⬜ Not used yet · 00:00:01:27 – 00:06:09:10 (6:07)
00:00:01:27 तो सभी को जय श्री राम। मैंने कई बार आपको बताया कि किसी को कभी हम छेड़ते नहीं। कोई हमें छेड़ दे तो छोड़ते नहीं। लोगों का यह कहना है कि भाई मैं भागवतानंद का सामना करने से कई बार कतराया और उसने मुझे चर्चा के लिए बुलाया था जब मैं पीछे हट गया। ऐसा एक बार हुआ था। उसके बाद मैंने उसको कहा कि भाई ठीक है अगर तुम ऐसे ही मान सकते हो तो ऐसे ही आ जाओ। हालांकि वो फिर तब से उस चर्चा से पीछे हटता रहा है। तो आज यहां पर माघ मेले में प्रयागराज में हम लोग हैं और मैं इस समय पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज के शिविर के बाहर खड़ा हुआ हूं और अभी मैं अंदर जाने वाला हूं जहां पर भागवतानंद कथा कह रहा है और अब मैं उससे बात करने के लिए कहूंगा कि भाई अपनी परंपरा के बारे में बताओ कि कैसे तुम्हारा निग्राचार्यत्व सिद्ध होता है और हां उसके जो प्रश्न है पीठ को लेकर के जो उसने आरोप लगाए थे जिनके बारे में वह प्रत्यक्ष चर्चा करना चाहता था यदि वह उसमें इंटरेस्टेड होगा तो वह भी करेंगे दोनों चीजें करेंगे और सबसे पहला उद्देश्य तो यही है कि अंदर जाकर के पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त हो जाए और यदि भागवत आनंद अब चर्चा से पीछे नहीं हटता है तो जरूर आपको एक चर्चा देखने को मिलेगी। अभी अगर अंदर सुलभ हुआ तो हम अंदर जाने के बाद के दृश्य
00:01:17:06 भी आपको दिखाएंगे। है ना जय श्री राम। केवल नंद नाम जगतया जयामयाम
00:01:50:26 मंगलम साधयामोपास धर्मराजोम वो तो थोड़ा स्वस्थ है अभी आए ही नहीं तो अभी दक्षिण की यात्रा में चलिए थोड़ा सुस्त हो गए थे। हम यही उद्देश्य है कि अगर कोई चर्चा आमने सामने से जो आप नहीं हो पाई उस समय तो हमारे कोई चर्चा अपेक्षित नहीं है। आप कुछ करना चाहे तो स्वतंत्र हम भी उपलब्ध हैं। हमारी ओर से तो यही है कि आप थोड़ा सा निग्रह परंपरा को डाल देंगे। अब ये व्यवस्था में इस व्यस्तता में संस्कृत तो हम लिख चुके हैं और जो हमारे अनुवाद हैं बाधित हैं। यही संपादक हैं। इनसे पूछिए। स्वामी जी के तो कुछ तो आप बताइए कुछ जिज्ञासा है आपने तो पाखंड घोषित कर दिया ना शक्ति संगम का श्लोक उठाकर जबकि पाखंड की श्रेणी वाले श्लोक तो उससे पहले अतीत हो चुके है आप मूल ही पाठ देख लो शक्ति
00:03:06:02 संगम तंत्र पर रिलेटेड हमने एक प्रश्न उठाया था मगर जो मूल जो जिज्ञासा है वो तो दूसरी है बताइए जैसे एक यही है कि अगर निग्रह आपने कहा कि भाई क्या कहते हैं ये आपका जो संप्रदाय है उसमें मैं आपको सभी संप्रदायों का निग्रह करना चाहता हूं। समय द्रोह निग्रह आज्ञाधार यह करता है अनुशासन जो शास्त्र का भंग करे उसका निग्रह अब उसमें बात ये आती है कि उनके यहां शास्त्र का जो अर्थ है परंपरा से जैसे रामानुजाचार्य भगवान ने कहा है वो आपको किसी रामचार्य से ही प्राप्त होगा कि आगे किसी प्रमाणिक आचार्य से। ठीक है। अब जैसे मान लीजिए कि आपको विद्या भास्कर जी से उस सिद्धांत का पता चला। ठीक है। तो अब आगे चलकर के आप ये क्लेम नहीं कर सकते कि विद्या भास्कर जी ये सिद्धांत गलत बता रहे हैं। अच्छा क्योंकि वो अगर वह सिद्धांत उनके पूर्वारों से विरुद्ध हो जाता तो तो आपको कैसे मिला वो क्या? आपको कहां से मिला है? उनके पूर्व से प्राप्त होगा। आपके उनके पूर्वाचार्यों से डायरेक्ट मिला है क्या? उनके पूर्वाचार्य तो उनको भी डायरेक्ट नहीं दिए। जैसे रामानुजाचार्य जी की अमूल अगर परंपरा पकड़े तो रामानुजाचार्य स्वयं विद्या स्वामी जी को भाष्य पढ़ाने तो आए नहीं थे। मगर जिस गुरु से उन्होंने लिया उसका विरोध थोड़ी ना कर सकते। ये तो उनकी व्यवस्था है। ये हमारी व्यवस्था नहीं है। ये उनकी व्यवस्था है। वो नहीं कर सकते। हम तो प्रभाकर
00:04:21:10 मत को देखेंगे कि जिन्होंने अपने गुरु का भी विरोध किया। नहीं हम कुछ और कहना चाह रहे हैं। ये कहना चाहेंगे जैसे गुरु शिष्य परंपरा से हमारे पास कोई एक सिद्धांत आया रामचरण हां भगवान का अब वो आया तो हमने जिससे लिया है। हां हम उसका निग्रह नहीं कर सकते। अच्छा ये आपकी अवस्था होगी। एक मैं बता रहा हूं। अगर हमने उसकी किसी बात को कहा कि यहां पर आप जो है सिद्धांत गलत बता रहे हैं। आपके पूर्वाचार्य ने गलत आपके पूर्व ने कुछ और कहा था। आप कुछ और कह रहे हैं। तो पूर्वाचार्य ने आपको नहीं कहा था। उनको कहा था। ठीक है। ठीक है तो उस विषय में वो आपके शब्द प्रमाण हुए। हां तो आप विषय को स्थापित करें कि अमुक विषय में उनका कथन जो है अपने पूर्वचार्य के अनुकूल है लेकिन आपका नहीं है। क्योंकि हर जैसे तो आप मदद्राचार्य भी कह देंगे। उत्तरकांड प्रक्षित हमारे गुरु जी बोलकर गए। इसीलिए जब हम उनके अनुगत सिद्ध हो गए। हां। हम चर्चा के उनके शिष्य बनकर यह नहीं कह रहे कि आप रामानुज संप्रदाय के अंतर्गत दीक्षा देकर हमको इसका बोध कराएं। हम यह कह रहे हैं कि आपके यहां इस सिद्धांत को किस रूप में आचार्य ने प्रतिपादित किया? और यही कारण है कि वेदांतीय विषयों पर हमने किसी रामानुज जी का खंडन नहीं किया। माध्यम का भी खंडन हमने नहीं किया। हमने ब्रह्मानंद जी से इस विषय में चर्चा की। हां उन्होंने ये कहा कि जो हमारा सिद्धांत है वो शास्त्र से शास्त्र की प्रमाणिकता गुरु से गुरु की प्रमाणिकता शास्त्र से इन दोनों में से एक भी पटरी को छोड़ नहीं सकते तो ये बताइए
