⬜ Not used yet · 00:00:04:04 – 00:33:28:00 (33:24)
00:00:04:04 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और इस बात का मुझे फेर है इन दिनों मैं आप लोगों को समय कुछ कम दे पा रहा हूं। YouTube पर बहुत ज्यादा एक्टिव नहीं हूं। बट इसके साथ ही साथ मुझे भी प्रसन्नता है और आप लोगों को भी इस बात का संतोष होगा। प्रसन्न आप अवश्य यह जानकर प्रसन्न हुए होंगे कि हमने विधर्मियों की अधर्मियों की पाखंडियों की खाट खड़ी कर रखी है धरातल पर।
00:00:50:12 तो इसीलिए थोड़ा सा समय कम मिल पा रहा है। पर जो इस कारण से हम पिछले सप्ताह उपस्थित नहीं हो पाए थे मगर ना उपस्थित होने की स्थिति में आपको कई सारी शुभ सूचनाएं अच्छे समाचार अच्छे संकेत प्राप्त हुए तो थोड़ा सा विवरण भी बात कर लेते हैं। जैसा आप सभी को पता ही होगा कि रामपाल का एक व्यक्ति यहां पर ठेले पर किताबें बेचते बेचते पकड़ा गया है और उस पर जो है मुकदमा दर्ज हो गया है। अ इस संबंध में किसी का फोन भी मेरे पास आया था तो उससे वार्ता हुई है।
00:01:40:24 उनकी उनके पक्ष से रखने वाला एक व्यक्ति तो इस संबंध में वार्ता हुई है। आने वाले समय में वह वीडियो भी आपको मिल जाएगा कि किस तरह के कुतर्क करते हैं ये लोग? क्या पराकाष्ठा है? कहां तक जा सकते हैं? कुतर्कों में इनका लेवल क्या हो सकता है? किस तरह जब बात इनकी खंडित होने लगती है तो टॉपिक बदल करके दूसरा टॉपिक लाने का प्रयास करते हैं। वो सभी आपको आने वाले टाइम में दिख जाएगा। जो बात हुई फिलहाल हम लोग जल्दी से जो पिछला वाला हमारा चैप्टर था उसका कुछ बुलेट पॉइंट्स हमने तैयार किए वो हम ले लेते हैं।
00:02:23:27 सबसे पहला है 319 से स्टार्ट करेंगे। तो 319 का संभवत इन्होंने अर्थ लिया नहीं है। पष्ठ संख्या 3 20 पृष्ठ संख्या 48 इसमें इन्होंने 48वें पृष्ठ में गरिमा गीता की हम पढ़ रहे हैं। 48वें पृष्ठ में तीसरे अध्याय के 20वें श्लोक का अर्थ दिया है और इससे पहले यानी कि पष्ठ संख्या 43 में इन्होंने तीसरे अध्याय के 17 से 18 श्लोक का अर्थ दिया है। इन्होंने 19वें श्लोक का अर्थ नहीं किया है। तो इसका अर्थ है कि हमें जो है 19व श्लोक को अमान्य मानना पड़ेगा। उस कैटेगरी में डालना पड़ेगा कि भाई वह काल ने अपने मन से बोल दिया था इसलिए इन्होंने लिया नहीं। तो हम ये भी काउंट करते जा रहे हैं कि कितने श्लोक इन्होंने अमान्य घोषित किए हैं। कितने श्लोकों की बात को इन्होंने माना नहीं। तो इसको भी उसमें डाल दिया। और इसके बाद इन्होंने तीन 20 में सीधे अगली बात कही है कि जो श्रद्धालु किसी मनोकामना
00:03:38:28 की पूर्ति की इच्छा ना रखकर अपना धार्मिक कर्तव्य जानकर दान करता है वह वास्तविक दान है। जबकि उसमें और कुछ कहा जा रहा है। तो उसमें बताया जा रहा है कि जो भगवान ने धर्म धर्म यज्ञ बताया है उसके अनुसार चलने वाले जो लोग हैं जनक आदि वह भी मोक्ष को प्राप्त कर गए थे। मतलब वहां भगवान ये बता रहे थे गृहस्थ होते हुए भी जनक ने मुक्ति प्राप्त की थी। वो बता रहे थे। तो यहां पे इन्होंने पूरा अर्थ ही बदल दिया। मुक्ति वाला हिस्सा हटा ही दिया। यहां सिद्धि की कोई बात ही नहीं की। है ना? और अलग ही एक इनका गाना चलने लगा। 