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00:00:00:12 ओम अब जैसे तुम्हारा बिलीव है कि वो सही है तो मेरा बिलीव है कि वो सही है। दोनों ने अपनी रिसर्च परंपरा वाले तो आपने खुद भी रिसर्च की देखी पूरा इतिहास मिल रहा है उसमें तो नहीं उसमें कई सारी चीजें हैं जैसे कि

00:00:43:18 उसमें क्या व्याकरण की परंपरा है वो? हां उसका पूरा इतिहास है ना उसमें इसको तो वह जो पुस्तक है ना उसको सब ने स्वीकार किया उसे उस पुस्तक के लिए युधिष्ठिर जी को काशी के पंडितों से उपाधि मिली थी महापंडित की गवर्नमेंट ऑफ इंडिया से देखो जब जब कोई पुस्तक आ जाती है ना कि उन्होंने लिखी है सबसे पहली तो वो एक भाई मेरे सामने पहली बार आई है तो सबसे पहले तो वही हो जाता है कि ये पुस्तक कितनी प्रामाणिक है उनमें उसमें उसमें जो बातें लिखी गई है उससे कितना लोग मतलब क्या उसकी क्रेडिबिलिटी है वो एक जांच का विषय हो जाता है दूसरी बात ये है कि परंपरा तो आफ्टर ऑल व्याकरण की है वेद अथवा वेद अथवा वेदार्थ की तो नहीं है वेदार्थ तो व्याकरण क्या है वेदार्थ ही तो है आप ये बताइए व्याकरण नियम व्याकरण तो नियम है ना नहीं नहीं मैं जैसे मैं जैसे ये बताइए जैसे आप जो शंकर संप्रदाय है उसमें चार चीजें पढ़ाते हैं ठीक है मीमांसा न्याय वेदांत और व्याकरण ठीक है अब ये बताइए उसमें से वेद का अर्थ किससे करते हैं? व्याकरण से करते हैं। अगर व्याकरण वेद का अर्थ छोड़ दिए। व्याकरण नहीं रहेगा ना वेदांत भी नहीं पढ़ पाएंगे। अर्थ वो भी नहीं कर पाएंगे। व्याकरण नहीं रहेगा वो नहीं पढ़ पाएंगे। वो सही

00:01:58:24 है मगर कई जगह वहां पे जैसे कि कोई अर्थ निकल रहा है। अब उस अर्थ में जो व्याकरण के अनुसार शाब्दिक अर्थ निकल रहा है वो ना लेके और जो है जो अलंकारिक अर्थ या भावार्थ उससे लेते हैं ना ब्राह्मण ग्रंथों से। नहीं तो वेद अकेले थोड़ी पढ़े जाते हैं। वेद का एक एक अर्थ क्या है? एक एक जो आपको मंत्र मिलते हैं ना उसमें कहां अलंकार है? क्या है? क्या नहीं है? कहां क्या चीज है? क्या कौन सा कर्म ब्राह्मण ग्रंथ में बता वो मतलब केवल वो व्याकरण से नहीं हो पाएगा। उसमें आपको भाव भी ले चलना पड़ेगा। जैसे भाव है ना वो ब्राह्मण ग्रंथों से जैसे कि सर्वशक्तिमान की ही बात ले ले। मान लो तो सर्वशक्तिमान जो है वो सर्वज्ञ में सब कुछ है और क्या कहते हैं? सर्वव्यापक में भी सब कुछ है। मगर सर्वशक्तिमान में कि भैया वो सब वो इन सब से ज्यादा है। जीव से ज्यादा है। वहां पे सब कुछ नहीं है। तो यहां क्या हुआ? व्याकरण खत्म हो गए। यहां भाव लेना पड़ा। नहीं उसमें देखिए ये कहते हैं इस चीज को ये वाला जो कांसेप्ट आप कह रहे हैं इसको मैं क्लियर करूंगा। ये ऐसा है कि जब मैं इस विषय में बताऊंगा तो ना इसमें आपकी तरफ से विरोध आएगा ना मेरी तरफ से विरोध आएगा। और दूसरी बात यह है कि जैसे मान लो कि व्याकरण की परंपरा है। हम उसमें

00:03:13:27 फिर और भी कुछ काउंटर्स हैं। जैसे एक काउंटर ये आ जाएगा कि जैसे दयानंद जी ने जो भाष्य लिखा हम है ना वेदों का क्या उससे उसको सहमति वाला पहले वेदार्थ उनकी जो परंपरा है उसमें किसी ने लिखा जो वो बताया जा रहा है। दूसरी बात कि क्योंकि वेदार्थ पहले लिखा नहीं जाता था ना नहीं तो प्रमाण मान प्रमाण होना चाहिए ना भाई ढाई हजार साल पुराना प्रमाण हमारे पास तो है तो शंकराचार्य उन्होंने तो लिखा कौन सा वेद का उन्होंने कौन सा वेद का किया हुआ है बताइए अरे वेदार्थ मतलब उपनिषद व्याख्या प्रस्थान पर व्याख्या प्रस्थ थोड़ी है मैं वो नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं कि भाई धर्म ब्रह्म पर धर्म ब्रह्म की व्याख्या उनके के सपोर्ट में उनसे पहले के किस आचार्य ने की बुद्ध के समय पर वो क्या कर रहे थे ये सब काउंटर आएंगे एक काउंटर ये आ जाएगा किरण मीमांसक जी ने इस पुस्तक को लिखा अब दयानंद जी स्वयं कह के गए कि भाई मेरा कोई ऐसा उत्तराधिकारी नहीं है जिसको मैं मतलब ऐसा कोई शिष्य नहीं जिसको मैं उत्तराधिकारी कह सकूं। यानी कि दयानंद जी के अनुसार

00:04:29:10 यह आगे यह ज्ञान चलना था कि नहीं चलना था? चलना था तो उन्होंने यह स्वीकार किया कि भैया जिसको मैं घोषित करूंगा वही मेरा ज्ञान प्रामाणिक रूप से बता सकेगा। उन्होंने तो ये गुरु बुद्धि का विरोध किया था ना। हां तो जब वो खुद गुरु बुद्धि का विरोध कर रहे हैं तो फिर वो गुरु परंपरा पे ही प्रहार हो गया। नहीं गुरु परंपरा गुरु बुद्धि में अंतर है ना? हम उसमें अंतर ये आ जाता है कि जैसे ये बताइए जैसे मैं पूछता हूं कि बताइए कि आदि शंकराचार्य जी से पहले की कौन सी गुरु गद्दी थी? हां बताइए नहीं पता क्यों नहीं पता है उनके पहले हां बताइए गोविंद पाद थे उससे उनसे पहले कौन टाइटल क्या था उनका शंकराचार्य टाइटल था ये तो उन्होंने टाइटल शुरू किया है यानी कि यानी मतलब उनको इस उपाधि उपाधि से दिक्कत मैं पूरा बताता हूं पूरा बताता हूं इसमें क्या है शंकराचार्य जी ने चार गद्दी स्थापित की ठीक है चारों को शंकराचार्य तो ये गद्दी परंपरा उन्होंने स्टार्ट की उसके पहले कोई गद्दी परंपरा नहीं थी लेकिन गुरु परंपरा थी गुरु शिष्य परंपरा था ठीक है अब जैसे ठीक है अब जैसे शंकराचार्य जी के पहले हमें दो आचार्य का नाम मिलता है। उसके पहले का नहीं मिलता। शंकराचार्य जी ने तो कभी नहीं बोला कि मेरे पहले की ये शिव से या नारायण से शुरू करके आते हैं। वो तो बाद के आचार्य ने अपनी मर्जी से जोड़ा। शंकराचार्य जी ने कहीं कोट नहीं किया। अगर अगर शंकराचार्य ने नहीं भी जोड़ा मगर शंकराचार्य ने बाद के आचार्यों को घोषित तो किया कि वो मेरा ही स्वरूप मान्य होगा।

00:05:44:24 उसमें वही चीज मैं कह रहा हूं कि वहां पर गुरु गद्दी एक रखी गई। वहां पे गुरु गद्दी में। कहने का कहने का मतलब है उनका उनका प्रहार गुरु शिष्य परंपरा पे नहीं। मगर उनका प्रहार गुरु गद्दी पे था। हां। हां तो बात ये है कि गुरु की तरफ से वो शिष्य जो है वही बता रहा है जो गुरु ने कहा। तो इसके लिए तो गुरु गद्दी की आवश्यकता है। नहीं गुरु गद्दी का जो प्रहार कर गुरु गद्दी क्यों चाहिए? अब मैं एग्जांपल दे देता हूं आपको। अब जैसे जो ये थे ना आपके युधिष्ठिर हिमांसक जी इनके जो गुरु थे ब्रह्मदास जी जिजासु जी वो उनके जो गुरु थे वो किससे पड़े थे? वो डायरेक्ट उनसे पड़े थे। क्या नाम है? विजानंद जी से और इनके गुरु भाई थे स्वामी दयानंद जी के। हम्म तो परंपराएं तो उधर से जुड़ ही रही है ना? नहीं जुड़ी है मगर जैसे मान लो कि मैंने प्रभुपाद जी से वही वाले इस वाली बात कि भैया मैंने श्रीधर स्वामी से सीखा अब जो अपना बता रहा हूं इसमें फिर कैसे करेंगे। श्रीधर स्वामी की तरफ से अगर घोषित नहीं होगा ये मेरा प्रामाणिक है बताने वाला तो मैं तो अपना कुछ भी बता दूंगा। उसमें यह भी बात आ जाती है ना उसमें एक बात आ जाती है कि जो कोई व्यक्ति रिसर्च करता है और अगर हम अगर हम शंकराचार्य पर वो उठा देंगे तो फिर हमारा जो वैदिकता का प्रमाण है वो दिक्कत आने लगेगी नहीं वो दिक्कत आए चाहे ना आए लेकिन जो त्रुटियां है वो तो हम उठाएंगे ना सवाल

00:06:59:27 तो अलग विषय है की दिक्कत आ गया नहीं आ गया लेकिन जो जब त्रुटि है तुम प्रश्न उठाएंगे तो उसमें तो शब्द प्रमाण की बात आ जाएगी ना आएगी वो आएगी एक अलग बात है लेकिन जैसे मैं एक पॉइंट रख रहा हूं पॉइंट ये है कि जैसे कोई व्यक्ति इतिहास लिख रहा है किसी का हां तो उसमें उसने सामने वाले उन्होंने तो देखिए एक एक आचार्य का प्रमाण दिया उन्होंने इनका आचार्य का ये मिलता है इस लाइब्रेरी के इस कॉर्नर के इस नंबर पर रखा हुआ है ठीक है एक एक बता रहे हैं वो तो कि हां ये चीज यहां इनका ये टीका मिलती है इनकी ये वृत्ति मिलती है और उन्होंने कई जगह पे कई जगह पे उन्होंने यदि शब्द का उपयोग भी किया जैसे इस नाम का कोई था यदि उसको इसका इसका रचनाकार माना जाए तो ये ठीक है मतलब वो भी खुद कंफर्म नहीं है वो यदि लेकर के चल गया इतिहास विषय ऐसा होता है कि बहुत बार क्या होता है कि कुछ-कुछ लोगों के क्लेरिटी नहीं होती है। तो उसमें उन्होंने अज्ञात करतिक करके उन्होंने नोट किया हुआ है। अज्ञात कर्तिक अर्थात उसकी कृति तो है उसका नाम। अज्ञात तो है मगर उन्होंने कई जगह पे जो जिसको जिसकी वो बात कर रहे हैं ना उसको यदि करके बोला है। मतलब वो खुद कंफर्म नहीं है अपनी परंपरा। दूसरी बात दयानंद जी ने अपनी जो है क्या कहते हैं? परंपरा बताई नहीं है। कहीं भी बताइए। बताइए ना वो तो बोलते हैं ना कि मैं जो मानता हूं क्या मान रहा हूं। मैं तो ये ब्रह्मा से लेकर जैमिनी जी मानते मैं वही मान रहा हूं। ऐसे तो वो भी

00:08:14:28 मानते हैं ब्रह्मा ये ब्रह्माकुमारी वाले। नहीं तो फिर अगर यही दृष्टिकोण रखा जाए तो फिर आप लोग भी वैसे ही मानते हो। उससे कुछ अलग नहीं मानते। सुनो सुनो तो उन्होंने अपनी कहीं भी आचार्य परंपरा बताई नहीं। अब बात ये है कि युधिष्ठिर मीमांसक जी बता रहे हैं और उन्होंने कहा है कि भाई मेरी ओर से मेरा जो उत्तराधिकारी या मेरी ओर से मैं किसी को घोषित करूं कि वो मेरे जो मैं जानता हूं या जो मैं कहना चाहता हूं वो प्रामाणिक रूप से यह बताएगा। मेरा प्रतिनिधि। उन्होंने किसी आप कह रहे हैं और जो मैं कह रहा हूं उसमें दोनों में अंतर है। अंतर यह है जो आप कह रहे हैं वो उस गुरु गद्दी वाले दृष्टिकोण से कह रहे हैं। ठीक है? मैं जो कह रहा हूं उसमें मैं गुरु गद्दी वाले दृष्टिकोण से नहीं कह रहा। क्यों नहीं कह रहा? का गुरु गद्दी का मतलब कि अब जैसे ये है कि इसमें हम तो क्लेम ही नहीं करते कि हमारी गुरु गद्दी कोई व्याकरण परंपरा वालों ने स्थापित करी और वो वैसे चले। बात ये है जैसे आपने पहले कहा था कि इतिहास मिलना चाहिए। इतिहास तो कुछ ना कुछ तो मिलना चाहिए ना। हां तो इतिहास मिल रहा है कुछ ना कुछ। अच्छा अब बात ये आती है कि इतिहास मिल रहा है। अगर इतिहास नहीं मिल रहा तो आपके जो संप्रदाय हैं वो उनमें से भी कुछ-कुछ लोग हैं जो हमारे ही यहां से आकर के व्याकरण सीख करके जा रहे हैं और फिर वो अर्थ कर रहे हैं तो फिर उनको भी फिर खारिज करना पड़ेगा और ये बात आ जाएगी। बाकी यह है कि इतिहास मिल रहा है तो इतिहास तो मिल ही रहा है। अच्छा ऐसा मिल रहा है जो आपको 1000 साल पुरानी मैनुस्क्रिप्ट मिल रही है

00:09:30:02 ठीक है और वह जो और वो जो उसमें जो अष्टाध्याय के जो सूत्र हैं सेम सूत्र वो है जो अभी 150 200 साल पहले महर्षि दया ने जिस पे वृत्ति लिखी थी जिसके चार अध्याय अभी उपलब्ध है चारको वो भी सेम है। अच्छा बुध के बुद्ध के समय महर्षि दयानंद जी का जो दर्शन था वो किस आचार्य ने लिखा था और वो कहां थे? मैं बताता हूं मैं बताता हूं। देखिए जो स्वामी दयानंद जी का दर्शन था ठीक है वो क्या है वो एज इट इज सांख्य वैशेषिक न्याय वाला एज इट इज सेम है उसमें 1% चेंज मत कीजिए उसको पूरा ले लीजिए जो सेम है उसका खंडन उसका खंडन आचार्य शंकर ने किया हुआ है ना सांघ के वैशिक जो दर्शन है वो आप है ना देखिए अब देखिए अगर कहां से आया त्रेतवाद कहां से आया यही अगर आप छह दर्शनों को मान लेंगे ना ऑटोमेटिकली त्रैतवाद सिद्ध हो जाएगा अलग से बाहर से थोड़ी आ रहा है तो फिर बुद्ध का खंडन क्यों नहीं किया इन्होंने? किसने किया? न्यायिकों ने ही तो किया खंडन और किसने किया है? ये बताइए बौद्धों के खंडन में किसने पुस्तकें लिखी हैं? ने एक भी नहीं लिखी सारी न्यायिकों ने लिखी हैं। दयानंद जी ने तो सत्यार्थ प्रकाश में स्वयं कहा है कि बौद्धों का खंडन इन्होंने किया शंकराचार्य ने। शंकराचार्य के नेतृत्व में, हां वो ठीक है, शंकराचार्य के नेतृत्व में हुआ था लेकिन लिखा किसने? जैसा आपने बोला ना कि खंडन किया है, बताइए किसने

00:10:45:06 खंडन किया? आप मुझे सिर्फ बताइए किसी वेदांती ने लिखा हो। शंकराचार्य अरे भैया जो ब्रह्मसूत्र पर व्याख्या है वो बौद्धों के खंडन पे ही तो है। ब्रह्मसूत्र के अलावा बताइए ना वो कह रहा हूं कि ब्रह्मसूत्र तो ये पहला एक शुरुआत था जो आचार्य शंकर ने किया। ठीक है। उसमें तो उन्होंने सांख्य का भी किया। उसमें उन्होंने वैशेषिक का भी किया। उसमें उन्होंने न्याय का भी दयानंद जी ने किसको माना है? वेदा वैदिक की वैदिक उसकी स्थापना करने वाला। उन्होंने बोला उन्होंने वैसे उन्होंने बोला वैदिक धर्म की वो स्थापना करने की अब देखो यही बात है ना। अब यही बात नहीं उद्धत नहीं थे। उन्होंने माना वैदिक धर्म की स्थापना वर्ड लिखा है उन्होंने। अरे उन्होंने माना है कि उन्होंने ये उस समय पे जो है स्थापित किया। ये उनकी अच्छाई थी। हां उन्होंने इस चीज को बोला उन्होंने वहां कहीं न्याय वैशेषिक वगैरह की बात नहीं की है। अब वो हर चीज की व्याख्या थोड़ी करेंगे। तो फिर उनकी तरफ से किसी को प्रामाणिक कैसे माना जाए कि तुम तुम सही बोल रहे हो। उन्होंने नहीं किया तो यही तो दिक्कत है। उन्ही की मैं बता दे रहा हूं ना। क्योंकि उसी सत्यार्थ प्रकाश में वही तो कह रहे है ना कि छह के छह दर्शन मानने वाले और जो छह के छह और जैसे देखिए एग्जांपल देखिए जैसे आचार्य शंकर ने सांख्य का खंडन किया है नास्तिक बोला है ठीक है स्वामी दयानंद जी सांख्य सांख्य का वो मंडन करते हुए बोलते हैं कि जो कपिलाचार्य को नास्तिक बोले स्वयं नास्तिक है अब बताइए आचार्य शंकर को नास्तिक भी कह रहे हैं वो तो बात यहां ये हो रही है कि बुद्ध का खंडन किसने किया

00:12:00:12 तो बुद्ध का अपने आचार्य से पूछिए ना किसने किया न्यायिकों ने किया है अरे बुद्ध का खंडन देखिए चार शिष्य उन्होंने रखे थे अपने आचार्य शंकर ने एक न्यायिक थे, एक मीमांसक थे, एक व्याकरण वाले थे, एक वेदांत वाले थे। ठीक है? उनमें से ये जो न्याय वाले थे, ये क्या कहते हैं? आपका जो बौद्धों का जिसने खंडन किया, पूरा खंडन में जो प्रक्रिया बौद्धों खंडन हुआ ऐसा थोड़ी कि आचार्य शंकर करके एक बार चले गए उसके बाद काम ही खत्म। बौद्ध खत्म हो गए, नष्ट हो गए। उन्होंने रामानुज ने भी किया है। रामानुजाचार्य जी ने भी किया है। बौद्धों रामानुजाचार्य ने किया होगा उनका नहीं पता मुझे। लेकिन मेरे को ये पता है कि अब जैसे बौद्धों के फंड में मैंने जितनी पुस्तकें पढ़ी। ठीक है? सारी न्यायिक है। न्याय लड़ते लड़ते लड़ते लड़ते न्याय जो है नव्या बन गया आज भी मैं आपको बताऊं आज भी और ये तो वेदांतियों की मजबूरी है कि उन्हें न्यायिकों के साथ में साठगाठ करना पड़ रहा है क्योंकि अगर न्यायिक साथ नहीं होंगे तो फिर तो वो टिक नहीं पाएंगे कहीं भी लेकिन उसके बावजूद भी न्याय जो है वो वेदांतियों का भी खंडन करते हैं। अभी प्रयागराज में कुछ महीने पहले शंकराचार्य जी के अध्यक्षता में नव्या वर्सेस वेदांत अद्वैत का डिबेट हुआ था। खंडन खंडन खाद्य का खंडन लिखा हुआ है न्यायों ने अभी हम तो वो मजबूरी है वो वो मैं नहीं कह रहा मजबूरी की मैं नहीं कह रहा अभी देखो एक चीज निकल के आई परंपरा की अगर बात करें कि दयानंद जी

00:13:15:18 की तरफ से प्रामाणिक उनकी परंपरा बताने वाला किस व्यक्ति को क्यों माना जाए क्योंकि उनके शिष्य है ना तो वो तो कह रहे हैं कि मेरा कोई प्रतिनिधि नहीं है अधिकारिक नहीं प्रतिनिधि होना और यह एक शिष्य होने में अंतर है ना बात वो गुरु गद्दी को ही दूसरे शब्दों में प्रतिनिधि कह लो प्रामाणिक अधिकारी वो आप इसलिए देखो शिष्य देखो आपके हमारा अलग है ना देखो वही तो मैं कह रहा हूं गुरु गद्दी के अभाव में ही तो ये दिक्कत है कि दयानंद जी की ओर से उनके अलावा किसी की बात को प्रामाणिक क्यों मान लिया जाए जैसे जैसे अभी तुम्हारे यहां पर अभी कई गुट हैं जो कह रहे हैं कि हनुमान जी उड़ते थे मान रहे हैं कुछ लोग नहीं मान रहे हैं। अब वो भी कह रहे हैं हम भी शिष्य हैं उनके दयानंद जी के और जो जो नहीं मान रहे हैं वो भी कह रहे हैं हम शिष्य हैं दयानंद जी के तो प्रामाणिक किसको माना जाए जिसको वो घोषित करके गया अब वो घोषित तो किसी को करके नहीं गए नहीं इसमें पॉइंट ये आता है इसका मैं उत्तर देता हूं उसका पॉइंट आता है कि क्या स्वामी दयानंद ने इस विषय पे कुछ बोला है अगर उन्होंने इस विषय पे नहीं बोला है तो फिर तो मतभेद हो सकता है ना उसमें कोई समस्या नहीं है अब जैसे मैं बोलूं विवर्तवाद है कौन कौन से वाद है अद्वैत में तो दुनिया भर के मतभेद है है ना फिर अब क्या करना उन्होंने उन्होंने फिर भी मतभेद है आप बताइए मतभेद से नहीं उसमें फिर गुरु गद्दी है ना कि मैं मैं घोषित अरे तो वो घोषित करके जा रहे हैं ना उसकी बात मान्य होगी जैसे कि जैसे कि हमने

00:14:31:03 बता रहा हूं मैं मैं बता रहा हूं ना मैं बता रहा हूं उसमें कि हम कम से कम ऑफिशियली क्लेम तो कर सकते हैं ना अपनी चीजों को अब वो वो क्या कहते हैं वो लागू नहीं हो पाए एम्पलीफाई नहीं हो पाए बात अलग है मगर बात ये अगर आपने कुछ बोला उसमें कितना वैल्यू है जैसे कि हमने कानून बनाया अब वो कानून जो है फिर भी दारू बिक रही है फिर भी मुर्गा मांस खाया जा रहा है। इसका मतलब सनातन धर्म ही बेकार है। ये तो कहना गलत है। नहीं पॉइंट ये जाता है। पॉइंट ये आता है कि एक गुरु कुछ और कह रहे दूसरे गुरु कुछ और कह रहे तो मान्यता अरे मान्यता उसकी जिसको घोषित किया गया गद्दी पर। दोनों को किया गया ना फिर तो कहां दोनों को किया गया? क्यों दोनों घोषित नहीं है। कौन? सरस्वती ने अपने आप को दोनों दो पीठों के शंकराचार्य घोषित नहीं कर लिया था। धर्म और ब्रह्म की व्याख्या की बात हो रही है। देखिए अभी धर्म और ब्रह्म की बात नहीं चल रही। परंपरा की बात चल रही है। धर्म और ब्रह्म की बात अलग है और जो क्या बात है मैं बात कीजिए तो मैं बता रहा हूं ना परंपरा से जो धर्म ब्रह्म है उसमें अंतर नहीं आना चाहिए क्योंकि वो पीछे से आ रहा है। मगर जो वर्तमान की स्थितियां है कि भैया कहीं किसी मंदिर में सोना गया। अब वो उस मंदिर में सोना गया तो एक शंकराचार्य को पता चला की गया। दूसरे को पता चला कि नहीं गया। इस जानकारी के लिए वो निर्भर किस

00:15:46:04 पे हैं? आज के टीवी चैनल्स पे। तो आज की जो जानकारियां इनको लेकर के उनके बीच में मतभेद हो सकते हैं। मगर पीछे से जो धर्म ब्रह्म की व्याख्या चली आ रही है उसमें तो अंतर नहीं है ना? नहीं उसमें अंतर ऐसा है कि उसमें विवरित और दुनिया भर के सब मतभेद है। अरे तो उसमें उसमें जो घोषित होगा वह अंतर वो निर्णय बताएगा। उसमें चारों शंकराचार्य में से किसने निर्णायक फैसले में धर्म और ब्रह्म की व्याख्या में अंतर कर दिया बताओ। अभी तो मतभेद आ रहा है ना ये अपना इसका और डिटेल बता दूंगा। क्योंकि इसमें मतभेद आ रखा है। उत्तर में मानते ही अलग है। यहां अपने पूरे शंकराचार्य अलग मानते हैं। नहीं धर्म और ब्रह्म की व्याख्या में अंतर बताओ मुझे किस शंकराचार्य ने एक दूसरे का खंडन किया। अब जैसे मैं आपको बता देता हूं। ठीक है। अब जैसे मान लीजिए अगर आचार्य शंकर कब हुए ये चीज नहीं पता रहेगी। ठीक है। इसका कन्फर्मेशन नहीं रहेगा। ये भी ये भी वैसी ही चीज है। मैं उसको बताता हूं कैसे कनेक्टेड है। धर्म ब्रह्म की व्याख्या नहीं है। ये जानकारी की व्याख्या है। नहीं नहीं इसमें कैसे कनेक्टेड मैं बताता हूं। जैसे मान लीजिए आचार्य शंकर कब हुए इस बात की हमारे पास जानकारी नहीं है। ठीक है? तो बेसिक बात है कि जब हमें यही नहीं पता कि परंपरा कब से स्टार्ट हो रही है। हमारे पास है ना जानकारी ढाई हजार साल पहले हुए मैं पूरा गलत लिखता हूं कि आचार्य शंकर कब हुए हैं अगर हमें ये नहीं पता तो आचार्य शंकर के कौन-कौन से ग्रंथ हैं कब लिखे क्या लिखे। इसकी प्रमाणिकता का आधार खत्म। इसकी प्रमाणिकता का आधार खत्म। तो भैया ग्रंथ में जो बात लिखी है सही गलत। उसकी प्रमाणिकता का आधार खत्म।

00:17:01:08 अगर अगर ऐसे तो हम यह वेदों की प्रमाणिकता पे भी वो कर सकते हैं कि भैया कई सारे पड़ेगा ना जब ये बात आ जाएगी तो फिर तो करना पड़ेगा या तो देखिए या तो ये कीजिए कि इतना 19 20 को एक्सेप्ट करके चलिए या तो बिल्कुल टिट फॉर टाइट करेंगे तो फिर तो हर चीज खत्म हो जाएगी कुछ फिर वही तो मैं कह रहा हूं कि अगर आप शंकराचार्य पर उंगली उठाएंगे तो वैदिकता खत्म हो जाएगी आपकी नहीं मैं वही कह रहा हूं कि अगर आप बाकियों में भी प्रश्न उठाएंगे क्योंकि जो जो कमी आप में है वैसी कमी दूसरे में ढूंढेंगे तो प्रश्न उठ जाएंगे ना हमारे में जो कमी है वो उस समय से पहले किए जिस समय के बाद आप हम पर निर्भर कर रहे हो। हम आप पर निर्भर नहीं कर रहे हैं। जैसे आचार्य शंकराचार्य जी ने बोला था पूरी शंकराचार्य जी ने कि मुझे सपने में धन और वेद का ज्ञान मिला था। तो वहां पे उस स्थिति में स्वीकार कर रहे हैं कि वो क्या कहते हैं? किसी सामने से जो एक फिजिकल फॉर्म में कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने ये भी कहा है कि अगर आपको सपने में मंत्र इत्यादि प्राप्त हो जाए तो किसी प्रामाणिक आचार्य के पास जाकर के उसे सत्यापित कराएं। ये भी कहा है। अभी तो धनुर्वेद का जो ज्ञान उन्होंने उन्हें प्राप्त हुआ। उसे उन्होंने किससे सत्यापित करवाया? तो उन्होंने कराया होगा नहीं कराया होगा वो तो तब है ना जब वो किसी के ऊपर वो थोपे उस चीज को कह रहे है ना कि वो तो कह रहे है ना कि मेरे पास ये तो उनकी ये तो उनका पर्सनल एस्पेक्ट है ना इसको उन्होंने उसपे थोप कहां दिया कि तुम ऐसा करो या तुमको ऐसा करना चाहिए करने वाली बात

00:18:17:03 करने मैंने करने का बोला ही नहीं मैंने ये बोला है कि यानी उस स्थिति में उन्होंने ये बात माना है ना कि इस तरीके से भी ज्ञान मिल सकता है ज्ञान ज्ञान बिल्कुल मिल सकता है फिजिकल गुरु के बिना मगर उसको सत्यापित कराना बहुत आवश्यक है अगर जैसे जैसे सुनो जैसे अभी देखो यही तो सत्यापित कराने वाला ना हो तो तो यही तो सुनो तो यही तो दिक्कत है सत्यापित कराने वाला ना हो तो फिर अपनी वैदिकता कैसे सिद्ध करेंगे जैसे सुनो मैं एक छोटी सी एग्जांपल दे रहा हूं ब्रह्मा कुमारीज वाले कहते हैं कि ब्रह्मा जी मुझे दिखाई देते है सीधे मुरली सुनाते हैं। अब हम उनको अगर यह नहीं कहेंगे जो परंपरा प्राप्त वैदिक हैं उनसे वो सत्यापन हुआ है आपका भेद तो आपको इधर से मिल रहे हैं तो उनकी बात तो फिर माननी पड़ेगी फिर इसमें कोई तर्क ही नहीं है उनको तो सीधे ब्रह्मा मुरली सुना रहा है| हर हर व्यक्ति कहने लगे मुझे भगवान दिख रहा है ये कह रहे हैं मैं क्या करूं मास्क नहीं उसमें पॉइंट ये आता है ना उसमें देखिए अब जैसे मान लीजिए कि इसका सोलशन ऐसे होता है कि मान लीजिए कोई व्यक्ति कुछ भी कह रहा है और अब कुछ भी कहने का अर्थ क्या होता है कुछ भी कहने का अर्थ होता है व्यक्ति अपनी व्याख्या दे रहा है यही होता है अर्थ उसका अब इसमें ये आ जाता है इसका सशन ऐसे करते हैं आचार्य शंकर के पहले जो परंपराएं थी कौन सी परंपराएं थी वेदांत गुरु गद्दी स्थापित करने से बहुत प्राचीन परंपरा थी वैशेषिक सांख्य और न्याय की ठीक है प्राचीन उनसे पहले की जो ग्रंथ है ना एक मिनट एक मिनट एक मिनट तो उन्होंने ये पूरा इन्होंने उनकी पहले की परंपरा

00:19:32:12 थी मतलब अब जो आचार्य शंकर उनका खंडन कर रहे हैं तो ये बोल के खंडन नहीं कर रहे कि नहीं नहीं मेरी जो परंपरा है ये भी परंपरा है कोई इसलिए आपकी नहीं मान वो आप युक्ति दे रहे हैं कि आपका जो पॉइंट है ये वाला पॉइंट ऐसे युक्ति देखिए वो ना ठीक है वो कह रहे हैं श्रुति में ऐसा इसका इंटरप्रिटेशन ऐसा होगा ये वो हर हर चीज में युक्ति दे रहे हैं। युक्ति दे के खंडन कर रहे हैं। तो इससे ये कंक्लूजन निकल कर के आया कि और यही यही चीज फॉलो करते हैं रामानचार्य। वो भी युक्ति देकर के शंकराचार्य की बात खंडन करते हैं। फिर यही परंपरा फॉलो किया मधवाचार्य वो भी युक्ति देके खंडन कर रहे हैं। सब कुछ है युक्ति सेट। युक्ति के साथ साथ श्रुति भी दी है और चेंज किया ना दोनों लोगों ने, श्रुति के साथ साथ परंपरा है ना? परंपरा है परंपरा उन्होंने भगवत गीता में लिख दिया ना 13वें अध्याय के दूसरे श्लोक में कि वो जो संप्रदाय से हीन हो परंपरा से हीन हो उसको त्याग दो परंपरा पर जोर दिया तो है उन्होंने नहीं तो परंपरा से हीन का मतलब क्या होता है देखिए एक बात आती है अगर परंपरा से हीन है तो उसके पास ज्ञान ही नहीं होगा अगर ज्ञान है तो परंपरा के अनुकूल है ज्ञान सुनो ज्ञान बिल्कुल हो सकता है मगर उसको सत्यापित कराना आवश्यक है किसी परंपरा प्राप्त आचार्य से और जिस जिसके ऊपर परम आश्रित होंगे ना सत्यापन के लिए वही हमारी परंपरा कहलाएगी। नहीं उसमें देखिए जैसे आपकी जो परंपरा है वो किस चीज के लिए प्रमाणिक है? अद्वैत वेदांत के लिए प्रमाणिक

00:20:47:20 है। ठीक है? आपकी जो परंपरा है वो वेदांत वो वेद की रियल में देखा जाए तो वेद के ऊपर बात करना ही तब शुरू किया गया जब स्वामी दयानंद जी ने बोला। नहीं तो इसके पहले तो ये श्रुति के नाम पे सेव केवल उपनिषद के रेफरेंस दिए जाते। क्यों भाष्य नहीं किया? क्यों सांड में भाष्य नहीं किया? मैं बताता हूं। सांड पे भी मैं आता हूं। सांड और महिधर में भी बहुत मंत्रों में मतभेद है। फिर क्यों परंपरा वाली बात आ जाती है। ठीक है। महध जरूरी थोड़ी है उसी परंपरा के हो नहीं तो नाम तो ले रहे ना ये राघवाचार्य बोल रहे कि नहीं परंपरागत भाष फिर वहां फिर वहां पर देखो अगर उनमें आपस में वो आएगा तो फिर क्या कहते हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म से वो हो जाएगा क्या कैसे बताइए सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म इसको व्याख्या कीजिए कि कैसे कैसे दोनों में अगर मतभेद आ रहा है तो कैसे कटेगा इसकी जैसे मान लो कि राघव रामानुजाचार्य जी ये कह रहे हैं उनके पास भी उनकी परंपरा है ठीक है और शंकराचार्य जी यह कह रहे हैं उनके पास भी उनकी परंपरा है ठीक है अब राघवाचार्य जी आकर के विरोध कर रहे हैं कि नहीं नहीं हम तो जो है अगेंस्ट है आपके तो फिर उनसे पूछ लिया जाएगा भैया ठीक है दे दो आप परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म और सर्वशक्तिमान ईश्वर दे दो जीव की बात ये नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह मैं कह रहा हूं कि वो कह रहे हैं वो कह रहे हैं कि जो संप्रदाय के विरुद्ध जो वेद भाषा है वो नहीं माना जाएगा संप्रदाय के अनुकूल जो भाषा कौन सा भाषा है परंपरा

