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00:00:11:01 आज की यह चर्चा किसी निर्णय तक पहुंचने की चर्चा नहीं है। अभी एक विचार को धारण करने की चर्चा है। अत हमने इसे सौहार्द पूर्ण चर्चा कहा है। कोई शास्त्रार्थ नहीं, कोई विवाद नहीं। यह एक चर्चा है जिससे हम दोनों ही मतों को समझ सके। अत हम अपने दोनों वक्ताओं से निवेदन करेंगे कि जो भी चर्चा के नियम है कि जब एक व्यक्ति बोल रहे हो तो उनको बोलने देना और उनके बीच में ना बोलना तथा उनकी बात पूर्ण सुनकर के जो है उनका उत्तर देना तथा यहां पर वैदिक वांगमय के सभी प्रमाण स्वीकार्य हैं और यदि आपके संप्रदाय विशेष के कोई प्रमाण है तो वो केवल आप अपने बात को रखने के लिए अथवा खंडन के लिए उसका प्रयोग कर सकते हैं। तथा यहां पर आप यदि अपने संप्रदाय के आचार्य का किसी प्रकार से विरोध करते हैं तो तक्षण यह समाज जो है वह समाप्ति की ओर पहुंच जाता है। और इसके अतिरिक्त मैं आप दोनों से निवेदन करूंगा कि प्रारंभ में आप अपना एक परिचय दें
00:01:26:09 कि आप किस संप्रदाय से हैं। आप किस परंपरा से है अपनी योग्यता का परिचय दें तथा आपके द्वारा मान्य प्रमाणों का भी एक संक्षिप्त परिचय दे दे और अपने संप्रदाय के उचित मंगलाचरण को आप दोनों कृपया प्रारंभ करें पक्ष और विपक्ष इस क्रम से यह संवाद चलेगा प्रथमत पक्ष बोले पश्चात में विपक्ष [प्रशंसा] सभी को जय श्री राम। मेरा नाम शिवश नारायण द्विवेदी है। मेरा केवल इतना ही परिचय हो सकता है कि मैं श्रीमद् जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर जी महाराज का एक अल्पज्ञ शिष्य हूं और एक साधारण सा राम का भक्त हूं।
00:02:21:22 हमारी परंपरा के लिए जो श्लोक प्रसिद्ध है उसको मैं अपने गुरुओं के और आचार्य परंपरा के चरणों में निवेदित करता हूं। नारायण समारंभाम शंकराचार्य मध्यमाम अस्मदाचार्य पर्यताम वंदे गुरु परंपरा अनादि काल से लेकर के और अभी तक जो हमें वैदिक धर्म प्राप्त है उसको कल्प के प्रारंभ में भगवान नारायण सर्वप्रथम ब्रह्मा जी को विद्या के रूप में प्रदान करते हैं। जिसे हम वैदिक मार्गमय कहते हैं। और फिर वो ब्रह्मा जी से वशिष्ठ जी वशिष्ठ जी से शक्ति फिर शक्ति जी से पाराशर पाराशर जी के पुत्र व्यास जी व्यास जी के से फिर सुखदेव जी सुखदेव जी से श्री गॉड पादाचार्य उनके शिष्य गोविंद पाद जी और फिर उसी क्रम में आगे भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी के पास जो ज्ञान विज्ञान आता है हमारे वैदिक वांगमय का उसी
00:03:37:01 परंपरा से अभी तक हमारे जो शंकराचार्य परंपरा है उसके आलोक में जो ज्ञान विज्ञान मुझे प्राप्त है अ भगवान के अवतार के समर्थन में उसी को मैं आज यहां पुष्ट करने का प्रस्तुत करने का प्रयास करने वाला हूं। तो बस इतना ही मेरा परिचय है। [प्रशंसा] ओम
00:04:15:25 तमे पिता त माता शतो तथा नम इसिक जो कार्यक्रम आप सबों ने रखा है ये स्तुत्य है और ऐसा होना चाहिए। मेरा नाम वैसे सदानंद है। शास्त्री और आचार्य मैंने जो किया तो आचार्य जी ने मुझे आचार्य शास्त्री के नाम से पुकारा और यह नाम मेरा विख्यात हो गया। शास्त्री मैंने संस्कृत साहित्य से की और आचार्य ही मैंने संस्कृत साहित्य से किया। बाद में मैंने वेद से आचार्य किया। मैं गुरुकुल जो सीतामढ़ी के अंतर्गत आता है वहां का छात्र रहा हूं। कामेश्वर सिंह दरंगा विश्वविद्यालय से प्रतिष्ठित हूं और बहुत काल तक मैं शिक्षण का कार्य नहीं रहा। आचार्य के पद पर वैज्ञानिया में और इसी बीच ये वैदिक सिद्धांत है परमात्मा की जो वाणी
00:05:30:26 है उसके प्रचार प्रसार का जो अवसर जब तक जहां मिला मैं उसमें अपना सहयोग देता आया हूं। यहां अचानक मैं कुछ महीनों से पटना में और इसी बीच एक फोन मनोहर जी का आ गया। मुझे तो पता भी नहीं था मनोहर जी कौन है कैसे नंबर मिला उन्हें पता नहीं पहली बार उठाए तो नहीं हुआ बाद में फिर दूसरी बार उन्होंने फोन किया बातचीत हुई इन्होंने एक विषय रखा कि आचार्य जी एक विषय जरा है ईश्वर क्या ईश्वर अवतार ले सकता है ईश्वर संवाद की व्यवस्था की गई है मैंने कहा कि संवाद तो बड़ी अच्छी बात है विवाद नहीं होनी चाहिए थी इस पर ध्यान रखिए कि निर्देश देश जो उन्होंने किया उनसे मुझे पूजा बड़ा अच्छा लगा कि सब बात का मतलब क्या है एक व्यक्ति जो बोलता है सभी ध्यान मग का सुने अगर उसमें कोई प्रश्न चिन्ह लगता है उसको नोट करें दूसरा व्यक्ति बोलता है उनके चीजों को नोट करें और दोनों को देखें कहां पर क्या गलत हो रहा है क्या सही हो रहा है शास्त्रीय प्रमाण के नाम से हमारे और आपके विचार से कोई सिद्ध नहीं हो सकता जब भी होगा तब शास्त्रीय प्रमाणों से सिद्ध होगा
00:06:45:27 और इसलिए शास्त्रीय प्रमाण भी मान्य होता है तो बहुत अच्छी बात है। ये छोटा सा मेरा परिचय है और आगे इस कार्यक्रम को बढ़ाया जाए। धन्यवाद। [प्रशंसा] जी बहुत-बहुत आभार आपका शास्त्री जी। तो मैं सर्वप्रथम जिस प्रकार से क्रम को बताया गया है। उसके अनुसार मैं पक्ष को रखता हूं। जी धन्यवाद। रखा जाए। अ यह बात सर्वमान्य है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान हम ईश्वर को मानते हैं। दोनों ही पक्ष के बारे में ये बात एक मत है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। अनंत सामर्थ्यवान है। फिर सर्वशक्तिमान और अनंत सामर्थ्यवान जब ईश्वर है तो फिर उसके अवतार लेने मर लेने में बाधा क्यों मानते हैं लोग? और फिर वो अवतार क्यों नहीं ले सकता? इस पर यही मेरा जो पक्ष है सर्वप्रथम क्योंकि ईश्वर यदि अनंत सामर्थ्यवान है तो वह अवतार लेने का सामर्थ्य भी रख होना चाहिए। ईश्वर यदि सर्वशक्तिमान है
00:08:01:03 तो वह अवतार लेने की शक्ति संपन्न भी होना चाहिए। जी आपने अच्छा आपने जो बातें रखी वो है ईश्वर सर्वशक्तिमान है तू जो चाहे सो कर सकता है ऐसा नहीं है सर्वशक्तिमान का मतलब है ईश्वर का जो कार्य है उस कार्य में किसी की सहायता नहीं लेता अगर यू माने कि सब जो भी चाहे सो करे तो क्या ईश्वर अपने आप को मार कर सकता है। क्या ईश्वर अपने आप को दो चार 10 बना सकता है? अगर नहीं कर सकता तो आपके सर पर इस्तेमाल नहीं होगा। मतलब यह नहीं होता है। अब विषय सामने आता है अवतार। क्या ईश्वर अवतार ले सकता है? इसमें दो शब्द है। एक शब्द है ईश्वर और दूसरा शब्द है अवतार। ईश्वर को समझना है कि ईश्वर है क्या? ईश्वर क्या है? ईश्वर का स्वरूप क्या है? है नहीं? ईश्वर रहता कहां है? ईश्वर का काम क्या है? इन चीजों को अगर व्यक्ति समझ लाए तो ईश्वर के नाम पर कहीं विवाद
00:09:16:04 नहीं होगा। आज यही सबसे बड़ी कमजोरी है कि ईश्वर को मानते तो सब है लेकिन स्वरूप से परिचित नहीं है और व्यक्ति अपने अपने मन से स्वरूप को कर रखा है और जिसके कारण विवाद बनता है तो सबसे इस प्रश्न के अंतर्गत सबसे पहली चीज है कि ईश्वर क्या है अब किसी से पूछा जाए मुझसे पूछा जाए आचार्य जी आप अपना परिचय दें तो मैं सही सही दूंगा अगर मेरा आपसे पूछा जाए तो नाम बता सकते हैं। दो चार शब्द सुना होगा तो उसमें से बोल सकते हैं। पूरा नहीं दे सकते। इनके बारे में मुझसे पूछा जाए तो दो चार शब्द हो सकता बता सकता। लेकिन हमसे ही हमारा पूछा जाए तो मैं पूर्णता का पूर्ण परिचय दूंगा। आपसे [गला साफ़ करने की आवाज़] पूछा जाए तो आप पूरा परिचय दे सकते हैं। इसी के अंतर्गत आता है कि ईश्वर के बारे में जानना हो तो ईश्वर क्या है? ईश्वर से ही पूछ लो। दूसरे से क्यों पूछे? दूसरा तो गलत खा सकता है। इसीलिए तो मतभेद संसार ईश्वर के नाम पर है। अगर ईश्वर से ही पूछ लिया जाए कि ईश्वर तेरा नाम क्या है? ईश्वर तुम रहते कहां हो? ईश्वर तेरा काम क्या है? अगर यह ईश्वर से ही पूछ लिया जाता, उसको पढ़ लिया जाता
00:10:31:08 वेदों से तो यह विवाद आज आस्तिक जगत में जो उसको ईश्वर मानते हैं। आस्तिक जगत में इस प्रकार का विवाद नहीं होता। और यह प्रश्न भी आज नहीं आता। इसलिए इन्होंने आपने कहा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है इसलिए वो अवतार भी ले सकता है। अब अवतार को समझे कि अवतार कहते किसे क्या? अवतार में अव उपसर्ग है। पढ़े लिखे सब लोग हैं। और त्रि धातु है इसमें। त्रि का मतलब तरना। उपसर्ग के जोड़ने से अर्थ धातु के बदल जाते हैं। तो अवतरण शब्द है। अवत्री धातु से बना हुआ है। अवतरण है। अवतरण अवतार लेना। अब अवतार कौन लेगा? जो जहां पर नहीं है वहां वहां आएगा तो उसको अवतार कहा जाएगा और जो सब जगह मौजूद हो तो आएगा कहां से प्रश्न होता है जैसे मैं यहां बैठा हूं अब कोई कहे आचार्य जी इस कुर्सी पर आप बैठ जाइए ये प्रश्न गलत हुआ कि नहीं मैं पहले से बैठा हूं तो कहने की जरूरत नहीं है उसी प्रकार से यह जो प्रश्न आता है कि क्या ईश्वर अवधार ले सकता है इसका मतलब है कि हमने ईश्वर के आधार स्वरूप को नहीं समझा और ईश्वर के आधार अर्थात उसको समझना हो तो इसको से पूछ लीजिए। उससे बढ़िया तो कोई नहीं बता सकता। तो
