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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] अच्छा अच्छा भैया सर्वशक्तिमान पर थोड़ा सा विचार करें बताओ अगर आपकी इच्छा हो तो बताओ हां तो अब जैसे जैसे वो वाला जो आप तर्क बता रहे थे हां तो सबसे पहले भी एक बात आती है कि जैसे अगर हम ईश्वर को सर्वशक्तिमान कह रहे हैं है ना कुछ भी कर सकने वाली बात कह रहे हैं तो ये हम क्या क्यों कह रहे हैं क्या हम केवल शब्द प्रमाण से कह रहे हैं या हमारे पास कोई इसलिए कह रहे हैं इसलिए कह रहे हैं जैसे हम एक नास्तिक को शुरुआत करते हैं ना वो बताने की जी जी कि भाई तुम्हारी इच्छाओं का विषय है तो उसकी जो मूल इच्छा का पता चलता है वो भी उसकी व्यवहार से ही पता चलता है। हां हां तो उसके व्यवहार से उसके मूल में जाते हैं। जी जी तो उसी प्रकार से उसका जो सब्जेक्ट होगा वो व्यवहार से ही मूल में जाने वाला होगा। हम थोड़ी ना कह रहे हैं कि मूल में भी निराकार नहीं है। मूल में तो निराकार ही है। जी मगर उसका व्यवहारिक स्वरूप जैसे उसकी जो मूल इच्छाएं हैं वो है सच्चिदानंद की इच्छा। उसका व्यवहारिक स्वरूप क्या है? व्यवहारिक स्वरूप यह है कि बारिश ज्यादा हो रही तो कम हो जाए। व्यवहारिक स्वरूप यही है। इनहीं से पता चलता है कि मूल में ये है। तो ऐसे ही जब क्या कहते उसकी जो व्यवहारिक इच्छा है उसके मूल में सच्चिदानंद है तो ऐसे ही उसकी व्यवहारिक इच्छाओं का एक व्यवहारिक विषय जिसके मूल में वो सच्चिदानंद वाला ईश्वर है जो जो

00:01:17:06 इधर के मूल का उधर विषय है जो जी [गला साफ़ करने की आवाज़] मूल इच्छा का तो इसलिए कहते हैं। अच्छा भैया ये वाला जो तर्क इसका मैंने थोड़ा सा कल भी मैंने बताया था। हां इसमें यह अब मैं आपको बताता हूं जब आपने तर्क दिया तो मेरे को इतना बढ़िया तर्क लगा तो शुरू में मैंने इस तर्क का खंडन करने का प्रयास किया। मैंने कहा इसका खंडन सोचता हूं अगर पॉसिबल है तो खंडन नहीं है। नहीं मतलब जो आपसे डिस्कशन के बाद वो बात हुई थी ना उसमें मैंने विचार किया था कि मैंने तो मैंने वीडियो देखना शुरू किए पुराने वाले आपके तो उसमें मेरे को जो सबसे पहले वीडियो मिला था वो यही वाला मिला था। ये वाला तर्क वाला। सबसे पहला जो वीडियो था आपका आखरी मैंने देखा तो उसमें नास्तिक का ही खंडन था। तो उसमें मुझे ये वाला तर्क मिला। तो मैंने इसको लिखा। लिख करके मैंने इसमें विचार करना चालू किया। तो पहले मैंने सोचा कि ये मैं मान के चलता हूं कि तर्क गलत है। मैं इसका खंडन करता हूं। तो मेरे से खंडन नहीं हुआ इसका। तो फिर तो फिर मैंने तो मुझे समझा कि ये बहुत जबरदस्त तर्क है। बढ़िया तर्क है। फिर लेकिन मुझे इसके अंदर एक कमी नजर आई। कमी ये नजर आई कि इससे मुझे मुझे कुछ ना कुछ मतलब इसमें गड़बड़ी नजर आ रही थी। गड़बड़ी मुझे फिर मुझे ये क्रैक हुआ तो मैंने इसमें खूब विचार किया। विचार करने के बाद मुझे समझ में आया कि इस तर्क से वास्तव में मुक्ति और मुक्ति दाता की सिद्धि हो रही है। अब वो कोई भी हो। ठीक है। अब इसमें एक पॉइंट आया जो सच्चिदानंद है ना जी जी। उन्होंने नहीं माना है। हमने ही माना है कि हमने ही यह माना है कि सच्चिदानंद और मोक्ष में अंतर नहीं है। मोक्ष भगवान मोक्ष

00:02:32:14 स्वरूप है। इसमें कारण क्या है? एक दिन गुरुदेव से हमने प्रश्न किया था कि कई लोग ये स्कॉन टाइप के लोग ऐसा उड़ाते हैं कि अद्वैत में भक्ति नहीं है। जी जी ईश्वर के प्रति प्रेम की भावना नहीं है। नीरस है क्योंकि हम ही भगवान है। जबकि व्यवहार में हम लोग ऐसा नहीं कहते हैं। वो तो एक प्राप्तव्य का विषय है। जी जी तो गुरुदेव ने एक सिद्धांत बताया कि अन्यों में प्रीति आत्मा के लिए होती है। आत्मा में प्रीति अन्यों के लिए नहीं होती है। जी। यानी कि अगर आप यह कह रहे हैं कि भगवान और हम अलग हैं तो भगवान एक साधन हो गए। जी जी। आप खुश तो खुद ही को करना चाह रहे तो आपकी भक्ति कहां सिद्ध हो रही? फिर अगर तात्विक उसमें चले गए तो भगवान की भक्ति करने से क्या मिला कि खुशी किसको मिली? आत्मा को तो अपने लिए की। तो भगवान भगवान को आत्मीय नहीं मानोगे तो भगवान के लिए समर्पण सिद्धि नहीं होगा। आपकी भक्ति वो सिद्धि नहीं हो पाएगी। जी। तो और दूसरा फिर देखो फिर द्वैतियों से बात होती है द्वैत वालों से जी जी कि भगवान सामने खड़े हैं। जी ठीक है। जी जी तो भगवान सामने खड़े हैं। जी तो शंकराचार्य ने बस इतना किया है कि भगवान सामने खड़े हैं। खड़े होने पर तुम्हें क्या मिल रहा है? कि मोक्ष का सुख

00:03:47:25 जी मोक्ष का अनुभव जी जी तो इसका मतलब फिर भगवान साधन हो गए। बिल्कुल अनुभव प्राप्त करने के तो भगवान तुम्हारा अंतिम वो तभी सिद्ध हो पाएंगे जब तुम भगवान जो दिख रहे हैं या भगवान को जो तुम अनुभव जिस जिस भी तत्व से तुम अनुभव कर रहे हो जो है ना वो तत्व आखिरी स्टेज ना हो उसका जो आखिरी स्वरूप है ना परम स्वरूप वो वो अनुभव है जो तुम्हें हो रहा है हां जो तुम्हें जो तुम्हें ज्ञान और अनुभव का स्वरूप है वो हो रहा है जो वो ईश्वर का रूप है मतलब वो ईश्वर का अच्छा समझ में आया फाइनल मतलब फाइनल अल्टीमेट जो ईश्वर ईश्वर का स्वरूप है वो वो नहीं है जो बैकुंठ में दिख रहा है। वो वो है जो बैकुंठ में दिखने के कारण तुम्हें फील हो रहा है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] दिखने की हां ठीक है। ठीक है। मतलब एक वो तो केवल मोक्ष के अनुसार नहीं बता रहा हूं। मैं अभी द्वैत के अनुसार एंडिंग बता रहा हूं। जी जी तो द्वैत के अनुसार भी अगर एंडिंग है तो कोई लोक है जहां पे भगवान बैठे हैं। हां बिल्कुल है ना? और हम उन्हें देख रहे हैं। हम खुश हो रहे हैं। सायुज्य सारूप्य सामिप्य इनमें से कोई मोक्ष है वो। जी तो जब ऐसा हो रहा है तो हमको जो फीलिंग हो रही है जी जी इसी को आपको भगवान कहना पड़ेगा नहीं तो भगवान साधन मात्र सिद्ध होंगे आपके बिल्कुल अच्छा इसमें एक पॉइंट आता है कि

00:05:03:10 जैसे शंकराचार्य जी ने भी तो मतलब साधन माना ही है उन्हें अपने शास्त्रों में इसलिए अपने शास्त्रों में भगवान को ज्ञान स्वरूप कहा गया हां अंत में जो आनंद जो आपको आनंद मिल रहा है ना लास्ट में फाइनल वही भगवान है वो भगवान ही है वो आनंद की फॉर्म समय अब आपको मिल रहे हैं। बिल्कुल। अब इसमें ये आ जाता है कि जैसे स्वामी दयानंद जी ने बोला कि जो ईश्वर है वो आनंद स्वरूप है और ज्ञान स्वरूप है। है ना? तो इसमें अब इसमें बात आ जाती है कि [गला साफ़ करने की आवाज़] अब जैसे साधन वाली बात आई तो उसमें मैं आपको विचार बता रहा हूं। अगर जैसे आपको अच्छा लगे तो आप इस विचार को स्वीकार कर सकते हैं। मतलब मैं विरोध भाव से नहीं बता रहा हूं। हम इसमें ये कि अगर हम ये कहते हैं कि ईश्वर क्या आनंद पाने का साधन क्योंकि एक पॉइंट आता है कि हम मोक्ष की सिद्धि कर किस तरीके से रहे जिस तरीके से सिद्धि कर रहे हैं मोक्ष भी उसी तरीके से ही मानना पड़ेगा। है ना? ऐसा नहीं कर सकते कि मोक्ष को सिद्ध तो हम किसी और तरीके से कर रहे हैं और मान किसी और तरीके से रहे। अब जैसे हम जो सिद्धि वाला तर्क देते हैं हम ये देते हैं कि जैसे मुझे मिठास की चाह है तो मिठाई है। हम है ना? यानी अब मुझे मेरी डिमांड क्या है? मेरी डिमांड मिठाई बन जाना नहीं है। मेरी डिमांड है मिठाई से जो मुझे मिठास प्राप्त हो रही है वो मुझे चाहिए। वो मुझे चाहिए वो मेरे को मिलेगा उसकी विषय वस्तु मिठाई से। है ना? इसीलिए मैं मिठाई की डिमांड कर रहा हूं। रियल

