⬜ Not used yet · 00:00:01:28 – 00:28:22:00 (28:20)
00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] कि जैसे हमने कहा कि ईश्वर अवतार इसलिए नहीं ले सकता कि एक तो वो सर्व्यापक है। जी दूसरा वो पहले से ही है तो उसका आना जाना सिद्ध नहीं होता है। और तीसरा उसको आवश्यकता नहीं है। जी। अच्छा एक क्वेश्चन यहां पर अभी भी ये शेष है कि यदि किसी भी कारण से किसी भी कारण से उसकी कार्यों की कार्य क्षमता की कोई सीमा है तो फिर उसके वो ईश्वर ही माना जाएगा। कोई दिक्कत नहीं है। मगर उसके सामने से अनंत सामर्थ्यवान तो हटाना पड़ेगा क्योंकि अंत हो रहा है कि कोई कुछ कार्य ऐसे हैं जो नहीं कर पा रहा है। नहीं ठीक है मैं इनको पहले ले लूं वो अनंत को छोड़ देते हैं। जी अब जी अब हमने देखा कि सर्व्यापक आपने एक बात कही कि उसको अधिक अथवा न्यून होना पड़ेगा तभी वो एक देश हो सकता है। जी तो जैसे हम देखते हैं कि ईश्वर पृथ्वी सृष्टि की जब रचना करते हैं तो कहीं पे वो सूर्य बना रहे हैं। जी कहीं पे वो अ क्या कहते हैं? चंद्रमा बना रहे हैं, पृथ्वी बना रहे हैं। तो अब इसमें बात ये आती है कि सूर्य को बनाने में फोर्स ज्यादा चाहिए और पृथ्वी को बनाने में फोर्स कम चाहिए। जी। जो ईश्वर है अपनी शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है। चंद्रमा को बना रहा है। सूर्य को बना रहा है तो वो खुद को
00:01:17:15 जो एक रस था अब वो कहीं पर कम ज्यादा होकर के कार्य कर रहा है या नहीं? नहीं। ईश्वर हम जैसे हम लोग कार्य करते हैं उस तरीके से हाथ पैरों से कार्य नहीं करता। नहीं वो नहीं कह रहा हूं। ईश्वर को दर्शनों में बताया ईश्वर की इच्छण इच्छा के माध्यम से केवल इच्छा मात्र से सारे संसार रचना हो जाती है। उसे करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इच्छा मात्र से ही तो वो सिर्फ इच्छा करता है। इच्छा कुछ नहीं। इच्छा मात्र से ही सारी रचना हो जाती है और इच्छा मात्र से इसका प्रलय भी हो जाता है और यह सृष्टि का एक क्रम है अनादि काल से अनादि इसका सिस्टम है कि कितने दिन तक इसको रहना है कितने दिन तक इसको प्रलय में जाना है ये व्यवस्था उसकी बनी हुई है सुचारू रूप से मतलब ईश्वर केवल सोचता है करता कुछ नहीं है नहीं ये उसका करना ही हो गया क्योंकि करने लगेगा तो परम ऐश्वर्यवान नहीं होगा वो अगर हमारे जैसे हाथ पैरों से क्रियाकलाप करने लगेगा नहीं हाथ पैरों से नहीं तो पैरों तो वो परम ऐश्वरी नहीं हो सकता मतलब उसकी कोई फोर्स का जैसे जैसे जैसे एकदम आज प्रधानमंत्री है जी प्रधानमंत्री इतनी व्यवस्था राष्ट्र का देख रहा है तो क्या वो सारे कार्य अपने आप करने आ रहा है नहीं अपने आप नहीं करने आ रहा है लेकिन उसकी इच्छा मात्र से ही वो इच्छा अपनी व्यक्त करता है परमात्मा को व्यक्त भी नहीं करना पड़ता है
00:02:32:21 प्रधानमंत्री अपनी इच्छा व्यक्त करता है और संबंधित अधिकारी उस क्रिया को करने लग जाता इसको जैसे थोड़ा सा समझ ऐसे ही ऐसे ही प्रकृति है परमात्मा की जो प्रकृति है यह स्वयं में कार्यकर्ता मान लीजिए प्रकृति कार्य करती है। प्रकृति कार्य करती है। उसकी इच्छा मात्र से ही वो प्रकृति में वैसे रचना शुरू हो जाती। तो जड़ है ना जड़ है। जड़ तो है। वो बुद्ध वो संदेश लेती है क्या ईश्वर? नहीं नहीं संदेश नहीं लेती। तरीके से जैसे आपने कहा कि ईश्वर एक देश हो जाएगा। हां। है ना? तो जैसे किसी देश काल परिस्थिति में ऋषि मंत्र के दृष्टा बनते हैं। हां अब जो मंत्र के दृष्टा बन रहे हैं ऋषि गण तो वो जो मंत्रों का ज्ञान है है ना? अच्छा ईश्वर सब जगह है। इसका मतलब सब जगह सर्व व्यापक था। ईश्वर पहले से ही ऋषियों के मन में भी व्यापक था। ठीक है? जी मगर फिर भी वह एक देश होकर ऋषियों के मन में मंत्रों को प्रकाशित कर रहा है। नहीं एक जगह होकर के नहीं किया उसने। उसने सृष्टि के आरंभ में चार ऋषियों के हृदय में ऋग्वेद जो है अग्नि ऋषि एक साथ मंत्र प्रकाशित हुए। हां एक साथ पूरी दुनिया में जी