00:05:36:16 माधवाश्रम जी को शंकराचार्य मानते हैं ज्योतिष पीठ का लेकिन माधवाश्रम जी से तो गुरु शंकराचार्य जी को मान्यता मिली नहीं थी स्वरूपानंद जी से मिले थे तो उनका शास्त्र और गुरु दोनों एक साथ चल रहे हैं कि अलग-अलग चल रहे हैं जरा पूछिएगा दोबारा मिलेगा देखिए अभी मैं ये पूछ रहा हूं कि अगर हमने किसी गुरु से एक सिद्धांत प्राप्त किया तो हम उसका उसका खंडन कैसे कर सकते इसका खंडन इसीलिए कर सकते हैं क्योंकि हमारे पास शिक्षावल्ली का बल प्राप्त है तो शिक्षावल्ली अधिकार देता है कि जो अनबद्ध कृत हैं जो उपास्य कृत है उन्हीं का अनुसरण करें अनबद्ध कृत है ना किसी
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→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 0:46 ↗
→ Used in: A · Video श्रीराम ने ब्राह्मण शबरी माता से अपने पैर क्यों धुलवाए? भागवतानंद प्रलाप भंजन :... at 1:36 ↗
→ Used in: A · Video शबरी शंका समाधान : भाग १ माता शबरी ब्राह्मण या शूद्र? क्या प्रभु श्रीराम ने जूठे... at 4:34 ↗
00:06:09:10 एक परंपरा को मानना पड़ेगा ना और फिर उसका आप खंडन नहीं कर पाएंगे जिसको मान लिया तो जो पूरी शंकराचार्य जी ने कहा कि शबरी जी ब्राह्मणी थी या किस शास्त्र के आधार पर उनके पूर्व ने बताया ये बताइए उन्होंने कहा वाल्मीकि रामायण में जो राम कहीं नहीं लिखा है ब्राह्मण वाल्मीकि रामायण में रामचंद्र जी मर्यादा पुरुषोत्तम कहे गए हैं। बिल्कुल धर्म आचरण करने वाले कहे गए तो वहां पर वो जो है अभक्ष भक्ष नहीं करेंगे। हां तो भक्ष भक्षण नहीं किया उन्होंने। शबरी के झूठे बैर खाना क्या है? शबरी के झूठे बैर खाना उन्होंने ब्रह्म भाव में खाया है। भक्ति भाव में खाया है। तो फिर वो तो फिर व्यवहार राम जी का पैर धोई है शबरी जी। राम जी का पैर धोई है शबरी। राम जी का पैर शबरी जी धोई हैं। एक क्षत्रिय कैसे किसी ब्राह्मण से पैर धुलवा रहा है भाई? मर्यादा पुरुष होकर ये बताइए। देखिए विषय अंतर हो गया। नहीं नहीं शबरी पर हम विषय है। विषय हटा नहीं है। शबरी पे बता रहा हूं। हम खाया बाद में पहले घर आए तब तो खाया जी सुन लीजिए आप सुन लीजिए अवसर हमको भी दीजिएगा तब जी आपने कहा कि बेर जुठा बर खाया तो खाया कब जब गए तब ना जब गए हैं उसी समय शबरी जी पैर धोए हैं कि नहीं उनका तो वो कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम है जो झूठा बेर खा कर तो गलत कर सकते हैं कदाचित लेकिन शबरी जी से पैर धुलवाकर गलत नहीं कर रहे हैं। अहिल्या जैसी ऋषि पत्नी को पैर से छूकर गलत नहीं कर रहे हैं।
⬜ Not used yet · 00:07:14:21 – 00:08:07:08 (0:53)
00:07:14:21 ठीक है। ब्रह्म ब्रह्म भाव से आपका कहना है झूठे बेर खाए। जो देवता होते हैं वो समर्थ होते हैं इसीलिए न देव चरितम चरे यह शास्त्र का वचन है यही कारण है कि भगवान ने कहा कि पत्थर तैरेगा तो पत्थर तैरा भगवान जब मरे हुए को जीवित करते हैं तो क्या वो सामान्य क्षत्रिय के अनुसार है या अपने का प्रदर्शन कर रहे हैं यानी कि मनुष्यगत उन्होंने मनुष्यगत नहीं खाया मनुष्यगत ना खाया है ना खाने का उपदेश किया है यानी कि व्यवहारिक घटना नहीं है पारमार्थिक घटना है शबरी जी के उस कृत में वह अलौकिकता है अलौकिक है हां वो उनका हमें कोई आपत्ति मगर व्यवहारिक हमने कभी नहीं कहा व्यवहार में प्रश्न है प्रश्न है यहां पर ये तो चलिए ठीक हो गया व्यवहारिक कृत नहीं है पारमार्थिक रूप से पारमार्थिक रूप से तो भगवान कुछ भी कर सकते हैं अब आप जब भगवान साक्षात कृष्ण रूप में कोई सेना निकल जा रहे हैं प्रश्न दिक्कत वाला ये है हां कि जैसे यही प्रश्न आर समझिए
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→ Used in: A · Video एक सवाल : दुनिया भर के पाखंडी परेशान | परंपरा at 2:38 ↗
→ Used in: B · Live Iskcon : धर्म का प्रचार या कुछ और Live Discussion With Prateek at 1:32:54 ↗
00:08:07:08 कि जिससे तुमको वेद मंत्र मिला उसके अर्थ पर यदि तुम्हें विश्वास नहीं है तो उसके मंत्र पर तुम्हें विश्वास कैसे और यदि उसके मंत्र पर विश्वास है तो उसके वेद मंत्र पर विश्वास