00:06:18:16 में तो मैं है ना ये एक बात आ जाती है। तो वो वो मिठाई व्यवहार में है मात्र असली में नहीं है। जी जी मैं केवल यहां है। जी जी मैं वही बता रहा था कि इसमें ये हो जाएगा कि उसी प्रकार से उसी प्रकार से जिस जैसे हम मोक्ष की या कह लीजिए सच्चिदानंद की जो हमारी इच्छा है तो सच्चिदानंद की जो चाह है मूल जो चाय है वो सच्चिदानंद की ही है। है ना? और सच्चिदानंद का जो विषय वस्तु है वो ईश्वर है। है ना? तो तो मूल जो चाहे वो ईश्वर बन जाना नहीं है। मूल जो चाहे वो सच्चिदानंद की अवस्था को पाना है। यानी सच्चिद आनंद आनंदित होना है। दुख से छूटना है। अच्छा अगर मैं एक बार को दुर्जन ऐसे मान लेता हूं कि मेरी जो मूल चाह है वो ईश्वर बन जाना है। ठीक है इसको मान लेता हूं। तो भी प्रश्न आएगा कि ईश्वर भी मैं क्यों बना? ये भी जो चाह है ये मेरे अंदर क्यों आई कि मैं ईश्वर बन जाऊं। फिर लास्ट बस फिर लास्ट में वही आ जाएगा कि अल्टीमेटली मुझे वो आनंद ही चाहिए। वही है ना कि हमारे यहां पे सच्चिदानंद को ही ईश्वर कहा गया है। हां मतलब जो आनंद जो समझने वाला पॉइंट है हां इसमें जो समझने वाला एक छोटा सा पॉइंट ये है कि यानी हम ये कह रहे हैं कि यानी हम ये मान रहे हैं कि रियल में जो जीव की जो चाय है वो ये नहीं कि मैं ईश्वर हो जाऊं। उसकी चाय ये है कि मैं आनंद मिले। अगर ईश्वर को अगर जीव को जीव को जो आनंद है वो ईश्वर के थ्रू मिल रहा है तो फिर वो उसकी इच्छा पूरी हो गई फिर उसी ईश्वर बनने वाली बात

00:07:33:18 का कोई मतलब नहीं रह गया ये था पॉइंट क्या कहा तुमने लास्ट में जैसे में क्या कहा कि जैसे अगर जो उसकी जो मूल चाह है वो सच्चिदानंद होना ही है मतलब उसको आनंदित होना ही है दुख से छूट के आनंद को पाना अगर वो दुख से छूट के आनंद को पा रहा है विषय वस्तु से ईश्वर से तो ठीक है वो ईश्वर के माध्यम से मुझे सुख मिल रहा है तो बस जो मुझे चाहिए था मिल गया अब मुझे ईश्वर भी क्यों बनना है? हां तो नहीं बनना ना। मगर हमने उसको नाम दिया है कि तुमको जो तुम जिसको पा रहे हो वो ईश्वर है। हां ये ये ठीक है। मैं क्योंकि वो जिससे कि हां नहीं वो देखो ऐसा है। जी जी कि जब तक हम कोई एक तत्व छोड़ देंगे ना जी तब तक हमारा वो जो क्या कहते हैं मोक्ष की स्टेट है जी जी वो सिद्ध नहीं हो पाएगी। फिर ईश्वर की विवेचना तो यही है ना कि सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म हां ठीक है फिर वो वो जो तत्व है वो अलग कैसे हुआ फिर नहीं उसमें उसमें मैं आपको बताता हूं उसमें थोड़ा सा एक विरोध आता है विरोध ये आता है कि जैसे आप उस वाले वीडियो में ये भी था कि जैसे आपने कहा था कि ईश्वर वो है जो कुछ भी कर सकता है इसका प्रमाण आप देते हैं सत्यम ज्ञान अनंतम ब्रह्म ठीक है तो मैंने वो सत्य इसका प्रमाण ये नहीं है इसका प्रमाण ये तो एक ईश्वर की परिभाषा बना बताते हुए फिर बाद में

00:08:48:21 कहते हैं व्यवहारिक व्याख्या अबाध्य फिर उससे आता है सर्वशक्तिमान मतलब सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रह्म तो मूल की व्याख्या है। फिर उसकी एक व्यवहारिक व्याख्या है कि भाई वह जब सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रह्म है तो उसका व्यवहारिक स्वरूप कैसा है कि अबाध्य अब व्यवहारिक स्वरूप अबाध्य तो वो सर्वशक्तिमान हो गया। देश कृत कालकृत परिस्थिति कृत किसी भी प्रकार की बाधा से जो मुक्त हो। तो यह वाली जो बाधा होती है ना कि वो एक सर्व्यापक है तो एक देश कैसे हो जाएगा या फिर जो पहले से है उसका आना जाना यह परिस्थिति बाधा है। नहीं नहीं इसका इसका बड़ा अच्छा सशन करपात्री जी ने भी दिया और वही स्वामी दानंद जी दोनों ने सेम ही दिया। मैं उस मैंने समझा मैंने विचार किया मतलब मैंने विरोध की दृष्टि से नहीं मैंने खुद से विचार किया। अब वो क्या आया कि

00:09:28:02 जैसे मैंने ये कहा कि ईश्वर स्वरूप से निर्बाद है। है ना? तो निर्बाद होना भी उसका स्वरूप है। और अगर आप इस उसके ईश्वर के एक गुण से जो उसका निर्वाद वाला पॉइंट है उससे उसके स्वरूप का खंडन कर देंगे तो ये चीज ठीक नहीं बैठेगी। अब

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00:09:43:15 कैसे जैसे वही वही करपात्री जी उसमें उदाहरण देते हैं ना उस वाले वही नास्तिक वाद वाले में जो सरस्वती समझाते हैं उसी में वो उदाहरण देते हैं कि जैसे अग्नि जो है वो दाह पदार्थ काष्ट आदि का दहन करती है। अदाह आकाश आदि का दहन नहीं करती। है ना? यानी आग जो है वह जलने स्वरूप का खंडन नहीं होना चाहिए ना। हां हां वही उसी प्रकार हां तो इसमें इसमें यह बात है ना इसमें वो वाली बात आ जाती सृष्टि के निर्माण की अगर हम बात कहानी सुने तो हमें मानना पड़ेगा कि निर्गुण रहते हुए भी भगवान सगुण होते हैं। वो तो दोनों एक ही समय पे होते हैं। जैसे जैसे आप मुझे निर्गुण और सगुण समझाइए कि जैसे निर्गुण सगुण क्या है? फिर मैं आपको अपना पर्सेक्टिव बताता हूं। निर्गुण सगुण का यार यही पर्सपेक्टिव है कि जैसे सबसे पहला स्टेट जो है भगवान का वही सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रहबाला जो है वो निर्गुण एक रस है। कहीं कोई ऐसा नहीं है कि यहां 5 किलोमीटर में ज्यादा है और वहां 5 किलोमीटर में कम है।

00:10:41:20 परंतु यदि सृष्टि निर्माण करने करना पड़ेगा तो उनको कम ज्यादा होना पड़ेगा। वो मैंने फोर्स की बात बताई है ना कहीं पर ज्यादा हो रही शक्ति कहीं पर कम हो रही है। यह सगुण है उसमें उसमें मैंने थोड़ा सा विचार किया तो मुझे क्या समझ में आया कि जैसे जो हम ईश्वर का जो बल है ठीक है वास्तव में उसकी इच्छा ही है और उसका बल से हम अर्थ फोर्स नहीं ले सकते हैं। फॉर इसलिए कोइंसिडेंटली मैं एक बच्चे को पढ़ाता हूं चार से पांच मैं उसको ट्यूशन पढ़ाता हूं तो उसका वो उसमें चैप्टर था फोर्स वर्क एनर्जी वाला वो कल ही मैंने पढ़ाया उसको उसमें जब मैंने फोर्स देखा तो फोर्स की डेफिनेशन लिखी थी पुल या पुश है ना तो मेरे दिमाग में क्लिक किया कि यार पुश और पुल तो एक देसी चीज ही कर सकती है या एक ही साइड से पुश जो सर्वव्यापक है उसके पुल पुश और पुल सिद्ध नहीं होता इसीलिए तो सगुण का तभी होगा जब वो अवतार लेंगे वही तो मैं कह रहा हूं नहीं नहीं उसमें पॉइंट ये आ जाए कि पॉइंट ये है कि जैसे ईश्वर तो बिना अवतार लिए ही सृष्टि निर्माण कर रहा है। हम तो यहां पर या तो यह करना पड़ेगा मैं बताऊं। या तो यह मानना पड़ेगा कि फिर वही आप

