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00:00:01:28 [संगीत][घंटी की आवाज़] तो अभी हम ब्रह्मा कुमारीज में क्या कर रहे हैं और हमें मतलब जैसे हमें पता चल गया कि आत्मा का ज्ञान ये है। ज्ञान पता चल गया कि हम आत्मा है आत्मस्वरूप है। फिर हम ब्रह्मा कुमारीज में क्या प्रैक्टिसिंग करते हैं और उस प्रैक्टिसिंग से हमें मिलना क्या है? फाइनल गोल क्या है हमारा? फाइनल जो लक्ष्य है मैंने पहले ही बताया। मनुष्य से देवता बनाने की पढ़ाई परमात्मा पढ़ाने के लिए आया है। ये इससे हमारा दुनिया के भी मतलब हम देवता बनते हैं। देवता बना पढ़ाई पढ़ा रहा। अब अगर आप पढ़ेंगे तो ही बनेंगे। नहीं पढ़ेंगे। जितना पढ़ेंगे देवताओं की भी कैटेगरी होती है। शनि का अपना काम, इंद्र का अपना काम है। विष्णु का अपना उसकी कैटेगरी ऊंची है। विष्णु जी की कैटेगरी ऊंची है। ब्रह्मा जी की ऊंची है। शंकर जी की ऊंची है। और उसे भी थोड़ा कैटेगरी स्तर कम होता है। जो जैसा यहां अध्ययन करता पढ़ाई करता है आत्मा के बारे में परमात्मा के बारे में। वो उसी तरह की कैटेगरी वाले देवत्व में पहुंचता है। उसी तरीके से उसकी पूजा भी भक्ति में होती थी। अच्छा उसके बाद देवता बनने के बाद भी कोई गोल आ गया? भैया जैसे हम डीएम बन जाए तो फिर मुझे नहीं लगता कि डीएम पद पाने के बाद कोई दूसरा कोई और मतलब फाइनल गोल यही है कि देवत्व को प्राप्त करना है।
00:01:17:15 मैंने कहा ना इस पढ़ाई से मनुष्य देव पद को प्राप्त करता। अगर पढ़ता है सही तरीके से तो जो भगवान के नियम के अनुसार चलता है तो अन्यथा नहीं। फिर वो कोई भी हो तो जो मोक्ष का कांसेप्ट है वो अधूरा नहीं लगता आपको मुझे नहीं लगता है इसलिए क्योंकि जैसे आपने कहा ना डीएम डीएम वाली बात जैसे आपने कही वो एक अलग बात है वो लक्ष्य की आपसे कही थी लक्ष्य और लक्ष्य में फर्क है जी जी मोक्ष क्या है मोक्ष जैसे आवागमन से हमारा छुटकारा होना तो देवता जब बन जाएंगे तो उसके बाद आवागमन नहीं होना हां होना वही तो मैं बता रही हूं मोक्ष कभी किसी प्राणी को नहीं मिलता क्यों कई बता मोक्ष ऐसा क्यों कहा गया? जैसे कई बार होता है ना कि आप मोक्ष कभी किसी प्राणी को नहीं मिलता है। हम मैं बताती हूं कैसे बेहतर होता है बस। हां हां मैं बताती हूं जीवन एक तरीके से छुटकारा कभी जैसे मान लीजिए हमारी आपकी कोई लड़ाई हुई तो हम परेशान होके क्या बोलते आपसे मोक्ष छुटकारा मिल जाए। भगवान मुझे इस धरती पे नहीं भेजना प्रभु। क्यों? क्यों परेशान हो के ऐसे शब्द अगर किसी का बहुत प्रेम है अच्छा है अच्छा व्यवहार है तो शायद उसके मुंह से कभी निकले कि ना प्रभु धरती पर भेजना आदमी को चाहे नफरत व
