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00:00:00:10 आप अपना अग दर्शको को दे बता का है कुमार बनाता है जिसे घड़ा बोलते जी शंकराचार्य मठों के शिविर लगे हुए हैं जी और म हमारा गोवर्धन मठ पुरी आदि गुरु शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया है उ पर भाष्य किया है भी किया हो महाराज धर्म की उपयोगिता हमारा समय खम क्या हुआ जब हम गए एक फर्जी शंकराचार्य के शिविर में आप लोगों को बता द इस समय हम कुंभ में है और कुंभ में बहुत तरह के संत गण भी यहां पर आए हुए हैं हमारे धर्म को आगे बढ़ाने वाले लोग भी आए हुए हैं और साथ ही साथ छगन जो बेस धारण कर करके हमारे ही धर्म को हानि पहुंचाते हैं ऐसे बहरू भी कुंभ में आए हुए हैं अब वो एक लोकतंत्र है जिसके कारण से जो फिल्टर होना चाहिए कि कौन पाखंडी है कौन सनातन का दुश्मन है और कौन सनातन का पक्षधर है और किसको कुंभ में आना चाहिए यह सारा फिल्ट्रेशन पॉसिबल

00:01:15:19 नहीं है इसलिए यहां पर आपको कुंभ में जो भेष धारी पाखंडी जो संत का चोला ड़ करके चल रहे हैं वो भी मिल जाएंगे और जो वास्तविक परंपरा प्राप्त प्रामाणिक आचार्य गण है वो भी मिल जाएंगे तो जब हम कुंभ में पहुंचे और हम कवर कर रहे थे कुंभ को तो उसमें हमें मिला एक नकली शंकराचार्य का शिविर ये जो नकली शंकराचार्य है इसकी कहानी थोड़ी सी बता दें एक प्रस्ताव आया था कांग्रेस की ओर से नरसिंहा राव के समय में कि राम मंदिर जहां पर है वहां पर मस्जिद भी बन जाए ऐसे एक प्रस्ताव पर पूरी पीठ के जो वर्तमान शंकराचार्य हैं इनका हस्ताक्षर कांग्रेस को चाहिए था और वर्तमान जो पुरी शंकराचार्य जी है स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज उन्होंने वह हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था कि नहीं अगर बनेगा तो सिर्फ मंदिर बनेगा वहां पर मस्जिद नहीं बनेगी मतलब वो उनका कहना था कि वहां पर मस्जिद बन जाए तो यह मंदिर और मस्जिद का जो विवाद है वह खत्म हो जाए मस्जिद भी बन जाए और मंदिर भी बन जाए पर गुरुदेव ने जगतगुरु है उन्होंने मना कर दिया था अब इस कारण से द्वेष वश नरसिमा राव के द्वारा एक तथाकथित व्यक्ति को शंकराचार्य

00:02:31:01 के रूप में ख्या पित कर दिया गया व भी गोवर्धन मठ पुरी पीठ के नाम से और वह शंकराचार्य आज तक चल रहा है घूम रहा है विदेश यात्रा कर रहा है कई बार हमारे आज की जो सरकार है उसके द्वारा भी उससे जुड़े हुए कई लोग भी उनके उसके साथ दिखाई देते हैं तो यह शंकराचार्य की कहानी है यह कैसे बना था और मगर एक खास बात है जब हम जब यहां पर आए कुंभ मेले में और हमने यहां का जो कुंभ सहायता का जो एक

00:03:30:06 तो सही चीज के भी कहना बनता है तो प्रशासन ने साफसाफ कहा कि सभी शंकराचार्य का शिविर जो है सेक्टर 19 में है तो हमें बड़ा अच्छा लगा क्योंकि जो फर्जी शंकराचार्य का शिविर लगा हुआ है यह सेक्टर 18 में लगा हुआ है तो सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही मगर कहीं ना कहीं एक समर्थन किया कि नहीं भाई जो शंकराचार्य व आपको सेक्टर 19 में ही मिलेंगे मगर वो एक अलग बात है कि जब वो शंकराचार्य है ही नहीं तो उसको शंकराचार्य के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करते हुए और कुंभ के मेले में शिर लगाने की अनुमति क्यों दी जा रही है क्यों कु को शंकराचार्य कह पा रहा है क्यों विदेश यात्रा कर रहा है शंकराचार्य के नाम से यह सब प्रश्नवाचक प्रश्न है जो बनते हैं मगर खैर हम उसके शिविर में गए एक सबसे हसी की बात यह है तो सभी को जय श्री राम हम लोग इस समय कुंभ में है और सनातन की सांस्कृतिक रोवर कहा जाता है इसको और हमारे साथ में पूज्य शंकराचार्य जी महाराज जी हैं और इनके आज हमको कृपा वचन कुछ प्राप्त होने वाले हैं तो

00:04:42:25 पहले मैं आपको प्रणाम करता हूं महाराज जी अ तो थोड़ा सा आप अपना अगर परिचय दर्शकों को दे दे कुछ बता दे लिख