⬜ Not used yet · 00:08:17:08 – 00:09:19:08 (1:02)
00:08:17:08 क्यों नहीं है? तो कहने का तात्पर्य यह है कि अगर आप सभी संप्रदायों का निग्रह करेंगे। संप्रदायों का नहीं। हां। संप्रदायों का निग्रह कभी हमने ना कहा ना लिखा। संप्रदायों में जो घटनाएं हो रही हैं आचार्यों के द्वारा जो गलतियां हो रही हैं। केवल अनुशासनात्मक व्यवहार के विषय में हमने कहा है। अगर हमारा सिद्धांत को लेकर विरोध होता तो हमसे पहले कि अद्वैति द्वैति सब एक दूसरे मतलब कहने का यह है आचरण को लेकर विरोध करेंगे। सिद्धांतिक विरोध नहीं। सिद्धांतिक विरोध उनके संप्रदाय का जो माने वही वो मानेंगे। उनके यहां जीव की जो परिभाषा है, ब्रह्म की जो परिभाषा है, माया की जो परिभाषा है, वेदानुकूल वचनों के यहां से दिक्कत यही है, यही है कि उनके यहां का सिद्धांत वो सही बता रहे हैं कि नहीं बता रहे हैं इसमें आप कैसे करोगे? तो हम कहां उसको कर रहे हैं? क्योंकि हां तो बस कोई दिक्कत नहीं। आज तक एक उदाहरण दीजिए जब इस विषय को लेकर के आपके ब्रह्मसूत्र ने जो अर्थ आपने प्रतिपादित किया है, या शंकराचार्य ने किया, उसमें हम इस पक्ष से आपका खंडन कराया है। आप एक मेरा यानी कि सैद्धांतिक निग्रह नहीं होगा। तो सैद्धांतिक निग्रह करना ही नहीं है क्योंकि इससे जो अनंत शाखागत जो वेद का संप्रदाय प्रवर्तित होता है वह बाद हो जाएगा। तो अब मुझे आप बताइए कि आपको किस परंपरा से ये [संगीत] प्राप्त हुआ है कि वो सभी के झूठे हुए रामायण कहां से आया आपके पास? भुसुंडी
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→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 0:55 ↗
→ Used in: A · Video एक सवाल : दुनिया भर के पाखंडी परेशान | परंपरा at 4:42 ↗
00:09:19:08 रामायण से प्राप्त हुआ है। वो भुसुंडी रामायण कहां से आई है आपके पास? हमको अपने अध्ययन से प्राप्त हुआ है। स्वाध्याय वो सभी ग्रंथों को वो तो गीता प्रेस वाला जो देंगे वो हो जाएगा आपका प्रमाण। तो
⬜ Not used yet · 00:09:29:20 – 00:12:55:15 (3:26)
00:09:29:20 आप छपवा दीजिए वही मान ले। तो आप गुरु परंपरा बताइए ना। हमारे पास तो गुरु परंपरा शंकराचार्य आपको गुरु परंपरा से जब प्राप्त हुआ तो अग्नि पुराण प्राप्त हुआ था ना सर जो भी अग्नि पुराण में जब गौतम बुद्ध को शुद्धोधन पुत्र बुध को जब भगवान अपना अवतार स्वयं कह रहे हैं उस प्रकार से या विष्णुधर्म पुराण में कह रहे तो उसको मारने में क्या आपत्ति आ रही है ऋषिकेश ने तो कह दिया था कि उसको हटवाएंगे बाद देखिए बात ये है कि अच्छा आपको जब गुरु परंपरा से मिला तो आपके गुरु जी कब हुए थे आदि शंकराचार्य जी कब हुए आठवीं शताब्दी में हुए हैं श्रृंगेरी के अनुसार जिनके समर्थन से गुरु शंकराचार्य केश जी थे या 2500 साल पहले हुए थे और उनके के बर्थ में ईसा मसीह पढ़ने आए थे। ये धर्म ब्रह्म से प्रभावित नहीं है। तो हम धर्म ब्रह्म पर चर्चा करने नहीं बैठे। हम परंपरा पूछने बैठे हैं कि आदि शंकराचार्य जी कब हुए जहां से हम आपकी परंपरा जोड़ना शुरू करें। ये बताइए। ईसा मसीह से 500 तो श्रृंगरी वाले क्यों बोल रहे हैं? और साक्षात शिव स्वरूप बने घूम रहे हैं। जिनको अपनी परंपरा ज्ञान वो बताएंगे। वो वो बताएंगे। तो जाइए पूछिए उनसे जिसका जो गुरु है आज तक आप क्यों नहीं प्रश्न किए? सार्वजनिक आप क्योंकि उससे मेरा धर्म और ब्रह्म नहीं बिगड़ रहा ना। तो हमसे क्या आपका धर्म ब्रह्म बिगड़ गया होगा? बाकी आप आप जो है प्रामाणिक आचार्यों का वो करण कौन प्रामाणिक बताइए ना जिनकी प्रामाणिकता से पूरी शंकराचार्य शंकराचार्य बने उन श्रृंगेरी आचार्य को आप कह रहे हैं कि उनकी परंपरा गड़बड़ हो गई ठीक है तो जिनकी परंपरा ही अप्रामाणिक आपको ये कहना का मतलब है कि जो श्रृंगेरी वाले सही कह रहे हैं कि वो सही कह रहे हैं आप क्या मानते हैं ठीक है मैं बता रहा हूं
00:10:44:24 अब आप ये बता दीजिए कि रामानुजाचार्य सही कह रहे थे कि शंकराचार्य सही कह रहे हैं अपने संप्रदाय में उन दोनों का मत मान बस ऐसे ही अपने गुरु में हम दोनों का मत मान रहे हैं हां तो अपने गुरु के पास जाइए तो फिर आप क्यों तो फिर सर्वोच्च क्यों बने घूम रहे हैं कि हम ही सर्वोच्च आपके सर्वोच्च है। पूरे समाज को क्यों बताना है कि शंकराचार्य सर्वोच्च ये तो अनन्यता है तो अनन्यता अपने गुरु की होगी तो आपके गुरु का आप अनन्य मानेंगे तो सब नहीं मानेंगे ऐसे ही तो रामानुजाचार्य में विश्वास है सबका रामानुजाचार्य के लोगों का तो ऐसे ही शंकराचार्य में विश्वास है शंकराचार्य को सर्वोच्च धर्म पूरे हिंदू धर्म का क्यों माना जाए आपने अपनी किताब में लिखा है कि भैया जो मधवाचार्य का सिख परंपरा का हो वो मधवाचार्य में निष्ठा रखी रावण