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00:00:07:08 तो सभी को जय श्री राम। अमोग लीला जी का एक वीडियो प्राप्त हुआ है जिसमें वो प्रभुपाद जी की लेखनी में किए जा रहे बदलाव को लेकर के कुछ कुतर्क करते हुए दिखाई दे रहे हैं। जो एक प्रश्न उठाया जाता है कि चलो भाई आपने भगवत गीता में भगवान ने जो कहा है उसको बदल भी दिया फिर भी आप एज इट इज क्यों कह रहे हो? जैसे ब्रह्मपणम ब्रह्मते गंतव्यम तो उसमें तो इन इस श्लोक में आप देखेंगे 42 24 में भगवत गीता में ब्रह्म शब्द कई बार आ रहा है और जब ब्रह्म शब्द कई बार आ रहा है तो ट्रांसलेशन में अच्छा मीनिंग में भी कहीं-कहीं पर ब्रह्म का अर्थ ब्रह्म दिया गया है। ट्रांसलेट करते समय एक भी बार ब्रह्म शब्द का अर्थ ब्रह्म नहीं आया। वहां पर उसको कृष्ण भावना भावित कर दिया गया है। इसमें इनके कोई एक बंगाल के प्रचारक हैं यूबर जो यह कहते हैं कि भाई जो भगवान का भक्त होता है उसको जो है वही दिखता है। कोई अमरेंद्र प्रभु जी करके हैं बंगाल के बंगाल की शैली में बात करते हैं। तो उन्होंने एक और अव्वल दर्जे का कुतर्क किया है कि क्या भाई कि जो भगवान का भक्त हो जाता है उसको हर जगह भगवान ही दिखता
00:01:22:12 है। इसलिए वो सब जगह भक्ति भक्ति भक्ति भक्ति डाल देते हैं। ठीक है भाई तो आप यह मान रहे हो ना कि आपकी अंतर्भावना से प्रभावित आपकी दृष्टि है तो आपको हर जगह भगवान भक्ति भक्ति भक्ति दिख रही है तो फिर उसको सनातन शास्त्र क्यों कह रहे हो? उसको एज इट इज क्यों कह रहे हो? यह कहो ना कि भाई मेरी प्रभावित दृष्टि से प्रभावित यह शास्त्र है। मेरी अच्छी बात है। भक्ति से प्रभावित होना चाहिए। पर वो जो है उसको आप वैसे ही लिखो ना। फिर आप डंका क्यों पीट रहे हो? हां कि हम भैया एज इट इज दे रहे हैं। एज इट इज दे रहे हैं। अच्छा दूसरी बात यह भी है कि अगर आपको यहां पर भक्ति दिख रही है क्योंकि यहां पर क्या है कि यहां पर अद्वैत की सिद्धि होती है। इस श्लोक में अद्वैत की सिद्धि कैसे होती है कि सब कुछ ब्रह्म ही है। क्रिया भी ब्रह्म है। प्राप्त होने वाला फल भी ब्रह्म है। करने वाला कर्ता भी ब्रह्म है। तो कैसे बचे भाई यहां पर? तो इसलिए कह दो कि भैया ऐसा है यहां पर जो है ब्रह्म की बात ही मत करो। कृष्ण भावना भावित हो जाता है। वह जो है उसको परम मोक्ष प्राप्त हो जाता है। यह कर दो। ट्रांसलेशन की बात कर रहा हूं मैं। भाष्य में व्यक्ति अपनी जो
00:02:37:27 अपना दृष्टिकोण है उसको लिखता है। हालांकि वो भी सिद्ध हो पा रहा है कि नहीं हो पा रहा है वो बात एक अलग है। परंतु जब वो ट्रांसलेट कर रहे हो तब तो कम से कम उसकी एज इट इज अनुवाद कर दो उसका। पर नहीं अनुवाद में भी बदलाव करेंगे और फिर कहेंगे हम एज इट इज वाले हैं। हम एज इट इज वाले हैं। हां और अगर भक्ति के नाम पर हमें कहीं भी कुछ भी दिख जाता है। यदि भक्ति के नाम पर हमें ब्रह्म की जगह कृष्ण भावना भावित दिख जाता है। जो इस का नाम है। है ना? कृष्णा कॉन्शियसनेस तो फिर भैया तुम एक भी शब्द कैसे देख रहे हो? उसके बिना जब तुम यहां पर ब्रह्म की जगह पर कृष्ण भावना भावित देख रहे हो तो तुम हर जगह वही करो ना युद्ध की जगह भी कृष्ण भावना भावित करो अर्जुन की जगह भी कृष्ण भावना भावित करो क्योंकि तुमको तो और कुछ दिखाई नहीं देना चाहिए पर तुम्हें तो दिख रहा है तो इसको क्या कहते हैं दोहरापन दोगलापन है ना तो वो बात और है कि भगवत गीता के साथ किस तरह से खिलवाड़ किया गया इस कौन के द्वारा परंतु फिर भी उसके और निचले स्तर में जब आ तो यहां तो प्रभुपाद जी ने जो लिखा है उसको भी बदला जा रहा है इस कोन के द्वारा। इसी संबंध में प्रश्न उठता