00:11:46:14 ईश्वरीय वाणी कौन है? आप भी द्विवेदी है। द्विवेदी के विद्वान होंगे जैसे मैं समझता हूं। तो वेद ईश्वरीय वाणी है। जैसे संतान उत्पन्न होता है तो माता-पिता एक समय पर अपना परिचय देते हैं कि देखो मेरा नाम यह है ताकि कोई पूछे तो बता सको। कहां जाते हो सब चीज बताते हैं। परमपिता परमात्मा ने भी जो वेदों का ज्ञान हमें दिया सृष्टि के आरंभ में चार ऋषियों के माध्यम से तो क्रम से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद चारों वेदों के चार ऋषि हैं। यजुर्वेद के अंतर्गत जिसके वायु ऋषि उसको प्रकाशित करने वाले हैं। परमात्मा के ज्ञान को। वायु ऋषि परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त कर रहे हैं। समाधि की अवस्था में और प्राप्त करते करते जब अंतिम चरण आता है तो हर एक के मन में प्रश्न होता है किसी बारे में कि भाई इतनी सारी बातें हो रही है ये आदमी है कौन तो उस आत्मा ने परमात्मा से अंतरात्मा में प्रश्न किया है प्रभु इतने सारे ज्ञान विज्ञान की बात बता रहे हो ये तो बताओगे तुम लोगों को आइए मैं उस मंत्र को रखता हूं वेद का [गला साफ़ करने की आवाज़] यजुर्वेद के अंदर 40 अध्याय है
00:13:01:18 40 अध्याय में 40वा अध्याय को ऋषियों ने ईश्वर उपनिषद की संज्ञा दी है। ईश्वनिषद की संज्ञा क्यों दी? क्योंकि इसके अंदर जो 17 मंत्र है यह विशेष रूप से ईश्वर से संबंधित है। और [गला साफ़ करने की आवाज़] भी कुछ है उसमें लेकिन विशेष रूप से ईश्वर से संबंधित है। और जो पहला मंत्र आता है ये प्रश्न का जवाब वही से शुरू हो जाएगा। परमात्मा के बारे में पहला मंत्र क्या कहता है? ईशा वाम य जगत जगत ते
00:13:33:13 कसम उसके एक चरण को लीजिए ईशा वाम इदम सर्वम यत किंचा जगत जगत बहुत सरल शब्द है परमात्मा का ज्ञान कठिन नहीं होता ईश्वर क्या है सब में बसा हुआ है इदम सर्वम य जगत संसार में जो कुछ भी हम देख रहे हैं वह नहीं देख रहे प्रत्यक्ष है या अप्रत्यक्ष है सूक्ष्म या स्थूल है इन सबों में परमात्मा बसा हुआ है जब [नाक से की जाने वाली आवाज़] परमात्मा इन सबों में बसा हुआ है तो अवतार का प्रश्न कहां से आएगा? अब बताओ कि वह उतरेगा कहां से? क्योंकि अवतार का मतलब उतरना होता है। जो किसी खास स्थान पर बैठा हुआ हो। हमने उनको निवेदन किया हुआ यहां आ गए। इसका नाम है अवतरण। अवतार लेना। जब वो सब जगह मौजूद है तो उसके अवतार लेने का प्रश्न ही नहीं बनता है। क्योंकि जहां खोजो वहां मौजूद है। ये मंत्र आपको ईशोपने का पहला मंत्र आता है। आगे चलकर ऋषि थोड़ा सा थोड़ा सा मैं कहूंगा थोड़ा संक्षिप्त थोड़ा सा संक्षिप्त में रखें क्योंकि मुझे नहीं लगता कि बहुत ज्यादा समय है। अच्छी बात है। बोला जाए जी मैं बोल सकता हूं। जी
00:14:43:20 एक साथ शास्त्री जी ने बहुत सारे विषय दिए हैं। तो मैं समझता हूं कि सभी विषयों को एक साथ ले चलेंगे तो किसी भी विषय के निर्णय पर नहीं पहुंच पाएंगे। तो किसी एक विषय को ही मैं पकड़ करके पहले उस पर बात करते हैं। जैसे कि सबसे पहले उन्होंने कहा कि जो अपने सारे कार्य कर सकता है बिना किसी की सहायता के उसे सर्वशक्तिमान कहना चाहिए। तो जो सर्वविशेण है सर्वशक्तिमान में उसका अर्थ ये नहीं मान रहे हैं कि जो सब कुछ कर सके। कुल मिलाकर के बात इतनी है। अच्छा सर्व विशेषण का ही अर्थ जब हम पूछते हैं कि क्या वो सब जगह है? जैसे इन्होंने कहा कि वो सब जगह है। तो यहां पर सर्व विशेषण का अर्थ इन्होंने सब कुछ मान लिया। ऐसी कोई जगह नहीं है जहां पर ईश्वर नहीं है। इन्होंने माना। आप मानते हैं कि नहीं? मैं मानता हूं। मैं मानता हूं। धन्यवाद। जी। अच्छा फिर सर्वज्ञ की बात आ जाती है तो सर्वज्ञ में भी सर्व विशेषण है। परंतु वहां पर ये नहीं कहते कि जो हमारे को जानने लायक चीजें हैं वही जाननी है। अन्यथा दूसरी चीजें नहीं जाननी है या कुछ ऐसा है जो ईश्वर नहीं जानता है। ऐसा नहीं है। ये तो रही सर्व विशेषण की बात। साथ ही साथ
00:15:58:21 मैंने एक बात और कही अनंत सामर्थ्यवान। जिसके सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं है वही ईश्वर हो सकता है। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो अनंत सामर्थ्यवान का भी पुष्टि नहीं हुई। अब अगर बात करें कि जो किसी की सहायता नहीं लेता है उसे सर्वशक्तिमान कहना चाहिए। तो जब ईश्वर के चार कार्य माने गए हैं। ईश्वर सृष्टि करेगा, स्थिति करेगा, संहार करेगा और आर्य समाज के अनुसार कर्म फल प्रदान करता है। सृष्टि के लिए उसे जड़ प्रकृति की सहायता चाहिए। जड़ प्रकृति लेता है। जीव चाहिए जिसको मनुष्यों के रूप में वो जन्म देगा प्राणियों के रूप में। तो यह सहायता हो गई। स्थिति में जब वो धर्म का प्रचार प्रसार करेगा तो वो चार ऋषियों के अंत में वेद का ज्ञान देता है। जैसा कि इन्होंने कहा यानी कि धर्म के प्रचार प्रसार के लिए ईश्वर चार ऋषियों का आलंबन ले रहा है। अच्छा अगर कर्म फल की बात करें तो ईश्वर कर्म फल किस रूप में प्रदान करेगा? किसी ने किसी को चोट पहुंचाई
00:17:14:09 तो उस व्यक्ति को चोट कैसे पहुंचेगी? कोई ना कोई उसको चोट पहुंचाएगा। तो कर्म फल प्रदान करने वाले के रूप में भी ईश्वर जीवो की सहायता ले रहा है। ये तो हो गई सहायता की बात। फिर उन्होंने एक बात कही कि ईश्वर कहां है? जो उतरेगा कहीं से तो जब ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है तो वो हमारे और आपके मन में भी है, अंतःकरण में भी है। तभी तो उसने वेद का ज्ञान दिया। अंतकरण में कहकर तो नहीं दिया। उसने अंतकरण में बस इच्छा किया और चार ऋषियों को वेद का वेद के मंत्र प्राप्त हो गए। तो जब ईश्वर सर्वत्र पहले से ही था उसका यदि ईश्वर सर्वत्र पहले से ही था तो फिर वेद का ज्ञान भी पहले से ही था। तो जब वेद का ज्ञान पहले से है तो फिर ये मंत्रों का या वेद ज्ञान को प्राप्त करने प्राप्त करना या अंतकरण में उपदेश करना ये हम कैसे मान रहे हैं अच्छा प्रमाण भी इन्होंने दिया है तो वैसे मैं प्रमाण एक बात के हिस्से में रखूंगा मगर क्योंकि दिया है तो मैं रख देता हूं यजुर्वेद से ही प्रमाण है 31 वे अध्याय का
00:18:29:13 19वा मंत्र है जिसमें ईश्वर के प्रकट होने की बात कही जा रही है यदि भी अजन्मा है। अजन्मा होते हुए भी विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। तो प्रकट होने वाली बात को मैं समझा देता हूं कि उसमें मान्यता क्या होनी चाहिए। ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। परंतु अभी वो हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है। जैसे कि बिजली जहां हम लोग बैठे हैं बिजली जो ऊर्जा है ऐसे रूप में विद्यमान है कि वो हमें हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है। फिर कुछ ऐसा उपयोग किया जाता है जिससे कि बिजली तारों में दौड़ने लगती है। वही बिजली जो पहले इंद्रियों का विषय नहीं थी। अब वो जब वायर के अंदर मौजूद है तो उसमें गुण आ जाते हैं और वो हमें हमारी इंद्रियों का कुछ इंद्रियों का विषय बन जाती है। तो इसी प्रकार से जो ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है ये उसके व्यवहार में ना आ सकने वाले रूप की बात होती है। जो सर्वत्र व्याप्त है। फिर [गला साफ़ करने की आवाज़] व्यवहार में आ सकने वाला रूप जो होता है सगुण निराकार और उसी क्रम में आगे सगुण साकार के रूप में अवतरित होता है। और यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो सर्वत्र व्याप्त ईश्वर तो कोई
00:19:44:14 कार्य भी नहीं कर पाएगा क्योंकि वो तो सर्वत्र व्याप्त है तो फिर किसी चीज को मूवमेंट कैसे कराएगा वो तो यहां भी है यहां भी है कोई भी चीज मूव करेगी सृष्टि की रचना होती है तो उसमें एक जगह से दूसरी जगह ट्रेवल होता है गति कराता है ईश्वर चरने वाला कहा गया है तो ये सब चीजें हैं कि पहली बात सर्व का अर्थ जो सहायता लेने वाली बात है तो जीव और प्रकृति की सहायता ले रहा है। दूसरी बात पहले उतरने वाली बात है कि यदि यहां नहीं था तो उसका मतलब है फिर उसका ज्ञान भी प्रकट नहीं होना चाहिए। सभी लोग ज्ञानी होने चाहिए। फिर तो मामला ही बदल जाएगा। मगर ज्ञान प्रकट होता है। पहले वो ज्ञान हमारे अंदर है पहले से ही है। फिर भी जब वो हमारी इंद्रियों का विषय बन जाता है। जब हम उन मंत्रों को पढ़ने लायक हो जाते हैं तो ये कहा जाता है हमको भगवान ने उपदेश दिया। जबकि ज्ञान तो हमारे अंदर पहले से ही था। ईश्वर का दिया हुआ क्योंकि ईश्वर हमारे अंदर है। तो तरना भी सिद्ध हो गया और मैंने यजुर्वेद का प्रमाण भी दे दिया। जी
00:20:50:04 मेरा कहना जो था आपने थोड़ा सा उसको दूसरी तरफ बोल दिया। मुख्य विषय इसका ईश्वर ईश्वर और अवतार। दो चीज को समझना है। ईश्वर क्या है? और अवतार क्या है? मैंने कहा था कि ईश्वर को पहले समझो और ईश्वर को ईश्वर से ही पूछो कि भाई तुम कौन हो? मैं क्या बता सकता? ऐसे तो बताने को चौथा आसमान पर रहता है, कोई चौथा सात आसमान पर रहता है, कोई छ सागर में रहता है, कोई ब्रह्मलोक में रहता है। ये सब ईश्वर के मानने वाले कह रहे हैं कि नहीं कह रहे? ये सब लोग कह रहे हैं। लेकिन ईश्वर को मानते सब है। लेकिन इसका कारण क्या है? वेद ज्ञान का अभाव। और वेद ज्ञान में भी वेद के यथार्थ ज्ञान का मैं एक जगह था कार्यक्रम में एक ईसाई मिश्रा जी के लोग थे उन्होंने कहा कि आचार्य जी वेद में ईसा मसीह की चर्चा है मन में उन्होंने मुस्कुराया कि क्या बात कर रहे हो कहा कि आपने कहा है कि अभी यजुर्वेद के 40 अध्याय का पहला मन ई वास सर्व ईसी सब जगह व्याप्त है ये अर्थ का अनर्थ है ऐसे ही वेद के अर्थों का अनर्थ करके लोगों ने ईश्वर से अपने आप को कुसु दूर कर लिया। और जो