00:22:04:04 भाषा है कौन सा नाम लिखते हैं वो सायन और मैदतर का लेकिन सायन और मैदर के बहुत सारे मंत्र मत भेद दिखा दूंगा। अरे तो मतभेद के बाद फिर हमारा मत युक्ति युक्ति स्थापित कर रहे हैं हम। मगर साथ में हमारे पास परंपरा नहीं युक्ति सिर्फ नहीं है। परंपरा प्राप्त शब्द प्रमाण और फिर युक्ति। नहीं तो फिर बात वही अगर युक्ति को अगर युक्ति को ले आओगे तो वेद मंत्रों की भी आवश्यकता नहीं है। तुम नया धर्म्यापित कर सकते हो। अभी आज लिख दो सारा युक्ति के आधार पर। फिर भी देखिए उसमें यह है वैदिक क्लेम कर रहा है तो यानी वेद को स्वीकार कर रहा है वेद का वेद वेद का सुनो तो वेद का मतलब ही है श्रुति परंपरा वो ठीक है कि आप परंपरा से प्राप्त चीजों को अपने शब्द के प्रमाण के रूप में ले रहे हो लेकिन ये बात आती है बात ये आ जाती है कि जब हम इसको पढ़ते हैं ठीक तो हमें समझ में आता है जैसे हमने ये देखा कि अलग मंत्रार्थ कर रहे हैं ये महिर अलग मंत्रार्थ कर रहे हैं उनके पहले के नारायण स्वामी स्कंद स्वामी अलग-अलग मंत्रार्थ कर रहे हैं है ना जिसकी सबसे प्राचीन स्कंद स्वामी का मिलता है उनका तो साइंस एकदम ही अलग है और वो कैसे आता है तो फिर वहां पे युक्ति भी लगे वहां पे युक्ति भी लगेगी ना तो इसमें ये है कि अब जैसे इन लोगों का मतभेद आ रहा है यानी हमें क्या पता चला कि मंत्र वही है सब कुछ मंत्र में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जो मंत्र का अर्थ कर रहे हैं वो अलग-अलग है तो इसका इसके पढ़ने पे हमें

00:23:19:06 क्या पता चला इसका पढ़ने पे पता चला कि यहां पे जब हम निरुक्त पढ़ते हैं निरुक्त में व्यासकाचार्य ने क्या बताया कि वेद वेद तो वही है मंत्र वही है उन्होंने बोला कि लेकिन वेद का जो अर्थ करने वाले जो वेदार्थ के जो संप्रदाय है वो अलग-अलग हैं। ठीक है? उसमें से 10 संप्रदाय उन्होंने गिनाए। तो उसमें से एक संप्रदाय उन्होंने यह भी गिनाया हुआ है कि एक संप्रदाय ऐसा है कि जो वेद का अर्थ नहीं करता केवल मंत्र रटर रट के आगे बढ़ता है। उसको उन्होंने पशु बोला हुआ है कि तुम पशु के समान जैसे गधा बोचा होता है वैसे तुम वेद मंत्र ढो रहे हो। जैसे उन्होंने बोला हुआ है। फिर ऐसे 10 संप्रदाय के नाम गिनाए और एकाध ऐसे आचार्यों के नाम गिनाए जो स्वतंत्र थे जो किसी संप्रदाय से नहीं थे। मतलब ये बिना संप्रदाय के भी आप वेद का अर्थ करने वाला वो होता है उसके अंदर। वो भी गिना रखा है उन्होंने। तो उनमें से जिस संप्रदाय का नाम उन्होंने गिना है व्याकरण संप्रदाय। ठीक है? जिसको व्याकरण मानने वाले को व्याकरण कहते हैं। तो वो वो उसमें क्या है? तो व्याकरण और निरुक्त वाला जो है वो हमारा क्योंकि उसका इतिहास मिलता है। ठीक है? उसका इतिहास मिल जा रहा है। अब वो जो एक जो ट्रेिंग करते हैं तो हमें कुछ कुछ कुछ आचार्य जो जो हमें डॉक्यूमेंट इत्यादि मिलते हैं उसके बेस पे हमें पता चला कि नहीं इतने इतने पूरे श्रृंखलाएं चली आ रही है। ठीक है? इसमें कोई दिक्कत नहीं है। हम तो वही चीज मैं कह रहा हूं कि वेदार्थ करने के लिए जो वो संप्रदायों के नाम प्राचीन आचार्य ने गिराए हैं वो तो आपके नहीं है। तो आपको तो वेदार्थ करने का अधिकार ही नहीं है। एक पॉइंट आ गया। यानी वेदांत करने का मूल रूप से देखा जाए तो हमें अधिकार है। अच्छा इस पे एक और बात आ जाती है जो आचार्य शंकर जी ने जो परंपरा मैं पूरा बोल थोड़ा थोड़ा सा और है क्या कि जो आचार्य शंकर जी ने जो

00:24:34:07 परंपरा चलाई थी उसमें क्या था? उन्होंने चलाई थी प्रस्थांतरीय की परंपरा। ठीक है? उन्होंने चारों वेद का अर्थ करने की परंपरा चलाई ही नहीं थी। उन्होंने क्या चलाया था कि आपको वेद मंत्र याद करना है। ठीक है? और बाकी जो प्रस्थांतरी के ऊपर भाष्य करने की उन्होंने परंपरा चलाई थी। वही परंपरा रामानुज ने वही परंपरा मधुवा ने लोगों ने आगे आगे चल के फॉलो किया। इस चीज को इस परंपरा को तोड़ा स्वामी दयानंद जी ने। तो उन्होंने बोला कि ये प्रस्था तो स्वतः प्रमाण है ही नहीं। तो परत प्रमाण है। स्वतः प्रमाण तो वेद है। इसको मैं क्यों भाष्य करू? उन्होंने मना कर दिया। तो उन्होंने क्या किया कि इनकी प्रस्थांतरी भाष्य ना करके उन्होंने वेद के ऊपर भाषण करना चालू किया। इन्होंने बोला कि स्वतः प्रमाण वेद है। वेद के आधार पे ये प्रस्थांतरी का अर्थ बदल सकता है। लेकिन प्रस्थांतरी के आधार पे आप कहो कि नहीं वेद का फलाना अर्थ होगा। ये गलत है। क्योंकि ये प्रस्थरी स्वत है। तो वहां से और उन्होंने वेद ये वेदार्थ करने का जो आधार लिया वो क्या लिया? वो तो उन्होंने वही लिया ना जो अष्टाधय महाभाष्य है क्या अष्टादय महाभाष को रिजेक्ट करते हैं ऋषि कृत नहीं कर सकते वही आ जाती है अब इसके अंदर बात आती है अब इस चीज को हर कोई स्वीकार करेगा उसे कोई मना नहीं करेगा बात इसमें अब जहां पे इस कांटे पर जो टकराती है बात ये आ जाती है कि जो एक सूत्र का दूसरे सूत्र सूत्र से युक्ति लगा करके जो जो अर्थ स्वामी दयानंद जी ने किया हुआ है और उसमें फिर ब्राह्मण ग्रंथों का आता है क्योंकि बहुत जगह पे अलंकारिक व्याख्या इत्यादि है तो वो ब्राह्मण ग्रंथों से टैली किया जाता है उसके बिना नहीं किया साथसा तो वो ब्राह्मण ग्रंथों से टैली करके और जो पूरा व्याकरण के आधार पे जिन्होंने अर्थ कर रखा है व्याकरण

00:25:49:13 निरुक्त के आधार पे वो उसमें फिर सामने वाले व्यक्ति ने भी अगर पढ़ रखा है सेम चीज को तो आके उसमें फिर बात कर सके नहीं यहां पे ऐसे होना चाहिए था सामने वाले नहीं है यहां पे ऐसे होना चाहिए था वो एक अलग उसमें डिस्कशन है बाकी इसका कोई सशन नहीं है बाकी अब उसको रिजेक्ट करेंगे क्योंकि सामने वाले ने पढ़ रखा है कैसे रिजेक्ट कर देंगे आप पॉइंट ये है अब मैं बोलूं जी जी देखो सबसे पहली बात यहां से शुरू हुई है कि उन्होंने प्रस्थान त्रय पर परंपरा चलाई हम अब प्रस्थान त्रई को आप यह मानते हो कि वो जो है आपका ये मानना है कि वह जो है स्वता प्रमाण नहीं है। ठीक है मगर वेदार्थ के रूप में वेदार्थ के रूप में ही उपनिषदों को हमारे यहां माना गया है। अब इसमें मानने वाली बात जब आएगी मानने वाली है ना की वो स्वता प्रमाण है कि नहीं तो मानने वाली बात के लिए फिर वह परंपरा आनी ही पड़ेगी। आचार्य शंकर ने माना कि वेद स्वतः प्रमाण है। बाकी प्रमाण है। रामानुज ने माना है। मधुवा ने माना सबने माना। फिर भी वेस्टि भाष्य करते थे। क्योंकि परंपरा इसलिए इसलिए क्योंकि वो उसका प्रमाणिक भाष्य है ना उपनिषद। भाई जब एक बार वेद का अर्थ कर दिया उपनिषद में ब्रह्म की व्याख्या कर दी उपनिषद में प्रामाणिक व्याख्या जिसको हम प्रामाणिक अलग क्यों है फिर कहां अलग-अलग है नहीं आचार्य शंकर ने अलग किया मधवा ने अलग किया वो तो वो जब उपनिषदों पे भाष्य किया तो भाष्य अलग है ना उपनिषद थोड़ी अलग है मैं भाष्य की ही तो बात कर रहा हूं

00:27:04:24 उपनिषद को तो हम भी मान रहे हैं अभी बात में ये कह रहा हूं की जैसे हमने वेदार्थ की परंपरा नहीं चलाई मगर उपनिषद का मतलब क्या है वेदार्थी तो है ब्रह्मसूत्र वेदांत तो है उपनिषद क्या उसकी जैसे उसमें जो आध्यात्मिक व्याख्या आती है ब्रह्म ब्रह्म की व्याख्या तात्विक व्याख्या की व्याख्या वो है क्या तो कोई अद्वैत पर कर रहा है मेरे मेरी बात रह जाएगी मेरी बात रह जाएगी तुमने काफी काफी सारी चीजें बोली है तो मुझे काफी सारी चीजें बोलनी तो पहली बात तो ये है कि वेदार्थ की जो व्याख्या है वो हमारे यहां पर उपनिषदों की व्याख्या करते हुए चलाया गया समय आने पर जब ये देखा गया कि जो क्या कहते है वैदिक भाष्य लुप्त हो सकता है तो दोबारा से हमारे आचार्य ने शयना आचार्य ने उसपे भाष्य किया। ठीक है तो ऐसा नहीं कि वेदार्थ को अलग हटा करके रख दिया था। ऐसा होता तो कोई भी उसपे भाष्य ही ना करता फिर। क्यों करवाया? दूसरी और ऐसा भी नहीं है कि कहीं पर भी वेद का वाक्य लिया ही नहीं गया प्रमाण के रूप में। जगह-जगह पर आचार्यों ने वेद का वाक्य भी लिया प्रमाण के रूप में। मुख्य रूप में उपनिषद लिए हैं। वो उपनिषद भी लिए वेद वेद वेद के लिए वेद एकदम ना के बराबर ले रखे हैं। बताइए कौन सा वेद है। देखो ना के बराबर लिए हो चाहे जरासा भी लिया हो। मतलब लेने का मतलब है कि वो वेद को लेकर चल रहे थे। ठीक है? अब जब हमें वेद का अर्थ प्रामाणिक

00:28:19:25 रूप से अह उपनिषदों के रूप में प्राप्त है तो जल्दी हम उपनिषद ले लेते थे। नहीं वो अधूरा है ना। उपनिषद में कितने वेद मंत्र है? ठीक है। नहीं वेद मंत्र की बात नहीं कर रहा हूं। प्रामाणिक अर्थ की बात कर रहा हूं। नहीं नहीं अर्थ वेद मंत्र के अर्थ की बात कर रहा हूं ना। हमने उसे प्रामाणिक अर्थ के रूप में स्वीकार किया ना। उपनिषद को जैसे आप जैसे मान ले वेद में तो बहुत सारे मंत्र है ठीक है 100 मंत्रों का आपने उपनिषद उपनिषद में 100 मंत्र मान लीजिए आ गए उसका मैं अपनी मैं अपनी बात पूरी कर दूं फिर आप ठीक है एक तो रही ये वाली बात दूसरी बात ये है कि हमारी मुख्य विषय ये नहीं एक बीच में बात आई थी कि भाई हमारे पास युक्ति है तो हमने वैदिक स्वयं को कह दिया और युक्ति के युक्ति के आधार पर जो है वो कर दिया भले ही हमारे पास शब्द प्रमाण हो ना हो तो हमारे आचार्यों ने जो भाष्य किया है वो जो परम परंपरा अपनी दिखाते हुए कि भैया ये हमारे पास श्रुति को प्राप्त करने की विधा है। ये हमारी परंपरा है। उसके बाद अपनी युक्ति दी है। ठीक है? अब इस कई युक्तियों के आधार पर आचार्यों के भाष में अंतर तो है। मगर वहां पर क्योंकि उनके पास सबका शब्द प्रमाण है। इसलिए सबका ग्राह तो है। मगर फिर भी यदि एक दूसरे का वैसे ही विरोध करने लगेंगे कि आमने-सामने आ जाएं। तो फिर वहां पर बात क्योंकि सबके पास अपनी परंपरा है तो वहां पर बात यह हो जाएगी कि भैया सर्व शक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र

00:29:34:26 मोक्ष शाश्वत धर्म जो देगा वो उसका मान लिया जाएगा वहां पर मगर आप जो है केवल युक्ति को लेकर के आगे चले और जो है अपने शब्द प्रमाण को हटा ही दें कि भाई परंपरा हमारी 19 20 मान लो या क्लियर नहीं है वो मान लो तो फिर वहां पर ऑब्जेक्शनेबल हो जाएगा। नहीं यह तो सबका ही है ना और सबका नहीं है ना सब अपने आचार्यों के समय बता रहे हैं उन्होंने भाष्य लिखे हैं जगह जगह पर पंचदशी लिखी गई हमारे यहां धर्म ब्रह्म की व्याख्या में इनके इनको सपोर्ट करने वाली धर्म ब्रह्म की व्याख्या कौन सी है आचार्य शंकर से पहले कितने थे अरे आचार्य शंकर से पहले का अगर आप मानोगे नहीं वहां मान्यता विश्वास है अगर आचार्य शंकर से पहले का आप मानोगे नहीं तो अपनी वैदिकता भी तो सिद्ध करोगे फिर नहीं नहीं वैदिकता सिद्ध करने वाली बात अलग होगी अभी बात परंपरा पे चल रही है तो अभी बात हमें ऐसे तो हम तो बता रहे हैं भैया वशिष्ठ क्या कहते ब्रह्मा जी से वशिष्ठ वशिष्ठ जी से शक्ति शक्ति से पाराशर पाराशर से व्यास व्यास से वशिष्ट जी तो पूरा दो युग नाप गए हाँ दो युग नाप गए वही तो है वो आप मान्यता मानोगे नहीं वही मैं कह रहा हूं प्रमाणित करना पड़ेगा ना केवल मान्यता मानने से चीजें अरे भैया तो फिर

00:30:39:03 प्रमाणित आप भी कर दोगे वेद मंत्र चार ऋषियों के उसमें आए थे तो वो जो है भगवान नहीं दिए। कैसे प्रमाणित करो? उस दिन लक्षण आप पूछ रहे थे मुझसे। वहां लक्षण क्या था? वहां लक्षण क्या था कि ईश्वर ने वो दिया मंत्र क्या लक्षण था वहां ईश्वर का लक्षण क्या था वहां पहचानने के लिए ईश्वर का लक्षण था कि जो वेद का ज्ञान दे तो कोई सा भी ज्ञान दे रहे क्योंकि बिना ज्ञान दिए गुरु के ज्ञान दिए हो नहीं सकता तो बस वही लक्षण हमारे जो अवतार है वो दे रहे है क्या दे रहे है वेद का ज्ञान वैदिक ज्ञान धर्म का ज्ञान ब्रह्म का ज्ञान दे तो रहे है ये अवतार दे रहे है अरे आपने ही तो कहा कि भैया उसका लक्षण है कि वेद का ज्ञान देता है हां हां तो वेद का ज्ञान दिया भगवान ने नहीं भगवान ने अवतार ने क्या दिया वेद का ज्ञान अवतार ने वेद का ज्ञान दिया और क्या कौन से अवतार ने दिया श्री कृष्ण ने गीता में दिया गीता में वेद दिए उन्होंने कौन से वेद मंत्र दिए अरे वेद मंत्र बिल्कुल उसी फॉर्म में नहीं ज्ञान की बात हो रही है ज्ञान दिया कि नहीं दिया मैं जो बोल रहा हूं फिर अगर अगर आप मंत्र की बात कर रहे हो अगर आप मैंने कहा मैंने कहा वेद का ज्ञान मैंने तो वेद नहीं बोला अगर आप कह रहे हो ज्ञान सुनो तो ज्ञान है तो इसका मतलब आप आपके पास पहले से ये होना चाहिए कि वेद का ज्ञान ये है जो वेद का ज्ञान देगा वो ईश्वर है। नहीं

00:31:54:04 मैं आपसे पूछ रहा हूं कि फिर वेद का ज्ञान है क्या? मैं बता रहा हूं। आपने ऋषियों के ये कहा कि ऋषियों ने उनको वेद के ज्ञान से पहचाना। यही कहा ना आपने? मैंने देखिए मैंने ये बोला कि जैसे मान लीजिए कि आधी सृष्टि में लोग हैं। ठीक है? अभी हम अभी हम फिलहाल ये ऑब्जर्व कर रहे हैं कि बिना सिखाए कोई सीखता नहीं है। ठीक है? मां-बाप बच्चे को बोलना नहीं। मैं मैं वो बात पलट जाएगी। मैं ये कह रहा हूं ऋषियों ने उनको वेद के ज्ञान से पहचाना ना कि जो वेद का ज्ञान दे रहा है वो ईश्वर है। वेद का ज्ञान हटा दिया। वेद मतलब ये होता है जो ईश्वर द्वारा उसी को हमने वेद बोला है। ठीक है? यानी तो वो वो ईश्वर की पहचान कैसे की थी आपने? जिसने ज्ञान दिया वो ईश्वर है। तो बस ऐसे ही आपका एक विश्वास है वहां पर। अनुभव आप अनुमान प्रमाण है। केवल विश्वास थोड़ी है।

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00:32:36:28 हां बताओ क्या अनुमान प्रमाण है बताओ? अरे जैसे जैसे मैं बोल तो रहा हूं कि जैसे बिना सिखाए किसी को ज्ञान हो नहीं सकता। ठीक है? ठीक है तो वैसे बिना आधी सृष्टि में बिना किसी के ज्ञान दिए हो नहीं सकता। बिना सिखाए किसी को ज्ञान हो नहीं सकता। मतलब आप ये कह रहे हो कि बिना सिखाए व्यक्ति खाना खाना भी नहीं सीख सकता। अगर ये बताइए अगर बच्चा मान लीजिए बच्चा अभी पैदा हुआ है। ठीक है? उसको ये पता है कि पानी क्या है? शरबत क्या है? पता है उसको? तो इसका मतलब जानवर को तो पानी पीना नहीं चाहिए। बच्चा उठा के मिट्टी खाता है ना मुंह में। पता होता है उसको क्या खाना है? जानवर को पानी पीना चाहिए कि नहीं? जानवर के अंदर तो नेचुरली फिट कर रखा है वो चीज। तो हो सकता है नेचुरल हो सकता है हो सकता है नेचुरली आया ऋषियों के अंदर क्या आया वो यही ज्ञान अगर नेचुरली तो मानना पड़ेगा ना कि किसी के किसी के द्वारा दिया गया है नेचुरली भी अरे क्यों कुत्ते के अंदर जब आप नेचुरली मान रहे हो तो ऋषि के अंदर ईश्वर मानते हैं हम तो ईश्वर प्रदत्त मानते हो ना विश्वास है ना कि वो ईश्वर नहीं दिया वही है ना कि आएगा काम थोड़ी हो जाएगा हमारी अरे अभी तो तुमने कहा कि कुत्ते के अंदर नेचुरली होता है नेचुरली बोलने का अर्थ ही मेरा कि ईश्वर द्वारा दिया गया है और और इंसान को नहीं दिया गया है। इंसान को दिया तभी तो हमारे पास ज्ञान है। आज नहीं दिया तो कैसे होता? अच्छा दूसरी बात ये है कि वो ज्ञान ही है। ये कैसे सिद्ध

00:33:52:00 हुआ? तो और क्या है? भाई

00:33:55:01 जैसे कि हमें उससे मोक्ष प्राप्त होगा। ये सिद्ध कैसे हुआ? उसका लक्षण क्या है ज्ञान का? प्रयोग से क्या प्रयोग है बताओ। अगर कोई उसको टेस्ट करना चाहता कि इस ज्ञान से मोक्ष होगा नहीं होगा उसको टेस्ट कर ले। प्रत्यक्ष कर ले उसका। तो तुमने किया है नहीं मैंने तो नहीं किया तो इसका मतलब लक्षण सिद्ध नहीं हो रहा नहीं लक्षण बात ये नहीं कि लक्षण सिद्ध नहीं हो रहा बात है लक्षणों को चेक नहीं ऐसे तो ऐसे तो मैं भी कह सकता हूं ना कि राम जी को देख कर के मोक्ष प्राप्त हो जाएगा टेस्ट कर ले अब

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00:34:24:02 लाइए राम जी को टेस्ट कर लेते हैं हां तो करो भक्ति उनकी आजीवन कर लो नहीं आपने बोला ना कि राम जी को देख के देखना पड़ेगा लाइए देखते हैं अभी देखते हैं अभी हां तो अंतःकरण से आजीवन देखते रहो मोक्ष में अंतःकरण से अंतःकरण से तो किसी ऋषि ने लिखा नहीं कि भाई राम जी को देखिए आंखें आंखों से देखने का विषय है ना राम जी तो अच्छा तो मंत्र कैसे देखे गए थे वहां द्रष्टा कैसे बने थे अंतःकरण से बने थे कैसे बने थे अच्छा कौन से ऋषि ने दृष्टा का अर्थ देखना लिखा है जानना नहीं लिखा दर्शन करना आपके दयानंद जी ने ही लिखा है और बताओ ये भी उन्होंने लिखा कि अर्थ है ना अर्थ है ना अर्थ है ना हिंदी करना आना चाहिए ना संस्कृत यानी यानी कि ज्ञानार्थक उसका अर्थ ले रहे हो ना मैं भी मैं भी ले रहा हूं मैं भी ले रहा हूं राम जी को देखने का दर्शनार्थ अंतःकरण से उनको जीवन भर देखते रहिए मोक्ष मिल जाएगा टच कर लीजिए आपने ये क्लेम किया ना की उनको आंखों से देख सकते हैं आंखों से देखने के बाद भी अंतःकरण से भी देखिए ज्ञानार्थक दृष्टि से अलग विषय है अलग विषय आपने आंखों से देखना पहले बात किया था मेरी आपने भी पहले बात किया था कि वो चार ऋषियों को ज्ञान प्राप्त हुआ वो छोड़ दीजिए अभी बीच में मैं नहीं छोड़ रहा हूं मैं नहीं छोड़ रहा हूं मैं तो उसी पे बोल रहा हूं देखो अगर अगर तुम अगर तुम ज्ञान से टेस्टिंग मान रहे हो निर्भय तो तुमको यहां पे भी मानना

00:35:39:06 पड़ेगा कि हम कह रहे हैं कि भैया हमारे बताए रास्ते पे चलो मोक्ष मिल जाएगा टेस्ट कर लो जाकर फिर अवतार को मान लो। नास्तिक आपको यही बोलना ही पड़ेगा और कोई चारा नहीं है। हां तो बोलना पड़ेगा उसमें क्या है? मगर आप जो आप जो लक्षण पे रोक रहे हो ना कि वो क्या कहते हैं लक्षण क्या है? एक एक बात बात इसके अंदर जाती है। लक्षण पे कैसे आए वो मैं बता दूं। लक्षण पे कैसे आए? कि वैदिकता वैदिकता से नहीं वो कैसे मैं बता रहा हूं। घूमा कैसे? वो मैं बता रहा हूं। क्यों घूमा? लक्षण पे क्यों आए थे? क्योंकि जब हमें वैदिकता सिद्ध करनी है तो हमने ऋषियों की बात को वहां प्रमाण मान लिया। तो ऐसे हमारी मान्यता है कि भैया दो-दो लाख वर्ष के वो वशिष्ठ इत्यादि हुए। नहीं तो बात ये है ना बाद आ जाता है। हम ये देखते हैं कि कौन सी चीज संभव है, कौन सी चीज असंभव है। है ना? अब देखिए ऋषि अगर मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास ज्ञान नहीं तो उसके पास ज्ञान अचानक से आ गया और वही बात अगर आया नहीं तो फिर हमारे तक भी नहीं आता। है ना? इसके अंदर फिर असंभव असंभव असंभव तो असंभव तो इसमें ये आ जाता है कि यह अनुमान प्रमाण से चीज का पता चल रहा है लेकिन ये कहना कि नहीं कोई व्यक्ति जो है दो युग तक जी गया ठीक है इसको भी तो आपको कोई ना कोई अनुमान प्रमाण दीजिए प्रत्यक्ष दीजिए ना तो मानना पड़ेगा ना आप यहां पे असंभवता वो कर

00:36:54:07 रहे हो ना क्या चीज अब मैं असंभवता बता रहा हूं कि पहला मानव आपका कैसे बना है बताओ ये भी तो असंभव है आप बताइए आप बताओ हमारा तो सीधे मानव प्रकट हुआ अब बताओ आप बताओ कैसे प्रकट आप अपना बताओ ना मैं अभी आपसे पूछ रहा हूं आपकी भी तो मान्यता मुझे क्लियर होनी चाहिए ना कैसे पहला सीधे भगवान की इच्छा शक्ति से नहीं इच्छा शक्ति से भी कुछ तो हुआ होगा क्या हुआ है वो तो बताइए सीधे प्रकट हो गया और क्या? नहीं प्रकट में भी अभाव से भाव हो गया क्या? अभाव से भाव क्यों होगा जब ईश्वर है ईश्वर को मान रहे हैं हम पीछे नहीं जैसे वह मनुष्य नहीं था उस मनुष्य का अभाव था उसका अभाव हो गया ऐसा कह रहे हैं आप मनुष्य का मनुष्य के रूप में तो अभाव था ही और क्या जो रूप है उसका तो अभाव था ही हा उपादान क्या था मैं आपसे पूछ रहा हूं आज भी वो उपादान है ना तो संभव है एक इंसान प्रकट कर दो नहीं हम तो प्रकट होना ऐसे डायरेक्ट थोड़ी बोल रहे हम तो बोल रहे बंद है पंचभूत से बनता है जैसे आज बनता है आज आज जैसे मतलब वो आज जो है गर्भ धारण करके बनता है ना हां हां उस समय गर्भ धारण हुआ था किसी महिला का हुआ था किसने किया था ईश्वर ने बनाए थे किसके पेट में ये गर्भ

00:38:09:08 में बनाए थे अंडा के कौन बना रहा है मुर्गी के पेट में अंडा कौन बना रहा है मुर्गी बना रही है मुर्गी मुर्गी बना रही है अंडे के पेट में क्या बता रहे हो तुम समझ में नहीं मैं पूछ रहा हूं इसमें मेरा ये प्रश्न रूप में था प्रश्नात्मक शैली में था ये कि जैसे से अगर पेट में मुर्गी के अंडा बन रहा है। ठीक है? तो अंडा कौन बना रहा है? मुर्गी बना रही है। कौन बना रहा है? ठीक है? अज्ञात शक्ति बना रही है। और फिर अंडे को वो बाहर निकाल दे रही है तो भी उसको मुर्गी को नहीं पता कि अंडे के अंदर से बच्चा कैसे बन रहा है? कौन बना रहा है? अज्ञात शक्ति बना रही है। तो जैसे आज वो ईश्वर इस प्रकार से बना रहा है। गर्भ निर्माण अंडा क्या एक प्रकार का गर्भ है। ठीक है? तो जैसे वो गर्भ बना करके बच्चे का रचना आज कर रहा है। वैसे ही उस काल में भी कर रहा है। तो मैं वही तो कह रहा हूं। असंभव कुछ है ही नहीं। मैं वही तो कह रहा हूं असंभव कुछ है ही नहीं। आप कह रहे हो ना असंभव है कि दो लाख वर्ष जो वो जिया आपको उदाहरण दे के आज मैंने उसका उदाहरण देकर के दिखाया कि हां सुनिए आपका उदाहरण आपका उदाहरण इसलिए गलत है कि आज मुर्गी के गर्भ में ही अंडा पलेगा बढ़ेगा मगर वहां पे कोई मुर्गी नहीं थी फिर भी अंडा आप मान रहे हो वहां पे नहीं नहीं उसमें बात की बात क्या है पॉइंट पकड़िए इसलिए पॉइंट इसके अंदर ये आ रहा है कि हमें ये नहीं देखना कि मुर्गी के अंदर बन रहा है कि अंटार्कटिका में बन रहा है क्यों नहीं देखना है मुझे देखना है ना आज की साइंस ये नहीं मानती ना कि बिना उसके गर्भधारण हो जाएगा। अंडा बन जाएगा। साइंस मानती है। क्यों नहीं मानती? कहां मान रही है? साइंस मानती है। आर्टिफिशियल

00:39:24:19 फर्टिलाइजेशन मानती है। साइंस करते नहीं है ये लोग। जागोट को मिला करके आपस में करते नहीं है ये लोग। क्यों नहीं करते? लैब में टेस्टिंग होती है। ये जो ये जो बेबी टेस्टिंग होती है जागोट को ये लोग मिला के उसमें जागोट तैयार करते हैं। पूरा क्या करते हैं वो? आर्टिफिशियली तो हो रहा है। मतलब लैब में कर रहे हैं चीजें तो। अगर कोई मनुष्य काम करता चलो ठीक है ठीक है वहां पर मतलब कि आपका कहना है कि वहां पर जो है ये जो पंच तत्व थे वो जिस तरीके से आज जो टेस्ट ट्यूब में ये बनाए जा रहे हैं अंडे वगैरह उस तरीके से ईश्वर ने बनाए हां मतलब ये देखिए इसमें बात होती है संभव और असंभव तो अगर अगर हम हां हां मैं मुंह धो ले रहा हूं तो वही बात आ जाती है ना कि इसमें अगर संभव असंभव वाला पॉइंट आता है अगर इस चीज को अगर हम आज दिखा रहे हैं कि नहीं ये चीज असंभव है ठीक है तो आप उसे से 1000 साल पहले भी संभव है फिर तो आप रिजेक्ट नहीं कर सकते। लेकिन अगर वो चीज आज संभव नहीं है। ठीक है? आज अगर मतलब बिना माता-पिता के सहयोग के वहां पर संभव था या माता पिता का था। आज तो हो रहा है ना? अरे तो वीर तो ले रहे हैं ना वो किसी पुरुष का। यानी वो फिर वो वीर भी बना किसी चीज से। मैटर से बना है ना? आज बना पा रहे हैं कि नहीं बना पा रहे हम? तो वीर आज की साइंस तो ये मानती है ना कि वो एक मैन से ही निकलेगा। अरे आज आज आज तो हमारे पास में यह भी है ना कि हम एक डीएनए से सिंपल एक डीएनए से ही बच्चा

00:40:39:25 बना सकते हैं। प्लांट का कि हम कैसे बनाते हैं? प्लांट से वो डीएनए कहां से लाएंगे हम? जैसे इस चीज को समझिए। ये तो एक हो गया कि पैटर्न से एक एक तरीका ये होता है और ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो ईश्वरकृत कार्यों में असंभव वाली दिखेंगी। साइंस के मैं सबको प्रमाणित करूंगा। उसमें समस्या नहीं है। बात ये है कि उसमें समस्या ये आती है कि जब हम आपसे प्रश्न पूछते तो अपने प्रश्न का उत्तर ना दे के आप हमसे पूछते हैं। ये चीज खराब लगती है। लेकिन फिर भी मैं तो तैयार हूं। अपने आप जो मेरे से प्रश्न पूछेंगे सबका उत्तर देने को तैयार हूं। लेकिन कम से कम आप भी तो तैयार होइए। अपने वाले का देने के लिए उत्तर। भाई मैं तो दे ही रहा हूं ना भाई। आप मान नहीं रहे हो। तो आप आप वहां पे यह कह रहे हो कि भैया यह असंभव है। बिलकुल है तो मैं मैं आपको प्रमाणित करके रहूंगा कि आपके ईश्वर जिसको आप ईश्वर कह रहे हैं उसने कई ऐसे कार्य किए हैं जो असंभव है। देखिए अब ये बच्चा वाला तो आप असंभव क्लेम नहीं कर पा रहे हैं। क्यों नहीं क्लेम कर पा रहे भैया वो उनके पास मशीन होती है ये होता है वो होता है। आप मुझे दिखाओ करके बिना उसके इन सहायता के। किसके सहायता के? जिन उपकरणों का वो सहायता ले रहे हैं करने के लिए उन उपकरणों का वो दिखाओ मुझे करके। नहीं तो ऐसे तो ईश्वर भी जो पेट में बच्चा बनाता है वो क्या उपकरण से बनाता है? अपने से बनाता है ना? तो सामर्थ्य मानना पड़ेगा ना उसके पास ऐसा तो फिर सामर्थ मान रहे हो तो ऐसा सामर्थ भी मानो ना जो क्या कहते हैं ये क्या कहते हैं वो किसी को चाहे तो इतने लाख वर्ष जीवित

00:41:55:06 रख दे। अब मैं इसको बताता हूं। अब जैसे मान लीजिए कि इसमें पॉइंट ये आ रहा है कि अब जैसे ये चीज क्योंकि बच्चा बना रहा है। ठीक है? तो ये चीज अनुमान प्रमाण से सिद्ध हो रही है कि अगर बच्चा बना रहा है तो उसमें बच्चा बनाने का सामर्थ्य है। है ना? तो यह चीज आपको प्रूफ करना पड़ेगा ना कि ऐसे हजारों करोड़ साल तक जिंदा रखने का सामर्थ्य है तो प्रूफ करिए क्यों नहीं कर रहे तो देखिए हम सामर्थ घटाने आप अचिंत शक्ति को मान रहे हो आपने उस दिन पृथ्वी इत्यादि में धक्का ना मानने की बात आपने जो है इच्छा शक्ति मान ली वो दिखाओ मुझे वहीं से शुरू हो जाता है तो बार-बार आप टॉपिक चेंज करेंगे मूलंग इसलिए क्योंकि आपको पता है कि किसी एक चीज में आपने जानकारी हासिल कर ली है मगर ऐसे बहुत से उदाहरण है जहां पर हमको चमत्कार को मानना ही पड़ेगा कि उसकी इच्छा शक्ति थी केवल देखिए बात है आप जो है अपनी जगह पे इच्छा शक्ति को मान रहे हो हमारी जगह पे आप काउंटर कर रहे हो मैं मैं आपको बताता हूं जैसे आपने एक वाला पॉइंट उठाया था अभी ये वाला पॉइंट उठाया इसका मैंने आपको उत्तर दिया ठीक है अब आप ये करेंगे आप एक इसमें उत्तर नहीं मिला है इसमें उत्तर नहीं मिला है उत्तर ये है कि साइंस जिस तरीके से मान रही है जिस तरीके से साइंस मान रही है उस तरीके से आप वहां पे क्या मशीन्स हैं जहां पे वो टेस्ट ट्यूब बेबी बनेगा अभी आपने सामर्थ्य वाला बात बोला था ना हां तो सामर्थ वाली बात हुई तो उसको रिपीट क्यों कर रहे हो फिर क्या मतलब तो मैं तो मैं तो सामर्थ्य को मान ही रहा हूं ना आप नहीं