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00:04:55:04 देगा परिचय लिख देगा परिचय लिख देगा कि जब इस फर्जी शंकराचार्य से हमने इसका यूंही थोड़ा सा महिमा बखान करते हुए और कहा कि आप थोड़ा सा अपना परिचय दे दीजिए हमारे दर्शकों को अगर वास्तविक संचार होते इस प्रश्न पर हमारे चपेट मार देते कि हमारे पास आए हो हमसे हमारा परिचय पूछ रहे हो मगर क्योंकि इसके मन में चोर था क्योंकि यह इसकी जो बुनियाद है वो झूठ पर टिकी हुई है तो इस व्यक्ति को अपना परिचय देने में भी लज्जा आई इस व्यक्ति के मुख से बोल नहीं फूटे ऑन कैमरा कि मैं शंकराचार्य हूं गोवर्धन मठ पूरी पीठ का क्योंकि व नहीं है क्योंकि व नकली है तो जब हमने इससे कहा कि भाई आप अपना परिचय दे दीजिए तो व्यक्ति क्या कहता है लिखित में दे देंगे देखिए सर्वप्रथम हमने उससे कुछ ऐसे प्रश्न किए जिससे कि वो अगर यह सोच रहा हो कि पता नहीं से प्रश्न मेरे सामने आने वाले हैं तो वो थोड़ा सा थोड़ा काम डाउन हो जाए थोड़ा सा नर्वसनेस उसकी खत्म हो जाए तो हमने सबसे पहले उससे यही पूछा

00:06:10:10 कि कुंभ मेले की कथा क्या है तो भाई कथा वा चने में तो सब आगे रहते हैं तो उसने किस प्रकार से उत्तर दिया कथा बचते हुए व आप देखिए तो महाराज जी कुंभ की विशेषता क्या है क्या अर्थ है कुंभ का यह थोड़ा सा कुंभ के बारे में बता कुंभ है मतलब कुभ का अर्थ है कुमार बनाता है जिसे घड़ा बोलते हैं वही कुंभ अच्छा सतयुग में जी देवता और दैत्य ने मिलकर समुद्र मंथन किया था जी भगवान श्री हरि के निर्देशन में जी उससे 14 रत्न निकले

00:06:55:03 थे इसमें विष भी था ऐरावत हाथी जो इंद्र को दे दिया गया जी देवलोक की शोभा बढ़ाने के लिए उचे शवा घोड़ा जो दैत्य लोक में महाराजा बली को दिया दे दिया गया जी कस्त मणि और रमा नाम की लक्ष्मी निकली जो श्री हरि नारायण ने ले लिया जी अब सराए निकली जो इंद्र लोक को दे दी गई जी और फिर अमृत निकला जी भगवान विष्णु के अवतार भगवान धनवंतरी उस समुद्र मंथन की प्रक्रिया से समुद्र से स्वर्ण के घड़े में कुंभ में अमृत लेकर प्रकट हुए जी और वह अमृत भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर अपनी लीला चलाते हुए देवताओं को पिला दिया जिससे कमजोर हुई जो देवी शक्ति थी जिनका राज पार छिन गया था जी देवलोक में का कब्जा हो गया था फिर से देवता शक्तिशाली हुए अमरत्व प्राप्त हुआ उन्हें और अपने लोक को फिर से प्राप्त हुए

00:08:10:06 फिर फिर उनकी संप्रभुता कायम हुई तभी से यह महाकुंभ का प्रचलन है जब ग्रह नक्षत्र वार तिथियां उसी तरह उसी संजोग में आ जाती हैं तो अमुक अमुक जगह में चार जगहों पर योग आता है और वहां अमृत प्रकट होता है और यह समय दैविक शक्ति को मजबूत करने के लिए सबको सिद्धि प्राप्त करने के लिए जी और विश्व कल्याण के लिए सर्वोत्तम समय होता है चार स्थानों में हरिद्वार उत्तराखंड नासिक महाराष्ट्र उज्जैन मध्य प्रदेश सिपरा तट में और यह तीर्थराज प्रयाग जहां गंगा जमुना सरस्वती संगम होता है यहां पर लगता है और अभी यह महा संजोग तीर्थराज प्रयाग में आया है और आप देख रहे हैं कि यह विराट कुंभ मेला यहां कोई सामान्य मेला नहीं है य जी यहां सब साधक आए हुए हैं सिद्ध पुरुष आए हुए हैं साधनाएं चल रही है

00:09:25:26 आत्म कल्याण के लिए जगत कल्याण के लिए रा की उन्नति के लिए तरह तरह के यज्ञ अनुष्ठान विधान किए जा रहे हैं जो हमारे वेदों में वर्णन है जी यह शंकराचार्य शिविर जो हमारा है सभी कुंभ में लगता है यहां भी विशाल वैदिक यज्ञ चल रही है जी जो राष्ट्र के समृद्धि के लिए जी और सबके कल्याण के लिए किया जा रहा है बहुत ही अच्छा हमको कुंभ के बारे में एक डेफिनेशन प्राप्त हुई है क्योंकि आजकल लोग यह भी कर रहे हैं कि भाई कुंभ में जाने से घबरा रहे हैं और बहुत ज्यादा भीड़ है बहुत ज्यादा मतलब आने में हच पच हो रही है तो इस इस बारे में थोड़ा सा आप बताना चाहेंगे क्या कर भीड़ तो बहुत है और होती आई है हमेशा कुंभ में जी और भीड़ होना भी चाहिए क्योंकि ये सनातन धर्म का सबसे बड़ा पवित्रतम और महानतम समागम है मेला का मतलब मेल मिलाप है और यह भारतवर्ष सनातनी है और हमाने सनातन परंपरा को मानने वाले श्रद्धालु भारत से बाहर भी

