✅ This part is already used · 00:00:02:04 – 00:01:15:06 (1:13)
→ Used in: A · Video क्या ईश्वर सच में सर्वशक्तिमान है? दो टीमों के बीच तीखी बहस! at 0:00 ↗
00:00:02:04 आप जो वीडियो अभी देखने जा रहे हैं, इन वीडियोस में आहान के द्वारा आयोजित की जाने वाली जो ऑनलाइन मीटिंग्स हैं, उसमें आने वाले लर्नर्स के भाव भी व्यक्त किए गए हैं। तो इन वीडियोस को स्ववेक के द्वारा ही देखें। कही जाने वाली किसी भी बात को आह्वान के द्वारा निर्गत बात समझकर ही ना देखें। यह देखें कि उस मीटिंग में वह बात किसके द्वारा कही जा रही है। क्या मेरे द्वारा कही जा रही है या फिर वहां मीटिंग से जुड़ने वाले किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा कही जा रही है जो अभी केवल लर्नर है जो अभी-अभी जुड़ा है या फिर जिसे अभी सार्वभौम सिद्धांतों में जिसकी बहुत ज्यादा गति नहीं है। तो इन वीडियोस को आप प्रेरणा के लिए अवश्य देखें। परंतु कही जाने वाली सभी बातों को प्रमाण्य बुद्धि से ना देखें। उसमें देखें कि कौन सी बात आहान के द्वारा कही जा रही है और कौन सी बात वहां पर जुड़ने वाले किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा कही जा रही है। इन वीडियोस में सामान्य चर्चाएं हैं जिनको बिना किसी फिल्ट्रेशन के आप तक पहुंचाया जा रहा है जिससे कि उन्हें देखकर के जन सामान्य प्रेरित हो और उन अभियानों से जुड़े जिनसे जुड़कर के सामान्य जन आत्म कल्याण व धर्म उत्थान में दोनों में अपनी भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। जय
⬜ Not used yet · 00:01:15:06 – 00:10:20:28 (9:06)
00:01:15:06 श्री राम। जय श्री राम सभी को जी भैया जय श्री राम जो अपना टॉपिक चुना है राम रामा विग्रहान धर्मा तो उसमें यही है कि जैसे श्री राम भगवान जी थे तो जैसे वो रावण पे रावण को अगर वह हराना चाहते तो वह अपनी अयोध्या के वो भी अयोध्या के राजा थे। अपनी सेना लेके उनका वध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने एक धर्म को स्थापित करने के लिए सभी वर्गों को एक साथ किया। माता सबरी के यहां भी गए और केवट जी के भी उन्होंने वो भी संवाद आता है। उसके बाद सभी उसको लेके वो साथ में चले और उसके बाद एक मतलब एक धर्म स्थापित किया। तो सर इतना ही अभी
00:02:09:25 अच्छा बोल रहे हैं भैया आप कंटिन्यू रहिए तो वही सर हमें यही प्रेरणा मिलती है कि इसी यही मेरे को लगता है रामू विग्रहान धर्मा की एक धर्म के साथ सभी लोगों को साथ में लेकर उन्होंने इस चीज के लिए किया तो वही हमें प्रेरणा मिलती है और वही सर हमें अह जब भी कोई काम करते हैं कुछ भी है तो तो वही हमारे प्रेरणा स्रोत रहते हैं कि हमें भी ऐसा मतलब ऐसा नहीं है कि हम अगर सामर्थ्यवान भी हैं तो हम तुरंत वो कर सकते हैं। लेकिन एक धर्म के साथ और अपने जो हमारे मर्यादाएं हैं जो हमारे गुरुजनों ने या किसी ने भी हमें दे रखा है। किस हिसाब से हमें अपने शास्त्रों के अनुसार और वेदों के अनुसार चलना है। उस हिसाब से हमें कार्य करना चाहिए। तो हम [संगीत] सफल होंगे और समाज में एक प्रेरणा का स्रोत धन्यवाद। राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे सहस्र नाम ततुल्यम राम नाम वरानने मेरा नाम अभिषेक गड है। मैं अभी वर्तमान में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग उत्तराखंड में वेद विद्या का अध्ययन
