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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] मनुष्य कोई भी कार्य एक भी कार्य बिना सहायता कर ही नहीं सकता। इसमें उदाहरण क्या देना आपको? एक उदाहरण दे दीजिए तो मैं उससे नाप के दिखाऊंगा। ये मैंने बोतल ठीक है। ये ये मैंने बोतल उठाई है अपने हाथ में। ये मैं ईश्वर की सहायता के उठा बिना ईश्वर की सहायता के उठा ही नहीं सकता। ये ले लीजिए उदाहरण। अच्छा मतलब सबसे पहले तो एक चीज फिक्स हो गई कि अगर किसी ने किसी को चाकू मारा तो बिना ईश्वर की सहायता के नहीं मार सकता। कुछ भी नहीं हो सकता बिना ईश्वर की सहायता के एक भी कार्य नहीं। बहुत बढ़िया। बहुत बढ़िया। बिना ईश्वर की सहायता के नहीं हो सकता। इसको रख लेना बात के लिए। अब दूसरी बात आ गई सहायता निमित्त तो हर कार्य में ईश्वर ही है ना। बीच में इसमें मैंने बिना ईश्वर के सस्टेन नहीं कर सकते। इसमें मैंने ईश्वर की किस रूप में सहायता ली है? किस रूप में सहायता ली है? चेतन के रूप में, जड़ के रूप में? चेतन चेतन चेतन रूप का मतलब क्या समझ रहे हैं आप? मुझे बता दीजिए पहले। चेतन रूप का मतलब किस प्रकार बता देता हूं। बता देता हूं। बता देता हूं। जैसे मेरे पास मेरे पास एनर्जी है। खाना खाया तो इस समय जो मेरी एनर्जी है ना अगर मैं भौतिक दृष्टि से देखूंगा तो यह एनर्जी मेरे लिए क्या कहते हैं? ऐसी है कि इसके पास अपना कोई प्रज्ञा
00:01:17:08 नहीं है या बुद्धि नहीं है या वहां पर कोई भी दिमाग अक्ल इस तरह की कोई चीज नहीं निर्णायक क्षमता नहीं है। मैं जैसा इसको उपयोग करना चाहता हूं मैं जैसा इसको उपयोग करना चाहता हूं वो हो रही है उपयोग। अब अगर आप ये कहेंगे जो शक्ति है जिसका मैं अपने मन मुताबिक उपयोग कर रहा हूं। यह जड़ रूप से है तो यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर यहां पर चेतन होते हुए भी जड़ के रूप में उपस्थित हो रहा है तो हम उसके उसकी सहायता ले रहे हैं। ठीक? चेतन होते हुए भी जड़ रूप में उपस्थित हो रहा है तो हम उसकी सहायता ले रहे हैं और या फिर यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ईश्वर जो है बुद्धि पूर्वक हमारे समस्त कार्यों में उतना ही भागीदार होता है जितना हम होते हैं वही ना भागीदारी यानी निर्णय लेने में ईश्वर का कितना भागीदारी है यही बोलना चाह रहा अल्टीमेटली यही सवाल है आपका यही बोला आपने ये तो मैं मैं इस पर चर्चा आगे नहीं बढ़ाना चाह रहा हूं ये तो मैं बाद के लिए रख रहा हूं वो मुझे बस इतना बता दीजिए कि वो जड़ के रूप में उपयोग होता है ईश्वर शक्ति जड़ के रूप में या चेतन के रूप में होती है यह बता दीजिए बस फिर बाद में बात कर लेंगे इस बारे में अभी वो सर्वशक्तिमान वाला चल रहा है वो चलता रहेगा जी देखिए जड़ के रूप में भी वही बात है ना जड़ के रूप में नहीं चेतन
00:02:32:28 सत्ता के रूप में अवेलेबल है जड़ के रूप में मूत प्रकृति अवेलेबल है जड़ के रूप में ईश्वर नहीं ईश्वर से इंटरेक्शन नहीं करते मू प्रकृति से इंटरेक्शन बात को समझ थोड़ा सा स्ट्रक्चरल वे में चाहिए बात अभी हो रही है कि मनुष्य जो भी काम करता है उसमें ईश्वर सहायक होता है। ठीक है? तो क्योंकि ईश्वर तो चेतन है। ईश्वर चेतन है ना? तो मैं यहां पर आपसे ये पूछ रहा हूं कि चेतन होते हुए भी वो जड़ जैसा बिहेव करता है क्या? चेतन होते हुए भी नहीं करता। तो इसका मतलब वहां पर वो जो ईश्वर की सहायता ली जा रही है वो ईश्वर की चेतना के साथ ली जा रही है। मतलब चेतना भी वहां इन्वॉल्व है। ईश्वर एक ईश्वर का निर्णय है वहां पर। ईश्वर की सत्ता है। निर्णय नहीं है। वही तो आप गलती कर रहे हैं। निर्णय नहीं है। निर्णय मेरा स्वयं का है। निर्णय में ईश्वर ने कैसे आ सकता है? आप क्या बात कर रहे हो? तो निर्णय में आएगा नहीं। ईश्वर निर्णय नहीं है तो वो जड़ जड़ केव कर रहा है। हां नहीं आप शब्दों का चुनाव आप शब्दों का चुनाव गलत कर रहे हैं। मैं बताता हूं मैं बताता हूं कैसे जड़ को ईश्वर ने धारण किया हुआ जड़ के रूप में ईश्वर बिहेव नहीं कर रहा है। जड़ को ये ईश्वर ने खुद जो है जड़ को यानी मूव प्रकृति देखो धारण किया हुआ है इसलिए एक्सिस्टेंस
