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00:00:02:02 सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं कि आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। अ आज की लाइव स्ट्रीम रोचक रहेगी थोड़ी। मतलब जो लॉजिकल क्वेश्चन आंसर्स होते हैं वह भी है इसमें और बाकी कुछ समीक्षा भी है। पहले हम लोग एक कुछ लॉजिकल क्वेश्चंस ले लेते हैं जो उठाए जा रहे हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर के विरोध में।

00:00:42:25 तो एक क्वेश्चन हमारे सामने आया था जिसके बारे में हमने अपनी एक अन्य स्ट्रीम में बात की थी मगर पूरी तरीके से नहीं की थी क्योंकि वह स्ट्रीम उस इन चीजों के लिए नहीं थी। किसी और मतलब कोई और विषय था उस स्ट्रीम का। तो क्वेश्चन उठाने वाले का कहना है कि तुमने हमारे प्रश्न के उत्तर में प्रश्न कर दिया ऐसा कुछ और हमारे सभी प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। तो भाई वो जो स्ट्रीम थी वो आपके लिए नहीं थी केवल आपके प्रश्नों के लिए नहीं थी। आपके प्रश्नों का जो आपने जो संशय फैलाए हैं अपने लॉजिक दे दे के उनके लिए वो स्ट्रीम नहीं थी। हालांकि अभी भी बहुत आपने जो क्वेश्चन उठाए वह अभी मुझे जितना उससे याद है स्मरण शक्ति से जितना याद रहेगा उतना ही मैं बताऊंगा और बाकी तो सबसे अच्छी बात है कि हमारा आमनासामना हो प्रत्यक्ष वार्ता हो और उसके लिए आप जो अपना अभद्र आचरण है उसको त्याग त्यागे उसके लिए क्षमा मांगे जो आपने किया है तो यह भी आपका कहना ठीक नहीं है कि आपने हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया उसमें में आपके फोटो या आपके प्रश्न से संबंधित वो

00:01:57:25 प्रश्न को उद्भाषित नहीं किया गया है। वो एक अन्य जो कुलदीप विद्यार्थी जी आने वाले थे उनके बारे में आज बात करेंगे। उनके बारे में वो चर्चा है। एक मिनट बस तो प्रश्नकर्ता ने जो प्रश्न उठाए हैं वो जो मुझे मोटे-मोटे तौर पर जो याद है उनको मैं देख लेता हूं। सर्वशक्तिमान ईश्वर के लिए उन्होंने प्रश्न उठाया है इस व्यक्ति ने कि जिस सामर्थ्य का अस्तित्व

00:02:50:03 है वो सारे सामर्थ्यों की बात हो रही है जब सर्वशक्तिमान कहा जाता है तो सर्वशक्तिमान में जो सामर्थ्य है जैसे बल है या देखना है ये सब सामर्थ्य है इनका का कहना है। तो जब हम सर्वशक्तिमान की बात कर रहे हैं तो वहां पर सामर्थ्यों की सामर्थ्यों की बात नहीं हो रही है। क्रियाओं की बात हो रही है। शक्ति अह जो जो क्रिया पूछी जा रही है यह क्रिया हो सकती है। ये क्रिया को करने में सामर्थ्य है कि नहीं? तो सर्वशक्ति सभी जो भी क्रिया है जो क्रिया है उस क्रिया को करने का सामर्थ। अच्छा दूसरी बात एक ये है कि जिसका अस्तित्व अ है जिसका अस्तित्व नहीं है। आपने कहा जिसका अस्तित्व नहीं है उसको ईश्वर नहीं कर सकता। इनका कहना है कि जिस क्रिया का अथवा सामर्थ्य का कह ले उसका उसको करने में सामर्थ्यवान ईश्वर है। इसलिए उसे सर्वशक्तिमान कहा जाता है। तो हमने तो नहीं कहा कि हम कोई ऐसे सामर्थ्य की बात कर रहे हैं जिसका अस्तित्व ही ना हो। है ना? हमने तो ऐसा नहीं कहा। ये आपका कहना है कि जिस अस्तित्व के साम जिस सामर्थ्य की हम बात कर रहे हैं उसका अस्तित्व

00:04:05:15 नहीं है शायद आपके मेंटालिटी से आपके दृष्टिकोण से नहीं है। जबकि जब हम कहते हैं कि क्या ईश्वर ये जाहिर सी बात है ये आर्य समाझी के द्वारा पूछा जा रहा प्रश्न है कि सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है कि जिन सामर्थ्यों का अस्तित्व भी नहीं है वो सामर्थ्य भी ईश्वर में है। है ना? ठीक है? तो यह इनका कहना है। जबकि जो प्रश्न जो सर्वशक्तिमान जो शब्द है वह सभी प्रकार की क्रियाओं के लिए है। एक्शंस क्या यह एक्शन करने की शक्ति है ईश्वर में? क्या फलाना एक्शन करने की शक्ति है ईश्वर में? तो एक्शंस के लिए वो सर्वशक्तिमान शब्द आया है। ये तो एक बात रही। दूसरी बात ये रही कि जब कोई क्रिया होती है तो उसमें से कोई एक सामर्थ्य ही लगता है। जैसे बल या देखने वाला सामर्थ्य हो या छूने वाला सामर्थ्य हो या क्या कहते हैं? उठाने वाला सामर्थ्य हो इत्यादि इत्यादि कोई एक सामर्थ्य ही उसमें यूज़ होता है। मगर बात क्रियाओं की हो रही है कि क्या ये क्रिया कर सकता है? क्या वो क्रिया कर सकता है? दूसरी बात कि अगर हम

00:05:22:03 ये जब ये तो एक बात रही। दूसरी बात यह भी है कि हम ऐसे सामर्थ्य की डिमांड कर रहे हैं ईश्वर से जिस सामर्थ्य के अस्तित्व को आपने माना है। जैसे कि आपने माना कि जीव जो है वो एक व्यवहारिक स्वरूप ले सकता है जो किसी का माता जो किसी की जो किसी का माता-पिता इत्यादि इत्यादि कहला सके पुत्र कहला सके पुत्री कहला सके। जीव ऐसे अ रूप ले सकता है। ऐसा शरीर धारण कर सकता है। जब हमने प्रश्न ये किया था कि शरीर धारण करने का अस्तित्व है तो ये जो अलंकारी है इसने ये भी एक दोबारा से उसमें प्रति उत्तर दिया कि भाई अ क्या कहते हैं कि ये जीव जो शरीर धारण कर रहा है उसमें सिर्फ जीव ही नहीं है। उसमें ईश्वर भी है। है ना? तो ईश्वर भी शरीर धारण कर रहा है। ईश्वर ने तो पूरे संसार को ही धारण कर। मतलब मैंने जब शरीर धारण करने की सामर्थ के बारे में पूछा तो इनका एक उत्तर प्राप्त हुआ कि शरीर तो ईश्वर धारण कर ही रहा है। हमने कहा मना किया। बस जिस शरीर की तुम बात कर रहे हो वो शरीर धारण नहीं कर रहा है। तो ठीक है हम अपने प्रश्न को और बढ़ा देते हैं आगे कि क्या ईश्वर ऐसा शरीर

00:06:37:10 धारण कर सकता है जो किसी का पुत्र किसी का पिता जिसके साथ व्यवहार किया जा सके जिसके साथ बातें की जा सके जो किसी के व्यवहार की सीमा में आ जाए हम जो किसी के प्रेम का विषय बन जाए है ना ऐसा शरीर धारण कर सकता है हम तो पहली बात तो यहां से तो आपकी ये बात खत्म हो गई कि जिस अ सामर्थ्य का अस्तित्व होगा केवल। अच्छा मेरा वीडियो अटक रहा है। वीडियो अटक रहा है तो क्या ये

00:07:28:01 क्या अभी वीडियो मेरे ख्याल से नहीं अटक रहा होगा। दे दो यहां पर। तो दोबारा से मैं क्लियर कर दूं कि आक्षेप लगाया गया कि सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है कि उसमें नंबर ऑफ सामर्थ्य है ना जैसे बल का सामर्थ्य या देखने का सामर्थ्य या एग्जांपल दिया गया। बल है, फोर्स है। इन सब का जो सामर्थ्य है वह नंबर ऑफ सामर्थ अनंत है। अनंत सामर्थ्य का अर्थ है कि जो भी बल का अस्तित्व है वो उसमें अनंत है। यह कहा गया है। तो सबसे पहली बात तो हम अपनी बात बता दें। यहां पर ही खत्म हो जाता है कि हम उस सामर्थ्य की बात कर रहे हैं जिस सामर्थ्य का अस्तित्व है कि कोई अव्यवहारिक है जीव अव्यवहारिक है वो ऐसा रूप धारण कर रहा है जो किसी दूसरे जीव के लिए जो किसी के लिए व्यवहारिक हो सके जो किसी का माता पिता पुत्री पुत्र कहला सके वह ऐसा शरीर धारण कर रहा है यानी कि इस सामर्थ्य का अस्तित्व है ठीक ठीक है? तो सबसे पहली बात यहां पर हमारी बात यहीं पर आपकी वो जो चीज है जो आपने कही है कि सामर्थ्य का जिस सामर्थ का अस्तित्व

00:08:43:01 होगा उसी को वो करवाने में असक्षम होना चाहिए। तो यहीं पे आपका वो ईश्वर जो है बाधित हो रहा है। क्योंकि कोई एंटिटी है जो कि शरीर धारण कर रही है। वो शरीर वाली नहीं है। मगर वो शरीर धारण कर रही है और शरीर धारण करने के बाद वो ऐसा शरीर धारण कर रही है जो किसी के लिए व्यवहारिक हो सके बातें कर सके। जो किसी का संबंध में आ सके ऐसा शरीर धारण कर रही है तो क्या अलंकार समाज के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर ऐसा शरीर धारण कर सकता है जैसे कि आपने वहां पे थोड़ा सा शब्दों का हेरफेर कर लिया मेरा वीडियो अभी भी अटक रहा है क्या

00:09:21:21 87 मैं एक बार एग्जिट होकर दोबारा आ जाता हूं तो अभी मेरा वीडियो ठीक चल रहा है। जी तो वीडियो अब ठीक चल रहा है ऐसा बताया जा रहा है। अ एक

00:10:36:26 काम और कर लूं मैं जरा। है आज का जो लाइव है इसमें आने से पहले तक मैं कुछ और कार्य कर रहा था। तो इसलिए बहुत ज्यादा व्यवस्थित रूप से नहीं आ पाया हूं। हम तो पहली बात तो यह है कि अलंकार समाज की ओर से एक प्रश्न उठाया गया कि जिस सामर्थ्य का अस्तित्व होगा वही कार्य करने में ईश्वर सामर्थ्यवान होना चाहिए। तो उसका उत्तर यही है कि ऐसा शरीर धारण करने का सामर्थ्य का अस्तित्व है जो शरीर किसी का पुत्र पिता इत्यादि कहला सके जो शरीर किसी के साथ जिसके साथ मनुष्य अपना जो क्या कहते हैं विचारों का आदान प्रदान कर सके व्यवहारिक हो सके कुल मिलाकर के वो ऐसा शरीर क्या धारण कर सकता है नहीं धारण कर सकता तो फिर उसको सर्वशक्तिमान नहीं कहना चाहिए जैसा कि इन्होंने ने कहा कि जिस सामर्थ्य का अस्तित्व होगा उस सामर्थ्य को क्या कहते हैं? उस सामर्थ्य

00:11:52:00 को धारण करने वाला ईश्वर होना चाहिए। तो आपका ईश्वर नहीं है तो आप सर्वशक्तिमान कहना बंद कर दीजिए। ठीक है? और एक चीज हमने ये भी बताई कि जब सर्वशक्ति कह रहे हैं तो वहां पर नंबर ऑफ फोर्सेस की बात नहीं हो रही है। नंबर ऑफ स्ट्रेंथ की बात नहीं हो रही है कि कितनी प्रकार की स्ट्रेंथ उसमें होनी चाहिए। वहां पर बात हो रही है कि क्रियाएं किस किस क्रिया को करने की शक्ति है उसमें तो जो भी क्रिया वह उसको कर पा रहा है कि नहीं ठीक है तो सर्वशक्ति की बात जब हम करते हैं सर्व सामर्थ्यवान की बात करेंगे तो ठीक है वहां पर चल जाएगा कि सभी प्रकार के सामर्थ्य जिनका अस्तित्व है वो उसमें होना चाहिए देखने का सामर्थ्य सुनने का सामर्थ्य वो उसमें होना चाहिए मगर जब सर्वशक्ति की बात कर रहे हैं तो शक्ति का रिलेशन उससे है

00:12:40:09 किससे? क्रियाओं से। और क्रियाएं अनंत है। कुछ भी क्रियाएं हो सकती है वो अनंत है। ठीक है? अब दूसरी एक बात आती है और अगर अनंत ना भी हो तब भी आपको ऐसी क्रिया पूछी जा रही है जो अस्तित्व जिसका है। ठीक है? वो उसमें सीमा में है। मगर अब यहां पर आपके प्रश्न का उत्तर देने के बाद। अच्छा एक प्रश्न और है आपने वो मूल में पूछा है कि वो निराकार इन्होंने एक प्रश्न और है जो इन्होंने पूछा है कि निराकार जो उसका मूल स्वरूप है वो निराकार से साकार में हो सकता है कि नहीं हालांकि इस प्रकार के जवाब मैं दे चुका हूं सैकड़ों बार जैसे एक हाइपर क्वेस्ट के में भी पूछा गया कि अगर वो ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वो क्या ऐसी मौत मर सकता है जिसके बाद वो पुनः जीवित ना हो सके तो इन सबका उत्तर हमने दिया है जो चैनल को ठीक से फॉलो कर रहे हैं उनके पास सबके पास इसका का जवाब होगा। फिर भी आज उसको भी दिल दे देंगे। मगर अभी हमने जो यह उत्तर दिया है इसके बाद विचार करने वाली बात है कि इन भाई साहब का कहना है कि जिस जिसज सामर्थ्य का अस्तित्व है उस उस सामर्थ्य का

00:13:55:18 ईश्वर में होना आवश्यक है। मतलब उस सामर्थ के होने के कारण हम ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहते हैं। और यदि किसी सामर्थ्य का अस्तित्व ही नहीं है यानी कोई तार्किक रूप से कोई सामर्थ्य है जो सिद्ध ही नहीं हो रहा कि इसका अस्तित्व है तो उसका जरूर उसका उसमें होना आवश्यक नहीं है ईश्वर में होना तो अब पहली बात विचार करने की ये आती है कि जब हम कहते हैं कि अनंत सामर्थ्यवान तो अनंत सामर्थ्यवान हमें ईश्वर को सिद्ध करने के लिए हमें एक उदाहरण चाहिए होगा। आपका कहने का मतलब यही है कि जिस जिस सामर्थ्य का उदाहरण है वो सामर्थ्य असीमित रूप से ईश्वर में व्याप्त है। ठीक है? अब अनंत रूप से सामर्थ्यवान होना भी एक सामर्थ्य है। तो क्या इस सृष्टि में अनंत सामर्थ्य का कोई उदाहरण है?