00:03:25:10 कर रहा हूं। अभी शास्त्री तृतीय वर्ष का छात्र हूं। आपके द्वारा प्रदत्त विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने जा रहा हूं। अर्थात हमें हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता क्यों है? हम जानते ही हैं पुरा काल में इस भारतवर्ष के भूमंडल पर बहुत आक्रांताओं का राज रहा। जिसमें हमारे अनेक शाखाओं का लोप हो गया। आपको आश्चर्य होगा कि हमारे चारों वेदों की शाखाएं 10131 शाखाएं उपलब्ध थी। आज उनमें से केवल केवल 10 शाखाओं का
00:04:19:03 को हम देख पा रहे हैं। इसका कारण हमारे आक्रांताओं का इस भारतवर्ष की भूमि पर प्रहार होना और हमने उनको संरक्षण करने का प्रयास तो किया परंतु हम उसमें सफल भी नहीं हो पाए। यह भी अत्यंत विचारणीय वार्ता है। क्यों नहीं सफल हो पाए? और अभी वर्तमान में हम ऐसी ऐसी वैदेशिक परंपराओं के संभाग हो रहे हैं। आप आज वर्तमान की वेशभूषा को देख लीजिए। हम भारतीय वेशभूषा को धारण करने में अत्यंत लज्जा की प्रतीति अनुभव करते हैं। हम अपनी भारतीय संस्कृत के पठनपाठन में अत्यंत लज्जा की अनुभूति का अनुभूति को करते हैं। हम यदि कहीं देखेंगे गुरुकुलों में यह तो केवल पूजा पाठ करता है। यह क्या करेगा? परंतु आपको यह ज्ञात नहीं है। आज यदि भारतीय संस्कृति की संरक्षणा हो रही है
00:05:34:24 तो उसका मुख्य कारण हमारे वैदिक परंपरा का लक्ष्य है। यह वैदिक परंपराएं इस राष्ट्र में जब तक सुरक्षित रहेंग तब तक ही यह भारतवर्ष नहीं तो नहीं। आज आप आहार को देख लीजिए। आप वेशभूषा को देख लीजिए। इतना लुप्तकरण की ओर अग्रस्थित हो रहा है। हमारे शास्त्रों में प्रतिपादित मैं आप सबसे एक आहार के विषय में कुछ प्रस्तुत करना चाहूंगा। क्यों आज हमारी बुद्धि का जो एक स्तर था जो एक सोचने विचारने की जो क्षमता थी जो हमारे शरीर में एक रक्त [हंसी] प्रवाह होता था वीर का वो आज क्यों नहीं हो रहा है? इसका मुख्य कारण है आहार। क्योंकि आहार सबका बिगड़ गया है। कहते हैं आहार शुद्ध सत शुद्धि सत शुद्ध ध्रवा स्मृति अर्थात यदि आहार की शुद्धि हो गई तो स्मृति की
00:06:50:00 शुद्धि हो जाएगी और स्मृति की शुद्धि हो जाएगी तो अनेक अनेक शुद्ध विचारों का प्रकटीकरण हमारे मस्तिष्क के मस्तिष्क के पटल में होगा। मित्रों मैं आप सभी से यही निवेदन करना चाहूंगा कि अपनी संस्कृति परंपरा का संरक्षण और नहीं करेंगे तो हम आने वाले काल में ध्वस्त की ओर अग्रसित हो जाएंगे क्योंकि गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है स्वधर्म निधन श्रेया परधर्मो भया अर्थात यदि अपने धर्म में मर मर जाए अपने धर्म का आचरण करते करते यदि हमारे प्राण चले जाए तब हमारा धर्म श्रेय है परंतु पर धर्म तो भया भया है वह दूसरा धर्म तो हमको हर समय हमको प्रतापित करने वाला है इसलिए और मैं एक विषय को और प्रस्तुत करना चाहूंगा आज इस आभास पटल पर जुड़े सभी से कहना चाहूंगा आज इतना अपराध क्यों हो रहा है। यह इसका मुख्य कारण आज हमारी गौ माता का संरक्षण नहीं है।
