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00:00:01:25 तो हमने दो चैप्टर पढ़ लिए। पहला चैप्टर जिसमें हमने शबरी को ब्राह्मणी सिद्ध किया। है ना? किस कारण? कि वह धर्माचारणी कही गई हैं। श्री राम जी उनकी तपस्या को को प्रोत्साहित कर रहे हैं। जटा धारण कर रही हैं। मृग चर्म धारण कर रही हैं। धर्म को जानने वाली हैं। और तब वो जो है तपस्या इत्यादि कर रही हैं। तो तब हमने पहले चैप्टर में सिद्ध किया कि ब्राह्मणी हैं। और उनका जो शबरी नाम है वो जैसे शबराचार्य थे मीमांसा दर्शन के भाष्यकार उनके ही सदृश्य उनका नाम शबरी है। और दूसरे चैप्टर में हमने यह सिद्ध किया कि प्रभु श्री राम ब्रह्म भाव से कार्य नहीं करते थे। मनुष्य जो देख सकते हैं, उस देख सकने वाले दृश्यों में वह ब्रह्म भाव से कोई कार्य नहीं करते थे। वह मनुष्य दृष्टि से ही कार्य करते थे। ठीक है? और हमने यह भी देख लिया, यह भी सिद्ध कर लिया कि वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से ही देखने का समर्थन भी करते हैं। अब बात
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00:01:03:22 आती है वह आतिथ्य संस्कार वाली पैरों पैर कैसे धुलाए भैया ब्राह्मणी थी तो यदि प्रभु श्री राम ब्रह्म भाव से कुछ भी नहीं करते थे तो उन्होंने ब्राह्मणी होते हुए भी शबरी को अपने चरण स्पर्श क्यों करने दिए यही नहीं शबरी द्वारा उनके चरणोदक को क्यों ग्रहण किया गया यही नहीं प्रभु श्री राम ने अपने पैरों से ऋषि पत्नी अहिल्या को स्पर्श क्यों किया ब्राह्मण रावण का वध क्यों क्यों किया? राम जी का पैर धोइए। सबरी जी राम जी का पैर सबरी जी धोई हैं। एक क्षत्रिय कैसे-कैसे ब्राह्मण से पैर धुलवा रहा है भाई मर्यादा पुरुषोत्तम होकर ये बताइए। देखिए जी आपने कहा कि बेर जूठा बैर खाया तो खाया कब? जब गए तब ना जब गए हैं उसी समय शबरी जी पैर धोई है कि नहीं उनका? तो वो कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम है जो झूठा बेर खाकर तो गलत कर सकते हैं कदाचित। लेकिन शबरी जैसे पैर धुलवाकर गलत नहीं कर रहे हैं। अहिल्या जैसे ऋषि पत्नी को पैर से छूकर गलत नहीं कर रहे हैं। हम ठीक चलो। वैसे मैं यह समझता था मैंने दर्शन के विषय में भागवतानंद को कभी कुछ तार्किक बात करते हुए तत्व की विवेचना करते हुए मैंने कभी नहीं देखा। ठीक है? परंतु मैं इतना मेरी जानकारी में था कि भागवतानंद को यह विधि निषध इत्यादि में भैया बहुत अच्छे से उसने रटा हुआ है। यह करने पर यह जो कर्मकांड
00:02:18:24 विषयक चीजें होती है उसमें उसकी गति है। पर जब यह बात मेरे सामने आई तो मुझे हंसी आएगी। उसकी गति तो इनमें भी नहीं है। अरे भाई जिसकी गति होगी वो तो जानता होगा ना कि आतित्य संस्कार में ब्राह्मण भी क्षत्रिय के जो है पैर धुलवा सकता है, धुला सकता है। पाद्य उनको अर्पण कर सकता है। पाद्य प्रक्षालन कर सकता है। हां। बड़े निम्न कोटि के निकले यार तुम। खैर चलो। तो श्री राम द्वारा रावण वध के विषय में यह आपत्ति ब्राह्मण रावण का वध कैसे कर दिया? सबसे पहली बात समष्टि और व्यष्टि
00:02:59:15 धर्म कहां पर किस बात को धर्म माना जाएगा वह भी देखना है ना। सबसे पहली बात रावण जैसे आता ताई को मारने की आज्ञा मनुस्मृति से ही प्राप्त है। तो इसमें धर्म की सीमा का उल्लंघन कैसे होगा? श्री राम द्वारा रावण वध के विषय में हम पूर्व में ही कह आए हैं। यदि ब्राह्मण भी आताताई होए हो जाए तो उसका वध कर देने की ही आज्ञा शास्त्रों से भी प्राप्त होती है। मनुस्मृति 8350 तथापि श्री राम जी के द्वारा ब्राह्मण वध का पश्चाताप भी किया गया है। पश्चाताप भी किया भाई पद्म पुराण पाताल खंड इसके अलावा समष्टि और व्यष्टि दो प्रकार के जो धर्म होते हैं समष्टि के हित के लिए कर्तव्य का निर्णय कभी एकांकी नहीं होता है धर्म तो था हिरण्यकश्यपों की बातें मान लेना प्रह्लाद जी के लिए परंतु समष्टि का क्या था कि नारायण का त्याग नहीं करना जब आपका समष्टि का धर्म जो है व्यष्टि अह व्यष्टि का धर्म समष्टि के धर्म पर हावी होने लग जाए तो वहां पर व्यष्टि के धर्म का त्याग और समष्टि के धर्म को ग्रहण करना ही धर्म होता है। और जो ऐसा करता है वह आदर्श बनता है। जो ऐसा नहीं करता है वो उपेक्षणीय हो जाता है। जैसे भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा
00:04:14:21 को प्राथमिकता दी। नारी के सम्मान को नहीं। तो हमारे लिए उनका वध सबसे पहले भगवान के कोप का वह विषय बने। इसी प्रकार से द्रोण आचार्य कोटि के लोग होते हुए भी इनको इन्होंने कौरवों का साथ दिया। जबकि अपने व्यष्टि के धर्म का एकांकी धर्म का पालन ही तो कर रहे थे। परंतु क्योंकि इन्होंने समष्टि के धर्म को प्राथमिकता देना यह भूल गए थे। इसलिए दंड के पात्र बने। हम चलो खैर आगे चलते हैं। हम पूर्व में ही बताए हैं कि प्रभु श्री राम शबरी जी के यहां अतिथि रूप में गए थे। अतिथि अतिथि बनकर आएंगे। यह लिखा है वहां वाल्मीकि रामायण कहां लिखा है? वाल्मीकि रामायण 374 15 से 16 के बीच में आतित संस्कार के अंतर्गत ही धर्म शास्त्रों द्वारा अतिथि के रूप में अभ्यागत के प्रति हिरण्य गर्भ बुद्ध और विष्णु बुद्धि रखते हुए उनका पूजन करने का निर्देश दिया गया है। जब अतिथि आएगा तो उसके प्रति आपको विष्णु बुद्धि रखनी है। हिरण्य गर्भ बुद्धि रखनी है। उस बुद्धि के उस बुद्धि से उसका संस्कार किया जाएगा। पाद्य
00:05:29:27 प्रक्षालन इत्यादि आतित्य संस्कार में ही आता है। घर आए हुए अतिथि की विद्या, शिक्षा, कुल, वंश, चरित्र या शील की परीक्षा नहीं करनी चाहिए। वह कहां से आया हुआ है? उसका देश या स्थान क्या है? यह भी नहीं पूछना चाहिए। चाहे अतिथि कुरूप हो या सुंदर हो फटे पुराने वस्त्रों में हो या अच्छे वस्त्रों में हो या विद्वान हो वह विद्वान हो या मूर्ख गुणवान हो या निर्गुण घर आए हुए उस अतिथि को साक्षात भगवान नारायण विष्णु का रूप मानना चाहिए। उसके विषय में कभी भी मन में कोई संदेह या संकोच नहीं करना चाहिए। नरसिंह पुराण जिसको पहले कभी ना देखा हो ऐसे आए अतिथि को स्वागत वचन कहना आसन देख देना देखकर उठना जल आदि से पूजन सत्कार करें चरणों को धोने से पितृग प्रीति को प्राप्त होते हैं हारित स्मृति चार 56 58 अतिथि के चरण धोने से भलीभांति सत्कार करने से उबटन अतिथि के चरण धोने से भलीभांति सत्कार करने से उबटन आदि मलने से वेद से भी अधिक स्वर्ग की प्राप्ति होती है। व्यास स्मृति
00:06:45:13 तीन 39 जब मलेंगे उबटन को तो चरण स्पर्श नहीं होंगे वहां। हां अभ्यागत को पुत्र द्वारा भी पाद्य दिया जा सकता है। पारस्कर ग्रह सूत्र एक तीन चार यह क्यों बताया मैंने? यह बताने के लिए कि पुत्र के रूप में भी अगर वैकल्पिक है कि पुत्र के द्वारा भी दिलवा सकते हैं। परंतु पुत्र दे आप स्वयं दें। वहां पर जो है आतिथ्य संस्कार में पाद्य देने की बात की जा रही है। छह पुरुष पूज्य होते हैं। कौन-कौन होते हैं पूज्य? हम आचार्य यह आतिथित्य धर्म के अंतर्गत ही बताया जा रहा है। आचार्य, वेदाध्यापक, ऋत्विक,
00:07:32:16 वैवाह राजा अर्थात प्रजापालक क्षत्रिय राजा प्रिय अर्थात अपने समान जाति का मित्र स्नातक उपनयन पूर्वक ब्रह्मचर्य आश्रम समाप्त करके आया हुआ यह कहां लिखा है पारसकर ग्रह सूत्र एक तीन एक कुश विस्तर पाद्य देना आसन देना मधुबर इत्यादि देना भी अभ्यागत के लिए निर्देशित है कहां लिखा है पारस्कर गृहसूत्र एक तीन तीन पांच और यह कुश का आसन माता शबरी ने पद्म पुराण के अनुसार श्री राम जी को दिया था। इतने आति धर्म को जानती थी वो ऐसी धर्म निपुणा और फिर विधि का उल्लंघन करेंगी। हां। तो कोई बात नहीं। ब्रह्म भाव से करवाना मान भी लो। पर फिर उनको यह वाली उपाधियां जो है इनकी संगति नहीं होगी ना। इनको फाड़ना पड़ेगा ना। फिर फिर जो है उनको मर्यादा पुरुषोत्तम मत कहो। सत्य प्रतिज्ञ मत कहो। धर्म में बंधा हुआ मत कहो।
00:08:41:03 ध्यान रहे क्योंकि श्री राम जी की ही चरण पादुकाएं रखकर राजा भरत अयोध्या का सिंहासन संभाल रहे थे। इस दृष्टि से श्री राम ना केवल कुलीन क्षत्रिय थे बल्कि राजा भी थे। राजा को आसन और जल देकर सत्कार करें। गौतम धर्म सूत्र आदि शंकराचार्य जी लिखते हैं राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय जाति का कारणभूत होकर भी ब्राह्मण नीचे बैठकर ऊंचे बैठे हुए क्षत्रिय की उपासना करें। प्रधारणिक उपनिषद सांकर भाष्य एक चार 11 अचिंत अभ्यागत होने से ही अतिथि ऐसा कहा जाता है। भविष्य पुराण
00:09:24:02 ब्राह्म पर्व 100 48वा अध्याय और नौवा श्लोक अतिथि धर्म से जो भी अकाल्पनिक पुरुष आया है उसके रूप में वैश्वदेव का ही समागम ब्राह्मण को समझना चाहिए। यानी जान गए तो जाने हुए में किस किसके अनुसार होगा? आतिथ्य जो मैंने ऊपर बताया आचार्य राजा ऋत्विक वैवाह प्रिय मित्र स्नातक इत्यादि और जब नहीं जानते हैं तो फिर नहीं जानने में तो फिर कोई संदेह करना ही नहीं है। फिर सीधे विष्णु बुद्धि रखनी है। तो
00:10:06:19 अतिथि धर्म से जो भी अकाल्पनिक पुरुष आया है मतलब यदि मतलब यहां बताया जा रहा है अकाल्पनिक के लिए सम्मान और फिर जिनको आप जानते हैं उनके लिए सम्मान तो उनमें कौन-कौन है जिनके लिए पूजन आदि का विधान है पूजन आदि का विधान तो सबके लिए पर अमुक अमुक तरीके से तो उसमें जो यह वाला है पाद्य भी ग्रहण पाद्य भी दे सकते हैं चरणोदक भी ले सकते हैं तो वह विधान किस-किस में तो वह मैंने पूज्य बता दिए कौन-कौन से हैं तो उस उसके रूप में वैश्वदेव का ही समागम ब्राह्मण को समझना समझना है और हिरण्यगर्भ बुद्धि से वह उपास्य है। विष्णु पुराण 113 63 यदि अतिथि आ जाए तो उसका स्वागत आदि से आसन देकर और चरण धोकर सत्कार करें। विष्णु पुराण 11 तीन 49 इस व्यवहार के अनेक उदाहरण हमें वाल्मीकि रामायण में भी मिलते हैं। ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ द्वारा राज ऋषि विश्वामित्र जी को पाद्य दिया गया। उस समय तक वह ब्रह्म ऋषि नहीं बने थे। तो तुम अतिथियों में श्रेष्ठ हो इसलिए यत्न पूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है। अतः मेरे द्वारा किए गए इस सत्कार को तुम ग्रहण करो। इसी क्रम में वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी का पाद्य आचमनीय आदि