00:14:46:19 अनंत सामर्थ्य का कोई उदाहरण है? यहां पर आपने अनंत सामर्थवान उसको बिना उदाहरण के ही माना है। नहीं उदाहरण क्योंकि जब भी आप किसी चीज को उठा मान लीजिए एक पृथ्वी है या कोई ग्रह है उसको अगर उसने उठा दिया तो यह सिद्ध होगा कि उसमें उस ग्रह में जितना वजन है उसको उठाने की सामर्थ है। मगर जब हम कह रहे हैं अनंत तो यानी कि वह अनंत चीज को उठाने वाला होना चाहिए। और अनंत चीज यह जो पैरामीटर है यह आपको कभी मिलेगा ही नहीं उठाने के लिए। है ना? तो यह तर्क तार्किक रूप से यह है ही नहीं कि भैया अनंत का कोई उदाहरण हो। क्योंकि अनंत आपको सिद्ध करने के लिए मिलेगा ही नहीं। जो मिल गया वो अनंत नहीं है। भाई कहीं से उठाओगे ना हाथ लगाओगे ना नीचे तो अनंत नहीं है। तो अनंत चीज को उठाने पर ही अनंत सामर्थ सिद्ध हो सकता है। अगर तर्क की दृष्टि से देखें मगर आपने यहां तो मान लिया कि उसमें अनंत सामर्थ अनंत सामर्थ्य है। जबकि उसका उदाहरण इस दुनिया में अस्तित्व में नहीं है। उसका उदाहरण नहीं है। तो आपने शब्द प्रमाण से ही माना। अच्छा दूसरी बात यह इन्होंने एक बात और

00:16:01:20 कही है अपने प्रश्नों में कि हमने केवल मतलब क्योंकि शास्त्र कहते हैं इसलिए हमने माना है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। है ना? तो केवल शास्त्र नहीं ये जो वो है ना ये जो ईश्वर के अंदर की जो जीव के अंदर की जो डिजायर है असतो सदम तमस ज्योति गमया मृत्य गम इससे भी ईश्वर के सर्वशक्तिमान होने का वह सिद्ध होता है। वह अभी हम आगे बात कर लेंगे बढ़ते क्रम में। पर पहले क्या है कि हमने आपको यह बता दिया। आपका कहना यह था कि भैया जिसज सामर्थ्य का अस्तित्व वही सामर्थ होना चाहिए। तो सबसे पहली बात यही खत्म हो जाती है कि हमने ऐसा ही सामर्थ्य पूछा है। जीव अव्यवहारिक है। वो व्यवहार में आ रहा है। वो लोगों के साथ बातें कर रहा है। लोग उसको बातें बता रहे हैं। वो व्यवहार कर रहा है। तो इस सामर्थ्य का अस्तित्व है। अब अलंकार समाज का ईश्वर इस सामर्थ्य से ओतप्रोत है कि नहीं है? यह आपको बताना है। फिर से वीडियो अटक रहा है। अभी क्या करूं?

00:17:09:23 [संगीत] थोड़ा समझने वाली चीजें हैं आज तो अ आप लोग समझ सकते हैं। अटक रहा है। अटक रहा है क्या कोई बता दे नहीं अटक रहा है क्यों कहा जा रहा है फिर अटक रहा है

00:17:46:19 ठीक है अब नहीं अटक रहा है पे ही चलते हैं तो पहली बात ये हो गई कि सामर्थ्य का अस्तित्व है वही हमने पूछा है क्या ईश्वर ऐसा व्यवहारिक स्वरूप धारण कर सकता है दूसरी बात क्या हो गई कि अ जब हम आगे विचार करते हैं तो हमने ऐसी कई चीजें मानी है जिसको हमने उदाहरण नहीं लिया है। जैसे कि सबसे पहली बात हमने बिना उदाहरण के यह माना हुआ है ना ईश्वर सृष्टि बनाता है। क्या किसी ने उदाहरण दिखाया है क्या हमको सृष्टि बना के? सृष्टि है मगर किसी ने बनाई है इसका तर्क थोड़ी ना है। उदाहरण थोड़ी ना है। फिर भी हमने दूसरे कारणों से माना कि ईश्वर सृष्टि बनाता है। ठीक है? वह बातें अलग है कि वह क्यों बनाता है वह एक अलग चीजें हैं। मगर कई चीजें ईश्वर में हमने मानी है जिनका हमारे पास उदाहरण नहीं है। दूसरी बात एक यह भी है कि जब आप कहते हैं कि सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है, वह नहीं है तो इसमें बात आ जाती है प्रमाण की अर्थ की कि आपके द्वारा जो परिभाषित किया जा रहा है वो अर्थ क्यों माना जाए? सर्वशक्तिमान का। आपकी परंपरा तो है नहीं कोई। एक यह भी विचार करने वाली बात है कि आप अगर

00:19:01:27 किसी किसी चीज को कोट कर रहे हैं तो उसका जो अर्थ हमने माना है तो हमने वही अर्थ माना है जो हमारी परंपरा से हमें मिला है। आपके पास कोई परंपरा नहीं है। आप कहते हो हमारी परंपरा ऋषियों से चलती है। गायब हो जाती है बीच में। आप अपनी पीछे की पांच पीढ़ियां नहीं बताते हैं। ठीक है? अब यह बात है कि आप हमारी वो परंपरा पर झूठा होने का आक्षेप लगा सकते हैं। वो सब एक अलग बात है। मगर पहले आपको अपनी परंपरा बतानी चाहिए। ये हमारी परंपरा

00:19:35:12 है। तो एक ये बात हो गई कि जब आप प्रमाण को लेकर के आते हैं ना कि सर्वशक्तिमान का अर्थ ये नहीं ये है। हमारे अनुरूप मानो तो उसमें आपको फिर अपने आप को प्रमाणिक सिद्ध करना पड़ेगा। तो प्रमाणिक सिद्ध आप नहीं होते हैं। तो इसलिए इस तरह के कुतर्क करने से बचा करें। फिर भी आप जो कुतर्क करेंगे तो हम आपको उसका आंसर देंगे। और इसके बाद फिर अब देखिए बात यह है कि देखिए हमने वो तो बता ही दिया कि ईश्वर जो है क्या जिसज सामर्थ्य का अस्तित्व है वो सारे सामर्थ उन सारे कार्यों को करने का सामर्थ्य ईश्वर में है कि नहीं? तो हमने बता दिया कि हमने ऐसा ही सामर्थ्य दिया है। ऐसा ही क्वेश्चन पूछा है जिस सामर्थ्य का अस्तित्व है। मगर यदि कोई व्यक्ति ऐसा कोई कार्य करने की सोच रहा है जो कार्य अब तक हुआ नहीं जिसका तर्क मतलब जो अभी तक है नहीं जिस किसी ने नहीं किया ऐसा कार्य। पहली बात तो यह है भाई कि ईश्वर उसी का नाम है कि जो दुनिया में कोई ना कर सके वही करने वाला ईश्वर है। तो ये जो आप ये बात रख रहे हो ना कि उसका उदाहरण होना चाहिए। उसका अस्तित्व होना चाहिए। उसका तर्क होना चाहिए। तो ये अपने आप में एक ऐसी बात है क्योंकि जब आप अस्तित्व

00:20:50:19 है कि नहीं इसकी इसकी बात करोगे तो प्रमाण की बात आ जाएगी कि कौन-कौन से सामर्थ्य का अस्तित्व है तो प्रमाण की बात आ जाएगी। तो फिर बात ये होगी कि हम कह रहे हैं ये है। इसका प्रमाण है। हम किसी चीज को कोई नाम दे रहे हैं। मगर आप कहोगे कि नहीं ये ऐसे नहीं। आप उस नाम को स्वीकार नहीं करोगे तो प्रमाणिक प्रमाण की बात हो जाएगी। फिर परंपरा पूछनी पड़ेगी कि इस शब्द का अर्थ आपने यह कैसे लिया। तो यह तो एक अलग मैटर हो गया। मगर फिर भी यदि अच्छा एक चीज और है कि आपने कहा कि जिस सामर्थ्य का अस्तित्व है वो वो सामर्थ्य ईश्वर में होने चाहिए। अगर कोई व्यक्ति कल्पना कर रहा है तो कल्पना में किया जाने वाला मतलब उसका अस्तित्व अभी तक फाउंड नहीं है। मगर वो व्यक्ति कल्पना कर रहा है। ठीक है? कोई व्यक्ति कल्पना कर रहा है कि ऐसा ऐसासा हो सकता है क्या? क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? तो वो जो कल्पना कर पा रहा है उसका सामर्थ ईश्वर में नहीं है। तो यहां पर एक यह भी विचारणीय पॉइंट है। मैं अभी इनको सिद्धांतों के रूप में नहीं रख रहा हूं। मैंने आपको सिद्धांत तो पहले ही बता दिया मगर अभी मैं विचार करने योग्य स्थितियां बता रहा हूं कि एक व्यक्ति है जो अपने मन में कुछ कल्पना कर रहा है। ऐसी क्रिया जो सामान्यतया नहीं देखी गई। अभी तक प्राप्त नहीं है। उसने वो केवल अभी कल्पना में है।

00:22:06:00 तो पहली बात तो यह आती है कि जब आपने सर्वज्ञ का अर्थ लिया तो क्या आपने यह अर्थ लिया कि जिसज तथ्य का अस्तित्व है केवल अ उसी को जानने वाला ईश्वर है। क्या आपने ये अर्थ लिया सर्वज्ञ का? आपने जब सर्वज्ञ का अर्थ अगर आप यह ले लेंगे तो इसका मतलब ईश्वर जो है वह जो मनुष्य कल्पना क्या कर रहा है उसको नहीं जानता क्योंकि वो कल्पना का अस्तित्व तो है नहीं कल्पना में सोची जा रही चीजों का वो कल्पना कर रहा है ये तो ईश्वर जानेगा मगर कल्पना में वो क्या सोच रहा है क्योंकि उसका अस्तित्व नहीं है वो ईश्वर नहीं जानेगा मगर वहां पर आप ईश्वर को वो कल्पना वाली चीज को भी जानने वाला मान लेते हो क्यों भाई नहीं होना चाहिए मनुष्य अपने मन में जो विचार कर रहा है कल्पना कर रहा है जीव मनुष्य के रूप में तो उसको जानने वाला ईश्वर नहीं होना चाहिए। आपकी इस परिभाषा के अनुसार यह सब विचार करने योग्य बिंदु है। मगर यहां पर आप कहोगे कि नहीं वह जानता है कि वो मन में क्या सोच रहा है। अंतर्यामी है ना तो आप यहां पे आपने वो सर्व का अर्थ वो नहीं लिया कि जिस जिसज तथ्य का अस्तित्व है केवल

00:23:21:01 उसको जानने वाला ईश्वर है। अगर कोई नया तथ्य अगर कोई व्यक्ति अपने मन में सोच रहा है तो उसको ईश्वर नहीं जानेगा। ऐसा कहोगे क्या? कह देना यह भी पता चल जाएगा। अच्छा फिर अब दूसरी बात यह आती है कि चलो जब आप यह कहोगे कि कल्पना में सोची जा रही क्रिया को जानने वाला भी ईश्वर है। ठीक है? सर्वज्ञ तो कल्पना में ही सही कल्पना में उस क्रिया का अस्तित्व सिद्ध हो गया ना। कल्पना के अंदर यहां तक तो मानोगे कि कल्पना के अंदर उस क्रिया का अस्तित्व सिद्ध हो गया। तो अब सवाल यह आएगा ईश्वर उस कल्पना को जानता भी है क्योंकि वह सर्वज्ञ भी है। तो क्या ईश्वर उस कल्पना में उस क्रिया को करने का सामर्थ रखता है? कल्पना में इधर नहीं रियलिटी में नहीं हमारी रियलिटी उसमें नहीं। वो जो व्यक्ति कल्पना कर रहा है उसमें क्या वो उस कार्य को करने का सामर्थ रखता है? तो यदि कल्पना के अंदर करने का सामर्थ रखता है या तो वह जानने वाला हो ना उस कल्पना को सर्वज्ञ ना हो। तो