320 में इसके बाद 32 से 24 में इन्होंने क्या किया है? तुलना की है काल और कृष्ण की। यह बहुत जरूरी है। काल और कृष्ण की तुलना कैसे की है? कि 31 से 24 में इन्होंने बताया है कि गीता को बोलने वाला यह कह रहा है यदि मैं अच्छे कर्म ना करूं तो मुझे क्योंकि मैं श्रेष्ठ हूं तो मुझे फॉलो करने लगेंगे लोग और मैं अगर अच्छे कर्म नहीं करूंगा तो लोग भी अच्छे कर्म नहीं करेंगे। मतलब बुरे कर्म करने लगेंगे। अब यहां पे रामपाल ने अपनी पुस्तक में यह बताने
00:04:54:09 की कोशिश की है कि विचार करें कृष्ण भगवान के तो इतने बुरे बुरे कर्म है उसके अनुसार। तो फिर जब कृष्ण भगवान के इतने बुरे बुरे कर्म है तो वह यहां पर यह कैसे कह सकते हैं कि मैं अगर अच्छे कर्म ना करूं तो इससे पता लगता है गीता बोलने वाले कृष्ण नहीं है बल्कि काल है काल है कृष्ण से सेपरेट है तो कृष्ण भगवान अच्छे कर्म करने वाले नहीं है रामपाल के अनुसार तो क्या काल अच्छे कर्म करने वाला है बलात्कारी झूठा राक्षस अपना उल्लू सीधा करने वाला हम जो उसकी भक्ति करे उसको वह खा जाता है। तो कृष्ण भगवान अच्छे कर्म करने वाले नहीं है। मगर रामपाल यहां पर काल को अच्छा कर्म करने वाला मान रहा है। ये क्यों? पहली बात। दूसरी बात यह है इसने यहां पर इस पृष्ठ पर 48 वे पृष्ठ पर 48 पृष्ठ की बात चल रही है। इसने इस पृष्ठ पर जो है बहुत सारी बुराई की है। कृष्ण भगवान के जो लीलाएं उनका जो वृतांत है उनका अपार्थ करके बहुत सारी बकवास यहां लिखी है। तो इसने ये दर्शाने की कोशिश की है। कृष्ण भगवान तो इतने बुरे कर्म करने वाले थे। तो फिर वह यह क्यों कह
00:06:09:13 रहे हैं कि अगर मैं अच्छे कर्म ना करूं इससे पता लगता है कि अच्छे कर्म जो ना करने की बात जो कह रहा है वह काल है जो कृष्ण से अलग है। मगर मैं आपको एक बात बताऊं ये इनका कबीर सागर का सरल अर्थ है। और इसमें प्रश्न संख्या 70 कबीर सागर का सरलार्थ प्रश्न संख्या 70
00:06:45:22 यहां पर 71 में आप पढ़िए 71 वे पृष्ठ में और नीचे से तीसरा पैराग्राफ है ना वास्तव में यह काल का जाल है मन मन काल का सूक्ष्म रूप है। काल ने प्रत्येक प्राणी को धोखे में रखकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए 100 छल कपट किए हैं। श्री कृष्ण में प्रवेश करके अनेकों रूप बनाकर काल ब्रह्म स्वयं भोग विलास करता था। भार श्री कृष्ण जी के सर पर रख देता था। अर्थात रामपाल के अनुसार कृष्ण जी ने कोई बुराई नहीं की है। काल ने की है। तो फिर वहां यह क्यों कह रहा है कि भाई कृष्ण जी तो बुरे हैं। काल अच्छा है। तो ये पहले खुद डिसाइड कर ले कि कृष्ण और काल में से कौन अच्छा? फिर तत्व ज्ञान के रूप में बता दे अपने चंपूओं को। हम चलिए आगे चलते हैं। बुलेट पॉइंट। इसके बाद काल ने यहां पर तो कहना पड़ेगा कि यह इस श्लोक को अमान्य मानना पड़ेगा। कौन सा श्लोक जिसमें यह कहा है कि यदि मैं अच्छे