ये लिखा है ना आपने मधवाचार्य जी वालों ने क्या मधवाचार्य जी के नाम के आगे सर्वोच्च धर्म गुरु लगाया है अभी तक हमको देखने को नहीं मिला लगाया होगा तो आपको सार्वभौम से आपत्ति है पूरे सार्वभौम पर नहीं कहा हमने सर्वोच्च पर कहा सार्वभौम तो सभी हो गए फिर इसमें सर्वोच्च कौन नहीं है सभी गुरु सर्वोच्च आप इसको सार्वजनिक कहिए कि रामानुजाचार्य भी सर्वोच्च धर्म गुरु हैं बिल्कुल हम तो कहते हैं कहीं नहीं सुना आज तक सुना है कहते हम अभी कह देंगे सही कह रहे हैं सर्वोच्च धर्म गुरु हैं शंकराचार्य के अलावा रामानुजाचार्य सर्वोच्च धर्म गुरु हैं ऐसा मानते हैं अलावा नहीं हम उनमें भी शंकराचार्य को ही देखते हैं ना अच्छा आप देख सकते हैं आप आप देखिए बिल्कुल देखिए हम अपने गुरु में अगर अन्याय हैं अनन्य है तो पांच को प्रमाणिक मानते हमने कहां मना किया है आपको आप आप अपने गुरु में अनज नहीं है द्विवेदी जी आप अगर अनन्य होते तो शंकर जब पांच रात्रियों
00:11:59:25 की निंदा कर करके गाली दे रहे आपने कम से कम पक्ष रखा होता आप जो है विषय पंचरात्र गुरुओं में वो डाली प्रतिस्पर्धा वो सही कह रहे हैं कि वो सही कह रहे हैं आप प्रश्न कर रहे हैं कि जो परंपरा से आप आए हैं जिस परंपरा से आप आए हैं उसका आप उद्भव आदि शंकराचार्य के बाद से कब से देख रहे हैं हमने प्रश्न किया फिर हमने यह ब्राह्मणचार्य जी का नाम इस कब से इस कब से वो परंपरा असिद्ध है। ये संतुष्ट होता है। असिद्ध नहीं। हम तो यह कह रहे हैं कि जब शंकराचार्य सर्वोच्च धर्म गुरु होते हैं और अहमवेत विग्रह कहा गया उनके लिए। इसी नाम के आधार पर उनको शिव स्वरूप और अकाट्य माना जा रहा है। तो उनकी बात से इनकी बात कटती है। अकाट्य इसलिए माना जाता है क्योंकि उनके द्वारा प्रतिपादित जो धर्म और ब्रह्म है वो सर्वशक्तिमान तो गौतम बुद्ध और शबरी का प्रकरण तो उसमें आता नहीं है। वो तो इतिहास का विषय है। मगर जब आप इधर उनका खंडन करेंगे। जब इधर उनका खंडन करेंगे तो आदमी उसके प्रति अनास्था होगी ना। क्योंकि उसमें शब्द आपके व्यक्तिगत जीवन के व्यक्तिगत वचनों पर आस्था बनाने के चक्कर में हम शास्त्र को ताप
✅ This part is already used · 00:12:55:15 – 00:13:41:18 (0:46)
→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 1:05 ↗
→ Used in: A · Video एक सवाल : दुनिया भर के पाखंडी परेशान | परंपरा at 13:16 ↗
00:12:55:15 जावे तो शास्त्र आपके पास आए कहां से बिना गुरु परंपरा के आपकी क्या गुरु परंपरा है कहां से आए हमारे शास्त्र हमारे साथ अतीत जन्मांतर विद्यमान है और अगर एक शास्त्र पूरा सुना दीजिए चलिए कौन सा शास्त्र आपको सब प्राप्त है ना क्यों सुनाए हम आपको क्यों सुनाए यानी कि इसको कैसे माने तो आप मत मानिए आपकी नीति धारणा से हमारा संप्रदाय थोड़ी बिगड़ रहा है आप ही तो कह रहे हो आज तक शंकराचार्य आश्रम के लिए मिश्र से लड़ने हम ही गए इसका मतलब आपसे ये ना पूछा जाए कि निग्रह परंपरा ऐसे क्या है? नहीं बिल्कुल पूछे जाएंगे। पूछेंगे तो आप ये कहेंगे आपके गुरु ये कह रहे हैं और सिंगरी ये कह रहे हैं। हमने तो उस पर कई बार कहा है कि भगवान सिद्धनाथ जी से हमारी परंपरा है जिनको आदि शंकराचार्य जी ने भी प्रणाम किया है। आपको मंत्र और सिद्धांत कहां से मिला है? हमको उन्हीं की कृपा से प्राप्त हुआ है। अरे स्वप्न में मिला है। कैसे मिला है? हम इस विषय में आपको इसीलिए नहीं बताएंगे क्योंकि आपकी गुरु परंपरा आपकी अपनी अनन्यता पर आश्रित हो गई
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00:13:41:18 ना। नहीं अनंत पर आश्रित नहीं। कभी आपने अनन्यता का हमारे गुरु जी जो कह वही हो जाएगा। आपने भी उस अनन्यता को लिखा है हमारी अनन्यता हमारी अनन्यता सर्व शास्त्र समन्वित अनन्यता है यही कारण यही कारण है यही कारण है कि सिद्धनाथ संिता में कहते हैं कि अद्वैत ज्ञान निष्ठुर जो संसार एवं जिनकी हम आराधना कर रहे हैं सुन लीजिए जिनकी हम आराधना कर रहे हैं वह अद्वैत परंपरा से पूजित होने वाली देवी है फिर भी हमने कभी द्वैतवादियों का विरोध नहीं किया उनके स्वप्रदाय की सिद्धांतिक सीमा है आप आप यहां तक उतर गए द्विवेदी जी कि आपने ब्रह्मदंड का तिरस्कार किया आपने हमारी भगवती का तिरस्कार जब हमें उसकी प्रामाणिक व्याख्या मिलेगी तो नमस्कार हमने जिस पर ब्रह्मानंद के पास आप गए थे ना वही बताएंगे इनका कह दीजिए हम जा रहे हैं अभी बता देंगे हम प्रणाम हमने तो उनसे पूछा उन्होंने तो कहा कि मैं उन्हें भागवत के रूप में जानता हूं मैं तो निग्राचार्य के रूप में वो तो शंकराचार्य को माथाश्रम को जान रहे हैं माथा जी के भाई वो हमसे उन्होंने नहीं कहा उन्होंने ये तो कहा कि मैं उन्हें भागवत के रूप में जानता हूं के रूप में नहीं वो उनका मत हो गया विद्या भास्कर जी ने कहा आप उनसे पुष्टि करा रहे हैं इसलिए मैं कह रहा हूं के प्रति श्रद्धावान है इसलिए हमने कहा तो वो मना कर रहे हैं ना आपको प्रामाणिक मानने से तो आज तक हमारे कथन में व्यक्तित्व में जो दोष हो वो दिखा दे आपका ये कथन शास्त्री अभी पूछा ये जा रहा है