00:08:06:16 आज गौ माता पर इतना अपराध हो रहा है। आंखों में अश्रु आ जाते हैं। यदि हिंदुओं यदि एक एक लोग ने गौ माता का संरक्षण करना प्रारंभ कर दिया तो ये जो देश में आज ये जो बुद्धि मलन हो रही है। उसका क्षय हो सकता है। आप देखिए तो जब तक हमारा गौ सुरक्षित थी तब तक हमारा राष्ट्र सुरक्षित था। आज गौ माता का वृत्तरण हो रहा है। आज देखिए तो आप हम लोग एसओ में आराम से सोते हैं। परंतु हम गौ माता के लिए थोड़ा सा अन्य का अन्य का व्यवस्था भी नहीं कर सकते। आप जानिए या स्थान में अनेक गौशालाओं का हमारे संत महात्मा लोग प्रबंध करते हैं। उन गौशालों की संरक्षण कर रहे हैं। यदि आप लोग भी उनमें अपना सहयोग प्रदान करेंगे तो मुझे लगता है जब गौ माता की संरक्षण क्योंकि गौ माता में ही 33 कोटि देवताओं का निवास है। एक यजुर्वेद का चौथे अध्याय
00:09:21:20 का यह मंत्र प्राप्त होता है। जिसमें 33 कोटि देवताओं का वास गौ में बताया है। यदि गौ माता का संरक्षण हां किंचित यदि गौ माता का संरक्षण हमने कर दिया तो अवश्य ही यह हिंदू राष्ट्र एक समय विश्व गुरु की पदवी को प्राप्त कर सकेगा मैं ज्यादा नहीं कहूंगा क्योंकि समय का क्योंकि समय जो होता है वह अधिक मूल्यवान होता है क्योंकि समय के लिए हमारे शास्त्रों ने कहा है आयुष क्षण को नलभ्या कल्प कोटि भी तस्मात सर्व प्रयत्ने क्षण नल अर्थात आयु का एक क्षण भी हजारों करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से भी प्राप्त नहीं हो सकता इसलिए हमें हर क्षण का उपयोग करना चाहिए मैं अपनी वाणी को यही विराम देता हूं अंत में गौ माता की जय
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→ Used in: A · Video क्या ईश्वर पापियों को दंड नहीं देता? अवतार विषय पर आर्य समाज के साथ सैद्धांतिकचर... at 1:16:54 ↗
00:10:20:28 हो धर्म की जय हो अधर्म का विनाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का
⬜ Not used yet · 00:10:27:25 – 00:30:09:00 (19:41)
00:10:27:25 कल्याण हो। गौ माता की रक्षा हो। गौ हत्या बंद हो। पार्वती पत हर हर महादेव। जी जी सर नीलाम भुज श्यामलंगम सीता समारोपित वाम भागम पाणो मासाय चारू छापम नमामि राम रघुवंश। आप सभी जो इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं। आप सभी मेरे विद्वान जन प्रबुद्ध जन है। मैं आपके सामने एक छोटा सा हूं और आपको बता देना चाहता हूं कि प्रथम मंच है जहां मैं अपने विचार प्रकट करने जा रहा हूं तो कोई त्रुटि हो तो समाप्त होगा।
00:11:18:00 विषय पर अर्थात हिंदू राष्ट्र आपकी आवाज अच्छे से नहीं आ रही। कृपया थोड़ा जोर से बोलिएगा। हिंदू राष्ट्र की आवश्यकता क्यों इस पर विचार करने जा रहा हूं। तो ये तो एक प्रत्यक्ष बात है कि आज हम संपूर्ण भारत में जो घटनाएं देख रहे हैं उनके लिए हम अलग-अलग से इन सभी विषयों को उठा नहीं सकते। यदि हम इसके मूल पर ध्यान देंगे जो कि सभी को मालूम है कि यदि भारत हिंदू राष्ट्र होगा तो भारत की जो प्राचीन संस्कृति है जो प्राचीन गुरुकुल प्रणाली है प्राचीन जो गुरु ग्रंथ गोविंद की जो विधाएं चलती आ रही है जिस प्रकार से समाज यहां की अर्थव्यवस्था राज व्यवस्था शिक्षा व्यवस्था सभी प्रकार से संचालित होती आ रही है वो जब भारत पर हिंदू शासकों का राज्य हुआ करता था। भगवान श्री रामचंद्र जी के समय, श्री कृष्ण जी के समय किस प्रकार से उनका राज्य चलता था। यदि हम मनुस्मृति आदि में उनका देखें तो हमें ज्ञात होगा कि निश्चित रूप से यदि भारत