00:10:41:13 पूरी दुनिया में रहते हैं सबको इस बात का इंतजार होता है कि वह महाकुंभ का पर्व आएगा तो हम भी जाएंगे जी तो भीड़ तो होना स्वाभाविक है और बहुत लोग ऐसे हैं जो शरीर से नहीं आ पा रहे लेकिन मन से सम्मिलित है तो एक तरह से पूरी पूरी दुनिया ही पूरा उत्तर प्रदेश और भारतवर्ष ही नहीं पूरा दुनिया इस समय कुंभ में माहौल में रंगा हुआ है कुछ लोग काफी सारे लोग यहां प्रयाग आ पहुंचे हैं और बहुत लोग नहीं आए जो अपने अपने जगह से आनंद मना रहे हैं तो जो आए हुए हैं उनको और जो आना चाहते हैं उनको भी चिंता करने की ड़ने की कोई जरूरत नहीं है य सब कुछ बहुत सामान्य व्यवस्थाएं चल रही है और यहां के सरकार ने और यहां के मुख्यमंत्री जी ने जो खुद एक साधक और सिद्ध है एक विशा महान संत परंपरा के संवाहक हैं वह उन्होंने पूरे लगन के साथ इस दिन के लिए इस उत्सव के लिए पिछले दो सालों से तैयारियां की हैं बहुत व्यापक स्तर पर और बहुत बड़े क्षेत्र में यह मेला फैला हुआ है चाहे जितने भी लोग आ जाए सबको सुविधा है

00:11:56:14 सब स्नान करें गंगा में ध्यान कर कर और अपने जीवन को धन्य बनाए हमारी हजारों हजारों धार्मिक संस्थाएं आई हुई है यहां जी शंकराचार्य मठों के शिविर लगे हुए हैं जी और अन्य हमारे जो सनातन परंपरा साधु संता आचार्य हैं वैष्णव हैं उदासी हैं नाथ संप्रदाय के लोग हैं और स्वयं सेवक संस्थाएं भी हैं यहां शिविर लगाकर खाना खिला रही हैं रहने का प्रबंध कर रही हैं और हर तरह से यहां कार्यकर्ता लगे सग कर रहे हैं सरकार की ओर से भी यहां बहुत अच्छे अच्छे रन बसेरा बनाए गए हैं जी तो सर्दी का मौसम है उसके बावजूद भी यहां कोई चिंता का नहीं है सब कुछ अच्छा है और सबका कल्याण होने वाला है बहुत बढ़िया अब जब ये उत्तर उसने दे दिया कि कुंभ मेले की कथा क्या है इसके बाद हमने अगला एक प्रश्न उससे किया कि नास्तिकता का खंडन क्या है अब यहां से हमने थोड़ा सैद्धांतिक प्रश्न उससे नास्तिकता का खंडन क्या है नास्तिकता को क्या जवाब दे नास्तिकों को कैसे त्तर करें अब यह शंकराचार्य का कार्य है दुनिया में जब भी कभी भगवान के अस्तित्व पर

00:13:11:20 उंगली उठाई जाती है तो उसका जो अंतिम उत्तर आपको प्राप्त होगा अका उत्तर जिसका जिसके सामने फिर कोई बात टिक ना सके वो उत्तर शंकराचार्य से आपको मिलेगा तो क्योंकि वो अपने आप को शंकराचार्य कह रहा है तो हमने उससे पूछा कि भाई आप आजकल जो युवा है वो नास्तिक हो रहे हैं तो उनको किस तरह से त्तर किया जाए किस तरह से संतुष्ट किया जाए अगर कोई जिज्ञासु है तो उसको संतुष्ट कैसे किया जाए और अगर कोई विरोधी है तो उसको निरुत्तर कैसे किया जाए इस पर उसने क्या बातचीत की व आप देख सकते हैं अच्छा महाराज

00:13:49:09 जी एक आज की युवाओं में देखते हैं एक परेशानी चल रही है कि युवा धीरे धीरे नास्तिक होता जा रहा है तो यह जो की सिद्धि है युवाओं के समक्ष ज्यादातर लोग जो कॉलेज जाने वाले बच्चे हैं वह आजकल क्या है भगवान को नहीं मानते तो ऐसा कौन सा सिद्धांत उन्हें दिया जाए जो वह भगवान पर विश्वास करना शुरू कर दे कि हां भगवान है जो भगवान को नहीं मानते ऐसा कहते हैं तो मुझे लगता है कि वह लोग भगवान को बहुत मानते हैं कि जिसकी कोई सत्ता नहीं है उसकी चर्चा हो ही नहीं सकती जिसकी संपूर्ण सत्ता है उसकी ही चर्चा होगी कोई यह नहीं कह सकता कि मैं आकाश से अंगूर नहीं तोडूंगा या मैं आकाश में फले हुए सेव फल नहीं खाऊंगा क्योंकि आकाश में सेव नहीं फलते अंगूर भी नहीं फलता जो चीज होती है वही कही जाती है इसलिए ईश्वर को जो मानते हैं वही