00:03:53:03 है और इस प्रश्न के निराकरण के स्वरूप अमोग लीला जी ने एक फोरमैनी वाली कुतर्कों की व्याख्या प्रस्तुत कर दी है। तो हम इनके कुतर्कों की थोड़ी समीक्षा कर ले। क्या है? तो इन्होंने दो जो कुतर्क किए हैं उसमें पहला है कि भाई प्रभुपाद जी जो है बोलते थे। उनकी रिकॉर्डिंग होती थी। पुरानी मशीनंस थी। उनको कोई सुनता था, सुनने में गैप आता था और वो मशीनंस ठीक से वो उच्चारण नहीं होता था। सही से सुन ना पाने के कारण वो कुछ बोलते थे। कुछ का कुछ कभी-कभी टाइप हो जाता था। इसमें इसी से मिलताजुलता एक कुतर्क और है कि प्रभुपाद जी की जो शैली थी बोलने की वो बांग्ला वाली थी। बंगाली थे वो और जो ये थे सुनने वाले अंग्रेज थे। तो इसलिए कई शब्दों में बदलाव हो जाता था। जैसे कि उन्होंने उदाहरण भी दिया अपनी वीडियो में कि भाई जैसे उन्होंने कहा सनातन तो सुनने वाले ने सुन लिया सोनटोन उन्होंने कहा कि मून तो सुनने वाले ने सुन लिया कि डेमन नहीं उन्होंने कहा डेमन तो सुनने वाले ने सुन लिया मून अच्छा ठीक है आप यह मान रहे हो कि आपको प्रभुपाद जी को समझने में असफलता हो रही है और आप
00:05:08:12 वो चाहते कुछ थे छापना और छाप कुछ रहे हो। ठीक है? पहली बात यहां से यह समझ लेना चाहिए। अच्छा यहीं पर एक बात और है कि जो रिकॉर्डिंग होती थी उसके बीच-बीच में गैपिंग आती थी। तो प्रभुपाद जी से जब पूछा गया कि इतनी देर आप चुप क्यों हो जाते हो? तो प्रभुपाद जी ने बताया कि भाई मैं बहुत गहन चिंतन करता हूं कि मुझे एग्जैक्टली किन शब्दों को प्रस्तुत करना है। किन शब्दों को वाक्यों में पिरोते हुए यहां पर प्रस्तुत करना है जिससे कि सिद्धांत भी बना रहे और व्यक्ति की निष्ठा भी अह प्रगति पथ पर आकर बढ़ आगे बढ़ती रहे। तो यह उन्होंने गैप के संबंध में बताया। यह बाद में काम आएगा। अब सबसे पहली बात है जब सुनने में दिक्कत आ सकती है और इसलिए आप जो है गड़बड़ी हो रही है आपसे तो फिर क्या ऐसा हो सकता है कि द्वैत की जगह अद्वैत लिखा हो और अद्वैत की जगह द्वैत लिखा हो ऐसा भी हो सकता है फिर तो जब आप संभावना व्यक्त कर रहे हो कि हम प्रभुपाद जी की चीजें एज इट इज दे पाने में असमर्थ हैं। उन्होंने कहा कुछ हम समझ नहीं पा रहे हैं तो हो सकता है कि जहां पर अद्वैत की बात हो रही है वहां द्वैत की बात हुई हो। जहां द्वैत की बात हो रही हो वहां अद्वैत की बात हुई हो। यह भी हो सकता है फिर तो अच्छा यह भी हो सकता है कि गुण कर्म के आधार पर व्यक्ति का
00:06:23:27 पारमार्थिक वर्ण निर्धारित होता है। है ना? गुण गुण कर्म के आधार पर उसकी पारमार्थिक जो गति है वो निर्धारित होती है। व्यवहारिक गति निर्धारित नहीं होती। यह भी तो हो सकता है कहा हो उन्होंने। अच्छा सब कुछ कहा हो यह बता दो कि 230 में आत्मा की नित्यता को कटिंग क्यों की गई? वहां तो श्लोक में भी आत्मा को नित्य कहा गया है। शब्दार्थ में भी नित्य का अर्थ बताया गया एटरनल और फिर आपने श्लोक में एटरर्नल को गायब ही कर दिया कि जो शरीर में रहने वाली शरीरी है यानी जीवात्मा है वो जो है नित्य है। उसका कभी नाश नहीं होता। आपने नित्यता को काट दिया। उसका कभी नाश नहीं होता। इसको रख लिया। क्यों?
00:07:05:25 एक अब इसमें जो तीसरा पक्ष आता है वह यह दिया है इन्होंने कि भाई वह जो बोलते थे वह स्पोकन इंग्लिश है। ये ध्यान देना इनकी कुतर्क की भी कोई सीमा होती है। श्रोताओं को क्या बेवकूफ समझते हो? प्रभुपाद जी जो बोलते थे वो स्पोकन इंग्लिश थी। और रिटन इंग्लिश में लिखते समय जो लिखने वाले लोग थे या छपवाने वाले लोग थे वह उनकी स्पोकन इंग्लिश को इंग्लिश वो रिटन इंग्लिश में परिवर्तित करके तब लिखवाते थे और खुद ही क्या कह रहा है ये व्यक्ति थोड़ी देर पहले खुद ही अपने वीडियो में ये कह रहे हैं मोग लीला कि भाई प्रभुपाद जी एक एक बात बहुत सोच समझ के बोलते थे कि किन शब्दों में पिरोकर वाक्य को प्रस्तुत किया जाए जिससे कि सिद्धांत की भी पुष्टि हो और व्यक्ति की भक्ति भी बढ़ती इसी व्यक्ति ने कहा तो जब कोई आचार्य है आपका कोई गुरु है वो एक एक शब्द पर काफी देर मनन चिंतन करके एक वाक्य प्रस्तुत कर रहा है तब आप उसको स्पोकन और रिटन के नाम पर बदलोगे