00:03:48:14 है सारी ईश्वर खुद नहीं बिहेव कर रहा है उस रूप में या फिर हां रूप यानी ईश्वर का फॉर्म ट्रांसफॉर्म नहीं हो रहा है जिस प्रकार से आप ले जाना चाहे बात को वो नहीं हो रहा ईश्वर निर्णायक रूप से बिल्कुल नहीं सहायता कर रहा है ईश्वर जो है ऐसा कह लीजिए कि है वो बुद्धि है फिर भी वहां पर अपनी बुद्धि पूर्वक वहां पर हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। इसका मतलब कि मैं डला हुआ हूं। आप मुझे जैसा उपयोग में लेना चाहते हो ले सकते हो। यही जड़ होता है। इसी को मैं जड़ कह रहा हूं। ऐसा ही कर रहा है ईश्वर। ईश्वर की स्वतंत्र बुद्धि लेने की निर्णायक लेने की क्षमता होते हुए भी फुली पूरी तरीके से वो डिपेंड होता है वहां जीव के ऊपर और जो है वो वहां बिहेव करता है कि उसका जैसा उपयोग वो करना चाहता है उसकी सीमा में जो आ सकता है वो कर लेता है जैसा भी उपयोग वो करना चाहता है अब मैं बोलूं इसका उत्तर हां बोलिए जी बोलिए इसका जवाब ये है कि जो संसार बना है ईश्वर का बना है ईश्वर की खुद की ईश्वर का खुद का गुण है कि उस गुण की वजह से ईश्वर ने संसार बनाया है और वो संसार ईश्वर ने खुद से ही जानबूझकर ऐसा बनाया है कि हमारी कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे।
00:05:04:00 ठीक है? अब कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे। ये क्या बोलना चाहिए? ये जो मर्जी है वो ईश्वर की है। ईश्वर ही चाहता है कि हमारे पास कर्म करने की स्वतंत्रता बनी रहे। ठीक है? ऐसा मैंने क्या कहा? देखिए है क्या? कंप्लीट कर सुन लीजिए ना टोकिए मत बीच में ये जरूरी है कंप्लीट करना अच्छा कर लीजिए इसमें क्या समझ है मुझे कंप्लीट करने दीजिए ना पूरा पॉइंट अपना कर लीजिए कर लीजिए तो ये जो हम ये जो संसार में क्या बोल रहा हूं कर्म करने की स्वतंत्रता जो है ईश्वर की हमारी सॉरी तो ये ईश्वर अपनी मर्जी से बनाता है और ईश्वर चाहता है क्या मतलब चाहता है शब्द गलत हो जाएगा ईश्वर खुद से ये चलो चाहता है ले लो अभी के लिए क्योंकि फिर अभी बेटर ईश्वर खुद ही चाहता है कि हम जो है कर्म स्वतंत्र स्वतंत्र रूप से करें। इसीलिए ईश्वर ने हमें यह अवसर प्रदान कर रखा है। और इस अवसर प्रदान करने में ही ये निहित है कि ईश्वर इंटरफेयर नहीं करेगा। जिस प्रकार से हम इंटरफेरेंस करवाना चाह रहे हैं कि भाई या फिर आप बोल रहे हैं कि भाई बीच में क्या अपना चेतन रूप से क्या कोई प्रभाव डाल दे। ठीक है? एक तो ये बात है। और एक दूसरी बात ये है कि आप जो बोल रहे जड़ रूप में प्रयोग में आता है वो शब्द गलत है। प्रोसेस मैंने आपको समझा दिया। अब शब्दों की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि मैंने पूरा एक्सप्लेन
00:06:19:08 कर दिया। लेकिन आप अगर वो शब्द डालेंगे जो कि मैं मेंशन करना चाहूंगा वो शब्द नहीं डाल सकते। जड़ रूप में प्रयोग जड़ रूप में प्रयोग मूल प्रकृति हो रही है। आप उसको किसी और सेंस में समझ रहे हैं तो उसको छोड़ दीजिए अभी। आपने जवाब क्या दिया है? कि ईश्वर ने कर्म फल करने की स्वतंत्रता दी है। इसलिए वो वहां पर कुछ हस्तक्षेप नहीं करता है। ठीक है? बोलता नहीं है। बीच में यही कहा ना आपने? हम पर मैं ये पूछ रहा हूं कि इसका मतलब यह है कर्म फल की स्वतंत्रता देने के कारण ईश्वर वहां पर जड़ की तरह से व्यवहार करता है ना उसका व्यवहार क्या हुआ वहां पर कैसा व्यवहार हुआ का अगर जड़ का व्यवहार हुआ जैसे कि मान लीजिए ईश्वर की शक्ति है मैं मैं शब्द दे देता हूं आपको आप थोड़ा थोड़ा इंटरफेर कर रहा हूं ये कंप्लीट हो जाएगा एक पॉइंट आप जड़ शब्द को हटा दीजिए आप आप सिंपली ये बोलना चाह रहे हैं कि ईश्वर पैसिवली पैसिवली समझ रहे एक्टिवली या पैसिवली तो ईश्वर वहां पर है कुछ कर नहीं रहा है बीच में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है निर्णायक रूप से और ईश्वर बस वहां पर है एक्सिस्ट कर रहा है इसको ये रख दीजिए जड़ जड़ रूप जड़ रूप बोलेंगे तो फिर वो गलत हो जाएगा जड़ रूप उसमें उसमें बात है एक बात
00:07:34:14 उठाई जाती है ईश्वर लीला कर सकता है कि नहीं एक बात उठाई जाती है मैं यहां पर ईश्वर की लीला सिद्ध कर रहा हूं समझे आप क्या सिद्ध कर ईश्वर की लीला सिद्ध कर रहा हूं ना मैं यहां पर ईश्वर के पास निर्णय लेने की स्वतंत्र सत्ता है ईश्वर चेतन है ईश्वर बुद्धिमान है सर्वशक्तिमान है फिर भी वो अपने से निकृष्ट जो तत्व है अल्पज है जीव के द्वारा उपयोग होता है न्यूट्रल रहता है चाहे भले ही वो उसका उपयोग किसी भी कार्य में कर रहा हो वो न्यूट्रल रहता है। तो यह जो ईश्वर का बिहेव है यह बिहेव उसका जो चेतन स्वरूप है, सर्वशक्तिमत्ता का स्वरूप है, उसके विपरीत लीला है। अब वो करता क्यों है? वो बात एक अलग है। उसने लीला क्यों की? वो शांत क्यों रहा? वो चुप क्यों रहा? उसने अपने आप को उपयोग में क्यों आने दिया? इसके पास आपके अकॉर्डिंगली उसके पास एक लॉजिकल कारण है। क्योंकि वो कर्म फल के लिए स्वतंत्रता देता है जीव को। स्वतंत्रता देने के लिए ही ईश्वर वहां पर ऐसा बिहेव करता है जैसे कि उसके पास कोई बुद्धि है ही