00:11:21:27 वस्तु द्वारा वस्तुओं द्वारा पूजन सत्कार किया। वाल्मीकि रामायण एक 52 14 से 16 शबरी से मिलने के पूर्व अगस्त ऋषि द्वारा भी श्री राम जी को पाद्य देकर यथावत पूजन सत्कार किया था। चलो वहां तो वो भक्त भगवान तो भाव के भूखे हैं। भगवान तो ऐसे ही लोगों ने तो बेड़ा गर्क करवाया सनातन का। पहले तो एक और जाकर के कठोर वर्णाश्रम धर्म का प्रचार करो। फिर यह बातें कहने लगो। हर कोई व्यक्ति हर दूसरा व्यक्ति समर्थ के नाम पर कुछ भी करने का कुछ भी करने के लिए छूट पाएगा। फिर वो रामपाल बनेगा। मुझे कबीर ने दर्शन दिए। फिर वो भागवतानंद बनेगा। मुझे भगवती ने दर्शन दिए और बन जाएंगे सब लोग करुणा। जगतगुरु आचार्य और उनके कर्मों का साक्षी भी कौन होगा? जो उनके अपने प्रियजन हो गए। रामपाल अच्छा व्यक्ति है। इस संबंध में साक्षी कौन है? जो उनके अनुगत लोग हैं जो उसको जानने वाले हैं। भागवतानंद के विषय भागवतानंद के अच्छे कर्मों अच्छे आचरण के विषय में साक्षी कौन माने जाएंगे भैया जो उसकी चापलूसी किया करते हैं वही घोषित कर देंगे हां हां भैया इसके आचरण बहुत अच्छे हैं और फिर केवल उसी आचरण के आधार पर किसी अधिकार दिए जाने पूर्वक नहीं बल्कि आचरण के आधार
00:12:37:03 पर और उसके आधार पर उसको कर्मणा जगत गुरु घोषित कर दो तो शंभुक वध के बाद पुनः अगस्त ऋषि द्वारा भी श्री राम जी का भली-भांति पूजन सत्कार किया गया। वाल्मीकि रामायण 76 21 से 24 और शबरी जी से मिलने के पूर्व अगस्त ऋषि ने जो पाद्य देकर यथावत पूजन सत्कार किया था वो क्या था? वाल्मीकि रामायण तीन 12 14 ध्यान दे रहे हैं आप। उनकी मुक्ति कैसे होनी थी? झूठे बेर खिलाकर नहीं उनका आतित्य करके ठीक है आतित सत्कार धर्म शास्त्रों के अनुसार आतित्य करने से उनकी मुक्ति थी उसमें झूठे बेर का कहीं पर भी कोई विवरण हमें धर्म शास्त्रों से प्राप्त नहीं है। हां पाद्य प्रक्षालन कहा है कि शबरी ने शबरी ने पैर कैसे धुला दिए जब वो ब्राह्मणी थी तो हम सुन लो कैसे धुला दिए तो तो यद्यपि वाल्मीकि रामायण के अनुसार अहिल्या द्वारा श्री राम का आतिथित्य सत्कार करने से ही उनकी मुक्ति का विधान था। वो बात और है कि पद्म पुराण इत्यादि के अनुसार जो है वो उनके चरणों के स्पर्श से होना
00:13:52:09 था। परंतु जब वो वाली घटना लेंगे चरणों के स्पर्श वाली घटना तो वहां पर प्रभु श्री राम ने किसी ब्राहणी को पैर से स्पर्श नहीं किया। वहां तो आप तत्व देख रहे हैं। फिर तत्व देख रहे तब तो वहां कुछ है ही नहीं। फिर और तत्व में चले जाओ। मगर व्यवहार से वहां पर क्या था? एक पाषाण था, एक पत्थर था। उसको स्पर्श किए और वाल्मीकि रामायण के अनुसार प्रभु श्री राम का आतिथ्य सत्कार कर देने मात्र से ही शबरी जी अहिल्या जी को मुक्ति प्राप्त हो जाने हो जाने का विधान सुनिश्चित था। कहां लिखा है? वाल्मीकि रामायण चार 48 29 से 32 तथापि यह मान भी लिया जाए कि श्री राम ने ऋषि पत्नी अहिल्या का ही अपने चरणों से स्पर्श किया। तब भी यदि किसी पुण्य आत्मा का यहां भी वही समष्टि और व्यष्टि आ जाएगा कि हमें पाप लग भी रहा है यदि परंतु उससे समष्टि का कोई कार्य हो रहा है तो फिर हम उस पाप को प्रायश्चित पूर्वक या ग्रहण करते हुए आगे बढ़ेंगे ना हम संध्या वंदन क्यों करते हैं पाप तो कर रहे हैं बार-बार मगर संध्या वंदन क्या है संध्या वंदन में जो हम रसोई घर में डेली नित्य प्रति हमारे घर में जो जीव जंतु मारे मारे जाते हैं। उनका
00:15:07:13 प्रायश्चित हर एक पहर के बाद अगली जो संध्या होती है उसमें होता है। हम तो समष्टि के भाव से यदि पहली बात व्यवहार से उन्होंने किया नहीं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार तो हुआ ही नहीं। और पद्म पुराण का यदि पुराणों में जो दी गई दिया गया घटनाक्रम है जहां वो शिला है तो वहां पर ब्राह्मणी को नहीं छुआ। शिला को छुआ। फिर भी दुर्जनोष ने ऐसे यदि मान लिया जाए कि नहीं भैया उन्होंने ब्राह्मणी को छुआ तो यहां पर अपने स्वयं के कष्ट को स्वीकार करते हुए किसी अन्य के लिए परोपकार करने की भावना से किया ना तथापि यह भी मान लिया जाए कि श्री राम ने ऋषि पत्नी अहिल्या का ही अपने चरणों से स्पर्श किया तब भी यदि किसी पुण्य आत्मा का उद्धार एक क्षत्रिय के चरणों का स्पर्श होने से ही होना था होना है तो क्या क्षत्रिय को अपने व्यष्टि के धर्म को वरीयता देते हुए समष्टि के धर्म को त्याग देना चाहिए अभी मैंने समष्टि और व्यष्टि का धर्म बता दिया है। कुंभकरण ने यह जानते हुए भी कि उसका बड़ा भाई दुराचारी था। किसी की निर्दोष स्त्री को अपहरण पूर्वक ले आया था। तथापि अपने भाई की ओर से युद्ध करते हुए समष्टि के धर्म का त्याग करके व्यक्तिगत धर्म को अपनाया। इसी
00:16:22:24 प्रकार धर्मज्ञ होते हुए भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण होते समय प्रतिकार ना करते हुए भीष्म और द्रोणाचार्य ने भी राजगद्दी के प्रति अपने व्यक्तिगत कर्तव्य को ही प्राथमिकता दी। क्या यह सभी हमारे लिए आदर्श हैं? हमारे आदर्श तो वो प्रह्लाद हैं जिनके पिता ने जब जगदीश्वर भगवान विष्णु का विरोध किया तो उन्होंने अपने व्यक्ति अपने व्यष्टि के कर्तव्य को गौण करते हुए ईश्वर के पक्ष में खड़े होकर समष्टि के धर्म को प्राथमिकता दी। हमारे आदर्श तो प्रभु श्री राम है जिन्होंने अपनी स्वधर्म निष्ठ प्रजा की सुख शांति के लिए अपनी निर्दोष पत्नी को भी त्याग कर यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि कर्तव्य का निर्णय कभी भी एकांकी नहीं होता है।
00:17:05:27 पूरी शंकराचार्य जी का वचन है ये। भसुंडी रामायण के आलोक में अब आ जाती है भसुंडी रामायण। यह बड़ा मजेदार है। चलिए उपरोक्त शास्त्र वाक्यों के ठीक विपरीत भूषुंडी रामायण के अनुसार शबरी बहिष्कृता थी। जबकि वहां पर अहिस्तकता लिखा है उनके लिए और यहां पर बहिष्कृता लिखा है। एवं श्री राम द्वारा वहां पर भी शबरी की जाति के विषय में शंका ना करने को कहकर शबरी जी के प्रति हीन भावना रखने का खंडन किया है श्री राम ने। ठीक है? भसुंडी रामायण दक्षिण खंड 171वा अध्याय और 20वां श्लोक इस प्रकार भी श्री राम जी सहित वहां उपस्थित अन्य ब्राह्मणों सहित लक्ष्मण जी के वर्णाश्रम उचित धर्म का उल्लंघन स्वीकार करना होगा क्योंकि भुसुंडी रामायण के अनुसार ना केवल प्रभु श्री राम ने वहां पर जो धर्मशास्त्र है उनकी सीमा के बाहर जाकर के कार्य किया बल्कि वहां जो ब्राह्मण थे और उनके छोटे अनुज जो लक्ष्मण थे उनको भी वैसा ही करने को कहा उनको कहा ब्राह्मणों को जाकर के प्रमाण प्रणाम करिए क्षमा मांगिए और वह वहां जाते हैं और शबरी जी शबरी जी से कहते हैं आप हमारे आएंगे आपके चरणों की धूल
00:18:21:06 से हमारा आश्रम पवित्र हो जाएगा अमुक अमुक बातें कहते हैं ये सब क्या है भाई ब्रह्म भाव से भगवान राम है ना ब्रह्म भाव से भगवान राम को कोई दोष नहीं लगेगा ना ब्राह्मणों को तो लगेगा झूठे बैर खाने पर लक्ष्मण जी को तो लगेगा कि वह भी ब्रह्म भाव से झूठे बेर खाएंगे अच्छा यदि यह मान लिया जाए कि भगवान ने कहा तो नहीं लगेगा तो फिर तो बुद्ध के रूप में भी मान लो फिर वेदों का विरोध फिर रही कहां गया धर्म आग लगा दो तुम धर्म में ऐसा करो आग लगा दो करपात्री जी का विरोध करके दिखाना है कर नहीं पाओगे बात और है अकाट्य सिद्धांत है भैया अकाट्य सांप और बिच्छू शेरों को काटा नहीं करते दूर ही दूर से रेंग कर निकल जाते हैं ठीक है मगर मगर नीचता की पराकाष्ठा है। नीचता की कृपात्री जी से द्रोह दिखाने के लिए कितना नीचे गिरोगे? कि भगवान ने कहा इसलिए जो है उन ब्राह्मणों को दोष नहीं लगेगा। भगवान का कहा हुआ था। और भगवान का कहा हुआ तो बुद्ध का कहा हुआ भी था। फिर वहां पर वेदों का उल्लंघन करने पर दोष क्यों माना जा रहा? फिर क्या बात रह जाएगी वेद की? नान्यापन
00:19:36:09 था। क्या बात रह जाएगी फिर? हां। चलो। खैर आगे चलते हैं। तो प्रभु श्री राम ने शबरी के झूठे बैर खाए। बल्कि उनके साथ-साथ लक्ष्मण जी ने भी कहा शबरी के झूठे बेर खाए। भुसुंडी रामायण दक्षिण खंड 167 वा अध्याय और 15वा श्लोक और वहीं दूसरी ओर 172वा अध्याय और 21 से 25वें श्लोक इन सब में ये सारा विवरण आपको प्राप्त हो जाएगा कि ब्राह्मणों ने भी अपने वर्णाश्रम उचित धर्म से बाहर जाकर के कुछ कार्य किए लक्ष्मण जी ने किए सब आपको प्राप्त हो जाएगा तो फिर इनको दोष क्यों लगवाया भाई भगवान राम है उनकी भक्त वो हैं भक्त के उसमें आवेश में आकर के वह ब्रह्म भाव से वह कार्य कर रहे वैसे ब्रह्म भाव से ना करना सिद्ध कर दिया। शबरी जी को ब्राह्मणी सिद्ध कर दिया। वह कार्य नहीं और वह अपने कार्यों की समीक्षा ब्रह्म भाव से नहीं बल्कि मनुष्य भाव से करने का समर्थन करते हैं। यह भी सिद्ध कर दिया। राम और कृष्ण के व्यवहारिक भेद को भी सिद्ध कर दिया। ठीक है? और इसके बाद जो है