00:03:48:00 मतलब सबने मंत्रों के दृष्टा है। उस समय जितने प्राणी थे चार चार ऋषि चार ऋषि मंत्र के दृष्टा बन रहे हैं। एक देश हो रहा है। अग्नि बाई आदि आदित्य अंगीरा चार ऋषि शुरू। यहां पे एक देश कार्य हो रहा है ना। कहां एक ऋषि कार्य कहां हो रहा? चार ऋषियों ने ही तो देखा मंत्रियों ने। उस समय कुत्ते हैं, बिल्ली हैं, चूहे इन्होंने तो नहीं देखा। वो वो वो सृष्टि के आदि की मैं बात कर रहा हूं। उस समय सब कुछ नहीं था। इतना केवल चार ऋषि थे। प्रारंभ में जो है मनुष्य की सृष्टि होती है। तब जो है वो बच्चे के रूप में नहीं होता है। युवा युवती के रूप में जो है सृष्टि होती है। नहीं वो ठीक है। मैं ये युवा युवती के रूप में जी कि जब ईश्वर सब जगह है तो उसका ज्ञान भी सब जगह है ना। सब सर्वव्यापक है। फिर भी वो किसी एक देश में ऋषियों के मन में प्रकट हो रहा है वो ज्ञान। तो वो ज्ञान जबकि पहले से ही है उसके उनके मन में ईश्वर के रूप में। जी ठीक है। फिर भी वो एक देश में प्रकट हो रहा है। एक देश में नहीं चार ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ। उसके अलावा उसके बाद उन्होंने ब्रह्मा ब्रह्मा ने लिया। चार ऋषियों के अलावा और कोई था उस समय। वो चार चार ऋषियों के अलावा कोई नहीं था। उस समय केवल चार ऋषि ही प्राणी थे। चार ऋषि थे। और उन्हीं के मन में ज्ञान के मन में उन्हीं को ज्ञान प्राप्त हुआ। अच्छा ब्रह्मा को प्राप्त हुआ है। उनके द्वारा ब्रह्मा को फिर ब्रह्मा के द्वारा श्रुत परंपरा से एक दूसरे को सुना करके
00:05:03:06 इसलिए इसके वेदों का नाम एक नाम श्रुति भी है। हां सुन के फिर इसका जो है विस्तार होता चला गया। जी तो चलिए इसका दूसरा उदाहरण ले लेते हैं। जैसे कि ईश्वर जब सृष्टि बनाते हैं तो वो कहीं पे पृथ्वी बना रहे हैं, कहीं पे सूर्य बना रहे हैं, कहीं कुछ बना रहे हैं। तो ऐसा होता है कि कहीं पे ज्यादा शक्ति की आवश्यकता है और कहीं पे कम शक्ति की आवश्यकता है। अब शक्ति के रूप में भी ईश्वर ही तो है। नहीं ये हम आप सोच रहे हैं जी। कि कहीं ज्यादा शक्ति की आवश्यकता है, कहीं कम शक्ति की आवश्यकता है। वेदों में एक मंत्र आता है जो ओम सूर चंद्रम सौ धाता यथा पूर्वम कल्पयत सूर्य चंद्र पृथ्वी समुद्र जैसे यथा पूर्व जैसे इसके पूर्व के कल्प में था प्रलय के पूर्व उसी तरह से फिर से जो उसकी जो है उसकी सृष्टि होती है हम और जब प्रलय होता है तो बीज रूप में ये सब आ जाते हैं। नहीं नहीं सृष्टि वो होती है वो सही बात है। मगर मैं ये कह रहा हूं जहां पे बड़ी चीजें करनी है तो वहां पे ईश्वर ज्यादा शक्ति ईश्वर शक्ति जो लग रही है आप हम समझ रहे हैं कि वो बड़ी शक्ति है। हम उसके लिए सब कुछ बराबर है। सूर्य बनाया, चंद्रमा बनाया, पृथ्वी बनाया, समुद्र बनाया, पर्वत बनाया, पशु पक्षी बनाया। यानी हमारी
00:06:18:14 समझ में ईश्वर जो है कम ज्यादा हो सकता है। हमारी समझ में नहीं हम समझ रहे हैं लेकिन वो है नहीं। नहीं तो ऐसे ही तो अवतार हैं। नहीं अवतार हो जाने। जैसे जैसे जैसे जैसे कि हम समझ रहे हैं ये जो लौकिक संसार है अविद्या रूपी है वास्तविकता तो ऐसी नहीं है। कोई ऐसा गेट तो खुलता नहीं है जिसमें हम लोग मुक्ति के बाद उसमें प्रवेश कर जाते हो। केवल समझ का फर्क आता है ना अविद्या से मुक्त हो जाते हैं। तो जब तक अविद्या में है इस अविद्या रूपी संसार में हमारी समझ के अनुसार हमारे पर्सपेक्टिव के अनुसार ईश्वर का आना जाना सिद्ध हो सकता है। जब हम यह कह रहे हैं कि हमारी समझ के अनुसार ईश्वर कम ज्यादा होकर के कार्य कर रहा है। कर नहीं रहा। हमारी समझ के हम समझते हैं कि वो ऐसा कर रहा है लेकिन वो ऐसा कर नहीं रहा है। हमारी समझ हम अल्पज्ञ हैं। इसके बारे में पूरी तरह नहीं जानते हैं। इसलिए हमारी दृष्टि में इस तरह का इस तरह की चीजें हो रही हैं। मतलब ईश्वर सब जगह एक साथ एक बराबर कार्य कर रहा है। बिल्कुल फिर भी कहीं पे कम कहीं पे पृथ्वी बन जा रही है। कहीं पे सूर्य बन जा रहा है। नहीं सूर्य अलग बना है। पृथ्वी अलग बनी है। आप समझे नहीं मेरी बात। जैसे अगर ईश्वर बिल्कुल एक रस है। उसकी शक्ति बिल्कुल एक रस है। अब वो जैसे ही हरकत करेगा तो पूरे संसार में एक साथ सब जगह एक ही हरकत होगी। जी तो फिर कुछ बन सकता है ऐसे में? ईश्वर जो है सृष्टि जब करता है तो एक साथ सारी चीजों को बनाया उसने।