00:08:49:18 नहीं। पूरी बुद्धि जीभ लगा रहा है। उसकी शक्ति का उपयोग कर रहा है और मर्डर हो रहा है। चीजें हो रही है। ईश्वर वहां पर शांत रह रहा है। वो कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। जैसा जीव के द्वारा उसको उपयोग किया जाना है वैसा होने दे रहा है। कारण आपने दिया है वह बात एक अलग है कि ऐसा करने का उसके पास एक कारण है। वो बात एक अलग है। मगर वो कर तो रहा है ना वहां पर लीला वो चेतन होते हुए भी वहां पर जड़ जैसा उपयोग में आ रहा है। जैसे मैं इस बोतल है। मैं इसको उठा रहा हूं। अब यह जो बोतल है प्रकृति तत्व जो इसमें है प्रकृति उसका इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। उठाने अथवा ना उठाने में। इसी प्रकार से इस बोतल को उठाने के लिए जो शक्ति एनर्जी यूज़ हुई जो कि ईश्वर से मुझे प्राप्त हो रही है उसने भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया इसको उठाने ना उठाने हां वो तो है ही ना हस्तक्षेप तो मैंने प्लेनली क्लियर कर दिया हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं किया तो इसका मतलब ईश्वर यहां पर जड़ की तरह से बिहेव कर रहा है ना
00:09:53:13 जिस प्रकार आप चलो मैं इसको और अच्छे से रख देता हूं जिस प्रकार जड़ हस्तक्षेप नहीं कर रहा है वैसे ही उसी प्रकार ईश्वर पर भी हस्तक्षेप नहीं कर रहा। क्या आप ये बोलना चाह रहे हैं? हां हां ये बात सही है। लेकिन आप फिर उसको जड़ रूप एक शब्द दे देंगे ना वो मत दीजिए। मैं खाली उसके लिए छोड़ दीजिए। रुकिए ईश्वर का जो व्यवहार ईश्वर का जो व्यवहार यहां पर हुआ वो जड़ के जड़ जड़ पदार्थ के व्यवहार के समान हो गया ना। ईश्वर का जो व्यवहार हुआ जैसा जड़ जैसा जड़ पदार्थ व्यवहार कर रहा है वैसा ही व्यवहार ईश्वर कर रहा है ना यहां पर। ये तो बोल ही रहा हूं। ये तो बोले ही बोला है मैंने लेकिन आप मैंने छोड़ने वाली रुकिए रुकिए मैं क्लियर करूंगा क्लियर करूंगा छोड़ने वाली बात जो मैंने बोली वो जड़ रूप जो शब्द इस्तेमाल कर रहा था उसका फिर मतलब कुछ और निकल कर रहा था छोड़ने वाली बात इसलिए अगर आप हस्तक्ष वो आप समझ नहीं रहे इसीलिए इसीलिए मैंने बोला मैंने अब मैंने क्लियर कर दिया मेरा जड़ रूप क्या है कि यहां पर ईश्वर और जड़ के व्यवहार में समानता आ गई बिल्कुल ना वो हस्तक्षेप कर रहा है जड़ और ना ईश्वर तो है जड़ तो जड़ है वो तो इसलिए कर ही नहीं सकता मगर ईश्वर चेतन है फिर भी वो जड़ जैसा व्यवहार कर रहा है इसका मतलब यहां पे
00:11:08:19 वो लीला कर रहा है जो वो नहीं है उसके जैसा बिहेव कर रहा है आप ये बोलना चाह रहे हो कि ईश्वर का जो गुण कर्म स्वभाव है जो आप भी मानते हैं कुछ ना कुछ है उसके विपरीत जाके कुछ कार्य कर सकने की स्वतंत्रता ईश्वर के पास है या नहीं ये सवाल है ना आपका मुझसे नहीं ये सवाल है ही नहीं ईश्वर चेतन है। हां चेतन है। वो एक जीव के अकॉर्डिंगली कार्यरत हो रहा है ना। नहीं हो रहा। बोल रहा हूं। ईश्वर हां मैं बता देता हूं। ईश्वर के अकॉर्डिंग ही कर्म कर्म फल करने की स्वतंत्रता प्रदान ईश्वर ने की है और उसके अकॉर्डिंग ईश्वर का में आ रहा है। आप [हंसी] उसको गलत तरीके से ले रहे हैं। आप अगर ईश्वर के अकॉर्डिंग जीव के निर्णय कर दोगे तो फिर तो सीधेसीधे मर्डर का निर्णय फिर वही बात है। फिर जो बात मैंने बोली नहीं आप वो बोल रहे निर्णय की बात मैंने बोली नहीं। तो मैं बोल रहा हूं। मैं आप देखिए क्या करें? कान को इधर से पकड़ ले। कान को इधर से पकड़ ले। वो जीव के अनुसार चल रहा है ईश्वर या जीव उसके अनुसार चल रहा है ये बता दीजिए। कर्म करने वाली बात जो है कर्म करने वाली जो बात चल रही है उसमें जीव के अनुसार ईश्वर काम कर रहा
00:12:23:20 है या ईश्वर के अनुसार जीव काम कर रहा है बताइए जीव के अनुसार काम करना ही ईश्वर के अनुसार है। अब ये दिक्कत हो जाएगी समझने में। यानी वही मैं समझ गया। आप जो भी आप आपने क्या किया है? जो जो चीजें आप स्वीकार करते हो उनको आपने कह दिया यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है यह बात आ गई यह उसका कार्य इसलिए वो कर रहा है कुल मिलाकर के सारी कहानियों के पीछे यही है कि आप पहले ये कर देते हैं कि ये उसका कार्य है इसलिए उसने किया और जो जो चीजें हमारी है क्योंकि वो उसका कार्य नहीं है इसलिए वो नहीं कर सकता अब ये जो अब ये जो उसका कार्य है अब ये जो उसका कार्य है वो उसने किया यह फैसला कहां से होगा यह प्रमाण से होगा तर्क है नहीं इसमें कोई क्या-क्या क्या उसका कार्य है? क्या उसका कार्य नहीं है? फैसला प्रमाण से होगा। उसमें तर्क है नहीं। प्रमाण क्या है? वेद है। वेद का वो वो आंसर है जो हम करेंगे। यही यही बात आ गई। अब मैं बात कर रहा हूं। यानी कि जो ईश्वर नहीं है उसके अनुसार बिहेव करना भी ईश्वर ने तय किया है कि मुझे ऐसा करना पड़ेगा।
00:13:29:22 वही तो बोल रहा हूं। ईश्वर नहीं किया। जो ईश्वर है उसके अनुसार ही बिहेव कर रहा है। जो ईश्वर नहीं है उसके अनुसार बिहेव नहीं कर रहा। यानी कि ईश्वर के ईश्वर के ईश्वर के उसमें स्वरूप में लीला करना भी आ गया ना। लीला करना क्या है? नहीं आया। लीला सुनिए आप आपने अभी बोला लीला करना यानी स्वरूप में के विरुद्ध जाना। अब मैं जब स्वरूप के विरुद्ध जाना मान ही नहीं रहा हूं तो लीला कहां से आई बीच में? लीला आएगी नहीं ना। तो पर वो अपने से अपने से निकृष्ट चेतन सत्ता वाले के अनुसार बिहेव कर रहा है ना
