्थ स्वयं सदा पुण्य मार्ग पर चलते थे और दूसरों को भी चलाते थे। अनीति और अन्याय का सदा दमन करते थे। निष्काम भाव से सबकी सेवा करते थे। सबकी ऐ पारलौकिक उन्नति करते थे। एकांत में रहकर बड़े-बड़े गढ़ प्रश्नों पर विचार करते थे और सबके सामने वे विचार उपदेश रूप में रखते थे। वह जो कुछ कहते थे उसी के अनुसार आचरण करते थे और जो कुछ स्वयं करते थे वही कर वही करने कल्याण करने में ही वही करने का औरों को उपदेश देते थे। उनका सारा जीवन संसार के उपकार और जनता के कल्याण में ही बीता था। अब देखिए होता क्या है कि किसी किसी को लगता है कि भाई इन लोगों के पास कितना टाइम है यही सब बातें करने का यही करते रहने का। ऐसे लगता है लोगों को और जिसकी आसक्ति हो गई हो कि मुझे जो है धर्म की रक्षा करनी है जिसको उसमें सुख मिलता हो तो उसके उसको तो दिन भर वही दिखेगा नास्तिक का फोन आया अच्छा तुम भगवान को नहीं मानते हमारे श्री रामचंद्र जी का खंडन करते हो मूर्ति पूजा खंडन करते हो आ जाओ आ जाओ सामने आ जाओ क्या है फालतू

00:43:00:28 नहीं है हमारे पास भी भूख है हमारे पास भी अन्य हमारी आवश्यकताएं हैं। मगर वह आवश्यकता नगण्य है। गौ है। क्यों है? क्योंकि आसक्ति कहां हो गई? प्रभु में। इसने मूर्ति पूजा का खंडन कैसे किया? इसमें हो गई। इसने मूर्ति पूजा को मना कैसे किया? इसमें हो गई। है ना? उसमें आसक्ति हो गई। भगवान के कार्यों में, धर्म के कार्यों में भगवान में आसक्ति हो गई। और वहां पर भी वर्चस्वता नहीं होनी चाहिए। वहां पर भी लोकेशना नहीं होनी चाहिए। मेरी बाबाई हो गई। नास्तिक व्यक्ति सामने आएगा इसको मैं निरुत्तर करूंगा तो वाहवाही होगी नहीं नास्तिक व्यक्ति निरुत्तर होगा तो भगवान के मार्ग पर आजा भाई तू भी साथ देने लगे इस वाला भी साथ देने लगे विचार करो भाई इसमें उसका पर्यावसान हो ना कि इसमें वाह हरा दिया हम तो आप देखिएगा वैसे मैं अपनी प्रशंसा में नहीं कह रहा हूं मगर ऐसा कई बार हुआ है कि कुछ लोगों का जब हृदय परिवर्तन हुआ है तो जिनका हृदय परिवर्तन हुआ उनका हमने उस स्थिति का फायदा उठाने का प्रयास नहीं किया है। जिनका हृदय परिवर्तन हुआ है आवान के द्वारा ऑन स्क्रीन लाइव स्ट्रीम में चलते-चलते जिन्होंने जिनका हमारे पास प्रमाण

00:44:16:00 है फिर हमने उनका वो लोकेशन में उसको यूज़ नहीं किया बल्कि वो आज हमारा साथ दे रहे हैं। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर के चल रहे हैं। ठीक है? तो हां यह आ गए वो काल क्रम से विलुप्त देखो क्या आया है काल क्रम से विलुप्त ज्ञान विज्ञान को विशुद्ध करना विलुप्त ज्ञान विज्ञान को तपोबल से उभाषित करना तथा सूत्रात्मक शैली में हां विशुद्ध करना मतलब जो विकृत हो गया उसको विशुद्ध करना और जो विलुप्त हो गया है उसको उद्भाषित करना और फिर जो यह सब कुछ सब कुछ प्राप्त है उसको सूत्रात्मक शैली में जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके वह पहुंचाना। अब बात आती है आप लोग कह रहे होंगे मगर अब चल रहा है तो मैं हर भाव को प्रस्तुत करता जाता हूं कि एक प्रश्न

