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00:00:00:16 पृथ्वी को उद्धरण करके पृथ्वी का उद्धरण हिरण्याक्ष दैत्य को पा उद्धार करके केवल यही कथा नहीं है यह कथा तो जब रात्रि हुई हिरण्याक्ष जो है उनके जो नीचे के लोग हैं अतल वितल सुतल तलात महात रसातल वगैरह ये ये वहां उनकी राजधानी रहती है वहा पृथ्वी यह दूसरी घटना है इससे पूर्व अब मान लो पृथ्वी ले गया हिरण्याक्ष अब व हिरण्याक्ष पृथ्वी को ले गया तो हिरण्याक्ष आया कहां से वह भी बारा कल्प ही था तो वहां दिया है एक पुरुष की जब कोई पूर्वे खाम पंथा मनद से धीरा अनुले रन रस्मीन है ना अब यह जो चीज चली कति धाव कल्पन कैसे कल्प की स्थापना होती है तो कल्प भूमि सनातन भूमि शूकर क्षेत्र है अब वह शूकर क्षेत्र कैसे है वारा चैव बाराही सर्व सर्वा शया सती मूल प्रकृतिम संभूता

00:01:15:16 पंची करण मागत जब भगवान बर अपनी इच्छा के द्वारा जब पृथ्वी का और सृष्टि का उद्भव करते हैं तो वहां दो रूप होते हैं वारा और वाराही वाराही रूप के लिए मूल प्रकृतिम संभूता मूल प्रकृति है वह पंची करण मागत पंची करण कौन-कौन से हैं आकाश वायु अग्नि जल और पृथ्वी ठीक है और पांच चीज और क्या है ै तथा सवम सातम सौरम गाण

00:02:07:03 पम वैष्णव वैष्णव केवल विष्णु नहीं है विष्णु का वैष्णव का मतलब है जैसे कोई एक मंत्रालय होता है ना और मंत्रालय में कितनी कितनी चीजें होती है मान लो शिक्षा मंत्री है हमारे यहां के अब शिक्षा मंत्री में पूरे अपने सेंटर के शिक्षा मंत्री है तो कितने शिक्षा विभाग उनके अंडर में आ गए ऐसे ही एक वैश्णवम वह पीठ की स्थापना किया उन्होंने शैवम शक्तम कक्त माने शक्ति के उपासक और उनकी पूरी समूह मात्र

00:02:43:20 शक्ति सौरम शौर मंडल गाण ब माने गण इन सभी की पांचों की यहां स्थापना की और उस स्थापना करने के बाद में सभी का विवाह भी किया है उन्होंने यह ब्रह्मा विष्णु महेश की जन्मस्थली सूकर क्षेत्र है ब्रह्मा विष्णु सेवाद तद तदा

00:03:21:12 गया शिव रंच विष्णु भगवाना उपजे जाय अंसते नाना यह हमारे तुलसीदास जी महाराज लिखते हैं तो यहां समस्त पीठों की जो स्थापना करके फिर शादी करते हैं वैशेत महालक्ष्मी महाकाली शिवाय च महा सरस्वती ब्रह्मण महा सरस्वती ब्रह्मा जी के लिए महाकाली रुद्र के लिए और महा लक्ष्मी जो है भगवान विष्णु के लिए प्रदान करते हैं और समस्त देवी देवताओं को उनको पत्नियां प्रदान करके उसके बाद

00:04:11:01 में विष्णु के लिए भगवान के लिए स्वर्ग प्रदान किया है मेरू रंगे मनोहर मेरू जो ब्रह्म लोक है वो ब्रह्मा जी को दिया है समस्त लोक यहीं से प्रदान किए जाते हैं ऐसा हमारा और उसके बाद में जब गंगा जी को प्रकट किया है ना तो किस प्रकार से सृष्टि यज्ञ हुआ है देखिए जैसे हमारे वैदिक व्यक्ति हैं वेदाचार्य हैं वह यज्ञ से ही जजन जजम जंत देवा स्थान धर्मा प्रथमा आस यज्ञ से सृष्टि को मानते हैं यज्ञ से ही सृष्टि है और व यज्ञ कौन सा है यह भी हमें अपनी शंका का समाधान कर लेना चाहिए कि कौन सी यज्ञ से सृष्टि हुई है क्योंकि यज्ञ पुरुष ही भगवान वाराहा है जतम जतम ते जित यज्ञ भावन त्र तनु स्म परते नमः यद रोम कपेस निल धरा तस्मै नमः कारण सकरा यते वह शूकर भगवान ही यज्ञ पुरुष है कोई व्यक्ति यह सोचता है कि हम

00:05:26:02 यह जो आहुतियां डालते हैं ना चैत्र चर का स ओ विष्णवे स्वाहा वह यज्ञ पुरुष द्रव्य यज्ञ तपो यज्ञ योग यज्ञास तथा परे स्वाध्याय यज्ञन यज्ञास तेत कर्म विसूचिका यह भागवत जी में सत कर्म जो है वो द्रव्य यज्ञ है द्रव्य यज्ञ में हमें पूजा भी करनी है किनकी प्रतिमाओं की ऐसा नहीं है कि हम यज्ञ करते हैं तो प्रतिमाओं की पूजा नहीं करेंगे यह कौन सा कौन सा यज्ञ है द्रव्य यज्ञ और द्रव्य यज्ञ में तपस्या कौन सी है मालूम है आपको तपस्या कौन सी है देव दुज गुरु प्राज्ञ पूजन सचम अजम ब्रह्मचर्य अहिंसा च शारीर तपते यह तप शरीर का है कि हम भगवान की प्रतिमाओं की सेवा करें अपने माता-पिता की सेवा करें अपने वृद्ध जनों की सेवा करें और अपने क्योंकि मातरम पिम वृद्ध मातरम पिम वृद्ध माता पिता और माता-पिता तुल्य वृद्ध वो सब माता-पिता की

00:06:41:06 श्रेणी में आते हैं भारिया साधवी सतम शिशु भारिया केवल अपनी है लेकिन अन्य साधु हैं ऐसे रूप में हम उनकी पूजा करें सतम शिशु हमारा जो बच्चा है यह सभी चीजें द्रव्य यज्ञ में आती हैं तप यज्ञ हमारा जो होता है वाणी का तप मन का तप यह सभी तप है द्रव्य यज्ञ है तपो यज्ञ है योग यज्ञ है स्वाध्याय यज्ञ है और सबसे उच्चतम जो है वह ज्ञान यज्ञ है ज्ञान यज्ञ क्या करता है जो द्रव्य हम करते हैं आहुति हम उसमें डालते हैं ठीक है तप यज्ञ हम करते हैं हमारे शारीरिक तप यज्ञ हो जाता है जो आहुतियां को देते हैं और एक चीज और मैं बता दूं बहुत संक्षिप्त में संकेत आ गया दो मिनट लूंगा केवल यह शकर क्षेत्र मनब से यहीं से चला शकर क्षेत्र से ही और समस्त मनम आरंभ होते हैं यहीं

00:07:56:12 से होते हैं और सौर वंश भी ही से चला सूर्यवंश जो हुआ सूर्य भगवान ने यहीं तपस्या की उनके संताने प्राप्त हुई और चंद्र ने भी यहीं से तपस्या की चंद्रवंश भी यहीं से चला तो इसीलिए यहां कल्प देश्वर जो है समस्त सृष्टि यहीं से चली और एक और बात प्रधाना स्वरूपा सा गंगा भुवन पावनी विष्णु विग्रह संभूता द्रव रूपा सनातनी सनातनी गंगा जो सरोवर है ना वो गंगा जी यही विद्यमान है जब भागीरथी नहीं थे तो भागीरथी गंगा नहीं थी 5 भगवान जब पैर ऊपर नहीं गए थे तो आकाश गंगा नहीं थी तब गंगा कहां थी इस सूकर क्षेत्र में ही थी ऐसा परम दिव्य य सुकर क्षेत्र यह बरा भगवान की निर्माण स्थली है और उनकी प्रतिष्ठा स्थली है यही सभी के तन जुड़े हुए हैं इसलिए इसको सनातन तीर्थ कहते हैं सकर क्षेत्र धरा धाम की बारा भगवान की गंगा मैया की समस्त विदव जनों की मैं सभी को प्रणाम

00:09:11:24 करता हूं मुझे आशीर्वाद दे के उत्तर उत्तर विद्यु की ऊर्जा बिना आशीर्वाद के कुछ नहीं है विप्र प्रसादा धरणी धरो विप प्रसादा कमला वहम य प्रणाम बहुत-बहुत साधुवाद नरेश बबिया जी ताव जी का अब हम शास्त्रार्थ के कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए इसी श्रंखला में हमारे पास जो शास्त्रार्थ में प्रतिभागी हैं वह उनके चार समूहों में उनको वितरित किया गया है उनमें अलग-अलग राज्यों से अलग-अलग राज्यों से अलग-अलग जिलों से टीम पधारी है वैसे तो उत्तर भारत के ही ज्यादा है तो जो जैसे जैसे मैं उनका नाम लेता जाऊंगा वह अपना अपना स्थान ग्रहण करते जाए जो नोएडा से टीम आई है डॉक्टर करण सिंह जी डॉक्टर करण सिंह जी आप आए और अपना स्थान ग्रहण करें आचार्य शंकर मित्र शंकर मित्र जी आप भी अपना स्थान ग्रहण करें

00:10:26:28 सुकांत आर्य जी जवीर सिंह जी प्राची ब्रह्मचारिणी भामती ब्रह्मचारिणी क्योंकि हमारे अतिथि को आने में थोड़ा सा विलंब है तो यह जो बात की होने वाली प्रक्रिया है उसको हम पूर्ण कर लेते हैं आप प्रथम टीम में है और इसी में डॉक्टर आचार्य दिवाकर जी वह भी स्थान ग्रहण करें प्रथम टीम में द्वितीय समूह जो है द्वितीय समूह में आचार्य देव स्वरूप जी आ जाइए सुधीर आर्य जी कमलेंद्र आर्य जी अनामिका ब्रह्मचारिणी संचिता ब्रह्मचारिणी साक्षी ब्रह्मचारिणी और राजेश आर्य जी

00:11:33:15 हमारी जो तृतीय समूह है वह तृतीय समूह वैसे हमने उन्हें टब के माध्यम से फेसबुक के माध्यम से बहुत देखा है और लोग पसंद भी करते हैं तो आप नरवर से पधारे हैं और सांग वेद विद्यालय के प्रधान आचार्य हैं और मैं आचार्य ज्ञानेंद्र जी से अनुरोध करूंगा वह आकर के अपना स्थान ग्रहण

00:12:05:22 करें इसी समूह में आचार्य जी के समूह में प्रेम मूर्ति पंकज मिश्र जी पंकज मिश्र जी हां जी और तृतीय प्रभाकर जी प्रभाकर जी भी इसी समूह में है तो आप भी आकर अपना सु स्थान ग्रहण करें और आपके यहां एक बहुत विशिष्ट छात्र है जिससे आपने परिचय भी कराया मैं चाहूंगा वह भी इस शास्त्रार्थ में सम्मिलित हो उपांशु और एक और भैया जी आए हैं शिवम जी तो आचार्य जी के साथ आप स्थान ग्रहण

00:12:51:09 करें चतुर्थ जो समूह है चतुर्थ समूह सोरो सुकर क्षेत्र से है तो सकर क्षेत्र में जैसा हम सभी जानते हैं नरेश जी को तो मैं आचार्य श्री नरेश बवारिया जी से अनुरोध करूंगा कि वह भी आप अपना स्थान ग्रहण करें डॉक्टर अमरीश निर्भय जी आप भी वयोवृद्ध ज्ञान वृद्ध और आपका आशीर्वाद बना रहता है तो आप भी समूह में स्थान ग्रहण करें राहुल वशिष्ठ जी आचार्य राहुल वशिष्ठ जी आप चतुर्थ समूह में स्थान ग्रहण करें और हमारे तुलसी पीठ के पुजारी उपासक श्री मानवेंद्र गिरी जी महाराज वह भी चतुर्थ दल में अपना स्थान ग्रहण करें जैसा कि हम जानते हैं शास्त्रार्थ परंपरा प्राय विलुप्त प्रतीत होती है किंतु वर्तमान में बनारस इत्यादि में थोड़े-थोड़े कहीं ना कहीं अपने अपने प्रतिष्ठानों में चलती रहती है लेकिन इसको लुप्त प्राय

00:14:06:19 परंपरा को श्री एसएस उपाध्याय जी ने बड़े प्रयासों के साथ पुनर्जीवित किया है और इसको आगे बढ़ाने का कार्य आप कर रहे हैं आपने प्रथम शास्त्रार्थ पहले लखनऊ में कराया था उसके उपरांत शैल में कार्यक्रम हुआ उसके उपरांत अयोध्या में कार्यक्रम हुआ और आपके संरक्षण में आपके दिशा निर्देशन में यह कार्यक्रम यहां सोर सुकर क्षेत्र में आयोजित हुआ है इसके लिए मैं पुनः पुनः आपका धन्यवाद और आभार व्यक्त करता हूं आगे के क्रम में इस शास्त्रार्थ सम्मेलन में जब जब हम एकत्रित हुए हैं तो इसके कुछ नियम है कानून है कायदे हैं जिनको हमें ध्यान में रखते हुए ही शास्त्र थ को करना पड़ेगा ऐसे शास्त्रार्थ की नियमावली प्रत्येक समूह के पास है लेकिन फिर भी मैं उसका वाचन करके आपको एक बार सुना देता हूं जिससे सुस्पष्ट हो जाएगा ठीक शास्त्रार्थ में कुल चार टीमें प्रतिभाग करेंगी जैसा आप सभी देख ही रहे हैं शास्त्रार्थ हेतु चयनित किए गए विषयों प्रश्नों

00:15:21:28 की सूची एवं शास्त्रार्थ की नियमावली की कॉपी प्रतिभाग करने वाली टीम को उपलब्ध करवा दी जाएगी आपके पास पहुंच गया होगा शास्त्रार्थ की अवधि तीन घंटे होगी प्रत्येक टीम में न्यूनतम दो तथा अधिकतम पांच सदस्य होंगे लॉटरी पर्ची के माध्यम से टीमों के बोलने का क्रम निर्धारित किया जाएगा यद्यपि आप समूह में बैठ गए हैं एक दो तीन चार लेकिन लॉटरी के माध्यम से प्रथम कौन बोलेगा उसका निर्णय लॉटरी के माध्यम से होगा उसके उपरांत पांचवा नियम निर्धारित आठ प्रश्नों में से टीम द्वारा अपने लिए किसी एक प्रश्न का चयन करके शास्त्रार्थ की तिथि से पूर्व उसकी सूचना देनी होगी जैसा आप सभी ने हमें दे दिया यदि अपने द्वारा पूर्व में चयन किए गए किसी प्रश्न को कोई टीम अपने लिए असुविधा जनक पाती है तो उसे यह विकल्प होगा कि वह शास्त्रार्थ स्थल पर परर शेष अन्य टीमों से किसी एक टीम से प्रश्न को आपस में बदल सकते हैं है ना या आपके पास अब बैठने से पहले तक तो छूट थी कि भाई विषय सब्जेक्ट चेंज कर सकते थे लेकिन अब ये आपके पास से चली

00:16:37:13 गई प्रत्येक टीम को परिवर्तित विषय प्रश्न पर अपने विचार रखने के लिए 15 मिनट का समय दिया जाएगा विशेष ध्यान इस बात का करें सभी समूह सभी समूह इस बात को ध्यान से सुन ले उनको बोलने का जो समय निर्धारण है वह 15 मिनट [संगीत] है 13 मिनट पर बीतने पर पहली घंटी बजेगी 14 मिनट बीतने पर दूसरी घंटी तथा 15 मिनट पूरे होने पर तीसरी घंटी बजेगी और उसके 30 सेकंड के अंदर वक्ता को अनिवार्य रूप से अपना वक्तव्य समाप्त करना होगा टीम वक्ता के बोल लेने के पश्चात 5 मिनट का समय दूसरी टीमों को तथा श्रोता गण को वक्ता टीम से प्रश्न पूछने और उसको उत्तर देने के लिए दिया जावेगा आपने 15 मिनट में अपना विषय प्रतिपादन कर दिया बाकी के बचे जो पा मिनट है वह आपके सामने बैठे वाले दूसरे जो समूह हैं उन समूहों में से आपके लिए प्रश्न कर सकते हैं यदि ऊपर जो अतिथि बैठेंगे जो निर्णायक मंडल होगा अगर निर्णायक मंडल को लगेगा कि इस प्रश्न को और पूछा जा सकता है या इसमें और विस्तृत हो सकती है या किसी को जो शास्त्रार्थ

00:17:53:00 श्रवण करने आए हैं उनको यदि किसी को शंका होती है तो वह भी उसमें से प्रश्न कर सकेंगे इन् पा मिनट के अंदर उसके उपरांत वक्ता के बोलने के दौरान उनकी टीम का अन्य सदस्य भी नियत समय अवधि 15 मिनट में ही अपनी बात रख सकेगा अर्थात प्रत्येक टीम को बोलने के लिए कुल 15 मिनट का ही समय मिलेगा जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक टीम में पांच लोग हैं 15 मिनट समय निर्धारित है अगर आप तीन बोलना चाहो तो पांच पांच मिनट करके तीन लोग बोल लो एक बोलना चाहो तो 15 मिनट पूरा आप बोल लो उसको समय को निर्धारण

00:18:34:13 आप एक वक्ता के बोलने के दौरान दूसरा नहीं बोलेगा कोई स्पष्टीकरण मांगने के लिए अन्य टीम के सदस्य हाथ उठाकर संचालक मंडल की अनुमति से वक्ता शास्त्रार्थ है तो संवाद तो होगा ही तो ऐसा नहीं होगा कि एक वक्ता बोल रहा है उसी के बीच में अपनी बात शुरू कर दी उनको अपनी बात समापन करने दीजिए आप अपना हाथ खड़ा कर दीजिए मंच से निर्देशन होगा जिस समूह को निर्देशन होगा वो समूह का व्यक्ति प्रश्न पूछ सकता है यह बात स्पष्ट तरीके से जान ले आगे संचालक मंडल की

00:19:18:28 अनुमति वक्ता से पुन पुनः प्रश्न अथवा अधि प्रश्न करने की अनुमति नहीं होगी ऐसा नहीं होगा निर्णायक मंडल में से किसी ने आपसे प्रश्न कर दिया तो आप आप पुनः प्रश्न निर्णायक मंडल में ही कर रहे [संगीत] हैं यह बात भी आप ध्यान में रखें उसके भी नंबर कटेंगे क्योंकि शास्त्रार्थ कर रहे हैं तो शास्त्र जैसा आचरण भी होना चाहिए

00:20:00:03 प्रकार की भाषा का आचरण शैली का आप उपयोग करेंगे उसी तरह आशा है इसी प्रकार से आगे चलेगा वक्ता के बोल लेने के पश्चात निर्णायक मंडल अपनी टिप्पणी दे सकेगा और स्पष्टीकरण के लिए भी प्र आगे नियम प्रत्येक विषय पर टीम वक्ता के बोल लेने के पश्चात संबंधित विषय प्रश्न के निष्कर्ष को

00:20:42:28 रिकॉर्ड मंडल शास्त्रार्थ के अंत में पढ़कर श्रोताओं को सुनाएंगे ताकि श्रोताओं को गिरात हो सके कि शास्त्रार्थ के लिए रखे गए प्रत्येक विषय प्रश्न पर विद्वानों द्वारा अपना अपना वक्तव्य रखने के पश्चात उनका अंतिम निष्कर्ष क्या निकला क्योंकि नी इत्यादि दही इत्यादि इत्यादि इत्यादि द्रव्य बनते हैं तो निष्कर्ष जो निकलेगा वह निर्णायक मंडल ही घोषित करेगा जो इस पर शास्त्रार्थ हुआ है तो इसका निष्कर्ष क्या निकल कर के आया

00:21:18:25 है कथनों का खंडन करने तथा उनसे वाद विवाद में पढ़ने की अनुमति नहीं होगी यह बहुत स्पष्ट तरीके से जान ले जैसा मैं इस बात पर पुनः पुनः जोर दे रहा हूं और ये बात कई बार की है और कई बार हो जाती है आप जितने भी वक्ता हैं जितने भी टीम के सदस्य हैं पुनः निर्णायक मंडल से बहस नहीं कर सकते किसी भी प्रकार का आप बाद प्रकार का आप वाद विवाद निर्णायक मंडल में नहीं कर सकते अगर आपको बात करनी है तो बाद में आप बैठ कर के बात करें कोई दिक्कत वाली बात नहीं है शास्त्रार्थ की भाषा हिंदी होगी में नहीं आते इसीलिए ही शास्त्रार्थ किया जा रहा है वरना कुछ और होता बाकी सब समझदार है है ना शेरो शायरी कहां हो रहे

00:22:06:02 हैं कहने की आवश्यकता नहीं है कि शास्त्रार्थ के दौरान वक्ताओं को शालीनता गंभीरता व गरमा बनाए रखने की हो बनाए रखनी होगी शास्त्रार्थ के दौरान किसी पंथ गुरु अथवा वक्ता के प्रति अमर्यादित भाषा अथवा शब्दों का प्रयोग वर्जित है आप किसी भी पंथ के विषय में समुदाय के विषय में किसी भी अमर्यादित भाषा का असं वधान भाषा का उपयोग नहीं कर सकते हैं संवैधानिक भाषा के अंतर्गत रहकर ही आप बात करेंगे किसी टीम वक्ता को दूसरी टीम वक्ता से विवाद करने आक्षेप अथवा अशोभनीय टीका टिप्पणी करने की कदापि अनुमति नहीं होगी ऐसा करने पर संचालक मंडल प्रथम बार चेतावनी दे सकेगा और पुनरावृत्ति होने पर संबंधित वक्ता अथवा टीम को कार्यक्रम स्थल से चले जाने के लिए भी कह सकता है आप किसी भी प्रकार का विवाद यहां नहीं करेंगे यदि आप विवाद करते हैं तो संचालक मंडल आपको जाने की अनुमति हाथ जोड़ कर के कर सकता है कि भैया कोई दिक्कत नहीं टीम में वक्ता अपने द्वारा की गई किसी टीका टिप्पणी के लिए स् स्वयं वैधानिक रूप से उत्तरदाई होंगे ना कि आयोजक अथवा संचालक मंडल आप जो भी टिप्पणी करेंगे उसके आप उत्तरदाई हैं कोई संचालक मंडल या कोई निर्णायक मंडल उसका उत्तरदाई नहीं होगा किसी

00:23:21:04 वक्ता का वक्तव्य अथवा प्रश्न उत्तर अच्छा लगने पर श्रोता तथा दूसरी टीमों के सदस्यगण वक्ता की प्रशंसा में नांक शब्द बोलकर वक्ता का उत्साह वर्धन कर सकेंगे शोभन शोभन सुंदरम सुंदरम साधु साधु अति उत्तम अति उत्तम क्योंकि यह शास्त्र की शास्त्रार्थ है और विद्वानों की संगोष्ठी है तो उसी प्रकार के शब्दों का हम उपयोग करेंगे वक्ताओं की विद्युत व दक्षता का विनिश्चय पांच सदस्य निर्णायक मंडल द्वारा किया जाएगा जैसा यहां पर निर्णायक मंडल होगा निर्णायक मंडल के वरिष्ठ दम सदस्य निर्णायक मंडल के अध्यक्ष होंगे शास्त्रार्थ के दौरान प्रत्येक टीम की विद्युत व दक्षता का म मूल्यांकन 100 पूर्णांकों में किया जावेगा ठीक निर्णायक मंडल के अध्यक्ष तथा प्रत्येक सदस्य के पास 2020 अंक होंगे जैसा कि सभी को पता है पांच निर्णायक मंडल बैठेंगे 20-20 अंक सभी के पास होंगे पंचों द्वारा किए गए अंकों के योग के आधार पर निर्णायक मंडल द्वारा विजेता उपविजेता एवं सांत्वना विजेता का निर्णय किया जावेगा जिसकी घोषणा निर्णायक मंडल के अध्यक्ष अथवा उनके कहने पर अन्य सदस्य द्वारा की जावेगी पांच श्रेष्ठ वक्ताओं को वरीयता अनुसार प्रशस्ति पत्र तथा शास्त्रार्थ

00:24:36:15 में प्रतिभाग करने वाले वक्ता गण को भी प्रमाण दिया जावेगा जो निर्णायक मंडल के अध्यक्ष एवं सदस्यगण द्वारा हस्ताक्षरित होगा परिणाम की घोषणा अध्यक्ष द्वारा शास्त्रार्थ कार्यक्रम के अंत में किया जावेगा वक्तव्य के दौरान वक्ता का मोबाइल दूर रख देना भाई जिस जिसके पास हो देख लेना सारे समूह में किसी के पास मोबाइल ना हो और अगर मोबाइल हो तो उसको ऑफ कर करके जेब में रख ले क्योंकि उसका उपयोग ना करें यह बेईमानी होगी किसी भी प्रकार

00:25:12:19 का मोबाइल अथवा पुस्तकों आदि का उपयोग करने की अनुमति नहीं होगी जो भी लिखना है आप लिख लीजिए डायरी में जो याद आ रहा है आप नोट डाउन कर लीजिए आपको डायरी पहन दी गई है लेकिन किसी भी प्रकार की पुस्तक आप अपने पास नहीं रखेंगे जिससे आप बोल करके वो करें वक्तव्य के दौरान वक्ता को अपने मन पंथ मत संप्रदाय गुरु आदि की प्रशंसा अथवा श्रेष्ठता सिद्ध करने के बजाय परिवर्तित विषय प्रश्न परही अपना वक्तव्य केंद्रित करते हुए अपना वक्तव्य रखना होगा परंतु वक्ता अपने संप्रदाय गुरु व उसकी किसी रचना से उदाहरण आदि अपनी बात के समर्थन में दे सकेगा ठीक है आप किसी गुरु से जुड़े हैं किसी पंथ से जुड़े हैं किसी संप्रदाय से जुड़े हैं किसी भी पर गुरु परंपरा से जुड़े हैं तो आप अपनी गुरु परंपरा के विषय में प्रशंसा तो अ विषय से परिवर्तित होकर के आप अपने गुरु के विषय में प्रशंसा करने लगे उसके लिए आप यह शास्त्रार्थ आयोजित नहीं हुआ है शास्त्रार्थ विषय के लिए आयोजित हुआ है तो आप विषय पर ही बोले और उन्होंने जो कहा है आपके गुरु ने या पंथ में संप्रदाय में आपके ग्रंथ में जो लिखा है उसका आप प्रमाण दे सकते हैं शास्त्रार्थ कार्यक्रम में प्रतिभागियों को संचालक मंडल द्वारा किसी प्रकार का पारितोषिक यात्रा व इत्यादि अथवा धन आदि दे नहीं होगा अपितु शास्त्रार्थ कार्यक्रम