00:14:08:16 क्या बिहेव कर रहा छोड़िए आपको मैं समझा दिया वो कितनी बार रिपीट कर भाई वो बिहेव कर तो रहा है जड़ के समान वहां पर जीव के द्वारा उपयोग में आ रहा है हां आ रहा है पॉइंट में बता रहा हूं पॉइंट मैं बता रहा हूं कि जड़ जड़ ना होते हुए भी चेतन होते हुए भी जड़ के जैसा व्यवहार करना ये ईश्वर के स्वरूप में है शामिल है इस आप उसे कॉन्टक्स्ट कॉन्टक्स्ट [हंसी] तैयार करना जरूरी है कॉन्टेक्स्ट अगर आप फिर वही बात है ना आप अगर जड़ जड़ का स्वरूप है जड़ के स्वरूप में अलग-अलग क्वालिटीज भी आती है जड़ की वो क्वालिटीज वाली बात नहीं आएगी यहां पे केवल और केवल हस्तक्षेप ना करना जैसे जड़ हस्तक्ष तो कर ही नहीं सकता कौन सी कौन सी क्वालिटी क्वालिटी नहीं आएगी बताइए जरा देख क्वालिटी वो मेरा पूरा गजब हो जाना चाहिए फिर बाद में क्वालिटी कौन सी आएगी नहीं आएगी उस पे आ जाएंगे और अभी तक आप सवाल पूछने केवल मुझे अभी तक सवाल पूछने का मौका दिया नहीं अभी समझ रहे हैं आप उस मेरा क्वेश्चन अभी तक एक भी नहीं आया अब मेरा भी तो अवसर आना चाहिए कि मैं पूछूं कुछ सवाल आप सर्वशक्तिमान पे मैं सर्वशक्तिमत्ता का हमारी जो बात है वो तो हो गई जो हमारी बात है वो तो रह गई आप आपने
00:15:23:22 अपना पॉइंट पूरा कर दिया ना कंप्लीट मैंने भी अपनी ओर से बता दिया आप आप अपना अंत में भारी रख के जाना चाह रहे हैं यहां से फिर नहीं नहीं नहीं आप मुझसे सवाल में पूछिए इस विषय इस विषय में जितनी बात हुई आपके हिसाब से जो भी आपको लगा आप कर दीजिए फिर मैं सवाल पूछूंगा तो अलग तरीके से हो मतलब अलग विषय हो जाएगा एक बात ये है कि ईश्वर होना उसी का सिद्ध हो सकता है जो लीला कर सकता हो कहने का मतलब यह था मेरा ईश्वर होना जो व्यक्ति कहता है ना ईश्वर मिथ्याचारी कैसे हो सकता है? ईश्वर तो ऐसा नहीं कर सकता। फिर वहां पर वो झूठ वाली वो अगर दूसरा आचरण कर रहा है तो वो तो झूठा आचरण हो जाएगा। जबकि यहां पर जड़ के साथ जीव के द्वारा उपयोग होने वाले विषय में वो ऐसा आचरण कर रहा है जो जड़ का आचरण होता है। न्यूट्रल रहना। मुझे जैसा चाहो वैसा उपयोग में ले लो। ऐसा ही आचरण वो कर रहा है। जबकि उसके पास अपनी स्वतंत्र तो ईश्वर हो ही वो सकता है जो ऐसा आचरण कर सके। आप जो यह कहते हैं कि वह उसका स्वरूप है इसलिए वो नहीं कर रहा है तो वही मैं कह रहा हूं ईश्वर हो ही वो सकता है जो लीला कर सके क्योंकि ईश्वर में अगर सर्वशक्तिमत्ता है तो कर्म फल के निमित्त आपके ही अनुसार ले रहा हूं फिलहाल कर्म फल के निमित्त जीवों को स्वतंत्र
00:16:39:03 देने का भी उसका कार्य है तो ये दोनों कार्य जहां साथ में एकिस्ट कर सके समझ रहे हैं ये दोनों कार्य जहां साथ में एक्सिस्ट करें वो ईश्वर है अब आ जाती है कुल मिलाकर के एक बात अटक रही है क्योंकि हमारे और आपके बीच में एक ही डिफरेंस है कि ईश्वर अवतार ले सकता है कि नहीं और अवतार ले सकने में बाधा है क्योंकि वो सर्व्यापक है वो सर्वशक्तिमान है तो वो अपने स्वरूप के विरुद्ध नहीं हो सकता इसलिए वो है तो क्या इस पर आप बात करना चाहते हैं या कुछ और है जी ठीक है अब वही लीला शब्द का अर्थ कैसे मतलब हमारी धारणा में फिर मैं एक्सप्लेनेशन दूं या क्योंकि फिर वही बात कम कंटिन्यू हो जाएगी मैंने पहले बता दिया कि लीला का अर्थ और व्यवहार परमार्थ आप जिस तरीके से लेते हैं अलग-अलग वैसा हमारे में नहीं हमारे में एक ही है। व्यवहार कोई अलग जगह नहीं आप अगर आपके में नहीं है मैंने सिद्ध किया अगर आपको चाहते हैं तो उसको काटिए आप तो फिर व्यवहार परमार तो वो तो वो विषय चला जाएगा ना फिर इसीलिए मैं बोल रहा था कि आप वही तो आपके कंक्लूजन के बाद मुझे अपना कंक्लूजन देना पड़ेगा ना। आप ये कह के खत्म मत करिए कि भैया आपके यहां व्यवहार परमार्थ हमारे यहां नहीं है। ये कौन सी बात है? हम लोग सत्य का अनुसंधान कर रहे हैं। किसके यहां क्या माना जाता है? उसका अनुसंधान नहीं कर रहे हैं। सत्य का कर रहे हैं। हमने ये नहीं कहा हमारे यहां चलिए व्यवहार और परमार्थ में भेद