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00:14:53:07 य कहते हैं कि मैं नहीं मानता तो इनका कहना है कि जिस चीज का कोई अस्तित्व नहीं है तो उसके बारे में अगर बात भी हो रही है इसका मतलब उसका अस्तित्व है तो ये इनके बहुत ही निचले स्तर के जो है बस कुछ कुतर्क जिसका कोई बच्चा भी आकर के खंडन कर दे जैसे कोई कुछ उग्रता करे तो लोग कहते हैं राक्षस है और फिर यह अवधारणा बन जाती राक्षस भगवान को नहीं मानते और राक्षस कहते भी है कि हम भगवान को नहीं मानते लेकिन भगवान को मानने वाले सबसे बड़े जो भक्त हैं उन उनमें से जो गिनती की जाएगी राक्षसों का नाम उसम जरूर होगा भगवान विष्णु के भक्तों में शिव जी के भक्त तो राक्षस होते ही हैं जगजाहिर है और शिव जी सबको वरदान देते हैं लेकिन भगवान विष्णु के भक्तों में भी जब महानतम नाम लिए जाएंगे उसमें महाराजा बलि बाणासुर प्रहलाद ये सब राक्षस जाति के ही हैं लेकिन भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में है जी लिए सनातन भूमि में युवाओं का एक अवस्था है जब अवस्था का असर होता है बाकी हमारे सब बच्चे अच्छे हैं

00:16:08:24 युवा हमारे अच्छी दिशा में जा रहे हैं हां कुछ पश्चिमी संस्कृति हैं जो उनको गाने की कोशिश करती रहती जी और कभी कभी डिग नजर भी आते हैं लेकिन हमारी ऋषि संस्कृति बहुत मजबूत है और व फिर से वापस अपने संस्कारों में आ जाते हैं और अच्छे दिशा में आगे बढ़ते हैं आगे बढ़े इसके लिए माता-पिता को भी अपना जिम्मेदारी करते हैं माता-पिता करते ही हैं और करना चाहिए और गुरुजनों को भी अपनी जिम्मेदारी करते हैं और आगे करेंगे

00:16:42:01 बहुत बढ़िया तो महाराज जी इसमें कई बार यह होता है कि जैसे हम लोग कॉलेजेस वगैरह में जाते हैं ना कैंप लगाते हैं ये तो उसमें क्या होता है कि वो लोग इस तरह के अनर्गल काउंटर करते हैं तो क्या हमारे पास कोई परफेक्ट ऐसा सिद्धांत नहीं है कि उसका एक

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00:16:59:09 है कि जब हमारा देश गुलाम हुआ था तो आक्रांता ने य आक्रमण किया और यहां अपना कब्जा जमा लिया जी और वह जो आक्रांता थे व सांस्कृतिक रूप से हमसे भिन्न थे और यहां शासन आते ही उन्होंने हमारे जो प्रयोगशाला है प्रशिक्षण संस्थान जिह गुरुकुल कहते हैं जी नम संस्कारों का नि होता था मनुष्य बनने के लिए मनुष्य को टेलर नहीं बनाता मनुष्य को नाई नहीं बनाता मनुष्य संस्कार से बनते जी उस संस्कार से मनुष्य बनाने वाली जो प्रयोगशाला थी गुरुकुल थे उनको विधर्मी शासन में बंद कर दिया गया उसके बाद कई खानदान यहां शासन में आए लेकिन वह सनातन से नहीं थे उसके बाद ब्रिटिश शासन आ गया और उन्होंने भी हमारी संस्कृति के बारे में उन्ह को नहीं लेकिन जब देश आजाद हो गया स्वराज कायम हो गया तब हमारे वो शिक्षा पद्धति आ जानी चाहिए थी जो विधर्मी शासन में आके बंद कर दिए गए वो नहीं आई इसकी कमी हमें

00:18:14:14 खल रही है हमारे समाज को अखर रही है और उसी के कारण यह जो अलग-अलग विचार आते हैं युवाओं में तो उनमें मार्गदर्शन का अभाव है शिक्षण प्रशिक्षण का अभाव इसलिए हमारा शंकराचार्य मठ हमारा गोवर्धन मठ पुरी हमारे जो आचार्य थे उन्होंने उस समय भी जब यहां विधर्मी हों का शासन था हमारे मठ ने हमेशा य कोशिश रखा कि गुरुकुल चलते रहे गौशाला चलती रही हमने चलाया भी अब चकि विधर्मी शासन नहीं है और राष्ट्र में हिंदूवादी शासन है स्वदेश यों का शासन है इसलिए हम कहते हैं

00:19:01:26 कि फिर से व गुरुकुल खोल दिए जाए गांव गांव में गुरुकुल खोल दिए जाए ऋषि परंपरा वापस आए जिससे उमर रहते बच्चों में युवा होते होते वैदिक संस्कार आ जाए और व बिना किसी समय को बर्बाद किए मनुष्य जीवन के असली लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ते चले जाए इससे राष्ट्र की भी उन्नति है और समाज की भी उन्नति है जी बहुत बढ़िया आपने मार्गदर्शन दिया किस तरह से युवाओं में हम लोग ईश्वर की स्थापना कर सकते हैं अ मगर