00:07:33:15 क्रमश बनाए, समुद्र बने, समुद्र बने, पर्वत बने, सूर्य बने, चंद्रमा बने, फिर वनस्पतियां होगी, जीव-जंतु बने। वो सब क्रमबद्ध रूप से जो है बने। वो सही है। जैसे मान लीजिए कि सपोज़ करिए कि मिट्टी के कण तैर रहे हैं आकाश मंडल में। ठीक है? अब ईश्वर सर्वत्र एक समान रूप से सब जगह व्याप्त है। बराबर मात्रा में। वो तो अब वो अब वो यदि अपने आप को रेगुलेट नहीं कर सकता कि मैं इस जगह पे ज्यादा हिलूं। इस जगह पे कम हिलूं। ठीक है? इस जगह पे मेरी हरकत ज्यादा हो, इस जगह पे कम हो। अगर वो रेगुलेट तो सब जगह वो एक ही साथ हरकत करेगा। तो कोई शेप कुछ भी स्ट्रक्चर कैसे बनेगा फिर भाई वो साकार होगा तब ना कहीं पर जो कम करेगा कहीं पर ज्यादा करेगा वो सर्वव्यापक है हर जगह विद्यमान है इसलिए उसको अतिरिक्त शक्ति लगाने की जरूरत ही नहीं है नहीं अतिरिक्त नहीं कह रहा हूं जैसे कहीं पर वो जैसे मान लीजिए कि उसको कहीं पे प्रलय लानी है उसी समय दूसरी जगह प्रलय नहीं लानी है नहीं प्रलय का तो तात्पर्य कि संपूर्ण संपूर्ण सृष्टि का विलय वो छोटी प्रलय मैं मैं कह रहा हूं समुद्र में वो लाना है उसको क्या कहते हैं सुनामी उसको कहीं पे सुनामी लाना है। ठीक है? समुद्र में तूफान लाना है। तो उसी समय दूसरी जगह पे तूफान नहीं आ रहा है। तो वहां पे भी तो ईश्वर है। मगर वहां पे वो
00:08:48:19 अपने आप को रोक रहा है। तो वो सुनामी ईश्वर थोड़ी लाता है। चाहे जो है इस तरह ये तो है तमाम जो प्रदूषण है और जो ओजोन परत में क्षरण हो रहा है। तमाम जो है वो गैस उत्सर्जित हो रहे हैं। उनके कारण जो है ये संसार में जो है तरह तरह-तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं। ईश्वर की शक्ति के बिना आ जाती है। चाहिए क्या सुनामी? ईश्वर वो थोड़ी कर रहा है। हम अगर जो है प्रदूषण का प्रदूषित वातावरण को कर रहे हैं। कर्मों का फल भी तो हो सकता है ना सुनामी आना। किसका? नहीं जो हम कर रहे हैं तू तो है ही फल। फल है ना मगर वही मगर दे कौन रहा है फल? हां। ईश्वर ही तो दे रहा है। माने हम तो हम ईश्वर ईश्वर दे फल क्या दे रहा है? वो फल का हम तो अपना परिणाम उसका भुगत रहे हैं। नहीं पैसा हमने किया उसका देता कौन है? कर्मों का फल ईश्वर ही तो देता है। बिल्कुल देता है ईश्वर। तो जो जो सुनामी इत्यादि आ रही है हमारे दोष के कारण वो दे तो ईश्वर ही रहा है ना प्रकृति अपने आप कर लेती है कार्य प्रकृति क्या कर रही है हमने जो उस तरह का वातावरण बनाया तो उस तरह का रिजल्ट हम भोग रहे हैं तो रिजल्ट देने वाला तो भगवान ही है ना रिजल्ट जो है संपूर्ण रूप में तो देने वाला भगवान है लेकिन ऐसा थोड़ी कि जैसे हम हम जो है यहां पर बैठे हुए हैं और हमने खाना खाने के बाद उसमें विष मिला लिया विष मिला दिया तो थोड़ा जो है ईश्वर ईश्वर ने वो वो परिणाम हमको थोड़ा ईश्वर दे रहा है वो तो भौतिक रूप हमें
00:10:03:20 दिख रहा है कि क्या हो रहा है। अगर एट द एंड ये भी तो भौतिक है। एट द एंड जहां सुनामी आना भूकंप आना ये सब तो जो है प्राकृतिक प्राकृतिक आपला है। तो सुनामी बिना मतलब सुनामी आने में ईश्वर की शक्ति का उपयोग नहीं होता है। बिल्कुल नहीं होता है। बिना ईश्वर की शक्ति के सुनामी आती है। माने हमने जो जिस तरह का वातावरण बनाया उसके चलते जो विकृतियां उत्पन्न हो रही है। मतलब ईश्वर का उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं है। तो जब हमने वातावरण बनाया तो हमारे ही कर्मों का फल तो देता है। ईश्वर अभी आप कह रहे हो बिल्कुल कर्म का फल कर्म का फल मिल रहा है वो ईश्वर ही तो दे रहा है अब आप इस तरह से उसकी उसको कह सकते हैं लेकिन ऐसा है नहीं वो तो जो है हमारे द्वारा हमने उत्पन्न किया है तत्काल हम उसका परिणाम भुगत रहे हैं हां हम तो शुभ जो कर मतलब जैसे दुनिया में प्राकृतिक जो भी चीजें होती है वो अपने आप होती है ईश्वर का उसमें कोई रोल नहीं है प्राकृतिक चीजों का मैं नहीं कह रहा हूं वो प्राकृतिक चीज नहीं है वो तो जो कृत्रिम प्राकृतिक चीज मान लीजिए वो तो कृत्रिम हो गया चलिए मान लीजिए प्राकृतिक मान लीजिए कहीं पे हवा चली कहीं पे नहीं चली। ये तो प्राकृतिक है। हां। ठीक है। तो ये जो हवा चलाई ये तो ईश्वर ने चलाई। नहीं हम ईश्वर ने नहीं चलाई। किसने चलाई? अब यहां पर ज्यादा वाष्पीकरण हो गया हम तो नीचे की हवा ऊपर उठ रही तो बाहर की हवा जो है तेजी के साथ आएगी। उससे आंधी उत्पन्न हो जाता है। तो वो तो जो