00:43:10:07 मान रहे हो मुझे नहीं अभी देखिए अभी मैंने पूरी स्टेटमेंट बोली आप मुझे दोबारा रिपीट करवा रहे हैं मेरी बात को मैंने अभी क्या बोला मैं मैं फिर बताता हूं मैंने बोला कि जब ईश्वर पेट में बच्चा बना रहा है ठीक है ईश्वर सृष्टि बना रहा है या ईश्वर फूलों में रंग डाल रहा है तो कौन सा मशीन यूज कर रहा है नहीं यूज कर रहा है ना तो इसीलिए तो हम बोल रहे है ना की सर्वशक्तिमान है लेकिन पॉइंट क्या आ जा रहा है पॉइंट ये रहा है कि आप बोल अब आप कह रहे हो मैं पूरा बोल देता हूं एक मिनट यानी नहीं मैं पूरा कम से कम स्टेटमेंट मेरी तरफ मैं अपनी बात क्लेरिटी के साथ मैं बस एक चीज़ यानी कि वो कुछ ऐसा कर रहा है जो और किसी जो हमारे लिए संभव नहीं है। हमें हम डिपेंड हो के कर हम भी रहे हैं हम डिपेंड होकर कर रहे हैं। वो डिपेंड हो के कर रहा है। तो यानी कि वो कर रहा है ना असंभव चीजें कर रहा है ना वो। असंभव जब कर दिया तो असंभव कहां रह गया? ये क्या बात हो गई? कर भी रहा है फिर भी कह रहे हो असंभव है। जब काम हो गया तो असंभव कहां रह गया? फिर यानी जो हमारी जो हमारी इंद्रियों के द्वारा क्या कहते हैं वो नहीं है कि हम उसको जो है कर पाए। ऐसी चीजें वो कर रहा है ना। बात यह है कि नहीं देखिए एक होते है करने वाले काम ना करने वाले जब ना करने वाले का काम उसने कर दिया तो फिर वो करने वाले काम की श्रेणी में आ गया ना एक तीसरा वाला दूध देना आप ये बताओ आप ये बताओ अभी साइंस ने ऐसी तरक्की कर ली है वो एक नया ग्रह बना दे पता नहीं मुझे नहीं पता सूर्य बनाने छोटा सा सूर्य बनाने का तो कर लिया है

00:44:25:22 नया ग्रह बना दे इत्यादि कर लिया है नहीं छोटा सा सूर्य बना सकता है वो तो एक है लैब टेस्टिंग में बहुत स्माल था उन्होंने सन क्रिएट किया था तो वो ग्रह मान वो वो ग्रह मान लिया जाए उसको टांग देगा वो वहां पर और उस पर जीवन हो जाएगा। नहीं नहीं नहीं रक्त रक्त की जो बात होती है वो बनाने का वो मान लिया कि हम बना सकते हैं। नहीं नहीं नहीं मगर ईश्वर तो बना रहा है। तो बना रहा है तो आंखों से दिख रहा है। यानी पता ये चीज पॉसिबल है। है ना? पॉसिबल है ये पता है ना हमें? अब बात वही आती है कि जो हमें आंखों से दिख रहा है कि ये चीज बन रही है यानी ये चीज पॉसिबल है। आप ऐसा क्लेम कर रहे हो जो हमें दिख रहा पॉसिबल नहीं है। आप मतलब अच्छा आंखों से नहीं दिख रहा पॉसिबल नहीं है। तो विज्ञान ने ईश्वर को मान लिया है। आंखों से यानी वो क्रिया होते हुए दिख रही है। अरे भैया विज्ञान ने ईश्वर को मान लिया है। ये जो कर्म फल सिद्धांत इत्यादि मान लिया है। नहीं। तो फिर ये आंखों से कहां दिख रही है? क्यों मान रहे हो? नहीं मैंने बोला कुछ और आपने लिया कुछ और। क्या कर्म फल सिद्धांत इत्यादि के विषय में मैं क्या बोल रहा हूं वो तो आप पकड़िए मैं जो बोल रहा हूं वो छोड़ के आप सब पकड़ रहे हैं बताइए मैं ये बोल रहा हूं कि जैसे आप बोल रहे हैं ना कि रक्त बनना रस से रक्त बनना है ना ये क्रिया हो गई आप कह रहे हैं असंभव क्रिया मैं कह रहा हूं जब ये कार्य हो रहा है असंभव क्रिया के लिए इस श्रेणी में कैसे आ जाएगा

00:45:41:22 क्योंकि रक्त क्योंकि क्योंकि रक्त से रक्त बन रहा है आज के टाइम में हम ईश्वर की अचिंत शक्ति मानते हैं जहां पे रक्त जहां पे रक्त से रक्त नहीं बना उसकी अचिंत शक्ति से रक्त बन गया नहीं अचिंत शक्ति देखिए उसमें पॉइंट वही है ना पॉइंट ये कि कोई भी क्रिया हो रही है तो उसमें परमाणु के मेल से नए पदार्थ बन रहे हैं। अश्वचिंत क्या है? परमाणु के मेल से परमाणुओं के मेल से परमाणुओं का वो जो मेल की विधि है वो आज रक्त बन रहा है क्या उस विधि से? नहीं तो हम देखिए बात ये है कि हम उस चीज को अगर नहीं कर पा रहे तो इसका मतलब ये नहीं कि नहीं वो इंपॉसिबल है। पॉइंट क्या है? इसमें दो वो प्रक्रिया आज हम क्या बोल रहे हैं मैं क्या मैं क्या बोल मैं बोल रहा हूं कि आप ये देखिए अगर कोई इंसान कोई काम कर पा रहा है तो संभव नहीं कर पा रहा तो संभव है बात ये आ रही है इसका मतलब ये है कि आज अगर हम रक्त नहीं बना पा रहे पूरा तो बोलने दीजिए मैं समझ गया तुम्हारी बात नहीं मैं नहीं समझे पूरा बोलने दीजिए पहले बात ये है कि अब जैसे आप ये बोल रहे हो कि कोई इंसान कर दे रहा है तो पॉसिबल है नहीं कर पा रहा इमॉसिबल है मैं बोल रहा हूं कि अगर कोई चीज नेचर में हो रही है ठीक है तो वो चीज हमें पॉसिबल ही दिख रही अब जैसे इंसान थोड़ी हमारी ऐज कितनी है? क्या हम उस चीज को नाप थोड़ी रहे हैं? जितना जीना इंसान जी जाके मर जाता है। तो पॉइंट वही है कि ये चीज नेचुरल है। तो नेचर में जो चीज पॉसिबल है, इंपॉसिबल है हम उस चीज

00:46:56:24 को पॉसिबल इमॉसिबल कहते हैं। और वो चीज मैं मानू कि गॉड के द्वारा हो रहा है। नेचर में जो कुछ भी पॉसिबल इमॉसिबल हो रहा है। अब इंसान इतना दो युग तक जी चीज नेचर में पॉसिबल ही नहीं दिख रही है। फिर आप इसको कैसे क्लेम कर दे रहे हो? अरे भैया नेचर में तो यही पॉसिबल नहीं दिख रहा है कि सच्चिदानंद है कोई। नेचर तो बिल्कुल आपको विपरीत वो दे रही ना इंफॉर्मेशन क्या दे रही है आप उसके विपरीत जाकर के अपने मोक्ष की कामना कर रहे हो ना कैसा संसार तो दुखप्रद है मूर्खता प्रद है उसके विपरीत जाकर के आप सच्चिदानंद को मान तो रहे हो

00:47:30:07 नेचर दूसरी बात मैं एक ये कह रहा हूं जैसे आपने कहा मैं मैं करता हूं मैं ये पहले रक्त पे आता हूं आज के टाइम में हम लोग नहीं जान पा रहे हैं कि रक्त जो किस विधि से रक्त बनाया जाए जबकि पंच तत्वों से ईश्वर ने रक्त बनाया। ठीक है? आज के टाइम में हम नहीं जान पा रहे कि क्या कहते हैं किस विधि से रक्त बनाया जाए। तो इससे ये सिद्ध नहीं क्योंकि हम अभी नहीं जानते तो इसका मतलब ये नहीं कि वो पॉसिबल नहीं है। तो इस प्रकार से अभी हम उस व्यक्ति को नहीं जानते हो जो क्या कहते हैं हजारों करोड़ों युगों युगों वर्ष जी रहा हो। इसमें और इसमें अंतर ये है कि हमें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल रहा है ना इस चीज का कि रस से रक्त बन रहा है। प्रत्यक्ष मिल रहा है। अब हमें प्रत्यक्ष अगर देखिए रक्त से रक्त रक्त से रक्त बनने का मिल रहा है ना बिल्कुल जहां पे कुछ है ही नहीं सब अलग अलग पड़ा हुआ है। रस से रक्त का भी मिल रहा है। जैसे मैं बताता हूं ना जैसे मैंने भोजन खाया तो भोजन जो मैंने किया उसी से ही हमारा हीमोग्लोबिन वगैरह बन रहा है ना। भाई भोजन से जो उसमें जो उसमें जो विधि है वो मिसिंग है। विधि है वो मिसिंग है। इतना हमें पता है इतना हमें पता है ना कि ये कारण है ये इसका कार्य है इतना हमें पता है हमें पता है कि कारण क्या है कारण है भोजन कार्य क्या है रक्त है ना इतना और हमें पता है कि हमें प्रत्यक्ष दिख रहा है कि चीज हो रहा है बॉडी के अंदर स्थिति बन रही है मगर जो विधि

00:48:45:10 पूरा सुनिए पूरा सुनिए पूरी सुनिए पूरी सुनिए अब बात ये है अब वो बात अलग है कि वो हमें टेक्निक पता हो कि ना पता हो एक अलग विषय है लेकिन हमें प्रत्यक्ष चीज क्या हमें प्रत्यक्ष कोई ऐसे हजारों करोड़ साल वाला व्यक्ति ऐसा दिख रहा है नहीं दिख रहा तो जब हमें नहीं दिख रहा तो इस चीज को हम क्यों माने उड़ने वाला बुरा नहीं मान चलो चलो चलो ठीक है नहीं माने चलो हमें कोई ऐसा ऋषि दिख रहा है जिसमें इसमें अंतःकरण में वेद मंत्र प्रकाशित हो रहे हैं। नहीं नहीं नहीं दिख रहा। तो फिर हम क्यों मान ले? अनुमान से मान रहे है ना तो अनुमान से ही वो मान रहे हैं। नहीं कैसे वही तो कह रहा हूं सिद्ध कर लीजिए ना हमारे पास हमारे पास वेद मंत्र कैसे आए? वही बात है। और वहां पे वहां पे

00:49:16:26 अनुमान नहीं है। वहां पे शब्द प्रमाण है। वहां सुनो तो सुनो सुनो सुनो। वहां पे अनुमान नहीं है। वहां शब्द प्रमाण है। अनुमान

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00:49:24:09 क्या है वहां पे? बताओ। मैं बता रहा हूं मैं बता देता हूं। अब जो आपने बोला आपने जो बोला ऋषि वाली बात ठीक है जैसे जैसे ये अनुमान से हो गया वैसे अनुमान से हो गया उसमें बात ये है अभी हमें प्रत्यक्ष दिख रहा है ना कि बिना सिखाए नहीं कोई सीख सकता मैं कह रहा हूं अभी नहीं पूरा सुनिएगा पूरा सुनिएगा अभी जैसे हमें अभी हमें प्रत्यक्ष देखिए बात वही है ना कि प्रत्यक्ष अनुमान में से कुछ ना कुछ होना चाहिए तब वो शब्द मान्य हो जाएगा अब वेरिफिकेशन के लिए शब्द का अब बात ये आ जाती है कि अगर हमें प्रत्यक्ष यहां पे पता चल रहा है कि नहीं अगर बच्चे को ना सिखाया जाए तो बोलना भी ना सीखे आसपास गूंगरे बिठा दो चिड़िया भी ना हो घर के अंदर बच्चा बड़ा हो जाएगा गूंगा गूंगा रह जाएगा ठीक है तो पूछने में पॉइंट ये आ जाता कि उसी यानी अब बिना सीखा नहीं तो वही बात आधी सृष्टि में बिना सिखाए नहीं सीखा तो ये चीज अनुमान से आ रही है लेकिन वही यानी हमें प्रत्यक्ष कुछ ना कुछ मिला तो हमने उस बेस पे अनुमान लगा लिया है ना अरे भाई तो आज भी तो दिखना चाहिए ना जो बिना किसी की मदद के सीख जाए आप ही तो कह रहे हो बिना किसी की मदद के वहां पे ईश्वर की मदद से सीखे तो आज ईश्वर की मदद से क्यों नहीं सीख रहा कोई नहीं नहीं मैं क्या कह रहा हूं आप क्या कह रहे हो हां हां बताइए आप क्लेम हमें ये थोड़ी सीखना है कि क्लेम हमें क्या करना है अब हमें प्रूव ये नहीं करना है कि आज ईश्वर सिखा रहा नहीं सिखा रहा प्रूव हमें ये करना है कि आधी सिस्टम उसे सिखाई। ये प्रूफ करना है ना प्रति क्यों भूल जा रहे हो आप? चलो प्रूफ करो। प्रूफ करो। वही मैं बोल रहा हूं ना कि ये मैं ऑलरेडी सारी बात बोल चुका हूं। बस रिपीट करने वाली बात है कि जब हमें ये प्रूफ करना है कि आधी सृष्टि में ऋषियों को ज्ञान मिला तो ये तो भगवान से हो रहा

00:50:39:10 है ना कि बिना सिखाए आज हमें दिख रहा कि बिना सिखाए कोई नहीं सीखता। तो यानी मैं पूरा बोल देता हूं। मैं पूरा बोल देता हूं कि आधी सृष्टि में अगर कोई बिना सिखाए नहीं सीख रहा मतलब अभी वर्तमान में नहीं सीख रहा। तो इससे हम अनुमान करते हैं अनुमान प्रमाण से कि हां पूर्व में भी ये काम नहीं हो सकती। आज नहीं हो सकता। पहले भी नहीं हो सकता। लेकिन पहले नहीं हो सकता आज भी नहीं हो पाएगा। तो अब इसमें पॉइंट क्या जा रहा है? पॉइंट जा रहा है। उसी प्रकार से आपने बोला कि उसी प्रकार से वो भी हनुमान मान लो। है ना? दो युगों में जीने वाला। मैं वही बात बोल रहा हूं कि अगर इसको मानने के लिए भी हमें तो कुछ ना कुछ प्रत्यक्ष भेष चाहिए। प्रत्यक्ष भेष क्या दे रहे हैं? ये 17 साल में आदमी जीने वाला ही प्रत्यक्ष है। ठीक है। ठीक है। अब मैं बताता हूं। पहली बात ये है कि जो वेद का ज्ञान है वो हम केवल इस संबंध में नहीं मानते हैं कि हमारा जो जो भौतिक जीवन है वो कैसे जिया जाए। इस संबंध में वेद का ज्ञान है वो इस संबंध में है मूल रूप से कि वो वहां पे हमारा ब्रह्म सध जाए। मोक्ष सध जाए। ठीक है? वो अलग विषय है। फिलहाल ज्ञान मिलने की बात सुनो तो सुनो मेरी बात। ज्ञान मिलने की बात ये है कि अ क्या कहते हैं ये अह क्या कहते हैं ये? पहले ज्ञान मिलना मान लेंगे। बाद में चीजें डिस्कस होती रहती। तुम बीच में टोकते हो फिर मैं भूल जाता हूं। सुनो जो ये जो क्या कहते हैं वेद के वेद से ज्ञान मिलने का है इसमें भूल गए भूल

00:51:54:12 गए इसमें हमने इसमें हमने ये निश्चित नहीं किया इसमें

00:51:58:02 हमने ये निश्चित नहीं किया है ये सिद्ध नहीं हुआ है कि वो जो ज्ञान मिला है वो मोक्ष का ही है जबकि वहां पर वो मोक्ष का कहा जा रहा है कल्याण का हेतु कहा जा रहा

⬜ Not used yet · 00:52:05:27 – 01:08:23:10 (16:17)

00:52:05:27 है दूसरी बात ये है कि जो बेसिक चीजें हैं वो एक जानवर भी सीख लेता है बिना किसी के सिखाए ठीक है चौथी तीसरी बात ये है कि जो वहां वहां पे जो ईश्वर ने दिया ज्ञान है ना तो वो आज क्यों नहीं दे रहा है किसी ऋषि के उसमें प्रत्यक्ष प्रमाण क्यों नहीं है ठीक है अब हिंदी में बताता हूं आपने बोला कि आज कुछ जो ज्ञान है वो बेसिक ज्ञान तो जानवर सीख लेता है ठीक है यही तो मूल अंतर जानवर और इसमें मनुष्य में यही अब क्यों अब देखिए अगर यही अगर मनुष्य भी बिना सिखाए बहुत सारी चीजें सीख लेता है ना तो ये चीज अनुमान प्रमाण से प्रूफ नहीं हो पाती कि अधिष्ठ ने ज्ञान दिया हम आराम से क्लेम रख देते भैया जैसे जानवर सीख रहा है वैसे इंसान ने भी सीख लिया होगा। ईश्वर की जरूरत ही क्या है? हम तो हम इस चीज को प्रूफ ही नहीं कर पाते। लेकिन क्योंकि इंसान जानवरों की तरह चीजें नहीं सीख पाता। ठीक है? उसको चाहिए होता है कोई ना कोई। इसीलिए इसी कारण से जो है हम जो है इस चीज को प्रूफ कर पाते हैं। है ना? ये वाली बात आ गई। अच्छा अब एक पॉइंट आपने क्या बोला था? कि वो मोक्ष वाला जो ज्ञान है वो वो वाली बात है। ठीक है फिलहाल वो एक अलग विषय है। फिलहाल हमें ये देखना है कि कौन सी चीज संभव है? कौन सी चीज असंभव है। मोक्ष मोक्ष वहां से सिद्ध कहां हुआ? नहीं नहीं अभी मोक्ष सिद्ध करना ना सिद्ध करना वो विषय नहीं अभी क्या ही चमत्कार वाली बात चल रही है नहीं नहीं इसलिए है कि हनुमान प्रमाण से मान रहे हैं ना और भगवान ने जो भी

00:53:20:28 कहा है वो उसका जो अंतगत जो कारण है वो है मोक्ष वेद का जो तात्पर्य वो तो मोक्ष ही है ना तुम्हारा कल्याण हो जाए तो मोक्ष को तो हमने वो नहीं कर लिया तो फिर होने को प्रूफ हो जाएगा थोड़ा लंबा प्रोसीजर पड़ेगा लेकिन सुनो और सबसे तीसरा वाला जो पॉइंट है ना कि ईश्वर जब वहां दे रहे हैं तो आज नहीं दे रहे हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सामने नहीं है तो हम कैसे मान ले वहां दिया? बात यह है ना बात वही तो मैंने बोला ना कि इसीलिए मैं कह रहा था थोड़ा पंचाय वगैरह उसमें दोबारा से आप जाके थोड़ा सा रिककैप करते हैं तो आपको हेल्प होता है समझने में। वही बात है कि यही बात है। इसीलिए मैंने बोला थोड़ा न्याय जरूरी होता है। अब इसमें पॉइंट क्या आ रहा है यहां पे थोड़ा मतलब मैं कोशिश करूंगा आप थोड़ा सा मतलब वो सपोर्टिंग नहीं रहिएगा मेरे। अब इसमें ये है कि हमें क्या प्रूफ करना है? हमारा ऐ क्या है? हमें यह हमारा ऐ बोला कि आधी सृष्टि में चार ऋषियों का ज्ञान मिला क्या प्रमाण? ठीक है? तो चार छोड़े 10 को मिला। प्रमाण क्या है? ठीक है? प्रमाण इसमें ये मैंने बोला ना कि अनुमान प्रमाण ये है कि आज बिना सिखाए नहीं सीखता। उसी प्रकार आधी सृष्टि में बिना सिखाए नहीं सीख सकता। तो आदि सृष्टि में जो पहला मनुष्य है। ठीक है? और बाकी जानवर उससे जो है उच्चतम है नहीं। है ना? यानी और वही बात है कि सारे उसी समय हो गए हैं तो बाकियों को क्या ज्ञान? तो जब मनुष्य को सिखाने वाला कोई ना कोई होना चाहिए। ठीक है? तो जिसको जो जिसने मनुष्य को सिखाया हम उसी को मान रहे ईश्वर है।

00:54:36:04 तो अनुमान प्रमाण से ऐसी चीज प्रूफ हो रहा है। ठीक है तो यहां पे बात यह है कि वहां पे ये था संभव और असंभव वाला है ना तो जैसा आपने बोला कि आदि सृष्टि में ज्ञान ठीक है। अब अनुमान प्रमाण से मैं एक चीज सिद्ध कर देता हूं। ठीक है? जी की कोई व्यक्ति बिना कुछ कहे ठीक है और बिना कुछ उसके सीधे उसके अंतःकरण में कोई बात डाल सकता है। क्या इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज है? मैं बस पूछ रहा हूं। ये सिद्ध क्या कर रहे हैं मतलब मैं बताऊंगा ना मैं बता रहा हूं ना आप एक बार क्लियर तो करो की है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण क्या बोलिए दोबारा बोलिए कोई व्यक्ति बिना किसी अपनी इंद्रियों का उपयोग किए कोई किसी को ज्ञान दे सकता है नहीं दे सकता ठीक है इसका मतलब ईश्वर ने वहां पर बिना कोई इंद्रिय वो इंद्रियों वो इंद्रियों का यूज किए है ना क्योंकि उसके पास तो इंद्रिय है ही नहीं है ना तो उसने उसने बिना इंद्रियों का यूज किए किसी को ज्ञान दिया ठीक ठीक है? इसका, इसका मतलब हमें यहां ये मानना पड़ेगा, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज तो नहीं है। हम इसका मतलब हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर ने कुछ ऐसा किया जो असंभव है। जैसे मतलब पॉइंट और क्लियर करके बताइए इसको। बिना कहना क्या चाह रहे हैं? असंभव बात की ना उसने बिना इंद्रियों के वो अपना ज्ञान दे के। अच्छा मतलब आप वो वाला विषय कह

00:55:51:08 रहे हो जो मतलब कि ईश्वर ने जो है वेद ज्ञान दिया कैसे? मुंह से बोल के कि कैसे दिया? वो तो वो तो अंतःकरण में उसने प्रकाशित किया। मैं जानता हूं। मगर मैं ये कह रहा हूं कि तो उसने कुछ ऐसा किया ना जो असंभव है। नहीं असंभव नहीं है। असंभव है। बताता हूं कैसे मिलेगा? मिलेगा। बताओ बताओ। रुकिए बताओ बताओ। ये बताइए जो जीव है वो अपने मन में विचार कर पाता है। हां। क्यों कर पाता है? क्योंकि वो जीव है। चेतन चेतन तो है। ठीक है। इसके अलावा लेकिन वो अपने मन में वो कर पा रहा है। दूसरे के मन में क्यों नहीं कर पा रहा? क्योंकि वो बाध्य है। सर्वज्ञ नहीं है। व्यापक नहीं है। नहीं सर्व्यापक नहीं है। ये आपने करेक्ट पॉइंट बोला। उसको सर्वज वाला पॉइंट नहीं है। मेरे पास ए बी सी डी का तो कम से कम ज्ञान है। मैं दूसरे के मन में ये वाला भी क्यों नहीं दे पा रहा बिना कुछ बोले डायरेक्ट। कारण ये है कि मैं सर्व्यापक नहीं हूं। मैं केवल अपनी बॉडी तक ही सीमित हूं। है ना? ठीक है। लेकिन ईश्वर सर्व्यापक है। अब पॉइंट ये आ रहा है कि भाई फिर फिर ये बात आ जाएगी ना कि चेतन कोई ऐसा दिखाओ जो सर्व्यापक हो प्रत्यक्ष प्रमाण। बिल्कुल इसका भी मैं मैं तो इसीलिए मैंने बोला ना कि ये वाला थोड़ा लंबा जाएगा उसको मैं भी सिद्ध कर दूंगा। मेरे सामने मेरे सामने आप नास्तिक बन के आइए। मैं पूरा ए टू जेड सब सिद्ध करूंगा। खैर मैं इसी विषय पे रहता हूं फिलहाल। अब पॉइंट ये

00:57:06:09 है कि अब जैसे भाई कि अब जैसे अगर मैं ठीक है? मेरे पास मेरा मन है। मेरे पास दूसरे का मन नहीं है। है ना? इसलिए मैं उसके मन में विचार नहीं रख सकता। तो जिस प्रकार मैं अपने मन में शब्द कर सकता हूं उसी प्रकार ईश्वर सर्व्यापक होते हुए भी सबके मन में है और ईश्वर भी जिसको लगता है जिसको चाहे उसके मन में शब्द कर सकता है। ठीक है? तो इसीलिए अब क्योंकि ईश्वर अंतर्यामी और सर्वज सर्व्यापक है। इसीलिए ईश्वर ने ऋषियों के मन में वेद को शब्द रूप ये शब्द रूप में देने के लिए जैसे मुझे अपने शब्द रूप में देने के लिए बीच में हाथ पांव मुंह नहीं चाहिए। बिना मुंह के मैं मन में शब्द कर सकता हूं। वैसे ईश्वर बिना मुंह के अपने हमारे मन में शब्द कर सकता है। मैं ये मना नहीं कर रहा। मैं ये मना नहीं कर रहा। मैं यह मना नहीं कर रहा, मैं यह कह रहा हूं कि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण क्या है आज की तारीख में कि कोई सर्व्यापक चेतन है। प्रत्यक्ष प्रमाण हा अब इसका ये आ जाता है। है ना? या तो प्रत्यक्ष से सिद्ध तो अनुमान से सिद्ध दोनों चीजें रहती है ना? हां। अब है कि क्या कोई ऐसी वस्तु है संसार में जो सर्व्यापक है। चेतन। ठीक है। हां। सर्वव्यापक। चेतन तुमने पहले तो जब तुम अनुमान से मानोगे तो उसको फिर तुम उसकी शक्ति मानोगे ना, सामर्थ्य मानोगे ना। असंभव कार्य करने वाला मानोगे। तो हम उसी असंभव जैसे हम उसकी उसकी शक्ति का ही एक असंभव कार्य करने वाला और मान लेंगे कि भैया वो किसी जैसे हम जो हम जो कार्य हम जो कार्य करवा रहे हैं

00:58:21:10 उससे वो जब कार्य होना सिद्ध हो रहा है तो असंभव कार्य कहां रह गया फिर वो भूल कर रहे हो ना आप यहां पे जब कार्य मैं दिखावा दे रहा हूं कि कार्य कर ले रहा हूं तो असंभव कार्य रह गया फिर जो कार्य कर दिया तो फिर असंभव कार्य हो गया ना फिर तो वो ये असंभव कैसे हो गया आप आप ईश्वर के द्वारा करवाना दिखा रहे हो ना मुझे आप भी नहीं तो ईश्वर के कान्टेक्स्ट में ही तो कह रहा हूं मैं नहीं तो आप जब मुझसे प्रत्यक्ष प्रमाण मांग रहे हो तो किसी इंसान इंसान को पूछ रहे हो ना की आज वो इंसान दिखाओ तो प्रत्यक्ष आपने तो इतना लंबा जो उसको जलाया है ईश्वर के सामर्थ से ही जलाया ना तो बस ईश्वर का सामर्थ जब आप मान रहे हो तो मैं क्यों नहीं मान सकता नहीं नहीं तो वो प्रूफ करना मैं तो आप मेरे से एक एक ईश्वर का जो जो सामर्थ आप कह रहे हो मैं प्रूफ कर रहा हूं ना आपसे भगवान से कर रहा हूं ना ईश्वर पे ले जा रहे हो ना आप ईश्वर पे ले जा रहे हो बात ही ईश्वर पे छेड़ रही है अब तो देखो जब जब मैं किसी कार्य को असंभव कहता हूं तो आप उसको कहते हो ईश्वर ने कर दिया संभव है जब आप कैसे कर दिया कहां कर दिया जब तक ईश्वर मन वाला प्रमाण मन से प्रत्यक्ष प्रमाण थोड़ी ना है उसका अरे प्रत्यक्ष अरे यार अनुमान से आपने अनुमान से आपने ईश्वर की एक शक्ति मानी ना मैं आपको बताता हूं देखिए अच्छा मुझे अनुमान की फिर भैया फिर आप बोलेंगे कि ऐसा चलिए छोड़िए जैसे हम किसी चीज का अनुमान करते हैं ना अनुमान प्रमाण से देते हैं ठीक है अनुमान प्रमाण के लिए हमें कुछ ना कुछ प्रत्यक्ष चाहिए होता है ना अब प्रत्यक्ष हमारे पास ये है कि हम

00:59:36:14 जो है मेरे पास मेरा मन है और अपने मन में मैं शब्द कर सकता हूं ये प्रत्यक्ष हुआ कि नहीं हुआ। इस प्रत्यक्ष के आधार पे ही मैंने अनुमान किया कि ईश्वर भी हमारे मन में है। इसीलिए वो हमारे मन में शब्द कर सकता है। अरे मेरे भाई ईश्वर की सर्वव्यापकता के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण क्या है? हां तो यानी इसी यानी मन में शब्द कर सकता है। इसको आपने मान लिया ना? ये तो मैं मान ही रहा हूं। बस अब मैं आपको सर्वव्यापकता के लिए प्रमाण देता हूं। सर्वव्यापकता सिद्ध होगी वैधर्म से? वैधर्म से कैसे सिद्ध होगी? अभी तो मुझे नास्तिक बना करके दे रहे थे। अब तुम वैधर्म से दिखाओगे। तो तुम्हें वैध समझा रहा हूं मैं क्या? भाई न्यूट्रल रहकर के बात करो ना। मैं न्यूट्रल रैंक की तो बात कर रहा हूं। मैं ये थोड़ी बोल रहा हूं मैं अब कोई नास्तिक मेरे सामने अनपढ़ाएगा तो मैं उसको थोड़ी बोलूंगा भाई तू सीख ले। मैं थोड़ी बहुत पढ़ाऊंगा। वैधर्म से बताओ चलो वैध अब जैसे मान लीजिए कि अब जब हम साधर्म की बात करे तो क्योंकि सर्वव्यापक कोई वस्तु का उदाहरण मिलेगा नहीं इसलिए साधर्म हो नहीं सकता। ठीक बात है। अनंत वस्तु कोई हो नहीं सकती। अनंत वस्तु प्रूव नहीं हो सकती। तो अनंत वस्तु के लिए हम साधर्म से दे देंगे। जैसे मैंने प्रतिज्ञा की कि प्रतिजिया ले लिया कि क्या ले लेंगे? कि मान लीजिए कोई वस्तु सर्व्यापक है। ठीक है? ये हमारी प्रतिज्ञा हो गई। हेतु ले लिया कि वो क्या होता है? क्षेत्रफल की दृष्टि से आरंभ ना होने से। ठीक है? ये हो गया हेतु और व्याप्ति ले ली व्याप्ति

01:00:51:22 क्योंकि हेतु के अंदर ही आता है। व्याप्ति मैं वैधर्म से ले रहा हूं कि जो जो वस्तु क्षेत्रफल की दृष्टि से जिसजिस वस्तु का आरंभ नहीं होता है। ठीक है? अह क्षेत्रफल की दृष्टि से आरंभ ना होने से ना हां तो ये हो जाएगा। ऐसे व्यक्ति बनेगी जिसज वस्तु का क्षेत्रफल की दृष्टि से आरंभ होता है वो वस्तु ये मतलब अनंत नहीं होती सीमित होती है शांत होती है। ठीक है? उदाहरण ले लेते हैं कटोरी। कटोरी का एक स्टार्टिंग पॉइंट होता है या मान लीजिए कोई पेंसिल है। पेंसिल का एक क्षेत्रफल की दृष्टि से स्टार्टिंग पॉइंट ऊपर से ले नीचे तक खत्म हो जाता है। तो क्षेत्रफल की दृष्टि से ये शांत भी है। ठीक है? तो इसका उपनय बनेगा कि तो इस प्रकार ईश्वर का कह लीजिए कि ईश्वर को क्षेत्रफल की दृष्टि से आरंभ नहीं मिलता। इसीलिए क्या कहते हैं? आरंभ ना मिलने के कारण वो उसका कोई वो शांत भी सिद्ध नहीं होता निबंध बनेगा शांत ना सिद्ध होने से ईश्वर अनंत हो गया प्रूफ वैधान से तो प्रूफ कर दूंगा मैं सुनो सुनो सुनो सुनो वैधान से तुम प्रूफ कर दोगे मगर इसमें ये वाली इस पर थोड़ा प्रकाश डालो कि क्या कहते हैं ये जैसे तुमने कहा कि भाई अगर कोई जो व्यक्ति है वो दो लाख वर्ष जी सकता है ठीक है तो आज मुझे ऐसा कोई व्यक्ति दिखाओ। ठीक है? कुछ ना कुछ अनुमान से आपको प्रूफ करना पड़ेगा। मतलब सुनो तो

01:02:07:06 आप तो यहां पर मैंने अगर कहा कि ईश्वर क्योंकि सर्वसामर्थ्यवान है। वो जब प्रकृति में चेतन डाल सकता है। एक जो है इंसान जैसा बना सकता है। प्रकृति पंच भौतिक से बना हुआ उसमें चेतन डाल दिया उसने। जीव उसमें डाला है। हां उसने डाला है। जीव डाल दिया उसने। तो हां हां तो अब इसका वो जब डाल सकता है तो मैंने कहा कि वह यह भी कर सकता है कि वह चाहे तो किसी को दो लाख वर्ष तक जिला सकता है। नहीं हेतु मिसमैच हो रहा है ना। सुनो सुनो तो वो मैं अभी देखूंगा इसमें हेतु वो टेबल लिख लूंगा फिर मैं उसमें हेतु भी फिट कर दूंगा। ठीक है? वो अभी उस जो तुम्हारा पंचाव के तरीके से उसमें फिट कर दूंगा मैं। ये बेसिक क्या है? ये हम नॉर्मल यूज़ करते हैं। मैं पंचाव के तरीके से भी कर दूंगा। अभी मैं जो स्वतंत्र रूप से पूरा कर लीजिए। तो उसमें क्या है कि अह जब वो किसी जैसे मिट्टी इत्यादि पंच जो पंचभूत हैं उनको लेकर के उसमें जा उसमें जो है एक चेतन डाल सकता है वो। ठीक है? तो मैंने माना कि वो जब इतना कर सकता है तो वो जो है अह क्या कहते हैं इतना भी कर सकता है कि किसी अगर इंसान को जिलाना चाहे तो वो दो लाख वर्ष तक जिला सकता है। अब ये ये तो बात अलग हो गई। अब तुम्हारा कहना है कि अगर उसने ऐसा किया था। ठीक है? किसी को

01:03:22:19 सुनो तो पूरी बात तो सुनो की अगर वो अगर उसने ऐसा किया था तो आज भी दिखाओ तो तुम्हारा एक क्लेम है कि ईश्वर जो है अंतःकरण में जा करके ज्ञान दे सकता है तो मैं तुमसे कह रहा हूं कि अगर उसने ऐसा किया था तो आज भी ऐसा करके दिखाओ बोला ही नहीं ना हां क्या बोला मैं आपको बताता हूं इसमें कैसे प्रूफ करना होगा जैसे जो आपने अपना बात रखा ठीक है आपने यहां पे हेतु क्या ले लिया हेतु आपने ले लिया कि अगर ईश्वर ठीक है मनुष्य को तुम अभी पंचाल साइड में रख के बात करो। मैं पंचायत मैं लास्ट में ले लूंगा पंचा नहीं मैं पंचाय की बात नहीं कर रहा हूं। बेसिक कारण हेतु यानी हेतु हम इतना हमारे लिए नॉर्मलाइज है। मैं कारण की जगह हेतु ही बोलता हूं। इतना हमारे लिए नॉर्मलाइज है। ठीक है। ठीक है। ठीक है। अब इसमें क्या होता है कि अब जो मुझे लगा तुम सीधे पंचा। नहीं नहीं ये चीजें हम इतना ज्यादा घुसे कि हमारे लिए बिल्कुल नॉर्मलाइज है। कुछ ऐसे है नहीं। तो इसमें क्या है कि अब जैसे आपने पॉइंट यहां पे हेतु क्या यहां पे रख दिया कि अगर ईश्वर ये ये काम कर सकता है तो यानी अपने सामर्थ्य मान लिया कि उसमें अगर मनुष्य बनाने का सामर्थ्य है ठीक है तो फिर उसमें उसको ऐसे-ऐसे करोड़ों वर्ष तक अरबों वर्ष तक उसको जिलाने का भी सामर्थ्य है ठीक है तो बात ये आ रहा है कि फिर हमें फिर हम इसकी व्याप्ति घटा देंगे ये चीज रियल में ये चीज मतलब इस चीज से ये बात हो रही है कि नहीं हो रही हां व्याप्ति मैं नॉर्मल लोकल लैंग्वेज में बता देता हूं ठीक है