00:24:33:14 क्या फिर अटक रहा है? हां। तो कल्पना में क्या वो ईश्वर उसको करने वाला हो सकता है? तो अगर आप कहोगे हां कल्पना में कर सकता है। रियलिटी में नहीं कर सकता। तो मेरे भाई अविद्या को तो आपने भी माना है ना। कोई किसी का माता-पिता नहीं है। कोई किसी का बहन नहीं है। भाई नहीं है। यही रियलिटी है ना। तो क्या है कि बाकी सब इस ये जो अविद्या रूपी संसार है इसको जो भी आप जिस तरीके से भी देखते हो जो अविद्या से बनी हुई चीजें जो हमें मैसेजेस प्राप्त हो रहे हैं इसमें क्या है कि ईश्वर सारे चमत्कार दिखा रहा है जो नहीं है वही दिखा रहा है कोई किसी का वो नहीं है इसका अस्तित्व नहीं है ना इस रिश्ते का नहीं है अस्तित्व अविद्या में है ये सब जो चीज जैसी है वैसी नहीं दिख रही है मगर हम उसको वैसा समझ रहे हैं जैसा वो नहीं है अविद्या के कारण ये सब है ना इतना तो सत्य प्रकाश भी मानती है तो फिर क्या हुआ कि जब ईश्वर उसको कल्पना में करने वाला सिद्ध हो रहा है तो भाई ये भी अविद्या रूपी संसार ही है इसमें आप सारे चमत्कार दिखा रहे हो बाकी के मगर एक ईश्वर का अवतार ही दिखाने में आपको प्रॉब्लम है सारे चमत्कार दिखा रहे हो कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई वो सब कुछ उठा देगा

00:25:48:16 अविद्या रूपी संसार में अविद्या रूपी संसार के पर्सपेक्टिव से जब आप देखोगे तो ईश्वर सब कुछ कर रहा है बाकी सब कर रहा है। बस उसको अवतार लेने में ही दिक्कत हो रही है। आप वो सारी चीजें आप स्वीकार कर रहे हो जिनका अस्तित्व नहीं है। वो हो रही है। अविद्या रूपी संसार में हो रही है। तो हम भी तो यही कह रहे हैं जिसमें आप बाकी सब ऐसी चीजों का अस्तित्व मान रहे हो दिखा रहे हो जिनका अस्तित्व नहीं है या जो जैसा है वैसा नहीं दिख रहा आपकी भाषा में। तो आप फिर ईश्वर के अवतार को क्यों नहीं मानते हो इस अविद्या रूपी संसार में? ठीक है?

00:26:24:14 तो यह हो गई एक बात कि आप बाकी सब चमत्कार तो मानते हो जीव का कोई भाई बहन नहीं है। कोई रिश्ता नहीं है। मगर यहां पर उसके रिश्ते नाते आप भौतिक दृष्टि से मानते हो। आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं मानते हो। तो सबसे बड़ी प्रॉब्लम पता है क्या है कि ऐसा नहीं है कि आर्य समाज और जो हमारा सिद्धांत है सनातन सिद्धांत है उसमें बहुत बहुत अंतर है। मतलब बिल्कुल उलटी ही बोल रहा है। आर्य समाज क्या करता है या जो भी कई जितने भी तंत्र है जितने भी ऐसे तंत्र है जो धर्माभास है या सनातनाभास है वो यही करते हैं कि वो कुछ चीजें तो बोलते हैं जिसमें दोनों पर्सपेक्टिव लेंगे जैसे जीव की जब बात करेंगे तो दोनों पर्पस्पेक्टिव लेंगे जैसे जीव ने यहां कर्म किया पापी हो गया तो ये भौतिक पर्सपेक्टिव हो गया ठीक है और एक एक उसका पर्सपेक्टिव वो भी है कि वो वहां जाके ये भोगता है ये मुक्त होता है ऐसा तो दोनों पर्सपेक्टिव से जीव की बात करेंगे और ईश्वर की भी बात दोनों पर्सपेक्टिव से करेंगे। जैसे ईश्वर सुनता है, ईश्वर देख रहा है। ये भौतिक पर्सेक्टिव है। ठीक है? और वो सर्वव्यापी है, वो एक रस है। यह उसका आध्यात्मिक पर्सेक्टिव है। मगर

00:27:40:02 यह क्या करते हैं कि जहां पर इनको सनातन सिद्धांतों को काटना होता है या परंपरा प्राप्त आचार्यों द्वारा प्राप्त सिद्धांतों को काटना होता है। वहां पर ईश्वर के विषय में केवल पारमार्थिक वो ले आते हैं। वहां पर दूसरा वाला पर्सपेक्टिव छोड़ दिया जाता है। ये मैं अभी समझाऊंगा। थोड़ी जानने वाली बातें हैं यह सब। आप लोगों को आशा करता हूं कि रुचि आ रही हो। तो इसको समझना है कि आप जब सब जब सब जगह आप पर्सेक्टिव दोनों लेकर के चल रहे हो तो आप कुछ जगह आकर के पर्सेक्टिव छोड़ देते हो। जैसे फॉर एग्जांपल एक उदाहरण दूं कि शास्त्रों जैसे हमने जो शास्त्र स्वीकार किए आर्य समाज ने नहीं किए पूरे पूरे तो परंपरा प्राप्त आचार्यों का कहना है कि ईश्वर पाप क्षमा करता है। अगर उसकी भक्ति करते तो पाप क्षमा करता है। अलंकार समाज का कहना है कि ईश्वर पाप क्षमा नहीं करता है। ठीक है? क्योंकि अगर करेगा तो अन्यायकारी हो जाएगा। अब इसमें रियलिटी क्या है? किसी ने यह भी बात सही है कि वह अगर करेगा तो और शास्त्रों में यह भी वचन आया कि भुगतना तो पड़ता ही है। फिर शास्त्रों में ये भी वचन

00:28:55:06 आया हमारे शास्त्रों में जिनको हम मानते हैं भैया तो उनमें ये भी वचन आया कि पाप क्षमा करता है। तो ये क्या है? यह दो पर्सेक्टिव है जो ईश्वर की भक्ति करने लगता है। जैसे किसी ने एक चींटी मारी उसको इस चींटी को मारने का कोई फल मिलना है कि उसको एक खरोच आनी है। ये उसका फल है। चींटी को मारने का फल कि उसको एक खरोच आनी है। तो यह बात भी सत्य है कि उसको खरोच आएगी ही। उस खरोच से उसको कोई बचा नहीं सकता है। तो फिर ईश्वर की भक्ति करने से मिलने वाला जो फल है यह पाप क्षमा हो जाते हैं। उसका क्या? तो उसका यह है कि ईश्वर की भक्ति करने से यह जो खरोच आएगी ना इससे व्यक्ति को दर्द नहीं होगा। एहसास नहीं होगा। उसका जो कनेक्शन है इस भौतिक जगत से इतना ज्यादा डिटच होता जाएगा भक्ति करने के कारण कि उसको इससे मिलने वाला जो दुख है वो नहीं होगा। तो दुख नहीं मिला तो इसलिए अपराध क्षमा पाप क्षमा और क्योंकि वो भौतिक रूप से वो क्रिया तो हुई जो फल स्वरूप होनी थी। तो भैया दंड तो मिलके रहा। भुगतना तो पड़ा ही उसको। जैसे कि कई लोगों ने देखा होगा मुझे नहीं पता है अगर कोई नाम जप कर रहा होगा बहुत टाइम से तो उसके जीवन से कई चीजें विरक्त विरक्ति सी आ रही होगी। जैसे उसका फिल्में देखना कम हो गया होगा। अगर पहले ज्यादा देखता होगा उसका कपड़े खरीदना

00:30:10:07 कम हो गया होगा। अगर पहले ज्यादा खरीदता होगा उसका ध्यान जो भौतिकवाद से उसका हट रहा होगा। अब जैसे मान लीजिए काफी समय पहले उसने ऐसा किया था कि उसने किसी के कपड़े चुराए तो उसका कपड़े चुराने का उसका फल था ईश्वर का विधान था कि एक दिन ऐसा आएगा जब उसके पास कपड़ों की कमी हो जाएगी या उसके भी कपड़े कोई चुरा लेगा या उसको इस कपड़ों का अभाव जो है वो देखना पड़ेगा ठीक है मेरी बात ले लीजिए मैं आज ये सब कपड़े पहन रहा हूं जो कोशिश कर रहा हूं अपने पारंपरिक बेशभूषा में अधिक से अधिक रहूं। मेरा भी था भैया मुझे जींस लेनी है। वो फलानी फलानी इंपोर्टेड कंपनियों की जींस खरीदनी है। लेस लिविस की खरीदनी है और वो रेंगलर की खरीदनी है। ये सब था और सब मान लीजिए कि मैंने भी ऐसा किया कि मैंने किसी का कपड़ा लेकर के चुरा लिया या कुछ उसके साथ अन्याय कर दिया। जिसका फल ये था कि मेरे जीवन से वो जो खर्चीले कपड़े थे वो जाने थे।

00:31:16:12 ठीक है। अभी क्या हुआ कि मैं भक्ति में आया। चार पांच साल हुए श्री राम की धुन लग गई। आज मेरे पास उन कपड़ों की कमी है। जिन कपड़ों के लिए मारा मारा फिरता था। मगर वो जो कमी है मुझे खल नहीं रही। तो मुझे पापों से क्षमा किया भगवान ने और मुझे भोगना तो पड़ा। तो दोनों दृष्टि है। अब बात ये है कि भोगना कैसे पड़ा और क्षमा कैसे किया? तो इसमें दोनों पर्सपेक्टिव है। अगर इस तरफ से देख कि हमने भगवान की भक्ति की और मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ तो मैं तो यही कहूंगा मुझे भगवान ने अपनी शरण में ले लिया। मुझे जो है वो नहीं मिला। तो एक ये पर्सपेक्टिव है। मुझे दंड नहीं मिला। तो क्या होता है कि अच्छा ईश्वर ने दंड दिया मुझे। ये कौन सा पर्सपेक्टिव है? ये पारमार्थिक पर्सेक्टिव है। उसने दंड तो दिया ही है मुझे। तो अब क्या हुआ कि इन्होंने क्या किया? केवल पारमार्थिक पर्सपेक्टिव को पकड़ा और इसको नकार दिया। आप अगर इतना भी करोगे केवल पारमार्थिक पर्सेक्टिव को ही रखो और बाकी कुछ मत बोलो तो भी ठीक है। मगर आप क्या करते हो कि इस व्यवहारिक पर्सपेक्टिव को मना कर देते हो। ऐसा करने से ईश्वर आपका जो ईश्वर होगा वो अंतिम रूप से सिद्ध ही नहीं होगा।

00:32:31:20 जो मनुष्य है उसकी चाह का विषय है। ठीक है? अगर कोई सच्चिदानंद है इस दुनिया में और यदि वह सच्चिदानंद हमें प्राप्त नहीं हो सकता तो हमें उससे क्या मतलब? कोई एलन मस्क है और उससे वो हमें प्राप्त नहीं हो सकता तो हमें उससे क्या मतलब? हमें हमारे अंदर उसके प्रति आकर्षण क्यों आएगा? कोई आकर्षण नहीं आएगा। तो ये बात हो गई एक कि आप क्या करते हैं कि कई जगहों पर दोनों पर्सपेक्टिव रखते चलेंगे। रखते चलेंगे। फिर कहीं-कहीं पर अपनी बात को बड़ा रखने के लिए केवल एक पर्सपेक्टिव रखेंगे कि नहीं भाई ईश्वर तो दंड देके रहता है। वो अन्यायकारी हो जाएगा। फिर ये भक्ति वाला पर्सेक्टिव छूट जाएगा व्यवहारिक वाला। इसको मना कर देंगे। नहीं पाप क्षमा नहीं करता। ये दिक्कत है। इसकी वजह से दूरियां है। जैसे हां सही बात है। ईश्वर अपने मूल जो स्वरूप है जो उसका व्यवहार में ना आ सकने वाला स्वरूप है वो उसको बदल नहीं सकता। मगर यह पारमार्थिक पर्सपेक्टिव है। व्यवहारिक पर्सपेक्टिव नहीं है। व्यवहारिक पर्सपेक्टिव है कि वह अपना रूप बदल सकता है। वो निराकार होते हुए साकार हो सकता है। वो अवतार ले सकता है। यह व्यवहारिक पर्सपेक्टिव है। मगर आप ईश्वर को

00:33:46:24 देखने वाला, सुनने वाला, शक्ति प्रकट करने वाला ये सब तो मानोगे। वही ईश्वर सर्व्यापक है ना तो किसी एक देश काल परिस्थिति में शक्ति क्यों प्रकट हो रही है? वही ईश्वर सर्वव्यापक है। तो विचरण कहां कर रहा है? ईश्वर विचरण करता है गर्भ के मध्य में। ये सब क्यों आ रहे हैं? तो ये किस ईश्वर ने ईश्वर के पर्सपेक्टिव है। एक व्यवहार में ना आ सकने वाला पर्सपेक्टिव है। परमार्थ फिर व्यवहार में आ सकने वाले पर्सपेक्टिव शुरू होते हैं। व्यवहार। ठीक है? अन्यथा ईश्वर कुछ भी करने वाला वो सिद्ध ही नहीं होगा। ईश्वर विचरण कहां कर रहा है? जब वो सर्व्यापक है। कहां विचरता है ईश्वर? हां। तो यहां पर सगुण ईश्वर माना जाएगा ना। एक जगह से दूसरी जगह कौन जाएगा? जब उससे रिक्त स्थान दुनिया में होगा तभी तो चलेगा। तो सर्व्यापकता का दोष सर्व्यापक व्यापकता के कारण तो उसको विचरने वाला भी सिद्ध नहीं कर सकते।