00:08:00:26 कर्म ना करूं तो श्लोक चाहे वो कृष्ण के रूप में मान लीजिए या या वो काल के रूप में मान लीजिए अच्छे कर्म कहने वाली बात दोनों ही तरीके से लागू नहीं होती है। तो जब लागू नहीं होती है तो फिर ये इस बात को भी अमान्य मानना पड़ेगा। हम इसलिए काउंट करते चल रहे हैं क्योंकि इसने कहा है 5% ज्ञान जो है वो काल ने दिया है। तो हम ये देखेंगे कितने श्लोकों को ना मानने के बाद इसकी गीता बचती है और क्या वो 5% ही है या 5% से ज्यादा है। हालांकि आपको बता दूं अभी तक 17 श्लोक तो अमान्य हो चुके हैं। उन श्लोकों के अलावा जो मोटे तौर पर अमान्य हुए हैं। ठीक है? जैसे अभी मोटे तौर पर अमान्य हुआ है। 21वा श्लोक यदि मैं अच्छे कर्म ना करूं। इसके बाद
00:08:47:01 इसने यहां पर यह माना है कि गीता बोलने वाला यह कह रहा है कि मेरा कोई प्रयोजन शेष नहीं है। हम ये इसने माना है। मेरा कोई भी प्रयोजन मेरा तीनों लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है ना प्राप्त करने योग्य कोई वस्तु अप्राप्त है। ठीक है? कुछ भी अप्राप्त नहीं है। ठीक है? मतलब काल को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। मगर यह कहां पर कहा है इसने? 49व प्रश्न में। 49वा प्रश्न दिखा दीजिए गरमा गीता का।
00:09:26:04 49व प्रश्न में इसने ये कहा है और आपको बताएं 52 वे प्रश्न में 49व प्रश्न में गरमा गीता की में क्या कहा है? 49वा प्रश्न जिसमें ये इसने माना कि काल को ना तो कोई कर्तव्य शेष है और ना ही कोई प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है। कुछ भी अप्राप्त नहीं है। कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। गीता बोलने वाला वह है। गीता बोलने वाला कौन है? जिसे कुछ भी
00:10:11:25 प्राप्तव्य अप्राप्त नहीं है और ऐसा कुछ नहीं जो उसको कुछ करना पड़े हाथ पैर मारना पड़े मगर यही व्यक्ति यही रामपाल यही जेलधाव निवासी पष्ठ संख्या 52 में क्या लिख रहा है गरिमा गीता की दिखाइए पष्ठ संख्या 52 निकालिए हां इसमें देखिए क्या है काल को डर है कि क्या डर है काल को काल को डर बना रहता है कि कहीं जीव मेरे जाल से निकल ना जाए ठीक है इसको कुछ करने की जरूरत नहीं है। ये खुद मान रहा है रामपाल गीता बोलने वाले को मगर काल को डर बना रहता है। इसलिए काल को झूठ बोलना पड़ता है। इसलिए काल को यह सब रचना पड़ता है। तो या तो यह तय कर ले तो यहां पर यह जो श्लोक है इसको भी अमान्य मानना पड़ेगा कि गीता बोलने वाले को कुछ भी प्राप्त करने योग्य अप्राप्त नहीं है। ठीक है। आगे चलते हैं। क्या कहा है? अच्छा एक बात है एक काल को श्राप मिला
00:11:26:26 था कि काल इतनी इतनी आत्माएं बार-बार पैदा करेगा। ये श्राप मिला था काल को। हां। तो काल जीव पैदा करता है। प्राणी पैदा करता है। आत्मा पैदा करता है। वैसे फॉर योर काइंड इन आपको बता दूं। काल आत्मा भी पैदा करता है। यह बात भी लिखी है। अब बताइए यदि काल आत्मा को बना रहा है आत्मा हम।
00:12:18:09 अच्छा वह उसमें है चौथे अध्याय चलिए खैर आगे बुलेट पॉइंट में चलते हैं क्या है कि इसने बता दिया कृष्ण का चरित्र बोला नहीं है फिर इसने 49 पृष्ठ में पृष्ठ संख्या 49 है इसमें इसने माना है यजुर्वेद के अध्याय 40 के मंत्र 13 में 13 का समर्थन कहा है कि भाई धीरा नाम पुरुषों से जाकर के अह मोक्ष का ज्ञान जो है तत्व ज्ञान वो पूछो जबकि वहां पर ऐसा नहीं है। वहां यह कहा गया है कि धीरा नाम जो बुद्धिमान होते हैं, मनीषी होते हैं, वह ऐसा बताते हैं। तो यहां से उसने हिंदी पलट दी है। खैर चार 13 में धीरा नाम पुरुषों का मंडन कर रहा है, समर्थन कर रहा है। मगर यजुर्वेद के 40 वे अध्याय के दव मंत्र का दव मंत्र के मंत्र में ये धीरा नाम पुरुषों का विरोध करता है। तो पहले तय कर ले कि धीरा नाम से ज्ञान लेना है कि नहीं लेना है क्योंकि 40 वे अध्याय के दव दव मंत्र में लिखा है कि