00:02:32:21 जिससे जिसका अच्छा अथवा बुरा हिसाब है उसे चुक्त करने के लिए इस धरती पर आना ही पड़ता है वो मोक्ष का सवाल नहीं उठता अगर आपने किया है तो भी उसे आप चुने के लिए आए उसकी प्रालब्ध आपको भोगने के लिए आना ही पड़ता नहीं ऐसा इसमें एक क्वेश्चन बनता है हां जी कि अ जैसे आपने कहा कि उसको किसी व्यवहार के साथ चुकता करना है तो उसको आना पड़ता है वो एक अलग बात है कि जब तक हमारे को कोई दुख देने वाला मौजूद है अगर दुख देने वाला ही नहीं होगा तो हमें क्यों ऐसा लगेगा कि हम यहां से जाएं मगर अगर अगर हम किसी से हमारी बैरभाव है भी नहीं फिर भी हमारी अपनी बॉडी की कई ऐसी चीजें हैं जिनके कारण हम लोग कई कई बार ऐसा फील कर जाते हैं कि भाई हमें जो है यहां से बेहतर कहीं पर पहुंचना चाहिए। जैसे कि जैसे कि भूख लगना, समय पर भोजन नहीं मिल रहा है। मान लीजिए नदी है, नदी नहीं मिल रही है हमें। पानी नहीं मिल रहा है पीने के लिए या फिर वो जो बूढ़ापन आता है, वृद्धावस्था आती है, चल नहीं पा रहे हैं। उठा ले भगवान उठा ले। ये कहते हैं। वहां पे हमारा कोई दुश्मन नहीं है। हम स्वतः अपनी स्थिति में वो स्थित हो रहे हैं। तो हम चाहते हैं कि हम ये जो त्रिविध
00:03:47:25 ताप है दैहिक, दैविक, भौतिक इन तापों से हमारी मुक्ति हो। जी। परंतु जैसे आपने कहा कि हम देवता ही बन रहे हैं और देवता के बाद आगे कुछ नहीं। देवता बनके रह जाएंगे। अब फिर से ये चक्र चलेगा। तो यानी कि देव मैं बता किस स्टार्ट कर देखिए क्या होता है जैसे हम कभी-कभी क्या घर में कई बार बहुत परेशान हो जाते तो कहते बस हो गया। अब इससे बात नहीं करनी। मतलब नहीं। फिर जब उसे सिर्फ सुख मिलता या किसी से थोड़ा समय में रिस्पेक्ट भी कोई कह दे देता। फिर हम भूल जाते। रहने दो कोई बात नहीं है। अभी अच्छा है हमें जीना है इसके साथ। जब स्वयं से बहुत ज्यादा त्रस्त हो जाते तब भी व्यक्ति कहता है कि मोक्ष दे परमात्मा लेकिन उस समय तक एक ही जीवन तक ऐसा होता है लेकिन उससे बेहतर एक हमको जब जीवन मिलता है तब हम ये भूल जाते हैं। अगर हमें याद रहे तो हम बार-बार वही रिपीट करें। यह एक और भी प्रकृति किसी हमें प्रदत्त एक चीज है भूल जाने की। एक चीज में तंग होके हम भविष्य का निर्माण कर पाना सोच पाना यह बहुत मुश्किल क्योंकि कुछ चीजें अनचाही हमारे जीवन में होंगी और कुछ चीजें मनचाही प्रभु कुछ और चाहता है और हम आप कुछ और हम चाहते मोक्ष मिल जाए लेकिन हमारे कर्मों का जो हिसाब है वो हमें वापस आना ही पड़ता चुक्त करने
00:05:03:06 के लिए धरती पर आना पड़ता दूसरे जन्म में हम भूल गए बात खत्म हो गई जा करके फिर एक नया अच्छा जन्म मिला तो यानी कि एक तरीके से हम ऐसा नहीं लग रहा कि हम स्पिरिचुअल लाइफ जी के हमें बेवकूफ बेवकूफ बनाया जा रहा है कि हम भूल गए अपनी चीजों को। नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। क्योंकि आप किसी के जीवन से किसी के शब्दों में चेहरे पे ना जाकर के उसके व्यवहारिक जीवन को नहीं नहीं जैसे आपने कहा ना कि वो दूसरे जन्म में आप ये भूल जाएंगे कि आप मोक्ष लेकर आए हैं। अच्छा बात बताइए। तो आपका मोक्ष जी जैसे मान लीजिए आपकी किसी से दुश्मनी है। ठीक? और आपको अगला जन्म याद हो जाए कि फलाने भेजे एक करोड़ नहीं दुश्मनी नहीं फॉर एग्जांपल और आपको याद आ जाए उस जन्म में भी तो आप क्या करोगे? आप उस जीवन को जी नहीं पाओगे जो आपको मिला है जिस घर में आपको वो जीवन याद रहेगा कि उसने मुझे कष्ट दिया था। अब मुझे उससे बदला लेना है। मैं वो नहीं कह रहा हूं। इसलिए भूलना जरूरी होता है। मैं वो नहीं कह रहा हूं भूलना। मैं यह कह रहा हूं जैसे कि अपने शरीर की अवस्था ऐसी होती है जिसमें हमको जरूरतें पड़ती हैं और वो जब जरूरत जैसे हम कहते हैं कि हम जब हम किसी को स्पिरिचुअल मार्ग पे लाते हैं तो हम ये हमारा एक क्लेम होता है होना चाहिए जितनी भी आध्यात्मिक संस्थाएं हैं कि भाई हम आपको जो आपको दुख हो रहे हैं उससे हम