00:17:54:09 है ना आपके यहां। बिल्कुल है। आपके यहां भी है। चलिए ठीक है। अब खत्म करते हैं इसको। इतने पे ही रख देते हैं। वरना फिर मैं बताऊंगा कि कैसे नहीं है, कैसा है। फिर वो अलग विषय चला है। हां। ठीक है। तो अब इस पे इस पे आते हैं अपना सर्वशक्तिमान पे। जैसे सर्वशक्तिमान का अर्थ आपके द्वारा जो बताया जा रहा है वो है कि कुछ भी कर सकता है। यही अर्थ है। तो इसमें जो जैसे बेसिकली आपने ये सवाल जो इसके बाद जो सवाल आएगा वो सुना भी होगा पहले कि भाई क्या ईश्वर ऐसी चीजें कर सकता है विरोधाभास? क्या ऐसा पत्थर बना सकता है जो खुद ही ना उठा पाए? तो एक तो ये बात है। ठीक है। अब पहले चलो इसका उत्तर दे दीजिए आप। फिर आगे कंटिन्यू करते हैं। ठीक है। इसका आज नए तरीके से उत्तर देता हूं। मैंने बहुत बार दे चुका हूं। आज नए तरीके से देता हूं। आप मुझे मैंने कहा ईश्वर सर्वशक्तिमान है। यानी सारी क्रियाएं वो कर सकता है। तो आप मुझे ये बताइए क्रिया क्या करनी है? उस क्रिया से आपको क्या मानना है? ये एक अलग विषय है। जैसे कि मैं मुझसे कहा जाए कि इस मोबाइल को यहां से यहां सरकाओ। ये हो गई क्रिया। हम अब इस मोबाइल को सरकाने
00:19:09:15 से आप यह मान लो कि मैं फलाना काम नहीं कर सकता या फिर जैसे मैंने इसमें हाथ लगाया ठीक हाथ लगाने के बाद मैंने ऐसे किया ठीक है तो ये हो गई करने की क्रिया हाथ लगाया और किया ये क्रिया हो गई तो ये क्रिया ईश्वर कर सकता है अब आप इससे मान लो कि ईश्वर पत्थर नहीं उठा सका वो आपके ऊपर है अगर केवल मान्यता बदलनी है तो बिना किसी क्रिया कि ईश्वर मान्यता बदल सकता है आपकी। हां। तो आप भ्रम पे लाना चाह रहे हैं ना कि ईश्वर झूठ बोल रहा है वहां पे। आप ये बोल रहे ना ईश्वर झूठ बोल रहा है वहां पे। तो जहां पे ईश्वर बिना उसके वो उपयोग में आ रहा है वहां पर क्या हो रहा है? मैं जब चाह बोतल उठा ली। यहां पे क्या कर रहा है ईश्वर? जड़ के तह कर रहा है कि नहीं? विपरीत आचरण कर रहा है कि नहीं? इसका इसका इसका मैं सवाल पूछ रहा हूं। उससे क्या संबंध है? संबंध यह है कि ईश्वर जो ईश्वर लीला कर सके जो ईश्वर ऐसी चीजें कर सके वही ईश्वर है। जो नहीं कर सके वो ईश्वर नहीं है। उसकी सत्ता में ही कुरान का ज्ञान दिया जा रहा है। वेद विरुद्ध है। दिया जा रहा है। वो वहां पर चुप है। तो उसी तरीके से वो यहां पर वो यहां पर आपको कह सकता है। मैं नहीं उठा पा रहा। ले मान लो नहीं उठा पा रहा। यानी यानी झूठ बोल रहा है ना ईश्वर। तो
00:20:24:21 वहां पे भी झूठा आचरण कर रहा है ना ईश्वर। झूठा वहां पे मत जाइए। आप यहां वो वहां पे झूठा आचरण नहीं कर बता दिया नहीं मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि अगर मैं अभुगम सिद्धांत से या जैसे दुर्जन दोष न्याय बोलते हैं उससे मान भी लूं एक बार के लिए कि भाई मेरी बात गलत है वहां पे हमारी गलत बात गलत सिद्ध हो रही है तो इससे आपका सही होना कहीं से भी सिद्ध नहीं हो जाएगा मैं बता रहा हूं ना सिद्ध कैसे हो रहा है चलिए बोलिए क्योंकि हमने हमने ईश्वर को माना ही वो उसको है जब वो अपनी चीजों के विपरीत आचरण भी करता हमें दिख सके उसकी की विपरीत आचरण करने की प्रतीति हो आपने आपने माना मैंने नहीं माना आपने फिर आप पीछे चलो बता दो बिना उसको माने कैसे हो जाएगा सिद्ध या तो वो क्या माने [हंसी] बिना आप सवाल क्या बिना क्या माने ईश्वर जब स्वतंत्र सत्ताधारी है चेतन है तो दूसरे जो चेतन उससे निकृष्ट जीव है उसके अंतर्गत जाकर के उसके द्वारा नियंत्रित हो रहा है लो ये दोनों विपरीतार्थक वो है उसमें हो रहे हैं घटित ईश्वर में नहीं हो रहा विपरीत तक है नहीं। मैंने पहले ही बता दिया कि भाई ईश्वर जो है ईश्वर अपनी स्वयं की स्वतंत्रता के वजह स्वतंत्रता का आप अरे भैया वहां पर ईश्वर का ईश्वर का जीव की प्रेरणा
00:21:39:22 से काम करना हो तो रहा है सिद्ध हां हो रहा है लेकिन वो स्वभाव के विरुद्ध है ही नहीं। मैंने एक्सप्लेन कर दिया था पहले भी। वो वो वो जो वहां पर लीला है उसको आपने स्वभाव माना है ना। फिर लीला वो जो विपरीत आचरण है उसको स्वभाव मान लिया है तो विपरीत आचरण तो कर रहा है ना और वही उसका स्वभाव नहीं है विपरीत मैं वही आप देखिए वही है ना आप बोल रहे हैं विपरीत आचरण मैं बोल रहा हूं नहीं जबरदस्ती आप क्यों अपनी बात मनवाना चाह रहे हैं मैं बोल ही नहीं रहा हूं विपरीत आचरण है वही उसका आचरण है मैं तो पहले से ही मान के चल रहा हूं तो बस यही उसका आचरण है यही जो आचरण है हां हां हां बताइए अब अब एक्सप्लेन करिए क्या आचरण है यहां पे ये बताइए तो ठीक ठीक है आप वहां बताइए झूठ आचरण है वहां पे वही उसका आचरण है झूठा आचरण करना नहीं ऐसे फसाएंगे ना तो मैं भी फसाऊंगा अरे फसाएंगे फसाएंगे वाली क्या बात है मैंने अपना पूरा अरे भैया एक एक ऐसा वर्ड नहीं एक्सप्लेन किया जैसे यहां पर वो जो नहीं है वो बोल रहा है तो आप कह रहे झूठ बोल रहा है इसी प्रकार से वो जो नहीं है वहां वो उस तरह से बिहेव कर रहा है तो वो मिथ्या लेकिन मैंने तो एक्सप्लेन कर दिया ना वो वही है आप जबरदस्ती मान रहे हैं उसके वो नहीं है मैं तो बोल ही रहा हूं कि वो वही है तो मैंने मैंने उसको माना ना मैंने आप अब मैं उसको मान रहा हूं ना कि भैया ईश्वर वही हो सकता है जिसमें अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य करते