01:04:37:20 जैसे बहुत सिंपल है आप मुझे अगर दो मिनट देंगे तो मैं पूरा क्लियर कर देता हूं मैं मैं सुन सुन रहा हूं। सुन रहा हूं। हां। अब जैसे मान लीजिए कि मैंने बात एक बात मैंने बात बोला कि जो अग्नि है वो जलाती है। ठीक है। ये मेरी प्रतिज्ञा हो गई। तो मैंने पूछा भाई कैसे पता? अरे वो पंचायत में मत बताओ। तुम वो बताओ। वही समझाने वही समझाने के लिए मेरे को बताना पड़ेगा। मैं एक ही मिनट लूंगा ज्यादा थोड़ी लूंगा। बस एक मिनट बोलो बोलो। अब जैसे मैंने बोला कि अग्नि है जलाती है। मैंने पूछा कैसे पता? तो हेतु तो उन्होंने बोला गरम है इसलिए जलाती है। है ना? तो जो गरम बोला ये आ गया हेतु है। यानी कारण बता दिया क्या? कि जलाती है। फिर अब मेरे को टेस्ट करना पड़ेगा कि यार इसने सही बोला है या झूठ बोला है। क्योंकि सामने वाला बोल सकता है ना कि पीला रंग है इसलिए जलाती है। ये भी बोल सकता है। तो मैं चेक करूंगा कि अच्छा ये तो ये ये मेरे पास में पेज है। इसका रंग पीला क्या मैंने इसको छुआ मेरा जला? नहीं जला। तो ये हेतु गलत है। उसी प्रकार से फिर सामने वाला बोला कि नहीं गरम है इसलिए जलाती है। तो मैंने चेक किया तो मैंने गर्म पानी में उंगली डाला तो जल गई। है ना? तो तो यानी ये चेक करना पड़ता है। यानी हम हर जगह चेक करते हैं। व्याप्ति बिठाते हैं कि सार्वभौमिक रूल ये फिट बैठ रहा है या नहीं बैठ रहा। क्योंकि अभी हम उस चीज का प्रत्यक्ष नहीं कर। अभी मैं देख नहीं रहा ना अपने आपको आंखों से कोई व्यक्ति इतना लंबा जी रहा है की नहीं जी रहा मुझे नहीं पता मैं ही मर जाऊंगा मैं कहां से देखूंगा तो बात ये आ जा रही है कि उस चीज को मैं प्रत्यक्ष नहीं कर सकता इसीलिए अनुमान के लिए मैं दूसरी चीजों में चेक करूंगा कि यार ऐसा पॉसिबल है कि नहीं है ठीक है वो मेरे को करना पड़ेगा बात ये आ जा रही है बात ये आ जा रही है मतलब मैं समझ गया तुम क्या कहना चाह रहे हो तुम ये कहना चाह रहे हो कि

01:05:52:26 अगर ईश्वर अपनी सामर्थ्य से अ जो किसी को जिला सकता है तो अभी मतलब मेरे सामने वो नहीं है उदाहरण मगर यदि यदि मैं ये मानूं कि ईश्वर ने ऋषियों के मन में वो दिया। ठीक है? तो अनुमान प्रमाण से ऐसा सिद्ध हो रहा है कि ईश्वर अभी भी ऐसा कर सकता है। ये कह रहे हो ना तुम? हां इससे वो चीज तो सिद्ध हो जाएगी। लेकिन इससे ये सिद्ध नहीं हो पाएगा कि वो मतलब वो ये भी कर सकते हो कि वो मतलब तुम कहीं पर भी तुम कहीं पर भी जो है भगवान की अचिंत शक्ति नहीं मानते हो। जब वही है ना जब क्लियर हो जा रही है शक्ति फिर अचिंत क्या रहेगी। पता चल रहा है तो फिर अचिंत क्या हो गया? तो निर्गुण से सगुण बताओ कैसे हुआ? निर्गुण से सगुण हुआ ही नहीं ना वो निर्गुण सगुण एक ही समय में रहता है हमेशा तो तो एक ही समय में एक रस कैसे हुआ फिर वो मतलब वो कम ज्यादा रहता है कहां कम ज्यादा हुआ आपसे तो करी कम ज्यादा हुआ कहीं पे फोर्स लग रही है कहीं पे फोर्स नहीं लग रही है क्या है फोर्स बताइए अरे धक्का और क्या यानी पुश एंड पुल हम पुश एंड पुल है ना पुश एंड पुश एंड पुल हो गया फोर्स ये डेफिनेशन हो गई फोर्स की ये तो एक देसी के कांटेक्ट में होता है तो तुम बताओ ना मुझे कैसे हो रहा है ये ईश्वर क्योंकि सर्वव्यापक अब देखिए बात जैसे अगर मैं एक 5 किलो का डंबल उठा रहा हूं और एक 10 किलो का डंबल उठा रहा हूं। अंतर

01:07:08:00 ये 10 किलो वाले में परमाणु ज्यादा है। है ना? मैंने पकड़ा एक ही जगह से हुआ है। ईश्वर एक-एक परमाणु को धारण किए इसलिए वो हमेशा उसके ऊपर कभी 5 किलो 10 किलो का भार कम या ज्यादा लगता ही नहीं है। उसने तो एक-ए परमाणु को धारण कर रखा है ना। अरे भैया कहीं पे वो क्रियावान है। कहीं पे क्रियावान नहीं है। उसमें अंतर ये आता है। उसमें अंतर ये आता है कि उसमें हम उसका कम ज्यादा क्यों नहीं मानते? कम ज्यादा इसलिए नहीं मानते क्योंकि हम देखेंगे बल है क्या? बल की परिभाषा है क्या? तो बल की परिभाषा इतनी ही होती है। सिंपल सा ही होता है कि ईश्वर ने इच्छा की या मैंने इच्छा की। ठीक है? और इच्छा करने पे जो फोर्स के इफेक्ट्स होते हैं जो चौथी क्लास में पढ़ते हैं हम। ठीक है? कि क्या होता है कि कोई चीज मतलब खड़ी है वहीं पे तो वो गति करने लग जाए। गति कर रही है तो रुक जाए या तो उसकी दिशा मुड़ जाए या तो उसका स्पीड कम या ज्यादा हो जाए या तो उसका शेप चेंज हो जाए। ये इफेक्ट्स जहां दिखेंगे तो हम मानते हैं कि फोर सप्लाई हुआ है। यानी बल लगा है। ये परिणाम जहां मिलेंगे हम मानते हैं कि यानी अगर ईश्वर या जीव ऐसी इच्छा कर रहा है। इच्छा करने के पश्चात अगर ऐसा कुछ परिणाम दिख रहा है तो हम मानते हैं कि बल लगाया। अगर ऐसी इच्छा नहीं कर रहा है। ठीक है? मैंने मैंने इच्छा की कि मुझे सुख मिले। तो उसमें तो कुछ कोई परिवर्तन कोई यानी उसमें बल नहीं लगा। तो अल्टीमेटली उस वाली इच्छा में यानी वही बात है कि बल कहते किसे हैं? अब है ना? अगर ईश्वर ने इच्छा की कि परमाणु इधर से उधर हो जाए।

01:08:23:01 ठीक है?

01:08:23:10 तो वो जो इफेक्ट है गति करने वाला या रुकने वाला सेफ चीज उस इफेक्ट के कारण उन्होंने बोला कि यहां पे बल है रियल में बल जैसा कुछ नहीं होता बल एक फिनोमना मात्र है तो कैसे हुआ अब जो ईश्वर अब जो इच्छा की वो तो संपूर्ण ईश्वर ने की एक पर्टिकुलर अमेरिका लंदन की ईश्वर ने की नहीं वो तो संपूर्ण ईश्वर ने की इच्छा यानी कि एक रास्ता है यानी चलो ठीक है ठीक है ईश्वर इसका मतलब तुम्हारा क्रियावान भी नहीं है इच्छा कर रहा है तो क्रियावान है ना

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01:08:48:07 इच्छा के अलावा क्रियावान नहीं है तो और क्या करेगा वो इच्छा ही तो करेगा और क्या करेगा इसका इसका इसका तुम अपने ग्रंथों से प्रमाण दो। किसका? वो वो कोई क्रिया नहीं कर रहा है। केवल इच्छा कर रहा है। इच्छा ही तो उसकी क्रिया है। मैं बोल तो रहा हूं। अरे भाई ईश्वर कुछ करता नहीं है केवल इच्छा करता है इसका तुम प्रमाण दो मुझे। मैं तो आपको दे दूंगा। मैं आपको दे दूंगा है। दो। अभी कैसे दे दूं? अभी मैं उठ के अपना बाकी बेसिक काम करूं क्या आपको मैं बुक खोल के प्रमाण दूं? मैं आपको बोल रहा हूं ना दे दूंगा। ठीक है? लेकिन अब मैं स्टूडेंट हूं। मैंने सारे ग्रंथ पढ़ रखे हैं। तो मैं मेरे को ब्रीफ करिए ना। इससे इसलिए था मामला इसपे कैसे आता है वो क्रम बता दूं। कि पहले हम लोग गए थे कि भाई वो वशिष्ठ जी परंपरा अब परंपरा में जब तुमने हम पर क्वेश्चन किया तो यहां पर ये बात आई कि भैया देखो मेरे गलत होने से तुम्हारा सही होना सिद्ध नहीं होता मगर फिर भी तुम मेरा इतिहास पूछोगे तो मैं बता दूंगा कि वशिष्ट दो लाख वर्ष जिए अब तुम उसको नहीं मान पा रहे हो नहीं मानो वो बात एक अलग है फेथ की बात आ गई तो तुमने वहां पे कहा कि भाई मैं तो प्रत्यक्ष प्रमाण तो मैंने फिर मैंने फिर काउंटर करता क्या करता कहीं पे ऐसी बात तुम मानो जहां पे तुम्हें असाधारण चीज जो चमत्कारिक चीज जिसका इसका कोई प्रूफ नहीं बस सामर्थ्य के कारण तुम्हें मानना पड़ेगा। है ना? जिसे हम एक्सप्लेन नहीं कर सकते। बस सामर्थ्य के कारण मानना पड़ेगा। उसके कारण हमारे निर्गुण से सगुण पे ठीक है। निर्गुण से सगुण की व्याख्या पे है। उसपे व्याख्या में हम जो

01:10:03:15 ये तुम उसको इच्छा कह रहे हो बल बांधने को तैयार नहीं हो। तो इस पे एक बात ये भी तो ये परंपरा वाला अभी कहां तक अटका हुआ है। भाई वशिष्ट जी की 2 लाख वर्ष की आयु हो सकती है कि नहीं? वो चमत्कार नहीं मान रहे हो तुम। चमत्कार को नहीं मान रहे हो। और मैं वहां पे तुम्हें चमत्कार सिद्ध कर रहा हूं। निर्गुण से सगुण। है ना? वो मतलब आप सिद्ध करने का ट्राई करेंगे। चलिए ठीक है एक अलग टाइप यानी चमत्कार का ये वाला ठीक है चमत्कार से हट करके मोटा मोटी अगर परंपरा पे देखें तो परंपरा में हमें क्या पहले परंपरा में परंपरा परंपरा में सबसे जरूरी बात तो ये है ना कि दयानंद जी ने अपना किसी को प्रतिनिधि नहीं कहा है इसलिए शिष्य बनाए थे शिष्य बनाए थे मगर उनमें से कौन सा शिष्य उनकी बात करेगा प्रामाणिक रूप से नहीं ले सकते इसलिए दयानंद जी के रेफरेंस से दयानंद जी की बात को मानना पड़ेगा क्योंकि उनका कोई प्रामाणिक प्रतिनिधि है ही नहीं नहीं है ना उनके शिष्य हैं बिल्कुल अरे तो वो वो तो मना करके जा रहे हैं ना कि भाई मेरे रेफरेंस से प्रामाणिक रूप से बोलने वाला कोई नहीं जो जो इस पर सेट कर लेना उस पर सेट कर लेना वो मतलब फिर वो जजमेंट का विषय है घोषित शब्द प्रमाण देके नहीं गए वो अपनी ओर से किसी को ये मेरी ओर से बोलने वाला शब्द प्रमाण है। नहीं ऐसे तो ऐसे तो कोई भी ये नहीं बोलता कोई भी गुरु नहीं बोलता की मेरी तरफ से सब ये बोलेंगे सीख के चले जाते हां नहीं नहीं बोल के जाते है ना ये गुरु परंपरा यही है अच्छा

01:11:18:16 मुझे एक बात बताइए मुझे एक बात बताइए कृष्ण जी के गुरु कौन थे कृष्ण जी के गुरु थे सादीपन जी उनके गुरु कौन थे होंगे कोई क्यों बताओ नहीं है ही नहीं क्यों होंगे ही नहीं पूरी परंपरा प्रणाली शास्त्र उठा के देख ले पुराण सब कहीं नहीं मिलेंगे उनके गुरु नहीं मिलेंगे तो उससे क्या होगा उससे क्या होगा इससे ये प्रूफ होना कि गुरु परंपरा नहीं है यानी मानो सुनोद गुरु परंपरा सुनो सुनो ऐसे कैसे मान ले उनका उनका जरूरत नहीं नहीं थी उसमें देने की। अगर वेद में डायनासोर के बारे में नहीं दिया है मतलब उसी तरीके उसी उसी भाषा में जिस भाषा में डायनासोर को हम जानते तो इसका मतलब वेद क्योंकि डायनासोर को नहीं जानता था। इसलिए वेद गलत है। ये कौन सी बात हो गया वैसे तो ये भाई मैं बता रहा हूं। बात ये है कि अगर उन्हें जरूरत पड़ती तो उसका उनका इतिहास देते। नहीं पड़ी जरूरत नहीं दिया। जिसकी जरूरत उन्हें दिखाई दी। उसमें ऐसे बहुत से पात्र है जिनका इतिहास नहीं है हमारे पास। तो उससे क्या हो गया? जिसको हम अपने प्रमाण में ले रहे हैं उनका इतिहास है हमारे पास। नहीं बात बात पॉइंट क्या है मैं समझाता हूं। पॉइंट तुम तुम नहा लो तुम नहा लो। ना रुकिए रुकिए रुकिए थोड़ा 10 मिनट रुकिए रुकिए। अब इसमें पॉइंट ये आ रहा है कि अगर हम ये कह रहे हैं संदीपनी जी वाले विषय में। है ना? संदीपनी जी वाले विषय में हमारे से यह बात टकरा रही है कि संदीपनी जी की गुरु परंपरा अगर नहीं मिल रही है तो फिर हम उनके द्वारा कही गई

01:12:33:18 बात प्रमाणिक क्यों मान रहे हैं क्योंकि वो दूसरी प्रामाणिक परंपराएं उनसे मैच कर रही है इसीलिए तो इसीलिए तो वेद की परंपरा हमारे पास होनी चाहिए नहीं तो कोई भी आके कह देगा नहीं तो कोई भी आके कह देगा मेरे पास ज्ञान आया मैंने जो है ये वेद का अर्थ है लो वेद का अर्थ करने के लिए आपके पास में वेदार्थ की परंपरा होनी चाहिए वो आपके पास नहीं है है तो वेदार्थ की परंपरा है क्या वेदार धर्म ब्रह्म की व्याख्या हो रही है जो अरे नाम बताइए वेदासी परंपरा का शंकराचार्य परंपरा शंकराचार्य परंपरा का तो यासकाचार्य ने नाम ही नहीं लिखा कहीं यासकाचार्य ने नाम नहीं लिखा तो उन्होंने परंपरा की बात तो की है हमारी परंपरा वैसे बिल्कुल तो परंपरा में कौन-कौन सी परंपराएं हैं उनका नाम लिखा है ये ये कहां से सिद्ध हो रहा है यासकाचार्य जिसका नाम लेंगे उसी की परंपरा मान्य होगी इतिहास प्रमाण है ना वो तो ऐतिहासिक रूप से प्रमाण मानते हैं कि नहीं मानते आप उन्हें और वो निरुक्त निरुक्त किसने लिखा निरुक्त प्रमाण नहीं उन्होंने मना किया है क्या शंकराचार्य परंपरा प्रमाणिक नहीं है तब प्रमाण शंकराचार्य परंपरा थी ही नहीं तो कहां से बोलेंगे या जो भी उनके आचार्य उनके लिए उन्होंने मना किया है क्या? शंकराचार्य से पहले के आचार्य बात उनकी गवाही की जरूरत तब पड़ेगी जब उन्होंने उसपे बात की हो। उसप उन्होंने बात ही नहीं की है। उन्होंने परंपरा से बात तो कर तो रखा है। परंपरा पे की है कि ये परंपरा है परंपरा नहीं है। उन्होंने ये कहा है कि जो मैं नाम ले रहा हूं वही परंपरा है बस। हां।

01:13:50:00 तो ठीक है मुझे रेफरेंस भेज दे। अरे आपके आचार्य होंगे निरुक्त पड़े होंगे पूछ लीजिए। मैंने तो मेरे पास रखा है तुम रेफरेंस दो मुझे क्या लिखा उन्होंने इस संबंध में और तुम भी और तुम वो भी बताना कि वो केवल इच्छा करता है बल नहीं लगाता बता तो दिया मैंने और क्या बताना है प्रूफ तो कर दिया मैंने तुम्हारे तुम्हारे ग्रंथ से बताओ हमें आर्य समाज को गलत सिद्ध करना है ना अब वो तो अगर कोई आर्य समाज के नाम से आर्य समाज के सिद्धांतों को क्रॉस करता चलाएगा धीरे धीरे अद्वैति हो जाएगा उससे हमें क्या मतलब है नहीं आर्य समाज में स्वामी दयानंद छह के छह दर्शनों को माना हुआ है आर्य नहीं वो ठीक माना उसमें उन्होंने ये माला है उन्होंने माना कि मेरा जो ज्ञान जो प्रदर्शित हो रहा है जो मैं बातें बोल रहा हूं कहां से बोल रहा हूं छह दर्शनों के समन्वय के आधार पर बोल रहा हूं अगर एक भी दर्शन हटा दो मेरा मेरा ज्ञान खंडित हो जाएगा ये अरे भाई ऐसे ऐसे बहुत से लोग बोलते हैं मगर ये बात स्वामी दयानंद जी ने मानी है कि नहीं मानी कि ईश्वर बल नहीं लगाता ईश्वर केवल इच्छा करता है तो बात वही आ जाती है ना बात वही आ जाती है कि अगर वो बात बोल रहे हैं और जिस उन्होंने ग्रंथ को स्वीकार कर रखा है ठीक है तो हम ये मानेंगे ना की कि दयानंद जी गलत थे जो उन्होंने छह दर्शनों को भी मान लिया और जो है ये भी कह दिया कि एक ईश्वर जो है बल लगाता है। नहीं बोलने का आधार क्या होगा? यही कि उनकी बातें मिसमैच हो रही है। अगर तुम न्याय अगर तुम आ जाती है कि अगर तुम छह मिसमैच

01:15:05:03 तब होगी जब उनके विरुद्ध में बात होगी। मैं बता रहा हूं। जैसे तुमने छह दर्शनों से सिद्ध किया कि ईश्वर इच्छा करता है बल नहीं लगाता। ठीक है? और उन्होंने उन्होंने ये कहा है कि मैंने जो भी बात बोली छह दर्शनों के हिसाब से बोली है। ठीक है। इच्छा से चाहिए ना। मैं आपको अभी दिखा दो वेता भाषण का ऐसा प्रमाण है। मैं मैं तुम्हें बल भी दिखा दूंगा। मैं बल भी दिखा दूंगा तुम्हें उन्हीं का लिखा हुआ कि बल बल होता तो हां तो बात ये है ना कि अब उसकी व्याख्या कौन करेगा उसकी व्याख्या वही करेंगे जो शिष्य हैं हम शिष्य व्याख्या करेंगे ना तुम उन्होंने तुम्हें अपना प्रामाणिक शिष्य घोषित किया है क्या नहीं उनकी शिष्य उनकी परंपरा में आता हूं ना मैं उनकी गुरु परंपरा में अरे भाई वो आपको अपना प्रामाणिक रूप से बोलने वाला मान रहे है की नहीं मान रहे ये कैसे तय होगा अरे मैं आ तो रहा हूं मेरे को उनके ज्ञान प्राप्त हो रहा है ना इसीलिए हमको उनकी चीजों का प्रमाणिक थोड़ा सा और रिसर्च किया जो उन्होंने बोला था ना की मेरे को प्रमाणिक मेरे को अच्छा सेशन नहीं मिला उन्होंने पहले बोला बाद में उन्हें मिले थे। मेरे को थोड़ा और मैंने पता किया तो इसका मतलब उससे मान लिया जाए। आप उनकी ओर से बोलने वाले प्रामाणिक व्यक्ति हैं। बिल्कुल है। उन्होंने जबकि घोषित नहीं किया है। हम ये क्यों ना हम ये क्यों ना मान ले कि दयानंद जी को आता नहीं था। आपको आता है। नहीं तो ये बात आपको कैसे ये बोलने का आधार क्या बनेगा इस बात का? दयानंद जी नहीं बता पाए वो बात जो तुम बता रहे हो और क्या आधार? नहीं बात ये है बात ये है कि जैसे वही बात है ना कि अब जैसे स्वामी

01:16:20:07 दयानंद जी ने कुछ बात बोला ठीक है अब उन्होंने वो बोल रहे कि मैं इस चीज को संक्षेप में बता रहा हूं संक्षेप में किसी किताब में लिखा अब आप कह रहे हो शब्द प्रमाण दो अब शब्द प्रमाण पूरा सुनिए नहीं आपने आरोप लगाया पूरा सुनिए अब आपने अब आपने अब मैंने उस शब्द प्रमाण यानी संक्षेप वाला जो थाने शब्द प्रमाण आपको दिखा दिया शब्द प्रमाण दिखाने के बाद में आप बोलोगे नहीं विरुद्ध में भी मैं दिखा दूंगा बल भी लगाते हैं तो उस चीज को मैं एक्सप्लेन करूंगा ना एक्सप्लेन कौन करेगा जो उनका शिष्य को एक्सप्लेन करेगा अब आप मेरे को आप कह रहे हो कि नहीं अगर मैंने उस चीज को एक्सप्लेन किया जो स्वामी जो मेरे आचार्य जी ने लिखा हुआ है उसी को मैं एक्सप्लेन करूंगा तो आप कह रहे हो कि नहीं उनको नहीं आता ये प्रूफ हो जाएगा वाह वाह वाह वाह बहुत बढ़िया यही काम आपके साथ करूं नहीं नहीं बात ये है जी को बोलूं कि उनको नहीं आता था तो उनके जो प्रामाणिक शिष्य है वो तो है वहां उनकी बात बताने के लिए प्रमाणिक शिष्य को आता है उनको नहीं आता अरे भाई वो घोषित करके गए हैं ना घोषित नहीं किया है ना हमें बोला है हमारे शिष्यों को स्वीकार किया है भाई शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया घोषित किया है कहां घोषित किया उन्होंने तो कहा मेरा कोई प्रतिनिधि मेरे समझ में नहीं आ रहा है तुमने उन्होंने नहीं उन्होंने बाद में मान लिया ना बाद में पहले उन्हें लगा बाद में उन्होंने किसको माना किसको माना विद्यार्थी को माना किसको विद्यार्थी को माना गुरुदेव विद्यार्थी को माना गुरुदेव विद्यार्थी को माना तुमने तो खुद ही कहा था कि भैया वो अभी मैंने एक और लाइन बोली वो आप क्यों छोड़ दे रहे तो बात पकड़िएगा आगे वाली बात छोड़ दीजिएगा यही करना है अरे भाई जब तुम ही अपनी बातों को बदलते हो तुमने मुझसे ये कहा था

01:17:36:02 कि दयानंद जी ने खुद कहा कि भाई मेरा कोई उत्तराधिकारी बन सके ये मैं किसी शिष्य में ऐसी वो नहीं देखता हूं तो इसलिए उनका उन्होंने ये उन्होंने पहले कहा था। अच्छा हां बाद में उन्होंने मिला। ओ क्या कौन मिला? क्या नाम बताया तुमने? गुरुदत्त विद्यार्थी। कौन के तुम विद्यार्थी हो? गुरुदत्त विद्यार्थी से चलते आ रहे हैं हम लोग। परंपरा और भी आचार्य हमारे जो उनके शिष्य बने हैं। चलो ठीक है। तो तुम अब ये प्रमाण लेके आओ ये वाला इच्छा वाला। ठीक है। हां इच्छा वाला प्रमाण देता हूं। तो अच्छा इसमें जो परंपरा वाली बात अटकी थी वो कहां से अटकी थी? परंपरा वाली बात कहां पे है? वो वशिष्ठ हां। मैंने आपसे ये पूछा था ना कि मुझे ये बताइए कि आपके वेदार्थ परंपरा क्या? आपके पास वेद की परंपरा नहीं है। प्रमाणिक नहीं वेद का अर्थ करने के लिए सिंपल क्यों धर्म ब्रह्म की व्याख्या की तो है जरूरी है तो वेद का अर्थ करने के लिए प्रमाणिक नहीं तो ये मानना पड़ेगा आपने अपने मन से व्याख्या की है क्यों अपने मन से की है क्योंकि प्रमाणिक नहीं सारणाचार्य गुरु वो उनके समय में थे क्या किसके समय में सारणाचार्य जो थे वो आचार्य शंकर के समय में नहीं थे लेकिन आचार्य शंकर से भी पहले कहने का मतलब यह है कि हर आचार्य जो है वेद का अर्थ करता चला जाए जबकि वेद का अर्थ किया गया हो। बात वही पॉइंट ये मैं तो ये बोलूं कि शणाचार्य ने अपने मन से किया है। मन से किया है। वो उनके बता देता हूं। मैं परंपरा के थे ना मैं बता देता हूं ना क्यों क्यों उन्होंने अपने मन से किया क्योंकि वो शंकर

01:18:51:03 परंपरा से थे। अगर आप ये क्लेम कर रहे हो तो है ना तो शंकर परंपरा को तो अधिकृत किया ही नहीं वेदार्थ करने के लिए। किसने? वो शणाचार्य वो क्या कहते हैं? निरुक्त आचार्य ने व्यासकाचार्य ने। किसको किसको अधिकृत किया उन्होंने? उन्होंने संप्रदाय 10 संप्रदाय के नाम के ना व्याकरण वाले नुक्त वाले प्रमाण दो आप मुझे प्रमाण दो पहले फिर बात करते हैं उस बिल्कुल दे रहा हूं अच्छा बाकी मैं थोड़ा इसमें और लाइन दो चार बता देता हूं ताकि मतलब वो प्रमाण दूंगा तो कॉन्टक्स्ट के अराउंड ही घूमेगा वो अच्छा इसमें ये है कि अब क्योंकि उन्होंने जिन संप्रदायों के नाम लिए हैं ठीक है तो बात ये थी वो वेदार्थ के संप्रदाय के नाम लिए आपका संप्रदाय वेदार्थ में आता ही नहीं आपका वेदांत का संप्रदाय है तो अब क्योंकि आप वेदांत के लिए ठीक है आप देते हो तो बात ये थी कि वेदांत की जो मैं तो तुमसे यह भी पूछ लूंगा कि तुमको निरुक्त का शास्त्र कहां से प्राप्त हुआ? वो ठीक है वो हमारे गुरु परंपरा से बोल तो रहा हूं परंपरा से प्राप्त हुआ। वो परंपरा देखेंगे ना कैसी है वो परंपरा कैसे मैंने युधिष्ठिधर्षक प्रमाण दिया था बुक से दिया तो अरे युधिष्ठिर मीमांसक जी उनके वो क्या कहते है प्रामाणिक शिष्य है ये कैसे है उस संबंध उस संबंध में प्रमाण दो उस संबंध में प्रमाण संबंध में किस संबंध में की भैया वो दयानंद के उत्तराधिकारी थे उसी बुक में है उसी बुक में वो तो वो तो युधिष्ठिर मीमांसक जी लिख रहे है ना दयानंद जी लिखना चाहिए लिख रहे है ना अपने

01:20:06:09 दयानंद जी दयानंद ानंद जी घोषित करके गए हैं क्या उनको अपना उत्तराधिकारी अपना शिष्य मान के गए हैं ना अरे भैया शिष्य मानने के बाद शिष्य जो है बदल भी सकता है ना बातों को गुरु की जैसे कोई सुनो शिष्य और उत्तराधिकारी में अंतर क्या है उत्तराधिकारी वो होता है जिस पर गुरु को विश्वास हो जाए कि बदलेगा नहीं अब ये आज से आपका विश्वास तोड़ भी है तो मनुष्य विश्वास तोड़ भी सकता है तोड़ सकता है मगर वो फिर उसपे गुरु की बात आएगी वो अपने शिष्य को जांच नहीं पाए हां तो फिर बिल्कुल आ जाएगी यानी उत्तराधिकारी वाली कंडीशन में आपने मान लिया ना ये चीज हो सकती है तो फिर हम पे भी मान लो सिंपल क्या क्या मान लो उत्तराधिकारी वाले कैसे माना ना कि बदल सकता है फिर भी आप स्वीकार कर रहे हो उत्तराधिकारी को तो हमारे कैसे मानो कि अगर बदल सकता है तो भी स्वीकार कर लो क्या उत्तराधिकारी मतलब वही वाली बात कि भैया अगर कानून बनने के बाद भी रेप हो रहा है तो कानून ही गलत है ये कोई बात है क्या यदि आप ही थोड़ी ना भी बदल सकता है बदल सकता है गलत हो सकता है मगर हमारा जो उत्तराधिकारी हमारा तो वो शब्द प्रमाण है नहीं बदल सकता बदल ही नहीं रहा नहीं तो वही वही गलत क्या है? पॉइंट है कि आचार्य शंकर वही बात अगर शब्द ही प्रमाण लेना है सब कुछ आचार्य शंकर का जो कहूंगा शब्द अगर अगर अब तुम बताओ मुझे अब तुम बताओ मुझे कि जैसे ही शब्द प्रमाण उठाइए डायरेक्ट जैसे तुम समझो कि जैसे आर्य समाज की ओर से बोलने

01:21:21:15 वाले कई लोग हैं। तुम्हारी नजरों में भी कई लोग आर्य समाज के विरुद्ध बोल रहे होंगे। ठीक है? और वो हो सकता है कि किसी तरीके से प्रमाणित गुरु से उन्होंने शिक्षा ली भी हो। उसके बाद बदल गए हो। उसके बाद वो बदल गए हो। ठीक है? तो ऐसे में क्या होता है शब्द प्रमाण की आवश्यकता ये होती है कि गुरु ये गुरु ये घोषित करके जाता है कि ये मेरे रेफरेंस से बोलेगा मेरे लिए मेरे संबंध में इसको प्रमाण माना जाए अगर वो गलत बोल रहा है अगर वो आने वाले टाइम में गलत बोल रहा है तो उसके गुरु का ज्ञान गलत ही मानना पड़ेगा अगर वो गलत बोल रहा है तो उत्तराधिकारी की बातें होती है या तो वो गलत बोले नहीं अगर वो गलत बोलेगा तो उसके गुरु का ज्ञान गलत ही मानना पड़ेगा उसके गुरु को गलत मानना पड़ेगा क्योंकि शब्द खंडित हो गया। उसमें पॉइंट ये आता है कि स्वामी दयानंद जी ने ये क्या स्वामी दयानंद जी ने किसी व्यक्ति को ऐसे ऊपर नहीं रखा कि जो व्यक्ति ने बोल दिया वही 100% सही है। ठीक है? उन्होंने ये चीज नहीं रखा। उन्होंने क्या बोला कि भैया जैसे मैं परंपरा से वेद शास्त्र इत्यादि और ये क्या नाम है? वेदार्थ परंपरा से आया हूं। ठीक है? उसी प्रकार तुम भी वेदार्थ परंपरा से आए तो उसी के जो अनुकूल अर्थ होगा जो वेदार्थ का जो एक्चुअल अर्थ होगा वो माना जाएगा। व्यक्ति विशेष द्वारा गलती हो सकती है। लेकिन जो वही है ना बात तो उन्होंने किसी ये नहीं रखा कि नहीं व्यक्ति जो मैंने बोल दिया

01:22:36:19 वो 100% सही है। उन्होंने बोला नहीं ये नहीं है। भैया अगर मेरी बात वेद विरुद्ध जा रही है तो उसको खंड करो। तो पॉइंट यहां पे कहने का ही अर्थ इसका मतलब तुम दयानंद जी से अच्छा बता रहे हो ना फिर दयानंद जी गलत थे ना वहां पे उस प्रूफ करना पड़ेगा ना आपको। तुम प्रूफ कर तो रहे हो तुम वो। तुम इच्छा को इच्छा मान रहे हो। बल भी मान रहे हो मैं दिखाऊंगा तुम्हें। अरे तो देखिए बात ये है ना की अभी आपने प्रमाण दिखाया नहीं। कह रहे हो प्रूफ मैं करूंगा बुरा मानूंगा फिर। तो तुम प्रमाण लेके आओ ना बेटा क्यों खींच रहे हो अभी की अभी बात को नहीं बात ये है ना कि जब आपके पास प्रमाण अभी आपने मेरे को प्रमाण दिखाया नहीं जबरदस्तीने तो नहीं चार पांचों लाइन मैं बोलूंगा फिर कर्पात्री जी को लेकर के आप चढ़ोगे फिर तुमने भी तो नहीं दिखाया प्रमाण नहीं तो आपने कौन सा दिखा दिया और जब दिखाया नहीं तो मैं आपके आपके कर्पति जी को गलत नहीं बोल रहे हो तो मेरे दयानंद जी क्यों गलत मैं बोलूं कृपात्र जी गलत है कुछ नहीं आता था आपको अच्छा लगेगा फिर ये बात मैंने ये बोला कुछ नहीं आता था बताओ नहीं आपने बोला ना कि वो गलत है इनको नहीं आता ये कौन सी बात है ये कौन सी लाइन है तुम यहां पे ये कह रहे हो ना कि दयानंद जी ये कह के गए है कि इसके बाद भी और जो है रिसर्च होगी बाबा वाक्यम प्रमाणम नहीं रखा उन्होंने। तो बाबा वाक्यम प्रमाणम की ये भी तो बात है कि तुम अगर उनसे ज्यादा कुछ बता रहे हो तो जरूरी नहीं यही माना जाए कि ये दयानंद जी की खोज है। ये भी माना ये भी माना जाएगा हां तो बस प्रमाण देना बस। मतलब की मतलब की केवल तुम्हारे कहने मात्र से अगर वो चीज प्रमाण नहीं मिल रहा है तो तुम्हारे कहने मात्र से हम ये नहीं मान सकते। ये तो ये