00:19:34:02 मैं महाराज जी ये चीज जानना चाह रहा था जैसे कोई एक ऐसा प्रॉपर एक कोई सिद्धांत कोई फंडामेंटल हमारे सनातन धर्म ने दिया हो कि हम उसको काउंटर कर सके जब जैसे आपने कहा ना कि जो चीज नहीं है उसके बारे में बात ही नहीं होगी तो इसमें वो लोग ये कह देंगे कि तुमने कोई कल्पना की हम उस कल्पना को मना कर रहे हैं आपने कल्पना की भगवान की तो हम नास्तिक हैं हम उसको मना कर रहे हैं तो कोई ऐसा सिद्धांत आस्तिक का जो यह वाद विवाद है जी यह बहुत पुराना हैय ऋषि ऋषि कुल में भी था जी जो नहीं मानते हैं व

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00:20:08:28 नहीं मानते हैं व तो हिरण कश कहते थे कि मैं भगवान को नहीं मानता और भगवान नाम की कोई चीज नहीं और यदि कोई भगवान है तो मैं हूं क्योंकि मैं राजा हूं सर्व देव मस यद सर्वत्र कस्मा स्तंभ न दते लेकिन उनका बेटा था वो कहता था भगवान है और लो कण कण में व्याप्त है उसने उसको बहुत प्रताड़ित किया लेकिन वोह नहीं माना वो कहता था भगवान है अंत में जब बात अंतिम चरण में आ गई और रण कसप ने अपने उस विष्णु भक्त पुत्र को मारने के लिए अंतिम चरण में आ गया और पूछा कि इस पत्थर में बांधकर यदि वो सब जगह है तो पत्थर में क्यों नहीं दिखाई देता तुम्हारे प्राण क्यों नहीं बचा रहा अब मैं तुम्हें मार रहा हूं जी तो भगवान प्रकट हुए पत्थर फड़ नरस आ गए जी और वो तो सुरक्षित था वरदान से जी लेकिन कोई उसकी रक्षा नहीं कर पाया और व मारा गया जी तो कहने मतलब यह है कि जो य

00:21:12:24 सदियों से चली आ रही है हमारे पास प्रॉपर नास्तिकता का कोई खंडन नहीं है हमारे आचार्यों ने दिया हो ऐसे नास्तिक आचार्य भी हुए हमारे हमारे जो दर्शन हमारे मान्य है लेकिन ऐसे भी दार्शनिक हुए हैं जो बड़े विद्वान थे लेकिन भगवान को नहीं मानते धर्म को नहीं चारवा आदि जैसे हमारे जो शंकराचार्य आदि शंकराचार्य जी इनके द्वारा कोई ऋषि महा ऋषियों द्वारा दिया ग कोई ऐसा अकाट्य सिद्धांत जिससे कि हम नास्तिकों की बोलती बंद कर दे माने या ना माने उनको निरुत्तर कर दे निराधार कर दे बहुत है आदि गुरु शंकराचार्य

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00:21:43:20 ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषद पर भाष्य किया है वे पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं बहुत है आदि गुरु शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषद पर भाष्य किया है वे पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं आदि गुरु शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषद पर भाष्य किया है पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं तो इसने एक जगह पर देखिए क्या कहा जब इसने ये कहा कि शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया था आदि शंकराचार्य ने अब ये खुद को शंकराचार्य कह रहा है तो कम से कम इसको आदि शंकराचार्य के बारे में तो पता होना चाहिए था मगर ये कह रहा है कि आदि शंकराचार्य जी ने वेदों पर भाष किया था जबकि आदि शंकराचार्य जी ने वेदों पर भाष्य नहीं किया था उन्होंने उपनिषद पर भाष्य किया था उन्होंने ब्रह्म सूत्र पर भाष्य किया था गीता पर भाष्य किया था वेदों पर भाष्य नहीं किया उनकी परंपरा के आचार्य आचार्य शायन ने वेदों पर भाष्य किया था तो ये जो अपने आप को शंकराचार्य कह रहा है इसको इतनी एक आधार बेसिक नॉलेज भी नहीं है कि आदि शंकराचार्य जी ने क्या किया था और क्या नहीं किया था और य अपने आप को शंकराचार्य कह रहा है तो वही तो कह रहा

00:22:57:02 हूं कि गुरुकुल प्रणाली तो सारा अधूरा ज्ञान भी अज करता है तो उन्होंने कोई सिद्धांत नास्तिकों के खंडन के लिए दिया हो ऐसा कुछ बहुत कुछ है उनके जितने अद्वैत सिद्धांत के ग्रंथ है तो हमें कोई एक सिद्धांत आप दे देते जिसे