00:20:54:07 जो पाद्य प्रक्षालन इत्यादि को लेकर के आपत्ति थी उसमें भी निराकरण प्रस्तुत कर दिया। अब बात आती है कि भूषुंडी रामायण के अनुसार तो भैया मर्यादा का उल्लंघन श्री राम ही नहीं कर रहे बल्कि वो ब्राह्मणों से भी करवा रहे और लक्ष्मण जी से भी करवा रहे। तो ब्रह्म भाष ब्रह्म वो है ना बाकी सब भी ब्रह्म है जो उनको दोष नहीं लगेगा। खैर क्या इस प्रकार श्री राम मनुवाद रूपी धर्म के रक्षक सिद्ध होंगे? अन्यों से करवाना स्वयं करना नहीं अन्यों से भी करवाना। ठीक है? तो यहां यह अवश्य माना जा सकता है। यह हम अपना एक पक्ष रख रहे हैं कि अगर भसुंडी रामायण के वचनों का मान रखना है तो उसकी घटनाओं को या तो दिव्य घटनाएं मान लो। लौकिक घटनाएं या नहीं। लौकिक मतलब मनुष्य दृष्टि से ना देखी जा सकने वाली घटनाएं मान लो। दिव्य लोकों में हो रही हैं। दिव्य दृष्टि से ही दिख रही हैं। जो हमारे सामान्य चक्षु हैं स्थूल शरीर के उनसे यह घटनाएं नहीं दिख रही हैं। हमारी जानकारी में तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने मर्यादा में रहकर ही शबरी जी के साथ व्यवहार किया। खैर तो यहां और क्या-क्या माना जा सकता है? एक तो दिव्य दृष्टि दैविक घटना या फिर यहां यह माना जा सकता है। यहां यह
00:22:09:10 अवश्य माना जा सकता है कि उच्च कुल की होते हुए भी सब क्षेत्र में रहने के कारण वह सबरी कहलाती थी। जिस कारण वन में रहने वाले अन्य ब्राह्मण उन्हें भील जाति के होते हुए बहिष्कृता ही मानते थे। जिस संबंध में बहिष्कृता वाले श्लोक आ गए। और जिस प्रकार भगवान ने कृष्ण रूप में कर्ण का रहस्य बोध कराया था। उसी प्रकार उन्होंने शबरी के विषय में भी रहस्य बोध कराया उन ब्राह्मणों को कि इसकी जाति को लेकर इसके प्रति हीन भावना मत रखो। अगर इस प्रकार से अर्थ निकालना चाहें तो भी निकाला जा सकता है। पुषुंडी रामायण दक्षिण खंड 171वां अध्याय 20वां श्लोक जहां एक ओर प्रभु श्री राम वनवास के समय फल मूल इत्यादि ग्रहण करने की प्रतिज्ञा ले रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर मुसुंडी रामायण में शबरी जी द्वारा उन्हें दाल भात खिलाया जा रहा है। भाई प्रतिज्ञा ले रहे हैं। कि मैं जो है फल मूल पाऊंगा। कहां ले रहे प्रतिज्ञा? वाल्मीकि रामायण 3 110 16 से 27 26 से 27 और दाल भात कहां खा रहे हैं? भसुंडी रामायण दक्षिण खंड 167वा अध्याय और 11 से 12वा श्लोक। खिलाओ दाल भात। इसी प्रकार यदि श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम और शबरी को यथाविधि सत्कार करने वाली धर्माचारिणी
00:23:25:06 कृष्ण मृग चर्म धारणी कहा गया है तो क्या हमें मनुस्मृति का खंडन करते हुए किसी और का उत्ष्ट उच्छिष्ट पदार्थ खाना अथवा अतिथि को स्वयं का उच्चिष्ट खिलाने को विधि मानना होगा क्योंकि भाई वहां तो उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जा रहा है तो उनके द्वारा की किए जाने वाले को कार्यों को मर्यादा मानना पड़ेगा शबरी की चीजों को हमें धर्म मानना पड़ेगा क्योंकि उनको धर्माचारणी कहा गया है। विधि को जानने वाली कहा गया है। विधि से कार्य करने वाली कहा गया है तो उनके द्वारा की जाने वाली चीजों को विधि मानना पड़ेगा। तो हम भी वही करें। हां
00:24:02:19 अथवा शास्त्र के उन वचनों को ही त्याग दें जिनके द्वारा श्री रामचंद्र सत्य प्रतिज्ञ सदाचारी मनुवादी रूपी धर्म के प्रचारक रक्षक और पालक होते हुए मर्यादा का पोषण करने वाले मूर्तिमान धर्म सिद्ध होते हैं। ज्ञातव्य है कि उच्चिष्ट का अर्थ अवशिष्ट भी होता है। अब यहां एक समर्थन में भसुंडरी रामायण के समर्थन में एक पक्ष और रख रहे हैं कि उच्चिष्ट का अर्थ अवशिष्ट भी ले सकते हैं। अवशिष्ट एक अवशिष्टांश अनेक प्रकार का होने से उच्चिष्ट को अवशिष्ट भी कहा जा सकता है। उच्चिष्ट शब्द का अर्थ ही होता है छोड़ा हुआ या परिशेष भाग। तो ऐसे संदिग्ध स्थलों पर जहां शास्त्रंतरों से संगति आवश्यक है। यदि यदि झूठा लेने देने का मनवादी शास्त्रों में निषेध है एवं यदि मनु विरुद्ध कोई भी स्मृति प्रशस्त नहीं मानी जाती है। ऐसी स्थिति में अवशिष्ट पद पर विचार आवश्यक हो जाता है। मनुप्रोक्त उच्चिष्ट शब्द का अर्थ यदि सभी स्थितियों में अवशिष्टांश का निषेध माना जाएगा तब आतित्य प्रकरण में ही आने वाले निम्नलिखित वचनांश का विरोध हो जाएगा। ठीक है? कौन सा वचनांश का विरोध होगा? जब ब्राह्मण अपने सेवक भोजन
00:25:19:15 ब्राह्मण और अपने सेवक भोजन कर चुके हो तो उसके पीछे अवशिष्ट अन्य को स्त्री अन्य स्त्री पुरुष अवशिष्ट का अन्य स्त्री पुरुष भोजन करें। मनुस्मृति 100 16 तो यह वाला जो बचा हुआ अवशिष्ट है उसको झूठा करना आवश्यक नहीं है। जो भोजन प्राप्त करने के बाद बचा हुआ अवशिष्ट है वह भी किसी को दिया जा सकता है। तो उस अवशिष्ट को देने के रूप में यदि शबरी जी के द्वारा जो प्रभु श्री राम को बेर दिए गए हैं। उस रूप में यदि बेरों को मान लें कि उन्होंने एक जो बेर लिए जिस ढेर जो ढेरी थी बेर की उसमें से एक बेर को चक लिया और देखा कि इस ये जो ढेर है बेर का इसमें जो है मीठे फल हैं एक से पता लगा लिया जैसे चावल से पता लगाते हैं और वो फिर जो अवशेष है वो उनको दे दिया तो यहां पर तब भी संगति बैठ जाएगी तो अतः
00:26:16:14 शिष्ट कुलीन सदाचार के अनुसार ही इसे समझना चाहिए जिस प्रकार चावल पकाते समय चावल के दो दानों का परीक्षण करके यह ज्ञात कर लिया जाता है कि वह पक चुका है अथवा नहीं। उसी प्रकार यदि यह माना जाए कि जिन फलों को शबरी तोड़कर लाई थी उनमें से कुछ फलों को उसने ग्रहण कर जब यह परीक्षण पूर्वक निर्णय कर लिया कि वह फल मीठे ही हैं तब अवशिष्ट रूपी फलों को जिन्हें उच्चिष्ट भी कह सकते हैं। उच्चिष्ट का अर्थ अवशिष्ट होता है क्योंकि फलों को श्री राम जी ने ग्रहण किया तो ऐसे में ना ही शबरी के धर्माचारणी होने पर कोई आपत्ति उठेगी और ना ही श्री राम जी के द्वारा मनुस्मृति की मर्यादा के बाहर जाकर आचरण करने की कोई आपत्ति शेष रह जाएगी। अतः उच्चिष्ट के स्थान पर अवशिष्ट पदार्थ को प्रदान करना एवं श्री राम जी द्वारा ग्रहण करना तथा शबरी जी को ब्राह्मणी स्वीकार करने पर इन विषयों में कहे गए पूर्वोत्तर किसी भी शास्त्र वाक्य का विरोध नहीं होगा। जो शास्त्रंतर हो रहा है ना भूषुंडी रामायण ये कह रही है और वाल्मीकि रामायण ये कह रही है तो यहां वाल्मीकि रामायण जो भुसुंडी रामायण है उसकी जो है अवमानना नहीं होगी इस तरीके से अर्थ को लेने पर या तो दिव्य से ले लो या फिर वो वाला ले लो कि वो जो है क्या कहते हैं उन्होंने जो है यह
00:27:31:20 शंका जो थी ब्राह्मणों की कि वह जो है हीन जाति की है शूद्र हैं उस शंका को उन्होंने दूर किया इस इस रूप में उनका अर्थ ले लो खैर ध्यातव है और या फिर यह वाला और साथ ही साथ यह वाला भी लेना पड़ेगा। कौन सा कि उन्होंने उच्चिष्ट मतलब झूठा मुंह से झूठा किया हुआ नहीं बल्कि अवशिष्ट दिया था। जिसको उच्चिष्ट कहा गया है वहां पर। जैसे हम अन्य शास्त्रंतर की स्थिति में जो है संगति बैठाने के लिए जन्मना जाति शूद्रा का अर्थ भी क्या कहते हैं? शूद्रवत ले लेते हैं। हम खैर आगे चलते हैं। ध्यातव है कि भसुंडी रामायण के अनुसार प्रभु श्री राम ने वह सारे आचरण किए हैं जिस प्रकार के आचरण भगवान ने राम रूप में ना करके मर्यादा पुरुषोत्तम की उपाधि को प्राप्त किया था। वह सारे कार्य इसमें किए ना तो वह सत्य प्रतिज्ञ सिद्ध हो रहे हैं। भसुंडी के रामायण भसुंडी रामायण के राम ना तो सत्य प्रतिज्ञ सिद्ध हो रहे हैं। ना धर्माचरण में बंधे रहकर कार्य करने वाले सिद्ध हो रहे हैं। और तो और अंतत गत्वा वो जो है एक पत्नी व्रत धारण पूर्वक चलने वाले भी सिद्ध नहीं हो रहे हैं। क्या सिद्ध हो रहे हैं? देखो रास लीला है भैया इसमें रास लीला।
00:28:47:01 तो ब्रजांगनाओं के स ब्रजांगनाओं अर्थात पराई स्त्रियों के साथ रमण ना करने का कारण धर्म अथवा मर्यादा नहीं अपितु माता सीता का रूठना बता रहे हैं। पुषुंडी रामायण पूर्व खंड 26वां अध्याय 56 से 60वा श्लोक ब्रजांगनाओं की इच्छा पूर्ति हेतु मुनियों द्वारा श्री राम को सर्वप्रथम विवाह के बिना ही माता सीता के साथ रमण कर उन्हें अपनी एकनिष्ठता प्रदर्शित करने एवं उसी क्रम में आगे अनेक वृजांगनाओं के साथ रमण करने का परामर्श दिया जा रहा है। भुसुंडी रामायण पूर्व खंड 26वा अध्याय 72 से 78 श्लोक यह है भसुंडी रामायण में रास रचा रहे भगवान श्री राम अब एक पत्नी व्रत भी खंडित सत्य प्रतिज्ञ होना भी खंडित मर्यादा पुरुषोत्तम होना भी खंडित केवल नाम के राम रह गए हैं बदल डालो इतिहास को पूरा राम है ही नहीं ये भी कह दो
00:29:50:04 माता के माता सीता के साथ विवाह रहित रमण वृतांत है इसमें पूरा वही भागवत जैसा वो रामायण पूर्व खंड 28वा अध्याय ब्रजांगनाओं के साथ श्री राम की रास लीला का वृतांत पहले माता सीता के साथ और फिर ब्रजांगनाओं के साथ भुसुंडी रामायण पूर्व खंड 31 36 46 से 54 और 36 46 से 64
00:30:32:26 अशोक वाटिका जहां तीनों लोकों की कन्याएं बंद थी। तरह-तरह की सुंदर कन्याएं अशोक वाटिका में बंदी बनी हुई थी। वहां प्रमोद वन को प्रमोद वन को उत्पन्न किया गया। एवं श्री राम ने माता सीता सहित रावण के द्वारा बंदी बनाई गई। सभी मृगनयनी कन्याओं के साथ रमण किया। भसुंडी रामायण दक्षिण खंड 195वा अध्याय और एक से 12 श्लोक एक पत्नी व्रत भी खत्म। वो वहां पर प्रतिज्ञा कर रहे हैं कि मैं किसी और के बारे में सोचूंगा भी नहीं। मन से भी वर्णन नहीं करूंगा। और यहां ये विचारणीय है कि भुसुंडी रामायण के घटनाक्रमों में क्रमों के नायक दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम धनुरधारी श्री राम ही हैं। अथवा बांसुरी बजाने वाले लीला पुरुषोत्तम कृष्ण है। यह विचार करने वाली बात है कि यहां किसकी बात हो रही है। राम है कि कृष्ण है जिनको भुसुंडी रामायण में राम नाम से संबोधित मात्र किया है। यह विचार करने योग्य मात्र है। वह धनुधारी श्री राम है या बांसुरी बजाने वाले श्री कृष्ण है। जिनको यहां पर भुसुंडी रामायण में राम कहा गया है। बस इतनी सी बात है। श्री राम बांसुरी बजा बजाते हुए उन रमणियों के मध्य ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे विद्युत वनिताओं