00:08:11:03 इसीलिए प्रभुपाद जी ने अपने भगवत गीता के जो भाष्य किया है उसकी भूमिका में वह लिख रहे हैं क्या लिख रहे हैं श्रीमद् भागवतम की भूमिका क्या लिख रहे हैं श्री प्रभुपाद व्याख्या का अर्थ है परिवर्तन यदि मनुष्य अपूर्ण है यद्यपि यह वाली बात वहां भी लागू हो सकती है जो यहां कही जा रही है जहां पर सीधे-सीधे भगवान के वाक्यों को ही बदल दिया गया है परंतु अभी प्रभुपाद जी के वाक्यों को बदलने पर अगर दृष्टि डालें तो देखिए क्या कह रहे हैं प्रभुपाद जी कि व्याख्या का अर्थ है परिवर्तन यदि मनुष्य अपूर्ण है तो वह परम परमेश्वर के वचनों को कैसे कैसे बदल सकता है? तो यह बात तो वहां भी आ जाती है। ब्रह्म्पणम ब्रह्म गंतव्यम को कर दिया कृष्ण भावना भावित और ऐसा एक जगह नहीं हुआ है। अनेक जगह हुआ है। अनेक जगह भगवत गीता के जो अंतिम अध्याय है 18वा अध्याय उसमें जहां पर यह बताया गया है कि व्यक्ति का जो स्वभाव होता है उसके आधार पर उसके कर्म निर्धारित किए गए हैं। वहां पर तो प्रभुपाद जी की कोई व्याख्या ही प्रस्तुत नहीं की गई। वाह! और सीधे-सीधे वहां
00:09:26:09 पर ऐसा शब्दों का तोड़ मरोड़ करके पेश किया गया जो मूल अर्थ था उसको समझ ना पाए व्यक्ति कंफ्यूज हो जाए वहां पर क्या लिखा है वहां पर कि व्यक्ति के स्वाभाविक कर्मों के आधार पर कर्मों का निर्धारण किया गया है यानी कि कर्म के आधार पर उसके उसका स्वभाव निश्चित नहीं होगा बल्कि स्वभाव के आधार पर उसका कर्म निश्चित होगा और स्वभाव किस आधार पर निश्चित होगा स्वभाव उसके जन्म के आधार पर निश्चित होगा यह वहां पर दे रहे हैं इस पर एक विस्तृत एक अलग से वीडियो बनाएंगे। है ना कि गौ संप्रदाय वर्ण व्यवस्था के बारे में क्या कहता है। खैर फिलहाल बात यह है कि वहां पर तो प्रभुपाद जी ने कोई व्याख्या ही नहीं दी। सीधे आगे बढ़ गए और तोड़ मरो मरोड़ करके जो अनुवाद है उसके साथ ऐसी छेड़छाड़ की है कि वहां से निष्कर्ष निकाल पाना मुश्किल हो जाए। व्यक्ति को कंफ्यूज हो जाए। भाई अचिंत। सवाल मत करो। 5 101 कुरान। ठीक है? वही वाली बात अचिंत तो व्यक्ति अचिंत हो जाए। जहां भी दिक्कत आए वहां ऐसी खिचड़ी पका दो जहां अचिंत हो जाए। तो मैं यह नहीं कह रहा प्रभुपाद जी ने ही किया है। यह भी बात है। कौन कर रहा है यह सोचने वाली बात है। क्योंकि इस से एक नाम जुड़ा हुआ है जयद्वैत। जय
00:10:41:25 द्वैत और ये जो जय द्वैत है यह कोई इजराइलियन है और परिवर्तित हिंदू है। है ना? अब इसका क्या लक्ष्य है? क्या नहीं लक्ष्य है? पर चर्च जैसे मंदिर बनना, पाश्चात्य वातावरण बनना मंदिरों में और भी ना जाने कितनी चीजें जो हो रही हैं यह किस ओर इशारा कर रही हैं। यह आप इन चीजों से समझने का प्रयास करें। तो क्या है कि प्रभुपाद जी कह रहे हैं कि व्याख्या का अर्थ है परिवर्तन। यदि मनुष्य अपूर्ण है तो वह परमेश्वर के वचनों को कैसे बदल सकता है? यदि शब्दों को बदला जा सकता है तो पूर्ण नहीं है। इसलिए शंका होगी कि वचन परमेश्वर ने कहे हैं या किसी अपूर्ण व्यक्ति ने। श्रील प्रभुपाद फिर कहते हैं। जैसे ही आप शास्त्र की व्याख्या करते हैं या उसे बदलते हैं। शास्त्र अपना अधिकार खो देते हैं। तब दूसरा मनुष्य आकर बातों का अपने ढंग से अर्थ बताएगा। एक और आएगा और फिर एक और। और इस तरह शास्त्र का मूल तात्पर्य खो जाएगा। खो जाता है। अच्छा इसके बाद इन्होंने आगे बताया है
00:11:57:18 प्रभुपाद जी ने राय राम को पत्र लिखा है 21 दिसंबर 1967 को तो उसमें लिखा है कि अगर हम टेलीग्राम भेजते हैं तो टेलीग्राम देने वाले व्यक्ति को इसमें सुधार करने इसे संपादित करने या इसमें कुछ जोड़ने की आवश्यकता नहीं होती। वह बस इसे प्रस्तुत करता है। यही गुरु का व्यवसाय है। यह कौन कह रहे हैं? प्रभुपाद जी कह रहे हैं। ठीक है? तो बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो प्रभुपाद जी के विरुद्ध है। और इसी कारण से एक दिन प्रभुपाद जी जब वृंदावन में बैठे थे बगीचे में उन्होंने