00:34:48:20 तो यही दिक्कत है कि यही दिक्कत है कि ईश्वर कुछ भी करने वाला सिद्ध ही तब होगा जब आप उसके पर्सेक्टिव से अलग-अलग पर्सपेक्टिव से देखेंगे। तभी सिद्ध होगा। नहीं तो एक रस ईश्वर है। कहीं भी हिलेगा। सब जगह हिलेगा। यानी वो निर्गुण से सगुण होगा। अब निर्गुण से सगुण होगा तो क्या वो निर्गुण में बदल जाएगा? बदलाव हो जाएगा निर्गुण में नहीं। वो एक और रूप लेगा। दूसरा रूप लेगा। उसका निर्गुण रूप वैसा का वैसा ही रहेगा। वो एक रस रहेगा। ऐसा नहीं है कि उसी में उसने चेंजेस कर दिए। सगुण रूप लेगा तब वो क्रियात्मक

00:35:35:16 होगा। और चलते हैं। अब इनका एक आया कि ईश्वर हां ईश्वर का उदाहरण होना चाहिए। तो मैंने बता दिया कि भैया ईश्वर उसी का नाम है एट द एंड जिसका उदाहरण नहीं है वही ईश्वर है। ये समझ लो आप। ठीक है? अब बात एक आती है ईश्वर पापी भी हो सकता है। मूर्ख दिख सकता है। अच्छा पहली बात तो यह है कि आपने कहा था सामर्थ तो पापी दिखने का सामर्थ है ना इस दुनिया में कि कोई पापी दिख रहा है किसी को देखिए पहले पहले एक बात समझ लीजिए ईश्वर का जो अवतार है वो उतना ही सत्य है जितना कि कोई जीव मनुष्य के रूप में सत्य है मनुष्य है किसी का बेटा है किसी का पुत्र है व्यवहारिक जगत इस पर्सपेक्टिव से ईश्वर का अवतार है और अगर जीव किसी का पिता नहीं है किसी का पुत्र नहीं है वहां के लिए आप कह सकते हो कि नहीं वहां पे अवतार नहीं ईश्वर पहले इस बात को समझिए अगर जीव व्यवहारिक हो रहा है तो ईश्वर भी व्यवहारिक हो रहा है उसी अविद्या रूपी जगत बस जीव बंधा हुआ है वो अपनी आइडेंटिटी नहीं जान पा रहा है और ईश्वर वो है जो जानता है

00:36:51:27 ठीक है और अब बात ये आती है कि इन्होंने मैंने ये कहा है अपने वीडियोस में कि भाई ईश्वर क्या उसमें नहीं है उसमें नहीं है अवतार अवतार लेने के पहले ईश्वर में क्या कमी रहती है? वह अवतार लेके उसमें शक्ति का संचार होता है। नहीं देखिए यह बहुत ही लो लेवल की बातें हैं। आप देखिए मैं अभी बता दूंगा तो आपका अगला प्रश्न आएगा। इसलिए इन सब बातों को आप सामने से किया करिए। ईश्वर को सृष्टि बनाने से पहले क्या कमी रहती है? अच्छा ईश्वर ने कुछ ऐसे कीड़े बनाए हैं जिसका कोई उपयोग नहीं हो रहा है। दुनिया में ऐसे कीड़े होंगे ना जिसका कोई उपयोग नहीं हो रहा है। क्यों बनाए वह कीड़े? क्यों बनाए वो कीड़े? धरती में कुछ ऐसा जगह होगी जिसका कोई कोई तो ऐसा कण होगा दुनिया का जिसका कोई उपयोग नहीं हो रहा है। क्यों क्यों बनाया? उसकी मर्जी उसको ऐसा ही बनाना था। बना दिया उसने। ईश्वर बिना किसी प्रयोजन के सृष्टि का निर्माण करते हैं। उनका कोई हेतु नहीं होता है। अगर हेतु है तो बौद्धों को मान लो। सच्चिदानंद नहीं कहलाएंगे ईश्वर। कुछ कमी थी जो उन्हें सृष्टि बनानी पड़ी। वो बिना किसी प्रयोजन के बनाते हैं। यह उनके सामर्थ्य का स्वरूप

00:38:07:06 भूत ये उनका स्वरूप भूत लक्षण है। सामर्थ मात्र है। आंख है तो वो देखती है। सिंपल कोई हेतु नहीं है। तो ऐसे ही भगवान ये सब भगवान के सामर्थ्य ही है कि वो कभी कोई कार्य अवतार लेकर के कर रहे हैं और कोई कार्य बिना अवतार के भी कर रहे हैं। और अवतार लेने से जैसे फिर व्यवहारिकता में देखें कि वह चाहे तो अपने मन में संकल्प करें और सबके मन में उनका ज्ञान आ जाए और सब लोग उस ज्ञान का पालन करने लग जाए जो वेद के मंत्र हैं सबके मन में प्रकाशित हो जाए मगर उनको एक ये जो लीलात्मक रूप से सृष्टि का वो करना है लीलात्मक रूप से जैसे हम जबरदस्ती स्वयं को वो दे रहे हैं कई बार हम लोग जबरदस्ती स्वयं को टास्क देते हैं ऐसे ही इस संसार के रूप में चलने के लिए उन्होंने डायरेक्ट यह सब नहीं किया कि सबको बस केवल मन में संकल्प लिया और सबको सब हो गया। वह तो सबके अंदर थे। उन्होंने संकल्प मात्र सबको वैदिक मंत्र दे

00:39:11:07 देते। तो उन्होंने वैदिक मंत्र के रूप में मंत्र के रूप में व्यवहारिक चीज के रूप में वो आपको दिया जिसका व्यवहार हो सके। जगत का नाम ही है व्यवहार। तो जिस ऐसे रूप में उन्होंने अपना ज्ञान दिया जिसका जिसके साथ व्यवहार किया जा सके। इसी तरीके से वो अपना एक रूप ऐसा लेते हैं जिसके साथ व्यवहार किया जा सके। बाकी सब जगह आप मानेंगे। मगर एक इस जगह क्योंकि विरोध करना है। ईश्वर को बाधित सिद्ध करना है इसलिए नहीं मानेंगे। बाकी सब जगह आप मानेंगे कि ईश्वर ने ये बिना किसी वजह के ही किया। अहंकार क्यों लगा दिए भाई? समझ में नहीं आ रहे व्यक्ति के अलंकार आपके हिसाब से वेद के मंत्रों में अलंकार लगा दिए क्यों लगाए अच्छा कहो कि उनकी आवश्यकता थी तो हर एक मंत्र में क्यों नहीं लगाया ये दिक्कत आ जाएगी तो फिर आपको कहना पड़ेगा कि भाई उसने यूं ही लगाए उसका मन था तो उसने जो सृष्टि बनाई है उसने बिना किसी प्रयोजन के बनाई है उसमें जो जो सारी चीजें जो भी वो कर रहा है बिना किसी प्रयोजन के किया उसने श्वेता शत्रु निश में लिखा भी है और

00:40:26:07 अगर आप यह आरोप लगा देंगे उसके ऊपर कि नहीं उसका कोई प्रयोजन था तो वह सच्चिदानंद नहीं रह जाएगा आवश्यकता थी उसको हम अब आगे चलते हैं कि ईश्वर पापी तो पहली बात तो इन्होंने कुतर्क किया जब मैंने एक तर्क दिया था कि भाई क्या ईश्वर पापी हो सकता है तो इन्होंने बताया आया कि ईश्वर पापी हो सकता है मैंने उसमें तर्क दिया कि भाई रावण के अंदर ईश्वर नहीं है तो रावण रावण के अंदर भी जब ईश्वर है तो रावण ये कर रहा है तो फिर वो वो चीज उसमें उसको पापी भी कहा जा सकता है तो पहली बात यह है कि जैसे इन्होंने फिर वहां पर एक तर्क दिया है कि भाई यह तो ऐसे है जैसे कार में अगर आदमी व्यक्ति कोई बैठा है तो वह कार क्योंकि जड़ है तो व्यक्ति भी जड़ है मेरे भाई मैंने जो स्वरूप भूत लक्षण है ना उनसे तुलना नहीं की है। स्वरूप भूत लक्षणों से तुलना नहीं की है। मैंने क्रिया से तुलना की है। क्रिया से बताता हूं कैसी क्रिया। अगर कार में कोई ड्राइवर है और कार कहीं पहुंच रही है तो क्या वो व्यक्ति नहीं पहुंच रहा है?

00:41:41:25 क्या वो कार उस व्यक्ति के बिना चल रही है? है ना? तो उस कार के कहीं पहुंचने का कारण उस व्यक्ति को जो उसमें बैठा है माना जाएगा ना? मैंने इस चीज की तुलना की तो ठीक उसी प्रकार से यदि ईश्वर कहीं पर है और उसका तुमने माना कि उसके अंदर बल है सर्व सामर्थ्य है और वहां पर कोई कत्ल हो रहा है या कोई ऐसा दुराचार हो रहा है तो उस दुराचार का भी मूल कारण उसको माना जाएगा क्योंकि ईश्वर वहां पर है उसके अंदर सामर्थ्य है उसको रोकने का तो ये आरोप आपके ईश्वर पर लगेगा और तो और वो हटा दो। कोई नवजात शिशु अभी अभी जन्मा है। कुछ नहीं किया उसने। प्रलय आ गई। मृत्यु को प्राप्त हो गया वो। तो फिर उसका दोष किसको दोगे? हम तो अब ये बात आएगी यहां पर ये लोग अब यहां पर ये वो बात भूल जाएंगे कि भाई जिसज चीज का सामर्थ्य है वो जो है ईश्वर में होना चाहिए। अब ये वाला सामर्थ पाप पापी के रूप में दिखने का सामर्थ है कि नहीं है? अस्तित्व है ना तो इससे जी चुराएंगे। अब

00:42:56:26 बात क्या है? फैक्ट ये है कि यहां पर अब ये वेदों का प्रमाण ले आएंगे या शास्त्रों का प्रमाण ले आएंगे कि जो वो है जीव है वो बद्ध होता है। वो कर्मों से बद्ध होता है। इसलिए उस पर दोष लगता है और ईश्वर जो है मुक्त होता है। उस पर दोष नहीं लगता। ये तो हम भी कह रहे हैं। मगर ये पर्सपेक्टिव कौन सा है? ये परमार्थ का यहां पे तुरंत ये लोग क्या करते हैं? विरोध करने के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर का अनेकानेक जगह सब जगह दो परेक्ट दोनों पर्सेक्टिव ले चलेंगे व्यवहार और परमार्थ व्यवहार परमार्थ कहीं कहीं पर ये विरोध करने के लिए सनातन ईश्वर का सर्वशक्तिमान ईश्वर का वहां पर व्यवहारिक वो जो पर्सेक्टिव है छोड़ के सिर्फ पारमार्थिक पर्सेक्टिव की बात करेंगे जैसे यहां पर अब इन्होंने कहा कि भाई वो ईश्वर के साथ ऐसा है वैसा है या उसने कर्म किए होते हैं इसलिए ईश्वर उनके के साथ जैसे की फॉर एग्जांपल एक बात करें

00:43:52:09 ईश्वर ने चार ऋषियों के अंतःकरण में वेदों की प्रेरणा वेदों का ज्ञान दिया प्रकट किया क्यों क्यों किया और अब क्यों नहीं कर रहा है भाई इनका कहना है ना कि निर्भया को बचाने क्यों नहीं आया जब द्रोपदी को बचाने आया ठीक तो जिनको उन्होंने ज्ञान दिया क्यों दिया उन्होंने कौन से कर्म कर दिए थे? भाई कर्म तो तभी करेंगे ना जब उन्हें पता चले। तो वेदों का ज्ञान उनको कैसे हुआ? तो यह मानना पड़ेगा, कहना पड़ेगा कि उन्होंने पूर्व जन्म में पिछली जो कल्प था उसमें कुछ ऐसा हुआ कि जिसके कारण उनको ये रूप मिला और उन्हीं को उन्होंने प्रेरित किया। उन्होंने उस जन्म में आकर के ऐसा कुछ नहीं कर दिया था। उन्होंने वेदों पर नहीं चल दिए। इवन जनेऊ तक नहीं हुआ था। यज्ञ पवित नहीं हुआ था ना। इस पर फिर आगे बात आएगी। तो क्यों किया और फिर अब क्यों नहीं कर रहा है? अब अंतकरण में प्रेरणा तो इसमें क्या होगा? हमें यह मानना पड़ेगा कि कुछ पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण उनको ये इस कल्प में ये चार ऋषियों का रूप मिला और उसके उनके अंदर उन्होंने अपनी विधि के अनुसार अंतःकरण में प्रेरणा से भाषित किया। तो क्या हुआ यहां पे?