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00:23:14:18 नास्तिकता का खंडन क्या है शास्त्रो असतो मा सया तिया मृत मा मतम गमाया एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी कभी ना मरने की प्यास विद्यमान है अखंड ज्ञानी बन जाने की प्यास विद्यमान है और सदा सुखी रहने की प्यास विद्यमान है इन तीनों प्यास को मिलाकर कहते हैं सत चिता आनंद तो सत चिता आनंद की प्यास एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी है तो जिस प्रकार एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर एक नियम है कि हमारे अंदर उसी चीज की चाह होती है जिस चीज की चा का विषय का अस्तित्व हो इनबिल्ट चा की बात कर रहा हूं जि चाह से हम स्वयं को अलग नहीं कर सकते हम चाह के भी मृत्यु के भय से अपने आप को अलग नहीं कर सकते हम चाह के भी सब कुछ जान लेने की इच्छा से स्वयं को अलग नहीं कर सकते हम चाह के भी सदा सुखी रहने की इच्छा से स्वयं को अलग नहीं कर सकते हां मगर कुछ वस्तुनिष्ट चीज आ जाएंगी जैसे मैंने कहा कि उड़ने वाला डायनासोर मुझे उड़ने वाला डायनासोर चाहिए इस चाह से हम अपने आपको अलग कर सकते हैं मगर हमसे कह दिया जाए आप जो है जो अमर होने इच्छा है उसको छोड़ दो तो

00:24:30:06 नहीं नहीं छोड़ पाएंगे जितनी बार मृत्यु का ख्याल हमारे मन में आएगा उतनी बार हम उस ख्याल से दूर भागना चाहेंगे है ना तो एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी सत चित आनंद की चा विद्यमान है नियम क्या है कि हमारे अंदर जो भी चाह ऐसी जिससे हम स्वयं को अलग नहीं कर सकते हैं उस चाह के विषय का दुनिया में अस्तित्व जैसे हमारे अंदर भूख है तो दुनिया में खाना है हमारे अंदर प्यास है तो दुनिया में पानी है हमारे अंदर देखने की चा है तो दुनिया में क्या है दृश्य है हमारे अंदर सुनने की चा है तो दुनिया में क्या है आवाज है तो जिस प्रकार एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी व्यापत भूक का विषय भोजन सिद्ध होता है प्यास का विषय पानी सिद्ध होता है उसी प्रकार से एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी व्यापत सत चित आनंद की चा का विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व डंके की चोट पर सिद्ध होता है यह है नास्तिकता का खंडन य नास्तिकता का उत्तर मगर इस फर्जी शंकराचार्य के पास ऐसा कुछ नहीं था यहां तक कि हमने इस इससे ये भी पूछा बारबार कहा कि भाई त्तर करने वाला वो कौन सा सिद्धांत बताइए तो फिर य बातें बनाने लगा बातों

00:25:45:07 की जलेबिया वो देखिए आप कैसे बनाने लगा यह कहने लगा कि आचार्यों ने बहुत कुछ लिखा है हमने कहा क्या लिखा है क्या लिखा है आचार्य ने वो में नहीं मिल सकता वो में नहीं मिल सकता अच्छा अच्छा वो [संगीत]

00:26:28:27 और वेद विरुद्ध जो कार्य है जी वो अधर्म है और वो नहीं करना चाहिए मनुष्य जाति को बस वेदों में यही स्पष्टीकरण उसका है बाकी व्याख्या बड़ी है नहीं वो तो है मतलब वेद को तो तब हम प्रमाण के रूप में जब कोई वेद को मानता हो अभी तो एक सामान्य सा लड़का है कोई और उसको हमें बताना है कि धर्म वेद को ना मानने वाले के लिए हमारे पास कोई उपाय नहीं है वो नास्तिक मत है नास्तिक मत हमेशा से रहते नहीं फिर भी हम कुछ समझा तो सते क्यों मानना चाहिए तुमहे वेद को क्यों मानना चाहिए तुम्हारे धर्म को आज तक तो नहीं समझे हैं समझाने वाले समझा रहे हैं आदि गुरु शंकराचार्य समझाने ही आए थे जी भगवान राम समझाने ही आए थे श्री कृष्ण समझाने ही आए थे तो जो समझने वाले हैं वो समझ जाते हैं और जो नहीं समझने वाले नहीं समझते हा तो कुछ उन्होंने ऐसा बोला होगा ना कि ये समझ लो त जिससे की वो समझे वो समझे नहीं बात अलग है मगर हम कुछ ऐसा बताए तो कि वो धर्म को समझ पाए धर्म उनके लिए क्यों आवश्यक है का पालन अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन दयम धर्म का व्याख्याता सबसे बड़ा हमारा महर्षि व्यास है और वह कहते हैं कि अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य बचन

00:27:44:19 दयम परोपकाराय पुण्या पापायी परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं है और दूसरे को सताने के समान कोई पाप नहीं स धर्म नहीं भाई पर पीड़ सम नहीं अध माई तुलसीदास जी की भाषा में दूसरे को पीड़ा पहुंचाने जैसे कोई अधम कार्य नहीं है और परहित करने जैसा कोई अच्छा कार्य नहीं सबसे अच्छा कार्य परहित मगर यह तो लक्षण हो गए ना महाराज जी धर्म की उपयोगिता