00:22:05:13 कह रहे हैं ना आपने जैसा कहा कि ईश्वर सर्व्यापक है। ठीक है। लेकिन ये लेकिन शब्द ऐसा है जो हर जगह गड़बड़ पैदा करता है। लेकिन मत लगाओ। लेकिन वहां लगाओ जहां अधूरा हो। जब लेकिन लगाओगे तो इसका मतलब अधूरापन है और परमात्मा पूर्ण है। वो अधूरा तो है नहीं जिसके लिए लेकिन की जरूरत जब वह सर्वव्यापक है और कण कण में है एक ऐसा कण नहीं जिसमें ईश्वर की सत्ता ना हो और ऐसा कोई क्षण नहीं है जहां पर ईश्वर की अनुभूति ना हो। तो ऐसे कण-कण में व्याप्त और हर क्षण व्याप्त जो परमात्मा है क्या वह परमात्मा हमारे भीतर नहीं है जो कण में व्याप्त है वो हमारे भीतर है कि नहीं हमारे भीतर का मतलब क्या हुआ शरीर के भीतर नहीं आत्मा में आत्मा में परमात्मा है व नहीं और जब आत्मा में परमात्मा मौजूद है तो फिर बाहर क्यों ढूंढ ले जाते हो हमें कहां जाने चाहिए? जहां पर हम भी है देखो मिलन जैसे हम यहां पर सब बैठे हुए ना एक दूसरे का दर्शन कर रहे हैं। बाहर के व्यक्ति का दर्शन ना हमारा हो रहा है ना हम से उसका हो रहा है। है नहीं? लेकिन जहां पर हम दोनों है दर्शन होता है।
00:23:20:26 तो परमात्मा दर्शन आत्मा को कब होगा? जहां आत्मा और परमात्मा दोनों हो। वहां ही परमात्मा दर्शन हो सकता है। तो वेद में परमा ये तो मैं अपनी बात कुछ भी नहीं कहना चाहता। जो वेद कहता है वही मैं कहना चाहता हूं। ईशाम जगत जगत ये मैंने नहीं कहा ये परमात्मा अपना परिचय दिया है कि मैं तो हर जगह मौजूद हूं कोई भी ऐसा कण नहीं कोई भी ऐसा क्षण नहीं जहां मैं ना हूं आगे चल इसको परमात्मा के जैसे परिचय देता है ना तो मुख परिचय दिया विस्तार से परिचय अपना देता रहता है यजुर्वेद के अंतर्गत ही 40 अध्याय का एक मंत्र आता है सब पढ़ेगा शुक्र ये आठवा अंक है 40 यजुर्वेद के उसमें परमात्मा का पूरा परिचय आ रहा है वहां तो सिर्फ बताया है कि ईश्वर सर्व्या मैं सर्व व्यापक हूं कण में सब हूं ठीक है अब वो बताते हैं कि जो प्रश्न सामने आ रहा है वो प्रश्न का उत्तर किसी में आ जाएगा और ये मेरी बात नहीं है किसी ऋषि का वक्तव्य नहीं है ये परमात्मा का ही है कहते हैं स्वपर्यागारात अर्थात वह सर्व्यापक है शुद्धम शक्तिशाली है
00:24:36:19 कहते हैं अप्रणम वर्ण कहते हैं घाव गो है ना छिद आदि से रहित है सगा सुम अायम अायम माने शरीर रहित है जब परमात्मा स्वयं कह रहा है कि मैं शरीर रहित हूं फिर हम कैसे जोड़ते हैं कि वो शरीर हो गया ये तो अपनी मन से बात हो गई तो परमात्मा के सिद्धांत से हम अलग हो गए अकायम वो [गला साफ़ करने की आवाज़] शरीर रहित है अप्राणम असराम माने नस नारियों से भी परे जब शरीर होगा तब ना नस नाड होगी जब शरीर नहीं तो वर्णन भी नहीं होगा नस नाड़ी भी नहीं होंगे तो स्पष्ट करता है कि अप्रम असम शुद्धम अपम किसी प्रकार का पाप बुरे संस्कार उसके अंदर परमात्मा में नहीं अपवा पापों से रहित है कहते कवि कहते सर्वजण कहते जहां ना जाए कभी वहां जाए कवि गांव में लोग कहते हैं इसका मतलब सर्वजता परमात्मा कवि है अर्थात सर्वज है मनीष चिंता नहीं कि जो चाहे सो कर दे। मैंने पहले कहा था सर्वशक्ति का मतलब ये नहीं था जो चाहे सो करे। और उस प्रश्न का उत्तर मुझे नहीं मिला। क्या जब सर्वशक्त क्या ईश्वर दो अपने को मार सकता है? नहीं मार सकता तो सर्वशक्त नहीं हुआ। जब अर्थ करते यही करना चाहते हैं तो
00:25:51:20 ईश्वर अपने को मार नहीं सकता है। शायद सर्वशक्त मन नहीं है। ईश्वर क्या अपने को दो चार भाग में बांट सकता है? नहीं मान सकता नहीं सर्वशक्त मन का यह अर्थ उसके साथ नहीं बन सकता है ईश्वर के जो कार्य है उस कार्य में वो किसी के सहायता नहीं लेता आपने कहा कि ईश्वर जीव प्रकृति ये ईश्वर के साथ ही जीव भी परमात्मा के अधीन है और प्रकृति भी परमात्मा के दोनों उसी की चीज है हम अपने घर के किसी सामान को इधर करें इसका मतलब दूसरे का सामान ले रहे है किसी से नहीं ये अपनी संपत्ति है परमात्मा की अपनी संपत्ति जीवात्मा है और प्रकृति है और उसके द्वारा वो काम करता है तो वो उसकी चीज है। वो किसी से नहीं ले रहा है। किसी से मांग लेगा कि आत्मा इधर आ जाओ हम तुमको जन्म देंगे। हे प्रकृति तुम आ जाओ हम तुम जल बनाएंगे। हम मिट्टी बनाएंगे। ये तो नहीं कहता क्योंकि वो उसके बस की चीज है। हमारे बस की चीज नहीं है। इसलिए वहां सहयोग के सवाल ही नहीं उसके साथ। और तब कहते हैं परमात्मा कभी पर स्वयंभू वह कभी मनीषी चिंतनशील है बिना सोचे बिना निर्णय का कोई कार्य नहीं कि जो चाहे सो कर दे ऐसा नहीं है मनमाना नहीं करता वो विवेक पूर्वक कार्य परमात्मा का होता है कोई भी अविवक का कार्य नहीं होता है परिभ स्वयंभू और स्वयंभू का मतलब सब जानते हैं
00:27:07:18 जो स्वयं उत्पन्न हो जिसको कोई उत्पन्न नहीं करता अवतार लगाएंगे तो उत्पन्न होगा कि नहीं होगा अवतार अगर कह दे ईश्वर अवतार लेता है तब तो उसका उत्पन्न होना हो जन्म लेना हुआ मरना भी होगा सांसारिक क्रिया कर्म भी करना होगा ये सारी चीजें सब कर सकते इसलिए वो स्वयंभू है वह जन्म नहीं लेता और जो जन्म नहीं लेता वो मरता भी नहीं है तो इस प्रकार से वो है स्वयंभू यथा तत्व अर्थ कहते हैं यथा तत्व जैसे पहले था वैसे आज है वैसे आगे भी रहेगा तीनों अवस्थाएं कोई परिवर्तन परमात्मा परिवर्तनशील नहीं है अपरिवर्तनीय है यथा समाप्य वह शाश्वत है। पहले भी जैसा था वैसे आज है वैसे आगे भी रहेगा। उसको शाश्वत समाप्य अस हुआ है। ये वेद के एक मतलब समझ में आएगा आठव मंदिर परमात्मा ने परमात्मा के विशेष गुणों का वर्णन आया है। फिर चर्चा होगी मैं आगे बढूंगा। आया एक आपत्ति प्रकट की शास्त्री जी ने। मैं इसके लिए क्षमा मांगूंगा। मैं इस बिंदु को ध्यान नहीं दे पाया था। उन्होंने कहा था क्या ईश्वर मर सकता है? जिसका मैंने उत्तर नहीं दिया था। मैं दे देता हूं। ईश्वर हम किसे कहते हैं? जो शाश्वत
00:28:22:21 है और जो स्वयंभू है और जो अविनाशी है अमर है। अजर अमर अविनाशी। तो जब हम ईश्वर कह रहे हैं किसको? जो अजर अमर अविनाशी है। फिर हम कह रहे हैं क्या क्या ईश्वर मर सकता है? यानी कि हम एक ही पंक्ति में दो कार्य कह रहे हैं। एक कि आपको ईश्वर को अविनाशी सिद्ध करना है। ईश्वर कहने से उसका कभी ना मरना काट दिया और कभी ना मरना कहने से हमने उसकी ईश्वरता को भंग कर दिया। मतलब हम एक ही पंक्ति में दो बातें कह रहे हैं। तुम ये करो तुम ये मत करो। मतलब हम ईश्वर को कुछ ऐसा कार्य करने को कह रहे हैं जो उसे नहीं करना है। जब हम कहते हैं कि क्या ईश्वर मर सकता है? [गला साफ़ करने की आवाज़] तो इसका मतलब आता है जब हम इस पंक्ति का निचोड़ निकालेंगे। इसका मतलब आता है कि हम कह रहे हैं क्या ईश्वर कोई ऐसा काम कर सकता है जिसमें उसे कुछ ना करे? क्या ईश्वर कोई ऐसा काम कर सकता है जिसमें वो कुछ ना करे? जब हम कहते हैं ईश्वर अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है? जब हम कहते हैं क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे वो स्वयं ना उठा सके? जब हम कहते हैं कि क्या ईश्वर मर सकता है? तो इन सभी पंक्तियों का अर्थ होता है कि हम ईश्वर से कह रहे हैं कि कुछ भी मत करो। क्योंकि हमने दो बातें कह दी एक
00:29:37:27 प्रत्यक्ष रूप से और एक अप्रत्यक्ष रूप से। अप्रत्यक्ष रूप से हमने क्या कहा कि ईश्वर को अविनाशी सिद्ध करो। और प्रत्यक्ष रूप से क्या कहा कि ईश्वर को मरने वाला सिद्ध करो। तो हमने कहा ये करो और फिर अपनी ही पंक्ति में ये कहा ये मत करो। तो हमें यह बता दें करना क्या है? इसका अर्थ है कि यह जो पंक्ति है कि क्या ईश्वर मर सकता है या अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है। इस पंक्ति का अर्थ होता है कुछ भी नहीं करना है। इसका अर्थ है ईश्वर से हम कह रहे हैं कि कुछ भी मत करो। तो ईश्वर ऐसी स्थिति में रह सकता है। महाप्रलय के समय वो कुछ नहीं करता है। हम लोग भी रह सकते हैं। मुट्ठी को बंद रखना भी क्रिया है। बिना खोले भी हम क्रिया ही कर रहे हैं। तो ऐसी स्थिति में ईश्वर रह सकता है जब हम कुछ नहीं करते। तो ये तो इनकी जो ये लॉजिकल फैलेसी होती है अक्सर। ये नास्तिकों के द्वारा दी जाती रही है ईश्वर को ना मानने के संबंध में। तो इसका तो ये उत्तर है। दूसरी बात इन्होंने बहुत पुष्टि के साथ ये चीज क्लियर नहीं की है शास्त्री जी ने कि हमने इन्होंने बार-बार जोर दिया वो सब जगह है। सब जगह है। मैंने प्रश्न किया कि जब वो सब जगह है