00:13:29:18 पवित्र वेदों को बोलने वाले ब्रह्म ने कहा 39वा प्रश्न निकालिए 39 39वा प्रश्न निकालिए इसका पवित्र वेदों को बोलने वाले ब्रह्म ने कहा कि पूर्ण परमात्मा के विषय में कोई तो कहता है कि यह वह अवतार रूप में उत्पन्न होता है। अर्थात आकार में कहा जाता है। कोई उसे कभी अवतार रूप में आकार में भी हां चार 10 का समर्थन किया है। यहां पे समर्थन है। ठीक है? धीराम पुरुषों से जाकर के सुनने वाली जो बात इसने मानी है वो 40व अध्याय के दव मंत्र में माना है कि धीराम पुरुषों से सुनो। फिर उसके बाद 49 वे प्रश्न पर दोबारा आ जाइए। 49वा प्रश्न 49 वे प्रश्न में 40 वे अध्याय के 13 वे मंत्र का खंडन कर रहा है और उस खंडन में धीरा नाम पुरुषों का की बुराई कर रहा है। क्या बुराई है कि भाई
00:14:30:00 जिसको ये यहां ये कह रहा है जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं। और ये ज्ञान देने वाले वहां पर धीरा नाम कहे गए हैं। जो ज्ञान यजुर्वेद के 40वें अध्याय के 13वे मंत्र में है वह ज्ञान देने वाले धीरा नाम है और यहां पर यह कह रहा है कि नहीं नहीं ये बात वेद की गलत है कि जिस व्यक्ति को हालांकि इसने अर्थ गलत लिया है ये जो अर्थ इसने लिया है वो गलत है वहां पर अलग अर्थ है मगर अगर इसने यह अर्थ लिया है कोई भी अर्थ लिया बात तो धीराम पुरुषों की है ना तो जब ये धीराम पुरुषों के पास जाने को कह चुका है 40 वे अध्याय के द मंत्र का अर्थ बताते हुए अपनी ही किताब में 39 वे प्रश्न प्रश्न पर तो फिर 49व पृष्ठ पर धीरम पुरुषों की बात को खुद ही गलत क्यों कह रहा है क्योंकि यह पोलू है दिमाग से इसके दिमाग में पोल है खाली पड़ा है इसलिए ऐसा करता है ठीक है आगे चलते हैं अच्छा एक चीज और है तीसरे अध्याय के ये 48वा पेज निकालिए 48वा प्रश्न संख्या 48 इसमें इसने क्या किया है तीसरे अध्याय के 31 से 32 श्लोक में गीता कहने वाले भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ऐसा मेरा मत है। तो इसने अपने अनेकों जगह
00:15:45:03 कहा है कि हम केवल वह मानते हैं जो उसको भगवान ने दिया। उसने जहां पर अपना मत दिया तो बताया कि अपना मत है वो हमें नहीं मानना है। काल का अपना मत नहीं मानना है। मगर इसने जो है काल का मत माना है। कहां पे माना है? 50व पृष्ठ में निकालिए। 50वा 50वें पृष्ठ में इसने काल का मत मान लिया। क्या लिखा है? गीता अध्याय तीन के श्लोक 31 32 का सात सबसे नीचे सबसे नीचे जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते हैं। वे सब बुरे कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं करते हैं, वह मूर्ख अज्ञानी है। अब इसमें यहां पर रामपाल ने काल का मत मान लिया। तो यह नहीं कह सकते हैं काल का मत नहीं मानना है। ठीक है? आगे चलते हैं। फिर इसने 51 वे प्रश्न में फिर वही किया है। राग द्वेष ना करने का राग द्वेष का करने का जो विरोध होता है। है ना?