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00:28:18:01 अब बस हमारा समय खत्म अब बस हमारा समय खत्म अब बस हमारा समय खत्म अब हमारा समय खम हमारा समय हो गया अब बस अच्छा बस थोड़ा सा और बस लास्ट उने कहा जो वेद बताते हैं वही धर्म है ठीक है वेद बताते वो धर्म है मगर ये आपने धर्म को इंगित कर दिया कि भाई धर्म को कहां ढूंढे कि वेद में ढूंढे मगर उसकी मगर उसकी उपयोगिता उसके अस्तित्व की उपयोगिता जिससे सिद्ध हो वो परिभाषा नहीं बता पाए है धर्म की परिभाषा नहीं बता पाए धर्म की परिभाषा क्या है कि जीव की चाह का वास्तविक विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को परिभाषित कर सकने वाले शास्त्रों द्वारा सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करने के निमित्त बताई गई विधि विधान का नाम धर्म है जो आपको सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त कराएगी उस मर्यादा का नाम धर्म है तो इनके पास इतना भी उत्तर नहीं था मैं यह कह रहा था इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का सिद्धांत थोड़ा सा उस पर अगर कुछ प्रकाश डाल दे क्या कहते हैं यह सब पंथ है और चल

00:29:33:02 रहे हैं बहुत सारी अच्छी बातें हैं उनके पैगंबरों ने उनके जो प्रशिक्षु है व सब पढ़ाते पढ़ पढ़ाते े मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है उसकी अच्छा अच्छा इनके जो लेकिन ये मैं यह बताना चाहता हूं कि सनातन मूल है और सनातन के ही तनया डालियां शाखाएं पत्ते फूल नहीं जैसे उसमें कहा गया ना कि ईश्वर जो है वो यह नहीं कर सकता वो नहीं कर सकता तो उनके यहां जो सुप्रीम अथॉरिटी मानी गई है और हमारे यहां जो सुप्रीम अथॉरिटी मानी वो दोनों सिमिलर है ईश्वर क्या कर सकता है क्या नहीं कर सकता है इसके बारे में कोई अधिकृत नहीं है कहने के लिए ईश्वर क्या कर सकता है क्या नहीं कर सकता है इसके बारे में कोई अधिकृत नहीं है कहने के लिए ईश्वर क्या कर सकता है क्या नहीं कर सकता है इसके बारे में कोई अधिकृत नहीं है कहने के लिए हमारे यहां वेदों की बहुत बड़ी पहुंच है और सर्वोच्च मार्गदर्शन वेदों का होता है लेकिन वेदों की अंतिम लाइन जो है नेति नेति कहक खत्म हो जाती है ना इता नता अंत नहीं है अनंत है जी तो जो अनंत है और अनादि है उसके बारे में गारंटीड बात नहीं की जा सकती वही जान सकता तो फिर इसका मतलब यह माने कि इस्लाम अनुपम उपमा आन राम

00:30:48:12 समान राम निगम का है उसकी कोई उपमा किसी से नहीं हो सकती कि उसके जैसा वो है क्यों जन कोटि सत र क अलता है एक लाख एक करोड़ जुगन को इकट्ठा करके और यह कहा जाए कि देखो यह सूर्य के समान है यह सूर्य की तौहीन है क्योंकि जुगनू का सूर्य का कुछ नहीं है जी जी अब बस हमारा समय खत्म हो बस थोड़ा सा बस लास्ट एक महाराज जी एक बात कही जाती है बारबार की अद्वैत जो सिद्धांत है शंकराचार्य जी के द्वारा जो मतलब प्रचारित हुआ है बहुत ज्यादा तो अद्वैत सिद्धांत में भक्ति नहीं है तो इसको कैसे कई लोग ऐसा क्लेम करते अद्वैत सिद्धांत में अद्वैत में भक्ति नहीं है केवल ज्ञान मार्ग है पहले लोग ऐसा भी कहते थे कि शिव भक्त विष्णु भक्ति नहीं करते जी या विष्णु भक्त शिव भक्त नहीं होते जी तो इसकी पुरानी लंबी कथानक है और कहीं बड़ी जगह से यह बातें शुरू ई हो दक्ष प्रजापति और उनकी घटनाओं से अच्छा

00:32:04:06 लेकिन आगे जब युग आया तो हमारे विद्वानों ने बताया कि विष्णु भक्ति के बगैर शिव भक्ति नहीं हो सकती और शिव के भक्त विष्णु भक्ति करेंगे तो विष्णु जी प्रसन्न होंगे जी शंकर प्रिय मम द्रोही शिव द्रोही मम दास सोनर को नरक में कलब तक करे नरक में वास जी जी जी शंकर भगति बिना नर भगत न पावई मोरी और एक गुपत मति तुम कहो कर जोर जी जी तो उसी प्रकार से क्या प्रश्न था आपका कि अद्वैत में भक्ति नहीं है अद्वैत केवल ज्ञान मार्ग है मतलब कि मैं ही ब्रह्म हूं हम ब्रह्मास्मि तत्व मसी तो इसमें भक्ति नहीं रह जाती कि वो रामचंद्र जी है भक्ति के बगैर ज्ञान अधूरा