00:30:53:01 हमारे अंतःकरण में भी है। तो फिर किसी विशेष देश काल परिस्थिति में उसका ज्ञान प्रकट क्यों हो रहा है? होना चाहिए सबको। हम सब वेद मंत्रों को रटे होने चाहिए। जन्म से ही। परंतु एक व्यवहार हो रहा है कि ईश्वर किसी विशेष देश काल परिस्थिति में हमको ज्ञान देता है। जबकि वो पहले से ही हमारे अंदर है। क्योंकि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। फिर भी हम किसी विशेष देश काल परिस्थिति में ज्ञान प्राप्त करते हैं। यहां बैठे कई लोगों को भी कई सारे वेद मंत्र नहीं मालूम होंगे। मुझे ही नहीं मालूम है। और मुझे संभवत कुछ मंत्र शास्त्री जी को भी नहीं मालूम होंगे। तो जब ईश्वर हम सबके अंदर सर्वत्र व्याप्त है पहले से ही और वो सर्वज्ञ है। उसको वेद का ज्ञान है। तो जब वो हमारे अंदर है तो हमें भी वेद का ज्ञान होना चाहिए। परंतु किसी विशेष देश काल परिस्थिति में ईश्वर ज्ञान देता है तो ज्ञान कहां प्रकट हो रहा है? तो वही वाली बात है कि पहले वो हमारी इंद्रियों का विषय नहीं था। अब वो हमारी इंद्रियों का विषय बना। ठीक है? अब एक बात इन्होंने कही है। सबसे पहले तो मैं कहूंगा कि सारी बातों का जवाब ना दे कर के मैं इस पे ही बात कर दूं। जो इन्होंने कहा कि बिना सहायता के सर्वशक्तिमान वाली बात। क्योंकि फिर हम एक साथ बहुत सारे टॉपिक लेके चलेंगे। तो कोई भी टॉपिक क्लियर नहीं होगा। तो इन्होंने कहा कि वो उसके अधीन है। जीव और
00:32:08:07 प्रकृति अधीन है। अच्छा यदि कोई हमारे अधीन है जैसे कि उदाहरण भी दिया। हमने अपने घर में कुछ कार्यों को करने के लिए क्योंकि हम असमर्थ हैं तो पेड़ या अधीन रह के कुछ सेवकों को रखा तो क्या उसको सहायता लेना नहीं माना जाएगा? यदि हम सब कुछ नहीं कर पा रहे हैं और कुछ कार्यों के लिए अपने अधीन तत्वों को अपने अधीन पदार्थों का उपयोग कर रहे हैं तब तो मानना पड़ेगा ना कि हम सहायता ले रहे हैं भले ही वो अधीन हो तो अधीन से अपना काम करवाना या अधीन से अधीन को काम का अधीन से काम में अपने उपयोग करना वो सहायता ना लेना ऐसा नहीं है। अधीन से भी यदि आप अपना कार्य कराएंगे तो सहायता वो लेगा। दूसरी बात कि अगर अधीनता की बात है और इसमें अपापवि वाली बात है वो भी आ जाएगी कि ये कह रहे हैं कि जीव बिना सहायता के कोई कार्य नहीं कर सकता इसीलिए वो सर्वशक्तिमान नहीं है। इसका अर्थ क्या है कि जीव सभी कार्य ईश्वर की सहायता से करता है। है ना? तो जब जीव सभी कार्य ईश्वर की सहायता से करता है। इसका अर्थ है
00:33:23:08 कि यदि वो किसी को चाकू भी मार रहा है तो किस सहायता से मार रहा है? ईश्वर की सहायता से। परंतु परंतु ये तो मैंने नहीं कहा था कि ईश्वर ईश्वर की सहायता सब काम करता है। मैं आपका अर्थ नहीं लाए प्रश्न को। मुझे पूरा कर लेने फिर आप अपना पक्ष। टॉपिक आता है ना मुझे। है ना? मैं ये नहीं कह रहा। मैं ये नहीं कह रहा। अगर है ना अगर वो बिना सहायता के कर लेता है अपना कार्य तो वो भी सर्वशक्तिमान हो गया। क्योंकि हमने यही तो कहा जो अपना कार्य बिना किसी की सहायता के कर सके वो सर्वशक्तिमान है। तो यदि वो ईश्वर की बिना सहायता के सब कार्य कर सकता है तो जीव भी सर्वशक्तिमान हो गया तो दो ही ईश्वर हो गए। ईश्वर भी ईश्वर है और जीव भी ईश्वर है। तो ये हो जाएगा तो हमें मानना पड़ेगा कि जीव ईश्वर की सहायता लेता है। मैं ऐसे लेके चल रहा हूं। आपका पक्ष नहीं रख रहा हूं। मैं ये लेके चल रहा हूं। ठीक है। भाई हमने क्या कहा कि ईश्वर किसी की सहायता नहीं लेता है इसलिए सर्वशक्तिमान है। तो यानी कि जीव सहायता लेता है इसलिए नहीं है ना या फिर वो भी सर्वशक्तिमान है। तो वो सर्वशक्तिमान नहीं है तो हमें मानना पड़ेगा कि वो अपने सारे कार्य ईश्वर की सहायता से करता है और जो की सच बात है। ईश्वर की इन्होने कहा ईश्वर की सत्ता जहां ना हो ऐसी कोई जगह नहीं है। तो यानी कि जहां पर चाकू भी चल रहा है वहां पर भी ईश्वर की सत्ता है। मैं उस परिपेक्ष में नहीं जा रहा हूं कि अभी वो क्या कहते ईश्वर बुराई भी कर रहा है। वो एक उसका जवाब अलग है।
00:34:38:16 पर मैं यहां ध्यान दे रहा हूं। आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं इस विषय पर कि जीव भी ईश्वर की सहायता से सारे कार्य कर रहा है और ईश्वर का आलंबन ले रहा है। यदि ईश्वर उसके दोष पूर्ण कार्यों में भी बिना किसी विवाद के उसकी सहायता कर दे रहा है। तो इसका मतलब जीव भी सर्वशक्तिमान सिद्ध हो रहा है क्योंकि ईश्वर उसके अधीन हो गया। क्योंकि ईश्वर तो अपापम है। है ना? ईश्वर बुरे कार्य में साथ क्यों दे रहा है? क्योंकि जीव के अधीन जैसा हो गया ना ईश्वर भी। तो ये बात हो गई। कहने का तात्पर्य ये है कि मैं दोबारा से कहूंगा कि जब बात आती है सर्वत्र व्याप्त एक रस ईश्वर की। जब बात ये आती है तो यहां पे भगवान का जो व्यवहार में ना आ सकने वाला रूप है जिसके बारे में हमारे शास्त्रों में बातें भी हुई है। मांडूक्य उपनिषद में हुई है, ऋग्वेद में हुई है। और यहां तक कि सत्यार्थ प्रकाश में भी लिखा है कि एक समय था जब व्यवहार में ना आ सकने वाला समय था। तो ईश्वर का एक रूप है जो व्यवहार में नहीं आ सकता है और वही ईश्वर जब सृष्टि करता है तो वो व्यवहार में आने लगता है और जब वो सृष्टि करने के लिए व्यवहार में ना आ
00:35:53:18 सकने वाले से व्यवहार में आने वाला बन रहा है तो इसी क्रम में आगे जब वो आंखों का विषय बन जाता है तो वो सगुण सागर अवतार होता है। फिलहाल बात हम कर रहे हैं अवतार की। दूसरी बात जब वो स्वयंभू है अजन्मा है अविनाशी है वो तो सदा से है तो फिर वो क्या शरीर धारण करेगा तो आत्मा भी स्वयंभू है आत्मा भी तो स्वयंभू है परंतु वो किसी देश काल परिस्थिति में शरीर धारण करती है तो अजन्मीय जो अजन्मा है वो शरीर धारण कर रहा है इसका उदाहरण आत्मा है तो अब आप इसको पकड़ के चलें पहले तो ये वाली बात बताएं कि जो बिना किसी की सहायता के अपने कार्य कर सकता है। वो सर्वशक्तिमान ये वाला पकड़ के चलिए। बहुत सारी चीजें एक साथ अगर हम खोलेंगे तो उसमें फिर अह निष्कर्ष कुछ नहीं आ पाएगा। जी
00:36:46:00 आप में कोई प्रश्न बना? [गला साफ़ करने की आवाज़] जितने श्रोता बंधु यहां पर हैं। आपने जो कुछ कहा उसमें कोई प्रश्न चिन्ह आपके अंदर आया है कुछ? नहीं नहीं सबसे पहले तो आपको दोनों विद्वानों को यह बताना पड़ेगा कि इस लोक में कितने तत्व है? तीन ही तत्व है ईश्वर, जीव और प्रकृति। [संगीत] तीन ही तत्व है तीन के अलावा तो यहां पर चौथे तत्व तो नहीं है सिर्फ ईश्वर जीव और प्रकृति है अब आप लोगों का जो चल रहा है तो हम द्विवेदी जी से अनुरोध करते हैं कि आपने बहुत ही अच्छा एक बताया है कि क्योंकि सभी लोगों को यहां जो बैठे हैं उन सभी लोगों को ये मालूम होना चाहिए कि यजुर्वेद 31 अध्याय यही बोले थे ना कि ये मंत्र है तो जब यहां लोग बैठे हैं और बहुत से विद्वानों यहां बैठे हैं तो उनको अपने अपने घर जा के ऐसा नहीं है मैं भी आर्य समाज से ही हूं। मैं पत्र में पढ़ते थे तो आर्य समाज से हूं लेकिन ये खोज करने में हम लोगों को कोई दिक्कत नहीं है। बहुत सुंदर
00:38:01:20 खोज करने में कोई दिक्कत नहीं है। आपसे एक अनुरोध है हमारा कि आप खंड 31 खंड बताए थे। केवा मंत्र है 19 19वा जी आप लोग सभी नोट कर अच्छा मैं एक बात ये भी कह रहा था इससे थोड़ा सा विलंब हो जाएगा सभी लोग अगर बीच में वो करेंगे तो नहीं आपके आपके पीछे भी कई लोग हैं पूरा एकदम से अवतार एक मिनट एक मिनट शास्त्री जी ने कहा था कि शिवश जी से कोई प्रश्न सिर्फ ईश्वर और अवतार शब्द को लेकर ही चलना है और जी मैं वही कह रहा हूं मैं अपनी मैं अपनी बात पूरी कर लूं। शास्त्री जी ने सर्वप्रथम बता दूं शास्त्री जी ने मुझसे प्रश्न करने को कहा था। यद्यपि जो खड़े हुए वो शास्त्री जी से प्रश्न कर रहे हैं। तो उन्होंने कहा था कि शिवांश जी की बात से कोई अगर कोई प्रश्न उठ रहा हो तो वो अवश्य करें। तो मैंने अपना पक्ष रख दिया शास्त्री जी। मुझे लगता है आप रखें। एक बात मैं लास्ट में कह दूं कि मैंने जो 319 वो कहा है मंत्र उसमें ईश्वर के प्रकट होने की बात हो रही है। और भी कई मंत्र है। मैं बहुत ज्यादा उसमें नहीं जाऊंगा। तो आप यह जो है ना बिना सहायता के करना अगर वो सर्वशक्तिमान है तो बिना सहायता के करता है। इसको ले चलें और इस मंत्र का और बता दे
00:39:16:24 31 19 में कि वो प्रकट हो रहा है वो क्या हो रहा है? जी जो बताई बात मैंने रखी थी ना ईश्वर अपने कार्य में किसी की सहायता नहीं लेता। ये मैंने कहा था। उसका कार्य क्या है? प्रकृति से सृष्टि का निर्माण करना और जीवात्मा के कर्मों का फल देना इसमें किसी की दखल अंदाजा नहीं चलती मेरा करना ये था ईश्वर सृष्टि का निर्माण करता है प्रकृति से उसमें किसी से सहयोग नहीं लेता बनाने में और जीवात्मा के कर्मों का जो फल देना है उसमें भी किसी का विचार नहीं लेता कि दे कि ना दे इसमें वो स्वयं है उस कार्य को स्वयं करता है और मैं अपनी बात कुछ भी नहीं कह रहा हूं। मैं तो सिर्फ विश्लेषण कर रहा हूं वेद के मंत्रों का। मंत्र क्या कहता है? परमात्मा का क्या कहना है? हम उस बात पर रखना चाहते हैं और कुछ नहीं। तो जो कह रहे थे कि नहीं वो चाहे ईश्वर जो है सो ये आत्मा है। जो चाहे सो कर सकता है। नहीं आत्मा और परमात्मा में अंतर थोड़ा सा है। योग दर्शन के अंदर आया है। ईश्वर क्या है? वह भी पतंजलि