00:31:48:04 से घिरे गर्जन करते मेघ भुसुंडी रामायण पूर्व खंड 35वा अध्याय और 13 से 14 श्लोक तो एक काम करो अब धनुष ले लो उनके हाथ से बांसुरी पकड़ा दो खड़ा कर दो पूरा सिस्टम ही चेंज कर दो अपने द्वेष के चलते अच्छा श्री राम जी छलिया भी है छलिया भी है श्री राम जी लो भसुंडी रामायण पूर्व खंड छलिया कहा जा रहा है राम को तो ये राम है कि कृष्ण है कौन है ये रामायण पूर्व खंड 39वा अध्याय 20 से 25वा श्लोक धातव्य है कि उक्त उक्त घटनाओं को ब्रह्म भाव के आधार पर व्यवहारिक रूप में भी स्वीकार करने पर कोई आपत्ति नहीं है कोई आपत्ति नहीं है सारी घटनाएं स्वीकार है। उनका रास रचाना बांसुरी बजाना सब कुछ स्वीकार है। परंतु तब उक्त घटनाओं में प्रस्तुत भगवत स्वरूप को एक पत्नी व्रत धारण करने वाला कैसे स्वीकार किया जाएगा? सत्य प्रतिज्ञा कैसे स्वीकार किया जाएगा। मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे स्वीकार किया जाएगा। यह तथ्य तब और भी पुष्ट हो जाता है जब भसुंडी
00:33:03:08 रामायण के राम को पूर्ण परम ब्रह्म सच्चिदानंद इत्यादि को तो कहा गया है परंतु कहीं भी सत्य प्रतिज्ञ इत्यादि उपाधियां ना देकर ठीक इनके विपरीत छलियां इत्यादि उपाधियां दी गई है। एवं इसी क्रम में मर्यादा पुरुषोत्तम अथवा एक पत्नी व्रत रूप के विपरीत श्री राम को चरितार्थ करने वाले घटनाक्रम अनेक हैं। अनेक घटनाक्रम प्राप्त होते हैं। कैसे प्राप्त होते हैं? भूषुंड रामायण से प्राप्त होते हैं। कैसे प्राप्त होते हैं? भूषुंड रामायण में भी वो जो भरत वाला जो प्रकरण चल रहा है जब भरत जी कह रहे हैं कि चलो लौट चलो। तो उस समय भूषुंड रामायण में भी प्रभु श्री राम भरत जी को कह रहे हैं कि मैं 14 साल वनवास करूंगा और धर्मानुसार आचरण करूंगा। धर्मानुसार ब्रह्मानुसार नहीं हां यही कह रहे हैं तो अगर भसुंडी रामायण के कथानक को मान लिया जाए कि झूठे वेर पाए तो मानना पड़ेगा कि भाई धर्मानुसार वो वहां नहीं चले तो उनकी प्रतिज्ञा भंग हो गई सत्य प्रतिज्ञा रह गई और सीता माता के अतिरिक्त जो उन्होंने आनंद
00:34:18:21 रामायण में प्रतिज्ञा की हुई है। वाल्मीकि रामायण में प्रतिज्ञा की हुई है। सीता माता के अतिरिक्त किसी को भी माता के रूप में देखने की प्रतिज्ञा हम उसका भी विरोध हो जाएगा भसुंडी रामायण में क्योंकि यहां तो वो वो रास यही रचा रहे हैं। कृष्ण रूप के लिए वो नहीं दे रहे वरदान कि मैं अगले जन्म में आऊंगा। एक राम वो हैं जिनको जब पराई स्त्रियां मिल रही है या अमुक अमुक दिव्यांगनाएं हैं जो प्रकट हुई है वहां पर
00:34:54:21 जो लीलाएं हैं उनको प्रस्तुत करने के निमित्त जो दिव्य भाव भगवान का उसको प्रस्तुत करने के निमित्त जो प्रकट हुई है उनको एक वो राम है जो अपने कृष्ण रूप की प्रतीक्षा करने को कह रहे हैं और एक वो राम है जो यहीं पर सब कुछ सब पूरा यही फुल एंड फाइनल कर दे रहे हैं ब्रह्म भाव के नाम पर यह बात और है यहां पर भी भगवान ने कई बार वहां वहां पर वो दिव्यता दिखाई है। ज्ञातव्य है कि भुसुंडी रामायण के अनुसार भी श्री राम ने भरत के समक्ष वनवास के समय भी धर्माचरण करने की ही प्रतिज्ञा की थी। भुसुंडी रामायण दक्षिण खंड 41वां अध्याय और 26 से 29वा श्लोक। ऐसे में उनके द्वारा आगे चलकर
00:35:45:27 ब्रह्म भाव से शबरी के झूठे बेर खाने के रूप में उनके द्वारा धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए कार्य करने पर भी उन्हें सत्य प्रतिज्ञ किस आधार पर कहा जाएगा। हम अब यहां फिर से वही बात एक बार ध्यान दिला दूं कि ध्यान रहे हम पूर्व में भी कह आए हैं कि विषय दोष लगने अथवा ना लगने का नहीं है। विषय यह है कि धर्म के अनुसार आचरण करेंगे। श्री राम अथवा ब्रह्म भाव के अनुसार यदि वे ब्रह्म भाव से धर्म की सीमा के बाहर कोई कार्य कर भी रहे हैं तो कोई आपत्ति नहीं परंतु उक्त कृत्यों की संगति शास्त्र के उन वाक्यों के साथ ना बैठने पर आपत्ति है जिनमें श्री राम को धर्मानुसार आचरण करने वाला कहा गया है। यहां तो भुसुंडी रामायण से ही भसुंडी रामायण की बात कट रही है। वाल्मीकि जी की भी आवश्यकता नहीं है। अब क्या करोगे? हम यदि वह ब्रह्म भाव के आधार पर दिए गए वचनों से विमुख भी हो जाते हैं तो कोई आपत्ति नहीं है। परंतु शास्त्र द्वारा उनको वचन से विमुख ना होने वाला कहे जाने वाले वाक्यों के साथ संगठ संगति ना बैठने पर आपत्ति है। आपत्ति किस पर है समझ लो। जब आप जब यह जो भागवतानंद है अपने दृष्टांत की पुष्टि हेतु इसका एक वीडियो है जिसमें
00:37:00:28 यह अपने दृष्टांत की पुष्टि करने के लिए क्या बता रहा है कि भसुंडी रामायण के शब्दों में शाब्दिक अर्थ के विपरीत तर्क दे रहा है कि माता शबरी ने श्री राम को अपने नेत्रों के अश्रु जल से पाद्य अर्पित किया। अब यह अश्रु कहां से आ गया वहां पर? एज इट इज लेना है ना अर्थ। हम लोग अर्थ को शास्त्रंतर भेद को मिटाने शास्त्रंतरता को मिटाने के लिए हम जो है शब्दों का वो नहीं गुरु वचनों के आधार पर परंपरा प्राप्त ज्ञान विज्ञान के आधार पर यह जो शास्त्र में भेद आ रहा है वहां पर हम यह नहीं कर सकते कि भाई जो है कि वहां पर कहा जा रहा है कि झूठे वेदर दिए या तो वो दिव्य घटना है या तो अवशिष्ट है और या तो उन्होंने अपने भाव प्रदान किए ऐसा कुछ हम अर्थ नहीं ले सकते एज इट इज लेना है परंतु यह स्वयं यह स्वयं अवश्य ले सकता है। यह स्वयं वहां पर क्या कह रहा है कि शबरी ने अपने नेत्रों के अश्रु जल से पाद्य अर्पित किया। क्यों कह रहे हो भाई? एज इट इज लो ना। शबरी जी तुरंत आए। उनके चरणों को अपने नेत्रों से ही धोते हुए अपने नेत्र के आंसुओं से धोते हुए शबरी जी आश्रम में ले आए। तुम अपने व्याख्यान के लिए छेड़छाड़ कर सकते हो।
00:38:16:00 परंतु शास्त्रंतर को मिटाने के लिए दोष दृष्टि ना आ जाए कि भाई यह वाली जो यह घटनाक्रम है यह बिल्कुल विपरीत है श्री राम के श्री राम की सत्य प्रतिज्ञता की रक्ष रक्षा करने के लिए वहां पर उच्चिष्ट को अवशिष्ट ना समझा जाए वहां पे एज इट इज लेना है। फल का मतलब फल ही होता है ना। अब तू बता भाई ये नेत्रों से आंसू आंसू गिरने वाली बात वहां कहां लिखी है? हां। खैर तरस आता है ऐसे लोगों पर अपने ही हाथों से अपने ही घर में आग लगाते हैं फेम प्राप्त करने के लिए प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए।
00:38:58:00 चलिए माता शबरी ने श्री राम को अपने नेत्रों से अश्रु जल से पाद्य अर्पित किया। ये भागवतानंद कह रहा है तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र की निर्मलता अक्षुण रखने हेतु भुसुंडी रामायण का अर्थ वाल्मीकि रामायण के आलोक में क्यों नहीं ग्रहण किया जा सकता। सब प्रश्न यह है। इससे यह सिद्ध होता है कि आक्षेपकर्ता का मंतव्य किसी शास्त्रीय दृष्टांत का अन्वेषण अथवा शोध करना नहीं है। अपितु उन प्रामाणिक आचार्यों का विरोध करना है। उसका एकमात्र लक्ष्य जिनस में उन आचार्यों के प्रति अनास्था उत्पन्न करना है। जिनके सिद्धांतों के आधार पर कोई व्यक्ति स्वयं को नास्तिक के स्थान पर आस्तिक, सनातनी और वस्तुतः मनुष्य कहलाने का अधिकारी मानता है। जिनके द्वारा आज धर्म स्थापित है ना उनके प्रति अनास्था जगा दो। मुझसे कई लोग आकर के कहते हैं कि चलो ठीक है उनके कुछ कार्य गलत है। वो प्रामाणिक नहीं है। पर फिर भी उनका विरोध नहीं करना चाहिए। अगर आज हमने किसी अप्रामाणिक ऐसे स्वोषित स्वप्न निर्मित आचार्य को प्रश्न दिया ना तो कल को हर व्यक्ति को छूट मिल जाएगी। हमको भी सपना आया
00:40:14:02 कर्म कर्म पर वैसे ही रामपाल जैसे लोग खड़े हुए हैं। फिर तो हमारे ही द्वारा वो लोग पोषित होने लगेंगे। हर कोई व्यक्ति आएगा कहेगा मेरा भी सपना मान लो। क्यों ना माने? वो कहेगा भैया इसके आचरण बहुत अच्छे हैं। भागवतानंद के। मेरे भी आचरण बहुत अच्छे हैं। इस संबंध में साक्षी कौन है? भागवत के मानने वाले भागवत के साक्षी हैं और रामपाल को मानने वाले रामपाल के साक्षी हैं। बनाओ करणा जगतगुरु जैसे कोई व्यक्ति आकर के कहे कर्मणा रॉन्ग साइड में अच्छा ड्राइवर करणा कैसे भाई कोई आकर के कहे कि भैया यह बहुत कुशल ड्राइवर है रॉन्ग साइड में भी अच्छी गाड़ी चलाएगा इसलिए उसको अनुमति दे दो हं बिना एक्सीडेंट के गाड़ी चलाएगा इसलिए उसको अनुमति दे दो फिर क्या होगा सब लोग मैं भी कुशल हूं मैं भी कुशल हूं मैं भी कुशल हूं ऐसे किसी विप्लव को प्रश्रय देना होगा भागवतानंद जैसे स्वगोषित और अप्रामाणिक एक व्यक्ति को प्रश्रय देने का अर्थ ऐसे विप्लव को अंजाम देना और ऐसा ही भूतकाल में जब लोगों के द्वारा किया गया है तो उसी का तो ये परिणाम है आर्य समाज इस रामपाल निरंकारी राधास्वामी अडगड़ानंद सब वही
00:41:29:08 है। अतः इस प्रकार भी श्री रामचरित के विषय में स्थापित मौलिक सिद्धांतों के आलोक में भसुंडी रामायण का अर्थ करने पर भी शबरी जी ब्राह्मणी ही सिद्ध होंगी एवं मनुष्य दृष्टि से उनके उच्चिष्ट रूपी फलों का सेवन श्री रामचंद्र जी द्वारा कभी ना किया जाना ही सिद्ध होता है। ठीक है? चलो भाई आगे चलते हैं। अब श्री रामचरित के विषय में वाल्मीकि रामायण मूल क्यों? हर प्रश्न लिया है जो भी तुम लोग सोच सकते हो ना सारी सारी चीजें ली तो समन्वय बिाने के निमित्त आदि रामायण के श्लोक आदि रामायण यानी कि भुंडी रामायण श्लोकों का अर्थ ज्यों की त्यों ना लेकर वाल्मीकि रामायण से प्रभावित होकर क्यों लिया जाए वही आदि रामायण के आधार पर वाल्मीकि रामायण के अर्थ को मतलब यहां एक पक्ष रखा है कि भाई आदि रामायण के आधार पर तुम वाल्मीकि को बदलो ना वाल्मीकि के आधार पर आधी रामायण को क्यों बदल रहे हो यह क्यों नहीं हो सकता मतलब तुम राम को कृष्ण बना दो ना राम की की अपनी कथा तो कुछ रह ही नहीं जाएगी। अपना उनका जो तात्विक जो स्वरूप है उनका जो जो उनके द्वारा धर्म की संस्थापना है एक आदर्श स्थापित करना है वो सब तो कुछ रह ही नहीं जाएगा। खैर तो क्या है?