00:33:01:12 है और ज्ञान के बगैर भक्ति लंगड़ी है भक्ति ज्ञान दोनों होंगे तभी मनुष्य को यह फायदा करेगा राम प्रेम बिन सोहन ज्ञान करण धार बिन जिम जल जानू नौका बहुत अच्छी हो वोट बहुत अच्छा बना हो से जड़ित हो लेकिन नाविक यदि उसमें नहीं है या नाविक अच्छा नहीं है तो नौका बेकार है तो ज्ञान और भक्ति दोनों एक दूसरे के परिपोक हैं वैराग्य भी उसमें शामिल है भागवत में इस बात का वर्णन है कि भक्ति ज्ञान वैराग वृद्ध हो गए वृंदावन में आके भक्ति युवा हो गई भक्ति तो युवा हो गई लेकिन ज्ञान बैराग बुड्ढे रहे तो वो दुखी रही बेचारी नारद जैसा ज्ञानी विज्ञानी आया उन्होंने जब उन्हें श्रीमद् भागवत सुनाया तो ज्ञान और वैराग्य भी जब चेतन हो गए तब भक्ति प्रसन्न हुई एक दूसरे के परिपूर्ण है जो असली ज्ञानी होगा वह महा भक्त अवश्य होगा और जो असली भक्त होगा वह ज्ञान से परिपूर्ण जरूर होगा ज्ञानी प्रज प्रभु

00:34:16:14 में देख जगत कसन करही विरोध भक्त जो होते हैं व सारे संसार को भगवान के रूप में देखते हैं सबको प्रणाम करते हैं आदर करते हैं विरोध नहीं करते और ज्ञानी ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या सर्वम लविद ब्रह्म जो उनका सर्वोच्च साधना ब्रह्म है व क्या है बोलिए सर्वम कल विम य सारा संसार ब्रहम है और भगत बोले प्रभु मैं देख जगत य सारा संसार उनका प्रभु है तो फर्क कहां है मतलब य एक दूसरे के परिपोक है मतलब यह जो सर्व ब्रम कहते हैं इसमें य लोग जो भक्ति गरस होता है वह बताते कि नहीं होता है केवल ज्ञान मार्ग अवत के संबंध में हमने इनसे एक प्रश्न और किया क्योंकि भगवत पाल आदि शंकराचार्य की जब बात होती है तो अद्वैत सिद्धांत की बात होती है तो हमने इनको और ड़ टोला कि भाई अद्वैत में भक्ति बहुत कम है अद्वैत में भक्ति नहीं है ऐसा लोग आरोप लगाते हैं तो यह महाशय इस बात के पीछे पड़ गए कि भाई ज्ञान के भक्ति नहीं हो सकती भक्ति के बिना ज्ञान नहीं हो सकता ये बात सही है

00:35:31:18 मगर हम पूछ रहे हैं कि आप अद्वैत में भक्ति की स्थापना करिए तो महाशय को सिद्धांत जब पता हो जब वो शंकराचार्य परंपरा से परंपरा प्राप्त आचार्यों से पढ़ते आए हो तब तो उन्हें कुछ पता होगा तो वो उन्ही बातों को गोल मल गोल मोल बारबार घुमाते रहे इसका सिद्धांत जगतगुरु शंकराचार्य जी ने दिया था

00:35:49:26 कि अन्यों में प्रीति आत्मा के लिए होती है आत्मा में प्रीति अन्यों के लिए नहीं होती है इसका

⬜ Not used yet · 00:35:56:27 – 00:37:10:27 (1:14)

00:35:56:27 अर्थ है कि जब हम यह कहते रहेंगे कि भगवान हमसे अलग है तब तक हमारा जो भगवान के प्रति प्रेम है वह अंतिम रूप से भगवान के लिए नहीं माना जाएगा क्यों क्योंकि भगवान को प्रेम करने से आपको क्या मिल रहा है अंतक अथवा सुख किसको मिल रहा है आपको और आप तो भगवान से अलग हो मगर जब आप और भगवान एक ही रूप मानोगे आप स्वयं को और भगवान को आत्म स्वरूप मान लोगे एक दूसरे का तो आप सीना ठोक के कह सकते हो कि भगवान की भक्ति करने से जो सुख मिल रहा है वो भी किसको मिल रहा है भगवान को यानी कि आप जो भी भक्ति कर रहे हैं वह अपने लिए नहीं कर रहे वह भी भगवान के लिए ही कर रहे हैं तो तो भक्ति की पराकाष्ठा भी कहां पर हो सकती है अद्वैत सिद्धांत में तो इन महाशय को ना तो शंकराचार्य के बारे में कुछ पता है ना ना ही नास्तिकों के के समक्ष ईश्वर का अस्तित्व कैसे सिद्ध किया जाए यह कुछ पता है ना ही धर्म की परिभाषा पता है ना ही इनको यह पता है कि मत में भक्ति किस प्रकार से सिद्ध होती है और अंततोगत्वा इनको तो यह भी नहीं पता है कि यह है कौन क्योंकि इनको अपना परिचय देने में शर्म आ रही है जय श्री राम बहुत बहुत तुम्हारे दर्शकों को रे

00:37:10:27 चैनल के बहुत-बहुत आशीर्वाद और कुंभ मेले से उन सबके कल्याण की कामना तीर्थराज प्रयाग सबका सबको कल्याण करें और सब सुखी रहे

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00:37:21:06 [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 37:26 · 02 Feb 2025

शंकराचार्य या हुर्रियत का नेता #fakeshankaracharya #mahakumbh2025 #prayagraj

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A · Video क्या अद्वैत में भक्ति रस नहीं है Part-5 #adiguru #bhakti #bajan
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