00:12:36:02 वो जब अपनी उनको अपनी अपने जो ग्रंथ है उनको सुनना पसंद था। तो जब कोई यशोदा नंदन प्रभु जी थे वह ईशोपनिषद पढ़ रहे थे। जब श्रील प्रभुपाद ने उन्हें रोका और अंतिम पैराग्राफ को फिर से पढ़ने को कहा। इसे फिर से सुनने के बाद श्रील प्रभुपाद ने कहा यह मेरे शब्द नहीं है। वह मेरे शब्द बदल रहे हैं। क्या मेरी अंग्रेजी अच्छी नहीं है? श्रील प्रभुपाद बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने कहा यह सबसे बुरा काम है जो एक शिष्य कर सकता है। एक छलांग मेंढक की तरह मत बनो और आध्यात्मिक गुरु के ऊपर से यह सोच कर कूदने की कोशिश मत करो कि तुम उससे बेहतर जानते हो। उनसे तुरंत कहो मेरे शब्दों को ना बदले। यह प्रभुपाद जी कह रहे हैं। तो कुल मिलाकर के अमोग लीला जी ने जो कुतर्क प्रस्तुत किए हैं वो ना तो प्रभुपाद जी की संगति है। धर्म की तो संगति है ही नहीं। शास्त्रों की संगति तो उसमें है ही नहीं। प्रभुपाद जी की भी संगति नहीं है। अब प्रभुपाद जी के साथ छल किस प्रकार से हो रहा है। इस के मैनेजमेंट कह लो या वो जयद्वैत कह लो। इजराइलियन कन्व्टेड हिंदू है जो इस सब के पीछे माना जाता है। जिसको किसी को भी समझ लो अह परंतु और भी
00:13:51:08 कई सारी चीजें ऐसी हैं जो इस ओर इशारा करती हैं कि एक षड्यंत्र चल रहा है। कैसी है वो? कौन सी सामग्री है? जैसे कि मैं अलग से एक वीडियो बनाऊंगा कि गौडिया वैष्णव संप्रदाय वर्णाश्रम धर्म के विषय में कितना स्पष्ट और क्या कहता है? और इनके जो यह श्रील ठाकुर भक्ति विनोद है। इनके ही ग्रंथ के आधार पर मैं बताऊंगा आपको। अलग से एक वीडियो बना रही हूं। इसके अलावा अगर प्रभुपाद जी की कुछ मोटी मोटी चीजों पर ध्यान दिया जाए तो आप देख सकते हैं कि प्रभुपाद जी भगवत गीता प्रभुपाद जी के रेफरेंस से भगवत गीता 262 में भगवान शिव की बहुत अवहेलना की गई है। अपमानजनक बातें की गई है। क्या-क्या कहा गया है कि भगवान शिव अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं कर पाए। वहीं पर एक भक्त था हरिदास। वह उन्होंने अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल कर लिया। शिव जी को मनाने के लिए माता पार्वती आई विवाह के लिए और हरिदास ठाकुर को एक वैश्या वहां पर भोग के लिए प्रवृत्त करने आई। तो शिव जी का क्योंकि कंट्रोल नहीं था। वह वैष्णव वो परम वैष्णव भक्त नहीं थे। समझिए
00:15:06:19 परम वैष्णव भक्त नहीं माना यहां पर क्योंकि हरिदास ठाकुर से कंपैरिजन में शिव जी को बताया क्योंकि शिव जी को अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं था वो ध्यान मंगने थे पार्वती के उसाने पर वो मान गए सहमत हो गए विवाह हो गया फल स्वरूप कार्तिकेय का जन्म हुआ जबकि हरिदास ठाकुर जो शुद्ध वैष्णव भक्त थे उनके पास जब एक वैश्या आई तो वह उन्होंने अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल रखा उन्होंने उसका जो उसका जो प्रस्ताव था उसको ठुकरा दिया इस तरीके से कंपैरिजन किया गया अब यहां पर सीधे तौर पर देखा जाए तो सिर्फ शिवजी का कंपैरिजन हरिदास ठाकुर से नहीं हुआ। सबसे पहले तो इनके इनके द्वारा जो ढिंढोरा पीटा जाता है ना वो तो सबसे बड़े वैष्णव है। परम वैष्णव है। क्या हो गया यहां पे भाई परम वैष्णवता को शिवजी की चले गए। अब उनकी वैष्णवता भंग हो गई। अब वो वैष्णवा नाम यथाशंभू वो भूल गए। अच्छा चलिए वो वैष्णव नहीं है। परम वैष्णव नहीं है। थोड़ा निचले स्तर के वैष्णव है। हरिदास ठाकुर के कंपैरिजन। अब उसके बाद आगे क्या हुआ है कि केवल शिव जी की तुलना हरिदास ठाकुर से नहीं हुई है। यहां पर शिव पार्वती के बीच जो दिव्य दैवीय वैवाहिक संबंध बना उसकी तुलना किससे हो रही है? व्यभचार से एक वैश्या और उसके ग्राहक के बीच बनने वाले संबंध