00:45:10:26 आता है भाई ये विशुद्ध करने की ये सूत्रात्मक शैली में देने की आवश्यकता क्या है? लोग ये आरोप लगाते हैं। मुसलमान आरोप लगाता है कि भाई वेद में इतनी घुमा फिरा के बात क्यों कही गई है? उपनिषदों में इतनी घुमा फिरा करके बात क्यों कही गई है? यह सूत्रात्मक शैली में देने के लिए ही आचार्य गण समय-समय पर आते हैं। उस समय के वातावरण के अनुसार सूत्रात्मक शैली में देते हैं। पर ये आवश्यकता भगवान ने सीधे सूत्रात्मक शैली में क्यों नहीं दिया? भाई भगवान ने सूत्रात्मक शैली में ही दिया था। ब्रह्मा जी को तो केवल प्रणव मिला था। जिसको कहते हैं सूक्ष्म वेद कहते हैं ना सूक्ष्म वेद क्या है? केवल प्रणव उसमें मिला। लो इससे बड़ा सूत्र क्या है? केवल प्रणव। मगर जैसे जैसे हमारी प्रज्ञा शक्ति घटती है, विकृति आती है, हम प्रपंच रूपी संसार में फंसते चले जाते हैं। वैसे वैसे उन सूत्रों को जो उस समय की काल परिस्थिति के अनुसार दिए गए थे। उन सूत्रों को समझ पाना हमारे लिए कठिन हो कठिन हो जाता है। तब जब कठिनता होती है तो उस देश काल परिस्थिति के अनुसार दोबारा पुनः उसको सूत्रों में पिरोहित करके दिया जाता है। इसलिए जैसे अपने समय में तुलसीदास जी की भी आवश्यकता थी उसी प्रकार आज रामानुजाचार्य की गद्दी पर बैठने वाले आचार्यों की आवश्यकता है। शंकराचार्य की गद्दी

00:46:26:00 पर बैठने वाले शंकराचार्यों की आवश्यकता है। आज के समय अनुसार जो है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान विज्ञान की फिर से आवश्यकता है और आने वाले समय में जैसे जैसे और विकृति आएगी तब भी हमें आचार्यों की आवश्यकता रहेगी सूत्रात्मक शैली में देने के लिए वरना तो फिर वेद ही पर्याप्त थे। किसी को सत्यार्थ प्रकाश लिखने की क्या आवश्यकता है? गो बैक टू द वेदास। भाई वो लेके चलते हैं। हम वेद वेद गो बैक टू द वेदास। वेद को ही मानेंगे। सूत्रात्मक शैली में जो पुराण में दिया गया पुराण के बाद जो है जो और अन्य आचार्यों के ग्रंथों में दिया उनको नहीं सुनेंगे। खुद जो है वेद को गो बैक टू द वेदास गो बैक टू द वेदास गो बैक टू द वेदास चिल्ला चिल्ला कर फिर कहां ले जाएंगे व्यक्ति को सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास फिर उसमें ले जाएंगे तो कहने का मतलब तो यह है ना उनका भी कि भाई सुत्मक शैली में हमने भी दिया है मगर वही जब तुलसीदास जी दे देंगे तो वहां कहेंगे देखो देखो ये तो तुलसीदास जी का ग्रंथ पढ़ने कह रहे है वेद पढ़ने की बात नहीं कह रहे और यदि उनके हिसाब से कुछ ये सब प्रश्न आते हैं कि जब सबको वेद ही पढ़ने हैं तो फिर सत्यार्थ प्रकाश क्यों लिखी जा रही बताओ? जब सबको वेद ही पढ़ने हैं तो सत्यार्थ प्रकाश लिख लिखी क्यों जा रही है? क्योंकि जाहिर सी बात है कि सबको वेद नहीं समझ

00:47:41:08 में आएंगे। इसलिए सत्यार्थ प्रकाश भी है और जब तक लोग किसी किसी की सीमा के बाहर वेद और अन्य गढ़ ग्रंथ नहीं होंगे तब तक सत्यार्थ प्रकाश जैसे स्वरचित ग्रंथों की क्या आवश्यकता है मार्केट में? तो उनका सत्यार्थ प्रकाश को लिखना ही इस बात का द्योतक है कि सबके लिए वेद उपनिषद सब कुछ नहीं है। सबका सम अधिकार नहीं है। इस बात का द्योतक है उनके द्वारा सत्यार्थ प्रकाश की रचना करना।