00:11:18:24 है भौगोलिक कारण उसके आप बार-बार वैज्ञानिक आधार पर जो है ईश्वर का खंडन कर दे रहे हैं। ईश्वर कर क्या रहा है फिर? तो हम खंडन कहां कर रहे हैं? वैज्ञानिक आधार पर। ईश्वर क्या कर रहा है फिर? विज्ञान वैज्ञानिक आधार पर तो ईश्वर का परिपुष्टि हो जाती है। भाई स्थिति कहां है? ईश्वर जो आप कह रहे हो ना स्थिति संचालन हां संचालन वाला कार्य नहीं है ईश्वर का। बिल्कुल संचालन हवा चल रही है तो वो नहीं चला रहा। संचालन ईश्वर का ये है कि सूर्य है, चंद्र है, पृथ्वी है सभी अपने-अपने धुरी पर घूम रहे हैं। ये उसकी व्यवस्था है। उस व्यवस्था में कहीं व्यतिक्रम नहीं हो रहा है। व्यतिक्रम होता तो सब कुछ नष्ट हो जाता है। ये उसकी व्यवस्था है। तो ये भी तो उसकी व्यवस्था है कि कहीं पे हवा चल रही है, कहीं पे नहीं चल रही है। नहीं ये उसकी व्यवस्था नहीं है। अच्छा। ये उसकी व्यवस्था नहीं ये प्राकृतिक है। अच्छा तो ये प्रकृति अपने आप निर्णय ले रही है। नहीं प्रकृति अपने आप निर्णय नहीं ले रही। किसने लिया निर्णय कि ऐसा होने पे ऐसा होगा? ये तो वैज्ञानिक है। विज्ञान के आधार पर जो है विज्ञान ईश्वर का निर्णय नहीं है। हां ईश्वर के उसमें निर्णय नहीं है। अच्छा ठीक है। एक चीज ये बताइए जैसे चलिए कहीं पे पृथ्वी घूम रही है और कहीं पे दूसरा कोई ग्रह जुपिटर घूम रहा है। जी उसमें तो कम ज्यादा एनर्जी है। [गला साफ़ करने की आवाज़] पृथ्वी के घूमने में एनर्जी कम लग रही है। हां। और जुपिटर के घूमने पे ज्यादा लग रही है। जी। ये तो मानेंगे। हां। तो यहां तो ईश्वर की शक्ति कम ज्यादा हुई। कहां पर? ईश्वर की शक्ति कम ज्यादा हुई। ईश्वर ने हम जहां जो उचित
00:12:33:27 था पृथ्वी को के अंदर कितना गुरुत्वाकर्षण शक्ति देना था हम सूर्य को पृथ्वी से कितनी दूरी पर रखना था ताकि जीव जंतु मरे नहीं उसके ताप से हां तो ये एक व्यवस्था उसने दिया है नहीं व्यवस्था दिया है मगर अपने आप को उसने कम ज्यादा किया ना अपने आप को जहां कार्य ज्यादा होना है वहां ज्यादा कम होना है तो उसने अपने आप को कम ज्यादा हम समझ रहे हैं कि कम ज्यादा काम हो रहा है ना उसने जो व्यवस्था दिया है उसके अनुसार ये हो रहा है कम ज्यादा नहीं हो रहा हम तो मुझे साहब समझाइए ना जैसे मान लीजिए कि पृथ्वी को घुमाने में 10 नंबर की ऊर्जा लगेगी। जुपिटर को घुमाने में 60 नंबर की ऊर्जा लगेगी। अब ये ऊर्जा के रूप में ईश्वर ही तो है। बिल्कुल है। तो कम ज्यादा हुआ ना यहां 10 नंबर और वहां 60 नंबर। हां तो कम ज्यादा हुआ ना? तो जहां जहां जितनी शक्ति की आवश्यकता है उतनी और कहीं-कहीं पे ऐसा भी होगा कि ईश्वर को एनर्जी लगा ही नहीं रहा है। यहां लग रही है। यहां लग ही नहीं रही। ऐसा भी होगा। देखिए ये सब जड़ हैं। हम्म। जितने गर्म तभी करेंगे जब भगवान शक्ति देंगे। हां। वो जब तक चेतन उसमें नहीं लगेगा तब तक उसके अंदर शक्ति नहीं आएगी तब तक उसके अंदर संचलन नहीं होगा सुनामी आने में कौन सा चेतन लगा क्या चीज सुनामी आने में किसका चेतन लगा सुनामी नहीं आने में चेतन सुनामी तो प्राकृतिक रूप से जो हमने बताया आपको उसके कारण आ गया चेतन की जरूरत नहीं है उस जड़ को