00:40:32:12 जी ने स्पष्ट किया है। और उन्होंने भी लिखा है क्लेश कर्म दीपा का अपराष्टा पुरुष विशेष ईश्वर ईश्वर कौन है जो क्लेश के अंदर नहीं आता जो सांसारिक कर्मों में नहीं आता जो विपाक कर्म फलों के अंदर नहीं आता इन सबों से जो रहित है उसका नाम उस सत्ता का नाम ईश्वर है अगर जिसके साथ कर्म लग गया जिसके साथ दुख सुख लग गए वो ईश्वर नहीं कहला सकता वो जीवात्मा होगा। ये दुख सुख जी जीवात्मा के साथ न्याय दर्शन ने कहा है जीवात्मा का लक्षण दिया इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख दुख ध्यानम आत्मम अगर जिसमें इच्छा है द्वेष है प्रयत्न है सुख है वह दुख है वह परमात्मा नहीं वो क्या है आत्मा है और क्लेश कर्म विपा का अपरामिष्ठा पुरुष विशेष जो इन चीजों से बड़े है वो ईश्वर है दोनों दोनों को स्पष्ट कर दिया है। दुख सुख में पड़े राम ये ईश्वर का गुण नहीं है। ईश्वर का नहीं एक एक मैं निवेदन करूंगा कि एक टॉपिक जो चल रहा है ना जैसे बिना सहायता
00:41:47:15 वाला तो उसको ही पकड़ ले क्योंकि फिर कई चीजें बोलेगी तो दोनों लंबा होगा निष्कर्ष नहीं है। हमें सिर्फ दो विषय रखना है। ईश्वर अवतार इसको क्लियर करना है और कुछ नहीं। विशेष के लिए तो घंटों व्याख्यान हो जाएगा। उससे कोई मतलब नहीं। मूल चीज है ईश्वर क्या है? ये जानना है। मैंने कहा था कि ईश्वर से ही पूछ लो कि ईश्वर कौन है? दूसरे से मत पूछो। आइए हम वही पर आ जाते हैं। यजुर्वेद 40व अध्याय के अंतर्गत एक मंत्र आता है अंतिम मंत्र। वायु ऋषि जब परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त करते चले जा रहे हैं। और अंत होता है तो कहते हैं प्रभु तुम हो कौन? तुम क्या करते हो? तुम रहते कहां हो? और परमात्मा उसको तो भुलाना नहीं चाहिए। हम अपना परिचय स्वयं दे और मेरा परिचय कोई दूसरा दे रहा उसमें अगर अंतर आ रहा है तो मेरा बात मानूंगा कि उसका बात मानूंगा परिचय किसका सही माना जाएगा जो मैं अपना परिचय दे रहा हूं और मेरा परिचय कोई और दे रहा है उसमें अगर थोड़ा अंतर होता है तो प्राथमिकता किसकी होगी सत्य किसको माना जाएगा मैं जो कह रहा हूं उसका कि दूसरा व्यक्ति मेरा परिचय दे रहा है उसका होगा आइए परमात्मा ने क्या ऋषि के आत्मा आवाज दिया उसको सुना देता हूं हिरणम पात्र सत्यसितम
00:43:06:14 पुरुष सोसाव ओम खम ब्रह्मा पूरा परिचय परमात्मा ने दिया ऋषि की आत्मा ने और कहते है हिरणमय पात्र हिरणमय पात्र से एकदम सरल शब्द है हिरणमय पात्र माने जिसमें चमक दमक हो आकर्षण विकर्षण हो उसको हिरणमय कहते हैं तो परमात्मा कहते हिरण पात्र सत्यम हम नजर नहीं आ रहे हैं समझ नहीं रहे हो इसका कारण क्या है यह [गला साफ़ करने की आवाज़] संसार हिरण में जिसको मैंने बनाया चमक चमक से बना दिया आकर्षक बनाया है इनहीं पात्रों से ढका हुआ अर्थात संसार से बाहर परमात्मा नहीं है इसी में सत्य वह सत्य जैस इनहीं सांसारिक चीजों से ढका हुआ है दिखता नहीं है तो संसार के जो मोह ममता है या आकर्षण विकस है और प्रकृति के जो गुण है सत का हम उसमें ही प्रवेश कर जाते उसमें ही फस जाते हैं और जो उसके भीतर सत्य है उसको नहीं जान पाते हैं सत्य शब्द शब्द के सत्यम शब्द है सत्यम इसके तीन शब्द खंड है स ती अम स परमात्मा ती जीवात्मा अम प्रकृति ये
00:44:21:15 तीनों सत्य है इसलिए क्या है सत्यम परमात्मा भी सत्य है जीवात्मा भी सत्य है और प्रकृति सत्य है। मतलब इन तीनों का कभी नाश नहीं होता है। प्रकृति का रूपांतरण होता है। आत्मा आवरण धारण करता है कर्म [हंसी] के अनुसार और परमात्मा कुछ भी धार परमात्मा व्यापक है। विश्व ब्रह्मांड के अंदर व्यापक है। ये तीन सत्य है। इन ये तीनों सत्य किससे ढका हुआ है? प्रकृति के सत रज तम के द्वारा ढका हुआ है। इसी कारण से ना हम प्रकृति को देख पाते हैं। प्रकृति क्या है? ना हम आत्मा को देख पाते हैं कि मैं कहा हूं और ना परमात्मा को देख पाता हूं। इसका कारण क्या है? कहते ये सांसारिक था सांसार इसलिए ना योग्य सन्यासी संसार को छोड़कर विरक्त होकर कंधराओं में क्यों चले जाते थे? इन चीजों से अलग होने के लिए ताकि इसे हटे [हंसी] तो हिरण पात्र सत्य यह आदित्य पुरुष इन तीन में एक जो है सो प्रकाशमान पुरुष है यह आदित्य पुरुष इसमें एक प्रकाशमान पुरुष है और जो प्रकाशमान नहीं है माने आत्मा प्रकाशमान नहीं है इसको परमात्मा से प्रकाश लेनी पड़ती है और प्रकृति जड़ है कहते
00:45:36:24 इस तीनों में एक जो है सो प्रकाशमान पुरुष है यह असित कहते सोसा वह मैं हूं मैं संज्ञा है कि सर्वनाम है तो जवाब दीजिए मैं सर्वनाम है संज्ञा नहीं मैं कहने से पता नहीं चलेगा तो नाम बताना पड़ेगा ना परमात्मा का सोच था वो मैं हूं और तब कहते ओम मैं ओम परमात्मा ने अपना नाम क्या बताया है ओम इसलिए जितनी आरतियां गा ओम जय जगदीश हरे आचार्य थोड़ा सा इससे विषय से भटक जाएंगे। थोड़ा सा जितनी टॉपिक हो उसी के बीच में बस बस नहीं वो नहीं चाहिए। असल में बहुत लंबी व्याख्या दे देते हैं तो उसमें कई सारे विषय ऊपर होते चले जाते हैं जो जो हमने पकड़ा रखा है कि ईश्वर का परिचय ईश्वर ने क्या किया? नाम बताने की आवश्यकता नहीं है। अभी प्रश्न यह है कि बिना सहायता के जो कार्य करता है, क्या उसी को क्या कहते हैं? सर्वशक्तिमान कहा जाता है कि नहीं? तो उस पर मेरा प्रश्न था उसप उसप मैं प्रश्न नहीं आपने आधा बात [हंसी] पकड़ते आधा नहीं पकड़ते ईश्वर सृष्टि के निर्माण में किसी दूसरे की सहायता नहीं बस इतना काफी है तो अब मुझे मेरा पक्ष रहने दीजिए जी सृष्टि के निर्माण में तो सबसे पहली बात तो ये है
00:46:51:25 मैं ये पूछना चाहूंगा शास्त्री जी से बस एक प्रश्न का जवाब दें कि जीव का कार्य क्या है जिसमें वो सहायता लेता है जिस कारण वो सर्वशक्तिमान नहीं है जी हां जीव का कारण अल्पजता है। कार्य क्या है? कहां से? अल्पता के कारण गलत कार्य उसके होते हैं। नहीं नहीं जीव का स्वभावगत कार्य क्या है? जैसे ईश्वर का कार्य है ना सृष्टि, स्थिति, उत्पत्ति और संहार ऐसे ही जीव का कौन सा ऐसा कार्य है जो है उसका मगर उसके लिए वो ईश्वर पर डिपेंड है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान नहीं है। कौन सा कार्य है? ईश्वर देखिए एक देसी है। जीवात्मा एक देसी है। मैं कार्य पूछ रहा हूं। अगर कार्य किया हुआ तो कार्य तो ज्ञान के द्वारा ना कार्य होता है। तो कार्य यहां तो ज्ञान पूर्ण ज्ञानी आत्मा है या नहीं? नहीं नहीं पूर्ण ज्ञानी तो परमात्मा है। देखिए बात ये हो रही है कि जो अपने कार्य को करने में किसी और की सहायता नहीं लेता। अपने कार्य तो जीव के वो अपने कार्य कौन से हैं जिसमें वो सहायता ले रहा है जिस कारण वो सर्वशक्तिमान नहीं है। मैं ये पूछ रहा हूं। सभी कार्य और जैसे भोजन करना है भोजन कहीं व्यवस्था अलग से करनी पड़ती है कमाना पड़ता है लाना पड़ता है बनाना पड़ता है तब खाना पड़ता है तो ये अलग कार्य हो गया कि नहीं तो भोजन अपने पास का तो नहीं है भोजन करना जीव का स्वभावगत
00:48:07:06 कार्य है मेन भोजन करना ही उसका कार्य है भी नहीं है भी है भी है तो उसका मुख्य कार्य क्या है मुख्य कार्य ईश्वर वो ईश्वर को प्राप्त करना ईश्वर को प्राप्त है मोक्ष की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति तो मोक्ष की प्राप्ति करने के लिए वो ईश्वर पर आधारित है। मोक्ष ईश्वर पर आधारित नहीं है। इसका अपना कोई आधार नहीं है। इसको ईश्वर कैसे प्राप्त होंगे? जो उसका साधन दिया है उस साधन को अपनाना है। ईश्वर को अपना ईश्वर तो सब जगह है ही। तो सबके पास है। सिर्फ योगस्थ होने की जरूरत है। हम बाहर हम ईश्वर को बाहर खोज रहे हैं ना। समस्या ये है कि परमात्मा ने ज्ञान इंद्रियां कर्म दिया है। ये आंखें किस लिए दिए? ईश्वर को देखने के लिए। नहीं संसार को देखने के लिए ईश्वर को देखने के लिए आगे मैं समझ गया मैं मैं समझ गया कि जीव का कार्य है मोक्ष प्राप्त करना जिसके लिए वो दूसरी चीजों पर डिपेंड है तो जीव ईश्वर पर डिपेंड नहीं है ईश्वर पर डिपेंड क्या है जीव ईश्वर पर डिपेंड नहीं है किसी पर डिपेंड नहीं है उसमें ज्ञान प्राप्त करना ज्ञान जीव के पास शक्ति कहां से आ रही है कार्य करने की जीव के पास हाथ को हिलाने की शक्ति कहां से आ रही है ये आत्मा के द्वारा बढ़ रही है आत्मा शक्ति दे रहा आत्मा शरीर निकल जाए तो क्या चलेगा
00:49:22:12 परमात्मा तो मौजूद है ही तो मैं मैंने आत्मा का ही पूछा है की वो शरीर कैसे हिला रही है शरीर नहीं पूछा है मैंने मैंने आत्मा को ही पूछा है वो शरीर कैसे हिला रही है अपनी चेतना से चेतना से नहीं ईश्वर की शक्ति है नहीं ईश्वर की शक्ति से किसी को मार दिया किसी का गला काट दिया ईश्वर से शक्ति का काम ये आप आर्य समाज के विरुद्ध जा रहे हो नहीं कोई सवाल नहीं ये आर्य समाज ईश्वर की शक्ति से नहीं आपने कहा कि ईश्वर की शक्ति से काम करता है ईश्वर तो किसी का गला काट ईश्वर शक्ति से क्या चलिए ठीक है। इसको ये शक्ति मिल कहां से रही है? इसका अधिष्ठान क्या है? यह तो आत्मा का लक्षण है। आत्मा में शक्ति होती है। हां, आत्मा में लक्षण है। लेकिन अज्ञानता ऋग्वेद में लिखा हुआ है शुरुआत में ही सत्यार्थ प्रकाश में लिखा हुआ है कि जब प्रलय काल था और इनके मान्य आचार्य गण है उनको मैंने कई बार सुना है आर्य समाज की। तो मानना है कि जब प्रलय काल था जब व्यवहार में ना आ सकने लायक स्थिति थी संसार की उस समय कुछ आत्माएं बेहोश जैसी पड़ी हुई थी। स्वामी विवेकानंद परिवराजक जी हैं गुजरात के। उन्होंने उनका वक्तव्य सुना है। सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है। तो जीव जो है बेहोश जैसा पड़ा था और जीव