00:16:56:02 राग द्वेष का यहां पर समर्थन किया है। 33 34 कि क्या कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्व ज्ञान हां 33 34 में ये कहा है कि क्या कहते हैं? राग राग द्वेष नहीं करना चाहिए। स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी भी राग द्वेष के बिना नहीं रह पाए थे। मतलब यहां पर राग द्वेष ना करने की जो शिक्षा दी जा रही है उसका विरोध कर रहा है। ठीक है?
00:17:29:27 और एक बात और है इसी में 33 34 में क्या कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्वज्ञान हीन है। मूल स्वभाव वाले शिक्षित व्यक्ति कौन है? और हां पीछे एक बात और है। तत्वदर्शी के पास कौन जाता है? 49 वां प्रश्न दिखा दीजिए एक बार। 49वा 49 वे प्रश्न में इस बेवकूफ व्यक्ति ने यह भी लिखा है कि तत्वज्ञानी से तत्वदर्शी से जो
00:18:07:22 ज्ञान लेने जाते हैं शास्त्रानुकूल साधना प्राप्त करने जाते हैं वो कौन होते हैं? अविद्वान भोलेभाले अशिक्षित अर्थात अनपढ़ और गवार जितने लोग यहां पर हैं लिखे मैं गवार हूं मैं अनपढ़ हूं दोबारा आ जाइए वहां पर 33 34 वाले में तो 33 34 का वह बात करते समय इसने जो है राग द्वेष नहीं करना चाहिए इस बात का जो है विरोध किया है और जबकि 52 वे प्रश्न में राग द्वेष ना करने का समर्थन किया है। देखिए कैसे 52 वे प्रश्न में क्या लिखा है? काल को डर बना रहता है। कहीं जीव तेरे जाल से निकल ना जाए। इसलिए तत्व ज्ञान सुनकर पूर्ण संत की शरण ग्रहण करके पूर्व परमात्मा की भक्ति करो। तब राग द्वेष समाप्त हो जाएंगे। राग द्वेष समाप्त हो जाएंगे। यानी होने चाहिए। राग द्वेष समाप्त होने चाहिए। तो जब समाप्त होने चाहिए तो बार-बार तू यह क्यों कह रहा है कि राग द्वेष समाप्त नहीं हो पाए, समाप्त नहीं हो पाए। क्यों कह रहा है? क्योंकि
00:19:23:01 हमें तो हर बात का विरोध करना है। फिर हमें खुद वही बात कह देनी है। जैसे कि कभी-कभी ऐसा हुआ हो आपके घर में शायद कि मान लीजिए कोई आप लोग चुनाव कर रहे हैं कि दीवार का जो कलर है वह हरा किया जाए। या सफेद किया जाए या पीला किया जाए या इस तरह से घर घर से जुड़ा हुआ कोई भी प्रसंग ले लीजिए जिसमें कि घर के जितने भी सदस्य हैं वो चुनाव कर रहे हैं कि कौन सी चीज किस तरह से इसको करना चाहिए विषय वस्तु अथवा स्थिति को चुन रहे हैं। तो एक कोई ऐसा आया भैया अहंकारी व्यक्ति उसने कहा नहीं ना पीला ना हरा ना लाल ना सफेद उसने घर की घर घर के सभी सदस्यों की सारी बातों को काट दिया तो फिर सब ने उससे पूछा कि फिर कौन सा पीला समझ रहे हैं इस बात को समझ रहे हैं ना जो बात पहले ही कही जा रही है उसको तो मना कर दिया गलत बोल रहा है मूर्ख है ये तो पीला कहने वाला ये क्या है सही पीला? यह तरीका है रामपाल का।
00:20:36:02 खैर आगे चलते हैं। कृष्ण ने एक बात मानी है काल के अवतार। काल ने जब ये घोषणा कर रखी है कि मैं किसी को दर्शन नहीं दूंगा तो काल का अवतार कहां से हो रहा है भाई? काल का अवतार कहां से हो रहा है? घोषणा कर रखी है। मैं किसी को दर्शन नहीं दूंगा। तो काल का अवतार क्यों हो रहा है? और कौन से अवतार है फिर वो बताएं। हालांकि बताए गए हैं महा विष्णु ये है वो है वो अवतार सिद्धि नहीं होते काल के। खैर आगे चलते हैं।