00:26:27:22 में उनका पूर्णता इच्छिक है अ व धनाप पेक्षा य जैसा हमें सभी को पता है कार्यक्रम के अंत में श्रोताओं की टिप्पणियां जानने के लिए दो चार श्रोताओं से संपन्न हुए मतलब यहां तो काफी है दो चार तो नहीं है तो श्रोताओं से संपन्न हुए शास्त्रार्थ कार्यक्रम पर दो-तीन मिनट में उनके विचार जानने के लिए निर्णायक मंडल उनके कुछ बोलने हेतु आग्रह कर सकेगा जैसा विद्वान तो शास्त्रार्थ करने के लिए बैठे ही हैं लेकिन यदि श्रोताओं में भी कोई प्रश्न होगा तो निर्णायक मंडल उनसे पूछ सकेगा कि भाई कोई आपको प्रश्न इत्यादि हो कोई शंका हो तो आप बता दे कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागी गण एवं आमंत्रित अतिथियों हेतु सूक्ष्म वैदिक जलपान तथा मध्यान भोजन की व्यवस्था रहेगी जैसा सभी को पता है इसी प्रकार के शास्त्रार्थ के नियम थे इसके उपरांत

00:27:22:01 हम कार्यक्रम [संगीत] को आगे बढ़ते हुए आगे बढ़ाने की श्रंखला में मैं मंच पर अतिथियों का आवाहन करना चाहूंगा तो इस कार्यक्रम के शास्त्रार्थ स्पर्धा के अध्यक्ष के रूप में माननीय श्री न्याया श्री एसएस उपाध्याय जी को मैं आमंत्रित करूंगा कि वह आए और मंच पर अपना स्थान ग्रहण करें और मंच की शोभा को बढ़ाएं हम सब कतल ध्वनि से उनका स्वागत करें आपने वेदों के प्रति शास्त्र के प्रति सनातन संस्कृति के प्रति बहुत सारे काम किए हैं आपकी बुक हिंदुत्व चैलेंजिंग हिंदू चैलेंजिंग हिंदू इत्यादि और द ग्लोबल राम जिसका विमोचन अयोध्या में हुआ था वह पढ़ने योग है प्रशंसनीय योग है और अमेरिका में बेस्ट सेलर है आपकी बुक सनातन संस्कृति के विषय में आपने बहुत गहन अध्ययन

00:28:37:03 किया है न्याय के विषय में भी और बहुत सारे लोगों को आपने पढ़ाया है वर्तमान में पुलिस लाइन में भी आप पढ़ा करके आ रहे हैं और [संगीत] बड़े व्यस्ततम समय में से आपने समय निकाल कर के हमें समय दिया इसी अतिथि की श्रंखला में मैं निमंत्रित करना चाहूंगा आदरणीय श्री प्रोफेसर डॉक्टर राम सेवक दुबे जी कुलपति जगतगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय व आए और आप मुख्य अतिथि के रूप पर आसन हो आपके पास भी बहुत व्यस्ततम समय है जैसा आप देख पा रहे हैं कि वयोवृद्ध भी है और जयपुर से चलकर के आना और इस समय में यात्रा करना आपके लिए कितना वो है लेकिन अपना बालक जान कर के अपना शिष्य जान करर ने गुरु ने कृपा की है और आपने कृपा कर आप पधारे हैं आपका बहुत-बहुत

00:29:56:18 धन्यवाद इसी अतिथि के क्रम में मैं आगे बुलाना चाहूंगा डॉक्टर शास्त्री श्री कौश कौशलेंद्र दास जी आप आए और मंच को सुशोभित करें आप जगतगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में दर्शन और योग विभाग के अध्यक्ष हैं और आपकी आपका आशीर्वाद आपकी कृपा दृष्टि बनी हुई है और ना कि गुरु मेहरवान तो चेला पहलवान तो आपकी कृपा दृष्टि है जो अतिथि मंडल आपको दिख रहा है तो आपकी ही कृपा दृष्टि है आपके कहने पर गुरु जी को बार-बार अनुग्रह आग्रह करने पर आपने कृपा की है ऐसे ही गुरु की पंक्तियों में मैं आगे अपने गुरु जी जगतगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के वेद विभाग के अध्यक्ष तथा मंत्र यंत्र और तंत्र प्र मंत्र यंत्र प्रतिष्ठान के निदेशक आदरणीय डॉक्टर श्री देवेंद्र शर्मा जी को निमंत्रित करूंगा व आए और मंच की शोभा बनाए राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में एक नई

00:31:11:26 परंपरा को चालू किया गया है जहां पर मंत्र यंत्र और तंत्र तीनों पर प्रयोग होकर के वैज्ञानिक रूप से चिकित्सा की जा रही है आप उसके निदेशक हैं तो आप भी आए और मंच की शोभा को बढ़ा इसी पंक्ति के अतिथि स्वागत के क्रम में आगे बढ़ते हुए मैं आवाहन करना चाहूंगा डॉक्टर श्री अशोक रुस्त कीी जी का आप प्राचार्य केपीजी कॉलेज कासगंज से हैं और आपका भी विशेष आशीर्वाद रहता है जैसा आप सभी जानते हैं कि तुलसी संगोष्ठी हुई थी उसमें भी आप पधारे थे और आप कृपा करते रहते हैं तो मैं पुन पुन आपको आमंत्रित करना चाहूंगा आप आए और मंच को शोभायमान करें इसी अगले अतिथियों के क्रम

00:32:11:16 में मैं निमंत्रित करना चाहूंगा डॉक्टर श्री सुरेश शास्त्री जी को यह पूर्व प्रधानाचार्य भारतीय इंटर कॉलेज राई एटा से हैं आप भी विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे हैं निर्णायक मंडल के रूप में पधारे हैं आप आए और मंच को शोभायमान करें हेलो हेलो हेलो

00:33:37:18 मैं मंच पर आसीन अतिथियों से निवेदन करूंगा कि आप आए और भगवान वरा और मां गंगा के समक्ष दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का आरंभ करें वैदिक विद्वान मंत्र पाठ करें हरि ओम चंद्रमा मनसो जात चो सरज

00:34:26:21 अजत रावा मुगने [संगीत] रजता रा काया मा देवा भद प मा जातरा [संगीत] रंग हे रव्या माहे वाहेता जादा ता मेनु शरदो अति देवा जतरास चकरा र संतन नाममा उतरास जतरा पितरो भवंतु

00:35:28:06 [संगीत] मयारी खाता गंतो आद राध माध माता सा पिता सा पुत्रा विश्वे देवा आ पंच जना अमा [संगीत] शांतिर तर शांति पथवी शांति रा शांति रोख दया शांति

00:36:20:27 वनस्पति शत विश्वे देवा ब्रह्मा शांति सर्व शांति शांतिरे वसंति सामा शांति रे जी यतो यता सम हसे ततो नो अभय कुरु सना कुरुप ा

00:36:59:25 भना बासिया आचार्य जी का बहुत-बहुत धन्यवाद अतिथि की श्रंखला में मैं आवाहन करना चाहूंगा माननीय न्यायाधीश श्री पीएन पाराशर जी का आप भूल के लिए क्षमा चाहूंगा आप मंच पर सारस्वत अतिथि का स्थान ग्रहण

00:37:39:07 करें सभी लोग कतल ध्वनि से उनका स्वागत करें हेलो हेलो शास्त्रार्थ श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए बहुत लंबा ना खींचते हुए मैं अनुरोध करूंगा हेलो हेलो मैं श्रीमती चंद्रपति कन्या महाविद्यालय की छात्राओं से कि आप वेद पाठ कर कर वेद पाठ कर मंगलाचरण कर कार्यक्रम का शुभारंभ करें

00:38:27:26 अथ वैदिक मंगलाचरण ओम काया नश त्रा [संगीत] अवता [संगीत] उती सदा वध सा [संगीत] होहाई [संगीत] करा सचाई सय हो

00:39:13:01 हिमा बार तो हो हाई कावा सयो मा ना मा हिमा साधं सा होहाई

00:39:45:13 दृढ़ चदा रजऊ हो हिमा सो होहाई आभी सुना साखी ना पता जरा

00:40:18:16 त्र होहा शता भवा सी हो हेमा यो होहाई इति वैदिक मंगला चरण [संगीत] ब्रह्मचारिणी हों का बहुत-बहुत धन्यवाद बहुत-बहुत आभार जैसा आज देखने को मिलता है कि आज बातें करते हैं कि भाई महिला सशक्तिकरण हो समानता का अधिकार हो यह सारी बातें हो और सनातन धर्म बड़ा पीछे है महिलाओं को अधिकार नहीं देता इस प्रकार की कई सारी भ्रांतियां इस समाज में फैली हुई है जब हम अपनी वैदिक सनातन संस्कृति को देखते हैं तो हम याद करते हैं कि गार्गी और याग वलक जी का जो संवाद है जो शास्त्रार्थ है व उससे सब सुपरिचित है

00:41:34:08 और ऐसी कई विदिया हमारे सनातन संस्कृति में सनातन धर्म में हुई हैं जिन्होंने सनातन संस्कृति को जाना है पढ़ा है समझा है और अपने बच्चों में संस्कारित करके उसको आगे बढ़ाया है मैं अधिक समय नहीं लूंगा इसी शास्त्रार्थ की श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए मैं अनुरोध करूंगा आदरणीय श्री राहुल वशिष्ठ जी से कि वह लौकिक मंगलाचरण करके कार्यक्रम का शुभारंभ करें

00:42:53:01 हेलो सभी को सादर नमन मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुण धवज मंगलम पुंडरीकाक्ष मंगलायतन हरि शांताकारम भुजग शनम पद्मनाभम सुरेशम विश्वाम गगन सदृश मेघ वर्णम शुभांग

00:43:28:07 लक्ष्मीकांतम कमल नयनम योग विर ध्यान गम्यम वंदे विष्णु भव भय हरम सर्व लोकक नाथम बहुत-बहुत

00:44:45:26 धन्यवाद बहुत-बहुत आभार आपने मंगलाचरण कर इस कार्यक्रम का शुभारंभ किया आगे कार्यक्रम की श्रंखला को बढ़ाते हुए हुए मैं कतल ध्वनि से सभी लोग स्वागत करते रहे तीनों लोग मिलकर के आदरणीय को स्मृति चिन्ह भेंट करें मैं मुख्य अतिथि के स्वागत सत्कार के लिए आमंत्रित करूंगा डॉक्टर श्री सुरेंद्र बाबू जी आप आए और हमारे मुख्य अतिथि को माल्यार्पण

00:45:51:07 माल्यार्पण कर स्वागत करें एवं श्री संजय उपाध्याय जी जी और छोटू जी आप आए मुख्य अतिथि का स्वागत एवं सत्कार करें तथा स्मृति चिन्ह भेट करें हा हां जी बक विराज हमारे नगर के यशस्वी अध्यक्ष महोदय हमारे समक्ष उपस्थित है आप भी स्थान स्वीकार करें और तथा सभी कतल ध्वनि से आपका स्वागत

00:46:24:16 करें माला स्मृति चि हा तीनों लोग सम्मिलित हो करर के स्मृति चिन्ह भेट करें

00:46:59:14 मैं अतिथि सत्कार की इसी श्रंखला में निवेदन करना चाहूंगा हमारे सारस्वत अतिथि न्यायाधीश श्री पीएन पाराशर जी के स्वागत के लिए नगरपालिका अध्यक्ष श्री रामेश्वर दयाल महेरे जी आप अतिथि को शॉल उड़ा कर के तथा श्री संतोष मिश्र जी आप दुपट्टा उड़ा कर के तथा सुरेंद्र जी आप पहना करके अतिथि का स्वागत एवं सत्कार करें एवं रवि पाराशर जी आप स्मृति चिन्ह भेट करें सारस्वत अतिथि

00:48:06:14 मा अतिथि सत्कार की श्रृंखला में मैं आदरणीय डॉक्टर शास्त्री श्री कौशलेंद्र दास जी के स्वागत सत्कार के लिए आमंत्रित करना चाहूंगा एडवोकेट शुभम मिश्र जी को व आए अतिथि गढ को शॉल उड़ा कर के एवं नरेश बबिया जी माला पहना करके

00:48:54:06 तथा भैया जी आप स्मृति चिन्ह भेट करके स्वागत सत्कार करें हां हां जी हां जी इसी अतिथि स्वागत की श्रृंखला में मैं डॉक्टर श्री देवेंद्र शर्मा जी के स्वागत के लिए आवाहन करना चाहूंगा सुकांत आरे

00:50:09:19 जी का तथा करण सिंह जी का एवं राजवीर जी का कि व आए शॉल माला दुपट्टा एवं स्मृति चिन्ह भेंट करके अतिथि का स्वागत एवं सत्कार करें देवेंद्र शर्मा जी अतिथि

00:51:24:26 स्वागत श्रृंखला में हम आगे बढ़ते हुए डॉक्टर श्री अशोक रुस्त कीी जी के स्वागत सत्कार एवं सम्मान के लिए आवाहन करना चाहूंगा श्री किशन एडवोकेट श्री किशन जी आप और मुकेश अग्रवाल जी तथा आपके पास में बैठे हुए आप आए एवं रुस्त कीी जी का स्वागत एवं सत्कार

00:52:32:20 सी कतल ध्वनि से स्वागत करेंगे करतल की ध्वनि थोड़ी थोड़ी कम सी लग रही है अभी आगे की श्रंखला में डॉक्टर श्री सुरेश शास्त्री जी के सम्मान सत्कार के लिए मैं निमंत्रित करूंगा एडवोकेट श्री उपेंद्र ताऊ जी उपेंद्र मिश्र जी एवं माधव उपाध्याय जी और कृष्णा कोटवार जी आप आए और अतिथि को स्वागत माला इत्यादि स्मृति चिन्ह भेंट करके अतिथि का स्वागत एवं सत्कार

00:53:22:24 करें जैसा हम देख पा रहे हैं यह इतना बढ़िया मंच इतना बढ़िया पांडाल इतनी अच्छी व्यवस्था सब कुछ हमारे आदरणीय नगरपालिका अध्यक्ष महोदय के कहने से हुई है और आपके निर्देशन में हुई है और आपने इतनी अच्छी व्यवस्था हमें उपलब्ध कराई तो आपको पौना पूर्णन धन्यवाद तो है ही लेकिन स्वागत सत्कार के लिए पुनः मैं आमंत्र करूंगा आप आइए नाम में आपका नाम भैया जी का आइए आइए आप और हेमंत भैया जी आप भी पधारिए ग्रीन भैया आप तीनों आइए और नगर अध्यक्ष जी का माल्यार्पण कर स्वाग स्वागत एवं सत्कार करें तथा स्मृति चिन्ह भी भेट करें

00:54:40:07 बात अब आए हुए अतिथियों का स्वागत तो हो गया अब यह जो शास्त्रार्थ इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए बड़ी बड़ी दूर से चल कर के आए हैं उनके स्वागत सत्कार के लिए मैं समूहावुम जी आप आ जाइए

00:55:55:15 महाकाल जी आप आ जाइए भैया जी आप आ जाइए सभी शास्त्रार्थ यों का माल्यार्पण कर स्वागत और सत्कार करें तथा दुपट्टा भी उड़ा कर के उनका सत्कार करें छोटू भैया दीपांशु आप सभी आ जाइए सभी समूह में सम्मिलित हुए सभी शास्त्रार्थ यों का कतल ध्वनि से उत्साह वर्धन करेंगे आप आए पधारे आपका

00:57:10:25 हृदय से बहुत-बहुत आभार बहुत-बहुत धन्यवाद ऐसे ही विद्युत चर्चा में परिचर्चा में आप सम्मिलित होते रहे अपनी कृपा बनाए रखें और यह जो वैदिक सनातन संस्कृति की परंपरा है उसे जीवित रखें ऐसी मैं प्रार्थना कर ह पुनः शास्त्रार्थ के कार्यक्रम को अग्रिम पंक्ति में ले जाते हुए मैं निवेदन करूंगा अध्यक्ष महोदय जी से क्योंकि इस शास्त्रार्थ के सूत्रधार आप हैं तो आप बहुत अच्छी तरीके से बता सकते हैं कि यह परंपरा कैसे शुरू हुई और कैसे क्या हुआ और उसके बाद शास्त्रार्थ आरंभ करने का निर्देशन और त शास्त्रार्थ के जो विषय हैं उनका वाचन आप कर दीजिएगा और निर्देशन आगे आरंभ करने का वो कीजिएगा

00:57:57:01 केव तुम और मैं के अलावा कोई माला प ठीक है आज के इस राष्ट्रीय शास्त्रार्थ प्रतियोगिता के मुख्य अतिथि राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति आदरणीय प्रोफेसर राम सेवक दुबे जी इस कार्यक्रम के प्रधान सूत्रधार प्रणेता पूर्व न्यायाधीश और इसी क्षेत्र की महा विभूत श्री पीएन आरस पी एन पाराशर सर मंच पर उपस्थित अनेकानेक विद्युत विभूतियां सभागार में उपस्थित निष्णात विदत जन श्रोता गण प्रतिभागी गण

00:59:12:24 यह बड़े सौभाग्य का विषय है कि शूकर क्षेत्र में जो एक प्राचीन पौराणिक तीर्थस्थल है यहां उस विलुप्त ज्ञान परंपरा को फिर से पुनर्जीवित करने का कार्यक्रम जिसे हम शास्त्रार्थ कह रहे हैं आज यहां आयोजित हुआ है य वैदिक ज्ञान परंपरा का अंग है शास्त्रार्थ

00:59:46:28 जितना श्रेष्ठ ज्ञान भारत में सृजित हुआ है वो वादे वायदे जायते तत्व बोध के सिद्धांत पर हुआ है भारत की अकादमिक परंपरा एकांगी नहीं रही है व्यक्ति विशेष जो चाहा आचार्य विशेष जो चाहा वही मत प्रतिपादित कर दिया और दूसरों ने स्वीकार कर लिया ऐसा भारत में नहीं हुआ भारत की जो ज्ञान परंपरा रही है अकादमिक परंपरा रही है वो प्रश्न और जिज्ञासा आधारित रही किसी आचार्य ने किसी विद्वत मनीषी ने वह चाहे दार्शनिक प्रश्न हो चाहे लोक जीवन से संबंधित कोई प्रश्न रहा हो जब भी उस पर कोई अपना मत स्थापित किया है तो उस परे दूसरे विद्वानों ने हमेशा प्रति प्रश्न खड़ा किया है इसीलिए हमारे यहां देखिए तो सट दर्शन सिक्स ब्रांच इंडियन फिलासफी का उदय हुआ फिर इस सट दर्शन में तमाम

01:01:02:21 उपशाखा उपशाखा की उपशाखा एं बनती गई और अनेकानेक मत और संप्रदायों का सृजन हुआ है लेकिन मूल रूप से जो भारत की ज्ञान पिपासा है जो भारतीयों को जोड़ने का जो सनातन तत्व है वैदिक तत्व है जिसका आख्यान प्रतिपादन भेद करते हैं वह सब में सामान्य रहा है कॉमन रहा है तोय हमारी अकादमिक परंपरा शास्त्रार्थ की परंपरा भारतीयों में वैचारिक अकादमिक विखंडन के लिए नहीं है बल्कि जहां कहीं कुछ विभेद है उनमें समन्वय करने की है और उनमें

01:01:56:00 क्या कहा गया है उस सत्य तक जानने की जो परंपरा है उसी को हम शास्त्रार्थ कहते हैं जब हम आचार्य के रूप में विद्वान के रूप में एक मत व्यक्त करते हैं तो उस मत में अगर कहीं कोई कमी है कोई न्यूनता है तो दूसरे विद्वान पूरक के रूप में एक परिमार्जन पथ प्रदर्शक के रूप में आगे आते हैं यही होता रहा यही आज भी यहां होना है जिसे हम सारे लोग देखेंगे ये आप देख रहे हैं चार टीमें बनी हैं इस पर वह विद्युत विभूतियां बैठी हैं जो आज के समय में मैं कहूं तो दुर्लभ है ऐसे शास्त्रों के विद्वान धर्म दर्शन के विद्वान य सामान्य रूप से नहीं मिलने कथावाचक मिलेंगे प्रवचन कर्ता मिलेंगे व्यास पीठों पर बैठे हुए विद्वत जन अपनी शैली में कथा कहने वाले मिलेंगे

01:03:11:03 लेकिन गढ़ कठिन दार्शनिक और अनुत्तरित प्रश्नों का समाधान देने वाले निर्वचन करने वाले विद्वत जन आपको ऐसी सभा में ही मिलेंगे जो शास्त्रार्थ की सभा विद्वानों की सभा है तो हम जितने लोग भी यहां हैं हम आग्रह करते हैं आपसे निवेदन करते हैं कि इन विद्युत मंचों पर बैठे हुए जो शास्त्रार्थ हमारे अप्रतिम विद्वान जन है इनको हम हाथ जोड़ कर के विनम्र भाव से प्रणाम करें कि या उनकी कृपा है कि इस सनातन वैदिक परंपरा को जीवित रखे हुए हैं उन्होंने इन सबसे भी अधिक विलुप्त परंपरा को प्रोत्साहित करना है जीवंत बनाए रखना है कुछ वर्षों पहले मैंने लखनऊ में प्रयोग के स्तर पर डरते डरते इसको शुरू किया था 2019 में लेकिन मैंने देखा कि विद्वानों ने जो मुझको सहयोग दिया और उत्साह वर्धन किया उसी के कारण मैं प्रतिवर्ष इसको कर पाता हूं यहां बैठी कई विभूतियां उसमें भी प्रतिभाग करते हैं और अब तो ऑल इंडिया हो गया है और खुशी यह बताते हुई होती है मुझे

01:04:26:09 कि देश के कई प्रांतों में कई प्राचीन गुरुकु में संस्कृत महाविद्यालयों में और दूसरे गृहस्थ के द्वारा यह कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं तो यह देखकर मुझे बड़ी खुशी होती है कि एक जो प्रयास शुरू किया उसको इतना प्रोत्साहन शूकर क्षेत्र में मिला जज साहब हमारे पीएन पाराशर साहब ने इस परंपरा को इस क्षेत्र में आगे बढ़ाया है जब वह प्रथम बार कर रहे थे तीन साल पहले यहां तो मुझे यह लगा कि इस क्षेत्र में शास्त्रार्थ करने वाले विद्वान सुलभ भी होंगे अगर मैं पड़ोस की भी बात करूं वृंदावन की तो कथाकार और व्यास तो मिलेंगे भागवताचार्य लेकिन क्या शास्त्रार्थ विद्वान मिलेंगे जब उन्होंने प्रथम बार ही कराया तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गई यह क्षेत्र भी एक से एक उद भर शास्त्रार्थ से भरा हुआ है बस एक मंच मिलने की देर थी उसका आप उदाहरण य पंडाल में देखिए कि कोई भी हमारा यह मंच शास्त्रार्थ यों का खाली नहीं है उस पर जगह होती तो शायद कुछ विद्वान और आक उस पर बैठ जाते हैं तो मैं इसके लिए बधाई देता हूं इस विद्युत क्षेत्र को यही वह विभूतियां सुलभ

01:05:41:12 है आपको शायद बहुत दूर भी जाने की आवश्यकता नहीं है यह विद्वानों का क्षेत्र है नरहर स्वामी जी का क्षेत्र है तुलसीदास जी का संबंध यहां से होना बताया जाता है ये भगवान शक्र र का जो क्षेत्र है गंगा जी का पावन तट है गुरुकुल और आश्रम की परंपरा यहां बहुत पुष्प पल्लवित हुई रही होगी यह तो एक अकादमिक स्थान है ही है इसको आगे ले जाने का आपने जो काम किया है आज यहां प्रतिभाग करके मैं आपकी वंदना करता हूं आपकी सराहना करता हूं शास्त्रार्थ कैसे होता है वो अभी शुभम मिश्रा ने विस्तार से बताया है शास्त्रार्थ प्रारंभ करने में पहले ही विलंब हो चुका है मैं और समय ना लेकर के आचार्य शुभम मिश्रा को अनुरोध करता हूं कि व आवे और शास्त्रार्थ की इस प्रक्रिया को आगे बढ़ावे वो प्रश्न कुछ बना है हम लोगों ने परामर्श करके बनाए हैं विषय बनाए हैं जिन पर टीमें बोलेंगे कितनी देर बोलेंगे कैसे बोलना है वह सब व बता चुके हैं तो शुभम मिश्रा जी से अनुरोध है आए और इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाए

01:07:00:26 शास्त्रार्थ को आगे बढ़ाने से पूर्व हमारे जो आदरणीय अतिथि थे वह हमारे मध्य आ चुके हैं तो उनका थोड़ा सा स्वागत सत्कार करने के उपरांत में शास्त्रार्थ आरंभ होगा तब तक मैं शास्त्रार्थ के जो विषय हैं उनका वाचन कर देता हूं या शास्त्रार्थ के विषय यद्यपि पूर्व सभी के पास आ चुके थे सभी विद्वानों के पास जो यहां पर सहभागी हुए हैं उन सबके पास थे हमारे अतिथि हमारे मध्य पधार रहे हैं सभी लोग करतल ध्वनि से और उनका स्वागत करेंगे सत्कार करेंगे खड़े

01:07:46:27 हो आप वर्तमान में हमारे जिला के न्यायाधीश हैं जिला न्यायाधीश है तो सभी लोग खड़े होकर के तथा करतल के साथ में आपका स्वागत एवं सम्मान करेंगे शांत निशांत

01:08:59:29 [संगीत] ब्रहमान सात जोनी मा मैं आदरणीय पीएन पाराशर जी से अनुरोध करूंगा व सर के विषय में दो शब्द निवेदित

01:09:36:12 करें सबसे पहले शुक क्षेत्र की पावन भूमि को प्रणाम करता हूं यह पौराणिक तीर्थ जिसने आज के इस प्रोग्राम को जन्म दिया है बहुत पुराना है और यहां पर शास्त्रार्थ की और विद्वानों की चर्चाएं ऐतिहासिक है मैं अधिक नहीं कहना चाहता हूं इस अवसर पर क्योंकि कार्यक्रम पहले से ही बहुत विलंब हो चुका है आप सभी प्रतिभागियों को नमन करता हूं मंच पर आसीन जितने भी विद्वत जन अतिथि गण सम्मानित अतिथि गण है सभी को नमन और प्रणाम करता हूं यह सौभाग्य का विषय हम सभी का शूक क्षेत्र की पावन भूमि में पहली बार ऐसा विद्युत जनों का मेला इस मेले में लौकिक मेले में हो रहा है य विद्वानों का मेला पहली बार है एक ऐतिहासिक ऐतिहासिक क्षण है महान संगम है विद्वानों का और विद्वान भी पूरे भारतवर्ष से आए हुए हैं अनेकों विधाओं के