00:50:37:18 के पास प्रकृति को मूव कराने की शक्ति नहीं है। वो केवल इच्छा करता है। उसके इच्छा में ही जो ईश्वर है वो जो स्थिति वाला रूप है ना ईश्वर का स्थिति वाला रूप है। ईश्वर की ही शक्ति जो है वो काम में आती है। जब जीव इच्छा करता है तो कोई चीज हिलती है। वरना नहीं हिलती। अच्छा दूसरी बात यह है कि जीव के पास अपनी स्वतंत्र शक्ति है। आप यह कह रहे हैं है? आपको जो बोलना है बोल दीजिए तब कहेंगे। जीव के पास यदि अपनी स्वतंत्र शक्ति है तो फिर हम सूर्य से आने वाले भोजन को क्यों प्राप्त कर रहे हैं? हम तो स्व हम तो स्वयं शक्तिमान है। तो फिर हमें सूर्य से आने वाले भोजन को प्राप्त करने की क्या आवश्यकता है? अगर कहेंगे कि सूर्य से आने वाली एनर्जी पे हम डिपेंड है। तो सूर्य को एनर्जी कौन दे रहा है? सूर्य को एनर्जी भी ईश्वर ही दे रहा है। तो इस तरीके से मान लीजिए हम लोग अपने भोजन पर आधारित है ना शक्ति के लिए कि हम लोग स्वयं शक्तिमान है। हम लोग स्वयं शक्तिमान नहीं है। हम लोग भोजन पर आधारित हैं। और आर्य समाज का भी मत है कि जीव केवल इच्छा करता है। इसमें आप थोड़ा सा चेक करिएगा अपने मत को। मैंने तो कहा ही है इच्छा सुख जाने लेंगे। हम तो मैं कह रहा हूं जीव के पास शक्ति नहीं है जड़
00:51:52:19 पदार्थों को मूव कराने की। ज्वार पदार्थ ये जो ये जो पेन है ये जो पेन है इसको उठा के जीव अपने से इधर नहीं रख सकता। कौन रखेगा उसको? तो ये आप मुझे बता दीजिए। आप बताइए आप ही ना कह रहे हैं तो कौन रखता है उसको? ईश्वर की शक्ति मिल रही है ना? हां किसे गला काट रहा है उसमें कौन काम कर रहा है? ये आप बताइए। गला काटने की बात सुन लीजिए। जब कहते हैं कि ईश्वर की शक्ति सारा कार्य होता है। गला काटने की बात बता देता हूं। देखिए सबसे पहली बात है कि ईश्वर को हमने सामर्थ्यवान माना है। तो सामर्थ्यवान में यदि बात आती है कि क्या ईश्वर किसी चीज को मूव करा सकता है कि नहीं मूव। या तो पुश करते हैं। दो प्रकार की क्रियाएं होती है। पुश या पुल या तो खींचना या फिर धक्का लगाना। गतिमान करा देना। तो अगर किसी को गला काटना है तो उसमें मान लीजिए पुल हो रहा है या पुश हो रहा है। कोई दोनों में से एक चीज कुछ हो रही है। तो क्या बात ये नहीं है कि वो चाकू से गला काट सकता है कि नहीं। बात ये है कि वो पुल पुश कर सकता है कि नहीं ईश्वर। अब वो बात अलग है कि वहां पर किसी का गले पे वो छुरी चल रही है। अच्छा इसका दूसरा तरीके से हम लोग सत्य तक पहुंच जाते हैं। यदि किसी ने चार लोगों का गला काटा है पिछले जन्म में, तो
00:53:07:22 ईश्वर उसको गला काटने वाला दर्द देगा कि नहीं देगा? और देगा तो कैसे देगा बताइए ये तो परमात्मा की व्यवस्था ना अपनी है तो बताइए कैसे देगा आपका दखल वो कैसे फल कर्म फल परमात्मा को देना है ना वो किस प्रकार से दंड दे उसका अगर किसी ने गला काटा है चार लोगों का तो उसको न्याय न्याय तो यही है ना कि उसको भी वो दर्द मिले एक दिन इसका मतलब तो फिर एक मिनट तो फिर अगले जन्म में या फिर कभी भी ईश्वर ऐसी व्यवस्था करेगा ना कि उसको भी गला गला रेतने का दर्द मिल जाए तूने चार लोगों का काटा था तेरा तो कटेगा तो वो वो जब व्यवस्था करेगा तो कैसे करेगा? कोई गला रेतेगा ही उसका और वहां पर ईश्वर की ही व्यवस्था के अनुसार उसका गला रेता जा रहा है। तो इसलिए गला रेतने में मनुष्य दृष्टि से तो दोष है। क्योंकि मनुष्य को नहीं मालूम कि मैं किसी को पाप का दंड दे रहा हूं। वो तो चोरी के लिए डकैती के लिए व्यभचार के लिए गला रेत रहा है। परंतु वही कार्य जब ईश्वर के द्वारा हो रहा है तो उस पर दोष नहीं है। क्योंकि वो कर्म कर्म फल व्यवस्था भी हो सकती है। वह कर्म ईश्वर का है ही नहीं। किसी गला काटना किसी कर्म फल कर्म फल कैसे देगा? न्याय कैसे देगा? फल कर्म फल की व्यवस्था नहीं हुई ना? नहीं बताइए। आप जैसा कर्म किया वैसा फल भोग रहे हैं। मैं जैसा कर्म किया वैसा फल भोग रहा हूं। सब लोग अपने-अपने कर्म कर रहा है कि नहीं? मैं कह रहा हूं कि अगर किसी ने किसी को गला कटने का दर्द दिया
00:54:22:26 है तो ईश्वर उसको गला कटने का दर्द देगा कि नहीं देगा? नहीं तो वो तरीका है। आपने सोच लिया ना तरीका क्या है? बताइए। इसका मतलब है कि जितने हत्याएं हो रही है सब में परमात्मा दोषी है। वही कर्म फल दे रहा है तब तक दंड न्याय इसका मतलब जहां पे हत्या हो रही है वहां पर ईश्वर की सत्ता नहीं है। नहीं ईश्वर सत्ता ईश्वर का काम क्या है? ईश्वर आपके काम में दखल नहीं देगा। आत्मा के काम में ईश्वर दखल नहीं देता। आप अपना काम कीजिए। बहुत सारे विषय ना बोलेगा। मुझे आप ये बताइए वो गला काटने का दर्द कैसे देगा मनुष्य को? किसी को किसी ने गला काटा है। न्याय करना है। उसको दर्द देना है। कैसे देगा दर्द? अब कैसे देगा परमात्मा से पूछे वो तो अन्याय उसका अन्याय इसका मतलब इस बारे में मौन है मन समान नहीं है अच्छा आप जो कह रहे हैं एक चीज एक चीज और है एक चीज और है अभी तक अभी तक इन्होंने बार-बार प्रमाण की बात कही कि भाई ईश्वर से पूछ लो ईश्वर से पूछ लो तो कहने का लाजा है कि कैसे ईश्वर के प्रमाण
00:55:22:24 प्रमाण एक मिनट प्रमाण की बात भी मैं बता देता हूं। कई बार शास्त्री जी ने प्रमाण की बात कही है। तो पहली बात यह है कि यदि हम केवल प्रमाण की बात को ही रखेंगे और उसके साथ तार्किक दृष्टि को नहीं रखेंगे तो एक मिनट तो फिर हमें मानना पड़ेगा। हम ये इस ओर ले जा रहे हैं समाज को कि हमारे जो वेद के वाक्य हैं वो तार्किक नहीं है। उनको बस बिना प्रश्न के मान लो। पहली बात। दूसरी बात यह है कि हमने कहा भगवान स्वयं ईश्वर स्वयं अपना प्रमाण देते हैं मैं क्या हूं तो क्या आपको दिया है यहां बात ये नहीं हो रही भगवान ने क्या कहा है यहां बात ये हो रही है भगवान ने जो कहा है उसका अर्थ क्या है आप उसका अलग अर्थ लेते हो हम अलग अर्थ लेते चलो इसका अर्थ मैं निकाल रहा हूं जैसे कि मैंने कई बार कहा कि इनके जो अर्थ हैं वो मैंने मना नहीं किए मैंने कहा जहां-जहां पर ऐसे अर्थ हैं वहां पर ईश्वर के इस व्यवहार में ना आ सकने वाले रूप की बात हो रही जो वो है सच्चिदानंद मगर जब भी वो कार्य करता है कुछ भी अगर वो हिलेगा भी तो वो हिलने के लिए सबसे पहले अवतार लेता है मैं अभी इसको समझाऊंगा वो अवतार कैसे लेता है अगर उसने सृष्टि बनाई तो सबसे पहले ईश्वर अवतार लेगा तब सृष्टि बनेगी पहली बात
00:56:38:00 दूसरी बात ये है कि मैंने प्रमाण दिया है 31 19 जिसमें ईश्वर के प्रकट होने की बात हो रही है और बहुत सारे में बहुत सारे प्रमाण एक ही बात जो बोल रहे हैं छ तीन त्रिपाठ आठ ये दोनों ऋग्वेद के वचन है और कई जगह उपनिषदों में आ रहा है तो बहुत सारे प्रमाण की एक भी प्रमाण यदि है तो वो पर्याप्त है तो मैंने कहा 31 19 में उसके प्रकट होने की बात हो रही है तो आप उस प्रमाण के लिए भी बोले बात ऐसी है ईश्वर के तीन स्तर है ईश्वर के तीन स्तर है एक है व्यवहार में ना आ सकने वाला दूसरा स्तर है दिखाई ना देते हुए व्यवहार में आने वाला पहला स्तर दिखाई ना देते हुए व्यवहार में बिल्कुल भी ना आ सकने वाला। दूसरा स्तर दिखाई ना देते हुए व्यवहार में आ सकने वाला। तीसरा स्तर दिखाई देते हुए व्यवहार में आ सकने वाला। पहला स्तर निर्गुण निराकार। दूसरा स्तर आप इस पे मत जाइएगा। मैं नाम क्या दे रहा हूं मैं अपनी केवल एक बात रख रहा हूं। इसका खंडन आवश्यक नहीं है। पहले स्तर को हम लोग कहते हैं निर्गुण निराकार। दूसरे स्तर को हम कहते हैं सगुण निराकार। जैसे तारों में दौड़ने वाली बिजली। और तीसरे स्तर को हम कहते हैं सगुण साकार। ठीक है? तो अच्छा वो वाली बात मेरी रह रही कि अगर ईश्वर अपने अधीनस्थ से काम
00:57:53:06 करा रहा है तो उसको सहायता नहीं मानी जाएगी। दूसरी बात अह अह 319 का आप वो करें। 319 में ईश्वर के प्रकट होने की बात हो रही है यजुर्वेद में। और एक बात ये है कि अह जो जीव है उसका कार्य अगर स्वभावत कार्य देखा जाए जीव का तो वो केवल इच्छा करना है। क्या है? इच्छा करना। जीव का स्वभावत कार्य है ही नहीं। मूव करना। सामान को मूव कराना जीव का स्वभावगत कार्य नहीं है। आर्य समाज के अनुसार ही बोल रहा हूं। आर्य समाज के अनुसार जीव का स्वभावत कार्य है केवल इच्छा करना। नहीं आप फिर गलत आप समाज को चर्चा मत कीजिए। सिद्धांत की बात कीजिए। अच्छा ठीक है। सिद्धांत सिद्धांत 31 क्या मतलब इसमें नहीं जैसे आपने कहा कि जैसे जो बोल रहा हूं उसे मंत्र से बोल रहा हूं ना। ठीक है। मैंने कहा मैंने कहा जैसे कि ईश्वर के चार कार्य हैं जिसमें वो जीव की सहायता नहीं लेता है। वो किसी की सहायता नहीं लेता है। अब मैं कह रहा हूं जीव का कार्य है कि भोजन की शक्ति से सूर्य की शक्ति से अपने कार्य करना। यह जीव का कार्य है। अब इस कार्य में वो किसी की सहायता नहीं लेता। सूर्य की शक्ति को तो ले लिया मैंने पहले ही जैसे इन्होंने