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→ Used in: A · Video एक सवाल : दुनिया भर के पाखंडी परेशान | परंपरा at 16:17 ↗
→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 1:47 ↗
00:14:54:14 आपकी शास्त्रीयता पूछी जा रही है आपकी परंपरा के तो उसमें आप सारी बातें बता रहे हैं उसकी प्रामाणिकता के विषय में आप कह रहे हैं नहीं बताएंगे हमारी प्रामाणिकता जो है मूल मार्ग की प्रामाणिकता के बारे में ये कहा जाता है कि न कुरत संभाषणम जो दीक्षित ना हो उसको वैयक्तिक स्तर पर संतुष्ट करने के लिए उसका उपदेश करे श्रुति की आज्ञा हमें प्राप्त कहने का अर्थ यह है कि आप सब पर सवाल उठाएंगे। आप सवाल का उत्तर
⬜ Not used yet · 00:15:16:21 – 00:15:38:04 (0:21)
00:15:16:21 देंगे। हम क्या सवाल उठा रहे हैं? आप अग्नि पुराण के वचनों को कह रहे हैं कि नहीं मानेंगे। आप रामायण को कह रहे तुमको कहां से मिली? हम तो कहते हैं हमको मिली जो वो सिद्धांत बचा। आपने तो नष्ट कर दिया। परंपरा से मिली है आपको? नहीं डाउनलोड होके मिला था क्या? तो ऐसे आर्य समाज में आप में क्या अंतर है? परंपरा सिद्धांतों के विरुद्ध जा रहे हैं। परंपरा को प्राप्त करने के बाद भी आप शास्त्र अर्थ कर रहे हैं।
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→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 2:09 ↗
→ Used in: A · Video एक सवाल : दुनिया भर के पाखंडी परेशान | परंपरा at 18:11 ↗
00:15:38:04 सिद्ध कैसे करेंगे आप? उनहीं शब्द प्रमाणों से सिद्ध करें। वो शब्द प्रमाण आपके पास आए कैसे जब हम उन शब्द प्रमाणों को देने वाले पर आपका भरोसा नहीं है। किसने हमें दिया बताइए और किस पर भरोसा नहीं है? किसी ना किसी परंपरा पे आश्रित होना पड़ेगा।
⬜ Not used yet · 00:15:48:28 – 00:16:28:02 (0:39)
00:15:48:28 आपको तो आप तो मना आपको तो पता है ना कि शब्द प्रमाण आपको आपके गुरु ने दिए। शंकराचार्य से आए। तो शंकराचार्य जी ने जब शब्द प्रमाण के आधार पर पुराणों को मान्यता दी तो अग्नि पुराण के सूत्र पर आपकी श्रद्धा क्यों नहीं? ये आप ये आप उनसे जिज्ञासा मतलब आपका ये कहना है कि शास्त्र हमारे गुरु ने मनमानी व्याख्या कर दिया हमको टोकने ना। और उन गुरु के वचनों को हम पूरे धर्म पर थोपते चलेंगे। तुम भी मेरा यह कहना है कि हम दोनों में से एक भी टांग को हटा नहीं सकते क्या ना केवल शास्त्र को नहीं ले सकते केवल गुरु को नहीं ले सकते शास्त्र सिद्ध में दोनों में कहा गुरु कार्यकार गुरु से शास्त्र को भी लेना पड़ेगा गुरु की अगर ऐसा नहीं है तो अगर कार्य और अकार्य में गुरु की गति है तभी
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→ Used in: A · Video एक सवाल : दुनिया भर के पाखंडी परेशान | परंपरा at 6:47 ↗
→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 2:19 ↗
00:16:28:02 अगर हम गुरु के बिना शास्त्र को लेंगे तो शास्त्र की प्रमाणिकता कहां से आएगी? गुरु के बिना शास्त्र बोलने की बात हमने अभी तक नहीं कही है। हमने क्या तो आपको वो कौन सा गुरु है आपका
⬜ Not used yet · 00:16:36:16 – 00:17:26:21 (0:50)
00:16:36:16 जहां से आप वो शास्त्र ले रहे हैं जिसका आप जो है परंपरा का विरोध कर रहे हैं। इसके आधार पर किस परंपरा का कभी शंकराचार्य परंपरा का विरोध किए कि परंपरा नकली है? अरे भाई परंपरा का कर्पात्री जी का जो आज के प्रामाणिक शंकराचार्य हैं वो कर्पात्री जी को सही बता रहे हैं। कर्पात्री जी को गलत इसीलिए बता रहे हैं क्योंकि कर्पात्री जी ने स्वयं भूषण रामायण को प्रामाणिक मान आप परंपरा का विरोध कर रहे हैं ना। कैसे करात्री जी का अलग से कौन सी परंपरा हो गई? अरे, कर्पात्री जी को आज के वर्तमान के शंकराचार्य सही बता रहे हैं। तो कर्पात्री जी के द्वारा स्थापित पंचमपीठ सुमेरु को पांच शंकराचार्य होते हैं। सारे सारी चीज़ों को दे देंगे मगर वो नहीं। नहीं नहीं क्यों नहीं? जब कर्पात्री जी को प्रमाण मानते हैं तो उनके द्वारा उनके द्वारा कर्पात्री जी को इतना ही आप प्रमाण मानते हैं तो उनके द्वारा प्रस्थापित पंचमूर पीठ क्यों नहीं लोकाचार्य की दृष्टि से लोकाचार्य से पीठ बन गया। बन गया। लोकाचार्य से एक नया भेद बन गया। लोकाचार्य से कहते हैं उसको। लोकाचार्य से शंकराचार्य बनने लगे तो फिर सारे शंकराचार्य से अपनेप सिद्धांत कहां से आया?