00:13:49:06 किसको सुनामी आने में उस जड़ को चेतन की क्या जरूरत है चेतन ने जो प्रकृति का दोहन किया उसके कारण जो ये सब हो रहा है अरे चेतन को जड़ को चेतन की आवश्यकता कता है कि नहीं कार्य करने के लिए? बिल्कुल है। तो आप वहां पे तो पानी जो सुनामी आ रहा है उसमें नहीं मान रहे हो। तो कह तो रहे हैं कि चेतन किसका चेतना लगी? चेतन ने जो कुकृत किया है उसी का परिणाम है। मतलब मनुष्य ने चाहा कि ऐसा हो। चाहा नहीं है। मनुष्य ने जो है वातावरण को प्रदूषित कर दिया। हम उसके कारण ये चीजें उत्पन्न हो गई। हम्। अच्छा ठीक है। तो जुपिटर पे आ जाते हैं। आइए जो अह क्या कहते हैं यह पृथ्वी जहां पे हमने माना कि यहां पे 10 नंबर ऊर्जा लग रही है और जुपिटर में लग रही है 60 नंबर। तो ऊर्जा के रूप में स्वयं ईश्वर ही है क्योंकि तीन ही तत्व हैं। है ना? जीव, ब्रह्म और प्रकृति। ईश्वर, जीव, प्रकृति है। हम तो जब ऊर्जा के रूप में ईश्वर ही है तो ईश्वर अपने आप को कर रहा है ना कि यहां पे मैं ज्यादा हूं। यहां पे मैं कम हूं। अपने आप को रेगुलेट कर रहा है। ईश्वर ज्यादा कम कहां है भाई साहब? ईश्वर तो सब जगह ऊर्जा ऊर्जा के रूप में कौन है भाई साहब? हां ऊर्जा के रूप में कौन है? ऊर्जा उससे आती है। ऊर्जा उससे आती है। मतलब ऊर्जा एक अलग तत्व है। हां ऊर्जा अलग-अलग तत्व है। बिल्कुल। मतलब जीव ब्रह्म प्रकृति के अलावा एक तत्व
00:15:04:09 और है। ऊर्जा वो अलग तत्व नहीं। नहीं ईश्वर जीव प्रकृति से अलग तत्व नहीं। तत्व के ना आप कह सकते हैं। लेकिन जो है वो अलग से सत्ता नहीं है। तो क्या है वो? यह ऊर्जा जहां से ऊर्जा का ऊर्जा का आदि स्रोत जो है इस जैसे सूर्य में जो जैसे मान लीजिए सूर्य में जो ताप आए ऊर्जा आए ईश्वर से जैसे मान लीजिए ये जड़ है पृथ्वी ठीक है अब इसको घुमाना है ठीक है अब फोर्स चाहिए इसको बाह्य फोर्स तभी ये घूमेगी जी तो ईश्वर शक्ति के रूप में ईश्वर ही तो कार्य कर रहा है उसको घुमाने का ईश्वर ने व्यवस्था दे दी जो कि निरंतर चल रहा है अरे तो वो शक्ति के रूप में ईश्वर ही तो है ना निरंतर जो चल है। अब जैसे सूर्य है। हां। सूर्य की परिक्रमा जो है पृथ्वी कर रही है। हां। तो सूर्य के अंदर जैसे कि किसी चीज में ताप दिया जाए ताप दिया जाए तो देखेंगे उसमें संचरण होने लग जाता है। तो सूर्य के कारण जो है पृथ्वी जो घूमने लग जाती है अपनी दूरी पर घूम रही है। पृथ्वी के चारों तरफ जो है चंद्रमा चक्कर काट रहा है। तो ये व्यवस्था व्यवस्था दी गई जिसके कारण हो रहा है। तो व्यवस्था हो रही है। उसको जो हो रहा है उसमें तो ईश्वर अलग-अलग आंख नहीं कर रहा है। अलग-अलग नहीं थोड़ी कर रहा है। वहां ज्यादा शक्ति दे दिया। यहां कम शक्ति दे दिया। उसने एक व्यवस्था बना दिया। उस व्यवस्था के अंतर्गत ये सब हो रहा है। ईश्वर
00:16:19:15 तो सब जगह 100% है ना बिल्कुल वो तो मंत्र कह रहा है ईवासम सर्वम वो 100% है जब हर जगह तो जहां [नाक से की जाने वाली आवाज़] पे कम शक्ति यूज़ हो रही है जहां ज्यादा शक्ति यूज़ हो रही है तो यहां पे वो अपने आप को कम ज्यादा करने वाला हो गया ना तो उसने इस तरह की व्यवस्था ही बनाई है कि कम 40 और ले ये कहीं पे लिखा हुआ है क्या कि जो है उस जिस समय चार ऋषियों ने मंत्र की दृष्टा बने उस समय कोई और प्राणी नहीं था हां वो वेदों में आया है ना वेद का ही मंत्र है वेद का ही मंत्र है हमको वो मंत्र याद नहीं है कि ऋग्वेद जो है अग्नि ऋषि को यज नहीं नहीं उनके अलावा कोई और प्राणी था ही नहीं दुनिया में। हां ये जो है वेदों में ही है। कहां पे? अब इस समय तो हमको ध्यान देना। ठीक है। ऐसे मान लेते हैं कि अभी भी ठीक है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] ईश्वर सब जगह है। तो हमारे दिमाग में भी है। फिर भी किसी किसी के दिमाग में वो वेदों के मंत्र प्रकट होते हैं। है ना? वो पढ़ के ही होते हैं। मगर किसी किसी के मन में तो एक देश हो रहा है ना मनुष्य जो ईश्वर का ज्ञान है। एक देसी कहां हो रहा है? क्यों? ईश्वर तो सब जगह है बराबर रूप से। सर्वव्यापक है। सर्व्यापक तो लोगों के मन में भी है। पर प्रारंभ में चार ऋषियों को ये ज्ञान अभी अभी की बात कर रहा हूं। क्योंकि वो एक मामला वो हो गया कि चार ऋषियों के अलावा और दूसरा प्राणी था कि नहीं था? दूसरे प्राणी