01:10:51:27 अनेकों प्रकार की विधियों के वेता है वेद शास्त्रों के पुराण के सबके वता है हमारे परम आदरणीय श्री एसएस उपाध्याय जी ने जो कीर्ति माने स्थापित किया है और इस शास्त्रीय परंपरा को शास्त्रार्थ परंपरा को जितना उन्होंने और ज्यादा आगे जीवित करके पुनर्जीवित करके प्रचारित प्रसारित किया है हम सब में एक भावना उत्पन्न कर द एक विचार उत्पन्न कर दिया है कि हमारे शास्त्र हमारे पुराण हमारे वेद क्या है और उन वेदों में भक्ति और योग साधना ज्ञान मार्ग से संबंधित क्या-क्या पौराणिक इतिहास है उसके परिपेक्ष में विद्वानों के विभिन्न मत और विभिन्न बाद यहां

01:11:44:10 परे जनपद के परम श्रद्धेय जनपद न्यायाधीश श्री रामेश्वर जी वो यहां हमारे अनौपचारिक आम पर निवेदन पर आए हैं आशीर्वाद देने के लिए जनपद न्यायाधीश महोदय ज साब जनपद न्यायाधीश महोदय हम सब आभारी हैं आपके इस हमारे निवेदन को स्वीकार करके आशीर्वाद देने के लिए आपके य पधारने के लिए क्योंकि आपकी रुचि भी आध्यात्म में है और आपने अनौपचारिक रूप से हमारे निवेदन को स्वीकार किया मेरी और उपाध्याय जी की दोनों की हम दोनों न्याय क्षेत्र से हैं और जस साब के बारे में जानते भी हैं तो इस करके हमारे कार्यक्रम में आयोजन में अपने पधार करके आशीर्वाद देने के लिए आए हैं बहुत-बहुत आभार प्रदर्शित करते हैं हम सभी की ओर से विद्वानों की ओर से और इस मंच की ओर से आयोजकों की ओर से बहुत-बहुत धन्यवाद य और खुशी की बात है कि जज साहब अपने पूरे परिवार के साथ अपने जी पिताजी के साथ अपने भाभी जी की मां

01:12:59:12 के साथ सब लोग आप आए हैं आपके पिताजी को मैं नमन करता हूं प्रणाम करता हूं और मैं आपके जो हमारे आयोजक है मुख्या आयोजक जी शुभम जी आचार्य शम जी से निरोध करता हूं कि पिताजी का सम्मान पहले करें पिताजी का समान बैठे हुए सामने और साथ ही साथ साथ ही साथ उनकी माता जी सास जी आई उनके तो दोनों पक्ष हैं भाभी जी का भी सम्मान व वही बैठे बैठे करते कृपा करके हमारे उपाध्याय जी के बारे में हम कितना बोलेंगे बहुत कम होगा आज हमें सुनना है उनको और और विद्वानों को इसलिए दूर दूर से मेरठ से कहां कहा से लोग आए हुए हैं तो मैं अधिक समय नहीं लेना चाहता संकट मोचन धाम की पावन भूमि में यह कार्यक्रम हो चुका है दो वर्ष इस साल फिर होगा और वहीं से यह धारा प्रवाहित की थी श्री उपाध्याय जी ने पिताजी को प्रणाम हम सब की ओर से नमन और उनका सम्मान और साथ ही साथ शल उड़ा कर के और साथ ही साथ माता जी का परम आदरणीय भाभी जी

01:14:20:15 का बहुत ही सुंदर माननीय जनपद न्यायाधीश महोदय की धर्म पत्नी भी आई है हम बहुत बहुत आभारी है इस कार्यक्रम में उन्होंने पधार करर बहुत बड़ी कृपा की है उनका सम्मान ये हमारे सुकांत आरया जी जो आर्य समाज के पक्ष को प्रस्तुत करें सुकांत तारिया जी की धर्म पत्नी है और उनको प्रणाम करता हूं मैं उनकी विदु होता को

01:15:07:07 भी अच्छा हमारे कुलपति महोदय तो आज के मुख्य अतिथि है और कुलपति महोदय की धर्म पत्नी भी आई हुई है उनको देवी जी को प्रणाम करें और आप सम्मान कर कुलपति साहब की पत्नी धर्म पत्नी को मैं प्रणाम करता हूं और उनका सम्मान शुभम जी करें और सुकांत जी की पत्नी जो स्वयं इस कार्यक्रम में अग्रणी भूमिका निभा रही है शुभम जी सुकांत जी की पत्नी को भी हमारी परम आदरणीय भाभी जी को जो हमेशा हां हमारे न्यायपालिका में ही नहीं पूरे समाज में विद्युत समाज में जो उन्होंने उपाध्याय जी ने पुस्तक लिख कर के कार्य किया है इतना बड़ा योगदान मैं नहीं समझता न्यायाधीश छोड़िए किसी भी विद्वान का आज के युग में हुआ हो उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी वैसे तो उन्होंने पुस्तक गवर्नर गाइड लिखी यूनिवर्सिटी के लिए लिखी एक पुस्तक अभी थोड़े दिन पहले अयोध्या में जिसका

01:16:23:00 वो हुआ था विमोचन ग्लोबल राम तो ग्लोबल राम पुस्तक बहुत ही महान ग्रंथ है उस ग्रंथ को वो प्रस्तुत करें उपाध्याय जी बहुत बड़ा आपसे निवेदन है कि हमारे आज के इस कार्यक्रम का शुभारंभ कराने वाले पधारे जनपद न्यायाधीश महोदय श्री रामेश्वर जी को आप ग्लोबल राम पुस्तक भेंट करने का कृपा मैं संचालक नहीं हूं बीच में ही बोल रहा हूं उल्टी सीधी बातें बोल जाता हूं क्षमा करें संचालक तो वह है शुभम जी जो आयोजक भी है तो पुन पुन आप सभी को नमन करता हूं और जनपद न्यायाधीश महोदय से यह आकांक्षा है प्रार्थना है ज साब से प्राथना

01:17:21:02 है ये उपाध्याय जी अपनी पुस्तक ग्लोबल राम प्रस्तुत का भेंट कर रहे हैं हमारे जनपद न्यायाधीश महोदय को अब मैं श्री ज साब पारा सर जी से कहूंगा कि वो हमारी स सब की ओर से हमारे जनपद न्यायाधीश का साल उड़ाकर स्वागत करने का कष्ट करें श्री पीएन पारा सर जी हमारे जिला जज साहब

01:18:18:27 का कार्यक्रम में विलंब भी हो रहा है और जनपद न्यायाधीश महोदय ने अपना आशीर्वाद दे दिया इसलिए अब आप कार्यक्रम जैसे शुरू कर रहे थे शुभम जी आगे जारी र शास्त्रार्थ के कार्यक्रम में अवलंबन कोई देर ना करते हुए मैं शास्त्रार्थ के विषय जो सभी के पास आ मैं शास्त्रार्थ के विषयों का वाचन कर देता हूं और जो जो उस उस टीम के पास है पहला विषय है वेदो खिलो धर्म मूलम यह प्रथम विषय है और यह विषय हमारे डॉक्टर श्री ज्ञानेंद्र शर्मा जी के पास आपका यह विषय है हमारी तृतीय टीम के पास आपने सुनिश्चित किया हुआ

01:19:34:03 है उसके उपरांत में विषय और भी है लेकिन एक और विषय है पांच नंबर साकार और निराकार ब्रह्म तथा उनसे संबंधित उपासना पद्धतियों को शास्त्री परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए यह प्रथम टीम के पास है कि द्वितीय टीम के पास है प्रथम टीम के पास ये है ठीक उसके उपरांत में अ सात नंबर जो प्रश्न है सनातन धर्म एवं संस्कृति के मूल तत्व क्या है इसके हो रहे क्षरण को किस प्रकार रोक ठीक और भारतीय ग्रंथों में आए क्षेप कों का भारतीय धर्म संस्कृति पर दुष्प्रभाव एवं उनके निवारण के उपाय बताइए यह टीम नंबर दो पर है ठीक है सभी को अपने अपने विषय

01:20:29:21 हैं विषय सभी के पास थे सभी को पता है शास्त्रार्थ आर अनुमति चाहूंगा शास्त्रार्थ आरंभ करने की उससे पहले लॉटरी के माध्यम से वाचन का निर्णय होगा तो मैं सभी के सभी सभी एक एक सदस्य आ जाइए आ जा समूह के एक एक सदस्य आ जाए और एक एक पर्ची उठा ले आपके समूह से किसी एक को भेज

01:21:14:27 दीजिए निर्णायक मंडल में हमारे आदरणीय श्री एसएस उपाध्याय जी आदरणीय कुलपति श्री रामसेवक दुबे जी आदरणीय कौशलेंद्र कौशलेंद्र जी आदरणीय देवेंद्र जी आदरणीय अशोक रुस्त कीी जी और आदरणीय सुरेश शास्त्री जी हैं तो आपके सामने पेन और डायरी एक रखी रखी रखी हुई है उसे ले लीजिएगा कौन से समूह का कौन सा नंबर आया है आप एक बार बताएंगे आपका

01:21:57:15 टीम क्रमांक प्रथम है उसका दूसरा नंबर आया है टीम क्रमांक तृतीय का पहला नंबर आया है और टीम क्रमांक द्वितीय का तीसरा नंबर आया है और टीम क्रमांक चार का चौथा ही नंबर आया है सबसे अंतिम का तो इसी क्रम में बोलेंगे आपके पास विषय है आपके विषय जो निर्धारित किए हुए हैं दिए हुए हैं आपका विषय है टीम क्रमांक तृतीय का वेदो खिलो धर्म मूलम जो अभी टीम बोलने जा रही है वो वेदो खिलो धर्म मूलम पर बोलने जा रही है टीम क्रमांक तीन आरंभ कीजिए

01:22:46:04 गुरुजी जय जय देवी चराचर सारे कुछ योग शोभित मुक्ता हारे वीणा पुस्तक रंजित हस्ते भगवते भगवती देवी नमस्ते सरस्वती महाभागे विद्य कमल लोचने विश्वरूप [संगीत] विशालाक्षी विद्याम देहि नमो

01:23:26:22 वाग देव विद महे काम राजा धीमहि तन्न सरस्वती प्रचोदयात परमा आदरणीय सभापति यति वंद भक्ति वृंद शोत्र वंद हम जो शास्त्रार्थ है एक व्यक्ति पूर्व पक्ष करता है दूसरा व्यक्ति उत्तर पक्ष करता है इसका नाम शास्त्रार्थ है हम इसको शास्त्रार्थ संज्ञा के साथ साथ ध्यान से सुने बाद संवाद भी दे सकते हैं वादे वादे जात तत्व बोधा दद और संवाद में तत्व का बोध होता है और अनादि काल से गुरुजी निवेदन करूंगा वेदो खिलो धर्म ज्ञान यज और कर्म यज्ञ में जो है आचार्य और यजमान जो है समान

01:24:42:06 होते हैं य ज्ञान यज्ञ है और इसमें जो हमें विषय मिला है वेदो खिलो धर्म भलम धर्म शीले तम आचार साधु ना आत्मस तुष्ट रे बच वेद खलो धर्म बलम देखो जो शास्त्रार्थ है वह शास्त्र आव निथम जो शास्त्रार्थ होता है व तत्व के निर्णय के लिए होता है न कश्या नहीं परा भवार्थ किसी के पराभव के लिए नहीं होता है शास्त्रम शस्ता करोति जो शास्त्र है व शासन करता है और शस्त्र ब जो शास्त्र है वही जो धर्म की रक्षा करता है तो हमारा शास्त्र कौन है वेद तो वेदो खिलो धर्म मूलम इस पर थोड़ा ध्यान देना है लोगों को बहुत भ्रांतियां है सनातन धर्म का जो मूल है वह वेद है इसको ध्यान रखना है जो सनातन धर्म का जो मूल है वह अखिल वेद है अखिल शब्द का य तात्पर्य है विधि मंत्र और अर्थवा तीनों का

01:25:57:07 जब एक होगा जब जो वेद के अर्थ की प्रतीति होगी पुराण सर्व शास्त्रम प्रथम बस्तम अनंत यो वेदा तस्य विनिता पुराण सर्व शास्त्रम पुराण और वेद दोनों का सामान काल में ही प्रकाशन हुआ प्रथम ब्रह्मणा स्तम ब्रह्मा जी ने पहले पुराण का स्मरण किया है और इसके बाद वेद का श्रमण किया है अब अनंत तयो हमारे वैदिक है यह कहेंगे य कैसी बात क दी पुराण के बाद वेद जबक वेद ही सबका मूल है तो अनंतर की जो व्याख्या है न विद्यते अंतरम यत्र अर्थात पुराण वेद में कोई अंतर नहीं है दोनों साथ साथ ही प्रकट हुए हैं तो दोनों साथ साथ प्रकट करने की आवश्यकता पड़ी कि बिना पुराण के बिना सपद ब्राहमण के बिना धर्मशास्त्र के कोई वेद का निर्णय नहीं कर सकता वेद के निर्णय में कोई प्रमाण

01:27:12:09 है तो पुराण ही है वेदो खिलो धर्म मूलम प्रत्यक्ष यतु पाय लते न विदं वेदन वेदस तस्मा वेदत जो प्रत्यक्ष के द्वारा अनुमान के द्वारा जो बात सिद्ध ना हो सके वह बात जो है वेद के द्वारा सिद्ध होती है त असमाद वेदस वेद वेता का मतलब अपूर्व बोता जो वेद है उसका नाम है अपूर्व बोध अपूर्व बोता का तात्पर्य जो किसी से प्रमाण ना हो सके जैसे चक्षु है व किसम प्रमाण है देखने में प्रमाण है चक्षु का कार्य स्रोत नहीं कर सकती सूत्र का कार्य ग्रहण नहीं कर सकता से इंद्रिया अपने अपने में स्वतः प्रमाण है उसी प्रकार जो वेद है वह स्वतः प्रमाण है परत प्रमाण नहीं है यदि वेद को प्रमाण नहीं है यदि वेद को किसी के द्वारा प्रमाणित कर दिया जाएगा तो वेद अपर सेय नहीं रहेगा वेद अपश

01:28:27:13 है जो लोग वेद को पौष पुरुष के द्वारा सिद्ध करना यंते प्राप्य लभते इति वेद र धर्मार्थ ही अर्थात विद्यंत जिसके द्वारा जाना जाए जिसके द्वारा प्राप्त किया जाए उसका नाम जो है वेद है विगरी ने से बना लो विदरी लावे से बना लो विध विचारण से बना लो और वि सत्ता सत्ता याम से वेद बना लो अंतिम में जो हमारा ऋग्वेद उसके सा भाष में जो है व्याख्या की टयो हो प्रद

01:29:24:07 और अनिष्ट का जो प्रतिपादन करने में सामर्थ्य भान है उसका नाम वेद है वेद थ वेद इट क्या चीज है क्यों जो वेद है वो प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों मार्ग में है जो सकाम लोग है वो प्रवृत्ति मार के उसम है जो निष्काम लोग होते हैं वो इससे केवल मोक्ष की प्राप्ति चाहते हैं और जो कामी लोग होते हैं वो इससे अपने धन धान समृद्धि की इच्छा चाहते हैं तोय लोक परलोक दोनों सिद्ध करने वाला कौन है वेद है देख इष्ट क्या चीज है यदि हमें संतान की प्राप्ति की इच्छा है तो वेदो के द्वारा आप संतान गोपाल मंत्र का जब कराएंगे तो संतान होगी ही आपके कन्या के विवाह में अर्चन आ रही है कन्या का विवाह नहीं हो रहा तो नी महा माय का आप वेदो के द्वारा जप कर आचार जी वक्ता आचार्य जी विषय मैं फिर आपके ध्यान में ला रहा हूं वेदो अखिलो धर्म मूलम धर्म मूलम आपसे

01:30:39:09 अनुरोध है विषय पर अपने को केंद्रित करें केंद्रित करें धर्म क्या है उसकी परिभाषा क्या है उसका विस्तार क्या है वह बताएं और उस धर्म का मूल वेद कैसे है यह बताए कृपया हा ऋगवेद का जो भाष्य उसकी व्याख्या है व फिर भी चलो आपका आदेश तो धर्म और मत इसम मैं कहता हूं धर्म सनातन धर्म क्या है और मत क्या है देखि सनातन जो धर्म है सर्वो भोग सुलभ निगम प्रतिष्ठा

01:31:24:00 धर्म धर्म धर्मम सनातन मद विदास धर्मा सर्वो भोग सुलभ संसार में स कामना है उसको देने वाला कौन सनातन धर्म है सर्वो उपकार निरत और सभी के उपकार की भावना रखने वाला कौन है सनातन धर्म है सर्वो का रतो मुनि भी प्रत अन मत मजहब जो होंगे व मुनियों के द्वारा प्रणित नहीं है सनातन धर्म जो ऋषि महर्षि के द्वारा प्रणित है कोयो भूम बल इस संसार में भूमंडल में सनातन धर्म के अलावा ऐसा कोई धर्म नहीं है जो दूसरे का कल्याण कर सके को भूम धर्म सग धर्मम सनातन मृते विधा सुधर्म

01:32:24:18 अर्थात सनातन ते माने बिना सनातन धर्म के बिना संसार में कोई ऐसा धर्म नहीं जो कल्याण कर सके और अस्तित्व आत्म विषयम यद लोक मध्य ि सनातन धर्म का अस्तित्व रहेगा तो भारत का अस्तित्व रहेगा सनातन धर्म का अ भारत का अस्तित्व नहीं र शोन शो अस् अब सकल सिस्टम व संसार में सबका कल्याण करता है अस्तित्व में विना तदा की मस्ती यदि हमारा सनातन धर्म नहीं रहा तो संसार में किसी का अस्तित्व नहीं रहना और अंतिम में कह रहे कि जो है कि सर्वम विनट जगत जगत सर्वम विन संसार य सनातन धर्म के अनुसार नहीं चलेगा तो इस भूमंडल पर जो है पृथ्वी का भी रहना कठिन है तो हम आज लोग सब लोग प्रतिज्ञा करते हैं बिल सद भूते भारते धर्म भावा इस भारतवर्ष में घर घर में जो सनातन धर्म बले लस भू भारते धर्म बाबा प्रजन भूते भारतीय प्रताप और घर घर में हमारा

01:33:39:26 विश्व भारतीयों का प्रताप भरे और प्र बंदो छित धर्म चर्चा भारतीयों के प्रताप के साथ साथ में जो भारतीयों का प्रताप है उसके साथ साथ में और क्या प्रत बंद धर्म चर्चा घर घर में आध्यात्मिक चर्चा भी पड़े और निप बाधा पामर सम गतम जो मनुष्य के द्वारा मन माने ढंग से जो मत मज संप्रदाय चलाए हैं उन मूर्खों का जो मत मजहब है व विट हो नि बाधा पामर संतम अब यह मत किसको कहते हैं तो मस्त का मत का लक्षण भी सूच धर्म केवल सनातन है इसके अलावा कोई धर्म शब्द का प्रयोग करता है उसको मत शब्द का प्रयोग करना चाहिए धर्म शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता नामाक्षर मते यशु लोके मतान किता मतान नाम महे शयो धर्म सनातन नाम देहा नामरा लसत मते जिसके आगे नाम लग जाए जिसके आगे नाम लग जाए नामा मते यशु मत

01:34:55:03 माना जाएगा आप ये समझिए जैन है बौद्ध ईसाई है इनके आगे नाम लगा है धर्म जो धर्म शब्द ना होकर मत शब्द का प्रयोग करना चाहिए तो बोले धर्म कौन है कुम नाम महे जिस पुरुष का नाम नहीं लगेगा वो धर्म होगा आप ये कहोगे सनातन धर्म 13 मिनट आपके पूरे हो चुके दो मिनट विशेष विशेषण भाव जहा होगा वहां मत माना जाएगा जैसे जैन धर्म है बौद्ध धर्म है जहा विशेष विशेषण भाव नहीं होगा वह धर्म माना जाएगा तो आप ये कह सकते हैं सनातन विशेषण धर्म विशेष है तो बोले कि नहीं पर्याय वाचक नित धर्मम केच सनातन पदम वृषा सनातन का जो पर्याय वाचक है वे धर्म शब्द है सनातन धर्म में कोई अलग अलग नहीं है घटो घटा का साद बध नहीं होता सब विद्वान बने हैं त्य घटा का साद बध नहीं होता इसलिए जो है पर्याय वाचक तया निद धर्मम केच सनातन पदेन बदाम बरिष्ठ जो पर्याय वाचक है सनातन धर्म दोनों पर्याय वाचक है विशेष विशेषण भाव नहीं है तो धर्म जो केवल सनातन के आगे ही लग सकता है और किसी के आगे धर्म

01:36:10:10 शब्द नहीं लग सकता शोभन शोभन अब ये कहिए इसमें प्रमाण क्या है तो इसमें सनातन बव आरता ये अथर वेद का प्रमाण है वेदो खलो धर मूलम सबके मूल में कोन वेद है जो वेद प्रमाणित करेगा वो धर्म माना जाएगा जिसको वेद प्रमाणित नहीं वो धर्म नहीं माना जाएगा तो सनातन में अथर्ववेद में कहा है कि सनातन धर्म को धर्म का पर्यायवाची माना है सनातन जो धर्म सबसे विवत है हमारे में अथर वेद भी मूल है और मत मजत संप्रदाय में कोई वेद मूल नहीं हो सकता समय आपका पूरा हो गया बहुत सुंदर बहुत सुंदर शोभन शोभन अब प्रश्न उत्तर की श्रंखला है जिस भी समूह जिस भी समूह

01:37:04:07 को जिस भी समूह को प्रश्न है वो प्रश्न कर और शास्त्रार्थ का आनंद ले संचालक जी प्रश्न था वेदो अखिलम धर्म मूलम निर्णायक मंडल की अपेक्षा थी कि वक्ता सबसे पहले यह बताएंगे कि धर्म क्या है और फिर उस धर्म का स्रोत वेद कैसे वक्ता ने अपने तरीके से अपनी बात रखी उनको साधुवाद अथर्व वेद का एक मंत्र उधत करता हूं कणाद ऋस उसके प्रवर्तक है प्रणेता है तो कहते हैं कि धर्म क्या है प्रथम परिभाषा मिलती है अथर्व वेद से यतो अभुदय निय सिद्धि स धर्म धर्म की परिभाषा है कि जिस कार्य व्यवहार चिंतन आदि से लोक परलोक दोनों में कल्याण हो वेल बीइंग हो उसे ही धर्म कहते हैं वह आचरण वह व्यवहार वह चिंतन वह सोच वह कृत्य जिससे प्राणी का स्वयं का भी

01:38:19:28 और इस ब्रह्मांड का भी जगत का भी कल्याण हो उस कृत्य उस आचार व्यवहार और विचार को क्या कहते हैं धर्म तो जिससे सब प्रकार से कल्याण ही कल्याण हो वही धर्म है तो य यतो अभद निश सिद्धि स धर्मा अथर्व वेद वेद ही स्रोत है इस वाक्य को कहने वाला कणाद ऋषि इसको बताते हैं फिर आगे कहते हैं धर्मे धार लोक यह जगत ही ब्रह्मा धारण किया हुआ है निमित है चल रहा है किसके द्वारा धर्म के द्वारा तो धर्म वह नियमन है वह रेगुलेशन है जिससे जीवन चलता है जगत चलता है य भगवान की बनाई हुई व्यवस्था जो है यही धर्म है इसी को सरली कृत तरीके से आगे जाकर के महाराज मन ने मनुष मति में बताया और इसको थोड़ा सरल किया उन्होंने तिमा सचंद्र निग्रह र विद्या सत्य धर्म लक्षण धर्म के द लक्षण होते हैं यह चीज जहां दिखे आप जान लीजिए वही धर्म

01:39:35:02 है क्या क्या चीज ति सद वृत्तियों को सद्गुणों को धारण करने की क्षमता अी में आप कहना चाहे तो कैलिबर टू रिटेन वर्चू श्रेष्ठतम जो आचार विचार है गुण है उनको धारण करने की क्षमता का सतत विकास करते रहना धर्म का पालन करना होता है तो ति क्षमा बहुत शक्तिमान हो जाइए ज्ञान में संपदा में और किसी भी प्रकार के ऐश्वर्य में वैभव में तो क्षमाशील हो जाइए विनम्र हो जाइए ति

01:40:10:14 क्षमा इसमें कुछ प्रॉब्लम ना हो इसको ये जितने दुपति है गलत विचार सोच है जीवन की इसको दमन करने की सामर्थ क्षमता का विकास करना धर्म का लक्षण दु प्रवृत्तियों को दमित करने की शक्ति को विकसित करना यानी धर्म का पालन करना है ति क्षमा दम अ परनिंदा चुली इत्यादि यह सब नहीं करना चाहिए यह धर्म का लक्षण हैमा मस्ते सचम इंद्री निग्रह सच पवित्रता मन वचन कर्म से पवित्र रहना और इंद्र निग्रह इंद्रियों के जो विषय है पांच कर्म इंद्रिया पांच ज्ञ इंद्रिया इन पर एक रीजनेबल रिस्ट्रिक्शन रिस्ट्रेंट एक्सरसाइज करना एक संतुलित रूप से इनको इन पर नियंत्रण रखना यह भी धर्म का लक्षण है फिर कहते हैं धीर विद्या बुद्धि का विकास करना और एकिशन ऑफ नॉलेज विद्यार्जन करना बुद्धि का विकास करना विद्यार्जन करना ज्ञानार्जन करना तोय हो गया धीर विद्या सत्यम अक्रधा सत्य का पालन करना और क्रोध के विपरीत यानी सौम्य अवस्था में रहना शांत और

01:41:25:20 सौम्य रहना अच्छे स्वभाव का होना यह 10 चीजें जो है ये धर्म के लक्षण है इस पर अगर और विद्वानों को प्रश्न पूछना हो तो पूछ हा प्रश्न इत्यादि प्रश्न उत्तर आपने व्याख्या दी धर्म के विषय में जो वो था बहुत सुंदर व्याख्या आपने दी हम कतल ध्वनि से आपका स्वागत करेंगे और प्रश्न जो भी है तो प्रश्न पूछे ओम हां जी मैं अध्यक्ष जी से अनुमति चाहूंगा प्रश्न पूछ लू आचार्य परवर आपसे निवेदन है कि आप वेदो अखिलम धर्म मूल यह किस शास्त्र से लिया गया है यह मनुस्मृति से ठीक है सही है और किसी को कोई प्रश्न किसी टीम को और कोई समूह प्रश्न करना चाहेगा आचार्य प्रवर अभी आपने दो न्यायाधीश पूर्व और वर्तमान में जिला न्यायाधीश और सबसे परम सत्ता परम पिता परमात्मा को मानते हुए मैं वाक्य को प्रश्नों के रूप में आपको उत्तर देने की कृपा करेंगे आपने पुराणों को और वेदों को एक समय उत्पत्ति