01:23:51:22 तो अलग विषय हो गया। ये तो अलग विषय हो गया। विषय यह है कि जो हमारी वेदार्थ की परंपरा है तो हम प्रमाणिक है आप नहीं हो वेद अर्थ करने के लिए विषय वेदार्थ की परंपरा हमारी है भाई आपकी परंपरा तो खाली परंपरा का नाम ही नहीं है वेदार्थ में संप्रदाय में कैसे हो जाएगा तो शंकर परंपरा के नाम से नहीं है अगर उसको और किसी नाम से होगी तो वो मानी नहीं जाएगी ब्रह्मा में वशिष्ट हमारे में ये सब वेद वैदिक नहीं थे तो संप्रदाय का नाम बदल जाता है आपके हा अरे भैया जैसे अभी सत्यार्थ प्रकाश लिख दिए वेदार्थ नहीं है नहीं वही है ना मैं भी पूछ रहा हूं सुनिए सुनिए पहले प्रश्न प्रश्न पूछे तो पहले उत्तर दिया जाता है उसके बाद क्रॉस क्वेश्चन किया जाता मैं उत्तर दे रहा हूं मैं उत्तर दे रहा हूं ठीक है उत्तर ये है कि उत्तर आप डायरेक्ट देते नहीं हो ये बात ठीक नहीं है सुनो परंपरा थी परंपरा का एक नवीनी नामकरण रख दिया गया पहचानने योग्य जैसे वेद थे फिर भी उनका नवीन भाष्य किया गया और वेद थे भाष्य वेद का नाम कहां बदला हमने भी तो अपनी परंपरा को नारायण से बताया है लो कहां बदल दिया पॉइंट पॉइंट ये आ रहा है पॉइंट आ रहा है जिस प्रकार से सुनो जिस प्रकार से वेद का नाम नहीं बदला उस प्रकार से परंपरा का नाम भी नहीं बदला होगा ना कहां बदला कहां बदला नारायण परंपरा हां नहीं पूछ रहा हूं नारायण परंपरा हां नहीं तो आपने हां तो नारायण परंपरा का नाम दिखा देना आप तो नारायण

01:25:07:03 परंपरा में वो जो आचार्य गण है जिनका उन्होने नाम लिया है वो हम दिखा देंगे देखो देखो जैसे तुम्हें मेरी ये चीज बुरी लगती है ना की मैंने उनको गलत बोल दिया ऐसे तुम खामखा जो हस के अपनी बात को ये पुष्टि देने की कोशिश करते हो ये मुझे बुरा लगता है मैं हस के लिए पुष्टि नहीं करता हूं वो तो मैं आपसे छोटे भाई के हां देखिए छोटे भाई के रूप में जब मैं बात करता हूं छोटे भाई के रूप में जब बात करता हूं तो उसमें कुछ चीजें होती है ना थोड़ा सा जाके वो तो ठीक है छेड़ रहा है कोई आपसे छेड़े जैसे बीच में मैंने आपको ये गाना गाने लग गया था तुम्हारे अंदर इंस्टिंक्ट है छेड़ने का ये बात पक्की है मैंने बताया था ना एक आदत हो जाए कि मेरे साथ लंबा श्रृंखला में बात करते अच्छा तो बात क्या थी जैसे आपने कहा अब जैसे सुनो सुनो सुनो ऐसा पॉइंट ये आता है जैसे देर हो गई एक लाइन एक लाइन एक लाइन एक लाइन एक लाइन एक लाइन बात जैसा आपने बोला कि नारायण से परंपरा नारायण परंपरा नाम ले लेंगे तो बात ये है कि आपने ये बात बोला ये बात क्यों मानू मैं कोई शब्द प्रमाण होगा तभी तो मानूंगा शब्द प्रमाण है वैदिक परंपरा लो आर्यों की परंपरा लो ठीक है ये भी ठीक है बात ये है कि कुछ भी जैसे वो एक हो सकता है शब्द प्रमाण लेकिन मैं ये बोल रहा हूं कि अगर जैसे मान लीजिए कि कोई भी परंपरा का आप नाम लेते हैं कि नहीं शंकर परंपरा नाम से पूर्व हमारा ये नाम था ठीक है ये बात क्लेम करने के लिए आपको किसी न

01:26:22:04 किसी आचार अपने आचार्य का प्रमाण देना पड़ेगा बात यह है कि हमने हमने जो है जो उन्होंने नाम लिया है क्या उसके विरोधी माना है अपने को अगर उनके नामों में जो उन्होंने नाम गिनाए उनके समर्थन वाले हमारे आचार्य हुए तो नहीं ये कोई बात है क्या कि वो उसी नाम से जानते हो उसे जिस नाम से हम उसे ज्ञापित कर रहे हो पॉइंट है कि ये तो इतिहास का विषय सबसे पहले तो इसमें तुम प्रमाण लाओ फिर हम बात करें पहले उसकी विवेचना करते इसमें बात आ जाती है कि इतिहास का विषय हो जाता है है ना कि अरे पहले प्रमाण तो लाओ पहले प्रमाण तो दो हो सकता है कि उसे इतनी ज्यादा बहस करनी ना पड़े इस मामले में पहले प्रमाण तो दो उस निरुक्त का कि उन्होंने कौन किसको मान्य माना है तो यानी कि यहां पे टोटल बात कहां पे आके अटक गई क्या और पॉइंट रह गए हैं अब वो सुन लेना अब बहुत देर हो गई अब सर में दर्द मतलब टोटल पॉइंट टोटल पॉइंट तुमने रिकॉर्ड किया होगा ना एक सेकंड रिकॉर्ड तो नहीं किया शायद अरे किया होगा तुमने स्क्रीन ऑफ हो रखा है रुकिए ये क्या कहते हैं वो वो मैं चेक कर लूंगा। अभी ये मेरे को क्या कहते हैं अभी जो पॉइंट अटका है वो इस पर अटका है ना कि मैं आपको वो प्रमाण देता हूं कि आपके शंकर परंपरा का नाम नहीं है। नहीं वो हम उसकी विवेचना करेंगे। ये नहीं कि उसका नाम नहीं है। उसको हर तरह से अलग-अलग तरह से जांचा जाएगा कि किस-किस प्रकार से वो भैया हमारे विरोध में सिद्ध हो रहा है। केवल

01:27:37:06 एक यही बात थोड़ी ना है कि हमारा नाम नहीं है। ठीक है। नाम तो सत्यार्थ प्रकाश का भी नहीं है। तो सत्यार्थ प्रकाश गलत हो गई। नहीं बात यह है कि बात किसकी चल रही है? क्या सत्यार्थ प्रकाश के संबंधित प्रकरण ग्रंथों की बात चल रही है? तो बात यह है सत्यार्थ प्रकाश को हम सही क्यों मानते हैं? क्योंकि सत्यार्थ प्रकाश में आपके हिसाब से वही बातें कही गई है जो वेद के जो वेद ने कही है। उसी प्रकार से उसी प्रकार से गलत उदाहरण दे रहे हैं आप। मैं तुम एक काम करो तुम तुम प्रमाण लाओ। फिर बात करेंगे। ये प्रमाण क्योंकि विषय अगर परंपरा का चल रहा है तो परंपरा वाले विषय में प्रमाण होगा। प्रमाण थोड़ी हो जाएगा। क्यों नहीं होगा? मैं आपको उधार दूंगा। आप लॉजिकली उसको काट देना जब मैं दूंगा उदाहरण तो पर यास्काचार्य परंपरा की बात कर प्रकरण ग्रंथ घुसा दोगे अरे अरे भाई किसी चीज का नाम दूसरे नाम से ख्यापित हो उसके अर्थ के रूप में तो उसका प्रमाण स्वीकार्य होता है कि नहीं होता मैं संबंध में होता है होता है होता है होता है होता है प्रमाण दीजिए प्रमाण देना पड़ेगा कि आप दे दूंगा तुम अभी अपने प्रमाण लाओ मैं दे दूंगा प्रमाण ठीक है ठीक है और ये वाला पॉइंट हो गया इसके अलावा और क्या था इसके वाला निर्गुण सगुण इच्छा बल उस बात नहीं वो नहीं वो नहीं परंपरा में परंपरा में परंपरा में तो यही अटकी है बात की वशिष्ट जी दो लाख वर्ष पूर्व हो सकते हैं कि नहीं चलिए अगर मैं उसको एक दुर्जन दोष

01:28:52:09 न्याय से लेकर भी चलता हूं तो तो इसमें फिर क्या बात आती है तुम्हारी परंपरा सिद्ध है और क्या तुम्हारी हमारे वाले हमारी परंपरा से लेकर के क्या प्रश्न है आपके फिर तुम्हारे तुम्हारे पास सबसे बड़ा ड्रॉबैक तो यही है कि गुरु गद्दी का खंडन उन्होंने किया है ठीक है और ये सबसे बड़े गुरु परंपरा पर आघात है ठीक है इस पर विवेचना कर लेंगे और केवल केवल शिष्य होने से किसी के हम उसी का ज्ञान आपको एज इट इज दे रहे हैं। वो नहीं होता है। नहीं नहीं उसपे हम विवेचना कर लेंगे। वो तो अगर अगर अगर पीछे जाओगे पीछे के ऋषियों के उन्होंने उत्तराधिकारी घोषित किया तो वो हमारी आर्स प्रमाण है। उनको हम प्रमाण के रूप में लेते हैं। जिनकी तुम बात करोगे। तो वो वाली बात है और कोई मुझे ध्यान नहीं है पॉइंट। निर्गुण सगुण इच्छा बल और जो है वशिष्ठ जी का वो और तुम्हारा उत्तराधिकारी ना चुनना उनको सत्यार्थ प्रकाश में गुरु परंपरा का एक तरीके से उत्तराधिकारी गुरुगद्दी इत्यादि का खंडन करना ही वो सबसे बड़ी बात मिलाजुला करके इतिहास तो मिल रहा है लेकिन गुरुगद्दी नहीं है यही ना इतिहास भी कहां मिल रहा है वो इतिहास अभी जांच का विषय वो सत्यापन का विषय है ना वो किताब तो दी है वो सत्यापन का विषय उसमें देखना पड़ेगा क्या है क्या नहीं है चलिए वो सत्यापन करिएगा अपने हिसाब और बाकी लेकिन वही है ना कि आचार्य शंकर के पहले तो गुरुगद्दी थी नहीं वो तो उन्होंने

01:30:07:15 गुरु इस मैं तुम्हें जवाब दे दूंगा मैं दे चुका हूं वैसे फिर मैं दे दूंगा दोबारा ठीक ठीक है ठीक है यानी ठीक है इतिहास हो रखा है इतिहास तो मिल ही रहा है उसमें समस्या नहीं है वो तो आप अपनी तरफ से चेक कर लीजिएगा और अब इतिहास तो ऐसे मैं एक बुक छाप दूं अभी मैं अपने आचार्यों के यहां के नाम प्रमाण वाली उन्होंने बहुत प्रमाण दिए एक एक आचार्य तो कुछ थोड़े से सत्यापन देखने पड़ेंगे ना पूर्वकालीन कौन से किसका का क्या दिया है? मैं उसमें विरोध नहीं कर रहा हूं। मैं केवल उसमें अपने पॉइंट रख रहा हूं कि इतिहास तो मिल रहा है। विजानंद जी के गुरु का नाम क्या था? व्याकरण परंपरा में? व्याकरण परंपरा उनका नाम गौरी शंकर था। उनका नाम या उनके गुरु का नाम? उनके गुरु का नाम? गुरु के गुरु पता नहीं। मतलब लिखा है इसमें ये नहीं उसमें तो ये प्रमाण देख जिसका प्रमाण मिलता है इतिहास के दृष्टिकोण से लिखा हुआ है ना? नहीं उसमें ऐसे लिखा है कि ये इनके शिष्य थे। ये इनके शिष्य थे। ऐसे लिखा है कुछ। इसमें ऐसे इसमें ऐसे डायरेक्टली सबका नहीं लिखा शिष्यों का बहुतों का शिष्यों का भी लिखा हुआ है और इसमें ऐसे भी बहुत है जिनका डायरेक्ट गुरु शिष्य मिल अब जैसे मान लीजिए कि इसमें ये है क्या बोलते हैं उनकी जैसे जो दयानंद जी के जो गुरु है ठीक है उनकी एक वृत्त मिलती है दयानंद जी की वृत्त मिलती है वृत्ति में उनके गुरु का नाम लिखा तो वहां पे हमें मिलता है लेकिन इसमें उन्होंने डायरेक्ट उनका नाम नहीं लिखा हुआ

01:31:22:16 नाम इसलिए नहीं लिखा हुआ क्योंकि जो उनके गुरु है उनके गुरु की कोई वृत्ति नहीं मिलती ऐतिहासिक परिप्रेक्ष से है ना तो फिर इस दृष्टिकोण से उन्होंने उनका नाम नहीं लिखा यानी गुरु परंपरा तो बहुतों की है लेकिन जानबूझ के इन्होंने इसलिए नहीं लिखा क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से उन्होंने डाटा तैयार किया है। गुरु परंपरा वाले स्टाइल से नहीं इतिहास मतलब गुरु परंपरा नहीं है ना अभी फिलहाल इतिहास तो है ना अरे मैं परंपरा पूछ रहा हूं तो तुम पूरा का पूरा इतिहास ला रहे हो भाई हमें ये बताना पड़ेगा पूछने का मतलब क्या है जैसे मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं क्या मतलब आपने मुझे उस दिन बोला था कि इतिहास मिलना चाहिए मैं बता रहा हूं वो इतिहास इस परिपेक्ष में था कि जब तुमने परंपरा बताई तो मैंने कहा कि इतिहास में चेक किया जाएगा क्या प्रमाण है क्या नहीं है जैसे अभी भी तुम कह रहे हो कि उन्होंने वो बहुत सारे रेफरेंसेस दिए तो उसको मैंने कहा सत्यापन का विषय वो कह रहा हूं और दूसरी बात यह है कि मैं यह पूछ रहा हूं जैसे विजानंद जी के गुरु का नाम है गौरी शंकर जी। ठीक है? अब गौरी शंकर जी को किसने वेदार्थ का ज्ञान दिया? ये है उसमें युधिष्ठिर मीमांसक में नहीं है। तो फिर ये परंपरा कहां से हुई? उन्होंने तो ये बताया कि यहां पे इस व्यक्ति ने भी ये बात बोली थी। यहां पे इस व्यक्ति ने भी बात बोली थी। मुझे लगता है ऐसा कुछ होगा। मैंने अभी पढ़ा। नहीं नहीं ऐसा नहीं है उसमें ये है कि अष्टाध्यायी महाभाष्य के ऊपर अष्टाध्यायी के ऊपर जिन जिन लोगों ने भाष्य की भाषावृत्ति की प्रथमावृत्ति लिखी द्वितीयवृत्ति लिखी ठीक है काशिकावृत्ति लिखी आगे चल के फिर उसपे व्याख्या व्याख्या

01:32:37:20 रखी है दुनिया भर की तो इससे क्या होता है कि इससे हमें पता चलता है कि यार ये 4000 साल पुराना ग्रंथ है 5000 साल पुराना ग्रंथ है इसके ऊपर लगातार लोगों ने काम किया है ठीक है ये 50 साल में 50 साल में इस व्यक्ति का काम है फिर अगले वाले 50 साल में इस व्यक्ति का काम है तो इससे क्या है इससे ये पता चल रहा है कि ये उनके बीच में कनेक्शन था इन लोगों ने कहीं ना कहीं माध्यम से पढ़ा और पढ़ करके उसके ऊपर अनुमान है अनुमान है शब्द प्रमाण नहीं अनुमान है वो नहीं शब्द प्रमाण भी है उसके अंदर उन्होंने बहुत सारे प्रमाण दे रखे है ना अब जैसे जैसे मुझे कैसे पता कि उन्होंने वृत्ति लिखी थी तो वृत्ति मिल रही है वृत्ति फलाना लाइब्रेरी में रखी हुई है तभी तो पता है नहीं वो तो ठीक है मगर विजयनंद जी को वेदार्थ किसने दिया ये नहीं है ना गौरी शंकर जी को किसने दिया कॉमन सी बात है उनके गुरु ने दिया होगा ना तो गुरु का नाम लिखा है उसमें दो तीन साल पुराना ही तो इतिहास है अच्छा चलिए कैसे होता है मैं बताता हूँ वेरिफिकेशन कैसे होता है जैसे मान लीजिए स्वामी दयानंद जी ने एक वृत्ति लिखी ठीक है अष्टाध्यायी के ऊपर अब उन्होंने देखा कि जो वही अष्टाध्यायी है जो उन्हें 100 साल पहले के व्यक्ति ने लिखी थी वो सेम अष्टाध्यायी मैच करने पे सेम मिल रही है अरे तो ये भी तो हो सकता है कि मैंने उसको कॉपी किया लिया हो कॉपी किया हो वहां से और उसके पहले वो भी सेम मैंने उसके भाव को ना समझते हुए उसकी बुक्स को कॉपी कर लिया हो ये भी तो क्यों कह सकते हैं अष्टाध्यायी तो वही है ना अष्टाध्याय

01:33:52:24 ही पढ़ा है उन्होंने अष्टाध्याय तो उन्होंने सेम इसलिए जो पुराने लोगों ने लिखा तो वो अष्टाध्यायी के द्वारा वेद का क्या अर्थ बताना चाह रहे थे। उन्होंने अवतार माना था कि नहीं माना था? ये चीजें तो देखनी पड़ेगी ना। अब उन्होंने उनके नियम तो ले लिए व्याकरण के एज इट इज मगर उन्होंने वेद का जो अर्थ बताया बताना चाह रहे होंगे कि अवतार भी लेता है ये नहीं लिया मान लो फिर क्या करेंगे? उसमें उसमें क्या करेंगे? उसमें तो मेन यही है ना कि वैसे तो मिलना पड़ेगा। वो तो आपको ये भी वेरिफिकेशन वो तो आप अपनी तरफ से करोगे तब होगा ना। अनुमान से तो फिर क्या ही बोलोगे आप। तो इसीलिए तो शब्द प्रमाण की आवश्यकता है वहां पर कि उन्होंने इनसे पढ़ा। वहां पर शब्द प्रमाण की आवश्यकता है ना फिर कि उन्होंने इनसे पढ़ा। उन्होंने व्याकरण के नियम लिए वेद वेद का अर्थ समझा। धर्म ब्रह्म का अर्थ समझा। तो इसमें नहीं इसमें बात ये आ रही है कि अगर मान लीजिए किसी गुरु का नाम नहीं मिल रहा है। ठीक है? तो इसमें हम ये क्यों बोल रहे कि नहीं गुरु होंगे ही नहीं। क्योंकि बिना गुरु का ज्ञान नहीं मिलेगा। मैं कहां कह रहा हूं कि गुरु होंगे ही नहीं। मगर गुरु के ज्ञान को एज इट इज दिया जा रहा है। यह कैसे माने भाई? हमारा हमारा किसी पुराने व्यक्ति के व्याकरण के नियमों से मैच खा रहा है। व्याकरण ठीक है। अब उसने जो है अवतार माना था कि नहीं माना था? वर्णाश्रम में क्या माना था? ये हमें प्राप्त नहीं है। उसने क्या माना था? जिससे हमारा मैच खा रहा है। मगर

01:35:07:25 हम उसमें वेद और वेदार्थ में ये होता है ना? वेद और वेदार्थ वाले ये होता है कि जैसे जो व्याकरण हमने पढ़ा वो तो सेम है। व्याकरण के अंदर अवतार थोड़ी बात है। उसमें केवल व्याकरण व्याकरण है। मैं नहीं कह रहा मेरी बात तो मैं आगे बता रहा हूं। मेरी बात प्लीज मेरी बात पूरी हो जाने दो जिसको हम अपना गुरु सिद्ध कर रहे हैं। ठीक है? जिसको भी हम अपना गुरु सिद्ध कर रहे हैं। किसी को भी किसी का एक अज्ञात व्यक्ति का भाष्य मिला है। अब मेरा भाष्य उससे मैच कर रहा है। तो इस बिना पर हम मान ले रहे हैं कि वो हमारा अब उसका वेद के अर्थ में क्या उन्होंने स्वीकार किया था जो व्याकरण के द्वारा उन्होंने लिया था। फिर वेदार्थ उन्होंने क्या स्वीकार किया था। इसमें हमारे पास उसका अज्ञात व्यक्ति का कोई और प्रमाण है नहीं। अब हमने जो है व्याकरण उससे ले ली और अपना अर्थ व्याकरण उससे कॉपी कर ली और अपना अर्थ दे दिया। वेद का कि भाई अवतार नहीं ले सकता। सगुण साकार नहीं हो सकता। ठीक है तो अब इसलिए क्योंकि हमारा क्योंकि वो जो व्याकरण का भाष्य उससे मैच खा रहा है। इसलिए मान लिया जाए कि हम जो है उसके प्रामाणिक शिष्य हैं। और हमने जो बताया है वो परंपरा से हमें प्राप्त हुआ है। इसमें ये इसमें ये चीज प्रमाणित होती है। अगर कोई ऐसा भाष्य मिलता है और पूरा इतिहास मिलता है। उस इतिहास के द्वारा ये चीज पता चलती है कि इन्हें व्याकरण पता है। इन्हें वही व्याकरण पता है जो परंपरा से ही जो पहले पहले हजार साल से 10 हजार साल से चला रहे हैं। इन्हें वही व्याकरण आता है इन्हें। ये पता चल गया। पूरा

01:36:23:18 अब इसमें ये वाला उन्हें पता है। अब ये पता होने के बाद इतना तो कंफर्म हो चुका है कि वही वाला व्याकरण आता है जो अष्टाध्याय महाभाष जो मूल पढ़ाई क्योंकि इतिहास इसका मिल गया। ठीक है? इतिहास में हमें ऐसे कम से कम 1000 प्रमाण मिल जाते हैं। जो लोगों ने वृत्ति लिखी है सारे सेम अष्टाध्याय है स्वामी दयानंद जी ने लिखवाए हैं। ठीक है? अब इसमें बात आती है कि उसी अष्टाध्यायी महाभाष्य के आधार पर उन्होंने जो है वो वेद का हर्ष किया। ठीक है? अब इसमें बात आ जाती है युक्ति की क्योंकि जो अर्थ होते हैं वो उसमें जब आपको व्याकरण सेम आ रहा है। ठीक है? हम व्याकरण में ऐसा होता है ना कि कौन सा सूत्र किधर बैठेगा वो युक्ति उसमें लगानी पड़ती है। क्या बोलते हैं उसको संगति लगानी पड़ती है। संगति के आधार पे तो उसमें फिर आचार्यों की फिर अपनी डिबेट वगैरह होती है कि नहीं कौन सी संगति कैसे बैठी कैसे नहीं बैठी मैं इसमें क्लियर करता हूं व्याकरण के मैच खाने से ये सिद्ध नहीं होता कि इन्होंने अपने गुरु का विरोध किया है कि नहीं किया। जिसको जिसके कारण ये अपने आप को प्रामाणिक सिद्ध कर रहे हैं। समझ रहे हो मेरी बात? व्याकरण के मैच मैच खाने से गुरु विरोध ना होना सिद्ध नहीं होता है। उसके लिए का ज्ञान होना सिद्ध होता है। हां ठीक है। अब व्याकरण का ज्ञान होना सिद्ध हो गया। अब उन्होंने व्याकरण का ज्ञान उनके अधिकार पूर्वक उनकी इच्छा से या फिर उनकी किताब को कॉपी करके ये भी डाउट की बात है। वहां पे घोषित नहीं है। शब्द प्रमाण कुछ नहीं है। अनुमान पे चल रहे हैं हम लोग। समझ रहे? देखिए

01:37:38:28 नहीं उसमें बात उसमें बात ये आ जाती है कि बात ये आ रही है ना कि अब हमारे पास अगर किसी व्यक्ति के पास में इतिहास नहीं है जैसे हम हमारे पास इतिहास नहीं है कि संदीपनी जी के गुरु कौन थे तो उसमें हम दूसरे तरीकों से मैच करते हैं ना अब वही है कि अब हम उसमें गला पकड़ के थोड़ी इतिहास निकालेंगे बात ये बस दूसरे तरीकों से हमने मैच किया दूसरे तरीकों से मैच नहीं खा रहा है इनका ध्यान मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं अब इसमें पॉइंट ये आ रहा है पॉइंट ये जैसे मैंने आपको बताया ना कि अब अगर मान लीजिए कहीं-कहीं भी इतिहास इतिहास इतिहास में उसमें त्रुटियां आ रही है ठीक है क्योंकि आचार्य शंकर ने भी अपने एक ही गुरु का नाम लिखा है 10 पीढ़ियों का नाम नहीं लिखा है ना उसी प्रकार स्वामी दानंद जी ने हमेशा अपने एक ही गुरु का नाम लिख के आए हैं। है ना? देखिए पढ़ा तो उन्होंने कम से कम 100 लोगों से होगा। ठीक है? चैतन्य में पढ़े थे। आचार्य शंकर ने ये घोषित किया ये मेरी ओर से बोलने वाला व्यक्ति है। इसको शंकराचार्य ही मानना ये घोषित किया। अब अगर वो जो जिसको वो ठीक है वो मैं उसपे आऊंगा। मैं उसपे आऊंगा ठीक है। लेकिन अभी जो मैं पिछले उनसे पहले के लोगों की बात कर रहा हूं। तो उनसे जब हम पहले के लोगों की बात कर रहे थे उन्होंने एक ही आचार्य को क्लियर नहीं है कि आचार्य शंकर जी ने ये कहा है कि नहीं नारायण से अपनी परंपरा बताई है कि नहीं। नहीं कहीं नहीं है कहीं नहीं है चलो ठीक है कोई बात नहीं है कहीं नहीं है आगे आगे मतलब फिर मैं आखरी बात थोड़ी सी जुट रही थी अब ये है कि यानी उन्होंने हर जगह अपने एक ही आचार्य को उन्होंने लास्ट में जब समापन करते हैं तो समापन करने पे अपने गुरु की वंदना करते हैं ठीक है और तो करते हैं अच्छा उसके बाद इसी प्रकार स्वामी

01:38:54:04 दयानंद जी में सेम परंपरा उस चीज को फॉलो करते हैं और वो भी अपने विजानंद जी को है ना दंडी स्वामी विजान जी महाभाग इत्यादि करके वो भी अपना करते हैं जब भी अब इससे पता चलता है कि यानी कोई व्यक्ति अगर अपने को अपने गुरु को बताता है तो किसी एक अपने जिसको सबसे अधिक मानता हो उस वाले गुरु को नाम लिखता है। बाकी गुरु तो उनके भी बहुत हुए थे। अच्छा बात फिर बात अंदाज आती है इतिहास मिलने वाली। अच्छा इसमें पॉइंट ये आ रहा है कि इतना तो हम ये स्वीकार कर रहे हैं कि इनके पास ये शास्त्र था। प्रमाणिक रूप से ये शास्त्र था। इतना तो हम मान रहे हैं। और ये वही शास्त्र था जो 10,000 साल पहले कहते ये भी प्रमाणित हो रहा है। इतिहास मिल रहा है। तो इतिहास में चीज़ सेम सेम है। हमें प्रमाणित क्या करना है? हमें इस पे ध्यान देना है। हमें प्रमाणित इस पे ध्यान देना है कि जो शास्त्र मिल रहा है वो इनके पास भी था। वो इनके पास भी था। है ना? ये प्रमाणित करना है। प्रमाणित ये करना है कि दयानंद जी ने जो उन्हें ये जो शास्त्र मिला है व्याकरण वाला उनके गुरु विजानंद से और विजानंद जी को गौरी शंकर से और गौरी शंकर जी को किसी अज्ञात से हां अज्ञात आचार्यों से इस व्याकरण शास्त्र के आधार पर है ना उन्होंने वेदों का वही अर्थ दिया है जो जिनसे शास्त्र लेने की बात कर रहे हैं उनको स्वीकार्य था वेद का अर्थ वही अर्थ दिया है कि नहीं दिया है। ये कैसे सिद्ध करेंगे? नहीं हमें हमें

01:40:09:10 क्या सिद्ध करना है? हमें केवल इतना सिद्ध करना है। ठीक है मैं अपना पक्ष बता रहा हूं इसमें। क्योंकि क्योंकि अच्छा पहले एक चीज़ क्लियर कर लो। तुम जिनसे इनका व्याकरण प्राप्त होना मान रहे हो उन्हीं से वेद मंत्र भी प्राप्त होना मान रहे हो या वेद मंत्र यजुर्वेद तो उन्हें अपने कुल से ही प्राप्त हो गए थे। पाठी ब्राह्मण थे ना वो तो यजुर्वेद अपने कुल से प्राप्त हुए थे। बाकी वेद उन्होंने अलग-अलग आचार्यों से पढ़ लिए थे। तो जो कुल से प्राप्त हुए थे उनका कुछ इतिहास है कि वो क्या मानते थे? यजुर्वेद वैसे तो वो तो सामवेद मानते थे लेकिन वो शव थे तो फिर उन्होंने पढ़वाया था अगर उनको कुल से प्राप्त हुए थे इसका मतलब कि वेदों के लिए वो अपने कुल पर डिपेंड थे यजुर्वेद के लिए कम से कम ठीक और उनके यहां तो शिवलिंग की पूजा हो रही थी बिल्कुल बिल्कुल तो फिर वो तो वहां हो गई मूर्ति पूजा नहीं उससे सिद्ध नहीं हुआ ना बाद में रिजेक्ट भी तो किया ना नहीं तो उन्होंने किया कुल परंपरा क्या मान रही है नहीं कुल परंपरा तो वही बात है ना कि कुल परंपरा ऐसे तो वहीं यानी कि वेद वेद मंत्र के वो डिपेंड थे अपने कुल पर मगर अर्थ अपने से दिया उन्होंने। यही बात मैं कह रहा हूं। अब जैसे सामवेद में तो शिवलिंग पूजा नहीं है ना लेकिन कर रहे हैं तो क्या करेंगे उसका फिर? तो फिर मंत्र पर भी विश्वास मत करो ना। उनके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो। यही तो मेरा पॉइंट है। नहीं मंत्रार्थ मैं क्या मैं कह रहा मंत्र के अंदर तो वो है ही नहीं ना शिवलिंग पूजा। मैं ये नहीं कह रहा। उनके मंत्र पर विश्वास ये मत करो कि ये वही मंत्र है जो चार ऋषियों के अंतकरण

01:41:24:24 में आए थे। ये मत करो। जैसे हम ये विश्वास कर रहे हैं कि ये वही पुराण है। ठीक है? हम मान रहे हैं कि ये वही पुराण है जो आप मानते आ रहे हो। वैसे हम मान रहे कि ये वही वेद है जो आप मानते आ रहे हो। तो ये जो शिवलिंग पूजा इत्यादि का जो विषय है वो तो पुराण में आ रहा है। शिव पुराण में आ रहा है। ठीक है? अब उसके अंदर बात आ रही है कि उसी आधार पे जो हम उस चीज को सही या गलत कह रहे हो वो एक अलग विषय है। ठीक है? तो हम है ना? हम तो पुराण को मान के चल रहे है कि आप इस चीज को परंपरागत मैं बता रहा हूं। मैं पूरा पूरा पूरा पूरा बोल। अब इसमें थोड़ा सा ये हो गया। है ना? अभी अरे यार काफी देर हो गई। दो घंटे चार मिनट हो गए बोलो बोलो पूरी करो बात अपनी। तो वही मतलब इतना वो कर लिया चलो ये अच्छी चीज मुझे बताई तुमने कि यजुर्वेद उनको उनके कुल से प्राप्त था तो 14 वर्ष में उनको यजुर्वेद कंठस्थ था हां तो फिर उनका जो है कुल कुल परंपरा पे विश्वास होना जरूरी है यजुर्वेद के लिए कम से कम तो जरूरी है वेद के लिए तो था ना बिल्कुल वेद था तो बात यह है की जो व्यक्ति वेद के नाम पे झूठी पूजा आपको दे सकता है की भैया वह कह रहा है कि पुराण भी वेद का ही अर्थ है वो यह कह रहा है और तब वो पुराण के आधार पे शिवलिंग दे रहा है। ठीक है अब आपको अगर उसके वेदार्थ पे वेदार्थ के रूप में उसके पुराण पर विश्वास नहीं है उसकी शिवलिंग पूजा पर विश्वास नहीं है तो फिर वो वेद मंत्र भी तो आपको झूते दे

01:42:39:25 सकता है इसमें पॉइंट ये है ना क्योंकि वेद की परंपरा और वेदार की परंपरा दोनों अलग अलग है तो वो तो वो दोनों कुल परंपरा एक ही है ना शिवलिंग की पूजा करने वाला भी वही वहाँ पे वो वेदार्थ की परंपरा में थोड़ी थे मैं ये कह रहा हूं मैं ये कह रहा हूं कि शिवलिंग की पूजा करने वाला शिवलिंग की पूजा बताने वाला शिवलिंग की पूजा को वैदिक धर्म बताने वाला और वेद के मंत्र देने वाला वही कुल है ना उनका एक ही हां हां ठीक है तो फिर तो वो एक जगह झूठा सिद्ध होगा ना वो नहीं तो उसमें बात ये है इसमें सिंपल ये है कि वेद के मंत्र उन्होंने दिए हां मैंने मान लिया आपने मेरे को पुराण दिए ठीक है मान लिया पुराण पढ़ता है प्रमाण है वेद स्वतः प्रमाण है तो ये भी आपने बोला ठीक है मान लिया इसके बाद बात आती है कि अब वेदार्थ क्या है तो वेदार्थ नहीं पता तो वेदार्थ करने के लिए वेदार्थ करने के लिए क्या चाहिए भैया तो वेद का अर्थ आपको खुद से करना है तो खुद से कैसे करूं खुद से मैं समझ गया मैं तुम्हारी सारी बातें मगर कहीं ना कहीं जिन्होंने आपको वेद मंत्र दिए उन पर आपका डाउट आएगा जब आप अपने ज्ञान से करोगे। आप कुछ भी कर लो आपको डाउट लाना पड़ेगा जिससे आपने वेद मंत्र लिए हैं। और जब क्यों डाउट आ रहा है ना उसके ऊपर कि वह जो है व्याकरण से नहीं किया उसने अर्थ जो किया है। नहीं वेद के नहीं हम कह ही नहीं रहे कि उन्होंने वेद का अर्थ पढ़ा। हम कह रहे तो वो शिवलिंग को अवैदिक के रूप में दे रहे थे क्या? अवैदिक

01:43:55:06 घोषित किया था शिवलिंग की पूजा को उनकी कुल ने ये जो है सनातन नहीं है वैदिक नहीं है नहीं बात क्या है बात ये है कि जो वो वो कह रहे हैं ना अगर वो चीज कह रहे हैं इतना सिंपल सी चीज है बिना कॉम्प्लेक्स किए जा रहे थे इसमें बात ये है कि अगर वो कह रहे हैं कि नहीं शिवलिंग पूजा इत्यादि करो तो वो तो वो तो शायद शिव पुराण पढ़वाते थे स्वामी दयानंद जी को शिव पुणराण बच्चों ने पढ़ाते क्या वो ये कह रहे थे कि यह वैदिक शास्त्र है नहीं यानी वो भी वैदिक ही मानते थे ना जो उनका कुल था उसको हां यानी कि जब जब उनके इधर जाकर के दयानंद जी भाष्य करेंगे कि नहीं शिवलिंग की पूजा गलत है तो उनकी या तो अज्ञानता का डाउट आएगा कि भैया वो हो सकता है उनके ज्ञान की कमी थी जो समझ नहीं पाए उनके कुल पर और या फिर उन पर जो है आएगा कि लालच वश या द्वेष वश या भ्रमवश किसी कारणवश उन्होंने गलत बात बोली नहीं तो ये तो देखिए पॉइंट ये है कि कोई कोई अधिक पांडित्य वाला होता है कोई कम पांडित्य वाला होता है तो फिर जो जो देता हूं मैं समझ गया तुम्हारी बात समझ गया। जैसे जैसे इन्होंने मंडल मिश्र के साथ में डिबेट किया था और मंडल मिश्र को हराया था। मंडल मिश्र को अज्ञानी सिद्ध कर दिया था ना उस टाइम पे और फिर भी उन्होंने अपना शिष्य प्रतिनिधित्व माना यानी उनका उनका जो प्रतिनिधित्व करने वाला उनसे कम ज्ञान रखता है। हुआ था ना ये पॉइंट फिर तो यानी कि बात ये है ना कि कोई कम विरोधी