00:45:07:15 यह जो कारण है ना यह आध्यात्मिक कारण है। पारमार्थिक कारण है कि हम ईश्वर पर दोष नहीं दे रहे। मगर यह तब है जब हम ईश्वर को ईश्वर मान चुके हो। कि जैसे कहीं पर कहीं पर वो हुआ कोई दुराचार हुआ, किसी का किसी की हत्या हुई या किसी का कुछ भी हुआ। तो इसका जो कारण है हमने ईश्वर को नहीं माना। इस हत्या का कारण हमने इस हत्या का दोष इस हत्या के अनुसार ईश्वर को हमने पापी नहीं कहा। क्यों नहीं कहा? क्योंकि हम उसे आध्यात्मिक रूप से जान रहे हैं। आध्यात्मिक रूप से। मगर आध्यात्मिक रूप से जानेंगे कब? जब हम व्यवहारिक रूप से उसको ईश्वर मानेंगे। तभी तो जानेंगे उसे आध्यात्मिक रूप से। तो ईश्वर जब यह यह पारमार्थिक पर्सेक्टिव है कि ईश्वर ने अमुक अमुक कारणों की वजह से वहां पर निर्भया को नहीं बचाया या अमुक अमुक कारणों की वजह से उस पर ये दोष नहीं लगता। वो सब कुछ करने वाला क्योंकि उसकी किसी भी कर्म के फल में आसक्ति नहीं है। इसलिए वो अकर्ता है। ठीक है? सब कुछ करने वाला होते हुए भी भगवान अकर्ता है। तो ये कौन सा पर्सपेक्टिव है? ये परमार्थिक पर्सेक्टिव है। मगर व्यवहारिक पर्सपेक्टिव से क्या ईश्वर

00:46:22:21 ऐसा कर्म करने वाला दिख सकता है? हां, दिख रहा है। तो जब ये क्वेश्चन पूछा जाता है तो व्यवहारिक पर्सेक्टिव से पूछा जाता है कि क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है? जो उसका आध्यात्मिक पर्सेक्टिव है तो सभी का एक जैसा है। वो ब्रह्म स्वरूप में अलग थोड़ा सा अंतर है। मगर व्यवहारिक पर्सपेक्टिव में ही आप उसको बाधित कर रहे हो। दिक्कत ये है नास्तिकता का खंडन नहीं कर पाओगे। नास्तिकता का खंडन नहीं कर पाओगे तो अधर्म दुनिया यही तो सिद्ध करने में लगी है। ईश्वर नहीं है। तो ईश्वर को जब आप व्यवहार में बाधित कर देते हैं तो ये दिक्कत आती है। तो आपने यहां क्या किया कि उसका फिर से केवल पारमार्थिक पर्सपेक्टिव पकड़ लिया और जो व्यवहारिक पर्सपेक्टिव था उसको छोड़ दिया। इधर से क्या दिख रहा है? अगर कोई नवजात शिशु जा रहा है किसी के बिना मारे तो उसमें हमें ईश्वर की जो वो है आज्ञा ईश्वर की सहमति को स्वीकार करना पड़ेगा। तो इस रूप में उसके हत्या करने वाले के रूप में व्यवहारिक रूप से ईश्वर सिद्ध हो गया। हां फिर हम लोग उसको बताएंगे कि नहीं यह हमें इस तरफ से दिख रहा है। इसकी वास्तविकता पीछे की यह है कि उस बच्चे उस जो शिशु रूप में आपको दिख रहा है वो उसका

00:47:37:27 पुनर्जन्म का पिछले जन्म का ऐसा कर्म था जिसके कारण उसको ऐसा दंड दिया जा सकता है। अमुक अमुक बहुत सारी चीज है। तो व्यवहारिक पर्सेक्टिव में ईश्वर सब कुछ करने वाला सिद्ध है। आपका भी मगर आप उसको स्वीकार नहीं करते। जैसे एक आरोप लगाया जाता है कि श्री कृष्ण ने निर्वस्त्र लड़कियों को देखा। श्री कृष्ण ने निर्वस्त्र लड़कियों को देखा। अरे भैया तुम्हारा ईश्वर नहीं देखता है क्या? वो तो सब जगह देख रहा है। सर्वज्ञ है। देख रहा है। तो उस पर अब कह दोगे दोष नहीं लगता। तो फिर श्री कृष्ण पे दोष क्यों लगा रहे हो? केवल इतना ही तो है कि उन्होंने एक रूप लेकर के देखा और वो बिना रूप के देख रहा है। मगर देख तो रही है ना। देखने की देखना दोष है ना ऐसे अच्छा यह सब भी विचार करने वाली बातें हैं। मुझे अच्छे लगे थे टॉपिक्स के इन पर बात की जाए और बहुत दिनों से सर्वशक्तिमान पर लॉजिकल बातें की नहीं थी। तो ये भी एक बात हो गई कि ईश्वर ईश्वर पापी कैसे दिख सकता है और ईश्वर पापी क्यों नहीं है? ईश्वर पापी नहीं है पारमार्थिक पर्सेक्टिव से। मगर ईश्वर पापी दिख सकता है। व्यवहारिक पर्सपेक्टिव से। व्यवहारिक पर

00:48:53:01 पर्सपेक्टिव से ईश्वर पर कोई भी बाधा नहीं लग सकती। और अगर लगेगी तो वो जिसके बारे में बात हो रही है वो बाधित है। और जब बाधित है तो वो ईश्वर नहीं है। यही खेल है बस। कोई नास्तिक है जो आपसे बातें कर रहा है। ईश्वर ने इसको बचाया क्यों नहीं? तो आप उसको आप जो है ईश्वर को दोषी नहीं हो सकता क्योंकि वो पूर्व जन्म का फल है तो वो क्यों माने आपकी बातें? उसकी शास्त्र में निष्ठा तब होगी ना जब उसकी ईश्वर में निष्ठा होगी। यह सब बातें हैं। अब ऐसे ही वो हाइपरस्ट के उसमें भी उठाया गया प्रश्न कि ऐसा ले सकता है। इन्होंने भी उठा दिया। क्या वह अपने मूल स्वरूप को परिवर्तित कर सकता है? मेरे भाई मूल स्वरूप को परिवर्तित करने की आवश्यकता नहीं है। पहली बात ईश्वर व्यवहार में सब कुछ कर सकने वाला होना चाहिए। जिसको जिसका जिसको भज के जिसको जिसकी भक्ति करके मुक्त हो सके। मुक्त मुक्त होने के बाद भी हम ईश्वर को चेक क्यों करेंगे?

00:50:08:21 क्यों किया जाएगा भाई? उसको चेक कि तुम ये कर सकते हो कि नहीं? क्या क्या आवश्यकता है? मगर तुम्हारा ईश्वर तो व्यवहार में ही बाधित है ना। तुम वहां की बात कर रहे हो परमार्थ की बात जहां पर क्रिया है ही नहीं। प्राप्तव्य है वो केवल। अब इसमें भी अगर तुम ये कहोगे तो इसका वो देख लेना जाकर के बनाया है। क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है जिसको वो स्वयं ना उठा सके। बनाया है। देख लेना उसमें भी उसके आधार परमार्थ में उसकी चीजें सुनिश्चित होने के बाद भी आप उसको नकार नहीं सकते। क्योंकि उसकी वो जो सुनिश्चितता है वह आपको उसको ईश्वर कर मानने के कारण जानने को मिल रही है। और जब आप उसको ईश्वर नहीं मानते हो तो उसकी वो जो सुनिश्चितता है उसका कोई आधार नहीं रह जाता आपके पास। समझना इससे इसको जैसे एक सोता हुआ व्यक्ति ये नहीं कह सकता कि मैं किसी के जागा हुआ व्यक्ति ये नहीं कह सकता कि मैं किसी आवाज देने से जाग गया। क्योंकि अगर वह सो रहा था तो सुनना सिद्ध नहीं होता और सुन रहा है तो जागना सिद्ध नहीं होता है। तो उसी ठीक प्रकार से अगर वो ईश्वर को मानता है तो परमार्थ के आधार पर ईश्वर के द्वारा बताई गई स्थितियों के आधार पर आपका ईश्वर को नकारना

00:51:23:27 सिद्ध नहीं होता है। और यदि आप ईश्वर को नकार रहे हो तो आपका परमार्थ को जानना सिद्ध नहीं होता है। इसको समझना। ठीक है? और भी बहुत सी चीजें हैं। वह मुझे टाइम नहीं मिला। नहीं मैं अच्छे से इसको बताता आपको। हां एक बात और थी उसकी भी बात कर लेते हैं। पापी दिख रहा है हमारे अंदर। हां एक बात और कही इनबिल्ट। अब देखिए यहां पर भी वही वाली बात है। एक पर्सपेक्टिव को पकड़ लेते हैं। बाकी सब जगह दो-दो पर्सेक्टिव को लेकर के चलेंगे। हम बाकी सब जगह दो दो पर्सेक्टिव को ले चलेंगे। जैसे ईश्वर एक रस वाला होते हुए भी कहीं पर जुपिटर घुमा रहा है और कहीं पर पृथ्वी को घुमा रहा है तो यहां पर वह कम ज्यादा हो रहा है तो यानी निर्गुण से सगुण का रूप उसने धारण किया हुआ है तो ये जो सगुण रूप आपने धारण किया ना यहां पर व्यवहारिक हो गया ईश्वर क्योंकि वो अब किसी थोड़ा बहुत ही सही पर व्यवहार की उसमें आ रहा है वो सुन रहा है व्यवहार वो देख रहा है आपको व्यवहार इतना इतने में तो व्यवहारिक हो गया ना पहले वो अव्यवहारिक था निर्गुण था सगुण हुआ व्यवहार तो आपने ने अपनी बातों को मानने के लिए दोनों पर्सेक्टिव मान लिए। फिर क्या किया?

00:52:39:08 ये भी जो जो अगला पॉइंट है इसमें भी आपने एक पर्सेक्टिव जहां पर खंडन करना है सन जो सनातन परंपरा प्राप्त आचार्यों का तो वहां पे आप अपनी बात को आगे रखने के लिए एक ही पर्सेक्टिव पकड़ लेते हो। बताता हूं आगे कैसे कि जैसे मैंने कहा कि हमारे अंदर इनबिल्ट इच्छा है सब कुछ कर सकने वाला बनने की। तो आपने कहा कि नहीं सब कुछ कर सकने वाला बनने की इच्छा नहीं है। सर्वशक्तिमान की इच्छा नहीं है। दुख से मुक्त होने की इच्छा है। ठीक है? यहां पे आप एक एक वर्ड लिख के फंसे भी हैं। उस पर मैं आगे बात करूंगा। पर पहले अपने उसको क्लियर कर दूंगा। आप फंसे कैसे हैं? वो बताता हूं।

00:53:25:28 कि हमारे अंदर इनबिल्ट इच्छा है। दुखों से मुक्त होने की। यह पारमार्थिक पर्सेक्टिव है भाई। मगर जब हम इधर से देखेंगे तो क्योंकि हम दुखों से मुक्त होना चाह रहे हैं तो उसका बाय प्रोडक्ट क्या है? प्रकृति के सारे बंधनों से मुक्त हो जाना। तो उन बंधनों से मुक्त हो जाने में सभी बंधनों से मुक्त हो जाना यानी कूदू तो चोट ना लगे। अदृश्य हो जाऊं। सारी चीजें प्रकृति के सारे नियमों से मुक्त हो जाना। ये भी उसमें छुपा है। जैसे कि इसको थोड़ा समझ लो। जैसे कि दुखों से मुक्त कौन है? ईश्वर। दुखों से सदा के लिए मुक्त कौन है? आपने माना ना कि उसके अंदर चाह है हमेशा के लिए दुखों से मुक्त हो जाने की। तो दुखों से मुक्त कौन है? ईश्वर। क्या ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा गया है कि नहीं? ईश्वर में तो भेद नहीं है ना। वही सब एक ही बात है। सच्चिदानंद स्वरूप सर्वशक्तिमान अनंत सामर्थ्यवान तो वह उसका दूसरा पर्सपेक्टिव है। उसका सर्वशक्तिमान अविद्या रूपी संसार के पर्सपेक्टिव से उसे सर्वशक्तिमान कहा जा रहा है। अन्यथा जो पारमार्थिक दुनिया है उसमें शक्तिमान की आवश्यकता ही नहीं

00:54:38:03 है। है ना? तो आपका जो दुख से मुक्त होने वाली भावना है वह पारमार्थिक दृष्टिकोण से है कि आप मुक्त होना चाहते हो मगर उसी भावना को जब व्यवहारिक पर्सेक्टिव से देखोगे तो उस भावना का ये निकलेगा बाय प्रोडक्ट कि वो सब कुछ कर सकने वाला प्रकृति के सभी बंधनों से मुक्त हो बनना चाहता है क्योंकि जो मुक्त है उसको तुमने भी माना वो सर्वशक्तिमान है और जिस जिस सामर्थ्य का अस्तित्व है वो वो सामर्थ है हालांकि ये वो टॉपिक नहीं है मगर आपने क्योंकि इसमें भी हमको बोला है अपने लेख में तो हम उसको भी लेते देते हैं। ठीक है? और आगे बात है कि अब यहां पर आप एक चीज कह के फंस गए। आपने मान लिया कि मनुष्य के अंदर हमेशा आनंदित रहने की चाह विद्यमान है। तो क्या आप उसको ऐसा मोक्ष दे रहे हो? क्या विद्यमान से आपने माना कि ऐसी कोई चीज है। मगर आपने तो अपने यहां पर जीव और ब्रह्म की एकता मानी नहीं है। तो जब जीव और ब्रह्म की एकता नहीं मानी है तो और तो फिर इस चाह से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। कनेक्शन कैसे लाओगे? मैं एलन मस्क को इसलिए जानता हूं क्योंकि मुझे

00:55:53:06 किसी ने बताया एलन मस्क वरना मैं एलन मस्क को नहीं जानता। ठीक है? तो आपको कनेक्शन लाना होगा। कनेक्शन कैसे लाओगे? हमारे पास तो कनेक्शन है। जीव और ब्रह्म एक होगा। आप तो नहीं मानते जीव और ब्रह्म एक होगा। ब्रह्म स्वरूप हो जाएगा। हम तो तो जीव की चाह से इस ये जो आपकी जो चीजें हैं उससे जीव के अंदर ये चाह आपने मान ली। वो सदा आनंदित होने वाला बनना चाहता है। सदा आनंदित रहने वाला बनना चाहता है। तो उससे आपका वो सच्चिदानंद स्वरूप सिद्ध नहीं हो रहा। उसकी चाह से क्योंकि उसमें कनेक्शन नहीं है कोई। मगर आपने लिख दिया वो मेरा नहीं है विषय विषय यह है कि आपने यह मान लिया कि जीव सदा के लिए मुक्त रहना चाहता है दुखों से क्या आपने ऐसा मोक्ष दिया है उसको क्या आर्य समाज के द्वारा मिलने वाला मोक्ष सदा आनंदित रहने वाला है नहीं वो कुछ समय के लिए ही मुक्त होता है आपके अनुसार वो मुक्त भी नहीं है उतनी देर तक भी वो भी मैं बताऊंगा अभी कैसे नहीं है मुक्त ठीक है वो मुक्त भी नहीं है उतनी देर के लिए वो जितनी देर आपने मुक्त किया उतनी देर के लिए भी मुक्त नहीं। बताऊंगा कैसे? मगर पहली बात तो यह है कि आपके ही अनुसार जीव जो है सदा के लिए मुक्त नहीं होता है। तो जिस चीज का अस्तित्व नहीं है वो उसके अंदर क्यों आ रहा है?