00:21:11:27 हां इसने यहां पर देखिए इसने यहां पर भी द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। फिर इस बात को माना है राग द्वेष को त्यागने को। द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। इसका मतलब इसके जितने भक्त इस समय कोर्ट कचहरी में जा रहे हैं। इसका जो भाई जो अरेस्ट हुआ है गलत किताबों के साथ जिसमें हिंदू देवी देवताओं के बारे में अभद्र आपत्तिजनक अश्लील टिप्पणियां लिखी हुई है। उसको बचाने के लिए जो वो न्यायालय में जो युद्ध लड़ने जा रहे हैं तो ये राग द्वेष ले जा रहे हैं। और राग द्वेष के बिना क्योंकि युद्ध हो नहीं सकता। इसका बाबा खुद कह रहा है। यानी कि यह लोग अभी सही तत्वदर्शी की शरण में नहीं है। पूर्ण संत की शरण में नहीं है। इसी के अनुसार इसी का खंडन ठीक है ना? क्यों? क्योंकि राग द्वेष के बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। हम
00:22:15:03 अच्छा इसने क्या किया है? फिर तीन 35 का अर्थ करते हुए कहा है कि दूसरों की गलत साधना से शास्त्र अनुकूल नहीं है। इसने 52 वे उसमें कहा है 52 वे अध्याय में 52 वे प्रश्न में कहा है वही वाला निकालिए 52 प्रश्न गरिमा गीता की क्या कहा है कि भैया
00:22:47:22 दूसरों की गलत साधना से जो शास्त्रानुकूल नहीं है चाहे वे कितनी भी कितनी ही अच्छी नजर आए वैज्ञानी चाहे आपको कितना ही डराए उनकी साधना भयवश होकर स्वीकार नहीं करनी चाहिए अब यहां क्या हुआ यहां भगवान कह रहे हैं कि जो स्वधर्म होता है दूसरे का धर्म जो है भले ही गुणवान दिख रहा हो अपना धर्म जो है गुणहीन दिख रहा हो ठीक है यहां पे इस बात का खंडन किया है कि भाई ब्राह्मण क्यों नहीं बन सकता वो क्यों नहीं बन सकता क्योंकि शद्र का जो धर्म है वही उसके लिए उपयोगी है क्षत्रिय का जो धर्म है वही उसके लिए उपयोगी है तो किसी भी हाल में स्वधर्म को त्यागना नहीं चाहिए भले ही दूसरे का धर्म कितना भी श्रेष्ठ दिख रहा हो ठीक है तो क्या हुआ यहां पर अब इसने इसकी गाथा ही बदल दी इसने कहा कि दूसरे की साधना नहीं करनी चाहिए गलत साधना नहीं करनी चाहिए तो जब यहां गलत साधना की बात हो रही है तो स्वधर्म का पालन किस हिसाब से करना चाहिए? स्वधर्म मतलब कि अगर मैं मैं जो है शिवाश नारायण द्विवेदी होते हुए किसी का पुत्र हूं, किसी का भाई हूं। ठीक है? तो मेरा धर्म है। यह स्वधर्म में आ गया कि मैं किसका भाई हूं। मैं किसका पुत्र हूं। तो उनकी सेवा जिनका मैं पुत्र हूं।
00:24:02:26 उनकी सेवा उनके प्रति जो भी कार्य करने हैं वो कार्य करना मेरा धर्म है। तो भले ही कोई कोई और व्यक्ति अपने पिता की सेवा करते हुए मुझसे ज्यादा सुखी हो। मुझसे ज्यादा आनंदमय जीवन जी रहा हो अपने पिता की सेवा करते समय तो मैं यह नहीं मैं यह नहीं कर सकता वहां पर कि अपने पिता की सेवा छोड़ के क्योंकि वहां वहां जिस पिता की सेवा हो रही है जिसके पिता की सेवा हो रही है उस सेवा को करते समय आनंद मिल रहा है सांसारिक तो मैं उससे आकर्षित हो के अपना जो स्वधर्म का पालन है वो मुझे नहीं त्यागना है। अपने पिता की सेवा को नहीं त्यागना है कि भाई यहां पे भी तो मैं पिता एक