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00:48:13:03 उनकी गणना संसार के प्रसिद्ध महापुरुषों में की जाती है। उनका सारा जीवन संस्कार संसार के उपकार और जनता के कल्याण में ही बीता था। श्री समर्थ स्वामी रामदास सचमुच सभी विषयों में समर्थ और राम के सच्चे दास थे। ऐसे महापुरुषों के गुणों का कीर्तन करने में इन पंक्तियों का तुच्छ लेखक अपने आप को नितांत अयोग्य तथा असमर्थ समझता है। हर बात में तो कोई ना कोई ऐसी गढ़ बात आ जाती है और किसी ना किसी सनातना भाष की याद आ जाती है। अब जैसे इन्होंने अपने आप को अयोग्य कहा है। इन्होंने अपने आप को दृष्टता करने वाला समझा है। नितांत अयोग्य असमर्थ समझा है। अब इसी प्रकार से तुलसीदास जी ने अपने लिए शब्द कहे हैं। अपनी दासता को प्रकट करने के लिए भगवान के प्रति उस बात को वो लोग क्या कह रहे देखो तुलसीदास जी खुद कह रहे हैं मैं बेकार हूं मैं बेकार हूं फिर हमने उनको याद दिलाया भैया रामपाल खुद कह रहा है मैं कुत्ता हूं अब क्या हुआ तो वैसे याद दिलाना पड़ता है व्यक्ति को तो खैर अतः यह विषय यही कहकर समाप्त किया जाता है कि पाठक स्वयं ही रत्नों के सागर में अवगाह करें और अपनी रुचि तथा सामर्थ्य के अनुसार इसमें से रत्न

00:49:28:09 निकालकर अपने आप को अलंकृत तथा कृत कृत करें। जय श्री राम रामचंद्र वर्मा जी ने ये भूमिका लिखी है और रक्षाबंधन के दिन संभवत ये पूर्ण हुई थी। तो ये संवत लिखा है शायद इन्होंने 1900 अ 89 बहुत सुंदर दिन पे इन्होंने लिखा है श्रावणी का दिन है और बहुत अच्छा भूमिका भी बहुत अच्छी इन्होंने जो है अब हम अगली जब अगली हमारा ये होगा अगली कक्षा होगी तब हम हिंदी दास बोध का पहला समास प्रारंभ करेंगे और उसी दिन हम विषय सूची पर भी एक नजर डालेंगे एक भी प्रश्न को छोड़ते नहीं है किसी भी ग्रंथ को पढ़ते समय यह आप सब सदैव ध्यान रखें। ठीक है? अब बहुत ज्यादा प्रश्न तो नहीं मगर आज के विषय आज जो हमने पढ़ा है उस विषय से रिलेटेड अगर कुछ एक आध प्रश्न है तो हम ले लेते हैं। जी विश्वजीत जी पूछिए।

00:50:32:12 एक एक करके सबके प्रश्न लेंगे। विश्वजीत भैया आप पूछिए। शिवश भैया जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम। भैया एक चीज पूछना था बिना शिक्षा के दीक्षा लिया जा सकता है क्या मतलब पहले शिक्षा लेना पड़ता है आपका जिनके प्रति आपकी आस्था हो रही है उनकी शिक्षा आपने ली ही है ना तभी तो दीक्षा ले रहे हैं उनसे जैसे मतलब गुरुदेव को देखते हैं मतलब YouTube वीडियोस में तो तो गुरुदेव की शिक्षा ली है ना आपने तभी तो उनसे दीक्षा का मन हो रहा है आपका जितनी शिक्षा की आवश्यकता है वो आपने ले के लिए कहने का तात्पर्य ये है जी भैया हम धन्यवाद भैया

00:51:18:07 भैया हमें एक प्रशांत जी हमें एक कृपया प्रशांत जी हमें पूछना भैया हमें पूछना नहीं है आपने बताया कि रक्षाबंधन था तो कल भैया दूज भूमिका आपने समाप्त की है यही बताना जी बहुत सुंदर है बहुत अच्छा है जी हेलो जी हां यादव जी यादव जी मेरा एक प्रश्न है कि जैसे आपने बताया जीव का वास्तविक विषय सच्चिदानंद की प्राप्ति है। है ना? लास्ट बार मैंने एक बार आपसे क्वेश्चन पूछा था कि आप तो आपने एक चीज बताई थी कि जिनके अंदर कॉनशसनेस होती है उनको सच्चिदानंद की प्राप्ति होती है। है ना? आपकी आवाज थोड़ी सी डिस्टर्ब हो गई। दोबारा बोलिए।