00:06:18:09 मुक्ति दिलाएंगे हम जो आपको अभी दुख हो रहे हैं तो उसमें अभी ये आता है कि जैसे भाई आप ऐसा कौन सा सुख देने वाले हैं जो कि हमें यहां नहीं मिल रहा है मूवी देखने में नहीं मिल रहा है या मिठाई खाने में नहीं मिल रहा है। भोजन खाने करने में नहीं मिल रहा है। तो हम ऐसा सुख आपको देने वाले हैं जो शाश्वत हो जिसमें ब्रेक ना आए। जी जिसमें कि बीच में बाधा ना उत्पन्न हो वो लगातार आप जो है स्थित प्रज्ञ हो जाए। आत्म स्थित हो जाए। आत्मस्वरूप हो जाए। तो ये हम कहेंगे अच्छा अगर हम ये कहें कि ये जो सुख तुम्हें मिल रहा है इससे बेहतर सुख होगा मगर ब्रेक तो उसमें भी आएगी। जी है ना? अनंत सुख नहीं होगा। वहां शाश्वतता नहीं होगी। तो फिर वो कहेगा भाई ठीक है फिर मैं अपना जो प्रैक्टिकल कर रहा हूं उसमें ही ठीक हूं खुश हूं फिर हम जब उसको वो दे नहीं रहे दूसरी बात ये है कि जैसे हमने कहा कि दूसरा दूसरा जन्म मिलता है वहां पर भी मोक्ष मिलता है मतलब मोक्ष नहीं मतलब वो देवत्व की प्राप्ति होती है तो कहने का मतलब है इन शॉर्ट कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार मोक्ष नहीं है जी देवत्व की प्राप्ति है और देवत्व की प्राप्ति होने के बाद आप यह भूलते हुए कि आप यह जीवन पहले काट चुके हैं दोबारा वही जीवन आपको जीना है। देवत्व की प्राप्ति के बाद नहीं जीवन बेहतर जीना है। जीवन जीना नहीं देवत्व से पतित होना
00:07:33:13 है ना दोबारा। नहीं पतित साइकिल चलेगी ना बहुत समय बाद जब हमें विस्मृति हो जाती है। जब अजंता लोहरा वगैरह में गुफाओं में ऐसी चीजें आती तो विकृति आती मन के अंदर होती है। तब हमारा तो लास्ट तक बहुत अच्छा जन्म होता। द्वापर के अंत तक हमारा बहुत देवत्व बना रहता। मतलब एक मतलब एक बड़े टाइम की अब कोई नहीं 16 कला फिर आठ कला कम हो जाते हैं ना जैसे आप बचपन जैसे जेल में पेरोल मिलता है ना आप 8 दिन के लिए घुमाओ जाके ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी पेल जैसी शब्द तो नहीं कहूंगी लेकिन हां लास्ट में मुझे लगता है आप शायद सुना होगा अपने बड़ों से अभी तक 100 साल के अंदर जितनी गिरावट हुई नैतिक पतन हुआ है चारित्रिक पतन हुआ हमारी सोच नीचे आई है उतनी तो पहले भी नहीं थी नहीं थी तो कहां गिरा था मनुष्य कुल मिला के एक चीज समझ ले कि यह जो आवागमन है इससे हमारा छुटकारा नहीं है। अगर एक जैसे मान लीजिए किसी चीज का नहीं नहीं वो ठीक है मैं आपकी बात मान गया भाई बी के जो ब्रह्माकुमारी है उसकी विचारधारा यह है कि जो ये आवागमन है इससे मुक्ति नहीं है हां इससे बेटर में आप जाओगे मुक्ति नहीं जीवन मुक्ति मिलेगी एक अच्छा जीवन मिलेगा जैसे अभी आपने कहा था ना बीच में अपने से इंसान परेशान हो जाता है तो मोक्ष तो वहां अपना