पिता की सेवा कर रहा हूं। मेरा नहीं है तो क्या हुआ? तो यानी कि उसके पिता की सेवा मेरा स्वधर्म नहीं है। ठीक है? तो उसके उससे आकर्षित होकर के मुझे अपने स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। यह वहां पर कहा जा रहा है। मगर इसने पूरा बदल दिया कि भैया दूसरे की गलत साधना से अपनी अच्छी साधना और यही बात वर्णाश्रम में भी आती है। यही बात वर्णाश्रम में आती है। यही आपको लग रहा है कि ब्राह्मण का क्षत्रिय का श्रेष्ठ जीवन है ये है वो है मगर उससे आकर्षित हो के अपना जो आपको गुणहीन दिख रहा है। हालांकि है नहीं मगर चलो मान लो दिख भी रहा है तो उसको त्यागना
00:25:18:02 नहीं चाहिए। भले ही आपको लग रहा है कि उसका जीवन जो है सरल है जबकि वह कठिन है। फिर भी आप उसके लालच में आ के अगर आपको दिख भी रहा है तो उसके लालच में आकर के अपने स्वधर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। यह कहा जा रहा है। ठीक है? ये सार्वभौम सिद्धांत भी है ले लीजिएगा। अब आगे क्या है कि हां इसने एक बात और मान ली है कि संसार के नर नारी पृष्ठ संख्या 59 संसार के नर नारी सनक सनंदन सनत कुमार सनातन नारद व्यास जी पाराशर जी प्रह्लाद मुेंद्र ऋषि ये सब स्वयं कबीर थे। भक्त प्रह्लाद कौन थे? कबीर थे। ये बात किसने मान ली? रामपाल ने। ठीक है? और एक चीज और देख लेते हैं। हां, यहां पर लालच भी दिया गया है।
00:26:37:25 ज्ञानी विद्वान पुरुष मानवश ज्ञानी विद्वान पुरुष मानवश पैसा प्राप्ति व अधिक शिष्य बनाने की इच्छा के कारण गलत कर्म छोड़कर यह पृष्ठ संख्या है 53 छोड़कर सच्चाई का अनुसरण नहीं करते दोनों ज्ञानी व अज्ञानी स्वभाव व चल रहे हैं इसलिए भक्ति मार्ग गलत दिशा पड़ चुका है तो अब क्या है जो ज्ञानी है जो गलत मार्ग पर चलने वाला है वो ज्ञानी कैसे है
00:27:15:22 जब मार्ग ही गलत है तो वो अज्ञानी कैसे है वो तो अज्ञानी कहा जाना चाहिए तो ये एक बात सोचने वाली ठीक है ये बेवकूफियां है हर पन्ने पर की है इसने तो उसी का आप लोग मनोरंजन लीजिए और समय पढ़ने पर चैप्टर वाइज ये जो व्याख्या चल रही है इसको देखते रहिए। 59व पे 59व प्रश्न में क्या माना है कि स्वयं कबीर परमात्मा ही प्रह्लाद थे। हम भी तो यही कहते हैं प्रह्लाद थे। हां मान लिया ना 59 में रख लो इसको संभाल के। आगे चलते हैं।
00:28:06:07 वह परमात्मा उस परमात्मा यह कहता है ना जब वह जब वह स्वयं ही परमात्मा थे तो उन्होंने यह क्यों कहा कि वह परमात्मा उस परमात्मा तो यहां पे तुम्हारे कबीर बाबा जी भी कह रहे हैं क्या कह रहे हैं वह परमात्मा जिसका काल ना हो यानी अविनाशी सत्पुरुष वह सच्चा परमात्मा जिसका नाश ना हो यानी अविनाशी वह परमात्मा जिसकी वास्तविक वह परमात्मा जो अविनाशी है भाई वह परमात्मा क्यों कह रहे हो मुझ परमात्मा कहो ना मुझ परमात्मा मुझ परमात्मा ये कहो ठीक कबीर साहब कह रहे हैं ये नहीं कहना चाहिए वह नहीं कहना चाहिए वह और उस वो तो थर्ड पर्सन हो गया ना