00:52:06:12 आपने यह कहा था कि जिसके अंदर कॉनशसनेस होती है, चेतना होती है उनको सच्चिदानंद मतलब कि उनको सच्चिदानंद की तरफ जाना है। है ना? हम तो मेरा एक प्रश्न है कि जैसे आपने बताया था असतो समसो ज्योति सत्य से असत्य से सत्य की ओर अंधकार से प्रकाश की ओर। इसमें कहीं चेतना तो नहीं है कि जो जिनके अंदर चेतना है वही जा सकते हैं। वही जा सकते हैं। चेतना में ही तो यह विचार आ रहा है। यह विचार कहां आएगा? नहीं मतलब उसमें जैसे वो श्लोका में ऐसे वर्णन नहीं है कि चेतना याित ऐसा कुछ वर्णन अगर दुनिया में हम विचार की बात कर रहे हैं। उसमें वस्तुनिष्ठता के साथ दिया गया हो या ना दिया गया हो। अगर हम विचार की बात कर रहे हैं तो विचार का अधिष्ठान तो चेतना ही होगा ना। बिना चेतना के विचार का अस्तित्व कैसे होगा?

00:53:05:22 जैसे जैसे आपने बोला था सच्चिदानंद हमें हर हर जीवात्मा का विषय सच्चिदानंद के पास जाना है लेकिन उसमें सेित जो सच्चिदानंद जोित है जो वो कॉनशियसनेस है लेकिन जैसे आपने वैिक उपनिषद का वो श्लोक लिखा उसमें श्लोक बताया लेकिन वो उसमें कोईित का वर्ड यूज़ नहीं हुआ है ये क्या है ये क्या कहते हैं असतोमा सद्गम तमसो ज्योतिर्गमया तमसो ज्योतिर्गमया का परवसान किस में मतलब अंधकार से प्रकाश की ओर जाना है हां तो वही तो अज्ञान से अज्ञान से ज्ञान की ओर जाना है ना अंधकार सूचक ही है अज्ञानता का जब हमें कुछ दिख नहीं रहा है हमारे पास शेर खड़ा है कि कुत्ता खड़ा है हमें नहीं ज्ञान है इस बात का अंधकार का पर्यावसान किस में है अज्ञानता में ही तो है अगर शाब्दिक रूप से देख ले अलंकृत रूप से तब भी है और व्यवहारिक दृष्टि से देख ले तब भी है अलंकृत रूप से अंधेरे को अज्ञान और प्रकाश को ज्ञान से जोड़ा जाता है। मगर उसको और उसमें जो है व्यवहारिक रूप से देखें तो अंधकार से हमें परेशानी क्या होती है? क्या होती है कि हमें पता नहीं चलता है कि हमारे आसपास क्या है? यानी कि अज्ञान है ना

00:54:21:15 तो असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया का पर्यावसान ही उसमें है चित्त की ओर जाने में और एक और एक और क्वेश्चन था कि जैसे आपने एक बहुत लॉजिकल सािक उपनिषद का श्लोक लिया जिससे नास्तिकों का खंडन हो जाता है और ऐसे रिलेटेड कोई श्लोकात है उपनिषदों में वेदों में जैसे ये बहुत अच्छी तरीके से यह श्लोक बहुत अच्छी तरीके से नास्तिकों का खंडन करता है। है ना? तो तो और भी कोई श्लोक है इससे रिलेटेड जो कि नास्तिकों का खंडन करें। और भी होंगे संभवत अभी मेरे जानकारी में वर्बली तो मुझे याद नहीं है। वो कई बार होता है कि ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते मिल जाता है। परंतु होता क्या है कि उस समय अगर नोट करने में बुद्धि लगाएंगे तो उसका जो रस ग्रहण करना है वो नहीं मिल पाता। और यदि रस में बुद्धि लगाएंगे तो फिर हम नोट नहीं कर पाते। तो यह एक दिक्कत होती है ग्रंथ पढ़ते समय। जो व्यक्ति जिसके चित्त में ज्यादा खंडन मंडन का रहेगा वो इस पर रहेगा ग्रंथ पढ़ते समय वो नोट करता जाए। श्लोक क्रमांक ये सब आजकल ज्यादा है तो वो फिर रस को ग्रहण कर पाने में उसे दिक्कत होती है और दुविधा हो जाती है तो इसलिए