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00:11:40:16 अदो अचिंत जो शंकराचार्य की फिलॉसोफी है उसमें एक चीज अच्छी लगती है जी। कि क्या किया है कि जो अन्य आचार्य गण हैं जैसे किसी ने बात की 70 तक जैसे मान लो नीचे से पिलर खड़ा है एक जी जी ठीक है तो कोई आचार्य गए 70 पे 70 के बाद उन्होंने कहा कि भाई मैं जिन लोगों को ये ज्ञान दे रहा हूं ना वो इससे आगे जाएंगे तो कंफ्यूज हो जाएंगे तो उन्होंने 70 पे स्टॉप कर दिया जी जी फिर कोई आचार्य 80 तक चले गए जी जी फिर कोई आचार्य मतलब अनिर्वचनीय शब्द सब ने कहा है जी ये नहीं है कि किसी ने नहीं कहा शंकराचार्य जी ने शंकराचार्य जी ने 100 पे जाके कहा है कि इसके बाद अनर्वचनी है और कई लोगों ने पहले कह दिया

00:12:18:24 अब जैसे यहां पे अगर हम ये नहीं मानेंगे कि सगुण हुए भगवान है ना तो हमें यही यहीं पे अचिंत कह देना पड़ेगा भैया यहां अचिंत शक्ति से करते हैं उसमें बात आएगी उसमें बात आएगी कि जैसे जैसे इच्छा मात्र की बात आ गई ना हां हां तो अचिंत शक्ति हो गई फिर वो वो कैसे हो रहा है हम उसको डिफाइन नहीं कर सकते फिर मतलब जो प्रैक्टिकली हम डिफाइन कर रहे हैं चीजों को कि भाई वो कैसे हुआ वो डिफाइन नहीं अचिंत शक्ति से ही कर दिया उन्होंने लेकिन लेकिन ये है कि फिर भी उस अचिंत शक्ति को आचार्य शंकर ने भी उसको बल बोला है। मतलब बल रूप में उसको स्वीकार किया है। अब उसकी व्याख्या उसमें हमें थोड़ी और गहराई से मुझे भी शास्त्रों में थोड़ी और गहराई में पढ़नी पड़ेगी कि ईश्वर का बल और मनुष्य के बल मतलब किस प्रकार से उन्होंने व्याख्या की है। बाकी ये है कि जैसे अचिंत अगर हम इधर से देखें अगर हम इधर से देखें उधर ब्रह्म की दृष्टि से ना देखें। ब्रह्म ने तो इच्छा मात्र की है। इधर से देखें तो कहीं सूर्य कहीं पृथ्वी बन रही है तो हम हमारी दृष्टि से कहीं फोर्स का कम ज्यादा मानना पड़ेगा।

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00:13:16:12 और वही वही चीज होती है। ईश्वर के अनुसार ईश्वर के अनुसार क्या होता है? ईश्वर के अनुसार तो कहीं कुछ हो ही नहीं रहा होता है। सब केवल माया होती है। हम मैं अपना वाला बता रहा हूं। ईश्वर के अनुसार तो कहीं कुछ हो ही नहीं रहा होता है। माया होती है। मतलब वो माया रूपी संसार होता है। उसी में फिर सब कुछ हो जाता है।

00:13:33:25 हमारी ओर से तो यही हो रहा है कि भैया जो निर्गुण भगवान है। सर्व जो ये क्या कहते हैं सर्वव्यापक जो व्यवहार में ना आ सकने वाला है वो फिर वो रहते हुए भी स्वरूप के विरुद्ध दूसरा अवतार लेते हैं। ठीक है। अच्छा वो वो जो क्योंकि यहीं से कहानी यहीं से हो गई ना व्यवहार में ना आ सकने वाला व्यवहारिक हो गया। ये स्वरूप के विरुद्ध ही तो हुआ। नहीं तो हम मान ही रहे हैं कि वही एक ही ईश्वर है। वही व्यवहार में आता ही आता है। ऐसा अब उसमें बात ये थी कि अब जैसे तो फिर वो परिवर्तनशील हो गया।

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00:14:03:08 नहीं नहीं समझते हैं इसको। जैसे हमने बोला कि व्यवहार में नहीं हंसता तो ऐसा तो नहीं कि मुक्ति मुक्ति के बाद आखिरकार जीव के व्यवहार में आया ना उसके आनंद का विषय बना ना। व्यवहार में तो वो आ ही रहा है। अगर आप जैसे जैसे आप ये मानिए कि जो परमार्थिक ब्रह्म है वो व्यवहार का विषय नहीं बन रहा। लेकिन वो तो एक ही भूत हुआ ना? नहीं एक एक भूत अभी हमारे यहां एक ही भूत हुआ और आपके यहां तो हुआ ही नहीं तो वो व्यवहार भी नहीं हुआ। आपके यहां नहीं आपके यहां भगवान के लोक में गया। आपके यहां पे ब्रह्म के अंदर विचरण करता है ना वो। जीव जो होता है मतलब अलग से कोई लोकांत नहीं यही दुनिया यही रहता है लेकिन वो ब्रह्मस्थ हो जाता है एक डायमेंशन चेंज चेंज हो जाता है बस उसका तो ब्रहस्त जब हो जाता है तो वो ब्रह्म के अंदर रहता है मैंने पढ़ा था कि आपका जो जीव है मुक्ति में ब्रह्म के अंदर विचरण करता है वो वही उसका सुख है तो तो उसको जो आनंद वगैरह मिला है कहां तो फिर बोला कि नहीं ब्रह्म तो हर जगह जैसे यहां घूम रहा है वो शरीर में बाधित नहीं है वो मेरे सामने हो गया अब तक मुक्ति जीव मेरे सामने होंगे मुझे नहीं पता वो हर जगह वो हर जगह [गला साफ़ करने की आवाज़] अच्छा अच्छा जी तो उसमें जो हम बात कर रहे थे क्या बोलते हैं ये जो तर्क था इस तर्क से कि जो व्यवहार में सर्वशक्तिमान की सिद्धि वाला उसमें हम मैंने मेरे दिमाग में ये क्लिक किया कि हम ये क्या पकड़ रहे हैं हम ये देख रहे हैं कि दो प्रकार की चाह है एक है मौलिक चा एक है व्यवहारिक चाह ठीक है

00:15:18:09 जैसे ये जो आभास रूपी संसार है एक इसके अंदर की चाह है और क्या है कि जब तक अग्नि जलती नहीं है इधर से अगर देखें तो हमको ये चीज नहीं होती कि इसके अंदर जो है दाह चमता बिल्कुल तो हमारे को व्यवहार की दुनिया में एक अग्नि चाहिए ही चाहिए। तब हम जो है वहां से शुरुआत होती है। अब जैसे चलो मान लो अवतार नहीं है। मान लो सगुण साकार नहीं है। मगर जो चार ऋषियों के अंतःकरण में जो अग्नि जली ना ईश्वर ईश्वर रूपी अग्नि तो जली ना। उसने उपदेश किया ना। अगर वो अग्नि नहीं जलेगी तो वहां से यात्रा ही नहीं शुरू। क्योंकि यह चीज उन्होंने भी कही है। दयानंद जी ने दयानंद जी ने यह बात कही है कि ईश्वर के बिना दिए ईश्वर के बिना दिए कुछ नहीं ले सकते तुम। तुम अपने से सोचोगे तपस्या करके हासिल कर लेंगे नहीं कर पाओगे। ईश्वर को कहीं ना कहीं देना ही पड़ेगा आपको। जी जी जी तो तो वो जो अग्नि का मान मामला है अग्नि का मामला तो वहां भी उन्होंने भी लिया। बस ये है उस अग्नि को हम यहां जो है यहां आंखों वो आंखों का विषय नहीं था। वो केवल अनुभव का अच्छा ये बताओ तुम्हारे यहां ये और क्या-क्या माना जाता है मतलब ये सुन सकते हैं कि नहीं ईश्वर को नहीं जैसे सुनने के लिए वो बात आ जाती है ना कि जैसे जो वस्तु जैसे उसमें ये आता है कि दो कैटेगरी बांट दी साकार एक निराकार साकार वस्तु