00:42:45:18 तो यदि आप यह चाहते हैं कि वाल्मीकि के आधार पर भुसुंडी के अर्थ को लिया जाए तो यह ऐसा क्यों ना किया जाए कि वाल्मीकि का अर्थ भुसुंडी के आधार पर ले लिया जाए। यद्यपि जो भसुंडी रामायण है वह स्वयं वाल्मीकि को प्रमाण मान रही है। सबसे पहली बात तो है तो समन्वय बिाने के निमित्त यह पूर्व पक्ष रख रहा हूं मैं। समन्वय बिाने के निमित्त आदि रामायण के श्लोकों का अर्थ ज्यों की त्यों ना लेकर वाल्मीकि रामायण से प्रभावित होकर क्यों लिया जाए? वहीं आदि रामायण के आधार पर वाल्मीकि रामायण के अर्थ को क्यों ग्रहण ना किया जाए अथवा स्वतंत्र रूप से दोनों ही कथाओं को स्वीकार क्यों ना किया जाए। तो जब हम यह कह रहे हैं कि भाई वाल्मीकि रामायण के आलोक में आप भसुंडी रामायण को देखो तो हम यह क्यों नहीं करते कि भसुंडी रामायण के आलोक में वाल्मीकि रामायण को देखें यह भी तो हो सकता है या फिर दोनों के स्वतंत्र देखें वहां पर राम ने झूठ बोला यहां पे राम ने झूठ नहीं बोला है ना तो क्यों वाल्मीकि रामायण का आलोक जरूरी आवश्यक है श्रुति ने वेद वाणी को ही नित्य कहा है ऋग्वेद वैसे बताने की आवश्यकताएं नहीं है पर पर फिर भी ऋग्वेद 8 75 छ व्यास जी ने भी वेद को नित्य कहा है। कहां पर? ब्रह्मसूत्र
00:44:01:01 में एक तीन 28 29 वेद अपषय हैं। ब्रहानक उपनिषद दो 4 10 और तमाम अन्य प्रमाण स्थल हैं। वेद ही परम प्रमाण है। मनुस्मृति दो 13 इसी क्रम में जब सच्चिदानंद स्वरूप भगवान श्री राम के रूप में अवतरित होते हैं तब अपचय वेद ही वाल्मीकि रामायण के रूप में अवतरित होते हैं। कहां लिखा है? वाल्मीकि रामायण एक एक और एक चार छ में भी कुछ इसी प्रकार का भाव प्रस्तुत है। अतः अपौषय होने के कारण वाल्मीकि रामायण भी स्वतः प्रमाण हो जाती है। स्वतः प्रमाणता प्रमाण नहीं एवं इसी कारण से श्री रामचरित के विषय में इसे मूल मानकर इसके ही आलोक में अन्य राम कथाओं का अर्थ करना युक्ति युक्त सिद्ध होता है। अर्थात किसी भी राम कथा का ऐसा अर्थ निकालना जो कि वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध जा रहा होगा वह वहां पर वेदों का ही खंडन मान्य होगा। ज्ञातव्य है कि जहां एक ओर वाल्मीकि रामायण में धर्म के विषय में प्रमाण मानने के निमित्त श्री राम जी के लौकिक मनुष्य स्वरूप को प्राथमिकता दी गई है तो वहीं दूसरी और अन्य रामायण राम कथाओं में उनके पारलौकिक ईश्वरीय स्वरूप को प्राप्त करने के निमित्त
00:45:16:04 प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ ही साथ कल्प वेद के कारण भी अन्य राम कथाओं की वाल्मीकि रामायण के साथ भिन्नता प्राप्त होती है। ऐसे में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के व्यवहार रूपी चरित्र के विषय में उनके लौकिक स्वरूप को प्राथमिकता से बताने वाले अपौरुषय ग्रंथ वाल्मीकि रामायण को प्रमाण मानते हुए श्री राम के पारलौकिक स्वरूप की प्रधानता से रची गई राम कथाओं में वाल्मीकि रामायण के विपरीत दिखने वाली घटनाओं को मनुष्य दृष्टि से ना जानकर दिव्य दृष्टि से समझना ही तर्कसंगत है। यहां ध्यातव्य है। जहां एक ओर भुसुंडी रामायण की प्रामाणिकता विद्वानों के मध्य आज भी शोध का विषय है। वहीं दूसरी ओर समाज में प्रभु श्री राम के चरित्र को नष्ट करने के निमित्त सनातन विरोधियों द्वारा दशरथ जातक, घट रामायण, अनामक जातक, दशरथ कथानक, राम की कहानी, राम की जवानी इत्यादि अनेक मनगढ़ंत पुस्तकों की रचना की गई है। दशरथ जातक में माता सीता को श्री राम जी की बहन बताते हुए उन दोनों के विवाह की कथा कही गई है। ऐसे में समाज में रामायण के नाम से घूम रही किसी भी पुस्तक द्वारा दिए जाने वाले संदिग्ध वृतांत से श्री राम जी को देखना किस प्रकार उचित हो सकता है? बहन
00:46:31:08 मान लो सीता माता बहन है दुसर्ग जातक के अनुसार प्रभु श्री राम की है ना क्योंकि भाई वह किसी में छपी हुई कहानी है और कागज के पन्नों में हमें दिख रही है इसलिए वो ग्रंथ है और फिर उसको मान लो और ऐसा बना दो श्री राम के चरित्र को और ब्रह्म भाव दे दो ब्रह्म भाव है कुछ भी कर सकते हैं दे दो बस इसलिए करपात्री ने भी बुल के जैसे सनातन विरोधियों के प्रतिकार स्वरूप रचे गए अपने कालज ग्रंथ धर्म रामायण मीमांसा में पुसुंडी रामायण इत्यादि अनेक राम कथाओं का भलीभांति अवलोकन करके ही अपौरुषय वाल्मीकि रामायण को मूल मानकर उसी के आलोक में अन्य सभी राम कथाओं को देखने की बात कही है। एवं वाल्मीकि रामायण द्वारा स्थापित मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अनुकरणीय आदर्श चरित्र का खंडन खंडन करने के निमित्त लोक में प्रचलित अन्य राम कथाओं का आलंबन लिए जाने पर ही उन्होंने बुलके जैन जैसे विरोधियों का प्रतिकार करते हुए अपने ग्रंथ रामायण में मानसा के पृष्ठ संख्या 703 में आदि रामायण को प्रमाण मानने का स्पष्ट प्रमाण कोटि का ग्रंथ मानने को स्पष्ट अस्वीकृत किया है। उन्होंने वहां कहा है तथाकथित
00:47:46:26 कहा है जो एक बताया जाता है ना कि उन्होंने जो है यह पढ़ी ही नहीं थी। उन्होंने देखा ही नहीं भुसुंडी रामायण को इस तरह का आरोप लगाया जाता है या उन्होंने प्रमाण माना है। उन्होंने उतने ही अंशों को उद्रत किया है जितने अंश वाल्मीकि रामायण के संगत हैं। उन्होंने प्रमाण नहीं माना है कि भाई ये आपके यहां भी लिखा है। जैसे हम किसी बात को कहते हैं कि इतने ये जो वेदों से मैच खाने वाली चीजें इतनी चीज तो आपके यहां भी लिखी है। परंतु अपनी उस मान्यता को स्वीकार करने के लिए हम उस अमुक ग्रंथ पर आधारित नहीं है। हमारे पास अपनी स्वतंत्र विवेचना है। स्वतंत्र प्रमाण है। आपकी संतुष्टि के लिए हम आपकी जिसमें प्रमाण्य बुद्धि है उससे हम निकाल करके कुछ दिखा देते हैं कि भाई यह चीज तो तुम्हारे यहां भी लिखी है। इसमें तो कोई शंका होनी नहीं चाहिए। तो उस रूप में उन्होंने अनेकानेक जो राम कथाएं हैं उनके वचनों को द्रत मात्र किया है। परंतु प्रमाण कोटि का ग्रंथ नहीं माना उन्हें। तो वहां पर रामायण मीमांसा के 703 वे पृष्ठ में पढ़ लेना। आदि रामायण को उन्होंने प्रमाण के रूप में नहीं माना है। अच्छा देखा जाए तो ऐसे अनेक आगम ग्रंथ हैं जो दूसरे संप्रदाय के उपास्य देवी देवताओं के प्रति ब्रह्म बुद्धि रखने का निषेध करते हैं। ऐसे में सभी संप्रदाय
00:49:02:09 द्वारा प्रमाण माने जाने वाले इस प्रकार के अह सभी शास्त्रों को विवेचना का आधार सभी शास्त्रों को विवेचना का आधार बनाने पर किस प्रकार का विप्लव हो सकता है? समझ रहे हैं ना? आगम शास्त्र में क्या-क्या एक दूसरे का विरोध है हम चलो अद्वैत संप्रदाय तो मान भी लेगा ये श्री संप्रदाय मद संप्रदाय ये सब कैसे मानेगा भाई खैर यह निर्णय पाठक गण स्वयं करें आदि रामायण को सुलभ कराने वाले लेखक लेखक भी प्राप्त प्रति की भूमिका के पृष्ठ संख्या 60 पर लिखते हैं कि आदि रामायण वैष्णवों का आगम ग्रंथ है जिसमें माधुर्य भाव की प्रधानता अन्य देवी देवताओं का तिरस्कार वर्णाश्रम की उपेक्षा एवं आचरण संबंधी नियम में नियमों में शिथिलता दिखाई गई है। ध्यातव्य है कि दक्ष के यज्ञ में शापितों के उद्धार हेतु शैव वैष्णव और सौर सा तथा गानपत्य आगमों की रचना की गई है। यह शास्त्र कापालिक अघोर भैरव आदि नामों से भी जाने जाते हैं। उनमें कहीं-कहीं वेद से विरुद्ध अंश भी है। वेद से भिन्न वेद यानी कि वाल्मीकि रामायण अपौरष है। वेद से भिन्न अर्थ को स्वीकार करने के लिए द्विज सर्वथा अनाधिकारी हैं। वह होते हैं जो पढ़ाते हैं। अर्थात
00:50:18:04 वेद से भिन्न अर्थ को तो स्वीकार करना ही नहीं चाहिए। अत वैदिक पुरुष सभी प्रकार से प्रयत्न करके वेद का ही आश्रय लें। यही शाश्वत धर्म है। देवी भागवत 7 39 28 से 33 यहां यह तथ्य स्मरणीय है कि कतिपय शास्त्रों के प्रति संशय पूर्ण दृष्टिकोण होने के उपरांत भी प्रमाणिक आचार्य आवश्यकता अनुसार अपने वक्तव्य के समर्थन में उनके संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। इसका मुख्य कारण उन विशिष्ट अंशों की वेदमूलकता वेदों पर आधारित होना है। वही जितना अब हमारे वाल्मीकि रामायण से मैच खा रहा है तो इसमें तो शंका नहीं होनी चाहिए उस रूप में। अर्थात लोक में प्रचलित शास्त्रों के वह अंश जो स्वतः प्रमाण शास्त्रों के प्रतिकूल नहीं है। उनका आलंबन केवल सिद्धांत की पुष्टि और बोधगम्यता हेतु लिया जाता है। उदाहरण स्वरूप पूज्य करपात्री जी ने भी अपने ग्रंथों में आदि रामायण या अन्य गौण रामायणों के उद्धरण अपने पक्ष को सुदृण करने के लिए दिए हैं। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि वो जो पक्ष वहां सुद्रण करना चाह रहे हैं उसके लिए वो उन्हीं प्रमाणों पर आश्रित है ना। उनके पास स्वतंत्र रूप से अपने जो अपने पक्ष को पुष्ट करने हेतु पर्याप्त सामग्री है।
00:51:33:06 पर लोगों की यदि अमुक अमुक ग्रंथों में आस्था है तो उस ग्रंथ का उतने उस सिद्धांत की पुष्टि के लिए जिस सिद्धांत में वो जो ग्रंथ है वह प्रतिकूल नहीं है। अनुकूल है। उसका उदाहरण दिया जा रहा है। तो यह बात कहना गलत है कि उन्होंने अपने ग्रंथ में जो है इतना इतना प्रमाण यूज़ किया है। पहले पूरा जान लिया करो तब बोला करो। ठीक है? उन्होंने इतना प्रमाण माना उतना प्रमाण माना है। खैर
00:52:08:02 इसका आधार वेद इसका आधार उन संदर्भों की वेद मूलकता है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि वह उन्हें वाल्मीकि रामायण के ही समान सर्वथा प्रामाणिक स्वीकार करते हैं। करपात्री जी ने ऐसी अनेक राम कथाओं के प्रसंग भी उद्रत किए हैं जो सामान्यतः अप्रामाणिक मानी जाती है। किंतु वहां उनका आधार उस विशिष्ट अंश की सिद्धांत अनुकूलता है ना कि संपूर्ण ग्रंथ की प्राथमिकता। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इन बाह्य संदर्भों के अभाव में भी उनके पास सिद्धांतों को सिद्ध अपने सिद्धांतों को सिद्ध करने हेतु पर्याप्त स्वतंत्र एवं मौलिक प्रमाण उपलब्ध हैं। अथवा यदि केवल संदर्भ प्रस्तुत करने मात्र से कर्पात्री जी द्वारा भुसुंडी रामायण को प्रमाण माना जाना सिद्ध होता है तो क्या रामायण मीमांसा में गुण भद्रकृत जैन उत्तर पुराण का संदर्भ प्रस्तुत किए जाने पर करपात्री जो करपात्री जी द्वारा इस रामकथा को भी प्रमाण माना जाना स्वीकार किया जाएगा। जैन की जैनों द्वारा रचित एक पुस्तक है गुण भद्र कृत जैन उत्तर पुराण इसको भी स्वीकार इस आपके हिसाब से करते क्योंकि उन्होंने उसका वचन उद्रत कर दिया है। ध्यान रहे किसी शास्त्र को बिना पर्याप्त अनुसंधान के प्रमाण रूप में स्वीकार कर लेना भी उतना ही घातक है