01:42:40:22 बताई क्या यह सही है और उसका प्रमाण देने की कृपा करें ये आप दोबारा फिर दोहरा सकता हूं प्रणाम स शास्त्र नाम वेद [संगीत] ब्रह्मणा क्या संदेह आपको ये बताओ आप अनंतर की व्याख्या बताइए क्या अन की विग्रह बताओ पहले ये कहां का श्लोक है नहीं मैं प्रश्न कर रहा हूं आप मेरे लिए प्रश्न कर रहे हैं अरे आप प्रश्न इसलिए कर रहे है कि उत्तर को समझे नहीं नहीं मैं इसलिए समझा नहीं हूं इसलिए तो पूछ रहा हूं आपने क्या कहा आप अपनी बात को हिंदी में समझा दीजिए क्या मतलब है पुराण सर्व शास्त्रम प्रथमं भ्रम स्मत ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की उत्पत्ति की आप ये कहां से उधित है वो भी बताइएगा हां ये ये सब स्मृतियों से है स्मृतियों में भी है और महाभारत में भी है स्मृतियों में भी है महाभारत में भी है भी से काम नहीं चलेगा मर्यादित मर्यादित होकर ही बात करें श्रीमान जी भी नहीं नहीं नहीं भी नहीं कह रहे एक ब

01:43:57:04 मैं फिर हस्तक्षेप करूंगा पहले सुनिए शास्त्रार्थ की तीन व्यवस्थाएं हैं प्रथम व्यवस्था है आदर्श आइडियल डिबेट शास्त्रार्थ माने अकडम डिबेट अकादमिक प्रतिस्पर्धा वक्ता आइडियल डिबेट करेगा जो उनको पता था व उन्होंने बता दिया उसे कोई को प्रश्न पूछना है एक बार प्रश्न किया जा सकता है वो बता पाए नहीं बता पाए अब दोबारा उनसे प्रश्न उसी विषय पर नहीं होगा आपके प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला आप शांत हो जाए एक बात कहना चाहते हैं हा शास्त्र में एकार और अपकार दो होते हैं जिसमें भी और ही का प्रयोग होता है यदि भी है तो इसमें आपत्ति क्या है

01:44:47:27 है ही निचयामूरा है हमें संदेह है तो संदेह दूर करें हमारा य निर्णायक बंध निर्णायक मंडल के लोग बताएंगे के भी संदेहास्पद होता है क्या यह निर्णय मंडल करेगा इस प्रश्न को यही समाप्त करते हैं निर्णय मंडल इसका सुनिश्चित करेगा क्या हुआ आगे कोई प्रश्न हो तो पूछ सकते हैं एक वस्तु वेद में भी है पुराण में भी है व धर्म शास्त्र में भी है तो भी क्या अनिश्चय हो जाएगा कोई मतलब

01:45:25:09 फिर सुनिए मुझे इसलिए हस्तक्षेप करना पड़ रहा है कि कुछ विधाएं हमें स्पष्ट करनी है कि प्रश्न कैसे हो उत्तर कैसे आवे शस्त्राणि बहवा ऋषियो विभिन्न न को ऋषि यस्य मतम प्रमाणम यद सार भूतम तद उपास नियम बहुत सारे हमारे शास्त्र है बहुत सारे ऋषि हैं उसके प्रवर्तक है विचारों के एक का भी मत अंतिम नहीं है इसलिए जो विदत सभा स्वीकार कर ले लोकमानस स्वीकार कर ले वही अंतिम सत्य है अब य मंच भी यह कहने की स्थिति में नहीं है कि यह जनमानस जो सुन रहा है इस विमर्श को वह इसको कैसे स्वीकार करेगा तो मैंने यह उधत किया कि आचार्यों ने ही यह कहा है कि बहुत शास्त्र है तरह तरह की प्रतिकूल बातें लिखी है और मत अलग अलग है ऋषियों केलिए आप मान ले प्रश्न नंबर दो पर जाइए मैं संचालक महोदय से ही प्रश्न करता हूं वो षि कर सते आप नहीं कर सकते ियो को प्रमाणिक कैसे कह रहे हैं ऋषि का कोई सूत्र भी अपमा नहीं है किसी ऋषि का सूत्र प्रमाणिक नहीं

01:46:40:14 पुनः यह जो बात है ना मैंने पहले आपको कह दिया है कि आप स निर्णायक मंडल में प्रश्न नहीं कर सकते आपको सामने वाली टीम से प्रश्न करना है वो कर लीजिए आप स्पष्ट रूप से आ कोई प्रश्न नहीं है तो फिर आगे बढ़ते हैं आगे क्रम संख्या टीम किसका था दो नंबर पर किसका है टीम नंबर तीन का है अच्छा प्रथम का टीम नंबर प्रथम प्रश्न संख्या आपकी पाच समूह नंबर वन समूह क्रमांक एक विषय संख्या पाच साकार और सभी सुनेंगे इसको और आगे ध्यान से इसको सुनेंगे क्योंकि विषय ऐसा है बहुत जरूर और बहुत विवादास्पद भी है तो इसको सुनने में श्रवण करने में आनंद भी आएगा साकार और निराकार ब्रह्म तथा उनसे संबंधित उपासना पद्धतियों को शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट कीजिए समय हो रहा है करेक्ट दो बजे आरंभ कीजिए ओम स परगा चक्रम कायणना शुद्धम अधम कबीर मनीष परभू स्वयं यात शाश्वती

01:47:57:21 समाय ओम शांति शांति शांति आदरणीय अध्यक्ष महोदय सभी विद्वत मंडल आज के मुख्य अतिथि संचालक महोदय और सभी टीम में उपस्थित आचार्य गणों और हमारे श्रोता गण जो मंच के प्राण होते हैं आप सभी को नमन करता हुआ मैं अपने प्रश्न की ओर बढ़ता हूं विषय है साकार और निराकार मैंने यजुर्वेद के 4 अध्याय का य मंत्र रि आपके सामने पढी है मान्यवर बात मत करिए बात नहीं आप ऐसे आप नहीं बोल सकते आप अपने विषय का प्रतिपादन कीजिए चलिए कोई बात करे कुछ आपको उ ध्यान रखिए इस बात का हम ध्यान रखेंगे आप अपना विय प्र तो यहां विषय आया है कि यजुर्वेद के 40 अध्याय का आठवा य मंत्र है इस मंत्र में य बताया है स प्रगा यानी के वह परमात्मा इस संसार को व्यापत व्यापक भाव से घेरे हुए है और बीज शुक्र बीज रूप में हर जगह विद्यमान है अकाम बिना शरीर वाला है असना

01:49:13:04 विरम नस नाड़ियों से रहित है रोगों आदि से रहित है और शुद्धम शुद्ध बुद्ध है पवित्र है रोग पाप उसे छू नहीं सकता कवि क्रांति दर्शी है मनीषी विद्वान है और सब प्रकार से ठीक प्रकार से इस संसार को बना करके रच करके चला रहा है यह उसकी नियमन में व्यवस्था है कोई भी परमात्मा का कार्य बिना नियम के नहीं है अब यहां विषय आता है देखिए यह वेद का मंत्र कहता है और वेद से सनातन कोई सत विद्या संसार में नहीं है अभी पुराणों की चर्चा भी आई सबसे पहले आवि भाव वेद का हुआ और वेद सदा रहता है वेद का ज्ञान सदा रहता है वह अनित्य है और उसमें उस प्रकार से यानी कि यहां साकार का विषय निराकार का चल रहा है उपासना पद्धति का विषय है तो मैं यहां कहना चाहता हूं कि परमपिता परमात्मा का साकार रूप देखना है तो इस ब्रह्मांड को देखो त्रण से लेकर के सूर्य लोक तक और चीटी से लेकर के हाथी तक समस्त प्राणियों की रचना को देखो किस प्रकार से एक एक रचना को परमपिता परमात्मा ने रचा है

01:50:28:14 यह उसकी बहुदा कला है इससे देख कर के और इस प्रकार से उसका जो गुण है यह गुण सगुण और निर्गुण से साकार का विषय यहां ग्रहण करते हैं लोग देखिए साकार का अर्थ होता है आकार वाला और निराकार का अर्थ होता है बिना आकार वाला जैसे हम सब आप बैठे हैं सूर्य दिखता है चंद्रमा दिखता है पृथ्वी दिखती है यह सारी चीजें दिख रही है यह आकार में है इनका आकार है और हम सब बैठे हैं तो हम सब आकार वाले हैं हम अल्पज्ञ हैं और परमात्मा सर्वज्ञ है वे मैं यहां हूं तो यही हूं आप वहां है तो वहां है उस कोने में नहीं है जो जहां बैठा है व वही है तो इस प्रकार से परमपिता परमात्मा का बीज रूप में विद्यमान होने से अर्थात यह गुण उसका सर्व व्यापकता होने से और सब जगह विद्यमान होने से यह उसकी सगुण उपासना कहा है और इसको ही हम जो है जो लोग साकार कह के और परमपिता परमात्मा का रूप बना कर के एक मूर्ति आदि में प्रतिष्ठित करके जो जगत का रचयिता है

01:51:43:18 महर्षि दयानंद सरस्वती ने इसमें एक उदाहरण देते हुए कहा है कि जो ब्रह्मांड का स्वामी है जैसे किसी अमेरिका के राष्ट्रपति को आप कह कि एक छोटी सी कुटिया का राजा है तो वह इससे नाराज होगा इसी प्रकार से परमपिता परमात्मा जिसने लोक लोका बनाए हैं और उन सबको रच कर के उनमें रम रहा है और उनसे अलग है उस परमपिता परमात्मा को अगर किसी छोटी सी मूर्ति में आकित करते हैं तो यह उस परमपिता परमात्मा का अपमान है ये उसकी उपासना नहीं है क्योंकि परमपिता परमात्मा वेद कहता है और वेद से पुराना कोई ज्ञान विज्ञान दुनिया में नहीं है ब्रह्मा से लेकर के जमनी पर्यंत मह ऋषि दयानंद पर्यंत सभी ऋषियों ने वेदा अनुकूल उसी सनातन धर्म की परंपरा को जीवित रखते हुए जिसका अभी हमारे उपाध्याय साहब वर्णन कर रहे थे उसी क्रम को मैं आगे बढ़ाता हूं उसमें अथर वेद में मंत्र आया है सनातनम एनम तार आध पुनर्नवा अहोरात्र प्रजाय अन्य अनस रूपयो सनातन का अर्थ केवल पुराना नहीं है सनातन का अर्थ

01:52:58:21 केवल पुराना ही नहीं है सनातन धर्म का सनातन का मतलब है जो पुरातन से पुरातन होते हुए नूतन से नूतन है और न्यूतन में भी न्यूतन बना रहता है उसे सनातन कहते हैं इसीलिए परमपिता परमात्मा की उपासना निराकार ब्रह्म की उपासना और यहां मैं एक और उदाहरण देना चाहता हूं गीता से प्रस्तुत कर गीता के आठवे अध्याय में योगेश्वर श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को समझाते हुए जब उसे मोह में पड़ गया वह कह रहे हैं कि हे अर्जुन आओ मैं आपको उस अविनाशी ब्रह्म का दिग दर्शन कराता हूं और उसके रूप को दिखाता हूं और जिसमें हमारे पौराणिक बंधु कहते हैं कि श्री कृष्ण जी ने मुंह खोला और सारा बमा उसम दिखा दिया तो वो क्या था श्री कृष्ण जी ने जब बताया योगेश्वर ने कि हे अर्जुन ओम इति त दक्षम मनु शरण व्यवहार ही लोके च परलो के परमम गति प्राप्ति यानी के योगेश्वर श्री कृष्ण ने कहा कि यह ओम ही वह अविनाशी ब्रह्म है जिसका कभी विनाश

01:54:14:10 नहीं होता उन्होंने आकार उकार मकार इन सब की व्याख्या करते हुए और सूर्य तिन से लेकर के सूर्य लो तक और चीटी से लेकर हाथी तक समस्त ब्रह्मांड का वर्णन दिग दर्शन जन चक्षु के द्वारा जब योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन के सामने रखा तो उसका जन चक्षु से उसने देखा और उसको देख कर के उसका मोह भंग हो गया कि वास्तव में योगेश्वर कृष्ण आप धन्य है आपने मेरी आंखें खोल दी मैं अब तक अजान में था यह सबसे बड़ा प्रमाण है दूसरा यह है कि निराकार ब्रह्म की ही उपासना हम कर सकते हैं और जितने भी हमारे मूर्ति पूजक बंधु भाई हैं वह सब भी उसका ध्यान करते करते करते करते अंत में निराकार पर ही आश्रय लेते हैं और उसकी उपासना पद्धति योग साधना के द्वारा अष्टांग योग है यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि यह हमारा उसका क्रम है और योग विद्या भी वेद से ही प्रकाशित हुई है तो इस प्रकार से यहां कहने का तात्पर्य यह है कि परमपिता परमात्मा के नाम पर अगर आज देखा जाए तो सबसे ज्यादा झगड़ा बखेड़ा है ईश्वर के नाम पर है और किसी के नाम पर इतना नहीं है आज

01:55:29:18 लोग इस प्रकार से मानने लगे जिस सनातन धर्म की दुनिया में धाक थी कोई उसको किसी प्रकार से चैलेंज करने वाला नहीं था आज जिन मतों की बात आपने की जैन को आपने धर्म कहा बौद्ध को धर्म कहा यह धर्म नहीं है यह मत पंथ है और एक आचार्य गुरु विशेष के द्वारा चलाए हुए पंथ रास्ते हैं धर्म सर्वज्ञ होता है और धर्म जो है सबके लिए होता है जिसको समानता से सब धारण कर सके तो इस प्रकार से परमपिता परमात्मा का दिया हुआ धर्म सबके लिए समानता देता है और वह है वेद वेद से बढ़कर के कोई भी हमारे लिए धर्म नहीं हो सकता तो परमपिता परमात्मा की उपासना भी हम वेद के द्वारा ही कर सकते हैं और वेद के मार्ग से चल सकते हैं और योग के मार्ग से यज्ज के मार्ग से परमपिता परमात्मा को उपासना करते हुए हम उसके समीप में पहुंच सकते हैं यह परमपिता परमात्मा की विधा है जब मत मता इस देश में खड़े हुए वेदों की अविद्या का आविर्भाव

01:56:36:12 हुआ इससे बड़ी हानि हुई है और सनातन की रक्षा के लिए हमें वेद की शरण में ही जाना पड़ेगा तो साकार और निराकार दोनों में यह सगुण और निर्गुण की उपासना की बात है तो परमपिता परमात्मा के जो गुण अभी हमने गिनाए हैं वो अकाम है शरीर रहित है नस नाड़ी से रहित है वर्ण आदि रोगों से रहित है तो यह उसके यानी कि इस प्रकार से परमपिता परमात्मा का कोई आकार नहीं हो सकता तो उसकी उपासना हमें योग दर्श योग योग के माध्यम से और तप के माध्यम से यज के माध्यम से करनी होगी जो आचरण का विषय है किसी के कहने से नहीं होगी केवल दूर से करने से नहीं होगी ये आचरण का विषय इसी प्रकार से इसे इस प्रकार से जानना पड़ेगा परमपिता परमात्मा के विषय में गीता में उसमें बाइबल में कहा है कि मनुष्य ने परमात्मा ने मनुष्य को अपनी आकृति का बनाया लेकिन बात इसके विपरीत है मनुष्य ने ही अपनी आकृति का परमात्मा को बना डाला मनुष्य के दो हाथ होते हैं तो वहा चार लगा दिए विशेषता कुछ कर डाली उधर किसी ने कहा कि कृष्ण और राम ईश्वर का अवतार नहीं ईसा ईश्वर का अवतार है

01:57:51:22 ई खुदा का बेटा है और वह राम को नहीं मानते राम जिन जो राम को मानते हैं वह ईसा को नहीं मानते और किसी ने कहा कि मोहम्मद ही उसका सच्चा पैगंबर है उसके अलावा कोई उसका पैगंबर दूसरा जन को देने वाला नहीं है तो इस प्रकार से कहने का तात्पर्य यह है कि परमपिता परमात्मा तो एक है इसीलिए ऋग्वेद में कहा एकम सद विप्रा बहुदा वदंती वह परमात्मा एक है परंतु गुणों के आधार पर उसको लोग विद्वान लोग अनेक नामों से पुकारते हैं और अनेक नामों से उसकी चर्चा करते हैं और इसमें परमपिता परमात्मा ने जो वेद का ज्ञान हमें दिया है यह वेद परमात्मा की वाणी है अभी परमात्मा परमपिता परमात्मा की वाणी है वेद ऋषियों ने जो भी वेदों के आधार पर अपना चिंतन दिया है उसे कोई दुनिया में चैलेंज नहीं कर सकता ऋषियों ने जो चैलेंज दिया है उसे कोई नहीं कर सकता दुनिया का वैज्ञानिक नहीं काट सकता कोई पंडित पुरोहित नहीं काट सकता और ऋषियों के प्रमाण अकाट्य हैं वेद स्वतः प्रमाण है और वेदा अनुकूल स्मृति आदियोदी वेदा

01:59:06:22 अनुकूल होने से स्वीकार्य है इस प्रकार से हमें उन्हें स्वीकार करना चाहिए अगर वेदा वेद विरुद्ध है तो कोई भी प्रमाण स्वीकार नहीं होना चाहिए यह हमारे ऋषियों ने मान्यता दी है और महर्षि दन ने कोई अलग से अपना लेखन नहीं किया मर्ष दन ने ब्रह्मा से लेकर के जयमिनी पर्यंत जो वेदा अनुकूल था उसी को उन्होंने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अभीष्ट किया है सनातन धर्म की सनातन संस्कृति को बचाने के लिए अभीष्ट किया है तो स्वामी दयानंद सरस्वती का सनातन रक्षा में जितना योगदान है मह ऋषियों की पंक्ति में उन्हें अग्रण पंक्ति में होना चाहिए क्योंकि बहुत सारे परमपिता परमात्मा तो उपास्य है हमारा और वह स्तुत है उसके सिवाय कोई स्तुत नहीं है कोई भी संसार में कोई भी पदार्थ परमात्मा के सिवाय स्तुत नहीं हो सकता केवल स्तुति परमात्मा की की जा सकती है क्योंकि स्तुति स्तुति उसी की की जाती है का इस प्रकार से परमपिता परमात्मा ही केवल स्तुत है और उससे शुद्ध बुद्ध पवित्र और दुनिया में कोई भी नहीं है हम अपने मित्र आदि की झूठी प्रशंसा कर सकते हैं अपने आचार्यों की

02:00:21:28 टी प्रशंसा कर सकते हैं और जो मत के कारण हो रहा है और मत से मतवाद होता है और मत से विवाद होता है इसीलिए परमपिता परमात्मा के नाम पर जो आज झगड़े खड़े हुए हैं विवाद खड़े हुए हैं वह इसीलिए हैं क्योंकि हम वेद मार्ग को छोड़कर और सनातन धर्म को छोड़कर हम उल्टे पथ पर चल चुके हैं गोस्वामी तुलसीदास जी की एक पंक्ति य मुझे याद आ रही है चल ही कु पंथ वेद मग छाड़ कुटिल कु चाली कलि मल भांडे जो वेद जैसे पवित्र जान को छोड़ कर के उल्टे पथ पर चलता है वह कलयुग में झूठी बर्तन के झूठ के समान है बस इतना कह कर के मैं अपनी वाणी को विराम करता हूं हम एक परमपिता परमात्मा के उपासक बने और वेदा अनुकूल पद्धति को स्वीकार करते हुए सनातन धर्म की रक्षा का व्रत ले इतना कह कर के मैं सभी को नमन करता हू अपनी वाणी को विराम करता हूं ओम सम

02:01:23:14 सोनम सोनम अब आप प्रश्न विषय इतना उत्साह पूर्ण था तो प्रश्न भी वैसे ही होंगे हा आगे हम जो है आप लोगों सेही जानकारी ले लेंगे आपने विषय का प्रतिपादन किया ही है आपने कहा नि निराकार सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान है जो आपके शब्द को कह रहा हूं मैं निर्ग निराकार सर्वज्ञ शक्तिमान है जीव अल्पज्ञ अल्प शक्तिमान आपने कहा मैं आपसे पूछना चाहूंगा जो परात्पर पूतम परमात्मा सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान है न निराकार है व साकार रूप में नहीं आ सकता यदि परमात्मा साकार रूप में नहीं आएगा तो सर्व सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान विशेषण हटा देना चाहिए हटा देना चाहिए क्यों वो सर्व शक्तिमान परमात्मा जो है वह 12 रूप में भी आ सकता है वो भगवान श्री राम के रूप में भी आ सकता है कृष्ण के रूप में भी आ सकता है यदि सर्वज्ञ शक्तिमान है तो यदि आपने कही मूर्ति की बात सर्वम

02:02:39:01 खल वेदम ब्रह्म आप जब सब ब्रह्म स्वरूप ही है तो जो परमात्मा है वह मूर्ति में भी है शोभन शोभन शोभन शोभन आचार जी शोभन खंडन की आवश्यकता है अंतिम में ज तत्व साक्षात्कार हो जाता आपकी बात को कहता हूं नहीं आप प्रश्न पूछिए तत्व साक्षात देखिए भगवान ने स्वयं कहा है हा भगवान ने स्वयं कहा है सुनिए आप भगवान ने स्वयं कहा है कि मूर्ति में पूजा मेरी कब तक करो जब तक सभी प्राणियों मेरा दर्शन ना हो यदि आपका सभी प्राण भगवान का दर्शन हो गया हो और उनका दर्शन आप में हो गया हो तो मूर्ति पूजा की आवश्यकता नहीं है प्रश्न हो गया आप उत्तर उत्तर उत्तर उत्तर हां उत्तर सुनिए देखिए अभी आचार्य श्री ने कहा के वो अवतार के रूप में आने में क्या दिक्कत है आप निराकार सब जगह सर्वव्यापक स्वीकार कर रहे हैं सर्व स्वीकार कर रहे आपका यही कहना था अब इसमें सुनिए अगर परमात्मा एक उसमें आएगा शरीर में आएगा जब आएगा तो अल्प हो जाएगा यह दोष परमात्मा में आ जाएगा इसीलिए परमात्मा का अवतार कभी नहीं होता है नहीं निर्णायक मंडल

02:03:54:09 को यदि कोई प्रश्न हो तो पूछ सकते हैं सर्वशक्ति मता आपको भी कोई प्रश्न हो तो पूछ सकते हैं सर्वशक्ति मत्ता का अर्थ है उसे अवतार लेने की शक्ति से भी संपन्न है अन्यथा सर्व शब्द में बाधा उत्पन्न हो जाएगी वो समस्त शक्तियों से और अो रयान महतो महिया अगर वो मूर्ति में और जब अणु अणु में है जर्रे जर्रे में है तो मूर्ति में क्यों नहीं हो सकता किसी का कंट्रोल तो नहीं है उस पर सुनिए सुनिए सुनिए कैसे हो सकता है अ जी सुनिए अवनी जी सुनिए कण कण में विद्यमान है अभी सुनिए मूर्ति में आने से अल्प हो जाएगा तोय सर्वव्यापक है ना सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है जो आप कह रहे सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि परमात्मा परमात्मा संसार के जगत के रचने में अपने कार्यों में किसी की सहायता नहीं लेता है सब शक्तियों से संपन्न है इसीलिए परमपिता परमात्मा को सर्वशक्तिमान कहते हैं सर्व शक्तिमान नहीं लायक मंडल समझ गए एक प्रश्न मैं भी करूंगा आपके आपने बोला एक आपका वाक्य था कि आपने बोला कि वेदों की बातों का जो खंडन करे वह झूठा खाता है ऐसा आपने कहा अरे जिसने भी कहा पर आपने उसका

02:05:09:22 उच्चारण किया कि वेदों को जो काटे वो व्यक्ति नहीं हो सकता हां चले हीप छड़े अरे आप सुनिए आप सुनिए अपने उस पर रहिए आपने बोला वे वेदों के विषय में बोला कि वेदों का खंडन नहीं कर सकते है ना वेदों की बातों को मानना चाहिए मेरा प्रश्न हो जाने दीजिए कोई नहीं तो महर्षि दयानंद ने सायण इत्यादि को क्यों काटा क्या उन्होंने व्याख्या ठीक नहीं की थी या महर्षि दयानंद से पहले कोई ऐसा व्याख्या का नहीं हुआ जिसने वेदों को समझा हो सायण की बात को आ गया बहुत अच्छा प्रसंग आया अब इसे ध्यान से सुन लीजिए सायण की बात को मैं नोट करके लाया मैं सुना दूंगा आपको यही पर ध्यान से सुन लीजिएगा अ प्रबु लोग बैठे हैं य सुन लीजिए आप बो ओम गणा नामवा गणपति ग ह प्रनाम पति हवामहे निधि नामवा निधि पति वसमम अहम जानी गम जाना गम यजुर्वेद के 2 अध्याय का नवा मंत्र है इसका अथ महिदर क्या करता है सुन लीजिए पहले सुन लो सुनले

02:06:14:22 सुनले भाष का उपयोग कर मर्यादित भाषा का उपयोग करें लीजिए प सुने दीजिए मान्यवर सुन लीजिए अब सुन लो पहले सुन लीजिए ये श्रोता गण भी बैठे हैं मैं महिदर का अर्थ पढ़ता हूं जो स्वामी जी ने ऋग्वेद आदि भाष भूमिका में उधित किया है क्या करते हैं गणपति का अर्थ इस शब्द से घोड़े का ग्रहण किया उन्होंने और वह क्या लिखते हैं सब रिजों के सामने यजमान की स्त्री घोड़े के पास सोवे और सोती हुई घोड़े से कहे कि हे अश्व जिससे गर्भ धारण होता है ऐसा जो तेरा उसको मैं खींच के अपनी योनि में डालू था तू उस को मुझ में स्थापन कर बैठ जा बैठ जा बैठ जा बैठ जाइए बैठ जाइए आराम से बैठ जाइए बैठ जाइए बैठिए बैठिए बैठिए निर्णायक मंडल सुनिए रु स्वामी द का अरे रुको रुको रु स्वामी द का अर्थ भी सुन लीजिए अरे रुक जाइए इनका माइक बंद कर दो फिर भैया क्या बा एक मिनट रुक जाइए अनुमति से एक बात कहूंगा सिर्फ उपाध्याय जी ने अभी बताया इसमें शास्त्रार्थ में एक प्रक्रिया बाद वाली तंड होती है मैंने