00:16:33:13 उसमें बोलते हैं जिसका रूप रस गंध स्पर्श इत्यादि माने जाते हैं। ठीक है जिसमें रूप है रस है गंध इत्यादि शब्द है ये सारे मतलब कहने का मेरा प्रश्न ये है निराकार में है ही नहीं अब क्योंकि [गला साफ़ करने की आवाज़] निराकार में नहीं तो उसको फिर डायरेक्टली क्योंकि सुनने के सीधे वो मन में डालता है सीधे मन में डालता है बुद्धि में डाल देता है चीज जो भी डालनी होती है प्रश्न किया था संदेश देना होगा तो सीधे मन में डाल दे ठीक उस करपात्र जी मतलब मैं ये बस मेरा ये पूछना था कि कौन-कौन से व्यवहार में ईश्वर आता है जी जी तो वो किसी व्यवहार में नहीं आता है। अब अब ये भी पता है ये भी क्यों बोला जाता है कि क्या कहते हैं कि वो मतलब वो ब्रह्मा आदि शरीर के रूप में वेद नहीं दे रहा वो डायरेक्ट मन में ये भी उसकी सर्वशक्ति मता के कारण ही बोला जाता है तो वो तो कर सकता है कुछ भी कर सकता है वो तो और उसमें उसमें बात ये देखी कि ईश्वर ने ये दुनिया जो बनाई है इसका प्रयोजन क्या है यूं ही अगर ये उसकी शक्ति का लक्षण मात्र अगर जैसे हम बैठे-बैठे पेन चलाते हैं ना जी जी जैसे हम बैठे-बैठे टांग हिलाते हैं हाथ चलाते हैं तो ये हमारी शक्ति परिलक्षित हो रही है बस और कुछ नहीं हो रहा है। इसमें हमारी कोई इच्छा नहीं होती है। उसमें उसमें ये बात आ जाती है कि जैसे करपात्री जी बोलते हैं मतलब करपात्री जी का उदाहरण मैं केवल इसलिए दे रहा हूं क्योंकि यही बात हमारे आचार्य जी भी बोलते हैं। अब बात ये है कि मैं अपने आचार्य जी का बोलूंगा तो सामने जो पक्ष है वो नहीं मानेंगे। तो मैं वही सेम बात जो मेरे आचार्य जी ने बोली वो सामने वाले के आचार्य ने बोली तो उनका आचार्य कोट कर

00:17:48:14 देता हूं। ये चीज है। तो कृपात्री जी भी ये बात बोलते हैं कि संसार में एक भी ऐसा कोई कण भी नहीं है जो निष्प्रयोजन हो। हो वो अलग बात है कि हमें उसका प्रयोजन पता हो या ना पता हो। लेकिन ऐसी कोई चीज है ही नहीं है। अगर उन्होंने भक्ति सुधा में बोला है जैसे भगवान बिना किसी प्रयोजन के यूं ही सृष्टि रचते हैं ऐसे ही हमें मानना पड़ेगा कि यूं ही अवतार लेते हैं। वो फिर व्यवहारिक भेद है रसगत

00:18:15:13 मतलब तुम कहीं पर भी तुम कहीं पर भी जो है भगवान की अचिंत शक्ति नहीं मानते हो। जब वही है ना जब क्लियर हो जा रही है शक्ति फिर अच क्या रही है ज्ञान पता चल रहा है तो फिर अच क्या हो गया तो निर्गुण से सगुण बताओ कैसे हुआ निर्गुण से सगुण हुआ ही नहीं ना निर्गुण सगुण एक ही समय में रहता है हमेशा तो तो एक ही समय में एक रस कैसे हुआ फिर वो मतलब वो कम ज्यादा रहता है कहां कम ज्यादा हुआ सिद्ध करिए कम ज्यादा हुआ जब कहीं पे फोर्स लग रही है कहीं पे फोर्स नहीं लग रही है क्या है फोर्स बताइए अरे धक्का और क्या यानी पुश एंड पुल हम पुश एंड पुल है ना पुश पुश एंड पुल हो गया फोर्स। ये डेफिनेशन हो गई फोर्स की। तो ये तो एक देसी के कॉन्टेक्स्ट में होता है। तो तुम बताओ ना मुझे कैसे हो रहा है? ईश्वर क्योंकि सर्व्यापक है। अब देखिए बात जैसे अगर मैं 5 किलो का डंबल उठा रहा हूं और एक 10 किलो का डंबल उठा रहा हूं। अंतर ये 10 किलो [गला साफ़ करने की आवाज़] वाले में परमाणु ज्यादा है। है ना? मैंने पकड़ा एक ही जगह से हुआ है। ईश्वर एक एक परमाणु को धारण किए। इसलिए वो हमेशा उसके ऊपर कभी 5 किलो 10 किलो का भार कम या ज्यादा लगता ही नहीं है। उसने तो एक-एक परमाणु को धारण कर रखा है ना। अरे भैया कहीं पे वो क्रियावान है। कहीं पे क्रियावान नहीं है। एक अंतर आता है। उसमें अंतर आता है कि उसमें हम उसका कम ज्यादा क्यों नहीं मानते? कम ज्यादा इसलिए नहीं मानते क्योंकि हम देखेंगे बल है क्या? बल की परिभाषा है क्या? तो बल की परिभाषा इतनी ही होती है सिंपल सा ये होता है कि

00:19:31:22 ईश्वर ने इच्छा की या मैंने इच्छा की। ठीक है? और इच्छा करने पे जो फोर्स के इफेक्ट्स होते हैं जो चौथी क्लास में पढ़ते हैं हम। ठीक है? कि क्या होता है कि कोई चीज मतलब खड़ी है वहीं पे तो वो गति करने लग जाए। गति कर रही है तो रुक जाए या तो उसकी दिशा मुड़ जाए या तो उसका स्पीड कम या ज्यादा हो जाए या तो उसका शेप चेंज हो जाए। ये इफेक्ट्स जहां दिखेंगे तो हम मानते हैं कि फोर सप्लाई हुआ है यानी बल लगा है। ये परिणाम जहां मिलेंगे हम मानते हैं कि यानी अगर ईश्वर या जीव ऐसी इच्छा कर रहा है। इच्छा करने के पश्चात अगर ऐसा कुछ परिणाम दिख रहा है तो हम मानते हैं कि बल लगाया। अगर ऐसी इच्छा नहीं कर रहा है। ठीक है? मैंने मैंने इच्छा की कि मुझे सुख मिले। तो उसमें तो कुछ कोई परिवर्तन कोई यानी उसमें बल नहीं लगा। तो अल्टीमेटली उस वाली इच्छा में यानी वही बात है कि बल कहते किसे हैं? अब है ना अगर ईश्वर ने इच्छा की कि परमाणु इधर से उधर हो जाए। ठीक है? तो वो जो इफेक्ट है गति करने वाला या रुकने वाला सेफ चेंज उस इफेक्ट के कारण उन्होंने बोला कि यहां पे बल है। रियल में बल जैसा कुछ नहीं होता। बल एक फिनोमना मात्र है। तो कैसे हुआ? अब जो ईश्वर अब जो इच्छा की वो तो संपूर्ण ईश्वर ने की। एक पर्टिकुलर अमेरिका लंदन की ईश्वर ने की नहीं वो तो संपूर्ण ईश्वर ने की इच्छा। यानी कि चलो ठीक है ठीक है। ईश्वर इसका मतलब तुम्हारा क्रियावान भी नहीं है। इच्छा करो तो क्रियावान है ना? इच्छा के अलावा क्रियावान नहीं है। तो और क्या करेगा वो? इच्छा ही तो करेगा।

00:20:47:08 इसका इसका इसका तुम अपने ग्रंथों से प्रमाण दो। किसका इच्छा? वो कोई क्रिया नहीं कर रहा है। केवल इच्छा कर रहा है। इच्छा ही तो उसकी क्रिया है। मैं बोल तो रहा हूं। अरे भाई ईश्वर कुछ करता नहीं है। केवल इच्छा करता है। इसका तुम प्रमाण दो मुझे। मैं तो आपको दे दूंगा। मैं आपको दे दूंगा। दो दो अभी कैसे दे दूं अभी मैं उठ के अपना बाकी बेसिक काम करूं क्या आपको मैं बुक खोल के प्रमाण दूं मैं बोल रहा हूं दे दूंगा लेकिन अब मैं स्टूडेंट हूं मैंने सारे ग्रंथ पढ़ रखे हैं तो मैं मेरे को ब्रीफ करिए ना

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00:21:12:21 बाकी बात ये है ना कि सामने वाले ने क्या अपना कांसेप्ट रखा है वो भी तो मैं क्योंकि मैंने कांसेप्ट रखा है काटिए मैं बता रहा हूं ना काट रहा हूं क्योंकि ईश्वर को अगर जो उधर तात्विक दृष्टि से देखोगे तो वो तो ठीक है कि तात्विक दृष्टि से उसने केवल इच्छा मात्र की है और सब हो गया उसको आप बल नहीं कह सकते हो जब बल बल तब कहेंगे जब उसमें वाले परिणाम घटेंगे तो उसको बल बोल देंगे वो केवल फिनोमना मात्र है। बल क्या है? बल कोई अलग से कोई गुण नहीं होता। बल एक फिनोमना मात्र होता है। तो वो घट तो रहे हैं। पृथ्वी घूम तो रही है। धक्का लग तो रहा है पृथ्वी को। तो उसमें कोई अलग से कोई देखिए अगर वो आपका जो पॉइंट है ना कम ज्यादा होने वाला वो तब सही होता है जब बल एक इच्छा की तरह एक अलग से कोई गुण होता है बल। है ना? तब वो आपका पॉइंट सही होता है कि कम ज्यादा बल लगा तो कम ज्यादा ईश्वर। यानी कि तुमने माना कि उन वो बल नहीं लगाता है। उसके पास बल भी नहीं है। अरे मैं क्या बोल रहा हूं? आप क्या बोल रहे हो? सगुण का मतलब गुण का मतलब क्या है? ये बताओ। नहीं मैंने क्या बोला? आप क्या बोल रहे गलत इंटरप्रेट कर रहे हो ना आप इसीलिए पूछ रहा हूं कि गुण का मतलब क्या है? गुण का मतलब क्या है? गुण का तो वही स्वरूप ही होता है। गुण से ही स्वरूप होता है। गुण का मतलब स्वरूप है। नहीं गुण से ही स्वरूप होता है। गुण से स्वरूप होता है। जो वो जो एक गुण है कि वो ये कर सकता है, वो कर सकता है। उसमें क्षमता एक गुण है। और स्वरूप स्वरूप क्या है? स्वरूप क्या है? स्वरूप भूत लक्षण