00:22:54:26 हुए दिखना प्रतीति करवाना भी शामिल हो। वही हो सकता है ईश्वर। लेकिन मैंने स्वरूप नहीं नहीं मैंने एक्सप्लेन कर दिया कि वो स्वरूप के विरुद्ध है ही नहीं। आपने आपने हां सुनिए सुनिए। अब आप सुन अब रुकिए आप रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए रुकिए। आपने बोला था आपने आपने अपने मुंह से ही बोला था कि आपने एक एक मिनट एक मिनट मैं क्लिटी में पहुंच गया हूं हमारी आपकी मिसअंडरस्टैंडिंग में आपने उसका जो मिथ्या आचरण है उसको ही उसका स्वरूप मान लिया है नहीं नहीं फिर गलत शब्द मिथ्या आचरण है ही नहीं वो नहीं गलत शब्द ये आप जबरदस्ती मान के चल रहे ये गलत बात है मैंने ये कहीं पर भी ना बोला ना तो मैंने लीला बोला ना तो मैंने मिथ्या आचरण बोला फिर से अगर बोला तो बता दो ना भाई वहां पे वो जीव के अनुसार बिहेव क्यों कर रहा है बता दो क्योंकि वही उसका स्वरूप है तो बस इसका मतलब जीव के अनुसार आश्रित जैसा बिहेव करना भी उसका स्वरूप है ना आश्रित फिर चलो मान लो अभी ठीक है दूसरे चेतन के अनुसार कार्य करना भी उसका स्वरूप है ना हां कार्य करना ठीक है दूसरे चेतन से निर्देश लेकर के कार्य करना भी उसका स्वरूप है ना ठीक है हां तो
00:24:09:27 यही तो मिथ्या आचरण उसका स्वरूप हो गया। क्या मिथ्या आचरण है? स्वतंत्र मैंने एक्सप्लेन किया था ना सुन लीजिए। एक आपने पहली बात तो लीला वाली बात एक्सप्लेन किया था मैंने कि स्वतंत्रता कर्मों की स्वतंत्रता देने के लिए ईश्वर को ये जो आचरण है जिसको आप मिथ्या आचरण आचरण बुलवाना चाह रहे स्वरूप के विरुद्ध स्वरूप के विरुद्ध नहीं क्योंकि ईश्वर ने अपने स्वरूप के अनुसार ही जीवो को कर्म करने की स्वतंत्रता दी है और उसके अंतर्गत ही जितने भी कार्य करवा रहे उसमें अंतर्गत वो खुद उपयोग में आ रहा है जड़ के जैसा व्यवहार कर रहा है जड़ के जैसा व्यवहार बाहर अपना इंटरफेरेंस ना करके कर रहा है। हां ठीक है। यही उसका स्वरूप है। इसमें दिक्कत क्या है? दिक्कत क्या है? इसका मतलब इसका मतलब जो वो नहीं है उसके जैसा व्यवहार करना ही उसका स्वरूप है। वो वही है। मैंने ये कहां बोला कि वो वो नहीं है। मैंने आप मुझे लाइन बताओ मैंने कब बोला? कुल मिलाकर मैं बताऊं। वो हो क्या रहा है? मैं बताऊं। ईश्वर को केवल यहां पर सीमित नहीं किया जा सकता। वो केवल सत्य ही बोलता है या वह सत्य आचरण ही करता है। वह अपने स्वरूप के बाहर जाकर के भी कार्य करता दिख सकता है। क्योंकि उसके स्वरूप के बाहर जाकर के कार्य करना दिखना ही उसका परम स्वरूप है। वास्तविक स्वरूप है। ये मानना पड़ेगा। अगर ये नहीं मानेंगे ये नहीं
00:25:24:28 मानूंगा। ये नहीं मानूंगा। एक मिनट। अगर ये नहीं मानेंगे तो जड़ के जैसा आचरण आप सिद्ध करिए। वो कैसे कर रहा है? वो तो सत्यवादी है केवल। अगर केवल में सीमित करेंगे ना उसे कि वह केवल वही करेगा रास्ता है। आप मुझे समस्या आप मुझे समस्या बता दीजिए ना कि जड़ के जैसा हस्तक्षेप ना करने वाला व्यवहार जड़ जड़ बोल रहे हो गलत है। हस्तक्षेप ना करके वो अपने स्वरूप के विरुद्ध कैसे जा रहा है। आप ये मुझे एक्सप्लेन कर दीजिए। हां आप ये बताना चाह रहे हैं कि क्योंकि वो हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। यानी वो चेतन जैसा व्यवहार नहीं कर रहा है वहां पे। आप ये बताना चाह रहे हैं और चेतन जैसा व्यवहार नहीं कर रहा यानी अपना स्वरूप जो चेतन वाला है उसके विरुद्ध जा चेतन जैसा व्यवहार कर रहा है वो पैसिव रहना भी चेतन का ही गुण है ठीक है ठीक है इसका मतलब कि जहां पर पाप आचरण हो रहा है वहां पर जैसे मनुष्य को दोष लगता है मनुष्य को दोष लगता है ना हस्तक्षेप ना करने में दोष लगता [गला साफ़ करने की आवाज़] है कि नहीं हम हम
00:26:22:02 इस तरीके का कार्य भी ईश्वर कर सकता है जी जी बोलिए आप हां मैंने हां बोल दिया जी बोल दिया मैंने इस तरीके का कार्य भी ईश्वर कर सकता है तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अब इसमें ये वाली बात आती है कि आपने कहा कि हस्तक्षेप ना करना भी चेतन का ही व्यवहार है। शांत रहना भी चेतन का ही व्यवहार है। इसलिए जो है अह हम यह मानते हैं कि ईश्वर जो है अपने स्वरूप के निमित्त ही कार्य कर रहा है। ठीक है? अब पहली बात तो ये आ गया कि शांत रहना शांत रहना हस्तक्षेप ना करना मनुष्यों में पाप माना जाता है कई जगह पर। भीष्म जी को भीष्म जी को दोष लगा ना द्रोपदी का चिरण देखने पर पाप माना जाता है। हस्तक्षेप ना करना। जो हां उसको एक्सप्लेन कर सकता हूं। ठीक है। ठीक है। वो करेंगे। अब दूसरी बात यह आती है कि जब हम इसको इधर से उधर कर रहे होते हैं व्यवहार में तो हम अपने मन में क्या सोच रहे होते हैं? ईश्वर करवा रहा है या मैं कर रहा हूं। बंधन की ओर से देख रहा हूं। मुक्ति की ओर से नहीं देख रहा। बंधन संसार में बंधन में जो है क्या आता है? क्या आता है?