00:12:33:06 हिंदू राष्ट्र घोषित होता है तो हम संपूर्ण विश्व को दिखा सकते हैं कि हिंदू धर्म शास्त्रियों के अनुसार एक राष्ट्र का संचालन किस प्रकार से होना चाहिए। किस प्रकार से वहां की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, वहां की कृषि आदि सब प्रकार की कार्य किस प्रकार से संचालित हो और विकास के नाम पर जो आज विनाश का कार्य किया जा रहा है। हम बता सकते हैं कि प्रकृति के साथ जुड़कर भी विकास कार्य किए जा सकते हैं और उन्नति को राष्ट्र को राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर प्रशस्त किया जा सकता है। अंत में मैं एक दो वाक्यों के साथ अपनी वाणी को यह विश्राम देना चाहूंगा। कि जिस दिन मेरा तीर चलेगा, जिस दिन मेरा तीर चलेगा, सब बाधाएं चीर चलेगा। इस शुष्क धरा पर, इस शुष्क धरा पर तब विजय का नेर चलेगा। तब विजय का नेर चलेगा। जय तू भारतम जय तू संस्कृत जय श्री राम।
00:13:44:00 जी रामो विग्रह धर्म मेरा टॉपिक यह नहीं है। मैंने यह स्टार्टिंग में सेंटेंस बोला है। मेरा टॉपिक है परंपरा प्राप्त सिद्धांत और आधुनिक अपरंपरा प्राप्त सिद्धांत जैसे जी जी करिए माता राम पिता रामचंद्र स्वामी राम रामचंद्र सर्व रामचंद्र दयालु जान तो आज का मेरा विषय है परंपरा प्राप्त और अपरंपरा प्राप्त सिद्धांत अगर हम परंपरा आज के युग में अगर हम बात करें तो मनुष्य चांद तक पहुंच गया है जबकि वो आत्म साक्षात्कार से दूर होता जा रहा है क्योंकि वो अपना जो मूल सिद्धांत है शास्त्र को छोड़कर के विज्ञान को अधिक महत्व देने लगा है। जैसे विज्ञान में कोई भी सिद्धांत शाश्वत नहीं है और जो सनातन सिद्धांत शाश्वत सिद्धांत जो हमें शास्त्रों से प्राप्त होते हैं वो विज्ञान से कभी प्राप्त नहीं हो सकते। क्योंकि विज्ञान का प्रत्येक सिद्धांत खंडनात्मक है। लेकिन आज अगर परंपरा प्राप्त आचार्यों के शरण को छोड़कर के जो लोग मॉडर्न आचार्यों जैसे आधुनिक आचार्यों की शरण में जाने से आचार्य प्रशांत हो गए या स्कन आदि हो गए वो अपने सिद्धांतों को वेरीफाई करने के लिए गुरु गोविंद और ग्रंथ को छोड़ के विज्ञान की शरण लेते हैं। जैसे कल को अगर विज्ञान में कोई ऐसा शोध हो गया तो वो उसको मानेंगे।
00:14:59:01 शास्त्र को नहीं मानेंगे। जिसको लेकर के बात यह है कि उनके पास सनातन सिद्धांत की कमी है और जिसकी वजह से उनका ईश्वर शाश्वत उनका धर्म शाश्वत सिद्ध नहीं होता और ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसलिए हमें परंपरा प्राप्त आचार्य और सिद्धांतों की शरण लेनी चाहिए। जी धन्यवाद। इसका करता हूं स्वयं विश्व से विश्व में आज
00:15:37:25 करीब ये लोगों के जब भी किसी और होती है ये अपने आप के लोगों को बचाने के लिए तैयार हो जाते हैं। और भैया आपकी आवाज कट रही है। आपकी आवाज अच्छे से नहीं आ रही है। देख लीजिए एक बार जैसे कि आज देशों में सूडान और सोमालिया जैसे देशों में अगर क्रिश्चियन लोगों की मृत्यु हो रही है तो उस अमेरिका और बाकी नेटो के देश अपने आप के समर्थन में तुरंत उतर सकते हैं। कहते हैं कि हम लोग इनकी रक्षा के लिए अपने चाहे तो हम लोग इन पर प्रतिकार भी कर सकते हैं। उसी प्रकार आज भारत एक सेकुलर देश है और उसकी वजह से पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं की, बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की और विश्व के कई देशों में जहां पर हिंदू थे उन लोग को संरक्षण नहीं प्राप्त हुआ। आज हम लोग उनको रक्षा नहीं दे सकते क्योंकि हम लोग एक सेकुलर देश है और हम लोगों के अंदर हम लोग हिंदू कंट्री नहीं है। ये हम लोगों की बहुत बड़ी कमी है। दूसरा सनातन आज की नहीं विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। ये जो कुछ धर्म जो 1500 साल पहले या फिर 2000 वर्ष पहले आए थे। इन्होंने अपने नाम पर कई देशों को बना लिया और यह अपने आप की पहचान बहुत समय से करते हैं कि हमारी संस्कृति बहुत अच्छी है। इनकी संस्कृति में एक से एक फोट भरे हैं। लेकिन हमारी इकलौती संस्कृति है जो कि सारे जीवन को