00:28:47:13 और क्या है 69 काल जब दोबारा सृष्टि रचेगा वही बात आ गई दोबारा सृष्टि रचेगा दोबारा जो है उसमें जीवात्माएं फसेंग तो कौन सी जीवात्माएं होंगी काल के लिए दोबारा से जीवात्माएं बनाई जाएंगी। पहले वाली जीवात्माएं कहां होंगी? क्या होगा? बहुत सारे क्वेश्चनंस हैं। हालांकि हमने इनकी सृष्टि रचना कबीर सागर का सरलार्ध में भी पढ़ी है। तो उसमें बहुत सारी खामियां है। हालांकि आगे चलते हैं। श्लोकबद्ध तरीके से चलते हैं। इसने रामपाल ने नाम देने का अधिकारी माना है। किसको? जिसको नाम देने का अधिकार मिला हो। प्रश्न क्रमांक 70
00:29:35:13 हम नाम देने का अधिकारी इसने कहा है कि नाम देने का अधिकार केवल उसी को है जिसने अपने गुरु से उस नाम को लिया हो। तो क्या नाम देने का अधिकार अगर सिर्फ उसे है जिसने अपने गुरु से उसको ज्ञान को लिया हो। तो रामपाल का गुरु जो था वह तत्व ज्ञानी था। जिससे रामपाल ने ज्ञान लिया वो तत्वदर्शी था। वो गुरु था। यह प्रश्न आ जाता है। ठीक है? क्योंकि इसने 79 नंबर के पृष्ठ में कहा है इसने कहा है कि केवल मुझ संत रामपाल सारनाम दान करने का केवल मुझ संत रामपाल दास को आदेश मिला है। केवल संत रामपाल
00:30:50:26 दास को आदेश मिला है। आदेश किससे मिला भाई? यह तो खुद कबीर का अवतार है। यह तो खुद कबीर है। तो आदेश किससे मिल रहा है? यानी कबीर के ऊपर भी कोई और है। और अगर गुरु से मिल रहा है तो वो गुरु कौन है? हम बहुत सी बातें हैं। आगे चलते हैं। पृष्ठ क्रमांक 76 वही ब्रह्मा विष्णु महेश की पूजा करने वाले मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले हैं। ठीक है? और फिर भगवान का अपमान है 88 से 89 पृष्ठ में शिव भगवान से सेक्स कंट्रोल नहीं हुआ। सीता माता वाला विवरण है। यहां पर शिव जी को काल ने भड़काया। जैसे काल वहां कृष्ण को भड़काता है। मगर फिर भी ये कृष्ण को दोषी मानते हैं। यहां शिव जी को काल ने भड़काया। 89 नंबर पर है
00:31:54:28 और यह सब होते होते फिर अर्धनग्न शरीर वाली पोशाक पहनी ये सब बातें हैं सब निर्लज्जता पूर्वक लिखी गई है यहां विष्णु भगवान से सेक्स कंट्रोल नहीं हुआ एक बात ध्यान रखने के लिए मन स्वयं काल ब्रह्म है और 3.35 के बात 3.35 का अर्थ क्या है जो हमने बता दिया है कि अगर सभी कार्य धर्म है तो दूसरे का धर्म क्या है? धर्म उसे कहते हैं धर्म किसे कहते हैं? समझिए जो मोक्ष दिलाए। तो दूसरे का जो धर्म है जो इसने व्याख्या की है कि दूसरे की साधना नहीं लेनी चाहिए। वहां शब्द क्या आया है? धर्म। दूसरे के धर्म में नहीं जाना चाहिए। तो स्वधर्म से तो वो बात समझ में आ रही है। मगर जब दूसरे की साधना की बात आ जाएगी तो वहां साधना नहीं कहा गया। वहां धर्म कहा गया है तो उसको साधना क्यों बोल रहे हो? और जब धर्म कहा गया है ठीक है? तो धर्म का तो अर्थ ही है जो मोक्ष दिलाए। फिर आप उसमें भेद कैसे कर रहे हो? हम या तो उसको दूसरे
00:33:10:04 की साधना को धर्म मत कहो। अगर धर्म के अर्थ में तुम जब साधना ले रहे हो तो दूसरे की साधना को आप धर्म मत कहिए क्योंकि वह गलत है। वह मोक्ष नहीं दिला रही तो उसको धर्म क्यों कह रहे हो? यह है कहने का मतलब। तो यह थे बुलेट पॉइंट्स। [संगीत]
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रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #6 अध्याय 3 का #श्लोक #gita #gitagyan
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