00:59:08:07 कहा कि ईश्वर का कार्य है जड़ प्रकृति से सृष्टि रचना करना। जड़ प्रकृति का उपयोग करके सृष्टि रचना करना। इसमें शब्दों का खेल है बस। इन्होंने जो जड़ प्रकृति की सहायता है या जीव का आलंबन है वो तो ले ही लिया। उसके बाद का इस कार्य में अब ये किसी की सहायता नहीं लेता। अब मैं कह रहा हूं। कि जीव का कार्य है सूर्य से आने वाला जो भोजन है। भोजन कैसे मिलता है? सूर्य की जो शक्ति होती है, वो हमें भोजन के माध्यम से प्राप्त होती है तब हम कुछ कर पाते। तो जीव का कार्य है, मनुष्य का कार्य है, सूर्य से आने वाली शक्ति का उपयोग करते हुए अपने कार्य को करना तो वो भी सर्वशक्तिमान हो गया फिर। कितने ईश्वर हो गए? अच्छा। अब लास्ट में मैं वो वाली बात बता देता हूं कि ईश्वर जब प्रकट होगा तो सबसे पहले अवतार लेगा। कैसे? जब ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है तो जब वो किसी चीज को गतिमान करेगा यदि वह यहां पर भी है और यहां पर भी है। बहुत ध्यान से समझिएगा। जब ईश्वर इस गिलास के पास भी है और इस गुलदस्ते के पास भी है। तो जब वो गतिमान करवा रहा है तो ये अगर उसको केवल गिलास को गतिमान कराना है तो यदि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है तो वो जब गतिमान कराएगा तो ये भी हिल जाएगा। वो जब
01:00:23:13 गतिमान कराएगा जब उसकी शक्ति यूज़ होगी शक्ति तो ये भी हिलेगा ये भी हिलेगा। जबकि करना क्या है? केवल इसको हिलाना है गिलास को। तो इसके लिए ईश्वर विशेष व्यवहार के लिए विशेष रूप धारण करता है। आंखों वाला नहीं ये मनमानी आपके लिए एक मिनट एक मिनट एक मिनट मैं बता रहा हूं। आप मुझे बताइए इस बात विशेष व्यवहार अगर वो कर रहा है जैसे कि ईश्वर सारी दुनिया में सर्वत्र व्याप्त है। मगर वो केवल चार ऋषियों के अंतःकरण का विषय क्यों बन रहा है? उसी समय कुत्ते बिल्ली का भी अंतःकरण है। उसमें विषय बन जाए या फिर जो अन्य बाकी के मनुष्य उसमें मगर वो चाहता है कि मैं केवल चार ऋषियों के अंतःकरण का विषय बनूं। तो वो चार ही ऋषियों का अंतकरण का विषय ये ईश्वर का अवतार है। ईश्वर एक देशीय हो रहा है। ईश्वर एक देशीय हो रहा है। वो सर्वत्र व्याप्त है। फिर भी केवल चार ऋषि वेद का ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार से किसी अंतरिक्ष में किसी एक जगह पे पृथ्वी बन रही है और किसी जगह पे नहीं बन रही। मगर यदि सर्वत्र व्याप्त ईश्वर क्रिया करेगा तो सब जगह वही क्रिया होगी। कुछ भी नहीं हो पाएगा। सब जगह मूवमेंट हो जाएगा। मगर जब वो चाहता है कि केवल पृथ्वी वाली जगह पर ही पुश हो, पुल हो, वही हिले और दूसरी चीजें ना हिले। तब वो विशेष शक्ति के रूप में वहां प्रकट होगा और वो क्रिया कर पाएगा।
01:01:38:24 तो जो सर्वत्र व्याप्त ईश्वर है वो क्रिया नहीं करता है। वो पहले विशेष व्यवहार करने के लिए विशेष रूप धारण करता है। ये ये रूप अभी आंखों का विषय नहीं है। मैं फिर कह रहा हूं। मगर जो सर्वत्र व्याप्त ईश्वर है वो एक देशीय होकर कार्य करने के लिए एक सीधी सी बात है। अगर कार्य एक देश है तो उसको करने वाला जो कारण है वो भी एक देशीय ही मानना पड़ेगा। वरना कार्य हो ही नहीं पाएगा। जीवन में एक देसी परमात्मा है ही नहीं। वो सर्व्यापक परमात्मा है। जैसे मैं बताता हूं आपको। नहीं होगा। ये सुनिए एक सेकंड। ये बता दीजिए। जी जैसे अभी रेडियो से ब्रकास्ट सब जगह हो रहा होगा। भिन्नभिन टीवी पर चैनल पर चल रहे हैं। क्या हम सब सुन रहे हैं?
01:02:21:18 रेडियो से या टीवी पर जितने चैनल चल रहे हैं आकाशवाणी के द्वारा क्या कोई सुन रहा है यहां पर? इसलिए क्योंकि हमारी परिधि के अंदर वो नहीं है। वो नहीं उसका जो ट्रांसमीटर का सेटिंग है वो हमारे भीतर नहीं है। हां जैसे जैसे आपका मोबाइल है आपने मिला लिया जगह को तो उसकी आवाज आप सुन रहे हैं। बगल में कोई चर्चा चल रही है वो आपको नहीं सुनाई पड़ेगी उसमें। क्योंकि जैसे ही आप बदलेंगे वैसे हो जाएगा। परमात्मा सर्व्यापक है। है नहीं? सब जगह है लेकिन हमारा संबंध उससे कब बनता है? है नहीं जब तक हमारा संबंध उससे बनेगा नहीं तब तक हम उसकी चीज को नहीं समझ पाएंगे। इसी को प्रकट होना कहते हैं। आप प्रकट होना इसी को प्रकट होना कहते हैं। आप प्रकट होना कह लीजिए। ये दूसरी बात है आपकी बात
01:03:04:21 के कारण अब एक 31 19 का जवाब नहीं मिला है और जीव की सहायता या प्रकृति की सहायता लेने पर भी उसको जो है आप सर्वशक्तिमान कह रहे हैं। तो मैंने एक तर्क दे दिया कि जीव का कार्य है सूर्य से आने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल करके कार्य करना। तो इस प्रकार से जीव भी सर्वशक्तिमान हो गया क्या? पहली बात 31 19 का जवाब नहीं है। दूसरी बात क्या इस प्रकार से जी नहीं आप जब पॉइंट उसे रुकिए सूरज आपके बस की चीज नहीं है। हां किसके बस की है? आप सूरज के प्रकाश में आएंगे तो गर्मी मिलेगी और चले जाएंगे घर में तो मिलेगी। किसके बस की? ये अपने कार्य पर निर्भर करता है। जी मेरी बात नहीं। मेरी बात पूरी नहीं हुई। मैं पूरी बात कर लूंगा। लास्ट में मैं एक बात कह रहा हूं। एक मिनट एक मिनट। अब मैं लास्ट में बात कह रहा हूं। बात बार-बार प्रमाण की आ रही है। तो क्या मैं ये कह रहा हूं आवाज कर रहा है कि शास्त्री जी के पास जो वेद के मंत्र हैं जिनको आधार बना रहे हैं ईश्वर के अवतार को निषेध करने में वो शास्त्र इनके पास आए कैसे ये मुझे कृपया करके बता क्या वेद के मंत्र आपके पास कैसे आए गुरुओं के सानिध्य से कुछ कुछ
01:04:19:27 नाम बताएं गुरुओं के पीछे के हमारे गुरु तो एक दो सर आए नहीं है बचपन से लेकर अरे दयानंद जी से पीछे के चार पांच गुरुओं गुरु का नाम बताएं। दयानंद के पीछे गुरु कौन? इनको माइक दे दीजिए। दयानंद के पीछे कौन? जी दयानंद दयानंद जी के पीछे मैं किसी गुरु को नहीं मैं सिर्फ अपने गुरु को जानता हूं। नहीं तो भाई वेद की उत्पत्ति वेद की उत्पत्ति अभी नहीं हुई है। क्लियर कर दे। देखिए पूरा दो मिनट में समाप्त हो जाए। समय का भाव जी अवतार का अर्थ मैंने बताया था कि अवतरण होता है उतरना होता है जो सर्व व्यापक है सब जगह है उसको उतरने का प्रश्न ही नहीं बनता है तो मैंने आप ही से उत्तर दे दिया ना कि जब हम ट्रांसमीटर ऑन करते हैं और जब वो व्यवहार का विषय बनता है अवतरण हो गया उसी को हम प्रकट होना कहते हैं जब वो हमारी इंद्रियों का विषय बना हमने उसको अवतरण कह लिया तो मन हो जाएगा लेकिन जो अवतार माना जा रहा है दुनिया में ईश्वर का अवतार होता है जैसे राम का अवतार माना गया तो ये अवतरण मतलब आप चलिए ठीक है मतलब आप अवतार मानते हैं मगर ये वाले जो अवतार हैं रामकृष्ण आदि इन पर परहेज है। अब मैं इसकी जवाब दे समझ लीजिए अवतार बस दो मिनट ज्यादा समय नहीं अवतार को समझिए जैसे ही अग्नि के नजदीक लोहा को रख दीजिए हां तो लोहे में अग्नि का गुण चला जाता है की नहीं हां और वहां से हटा लीजिए हां तो फिर ठंडा
01:05:35:03 हो जाएगा तो जब जब आत्मा भी परमात्मा के सानिध्य में जब जाता है तो परमात्मा के कुछ गुण उसमें आते हैं तो वो तो पहले से ही सानिध्य में था अरे सानिध्य में रहने से तो आना जाना कैसे सिद्ध हो रहा है वही तो मैं कह रहा हूं इसी इसी आने जाने को हम अवतरण कहते नहीं आप पहले वो व्यवहार का विषय नहीं था अब है आपके कहने से नहीं ना होगा या सार्वजनिक अर्थ आएगा ना सार्वजनिक अर्थ ही तो है हां व्यक्तिगत अर्थ नहीं दूसरी बात आप अवतार मान रहे हैं मगर रामकृष्ण के अवतार पर आपकोत्त मैं वो तो उदाहरण मैं दे रहा था कि जैसे अग्नि के समीप आप लोहे को डाल दीजिए धीरे-धीरे उसमें अग्नि का गुण आ जाता है ऐसे ही परमात्मा के सानिध्य में जब आत्मा आता है तो आत्मा के कुछ गुण उसमें आते हैं। वैसे ही जैसे लोहे गरम अगर है तो उसको कोई दो लोहा रखा है एक ठंडा एक गरम लेकिन खत्म कर रहा हूं दो लोहा एक ठंडा एक गरम है लेकिन हमें तो पता नहीं है कौन गरम कौन ठंडा है जब आप हाथ डालते हैं तो एक गरम लगता है इसका मतलब क्या है इसमें ये अग्नि के सानिध्य में था और ये लोहे ठंडा है इसका मतलब ये अग्नि के सानिध्य में नहीं था आप तीन प्रश्नों के उत्तर दें यदि यदि यदि अधीन है तो उससे सहायता लेना क्या सहायता नहीं है और यदि जीव को हम कहें कि वो जो सूर्य से आने वाली और दूसरों पर डिपेंड होने वाली ऊर्जा से अपना कार्य करता है। यह उसका
01:06:50:09 कार्य है। इसके लिए वो किसी की सहायता नहीं लेता तो वो भी सर्वशक्तिमान हो गया। एक मिनट तीसरा 31 19 का जवाब दें। ईश्वर प्रकट होता है। और चौथा आप ये बताएं कि आपके पास वेद मंत्र कहां से आए हैं। जी क्षमा करिए। थोड़ा समय का अभाव है अर्थात चर्चा को जो है जैसा कि पूर्व में हमने कहा था निष्कर्ष पर आने का प्रयोजन नहीं है केवल लोगों के तर्क को जो है बढ़ाने का दार्शनिक विचारों को बढ़ाने का उद्देश्य है अतः इस उद्देश्य की पूर्ति तो यहां हो ही गई है अब हम बस निवेदन करेंगे यहां कोई श्रोताग ऐसे हैं जो कोई प्रश्न विशेष करना चाहे कोई आपत्ति आदि नहीं