00:16:52:28 बचाना चाहती है। सारे जीवन मूल्यों को बचाना चाहती है। मनुष्य की रक्षा करना चाहती है। यदि शत्रु के परिवार कभी कोई आए जैसे स्वयं राम जी के शत्रु रावण के भाई स्वयं विभीषण जी राम जी के शरण में आए थे। लेकिन हम लोग का हम लोग का मानना है वसुदेव कुटुंबकम और हम लोग उनकी रक्षा करते हैं। शरण में आए की रक्षा हम लोग ने करी है। स्वयं पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी के भाई की रक्षण करी है। ये एक हमारा सिद्धांत है। सबकी रक्षा करना। प्रकृति की हम लोग रक्षा करते हैं। नदियों की रक्षा करते हैं। जो नदियां गंदी रहती है साल भर उन्हें जब हमारे हिंदू संस्कृति के त्यहार होते हैं उनके नाम पर ही उनकी सफाई होती है। नहीं तो उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है। जितने एक्टिविस्ट है ये सब छिप जाते हैं। जितनी महिलाएं हैं उनको भी कोई नहीं देखता है। आज अफगानिस्तान और पाकिस्तान में उनकी पूरी तरह से उनको आजादी इनकी छीन ली गई है। क्योंकि उनको पूरा अपने आप को ढकने के लिए कहा गया है और अफगानिस्तान में तो इस हद तक पार कर दी गई है कि एक छोटा सा नाक के ऊपर छेद दे दिया गया कि वहां से आप लोग देखिएगा उनको पूरा ढकने के लिए कह दिया गया तो हमारे ये कहीं भी अब रक्षण नहीं हो पाएगा यदि हम लोग अपने आप को देख दिखाएंगे नहीं यदि हम लोग अपना सम्मान नहीं कर पाएंगे और बात आई विश्व में हम लोगों को इतिहास भी इतिहास विश्व के लिए बहुत जरूरी
00:18:08:00 होता है हम लोग अपनी पीढ़ियों को अपने बारे में नहीं बता पाएंगे अगर हमारा कोई इतिहास ही नहीं बचेगा जैसे विश्व में वैसे तो हर जगह सनातन धर्म था लेकिन आज भारत में सबसे ज्यादा उसके मंदिर है और उसी प्रकार से और एक से एक हमारे विश्व प्रख्यात मंदिर है और हम लोगों को 1947 में जब आजादी मिली उसके कुछ ही वर्षों में विश्व के सात अजूबों को डिक्लेअ कर दिया गया। भारत की तब इतनी नाम पहचान नहीं थी। नहीं तो सात क्या भारत में 7000 अजूबे रखे हैं। इतने वर्षों बाद जब हिंदू संस्कृति थोड़ी बहुत जागी। लोगों को थोड़ा बहुत पता चला जब अंग्रेजों गुलाम से बाहर आए तो विश्व का सबसे बड़ा मंदिर एंड कोर वाट को हम लोगों का आठवा विश्व का अजूबा बनाया गया है। लेकिन क्या हम भारत में ऐसे अजूबे नहीं है जो हम लोग रक्षा कर सके और हम लोग इकलौते हैं जो त्याग की त्याग की महिमा जानते हैं। त्याग हम लोग करते हैं। स्वयं भगवान श्री कृष्ण वो जानते थे आज मैं अर्जुन के साथ युद्ध करने जा रहा हूं। लेकिन मेरा जो भांजा है अभिमन्यु वो कुरुक्षेत्र की रणभूमि अकेला मारा जाएगा और उनकी स्वयं पांच भांजों समान उनके द्रोपदी के पांच पुत्र जिनका मरण था वो स्वयं जानते थे लेकिन वो कहते थे धर्म के लिए कोई से बड़ा सा बड़ा त्याग देना पड़े तो हम लोग को अवश्य देना चाहिए हम लोगों को रक्षा करनी चाहिए ये जो सांस्कृतिक मूल्य है इनकी हम लोग को रक्षा करनी चाहिए इसी से