00:17:34:24 जो मंत्र के दष्टा बने। हां। मंत्र के दृष्टा बने। ये चार ऋषि थे। है ना? तो चार चार ऋषि ही थे। उनके अलावा और कोई प्राणी दुनिया में था ही नहीं। सृष्टि में था ही नहीं। नहीं ये थोड़ा हम कह रहे हैं कि नहीं था। तो फिर उनके मन में क्यों नहीं आया वो? क्या जी ईश्वर सब जगह है ना? यही चार ऋषि जो है योग्य थे जिनके अंदर जो ईश्वर चाहे तो स्वयं को एक ही कर सकता है। नहीं कैसे कर सकता है? आपने कहा ना यही चार ऋषि योग्य थे। इनके मन में इसलिए आया। ये योग्य थे। हर तरह से जो है पवित्र थे। इसलिए उनके अंदर ये पवित्र ज्ञान आया। उनके हृदय में ज्ञान दिया गया। तो ईश्वर अपने आप को अपनी शक्तियों को एक देसीय कर सकता है ना? नहीं एक देसी नहीं कर सकता। एक देश हो तो रही है। ज्ञान दिया इसका मतलब थोड़ी एक देसी हो गया। तो मैं आपको पूछ रहा हूं जब ऋषियों के मन में वो ज्ञान आ रहा है तो दूसरों के मन में क्यों नहीं आ रहा है? तो दूसरों के फिर उसके द्वारा तो प्रसारित हुआ ही सबके ज्ञान में। दूसरों के मन में क्यों नहीं आ रहा है? ईश्वर तो सब जगह है ना। प्रारंभ में उन्हीं चार ऋषियों को हुआ। मैं वो पूछ रहा हूं कि दूसरों के मन में क्यों नहीं आ रहा है? दूसरों के मन में कैसे आता है? दूसरी यही चार ऋषियों यानी ईश्वर ने ये चाहा कि मैं इन्हीं चार ऋषियों में ही प्रकट करूं ज्ञान तो ज्ञान के रूप में वो भी तो था क्या ईश्वर भी तो था ज्ञान के रूप में पहले से ईश्वर तो थे ही सर्वत्र है ना फिर भी ज्ञान केवल चार ही ऋषियों में आया और जो बाकी के प्राणी है उसमें नहीं आया वैसे आपने कहा
00:18:49:27 कि और कोई प्राणी था ही नहीं नहीं नहीं ये मैंने कहा अच्छा ठीक है ये मैंने नहीं कहा कि प्राणी नहीं था तो दूसरे प्राणियों के मन में क्यों नहीं आया दूसरे मनुष्य ही मननशील प्राणी है विवेकशील प्राणी है तो चार ऋषियों के अलावा और कोई मनुष्य नहीं था उस समय दुनिया चार ऋषि प्रारंभ में जो थे और लोग भी थे लेकिन सबसे योग्य यही थे जिनके वो तो यानी ईश्वर ईश्वर चाहे तो ऐसा कर सकता है कि मैं यहां पे प्रकट हूं यहां पे ना हूं अप्रकट हूं नहीं ये कहां है तो वो हो तो रहा है ज्ञान वो पहले से सब जगह नहीं ज्ञान ज्ञान जो है चार ऋषियों को दिया तो वो ज्ञान लेकिन वो इसका मतलब थोड़ी कि वो प्रकट हुआ प्रकट हुआ ना उसने अपना ज्ञान दिया उसने अपना जो ज्ञान चारों वेदों का ज्ञान जो है ज्ञान जो ज्ञान वो देख रहे हैं मंत्रों के दृष्टा बन रहे हैं। हम वो ज्ञान उनके अंदर पहले से भी था ना। ईश्वर ईश्वर के रूप में ईश्वर के अंदर ज्ञान है ना? ईश्वर के अंदर ज्ञान है। ईश्वर सब जगह है। हां। ईश्वर उनके मन में भी है। हां। मगर अभी वो नहीं जानते। नहीं जानते। उसके बाद एक दिन ईश्वर ऐसा करता है कि जो मंत्र हैं वो उसके दृष्टा बन जाते हैं। यानी कि किसी देश काल परिस्थिति में ईश्वर ने अपने आप को प्रकट किया अपने ज्ञान को। सृष्टि के आदि में हम सृष्टि के आदि में चार ऋषियों को ये ज्ञान प्रकट हुआ। तो उसने अपने आप को एक देश किया ना? नहीं एक देसी नहीं किया। तो यानी कि और जगह भी प्रकट हुआ होगा वो सब जगह जितने भी और प्राणी होंगे
00:20:05:15 प्रकट कहां हुआ वो तो प्रकट तो हुआ ही नहीं प्रकट क्यों होगा वो अपने ज्ञान को प्रकट किया कि नहीं अपने ज्ञान को दिया ज्ञान का जो है उनको ज्ञान चारों वेदों का ज्ञान उन लोगों को हुआ एक देश एक देश किया ना अपना ज्ञान एक देशीय नहीं होगा ये अरे एक तो फिर औरों को भी प्रकट होना चाहिए वो औरों को कैसे प्रकट होगा ये चार ऋषि ही योग्य थे जिनके यानी कि योग्यता के आधार पे ईश्वर सेलेक्ट कर सकता है कहां प्रकट होना है कहां नहीं होना है ईश्वर उसको कहां प्रकट होना था? यह ज्ञान देना था। इसके माध्यम से माध्यम से वेदों का ज्ञान आगे ज्ञान का ज्ञान के रूप में भी तो ईश्वर ही है। ईश्वर ज्ञान के रूप में है लेकिन वो चारों चारों वेद वही नहीं ना है। उसके उसके लिए वो ज्ञान है। मैं वही कह रहा हूं। जैसे उसके वो जैसे मेरे और आपके मन में दोनों में ईश्वर है। ठीक है? तो ईश्वर के रूप में मेरे और आपके मन में ज्ञान भी है ईश्वर का क्योंकि ईश्वर है तो ज्ञान भी है। सच्चिदानंद चित्त है तो उसका ज्ञान भी है। फिर भी वो ज्ञान अभी हमारे इंद्रिय इंद्रियों का विषय नहीं है। नहीं है। है ना? तो किसी एक देश काल परिस्थिति में भगवान ने कुछ ऐसा किया जिससे कि वो अब हमारी मन इंद्रिय का विषय हो गया। तो वो मंत्रों के रूप में भगवान ने चाहा तो उसने दे दिया। मगर उसने चाहा कि मैं इन्हीं चार लोगों के मन में आऊं। बगल में कोई और दूसरा प्राणी हो तो उसके मन में ना हो।