✅ This part is already used · 00:17:26:21 – 00:17:33:01 (0:06)
→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 2:29 ↗
00:17:26:21 हमारा सिद्धांत धर्म से चलता है। हमारा सिद्धांत धर्म शास्त्र से चलता है। वह शास्त्र कहां से आए? वह शास्त्र अनादि परंपरा से हमें प्राप्त है जो आपको
⬜ Not used yet · 00:17:33:01 – 00:19:28:14 (1:55)
00:17:33:01 भी प्राप्त थे। आए जो आपको भी प्राप्त थे किंतु आपने अपनी अंधभक्ति त्याग आप कर पात्री जी का अगर इतना ही बड़े भक्त होते ना तो जिस समय पीएन मिश्र ने कहा कि उन्होंने नकली शंकराचार्य बनाया उसका विरोध करते ना कि हमारे ऊपर उसी समय बौद्ध भी गाली दे रहे थे। तो उसी समय राम राम रामपाल भी गाली दे रहा था। उस समय किया था उस समय। एक ही समय में एक व्यक्ति सारा विरोध कर लेगा। लेकिन वीडियो तो बनाया ना कि मिश्र ने चुनौती दे दी। तो जब जैसा जो जब जैसा जो हमें जो अपेक्षित लगा वो बनाया मतलब आपके ही आपका तो निग्रह नहीं किया ना कर भी नहीं सकते हैं आप कर भी नहीं सकते क्योंकि आप स्वामी कृपा हम वो करते हैं हम वो करते हैं गए कह रहे हैं कि हमारे गुरु भाई हैं जो माताओं को नाजायज संतान बता रहा है उधर हम वो करते हैं हमने उस विषय में पहले ही वीडियो बना रखा है नहीं बनाया हम नाम ले बनाया भी उस विषय में पहले यहां पर आप चले गए जोधपुर जिस व्यक्ति से हम आज तक नहीं मिले ना किसी प्रकार कोरोना गृप्त चिकित्सा हुई त्रिपाठी जी के कहने पर लिए मणि त्रिपाठी की भगवती साक्षी चिकित्सा ली बार-बंतर हो रहा है। विषयांतर नहीं हो रहा है। आपने सदैव एक फ्रेम बनाया है और उस फ्रेम पर अपने पक्ष को डालने का प्रयास आप बता दीजिए कि आपने कहा भगवती जी की कृपा हुई उससे आपको सिद्धांत और ये सब प्राप्त हुआ आप जाकर पूरी शंकराचार्य से पूछिए पूछिए उन्हीं से गुरु जी से अपना पूछिएगा कि जब स्वामी कृपात्री जी रामायण को प्रमाणिक मानते हैं और गुरु जी ये ग्रंथ ये जो उन्होंने अपने रामायण मीमांसा में लिखा
00:18:48:04 है जब तक जो भी जितनी भी रामायण है वाल्मीकि रामायण उसका मूल है जब तक उसके साथ रहेंगी तब तक वो वाल्मीकि रामायण में कहां लिखा है वो ब्राह्मणी थी वाल्मीकि रामायण में उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया सदाचार्य तो आपने भी तो उन्हें परमार्थिक माना है ना हम कहां कह रहे परमार्थिक मानिए कुछ करने वाले आपने व्यवहारिक आपने व्यवहारिक नहीं माना उन्हें व्यवहारिक रूप से बेर खाए रूप से प्रत्यक्ष भक्षण किया लेकिन वो ब्रह्मभाव से तो वो पारमार्थिक घटना हुई ना तो घटना तो उन्होंने एक जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम है जो मनुष्यगत रूप है उनका उस रूप से उन्होंने भेद नहीं खाया तो उस रूप में जो उस रूप में उनका ब्राह्मणी होना ही क्या उससे शबरी जी का ब्राह्मण या भीलनी होने में क्या विरोध होगा शबरी जी को भीलनी तो
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00:19:28:14 अप दीक्षित जी ने भी माना था आप ही के पूवाचार्य अब फिर वही बात आई उन्होंने क्या कहा आपको कैसे पता चले क्योंकि उनके ग्रंथों में ही बात लिखी गई अरे भाई उनके ग्रंथों का अर्थ आपको कौन देगा ग्रंथ कौन देगा आपको उनकी परंपरा ना फल
⬜ Not used yet · 00:19:40:26 – 00:20:22:28 (0:42)
00:19:40:26 का अर्थ फल होता है दही नहीं इतना विवेक भी आपको अगर नहीं है तो क्या कहें प्रतिमा का अर्थ कितने प्रतिमा निकाल लिया वहां पर उसका और क्या-क्या अर्थ है ये बताइए जरा बहुत सेधा व्याकरण वाले हैं ना बताइए धर्मधाधा कन्याभ्यासा और संस यथाभ्यासा जो इसका क्या तात्पर्य है ठीक है आप अगर ये कर भी देंगे कि भाई वहां पर उसका संस्कृत में सुनिए एक बात है चाहे स्वामी निश्चनंद जी हो आप उनके शिष्य हैं चाहे स्वामी विदेशानंद जी हो जिनके शिष्य कुछ देर पहले गए चाहे मूव पीठ वाले हो चाहे कोई हो उनके निजी कथन को सही सिद्ध करने के लिए बैठकर हम शास्त्र के वचनों से विखंडन नहीं करेंगे
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→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 2:36 ↗
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00:20:22:28 आपके सिद्धांत आपको कहां से मिले वो बता हमको सिद्धांत इन्होंने दिए कान में दिया हां कान में दिया माथा में दिया शास्त्र भी दिए तो एक शास्त्र सुना दीजिए वाल्मीकि रामायण तुम क्यों शास्त्र इसका मतलब नहीं प्रोपेगंडा था क्या उनके वचनों शास्त्र के वचनों आपको कान में भगवती
⬜ Not used yet · 00:20:38:07 – 00:20:56:24 (0:19)