00:16:21:27 से। उससे तुलना यहां पर कर दी 262 में भगवत गीता में। और इतना ही नहीं अगर शिव जी की तुलना वहां अरदास ठाकुर से हो रही है और विवाह की तुलना शिव पार्वती के विवाह की तुलना वहां पर व्यभचार से हो रही है। एक वैश्या और उसके ग्राहक के बीच बनने वाले संबंध से हो रही है। तो माता पार्वती की तुलना किससे हो रही है? माता पार्वती की तुलना। भाई यहां पर शिवजी को मनाने कौन आया था? जगत जननी मां पार्वती। तो यहां पर आप दिखा रहे हो कि वह जो है सहमत हो गए और वहां जो वैश्या से तुलना कर रहे हो। कहने का तात्पर्य यह है कि आपके लिए पार्वती जी और जो जिसका आप नाम ले रहे हो वो सब एक समान है ना। इसलिए शिव जी को सहमत नहीं होना चाहिए था क्योंकि जिस प्रकार वहां पर हरिदास ठाकुर वैश्या के मनाने पर सहमत नहीं हुए। किस तरह की नीच मानसिकता का पोषण करने वाले लोग हो आप लोग। शर्म आनी चाहिए। खैर बैक टू द पॉइंट। तो अब 262 में इन्होंने दिखा दिया कि शिव जी का अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं है। परंतु आठ सात 33 आठवां स्कंध सातवां अध्याय और 33वा श्लोक प्रभुपाद जी का जो भाष्य है श्रीमद् भागवतम
00:17:38:07 उसमें प्रभुपाद जी के रेफरेंस से ही फिर से लिखा हुआ है कि पार्वती के साथ रहते देख माता पार्वती के साथ रहते देख शिवजी को इंद्रियों के वशीभूत समझने वाले मूर्ख हैं। अब आप फैसला कर लो निर्णय कर लो कि शिवजी इंद्रियों के अधीन है कि नहीं है। लिखने वाला मूर्ख है कि ज्ञानी है और या फिर दो 62 सही है या फिर 8 7 33 सही है भागवतम तो यह इस ओर इशारा करती है इस तरह की चीजें कि किस तरह से प्रभुपाद जी को भी धोखा दिया जा रहा है। गौडिया वैष्णव संप्रदाय की जो वर्णाश्रम व्याख्या है वो उसके ठीक विपरीत यहां पर पूरा षड्यंत्र चल रहा है। आत्मा की नित्यता को काटा जा रहा है। और इस तरह से विरोधाभासी चीजें प्रभुपाद जी के ही रेफरेंस से आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। आपका ये तय कर पाना मुश्किल है कि प्रभुपाद जी ने एग्जैक्टली कहा क्या है? और जो भी प्रश्न है उसके अंत में डाल दो। अचिंत है। कुछ मत पूछो। अरे भाई तो कोई तुम्हारे गाल पर आकर के चांटा मार देगा तब भी यही कह देना। अचिंत है। कुछ मत पूछो। खैर अब इसमें एक एक कुतर्कता एक कुतर्क और किया गया कि भैया जो पहले वाली बुक है उसको गायब थोड़ी ना कर दिया गया
00:18:53:13 है भाई गायब नहीं किया गया है मगर धर्म का लोप कैसे होता है क्या एक दिन में अचानक से कुरान आ जाती है क्या एक दिन में बाइबल आ जाती है क्या एक दिन में द्वापर से कलयुग आ जाता है क्या लोप होता है धीरेधीरे शय श और वह हो रहा है वो हो रहा है ना आप अगर 1 लाख भगवत गीता छापते हैं जो आपको छापनी है जो आपको प्रचारित करनी है तो उसके अनुपात में 10 भगवत गीता छपती है आपकी जो वो 1972 वाला एडिशन है उसकी आपके स्टोर्स पर कौन सी भगवत गीता थोक के भाव रखी रहती है 1972 वाली हां तो यह कहना आपका गौ हो गया कि भैया हम वो वाली भी तो उपलब्ध करा रहे यह तो सनय सनय बदलाव चल रहा है ना एकदम से थोड़ी ना धीरे-धीरे अच्छा फिर इन्होंने कहा कि भैया हम अगर अगर उन्होंने बदला होता तो हम भक्त कैसे बन जाते मतलब इसमें कहना क्या चाहते हो कि आप प्रभुपाद के फॉलोअर कैसे बन जाते आप जब एक किताब को मानने वाला होते हुए यह दावा कर रहे हो कि हम प्रभुपाद को मान रहे हैं और प्र और उस किताब का संबंध
00:20:09:01 प्रभुपाद से होने पर सवाल किया जा रहा है तो उस समय में आप अपने उस प्रभुपाद के संबंध को एज ए प्रमाण कैसे प्रस्तुत कर सकते हो? क्योंकि अभी जिस किताब के आधार पर आप अपना भक्त होना सिद्ध कर रहे हो, उस किताब का संबंध ही प्रभुपाद जी से होना सिद्ध नहीं हो रहा है या उसके ऊपर सवाल उठाया जा रहा है। तो अपना संबंध आप प्रभुपाद के साथ कैसे सिद्ध कर रहे हो? उस किताब के आधार पर क्या हम इस किताब को फॉलो कर रहे हैं? इसलिए हमारा संबंध भक्त भक्ति का हो गया क्योंकि हम प्रभुपाद को फॉलो कर रहे हैं। इस किताब को फॉलो करने वाला होते हुए हम प्रभुपाद को फॉलो करने वाले सिद्ध होते हैं। और क्योंकि हम प्रभुपाद को फॉलो करने वाले सिद्ध हैं। इसका मतलब है कि यह किताब सही है। क्या बकवास है भाई ये?