00:53:23:03 जितना कि बिना अनुसंधान के किसी भी प्रमाणिक शास्त्र को प्रक्षिप्त कह देना। अब यहां पर प्रक्षिप्त वाली बात आ रही है। यदि आर्य समाजियों द्वारा हमारे शास्त्रों को प्रक्षिप्त कहकर अस्वीकार करने की बात का हम विरोध करते तो इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं हो सकता कि हमें किसी भी शास्त्र को बिना पर्याप्त अनुसंधान के प्रामाणिक मान लेना चाहिए। यह ठीक इस प्रकार से है कि यदि वर्तमान में वर्तमान वातावरण में बहन भाई के विवाह को अस्वीकार किए जाने के कारण जनसामान्य धर्माभास की ओर आकर्षित होने लगे तो हम इस समस्या का निराकरण करने के लिए बहन भाई के विवाह को भी धर्म बताने लगे हैं। ठीक उसी प्रकार यदि प्रक्षिप्तवाद का सहारा लेकर आर्य समाज दुराग्रह करते तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि हम शास्त्रों में मिलावट किए जाने की संभावना को ही नकार दें। ऐसी ही स्थिति में परंपरा प्राप्त आचार्य की उपयोगिता सिद्ध होती है। इसलिए केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं केवल ग्रंथ नहीं अपितु हम सदैव गुरु गोविंद और ग्रंथ के सामंजस्य से धर्म के निर्णय को स्वीकार करने का समर्थन करते हैं। हमारे हर वीडियो के अंत में देखिएगा एक मैसेज आता है मिशन एम3जी मिशन गुरु गोविंद और ग्रंथ
00:54:36:24 शबरी के अब्राहमणीय होने व श्री राम द्वारा शबरी के झूठ झूठे भेर खाने के समर्थन में भसुंडी रामायण का कुछ वैदिक परंपराओं द्वारा स्वीकार होने की बात भी कही जाती है। ऐसे में सर्वप्रथम विचारणीय है कि क्या किसी भी प्रामाणिक परंपरा द्वारा स्वीकार किए जाने पर उस शास्त्र अथवा सिद्धांत को निर्विवाद रूप से सभी परंपराओं द्वारा स्वीकार किया जाना आवश्यक है। अब यह जो बात कुछ कह रहा है कि उसको अमुक परंपरा ने जो है स्वीकार कर रखा है। इसलिए उसको निर्वाद रूप से स्वीकार कर लो। गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल ग्रंथ नहीं केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं। इस बात को समझो कि इसका अर्थ क्या है। ठीक है? चलिए। अब केवल यहां पर किसी परंपरा के द्वारा उसको स्वीकार किए जाने पर केवल ग्रंथ की बात आ रही है कि केवल जो है वहां पर जो है गुरु के कारण हम ले लें। क्योंकि गुरु ने उसको स्वीकार किया इसलिए हम ले लें। भाई जो वाल्मीकि रामायण है जो अपुषय ग्रंथ है उसके विपरीत यदि भुसुमंडी रामायण के घटनाक्रम जा रहे हैं तो या तो उन घटनाक्रमों को का अर्थ ऐसा प्रकट करिए जो वाल्मीकि रामायण के समर्थन में हो। अन्यथा किस प्रकार से उसको स्वीकार किया जाएगा।
00:55:51:08 जब पद्म पुराण में वाक्य आता है कि भैया विष्णु की ही भक्ति हो और अन्य सब भी कुछ है तो वहां पर उनका अर्थ लेते हैं ना अनंतता में वेदों की रक्षा के लिए भैया यहां पर अनंता के लिए कह दिया और वहां पर जो जो अर्थ वो ले रहे होते हैं वैष्णव वो तो हम नहीं लेते हैं हम ये कहां का क्या मजाक है क्या वास्तविकता में प्रश्न उत्तर के योग्य है किसी परंपरा द्वारा स्वीकार किए जाने पर वह ग्रंथ उक्त परंपरा के लिए मान्य हो सकता है। उसके स्वमत की पुष्टि हेतु हो सकता है। परंतु सार्वभौम रूप से किसी ग्रंथ को स्वीकार करने के लिए तर्क और प्रमाण दोनों की ही आवश्यकता होती है। अब विचार करें यदि इस सिद्धांत को अपना लिया जाए तो श्वेतासत्रपनिषद में तीसरे अध्याय के दूसरे मंत्र में और भी आगे यजुर्वेद सोलवा अध्याय दूसरा मंत्र इत्यादि श्रुतियों श्रुतियों में भगवान शिव को परम तत्व कहे जाने वाले वचनों को वैष्णव परंपराओं द्वारा विष्णु परक बताया जाता है। यह किस किस आधार पर स्वीकार किया जाएगा भाई? क्यों? एज इट इज मानो। क्यों वहां पे उसको विष्णु परख कर दे रहे हो? जहां श्रुति और श्रुति शास्त्रों में भगवान शिव को परम तत्व कहा गया है। हम रामानुज
00:57:06:16 संप्रदाय के प्रामाणिक आचार्य गोविंद राज भूषण द्वारा रामायण के भाष्य में युद्ध कांड के अंतर्गत 126 वे अध्याय के 126व सर्ग के 23वें श्लोक में पृष्ठ संख्या भी बता रहा हूं। 438 468 महादेव जो है वहां पर महादेव उन्होंने समुद्र को कह दिया। वह जो समुद्र पूजन हुआ है ना वहां पर शिवलिंग का पूजन महादेव का पूजन वहां उन्होंने महादेव का पूजन बता दिया वह तो समुद्र का पूजन किया है रुद्र का पूजन नहीं किया है स्पष्ट लिखा उन्होंने रुद्र का पूजन नहीं है वहां शिव जी का पूजन नहीं है मान ले इस बात को और उन्होंने क्यों नहीं माना एज इट इज हम उन्होंने क्यों नहीं माना अर्थात श्री राम ने रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा नहीं की थी बल्कि समुद्र देव की पूजा की थी यह गोविंद जी लिख रहे हैं क्या यह सभी परंपराओं द्वारा स्वीकार करने योग्य सिद्धांत है? और सबसे बड़ी बात कि उन्होंने क्यों नहीं स्वीकार किया राम के द्वारा शिव को पूजित होना? यही नहीं तथाकथित स्वगोचित स्वप्न सिद्ध आचार्य कर्मणा जगतगुरु भागवतानंद द्वारा आदिका प्रस्तुत किया जाने वाला शाक्त संप्रदाय का आगम शास्त्र वही वो भी उसमें बात की ना हमने देवी
00:58:21:22 भागवत में क्या लिखा है शक्ति संगम तंत्र है जिसमें छिन मस्ता खंड तृतीय पटल में मंत्र जाप की ऐसी अनेक विधियां दी गई है जिन्हें श्री संप्रदाय कभी स्वीकार नहीं करेगा। क्यों भैया? भागवतानंद तो स्वीकार कर रहा है ना। तो स्वीकार कर ले श्री संप्रदाय वाले वहां पे अलग-अलग तरीके से मंत्र जाप दिखाया है कि रजसला स्त्री के अह इस तरह से जीवा ये करके और उसको तो बोलने भी असहज है। खैर आप लोग खुद ही पढ़ें। चिन्मस्ता खंड तृतीय पटल हम वहां देखें किस-किस तरीके से मंत्र जाप करना है जिससे मुक्ति हो जाएगी कल्याण हो जाएगा तो स्वीकार कर लो भागवतानंद की जो स्वप्न निर्मित परंपरा है ना उसको स्वीकार कर लो सब लोग और वही कार्य करो जो उसमें लिखा हुआ है शक्ति संगम तंत्र में
00:59:12:14 क्या उपरोक्त सिद्धांत के अनुसार इन अंशों में प्रत्येक वैष्णव संप्रदाय को भी अशास्त्रीय कहा जाएगा? जो इस तरह से विष्णु विष्णु शिव जी के लिए जो द्रत जो वचन है उनको विष्णु परक कर लिया और जो यह महादेव बता दिया समुद्र को तो क्या इनको अशास्त्री कहा जाएगा जबकि वो वहां तो उनका शास्त्र के विपरीत जाना स्पष्ट दिखाई दे रहा है फिर भी क्या इनको अशास्त्रीय कहा जा रहा है और यदि कहा जा रहा है तो फिर काहे की रामानुज परंपरा श्री संप्रदाय कैसे होगा हम खैर अंतत गतवा भसुंडी रामायण तो दूर सार्वभौम रूप से स्वीकार्य आनंद रामायण में श्री राम और सीता को भगवान शिव और पार्वती का अवतार बताया गया है आनंद रामायण में हम बिना किसी लाग लपेट के शास्त्र की इस पंक्ति को कौन सा वैष्णव संप्रदाय स्वीकार करता है मुझे बता दें आनंद रामायण में दुर्गा माता कह रही हैं कि सीता में सीता के रूप में मैं हूं और राम के रूप में महादेव है और हम दोनों में जो और इनमें जो भेद भेद करता है। वह नरकगामी है। देखो क्या लिखा है। मैं ही सीता हूं। राम साक्षात शिव है और हम में और सीता में राम में तथा शिव में भेद
01:00:27:22 मानते हैं। जो लोग वह करोड़ों जन्म पर्यंत रॉक नरक में सड़ते हैं। आनंद रामायण मनोहर कांड 12वा अध्याय 12वा सर्ग 26 से 28वा श्लोक अद्वैतवादी शंकर संप्रदाय के विपरीत यह किस वैष्णव संप्रदाय द्वारा स्वीकार किया जाएगा? तो इसीलिए कहता हूं मत पड़ो चक्कर में कोई है नहीं टक्कर में खामखा का पड़ी लकड़ी मोल ले ली इसी क्रम में जहां एक और मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्र दास जी भी अपने एक वक्तव्य में कहते हैं कि भक्तमाल प्रमाण कोटि का ग्रंथ नहीं है। राजेंद्र दास जी देखिए सहज सहजता से बात को प्रस्तुत कर दिया। अपने मत की पुष्टि में तो उन ग्रंथों का अध्ययन है परंतु प्रमाण कोटि का ग्रंथ नहीं है। वहीं दूसरी ओर अखंडानंद सरस्वती जी महाराज की बात की जाती है कि भैया उन्होंने शबरी को शूद्रा कह दिया। तो अखंडानंद सरस्वती जी भी समाज में शबरी को लेकर व्याप्त धारणा के अनुसार प्रवचन तो करते हैं। किया होगा। बिल्कुल परंतु धर्म और अधर्म के विषय में करपात्री जी को ही निर्णायक घोषित करते हुए अपनी वाणी को उन्होंने उस अंश में प्रमाण कोटि का नहीं कहा है। समाज में व्याप्त जो धारणाएं हैं उनके अनुसार
01:01:42:28 यदि हमने किसी सिद्धांत को किसी प्रवचन में कहीं पर बोला है तो उससे हमारा उसको प्रमाण के रूप में ही स्वीकार करना सिद्ध नहीं होता है। उन्होंने यह भी बोला है कि धर्म और अधर्म के विषय में करपात्री जी ही उनके निर्णायक हैं। एक नाम हमारे मन में लौट के आ गया फिर श्री कृपात्री जी महाराज से मेरा परिचय सन 42 से ही जब मैंने दंड ग्रहण किया था मुझे याद है कि मैं हरिद्वार से चल के वृंदावन पैदल आया तो रास्ते में मेरठ में उनका यज्ञ हो रहा था तो वहां गया था और उनके सत्संग से जो नारायण धर्म पर, वेद पर, शास्त्र पर, वेदांत पर, अद्वैत पर जो श्रद्धा और अनुभूति की स्पष्टता हुई है। उसके लिए मैं उनका कृतज्ञ हूं। और नारायण और भी हमारे क्या क्या बताएं। निश्चनंद जी महाराज हमको रोज वेदांत सुनाते हैं। उपनिषद