02:07:29:22 बता चुका हूं कि हमारा क्षेत्र बंड वाला है लेकिन बंड च बजे होगा च बजे से पंड नहीं होगा आप निर्णायक मंडल इस बात पर कोई मत रखना चाहे क्योंकि इन्होने इस तरीके की व्याख्या की है निर्णायक मंडल से जरूर चाहूंगा इस कर करना है तो च बजे के बाद बजे तक बिल्कुल ऐसे शास्त्री परंपरा से काम चलेगा शास्त्री मिनट रहने दीजिए निर्णायक मंडल इसको सुनिश्चित करेगा आर जी आचार्य जी एक व्यवस्था बनी रहेगी तो शास्त्रार्थ का आनंद भी आएगा हम सहि सारे लोग यहां जो उपस्थित है उसको समझ भी पाएंगे तो इसलिए अनुरोध है कि व्यवस्था बनाए रखिए निर्णायक मंडल टिप्प हम आप सबका यह दायित्व है कि ये बहुत बड़ी हमारी वैदिक अकादमिक परंपरा है इसमें हम वाद जल्प वित माने अंग्रेजी में कहे तो आइडियल डिबेट बैड डिबेट इलेजिटीमेट डिबेट अगर हम एक दूसरे को बोलने नहीं देंगे तोय अवैध है अवैधानिक है निंदनीय डिबेट है ऐसा हमारी शास्त्रीय परंपरा कहती है एक बोल ले तो हम ठीक है इस पर हम कभी एक मत नहीं रहे हैं इतिहास में और ना एक मत होने वाले हैं

02:08:45:06 इसलिए थोड़े मैं कुछ उदाहरण दे रहा हूं सुनिए आचार जी ने इधर से तभी कोट किया ईसा वास्य उपनिषद का एक मंत्र कि सर्वं खलो मदम ब्रम किंचित जगत जगत इस संपूर्ण जगत में ब्रह्मांड में जो कुछ भी है वह ईश्वरम है ईश्वर के अतिरिक्त यहां कुछ नहीं है एक ग्रंथ और मैं उत करूंगा वाल्मीक कृत योग बशिष्ट योग बशिष्ट कहता है कि इस जगत में जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है जो दिख रहा है जो नहीं दिख रहा है जो सूक्ष्म अदृश्य रूप में है और जो दृश्य रूप में है ये कुछ और नहीं है ये बॉडी एक्सटर्नल मेनिफेस्टेशन ऑफ बॉडी ऑफ ऑलमाइटी है ये भगवान का ब्रह्म का ही बाह्य स्वरूप है जब उसके सूक्ष्म स्वरूप को देखने आप जाएंगे तो निराकार रूप में दिखेगा और जब उसको स्थूल रूप में देखना चाहेंगे तो वही साकार सगुण रूप में दिखेगा इसी को

02:10:00:06 गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी को गोस्वामी तुलसीदास जी ने और सरल करके कहा है कि सगुण निगुण नहीं कछ भदा सगुण और निर्गुण में साकार निराकार में कोई भेद है ही नहीं है गाव मुनि पुराण बहु वेदा सारे ऋषि मुनि विद्वान लोग सारे पुराण सारे शास्त्र जुगो जुग से यही कहते आए हैं इसलिए जो सगुण है वही निर्गुण है जो निर्गुण है वही सगुण है जैसी आपकी देखने की इच्छा हो तो तुलसी ही स्पष्ट करते हैं जा की रही भावना जैसी प्रभ मूरत देखे तिन तैसी ब्रह्म को भगवान को निराकार रूप में आप साक्षात्कार करना चाहते हैं भारतीय ज्ञान परंपरा पूर्ण स्वतंत्रता देती है कि आप

02:10:55:26 देखना चाहते हैं बिल्कुल आपको स्वतंत्रता देता है आप जिस रूप में देखें क्योंकि दोनों ही रूप किसके हैं सगुण और निर्गुण दोनों ही रूप किसके हैं उसी परमपिता परमेश्वर के हैं हमारी दृष्टि हमारी बुद्धि हमारी कल्पना हमारी सोच जैसी हो हमारा सनातन धर्म हमारी ज्ञान परंपरा दोनों की अनुमति देती है आगे विषयात और करें अपने विषय आप कहना चाहते हैं मुख अतिथि महोदय मुख्य अतिथि महोदय कुछ कहना चाहते मैं सिर्फ एक जिज्ञासा करना चाहता हूं कि आप अध्यक्ष जी की बात से सहमत है अध्यक्ष जी की बात से पूर्णत सहमत हूं लेकिन स्वामी दयानंद का अर्थ सुन लीजिए जो उन्होने किया अपनीत सतब मर का सुना जी आचार्य जी नहीं अर्थ नहीं सुना जाएगा दूसरी जिज्ञासा है अध्यक्ष जी ने कहा कि जाकी रही भावना जैसी आपकी भावना क्या है यह बता सहमति है या नहीं हा या ना नहीं अध्यक्ष जी दोनों तरफ बोलेंगे तो असहमति है अ निर्णायक बोलेंगे तो सहमति है ठीक है वो स्पष्ट कर दिया उनके भाव उन्होने स्पष्ट कर नहीं दे जिज्ञासा बता हा जी हा हेलो आगे मैं आचार जी से एक मिनट आपको महाराज जी थोड़ा सा धन्यवाद वेद

02:12:10:28 के विषय में बहुत सारे भाष्य विश्व भर में हुए और बहुत सारे ऐसे भाष हुए जिनमें बहुत सारे अश्लील अर्थ भी उनमें किए गए जिनके आधार पर यह घोषणा की गई कि वेद गयो के गीत है वेद के विषय में बहुत सारी भ्रांति उत्पन्न हुई और अवद मत प्रचलित हुए ऋषि दयानंद की बात य आई थी तो ऋषि दयानंद ने बहुत ही तर्क सम्मत वैज्ञानिक भाष्य किया और उन्होने कहा कि कोई नवीन मत मता चलाने का मेरा लेश मात प्रयोजन नहीं है अब त जो आद ऋषि ब्रह्मा से जय मुनि मुनि पर्यंत मानते आए हैं वही मैं मानता हूं इसके अतिरिक्त एक स्थान पर ऋषि नंदने वेद मंत्र की व्याख्या कर रहे थे यजुर्वेद के मंत्र की और उन्होने मंत्र की व्याख्या करते करते कहा कि क्या तुम्हारा ईश्वर पक्षपाती है जो स्त्रियों को और शूद्रों को वेद के पठन पाठन का निषेध करता है ऐसा ईश्वर कलाप ईश्वर नहीं हो सकता आर्य समाज के तीसरे नियम में ऋषि दयानंद उद्घोष किया कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक और वेद का पढ़ना पढ़ाना तथा सुनना सुनाना सबका परम

02:13:26:00 धर्म हैय वेद को एक नारा दिया था बक ू वास्तव में वेद की बड़ी विषद व्याख्या ने की और ऐसे भाष में नाम नहीं लेना चाहता ऐसे ऐसे भाष्य वेद के हुए जिनको मेरी गारंटी है कि परिवार में बैठ कर के उनके अर्थों को नहीं पढ़ जाल भाष तो वेद को समझा ही नहीं तो इस प्रकार की बातें आई है बहुत अच्छी चर्चा चल रही है बहुत बहुत धन्यवाद यजुर्वेद के अभी मंत्र का आचार्य जी अर्थ कर रहे थे सायण महिदर आदि के अनुसार एक मिनट आप प्रश्न हुआ क्या अभी प्रश्न हुआ क्या प्रश्न हुआ क्या संचालक महोदय जी से समय आप आप समय वैसे ही ख जानना चाहते हैं कि प्रश्न काल कितना है हां जी प्रश्न काल जितना था खूब पर्याप्त मिला इस प्रश्न के लिए कितना सु निर्धारित नहीं है आप जैसे जिज्ञासा होती रहेंगी आप क्या कहना चाहते हैं बस एक अंतिम और अंतिम प्रश्न कर ले और इसका अंतिम उत्तर कहना चाह रहा हूं कि आपने ऋग्वेद की एक पंक्ति को उधित करते हुए स्वीकार कर लिया कि सद विप्र बहुदा बदन इसलिए कोई विवाद नहीं है उन्होंने स्वीकार कर लिया है ठीक है बहुत शोभन सद विप्र बन इस बात को गुरुजी लास्ट प्रश्न चाहंगा मैं एक मिनट मैं बिल्कुल चाहूंगा इनको भी मैंने रोक दिया अब नहीं गुरुजी

02:14:41:22 कुछ बात अवैध हो जाती है सहन नहीं होती है जी नहीं आचार्य जी आचार जी बस बस नहीं नहीं नहीं आचार्य जी नहीं मैं आचार्य जी निवेदन चाहूंगा निवेदन चाहूंगा रख दो एक मिनट बस मैं माननीय अध्यक्ष जी की यहां उपस्थिति में और यहां जन समुदाय बैठा है मैं आपको यहां टाइम का अनुबंध है प्रतिबंध है उसमें नियम में हम व्यवस्था में चल रहे हैं उसका हम पालन करेंगे ठीक है अब सुनिए आप नंबर मेरा आपके पास में है आप इस पर समय रख लीजिए तीन दिन बैठेंगे और खुली चुनौती है हां तो ठीक है कल से रघुनाथ जी वाले मंदिर पर आ जाना बात खम सभी सभी सभी के सामने कल से आप रुकिए तीन

02:15:34:08 दिन महाराज जीजे के बाद दिया रुक जा रुक जा क्योंकि य औपचारिक कार्यक्रम है इसका समय सुनिश्चित है रघुनाथ जी वा सुनिए रघुनाथ जी वाले घाट पर आपको जब भी शास्त्रार्थ करना है विद्वान यही प्राप्त होंगे किसी को कोई संदेह हो तो बता देना ठीक है आगे आगे की बात आगे की शास्त्रार्थ की श्रंखला को आगे बढ़ाऊ मैं हमारे मध्य पधारे हैं आदरणीय श्री सुधाकर राय जी अपर जिला जज जी हैं और आपके स्वागत सत्कार और सम्मान के लिए मैं निवेदन करना चाहूंगा दिनकर राव जी से आप आए और आदरणीय का माला पहना करके स्वागत एवं सत्कार करें आप आप भी आ जाइए और और रामाश्रय पचौरी जी और क्या कहते हमारे मिश्र जी आप भी आ जाइए धाम में रख लीजिए परा जी के य हा जी बकुल बिल्कुल माना के य होगा बकुल होगा दिन वही रहेंगे बिल्कुल बिल्कुल साब सहमती है सहमती है मैं इसम निवेदन करना

02:16:42:15 चाहूंगा कर दीजिए ध्यान रहना है उपदेश ब करो श होना चाहिए अशुद्ध नहीं उनको रोको स्वर से वर्ण से य ब

02:17:52:21 सभी लोग कतल धवनी से स्वागत करेंगे मैं आदरणीय श्री दिनकर राव चतुर्वेदी जी के स्वागत सम्मान के लिए निवेदन करूंगा रवि ताऊ जी से वह आपको माला और शॉल पहना करके स्वागत करें आगे शास्त्रार्थ की खला को आगे बढ़ाएंगे इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए क्योंकि यह औपचारिक कार्यक्रम है इसकी समय सीमा निर्धारित है और विद्वान जब भी बैठना चाहे सभी अपना अपना समय दे दे हम भाई इस समय पर इस स्थान पर बैठ सकते हैं तो पुनः शास्त्रार्थ का आयोजन हो जाएगा कोई दिक्कत वाली बात नहीं है आगे इस श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए अगली टीम जो है उनका बोलने का क्रमांक है टीम संख्या है दो निर्णायक मंडल क्रमांक संख्या है टीम की दो समूह संख्या है दो और प्रश्न नंबर है आपका

02:18:54:04 आठ यह जो आपने की थी ना बात अभी कि भाई किसी तरीके के दुर्विन हुए हैं कई सारे ऐसे लेख लिख दिए गए हैं जिनका शास्त्रों का गलत अर्थ हो गया है उसी के परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न है आठवा आप सभी ध्यान से सुनिए और आप व्याख्या कीजिएगा और मैं पुनः कहूंगा आप विद्वान है आचार्य है आदरणीय है सम्माननीय है और विद्वत है आप एक सुसज्जित भाषा का उपयोग कीजिएगा उससे इतर मत जाइएगा अपनी मर्यादा को ध्यान में रखते हुए प्रश्न है भारतीय ग्रंथों में आए क्षेप कों का भारतीय धर्म संस्कृति पर दुष्प्रभाव एवं उनके निवारण के उपाय बताइए समय हो रहा है दो 32 आगे प्रारंभ करो बिना मंगलाचरण के कोई मंगलाचरण इत्यादि नहीं

02:19:45:19 कर ओ न पिता त्वम माता सत कतो बभु वि अधा सुनमी महे नमस्ते सते ते जगत काणा नमस्ते चिते सर्व लोका आश्रया नमो द्वेत तत्वा मुक्ति प्रदाय नमो ब्रह्मण व्याप शाश्वता नमो ब्र [संगीत] शावता ओम शांति शांति शांते आदरणीय इस मंच पर उपस्थित निर्णायक मंडल विद्वत जन अध्यक्ष महोदय मुख्य अतिथि वृंद सभी वादी प्रतिवादी विद्वत जन श्रोता बंधु मातृशक्ति नौजवान साथियों बच्चों विषय है भारतीय ग्रंथों में आए क्षेप कों का भारतीय धर्म संस्कृति पर दुष्प्रभाव एवं उनके निवारण के उपाय बताइए भारतीय

02:21:01:03 सभ्यता संस्कृति हमारे जो विशेषकर पौराणिक जो हमारे आक्षण ग्रंथ है जिन पर वेदों का नाम लेकर ऋषियों का नाम लेकर धर्मशास्त्रों का नाम लेकर ऐसी घिनौनी घिनौनी बातें प्रतिपादित की गई है जिनको लेकर के विदेशी लोग भी आक्षेप करते हैं और हम सनातन वैदिक धर्म सभ्यता संस्कृति पर कुठाराघात करते हैं इनके निराकरण का उपाय क्या है महर्षि स्वामी दन जी महाराज कहते हैं जिन्ह हमारा बहुत संख्यक वर्ग अपना धर्म ग्रंथ मानता है अपने टि ग्रंथ मानते हैं उन पर अपना संचालन करता है वेद को छोड़कर अभी हम वेद की बात करते हैं लेकिन वेद के अनुसार हम चाल चलन नहीं करते वेद के अनुसार हमारी वेशभूषा नहीं है वेद के अनुसार हमारा आचार विचार नहीं है वेद अनुसार हमारा खानपान नहीं है वेद के अनुसार हमारे सांस्कृतिक जो कार्यक्रम होते वो नहीं होते वो केवल पुराणों के आधार पर होते हैं आक्षेप के आधार पर होते हैं ऋषि दयानंद ने हमें कोई बात सत्य है उसके लिए पांच परीक्षाओं का विधान दिया है उन पांच परीक्षाओं में कहते हैं इन पांच परीक्षाओं में अगर कोई बात खरी उतरती है तो समझ लेना वो बात सत्य है और य गलत है तो वो गलत है कट जाती है उ नहीं करना चाहिए सबसे पहली बात कहते हैं ईश्वर के गुण कर्म स्वभाव

02:22:16:04 के अनुसार सृष्टि क्रम के अनुसार सृष्टि क्रम क्या है और सृष्टि का नियम क्या है यह समझने का प्रयास कीजिएगा सृष्टि में कोई भी बीज जहां पर बोया जाता है वही अंकुरित होता है यह नियम है कोई बीज कहीं पर आप बोंगे जहां बोते हैं वह वही उपज है वही उसका पौधे का रूप लेगा और विशाल वृक्ष का रूप धारण करेगा ऐसा कभी नहीं होता कि आपने कहा कि मैंने गुठली आम की खेत में लेकिन मेरा आम का पेड़ छत पर हुआ ऐसा कभी नहीं होता ऐसा ही हमारे ग्रंथों में गड़बड़ कर दिया गया जीवधारियों में भी नर और मादा ईश्वर की रचना है यह प्राण तो निमि तो महत्व की द्रा जगतो बुवा यह वेद मंत्र यजुर्वेद के 32 अध्याय का तीसरा मंत्र है और ऋग्वेद में भी दसव मंडल में आता है इस वेद मंत्र में स्पष्ट कहा गया परमपिता परमात्मा प्राण वाले और अप प्राणी रूप ये सारे संसार की रचना करता है द्विपद चतु पदे का स्वामी ध्यान करते हैं दो पैर वाले अर्थात मनुष्य आदि चतु पदे गौ आदी प्राणियों के ई शरीर की रचना कौन करता है ईश्वर करता है याद रखिए कोई मनुष्य नहीं करता और उन सबके प्रसव काल निश्चित है सबका प्रसव काल निश्चित

02:23:31:10 है सृष्टि के आदि से लेकर हमेशा तक रहेगा और वो कभी बदल नहीं सकता ईश्वर की व्यवस्था ईश्वर का नियम है लेकिन हमारे धर्म ग्रंथों में हमारे पुराणों में हमारी कथाओं में ऐसे ऐसे आक्षेप कर दिए गए कि तत्काल ही गर्भधान हुआ और गर्भधान होते ही बालक पैदा हो गया और उस उसका मतलब वो नाभी भी नहीं कटी बल्कि नाभी को ही कंधे पर डाल कर के और जंगल को चला गया और तपस्वी बन गया ये ऐसे आक्षेप डाल कर के लोग आक्षेप करते हैं याद रखना ये सृष्ट क्रम के विरुद्ध न्याय के विरुद्ध धर्म के विरुद्ध वेद विरुद्ध बात है ये कैसा हो ही नहीं सकता हमेशा प्रसव काल मनुष्य का न महीने 10 महीने निश्चित है इससे पहले कोई बच्चा पैदा नहीं हो सकता लेकिन ऐसे आक्षेप बहुत सारी कथाएं किसी बालक का जन्म गर्दन से पैदा किसी का बाल से पैदा किसी को नाक से पैदा किसी को कान से पैदा ये सारे आक्षेप हमारे धर्म ग्रंथों पर जो लगाए गए इसे हमारा पूरा इतिहास और हमारे पूरे ऋषि महर्षि दूषित हुए इसलिए इन दूषण को दूर करने के लिए ऋषि दयानंद डंके की चोट पर बात कहते हैं कि इनका लिखने वाला अगर अपनी मां के गर्भ में ही मर जाता तो ये सनातन धर्म की हत्या नहीं होती यह वैदिक धर्म नहीं होता आइए हम इन आक्षेप को दूर करें अपनी भ्रांतियों को दूर

02:24:46:12 करें और जो सृष्टि का नियम है जो वेद का विधान है जो जकता है उसी के आधार पर हम सत्यवादी करें और सत्यवा स्वीकार करके अपने जीवन को बदले अपनी पद्धति को बदले अपनी पैथी को बदले और अपने महापुरुषों के वास्तविक स्वरूप को जाने हमारे किसी भी ऋषि महर्षि ने ऐसा कु कृत नहीं किया यह बिल्कुल गलत बात है हम इसे कभी स्वीकार नहीं करते ऋषि ध्यान के अनुयाई किसी भी ऋषि पर कोई आक्षेप स्वीकार नहीं करता भगवान के नाम पर कोई अडम स्वीकार नहीं करता कोई अधर्म अवैध बात स्वीकार ही नहीं है शोभन शोभन सुंदरम सुंदरम सुंदरम लोगों ने केवल हमारी संस्कृति को मिटाने के लिए याद रखना ये विदेशियों के दुष्चक्र है दतार दुष्चक्र है और ये सृष्टि के आदि में ग्रंथ नहीं लिखे गए यह पुराण समय समय पर लिखे गए का सृष्टि के आदि में पुराण लिखे गए होते तो याद रखना इनमें बुद्ध का काल का वणन नहीं होता अकबर का काल का वणन नहीं होता अन्य लोगों मलयो का वर्णन नहीं होता क्योंकि ब्रह्मा तो सतयुग के काल के व्यक्ति है उस समय का ही वर्णन होता आज जो ग्रंथ लिखे जा रहे हैं आज का वर्णन किया जा रहा है हमारे गायत्री परिवार के आचार्य श्री राम जी ने एक प्रजा पुराण लिखी है उन्होंने अपने काल में लिखा है इसका वर्णन है उसमें ब्रह्मा जी का वर्णन

02:27:03:03 और मान धाता का जन्म दिया गया पेट फार के निकला गया सृष्टि क्रम के नियम के विरुद्ध कभी भी मनुष्य के शरीर में गर्भ सेय नहीं होता आमा से होता है महिलाओ के शरीर में आमा गर्भ दोनों होते हैं और याद रखना गर्भाशय में जो पदार्थ जाता है जिससे गर्भ स्थापित होता है व मार्ग अलग होता है उसी मार्ग से जाएगा तो गर्भ ठहरेगा अन्य किसी भी मार्ग से गर्वा सम पदार्थ जाता ही नहीं है कोई गर्भाशय में जाने वाले पदार्थ को मुंह से पी जाए तो गर्भाशय में गर्भ ठहरेगा क्या नहीं ठहरता सृष्ट क्रम के नियम के विरुद्ध बात है लेकिन हमें कथा के नाम पर सुनाया जाता है बड़े-बड़े लोग कथाकार करते हैं इंटरनेशनल पर लोगों का बवाला होता है कोई समझता नहीं इस बात को अरे शरीर की रचना देखो भगवान ने शरी की रचना की है वे सब सत विद्याओं का पुस्तक है ऋषि दनन कहते हैं और हम चैलेंज के साथ आप को कहते हैं ऋषि दन के एक एक मंत्र की व्याख्या पढ़िया विजान सम्मत है ऋषि सम्मत है और ऋषि ने सायण मराज के भाष को बरी तर द ऋषि दयानंद कहते यास काचार्य के भाष को महर्षि स्वामी दयानंद अपने पूर्ववर्ती ऋषियों के महर्षि यास काचार्य निरुक्त के भाष्य को स्वामी दन जी प्रमाणित मानते हैं यावाल को प्रमाणित मानते हैं पतंजलि को प्रमाणित मानते हैं और जितने सांग दर्शन आद छ हमारे जो आशिक दर्शन है उन सबको प्रमाणित मानते हैं इसलिए

02:28:18:08 हमें ऋषि दयानंद की बात शर्त है समत है धर्म सम्मत है और अपने पक्ष की बात नहीं है हमारे संचालक अशोक जी कह रहे थे स्वामी जी ने स्पष्ट कहा कि मेरा अपना कोई मत मजब चलाना उद्देश्य नहीं है बल्कि ब्रह्मा से लेकर जम ऋषि पर्यंत और य आ समाज एक ऐसा आंदोलन है एक ऐसा संगठन है जो सत्य सनातन वैदिक धर्म की रक्षा में प्राण पर से समर्पित आदि से अब तक रहा है मंदिरों की रक्षा भी हम करते हैं आप सबका साथ बढ चल के साथ देते भले आप हमें जर देते रहो भले आप हमें जहर देते रहो याद रखिएगा लेकिन हम हमेशा इस वैदिक सनातन धर्म की रक्षा में हमेशा तत्पर रहे महोदय आप अपने मत की स्वामी सरस्वती 185 में आए उनके मत का प्रवर्तन करिए समर्थन करिए ठीक है एक प्रश्न है मंच से ब्रह्मा की पूजा सनातन धर्मिंदर क्यों नहीं लगाई जाती कहां है यह क्षेपक किस कारण से वो बोलेंगे फिर आप प्रश्न करिएगा ब्रह्मा की पूजा उनका चित्र घरो में लगाना कब से बंद हुआ कहां है यह उल्लेख कहां है य क्षेपक कि कोई चित्र ब्रह्मा का अपने घर में नहीं लगाना चाहता है कारण क्या ब्रह्मा की पूजा आदि हम सनातनी लोग करते ही नहीं

02:29:33:09 है और ब्रह्मा के ब्रह्मा चारों वेदों विद्वान को ब्रह्मा कहा जाता है उस चारों वेदों के विद्वान विदव व्यक्ति की हमेशा आदर सत्कार सम्मान पूजा और समाज करता है और उसका हम कराना तत् का करते केवल चार मुंह वाले व्यक्ति का कोई जन्म कहीं नहीं हुआ ना हम उसे मानते ऐसा वेद का ऐसा कोई प्रमाण नहीं कोई वेद मंत्र ऐसा नहीं है जिस मंत्र के आधार पर चार मुख वाला कोई व्यक्ति पैदा हो जाए बल्कि चार मुख का मतलब है चार वेदों का विद्वान चारों भदों के जाता मनुष्य को ही ब्रह्मा की उपाधि दी जाती है और उसकी पूजा हमेशा रहती है पूजा मतलब आदर सत्कार या सम्मान आज भी हमारे यहां होता है हमारे जो भी आर विचारधारा के लोग हैं वो सनातन रूप से हम ऐसे विद्वान का सम्मान करते हैं मानते हैं लेकिन ये पौराणिक जो पद्धति है जैनियों के माध्यम से आई जैन काल से पहले मूर्ति पूजा का विधान हम नहीं और जो मिलता है वो उन लोगों के दवारा आक्षेप किया हुआ है इस आक्षेप को हमें निकालना है प्रश्न करते प्रश्न काल आरंभ हुआ

02:30:32:22 क्या शिव पुराण दो मिनट समय है आपके पास बस 43 हुआ 43 हो गया 32 प शुरू हुआ था मत आपके प्रश्न का उत्तर हम देंगे सुनि यह आक्षेप मूर्ति पूजा का विषय नहीं है य आक्षेप है कि जो आक्षेप लगाए गए उन आक्षेप का निराकरण क्या है उनसे हम कैसे व्यवस्था दे यह प्रश्न है तो आक्षेप आपने कहा कि ब्रह्मा जी के मूर्ति पूजा आदि प की पूजा क्यों नहीं होती यह सवाल मूर्ति पूज कों का है मेरा नहीं मैं यह व्यवस्था नहीं करता मैं तो चारों वेदों के विद्वान को ब्रह्मा मानता हूं और ऐसा ही अपने गुरुकुल में बच्चों को व्याकरण से लेकर मवास पर्यंत व्याकरण पढ़ाने का प्रयत्न करता हूं और ऐसे बच्चों को मतलब वेद के मंत्रों को भी तैयार कराता हूं याद कराता हूं और जो बच्चा ऐसे होते हैं उनको चतुर्वेदी की संजा देता हूं ये हमारा काम है इसके साथ जो आक्षेप हमने दिए रामचरित मानस में जब हम पढ़ते हैं बाली और सुग्रीवा आदी की कथा पढ़ाई जाती है वहां क्षेपक लिखा गया है कि बाली का जो शरीर है एक स्त्री के बालों से पैदा हुआ है इंद्र जी का जो है वीर गिर गया गर्दन पर तो गर्दन से सुग्रीव पैदा हो गया ये वहां वर्णन आक्षेप लिए गए हैं और आपके पुराणों में बहुत सारी कथाएं मिलती