00:57:08:14 ऐसे मोक्ष का अस्तित्व नहीं है जो सदा आनंदित रहे व्यक्ति उसको वापस आना होता है। तो आपका मोक्ष बाधित ईश्वर को आपने कचरा कर दिया। अपने मन मन चाहा जहां पर आपने दोनों पर्सपेक्टिव लिए। मन चाहा जहां पर आपने केवल एक पारमार्थिक पर्सेक्टिव को लेकर के व्यवहारिक पर्सपेक्टिव वाली बातों का खंडन कर दिया। ये है ठीक है। दिक्कत ये अंतर ये है। बहुत सूक्ष्मता से समझने वाला वीडियो होगा ये। सबका मन में नहीं लगेगा इतनी ऐसी बातों में। मगर ठीक है। कभी-कभी बनाना चाहिए ऐसा भी। तो क्या है कि जीव के अंदर आपने माना सदा दुखों से सदा मुक्त हो जाने की चाह है। सदा सदा के लिए तो आपके पास ना तो मोक्ष है जीव को देने वाला मनुष्य के लिए मोक्ष है आपके पास और ना ही आपके पास उसकी चाह का कोई विषय विषय के रूप में वो ईश्वर सिद्ध होता है। क्योंकि उससे कोई रिलेशन ही नहीं है। क्यों नहीं रिलेशन है? ना तो वह भक्ति करने पर आपको फल दे रहा है क्योंकि आपने उसका व्यवहारिक स्वरूप है वह काट दिया केवल पारमार्थिक स्वरूप पकड़ लिया कि नहीं फल तो मिलेगा वो तो पकड़ लिया मगर जो व्यवहारिक स्वरूप है भाई कि हमने

00:58:23:25 भक्ति की ईश्वर की और फल स्वरूप क्या हुआ हमारी जो अटैचमेंट था भौतिक जगत के साथ वो कम हुआ अब उस अटैचमेंट के कम होने की वजह से जो हमारे को दंड मिलना था प्रारब्ध के कारण या हमारे कर्मों का जो हमें फल मिलना था वो मिला वो वह नहीं कटा मगर हमको उसका कष्ट नहीं हुआ। हम रमे हुए थे अपने राम नाम के भजन में। अब यह क्या हुआ? आध्यात्मिक पर्सपेक्टिव यह है कि हमें दंड मिलके ही रहा और क्या है कि हमें कष्ट नहीं हो रहा। ये परमार्थ की दृष्टि से देखी जाने वाली सच्चाई है। मगर व्यवहार में हमें क्या हुआ? नहीं नहीं। भगवान ने हमें अपनी शरण में ले लिया। भगवान ने हमारे दंड माफ कर दिए, क्षमा कर दिया। यह व्यवहार की सत्यता है। तो आपने व्यवहारिक सत्यता को छोड़ दिया। यहां पर कई जगह पकड़ते हो। ऐसा नहीं पकड़ते। व्यवहारिक सत्यता को आप पकड़ते हो। मगर जब चाहो तब छोड़ देते हो। प्रॉब्लम ये है। आप विचार करिए अपने ऊपर। और

00:59:28:01 तो हमारे अंदर इनबिल्ट चाह दुखों से छूट जाने की ही है। मगर जब व्यवहारिक परिपेक्ष से देखेंगे तो उस दुखों से छूट जाने के वाले के रूप में वो सर्वशक्तिमत्ता की ही चाह है। ठीक है? सारे प्राकृतिक बंधनों से मुक्त हो जाने की चाह। हम और आपने भी माना है कि उस चाह का विषय जो है वो भगवान है। भगवान कौन है? सच्चिदानंद है। सच्चिदानंद की चाह है। सच्चिदानंद सर्वशक्तिमान है। ठीक है? सर्वशक्तिमान जब ये दुनिया है तब है ईश्वर। दुनिया के पर्सपेक्टिव से वो यहां पे कुछ भी कर सकता है। पर्सपेक्टिव को समझिए। हां और आगे सुनिए। अच्छा अब दूसरी बात एक है कि यह जो अपनी इच्छा अनुसार जैसे आप लोग बात करें कि अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने का पर्सपेक्टिव नहीं है। वो सामर्थ्य नहीं है इस दुनिया में। मतलब इसका कोई उदाहरण नहीं। मगर भगवान श्री कृष्ण तो आपकी सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार आप उन्होंने जो अंदाजा बताया है वो अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेने की बात कर रहे हैं। आप तो पुरुष हैं या तो उनकी वो इच्छा जो है गलत है। बोल दो श्री कृष्ण गलत थे। आप तो पुरुष नहीं थे। आप तो पुरुष है तो मानो कि हां जो उन्होंने इच्छा

01:00:43:08 की वह पॉसिबल थी। अपनी इच्छा अनुसार जन्म लिया जा सकता है। तो जब अपनी इच्छा अनुसार एक जीव जन्म ले लेने की बात कर रहा है आपके अनुसार तो ईश्वर क्यों नहीं? सामर्थ्य का अस्तित्व सिद्ध हो गया। ठीक है? तो ये सब बातें हो गई। कुल मिला के अगर हम आर्य समाज के ईश्वर को पकड़ेंगे तो वह मनुष्य की चाह का अंतिम विषय सिद्ध नहीं होगा। आप केवल यह कहते रह जाएंगे कि वो जो है ईश्वर का निर्माता है। इसलिए वो ईश्वर है। और अगर हम उसको यह ना कहें कि वो ईश्वर है। बल्कि ये कह दे कि भाई ये जो प्रकृति है वो ऐसे ही काम करती है कि आप जो करोगे उसका आपको मिलेगा। आप जो करोगे उसका आपको मिलेगा और कोई आपके साथ इधरउधर कोई बिहेव नहीं हो सकता है। अगर हम ये कह दे तो बौद्धों में आप में अंतर क्या बचा और ये कहा जा सकता है ईश्वर ऐसा ही मशीनों जैसा तो है क्योंकि आपने व्यवहारिक स्वरूप उसका स्वीकार ही नहीं कई जगहों पर काट दिया भक्ति का फल नहीं देता पापों से नष्ट नहीं करता व्यवहार में सब कुछ कर सकता है करता

01:01:47:12 है अच्छा जब वो अंतिम विकल्प नहीं है तो उसको फॉलो करने की उसको सुनने की उसके पीछे चलने की कोई आवश्यकता नहीं है आवश्यकता क्या रही ईश्वर की बौद्ध बन जाओ ईश्वर रहित बस कर्म करते जाओ फल प्राप्त करते जाओ कोई आवश्यकता नहीं है ईश्वर की तो अगर उस ईश्वर को ईश्वर ना कहकर एक प्राकृतिक सिस्टम भी मान लिया जाए तो भी कोई दिक्कत नहीं प्राकृतिक प्रकृति है वही तो बौद्ध भी तो यही कहते हैं बस आपने उसमें ईश्वर का नाम दे दिया है ना बौद्ध भी यही कहते हैं अब क्या है

01:02:24:18 यार कुल मिलाकर आपने खुद माना है जो जीव की जो मूल चाह है उस चाह का निवारण आपके पास नहीं है। आपने माना कि वो सदा दुखों से मुक्त होना चाहता है मगर आप मोक्ष दे रहे हो कुछ सालों के बाद वापस आएगा। बहुत सालों के बाद वापस आएगा। कुछ नहीं बहुत दयानंद जी ने भी ये उत्तर दिया है। अब दिक्कत क्या है? अब दिक्कत ये है कि आपने कहा कि वो इतने इतने लाख वर्ष तक मुक्त रहेगा। ठीक है? मगर आपने उसको एक सच्चाई बताई है मेरे भाई। वो क्या सच्चाई है कि तुम्हें इतने इतने लाख वर्ष बाद पुनः यहां आना है। पुनः यहां पर लिपटना है दुखों से। तो ये दुख तो उसके साथ रहा। और जो कहो सत्यार्थ प्रकाश की स्टाइल में सत्यार्थ प्रकाश ऐसी ही बात करती है। जो कहो कि उसको हम भुला देंगे कि तुम्हें वापस आना है। वो जो 36 लाख वर्ष है जो भी वर्ष है उतने समय के लिए भूल जाता है कि उसको यहां वापस आना है। तो अविद्या यह है कि वो है अविद्या यह हुई यह संसार अविद्या है कि फिर वो संसार अविद्या है। अगर हम उसको कोई इंजेक्शन लगा दे मुक्ति के टाइम पे कि भैया तू 36 लाख वर्ष तक जो है दुखों से मुक्त है। अब

01:03:39:18 तू घूम विचरण कर। हमने इंजेक्शन लगा दिया। तेरी मेमोरी खत्म हो गई वो वाली। यह तुझे नहीं ध्यान रहेगा कि वो तुझे वापस उस संसार में जाना है दुख भोगने के लिए दोबारा। ठीक है? तो फिर क्या होगा? अविद्या रूपी संसार तो वो हो जाएगा। बना मूर्ख टहल रहा है जीव। उस उसको वापस आना है। मगर वो सोच रहा है वाह मैं तो मुक्त हूं जबकि वो मुक्त नहीं है। तो आप उसको भुला भी नहीं सकते। तो सच्चाई क्या है कि वो उस 36 लाख जो भी वो मैंने देखा नहीं है वो कितना बड़ा है टाइमिंग है। मगर जो आर्य समाज के अनुसार जो मुक्ति है वो कुछ समय के लिए है। कुल मिलाकर के परांत काल कहते हैं उसे। तो जो मुक्ति है परांत काल का जो समय है वह भी मुक्त नहीं है क्योंकि उस समय भी उसको एक दुख है कि मुझे वापस जाना है वो है उसके अंदर भाव तो मुक्त कहां हुआ नहीं हुआ ना ठीक है इसीलिए कहता हूं क्यों पड़े हो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर

01:04:43:16 में देखना विचार करके भाई सकारात्मक दृष्टि से देखना चिढ़ना मत हम और हो सकता है हमारी एक अच्छी वार्ता हो जाती अगर तुम वो दुराचरण ना करते जो तुम्हें वहां से भरे गए हैं। हमने आज तक कभी व्यक्तिगत प्रहार किया किया व्यक्तिगत प्रहार [संगीत] हम आपने किया जोकर इत्यादि ये सब वर्ड इन्होंने कहे हैं जो जिनके प्रश्न है बस यही है कि भौतिक व्याख्या को जो व्यवहारिक पर्सपेक्टिव है उसको कई जगह पर यह सारी संस्थाएं जो ईश्वर को बाधित करती हैं ये कई जगह जगह पर जो व्यवहारिक पर्सपेक्टिव से होने वाली व्याख्या है उसको कैंसिल कर देती है। बस यहीं पर उसके कारण वो ईश्वर बाधित हो जाता है। फिर वो मनुष्य की चाह का विषय नहीं रह जाता। फिर हम उस ईश्वर को सिद्ध नहीं कर सकते कि जीव की चाह का अंतिम विषय हो। नहीं कर पाओगे। हां ना कभी नास्तिक बन के बात करूंगा। ठीक है? तो वो सिद्ध नहीं हो पाएगा जीव की चाह का। तो फिर वो वो नहीं बन पाएगा जिसके पीछे हम चले ही चले। नहीं पीछे चलो ही चलो। उसको मानो ही मानो।