00:19:23:01 विश्व बनेगा इसी सनातन राष्ट्र बनेगा हम लोगों को राष्ट्र लेना चाहिए अपने सम्मान के लिए और इतिहास के लिए संस्कृति के लिए विश्व में धरोहर बनने के लिए क्योंकि जब जब भारत अपना सब शक्तिमान था वो उसी पर था सबसे जब अमीर था वो इसी पर था जब वो हिंदू पालन कर रहा था विश्व के बड़े से बड़े विजेता चाहे तो अलेक्जेंडर हो चाहे तो वो मंगोल हो वो हमेशा भारत की सीमा पर आकर रुक गए हैं धन्यवाद मेरा टॉपिक श्री रामो विग्रह धर्म सभी बड़ों को समकक्षों को और छोटों को यशोचित सम्मान एवं प्रेम अब मैं अपना टॉपिक शुरू कर रहा हूं। श्री राम जय राम जय जय राम नमोस्तु रामाय लक्ष्मणाय देव चस जनका वादितो विश्वेश्वरम धर्म मार्ग प्रवर्तकम वंदे श्री हरिहरंदम करत्रम जगत गुरु जय श्री जिस प्रकार से अभी मेरा विषय है धर्म के संबंध में तो आज जैसे हम देखते हैं अधिकांश लोग धर्म का अर्थ ही नहीं जानते बहुत अधिकांश लोग केवल धर्म की परिभाषा के लिए केवल पूजन पद्धति को प्रयोग करते हैं
00:20:38:02 जो कि इसका बहुत संकीर्ण अर्थ है। वास्तव में धर्म का अर्थ है शास्त्रोक्त रूप से किए गए कर्म को ही धर्म कहा जाता है। जैसा कि गुरुदेव बताते हैं उसके अनुसार और यहां पर कर्म को लेकर किसके लिए क्या कर्म होता है? यह भगवान श्री राम से बेहतर कोई बता नहीं सकता। हमारे वास्तविक अगर हीरो हम कहे जाए तो भगवान श्री राम ही है। जिस प्रकार से एक पुत्र का क्या धर्म हो सकता है? शिष्य का क्या धर्म हो सकता है? भाई का क्या धर्म हो सकता है? पिता का क्या धर्म हो सकता है? शत्रु का क्या धर्म हो सकता है? एक शरणागत वत्सल के लिए हमारा क्या धर्म हो सकता है? यह संसार में अगर कोई बता सकता है तो वह केवल भगवान श्री राम है। जिनके अलावा कोई नहीं इस चीज को व्याख्या कर सकता। वो एक ही अकेले सब रूपों में सबसे बेहतर आचरण प्रस्तुत करते हैं। जिस प्रकार से उन्होंने जब माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया और अपने बालपन की अटकेलियां करते हुए गुरु के साथ वन में गए और वहां उनके समस्याओं का समाधान किया। उसके बाद उन्होंने विवाह किया एवं पिता की आज्ञा का पालन किया।
00:21:53:08 पिता के केवल एक वचन मात्र से उन्होंने समस्त साम्राज्य त्याग दिया। जबकि वर्तमान स्थितियां यह है कि साम्राज्य के लिए तो भाई स्वयं का अपने पिता तक का पुत्र का भी हत्या कर देता है। तो इस स्थिति से बचने के लिए हम उनको हमारा आदर्श बिल्कुल मान सकते हैं। उन्होंने फिर आगे बढ़कर वन में गए और समस्त समस्याओं का सामना किया। पशु पक्षियों को जानवरों को उन्होंने मित्र बनाया। रावण जैसा शक्तिशाली उनकी भार का हरण करके ले गया तो उसके साथ पूर्ण युद्ध करके उसको परास्त करके अपनी भार को भी वहां से प्राप्त किया आखिर में जाके एक राजा का कर्तव्य भी निभाया बहुत ही बेहतरीन रूप से अपनी सब सर्वोत्तम सबसे प्रिय माता सीता का भी उन्होंने अपनी जनता के लिए एक आदर्श पुरुष के रूप में त्याग कर दिया इससे बेहतरीन हमारे इतिहास में कभी कोई व्यक्तित्व हो नहीं सकता कोई नहीं हो हम हमारी संतानों को, हमारे मिलने वालों को, हमारे मित्र जनों को सभी को अगर हम ये किसी भी प्रकार से समझा पावे के इन्हें हम हमारे गुरु के रूप में अगर मान ले तो बहुत सारी समस्याएं या मान लीजिए कि सभी समस्याएं हमारी सामान रूप से बिना किसी समस्या के