00:27:37:18 भौतिकवादी विचार क्या आएगा? क्या कि मैं कर रहा हूं। मतलब अरे भैया कर रहा हूं। मैं कर रहा हूं। मैं कर रहा हूं। अगर यहां पे ईश्वर की उपस्थिति मानू तो ईश्वर कैसा उपयोग में आ रहा है? मेरी जानकारी में ईश्वर तो वही कर रहा है जो वो करता है। मेरी जानकारी में क्या आ रहा है? यही आ रहा है कि ईश्वर की वजह से मूल प्रकृति है। उसकी वजह से सॉरी मूल प्रकृति से बनी हुई सारी चीजें हैं। मैं भी हूं मेरा शरीर मतलब मेरा शरीर मैं नहीं मैं मेरा शरीर भी बना हुआ है और उसकी वजह से मैं व्यवहार कर रहा हूं। ये जानकारी है। नहीं जानकारी यह है कि मैं ही कर रहा हूं। जानकारी यही है। हां तो मैं कर रहा हूं ना। देखिए मैं अभी [गला साफ़ करने की आवाज़] कर रहा हूं। इसका मतलब यह नहीं है। एक्सप्लेन कर दूंगा। मैं मैं बता रहा हूं। व्यवहार में हमारे यही है। व्यवहार में हमारे यही है। व्यवहारिक सत्य हमारा यही है कि हम ये सोचते हैं कि इसको हमने उठाया ना कि ईश्वर ने उठवाया। ठीक है? और इसीलिए हम बंधन में है। इसीलिए बंधन में है ना? नहीं तो ये नहीं नहीं नहीं हां। ये तो अज्ञान और ज्ञान की जैसे मुझे अगर जानकारी नहीं है कि ईश्वर है मूल प्रकृति है ईश्वर ने संसार को बनाया है तब मैं ये सोच रहा हूं कि ईश्वर
00:28:52:19 मैंने उठाया जो बंधन में है वही पूरा पूरा एक्सप्लेन कर दूं मैं लेकिन अभी तो मुझे पता है ना कि ईश्वर के निमित्त के बिना मैं कर ही नहीं सकता हूं ये काम इसमें दिक्कत क्या है मुझे पता है ये चीज ठीक है पता तो फिर आपके जीवन में आपके मुख से दिन भर में एक भी बार ऐसे नहीं निकलता है कि मैंने ये किया मैंने वो वो किया आप हर बार ऐसे ही बोलते हो कि मैंने ही नहीं नहीं नहीं मैंने किया ये गलत नहीं है। मैं एक्सप्लेन कर देता हूं। मैंने किया ये बात गलत। मैं इसको वो नहीं बोल रहा कि मैंने किया ये बात गलत है। आप अगर वह उस पॉइंट पे लाना चाह रहे समय एक तरीके से जिसने ईश्वर को मान लिया आर्य समाज के अनुसार जान लिया वो हर काम करते समय अपने मन में यही सोच रहा होता है कि ये सब ईश्वर ने करवाया है और वो अपने मुंह से अपनी धारणा ही नहीं होती मैंने कुछ किया मैंने कुछ पास आउट किया मैंने ये बोला मैंने बोला धारणा नहीं होती है मैंने किया का तो गलत मैं बोल नहीं रहा हूं मैंने किया मतलब मैंने ही किया यानी मैंने ही चेष्टा करी है मैंने चेष्टा करी है। चेष्टा के बाद आपके मन में आपके मन में सिर्फ चेष्टा की भावना होती है। यह भावना नहीं होती है कि इसमें शक्ति मेरी लगी कि नहीं लगी? इससे क्या फर्क पड़ता है मेरे मन में होती है या नहीं होती? जो सच है वो सच ही है।
00:30:07:27 मैं वो बताऊंगा मैं आपसे पूछ रहा हूं। जो सच है वो तात्विक सत्य है। मैं आपसे आपका व्यवहारिक सत्य पूछ रहा हूं ना। भौतिक सत्य क्या है? आपको ये फील आता है ना मेरी ताकत लगी कि नहीं लगी कि नहीं आता है? मेरी मैं अगर मैं अपने आप को शरीर देख के चल रहा हूं। शरीर यानी मनुष्य देख के चल रहा हूं। मेरे भाई मैंने अभी आपको एक सामान्य पुरुष जो बंधन में उसी हिसाब से हम लोग बात कर रहे हैं। तो क्यों बात को ला रहे हैं कि मैं शरीर देख के चल रहा हूं। आप जो सोचते हैं किसी कार्य को करने में वो क्या सोचते हैं? वो बताइए।
00:30:47:10 क्या सोचते हैं? हेलो यही सोचता हूं कि मैंने किया। हां मैंने अपनी शक्ति से किया कि नहीं? नहीं मैंने अपनी शक्ति से नहीं किया। ये तो ये तो तात्विक जानकारी है। आप हर कार्य को करते समय यही सोचते हैं कि मैंने नहीं किया अपनी शक्ति से। यही सोचते हैं। नहीं उस कार्य को करते समय नहीं सोचते हैं। पर ये बात पता तो है ना कि मैंने पता है। वही मैं यही होता है व्यवहार और परमार्थ। पता होते हुए भी हमारे व्यवहार के अनुसार हमारे दिमाग में दूसरी जानकारियां चल रही होती है। अभी मैं आ रहा हूं। व्यवहार परमार्थ पे आपको अटकाऊंगा नहीं। अब मैं आ रहा हूं। यानी कि ईश्वर ऐसा कुछ कर सकता है जिससे हमें प्रतीति ईश्वर के विपरीत हो जाए।