01:05:56:12 तो हमें जब हम जब दोनों पर्सपेक्टिव स्वीकार करेंगे तो जो व्यवहारिक पर्सेक्टिव होगा उसमें ईश्वर सब कुछ कर सकता है। ईश्वर किसी भी प्रकार के व्यवधान से रहित है। किसी ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं बल्कि सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है। ये हमेशा ध्यान रखिए। ये व्यवहारिक पर्सपेक्टिव है। सच्चाई और हमें वो ईश्वर चाहिए जो व्यवहार में सब कुछ कर सके। मुक्त हो गया व्यक्ति वहां जाकर पूछ रहा है तुम यह कर सकते हो क्या भाई वहां का वह विषय नहीं है और उसके आधार पर भी आप नकार नहीं सकते ईश्वर को हम नहीं नकारने देंगे ले आओ नास्तिक को भेज दो आपका ईश्वर नकार दिया जाएगा आप लोग कहते हो ना कि जो आहार समाज को नहीं मानता वो नास्तिक है अभी मैं एक धर्मामीटर करके एक वो बना रहा हूं कुछ लाऊंगा तब आपको बता पता चलेगा वास्तविकता यह है कि जिसका ईश्वर बाधित है वह ईश्वर उस ऐसे ईश्वर को मानने वाले भी नास्तिकी है। आस्तिकता भास है वहां बस ये

01:07:03:28 है। अब आगे आपने एक पॉइंट रख दिया कि ईश्वर अकाया है। अकाय है। तो भाई ईश्वर जो है जन्म भी तो लेने वाला कहा गया है। 31 19 में उसको क्यों भूल जा रहे हो? 31 18 31 19 इत्यादि में यजुर्वेद वो क्यों भूल जा रहे हो? मैंने कहा ना कि ईश्वर के तीनों पर्सपेक्टिव मानने पड़ेंगे आपको। एक पर्सपेक्टिव वो है निर्गुण निराकार। एक रस। फिर जब वो क्रियात्मक होगा तो सगुण

01:07:36:18 निराकार। और फिर जब वो लीलात्मक होगा, व्यवहारिक होगा तो सगुण साकार। सगुण निराकार में भी व्यवहारिक मान लिया आपने उसको। फिर आपने अंत में एक प्रश्न पूछा है मूल निराकार को बदल सकता है कि नहीं मैंने बता दिया दोनों पर्सपेक्टिव है जो उसका वास्तविक पर्सपेक्टिव है परमार्थ उसमें नहीं व्यवहारिक पर्सपेक्टिव में हां अविद्या रूपी संसार में हां ये अगर अविद्या है तो इसमें जब तुम सारे चमत्कार दिखा सकते हो तो एक यही चमत्कार क्यों नहीं दिखा पा रहे हो कि वो अवतार ले सकता है क्योंकि तुम्हें नफरत है परंपरा प्राप्त आचार्यों से धर्म से तना सनातन से और अपना ब्रामिक आईडियोलॉजी ठूसनी है

01:08:31:21 इसमें हम ये चीजें पूरी हो गई। अब हम दूसरा टॉपिक खोल लेते हैं। हम समीक्षा करनी थी। एक लाइव हुआ था हमारे बीच। आर्य समाज के एक आर्य समाज को फॉलो करने वाले एक भाई साहब आए थे जिनका नाम था कुलदीप विद्यार्थी। है ना? तो उनके बारे में कुछ चीजें थी और

01:09:08:22 [संगीत] चलिए ठीक है तो आज ये सर्वशक्तिमान वाली बातें हो गई क्लियर और कुछ और भी प्रश्न सर्वशक्तिमान से रिलेटेड पूछे गए हैं अलग से वर्बली ध्यान नहीं है और पूरी व्यवस्थित रूप से था नहीं कुछ किसी के क्वेश्चंस हो तो वो आ सकता है सर्वशक्तिमान से रिलेटेड बात कर सकता है और अगर वो जिसके के प्रश्न थे अगर वो देख रहा है लाइव को तो उससे मैं कहूंगा कि अपने जो अभद्र आचरण आपने किया है जो आपको सिखाया नहीं गया आपके अलंकारी भवनों में वो सीख लो आ करके कहीं मंदिर मंदिर में या हमसे संपर्क कर लो हम ही सिखा देंगे तो वो जो है जो वो चर्चा है कुलदीप विद्यार्थी जी वाली जो अ लाइव चर्चा हुई है उनके साथ वो चर्चाएं हम कर लेंगे किसी और अ एक जैसे कुछ क्वेश्चंस आते हैं मैं उनका जवाब दे दूं। वैसे मैंने दिया है पर फिर भी मैं देता चलता हूं। जैसे कुछ क्वेश्चन आते हैं कि क्या ईश्वर इलॉजिकल चीजें कर सकता है क्या? कोई चीज इलॉजिकल है। यह एक इंफॉर्मेशन है। ईश्वर को इस प्रपंच रूपी संसार में आपकी इंफॉर्मेशन

01:10:24:00 ही तो बदलनी है। भाई ये इंफॉर्मेशन ही तो बदली है उसने कि कोई आपकी मां है, कोई आपकी बहन है, कोई आपकी पत्नी है, कोई आपका पिता है, कोई आपका भाई है। इंफॉर्मेशन ही तो दी है आपको एक। तो इंफॉर्मेशन चेंज करने में क्या होता है? जैसे मैं फॉर एग्जांपल बता दूं कि दो और दो पांच हो सकता है क्या? इसको बता देता हूं। तो आपने कहा क्या ईश्वर दो और दो पांच कर सकता है क्या? ये इनफेटिव क्वेश्चन है। क्रिया नहीं है कोई। आपके मन में ठुसा हुआ है कि दो और दो चार होता है। पांच नहीं होता है। तो आपको ये सिद्ध आपके मन को एहसास कराना है कि नहीं दो और दो चार ही होता है। यही तो गोल है एट द एंड तो क्या है? कैसे करेगा? सबसे पहली बात कि आपके मन में क्यों इसका वो क्या है? सोर्स क्या है? जो जो आपके लिए प्रमाणिक सोर्सेस होंगे वो उनसे कहलवाएगा आपको कि दो और दो पांच होते हैं। मान लो जिन जिनके कहने से आपने कहा कि दो और दो को चार कहा जाता है। उन्हीं को वो मजबूर करेगा कि आप कहो जाकर के। मान लो और किसी को मजबूर नहीं करेगा। आपको मजबूर कर देगा। आपको ही ऐसा दिखाने आपको ऐसा फील कराने लगेगा कि दो और दो वो होते हैं पांच

01:11:39:01 होते हैं। आप बोलने लगोगे पांच होते हैं पांच होते हैं। तो क्या हुआ? आपके अंदर की इंफॉर्मेशन उन्होंने उसने चेंज कर दी। वो चेंज करने का तरीका बहुत सारा है। अच्छा अब क्वेश्चन वही आ जाएगा दोबारा से कि उसने वास्तव में थोड़ी ना किया। यह तो वैसे किया गया है जादू के तरीके से या फिर हिप्नोटाइज करके किया गया है। तो भाई यह जो संसार आप देख रहे हो ना जगत जिसको आप ये सब मान रहे हो ये भी तो वही है अविद्या जो जैसा है वैसा आपको नहीं दिख रहा है। ये भी तो अविद्या है।

01:12:16:25 तो जब अविद्या में आप बाकी सब चीजें देख रहे हो तो ईश्वर का अवतार क्यों नहीं देख सकते हो? ईश्वर क्यों नहीं आ सकता है? बाकी सब चीजें आपको बांधने वाली है। मगर कुछ ऐसे रूप भगवान इस अविद्या के ही यह भी क्वेश्चन आता है। अविद्या है तो इसको इसको फॉलो क्यों करें? वेद भी तो अविद्या हो गया। वेद वो अविद्या है जो आपको छुड़ाएगी। ईश्वर का अवतार वो अविद्या का वो रूप है जो आपको छुड़ाएगा। जो आपको मुक्त कराएगा मुक्ति का हेतु भगवान भगवान का स्वरूप ठीक है

01:12:57:09 तो जैसे धरती पर गिरा हुआ व्यक्ति धरती का ही सहारा लेकर के उठता है अब उसने धरती का यूज़ इस तरीके से किया कि वो उठ गया। एरोप्लेन जिसको हवा में उड़ना है, धरती से अलग हटना है, उसने धरती का यूज़ इस तरह से किया कि वह उड़ने लगा। इसी तरीके से यह अविद्या का वो रूप है जिसका ऐसा यूज़ करके आप जो है बाहर निकल सकते हैं अविद्या रूपी संसार से। तो यह ईश्वर का अवतार। यह ईश्वर का ज्ञान वेद। ठीक है?

01:13:37:12 मुझे तो यह हो गई इॉजिकल लॉजिकल वाला क्वेश्चन संभव को असंभव कर सकता है कि नहीं। ठीक है? और क्या था? उसने असंभव को ही संभव किया हुआ है। पहले ये समझ लीजिए। वास्तविकता क्या है? तीन तत्व माने ना आर्य समाज ने। क्या है वास्तविक? आर्य समाज की बात कर लो। तीन तत्व है केवल। अभी तुमको दिख रहा है क्या केवल तीन तत्व है ऐसा फील हो रहा है क्या आपको नहीं तो इसका अर्थ क्या है इसका अर्थ क्या है कि आपको वो दिखाया जा रहा है जो है नहीं या आपको वैसा दिखाया जा रहा है जैसा है नहीं अविद्या ठीक है ये सारी चीजें लड़ने वाली बात नहीं है विचार करिए बाकी आपने प्रश्न किया था कि वो जिसज सामर्थ्य का अस्तित्व है तो वो तो हमने आपको सामर्थ्य का अस्तित्व बता दिया है कई तरीकों से और अन्य कई सारे टॉपिक दे दिए विचार करने के लिए। मगर इसके बाद अब आप यह अपेक्षा ना करें कि आपका इसी तरीके से वीडियो के थ्रू जो है जवाब दिया जाए। आप अपने दो आपके पास ऑप्शन है या तो आप अपने आर्य समाजियों को ऐसा बनाएं कि वह आपके

01:14:52:21 आपके अनुसार जो आपको लगता है कि आप बहुत तर्कवान है वो जो है आकर के उस पक्ष को वैसा ही एज इट इज रख पाएं जैसे आप रख रहे हो या फिर आप अपने डायरेक्ट कुछ नए फॉलोअर्स तैयार करें और उनको ऐसा बनाएं जैसा आप स्वयं को समझते हो और और या फिर आप स्वयं आना चाहते हो तो आप स्वयं आ जाओ। आपका स्वागत है क्योंकि तब जरा फटाफट रिजल्ट पे आए। रिजल्ट आएगा। हमें इंतजार नहीं करना पड़ता है। तो आप अगर स्वयं आना चाहते हो तो आप अपने दुराचरण के लिए अभद्र व्यवहार के लिए हमारे यहां तो ऐसे ही होता है। है ना? उन सब चीजों के लिए आप क्षमा याचना करें। हां। ऐसे थोड़ी ना होता है कि मतलब आप हमारे बारे में कुछ भी व्यक्तिगत टिप्पणियां करते रहे। हमने कभी आपके लोगों के लिए हमने अपनी तरफ से कोई इमोजी बनाया हो या कोई हास्यात्मक चेहरा दिया हो ये हमारे सिद्धांत है। हम नहीं करते ऐसा दयानंद जी के लिए अगर कोई अभद्र टिप्पणी करता है तो हम उसको प्रतिकार करते हैं। और आप लोग क्या क्या नहीं बोलते रहते हो। खैर तो अगर आपको आना हो तो आप क्षमा मांग लीजिएगा।

01:16:18:04 व्याख्यान देख सकते हैं आप कोई दिक्कत नहीं है। आराम से देखिए। सार्वजनिक है सभी के लिए। किसी का कोई प्रश्न हो तो वह कर ले या फिर वह रॉकली जी आप किसी और दिन आ जाइएगा। अभी कल भी है शायद हमारा एक लाइव होगा सेशन तो आप कल आ जाइएगा। लगभग लगभग वैसे ही सवाल हैं आपके भी आप कल आ जाइएगा। विशाल भाटिया जी हां जी जय श्री राम। विशाल जी जय श्री राम। पहचाना मेरे को क्यों नहीं पहचानेंगे भाई? अच्छा काफी टाइम बाद मुलाकात हो रही है और बताइए क्या चल रहा है बस कृपा है राम की अच्छा मैं थोड़ा पूछ रहा था कि मैंने अभी जो एक घंटे से सब बोला है एक्चुअली बहुत ज्यादा मैं व्यवस्थित रूप से नहीं भागा दौड़ी में 10 दिन भर तो मैं आया और ये क्योंकि लगा हुआ था आज शाम का तो हमने किया है तो ये समझ में आया कि नहीं जो मैंने समझाने का प्रयास किया ये चीजें बिल्कुल बिल्कुल आया ना

01:17:33:13 तो ठीक थोड़ा वो वो हो जाता है। कठिन हो जाता है। यह वाला टॉपिक ऐसा है। हां आप आप देख सकते हैं उनके व्याख्यान अ YouTube पर जो पड़े हुए हैं। है ना? अधिकार की सीमा में आपकी। मैं दो-तीन दिन से आपको लिखने का कोशिश कर रहा था कि आप लाइव आ जाइए। तो इस बार मुझको भी कुछ अलंकार समाज से रिलेटेड चर्चा करनी होगी। तो आज उस पे है तो हम आ गए हैं। नास्तिकों को वेद की प्रमाणिकता कैसे सिद्ध करें?