00:20:56:07 जब आपके जिस आधार पर प्रश्न किया गया है, जिसके आधार पर आप प्रभुपाद के फॉलोअर हैं या फिर जिसके आधार पर आप अपने आपको प्रभुपाद के अनुसार वैष्णव भक्त बताते हैं, जब उसकी प्रामाणिकता पर बात चल रही है तो वहां पर आपकी भक्ति आपका आचरण वो जो भी है उसको आप भक्ति कहो या धर्माभास कहो वो प्रमाण कैसे हो जाएगी? क्योंकि आपके कनेक्शन के बीच में तो वह किताब है ना जिसको आप फॉलो कर रहे हो और उसकी प्रमाणिकता पर बात हो रही है। अच्छा दूसरी बात यह है कि रामपाल जो ग्रंथों में मिलावट करता है आपसे भी और उत्कृष्ट श्रेणी की मिलावट अव्वल दर्जे की मिलावट करता है। वो भी यह कह सकता है कि अगर मैंने मिलावट की होती तो लोग भक्त कैसे बन रहे होते? क्योंकि भक्त की पहचान तो यही है ना कि भक्त कहेगा कि मैं भक्त हूं। और कोई पहचान तो है नहीं भक्त की। भक्त की पहचान यही है कि उसने कह दिया मैं भक्त हूं। ज्यादा बोलोगे तो राम कह दूंगा राम कृष्ण कह दूंगा। लो हरे कृष्णा हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे मैं भक्त हो गया। अब मेरा प्रमाण मान लो। जाकिर नायक भी आकर कह देगा हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। फिर तुम्हारे वो रट्टू तोते जो घुमा करते हैं वो आकर के कह देंगे कि जिसकी जीवा पे भगवान का नाम हो वो ब्राह्मण
00:22:11:13 हो गया। लो उसको बना दो अपने यहां का आचार्य जाकिर नायक को वो आएगा। हां बढ़िया। वाह अब बनूंगा आचार्य। अब आचार्य बन के इनके अंदर से इनके गुर्दे का ऑपरेशन करूंगा। है ना? तो रामपाल भी यह कह सकता है फिर के भक्त कैसे बन गए होते? क्योंकि भक्त कौन है? कौन नहीं है? डिसाइड करने वाला स्वयं रामपाल ही है। जैसे तुमने अपने आप को भक्त घोषित करते हुए अपने आप को प्रमाण के रूप में रख दिया। तो कुतर्कों से बाहर निकलो थोड़ा और जो अंधे बन के इसको सुन रहे हैं ना मर गई है ना तर्क शक्ति तुम लोगों की ना प्रमाण ना युक्ति जो मन में आए वाह वाह वाह वाह वाह वाह खैर अब जरा सैद्धांतिक बातों पर आ जाते हैं। आचार्य के लेख को संशोधित करने का जो जो क्या कहते टाइपिंग मिस्टेक होती है। जैसे आचार्य ने किसी ग्रंथ का श्लोक या मंत्र वहां पर प्रस्तुत किया है। वहां पर क्रमांक जो है गड़बड़ हो गए। उस क्रमांक को सही कर दिया। या फिर वो जो क्या कहते हैं? वर्तनी है वो अशुद्ध हो गई है। उसको ठीक कर दिया। हां। यहां तो पूरा का पूरा तात्पर्य
00:23:26:21 ही बदला जा रहा है। पूरा का पूरा नित्य शब्द ही गायब कर दिया जा रहा है। और ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण है और आप कह रहे हो भैया सुनने में गलती हो गई। अरे भैया गलती हो गई तो ठीक है। तो सबसे पहली बात तो यह है कि इस प्रकार से संशोधन ऐसा कोई उदाहरण हमें प्राप्त नहीं होता। ना ही शास्त्र की व्याख्या हमें प्राप्त होती है इस प्रकार की। हां यदि आप संशोधन कर रहे हैं। यदि आप आचार्य ने कहा क्या कहा था उसको आप समझाना चाहते हैं तो आप आचार्य की टीका पर भी टीका लिखो ना। अगर आप आचार्य के जीवन काल में जो ग्रंथ छप गए थे उनके जीवित रहते हुए उन्होंने उन ग्रंथों को देख लिया था और उसके बाद भी उन ग्रंथों में अगर संशोधन कर रहे हो तो उसमें अपना नाम लिखो ना कि प्रभुपाद की कमेंट्री पर मेरी कमेंट्री अपना नाम लिखो उसमें
00:24:21:27 नहीं तब तो कहेंगे एज इट इज दूसरी बात यह है कि अगर यह संशोधन सत्यापित ित कैसे होगा भाई? उनके जीवन काल में छपी किताबें। उन्होंने छपवाई किताबें। अब वह चले गए। सत्यापित कैसे होगा? वह तो है नहीं सत्यापित करने के लिए। एक बार को वो होते तो भैया ठीक है उनसे सत्यापित हो गया। ना ही उनका कोई उत्तराधिकारी है सत्यापित करने के लिए। कहो कि जीबीसी उनका उत्तराधिकारी है। तो जीबीसी स्वयं शास्त्र इकाई है आपकी। आपके सामान्य भक्त को यह पता है कि उसका धर्म का अंतिम निर्णायक कौन है? जिसको वह गुरु मान रहा है उसका बॉस कौन है? मुझको पता है। मैं छाती ठोक के कह सकता हूं मेरा गुरु मेरे गुरु शंकराचार्य हैं। पूरी के पीठाधीश्वर वर्तमान लो कोई नहीं है उनके ऊपर जो उनको कंट्रोल कर रहा हो। और अगर कोई किसी गृहस्थ का भी गुरु है प्रामाणिक परंपराओं में तो उस परंपरा के जो अमुक पीठाधीश्वर होंगे जिनके अंतर्गत उनका कोई गृहस्थ गुरु होगा किसी का तो उसका अंतिम निर्णायक वो पीठाधीश्वर सिद्ध हो जाएंगे मगर तुम्हारे यहां तो गुरु गद्दी है ही नहीं तुम्हारे यहां तो कमिटी है जीबीसी जिसके बारे में