00:22:28:02 होता है। जो बदला नहीं जा सकता। लक्षण लक्षण वो होता है जिससे किसी चीज को पहचाना जाता है। उदाहरण के लिए बताऊं कि जैसे मान लीजिए कि कोई वस्तु चेतन है। सगुण इसको इसको मत बदलो तुम। तुम तुम सगुण की व्याख्या अपनी बता दो मुझे। फिर मैं उसको काउंटर करूंगा। सगुण की मैं वो बता देता हूं। बाकी जो मैंने जो आपने मेरे को बोला था उस वाले में मैं थोड़ी सी क्लेरिटी और दे देता हूं। उसमें मैंने ये बात बोला। मैंने ये नहीं बोला कि ईश्वर बल लगाता ही नहीं है। मैंने वहां पे बताया कि बल है क्या? मैंने ये बताया। मैंने बोला ना कि ईश्वर तो क्या है कि इच्छा करता है और जब अगर वो ऐसी इच्छा करता है जिसका यह परिणाम निकले तो उस फिरोगना को बल बोलते हैं। मैंने तो पूरा बताया लेकिन आप बल तो बल लगा रहे हैं ना। ईश्वर से गुण नहीं है ना। मैं अलग से कहां कर रहा हूं? मैं कह रहा हूं गुण नहीं है तो फिर अलग से गुण नहीं उसका बल के रूप में कम ज्यादा होना सिद्ध नहीं होता। सिंपल। ये कहां लिखा है? अलग से कोई बल नहीं है तो बल के रूप में कम ज्यादा होना सिद्ध है। माना मेरी बात को पलट रहे हो मेरी बात को। मैं ये नहीं मैं ये नहीं कह रहा हूं कि वो अलग से क्या कहते बल लगता है मगर अलग से नहीं लगता इसलिए वो जो है वो बल नहीं है ये कहां से सिद्ध हुआ? नहीं मैंने कब बोला कि मैंने कब बोला कि वो वो

00:23:27:03 इच्छा कर रहा हो या कुछ भी कर रहा हो पृथ्वी को घूमने के लिए धक्का मिलता है जिस कारण

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00:23:33:10 से वो घूम रही है जिस कारण से आप उसे धक्का ही देगा तो वही तो मैं कह रहा हूं कि एक देसी हो के काम करता है वो सगुण तभी तो हो रहा है तो सगुण देसी हो रहा तो तुम सगुण सगुण कर रहे हो उसको एक देसी आप केवल एक उसमें इमेजिनेशन कर रहे हो अरे भाई तुम मना कर रहे हो वो एक देसी दिख रहा है प्रत्यक्ष प्रमाण है भाई सूर्य रुका प्रमाण एक क्या बात कर रहे हो प्रत्यक्ष उसे बोलते हैं जिसका पंचेंद्रियों से ग्रहण हो रहा हो क्या बोल रहे हो आप क्यों ये जो ये प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है कि वो जो है पृथ्वी घूम रही है इत्यादि भैया जी प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं प्रत्यक्ष प्रमाण आप ईश्वर के एक देसी होने का थोड़ी मिल रहा है आपको पृथ्वी के घूमने का तो मिल रहा है आप ईश्वर की बात कर रहे हो पृथ्वी पे आ जा रहे हो पट से हैं देखो अरे भाई तो किसको किस पे काम करना सिद्ध करोगे तुम तो आपने ईश्वर को एक देसी बोलने का प्रत्यक्ष प्रमाण बोला ना अभी एक तो उसकी एक देसी सीता वो उससे सिद्ध होगी ना कि जहां पे काम जहां पे काम होना सिखाई दिखाई देगा और काम हो रहा हो नहीं रही ना सिद्ध हो इसलिए नहीं रही तुम

00:24:32:09 की व्याख्या दे नहीं रहे हो तुम अपने ग्रंथ का प्रमाण दे नहीं रहे हो की ईश्वर केवल इच्छा करता है बल नहीं है बल नहीं लगाता वो

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00:24:39:03 अब देखिए अब वही बात है ना अब अब मेरी मैंने मैं कुछ और बोल रहा हूं आप मेरी बात को मैं फिर यही हरकत मैं करूंगा फिर। तुम तुम बताओ ना मैं सुनने के लिए बैठा हूं तत्पर हूं मैं। है ना मैं आप कुछ और बोलेंगे मैं जबरदस्ती आपकी बात को अपनी मर्जी से इंटरप्रेट करूंगा। मैं तुमको कह तो रहा हूं कि तुम बताओ मुझे मैं सुनना चाहता हूं। है ना मैं बार-बार बोल रहा हूं कि अगर आप अगर कोई ईश्वर जो इच्छा करता है जिसके फलाना फलाना परिणाम जो मैंने गिनाए आपको मैं फिर से गिना देता हूं। ठीक है? वस्तु स्टिल है स्टेशनरी पोजीशन में मोशन में आ जाए मोशन में है रुक जाए डायरेक्शन चेंज हो जाए स्पीड कम हो जाए ज्यादा हो जाए या उसकी शेप चेंज हो जाए। ऐसे इफेक्ट्स दिखते हैं तो वो जो इच्छा की उस इच्छा के ही उस इच्छा मात्र को ही बल बोला जाता है। ये मैंने बोला। ठीक है? अब आप बलि नहीं बोला। बल ही नहीं बोला। बलि बल यानी कि बल लग रहा है। उस फिनोमना को बल बोल रहे हैं बल कोई अलग से गुण नहीं है। अरे भाई बल इच्छा लग रहा है उसी जैसे बल लग रहा है कि नहीं लग रहा है? अरे उस इच्छा को ही बल बोलते हैं और कुछ यानी कि कहीं पे कहीं पे इच्छा रूपी बल लग रहा है कहीं पे नहीं लग रहा है। कहीं पे इच्छा रूपी बल नहीं बोलेंगे। इच्छा रूपी बल नहीं बोलेंगे। इच्छा बोलेंगे इच्छा लग रही है। उस इच्छा को ही देखिए जैसे मान लीजिए 10 तरह की इच्छा है कि उनसे चार तरह की इच्छा को बल बोलते हैं। यही है। कर तो इच्छा रहा है ना? और इच्छा जो है इच्छा को बल बोलते हैं ना इच्छा को बल बोलते हैं इच्छा बल के

00:25:52:00 मैं बताऊं हो क्या रहा है कि उसकी जो इच्छा है वो जो भौतिक पदार्थ है उनपे बल का काम कर रही है यही तो होगा बल का काम बल का काम नहीं कर [हंसी] रही है और जब वो इच्छा करता है और फलाना फलाना एक्टिविटी होती है तो उस पर्टिकुलर चीज को उस फिनोमिना को हम लोग वो बोल देते हैं बल बोल देते हैं मतलब कि मतलब कि क्या कहते हैं ईश्वर जो है वो बिना किसी चेतन वस्तु के वहां पर उसको घुमाने लगता है। कैसा बिना किसी चेतन वस्तु के मतलब जैसे उसके अंदर चेतन तो है नहीं मटेरियल में मटेरियल थोड़ी चेतन है। है ना? अब उसने केवल इच्छा की और वो घूमने लगा। उसकी क्या सूचना गई? क्या नहीं गई? इसके इसको थोड़ा सा डिफाइन करोगे। कैसे वो घूमी कैसे वहां? क्या सूचना गई? मतलब इच्छा से कैसे घूम गई पृथ्वी? इच्छा

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00:26:37:10 मात्र से कैसे घूम? हां। तो वो घूमा तो वो खुद घूमा। वो खुद घूमा। हां। नहीं। ईश्वर थोड़ी घूमेगा तो सर्व्यापक कैसे घूम जाएगा? सर्व्यापक तो इंच भी इधर उधर नहीं। जब जगह ही नहीं है तो इधर उधर कैसे हो जाएगा वो? वाइफ। तो ठीक है तो सिद्ध करो फिर पृथ्वी को कैसे घुमाया बताओ? बोल तो रहा हूं इच्छा से सनिधि मात्र से प्रेम अरे तो भाई पृथ्वी को क्या एहसास हुआ उस इच्छा के द्वारा जो वो घूम गई पृथ्वी को पृथ्वी जड़ है उसको क्या एहसास होगा पृथ्वी को फोर्स मिली ना पृथ्वी को वो इच्छा से ही घूमा इसी चीज को ही बोलते हैं इच्छा मात्र सन्निधि मात्र जिसको हम लोग बल बोल दे रहे हैं ना वही वो इच्छा मात्र ही है और कुछ नहीं तो यहां तुम इच्छा से क्या कहते हैं पृथ्वी पर लागू होने वाले फोर्स को मान रहे हो ना उसको हम लोग बल बोल दे रहे हैं हां तो बल बोलना पड़ेगा ना बल बोलना पड़ेगा ना लेकिन लेकिन अब देखिए बात यह है बात यह है कि अब जैसे उसमें या तो आप यह करें या तो आप अगर आप इस चीज को बल को अलग से कोई फिनोमना लेकर के अलग से गुण स्थापित करें तब बल का कम ज्यादा होना मानेंगे ठीक है लेकिन बात ये आ जा रही है कि जब ईश्वर जो इच्छा क्योंकि हो तो वो इच्छा से ही रहा है है ना उसी इच्छा को ही हम लोग बल बोल रहे हैं अब वो इच्छा जो कर रहा है वो तो ऐसा तो नहीं कर रहा कि वो इच्छा जो वो इच्छा कर रहा है तो संपूर्ण ईश्वर कर रहा है ना कंप्लीट ईश्वर जो सर्व्यापक ईश्वर है वो कर रहा है ठीक है ठीक है अब क्योंकि कंप्लीट ईश्वर कर रहा है इसीलिए वो कम या ज्यादा नहीं हो