00:23:08:21 हल हो। ये मेरा छोटा सवाल संदेश था आपके पास। श्री राम जय राम जय जय राम। उठे कि हम जो सो रहे उठे कि हम जो सो रहे अब उन्हें झिझोड़ दें नवीन क्रांति लाकर स्वदेश को नव मोड़ दें। स्वदेश को नव मोड़ दे। जय श्री राम। सर्व धर्मावलंबी जन को सादर प्रणाम। मैं हर्ष श्रीवास्तव विषय सनातनों को कैसे एकजुट किया जाए के सहित आप सभी का अभिवादन करता हूं। साथियों सनातनियों को कैसे एकजुट किया जाए। इस पूर्ण विषय से यह केवल यह मर्म नहीं है कि वर्तमान में स्थापित समाज को एक किया जाए। इनका एक संगठन बनाया जाए बल्कि यह है कि एक ऐसा सशक्त संगठन बनाया जाए जिसके द्वारा मूल उद्देश्य वास्तविकता में निष्पादित हो सके। वास्तविकता में हमारे समाज में सनातन संस्कृति का नित्य निरंतर पल्लवित पोषण हो और वो उनका सतत विकास हो। यह काल की पुकार है कि इस पूरी प्रक्रिया को निष्पादित किया जाए। अच्छा अब यहां पर इसका प्रभाव क्या होगा ये सोचते हैं। क्या हो जब हम जिस हिंदू राष्ट्र की संकल्पना करते हैं वह
00:24:23:25 पूर्ण हो जाए। क्या हो शास्त्रों में जिस समाज की संकल्पना की बात की गई है की गई है वह वास्तविकता में हो जाए। तो कदाचित हमारा मूल उद्देश्य ही पूर्ण हो जाएगा। आहान का मूल उद्देश्य ही पूर्ण हो जाएगा। जिस उद्देश्य से भगवान शंकराचार्य ने दिग दिगंतर में सनातन की धर्म ध्वजा को लहराया था वह उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा और इस पूरी प्रक्रिया की पहली सीढ़ी ही है कि सनातनियों को एकजुट किया जाए। देखिए इस पूरी प्रक्रिया में कई समस्याएं भी हैं। कई कठिनाइयां भी है। पहले जैसे पहली बात वर्तमान में स्थापित समाज में भेदभाव की संस्कृति है। ये भेदभाव परंपराओं से लेकर क्षेत्र से लेकर भाषा से लेकर जातिगत भी है। कदाचित ये भेदभाव समस्या नहीं है। समस्या यह है कि इस भेद से मन में भेद होता है और विखंडन उत्पन्न होता है। दूसरी बात अभी समाज में सनातन संस्कृति में कई आंतरिक और बाह्य हमले हो रहे हैं। विदेशों के द्वारा या फिर हमारे देश में ही द्वारा के लोगों के द्वारा तो ये भी एक समस्या है। तीसरी बात आम जनमानस में सनातन संस्कृति की मूल भावना ही नहीं फैली हुई। वे धर्म उसमें वहां पर धर्म की एक बहुत ही संकीर्ण परिभाषा है जिसका लोग पालन करते हैं। वे कर्मकांड आदि चीजों में ही फंसे रह जाते हैं। तो इस प्रकार जब आम जनमानस
00:25:39:13 सनातन संस्कृति से परिचित ही नहीं है तो वो वास्तविकता में उत्थान की तरफ आगे नहीं बढ़ पाता है। अब साथियों समस्याओं से कठिनाइयों से समाधानों की ओर आते हैं। पहली बात सभी लोगों में सर्वम एकम की भावना को परिनिश्चित करना होगा। जिससे आम जनमानस इस पूर्ण संस्कृति से जुड़ सके और आगे बढ़ सके। दूसरी बात कि हमें जो समाज में जो स्थापित समाज है उनको एकजुट करके आगे बढ़ना होगा। जो भी भेद है वो भेद रहे। उदाहरण के स्वरूप हम समझते हैं कि भगवान शंकराचार्य ने चार दिशाओं में चार पीठ की स्थापना की। इसलिए नहीं कि उनमे भेद हो सके बल्कि इसलिए कि वे चार जगह से एक सनातन संस्कृति को वास्तविकता में आगे बढ़ा सके। तो इस मूल उद्देश्य से जितने भी समाज हैं उनको संगठित करके एक सशक्त संगठन की ओर आगे ले जाया जा सके। इसका प्रभाव यह होगा कि समाज में एक नेतृत्व होगा जिससे कि सभी समस्याओं का सभी हमलों का जो आंतरिक बाह्य हमले हैं उनको उनका समाधान किया जा सकेगा। इसके लिए आन एक अच्छा प्रकल्प है। एक अच्छे समाधान की ओर आगे बढ़ रहा है। आवश्यकता है ऐसे और समस्याओं को लेकर ऐसे और समाधानों को पूर्ण करने का हमें साथ मिलकर छोटे-छोटे गिलहरे