00:25:36:28 सामान्य भक्त को नहीं पता जीबीसी ये तय कर रही है कि कौन गुरु होगा कौन गुरु नहीं होगा किसके शिष्य होंगे किसके शिष्य नहीं होंगे होंगे कहां शास्त्रों में वर्णन है भाई जीबीसी का और तो और सबसे श्रेष्ठतम हमारा जो आश्रम है वो है सन्यास आश्रम किसी व्यक्ति का गुरु कोई सन्यासी है आपके अकॉर्डिंग वो सन्यासी है भी कि नहीं है वो बाद की बात आपके अकॉर्डिंग इस का किसी भक्त का जो गुरु है वो सन्यासी है उसको कंट्रोल कौन कर रहा है जेबीसी जिसमें गस्थ बैठा हुआ है वाह कौन कौन होता है? गस्थ पता है जो दिन भर में छिपाने वाले कार्य तामसिक कार्य ज्यादा करता है। उसका कंट्रोल कैसे करोगे? उस उसका कंट्रोल कैसे स्वीकार कर लोगे किसी सन्यासी पर? जो छिपाने वाले कार्य कर ही नहीं रहा है।
00:26:34:16 मनुस्मृति 12वा अध्याय 37वा श्लोक जिन कर्मों को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो वो तामसिक कार्य है। गस्थ के जीवन में सन्यासी की अपेक्षाकृत तामस तत्व ज्यादा होता है। आप गस्थ से सन्यासी को कंट्रोल करवा रहे हो। या तो यही होता जीबीसी में केवल सन्यासी होते। हालांकि वह भी शास्त्र कितना वो भी विचार नहीं होता। पर इससे तो अच्छा होता। यहां एक भक्त को मालूम ही नहीं है मेरा गुरु कौन है। पहले कह रहा 500 गुरु है मेरे अंतिम निर्णायक। फिर लास्ट में कह रहा 12 है। अभी अभी पता चल गया। चर्चा के दौरान पता चल गया। यह तो हालत है आप लोगों की।
00:27:20:04 एट द एंड सब बातें एक तरफ। यदि आप यह संभावना आपने खुद व्यक्त कर ली कि हमने समझने में गलती हो गई थी क्योंकि आप जो छाप रहा है वह उसका अंतिम प्रमाण है आपके यहां के एक भक्त का जिसको आप डिवोटी कहते हो एक स्कनिस्ट का अंतिम प्रमाण कौन है जो प्रभुपाद जी के ज्ञान को प्रस्तुत कर रहा है उनके समक्ष किताबों के माध्यम से और वह जो अंतिम प्रमाण है वह कह रहा है कि मुझसे गलतियां हुई समझने में गलतियां तो बहुत हो सकती हैं। फिर वह अपनी प्रमाण जो अपनी प्रामाणिकता का खुद ही वह खंडन कर रहा है कि मुझे आप शब्द प्रमाण ना समझे तो किसे समझे? तो इस के यहां पर इस के जो डिवोटीज है उनके लिए कौन शब्द प्रमाण है? अचिंत है। अचिंत। शब्द प्रमाण कौन है? अचिंत। कंटाप किसने मारा? अचिंत। सब अचिंत कर दो। फिर एट द एंड अगर आप यह स्वीकार कर रहे हो कि हां भाई हमसे गलती हो गई थी अब हमने सही दिया है तो यानी आप अपनी अपने अपने अंदर दोष दृष्टि डाल रहे हो जो लोग आपको प्रामाणिक समझते हैं जो लोग जिन लोगों के लिए आप प्रमाण हो
00:28:35:22 ठीक है तो इस तरह से बदलाव होने वाले जो शास्त्र है आप खुद कह रहे थे ये सनातन शास्त्र है अभी तक बदलाव से पहले तक उसके बाद आपने बदलाव किया उसमें कि भैया वहां पर नित्य नहीं कहा प्रभुपाद जी ने हम नित्य हटा देंगे। आत्मा की नित्यता से आपको दिक्कत हो रही है। यही तो अब ब्राह्मीकरण कर रहे हो। धीरे-धीरे आत्मा को नित्य होना उसका बंद कर दो। वही बना दो उसको। इस्लाम और बाइबल वाला आत्मा अनित्य नहीं है। हम खैर अगर आप खुद स्वीकार कर रहे हो कि हम शास्त्रों में हमारे शास्त्रों में बदलाव हो रहा है तो इनको सनातन शास्त्र मत कहो ना भाई।
00:29:22:07 अगर आपको सुनाई नहीं दे रहा था ठीक से समझ में नहीं आ रहा था ठीक से आप एलिजिबल नहीं थे उस योग्य या फिर अगर आपने स्वयं को एलिजिबिलिटी दी या नहीं दी आपको जिसने दी उस पर भी दोष जाता है। जब आप इस योग्य नहीं थे तो उसने आपको वहां वो ये इतना गंभीर कार्य क्यों दिया? पहली बात और आप इतने सच्चे क्यों नहीं थे कि आपको अगर समझ में नहीं आ रहा था तो आप मना कर देते भाई मेरे को समझ में नहीं आ रहा यहां क्या कार्य जा रहा है यह धर्म की बात है इसके साथ खिलवाड़ नहीं होता है धर्म है ये
00:29:56:21 अच्छा एट द एंड अगर आप बदलने का बदलने की संभावना स्वीकार कर रहे हो शास्त्रों में तो वो सनातन सिद्ध नहीं होंगे तो वो कैसे सिद्ध होंगे वो कुरान की तरह सिद्ध होंगे कुरान दो 106 में एक आयत आती है क्या कहते हैं उसमें कि ऊपर वाला अपनी कोई आयत बदल देता है तो उससे बेहतर आयत देता है। लो साहब इसका अर्थ क्या है कि आज भयंकर मूर्ति पूजा विरोधी बने हुए हैं। कल को बदल जाएगी आयत क्या बदल जाएगी भैया मूर्ति पूजा करो। बेकार में ही मरे हम तो लड़ लड़ के