01:45:10:14 विरोधी थोड़ी ना थे ज्यादा कम ज्ञानी कम ज्ञानी ज्यादा ज्ञानी हो सकते है ना। अगर कम ज्ञानी ज्यादा ज्ञानी वाली बात है तो शंकराचार्य के शंकराचार्य के प्रति कम ज्ञानी थे। कम ज्ञानी ज्यादा ज्ञानी अलग बात है। बहुत सी वेद की शाखाएं जो लुप्त हो गई है प्रज्ञा शक्ति कम होने के कारण मगर विरोधी नहीं हो सकते। नहीं वहां पर शाखा लुप्त हुई तो परंपरा पे प्रश्न आएगा फिर तो शाखाएं बहुत सी लुप्त हुई है। क्यों परंपरा पे आएगा ना प्रश्न परंपरा में अगर आप परंपरा से अगर आपकी इतनी सुदृढ़ परंपरा है तो लुप्त कैसे हो गए? लुप्त हो रही है ना? लुप्त हो रही है। बदल नहीं रही। बदलने में विश्वास में दिक्कत आएगी। मैं लुप्त का ही पूछ रहा हूं। बदलने का नहीं लुप्त का पूछ रहा हूं। क्यों लुप्त हो गई? परंपरा सुदृढ़ है ना? क्यों लुप्त हुई? अरे सुदण है तो वेदार्थ तो मिल ही रहा है ना हमको धर्म मैं परंपरा मैं अगर नहीं वो उसका मैं कह ही नहीं रहा ना मैं जिस पूछ उसका बताइए ना उत्तर जिसको पूछ उसका छोड़ के बाकी सबका उत्तर देंगे मैं पूछ रहा हूं कि परंपरा सुदृढ़ है तो ये क्यों लुप्त हुए क्योंकि व्यक्ति का जो दिमाग है याद रखने वाला वो धीरेधीरे कम हो रहा है उसकी स्मरण शक्ति कम हो रही है यानी बौद्धिक क्षमता में कमी आने के कारण अगर व्यक्ति जो है शास्त्रों को भूल सकता है तो शास्त्रों में भूलने के कारण और अर्थों में तो गड़बड़ियां कर सकता है। नहीं तो उसके हम विरोध नहीं जा सकते क्योंकि उससे हमको चीज प्राप्त हुई है ना। या वो फिर हमारा अगर हम चले जाए

01:46:25:27 तो कर सकते हैं। तो वो डाउट करना ही तो विरोध है। डाउट करके विरोध चले तो गए। डाउट करके करना इसलिए पड़ेगा आपने माना इसी को खो दिए हैं। अगर हम डाउट करेंगे अगर हम डाउट करेंगे तो डाउट पर हमारा वो शब्द प्रमाण सिद्ध नहीं होगा। फिर हमें अपना दूसरा आधार चाहिए होगा कि हम वेद पे विश्वास क्यों करते हैं? वो विश्वास क्यों है? नहीं आगे जैसे वेद हमें मिल रहा है। वो खुद भी क्लेम कर रहे हैं कि वेद मिल रहा है। खुद भी क्लेम करने के लिए हमने वेद का अर्थ का अर्थ जो थे शाखा वगैरह थी वो हमें लुप्त कर दी। क्योंकि भैया हमारी शारीरिक क्षमता कम हो रही है वातावरण के अनुसार। मगर हम मगर इससे हमारा बदलना जितना बदला सिद्ध कर रहा हूं यार। बदला बताओ बताओ बताओ बदलना कैसे? वेद की शाखा क्या वेद की व्याख्या ही है। वेद की जो शाखा है वो कुछ कुछ कुछ 10 मंत्र इधर उठा लिए 15 मंत्र इधर उठा लिए करके शाखा बनाई और उसकी व्याख्या कर रखी है तो वही शाखा है। बात ये है कि अगर शाखा लुप्त हुई वेद का अर्थ लुप्त हो गया आपने मान लिया कि वेद का अर्थ लुप्त हो गया तो अब आप वेद का अर्थ जो कह रहे हो कैसे अधिकार पूर्वक कह रहे कि नहीं हमारा जो हम जो बोल रहे हैं वही अर्थ भैया आपने तो खुद ही लुप्त कर दिया अर्थ था वो अर्थ आपने लुप्त कर दिया अब इसमें सुनिए सुनिए इसमें पॉइंट है अब इसमें बात है कि यानी अब आवश्यकता क्या पड़ेगी आवश्यकता पड़ेगी फिर से यानी ये जो था ना वाली बात कि कविता में है ना सिर फूट गया उसको मारो मारो अरुण रंग का घड़ा

01:47:41:01 या और भी उदाहरण दे सकते हैं जो आप दे तो उसमें बात है कि उसमें उस शब्द का यही अर्थ कैसे पता चले इस वाली चीज को ये तो कट हो गया ना क्योंकि अब आप नहीं बता रहा हूं अब इसमें और पॉइंट आएगा इसमें एक और पॉइंट आएगा मैं साथ में ही साथ में कर देता हूं इसमें एक और पॉइंट ये आएगा कि अब आपको ये करना पड़ेगा कि आपको शास्त्रों के यानी व्याकरण इत्यादि और जो ब्राह्मण ग्रंथ इत्यादि उसके आधार पे आपको अपनी प्रज्ञा शक्ति से उसका अर्थ करना पड़ेगा। जब आप उसका अर्थ करेंगे तो उसमें से फिर उसमें तो फिर 100% ही आएगा कि नहीं भैया एक आचार्य ने अर्थ किया ये सही है एक आचार्य ने अर्थ किया वो सही है तो इत्यादि बातें के लिए वो डिबेट का विषय आ जाता है मैं भी तो बार-बार ये कह रहा हूं ठीक है मैं बता रहा हूं अब तुमने बोला मैं बता रहा हूं इसमें बात ये है आयुष को कॉल कर लो आयुष को कॉल करो इसमें बात ये है तुम नहीं तुम नहीं इसमें बात ये है कि शारीरिक क्षमता के कारण जो है चीजों का लुप्त होना ठीक है और जो है जो हमें पीछे से ज्ञान प्राप्त हुआ हमें मालूम है हमको याद नहीं है मगर हमने कुछ और कह दिया भैया देखो जैसे हमें पीछे से प्राप्त हुआ कि भैया शिवलिंग की पूजा नहीं करनी है ठीक है मगर हमने जो है हमने जो है हमको हम भूल चुके हैं हमें मालूम है कि क्या कहा गया था फिर भी हम कह रहे है की शिवलिंग की पूजा कर लो ठीक है एक तो ये होना तो ज्ञान को ज्ञान पूरा का पूरा ना दे पाना और ज्ञान

01:48:56:07 का बदल जाना इन दोनों में अर्थ है अगर हम इन दोनों में अर्थ अलग का अर्थ ये है कि जब हम ज्ञान को बदल के दे रहे है ना बदल के मतलब पीछे से कुछ और दिया गया और हम या तो उसके विरुद्ध बोल रहे है या फिर पीछे से जो दिया गया हम भूल गए फिर भी हम दे रहे है समझ रहे हो फिर भी हम दे रहे है अपने मन से दे रहे है ठीक है तो यहां पर क्या होगा कि हमारे अंदर कोई ना कोई द्वेष लालच कुछ ना कुछ अपना स्वार्थ सिद्धि होगी जिसके कारण हम ऐसा कर रहे है तो बताओ भाई जो जो ज्ञान लुप्त हुआ अगर वो कह दे भैया वो लुप्त हो गया हमें नहीं पता हा मगर वो वो तो वहां पे कह रहे हैं ना कि नहीं भैया ये वैदिक है शिवलिंग की पूजा और फिर दयानंद जी उनका विरोध कर रहे हैं। अगर विरोध, मैं कह रहा हूं, मैं कह रहा हूं कि अगर विरोध कर रहे हैं ठीक है करें। मगर उसके लिए फिर उनको अपने वेद मंत्रों का प्रमाण लाना पड़ेगा कि मैंने इससे मंत्र लिए। नहीं बात क्या है? बात इसके अंदर देखिए। बात वेद वेद मंत्र की नहीं है। वेद के मंत्र के अर्थ की है। वेद के मंत्र का अर्थ आधार शाखा था। शाखा आपने लुप्त कर दिया। अब आपने आधार नष्ट कर दिया। मैं कह सकते कि इस पर हम लोग बात करेंगे। अभी तुम्हारी जो परंपरा है यजुर्वेद के लिए वो कुल पे गए हैं और कुल में उनके यहां ये वाली पूजा होती थी मूर्ति पूजा। ठीक है? है ना? बताया ना अभी शाखा ठीक

01:50:11:08 है। इस हम लोग इसप हम लोग बात करेंगे आगे। ठीक। जय श्री राम। ठीक है। जय श्री राम। नमस्ते भैया। नमस्ते। कैसे हैं? बस कृपा राम और क्या चल रहा है? बस कुछ नहीं। मार्ग में जा रहे हैं थोड़ा पाखंडियों की खाल उतारने। बढ़िया बढ़िया सही है। टीम लेके जा रहे हैं। वहां बहुत पाखंडी होते हैं। हम जगह-जगह पे कल्कि अवतार ब्रह्मा एक्सपोज करना जरूरी है क्योंकि इससे क्या होता है? बदनामी होती है बहुत ज्यादा। तो इसीलिए एक्सपोज करना बहुत जरूरी। मैं हर साल करके आता हूं। दो तीन चिलाटुओं को तोस्ते में ही पकड़ लेता हूं। हां बच्चे बांट रहे होते हैं। वही सही है। कल की वाले वजह से बड़े खिसे आए हुए हैं। एक्सपोज हो गया ना वो इसीलिए इधर-उधर बांट रही होती है। चलो

01:51:12:24 हमारे भगवान आए थे। 2006 में गोली मारकर हत्या कर दी गई उनकी। बताओ। इनके भगवान कहानी पढ़ गए पता भी नहीं चला। चेलों को प्रचार करना पड़ रहा है। और बताओ। और भी आप वही तैयारी चल रही थी तो हम निकलना था बस थोड़ी बहुत देर में ही तुम्हारी भाभी अच्छा कर रही वही थोड़ा सिद्धांत वगैरह सोच रहा था चर्चा करूं अगर आपके पास समय हो तो अरे हो तो गई अपने बीच में चर्चा वही पॉइंट अटक जाता है सगुण निराकार में तुम इच्छा कर देते हो सगुण निराकार में इच्छा हां तो वो तो सही पॉइंट है ना उसमें क्या उसके बाद आर्गुमेंट क्या है आपके पास मतलब सही वहां पे वो संतुष्टिजनक नहीं है ना तुम्हारा ये कहना बल नहीं है वो इच्छा है हम तो उसमें तो सही पॉइंट है उसमें आपके पास सर फिर उसको शक्तिमान क्यों कह रहे हो इच्छा मान कहो शक्ति का मतलब क्या होता है शक्ति का मतलब होता है सामर्थ्य और सामर्थ्य कैसे होता है सामर्थ्य ऐसे होता है इच्छा के रूप में धक्का है ही नहीं ईश्वर का इसमें इसमें ये होता है कि जैसे मान लीजिए मेरी इच्छा हुई तर्क संगत नहीं लगी ना ये बात इसका एक्सप्लेनेशन देता हूं ना मैं आपको एक्सप्लेनेशन देता हूं अरे वो लंबा हो चुका है काफी अपना उसको कहो तो रिकॉर्डिंग बड़ी होगी मैं भेज देता हूं तुम

01:52:27:25 सुनो और ये लूप लूप टाइप से हुआ है उसमें कुछ बार-बार नहीं मेरी मेरी जानकारी में तो अभी देखिए मेरी जानकारी में तो जैसे तुम कह रहे हो ना कि स्वरूप से वो वो है क्या कहते हैं निराकार या स्वरूप से वो नित्य शाश्वत है तो स्वरूप से वो निर्गुण भी है एक रस भी है हम उसका कार्य करने वाला होने के रूप में उसका सगुण होना ही आवश्यक है तो वहीं से या तो यह मान लो अगर तुम अपने स्तर तर्क से अवतार का खंडन करोगे तो तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि ईश्वर की सृष्टि की रचना ईश्वर ने नहीं की फिर क्योंकि ईश्वर तो एक रस है और वो कम ज्यादा हो रहा है यहां सगुण रूप में क्योंकि क्रियाशील है ना ईश्वर जब जब ईश्वर दोनों के अंदर है और वो हिलना चाहता है हिलने के रूप में अपनी शक्ति लगा रहा है तो वो अंदर भी हिलेगा बाहर भी हिलेगा नहीं हिलने से नहीं महाराज जी ये बताइए शरीर के अंदर जीव है तो क्या ही जीव हिल हिल के हाथों को उठाता है क्या तो आप वहां पे बताओ ना वह बल है कि क्या है वो जैसे जैसे जैसे मेरे शरीर शरीर में जीव है। ठीक है? मैंने चाहा और मेरा हाथ उठा। तुम वहां से बताओ कि वो जो पृथ्वी का गोला है उसमें धक्का कैसे लगा? उसमें धक्का कहां? धक्का लगने के लिए एक देसी चाहिए। तो क्या हुआ? तो क्या हुआ? मतलब वहां कुल मिला के वहां कुछ तो कुछ समझाने वाली बात

01:53:42:26 नहीं। बस मान लो कि हुआ। यही तो है। ऐसा नहीं है ना। तो भगवान ने धक्का लगाया कि नहीं? और भगवान ये ये सब जो बातें लिखी हुई हैं तुम्हारे उसमें कि बिन उसके वो सब सुनता है बिन वो सब उसमें ये करता है वो करता है करने वाली कई बातें लिखी हुई है तो करने वाली जैसे ही क्रिया आएगी तो वहां पर वो फोर्स का ट्रांसफर ट्रांसफरिंग फोर्स तो दिखाई देगा ना उसी को तो सामर्थ्य बोलते हैं ना जैसे आंख आंख है तो कोई जैसे सामर्थ्य को ही तो मैं बल बोल रहा हूं बल ना बोले उसे तो बल उसमें देखिए मैं समझाता हूं जैसे एक तो जैसे हम उसे बोल रहे हैं कि सर्वशक्तिमान ठीक है? शक्ति का अर्थ तो सामर्थ बताया हुआ है शास्त्रों में। तो सामर्थ्य का एक्सजीक्यूशन तो बल के रूप में होगा ना। पत्ता हिलाना है। पत्ता हिलाना है तो केवल इतना मतलब नहीं होता ना। अगर अगर नहीं है तो फिर वो जिस रूप में फिर वो बताओ। हां तो मैं वो रूप बताते नहीं वो इच्छा कह देते हो तुम बस। बताता रहूं। मैं बताता रहूं। हां। और खैर बताने से पहले जो मैं थोड़ा सा इसमें और ओवरव्यू इसमें उधर बात करना चाहता था। यह तो बिना अल्टीमेटम के आप में घुस गए। तो इसमें जो टॉपिक रह रहे हैं हमारे सिद्धांतिक चर्चा के एक तो हम उस पर चर्चा कर रहे थे परंपरा पे तो परंपरा वाला टॉपिक छूटा

01:54:57:27 था परंपरा वाला टॉपिक में वो तुमने वशिष्ठ को नहीं माना मैंने जो है फिर तुमको ये पूछा है कि भाई ऐसे अच्छा परंपरा वाले विषय में थोड़ी सी मैं क्लेरिटी चाहता हूं आपसे कि जैसे आप जैसे जैसे ऐसे ऋषियों पे आपत्ति उठा रहे हो जिनकी आयु जो है 1 लाख वर्ष थी या इतने हजार वर्ष थी तो मैं ऐसे ऋषियों पे आपत्ति उठा बता रहा हूं जिनके अंतकरण में वेद प्रकट हुआ ऐसा शरीर आज दिखा दो कहां है नहीं जिसमें वेद प्रकट होता है मैंने तो आपको उसका सारा उत्तर उत्तर दे दिया था वो आप रिकॉर्डिंग में सुन लीजिएगा नहीं मैंने सुना था मैंने सुना था उसमें तुमने कहा है उसमें तुमने हमको यह कहा है अनुमान प्रमाण से क्योंकि हमें धर्म प्राप्त है तो वहां पर धर्म प्राप्त होना सिद्ध हो रहा है मगर वो अंतःकरण में आकर के प्राप्त होना सिद्ध नहीं हो रहा नहीं वो तो हम मन में अपने विचार करते हैं कि नहीं करते नहीं मैं ये कह रहा हूं वो हमें धर्म हमारे पास आज की तारीख में है। इससे यह सिद्ध हुआ कि ईश्वर ने ही धर्म दिया। मगर माध्यम अंतःकरण में था। यह थोड़ी ना है। हो सकता है आंखों आंखों से कुछ उसने लिख के बताया हो तो उन्होंने देखा होगा। इसका तो इसका इसका भी उत्तर है। इसका उत्तर है। इसका उत्तर है। अगर आप कहोगे मुंह से बोल के बताया। हम ठीक है। तो खैर मैं ये ये जो मूल विषय ये घुसेगा सर्वशक्तिमान वाले में घुसेगा तो मैं इसका उत्तर आपको दूंगा आगे। लेकिन जब ये सर्वशक्तिमान वाला विषय आएगा तो मैं वहां पे आपको इस चीज को क्लेरिटी दे दूंगा। लेकिन जो

01:56:12:28 अंतःकरण वाला था अंतकरण में कैसे हुआ इसका मैंने आपको अनुमान प्रमाण से सिद्ध किया था। अंतःकरण से अनुमान प्रमाण से यह सिद्ध है कि भाई धर्म उसी से मिला ईश्वर से ये सिद्ध है। जो जो प्रक्रिया आप बता रहे हो वो चमत्कारिक है। ना चमत्कारी को तो फिर उसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाओ। और ना ही आपने बच्चे का प्रत्यक्ष प्रमाण दिया कि बिना मां के बच्चा कहां जन्म ले रहा है आज? कोई बात नहीं। चलिए आपने दिए थे इसके जवाब। आपने मगर वो संतुष्टिजनक नहीं दिए थे। बिना मां के मनुष्य जन्म नहीं ले रहा आज की तारीख में। देखिए उसमें बात ये आ जाती है ना कि जब तीन प्रमाण समझने पड़ते हैं। अब अनुमान प्रमाण आप नहीं समझे तो फिर उसमें थोड़ा सा एक इशू होता है। बाकी रिकॉर्डिंग आप फिर से सुनेंगे। नहीं हनुमान प्रमाण से हमने हनुमान प्रमाण से हमने अगर हनुमान प्रमाण की बात आएगी तो हनुमान से तो हमने सर्वशक्तिमान भी सिद्ध किया है ना। कहां से हो रहा है? सर्वशक्तिमान शब्द वो तो सच्चिदानंद सिद्ध हो रहा है। सर्वशक्तिमान कहां सिद्ध हो रहा है? सच्चिदानंद का जो सच्चिदानंद जहां से वह सिद्ध हो रहा है उसका जो व्यवहारिक रूप है वो तो वही है ना सब कुछ कर सकने वाला यह जो सब कुछ कर सकने वाला देखिए ईश्वर की सिद्धि किस चाह से हो रही है मौलिक चाह से वो मौलिक चाह पता कैसे चल रही है कि मौलिक चाह है उसका अवतार क्या है एग्जीक्यूशन कैसे होता है हां व्यवहार

01:57:28:00 में हमें कैसे पता चल रहा है कि मूल में ये चाह है ये तो जब हम अपने अंदर एनालाइज करेंगे उसी से पता चलेगा ना हमारे व्यवहार से पता चल रहा है ना हमें डर लग रहा हम भाग रहे हैं तो ये व्यवहार आ तो वो जो जो इच्छाओं का मौलिक स्वरूप है सच्चिदानंद उसका अवतार हो गया कि हम भाग रहे हैं। हम जो है यह चाह रहे हैं वो चाह रहे हैं। उसका प्रकटीकरण ये हो गया। हां तो बस ऐसे ही जब जैसे वो जो मौलिक चाह है उसका प्रकटीकरण ये है ऐसे ही उस चाह का मैं थोड़ा सा ओवरव्यू उसमें दे देता हूं। एक एक मिनट जैसे वो जो मौलिक चाह है सच्चिदानंद की मौलिक चाह उसका प्रकटीकरण इसमें हो गया। वैसे ही उस मौलिक चा का जो मौलिक निवारण है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसका प्रकटीकरण इसमें हो गया व्यवहार क्या हो गया क्या हो गया जैसे अवतार लेना जैसे मौलिक जैसे हमारे जैसे प्रकटीकरण से हमारी उस तर्क से तो आप सर्वशक्तिमान की सिद्धि करें अवतार बीच में कहां से आ गया सर्वशक्तिमान है सब कुछ कर सकने वाला ये आ गया तो ना जब वो पहले सिद्ध हो जाएगा तब तो उसे अवतार पे आएंगे आएंगे ना अभी तो आप अवतार पे बात अभी तो सर्वशक्तिमान पे बात कर रहे हैं तो अब अवतार पे चले सर्वशक्तिमान इसीलिए तो नहीं सिद्ध होता है कि तुम अवतार पे बाधित कर देते हो उसे नहीं

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01:58:41:13 तो इसमें अब दोष बताता हूं इसमें क्या है सर्वशक्तिमान नहीं सिद्ध हो रहा तो अवतार नहीं सिद्ध हो रहा और अवतार से ही आप सर्वशक्तिमान सिद्ध कर रहे हो तो लीजिए आत्मा आश्रय दोष अवत अवतार से सिद्ध कर रहे हैं अवतार से सर्वशक्तिमान सिद्ध कर रहे हैं और सर्वशक्तिमान से अवतार सिद्ध कर रहे हैं नहीं तुम सर्वशक्तिमान पे ब्रेक लगा रहे हो ना कि अवतार नहीं ले सकता सर्वशक्तिमान की पहले तो ये बात आती है कि आप सर्वशक्तिमान सिद्ध करिए। पहले तो ये बात आती है ना और अगर आप सर्वशक्तिमान के अवतार है सुनिए तो अगर आप सर्वशक्तिमान के कांटेक्ट में अवतार का उदाहरण देंगे तो अवतार तो सिद्ध नहीं क्योंकि अवतार के सिद्ध करने के लिए हेतु ही सर्वशक्तिमान है तो वो तो साध्य कोटि हो गई। साध कोटि की वस्तु आप सिद्ध कोटि में कैसे दे देंगे? ये पॉइंट आएगा। मैं ये नहीं कह रहा। मैं ये कह रहा हूं। खैर

01:59:21:10 इसमें इसमें लंबी चर्चा आ जाएगी। मैं इसमें ओवरव्यू दे रहा हूं मैं कि एक तो ये हमारा इसमें था जो मैंने अभी बोला ना परंपरा वाला तो परंपरा वाले में जो आप वशिष्ठ जी की लंबी आयु कह रहे थे। चलिए ठीक है। अगर मैंने उसको मैंने उसमें बोला भी था कि दुर्जन तोष ने ऐसे अगर मैं मान लेता हूं कि वो जो परंपरा है वो ठीक चली आ रही है। ठीक है? और जो शास्त्र है वो सारे उसी परंपरा से चले हैं और बाद में वो परंपराएं की बहुत सारी शाखाएं बनती चली गई। विश्व द्वैत इत्यादि इत्यादि और सारे शास्त्र अलग-अलग पंडितों के माध्यम से हमें मिले हैं। ठीक है? अब इसमें बात ये आ जाती है कि लेकिन फिर ये आता है कि आपने हमसे परंपरा पूछी क्यों? तो जो मैं कारण समझ में आया आप मुझे करेक्ट कर दिए। मैं गलत हूं। तो तो मैं जो कारण समझ पाया वो ये था कि आपका मूल चीज ये था कि भैया जितने भी शास्त्र हैं वो सारे परत प्रमाण है। वेद जो है वो स्वतः प्रमाण है। तो वेद का जो अर्थ होगा उसी हिसाब से बाकी सारे शास्त्रों के अर्थ मानने पड़ेंगे उसे क्योंकि वेद के विरुद्ध नहीं हो सकते। तो अर्थ जो आएगा वो परंपरा से ही मानना पड़ेगा। और जो हमने जो है वो अर्थ वेदों का अलग कर रखा है। आपने अलग कर रखा है। तो आप कह रहे हो कि भैया आपने अलग कैसे कर दिया? ये परंपरा के विरुद्ध होने से अमान्य है। यही यही मोटा-मोटा पॉइंट है। हां। हां। अब इसमें पॉइंट ये है। समझने वाला जो पॉइंट है कि जब आप कह रहे हैं कि परंपरा से अर्थ आए हैं तो क्या आप ये कह रहे हैं कि ईश्वर ने जो वेद दिए थे उसी समय ईश्वर ने वेद का अर्थ भी जनाया था और वो अर्थ परंपरा

02:00:36:16 से चले आ रहे हैं आज तक क्या आप ये मानते हैं बिल्कुल हां तो मेरे पास इसका विरोध मैं प्रमाण में दे देता हूं बता दो इसका आप खोलिए निरुक्त 120 निरुक्त 120 में लिखा हुआ है कि जो परंपरा से जो समाधि अवस्था में जो ऋषियों को अर्थ जाने थे ना वेदार्थ हम वो लोग लोगों को देते लेकिन लोगों की जो स्मृतियां है वो शीड होने लग गई। तो फिर वो अर्थ जो है वो भूलने लग गए। हम फिर ऋषियों ने वेदांगों की रचना की हम और वेदांगों में निरुक्त निघंटू और ये व्याकरण आदि जो है वेदांग इनकी उन्होंने रचना की और यानी जो फिर ये हुआ कि अब जो वेदों का अर्थ होगा वो वेदांगों के आधार पे होगा। वेदांगों के आधार पे होगा। मगर वो आधार भी तो उन्होंने ही दिया। वो वो हमारे शब्द प्रमाण के विरुद्ध थोड़ी ना जाएगा। नहीं उसमें आप समझिए इसमें पॉइंट क्या आता है? हम हम हम जो अर्थ देते हैं उसमें वेदांगों का विरोध थोड़ी ना है और दूसरी सुनो तो सुनो सुनो सुनो सुनो दिक्कत क्या है दिक्कत ये है कि अगर आप यह मानते हो कि आपका वेदांगों के अकॉर्डिंगली है उनका नहीं है तो फिर आपको ये मानना पड़ेगा कि ये लोग जो है ये आपसे झूठे आपको झूठ बोल रहे हैं। कैसा झूठ मन जो ये कि हम जो ये कह रहे हैं कि नहीं हमारा वेदांगों के साथ है। नहीं

02:01:51:22 हमारा अर्थ वेदांग से ही है। तो आपको उन्हें झूठा सिद्ध करना झूठा मानना पड़ेगा। तो जब आप उनको झूठा मान लोगे तो आप उनसे द्वारा मिलने वाले मंत्रों को आप प्रमाणिक नहीं मान सकते। ये वही मंत्र है जो हम ईश्वर से लेके आए हैं। नहीं क्योंकि जरूरी नहीं है ना जरूरी इसलिए नहीं है। इसलिए नहीं है मैं आपको बताता हूं। क्योंकि देखिए क्या है वेद जो चले आ रहे हैं वो तो हम मंत्रों को रटते आ रहे हैं। ठीक है? अब ऐसा हो रहा है कि मतलब वो तो परंपरा से चला आ रहा है। जो वेद चला आ रहा है वो पर लेकिन जो वेदार है वो परंपरा से नहीं। वेदार्थ नष्ट हो चुका है परंपरा से। तो वेदार्थ करने के लिए जो रीति बताई गई है वो कही है वेदांग आप पढ़ो। परंपरा से शास्त्र चले आ रहे हैं। वेदांग जो शास्त्र है वो परंपरा से चले आ रहे हैं। और उन शास्त्रों को जो है हम वो पढ़ेंगे परंपरा से और फिर उन शास्त्रों के द्वारा वेदांगों का मतलब वेदों का अर्थ करेंगे। हम मान लीजिए मैं पूरा बोल देता हूं। मैं थोड़ा सा पूरा बोल देता हूं। मुझे पैर निकलना भी है। जी जी अब उसमें 10 पंडित है। 10 पंडितों ने वेदांग पढ़े हैं और वेदांग पढ़ पढ़ के अपने अपने वेदांगों के ज्ञान से अपना जो है उन्होंने अर्थ किए हैं। अब उसमें से हमें देखना पड़ेगा ना कि किसका जो है वेदांग की अब उसमें विरोधाभास आ रहा है तो हम तो चेक करेंगे भैया किसका सही है किसने क्या गलती क्योंकि मनुष्य मनुष्य गलती कर सकता है। है ना? तो उसमें किसी ने ऐसा तो नहीं किसी व्याकरण के नियम में उसने फलाना गलती कर दी, फलाना गलती कर दी।

02:03:06:26 इत्यादि को चेक करना पड़ता है। अंतत ये जो है ये बात इसी पर आ जाएगी कि इस आर्य समाज का जो भाषा है वो स्वामी दयानंद जी का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है या शणाचार्य जी का जो भाषा वेदांगों के अनुकूल है वो इसी और इसकी जो जांच है वो व्याकरण के एक्सपर्ट है वो कर पाएंगे। ठीक है। अब यह बात हो गई तुम्हारी। पहली बात इसमें यह वाला वो है कमी कि वहां पर जो बात हो रही है वो इस केस में हो रही है कि स्मृति क्षी हो रही है। इसलिए ये वाला सहारा भी रख लो। है ना? मगर मगर सहारा थोड़ी है। सुनो तो मेरी बात सुनो। मगर यह नहीं है कि अगर किसी को याद है तो उसका विरोध भी विरोध ही करो। याद कहां है? याद तो है नहीं ना। परंपरा से वो तो खत्म हो चुका है। नहीं खत्म। उन्होंने यह कहा था खत्म हो चुका है या स्मृति क्षीण हो रही कहा था। स्मृतिश होने से जो अर्थ था वो लुप्त हो गया। लुप्त रचना की खत्म हो गया। आप पढ़िए ना तो खत्म हो गया तो रचना कैसे कर दी? उसको उसको सिद्ध करने के लिए वैसे ईश्वर को आना पड़ेगा। अर्थ देने की मैं बता दे रहा हूं ना जब हुआ ये कि जब अर्थ लोग स्मृति शीड होने लग गई। ठीक है? लुप्त का मतलब वहां मानना पड़ेगा कि प्राय लुप्त हो चला। अगर पूरा लुप्त मान लेंगे तो दोबारा भगवान को आना पड़ेगा देने के लिए ना। क्योंकि हम अपने से तो अर्थ ज्ञान ले नहीं सकते हैं उसका। नहीं उसमें यह हुआ ना कि जो समाधिष्ट योगी थे उन्होंने तो

02:04:22:04 यानी समाधिष्ट योगी कुछ लोगों को मैं पूरा मैं समझ गया मैं समझ गया यानी समाधि नहीं समझे मैं पूरा बोलना चाहता हूं मेरे को मैं चाहता हूं मैं बोलूं बताओ बताओ बताओ अब उसमें बात ये है ना कि अब समाधिष्ट योगी थे अब जब अब ऐसा तो नहीं कि एक ही सेकंड में पूरा वाइप आउट हो गया था थनोस की तरह वो तो हुआ नहीं वही मैं कह रहा हूं मैं अब जब उसमें लुप्त होना जब लुप्त होना चालू हो रहा है ठीक है तो ऋषियों को समझ में आया कि भैया इनकी मेमोरी जो है उतनी तगड़ी है नहीं ये लोग वेद भी याद करे फिर सारा अर्थ भी याद करे इंतजाम कर उन्होंने क्या उन्होंने क्या किया? वेदांगों की रचना की। ठीक है? ऋषियों ने समाधिस्थ जो ऋषि थे उन्होंने वेदांगों की रचना की। अब ये हो गया कि भैया अब आपको मंत्र याद करने की जरूरत नहीं है। अब आप वेदांग पढ़ो। वेदांग से अर्थ करो। नहीं ये उन्होंने ये नहीं कहा कि जो है परंपरा से नहीं होगा। क्योंकि उन्होंने अपने भाष्य में कई जगह परंपरा से शास्त्र आ रहे हैं। उन्होंने उन्होंने जो उन्होंने जो क्या कहते उन्होंने ये माना है कि परंपरा से जो है शुति परंपरा से ही वो वेदार्थ निकाला जाएगा। ये भी माना उन्होंने। परंपरा क्या मैं निरुक्त मैं निरुक्त से निकाल के दे दूंगा? हां मुझे आप बताइए। मैंने आपको बताया एक में आप चेक करेंगे। श्रुति का सुनो श्रुति का मतलब ही होता है। श्रुति का मतलब ही है कि हम जो है श्रुति से कर रहे हैं। अगर ज्ञान का ज्ञान निकाल रहे हैं तो श्रुति का मतलब ही है कि परंपरा। नहीं तो श्रुति का मतलब ये लिखा हुआ है ना कि जो श्रुति से जो वेदार्थ चले आ रहे थे वो नो नो नो नो नो नो नो नो नो नष्ट हो गए और वेदांग से अर्थ होता है। नष्ट हो गए।

02:05:37:25 ये लिखा उन्होंने नष्ट हो गए। अरे आप आप पढ़िए वो भाव उसी में पता चल जाएगा आपको क्या है क्या नहीं है उसमें मैं मैं कह तो रहा हूं कि मेरे बोलने पे मत सुनिए आप खुद ही चेक कर लीजिए ना क्या लिखा है अगर आपको उसमें विशेष उसमें जानकारी इसमें परंपरा की बात भी कई जगह हुई है निरुक्त में ही मैंने खुद कहा निरुक्त में जो भी परंपरा की बात हुई वेदार्थ की परंपरा की बात हुई है और वेदार्थ में मैं कह रहा हूं निरुक्त में जो एक 20 देखो अगर अगर हम कुछ भी करके जो हमें मंत्र दे रहे हैं उनको झूठा सिद्ध करेंगे कि भैया यह जो है हमको गलत ज्ञान दे रहे हैं तो हमें उनकी क्रेडिबिलिटी पर उंगली उठनी उठ उठ ानी पड़ेगी। नहीं तो जो मंत्र दे रहे हैं उनप थोड़ी मैं कुछ कह रहा हूं। जिन्होंने मैं तो उस तो मंत्र फिर हमें मंत्र पर विश्वास क्यों? देखिए जो आपसे गलत बात बोल रहा है जो अर्थ बोल रहा है गलत। ठीक है? तो मैं शारणाचार्य से मंत्र थोड़ी ले रहा हूं। आप कहीं से भी ले आपको फिर अपनी परंपरा बतानी पड़ेगी जहां से आप ले रहे हो। वो आपकी है नहीं। जैसे समझिए इस चीज को। जैसे जैसे मान लिया मैंने कोई कोई भी दूसरे आचार्य हैं जो परंपरा से रूप से अपना उसे आप उसके विरुद्ध नहीं जा सकते अर्थ में। अरे तो उसमें बात ये है ना बात क्या है? बात यह है कि परंपरा से तो हमें मंत्र मिल रहे हैं। अरे वही उन्हीं मंत्रों की क्रेडिबिलिटी की बात कर रहा हूं ना जो व्यक्ति द्वेषी हो सकता है। जब एक मिनट तुम इसमें वो बताओ कहां का छपा हुआ है तुम्हारा निरुक्त? कहीं से भी ले लीजिए आप एक बी चेक कर लीजिए। कोई सा