02:31:48:01 है इन आक्षेप का हम लोग निराकरण यह करते हैं कि यह हमारे नहीं है यह हमारे विद्वानों के ऋषियों के लेख लेख नहीं है यह आर्स ग्रंथों के लेख नहीं है ये ऐसे धर्तो के द्वारा मिलाए हुए हैं जो हमारे ऋषियों को कलंकित करते हैं हमारे महापुरुषों को कलंकित करते हैं इसलिए हम सबका धर्म मिनट आपके पूरे हो चुके दो मिनट में उपसर कीजिएगा अपने विषय का तो मेरा चिंतन यही है आप सब लोगों के लिए कि जो सृष्टि क्रम के विरुद्ध बात है वेद विरुद्ध है सृष्टि क्रम के साथ आज मनु हमारा जो वि है विज्ञान के भी विरुद्ध है और आचरण के भी विरुद्ध है व्यवहार पक्ष के भी विरुद्ध है उन सारे आक्षेप को अपनी अपनी कथाओं से हटा दीजिए उन ग्रंथों से निकाल दीजिएगा और जो शुद्ध स्वरूप हमारे सारे ऋषियों का जो उल्लेख है बस उसे लाइए जैसे आज हम सब पैदा हो रहे हैं वैसे उस जमाने में भी सब बच्चों का जन्म हुआ है उसी कारण से तरह हुआ है जैसे आज होता है ऐसे पहले राम का भी जन्म वैसे हुआ ऐसा मत कर दीजिए कि कोई खीर से पैदा हो गया कोई फल दे दिया तो बस नाक में से निकल गया बच्चा कि कान में से क गया बच्चा यह कभी नहीं होता था

02:33:02:10 ना प्रश्न काल आरंभ होता है क्रम समूह संख्या तीन के पास प्रश्न है अपना प्रश्न शट मैं आपसे प्रश्न पूछने का समय दूंगा एक मिनट मैं इनको सब आप पहले टीम का हो जाने दीजिए थोड़ा सा टीम प्रश्न उत्तर का भी अंक किसने क्या प्रश्न किया क्या प्रश्न नहीं किया क्या उत्तर मिला आप तीन नंबर पूछ थोड़ा यह विषय गर शर्ट में पूछेगा गुरुजी शट में पूछेगा हमारे भगवान भगवान वेदव्यास उत्पत्ति जो है उनसे हुई है मस से मछली के गर्भ से जैसे आता है जो सत्यवती से हुए और भगवान वेदव्यास माने आदरणीय है और के विषय में आप ीचा लेदर करेंगे सहन नहीं होगा तो हम दयानंद जी की उत्पत्ति बताए तो सहन कर लोगे आप करेंगे आप बताओ दयानंद किसी मछली से पैदा हुआ सुनो सुनो दयानंद वैसे पैदा हु हम पैदा हुए हैं थोड़ी सी ये ी लेदर नहीं है ये हमारा गलत इतिहास लिखा इसलिए श ले सभ्य भाषा सभ्य भाषा समझिए अपनी बात को यार भा हम क ये हमारे ऋषियों ने नहीं लिखा ये व्यास का लिखा लेख नहीं है ये किसीसी का नहीं है विदेशी लोगों का मिला हुआ है े

02:34:17:13 अपना मान रहे हो इसलिए बरा ल भूल गए कि उनके आचरण के भी नंबर उनको दि समूह भूल गए हैं समूह भूल गए हैं कि उनके आचरण के भी नंबर उनको दिए जा रहे हैं आचरण के भी नंबर है क्योंकि सिर्फ वाणी से शास्त्र को याद कर लेना और आचरण में नहीं उतारना कोई बात नहीं है चाहे आप किसी भी भेद से पढ़े किसी भी शास्त्र से पढ़े इसलिए मर्यादित भाषा का प्रयोग करें आप उनका माइक चालू कर दीजिए कर दीजिए हा उत्तर दीजिए आप नहीं नहीं मैं पहले प्रश्न करता हूं हा प्रश्न कीजिए आप उत्तर दीजिए हमारे पितामह शास्त्र महारथ कन जी हुए आपने कहा वैदिक सत्यार्थ आपका सत्यार्थ प्रकाश वैदिक सत्यार्थ प्रकाश अक्षर सा खंडन किया उ के सामने उन्होंने एक रमा महर्षि संवाद लिखा है और वह दया आपके संस्कृति में रहे दया आप उन्होने दयानंद महाकाव्य भी लिखा जब उसने असलियत का पता लगा तो उससे अलग हुए रमा महर्षि संवाद का पहला श्लोक हैसे भगवान वेदव्यास की जो है व्याख्या कर रहे हैं हमारे ऋषि मयो की व्याख्या कर रहे हैं उन्होने लिखा है थोड़ा अच्छे ढंग से सुनना उसके लिए अ भूत परा नर तन जीव नाम कुले सय दासी तन

02:35:32:21 वदंते रमा महर्षि विचार बोधक विरते कादम लोकता अ भूत पुरा रतन जीव नामले नाचने गाने वाले के वंश में दयानंद पैदा हुए सवस तत जो दयानंद है व दासी तने है रमा महर्षि विचार बोधक रमा नाम की बाई थी उसके साथ विचार देखना है तो मेरे से काव्य को पढ़े इसके लेकर के हाई कोर्ट में पहुंचे मान हानी और हमारे बाबा वकील बने और हाई कोर्ट से प्रेम पत्र थे रमा नाम की स्त्री के दयानंद जी लिखे थे व आज भी प्रमाणित हाई कोर्ट में ये बात सिद्ध हो गई इस आप ऋषि मह उसम 27 लोक आप नंगे हो जाएंगे आचार्य प्रवर आचार्य प्रवर इसको क्यों आप मर्यादित भाषा आचार्य जी मर्यादित भाषा का उपयोग करें उस अ नहीं आपसे अनुरोध

02:36:35:14 हैवान एक दूसरे का आदर करना चाहिए एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए हम इसको आगे ले जाए बहुत हमारे मत मता है शास्त्रों में य स्वीकार करने में कोई हम लोग को परशा जनता से आप प्रश्न पूछना चाह लेकिन संजत भाषा में यही अनुरोध है बारबार हा जनता से आप प्रश्न करना चाहते हैं आप प्रश्न कीजिए मेरा सिर्फ एक अनुरोध है कि हमारे माननीय अध्यक्ष जी बार-बार एक अनुरोध कर रहे हैं यहां पर यह एक आपस में शास्त्रार्थ की प्रक्रिया चल रही है और आप सभी लोग एक बहुत बड़े विद्वान के रूप में यहां बैठे हुए हैं हम एकदम व्यक्तिगत टिप्पणी करना और अपने महापुरुषों के बारे में दोनों तरफ से ऐसे बयान आ रहे हैं जो वास्तव में अशोनी हमारे अध्यक्ष जी बारबार कह रहे य पंडाल में बैठे सारे लोग यह क्या हम सोचेंगे आप लोग विद्वान है देखिए एक बात स्पष्ट कर दूं मंच की यह स्पष्ट धारणा है जिसकी हम घोषणा करते हैं कि सब महापुरुष हमारे हैं महर्ष दयानंद सरस्वती उतने ही हमारे लिए पूज्य है प्रणम है प्रात बंदनी है जितने हमारे दूसरे आचार्य हैं उनसे हम मत विभेद रख सकते हैं लेकिन का मतलब य नहीं है कि

02:37:50:14 व हमारे लिए वंदनीय नहीं है प्रणम नहीं है आदरणीय नहीं है कोई भी हमारा स्वामी संत सन्यासी मत प्रवर्तक उतना ही आदर नहीं है जितना कोई दूसरा है यही सना सभ्यता संस्कृति का मूल संस्कार है चलिए आगे आगे ले च मिनट एक मिनट एक मिनट आचार्य जी एक मिनट छोड़ो अरे आचार्य जी सामने एक मिनट मेरा एक प्रश्न था आपसे मेरा एक प्रश्न बोलिए बोलिए काफी समय से मैं उसको आपसे पूछना चाह रहा था जैसे अभी आपने एक प्रश्न किया अपना उत्तर अभी आप अपना वक्तव्य दे रहे थे तो मेरे दिमाग में एक प्रश्न कौदा आपने कहा दयानंद सरस्वती भी उसी प्रकार न महीने बाद पैदा हुए गर्भ से उत्पन्न हुए ठीक है ना हम भी वैसे ही होते हैं और पूर्व में भी ऐसे ही होते थे ठीक है ना लेकिन जो अभी आपने एक वैसे ही राम का भी जन्म हुआ यह 100% गलत हम इसको नहीं मानेंगे भगवान कभी जन्म नहीं लेते मां के जिस प्रकार से मां के गर्भ से प्रस प उतर देने दीजिए उतर देने दीजिए मिट सु आप ठीक है

02:39:05:19 राम पर विवाद विवाद स्थिति आप खड़ी ना करें बात खत्म हो गई उस बात को मत कीजिए मान मान मानने मान एक मिनट सुनिए वैदिक नहीं बिल्कुल आप कहां से क रहे बात बैठ जाइए भगवान कभी जन्म ही नहीं लेता वो अजन्मा है देख अजन्मा सुनो ध्यान से बैठ जाइए भगवान श्री कृष्ण बैठ जा बैठ जाइए बैठ जाइए मैं इनका उत्तर देना चाहता हूं प् मानस रामचरित मानस में कहते बिल्कुल आप रामचरित मानस को सुनिए आप रामचरित मानस को बारबार प्रमाण बना रहे हैं और भ प्रकट कपा हम पमान चचन मना ठीक है ठीक है करले दशरथ के जाए हम पमान चचन बनाए और भ प्रकट कृपाला का कौन करेगा तीन दिन का सा संकट मोचन है ऋषि कहते जाल ग्रंथ है इसको पढ़ने की आवश्यकता नहीं है कुछ कुछ

02:40:12:15 बात दि हमलोग को से निवेदन बंद कर दीजिए प्लीज आपको पूरा मौका मिलेगा वित की तरफ मत जाइए उपाध्याय जी से मैं बता चुका हूं य की प्रवृत्ति है छोटी छोटी बात प कट चलता है यहां पर आप विद्वान लोग है आप विद्वान लोग है अरे ज साहब अगला सवाल प्रवर्तित करिए अगला सवाल पूछो भाई टीम संख्या चार क्रमांक संख्या सा प्रश्न संख्या सात सनातन धर्म छोड़िए उस बात को क्योंकि विवाद धर्म एवं संस्कृति के मूल तत्व क्या है इस बहुत स्पष्ट तरीके से सुन लीजिए टीम संख्या चार स्पष्ट तरीके से सुन लीजिए विषय पर ही रहना है विषय से भटकना नहीं है सनातन धर्म एवं संस्कृति के मूल तत्व क्या है इसके हो रहे क्षरण को किस प्रकार रोका जाए आपका समय हो रहा है अभी 254 आप आरंभ कीजिए बिना मंगलाचरण बिना

02:41:15:08 उसके सनातन धर्म की जय सनातन देखो कोई भी व्याख्या करने से पहले कोई भी शब्द की व्याख्या स्वरूप की व्याख्या उसके गुण की व्याख्या उनके कर्म की व्याख्या और उसके फिर फल की व्याख्या करने लग जाओगे तो समस्त शंकाएं समाप्त हो जाएंगी सनातन सन धन आ तन सन से

02:41:54:15 निकला तन उसको कहते है सनातन सनातनम सनातन या न धृत ब्रता जो सना से उत्पन्न हुआ एक ही उत्पन्न नहीं हुआ है एक ही वस्तु उत्पन्न नहीं हुई है सबसे पहले एकायन फलस दो स्वरूप हुए प्रकृति और पुरुष जैसे कहा है ना अभी बात आई थी कि चार मुख वाले नहीं होंगे कि इतने मुख वाले नहीं होंगे वेदों में तो यह कहा है च अपने अपने ही विषय पर सनातन पर सिर्फ सनातन सनातन स्वरूप को समझा रहा हूं मैं संचालक जी पहले सनातन का स्वरूप समझ ले कि हम कहां से तना जुड़ा हुआ है और कहां से क्या परिवर्तन हु यह सनातन तत्व का विश्लेषण कर रहा हूं मैं यह चलो मैं बिल्कुल हिंदी में कहूंगा मैं ईश्वर सर्व भूता नाम हदय सेन ति भगवान सनातन एक ही है है ना उसके

02:43:08:25 अलावा बीजम माम सर्व भूता नाम समस्त भूतों का ीज एक ही है और सनातन का अर्थ क्या है आज हमारी आंखें देख रही हैं इनमें कौन से व्यक्ति ऐसे हैं कि आंख के अतिरिक्त अलग कोई वस्तु देखती हो कौन से जीव की ऐसी आंख है कि वो आंख की अलावा और किसी को देखती हो है कोई चराचर में कोई ऐसा हो अपवाद एकाद हो सकता है कि आंख के द्वारा नहीं देखता हो और कहीं से देख लेता हो करणों से सुनता हो है ना मम बांसो जीव लोके जीव भूता सनातन मन सट इंद्रियानी प्रकृति स्थान कर सति सनातन जीव लोक का जीव और सनातन भूत का जीव यहां दो जीव विभाजित हो अब उसमें सनातन में दो जीव कौन-कौन से हैं

02:44:24:07 भूत सनातन जीव कौन है और लोक सनातन जीव कौन है यह जो पुरुष है ना पुर माने घर और उसमें रहने वाला ईश्वर अगर व्याख्या में जाओगे तो पुरुष प्रकृति जीव ईश्वर यह अलग-अलग वैदिक व्याख्या है पौराणिक व्याख्या है ले जसे मैं बैठा हुआ हूं नरेश शास्त्री मेरे माता भी है पिता भी हैं और इसमें से लोक जीव निकल गया लोग माने इस शरीर का स्वामी जिसको वो पुत्र मानते थे वोह निकल गया तो इसमें कौन सा जीव रह गया भूत जीव भूत जीव रह जाने पर यह परिवर्तन होकर के नस जाता है तो वह सना तनव अब सना तनव क्या है तन माने शरीर अब जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता हो जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता हो और जिसको परिवर्तन नहीं किया जा सकता हो उसको कहते हैं सनातन

02:45:39:21 आप देखिए हम मुख से खाते हैं ऐसा कोई भी व्यक्ति अपने को धर्म मानता हो वो कह दे के मुख से नहीं खाता मैं तो और किसी भी चीज से खा लेता हूं कोई चराचर में ऐसा कोई व्यक्ति हो या कोई चराचर में जीव ऐसा हो कि उसको यह कह दे कि वह मुख से नहीं खाता है ऐसे तो बिन पद चले सुने बिन काने ऐसे तो बहुत है लेकिन चराचर की व्याख्या करें सनातन की व्याख्या करें अभी उधर में बात आई अब यही नहीं समझते कि सृष्टि कितने प्रकार की होती है सृष्टि होती है संकल्प सनातन संस्कृति के मूल तत्व हां हां सनातन संस्कृति की सबसे पहले सृष्टि सृष्टि के बाद में क्या आया कि सबसे पहले संकल्प मानसी मै थुनी और अथुनी अंडज पिंड स्वेद और उद यही हम नहीं जानेंगे उपदेते ज्ञानम ज्ञान न तत्व दर्शन अगर जिस व्यक्ति के सनातन तत्व की यद जानकारी नहीं है तो कोई तामसी

02:46:55:01 है तो तामसी जैसी व्याख्या करेगा जो राजसी है वो राजसी जैसी व्याख्या करेगा जो राज सात्विकी है वह सातव की जैसी व्याख्या करेगा और जो तत्वदर्शी है वह तत्व का दर्शन करेगा सनातन और उसकी जो आपने सृष्टि बोली और सनातन में क्या मतलब जुड़ाव है सनातन का जुड़ाव यह है कि जो हमारी कुल गोत्र और उत्पत्ति जो है जन्मन जन्मन सनि तो जात वेदा वेद सूत्र है मैं नहीं कह रहा हूं तो वह सन्निहित जैसे सोना आज से करोड़ों वर्ष पहले था आज भी वही सोना उसका वही गुण है जो पहले था और चांदी का जो पहले जो गुण था वो आज भी गुण है और वही जो चीज मानव से जो हमारे गर्भाधान संस्कार जो हमारे संकल्प य संस्कार दृष्टि से भी संताने हुई हैं संकल्प से भी संताने हुई है यह सब सनातन पद्धति है और हमारा जो तन है ना कुल गोत्र जैसे हमारे वो है ना संकल्प जो दिया है जो संकल्प में जो उरण दिए गए हैं

02:48:10:08 वह सभी और संस्कृति क्या है प्रकट प्रकृति प्रश् ते सृष्ट वाचक सृष्टि वाचक जो है वो प्रकृति है जिससे स्वरूप बनता है और उसमें जो संस्कारित परमात्मा ने सन्निहित किया है सन्निहित जो जो पहले सन्निहित किया गया वह आज भी सन्निहित है जिसमें किसी भी प्रकार का कोई परावर्तन नहीं इसी के लिए स्वयं श्री कृष्ण जी गीता जी में कहते हैं एवं प्रवर्तित चक्रम नान वर्तीय अगार इंद्रिया रामो मोगम पार्थ जीवती यह नहीं कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण जी कि मैं कुछ कह रहा हूं यह परंपरा से मम विवस्वत योग प्रोतन परंपरा से सनातन पद्धति से चली आ रही है संस्कृति हमारी वही कर यद हेम न बते हम जात कर्मण तंद्र त मन वर्तमान वर्त ते मनुष्य पार्थ सर्वस इदयम मले का संकर से करता

02:49:25:12 हूं मतलब वह वर्ण शकर हो जाते हैं यह वह हमारी जैसे ट्रैक पर रेल चलती है ना कितनी भी तेज चली जाए लेकिन पटरी से उतर जाए तो वह एक्सीडेंट हो जाएगा जैसे हमारे मोबाइल में 10 नंबर होते हैं नंबर वही रखो सनातन अगर जो तना है उस मर्यादा में रखोगे तो एक एक नंबर आगे पीछे कर दोगे पूरे जीवन लगाते रहोगे वह सब रंग नंबर हो जाएगा यह सनातन पद्धति है उस मर्यादा में हम रहेंगे जभी तो कहा है महा पुरुषस्य विष्णु आज्ञा उनकी ओम तत्सत निर्देश ब्रह्मण त्र स्मत ब्राह्मणन वेदा यज्ञ बहता पुरा आज व्यक्ति कहते हैं अलग है पुराण अलग है जबक इतिहास पुराणा नाम पंचम वेद उते वेद जो परंपरा हमारी पुराण परंपरा जो है पुराणा पुराणा नित्य नुतन सा पुराणा जो पुरानी से पुरानी होने पर भी नित्य नूतन हो

02:50:40:21 उसको पुराण कहते हैं यह सनातन पुराण सनातन वेद और उनमें क्या है सन्निहित हो करके उनकी मर्यादाओं का अनुपालन करके क्योंकि यहां तक कहा है इत लंगत मर्याद तक्ष का जहां मर्यादाओं का स्त्रियों का श्रुति हों का स्मृतियों का जो हमारे पुराणा वेद है यह सभी अंग हैं जैसे वेदों में भी जाओ तो क्या कहते हैं पूर्वे काम पंथा सना से जो आया है नया कुछ नहीं है भगवान भी कह रहे हैं एवं प्रवर्तित चक्रम नान वर्तीय वह मैं भी कर रहा हूं और इसी प्रकार से जितने भी ऋषि महर्षि हुए हैं और बाबा जी तुलसीदास जी क्या कहते हैं मुनि प्रथम हर कीरत गाई ते मग चलत सुगम मोए भाई कौन सा पद चुना उन्होंने सनातन पथ संस्कार किए गए जो हमारी संस्कृति है संस्कृति किसको कहते हैं जो हमारे धर्म की जो हमारे कर्म की जैसे सत्य

02:51:55:26 व्रतम सत्य परमत सत्यम सत्य योनि तम च सत्य सत्य सत्य मत सत्य नेत्र [संगीत] सत्यात्मतीर्था स्वधर्मे निनम श्रेय पर धर्मो भयावह जो हमारी सनातन की आदेश भगवान वेद रूप भगवान के आदेश हैं पुराण रूप लीला करके आदेश दिए गए हैं अब यह आती है निराकार और साकार दो रूप है भगवान के तीसरा रूप है उनका कारण साकार है हमारे जैसे पुष्प है उसका आकार बद्ध है हमारा शरीर है अब निराकार किसको कहते हैं जिसका आकार वध नहीं है आकार क्या है जैसे अभी गं आई एक फुट दूर गई फिर वह हवा गई तो 10 फुट दूर हो गई 50 मीटर दूर हो गई और इतनी सी रह गई उसकी आकार कोई निहित नहीं है कभी बड़ा हो जाता है कभी छोटा हो जाता है

02:53:11:19 इसलिए उनको प्रश्न है कि सनातन धर्म के मूल तत्व क्या है दूसरा है कि संस्कृत के मूल तत्व है उंगलियों पर गिनाइज भी हो तो सनातन धर्म किन किन तत्वों से निर्मित होता है जरा बताए सनातन तत्व जो है समस्त परमात्मा से ही उत्पन्न होता है सनातन

02:53:50:07 जन्मन जन्म सतो जात वेदा हर चीज जो है सनातन हुई और उसमें सन्निहित जो किया गया सनातन पुरुष कल्पा दीश आद अनाद पुरुष उनमें वह तत्व जो है हर समय रहते हैं अब कौन सी स्तु 13 मिनट पूरा हो चुका है दो मिनट में अपने विषय का उ संहार कर दीजिए आपने उंगलियों पर तत्व गिनने को बोला था आगे उपसर कीजिए तत्व तो ऐसा है ना समस्त तत्व जो है परमात्मा ही है कि समस्त तत्व परमात्मा का हीमा प्रमाण प्रमाण चाहिए हा देखिए ऐसा है प्रमाण के लिए तत्व ऐसे है जैसे वात्सल आता है माता को तो वात्सल आते ही भले ही वो दूध पिलाने का नहीं है तो उनके दूध आने लग जाता है यह तत्व है जैसे किसी के बच्चा नहीं हुआ है तो उसके आचल में कभी दूध नहीं आएगा यह चलित सनातन बता रहा हूं मैं और जैसे ही बच्चा आने को होगा उसके आचल में दूध आ जाएगा यह उसका तत्व है इसी प्रकार के गर्भधान संस्कार नारी शक्ति के लिए दिया है वह गर्भ केवल उन्हीं में ही लेकिन

02:55:05:09 पुरुष जो है सदा पुरुष संगता बिना पुरुष के संगत के जहा प्रकृति पुरुष वाली बात आएगी तब तक इनके तत्वों को एक दूसरे का बोधक नहीं करेंगे तब तक वह चीज उत्पन्न नहीं होगी लेकिन भगवान की जो बात है अपने इच्छा के द्वारा समस्त जैसे हमारे शब्दों की वेदों की जो ऊर्जा हैं हमारे वेदों की शब्द जैसे ज्यादा ज्यादा से करोगे तो वह ऊर्जा अपने अंतर से ही तत्व प्रकट होते हैं वह सनातन तत्व है और उनके लिए क्रमश हमारे लिए मिलता है जैसे हम पिता बाबा दादा गोत्र हमारे संकल्प में दिया गया है उसी के द्वारा हमें सभी चीजें आप यह चाहो कि एक दूसरे की चीज एक दूसरे से पूर्ति कर लोगे वह पूर्ति नहीं होगी जैसे हमारे जो तत्व है सोने का तो सोने का तत्व सोने में ही मिलेगा लेकिन वह तत्व पीतल में नहीं मिलेगा समय आपका समय आपका पूर्ण हुआ प्रश्न उत्तर का समय है कोई भी समूह प्रश्न उत्तर करना चाहे सभ्य भाषा में मर्यादित भाषा में में किसी भी प्रकार का कोई अग्रेशन नहीं बड़ी

02:56:20:14 शांत तरीके से कीजिएगा वही है हां पूछेगा आप समूह में है आप समूह में है उनको भी रोक दिया बाद में आना समूह से अरे बाद में हम अरे सुनिए आचार्य जी आप उनको भी दो तीन बार नहीं आने दिया मैंने वो तो लास्ट की बात हो गई अरे तो सबको ही रोक रहे हैं हम तो किसी को पक्षपात के आचारी भर आचार्य भर आपने मूल तत्वों को उंगलियों पर गिलाने के लिए महाराज श्री ने कहा लेकिन वह हमें प्राप्त नहीं हुए लेकिन सनातन और संस्कृति के छरण का उपाय क्या है यह और बता दीजिए सनातन संस्कृति का क्षरण का कारण क्या है इसके उपाय बता दीजिए जो छरण हो रहा है यह संस्कृति समाप्त हो रही है उसका देखिए सनातन सत्य है जो त्रिकाल में व्याप्त है हम नहीं थे उससे पहले भी था हम थे जब भी है हम नहीं रहेंगे जब भी रहेगा सनातन उसको कहते हैं जो आज काल हमसे पहले भी है हम है जब भी है और हम नहीं रहेंगे जब भी रहेगा

02:57:37:08 हम लोग अपनी वृत्तियों के और हमारी लक्षण बताए उनका पालन नहीं कर रहे इसलिए चरण हम ही लोग कर रहे हैं माते पालन नहीं कर रहे इसलिए हम च कर रहे कोई दूसरा नहीं आ रहा है हम आक्षेप लगाते अन पर विद लोगों पर सब बा गलत है कर इसलिए उसका चरण होहा है का पान कर

02:58:18:09 पर उपाय क्या है हमें उपाय क्या करना है समाज में संस्कृति का उपाय क्या है शांत भाषा में सबसे बड़ा उपाय है जो हमारे ग्रंथों ने हमें सन्निहित कर्म दिया है स्वे कर्मण भरत सं लते नर स्वधर्मा चम सत्या धर्मा निवत जो अपने स्वधर्म का संचालन करता है तो जैसे पुत्र आता है उससे पहले आंचल से दूध आ जाता है पृथ्वी में एक बीज भी ठीक है ठीक है ठीक है और कोई प्रश्न

02:59:01:27 हां अध्यक्ष महोदय अच्छा ओ अगर सभी के प्रश्न प्रति प्रश्न हो गए हो चलिए आप आप कर लीजिए पूछिए भैया ओम ओ दर्शको में से दर्शको में अभी पंडित जी जब सनातन की परिभाषा कर रहे थे तो उन्होंने कहा था कि सनातन वह है जैसे जो सत्य है जैसे चला आ रहा है जैसे मुंह से भोजन करते हैं तो मुह से ही किया जाएगा अन्य जगह से नहीं कर सकते तो उससे पहले स्वामी जी यहां से बोल रहे थे कि भाई इसी चीज को तो मानो कि जो बच्चा पैदा करने की बात हो रही थी कि बालों से नाक से कान से तो वो भी तो एक ही जगह से होना चाहिए जैसे भोजन एक जगह से कर रहे हैं उसी प्रकार वो भी तो एक ही जगह से होना चाहिए वो अलग अलग क्यों जा रहा है यह बात आई थी देखिए भैया हमारी दृष्टि आप आप उत्तर देना चाहेंगे इनको ये उत्तर दे रहे