00:27:52:14 मैं बता रहा हूं कैसे हो रहा है। जब वो इच्छा संपूर्ण संपूर्ण ईश्वर कर रहा है। पूरा सर्वव्यापक ईश्वर कर रहा है तो किसी एक जगह पे अलग तरह का बल और दूसरी जगह पे अलग तरह का बल कैसे इच्छा में भेद है ना कि जैसी इच्छा कर रहा है वैसा हो रहा है। तो इच्छा में भेद के अनुसार बल में भेद हो रहा है ना। वो तो जैसे वही बात हो रही है मेरी इच्छा है कि मैं फल खाऊं मैं गाजर खाऊं। पंच भौतिक पदार्थों को मिलने वाला जो संपर्क है वो बल के रूप में प्राप्त हो रहा है वो कम ज्यादा हो रहा है उसका रूप भी बदल रहा है नहीं ईश्वर का नहीं बदल रहा ना वस्तु का बदल रहा है अरे जो जो उसको फोर्स प्राप्त हो रही है जो उसको फोर्स प्राप्त हो रही है वो ईश्वर का ही रूप है ना इच्छा का जो उसको फोर्स के रूप में प्राप्त हो रही है कि घूम वो घूम रही है फोर्स के रूप में प्राप्त हो रही है ना अब अब वो अगर सर्वव्यापी एक रस है तो उसकी वो फोर्स दुनिया के सभी कणों को प्राप्त होनी चाहिए। एक वो इच्छा के ऊपर डिपेंड करता है ना कि इच्छा अगर उसकी इच्छा यानी यानी कि उसकी फोर्स कहीं पे कम कहीं पे ज्यादा प्राप्त हो रही है उसकी इच्छा अनुसार। यानी कि उसकी यानी कि ये हुआ जो आप यानी कह रहे हैं तो उसका यानी ये अर्थ बैठेगा कि उसकी जहां इच्छा हुई जितने अंश में कार्य करने की इच्छा उतने में उसने इच्छा की वो कार्य।

00:29:05:20 यानी कि कार्य करने वाली जो फोर्स है उसके रूप में उसने अपनी इच्छा अनुसार कहीं पे कम फोर्स और कहीं पे ज्यादा फोर्स दी पंच भौतिक पदार्थों को। ठीक है? मतलब उसने जैसी इच्छा की वैसा काम हुआ सिंपल। नहीं तुम यहां पे मिस कर रहे हो। तुम यहां पे ये मिस कर रहे हो। तुम शक्ति को मिस कर रहे

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00:29:22:24 हो ना। वो जो फोर्स है वही शक्ति है ना। वो तुम आप शक्ति और ईश्वर को अलग मान रहे हो क्या? आप अलग कर रहे हो। फोर्स को अलग कर रहे हो उसकी इच्छा से। पंचत पंच मैं तो एक ही बोल रहा हूं मैं अलग कहां कर मैं अलग कर दूंगा तो फिर वो अलग गुण हो जाएगा मैं अलग तो आप भी तो कह रहे हो कि वो तो इच्छा है वो फोर्स नहीं है मगर उसको तो जब मैंने ये बोला कि वो इच्छा है फोर्स नहीं तो मैंने अलग कैसे किया मैंने तो एक किया ना इसलिए अगर मैं बोलता कि इच्छा और फोर्स अलग अलग है तब करना होता आप ये मान रहे हो ना कि आप ये मान रहे हो ना कि पृथ्वी को फोर्स प्राप्त हुई फिर आप कह रहे हो कि ईश्वर ने तो इच्छा की पर पृथ्वी के लिए वो फोर्स है हां तो मैंने एकता स्थापित कर रहा हूं ना यहां पे अलग-अलग कहां कर रहा हूं एकता एकता इसलिए स्थापित नहीं हो रही कि अगर पृथ्वी के लिए हो रही नहीं है आपने बोला ना कि मैं अलग-अलग कर रहा हूं मतलब मैं बता तो रहा हूं बता तो रहा हूं मेरे भाई सुनो तो तसल्ली सुनो

00:30:10:14 पृथ्वी को प्राप्त हो रही है फाॅर्स अब वो ईश्वर ने उसकी इच्छा की है मगर पृथ्वी को फाॅर्स

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00:30:15:25 प्राप्त हो रही अब ये फाॅर्स आई कहां से इच्छा के कारण आई और फाॅर्स है कौन अलग से कोई तत्व है क्या नहीं नहीं वही इच्छा ही है वो तो इच्छा ही है ना ईश्वर ही है फाॅर्स के रूप में वहां पे ईश्वर ही है इसीलिए उसको कहा के रूप में मतलब बोलिए जैसे बात ये है ना आपको ऐसा लग रहा है कि फोर्स कोई अलग वस्तु है तो फोर्स के रूप में इच्छा ठीक है बात ये है कि फोर्स कोई अलग वस्तु है नहीं फोर्स केवल एक शब्द है जो हम तब बोलते हैं जब हम ये हमें कोई पर्टिकुलर इफेक्ट दिखाई देता है जैसे कि गति करना रुकना गति वस्तु अगर हमें ये परिणाम दिखाई देते हैं तो ये जो परिणाम का जो कारण स्वरूप होता है उस कारण रूप इच्छा को हम लोग फोर्स बोलते हैं। ठीक है? तो यानी कि यानी कि कहीं पर कम कहीं पर ज्यादा फोर्स के रूप में ईश्वर की इच्छा के रूप में ईश्वर ही है ना। यानी ईश्वर अब देखिए कम और ज्यादा क्यों नहीं बोलेंगे? इसमें पॉइंट ये आ जाएगा कि अब ईश्वर ने इच्छा की अब जो ईश्वर ने इच्छा की कि ये जो पत्ता है ये हिले। ठीक है? अब ये जो इच्छा ईश्वर ने इच्छा की तो क्या ईश्वर ने हम ये नहीं बोलेंगे ईश्वर ने कम इच्छा की। ईश्वर ने ज्यादा इच्छा की। ईश्वर ने जो इच्छा की वो तो संपूर्ण ईश्वर में एक बराबर ही इच्छा हुई ना। तो एक रास्ता है। हां। तो फिर सारे पत्ते क्यों नहीं हिले? क्योंकि ईश्वर ने इच्छा ही यही की कि एक पत्ता हिले तो वो उस एक पत्ते को फोर्स मिली ना वहां पे ईश्वर के इच्छा ईश्वर के इच्छा करने के कारण पत्ते को फोर्स मिली

00:31:30:28 है ना मतलब तुम ये कह रहे हो तुम ये कह रहे हो यानी ईश्वर ने इच्छा की और वो पत्ता हिला वो जो परिणाम हुआ उस परिणाम को हम फोर्स बोल रहे हैं सिंपल परिणाम को फोर्स बोल रहे हो परिणाम को कैसे बोल फोर्स बोल सकते हो क्यों चौथी क्लास की साइंस की बुक में आ रखा है सुनो सुनो सुनो सुनो सुनो सुनो परिणाम मतलब पृथ्वी का घूमना फाॅर्स है ये पृथ्वी पे फोर्स घुमा घुमा रही है ये इसमें ये होता है कि जैसे मान लीजिए हमने कोई क्रियाकलाप देखा ठीक है नहीं एक मिनट अभी तुम्हें परिणाम जरा सिद्ध कर दो पृथ्वी का घूमना वही मैं वही चीज सिद्ध कर रहा हूं मैं वही चीज सिद्ध कर रहा हूं अभी तक मैं वही बोल रहा था अब जैसे ये होता है कि जैसे मान लीजिए कि कोई बॉल मेरे सामने रखी है हम ठीक है इसमें फोर्स लगा नहीं लगा कैसे पता तो क्योंकि अब इसमें अब जब हम वो चार पांच इफेक्ट जब तक इसमें नहीं हटेंगे नहीं दिखेंगे हमें तब तक हम क्लेम नहीं कर सकते कि इसमें फोर्स लगा अब ये बॉल खड़ी है और इसको मैंने बुला तो मारा और ये बॉल चलने लग गई तो हम मानेंगे कि अगर इसमें में स्टेशनरी सेम मोशन में आई है। तो यानी इसमें फोर्स लगा है। यानी हमने क्या किया? यानी हमने माना कि ये जो परिणाम हुआ इस परिणाम को देख के हमने ये अस्यूम किया कि नहीं इसमें जो ये जिस भी कारण से हुआ ये फोर्स है। हमने उसको नाम दे दिया कि फोर्स हां मतलब परिणाम का कारण फोर्स है। परिणाम फोर्स नहीं है। परिणाम परिणाम हो जाएगा। परिणाम का अभी तुमने अभी तुमने कंफ्यूज किया था ना। तुमने परिणाम को ही फोर्स कर दिया। बोला यही था। हो सकता है कि हां वो मैं समझ गया। त्रुटि हो। निकल गया होगा। नहीं

00:32:46:02 नहीं तुमने बोला यही था। तुमने यह बोला ना यही बोले आ रहा हूं मैं बार अपनी बात कई बार रिपीट कर चुका हूं हां तो गलती हो गई होगी रिपीट बार करने के कारण तो परिणाम परिणाम में क्या कहते हैं परिणाम से ज्ञात होता है कि फाॅर्स है वहां पे तो फाॅर्स को मान लिया ना हमने अरे भैया अभी मैंने क्या बोला था इस बार फाॅर्स फाॅर्स के अस्तित्व को माना कि नहीं माना उसको एक्सप्लेन कर देने से उसका अस्तित्व थोड़ी ना नकार सकते हो फाॅर्स का अस्तित्व है की नहीं भैया मैंने ये बोला हां हां हां हां कि जैसे जैसे मान लीजिए इसको ऐसे समझिएगा बड़ा सिंपल है कि मान लीजिए बॉल खड़ी है। ठीक है? इसको मैंने अब ये बॉल मूव मूव करने लग गई। ठीक है? खड़े-खड़े अचानक से ये मूव करने लग गई। तो अब ये अब ये जो मूवमेंट हुआ इसको हमने इसको बोला कि ये मूवमेंट हुआ यानी यहां पे फोर्स लगा। ठीक है?