00:21:21:10 नहीं नहीं पहले से तो उनके यहां था लेकिन ज्ञान वेदों का जो है उन्होंने चार ऋषियों को दिया। वही वही कह रहा हूं कि जो इंद्रियों का विषय बनूं तो इसी इन्हीं चार का इंद्रियों का विषय बनूं। और भी प्राणी है वो इतने योग्य नहीं मैं उनकी इंद्रियों का विषय नहीं बनूंगा। इंद्रियों का विषय तो बन ही नहीं सकता क्योंकि अती्द्रिय है। अरे इन इंद्रियों के द्वारा का विषय बना कि नहीं? ज्ञान बुद्धि का विषय है। चलो बुद्धि का विषय बना ना। बुद्धि का विषय है। हां। तो कहने का अर्थ यह है कि वो उसने अपने आप को रेगुलेट किया और वो एक जगह पर आया ज्ञान के रूप में। ज्ञान के रूप में वो तो सर्वत्र विद्यमान है ही। उसने ज्ञान दिया। हां। तो उसने अपने आप को रेगुलेट कर तो दिया। वेद जो है सृष्टि का ज्ञान है। सृष्टि का संपूर्ण सृष्टि का संविधान है। कह सकते हैं। जिस तरह से एक देश को चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है उसी तरह से संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए वेद है। नहीं वो सही है। वो आप सही कह रहे हैं। मगर इसमें एक ये चीज आ रही है। मैं इसमें थोड़ा जानना चाहूंगा। ये चीज समझ में नहीं आ रही है कि ईश्वर जब पहले से है तो उसका ज्ञान भी है सब जगह। जी। यहां बैठे हुए सब लोगों में ईश्वर का ज्ञान है। फिर भी किस किसी के मन में ईश्वर का ज्ञान वैसे प्रकट होता है जो भौतिक इंद्रियों के वो उसमें आ जाए। सीमा लोगों के अंदर ईश्वर है। हम्म लेकिन ईश्वरीय ज्ञान
00:22:36:12 जो है सब में नहीं है। क्यों ईश्वर ईश्वर का ज्ञान नहीं है? ईश्वर है तो ईश्वर में ज्ञान ईश्वर है। ईश्वरीय ज्ञान नहीं है। वो ज्ञान जो वेद कहते हैं वो नहीं है। अच्छा ईश्वर से अलग है ज्ञान। क्योंकि ज्ञान ईश्वर से अलग है। नहीं ईश्वर में तो ज्ञान है। तो फिर ईश्वर है तो ज्ञान भी तो है वहां। नहीं नहीं ना वो जो वेदों का जो ज्ञान है वो जो जिसको दिया उसने चार ऋषियों को उनके पास आया। उनके माध्यम से चारों तरफ फैला है। हां। अरे भाई जब ईश्वर है तो ईश्वर के अंदर तो सब कुछ है। तो उसका ज्ञान भी है। तो हम ये कैसे कह रहे हैं? उसका ज्ञान नहीं है इस लोगों के अंदर। नहीं तो उसके ज्ञान केवल इतना है कि वो अभी अविद्या होने के कारण अविद्या से ग्रसित होने के कारण वो जानता नहीं है। नहीं उस ज्ञान को इसी देश काल परिस्थिति में ईश्वर जो है वो अविद्या से बचा करके उसका ज्ञान जो है प्रकाशित कर देते हैं ऋषियों के मन में मगर ऐसा वो सब जगह नहीं करते एक साथ जहां वो चाहते हैं वही करते सृष्टि के आदि में उन्होंने चार ऋषियों को।
00:23:36:16 इसमें आचार्य एक चीज हमने देखी कि अगर ईश्वर को न्यायकारी होना है तो उसका सर्वव्यापक होना आवश्यक है। आवश्यक है। है ना? तो इसमें जैसे हम ये देखते हैं कि जैसे मान लीजिए न्यायकारी होना है। यानी कोई ना कोई क्रिया करनी है। जैसे कि ईश्वर ईश्वर सर्वव्यापक तो है पर क्रिया भी उसने की। कहीं पर उसने सूर्य बनाया, कहीं पर उसने पृथ्वी बनाई और तभी वो सृष्टि की रचना कर रहा है। है ना? जी हां हां। यदि दुनिया में कोई भी जड़ पदार्थ इधर से उधर मूव करेगा ईश्वर के कारण तो उसमें ईश्वर का धक्का बल इत्यादि लगेगा। जो बल होने की बात स्वीकार की है सभी ग्रंथों में वो बात है वो देखो जड़ जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है अपने को और चेतन जगत में वो अलग तरह से प्रकट करता है। इसका मतलब ईश्वर ईश्वर ये रेगुलेट कर सकते हैं कि वो कहां पर शक्ति के रूप में ज्यादा प्रकट हो और कहां पर शक्ति के रूप में कम प्रकट हो। ठीक है?