01:07:33:06 वही चले जाइए प्रश्न करिएगा प्रश्न जैसे इन्होंने बोला कि ईश्वर अवतार नहीं ले सकता है। ठीक है ना? तो उसमें देखिए ईश्वर अवतार नहीं लेगा तो फिर फिजिबिलिटी कैसे होगा? कैसे वो मतलब कि परफॉर्म होगा? सो जैसे दो इक्वेशन था। किसी भी चीज को डिफाइन करने के लिए तीन चीज होना चाहिए। कॉन्शियसनेस, एनर्जी और मैटर। तो भगवान को आप जब तक साकार के रूप में नहीं मानेंगे तो वो निराकार रूप हो ही नहीं सकता। इमॉसिबल है। ये आपका कथन है। अरे आपका आप निराकार उनको दे दीजिए। वो करेंगे आपको साकार मानने पर हमको क्या? नहीं नहीं ये शरीर साकार है। शरीर की पिता से जो बोल रहा है वो कौन है? वो निराकार है कि साकार है? जब तक वो साकार नहीं होगा तो निराकार ऐसा है नहीं सुन लीजिए मैं बात सुन लीजिए तौर से बोल रहा हूं एक मिनट कि जब जितने लोग जो बैठे हैं कुछ यहां ग्राउंड के लिए आए हैं और जो लोग अपना बोलना चाहे सिर्फ हम ही दो आदमी बोलते रहेंगे बाकी लोग क्या बोलेंगे हमारा ये कहना है कि जिन लोगों को यदि कुछ भी आप लोगों को बोलना है या प्रश्न करना है हमारे
01:08:48:16 हमारे बीच दोद विद्वान बैठे हैं सनातन सनातन के और ये हमारे पास जैन साहब चले गए शायद बहुत ही अच्छी बात बहुत ही अच्छी बात बोल रहे थे हम लोगों के बीच में तो आपको यदि प्रश्न करना है वही से करें मैं दे दूंगा आपको आपसे कृपया निवेदन है कि केवल एक प्रश्न करें और एक ही प्रश्न करें और शास्त्री जी का और शिवश जी का उत्तर ले ले और उसके बाद बस उतना ही जाने उस क्रॉस क्वेश्चन करने की आवश्यकता नहीं है जब ये पूर्ण हो जाएगी चर्चा तो उसके बाद आप क्रॉस क्वेश्चन करते रहिएगा उसे ऑफलाइन ठीक है नारायण ईश्वर तर्क का विषय नहीं है ईश्वर एक आस्था और विश्वास का विषय है और आप इस पर कितना भी तर्क कर ले ईश्वर जन्मा और अजन्मा दोनों स्वरूप में विद्यमान है। जी जी मैं इसका मैं आपकी बात पूरी कर दूं। आपने कहा था एक्स यदि ऐसा नहीं होता तो जितने भी अवतार है श्रीमद् भागवत इत्यादि भागवत इत्यादि ग्रंथों में जो वर्णित है वे ईश्वर के अवतार नहीं मनुष्य के अवतार जीव के अवतार कहे जाते हैं। राम
01:10:03:27 जो है ईश्वर नहीं है। इसका मतलब अवतार लेने वाले ईश्वर नहीं है। ईश्वर अवतार लेते हैं। अब मतलब होता है विशेष अवस्था में विशेष कारण से विशेष परिस्थिति में ईश्वर अवश्य अवतार आपको सिर्फ प्रश्न करना है उत्तर नहीं देना है आप भी देखिए इनकी बात यही है कि जब कोई विशेष व्यवहार होगा तो ईश्वर को अवतरित होना होगा क्योंकि सर्वव्यापी ईश्वर व्यवहार नहीं कर सकता क्योंकि यदि सर्वव्यापी ईश्वर व्यवहार करेगा तो सब जगह व्यवहार होगा एक जैसा व्यवहार होगा क्योंकि वो एक रस है तो आप ये इस पर प्रकाश डलवाएं कि विशेष व्यवहार जब भी हो रहा है केवल यही चीज हिल रही है केवल चार ऋषियों को ज्ञान हो रहा है तो यहां पर ईश्वर अवतरित होगा अगर अवतरित नहीं होगा और वो वो एक रस है वो सर्वत्र व्याप्त है तो सब जगह वही व्यवहार होगा एक ही व्यवहार सब जगह होगा एक जैसा धक्का तो सब लोगों को धक्का लग गया ये बात है अच्छा अह वो भाई साहब प्रश्न करना चाह रहे थे पीछे चले गए हैं उनको आप दे दीजिए भाई
01:11:12:21 नहीं जी पूज्य शास्त्री जी और द्विवेदी जी का जो डिबेट का जो यहां विषय था कि ईश्वर अवतार लेते हैं कि नहीं लेकिन शास्त्री जी ने जो तर्क दिया ईश्वर अवतार अवतार नहीं लेते हैं। लेकिन हमारा कहना है कि अगर यह विषय आ जाएगा तो हमारे देश के अंदर रामायण और महाभारत छूट हो जाएगा। नहीं नहीं होगा बता दो तो गए। मैंने उदाहरण दिया। आर्य समाज पुराण और स्मृति ग्रंथों को ऐसे मानता है कि उससे वो अवतार वाले विषयों को नहीं मानता। वो कहता है प्रक्षिप्त है। नहीं अवतार के अर्थों को लोग समझ नहीं रहा है कि अवतार किसे कहते हैं? नहीं उत्तर अवतार कहते हैं किसको यही नहीं समझा। अवतार लोग समझते हैं कि ईश्वर स्वयं उतर जाता है शरीर में आ के। ईश्वर तो पहले से था कि नहीं उसमें जिस शरीर में जिस शरीर का जन्म हुआ उस शरीर में पहले से ईश्वर था कि वह डेड बॉडी आया था उसमें आत्मा भी था उसमें परमात्मा भी था दोनों तो पहले से मौजूद था ही उसमें तो आने की क्या जरूरत उस पर अब बता रहा हूं सुनिए नहीं अब मानता आपकी हाल दूसरी बात है मैंने उदाहरण दिया था कि जैसे ईश्वर के सानिध्य में आने से
01:12:27:22 परमात्मा के गुण आत्मा में आते हैं विशेष रूप से जैसे लोहे का मैंने उदाहरण दिया था ना तो जिसमें आत्मा के गुण साधना के द्वारा आ जाएगा वो दिखने में क्या लगेगा? उसमें विशेषता आ गई मनुष्य से विशिष्ट मनुष्य है। तो जैसे लोहे को अग्नि में डाल दीजिए तो आग हो जाता है लाल तो वह आग है कि अग्नि में लोहा है? वह इसका मुझे देने दीजिए। समझ नहीं पहले। मैं समझ गया। आपने कहा आपके समझ में नहीं होता है लोहा जब आग में गया पहले काला था और जब आग में गया धीरे-धीरे अग्नि का गुण उसमें समाहित हो गया तो भी लाल हो गया अब वो लाल जब है तो देखने वाला क्या कहेगा इसको भी आग ही कहेगा इसको भी आग ही कहेगा लेकिन वस्तुतः यह अग्निय लोहा है इसमें अग्नि का गुण आए हैं साधना के माध्यम से और उसी अग्निय लोहा को अगर बत्ती से अलग कर दीजिए धीरे धीरे वो काला हो जाता है वास्तविकता ठीक है अब अब इसप मैं बोल दूं बार-बार ये बात हो रही है कि अग्नि के संपर्क में आके लोहे में अग्नि के गुण आते हैं। मैं इसको पूरा कर दूं। लोहे में अग्नि के गुण पहले थे क्या? लोहे में अग्नि पहले थी क्या? नहीं थी। तो फिर आत्मा में ईश्वर के गुण आना हम क्यों स्वीकार कर रहे जबकि आत्मा में तो ईश्वर पहले से ही आत्मा में ईश्वर पहले से ही है। तो गुण का आना जाना
01:13:43:01 ये हम क्यों कह रहे हैं? क्योंकि आत्मा के अंदर भी ईश्वर था। आत्मा या शरीर धारण करने है। अंतःकरण में पहले से ईश्वर था। मगर जब वो जानने योग्य हो जाता है तब उसे हम कहते हैं प्रकट और अप्रकट इसी प्रकार से एक मिनट मैं वो रामकृष्ण आदि पर जो आरोप लगता है उसको पूरा कर दूं आप कहा था कि जिस प्रकार से ईश्वर की एक विशेष शक्ति जो इस गिलास से टकरा कर इसको सरकाएगी और इसके अगल-बगल दूसरे पदार्थ होंगे तो वो वहीं के वहीं रहेंगे। वो विशेष शक्ति इस पदार्थ से टकरा कर गिलास को हिलाएगी। इसका मतलब कि ईश्वर यदि चाहे तो इस रूप में अवतरित होता है कि वो पदार्थों से टकरा सके और जब और जब वो रोशनी से टकराएगा तो क्या होगा? जब वो रोशनी से टकराएगा तो रोशनी किसी चीज पर पड़ के वापस आती है तब हम उसको देखते हैं। तो जब वो रोशनी के मार्ग की बाधा बनता है जब वो रोशनी से टकराता है तो वो सगुण साकार रूप हो जाता है वो रामकृष्ण हो जाता है। और महाराज जी जो बोले थे कि ईश्वर तर्क का विषय नहीं बिल्कुल नहीं है। ईश्वर का पहला जो स्तर है व्यवहार में ना आ सकने वाला वो तर्क का विषय नहीं है। व्यवहार का विषय नहीं है। नारायण [गला साफ़ करने की आवाज़]
01:14:58:07 चलिए प्रश्न कुछ आवे तो कुछ जवाब तो आज इसी क्रम में यह चर्चा संपन्न हुई अब हम आप सब से निवेदन करेंगे कि जलपान के लिए हमारे कैफे में प्रस्थान करें उपस्थिति के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद साधुवाद नारायण एक मिनट एक मिनट एक मिनट कार्यक्रम जब समाप्त करते हैं तो हम लोग अपने अनुसार वैदिक रीति के अनुसार शांति पाठ करते हैं तब हम लोग कार्यक्रम समाप्त करते हैं। मैं आदरणीय आपको इनसे अनुरोध करूंगा कि आप शांति बैठे
01:15:48:28 ओम शांति अंतरिक्षम शांति पृथ्वी शोषया श वनस्पतया श्व देवा शांति ब्रह शांति सर्वम शांति शांति रे शांति सामा शांति रे ओम शांति
01:16:24:21 ओम बोलिए सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय धर्म की जय हो बोलिए सियापति
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→ Used in: A · Video रामपाल बहिष्कार आंदोलन | यह तो संघर्ष प्रारंभ है | Damanaastra at 0:53 ↗
→ Used in: A · Video रामपाल के पाखंड को ठुकरा कर प्रेमानंद जी को बनाया गुरु | Boycott Rampal Movment... at 6:19 ↗
01:16:33:08 रामचंद्र की जय पवन सुत हनुमान की जय भगवान श्री कृष्ण चंद्र की जय पंच परमेश्वर ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती एवं गणेश की जय भगवत आदि शंकराचार्य भगवान की जय परम पूज्य गुरुदेव धर्म सम्राट श्रीमद् करपात्री जी महाराज की जय हो श्रीमद् जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर महाराज की जय हो धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो गौ माता की जय हो गौ हत्या बंद हो भारत अखंड हो भारत अखंड हो हर हिंदू सेना हो हर हिंदू सनातनी हो हर हिंदू सेना हो हर हिंदू सनातनी
⬜ Not used yet · 01:17:13:10 – 01:17:50:00 (0:37)
01:17:13:10 हो हम भारत भव्य बनाएंगे हम हिंदू राष्ट्र बनाएंगे नमः पार्वती पतय हर हर महादेव [संगीत]
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क्या ईश्वर पापियों को दंड नहीं देता? अवतार विषय पर आर्य समाज के साथ सैद्धांतिकचर्चा #patna
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