02:06:52:26 भी खोल लीजिए। किसी के भाषा उठा लीजिए। नहीं वो पेज नंबर बता देते तो जल्दी हो जाता। नहीं मेरे पास जो आपके पापा में है ना आपके पास में किसका? प्रथम पाद में है। हां प्रथम 1 20 देख कीजिए। अब बात यह आ जाती है कि मंत्र जो हमने लिए वो तो परंपरा से लिए हैं। जो अर्थ है वो परंपरा से थोड़ी है। अगर अर्थ परंपरा से होते तो मानना पड़ता। परंपरा प्राप्त अर्थ को नकारते तो फिर वेद मंत्र को नकारने की बात आती। अभी जो शयनाचार्य का अर्थ है वो फिर परंपरा से थोड़ी वेदांग के आधार पे। उसमें त्रुटियां है इसे नकार। एक मिनट 1 मिनट।

02:07:35:08 इसमें तो 20वां है ही नहीं। अरे द्वितीय पाद एक मिनट द्वितीय पाद इसको कह रहेगे द्वितीय पाद में प्रथम अध्याय अध्याय में अध्याय का 20वा है। निपात लक्षणम तो नहीं है। निपात लक्षणम नहीं है। उसका दूसरा वचन होगा उसका। नाम क्या है? जैसे 20वें में बहुत सारे वचन है ना उसमें दूसरा वचन होगा। यही है। एक मिनट

02:08:20:16 इसमें तुम्हारी वाली बात नहीं है। तुम ऐसा करो मुझे फोटो खींच के भेज दो। अरे आप जो जो आप पढ़ रहे हैं ना उसी के थोड़ा सा और नीचे जाइए नीचे पेज पर और वहां पर दूसरा वचन आपको संस्कृत में दिखेगा उसकी हिंदी पढ़िए। एक अध्याय में केवल एक ही वचन थोड़ी है। एक पाद में एक ही वचन थोड़ी वेदकालीन समाज में वैदिक संस्कृति ऋषियों द्वारा देवताओं के लिए प्रयुक्त होती थी। देवता विषयक ऋषियों द्वारा दृष्ट वैदिक मंत्र इसी भाषा में निबद्ध हैं। इन मंत्रों के अध्ययन के लिए आगे-आगे आचार्य इन मंत्रों का उच्चारण करता था तथा उनके पीछे-पीछे अध्ययता उच्चारण करते हुए अध्ययन करता था। इसके पीछे पीछे उच्चारण करके अध्ययन करने के कारण वेद मंत्रों को अनुवाध्याय

02:09:09:18 अनु पीछे पीछे उच्चारण करके अध्याय पाठ होने वाला कहा गया है। उस समय लौकिक संस्कृत जो परवर्ती काल में पाणिनीकृत अष्टाध्याय के विधानों द्वारा व्याकरण के नियमों से नियमित और परिनिष्ठित कर दी गई। वह लोक में प्रचलित थी। इसी लोक में प्रयुक्त भाषा को यहां भाषा शब्द से अभी अभिहित किया गया है। उपमा अर्थ में इव का लौकिक भाषा और वैदिक भाषा दोनों में प्रयोग होता है। यहां यास्क ने उदाहरण के लिए केवल वैदिक मंत्रों का ही उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि निरुक्त में निघंटू की व्याख्या करने की प्रतिज्ञा के प्रारंभ में ही अह सामामनाय

02:09:58:04 के द्वारा कह दिया गया है। भाषा में लोग भाषा में निषेध अर्थ वाला यहां नहीं है वो वाली बात बहुत लंबा हो रहा है। अरे आप मुझे फोटो लीजिए वो 20वा ठीक है कोई कोई नहीं तुम अपनी फोटो भेज देना मुझे इसमें इसमें दोनों चीजें हैं और इसमें सवाल यह भी आएगा ना कि अगर आप यास्क का प्रमाण हमको दे भी रहे हो फिर हम ये पूछेंगे यास्क का वो कहां से आया क्या परंपरा तो बतानी पड़ेगी ना मैं कह तो रहा हूं कि मान लो आप ही के आप ही के थ्रू आया। हां अगर आप यह भी मान लो कि आप ही के थ्रू आया तो भी आपको ये मानना पड़ेगा कि वेद के जो मंत्रार्थ जो ईश्वर ने दिए थे अभी वो नहीं है हमारे पास में। अभी जो वेद के मंत्रार्थ होते हैं वो उनका आधार आपको वेदांगों को ही मानना पड़ेगा। नहीं वेदांगों को नहीं परंपरा से वेद आए। परंपरा से वेद का अर्थ भी आया और वो जो वेद अर्थ वो जो वेद अर्थ होगा वो अष्टाध्याय के अनुरूप भी होगा। व्याकरण के अनुरूप भी होगा। ऐसा नहीं है कि विरुद्ध अगर वह विरुद्ध होगा तो तो आपको यह मानना पड़ेगा कि ना हमारे पास वेद है ना वेदार्थ है। यही सनातन ना पॉइंट ये कि जब शास्त्र ही खुद कह रहे हैं कि जब परंपरा से आने वाले वेदार्थ नष्ट हो चुके तो आप जबरदस्ती अरे भैया शास्त्र उसमें परंपरा भी कह रहे हैं। श्रुति श्रुति का श्रुति का मतलब ही श्रुति कितनी बार कहा होगा निरुक्त निरुक्त में बताओ यासकाचार्य ने बताओ तो श्रुति जितनी बार कहा है वेदार्थ की परंपरा के लिए कहा है तो क्या वेदार्थ की परंपरा

02:11:13:08 में ये निरक्तचार्य जो अर्थ किया जाता है तो व्याकरण संप्रदाय बताया निरुक्त संप्रदाय बताया तो यास्काचार्य ने भी अरे देखो ये सब चीजें तो तुमने अभी मुझे भेजी नहीं है भेज देना मैं देखूंगा जो तुम ये संप्रदाय 10 संप्रदाय वाली बात निरुक्त पढ़ा होगा तो आप तो खुद ही कह रहे हो ना उसमें है तो निरुक्त पढ़ी तो उसमें सारी चीजें हैं फिर उसमें अलग से क्या ये वाली जो चीजें हैं कि उन्होंने 10 संप्रदाय के नाम लिए हैं। वो मुझे बता देना। मगर मैं तुम्हें एक बात बता रहा हूं कि जहांजहां पे वो यह कहेंगे कि धर्म और ब्रह्म की व्याख्या हम निरुक्त उससे करते हैं श्रुति से। तो श्रुति का मतलब ही है कि हमने अपने गुरुजनों से जो सुना उससे करते हैं। श्रुति को तो वेद कहा गया है ना। वेद हां तो वो वेद श्रुति वेद का अपने आप में जो श्रुति नाम है उसका उसका मतलब ही परंपरा है। बिना परंपरा के श्रुति का अस्तित्व क्या है? नहीं वेद तो मान रहे हैं ना परंपरा से। वेदार्थ तो ये जोस्का कह रहे हैं कि व्यास का ये वेदा व्यासकाचार्य ये नहीं कह रहे हैं कि जो परंपरा से जो ज्ञान विज्ञान है उसका विरोध में भी तुम अपना खड़ा कर सकते हो ये जो मैं आधार दे रहा हूं उसके द्वारा नहीं हमने तो वेदांगों के आधार पर खड़ा किया ना केवल वेदांग नहीं होगा ना उसमें श्रुति भी होगी वेदांग भी होगा तब दोनों के समन्वय से होना चाहिए तो है और क्या है अरे श्रुति परंपरा भाई परंपरा को आप ठुकरा नहीं सकते ना भैया श्रुति मतलब परंपरा अपने आप में भी और मैं इसमें बता दूंगा कई जगह परंपरा के उन्होंने

02:12:28:12 बोला होगा प्रत्यक्ष जितनी जगह परंपरा बोला है वेदार्थ की परंपरा बोला उसमें निरुक्त परंपरा व्याकरण परंपरा है और बताइए ये भी दिखा देंगे बात ये है कि तुम जहां पे तुम्हारी बात आ रही है तुम यहां पे अब तर्क की बात ही नहीं छोड़ दे रहे हो बिल्कुल तुम मुझे शब्द प्रमाण से दबाने की कोशिश कर रहे हो तर्क ये है कि सीधी बात है कि हमको शास्त्र देने वाला कौन है हमारी परंपरा यदि वह झूठी हो सकती है यदि उसकी क्रेडिबिलिटी पर बात आ सकती है तो वह हमको झूठे मंत्र भी दे सकती है आसकाचार चार्य के नाम से झूठा शास्त्र भी दे सकती है। अगर तुम यह सिद्ध कर दोगे कि यासकाचार्य के अनुसार शंकराचार्य जी फिट नहीं बैठ रहे। अगर तुम यह सिद्ध कर दोगे कि यासकाचार्य के द्वारा दिए गए जो अष्टाध्याय सूत्र है व्याकरण के सूत्र उसके उसके अनुसार जो हमारे पारंपरिक गुरु है वो सही सिद्ध नहीं हो रहे तो आप यह सिद्ध करोगे कि वेदार्थ है ही नहीं कहीं वेद है ही नहीं कहीं सब मनमाना है। सब कुछ मनमाना है। यह सिद्ध करोगे। ठीक है। अब आपने एक पॉइंट बोला कि तर्क से सबसे पहले मैंने यही बोला था कि मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं कि शास्त्र आपकी परंपरा से आए। उन्हीं शास्त्रों के अंदर निरत्ताचार्य बोल रहे हैं कि जो वेद तो परंपरा से चल रहे हैं। लेकिन जो वेदांत है उसकी परंपरा वो परंपरा से आना भी तो मैं पूरा बोल देता हूं। आपने तो बोला ना मेरा तो सुनिए। तो आपने तो उसी उसी शास्त्र में निरुक्तचार्य बोल रहे हैं कि जो मंत्र है वो तो परंपरा से चल रहे हैं। लेकिन वेदार्थ जो है वो उसकी

02:13:43:13 परंपरा लुप्त होने के कारण बुद्धिश होने के कारण बुद्धिश होने के कारण वेदांगों की ऋषियों ने रचना की। अब जो वेदांगों के जो वेद के जो अर्थ होंगे वेदांगों के आधार पे होंगे। जिसका अर्थ वेदांगों के अनुकूल होगा उसका प्रमाण होगा। जिसका विरुद्ध होगा उसका अप्रमाण होगा। सिंपल सी बात है ना इसमें कोई डिबेट का मुझे पहले तो यह फोटो भेजो फिर इसके आगे हम बात करेंगे। दूसरी बात यह है कि उन्होंने इस स्थिति में कहा है कि वेदार्थ का जो वो है वो क्षीण हो रहा है। उन्होंने माना है कि वेदार्थ लुप्त हो रहे हैं। हां तो लुप्त हो रहे हैं। ये लुप्त हो गए। ये नहीं कह सकते क्योंकि उसके लिए फिर दोबारा भगवान को आना पड़ेगा। नहीं तो नहीं तो तो उन्होंने यह नहीं कह दिया कि अगर कोई अगर अगर सुनो अगर कोई यह कहेगा कि भाई मैं भूल गया हूं तो वहां पे एक सिंगल पॉइंट एजेंडा आ जाएगा कि भैया यहां पर जो है आपके जो क्या कहते हैं वेदांग है केवल उनके आधार पर कर सकते हो मगर जब कोई वहां खड़ा हुआ कह रहा है कि नहीं मुझे याद है तो वहां पे ये वाली चीज फिर तो उसको उसका विरोध नहीं कर सकते ना जैसे वो जो स्मृति क्षीण हो रही है प्रज्ञा शक्ति क्षीण हो रही है उसकी वजह से हम भूले तो हम कह रहे हैं कि हम भूले ठीक है मगर हम जब कह रहे हैं कि यह वाली चीज हमको याद है तो उसमें हमारा झूठ अगर आप हमें नकारते हुए तो भी ठीक है तो इस केस में अब हमारे पास में इतिहास प्रमाण है। इतिहास प्रमाण ये है हमारे पास में कि मतलब शीण हुआ है। वेदार्थ जो है वो शीण हुए हैं। वेद आए हैं लेकिन वेदार्थ शीण हुए हैं। इसका हमारे पास में प्रमाण है। अब

02:14:58:19 इस केस में मान लीजिए कि मैं दुर्जन ने ऐसे मान लेता हूं। वैसे तो प्रमाण कुछ है नहीं। नहीं जीरो प्रमाण है। फिर भी मैं दुर्जन ऐसे मान लेता हूं। सुनिए तो दुर्जनोष ने ऐसे मगर मैं मान लेता हूं कि जो वेदार्थ है वो किसी ना किसी आंस रूप में आज बचे हुए हैं। तो भी उनका क्योंकि ये आपने बोला ना कि ईश्वर को दोबारा वेद देना पड़ेगा। वो तब देना पड़ता जब ऋषियों ने इसकी व्यवस्था नहीं की होती वेदांगों के रूप में। लेकिन वेदार्थ करने की व्यवस्था ऋषियों ने वेदांगों के रूप में कर रखी थी। इसीलिए दोबारा से वेदार्थ देने की आवश्यकता नहीं। एक पॉइंट। दूसरा पॉइंट ये कि अगर मैं मान भी लेता हूं कि वेदार्थ जो है वो किसी न किसी को याद भी होगा। वो कह रहे नहीं मेरे को तो परंपरा से वेदार्थ याद है भले ही खत्म हो गया। कह रहे हो लेकिन मैं नहीं सुनता। मेरे को याद है तो भी उसका जो है वो वेदांगों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। अगर वो वेदांगों के विरुद्ध दे बोलेगा कोई बात तो हम यही मानेंगे कि भैया वो जो है उसकी बुद्धि क्षीण हो गई या उसकी अल्पशक्ति जो भी है क्षीण हो गई और वो व्यक्ति गलत बोल रहा है क्योंकि वेदांगों को तो ऋषियों ने स्वीकार किया इसलिए वेदांगों के विरुद्ध नहीं हो सकता। हां उस व्यक्ति पे दोष यहां पे एक कैची पॉइंट है। तुमने कहा कि उन्होंने व्यवस्था कर दी थी। भगवान को आने की जरूरत नहीं है। यानी कि आपका मतलब है कि आपने जो आपकी जो बुक्स हैं, हमारी जो बुक्स है, ग्रंथ है, अष्टाध्याय के सूत्र हैं, पाणिनी है, अष्टाध्याय है या जो निरुक्त है, ये सब हम एक बच्चे को पकड़ा देंगे और वो वेदार्थ कर लेगा। नहीं मैंने कब बोला कि बच्चे को पढ़ा उसकी पूरी व्यवस्था है ना? कैसे पढ़ेंगे? हां। उस व्यवस्था आ

02:16:13:20 जाएंगे। सुनिए बहुत सिंपल है। सबसे पहले शिक्षा पढ़ेंगे। शिक्षा के बाद अष्टाध्याय के सूत्र याद करेंगे। प्रथमा पढ़ेंगे। भैया वो शिक्षा में कहीं ना कहीं उनकी प्रिपरेशन में परंपरा प्राप्त ज्ञान आना पड़ेगा। परंपरा से शास्त्र ही तो पढ़ाएंगे और क्या पढ़ाएंगे? अरे मैंने कहा कि जब भगवान को आना नहीं जब उन्होंने ऐसी मतलब सबसे पहले सिखाते तो ख सिखाते मतलब जाकिर नायक जाकिर नायक भी खड़ा हो के जो है वो बच्चों को प्रिपेयर कर देगा कि भैया अष्टाध्याय के तुम सूत्र ले लो। तो कोई भी कर देगा। बहुत सिंपल है ना? अगर मान लीजिए अष्टाधय से अष्टाध्याय के आधार पे कोई उसने बोलता है कि मैंने जो भाषा की अष्टाध्याय के आधार पे है ठीक है तो अष्टाधय विशेषज्ञ चेक कर लेगा ना कि ये किध अष्टाध्याय विशेषज्ञ है ना वहां पर इसका मतलब कहां पे अष्टाध्याय विशेषज्ञ है ना वहां पर कहां पे इस बात को तय करने के लिए कि हुआ है कि नहीं अष्टाध्याय से नहीं मैं पूछ रहा हूं कहां पर तो कहां पर बताइए ना तुम कह रहे हो ना अष्टाध्याय विशेषज्ञ तय कर लेगा कि वो अष्टाध्यायी से हुआ है कि नहीं हुआ है हां यही अष्टाध्याय हमारा शब्द प्रमाण होगा यही विशेषज्ञ हमारा शब्द शब्द पुराण होगा हां तो यह परंपरा प्राप्त होगा अष्टाध्याय विशेषज्ञ और उस उस वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको उसको कैसे माना जाए कि उसके पीछे वाला वो विशेषज्ञ वो अष्टाध्याय विशेषज्ञ है कि नहीं उसको कैसे माना

02:17:28:21 जाए कि उसके पीछे वाला वो विशेषज्ञ वो वो तो चलिए बाद की बात है तो वो शब्द तो वही मैं कह रहा हूं परंपरा तो आपने मान ली ना जब विशेषज्ञ के अधीन छोड़ दिया नहीं छोड़ मैंने आपसे मैंने आपसे पहले मैंने आपसे पहले ही बोला ना कि दुर्जन ने ऐसे मैं मान तो रहा हूं कि सारे शास्त्र आप की परंपरा से हम भी आपकी परंपरा से संबंधित है और हमें सारे शास्त्र आदि की परंपरा से मिले। मैंने बोला तो शुरू में मैंने बोला तो मैं तो यह कह रहा हूं कि किसी कारण से अगर हमें हमारे गुरुजनों का झूठ बोलना हमारा लग रहा है। ये लग रहा है कि द्वेष वश या लालच वश या भयवश झूठ बोल रहे हैं। सुनो उनके सामने हमने सिद्ध कर दिया। सुनो तो उनके सामने हमने सिद्ध कर दिया। ये देखो अष्टाध्याय से आपका मैच नहीं खा रहा है। फिर वो वो कह रहा है कि नहीं अष्टाध्यायी से मैच हमारा खा रहा है। तो इसका मतलब वो लोग झूठे लोग हैं। उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। एक सूत भी नहीं किया जा सकता। और जब एक सूत गलत है। क्यों गलत है? अर्ध कुकुट न्याय नहीं अर्ध कुकुट न्याय करोगे यहां? हां तो क्या दिक्कत है? अर्ध कुकुट न्याय कर दोगे? किसी व्यक्ति की कोई एक बात गलत हो तो सारी बात गलत हो जाती है क्या? अब बस बस अब इस पे मनन करो अब तुम। और इसमें एक और शब्द वैसे इसका उत्तर देयर है वो हमारा शब्द प्रमाण नहीं रहा। ये है पॉइंट ये है कि वैसे मैं इसका उत्तर दे भी चुका हूं। इसका उत्तर मैंने आपको कम से कम पांच बार मैंने रिपीट

02:18:43:22 किया कि ये बात तब बोला जा सकता है जब वेदार्थ परंपरा से आ रहा हो। है ना? और अगर हम लेकिन परंपरा से नहीं आ रहा है। हमारा तो आ रहा है वेदार्थ परंपरा से। तो जब सयास्काचार्य ने बोल दिया कि वेदार्थ की परंपरा नष्ट हो गई तो कहां से आ रहा है? नष्ट नहीं हुई। वो प्रायः लुप्त हो रही है। इसमें लेना पड़ेगा। लुप्त हो गई है अगर वह लुप्त ही हो जाएगी तो फिर लुप्त हो गई तो बिल्कुल कोई है ही नहीं बताने वाला वहां ईश्वर को जाना पड़ जाएगा इसका मतलब और बात है कि शाखाएं भी लुप्त हो चुकी है ये भी लीजिए तो शाखाएं लुप्त हो रही है मैं तो बोल रहा हूं लुप्त हो रही है लुप्त होना और झूठ बोलने में अंतर है जहां लुप्त हो रही है वहां सुनो जहां लुप्त हो रही है वहां बोला जा रहा है भैया हमारी स्मृति छीन हुई हम यह नहीं बता पाएंगे इस विषय में मगर जिस विषय मगर जिस विषय में हम बता रहे हैं उस विषय में हमें नकारा नहीं जा सकता है हमारी क्रेडिबिलिटी नहीं आ सकता है। नहीं आपने तो यह स्वीकार किया ना कि जो हमारे आचार्यों का जो भाषा है वो वेदांगों के अनुकूल है। आपने स्वीकार किया ना इस चीज को। हां माना कि नहीं और क्या है ना? अब आप ही की परंपरा से मान लीजिए हमने वेदांग पढ़े। ठीक है? अब पढ़ के जब हमने वेदांगों से अर्थ किया तो हम देखेंगे कि यार इसमें और जो एक 200 साल पहले का आचार्य हुए थे शणाचार्य 400 साल पहले हुए थे मान लीजिए तो उनके भाष्य से और इधर तो विरोधाभास आ रहा है। तो हम पूछेंगे ना कि ये विरोधाभास क्यों आ रहा है? इसका उत्तर कौन? मेन मेन जो विरोधाभास आया है वो व्याकरण इत्यादि

02:19:59:01 विषयों में कम आया है वो ऐसे विषयों में ज्यादा आया है कि ईश्वर अवतार कैसे ले सकता है यहां अलंकारिक व्याख्या ना ना ऐसी बात नहीं है ऐसी ज्यादातर पलटा हुआ है मैं आपको समझाता हूं कैसे खेल पलटा समझाता हूं सायनाचार्य ने बोला है इससे विषय बदल इससे विषय बदल जाएगा विषय नहीं बदलेगा विषय यही है विषय यही है ये जो मैंने बात बोली है इसको अभी थोड़ी देर छोड़ दो इससे क्योंकि मेरा विषय बदल सकता है मूल बात ये है तो हो एक बार थोड़ा सा पूरा हो जाए। मैं थोड़ा सा बस दो लाइन ऐड करना चाहता हूं। कि सायनाचार्य जी तो बोलते हैं कि नहीं वेद में तो कोई वेद तो केवल कर्मकांड की पुस्तक है। वेद का प्रयोग तो केवल यज के लिए होना चाहिए। अब बताइए जब ऐसे ही वो इस मानसिकता से वेद का अर्थ कर रहे हैं तो कैसे मान रहे हैं? मैं उन्हीं के आचार उन्हीं के आचार परंपरा में उन्हीं के भाई आई क्यों लिख दे रहे पंचदशी जहां ब्रह्म की व्याख्या हो रही है तब तात्विक विवेचन हो रहा है। अगर ऐसा इसलिए वह तो इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि वेदांत की परंपरा आ रही है ना अद्वैत वेदांत की तो उन्होंने उस आधार पर लिखा तो वेदांत को वेदांत को वेदांत के रूप में नहीं कहते क्या वो वेदांत को अलग मानते हैं क्या उन्होंनेशन किया वेदांत जो है वो तो वेदांत परतय प्रमाण है ना मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं क्या वो वेद प्रमाण वो वेद के बाहर मानते हैं क्या वेदांत को परतय प्रमाण स्वत अरे भाई मैं बात

02:21:14:04 ये हो रही है क्या वो उसको वेद विरोधी मानते हैं क्या अरे क्योंकि जिस वेदांत के आप कह रहे हैं ना उसके इंटरप्रिटेशन कई तरीके से हो सकते हैं। तो कौन सा इंटरप्रिटेशन ठीक है इसके पूरा सुनिए पूरा सुनिए पूरा सुनिए किसका जैसे उसका अद्वैत पर फर्क है विद्वत पर है पर उसके जो इंटरप्रिटेशन है वो कौन सा सही है इसका इसीलिए वो क्या है वो प्रत्यय प्रमाण है तो उसकी जो जांच होगी ठीक ठीक इंटरप्रिटेशन कौन सी वो वेदों के आधार पे होगी तो वेद ही स्वत प्रमाण है वेदांत के आधार पे आप नहीं कर सकते मैं ये नहीं कह रहा कि वेदांत के अरे क्या बात कर रहे हो तुम गलत जा रहे हो तुम मैंने ये कहा कि वेदांत के आधार पर वेदार्थ कर रहे हैं मैंने यह कहा कि अगर वो वेदार्थ सिर केवल कर्मकांड के लिए कर रहे थे। मतलब उसमें तात्विक विवेचन देख ही नहीं रहे थे। तो जिन्होंने उन्हें आज्ञा दी थी यह करने की जिन्होंने उनसे कहा था उन्हीं ने तो पंचदशी लिखा। हां तो वो तो पॉइंट वही है ना कि उपनिषद में तो अगर वो अगर वो वेद अपने आप को वैदिक नहीं मान रहे होते वेदों का आश्रय नहीं लिया होता तो काहे के लिए पंचदशी लिखते। तो किसी की एक बात थोड़ी ना मानी जाती। उन्होंने तो लिखा नहीं। पहली बात एक बात। दूसरी बात उन्होंने तो लिखा किसने लिखा है? उनके भाई ने लिखा ना आपने बोला ना अभी तो भाई उसी ने तो आर्डर दिया था कि भैया वेदों पर भाष्य कर दो तुम मेरे पास समय नहीं है पॉइंट इसके अंदर ये है कि

02:22:29:08 जैसे वो ये कह वो ये जो पंचदशी उन्होंने किया वो प्रस्था के आधार पे किया अंदर तो उपनिषद आ रहा है ना मैं मैं ये नहीं कह रहा कि उन्होंने मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं यह कह रहा हूं कि वो वैदिक मानसिकता के थे कि नहीं तुम मेरी बात समझ नहीं पाए तुमने एक आरोप लगाया कि उन्होंने वेदों का आधार कर्मकांड माना है। उन्होंने खुद लिखा है। अरे तो मैं तो किसी की केवल एक बात को लेकर के क्यों माना जाए भाई उसको जो व्यापक दृष्टि है उससे देखोगे ना? अच्छा नहीं वो जो सामने और सायन के भाष्य में जो ये विद्या की बातें हुई है उसपे भाष्य किया तो है उन्होंने। तो वो तात्विक विवेचन हो गया। उन्होंने भले ही उसको कर्मकांड कह दिया मगर उसमें तात्विक विवेचन तो कर रहे हैं सायन। अरे तात्विक विवेचन वो थोड़ी कर रहे हैं। वो तो कर्मकांड के लिए बोल रहे हैं साफ-साफ। अरे भैया वहां विद्या की बात क्यों कर रहे हैं फिर पॉइंट अब जैसे विद्या को भी कैसे ले रहे हैं कर्मकांड विषय ले रहे हैं वो तो ये तुम बताओगे कि अगर उन्होंने एक जगह लिख दिया उन्होंने कर्मकांड की कर दी उन्होंने अपने वाक्य में जैसे कोई कोई अपने वेद भाष्य लिखता है तो वेद भाष्य की भूमिका लिखता है उस भूमिका में बताता है कि मैंने वेदभाष्य कैसे कर रहा हूं क्या कर रहा हूं और सायन ने भी जैसे स्वामी दयांद ने अपनी वेद भाष्य की भूमिका लिखी है वैसे सायरन ने भी लिखा हुआ है उसी भूमिका उन्होंने उसमें कर्मकांड की प्राचुर्यता देखी तो लिख

02:23:44:14 दिया उसमें क्या इसका मतलब इसका वेद का इसका अर्थ यह नहीं है इसका अर्थ ही नहीं इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने उसमें तत्व ज्ञान नहीं देखा वेद में हां तो आप दिखा दो कि वेद में कहां तक तथ्य ज्ञान उन्होंने लिखा अपनी भूमिका में मैं कह तो रहा हूं विद्या वाले पार्ट में उनको नहीं लिखना चाहिए था वहां समझाना ही नहीं बहुत अच्छा समझा दिया उन्होंने भूमिका में बोल दिया ना कि जितने अरे भूमिका में बोल दिया तो वो बाद वाला छोड़ दोगे जो उन्होंने यजुर्वेद के भाष्य में लिखा है 40वें अध्याय में उसको हम समझेंगे ना कि कौन सी दृष्टिकोण से लिखा है जो दृष्टिकोण दृष्टिकोण तो साफ पता लग रहा है वहां तत्व ज्ञान है। नहीं तो आप थोड़ी डिसाइड करोगे क्या है क्या नहीं आप डिसाइड कैसे कर रहे हो जी क्या सोचते हैं डिसाइड की बात से ही कोट करके कर रहा हूं ना अपने चलो ठीक है शनाचार्य ने क्या कोट किया है तुम्हारे पास कैसे आया चलो इस पे आ जाओ ठीक अरे परंपरा से ही मैं परंपरा से आया तो सुनो तो सुनो अरे अभी अभी दुर्जन तोष न्याय से तुम वो वाली मान रहे हो ना वेदार्थ की परंपरा अभी मैं शारणाचार्य की परंपरा की बात कर रहा हूं तो सायनाचार्य ने क्या लिखा क्या माना क्या कहा ये तुम्हें कौन बता रहा है कौन दे रहा है छाप के बुक यानी पॉइंट इसके अंदर क्या है कि मान लो अरे भैया मैं बोल रहा हूं मैंने आप ही के आचार्य से पढ़ा तो भी तो मेरा जो आचार्य जो मैं मेरा आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य ने ये लिखा और मेरा ही आचार्य बता रहा है कि शारणाचार्य उसमें तत्व ज्ञान भी देखते थे

02:24:59:18 वेद में अच्छा दिखाओ आचार्य बता रहे हैं जरा ऐसा दिखाओ मेरे पूरी के शंकराचार्य बता रहे हैं पूरी के शंकराचार्य बता रहे आपके दुनिया भर के आचार्य की वीडियो शंकराचार्य की ओर से बोलने वाला प्रामाणिक कौन है मैं कि तुम और बात ये है नहीं उसमें बात ये है कि अगर शंकराचार्य ने कोई बात गलत बोली तो शास्त्रों तो चेक होगा कि नहीं हुआ? फिर वही बात आ गई। अभी बात क्या चल रही है? साणाचार्य क्या सोचते थे? क्या नहीं सोचते थे? ये कौन बताएगा? तो जबरदस्ती इस पे ला रहे हो। बात तो सब चल रही है। बात देखो अभी बात ये चल रही साचार्य तो उन्हें कर्मकांड नहीं मानते थे। तो तुम्हें इस पे आ गया कि अगर तुम्हें उनका एक कोट मिल गया है। मुझे नहीं जरूरत है उनकी कोई किताब लाने की मिल जाएगी तो दे भी दूंगा जिसमें उन्होंने तत्व ज्ञान की बात की हो वेद में। मगर वो क्या सोचते थे, क्या नहीं सोचते थे? ऑथेंटिकली बताने वाला उनसे जो प्रामाणिक रूप से जुड़ा हुआ व्यक्ति वही बताएगा ना। नहीं वो तो गलत भी तो बोल सकता है ना तो गलत बोल सकता है तो वो तुम्हें छपी हुई किताब भी तो गलत बोल सकता है फिर तुम यह भी क्लेम मत करो कि उन्होंने यह लिखा आप उसमें न्यूट्रल हो जाओ उन्होंने क्या लिखा क्या नहीं लिखा मुझे नहीं पता यही मेरा कहना है कि जब तुम्हें वेद प्रमाण उनका डायरेक्ट जब हमें उनका डायरेक्ट शब्द प्रमाण मिल रहा है तो किसी तीसरे किसने किसने दिया वो शब्द प्रमाण उनका डायरेक्ट उन्होंने दिया मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट मिल रहा है मैनुस्क्रिप्ट उन्होंने दिया मिल रहा है ना उन्होंने दिया नहीं तो वो वो यहां पे मेरे सामने थोड़ी है अभी शंकराचार्य कोई बीच में कोई बीच

02:26:14:19 में विश्वास पात्र है ना जो ये बोल रहा है ये उनका मनुस्क्रिप्ट है कोई बीच में है ना मध्यस्थ ये भी नहीं पता कि जो ईश्वर ने वेद दिए थे वही वेद दिए थे वही तो मेरा कहना है कि जब उनके मंत्रों पर विश्वास सुनिए तो जैसा आपने बोला कि शंकराचार्य बताएंगे कि शराणाचार्य ने क्या शंकराचार्य शराणाचार्य थोड़ी दूर क्यों क्योंकि हमारे लिए वो शब्द प्रमाण है। हम उनका किसी भी मामले में विरोध नहीं करेंगे। यही मेरा कहना है कि विरोध करेंगे तो क्यों नहीं करेंगे? विरोध तो हो रहा है ना साफ़। तो फिर हम अपने आप को वैदिक नहीं कहेंगे। हम अपना नया अलग से बना लेंगे। नहीं हम तो कहेंगे ना तो तो तुम सिद्ध करो तुम्हारा वैदिक होना स्वतंत्र रूप से बिना गुरु परंपरा के नहीं गुरु परंपरा इसमें क्या है अभी देखो जैसे यहां पर ये वाली बात मैंने कहीं आपके ही शास्त्रों से टकरा रही है तब आप अपनी परंपरा को ही खत्म कर दे रहे हो पॉइंट याद मैं ये नहीं कह रहा हूं मैं परंपरा को खत्म नहीं कर रहा हूं तुम मेरी बातों को गलत मतलब निकाल रहे हो अभी जैसे शणाचार्य की बात करी तुमने माना कि उन्होंने कर्मकांड कहा है अब मैं जब इस पर आ गया कि भैया जब उनकी चीज तुम्हें किताब प्राप्त कैसे हुई परंपरा से उनकी परंपरा से तो उनकी परंपरा का जो व्यक्ति तुम्हें किताब दे रहा है वही व्यक्ति बताएगा कि उनकी सही मानसिकता क्या थी। अब उनकी उनकी परंपरा का व्यक्ति बता रहा है। उनकी मानसिकता तात्विक भी थी। तुम कह रहे हो वो झूठ बोल रहा है क्योंकि उनकी किताब में तो केवल कर्मकांड लिखा है। उन्होंने ये नहीं लिखा तत्व ज्ञान है ही नहीं वेद में। उन्होंने ये लिखा कि कर्मकांड है। मगर तुमने अपने आप उनको तत्व ज्ञान का विरोधी मान लिया वेदार्थ

02:27:29:27 में। मगर ठीक है। मान भी लिया तो जो व्यक्ति तुमको ये झूठ बोल सकता है कि उनके वो तत्व ज्ञान देखते थे। वेदार्थ में वही व्यक्ति तुम्हें झूठी किताब भी तो दे सकता है। तो इसीलिए मेरा कहना है कि जब हम परंपरा से प्राप्त होने वाले अर्थ पर विश्वास नहीं करते हैं या फिर सायनाचार्य की परंपरा से प्राप्त होने वाले जो गुरुजनों द्वारा कहे जाने वाले वाक्य सायनाचार्य के संदर्भ में उस पर जब हम विश्वास नहीं करते हैं तो हमें उस बुक पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए जो हमें उसी गुरु परंपरा से मिली है जिसमें लिखा हुआ है कि कर्मकांड की प्राचुर्यता है। पहली बात तो उस स्थिति में आपको अपने आप को न्यूट्रल मानना पड़ेगा कि भैया उसमें क्या लिखा था क्या नहीं लिखा था हमें नहीं पता हमारा यह है इस विषय में तो ऐसे ही तो यही बात चाहे जितना पूछ लो अंत में यही बात आएगी अगर तुमने हमको गलत साबित कर भी दिया तो तुम वैदिक सिद्ध नहीं हो पाओगे वेद को तुम खत्म करोगे वहां तर्क खत्म हो जाएगा फिर वहां पर आपके पास सिर्फ अपनी बातें रह जाएंगी वहां तर्क नहीं है फिर लॉजिक खत्म वहां पर

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02:28:30:21 अच्छा एक बात बताइए हां अगर अगर मान दीजिए कि विरोध होता है तो फिर किससे पूछेंगे तो विरोध पूछो ऐसा तो तुमने अभी कोई विरोध बताया नहीं सर्वशक्तिमान की बात मैंने तरह-तरह से सिद्ध कर अभी तो देखिए पॉइंट तो वही है ना आपने सिद्ध तो कुछ भी नहीं किया सर्वशक्तिमान पे तो अभी बात ही नहीं हुई सर्वशक्तिमान पे तो आप अपने तर्क से भी सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं कर पाए क्या देखो ना देखो अगर ऐसी बात है तो तुम उसका खंडन भी नहीं कर पाए हो अगर अगर किया मैंने बोला कि सच्ची की सिद्धि हो रही सर्वशक्तिमान की सिद्धि नहीं हो रही मैंने किया मैंने भी किया है मैंने भी किया निर्गुण से सगुण पे तुम कह रहे हो वो