00:20:38:07 नहीं सुना दीजिए उन श्लोकों को इतना संस्कृत पढ़ते रहता हूं आपके सामने वो जो सिद्धांत दे रही तो आपको रटा होगा ना उस सिद्धांत के विषय में परमा गुरु के आप शास्त्र की प्रामाणिकता कैसे सिद्ध करेंगे अपने गुरु सेक्षण करवा लीजिए जिनको मानते हैं वो शास्त्र
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→ Used in: A · Video धर्मयुद्ध अहंकार या व्यापार | क्या है पूरा विवाद | at 46:26 ↗
→ Used in: A · Video भागवतानंद ने मुझे निरुत्तर कर दिया at 2:54 ↗
00:20:56:24 एक एक आखरी बात आपने कृपा कही है भगवती की भगवती ने आपको वरदान दिया है कि आपकी कर्मेंद्रियों से गलती नहीं होगी हमारी भगवती ने यह कहा है कि अगर तुम्हारी बुद्धि भटकेगी तो क्रिया पर नियंत्रण होगा क्रिया भटकेगी तो विवेक तुम्हारा वहां पर संभाल लेगा ये कथन है रोक लेगा ठीक है तो वाकलन क्यों नहीं रोका वाकलन अधर्म नहीं है ना ऐसा क्योंकि हम उसका वाकलन का मतलब क्या है क्या है बताइए आपकी जीवा से कुछ झूठ निकला ना क्या सत्य निकला बताइए कि वो जो आपने आपने लेडी की पिक्चर दिखाई थी वो लेडी विजय सिंह ने तत्काल हमने उसका शोधन किया कि नहीं अरे तो उस समय तो अधर्म हुआ ना जीवा से अधर्म को हम प्रोत्साहित करने के लिए झंडा काटकर नहीं बैठ गए कि यह सत्य है अरे बात ये हो रही है होगा ही नहीं
⬜ Not used yet · 00:21:33:13 – 00:21:52:14 (0:19)
00:21:33:13 हुआ क्यों बात यह है कि हम उस पर निष्ठा करके उसके आधार पर पतन की बात नहीं आपके द्वारा कोई क्रिया होने वाली राम विवेक आपको राम मर्यादा पुरुषोत्तम है ना तो राम जी तो भगवान है राम जी ने किस प्रकार से यहां पर यह किया है कि हम करके ब्रह्म हत्या का निवारण करेंगे राम जी तो निष्पाप है राम जी तो आइए आइए आप ही का गुरु आइए
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00:21:52:14 अधर्म का हम समर्थन नहीं करते वो विवेक यहीं पर काम करता है ना यानी कि क्रिया तो होगी मगर बाद में उसका शोधन करेंगे आप बाद में क्या क्रिया बहुत न्यूनतम गलत होगी और कदाचित वन्यतम का पैरामीटर क्या है कितनी गलत होगी इसके समय आपको क्यों फिर मतलब आप भी साथ रिपीट कर रहे हैं ठीक बस यही चीज है कि कुल मिलाकर के सारे प्रश्नों
⬜ Not used yet · 00:22:10:21 – 00:25:09:06 (2:58)
00:22:10:21 को कुल मिलाकर ये है कि आप अपने फ्रेम में हम डालने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन अपने मर्ज के विचार आपको नहीं दिखेंगे एक बात आइए शुक्ला जी आइए मैं एक बात बोल सकता हूं कौन सी देखिए मान लीजिए जैसे मान लीजिए मुझे मेरे गुरु जी ने काशिका पढ़ाई व्याकरण चार चार अध्याय पढ़ाई उसके आधार पर मैंने बाकी चार अध्याय पढ़े तो क्या बाकी के चार अध्यायों में मेरा जो बोध है वो संदिग्ध माना जाएगा तब अगर आप गुरु की सीमा के बाहर पाए जाएंगे तो संदिग्ध माना जाएगा गुरु की सीमा के बाहर के सिद्धांतों के बाहर नहीं जा सकते उन्हीं को और जो है सुशोभित कर सकते ऐसे जैसे बहुत सारे ऐसे उदाहरण गुरु जहां तक नहीं पहुंचे हैं गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता गुरु जहां तक पहुंचे हैं उनके सिद्धांतों को गुरु जी से पढ़कर उनका शिष्य उनके कई गुना तक पहुंच गया यदि गुरु जितना दे उतना ही शिष्य पाए तो शास्त्र विरोध नहीं कर सकते विरोध विरोध काहे नहीं कर सकते ऐसा नहीं तो कार्य में मजा की बात ही नहीं उठती वाल्मीकि आपकी श्रुति परंपरा क्या है दिक्कत ये आएगी ना फिर तो आर्य समाज भी अपने मन का करेंगे हम हम विरोध थोड़ी ना करेंगे समाज के वचन को शास्त्र का शब्द वाक्य नहीं प्राप्त होगा उसके अर्थ में लेकिन हमें प्राप्त है उसके उसके लिए आर्य समाधि
00:23:25:22 जो बात और ऐसे अगर कहिएगा हर व्यक्ति शास्त्र का मनवाना अर्थ निकाल लेगा ऐसे अगर हम गुरु परंपरा आप निकाल रहे हैं कि आपके गुरु जी ने अर्थ बताए हमारे बारे में अर्थ बताया आप शुद्ध आर्य समाधि है द्विवेदी जी आपने शंकर परंपरा के आ रखे आपने हर बात में तो मना कर दिया यही कारण है यही कारण है आपका यह मत है कि जो जिस गुरु का चेला है उसके द्वारा बताए अर्थ को पकड़ कर आगे बढ़ता हूं आपने तो निष्ठा बताई ना नहीं उनके संप्रदाय की निष्ठा उसी प्रकार से जैसे आपने यह कहा कि भैया वो कह रहे हैं 500 साल बाद में और हम कह रहे हैं 500 तो उस उस अंश में हम अपने गुरु में निष्ठा रख रहे हैं हमारे गुरु के सनातन नहीं तो हम धर्म ब्रह्म थोड़ी ना बदल रहा है हमारा सिंघिणी का हमारा धर्म हमारा धर्म भी वही है वर्णाश्रम उनका