00:33:31:03 इसको हमने लौकिक भाषा में हमने इसको ऐसे बोल दिया कि इसको यहां पे फोर्स लगा तब ये वाल मूव करी। कैसे परिणाम देख के? अब इसमें अब इसमें अब इसमें आगे क्या आ रहा है? अब लौकिक भाषा से हम उसको फोर्स पूरा पूरा बोल देता हूं। ठीक है ना? अब इसमें ये आया अब ये जो ये जो मूव हुआ ये क्या था क्या ऐसा हो गया कौन सा तीर लग गया इसमें कि मूव हो गया तो पॉइंट यहां आया कि ये इच्छा से ही मूव हुआ ठीक है

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00:33:52:26 लेकिन उस पर अब जैसे मेरी इच्छा ये भी थी कि बॉल यहीं रहे मेरी इच्छा तो ये भी थी लेकिन फिर जब मेरी इच्छा ये होगी कि अब ये बॉल मूव करे तब मैंने किक किया और ये बॉल मूव भी करी यानी दो प्रकार की इच्छाएं हो गई जब तक ये मेरी इच्छा थी कि बॉल यहीं रहे ठीक है तो उस इच्छा को हम फोर्स नहीं बोलेंगे हम इच्छा को ही फोर्स बोल रहे हैं ठीक है एक प्रकार की इच्छा को हम फोर्स बोल रहे हैं दूसरे प्रकार की इच्छा को फोर्स नहीं बोल रहे इतना ही है अंतर मेरी का अस्तित्व है ना मेरे भाई फोर्स का अस्तित्व नहीं है अलग से कोई इच्छा ही है वो तो इच्छा फोर्स के रूप में प्राप्त हो रही है ना पंच भौतिक पदार्थों को उसको केवल जब जिस इच्छा से अगर निकल रहा है इच्छा को फोर्स बोल रहे हो हम अगर जिस इच्छा से हां तो इच्छा को फोर्स बोलना पड़ेगा ना फोर्स बोलना पड़ेगा ना क्यों मान रहे हो आप अलग से क्यों मान रहे हो नहीं अलग से फोर्स वो फोर्स कम ज्यादा हो रही है ना नहीं अलग से आप क्यों फोर्स मान रहे हो देखिए अगर आप खुद ही कह रहा हूं हां ठीक है अगर आप ये बोलेंगे कि सुनो मैं बताऊं हो क्या रहा है हो क्या रहा है मैं बताऊं तुम जो है ठीक है सही पॉइंट पे आ गया एकदम सही पॉइंट पे आ गया मैं मैं बोलना चाहता हूं मैं आपकी इसी स्टेटमेंट को ले रहा हूं आपकी इस स्टेटमेंट को ले ले रहा हूं कि फ़ कम ज्यादा हो रहा है ठीक है तो अगर आप ये कहेंगे कि अगर आप ये कहेंगे कि फोर्स कम ज्यादा हो रहा है अल्टीमेटली आप यही कह रहे हैं कि इच्छा कम ज्यादा हो रही है तो इच्छा ही इच्छा

00:35:08:07 अनुसार फ़ यही यही यही तो अंतर है मैं बोल रहा हूं कि इच्छा अनुसार फोर्स कम या ज्यादा नहीं हो रही है। इच्छा ही फोर्स है। मैं यही तो बोल रहा हूं। ठीक है। ठीक है। ठीक है। इच्छा ही है। अब मैं बता रहा हूं है क्या। कि भगवान ने तो केवल इच्छा की। ठीक है? उस इच्छा के कारण जो हमारे पंचभौतिक पदार्थ है उनको जो है फाॅर्स प्राप्त हुई। जिसके कारण वो क्रियाशील दिखने लगे। ठीक है। नहीं नहीं ये नहीं है। हां हां हां बताओ क्या है। इच्छा ही इच्छा ही फोर्स है। जिस इच्छा से गति प्राप्त हुई उस इच्छा उस इच्छा पर्टिकुलर इच्छा कौन? भाई इच्छा ही है मगर वो फाॅर्स के रूप में प्राप्त हो रही है पंच भौतिक पदार्थों को और वो है तात्विक तात्विक विवेचना उसकी इच्छा है नहीं तात्विक फाॅर्स को भी तात्विक विवेचना के रूप में नहीं अगर अगर तुम इच्छा कहोगे तो फिर वो इच्छा सूचना कैसे पहुंची है पंचौतिक फिर ये फोर्स कैसे पहुंचा? फाॅर्स तो उसकी शक्ति है भैया धक्के के पास उसका एक्सप्लेन करिए फिर शक्ति को अगर आप इच्छा को एक्सप्लेन करने को बोलेंगे शक्ति को एक्सप्लेन करने को बोलूंगा। अरे भैया तो हमें मानना पड़ेगा ना यहां पर अचिंत शक्ति भाई तो मैं तुम्हें अचिंत मनवाना चाह रहा हूं। नहीं अचिंत इसलिए नहीं बोलेंगे क्योंकि हमें पता है कि इच्छा लग रही है तो अचिंत कहां रह गया फिर वो वो काम कैसे कर रही है यह अचिंत है ना वो एक अलग बात हो गई तो बस अचिंत तुमने मान लिया कि दुनिया में

00:36:23:20 कुछ अचिंत होता है आप जबरदस्ती बोलेंगे तो थोड़ी हो जाएगा तुम एक्सप्लेन नहीं कर सकते मेरे पक्ष का उत्तर भी तो सुन लीजिए हां बताओ उसमें पॉइंट शायद ये चल रहा था कि इच्छा ही फोर्स है शायद ऐसा कुछ पॉइंट चल रहा था ना हां हां एक्सप्लेन वाला एक्सप्लेन वाला एक्सप्लेन वाला पॉइंट चला था कि अगर तो मैंने मैंने ये बोला कि जैसे मुझे पता है कि ये जो ये जो कार्य हुआ है इसका कारण क्या है? ठीक है? अब ये तो कारण तो पता चल गया लेकिन इस कारण ने ये कार्य किस प्रकार के मैकेनिज्म क्या है? तो मैकेनिज्म का ना पता होना और कारण का ना पता होना दोनों में अंतर है। ठीक है? अब जब हम बोलते हैं ना किस कैसे किया? ठीक है? यानी यानी इसका कारण क्या है? तो अब कारण बोल देते हैं अचिंत शक्ति। तो वहां पे मैं आपसे मैकेनिज्म नहीं पूछूंगा किस प्रकार किया? उस शक्ति ने कैसे क्योंकि वो शक्ति का मैकेनिज्म तो मैं खुद मतलब अभी नहीं बता रहा है ना मैकेनिज्म को समझने को तो फिजिक्स बोलते हैं फिजिक्स जो पूरी प्रणाली बनी हुई तो यही मैकेनिज्म ही समझेंगे दुनिया कैसे बनी है क्या काम करता है क्या फोर्स है वो अलग बात हो गई तो मैकेनिज्म पे बात नहीं है बात ये है कि उसका कारण क्या है अब आप कारण को अचिंत बोल देंगे तो फिर वहां हलफा हो जाएगा ना हम तो कारण बता रहे है आप कारण को अचिंत बोल दे रहे है पॉइंट यहां पे ये टकराव आ रहा है नहीं तो मैं उस विधि को पूछ रहा हूं कि वो सूचना कैसे प्राप्त हो रही है वहां ये तो मैकेनिज्म पे आ गए ना आप हां तो अब मैकेनिज्म समझाओ ना मुझे नहीं अभी मतलब

00:37:38:24 मैं ये कहना चाह रहा हूं मैंने क्या लाइन बोला मैं मैं ये कहना चाह रहा हूं कि जैसे पृथ्वी भूमि तो उसको कोई फोर्स प्राप्त हुई या फिर उसको कोई नहीं वो वो इच्छा देखो तुम वहां शब्दों का खेल है मैं बता रहा हूं [हंसी] एक मिनट एक मिनट एक मिनट जब