02:28:58:28 इच्छावान है बस फिर शक्तिमान भी मान रहे हो शक्ति का पूछ रहा हूं तो वो बस उसके आगे आप पूछो मत आपने कहा उसके आगे पूछो मत सामर्थ के आगे वह क्या है पृथ्वी को धक्का लग रहा है कि नहीं लग रहा है वो क्या है साकार एक देसी वस्तु होनी चाहिए साकार बताओ ना पृथ्वी पृथ्वी सरकी कैसे मुझे बताओ थोड़ा प्रैक्टिकली नहीं आप मुझे आप मुझे बताइए आप सगुण ईश्वर को साकार एक

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02:29:20:28 देश मानते हैं सगुण ईश्वर वो होता है जो सगुण निराकार ईश्वर वो होता है जो मैं बताऊंगा सगुण निराकार ईश्वर वो होता है जो अपने आप को रेगुलेट कर सकता है कि मैं साकार साकार एक देसी मानते हैं या नहीं मानते? साकार दिखता है एक देसी है। नहीं साकार एक देसी दिखता है दिखता नहीं है। साकार एक देसी है कि नहीं ये बता दीजिए। एक नहीं है तो धक्का नहीं लगा सकता। बात खत्म हो गई। अगर नहीं है साकार एक देसी नहीं है तो धक्का नहीं लगा सकता। एक देसी है तो धक्का नहीं लगा सकता। मतलब अगर साकार एक देसी मानेंगे तब तो धक्का लगाना। आपके आपके ही वचनों के अनुकूल हम तो नहीं मानते। लेकिन

02:29:57:01 सर्वव्यापक होते हुए भी एक देसी है। ऐसे है वो जैसे सगुण निराकार निर्गुण होते हुए भी सगुण है। मैं पूछ रहा हूं साकार एक देसी है कि नहीं है? क्योंकि धक्का लगा अगर कोई वस्तु किसी दूसरे वस्तु को धक्का दे रही है तो उसके लिए उसका साकार हो क्योंकि लक्षण में तो हमें ही दिख रहे हैं भाई जो भी हम देखते हैं कि या तो धक्का लगाने के लिए उसका साकार होना है और दूसरा उसके कांटेक्ट में साकार हो एक देश तभी उसका धक्का लगा पाएगा। हम है ना? जैसे जैसे जैसे बैट जैसे बॉल है बॉल को बैट ने हिट किया तो जो बैट तो बॉल मूव कर गई है ना? तो बॉल मूव क्यों की क्योंकि उसको एक बैट साकार वस्तु एक देश वस्तु ने किया तो वैसे ही अगर आप मान रहे हो कि ईश्वर भी धक्का लगा रहा है तो आपको मानना पड़ेगा ईश्वर भी साकार एक देश है मानो बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल अपने को रेगुलेट करता है ठीक है ठीक है आप इसी पे रुकिए इसी पे रुकिए यानी आपने माना कि जो आपका ईश्वर है वो साकार एक देश है व्यवहार वाला है ना सर्वव्यापक होते हुए भी सर्व्यापक अगर वही पॉइंट है ना यही बात है ना तुम ऐसे कह रहे हो देखो मैं बताऊं तुम क्या कह रहे हो जैसे मैंने कोई बुक उठाई तो तुम कह रहे हो कि आपने नहीं उठाई आपके हाथ ने उठाई तो मैं कह रहा हूं मैं होते हुए भी मेरे हाथ से बुक उठा रहा हूं

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02:30:56:28 आप जीव भी तो एक देसी है। नहीं एक देश है। मगर बुक के बुक के एंगल से तो मैं उसके अनुपात से तो बड़ा सिद्ध हो रहा हूं ना। फिर मैंने बुक उठाई कि नहीं उठाई? नहीं मेरे हाथ ने उठाई। ये कोई बात है क्या? इसी तरीके से इसी तरीके से निर्गुण ने ही सृष्टि बनाई। सुनो सुनो। निर्गुण ने ही सगुण सृष्टि निर्गुण ने ही सृष्टि की। मगर किस किसके द्वारा? अपने सगुण रूप के द्वारा। निर्गुण रूप के द्वारा वो सृष्टि कर ही नहीं सकता। क्योंकि मैं पूछ ही नहीं रहा हूं। मैं पूछने निर्गुण तुम क्यों पूछ रहे हो? अभी सवाल तो मेरा चल रहा है। तुम वहां पृथ्वी मूव कैसे की यह बताओ। नहीं पॉइंट अच्छा ये अब ये कौन सी बात आई कि मैं नहीं पूछूं? क्योंकि निर्गुण सगुण क्योंकि निर्गुण सगुण की बात चल रही है ना तुम दूसरे विषय को खोल रहे हो। नहीं मैं बता देता हूं ना मैं बताता हूं। क्यों पूछा मैंने

02:31:40:19 आपने जब वो बोला ना कि धक्का लगाता है। आपने बोला ना कि नहीं धक्का लगाता है धक्का लगा। मैंने उसी पे ही मैंने आपको धक्के वाले पे ही प्रश्न किया ना कि धक्का लगाने के लिए उसका सगुण एक साकार एक देश होना जरूरी है। तो क्या आप ईश्वर को तो क्या आप ईश्वर को साकार एक देसी मानते हो अपना? नहीं मानते ध्यान से सुनिए सर्व्यापक होते हुए भी साकार एक देश पॉइंट सुनिए जो ईश्वर सृष्टि बना रहा है धक्का लगा के बना रहा है ना आपके मंतव्य में हां यानी जिस ईश्वर ने और धक्का लगाने के लिए उसका साकार एकदेशी होना जरूरी है यानी आपके यानी आपके हिसाब से जिस ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है वो साकार एक देश है ना सर्वव्यापक होते हुए भी यही तो पॉइंट है हो तो रहा है तभी तभी तो आपको वहां पे अवतार मानना पड़ेगा वरना पृथ्वी पे धक्का सिद्ध कर दो आप वहां पे आप सिद्ध नहीं कर रहे वहां आप इच्छा इच्छा बोल के हट जाते हो इच्छा है वहां बल नहीं अवतार मानना पड़ेगा नहीं मानना पड़ेगा बाद की बात है पहले मैं आपसे पूछ रहा हूं यही तो बात है वहां तुम वहां वाले मामले में तुम कमजोर हो वहां वो तुम खुल के बात मैं कमजोर नहीं हूं अभी उसप बात ही नहीं हो रही है ये क्यों नहीं उसी पे तो बात हो रही है निर्गुण अभी तुम रिकॉर्डिंग सुन लो मैंने निर्गुण

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02:32:45:20 ये जो बीच-बीच में ये जो इस तरीके से करते हैं ना कि मतलब एक थोड़ा सा क्या बोलते हैं उसको एक मोनोपोली सेट करने का प्रयास यहां पे तुम दब रहे हो। यहां पे तुम कमजोर पड़ रहे हो। यहां पे तुम ऐसे कर रहे हो। ये चीजें मैं नहीं करता। लेकिन यहां पे ऐसा नहीं करूंगा। नहीं मगर मैंने एक देखा है तो ऐसी चीजें होती है कि रिकॉर्डिंग लेने की टेक्निक्स होते हैं। ठीक है? ये चीज़ ठीक नहीं है। नहीं ऐसा कुछ नहीं है। तुम गलत सोच रहे हो। ऐसा कुछ नहीं है। वो एक एक जो एक्साइटमेंट होता है। इसमें कोई सोची समझी प्लानिंग नहीं होती है। इसमें एक एक्साइटमेंट होता है। अंपायर हाउस दैट वाला। तो मैं वैसे कह नहीं रहा कि प्लानिंग है लेकिन वो एक आदत होती है तो बस उसी नहीं वो अगर तुम याद दिलाओगे तो मैं उसको ओवरकम करने की कोशिश करूंगा मैं समझता हूं उस चीज को वो

02:33:22:12 निकल गया मुंह से मगर ऐसा कुछ नहीं कि मैं सोच समझ के कर रहा हूं मैं ये कह रहा हूं कि जितनी बार निर्गुण सगुण की बात अभी तक हमारे बीच में आई है तुमने वहां से मतलब वहां पे कट जो निर्भय आर्य है जो निर्भय आर्य है जिस तरह से बात करने वाला निर्भय आर्य ने अपने स्वाभाविक लक्षण के अनुसार वहां पर प्रस्तुतीकरण नहीं दिया है निर्गुण और सगुण वाले विषय में वहां वो बचता है। सबसे पहली

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02:33:46:16 बार तो तुमने यही कह दिया था निर्गुण सगुण वाले में कि जो है बस यही तक मानता है आर्य समाज तो ये पहली बार की बात है। मैंने तो निर्गुण सगुण पूरा समझाया था। मैंने बोला कि प्रत्येक वस्तु निर्गुण सगुण मैं तुम्हें रिकॉर्डिंग भेज दूंगा। पहली वाली भी पढ़ी होगी। सामने बोल रहा हूं ना रिकॉर्डिंग। अरे तुमने मैं तुम्हें मैं ये मैं बता रहा हूं अभी तक कहां-कहां पे हमारा इस मामले में इंटरेक्शन हुआ है। तो वो बता रहा हूं। पहली बार तुमने यह कह दिया था कि नहीं नहीं वो आर्य समाज जो है यहीं तक मानता है वो बस मतलब इस बारे में फिर बात नहीं थी मैंने भी उसको नहीं है वो भी तो बोलिए ना कहां तक मैंने बोला बताइए बस वो वो सगुण ही मानता है वो सगुण निर्गुण एक मैंने

02:34:19:20 उसको खोलना चाहा था तो तुमने उसको बात को खत्म कर दिया था मतलब उसमें बहुत ज्यादा क्लेरिटी नहीं थी ठीक है मैं ये पहली बार की बात है फिर दोबारा हुआ तो तुमने कहा वो बल नहीं है वो इच्छा है तो इच्छा जो है पृथ्वी को प्राप्त हो रही है समझा देता हूं आगे बढ़िएगा बाद में पहले मैं सगुण निर्गुण वाला बोल देता हूं हां सगुण निर्गुण वाले पे जब मैंने आपसे ये वाला पॉइंट बोला था ना कि हम जो सगुण मानते हैं तो मैंने आपसे ये बोला था अब तुम एक काम करो तुम तुमने बोला क्या था छोड़ दो उसको हटाओ उसको डिलीट अभी मिसकोट कर रहे हो मैं मैं उसको मैं उसको मैं तुम्हें बता रहा हूं ना ही मैं उसको सुनूंगा मैं उसको डिलीट मार दूंगा तुमने जो कुछ बोला होगा तो तुम उस अभी फ्रेश व्याख्या दे दो निर्गुण सगुण की क्या है मैंने आपसे पहले ही बोला था कि जो विशिष्टा इसमें इसमें माना जाता है ना सगुण निर्गुण हां ठीक है कि उस उस दृष्टिकोण से मैंने कहा था कि अभी भी अभी भी तुम कुछ मत करो तुम अपनी फ्रेश व्याख्या दो वो छोड़ दो विशिष्टा द्वैत सब कुछ को अपनी निर्गुण सगुण की व्याख्या दो अब उसमें देखिए मैंने तो आपको पहले बताया था कि निर्गुण सगुण हर वस्तु जो होती है निर्गुण सगुण होती है ठीक है कुछ गुणों से सहित कुछ गुणों से रहित इसलिए उसको निर्गुण सगुण बोला जाता है पॉइंट आ जाता है मतलब हमारा हर तरीके से एक रस नहीं है पहली बात तो हम ये मान ले कुछ गुणों में एक रस है कुछ गुणों में जो है कम ज्यादा है एक रस का मतलब क्या होता है एक रस इसको ईश्वर को एक रस का मतलब समझा दो एक रस की सिद्धि कैसे एक से नित्य बिल्कुल कहीं भी

02:35:34:24 अभाव नहीं कि यहां इतना है, यहां ज्यादा है, यहां कम है। ये नहीं बिल्कुल इक्वल हर तरह से एक रस।

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02:35:40:19 हां। तो अब इसी को समझाता हूं। अब इसी को सुन लीजिए। जब हमने बोल दिया कि हर तरह से एक रस है। तो यानी कि अगर मान लीजिए ईश्वर सर्वज्य है। है ना? तो एक रस का मतलब तो ये सीधा-सीधा बनेगा कि लंदन में का ईश्वर भी जो लंदन में व्यापक ईश्वर है वो भी सर्वज है। भारत में व्यापक ईश्वर वो भी है। है ना? अब इससे इस बात का क्या संबंध हो गया कि नहीं कुछ गुण है कुछ गुण नहीं है। इसका क्या संबंध हो गया? तुम कह रहे हो ना कि बिल्कुल। अरे अभी तुमने कहा ना यार मैं तो तुमसे पूछ रहा हूं। तो मैंने बताया ना? तुमने कहा कुछ गुणों में वो एक रस है कुछ गुणों में नहीं भी है। हां तो तो मैं इसमें नित्यता अनित्यता कहां से आ गया? अरे तो एक रसता भंग हो रही है ना। कुछ गुणों में है कुछ गुणों में नहीं है। बताइए नहीं कैसी बात कर रहे हो आप? हां ये बताओ कितनी ये तो कितनी बेसिक सी लेवल की बात है। ये सोचो। अच्छा तुम तुम व्याख्या दो अपनी। अब देखो ये ये तुम्हारी मोनोपोली है। ये जो हंसते हो कहते हो कितनी बेसिक सी वाली है। हो सकता है। हो सकता है।

02:36:30:28 तो अब इसमें जैसे ये पॉइंट है कि जैसे कोई जैसे अग्नी है ठीक है वो गर्म है लेकिन ठंडी नहीं है यानी उसमें गर्मी है लेकिन ठंडी नहीं है तो ये वाला हां हट गया पेन पेन तो एक सेकंड तो अब जैसे अग्नि है वो गर्म है वो ठंडी नहीं है ठीक है इस वाले केस में क्या हो रहा है कि उसमें अग्नि उनमें गर्मी के गुण है लेकिन कुछ गुण नहीं भी है तो उसी प्रकार से दुनिया की हर वस्तु में जैसे ईश्वर सच्चिदानंद है ठीक है लेकिन दुख ही नहीं है तो सच्चिदानंद का जो है उसके अंदर तो इस दृष्टिकोण से सगुण है और जो दुख राग आदि ये सब नहीं है तो इस दृष्टिकोण से निर्गुण अब वो एक रास्ता वाला पॉइंट ये आता है कि ईश्वर सर्वव्यापक है और कहीं ऐसा तो नहीं कि लंदन वाला ईश्वर सच्चिदानंद है और भारत वाले ईश्वर सच्चिदानंद नहीं है तब उसकी एक रास्ता भंग होती है ऐसे भंग नहीं हो जाती कहते कोई गुण है कोई गुण नहीं है तो भंग हो गई ये कौन सी बात कौन से गुण है उसमें और कौन से नहीं है हां तो वो तो आर्य समाज का जो दूसरा समुलास है उसमें मुख्य मुख्य मेजर मेजर गुणों का अधिक दिया है। हम सर्वशक्तिमान सर्वंतमी अजर अमर नित्य पवित्र सृष्टि करता आदिआदि जो है वह मेजर मेजर उसके गुण है। सर्वशक्तिमान से वो एक रस है ना। हां ठीक है। यानी

02:37:46:07 कि फोर्स की दृष्टि से वो एक रस वाला है। फोर्स की दृष्टि से एक रस वो तो इच्छा हो गया ना। फोर्स क्या होता है? तो फिर शक्तिमान क्यों लिख रहे हो? इच्छा मान लिखो। अच्छा सर्वशक्तिमान का इच्छा अर्थ क्या होता है? सर्वशक्तिमान सब कुछ कर सकने वाला जो सब कुछ कर सकने का सामर्थ रखे जिसमें सब कुछ कर सकने के वो हो बल हो क्या ठीक है अब अब आपने बोला कि सर्वशक्तिमान का अर्थ होता है सब कुछ कर सकता है ठीक है अब मुझे ये बताइए कि आपको कैसे पता चला कि सर्वशक्तिमान अरे तुम देखो फिर टॉपिक चेंज कर रहे हो टॉपिक नहीं तो अपनी व्याख्या क्यों नहीं दे रहे हो सर्वशक्तिमान पे लाइन मैंने क्या पूछा है मैंने पूछा क्या था तुमसे मैंने पूछा क्या था तुमसे अभी मैंने पूछा था क्या वो शक्ति के गुण से बिल्कुल एक रस है सभी जगह कि नहीं तुमने उसका जवाब आपल पूछा शक्ति का मतलब क्या समझते ना जब वो बल मैंने आपको पहले मतलब आप कुल मिलाके मुझे आप हां हां बोलो बोलो अब बात ये है कि जब मैंने आपको पहले ही बता दिया कि जो बल वाला जो विषय है वो तो इच्छा से संबंधित है अब आप उसे अब उसे सर्वशक्तिमान से जोड़ोगे अगर अगर मेरे भाई वो इच्छा से देखो दूसरी जगह चली जाएगी बात वही बात है अगर इच्छा से संबंधित भी है मैं कह रहा हूं क्या पृथ्वी के कण को कुछ प्राप्त हुआ या नहीं हुआ। बस ये बताओ कोई

02:39:01:08 क्या प्राप्त हुआ उसे? एक सेकंड रुकिए। हां। हेलो हम हां तो अब बात ये आ जाती है कि जब मैं कह रहा हूं कि आपने बल वाला विषय छेड़ा। अब मेरे को जब मेरी जब मेरे अकॉर्डिंग वो बल से संबंधित उस टाइप से है नहीं। क्योंकि सर्वशक्तिमान में बहुत सारी चीजें आ जाती है। इसीलिए तो मैं कह रहा हूं ना निर्भय। सर्व शक्तिमान में देखना है। तो देखने को बल मान लेंगे। मैं समझ गया। मैं यह कह रहा हूं कि तुम मुझे बस इतना बताओ अभी कि पृथ्वी को प्राप्त क्या हो रहा है? कुछ फोर सोर्स प्राप्त हो रही है उसे कि नहीं हो रही है? बस वो एक उसके अंदर कोई ऐसा भैया ये सारा विषय मैंने आपको पिछली बार भी इच्छा वाला पूरा कांसेप्ट अच्छे से बताया था। नहीं नहीं बताया था अच्छे से। तुम उसमें खिचड़ी पका रहे हो। सगुण निर्गुण में तुम्हारी खिचड़ी पक रही है। दृष्टिकोण से पक रही है। लेकिन चलिए कोई बात नहीं। मैं उसमें अपना ले लेता हूं। उसमें अपना भी मैं इशू ले लेता हूं तो भी उसमें हम सॉल्यूशन की ओर बढ़ते हैं। इसमें वो क्लियर नहीं है सगुण निर्गुण और वहीं पे अवतार की सिद्धि होती है। क्योंकि अगर वो शक्ति शक्ति के उससे सर्व वो है सर्वव्यापक एक रस है तो जब वो पृथ्वी इत्यादि के लिए व्यवहारिक होगा तो वहां पर वो कहीं पर कम कहीं पे ज्यादा होगा। सिंपल। तो ऐसी स्थिति में या तो यह मानना पड़ेगा कि निर्गुण ने अपने स्वरूप को बदला जो कि वह बदल नहीं सकता। बदला

02:40:16:12 तो उसकी शाश्वतता भंग हो जाएगी। तो यहीं पर अवतार मानना पड़ेगा कि वो एक और अवतार लेता है। अपने उस रूप को सुरक्षित रखते हुए नित्यता को सुरक्षित रखते हुए सगुण अवतार लेता है और अब वो जो है क्रियाशील होता है। क्रिया करने के लिए ही उसे कहीं कम कहीं ज्यादा होना पड़ेगा। मेरे भाई क्रिया हो ही नहीं सकती जब वो सही सब जगह है। हां उस दृष्टि से तत्व की दृष्टि से वो केवल इच्छा मात्र कर रहा है। मगर हमारी ओर से तो हमें कुछ ना कुछ उसका बल प्राप्त हुआ ना कि हम किसके नहीं तो हमें मानना पड़ेगा केवल वो सोचता है। उसके पास ना बल है ना कुछ है ना फोर्स है कुछ केवल सोचता है वो बस और वहां सोचने पे भी जब अगर आर्य समाज के अनुसार चलो एक बार वो अद्वैत के अनुसार तो केवल सोचता है चल भी जाएगा। आर्य समाज के अनुसार तो वो चलेगा ही नहीं। आपको क्या कहते व्यवहारिक तौर पर उसकी वो सिद्धि करनी पड़ेगी कि वो बल लगा कि नहीं लगा। ये इस तरह की बातें तो अद्वैत में है कि उसने केवल सोचा और हो गया क्योंकि माया है। ये वाली बात है। हम ठीक है। अब देखिए तो चलिए आपने अपनी व्याख्या कर दी ना। अब तो अब तुम इस पर और करो। इस पे और अध्ययन करो। मुझे जो अरे अध्ययन मेरा पूरा हो चुका है। पॉइंट

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02:41:23:25 वही जैसे अभी मैंने धैर्य पूरा आपकी बात सुनी। जब मैं बोलना चालू अरे मुझे जाना है भाई। भाई मैंने तुम्हें बताया था तैयारी चल रही मैं वर्कआउट करने जा रहा था पंपिंग आयरन बनने तुमने कहा कि फोन कर लो मैंने सोचा 15 मिनट कुछ बातें होंगी बढ़िया और उसमें बातें होते जगह कॉल पे झगड़ा हां झगड़ा इंसा नहीं हुआ मगर मेरा पंपिंग आयरन छूट गया मैं सोच रहा था कुछ तीन चार दिन के लिए जा रहा हूं तो थोड़ा सा पंप मार लूं कुछ आज बैक और बाईसेप्स का डे था फुल डे ये भी सही है हां बाकी मतलब मतलब बातचीतवाचीत थोड़ी बहुत गरमा गर्मी हो जाती है। अग्नि की तरफ से आपको कुछ बुरा लगता है। नहीं खेल में पहले से ही ऐसा कुछ नहीं है। अभी देखो मैंने अभी कितना अच्छा बोला था तुम्हारे बारे में देखो उसमें वीडियो में मैंने बहुत भाव प्रकट दोबारा से किए थे। हां मैंने वो शुरू का मैंने वो 15 मिनट देखा था। उसके बाद फिर नींद बहुत ज्यादा आ रही थी। बाद में खराब लगा होगा। शुरू में अच्छा लगा। मतलब पता है मेरे को ऐसा लगा कि यार ऐसा कोई कांसेप्ट है ही नहीं। मतलब नया जिसका मैंने खंडन नहीं कर रखा। तो मेरे को ऐसा कोई नया नहीं लगा जैसे मैंने फिर सुना नहीं आगे।

02:42:23:22 मेरे हिसाब से मैं एक बड़े भाई होने के नाते तुम्हें कह रहा हूं तुम सगुण निर्गुण पर और वो करो क्योंकि यहां पर तुम जो है क्लियर नहीं हो मेरा क्लियर है वो इच्छा वाला पॉइंट आप खंडन करिए ना कर तो दिया खंडन कि भैया यहां पे हमें प्राप्त क्या हो रहा है जैसे हमें व्यवहार में क्या प्राप्त हो रहा है इच्छा इच्छा मतलब इच्छा मतलब एक मानसिक सूचना अब जैसे मैं उदाहरण देता हूं इच्छा मतलब मानसिक समझिए समझिए जैसे पॉइंट क्या है कि जैसे आप आप समझने के लिए मुझसे पूछ रहे हैं ना समझने का्सप्ट समझने के लिए कि मानसिक मानसिक तरंगे क्या? आपने समझने के लिए बोला तो समझने के लिए ही मैं दृष्टांत दे रहा हूं अपनी तरफ से। दृष्टांत ये दे रहा हूं कि जैसे चेतन जीव है। ठीक है? जीव इच्छा करता है और मन में विचार आता है। इच्छा करता है और हाथ उठता है। है ना? तो चाहने मात्र से ऐसा तो नहीं कि जीव अलग से हाथ के नीचे आकर के धक्का मार रहा है। ये तो हो नहीं रहा। चाहने मात्र से क्या हुआ? जैसे जीव इच्छा कर रहा है। मैं इच्छा कर रहा हूं। तो मेरे इच्छा करने से मेरे शब्द मन में हो रहे हैं। मुंह से निकल रहे हैं। हाथ पैर हिल रहे हैं इत्यादि। है ना? हम हम तो ये इच्छा मात्र से ही तो हो रहा है। मैं कोई जैसे मैंने हाथ उठाया मैंने हाथ उठाया। तो क्या मैं हाथों तो मेरा जो जीव है शरीर के बाहर आकर के हाथों के नीचे से ऊपर कोई धक्का थोड़ी लगा। नहीं नहीं। अब मैं बताता

02:43:38:28 हूं। हमारी जो वो होती है माइटोकांड्रिया जहां से एनर्जी प्रोड्यूस होती है। हां। हमारे चाहने मात्र से वो एनर्जी काम करती है हम और वो एनर्जी देती है कि हाथ वो जो हमारी जो हड्डियों पे चिपकी हुई वो है ना वो सूचना के द्वारा उस मसल को ये सूचना पहुंचाती है उस मसल को कि तुमको जो एनर्जी कहां से आ रही है माइट्रोकांड्रिया से है ना ठीक है अब तुम्हें जो है वो क्या कहते हैं अगर फैला हुआ है इलास्टिसिटी है तो अब तुम्हें सिकुड़ना है तो मेरा जीव जो है वो उसकी सूचना जाती है मन को मस्तिष्क को मान लो मस्तिष्क के द्वारा नर्व्स के द्वारा उस चिपाक को जो हड्डियों से चिपकी हुई है। ठीक है? और वह जब सिकुड़ती है तो हाथ मेरा मुड़ने लगता है और जब फैलती है तो हाथ मेरा सीधा होने लगता है। लेकिन चाहने मात्र से हुआ ना ये चाहने मात्र से एनर्जी का यूज़ किया।

⬜ Not used yet · 02:44:27:18 – 02:45:52:16 (1:25)

02:44:27:18 अब दिक्कत ये है यूज़ एनर्जी भी क्यों क्यों एनर्जी क्रिया में आया? सुनो तो सुनो सुनो तो सुनो तो मैं बता रहा हूं। मैं वही मैं वही बता रहा हूं। बस बस यही तुम सही जगह आ गए। बिल्कुल सही जगह आ गए। अब यहीं पर सबसे बड़ी बात है क्या वो जो एनर्जी जो यूज हो रही है मेरे मेरे जो मेरे कांसेप्ट में तो वो एनर्जी और मैं अलग हूं ईश्वर के कांसेप्ट में वो जो एनर्जी यूज़ हो रही है वो और ईश्वर अलग है क्या ये एटीपी की बात कर रहे हैं एटीपी रूप एनर्जी की जो एनर्जी हाथ को ये कैपेसिटी प्रोवाइड करा रही है कि वो फ्लेक्स या फिर इलास्टिसिटी करे मसल्स को वो जो एनर्जी है जो ग्लूकोस से आती है हां है ना? ग्लूकोस इंटेक करते हैं। ग्लाइकोजन हमारा होता है जिसकी वजह से वो एनर्जी प्रोड्यूस होती है माइटोकांड्रिया इत्यादि से। वो एनर्जी जो है वो तत्व और मैं यानी मेरा जो जीव है जो ऑर्डर दे रहा है वो अलग-अलग है मेरे कांसेप्ट में। तुम्हारे कांसेप्ट में थोड़ा सा मैं और समझना चाहता हूं इस चीज को। आप वही कह रहे है ना कि जैसे तीन शरीर जैसे दो एक सूक्ष्म शरीर एक स्थूल शरीर है ना। मैं तो ये कह रहा मैं तो ये कह रहा हूं। नहीं मैं थोड़ा सा अपने समझने के लिए मैं पूछ रहा हूं। मैं इसी मैं और सरल बता दे रहा हूं। मैं प्रश्न तो अपना स्पष्ट कर दूं एक बार प्रश्न अपना स्पष्ट कर दू जैसे

02:45:42:26 सूक्ष्म शरीर यानी जो मन हो गया है ना मन अहंकार मुझे मैं इस तरीके से तुम्हें नहीं बता पाऊंगा मैं इस तरीके से बता पाऊंगा तुम्हें कि नहीं इसमें मैं तुम

02:45:52:16 ये बताओ एनर्जी का अस्तित्व तुम मान रहे हो कि नहीं मान रहे हो मैं उस तरीके से नहीं समझ पा रहा ना भैया इसीलिए तो मैं ऐसे बोल रहा हूं तो इस मैं इसीलिए तुम्हें समझाने के लिए बोल रहा हूं एनर्जी का अस्तित्व मान रहे हो कि नहीं मैं नहीं वो एनर्जी किस चीज की क्या एनर्जी है वो मेरे को समझना तो पड़ेगा ना पहले कुछ हां ना बोलने के लिए बिना बिना समझे मैं कैसे बोल दूं आप बताइए कैसे तो मैंने मैंने बताया था कि भैया मैं जो खाता पीता हूं वो जो कार्ब कार्ब इंटेक करता हूं आप एटीपी की बात कर रहे हैं चलो एटीपी मान लो चलो ठीक है एटीपी हां एटीपी तो स्थूल शरीर में आ गया ना जीव जो क्रिया करता है वो तो सूक्ष्म शरीर में क्रिया करता है अरे तो मेरे चिपाक को तो एटीपी मिली ना वो तो सूक्ष्म शरीर में आ गया ना तो एटीपी मिली स्थूल शरीर में आ गया ना वो तो भाई एटीपी का अस्तित्व है कि नहीं मैंने कहा मना किया अस्तित्व है कि नहीं अलग-अलग आ गया। ठीक है? तो मैं और एटीपी तो अलग-अलग होता है वो तो सूक्ष्म शरीर पे होता है। तो यानी कि यानी कि सूक्ष्म शरीर पर नियंत्रण के कारण सूक्ष्म शरीर ने एटीपी को यूज किया। ये माने सूक्ष्म शरीर क्या करता है? सूक्ष्म जैसे जीव का नियंत्रण सूक्ष्म शरीर पे है। हां हां हां उसने उसने सूक्ष्म शरीर को आर्डर दिया और सूक्ष्म शरीर ने एटीपी को यूज़ किया। अरे केवल सोचा उसने बस केवल इच्छा की। इच्छा उसने इच्छा की

02:47:08:04 हां उसने इच्छा की उस इच्छा के कारण जो मेरा सूक्ष्म शरीर है उसने एटीपी को यूज़ किया और मेरे स्थूल शरीर पे उसका जो है रिफ्लेक्शन दिखाई एटीपी एटीपी भी जो हो गया वो आपका इसी में स्थूल में ही आ गया ये होता है मैं इसको पूरा बोल देता हूं कि जैसे जीव ने चाहा और जीव का जीव के चाहने से जो है ये वो सूक्ष्म शरीर है ठीक है जिसमें मन बुद्धि चित अहंकार आ जाता है इसमें प्रतिक्रिया होती है जब इसमें प्रतिक्रिया होती है तो इसके प्रतिक्रिया के अनुकूल शरीर में क्रिया होती है अरे मेरे भाई फिर भी एक एनर्जी का तत्व लिया ना क्रिया कराने के लिए तो वो जो वो जो सारा कुछ एनर्जी का बता रहे हो ये पूरे शरीर के वो स्थूल शरीर में होगा ना तो पृथ्वी स्थूल नहीं है उससे जीव का लेना देना नहीं होता जो जीव का लेना देना नहीं होता बिल्कुल सही कह रहे हो बिल्कुल सही कह रहे हो अब मुझे ये बता दो कि मेरी मसल्स चिपाक को सिकुड़ने अथवा इलास्टिसिटी होने के लिए एक तुमने एटीपी नामक वो मानी शक्ति वो ऑर्डर्स कहीं से भी आए हो मगर उस शक्ति का उपयोग हुआ हां ठीक हां हां तो जो शक्ति का उपयोग हो रहा है पृथ्वी को खिसकाने इत्यादि में वो और ईश्वर अलग-अलग है क्या? जिस शक्ति का प्रयोग हो रहा है नहीं वो इच्छा तो उसका गुण है ना देखा बस क्या अब तुम अब बस अभी अब फिर बात करेंगे

02:48:23:20 हां क्यों क्या हुआ अब फिर बात करेंगे मुझे निकलना भी है और यहां पे तुम थोड़ा वैसा दे रहे हो धुंधला आंसर क्लियर नहीं कर रहे हो नहीं धुंधला मतलब कैसे मैं समझ गया अब यहां तुम इच्छा पे क्यों ले आए तुमने माना ना मेरी मसल्स को हिलाने के लिए एक एनर्जी नामक तत्व है जिसको तुमने एटीपी नाम दिया फिलहाल नहीं अब अब जैसे मैंने मैंने जो उदाहरण दिया था मैंने क्या दिया था मैंने उदाहरण यह दिया कि जिस प्रकार इसीलिए मैंने उसमें दो तीन पॉइंट इसलिए रखे हुए थे। अब इसमें मैंने उसमें बोला था विचार का भी बोला था। है ना विचार। अब इसमें यह होता है कि जैसे हाथ हिलाने पर तो जीव का डायरेक्ट कंट्रोल नहीं होता है। वो जैसा चाहता है उसके अकॉर्डिंग वो ईश्वर ही उसके सहायक होता है हाथ हिलाने में। ठीक है? खैर वो मैंने मोटे मोटे भाषा में बोला था। लेकिन मैंने इसलिए मैंने जानबूझ करके उसके साथ में ये शब्द भी बोला था कि इच्छा मतलब चाहता है विचार करता है। तो जीव के चाहने मात्र से मन में मतलब वो जो विचार होते हैं। ठीक है? और वो उसके खुद के सामर्थ्य से होते हैं। उसमें कोई ऐसा आप ये नहीं दिखा सकते कि अलग से कोई एनर्जी कुछ ऐसा हो ये गलत बात है फिर। फिर तो खाना खाने की जरूरत ही नहीं है। चाहने मात्र से हो जाना चाहिए। एनर्जी तत्व का विषय हो गया ना। तो भाई स्थूल पृथ्वी स्थूल है ना उसको एनर्जी चाहिए ना फिर हिलने के लिए। पूरी बात तो सुनिए। पूरी बात जब तुम जीव के चाहने मात्र से स्थूल शरीर के ऊपर एक एनर्जी का स्थूल नहीं कह रहा। सूक्ष्म कह रहा हूं। इसीलिए तो कह रहा हूं सुनते नहीं हो आप मेरी बात। आधा तुम कितना भी घुमाओ उसमें अंत में आएगा कि एक तत्व मानना

02:49:38:28 पड़ेगा एनर्जी के रूप में जो कि एक देश में हो रहा है। घुमा लीजिए कभी कि सिद्ध नहीं कर पाएंगे। कितना भी जेली भी बना लिया सिद्ध नहीं पाएंगे। अच्छा ठीक है ठीक है। गुस्सा मत हो गुस्सा मत दो हो चलो चलो आगे बढ़ो बताओ। मैं ये शब्द मैं भी बोल दूंगा ना क्या बताओ चलो बताओ है ना ऐसे नहीं बोलना चाहिए। खैर बताओ बताओ। क्या है? सुन तो लिया एक बार में। चलो ठीक है निर्भय। हां। मुझे थोड़ा पंप मारने दो फिर बात करेंगे। हां। चलिए ठीक है भैया। फिर बात करते हैं। जय श्री राम। सुन लो। घर वालों की भी सुन लो। दिन भर इसी में ना रहो। हां। चलो ठीक ठीक। जय श्री

⬜ Not used yet · 02:50:11:27 – 02:50:39:00 (0:27)

02:50:11:27 राम। ठीक है। नमस्ते। जय

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