00:08:48:24 जीवन बहुत ही बेहतर जीवन होगा जिसको जीने के लिए मन करेगा कि मैं इस जीवन को जीू। बेहतर बेहतर जीवन में देखिए कोई रोग नहीं होगा मैं वही मैं मैं आपको कह रहा हूं। पहली बात तो यह है कि वो बेहतर जीवन भी शाश्वत नहीं होगा। नहीं उसमें भी एक ना एक दिन हम गिरावट आनी है। अपना जीवन छ साल के थे। अभी आप जो भी हो गए तो सबका मतलब वो मुक्ति नहीं होनी है। जो यहीं जैसा रहना है। आगे बस ये लंबे समय के लिए अच्छा जीवन मिल जाएगा। मुक्ति नहीं मिलेगी। [नाक से की जाने वाली आवाज़] अब उसमें एक चीज यह भी है कि जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति पर निर्भर हैं तब तक हम अपने आप को पूर्ण रूप से सुखी नहीं मान पाते। जैसे कि अगर मैं पानी पर निर्भर हूं। मुझे प्यास लग रही है तो मैं कभी-कभी सोचता हूं मुझे उठा के ना लाना पड़े। ये भी सोचता हूं। और भोजन के लिए मुझे पकाना ना पड़े, कुक ना करना पड़े। जी। और मुझे बढ़िया स्वादिष्ट भोजन भी मिल जाए। या फिर इसके अलावा और भी आप समझ रही होंगी कि काफी काम वासना इत्यादि ये सब इच्छाएं भी होती हैं। तो ये सारी चीजें जो होती हैं जब तक हम अपने से किसी द्वैत भाव पे निर्भर रहते हैं। द्वैत मतलब किसी देश काल परिस्थिति पे हमारी सुख की निर्भरता जब तक होगी तब तक हम पूर्ण रूप से सुखी नहीं हो सकते। जैसे किसी क्रिया की ही जरूरत हो गई। क्रिया मतलब
00:10:03:25 कि किसी के मतलब रमण करना ये सब इस इसमें ही हमारी जरूरत हो गई। या फिर हमारी भोजन पे आवश्यक भोजन पे हम निर्भर हो गए। ये भी हम किसी सामग्री पर निर्भर है कि वो वहां रखी मुझे उठा के लानी है। तो मेरे अंदर ये है कि मैं क्यों जाऊं? कोई मुझे अपने आप दे दे। तो जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति पर निर्भर हैं तब तक हम पूर्ण रूप से सुखी नहीं। तो हम ये मान सकते हैं कि जो बीके को फॉलो कर रहे हैं यहां पर उसको देवत्व की प्राप्ति होनी है। यहां से बहुत बेटर जीवन मिलना है और बहुत सालों तक वो चलना है। बहुत समय तक वो चलना है। आप ये भूल ही जाओगे कि आपने कभी दुख देखा भी था। मगर एक दिन ये दुख वापस भी आएगा। ये भैया जैसे सतयुग बार कलयुग आता है ना ये तो शाश्वत सत्य है ना प्रमाणिक है सभी में है तो ऐसे हर चीज हमारी आपकी बाल्यावस्था और फिर किशोरी युवा और फिर क्या होता है वृद्धि मतलब पूर्ण रूप से मुक्ति नहीं है कोई चीज नहीं है क्योंकि जो चीज बनी है जो इसमें सर्किल में है सोमवार मंगल बुद्ध बृहस्पत आता है ना ऐसे चार ऋतुओं का है 12 महीनों का है सभी का एक तो है हमें हम एक लंबे समय की मुक्ति दे रहे हैं व्यक्ति को यहां से लंबे समय की लंबे समय की परंतु यह नहीं है कि मुक्ति है ही नहीं मुक्त ही हो गए
00:11:35:18 [संगीत]
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यह मोक्ष है या पैरोल | ब्रह्माकुमारी बहन ने बता दी सच्चाई
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