00:55:37:08 ऐसा है कि कई ऐसे श्लोक हैं जो नास्तिकता के खंडन में मिले हैं। जैसे भगवत गीता में भी नास्तिकता के खंडन में क्या कहते हैं कुछ हैं श्लोक। अभी जब मैं ये रामपाल की जो भगवत गीता का एक एक श्लोक के आधार पर जो है उसका वो कर रहा था मैं तो मुझे मिल रहे थे चीजें मिल रही थी। अब पर वर्बली मैंने क्योंकि उस रूप में कि भाई रामपाल की बजाय जो है इस रूप में यहां नास्तिकता का मिला उस रूप में उसको नोट नहीं किया है। गीता में है भगवत गीता में जैसे कि तत्व जो तत्वदर्शी की बात हुई है शायद 216 में है वो श्लोक जहां पर तत्वदर्शी कहा गया है उसको जो अविद्या को समझ लेता है। ठीक है? उसका पर्यावरण भी आप नास्तिकता के खंडन में कर सकते हो। तो चेक कर लेना एक बार बाकी और होगा तो बताएंगे। मगर जो सबसे विशाल काय मुझे अभी तक जो नास्तिकता के खंडन में जो प्राप्त है ग्रंथ का वचन वो यही है असतो मा सद्गमय वैसे तो भगवान को प्रतिष्ठित करने वाला प्रत्येक श्लोक जो है वो नास्तिकता के खंडन में ही है अब जैसे अस्तो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमया ये हो गया अथात तो ब्रह्म जिज्ञासा अब जिज्ञासा शांत कैसे होगी वो भी तो नास्तिकता का खंडन ही है तो

00:56:52:16 शांत होगी किससे सत्यम ज्ञानम अनंत ब्रह्म इस ये जो पूछा जा रहा है यह क्वेश्चन है। इसका आंसर क्या है? आंसर भी उपनिषद में है। सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह ये इसका आंसर है। अस्तोमा सद्गमया प्रश्न है और ये उसका आंसर है। सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह। ठीक है। ठीक है देवांश जी। किरण जी से बात कर ले। दीक्षित जी आप बोलिए दीक्षित जी। दीक्षित जी तो पहले से

00:57:29:08 हां वो तो है जी बताइए जी शिवा जी जो मैंने आपसे बहुत दिनों पहले कहा था ना कि जो ब्रह्मा विष्णु महेश उनके जो साकार शरीर है वो पंच भौतिक होते हैं तो दास बोध का मैं अध्ययन अभी कर रहा हूं तो इसमें मुझे प्रमाण भी मिल रहा था वहां पर डायरेक्टली तो नहीं कहा गया लेकिन थोड़ा सा चिंतन करने से ही पता पता चल जाता है। वहां पर कहा गया कि जब यह जो हमारा वैवान जगत और सूक्ष्म जगत जो है जिसे हिरण्य गर्भ जगत कहते हैं। सूक्ष्म जगत जो है इसकी रचना जब नहीं हुई थी तब उससे पहले भी माया था। माया मूल ब्रह्म तो पहले से ही है लेकिन माया भी था। माया के बाद इस तेजस यानी कि हिरण्य गर्भ संसार की और पंच भौतिक जो है यह वैवान जगत और ब्रह्मा विष्णु महेश की उत्पत्ति बाद में हुआ है। तो अब तात्विक रूप से अगर देखें तो फिर ब्रह्मा विष्णु महेश तो साक्षात ब्रह्म है। तो वो तो पहले से ही है। लेकिन फिर भी यहां पर कहा जा रहा है कि उनकी उत्पत्ति बाद में हुई है। और फिर ये भी कहा गया कि प्रलय के दशा में उनका अंत भी हो जाता है। तो इससे ही तो सिद्ध हो जाता है कि उत्पत्ति और प्रलय तात्विक रूप से तो हो नहीं सकता। तो फिर पंच भौतिक उन शरीरों का ही होगा। तो फिर उनका शरीर पंच भौतिक ही हुआ।