00:30:31:08 बुत तोड़ो बुत तोड़ो बुत परस्ती को खत्म कर दो बेकार में ही लड़े बदल जाएगी आयत तो ऐसे ही आपकी चीजों में आप खुद खुद दोष दृष्टि उत्पन्न कर रहे हो उनको इनको तर्कों के द्वारा उस पर लीपापोती करने का प्रयास कर रहे हो दो 106 में कहते हैं कि भैया कोई आयत आती है तो बदल जाती है यह है वो है एक सैनिक वर्सेस कुछ थे जब इनको कहीं पर समझौता करना था ना मोहम्मद को तो वहां पर मूर्ति पूजा के लिए इन्होंने कुछ आयत पढ़ दी थी। बाद में कहा गया कि वह आयत हटा रहे हैं कुरान से। क्यों हटा रहे हैं? क्योंकि उस समय शैतान ने जीवा पर कंट्रोल कर लिया था। यानी कि दोष दृष्टि खुद मान ली। और यहां पर भी कुरान ने खुद अपने अंदर दोष दृष्टि मान ली कि मैं बदल सकता हूं आयतों को। तो जब आपने दोष दृष्टि उत्पन्न कर ली तो वो परम प्रमाण नहीं रह गया सामने वाले के लिए। अंतिम प्रमाण नहीं रह गया फिर वो सनातन शास्त्र नहीं रह गया वह और कुरान इसको आगे फॉलो करती है दो 187 में कहा जाता है कि आज से पहले रोजों की रात में स्त्री का स्त्री संग करना मना था पर आज जो है इसको अलऊ कर दे रहे हैं। हुआ क्या था वहां पे किसी ने रोजों की रात्र
00:31:46:09 में रात में स्त्री संग कर लिया था तो तुरंत आयत आ गई एक चलो आज से अलऊ है आज से पहले अलऊ नहीं थी आज से अलाऊ है क्यों आई मतलब इससे पहले धर्म नहीं था इससे पहले क्या था अगर यह धर्म है तो अगर करना धर्म है तो वो क्या था आज तक बेवकूफ बनाया जा रहा था ऐसे ही पांच 101 में कहती
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00:32:10:07 है कुरान कि ज्यादा सवाल मत करो अन्यथा तुम्हारे लिए वो आयत खोल दी जाएंगी जिन आयतों
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00:32:16:07 के कारण कुछ लोग पहले बागी हो गए थे तो क्या मान लिया जाए यहां पे कि पहले भाई शास्त्रनिष्ठ धर्मनिष्ठ वाला धर्म था लोगों का और उस उसमें कुछ लोगों को पशुता पसंद आ रही थी कि नहीं नहीं मुझे चचेरी बहन से विवाह करना है मेरी बहन से विवाह करना है तो इसलिए आयतों को बदल दिया गया भाई उन आयतों को दबा दिया गया पुरानी वाली को श्रुति को ह माना जाए जब स्वयं वो किताब ही कह रही है मैं बदल बदलती हो तो उसने तो स्वयं ही अपने अंदर दोष अपने में दोष दृष्टि वहां प्रस्तावित कर दी ना।
00:32:50:14 तो कुल मिलाकर के यदि आप खुद इस तरह से पहली बात तो आपके जो कुतर्क हैं वो सेट नहीं होते। यदि आप कहेंगे कि सुनने में दिक्कत आ गई थी तो फिर तो और भी दिक्कतें मानी जा सकती है। आगे भविष्य में और चेंज कर देना। सुनने में दिक्कत आ गई होगी। हो सकता है धीरे-धीरे वो द्वैत परक व्याख्या होते और अद्वैत परक व्याख्या हो जाए। हो सकता है वो जो गुण कर्म के नाम पर वह जो जो व्यक्ति जो कार्य कर रहा है उसकी वही जाति हो गई। इस नाम पर जो आप वर्ण व्यवस्था को अपना रहे हो वो भी बदल जाए आगे चलते-चलते यह भी हो सकता है। यह भी मान सकते हैं। फिर व्यक्ति अपने धर्म को लेकर के मजबूत कैसे रहे? वो तो नए संस्करण में आप नया धर्म ले आओगे ना। हां। और कि भाई वह बंगाली थे और वह स्पोकन इंग्लिश रिटन इंग्लिश आप जिसको गुरु कह रहे हैं वह कह रहे हैं मैं बहुत विचार करके बोलता हूं और उसको आप रिटन इंग्लिश के नाम पर बदल दे रहे हो क्या कुतर्क है भाई
00:33:51:03 और एट दी एंड इस प्रकार से मिलने वाले शास्त्र जो है वो सनातन शास्त्र सिद्ध नहीं होते अगर किसी को छापने में दिक्कत हो रही थी हो रही है तो उसको मना करना चाहिए मैं नहीं कर सकता ये कार्य मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि प्रभुपाद जी क्या बोल रहे हैं? जो समझ में आ जाए वो ना लिखो। समझ में आए वही लिखो। यह होता है धर्म। रामोद भाषते राम दो प्रकार की बातें नहीं करता। आज इस का भक्त उस आज एक सामान्य इस के डिवोटी का अंतिम निर्णायक कौन है? धर्म का अंतिम निर्णायक कौन है? वह जो दो प्रकार की बातें करता है। वह जो जिसको जो समझ में आ गया वह सुन के छाप देता है। वह जो डेमोन को मून लिख देता है। ऐसे अयोग्य व्यक्ति इस में जाने वाले जो श्रद्धावान लोग हैं भगवान के नाम पर जो वहां पहुंच रहे हैं उनके धर्म का अंतिम निर्णायक ऐसा अयोग्य व्यक्ति है। तो इस प्रकार के कुतर्कों द्वारा इस में चल रहे षड्यंत्रों और इन परियोजनाओं पर लीपापोती करने का प्रयास बंद कर देना चाहिए। जय श्री राम।
00:35:16:29 [संगीत]
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प्रभुपाद जी के साथ धोखा और अमोघ लीपापोती #iskcon
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