00:38:00:26 पृथ्वी घूमी तो उसके कोई ब्रेन है जिसमें उसको पता लगा कि ईश्वर की इच्छा ये है तो यह करना है। उसको क्या प्राप्त हुआ? उसको क्या प्राप्त हुआ? भाई तो इसका मतलब इच्छा प्राप्त हुई। यानी कि मतलब तुम ये मान रहे समझ सकते हैं ना। इसका मतलब एक मिनट एक मिनट एक मिनट 1 मिनट। यानी कि तुम ये मान रहे हो वहां पे कोई बल नहीं लगा। बस वो घूम गई। कुल मिला के कहना ये और जब वो घूमी तो उसी घूमने वाले जिस इच्छा को यानी जब ईश्वर ने इच्छा की नहीं कि तू घूम। ठीक है? यानी कि वो जो इच्छा है उसी इच्छा को हमने बल बोला। अरे तो फिर बल लगा बल मिला ना ऐसे बोलो ना कि बल मिला उसको नहीं बल मिलना अलग बात हो

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00:38:41:10 गई और हमने बल बोला हमने बल बोला पर उसको बल मिला नहीं वो अच्छा ही है बल जैसा कुछ नहीं है यानी कि तुमने अभी क्या बोला कि उसको उसको हमने बल बोला बल बोला कि नहीं बोला? बल हमने किसको बोला? बल हमने तब बोला ना अभी वही बात है ना। मेरे को लिखित रूप में आपको देना पड़ेगा क्योंकि आप मेरी बात को वो बार-बार कहिए ना मेरे को बार-बार आप बोलते रहते हैं। एक मिनट होल्ड करो हां एक मिनट होल्ड करो। जी जी तो अभी हम लोग यहां तक पहुंचे हैं कि जो इच्छा इक्वल टू बल हां जो इच्छा होती है उसे हम बल बोलते हैं। ठीक है पर्टिकुलर इच्छा इज इक्वल टू बल नॉट कंप्लीट इच्छा बट पर्टिकुलर इच्छा इक्वल टू बल ऐसा ही है। हां अब इसको यहां रोकिए फिर मैं नहा के आता हूं फिर बात करते हैं।

00:39:20:12 और तुम वो भी बताना कि वो केवल इच्छा करता है बल नहीं लगाता। बता तो दिया मैंने और क्या बताना है प्रूफ तो कर दिया मैंने। तुम्हारे ग्रंथ से बताओ। अच्छा हमें आर्य समाज को गलत सिद्ध करना है ना। अब वो तो अगर कोई आर्य समाज के नाम से आर्य समाज के सिद्धांतों को क्रॉस करता चला जाएगा धीरे-धीरे अद्ती हो जाएगा उससे हमें क्या मतलब है नहीं आर्य समाज में स्वामी दयानंद छह के छह दर्शनों को माना हुआ है आर्य नहीं वो ठीक माना है उसमें कहीं उन्होंने ये बाला है उन्होंने माना है कि मेरा जो ज्ञान जो प्रदर्शित हो रहा है जो मैं बातें बोल रहा हूं कहां से बोल रहा हूं छे दर्शनों के समन्वय के आधार पर बोल रहा हूं अगर एक भी दर्शन हटा दो मेरा ज्ञान खंडित हो जाएगा ये ऐसे बहुत से लोग बोलते हैं मगर यह बात स्वामी दयानंद जी ने मानी है कि नहीं मानी कि ईश्वर बल नहीं लगाता ईश्वर केवल इच्छा करता है तो बात वही आ जाती है ना बात वही आ जाती है कि अगर वो बात बोल रहे हैं और जिस उन्होंने ग्रंथों को स्वीकार कर रखा है ठीक है तो हम ये मानेंगे ना कि दयानंद जी गलत थे जो उन्होंने छह दर्शनों को भी मान लिया और जो है ये भी कह दिया कि ईश्वर जो है बल लगाता है नहीं बोलने का आधार क्या होगा? यही की उनकी बातें मिस मम्मैच हो रही है। अगर तुम अगर तुमच तब होगी जब उनके विरुद्ध में बात होगी। मैं बता रहा हूं। जैसे तुमने छह दर्शनों से सिद्ध किया कि ईश्वर इच्छा करता है बल नहीं लगाता। ठीक है और उन्होंने उन्होंने ये कहा है कि मैंने जो भी बात बोली छह दर्शनों के हिसाब से बोली

00:40:35:13 है ठीक है इच्छा से चाहिए ना मैं आपको भी दिखाता हूं भाषण है मैं मैं तुम्हें बल भी दिखा दूंगा मैं बल भी दिखा दूंगा तुम्हें उन्हीं का लिखा हुआ है कि बल बल होता हां तो हां तो बात ये है ना कि अब उसकी व्याख्या कौन करेगा उसकी व्याख्या भी करेंगे जो शिष्य मैं हम शिष्य की व्याख्या करेंगे ना तुम उन्होंने तुम्हें अपना प्रामाणिक शिष्य घोषित किया है क्या? नहीं उनकी शिष्य उनकी परंपरा में आता हूं ना मैं उनकी गुरु परंपरा में अरे भाई वो आपको अपना प्रामाणिक रूप से बोलने वाला मान रहे हैं कि नहीं मान रहे ये कैसे तय होगा अरे मैं आ तो रहा हूं मेरे को उनके ज्ञान प्राप्त हो रहा है ना इसीलिए हमको उनकी चीजों का और रिसर्च किया जो उन्होंने बोला था ना कि मेरे को प्रमाणिक मेरे को अच्छा सेशन नहीं मिला उन्होंने पहले बोला था बाद में उन्हें मिले थे मेरे को थोड़ा और मैंने पता किया तो इसका मतलब उससे मान लिया जाए आप उनकी ओर से बोलने वाले प्रामाणिक व्यक्ति है बिल्कुल है उन्होंने जबकि घोषित नहीं किया है हम ये हम ये क्यों ना हम ये क्यों ना मान ले कि दयानंद जी को आता नहीं था। आपको आता है। नहीं तो ये बात आपको कैसे ये बोलने का आधार क्या बनेगा इस बात का? दयानंद जी नहीं बता पाए वो बात जो तुम बता रहे हो और क्या नहीं बात ये है बात ये है कि जैसे वही बात है ना कि अब जैसे स्वामी दयानंद जी ने कुछ बात बोला ठीक है अब उन्होंने वो बोल रहे है कि मैं इस चीज को संक्षेप में बता रहा हूं संक्षेप में किसी किताब में लिखा अब आप कह रहे हो शब्द प्रमाण दो अब शब्द प्रमाण पूरा सुनिए नहीं आपने आरोप लगाया

00:41:50:14 पूरा सुनिए अब आपने अब आपने अब मैंने उस शब्द प्रमाण यानी संक्षेप वाला जो था मैंने शब्द प्रमाण आपको दिखा दिया और शब्द प्रमाण दिखाने के बाद में आप बोलेंगे नहीं विरोध में भी मैं दिखा दूंगा बल भी लगाते हैं तो उस चीज को मैं एक्सप्लेन करूंगा ूंगा ना एक्सप्लेन कौन करेगा जो उनका शिष्यों को एक्सप्लेन करेगा। अब आप मेरे को क्या कह रहे हो कि नहीं अगर मैंने उस चीज को एक्सप्लेन किया जो स्वामी देन जो मेरे आचार्य जी ने लिखा हुआ है उस चीज को मैं एक्सप्लेन करूंगा तो आप कह रहे हो कि नहीं उनको नहीं आता ये प्रूफ हो जाएगा। वाह वाह वाह वाह बहुत बढ़िया यही काम मैं आपके साथ करूं। नहीं नहीं बात ये है जी को बोलूं कि उनको नहीं आता था। तो उनके जो प्रामाणिक शिष्य है वो तो है वहां उनकी बात प्रमाणिक शिष्यों को आता है उनको नहीं आता। अरे भाई वो घोषित करके गए हैं ना। घोषित नहीं किया है ना। हमें बोला है हमारे शिष्यों को स्वीकार किया है। भाई शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया घोषित किया है। कहां घोषित किया? उन्होंने तो कहा मेरा कोई प्रतिनिधि मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुम उन्होंने नहीं उन्होंने बाद में मान लिया ना बाद में पहले उन्हें लगा बाद में उन्होंने किसको माना किसको माना गुरु विद्यार्थी को माना किसको विद्यार्थी को माना गुरुदेव विद्यार्थी को माना गुरुदेव विद्यार्थी को माना तुमने तो खुद ही कहा था कि भैया वो अभी मैंने एक और लाइन बोली वो आप क्यों छोड़ दे रहे पकड़िएगा आगे वाली बात छोड़ दीजिएगा यही करना है अरे भाई जब तुम ही अपनी बातों को बदलते हो तुमने मुझसे यह कहा था कि दयानंद जी ने खुद कहा कि भाई मेरा कोई उत्तराधिकारी बन सके ये मैं किसी शिष्य में ऐसी वो नहीं देखता हूं तो इसलिए उनका उन्होंने उन्होंने पहले कहा था अच्छा हां

00:43:05:15 बाद में उन्होंने मिला क्या कौन मिला क्या नाम बताया तुमने गुरुदत्त विद्यार्थी उनके तुम विद्यार्थी हो गुरुदत्त विद्यार्थी से चलते आ रहे हैं हम लोग पूरी परंपरा और भी आचार्य हमारे जो उनके शिष्य बने हैं चलो ठीक है तो तुम अब ये प्रमाण ले आओ ये वाला इच्छा वाला ठीक है

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 43:43 · 31 Mar 2026

ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं केवल इच्छावान है। भयभीत अलंकार समाज कॉल रिकॉर्डिंग भाग २

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