00:31:35:08 हस्तक्षेप ना करके आप सतही स्तर पर जितनी बार सोच रहे हो इस बोतल को मैंने उठाया और आपने इसी इसी के अंदर बोला है। चार पांच बार मैंने ये बोला मैंने ये बोला मैंने बोला। उसमें यही आ रहा है निकल के कि वहां आप मान रहे हो मैंने ही किया जबकि उसमें आपने केवल चेष्टा की है और कर रहा है ईश्वर वास्तविकता यह है पर आप मान के चल आप मैं एक्सप्लेन कर देता हूं करने का मतलब ये है कि जो कर्म की चेष्टा जो है वो मैंने की है उसके आगे की जो प्रोसेस प्रोसेससेस है उसमें तो ईश्वर की सहायता ही है केवल चेष्टा मैंने की है और जब भी हम मैं मैं का उपयोग सुनिए सुनिए सुनिए मैं का सुनिए मैंने जब काम आप दिन भर आप दिन भर में जब काम करते हैं आप दिन भर में जब काम करते हैं तो आप यही पूरी लाइन उसमें ध्यान रखते हैं कि मैंने केवल चेष्टा की है और ये सारी शक्ति ईश्वर की है। मेरी शक्ति नहीं है। ऐसा सोच सोच के कार्य कर रहे होते हैं। सोच सोच के नहीं करते। पर ये ध्यान तो होता ही है ना। तो क्या सोच रहे होते हैं उस समय? आप जब आप जब पास हो जाते हैं या कोई दौड़ जीत जाते हैं तो आप वहां पर ऐसा फील करते हैं कि नहीं मैंने देखो उसको पटक दिया मैंने उसको यह बोला मैंने वो किया मैं जो दौड़
00:32:50:12 में जीत गया अपनी शक्ति पर आपको गर्व होता है आप चलिए आप मुझे आपने ये बोला ना कि मिथ्या मतलब मिथ्या ज्ञान आपको प्रकट हो रहा उसमें मिथ्या मिथ्या मिथ्या मिथ्या ये है कि आपके पास तो शक्ति है ही नहीं फिर भी आप अपनी शक्ति पर गर्व करते हो लो नहीं मैं चेष्टा पे गर्व करता हूं मैं चेष्टा पे गर्व करता हूं कि मैंने जो चेष्टा की यहां यहां आप यहां जनता देख रही है यहां आपकी बात वो तय करेगी जनता आप चेष्टा पे गर्व करते हो पूरा आर्य समाज चेष्टा पे गर्व करता मैं अपने शक्ति को
00:33:29:18 आप ये बोलना चाह रहे हैं कि अगर कोई अज्ञानी है और अज्ञानी होने की वजह से जो है अपने नहीं अज्ञानी बंधन में जब तक है तब तक हम अज्ञानी ही है क्योंकि हमारी व्यवहारिक जो क्योंकि हमारे हमारे अंदर जो व्यवहारिक इन आ रही है मैं बता रहा हूं आपको क्योंकि हमारे अंदर जो इंफॉर्मेशन आ रही है बंधन में जब तक है तब तक हम इंद्रियों से इंफॉर्मेशन हासिल कर रहे हैं और इंद्रियों से आने एक मिनट भाई साहब एक मिनट पूरा कर लीजिए इंद्रियों से इंद्रियों के ऊपर हम इंडिपेंड है ठीक है हमें अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण गुरु इत्यादि जब तक नहीं है हम एक जीव मनुष्य होते हुए प्राणी मात्र होते हुए हम इंद्रियों से जानकारी हासिल करने वाले वाले हैं और उन जानकारियों के अनुसार बिल्कुल ऐसी प्रतीति होती है कि हां भाई मैंने ही किया। यह सारी जो जानकारी है कि ईश्वर ने किया, ईश्वर ने करवाया। यह हमारी इंद्रियों से आने वाली सीधे तौर पर जानकारी नहीं होती है। अनुमान प्रमाण इनडायरेक्ट वे में या फिर शब्द प्रमाण इन चीजों से आने वाली जानकारी होती है। तब हम ये लोग ये मानते हैं। तो वो जो सत्यता है उसको ना जानने के संबंध में जितनी बार हम अपनी इंद्रियों पर डिपेंड होंगे चीजों को जानने के लिए उतनी बार हम लोग अज्ञानी ही कहलाएंगे।
00:34:44:24 उस दृष्टि से भले ही हम यहां पर बहुत बड़े संस्कृतज्ञ हो। तो ठीक है वो ज्ञानी अज्ञानी पर फिर मैं एक्सप्लेन करने लग जाऊंगा। मुझे बताइए इस बात का उससे क्या संबंध कि ईश्वर पत्थर उठा सकता है नहीं उठा सकता। क्या संबंध है? इस बात का इससे संबंध है कि आपने बोला कि ईश्वर झूठ बोल देगा। तो आप वहां पर आपत्ति जता रहे हैं कि ईश्वर झूठ नहीं बोल सकता। तो ईश्वर ऐसी प्रतीति करवा सकता है। अपनी विपरीत प्रतीति वह करवा सकता है। जैसे वह यहां पर करवा रहा है मनुष्य को कि कर हो रहा है। जबकि मनुष्य को प्रतीति हो रही है कि वो कर रहा है। ईश्वर नहीं कर रहा है। ईश्वर उसके कंट्रोल में है। ये मानेंगे तो
00:35:41:06 [संगीत]
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ईश्वर की लीला सिद्धि | आर्य समाज के साथ सबसे जबरदस्त चर्चा
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