01:02:58:28 उपनिषदों का सार तो हमको ऐसा लगता है कि स्वामी जी महाराज श्री कृपात्री जी महाराज ही उनके रूप में बैठकर के हमको सुना रहे हैं। तो उनको निर्णायक घोषित करते हुए उन्होंने यह घोषणा इन शब्दों में अप्रत्यक्ष रूप से घोषणा की है कि उनके किसी भी वक्तव्य को कर्पात्री जी जैसे वाल्मीकि रामायण के आलोक में अन्य रामायणों को देखा जाएगा। ऐसे ही अखंडानंद सरस्वती जी महाराज जब स्वयं अपना निर्णायक करपात्री जी को घोषित कर रहे हैं तो कर्पात्री जी के आलोक में उनके किसी वचन को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जाएगा। अथवा उनके अर्थ को कर्पात्री जी के आलोक में लिया जाएगा। तो उनके किसी भी वक्तव्य को करपात्री जी महाराज अथवा सांकर परंपरा की निर्णायक गद्दी गद्दी पर विराजमान शंकराचार्य जी के आलोक में ही स्वीकार किया जाएगा। अंतत कथवा एक ही प्रश्न जिस ग्रंथ की प्रामाणिकता आज भी संशय का विषय है। ऐसी भुसुंडी रामायण में स्वतः प्रमाण वेद के अवतार अपरुषय ग्रंथ वाल्मीकि रामायण के विपरीत कहे गए कुछ वचनों के आधार पर मर्यादा पुरुषोत्तम सत्य प्रतिज्ञ श्री राम के आचरण को ब्रह्मभाव के नाम पर विधि बहाय सिद्ध कर उन्हें वचन से विमुख हो जाने वाला मानकर उनमें
01:04:14:04 दोष दृष्टि रखना परंतु वहीं तुलनात्मक रूप से काक भुसुंडी के अज्ञात रचनाकार के प्रति प्रमाण बुद्धि रखना ये किस प्रकार से धर्म संगत है बिल्कुल धर्म संगत सिद्ध नहीं होता। अब आता है छठवां अध्याय अपया दीक्षित जी के विषय में शंका समाधान। शंकर अब पूर्व पक्ष क्या है? शंकर परंपरा के ही मान्य आचार्य अपय दीक्षित जी ने उनके ब्रह्मसूत्र भाष्य में सबरी को शूद्र ही माना है। इसके लिए उन्होंने श्लोक प्रस्तुत किया है। कहां का? विष्णु धर्म पुराण का। उस श्लोक का अर्थ है धर्मव्याद आदि अन्यों ने भी घणित निम्न योनि में होकर पूर्व के अभ्यास से वैसे ही सिद्धि प्राप्त की जैसे श्रमणी शबरी ने प्राप्त की थी। ठीक है? सर्वप्रथम तो हम यही कहेंगे कि अनुसंधान की परिधि में ना आकर यह प्रश्न किसी विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति की संकीर्ण सोच को ही प्रकट करता है और वस्तुतः यह अत्यंत हास्यपूर्ण है। क्यों है हास्यपूर्ण? कतिपय दिवस पूर्व रामानुज संप्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य विद्या भास्कर जी ने एक चलचित्र के माध्यम से शूद्र वर्ण शूद्र वर्ण के आचार्यत्व के समर्थन में अपना वक्तव्य निर्गत किया था। अभी वीडियो लगा देते कि भाई चरण चरण में मस्तक
01:05:29:08 झुकता है मस्तक ब्राह्मण है ब्राह्मणों से मुख मासी बाहु राज्याद्रो तो कितनी गहरी बात भाई रस तो है जहां दास रस है भक्ति रस है वही तो ज्यादा रस मिलता है और संकल्प में शूद्र के लिए दासोहम के साथ शर्मा वर्माहम गुप्तोहम दासोहम जब कहते हैं तो ये अनुभव हमारा जो दासोम कहना है वह तो औपाधिक होगा लेकिन वहां दासोम वास्तविक है इसीलिए हम उनको अपने आचार्य के रूप में स्वीकार करते हैं और कहते हैं महाराज जी आप हमारे यहां चरण पधरा दे। इस वीडियो के अनुसार जब इस वीडियो को देखने के बाद तार्किक दृष्टि से यह अनुमानित है कि उनका मंतव्य केवल शूद्र वर्ण से मार्गदर्शन प्राप्त करने तक ही सीमित रहा होगा। हम अपनी ओर से आकलन कर रहे हैं। नहीं तो भागवतानंद यदि द्वेषी हो जाए। है ना? अभी फिलहाल ठीक चल रहा है। मगर यदि जैसे मुक्तेश्वरानंद जी के विपरीत गया समय आने पर जैसे पूरी पीठ के विपरीत गया समय समय आने पर जैसे पीएन मिश्र के विपरीत गया समय आने पर जैसे संदीप क्या
01:06:44:24 कहते हैं? संदीप जी के विपरीत गया समय आने पर। ऐसे ही किसी दिन जब यह विद्या भास्कर जी के विरुद्ध जाएगा तो उनके ऐसे ही वक्तव्यों का खूब चौआ उड़ाएगा। अरे वह तो शूद्र को जो है आचार्य बनाने की बात करते हैं। हम यहां पर अनुमानित अपनी ओर से ही कह रहे हैं कि भाई वहां पर जो है शूद्रों के महिमा मंडन में कह दिया है। परंतु वो वाक्य भी उसी तरह से प्रमाण कोटि का नहीं है जैसे कि अखंडानंद जी का वो वाक्य। शूद्र को आचार बनाया जाना चाहिए। यह वाक्य है इनका विद्या भास्कर जी का। तो अब इसका क्या अर्थ लिया जाए कि उन्होंने शूद्र को केवल व्यास गद्दी पर बैठने की बात नहीं कही है। उन्होंने शूद्र के द्वारा मार्गदर्शन इत्यादि की बात कही है। इस इसके इस अर्थ में उनके उस वक्तव्य का अर्थ लेना चाहिए। तो
01:07:41:13 ना कि ना कि उन्होंने शूद्र को शास्त्रीय व्यासपीठ अथवा प्रामाणिक आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने की बात कही है। किंतु उनकी अनुपस्थिति में अब विद्यास्कर जी महाराज की अनुपस्थिति में उनके इस कथन का अनर्थ करते हुए यह निष्कर्ष सरलता से निकाला जा सकता है कि वे आर्य समाज या इस्कॉन की ही भांति वर्णाश्रम धर्म के विरोधी हैं। ठीक है? तो अगर वह यहां पर नहीं है तो उनके इस वाक्य का यह अर्थ भी निकाला जा सकता है। तो क्यों ना निकाला जाए? अगर अपया दीक्षित जी नहीं है तो उनका अर्थ जो है कोई भी कुछ भी निकाल सकता है। तो उनके यदि विद्या भास्कर जी महाराज नहीं है तो उनके कहे हुए वचन का अर्थ कोई भी कुछ भी निकाल सकता है। ऐसे नहीं है ना। परंपरा की आवश्यकता क्या है भाई? मैं समझ सकता हूं कि श्री संप्रदाय वाले तो कम से कम यह समझ रहे होंगे। भागवतानंदी तो नहीं समझेंगे। हां तो क्या है कि इस प्रकार की व्याख्याओं के प्रसार से पूर्व यह गहन अनुसंधान अनिवार्य है कि वक्तव्य की व्याख्या करने वाला व्यक्ति संबंधित आचार्य का प्रामाणिक प्रतिनिधि अथवा शिष्य है कि नहीं यहीं पर काम आती परंपरा कि अपया दीक्षित ने क्या बताए मैं बताऊंगा विद्या भास्कर जी महाराज ने क्या
01:08:56:16 बताए उनका प्रामाणिक शिष्य बताएगा उनके वक्तव्य का अर्थ करने का अधिकार उनके प्रामाणिक परंप परंपरा से प्रामाणिक शिष्य को है। ठीक है? खैर अन्यथा अन्यथा कोई भी व्यक्ति किसी के भी कथनों का कुतर्क पूर्ण अर्थ निकालने हेतु स्वतंत्र हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार अपया दीक्षित जी से प्रत्यक्ष अथवा प्रामाणिक रूप से संबद्ध ना होने पर भी उनके संदर्भ के आधार पर उनके निष्ठावान शिष्यों की प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाना प्रश्न चिन्ह लगाना। किस प्रकार से उचित है? सर्वथा अनुचित है। शबरी जी को भेलने तो अप दीक्षित जी ने भी माना था। तो आप ही के पूर्वचार्य इससे अब फिर वही बात है। उन्होंने क्या कहा आपको कैसे पता चला? क्योंकि उनके ग्रंथों में ही बात लिखी हुई। अरे भाई उनके ग्रंथों का अर्थ आपको कौन देगा? ग्रंथ कौन देगा आपको? परंपरा ना। सत्य तो यह है कि जिस विषय के बोध हेतु कोई पक्ष पूर्णतः शंकर परंपरा की शंकर परंपरा उसकी निर्णायक शंकराचार्य पीठ पर ही आश्रित है। उसी विषय में शंकराचार्य द्वारा प्रदत्त्य वक्तव्यों के अर्थ को संदिग्ध सिद्ध करने का प्रयास नितांत तर्कहीन और व्याघात पूर्ण है। विष्णु धर्म पुराण के
01:10:11:20 संदर्भित प्रकरण में ना तो सोनक ऋषि ने शबरी का परीक्षण कर उन्हें शूद्र घोषित किया है और ना ही आचार्य अप दीक्षित ने अपने अनुसंधान द्वारा उनके शूद्र होने की पुष्टि की है। इस विषय में वस्तु स्थिति निम्नलिखित है। क्या है? सोनक ऋषि का दृष्टिकोण क्या था? विष्णु धर्म पुराण के इस अंश में सोनक ऋषि योग की महिमा का प्रतिपादन कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूर्व जन्म के अभ्यासों के कारण धर्मव्याध जैसे अल्प वर्ण के मनुष्यों को भी परम सिद्धि प्राप्त हो गई। दृष्टांत क्या है? औचित्य क्या था? यहां शबरी जी की तुलना धर्म व्याध से करने मा करने का एकमात्र तर्कसंगत कारण परलोक गमन के दृश्य का चित्रांकन है। जो शबरी जी ने जो परलोक गमन की यात्रा की थी वो चित्र वो चित्रण वहां पर दिया गया है कि वो कैसे उस समय का दृश्य क्या था। शास्त्रों में शबरी जी के परधाम गमन के समय उनकी देह और वातावरण की दिव्यता का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। तो यहां जो सोनक ऋषि जी ने उपयोग किया है धर्मव्याध के लिए शबरी जी का उदाहरण वो इसलिए किया है कि वह समझा रहे हैं कि योग वाले को मुक्ति मिलती है तो दृश्य कैसा होता है कि शबरी जी जैसा होता है। यह नहीं कि धर्मव्याध क्योंकि शूद्र था तो शबरी भी शूद्र
01:11:27:01 थी। वहां योग की महिमा बताते समय योग से मिलने वाले फल को का चित्रण बताने के लिए उन्होंने शबरी जी का उपयोग किया। कैसे? क्या हुआ था? तो शबरी जी के बारे में वाल्मीकि रामायण तीन 74 32 से 34 में आया है। श्री राम के इस प्रकार आज्ञा देने पर मस्तक पर जटा और शरीर पर चीर एवं काला मृग चर्म धारण करने वाली शबरी ने आग में अपने को होम कर प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी स्वरी शरीर प्राप्त कर लिया। वह दिव्य वस्त्र दिव्य आभूषण दिव्य फूलों की माला और दिव्य अनुपन धारण किए हुए दिखाई देने लगी तथा सुदामा सुदाम पर्वत पर प्रकट होने वाली बिजली के समान उस प्रदेश को प्रकाशित करती हुई स्वर्ग लोक चली गई। तो यह जो चित्रण है यह दिखाना विष्णु धर्म पुराण के अनुसार वहां पर सोनक जी के द्वारा जो है धर्मव्याद के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया कि धर्मव्याद को मुक्ति मिली थी तो कैसा दृश्य था? तो ऐसा दृश्य था। इस रूप में शबरी जी का नाम वहां पर लिया गया। ना कि इस रूप में कि क्योंकि वो शूद्र था। वो हीन जाति में जन्मा था तो शबरी भी हीन जाति में जन्म करके मुक्ति को प्राप्त हो गई। अतः धर्म की धर्मव्याद की वैसी ही अलौकिक सद्गति
01:12:42:14 को श्रोताओं के समक्ष स्पष्ट रूप से दृश्यमान करने के निमित्त ही शबरी जी का उदाहरण सोनक ऋषि जी ने लिया है। अब निष्कर्ष क्या है? स्पष्ट है कि यहां शबरी जी का संदर्भ उनकी जाति के निर्धारण हेतु नहीं। अबितु उनकी सिद्धि की विलक्षणता को दर्शाने के लिए किया गया है। ना तो सोनक ऋषि का और ना ही अपया दीक्षित का उद्देश्य शबरी जी के वर्ण पर कोई निर्णय देना था। अपया दीक्षित को अपने भाष्य में यह बताना था कि शूद्र शरीर मिलने पर भी व्यक्ति को जो है अह मतलब वो ज्ञान प्राप्त हो सकता है जो मुक्ति पथ में आगे उसको बढ़ाए। तो उन्होंने वहां पर यह विष्णु धर्म पुराण का उदाहरण लिया। वहां पर शबरी जी को शूद्रा सिद्ध करने का कोई उद्देश्य ही नहीं है। उसको पढ़िए आप भाष्य को। तो उनको वहां पर यह सिद्ध करना है कि जन्मांतर में जो पूर्व जन्म में योगाभ्यास किया होगा। तो इस जन्म में जो है शूद्र जन्म मिलने के बाद भी जो पिछले जन्म का योगाभ्यास था उस योगाभ्यास में आगे के क्रम में बढ़ने पर इस जन्म में उसे वैसे ही मुक्ति प्राप्त हुई। जैसी शबरी को प्राप्त हुई कैसी मुक्ति थी वह उस समय का वो दृश्य ना कि शबरी शबरी क्योंकि