00:26:54:28 प्रयास करने होंगे जो व्यक्ति व्यक्तिगत हो व्यक्ति परख हो जिनका लेकिन जिनका प्रभाव बेहतर हो और अंततः इसी कड़ी में अथर्ववेद की एक सूक्ति कृतम में दक्षिण हस्ते जयो में सव्याहिता अर्थात यदि मेरे दाहिने हाथ में पुरुषार्थ है तो मेरे बाएं हाथ में सफलता रखी हुई है। उस उद्देश्य से आप सभी का आह्वान करता हूं कि हम सभी को मिलकर छोटे छोटे ही सही लेकिन उन महत्वपूर्ण प्रयासों से आगे बढ़ना होगा। शंकर परंपरा के नेतृत्व संभालकर समाज को एकजुट करना होगा और जिस मूल उद्देश्य से हम सभी यहां पर हैं। उस मूल उद्देश्य को पूर्ण करके सनातन संस्कृति को पल्लवित करना होगा। एक सही स्वस्थ समाज की संकल्पना करनी होगी। धन्यवाद जय श्री राम सभी विद्वत जनों को मेरा सादर जय सियाराम मेरा विषय है वर्ण जन्म से अथवा कर्म से तो सर्वप्रथम वर्ण एवं आश्रम यह सनातन धर्म के दो अभिन्न अंग है एवं वर्णिक चार है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य एवं शूद्र इसका प्रथम जिक्र ऋग्वेद में हमें प्राप्त होता है जो श्लोक है ब्राह्मणस मुखम आशित बहुराज्य कृत
00:28:10:04 कुर तदस यद वैश्य पदभ्याम शद्र जायत इस प्रकार से सनातन परंपरा से हमें चार वर्ण प्राप्त होते हैं। सभी वैदिक आर्य हिंदुओं के चार वर्ण है और जैसा कि हम जानते हैं शास्त्रों रूप से सभी अपने जन्म के आधार पर ही वर्ण का निश्चित होता है। उदाहरण के रूप में भगवत गीता में अर्जुन ने भी कहा है कि कुल धर्मा जाति धर्मा शाश्वतः कुल धर्म सनातना और भगवान ने अर्जुन को भी तुम क्षत्रिय हो तुम्हारे लिए धर्म युद्ध ही उचित है एवं वही श्रेयस्कर है। इस प्रकार से जन्म से ही उसको तालुकात कर कर उनको उस कर्तव्य को पालन करने के लिए बताया गया है। उस प्रकार हमें ध्यान देना चाहिए कि जन्म से ही वर्ण प्राप्त होता है। पहले जन्म उसके पश्चात कर्म एवं जिस प्रकार से हम देखते हैं कि कर्म की चर्चा आती है कि केवल और केवल आपके कर्म से ही यह तय होगा आपका वर्ण क्या है तो प्रतिपल में आपका वर्ण परिवर्तित होता जाएगा अगर जन्म के आधार पर हम इसको नहीं देखते हैं और जो भी बाहरी तत्व इस प्रकार के अशास्त्रीय विधानों को तय करती हैं एवं बताती हैं वह सभी सनातन विरोधी हैं क्योंकि हमें परंपरा से जो प्राप्त है उसी का अवलंबन लेना चाहिए जिस प्रकार धर्म का भी परिभाषा
00:29:25:13 है कि परंपरागतम प्राप्त इति धर्म एवं धारति इति धर्म तो उन सब वाक्यों को हमें अपने जीवन में अवलंबन करना चाहिए एवं उसका पालन करना चाहिए। उसके अतिरिक्त मैं यह कहना चाहूंगा कि वर्णों में किसी के भी प्रति हीन भावना का विषय कभी नहीं है। यह भेद वास्तव में मंगल कारक है। सभी अपने जन्म के आधार पर उस कर्तव्य का पालन करेंगे एवं अपने जीवन को धर्म युक्त बनाएंगे और मोक्षदायक बनाएंगे। यह शास्त्रीय विधान है। इस प्रकार से हमें धर्म युक्त होकर ही जन्म के आधार पर वर्ण को मानना चाहिए।
00:30:07:24 [संगीत]
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भाषण प्रतियोगिता: भगवान आद्य शङ्कराचार्य कैलाशगमन दिवस २५००वीं वर्षगॉंठ पर विशेष आयोजन।
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