03:00:07:21 हैं वाह राजनय वेद में लिखा है ब्राह्मणो से मुख मासी वेद में लिखा है यह क्या है ओ बाहु से क्त्र उत्पन्न हुए मुख मंडल से ब्राह्मण उत्पन्न हुए और दूसरी बात आज आप कह रहे हो कि श्रद्धेय दयानंद जी महाराज का जो दर्शन है वह वैज्ञानिक है तो आज का विज्ञान तो बहुत कुछ उतल फतल कर रहा है तो कुछ चीजें समसामयिक होती हैं परिस्थिति जन्य होती है और इसी प्रकार से क्षेपक आदि का भी अर्थ लगाना पड़ेगा जिनको हम बहुत गलत समझते हैं कई बार समझने के बाद व बहुत अच्छी भी निकलती है चीज जैसे आपने पूछा था कि ब्रह्मा जी का ब्रह्मा जी का जो पूछा था शिव पुराण की उमा संगीता में लिखा हुआ है ब्रह्मा जी को उन्होंने ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी की गरुड़ जी एक हंसिनी पर आकृष्ट थे ब्रह्मा जी ने उनकी हसी उड़ाई थी तो यह साप लगा था और इसीलिए उनकी पूजा बंद हुई थी लेकिन इसके मूल में इस तरह का क्यों हु कोई प्रश्न कोई प्रश्न उत्तर नहीं मैं आगे इस काकम की श्रंखला को शास्त्रार्थ की श्रंखला को यही समापन संपन्न करता हूं आगे अतिथियों

03:01:23:02 हा हा जी हा नहीं तो आधा मिनट के अंदर आधा मिनट किसी को नहीं सारे माइक बंद कर दीजिए नीचे के ऊपर का माइक चालू रखिएगा है ना और मैं निवेदन करना चाहूंगा आदरणीय श्री डॉक्टर सुरेश आप पहले मुख्य अतिथि का निर्देशन हुआ है कि वह मुख्य अतिथि जी पहले अपने शब्द अच्छा ठीक है मैं डॉक्टर श्री सुरेश शी जी से कहना चाहूंगा कि वह मर्यादित समय में अपना सुस्पष्ट संक्षेप में वक्तव्य देकर के क्योंकि कार्यक्रम थोड़ा सा लेट चल रहा है और अतिथियों को भी कष्ट हो रहा है क्योंकि वह तो समय से ही पधारे थे और समय से पूर्व पधार गए थे इसलिए हम क्षमा याचना करते हैं बाकी आप अपना संक्षेप में वक्तव्य वो कीजिए और अपना जो नंबर दिए वो हमें दे जाइए आप आ

03:02:13:24 जाइए समय आप जितना भी पाच मिनट बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय अध्यक्ष महोदय निर्णायक मंडल समस्त शास्त्रार्थ में समाग विद्वान मंडल उपस्थित श्रोताओं माताओं बहनों आज जो शास्त्रार्थ चर्चा

03:02:51:13 जो विद्वान मंडल एकत्रित हुआ है उपस्थित चर्चा से यह लगता है कि शास्त्रार्थ नहीं बल्कि शास्त्र चर्चा हो रही है केवल शास्त्र चर्चा देखिए शास्त्रार्थ के बहुत से प्रकरण मैंने पढ़े हैं उनके पहले से ही नियम और सारी चीजें तय होती हैं और बादी वादी एक दूसरे के से बात करते हैं नियम के अंतर्गत यहां भी नियम का पालन हो रहा है लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिरकार बात एक व्यक्ति कह रहा है जैसे वो प्रश्न था कि भारतीय संस्कृति में जो आक्षेप है उन आक्षेप का निराकरण अगर हम कर सकते हैं तो हमें क्यों नहीं करना चाहिए कल्पना कीजिए हमारे जो बहुत सारे शास्त्र हैं उनमें ऐसी ऐसी मिलावट हुई हैं और हमारे ऐसे प्रतिष्ठित लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों ने की हैं जिनको अगर आप स्वयं भी पढ़ लेंगे तो कहेंगे कि ऐसा नहीं होना चाहिए फिर अगर उनको हटाने की बात कही जाती है

03:04:06:16 तो हमें विरोध क्यों हमें शास्त्र चर्चा करनी है और शास्त्र चर्चा पर ही हमें आधारित होना चाहिए हमें इसमें विरोध का प्रदर्शन चाहे यह पक्ष हो चाहे वो पक्ष हो विरोध का प्रदर्शन या उग्र भाव प्रदर्शित नहीं करना चाहिए मैं जानता हूं ऐसा लगता है कि हम जिन मान्यताओं में बहुत समय से चले आ रहे हैं उन मान्यताओं पर कोई व्यक्ति आक्षेप करता है तो हृदय को ठेस लगती है क्यों हम उसी मान्यता में चल रहे हैं परंतु अगर उसमें कहीं पर हमने जब यह बात कह दी कि प्रकृति के आधार पर समय के आधार पर जिन चीजों को समझना चाहिए अगर नहीं समझेंगे तो आज हम पछ जाएंगे समाज कहां जा रहा है किस रूप में जा रहा है देश की स्थिति क्या है परिस्थिति क्या है उसको हमें समझना होगा अगर नहीं समझेंगे तो शास्त्र चर्चाओं को करने का भी हमको मौका नहीं मिलेगा परिस्थितियां वो बनती जा रही है इसलिए आज समझिए सभी लोगों को समझना चाहिए कि हम शास्त्र चर्चा मिलकर करें परस्पर विचार विश करें और ढंग से विचार करके उन निर्ण उन पर निर्णय ले और उनके आधार पर समाज को चलने का निर्देश करें हम किसी को कुछ सम ते रहेंगे आप किसी को कुछ समझाते रहेंगे इससे कभी समाज का भला

03:05:21:25 नहीं होगा हम दो विद्वान अगर लड़ते रहते हैं तो फिर वही कहावत सिद्ध होगी कि दो विद्वान किसी घर पर गए एक ने कहा यह बैल है एक ने कहा ये गधा है यजमान ने दोनों के लिए जो है गधा घास और भूसा धर दिया जब उनको असलियत पता लगी कि हमारे ही व्यक्ति ने हमको यह गलत कहा तो ये बड़ी हास्यास्पद स्थिति होगी उस हास्यास्पद स्थिति से बचने के लिए हमको चाहिए कि परस्पर शास्त्रों में आई हुई बातों पर चिंतन करें और उनके सही निर्णय करने के लिए उनको वैज्ञानिक तरीके सिद्ध करने के लिए हम प्रयास करें ऐसा नहीं है कि हम कर नहीं कर सकते कर सकते हैं इसलिए उसका प्रयास करना चाहिए धन्यवाद आदरणीय का बहुत-बहुत साधुवाद पुनः इस क्रम को ना रोकते हुए आगे पंक्ति में चलते हुए मैं आदरणीय श्री डॉक्टर अशोक रुस्त कीी जी से निवेदन करूंगा कि संक्षेप शब्दों में अपने शब्दों में जो शास्त्रार्थ हुआ है उसके ऊपर टिप्पणी इत्यादि जो भी करना चा कहना चाहे कर

03:06:28:16 सकता धन्यवाद मैं मंच को नमन करता हूं प्रणाम करता हूं यहां उपस्थित सभी विद जनों को जो विभिन्न टीम यहां पर आई है जिन्होने बहुत ही विता पूर्ण ढंग से अपने शास्त्रों के संदर्भों को देते हुए अपना पक्ष रखा है सभी का पक्ष बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से सबने रखने का प्रयास किया है यह परंपरा बड़ी श्रेष्ठ परंपरा है और मैं इस परंपरा को नमन करता हूं प्रणाम करता हूं इसी से सत्य सत्य का विच्छेदन होगा और तर्क सम्मत ढंग से जो सत्य सनातन वैदिक धर्म की परंपरा है जो मान्यताएं है वो पुष्ट और सवल होंगी बहुत-बहुत आभार बहुत बहुत

03:07:31:28 धन्यवाद आदरणीय प्राचार्य साहब का बहुत-बहुत धन्यवाद बहुत-बहुत आभार और इसी श्रंखला में मैं आगे निवेदन करना चाहूंगा डॉक्टर श्री देवेंद्र शर्मा जी को आप आए अध्यक्ष वेद विभाग एव निदेशक मंत्र प्रतिष्ठान राजस्थान संस्कृत विद्यालय य जो शास्त्रार्थ हुआ है उस पर अपना मत टिप्पणी इत्यादि जो भी है उसको प्रस्तुत करें ओम विश्वानि देव सवित दुरिता परास जरत आसव नम सभ सभापति यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि श्री नरहरि ज्योति शोध संस्थान के द्वारा सौरव जी के इस पवित्र क्षेत्र में यह शास्त्रार्थ का कार्यक्रम आयोजित किया गया दोनों ही पक्षों के विद्वानों ने अपने अपने मत के अनुसार बहुत अच्छा प्रस्तुत किया शास्त्र प्रमाण सहित यह सभी लोगों को देखने का अवसर प्राप्त हुआ और यह हमारी जो प्राचीन परंपरा है यह इस समय में भी सौरव क्षेत्र में चल रही है यह बहुत ही गौरव का विषय है इस हेतु मैं इस संस्थान के समस्त

03:08:46:28 अधिकार यों को बहुत धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने इस परंपरा को बनाए रखा है और आगे भी इस प्रकार के आयोजन करते रहे आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार आदरणीय श्री देवेंद्र गुरु जी का बहुत-बहुत धन्यवाद अब अगली पंक्ति में जिनको हम सुनना चाहते हैं और जिन्ह सुनना चाहिए और जिनको सुनने के लिए बहुत बड़ी बात नहीं कहूंगा कि राजस्थान का प्रत्येक व्यक्ति लालायित है और बहुत अच्छे वक्ता हैं और गुरु परंपरा से आप पढ़े हुए हैं आदर विद्वान श्री आदरणीय श्री डॉक्टर शास्त्री कौशलेंद्र दास जी आप आए और शास्त्रार्थ के परिपेक्ष में हुए शास्त्रार्थ के परिपेक्ष में अपना मंतव्य टिप्पणी इत्यादि संबोधित करें और मार्ग प्रशस्त

03:10:08:20 करें सीतानाथ समारंभा रामानंद मध्यमाम अस्म चार्य पर्यंत वंदे गुरु परंपराम श्री नरहरी ज्योतिष संस्थान की तरफ से इस पवित्र पुण्यत भगवान बराह की भूमि में आज विद्वानों ने हमारे पुरातन शास्त्रों को लेकर के जिन विचारों को यहां व्यक्त किया वह वास्तव में यही वैदिक सनातन धर्म की एक प्रशंसा एवं विशिष्टता है कि इस शास्त्रार्थ को देख कर के आप लोगों को पता लगा होगा कि हम लोग कुरान और बाइबल क्यों नहीं है हम क्यों एक किताब वाले लोग नहीं है एक ही किताब से हम क्यों संचालित नहीं होते हमारे यहां तो रुचि नाम वै चित्र रिजु कुटिल नाना पथम रणाम एक गम्यम पय साम अरवा अनेक विद्वानों ने महाभारत में जो धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा न को ऋषि यस्य मतम प्रमाणम ऐसा कोई ऋषि नहीं दिखाई पड़ रहा है कि उसी का मत प्रमाण है व यह घोषणा कर दे यह चिंतन की विचार की हमारे यहां उत्कृष्टता है है कि व्यक्ति जिस चीज पर विचार करता है उसको लिखता है वैदिक सनातन धर्म के

03:11:23:21 आध्यात्मिक गगन में वेदों से प्राप्त ज्ञान राशि का प्रयोग करके भगवान वाल्मीकि भगवान व्यास तमाम सूत्र का आचार्य भगवान शंकराचार्य भगवान रामानुजाचार्य भगवान रामानंदाचार्य भगवान निबार काचार्य भगवान वल्लभाचार्य भगवान मधवा चार्य और उसी परंपरा में श्रद्धेय दयानंद सरस्वती जी ने जिस प्रकार प्रकार से शास्त्र को उपस्थित किया वह अनुपम है अनूठा है लेकिन कई बार क्या होता है कि संप्रदायिक सांप्रदायिक निष्ठा के कारण हम लोग अपने संप्रदाय के प्रति अत्यंत दृढ़ हो जाते हैं न्याय सूत्र के भाष्य का वार्तिक का उद्यो करर ने एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात लिखी है संप्रदाय कहते किसे हैं क्या होता है संप्रदाय हम लोग रामानंद संप्रदाय दयानंद संप्रदाय शंकर संप्रदाय पुराण संप्रदाय वेद संप्रदाय यह संप्रदाय है क्या इसको परिभाषित करते हुए वार्तिक का उद्योग करर ने लिखा शिष्या चार्य संबंध अ विच्छेदन शास्त्र नाम संप्रदाय शिष्य और आचार्य के जो अविच्छिन्न शास्त्र को प्राप्त करने की एक परंपरा है वह संप्रदाय है और जब हम उस परंपरा से ज्ञान को प्राप्त करते हैं तो निर्विवाद रूप से हम लोग उस संप्रदाय के प्रति आग्रह रखते

03:12:38:28 हैं हमारे चिंतन पर हमारे प्रकार की बातें होती है लेकिन एक बात जो आपने कही वो मुझे बहुत अच्छी लगी यह विविधता ऐसा नहीं है कि वेदों के बाद पुराणों में ही दिखी जा रही है ना ना ना वेद खुद कह रहे हैं एकम सद विप्रा बहुधा वदंती बहुधा शब्द का प्रयोग कर दिया वह तत्व एक है उसको विद्वान अनेक प्रकार से कहते हैं विचार हैं लिखते हैं बोलते हैं यही हमारे यहां एक बहुत बड़ा सौंदर्य है कि सनातन काल से शास्त्रार्थ की जो परंपरा है उपनिषदों में हम लोग पढ़ते हैं महर्षि याज्ञवल्क्य के यहां किस प्रकार से शास्त्रार्थ की परंपरा थी भगवान शंकराचार्य का मिथिला का शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है दक्षिण भारत में शास्त्रार्थ की शास्त्रों में सुदीर घ परंपरा है व्याकरण शास्त्र में इतनी भयंकर परंपरा है शास्त्र की कि आदमी उसको देख कर के भाग जाए मैदान छोड़ कर के कि मुझे शास्त्रार्थ करना ही नहीं है ऐसी स्थिति में आज जो यह पवित्र कृत्य यहां संपादित हुआ इसमें जिन प्रतिभागियों ने यहां स्थान ग्रहण किया और इसको सुंदरता प्रदान की इसको निष्कर्ष प्रदान किया यह शास्त्रार्थ परंपरा भगवान करे यहां तो तीन दिन की बात हो रही थी मैं तो भगवान से प्रार्थना करता हूं कि य शास्त्रार्थ 300 दिन चले कम से कम

03:13:54:03 तीन दिन नहीं चले जिसमें वेदों पर चर्चा हो पुराणों पर चर्चा हो रामायण पर चर्चा हो महाभारत पर चर्चा हो और हमारे यहां तो इतनी महत्त्वपूर्ण बात है यह भगवान वराह की भूमि है भगवान वराह जिनको वैदिक सनातन धर्म अनाद काल से पूछता आ रहा है मैं एक श्लोक लिख कर के लाया हूं वराह अवतार का उल्लेख करते हुए एक शूक प्रस्तरा अभिलेख जो पांचवी शताब्दी का है उसमें बहुत सुंदर श्लोक हमें प्राप्त होता है जिसमें भगवान वराह की महिमा है इस अनुष श्लोक को आप लोग श्रवण कीजिए यहां लिखा है जयति धरण धरण घण घणा घात ूर्त महिद्र देवो वराह मूर्ति त्रैलोक्य महा गृह स्तंभ यह एक शुकर प्रस्त अभिलेख में भगवान बराह के ऊपर लिखा हुआ है और हम सब लोग तो उस परंपरा के लोग हैं जहां सामने वाले को बात कहने का इतनी स्वतंत्रता है और आश्चर्य की बात देखिए आप हम सब लोग हिंदू है जो निर्गुण को पूछ रहे हैं वो भी हिंदू है जो सगुण को पूछ रहे हैं वो भी हिंदू है और जो दोनों को नहीं पूछ रहा वो भी हिंदू है वो कह रहा है मैं निर्गुण सगुण ईश्वर को मानता ही नहीं हूं तुम लोग लड़ते रहो आपस में मेरा ईश्वर से कोई लेना देना नहीं है मैं पूछता ही नहीं हूं वह भी हिंदू

03:15:09:08 है यहां महात्मा कबीर दास हिंदू है या गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज हिंदू हैं यहां सारे विचारों को लेकर के जिस प्रकार एक सुंदर पुष्प स्तक तैयार हुआ है यही भारतीय दर्शन की परंपरा आप देखिए हमारे अध्यक्ष जी कह रहे थे प्रारंभ में कि धर्म की क्या परिभाषा है मैं ईमानदारी से इस बात को कह रहा हूं कि यदि आदमी धर्म की परिभाषा इकट्ठी करने लगे तो ही कम से कम 100 200 धर्म की परिभाषाएं हमको ग्रंथों में उपलब्ध होने लगेगी रामायण तानी धर्मानी प्रथमा नि आसन वेद ने धर्म शब्द का प्रयोग बहुवचन में किया है तानी धर्मानी प्रथमा नि आसन एकवचन में नहीं कर रहा इसका मतलब अब वे जितने धर्म हैं वे सारे धर्म हनुमान जी प्रतिपादित करते हैं राम जी करते हैं कृष्ण करते हैं अर्जुन करते हैं युधिष्ठिर करते हैं व्यास करते हैं वाल्मीकि करते हैं हमारे आचार्य करते हैं इसी से यह स्पष्ट है कि हम सब लोगों का परस्पर सौहार्द बने और हम सब मिलकर के वह काम करें जिससे वैदिक सनातन धर्म मजबूत हो हमारे विरोधियों को हम सही उत्तर देते रहे इसीलिए हमारे यहां शास्त्र के निहितार्थ को प्रकट करने के लिए लिए शास्त्रार्थ की परंपरा थी आप सब लोगों को मैं प्रणाम करता हूं और परमपिता परमात्मा श्री वराह भगवान से प्रार्थना

03:16:24:16 करता हूं कि आप सबको और ऊर्जा दे और शक्ति दे और शास्त्र में हम लोगों की मति लगे और इस प्रकार के शास्त्रार्थ कार्यक्रम होते रहे मैं हमारे कुलपति महोदय को निवेदन कर रहा था य पास में गंगा जी हैं किसी भक्त ने क्या कहा वो इतना अद्भुत है उसने कहा साहब ना तो मैं साकार को मानता हूं ना मैं निराकार को मानता हूं तो पूछा भाई फिर तुम किसको मानते हो तो उसने कहा निराकार उपासम मैं तो इस निराकार गंगा की पूजा करता हूं जो लोगों को जीवन देती है जल देती है तमाम फसले देती है अब आप देखिए निराकार साकार निराकार यह गंगा को पूजने वाला धर्म है यह गौ माता को पूजने वाला धर्म है यह तुलसी को पूजने वाला धर्म है यह मिट्टी को पूजने वाला धर्म है यह राम और कृष्ण को पूजने वाला धर्म है यह भीम और अर्जुन को पूजने वाला धर्म है यह विवेकानंद रामानंद और दयानंद का धर्म है यह धर्म बहुत बढ़े इसकी वृद्धि हो यही मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं जय जय

03:17:30:13 सीताराम आदरणीय श्री कौशल जी का बहुत-बहुत धन्यवाद बहुत-बहुत आभार इस अतिथि की श्रंखला में जिन्ह हम सुनने बैठे हैं और अपना बहुत बेश कीमती समय निकाल कर के हमा हमारे बीच में जो मध्य पधारे हैं अपने व्यस्ततम कार्यकाल में से और इस अवस्था में भी आपके पास इतनी ऊर्जावान है कि रात तक आप पहुंचे उसके बाद भी हमसे संवाद किया उसके बाद समय से पूर्व यहां पहुंच गए उसके बाद निरंतर डटे हुए हैं आपकी ऐसी ऊर्जा देख कर के हमें उत्साह बनता है हमें प्रेरणा मिलती है ऐसे आदरणीय श्री कुलपति महोदय को मैं आवा हैतू निवेदन करूंगा कि आप आए और अपने शब्दों में आशीर्वचन प्रदान

03:18:35:18 करें गंगा तरंग रमणीय जटा कलाप गौरी निरंतर विभूषित म भागम नारायण प्रिय मन मदा प हारम वाराणसी पुर पतिम भज विश्वनाथम वंदे बोध मयम नित्यम गुरुम शंकर रूपिम यमा सतो हीव क्रोप चंद्र सर्वत्र वंते

03:19:22:16 श्री नरहरी ज्योतिष शोध संस्थान के द्वारा आयोजित इस शूकर तीर्थ क्षेत्र में आज इतने विद्वानों को देख कर के मन में बहुत ही अलाद हो रहा है इस शास्त्रार्थ स्पर्धा में मंच पर विराजमान इस कार्यक्रम के अध्यक्ष परम समा

03:19:56:16 आदरणीय पूर्व न्यायाधीश माननीय उपाध्याय जी इस मंच पर अनेक शास्त्रों के निष्णात आचार्य भी विद्यमान है शास्त्री कौशलेंद्र दास जो जगतगुरु रामानंद आचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन संघ का अध्यक्ष हैं वेद वेदांत पुराण इत्यादि पर आपके बहुत ही आपकी दक्षता

03:20:31:07 है मंच पर विराजमान और वक्ता जगतगुरु रामानंद आचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के वेद विभागाध्यक्ष डॉक्टर देवेंद्र शर्मा जी इस क्षेत्र के परम सम्मान दो वक्ता और बैठे हैं जिनसे मैं आज ही पहली बार मिला हूं और शास्त्रार्थ में चार संवर्ग में बैठे हुए अलग-अलग अपने अपनी अपनी अपनी विधा के शास्त्रों में नाथ आचार्य गण इस सभा में उपस्थित इस तीर्थ क्षेत्र में पधारे हुए संस्कृत शास्त्र के अनुरागी गण देवियों सज्जनों

03:21:32:10 बंधुओ सबसे पहले तो मैं आज बधाई दूंगा इन आचार्यों को जिन्होंने अपनी अपनी मान्यता को बड़ी ही मजबूती से बहुत ही बलव पूर्ण ढंग से स्थापित किया वह चाहे जिस भी सिद्धांत के समर्थक रहे हो लेकिन सब लोगों ने अपनी अपनी बात को रखा एक बार ऐसा

03:22:07:22 हुआ कि महासागर से निकल कर के एक मेढक बाहर निकल आया और एक कुए में जाकर के गिर पड़ा कुएं में बैठे हुए जितने मेढक थे उन्होंने पूछा भाई साहब आप कहां से आए उन्होंने कहा कि मैं महासागर से आया हूं कहाय क्या होता है महासागर कहा रे महासागर आप नहीं समझोगे आप उप मंडूक हो बहुत अगाध अनंत है महासागर हम वहां से आ रहे हैं तो एक मेढक उस कुए में दौड़ा थोड़ी देर ऊपर नीचे नीचे ऊपर इधर उधर गया कहा इतना बड़ा होगा तुम्हारा महासागर अरे कहा क्या कमाल करते हो बहुत बड़ा है महासागर हमारा तो एक दूसरा मठक करीब 10 मिनट उस कुए में ऊपर से नीचे नीचे से ऊपर दौड़ता रहा कहा इतना बड़ा होगा फिर उसने संतोष नहीं व्यक्त किया तो तीसरे ने कहा तीसरा जो कूप मंडूक था वो दौड़ा आधे घंटे तक जब थक गया तो उसने कहा कि अब इससे तुम्हारा महासागर नहीं हो सकता हम सारे लोग

03:23:23:18 कहीं ना कहीं किसी एक शास्त्र में बधे पड़े हुए हैं हमारा शास्त्र अनंत है हमारे वेद अपुष है अभी वेद की चर्चा आचार्यों ने की हम लोग पढ़ते हैं कि यह वेद तस निस उस परमात्मा से निस ग वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद इत्यादि है जो कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा को मिलता है और ब्रह्मा त स्वरूप सृष्टि करता है ऐसी मान्यता हम लोग सुनते

03:24:03:16 हैं देखिए शास्त्रों को समझने के लिए हम लोग प्रमाणों का आश्रय लेते हैं इसीलिए जो बड़े विद्वान होते हैं उनको कहते हैं पद वाक्य प्रमाण कोई शब्द से समझता है जब शब्द से समझ नहीं आता तो वाक्य का अर्थ संगत करता है और तब भी नहीं समझ में आता तो वह प्रमाणों को खोजता है और प्रमाणों के विषय में हमारे शास्त्रों में भी कोई एक प्रमाण मानता है प्रत्यक्ष कोई दो प्रमाण मानता है प्रत्यक्ष अनुमान कोई तीन मानता है जैसे सांख्य दर्शन वाले हैं व प्रत्यक्ष अनुमान और उपमान नैया को ने कहा कि नहीं प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और शब्द मी मांस को ने कहा कि नहीं हम दो प्रमाण और मानेंगे अर्था पति और आप लोग सुन नहीं रहे हमारी बात मैं आप लोगों को अपनी मंतव्य अपना मंतव्य जो है व सुना रहा हूं और पौराण कों ने कहा कि नहीं हम तो आठ प्रमाण मानेंगे तो देखिए पुराणों में क्या लिखा हुआ है इसको सुन कर के केवल एक पंक्ति से उसका

03:25:18:21 निर्णय कर लेना मुझे ऐसा लगता है कि यह हमारी निष्पक्ष निर्णायक भूमिका नहीं नहीं होगी ए परा विद्या और अपरा विद्या अपरा विद्या के द्वारा हम परा विद्या की प्राप्ति करते हैं यह अपरा विद्या से हम सामान्य ज्ञान करते हैं और परा विद्या से हम विशेष ज्ञान करते हैं श्रीमद् भगवत गीता का वह श्लोक आप लोगों याद है बड़े बड़े विद्वान यहां बैठे हैं उन्होंने कहा कि सगा नामद रत मध्यम चव अ अर्जुन अध्यात्म विद्या विद्या नाम वाद प्रवता वाद भगवान कृष्ण ने कहा कि सर्ग का मैं सृष्टि का आदि अंत और मध्य में ही हूं विद्याओ में मैं अध्यात्म विद्या हूं और शास्त्रार्थ की जहां परंपरा चलती हो वहां मैं क्या हूं वाद हूं लेकिन जब हम विजय प्राप्त करने की इच्छा से शास्त्रार्थ करते हैं तो वहां वाद के साथ साथ हम जल्प का भी आश्रय लेते हैं विंडा का भी आश्रय लेते हैं हमें

03:26:33:27 शास्त्रों को पढ़ना पड़ेगा गीता में भगवान कृष्ण ने यह भी कहा कि बुद्धिमान का य दायित्व है कि सामान्य ज्ञान रखने वाले लोगों को दि भ्रमित ना होने दे तो यह शास्त्र का परम कर्तव्य है कि सभी शास्त्रों का समन्वय ठीक से करें और समन्वय के बाद केवल अपनी बात को मानने के लिए अपनी बात को मनवाने के लिए ऐसे तर्क ना करें जो कि जनता जनार्दन में मतभेद पैदा करें संदेह पैदा करे और शास्त्रों के प्रति हमारी आस्था को कमजोर कर दे तो मेरा ये निवेदन है आचार्यों से शास्त्रार्थ अपनी परंपरा के अनुसार जरूर करें लेकिन जब किसी दूसरे के मतवाद को खंडन करना हो तो खंडन करते समय बहुत सारी बातों का ध्यान रखा करें श्रोताओं का इस सभागार में अथवा किसी भी सभागार में बैठे हुए लोगों का उनकी मान्यताओं क्योंकि यह सारी मान्यताएं लोगों के मन में न जाने कब से बध मूल है यह इतनी जल्दी किसी एक मतवाद को मानने वाले विद्वान के कहने से ये हिलने वाली नहीं तो यह हमारा परम दायित्व होना चाहिए हमने शास्त्रार्थ के बहुत सारे उदाहरण