01:13:57:22 शूद्र थी और उसको मुक्ति प्राप्त हुई उसी प्रकार जो है धर्म व्याद को भी मुक्ति प्राप्त हो जाएगी ना अगर ऐसा होता तो जो क्या कहते हैं यदि अपय दीक्षित जी शबरी को शूद्र मानते होते तो वह सीधे-सीधे शबरी का उदाहरण लेते ना कि भैया शूद्र उनको तो यह सिद्ध करना था ना कि शूद्र शूद्र कुल में जन्म मिलने पर भी जो है आपको मुक्ति प्राप्त हो जाएगी तो विष्णु धर्म पुराण क्यों लेते वो सीधे शबरी का प्रकरण उठाते और दे देते देखिए यहां शद्रा शबरी को मुक्ति प्राप्त हो रही है उनका फोकस धर्मव्याद पे था धर्मव्याद को मुक्ति प्राप्त हुई वो बात और है कि बाय प्रोडक्ट से उसी श्लोक में शबरी जी का नाम लिखा गया है इस रूप इस इस क्या कहते हैं इस अर्थ में कि जो धर्मव्यात को मुक्ति मिल रही है वो किस कैसी दिख रही है मुक्ति वो चित्रित कैसा हो रहा है वो वो बाय प्रोडक्ट है वहां शबरी जी का नाम जो अप दीक्षित है उनका फोकस धर्मव्याद पर है कि धर्मव्याद को मुक्ति मिली तो उनको धर्मव्याद से मतलब था उस श्लोक को उन्होंने उर्रत किया वो बात और है कि धर्मव्याद की मुक्ति को चित्रित करने के निमित्त वहां पर जो शबरी जी हैं उनका उदाहरण दिया गया था ना तो सोनक ऋषि
01:15:12:26 ने निर्णय किया कि शबरी जी शूद्रा थी और ना ही अपया दीक्षित ठीक है चलो आ जाना आमनेसामने से बात करना तो अतः धर्म व्याद की वैसी ही अलौकिक सद्गति को श्रोताओं के समक्ष स्पष्ट रूप से दसमान करने के निमित्त ही शबरी जी का उदाहरण दिया गया है। निष्कर्ष क्या है? स्पष्ट है कि यहां शबरी जी का संदर्भ उनकी जाति के निर्धारण हेतु नहीं अपितु उनकी सिद्धि की विलक्षणता को दर्शाने के लिए किया गया है। ना तो सोनक ऋषि का और ना ही अप दीक्षित का उद्देश्य शबरी जी के वर्ण पर कोई निर्णय देना था। इसी क्रम में यदि रामचरितमानस की चर्चा करें कुछ छोड़ेंगे नहीं चिंता ना करो तो रामचरितमानस से क्या है रामचरितमानस की चर्चा करें जहां शबरी जी स्वयं को अधम और अधम ते अधम कह रही हैं तो ज्ञातव्य है कि अध्यात्म रामायण इत्यादि में भी शबरी ने स्वयं के लिए हीन जाति जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। अध्यात्म रामायण तीन 10 18 पढ़िए। एवं गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो शबरी जी की पंक्ति को ज्यों की त्यों प्रस्तुत मात्र किया है। मतलब वह अपने आप को अगर अधम कह रही हैं अन्य अन्य रामायणों में तो उन्होंने उसको उद्ध्रत कर दिया। इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि तुलसीदास
01:16:28:00 जी उनको जो है वो मान रहे हैं। उस समय पर शबरी जी ने अपने बारे में क्या कहा था। तो शबरी जी ने जो कहा था वो उन्होंने बता दिया कि इन्होंने तो यह कहा था। मगर इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने उसका अर्थ अपने हिसाब से लेकर के उसको शूद्र मान लिया। अच्छा उन्होंने क्यों कहा था फिर भी देख लेते हैं उन्होंने क्यों कहा था गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो शबरी जी की पंक्ति को ज्यों की त्यों प्रस्तुत मात्र किया है जिसका भाव हमें उसी अर्थ में ग्रहण करना चाहिए जिस अर्थ में हनुमान जी ने श्री राम के प्रति अपना दासत्व प्रकट करने हेतु स्वयं की हीनता का वर्णन किया है। रामचरितमानस चार छ क्या कहा था कि प्रात ले जो नाम हमारा ते दिन ताई ना मिले आहारा
01:17:10:16 तो क्या है यह तो मोक्ष दायक है हनुमान जी। क्या उनका नाम नहीं लेना चाहिए? मगर यहां तो वो कह रहे हैं कि भाई मेरा जो नाम ले लेता है उसको आहार नहीं मिलता। अपनी दीनता प्रकट कर रहे हैं। ये सब बातें मुझे रामपाल को बतानी पड़ती थी। रामपाल वाले आकर खड़े हो जाते थे। आज बताओ वर्णाश्रम धर्मियों को बतानी पड़ रही है। तो जिसका मन सच में चंगा है ना वो स्वयं को अधम हूं, नीच हूं, पापी हूं, दुर्जन हूं। ये कहते धर्मराज के अवतार विभीषण जी अपने को अधम नीच कह रहे हैं। गिद्धराज जटायु अपने को अधम नीच कह रहे हैं। हनुमान जी कह रहे हैं अपने को अधम नीच। शबरी जी अधमति अधम अधमति नारी तनमय मति बंद अघारी धातव्य है कि यहां पर यज्ञ पवित्र धारण करने वाले हनुमान जी ने स्वयं को परम कुलीन होने का भी विरोध किया है। वहां पर उन्होंने ध्यातव्य है कि यहां पर यज्ञ पवित्र धारण करने वाले हनुमान जी ने स्वयं के परम कुलीन होने का भी विरोध किया है। स्वयं तुलसीदास जी ने भी ग्रंथ के शुभारंभ में अत्यंत विनम्रता पूर्ण स्वयं पूर्वक अत्यंत विनम्रता पूर्वक स्वयं को तुच्छ और अज्ञानी कहा है जो कि केवल उनके समर्पण भाव और दैन्य का परिचायक है। इसका मतलब यह नहीं कि उनकी बात पर विश्वास नहीं करना है। उनकी बात को सुनना ही नहीं है। उन्होंने तो बहुत बुरा बुरा कहा है अपने आप अपने लिए।
01:18:25:22 रामचरितमानस एक 11 दो पढ़ लेना। अनेकत्र भी शबरी जी के लिए प्रयुक्त अधम अथवा हीन जाति जैसे शब्दों का शास्त्रीय विश्लेषण भी देख लेते हैं। स्त्री योनि का संदर्भ यहां अधर्म अधम और हीन जाति का अभिप्राय मुख्य रूप से स्त्री योनि से श्रीमद् भगवत गीता के नौवें अध्याय के 32व श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो पाप योनि में जन्म लेने वाले उसमें स्त्री स्त्री शूद्र वैश्य का वो आया है। तो शूद्र योनि को आध्यात्मिक साधना के दृष्टिकोण से अपेक्षाकृत कठिन या निम्न माना गया है। भगवत गीता 9 32 इसी क्रम में भागवत में भी यज्ञ पवीत व वेदाध्यन निषेध के कारण पतित द्विज स्त्री व शूद्र को एक ही पंक्ति में रखा गया है। स्त्री शूद्र और पतित द्व जाति तीनों ही वेद श्रवण के अधिकारी नहीं है क्योंकि वह कल्याणकारी शास्त्रोक्त कर्मों के आचरण में भूल कर बैठते हैं। अब इसके द्वारा उनका भी कल्याण हो जाए। यह सोचकर वेदव्यास जी ने बड़ी कृपा करके महाभारत इतिहास की रचना की। श्रीमद् भागवत 1425
01:19:29:10 ऐसे में स्त्री होते हुए शबरी के लिए हीन जाति शूद्र अथवा अधम जैसे शब्दों के संबोधन में यज्ञ पवीत एवं वेद अध्ययन के निषेध को ही आधार मानना चाहिए। इसलिए शास्त्र में स्पष्ट तौर पर कहा भी गया है जन्मना जाति शूद्रः हम आ गया। जन्म से सभी शूद्र होते हैं। संस्कार से वह द्विज कहे जाते हैं। स्कंद पुराण नागर खंड उत्तरार्ध 139 व अध्याय का 31वा श्लोक। ठीक है? पढ़ लेना भाई। यहां भी शास्त्रंतर सामंजस्य हेतु शूद्र का अर्थ शूद्र ना लेकर शूद्रवत लिया जाता है। प्रामाणिक आचार्य द्वारा जिसका हेतु यज्ञ पवित रहित व वेद अध्ययन रहित ही है। भाव शबरी जी ने इन्हीं शास्त्रीय मर्यादाओं का स्मरण करते हुए श्री राम के समक्ष अपनी स्त्री योनि की सहज हीनता प्रस्तुत की है ताकि उनका अनन्य भक्ति भाव और दासत्व पूर्णतः प्रकट हो सके। अतः यह निष्कर्ष निकालना कि शबरी जी का वर्ण शूद्रता पूर्णतः त्रुटिपूर्ण है। उनका कथन केवल ईश्वर के प्रति उनकी निरभिमानता और परम लघुता का दर्शन कराता है। जिसे जातिगत आधार पर परिभाषित करना पूर्ण रूप से युक्ति विरुद्ध है। युक्ति विरुद्ध
01:20:45:15 इतने पर भी इतने पर भी कुछ कुतर्की कहते हैं। इतना सब बता देने पर भी कुछ कुतर्की कहते हैं कि शबरी के ब्राह्मणी होने के विषय में और श्री राम द्वारा उनके झूठे बेर झूठे वेर ना खाए जाने के विषय में क्या प्रमाण है? तो सुन लो सुन लो उक्त विषयों में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की मर्यादा ही प्रमाण है। सुन लिया मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम तुम छीनोगे हमसे राम को आ जाना अब किसी भी प्रकार के वैचारिक मतभेद के निमित्त प्रत्यक्ष वार्ता करने
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→ Used in: A · Live स्वयं को निर्भय कहने वालों में आह्वान का भय बौखलाहट अभद्रता और पलायन at 1:47:42 ↗
01:21:30:12 का साहस प्रकट करें। अन्यथा मुंगेरी लाल के हसीन सपनों की दुनिया में डूबे रहने के लिए स्वतंत्र हैं आप। ठीक
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01:21:36:21 है? और यह जो सारी विवेचना है ना वीडियो के साथ उसमें भी पीडीएफ फॉर्म में भी आपको प्राप्त हो जाएगी। तो सौभाग्य था मेरा जो प्रभु श्री राम का पक्ष रखने का मुझे अवसर प्राप्त हुआ और यह जो बात फैली हुई है समाज में एक भ्रांति कि शबरी जी शूद्रा थी हीन जाति की थी और या फिर उनके झूठे बेर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने पाए थे। इसका भी निराकरण हो जाना एक इनफेटिव वीडियो केवल वह नहीं है कि भागवतानंद को उत्तर देना था। ठीक है? तो अपने राम को जानिए। रात में बैठकर जा रहे हैं। माता-पिता पीछे चिल्ला चिल्ला के भाग रहे हैं। राम राम राम वाल्मीकि रामायण में क्या लिख रहे हैं वाल्मीकि जी? खूंटे से बंधा हुआ घोड़े का बच्चा। वो देख रहा है अपनी मां को कुछ कर नहीं सकता। किस खूंटे से बंधा है? धर्म के खूंटे से। कौन सी रस्सी है? मर्यादा की रस्सी।
01:22:52:14 अपने आदर्श को इस प्रकार से लुप्त मत करो। यह हमारे सनातन का गौरव है। प्रभु श्री राम उनको इस प्रकार से अपनी द्वेष भावना के कारण मत मतंतरों के कारण अपनी मान्यताओं के कारण इस प्रकार से उन्हें जाने मत दो भाई। जय श्री राम। [संगीत]
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श्रीराम ने ब्राह्मण शबरी माता से अपने पैर क्यों धुलवाए? भागवतानंद प्रलाप भंजन : भाग २
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