00:24:36:00 हां। इसका मतलब जिस प्रकार से वह जड़ पदार्थों के लिए धक्के इत्यादि का विषय बन रहा है। उसी प्रकार से वह प्रकाश के मार्ग में भी धक्के का या टकराने का विषय बन सकता है। निरा किसी विशेष नहीं नहीं बन सकता। जो अत्यंत सूक्ष्म होता है वो बाधक हो ही नहीं सकता। बाधक होने के लिए उसका स्थूल होना जरूरी है। किसी भी अर्थ में तो फिर वो तो फिर वो ये जो जड़ पदार्थ है पृथ्वी इत्यादि मिट्टी के कण इनके लिए बाधक कैसे बना? फिर रचना कैसे की उसने? जी एक तो हम ईश्वर को ना किसी पुरुष के नजरिए से ना देखें। परमात्मा की जो स्थिति है वो संसार में सर्वोपरि है। और हम जो उसे देख रहे हैं हम एक मानवीय दृष्टिकोण से उसे देख रहे हैं। सबसे पहले ये दृष्टिकोण छोड़ना होगा। तो कहने का मतलब यह है जब हम यहां पर यह मान लेते हैं कि ईश्वर के कार्य मनुष्य दृष्टि से समझ में ना आने वाले हैं तो वहां पर भी मान लेना चाहिए। नहीं तो यदि हम वहां पर तर्क कर रहे हैं कि जो सर्वव्यापक है वो मूर्त रूप में क्यों नहीं आ सकता है तो फिर हमें यहां पर भी जवाब देना चाहिए कि फिर वो यहां पर कैसे कर रहा है? और वैसे मैं एक बात आपको बताऊं ईश्वर विषय पर मैं चर्चा नहीं करना चाहता हूं। वैसे बेसिकली मैं अपना निजी विचार बता
00:25:51:01 रहा हूं। उसका अब इसमें क्या है? अब यही मैंने यही शुरू किया था कि आप मनुष्य की वस्तुएं भगवान पर आरोपित ना करें। वास्तव में तो मैं इसे समझ भी नहीं पाया। मैं सच बताऊं तो आपको अब तक समझा तो आपकी बेटे ये बात नहीं समझ पा रहा। आप ये बाधा शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हो बार-बार? बाधक क्षेपक वाली बात नहीं समझ में आई। ये क्या कहना चाह रहे हो आप मुझे बाधक ही समझ में नहीं आया मुझे तो अब तक। तो तर्क की दृष्टि से भले ही मूर्त रूप धारण करना सिद्ध हो सकता हो। मगर नहीं सिद्ध करिए। करो हो सकता नहीं। आप सिद्ध करिए तर्क से ऐसा हो सकता है। बताइए तो भाई साहब मैं कह तो रहा हूं कि आप जब यह तय करने चलेंगे कि उसने सृष्टि कैसे बनाई उसी से तय हो जाएगा कि वो अवतार कैसे लेगा? अच्छा आप क्या सोचते हैं ईश्वर ने सृष्टि कैसे बनाई? मैंने आपकी दोनों बातें ले ली है। अगर वो धक्के का विषय बनेगा तो प्रकाश के मार्ग में बाधक बन जाएगा। और अगर आप अगर अगर आप अचिंत शक्ति मान रहे हैं। आप यह नहीं बता पा रहे हैं वो कैसे जड़ पदार्थ जड़ पदार्थ मूव कैसे किया। आप अगर यह नहीं बता रहे हैं तो फिर हम यह कहेंगे कि वो अचंत शक्ति से ही अवतार धारण करेगा। यह तर्क की मेरी दो बातें हैं। जी
00:26:58:24 अब आप प्रश्न क्या करना चाहते हैं वो बताइए आप। तो ये बेटे साक्षात्कार का विषय है। ये इस तरह की चर्चा का विषय नहीं है। इस विषय में तुम्हारा क्या पक्ष है कि ये जो है ईश्वर सृष्टि बनाता कैसे है? जो बल लगा जी जी जी 10 नंबर और दो नंबर ये दोनों अलग-अलग बल है क्वांटिटी में तो ये बल के रूप में ईश्वर में भेद है तो यहीं पे अवतार मानना पड़ेगा कि वो एक और अवतार लेता है अपने उस रूप को सुरक्षित रखते हुए और अब वो जो है क्रियाशील होता है इसको मानते नहीं है अभी हम लोग क्यों नहीं मानते तो क्यों है पता है यहां पे यहां पे वो अद्वैत की बात आती है हां खत्म बाय बाय टाटा गुड बाय गया जैसे उसके अंदर चेतन तो है नहीं मटेरियल में। मटेरियल थोड़ी चेतन है। अब उसने केवल इच्छा की और घूमने लगा। उसकी क्या सूचना गई? क्या नहीं गई? इसके इसको थोड़ा सा डिफाइन करोगे कैसे? अब उसकी व्याख्या उसमें हमें थोड़ी और गहराई से मुझे भी शास्त्रों में थोड़ी और गहराई में पढ़नी पड़ेगी।
00:28:20:12 [संगीत]
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सर्व व्यापक ईश्वर एकदेशीय कैसे हो सकता है? अवतारसिद्धि
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