01:18:13:20 भाई देखिए प्रमाणिकता तो यही है कि वो परिभाषित कर पाते हैं आपकी चाह के विषय को। और आगे भाई केवल प्रामाणिकता से ही नहीं केवल तर्क से नहीं आस्था भी है वहां पर। वेद है ना आस्था है मगर उसमें तर्क की पराकाष्ठा है कि वो वो शास्त्र है जो यह नहीं कहते कि हमको ईश्वर ने लिखा वो अनादि शास्त्र है सदैव थे इसलिए हम उन पर आस्था भी है और विश्वास भी दोनों ही चीजें हो जाती है ठीक है मैंने कल आपकी वो काशी वाली वीडियो देखी थी जी हर हर महादेव हर हर महादेव

01:19:06:21 मैंने कमेंट्स तो बहुत सारे उसमें लिखे थे लेकिन अब काशी में ये लोग इतना मूर्ति पूजा से इतनी चिढ़ है। काशी के तो कोनेकोने में मंदिर है। काशी में मंदिर ऐसा है आर्य समाज की वास्तविक स्थिति पता है आपको क्या है कि पहली बात तो ग्राउंड पे इनके बहुत कम फॉलोअर्स मिलेंगे। हालांकि वह कोई बात नहीं है। संख्या बल कितना है क्या है। मगर आर्य समाज की वास्तविक स्थिति यह है कि जितने आर्य समाज हैं आज के टाइम में उसमें से भी 80 90% कहीं ना कहीं आर्य समाज के विरोधी है। उनको वो स्वीकार नहीं करेंगे मगर वो कर रहे होंगे। कई लोग आपको मूर्ति पूजक मिलेंगे। आर्य समाज कई लोग ऐसे ऐसे कार्य करने वाले कि नहीं हम वर्ण व्यवस्था को उससे जन्म से मानते हैं। हमारे यहां की जो विवाह है वो तो उसी में होंगे। हम अगर क्षत्रिय है तो क्षत्रिय में ही होंगे। ये सब कर रहे हैं। मगर बस जब करने चर्चा करनी होगी तो बोलने में आएंगे कि नहीं वो गलत वो जो है उस चीज को छुपा लेंगे जो खुद फॉलो कर रहे हैं। सच्चाई गई अफवाह उड़ाई गई। बात कुछ और थी बताई कुछ और गई। है ना? हम हां वो अफवाह उड़ाई गई है वो देख लो ना वहां पे क्या स्थिति है। उसी काशी शास्त्रार्थ स्मृति स्थल को संभालने

01:20:21:22 वाले जो लोग हैं वो तो कम से अच्छा ये जो सज्जन आए थे ये जो सज्जन आए थे हां रॉकली जी आप कल आ जाइएगा आपका फेस की आवश्यकता नहीं है। हम आपको व्यक्तिगत रूप से जानते हैं और देख लिया जाएगा। हम लोग बात कर लेंगे एक बार आपस में जो हमारी ऑपरेटर महोदय उनके साथ और टीम के साथ कहिए कहिए हां जी बोलिए मैं आपको आप पहले अपनी बात कहिए फिर मैं कहता हूं हां मैं ये कह रहा था कि जो अ ये जो भाई साहब आए थे काशी में तो हमने ये कहा था उनसे कि आर्य समाज के सिद्ध सिद्धांतों को जो अच्छे से जानता हो उसे भेजिएगा किसी विद्वान को और क्या कहे भाई क्या कहे और अब जब ये आए तो अब लोग कहने लगे विद्वान नहीं है आर्य समाज नहीं तो कैसे करें हां वो एक आया था वो बोला था कि विद्वान लिख आएंगे वो जो कुछ गंदा उल्टा सीधा लिखता रहता है वो आपको एक आर्य समाजी वो नहीं था वो जो निरंतर आर्य समाज है जो उनको आज गाली दे रहा था कि भाई ये आदमी वो है ही नहीं विद्वान नहीं है कोई ऐसे है शर्म आनी चाहिए ऐसे कर रहा

01:21:36:28 वैसे कर रहा है। बताओ यह कह रहा था उनके बारे में। यह क्या सवाल है? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। इसका मतलब क्या है? अनसस्क सब्सक्राइब दिस चैनल। बोलने वाला मस्त है। कल से कौन आएगा? यही है घमंड। ये किसका घमंड है? अनसस्क सब्सक्राइब करके खुद जा रहे हो। तुम्हारा खुद का घमंड है। किसका घमंड है? सिद्धांतिक चर्चा करनी है। अच्छा भैया मेरा एक प्रश्न है क्या वेदों में क्या सच में बलि प्रथा होती है? क्या जानवरों की बलि वगैरह अमुक अमुक अमुक अमुक चीजों में वहां उसका जो पर्यावसान है वो एक तरीके से मांसाहार को रोकने के लिए है बलि का जो प्रावधान है बलि का प्रावधान है ऐसा नहीं है कि नहीं मगर उसके उसका जो पर्यावसान है वो मांसाहार की न्यूनता में न्यूनता मतलब कमी आती जाए व्यक्ति उस उस आदत से मुक्ति पाए उसमें

01:22:44:10 है। चलिए फिर अब फिर किसी आप अपनी बात बोल लीजिए। फिर हम लोग फिर आज की चर्चा वो करते हैं। तो मैं ये कह रहा था कि अभी मैं शंकर भाष्य गीता का पढ़ रहा हूं। आपको एक बार दिखाया भी था लखनऊ से लिए थे कथा में। तो उसमें अभी पहले उसके शुरू में जब आप पढ़ेंगे ना आदि शंकराचार्य जो भगवान आदि शंकराचार्य जी हैं उन्होंने उसके स्टार्टिंग में दूसरे पेज में आप देखिएगा भगवान श्री कृष्ण को यह बताया कि वो विष्णु जी के अवतार हैं और यह भी उन्होंने बताया कि ईश्वर अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी वैष्णवी माया को अधीन करके वो जन्म लेता हुआ सा प्रतीत होता है संसार में और वो लोगों के सामने प्रकट हुआ सा दिखता है जबकि वो वैसा है नहीं और आगे आगे मैं भी उतनी देर से यही समझा रहा हूं कि जब ये अविद्या है जब जो जैसा है वैसा दिख नहीं रहा है तो यहां पर ईश्वर को वैसा दिखने में क्या दिक्कत है बस ईश्वर से ही दिक्कत आ जाती है इन्हें ईश्वर को बाधित जो करना है भ्रामितिक बनाना है उसको इसलिए आगे की आगे की व्याख्या में बहुत सारे महाभारत के श्लोक उपनिषद के श्लोकों को भी वो कोट करते हैं उन्होंने बिल्कुल

01:23:59:25 चलिए फिर सभी को जय श्री राम। समय देने के लिए धन्यवाद। और वो जो सर्वशक्तिमान वाला था विषय वो तो सारे टॉपिक्स हमने कवर कर लिए हैं। अ मूल निराकार। ठीक है? तो हम लोग कल फिर आते हैं। वह जो चर्चाएं हुई है जो लाइव उनके बारे में समीक्षा करेंगे और कुछ एक दो चीजें अगर रह गई होंगी तो कल हम लोग बात करेंगे। आशा करते हैं आज का ये जो आपके

01:24:35:12 लिए जो ये लाइव है इस ये आपके लिए लाभदायक रहे। एक बात समझ लीजिए कि पर्सपेक्टिव दो है। एक पर्सपेक्टिव है स्पिरिचुअल पर्सपेक्टिव एक पर्सपेक्टिव है जो बिहेविरियल है। ठीक है? बिहेवियल जो है वो अविद्या रूपी है। सबने माना है किसी ना किसी तरीके से। उसको वैसा नहीं है जैसा है। शब्दों का हेरफेर करके वो शंकराचार्य की बात को मान ही लिया है अलग-अलग तरीकों से और बहुत सारी चीजें हैं। मगर कुल मिलाकर के आज जो हम टॉपिक पे पहुंचे कि ये जो भी लोग ईश्वर को बाधित कर रहे हैं वो वो लोग हैं जो जहां पे अपना मन चाहता है वहां पर दोनों पर्सपेक्टिव से ईश्वर की व्याख्या करते हैं, स्वीकार करते हैं। और जहां अपना मन चाहता है वहां सिर्फ ईश्वर का एक पर्सेक्टिव लगा करके उसका जो व्यवहारिक पर्सेक्टिव से कही जा सकने वाली बातें हैं उसको नकार देते हैं जिससे कि ईश्वर बाधित हो जाए परंपरा प्राप्त आचार्यों से प्राप्त होने वाले ईश्वर से इतर चला जाए तो हम अपने नए सिद्धांत दे पाए अपना नया धर्म दे पाए नए ईश्वर के नाम पर ठीक है और जो मूल प्रश्न था कि जिस जिसज सामर्थ का अस्तित्व है वह होना चाहिए ईश्वर में तब वो सर्वशक्तिमान कहलाएगा तो इस व्याख्या के अनुसार जिस सामर्थ्य

01:25:50:21 का अस्तित्व है कि जीव ऐसा शरीर धारण कर रहा है जो किसी का पिता कहला सके, किसी का पुत्र कहला सके जिसके साथ विचारों का आदान प्रदान प्रत्यक्ष रूप से किया जा सके। तो आपका ईश्वर वैसा शरीर धारण नहीं कर पा रहा है। उसका सामर्थ्य है। अस्तित्व है उस सामर्थ्य का। ठीक है? और इसके बाद फिर एक चीज आपने खुद स्वीकार कर ली

01:26:23:02 कि वास्तविकता यही है कि ईश्वर में कोई दोष नहीं है। वो दोषी नहीं हो सकता। आज करेंगे क्या? पंडित जी आज प्रश्न करने वाले हैं। ठीक है? तो उसमें कोई दोष नहीं है। मगर व्यवहार की दृष्टि से विद्या रूपी संसार की दृष्टि से हम ये सब बातें भी कह सकते हैं। तो मैंने आपको कई चीजें बताई। इसके

01:27:03:00 बाद और इस तरह से उसकी व्यवकार नकार करके जो ईश्वर प्राप्त होता है आर्य समाज का और जो मोक्ष प्राप्त होता है आर्य समाज का वो जीव की चाह का विषय ही नहीं है तो ना उसकी सिद्धि है और ना ही जीव के पास कोई कारण बच पाएगा कि वो उसको फॉलो करे। ये ठीक इस प्रकार से है कि शंकराचार्य ने नास्तिकता का खंडन कर दिया। ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध कर दिया। ईश्वर का प्रचार हो गया सब जगह। अब क्या है कि जब ईश्वर के बारे में सवाल ना करने की भावना है ही नहीं। ऐसे लोग ऐसे लोगों को पकड़ के आप ब्रह्मा कुमारी वाला बना लो, आर्य समाजी बना लो, इस वाला बना लो। मगर जब शुरुआत से किसी को ईश्वर की तरफ लाना होगा तो आपको वहां शंकराचार्य की जरूरत पड़ेगी। शंकराचार्य के सिद्धांतों के कारण ईश्वर का इतना प्रभाव है कि आप अब कोई नास्तिक है ही नहीं। सब पहले से ईश्वर को ही ढूंढ रहे हैं। ईश्वर के विषय में बातें कर रहे हैं। तो ऐसे लोगों को आप कन्वर्ट कर सकते हो। आओ भैया चलो चलो हमारे साथ आर समाजी बन जाओ। ऐसे लोगों को आप कन्वर्ट कर सकते हो कि चलो चलो। मगर जब आपको मूल में जब क्योंकि वो लोग ये भूल गए कि ईश्वर है या सिद्ध कैसे हो होता है। ईश्वर मानते ही है तब आप उसको आर्य समाज ले जाओ ले जा सकते हो।

01:28:18:12 मगर जब सिद्ध करने से लेकर और वहां ले जाने तक बारी आएगी तब आपको शंकर की जरूरत पड़ेगी। तब आपको शंकराचार्य की जरूरत पड़ेगी। समझे? हम तो एक और दोबारा से कर लेते हैं रिवाइज क्या-क्या किया? जिस सामर्थ्य का अस्तित्व है वो सामर्थ्य आपके ईश्वर में नहीं है। और जीव की चाह का वो विषय नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि उसमें उसके बीच में कोई कनेक्शन है नहीं। और जीव अंत में वह सच्चिदानंद नहीं बन पा रहा है क्योंकि उसका जो मोक्ष है वो वो भी आपका बाधित है और वो जिसको आपने मोक्ष कहा है वह भी सुखदायक नहीं है उसमें भी एक कंटक है कि मुझे वापस जाना है ये दुख है ठीक है और और क्या था और हमने यह जाना कि जितनी भी ऐसी विरोधाभासी संस्थाएं हैं वो कैसे काम करती हैं धर्माभास कैसे काम करता है वो क्या करता है जहां मन चाहे दोनों पर्सपेक्टिव जहां मन चाहे सिर्फ एक पर्सपेक्टिव और वो अपनी बातें रचता चला जाता और हमने क्या जाना कि जीव की चाह वास्तविक है दुखों से मुक्त हो जाना मगर यह सिर्फ वो वाला पर्सपेक्टिव है गढ़

01:29:33:18 मगर सतह स्तर पर यह भी कहा जा सकता है कि वो प्रकृति के सभी बंधनों से मुक्त हो जाना चाहता है और जब सभी बंधनों से मुक्त होने कहेंगे तो फिर वो नियंत्रक हो जाना चाहता है ये भी कहेंगे जैसे ईश्वर सच्चिदानंद है तो ईश्वर सर्वशक्तिमान भी है ठीक है सभी जय श्री राम [संगीत]

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Live 1:29:55 · 18 Mar 2025

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