03:27:49:16 देखे शास्त्रों में जहां यावल की चर्चा आई जहां भगवान शंकराचार्य और मंडन मिश्र की चर्चा आई शास्त्रार्थ में तो इस प्रकार के कुछ न कुछ वाक्य कहने ही पड़ते हैं कि अपने आपको को हम बलवान दिखाई दिखाए और दूसरों को कमजोर दिखाई दिखाए लेकिन शास्त्रार्थ में भी जो हमारे श्रुति मूलक तर्क है उन श्रुति मूलक तर्को को हम कभी भी लांजल नहीं दे सकते तर्क वही है जो श्रुति हों के अनुकूल जो वेदों के अनुकूल हो वो तर्क है हमें शास्त्रार्थ में उन तर्को का भी आश्रय लेना पड़ेगा हमेशा हमें उन तर्कों का ध्यान देना पड़ेगा तो बहुत ही आनंद आया बड़े बड़े विद्वानों को सुन कर के आज मन में बहुत ही संतोष हुआ हमारी यह परंपरा आगे बढ़ती चले हम अपनी बात को इसी मजबूती से रखते चले लेकिन इस बात का जरूर ध्यान रखें कि हमारी जो सनातन पद्धति है सनान क्या है सनातन के बारे में भी लोगों को भ्रमित नहीं होना चाहिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा

03:28:55:26 अव नित्य सर्वय सनातन य आत्म तत्व ही सनातन है ये हम इसको जीव को आत्मा को सृष्टि को जगत को ईश्वर को परमात्मा को इन सब में एक समन्वय की दृष्टि से जब चलेंगे तब हम शास्त्र के निश्चितार्थम की शास्त्रार्थ का तात्पर्य ही हुआ कि शास्त्र का निश्चितार्थम को बैठने जानने बैठे हैं दो लोगों की लड़ाई देखने के लिए हम नहीं बैठे अभी मैं कहीं पढ़ रहा था एक बार महाराज जनक के दरबार में एक समस्या आई महाराज जनक ने एक दिन स्वप्न देखा उन्होंने स्वप्न देखा कि मेरा राज्य छिन गया और मैं भीख मांगने लगा और भीख मांग कर के किसी जगह खिचड़ी बनाया खिचड़ी खाने जैसे ही चले हो वैसे ही दो सा लड़ते हुए आए और उस खिचड़ी पर चढ़ बैठे और महाराज जनक खिचड़ी भी नहीं खा पाए स्वप्न में और जैसे ही उन्होंने अपनी तलवार निकाला वैसे ही जाग गए जब जाग गए तो देखा कि उण भी नहीं है ना खिचड़ी ही है

03:30:10:26 वो तो अपने सेना गार में बैठे हुए हैं फिर उन्होंने आकर के अपनी राज स में विद्वानों के सामने प्रश्न किया कहा कि सत्य यह है कि सत्य वो है और जो बताएगा उसको पुरस्कृत किया जाएगा और जो ना बताएगा जो विद्वान उसको तब तक य नजर बंद रखा जाएगा जब तक व बता ना दे सारे विद्वान आते थे वह बताते थे कि सत्य यह है कि सत्य व है अब सत्य यह है कि सत्य व है पता नहीं क्या सत्य है जान ही नहीं पाते थे इसी बीच अ महाशय वहां पहुंचे उनसे भी उनसे पूछा गया कि बताइए सत्य यह है कि सत्य उन्होंने कहा ना सत्य यह है ना सत्य व है कहा क्यों सत्य कोई नहीं है कहा नहीं जब आप स्वपन में थे तो सत्य वह था जो जागते ही खंडित हो गया तो न सत्य व था जो आपने स्वपन में देखा और ना सत्य ये है जो आप जागरण में देखे तो सत्य क्या है इसको जाने के लिए हमें शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ेगा हम वेदों को जानने के लिए जो सड वेद हम कहते हैं हम चतुर्दस शास्त्रों का

03:31:25:27 अध्ययन करते हैं क्यों क्योंकि वेदों का हम निहितार्थ वेदों का मंत्रा वेदों का अक्षरा अथ वेदों के निहितार्थ क्या है और वेदार्थ क्या है हम वेदार्थ को समझने के लिए एक एक अक्षर समझे एक एक शब्द समझे एक एक मंत्र वाक्य समझे तब जाकर के हम कभी निहितार्थ को समझ पाएंगे अथवा हम एकांगी होकर के किसी एक वाक्य को पकड़ कर के बैठे रह जाएंगे और हम जनता के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे कि हमारा शास्त्र वस्तुत कहता क्या है तो मेरा यह विचार है मैं आप लोगों से अनुरोध करता हूं कि जितने भी विद्वान यहां बैठे हैं बहुत ही निर्लिप्त भाव से एक बार पहले सारे शास्त्रों का अध्ययन कर ले चाहे वो जिस भी मतवाद का शास्त्र हो चाहे वो अद्वैत का हो चाहे द्वैत का हो चाहे द्वता दत का हो विशिष्टा दैत का हो साी सभी मतवाद को एक बार पढ़े पढ़ कर के फिर निश्चय पर पहुंचे कि जो उनका मत है वो क्या है अगर अन्य मतवाद को बिना पढ़े केवल अपने मतवाद पर रुके रहेंगे तो मेरी समझ से वो शास्त्र के साथ न्याय नहीं होगा विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं होगा जनता जनार्दन के साथ न्याय नहीं होगा और शास्त्रों के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो

03:32:41:13 विभेद अल्पता वेद वेद डरता है जो अल्प शत है जिनको कम आता है उनसे तो वेद ही डरता है कि कहीं यह मुझ पर ही प्रहार ना कर दे तो हम पहले वेदों पर पढ़े हम जो देखते हैं वही सत्य नहीं ना सत्य ये है ना सत्य वो है कैसे सृष्टि होगी इसको कैसे हम जान सकते हैं सृष्टि का यह विष यह सृष्टि ही अगर हम जान जाते तो इस बंधन में हम फसे रहते क्या सृष्टि से बचने का हमें उपाय मिल जाता तो इस संसार को जानना बड़ा रहस्य है हमारे जितने भी मतवाद हुए इसी संसार को जानने के लिए ही तो हुए तो लेकिन सब में एक बात जो रही वो बड़ी कॉमन रही कि हम अनुशासन में रहते हैं जब हम व्याकरण शास्त्र पढ़ते हैं तो कहते हैं अथ शब्दा अनुशासनम जब हम योगशास्त्र पढ़ते हैं तो कहते हैं अथ योगा अनुशासनम हम एक अनुशासन में रहे लेकिन पहले सारे शास्त्रों का अध्ययन तो कर ले बिना सारे शास्त्रों का अध्ययन किए अगर हम इसी तरह से अपनी बातों को करते रहेंगे तो निश्चितार्थम अपनी वाणी को विराम दूंगा बड़े बड़े आचार्य यहां आए उनकी बात को सुन कर के बहुत आनंद हुआ सब लोगों ने बहुत अच्छी तरह से अपना अपना पक्ष रखा और कोई काटने वाला नहीं है यह अलग बात है कि किसी की

03:33:56:20 शब्दावली में कोई परता रही हो यह अलग बात है कि कोई किसी को खंडन करने के लिए शास्त्रार्थ के नियमों को भूल गया हो यह अलग बात है कि अपनी बातों को सुनने पर अपने विपक्ष में सुनने पर उसको क्रोध आ गया हो यह सारी बातें तो एक मानव स्वभाव के अंतर्गत है आप लोगों ने शास्त्र सुना होगा जब शंकराचार्य और मंडन के शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका में मंडन की पत्नी थी उन्होंने दो माला पहना दिया था और अंत में उन्होंने निर्णय इस बात पर किया कि क्रोध किसको आ गया जिसको क्रोध आया उसकी माला सूख गई तो हम लोग शास्त्रार्थ में क्रोध ना करें हम लोग शास्त्रार्थ में किसी एक सिद्धांत के प्रति इतने आसक्त भी ना हो जाए अन्य सिद्धांतों को स्वीकार करने की उनको सुनने की भी जो मर्यादा है उसको छोड़ दे में आप लोग बड़े निषा है लेकिन मुझे क्योंकि बोलने के लिए कहा गया मुझे जो समझ में आया मैंने अपनी बात रखी आप लोगों को बहुत बहुत धन्यवाद और यह शास्त्रार्थ परंपरा चलती रहे मैं मां गंगा से प्रार्थना करता हूं कि इस तरह के आयोजन शुभम जी उपाध्याय जी करते रहे और अपने शास्त्रों के सभी पक्षों को विविध पक्षों को सुनते रहे क्योंकि जब तक सभी पक्षों को नहीं सुनेंगे तब तक

03:35:11:24 हम निर्णय पर नहीं पहुंचेंगे एक बार इसी तरह से एक अपने गुरु जी के पास गया उसने कहा गुरु जी एक वेदांत का सिद्धांत है समझ में नहीं आया कहा क्यों नहीं समझ में आया कहा एक आचार्य के पास गया मैं उन्होंने इस प्रकार समझाया तो उन्होने कहा उन्होंने ठीक समझाया कहा लेकिन दूसरे आचार्य के पास गया तो उन्होंने उसका विरुद्ध समझा दिया कहा उन्होंने भी ठीक समझाया कहा ये कैसे हो सकता है दोनों विरुद्ध बातें कहा तुम भी ठीक कह रहे हो तो सब आदमी ठीक ही कह रहे हैं ऐसा नहीं हो सकता कि सब लोग ठीक कह रहे हैं ठीक तो कोई एक होगा इसलिए हमें अध्ययन करना पड़ेगा अध्ययन करने के बाद ही हम शास्त्रों पर चैलेंज कर सकते हैं अन्यथा नहीं अन्यथा तो सारी बातें ठीक है आज यह मंच इसलिए भी बड़ा समर्थ रहा यहां बड़े बड़े न्यायाधीश बैठे रहे जो बड़ी उलझी हुई गुयों को समझाते रहे सुलझा रहे और उन्होंने शास्त्रों में भी आज प्रवेश करके किस प्रकार से आप लोगों के साथ संवाद किया आप लोगों ने देखा तो ये शास्त्रार्थ वाद है विवाद नहीं यह संवाद है इसमें प्रतिवाद नहीं है हमें वादे वादे जाते तत्व बोध का हमेशा ध्यान रखना पड़ेगा तभी हम अपने विषय का ठीक से स्थापन कर पाएंगे

03:36:27:19 बहुत धन्यवाद नमो नम आदरणीय का बहुत-बहुत आभार बहुत-बहुत धन्यवाद आपके वक्तव्य से एक श्लोक मुझे या है यदा किंचित योह दप वव मदान सवम यदा किंचित किंचित बुध जन सका दव गतम तदा मूर्खो स्मति ये जब हम थोड़ा थोड़ा जानते हैं एक सीधी हिंदी में कहावत है कि थोथा चना और बाजे घना तो जब आदमी थोड़ा थोड़ा कुछ कुछ कुछ कुछ जानने लगता है तो उसको मद आ जाता है कि आहा हम सर्वज्ञ स्मति उसको ये मद आ गया कि मैं सब कुछ जानता हूं यदा किंचित किंचित बुध जन सका अवगत जब वो धीरे धीरे विद्वानों की शरण में आप जैसे गुरुओं की शरण में जाने लगता है समझने लगता है तब उसको पता चलता है अरे मैं तो मूर्ख हूं मैं अब तक तो क्या समझ रहा था इसी प्रकार

03:37:36:01 आप आपके विषय में कहा जाए विद्वानों के विषय में कहा जाए संतों के विषय में विद्वान ही संत है क्योंकि वो जो विद्वान वही है जो आचरण में भी उतारे गंगा पापम शश तापम दैन्यं कल्प तरस तथा तापम दैन्यं कल्प तरस तथा पापम तापम च दैन्यं च सद्य साधु समागमा आपने जिस प्रकार वक्तव्य दिया कहते हैं कि गंगा पापम जो गंगा मां है वह सारे पापों का हरण कर लेती है शशि तापम चंद्रमा ठंडा होता है तो सारी ठंडक सारी गर्मी को विनट कर दे और जो कल्पतरु होता है कल्पतरु के नीचे बैठ कर के जो भी स्मरण किया जाए जो भी कामना की जाए वह सत्य हो जाती है ऐसे ही आप गुरुओं के चरणा श्रय है आप गुरुओं के चरण रज है जहां पर बैठ कर के पाप ताप और दीनता सब विनट हो जाती है ऐसे श्री कुलपति महोदय का मैं पुनः पुनः पन पुण्य स्वागत और धन्यवाद करता हूं नमन करता हूं वंदन करता हूं अब क्योंकि शास्त्रार्थ कार्यक्रम

03:38:48:25 अपने विश्राम की ओर है विश्राम ही कहेंगे क्योंकि पुनः शास्त्रार्थ सत्र कभी ना कभी आरंभ होगा फिर दोबारा ऐसे विद्वानों का आगमन होगा फिर वही चर्चाएं चलेंगी वही शास्त्रों का अवलो लोडन होगा तो मैं इसी विश्राम की श्रंखला में इस कार्यक्रम के सत अध्यक्ष न्यायाधीश श्री एसस उपाध्याय जी को निवेदन करता हूं कि वह अपने शब्दों में अध्यक्षीय उद्बोधन तथा टीमों के प्रथम क्योंकि यह बहुत बार आया है मैं दे रहा हूं प्रथम द्वितीय तृतीय और चतुर्थ स्थान करें क्योंकि बहुत बार आया क्योंकि दो बार शास्त्रार्थ पहले भी हुआ पूर्व में भी कहा कि अरे जब तक स्थान नहीं दिए तब तक तो कुछ वही वाली बात नहीं रही तो जैसा आपने निर्णय किया है आपका निर्णय शर्माते उसके बाद में क्या है कि जब निर्णय पता चल जाए उसके बाद में विवाद उत्पन्न ना करें अपनी विद्युत का सज्जनता का परिचय दे पुनः जब आगमन हो पुनः पधारे आप हमें बुलाए हम आपको बुलाए और इसी प्रकार से कार्यक्रम चलता रहे यही मैं निवेदन करूंगा आदरणीय श्री अध्यक्ष महोदय पहले ही बहुत विलंब हो चुका है हम दो शब्द बोल के

03:40:04:03 खत्म करेंगे यह जो विद्वान विभूतियां बैठी हैं इनका फिर से वंदन करता हूं अभिनंदन करता हूं शास्त्रार्थ के लिए विद्वान ढूंढे नहीं मिलते इन सबको हम अपने व जिसको कहते हैं साष्टांग प्रणाम करूं कि यह विद्वान अपना समय अपना संसाधन य करके यहां आए हैं सहमत या सहमत का कुछ अर्थ नहीं है यह भारतीय सभ्यता संस्कृत सनातन धर्म भारतीय दर्शन अनंत आकाश है यह दूसरे मजहब जैसा यह सीमित नहीं है संकुचित नहीं है यही ब्यूटी है यही है यही पिकटी है सनातन सभ्यता संस्कृत की विमत हम मत विमत कुमत सबको सम्मान देते हैं आस्तिक नास्तिक सब मिलकर के सनातन व्यवस्था सनातन सभ्यता का निर्माण करते हैं चारवा जमीन और यह बताइए आचार्य जी दूसरे तीसरे हमारे व जो हा यह सब मिलकर के हमारी भारतीय जो वो है संस्कृति उसका निर्माण कहते हैं हम नास्तिक मत को भी उतना ही सम्मान देते हैं जितना आस्तिक मत को

03:41:19:04 तो कणाद ऋषि जैमिनी चारवा ये हमारे वैदिक युगीन प्रवर्तक है नास्तिक मत के हमारे लिए उतने ही प्रणम में हैं निराकार बाद में विश्वास करने वाले हमारे पूज्य प्रात स्मरणीय स्वामी दयानंद सरस्वती उतने ही ग्राह हैं जितना हमारे शंकराचार्य है हमें अपनी सोच को व्यापक करना होगा नहीं विधर्मी तो हात लगाए बैठे ही कि आप लड़ इसी में कि सहकारी है कि निराकाल हो जाइए इसको व्यापक सोच बनाना है शास्त्रार्थ कराने का तात्पर्य यही है कि हम संकुचित दायरों से बाहर निकले मैं प्रणाम करता हूं सारे आचार्यों को विद्वानों को कि उन्होंने अपनी भूमिका का आज बहुत बढ़िया निर्वाह किया है कुछ कमिया होंगी कुछ उत्तेजना आई होगी इसका मतलब है कि उनको कहीं कहीं लगाव है अपनी परंपरा का बिल्कुल बेबाक वेचन करना और किसी और श्रेष्ठ सत्य और निष्कर्ष पर पहुंचना चाहते हैं जो शास्त्रार्थ का उद्देश्य होता है अंतिम लक्ष्य इस अंतिम लक्ष्य की प्राप्त के लिए सबने अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह किया फिर से प्रणाम करता हूं ये शुभम मिश्रा इतना बढ़िया व्यवस्था किए हैं इतना तो मैं लखनऊ में नहीं

03:42:34:06 कर पाता लेडी लेडी जो पीछे दिखा रहे थे तो इनसे तो देख कर के मैं सीख के जा रहा हूं कि ये सब जितना इन्होंने बढ़िया किया एक से एक दर्शन के विद्वान आदरणीय कुलपति महोदय जज साहब लोग हमारे सुधाकर जज साहब जी जए इन सबको बुला लेना एक मंच पर बड़ा य कठिन कार्य है सबके बस का नहीं है इसलिए आचार्य शुभम मिश्रा उनकी पूरी टीम को और उनके यहां मार्गदर्शक जज साहब पारा सर जी को सबको बहुत-बहुत साधुवाद बहुत-बहुत नमन इन्हीं शब्दों के साथ फिर से मिलने की आकांक्षा करता हुआ एक और घोषणा करूं कि दो या 9 मार्च को लखनऊ में मैं जैसे प्रतिवर्ष करता हूं शास्त्रार्थ आयोजन इस साल करूंगा मैं तो 22 फरवरी को करने वाला था हर साल फरवरी में करता हूं शुभम मिश्रा जी के यहां विवाह है इनके कारण मैंने शास्त्रार्थ का कार्यक्रम दो तारीख बढ़ाया है एक वहां बड़े श्रेष्ठ विद्वान स्वामी है अयोध्या मुख क रहे हैं दो को मुझको दिक्कत है एक हफ्ता और आगे बढ़ा दोगे क्या हम कहा चलो शायद हम नौ कर देंगे तो इनकी असुविधा और उन स्वामी जी की असुविधा देखते हुए हमने इसको दो या नौ में अभी देखते हैं कौन सी सबको प्रार्थना करता हूं

03:43:49:10 कि जो भी तिथि में तय करूंगा कार्यक्रम की यहां सूचना आएगी शुभम जी को और पासर साहब को ज साहब को इनके माध्यम से आप लोगों को पता चलेगा सारे इन विदव जनों को हाथ जोड़ कर के जा रहा हूं कि लखनऊ आए और ऐसे ही अपने पांडित्य का प्रदर्शन करें शास्त्रों में जो तमाम इधर उधर की बातें हैं उसका समन्वय करें और सब हिंदू जनमानस को सनातन धर्मी को एक संयुक्त रूप से संदेश दें कि सब हमारे आचार्य प्रणम है सब मत हमारे अपने हैं यहीं से सनातन धर्म सत संस्कृति से निकले हैं कुछ भी हमसे अलग नहीं है हम दो घंटे के लिए आर समाजी है तो दो घंटे के लिए वो है मूर्त पूजक है दो घंटे हम नास्तिक हैं चार घंटे उपासक हैं हम सब हैं जिसको जो करना हो हमारा करें हम सबको मानते हैं हमारे उतने ही प्रणम में है सब सबको वंदना करता हूं प्रणाम करता हूं बहुत-बहुत

03:44:54:09 साधुवाद अभी हमारी जो यह पैनल थी निर्णायक मंडल था यह जैसा तय किया है जैसा जैसा टीमों ने परफॉर्म किया है प्रदर्शन किया है यं तो मैं अध्यक्ष होने के नाते निर्णायक मंडल का यह कह रहा हूं यह विभाजन हमारी टीम के सदस्यों का है मेरी दृष्टि में सब श्रेष्ठ है हम उत्कृष्ट ही मान रहे हैं यह व्यवस्था है कि हमको फिर भी प्रथम द्वितीय तृतीय और संतोना की बात करनी है सबको श्रेष्ठ मानते हुए सबको चोटी का विद्वान मानते हुए सारी टीमों को मैं घोषणा करता हूं कि निर्णायक मंडल ने संयुक्त रूप से तय किया है कि यह जो टीम क्रमांक य टीम क्रमांक चार इसको सांना प्रमाण पत्र अथवा पुरस्कार मिला है टीम क्रमांक चार को सांना टीम

03:46:04:27 क्रमांक दो को तृतीय स्थान आज की इस विद्युत विमर्श की प्रतियोगिता में मिला है और टीम क्रमांक एक को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है और टीम क्रमांक तीन को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है तो सभी को हमारे लिए यह विभाजन कोई मतलब नहीं है यह हम उसके पक्ष में भी नहीं थे निर्णायक मंडल क था कि नहीं हमें कर देना चाहिए वर्गीकरण हमारे लिए सब उत्कृष्ट एक ही श्रेणी है उत्कृष्ट श्रेणी है आउटस्टैंडिंग है एक्सीलेंट है लेकिन इस तरीके से हुआ है तो तो ये उद्घोषणा थी बाकी आगे का अपना तो पुरस्कार वितरण होना है शांतोना की टीम आए पहले और अपना पुरस्कार ले जाए

03:47:24:01 जी सांत पुरस्कार के आचार्य गण पधारे हां संतोना का दीजिए भाई पुरस्कार दीजिए शुभम जी हा हाथ लगाइए ऐसे तो टीम पूरी आ सकती थी लेकिन चलिए लगा सर आचार सामने देखें तृतीय स्थान प्राप्त करने वाली हमारी आचार्यों की शास्त्रार्थ

03:48:07:04 टीम वह भी ले लीजिए य स्मृत चिन्ह भी जो दे रहे हैं अब पहले एक क्रम से चलो ना तृतीय स्थान की टीम में से कौन आचार्य जी आए अरे तृतीय कौन है आइए आचार्य जी बहुत प्रखर वक्ता है उनको सुनकर आनंद तो आ रहा आइए

03:48:51:00 आइए आइए आचार जी आइए आचार जी सामने देखिए आपको चित्र आ जाएगा यह भी ये भी पकड़ लीजिए बधाई द्वितीय स्थान प्राप्त टीम कृपया आए तृतीय हो गए अब द्वितीय आएंगे [संगीत]

03:49:28:24 ना वेदों का जितना गहन ज्ञान है इनको आचार्य जी को बड़ा कठिन हो रहा था कि प्रथम और द्वितीय में विभेद कैसे हो इसलिए उनका अलग से मैं अभिनंदन करता हूं वेद मार्गी मुझे बहुत पसंद है वो लेकिन अपना यह अपनी यह पक्ष धरता निर्णय में नहीं रिकॉर्ड कर सकता हूं इसलिए आपको पुनः प्रणाम करता हूं बधाई अब कौन और बचे प्रथम स्थान हा अभी तो प्रमुख लोग हमारे उधर ही बैठे हुए हैं आइए

03:50:18:16 चलिए कट्टर साकार बादी सगुण पासकों को अभिनंदन है उनको प्रणाम है प्रथम स्थान पाने की बधाई और बचे अन्य सभी प्रतिभागियों के सर्टिफिकेट और वो रखा हुआ है वह हम वितरण कर देंगे धन्यवाद ज्ञापन के लिए मैं आदरणीय पीन पश जी को और भोजन के लिए सब धन्यवाद

03:50:54:13 ज्ञापन आज के इस बहुत ही सराहनीय आयोजन में आए हुए इस मंच पर और मंच के उधर पूरे पंडाल में जितने भी विद्वान श्रोता अतिथि यहां पर मौजूद है मैं सबको नमन करता हूं प्रणाम करता हूं श्रोता वक्ता प्रतिभागी अतिथि सभी बहुत ही सराहना के पात्र है और धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि आज पहली बार इस सुकट क्षेत्र धाम में मेला में यह बहुत बड़ा आयोजन हुआ है और यह आगे भी धारा प्रवाहित रहेगी माननीय श्री उपाध्याय जी ने हमारे जनपद में दो तीन साल पूर्व शास्त्रीय परंपरा शास्त्रार्थ की परंपरा को जन्म दिया था संकटमोचन धाम शैल में और बहुत ही अच्छे प्रोग्राम व हुए और आज यह प्रोग्राम हमारे शुभम जी ने आचार्य जी ने अपने सभी साथियों से मिलकर के बहुत ही सराहनीय प्रोग्राम किया है मैं पहले इनको सबको आयोजकों को बधाई देता हूं मैं प्रणाम के साथ-साथ नमन

03:52:10:08 करते हुए श्री उपाध्याय जी को भी बहुत-बहुत बधाई दे उनकी सराहना करता हूं और उनको धन्यवाद देता हूं कि हम आपके प्रति आभार व्यक्त करने की भाषा हमारे पास नहीं है आप विद्वान है ऋषि है मनीषी है और आपने कुछ विद्वान ऐसे होते हैं पुस्तक लिख देते हैं कुछ अपना भाषण दे देते हैं कुछ कहीं होते हैं आपने अपने विचारों को सब सर्वत्र अपना परिश्रम करके हम सबको अपना समर्थन देकर के हमको प्रोत्साहित करके प्रेरित करके यह शास्त्रीय परंपरा को जो दिया और इसको संबल दे रहे हैं मैं आपकी प्रति सबकी तरफ से बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं आभार प्रदर्शित करता हूं साथ ही हमारे वाइस चांसलर साहब इतनी दूर से आए हैं उन्होंने भी बहुत बड़ा उपकार किया है हमारे मंच पर जितने भी अतिथि हैं हमारे रुगी साहब जो है व

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 3:53:11 · 24 Dec 2024

बिना किसी काट छांट के सोरों वाले शास्त्रार्थ का पूरा वीडिओ #vedpuran #hindu @DrGyanendrasharma

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A · Live शास्त्रार्थ विजेता आचार्य ज्ञानेन्द्र शर्मा जी #aryasamaj #gurukul #...
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