00:58:46:07 हम एक तरह से है भी और एक तरह से नहीं भी। दोनों बातें स्वीकार करनी पड़ेगी। वो जो तत्व हमें मैंने कई बार बताया ना जो तत्व हमें दिख रहा है वो तत्व तो पंच भौतिक नहीं वो तो सच्चिदानंद है। मगर जिस कारण से उस तत्व की एक आकृति बनी है। वह कारण माया है। तो माया से भी निर्माण हो गया और उसका जो है सच्चिदानंद स्वरूप होना भी सिद्ध हो गया। है ना? उसको उस स्ट्रक्चर में दिखने का कारण माया है। क्योंकि उसके इर्दगिर्द माया है। इसलिए वह एक स्ट्रक्चर है। जैसे कि आकाश को खिड़की से देखने पर खिड़की से दिखाई देने वाला जो आकाश है उसके इर्दगिर्द दीवार है कमरे की। इसलिए उसका जो स्ट्रक्चर है वो चौकोर है। है ना? हां। इसी प्रकार से माया को चीर करके भगवान दिख रहे हैं तो माया से घिरा होने के कारण वो स्ट्रक्चर है तो उसको मायामई भी कह सकते हैं। मगर क्योंकि जो तत्व हमें दिख रहा है वो तो सच्चिदानंद स्वरूप ही है तो उसको सीधेसीधे सच्चिदानंद स्वरूप भी कह सकते हैं। मोक्ष कारक भी कह सकते हैं। हां लेकिन मेरा ये कहना है कि जो लोग निर्गुण का खंडन कर देते हैं ना वो तो ईश्वर को फिर आध्यात्मिक सिद्ध ही नहीं कर पाएंगे ना। भौतिक सिद्ध हो जाएगा। तो वो तो है ही है भाई शंकराचार्य का विरोध करते हुए

01:00:02:04 आप बहुत कुछ सिद्ध नहीं कर पाएंगे ये तो बिल्कुल सर्वविदिित बात है शंकराचार्य विरोध करते हुए धर्म की स्थापना हो ही नहीं सकती शंकराचार्य को स्वीकार करते हुए आप व्यवहार में उनकी सीमा में रहते हुए अपने दर्शन का प्रतिपादन कर सकते हैं। प्रचार प्रसार कर सकते हैं। मगर आप सिरे से नकार दें कि अद्वैत है ही नहीं। निर्गुण भगवान स्वरूप है ही नहीं भगवान का। आखिर में वो कोई ना की तरह खड़ा हुआ ईश्वर है। इसको तो यही बोलता है। यहां बैठा होगा वहां बैठा होगा। बस उनके वर्ड्स ऐसे होते हैं मीठेमीठे कि व्यक्ति सोचता है आ बहुत हरे कृष्णा वर्ड्स उनके इतने मीठे-मीठे होते हैं। व्यक्ति हमारा जो हमारे यहां भी ब्राह्मण भी हैं जिनके यहां आज आज भी जो है कुल खानदान वंश जो है सुरक्षित रहा। मगर आज की पीढ़ी जो है उफी जा रही है। अरे बहुत अच्छा कार्य करते हैं। है ना? जी पंडित जी और जी जो वो लोग कहते हैं कि भगवान जो है सिर्फ मतलब इंद्रियातीत है लेकिन वो तो भगवान में इंद्रियों को भी मानते हैं कि भगवान के आंख है पैर है नाक है और फिर उनका भगवान सबसे बड़ा तो पुरुष है यही सब लेकिन भगवान काउंटर क्वेश्चन है बहुत सारे हैं यही सब काउंटर क्वेश्चन

01:01:17:15 है ना ठीक है चलिए मुझे लगता है और किसी का हाथ नहीं है और काफी लंबी क्लास भी हो गई आज। हालांकि थोड़ी सी विलंब से शुरू हुई थी मगर काफी तात्विक विवेचना हुई है। तो देर ना करते हुए अविलंब इसको जो है विराम देते हैं। रस की चाह रास की राह में इसको चलिए संडे को ही सत्र होगा ना। अगला वाला अगला संडे को होगा और बस थोड़ा सा आप लोगों से मेरा यही निवेदन है कि इसके लिए अनुशासित रह आए यहां पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ें इसमें जो है नहीं धीरेधी दिखने लगा है अब जो संख्या घट रही है यही लोग और जो कभी-कभी जो ऐसा हो जाता है कि मैं विलंब से आता हूं या जो है आगे बढ़ गई डेट तो इसमें बस आप ये हर्ष मनाया करिए कि इस समय कहीं ना कहीं धर्म के लिए कुछ ना कुछ और ऐसा कार्य हो रहा होगा जो इससे भी ज्यादा लाभकारी होगा। बस इतना आप मन में विचार पाया करिए। है ना? बस इतने निवेदन के साथ नारायण समारंभाम शंकराचार्य मध्यमाम अस्मदाचार्य पर्यंतम वंदे गुरु परंपरा गुरु

01:02:32:19 परंपरा सभी को जय श्री राम जय [संगीत]

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 1:02:44 · 31 Oct 2025

अध्ययन प्रारम्भ DAASBODH LECTURE #1

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