धर्म ही वर्णाश्रम ये सब क्यों कहते हैं कि नकली शंकराचार्य बनाए घूमने वो भी धर्म ना उससे पूछने गए थे उसको नास्तिक नास्तिकता का वो नहीं मालूम कैसे सिद्ध करेंगे उसको नहीं मिला है वो तो अपना गुरु बताएगा ना उसका क्या सिद्धांत बताया वो अरे भैया हमने पूछा उससे उसको पता ही नहीं है धर्म ब्रह्म की व्याख्या हमने तो पूछा ना उससे भाई कोई अगर नकली शंकराचार्य बन के घूम भी रहा है तो उसके पास शंकराचार्य के सिद्धांत तो होने चाहिए अच्छा वो कहां थे उसके पास देखिए वीडियो हमारा तो एक सिद्धांत नहीं बताया बोला टाइम पूरा हो गया उनका व्यवहार भी एक चीज होती है ना आपके कथा अनुसार लोक व्यवहार जैसा काशी सुमेरू वाले हैं लोक व्यवहार में काशी सुमेरू वाले लोक व्यवहार में शंकराचार्य बने
00:24:41:01 लोकाचार की दृष्टि से कहा गया है तो लोकाचार प्रामाणिक चार ही है लोकाचार की दृष्टि से कहकर उनका अभिषेक कर दिया गया अभिषेक करने आपके गुरु जी गए शंकराचार्य के पद पर अभिषेक करने तो गए होंगे हां तो गए होंगे तो जाके पूछिए जरा उनसे उससे क्या उससे क्या गलत कर सकते हैं उस उससे सरोकार क्या निकल रहा है सरोकार यह निकल रहा है स्वयं एक शंकराचार्य को बैठाइए जब आती है तो कहते हैं चार पीठ कह रहे हैं क्यों आप स्वयं जाकर वहां मतलब अगर मान लीजिए मान
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00:25:09:06 लीजिए कि उन्होंने चार पीठे बनाई है वो पांचवी पीठ कह भी रहे तो इससे आपकी प्रमाणिकता सिद्ध हो गई
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00:25:13:18 नहीं इससे उनकी अरंगता सिद्ध हो जाती है उनको सर्व धर्म के चार पीठ बना दे अरे भैया हमारे धर्म धर्म और ब्रह्म में अंतर कहां आ गया शंगेरी और हमारे प्रश्न ये आपने प्रश्न ये किया ना धर्म और ब्रह्म का बोध जिस गुरु से उस गुरु के ही उत्पन्न होने पर उसके अवतरित होने पर कार्य उससे धर्म बदल रहा है विद्या आप बदल रहे हैं आप बदल रहे हैं बुद्ध के मामले में खंडन कर रहे हैं परंपराचार्य शास्त्र कहां से मिला आपको बताइए शास्त्र कान में दिया अब कान में दिया तो वो पूछ रहे हैं सुना दो चलो ठीक है शास्त्र तुमको बता ठीक है
00:25:50:02 पता चलेगा चलो भैया हम लोग आए भागवतानंद से बंद कमरे में बिना माइक वगैरह लगाए हुए काफी सारी बातें हुई है और आप देख सकते हैं भागवत आनंद अपनी बारी आने पर कैसे हर जगह निरुत्तर हो रहा है। परंतु अंत में भागवतानंद के द्वारा जो पाला गया गुंडा है बृजेश पाठक उसने भरी सभा में कई लोगों के सामने हम जब वहां गए थे तो विनम्र भाव से गए थे और हम वहां पर ये नहीं देखा कि हमको नीचे बिठाया जा रहा है कि ऊपर बिठाया जा रहा है हमने देखा भगवान की मूर्ति है भागवतानंद पूजा पाठ में संलग्न है हम बिना सोचे समझे नीचे बैठ गए क्योंकि वहां भगवान थे हमने अपने आप को भगवान से नीचे बिठा लिया हमने नीचे बैठकर के भागवतानंद ने ऊपर बैठकर के हमसे काफी देर तक बातचीत की वो हम वो हम दिखाएंगे आपको। अंत में जब भागवत आनंद निरुत्तर होते हुए दिखाई दिए तो उसके गुंडे ने उसके पाले हुए गुंडे ने बृजेश पाठक ने हमको गाली दी। अश्लील गाली। ठीक है? और वहां पर बहुत लोग थे। धीरे-धीरे आपके सामने साक्ष्य आ जाएंगे। ये भी हमारे साथ भाई साहब थे।
00:26:57:10 भाई साहब उसने भाई साहब उसने गाली दी थी। आप बताएंगे। उसने गाली दी। उसने हम सिंह भी बदतमीजी को उसने कहा कि तुम भी निकलो जब हम बीच बचाओ रहने आ गए। हमने उसको कहा कि अगर तू गाली दे रहा है तो हम तुझे गाली नहीं दे सकते। क्योंकि हम भागवत आनंद नहीं है। हां मगर तू आ जाएगा तो हम तुझको उठा के पटक देंगे। पर वो आया नहीं। जानते हो ना वो आया नहीं। हमारे संग भी बदतमीजी की। निग्राचार्य तो तमीज से बात कर रहे थे। लेकिन वो जो पांडे वो उसने जब उसने जब अपने बाबा जी को निरुत्तर होते हुए देखा तो उसके रहा नहीं गया। उसकी कमाई बंद हो जाएगी ना। बाबा जी निरुत्तर हो जाएंगे तो। तो इसलिए वो गाली पर उतर आया। तो आप देख लो भगवती की उपासना से कान में आकर क्या मिल रहा है। तो इस चर्चा से हमें क्या-क्या मोटी मोटी बातें जानने को मिली। वो मैं आपको कुछ बता देता हूं। पहली बात कि भागवतानंद ने यह मान लिया। यह स्वीकार किया सैद्धांतिक धरातल पर वो किसी भी परंपरा के किसी भी आचार्य का खंडन नहीं कर सकता। तार्किक भी सिद्ध नहीं होता। किसी के आचरण का विरोध अवश्य कर सकता है। वो बात अलग है कि भागवतानंद ने करपात्री जी महाराज का दो बिंदुओं पर बुद्ध के विषय में और शबरी के विषय में खंडन करने का प्रयास किया। परंतु प्रयास भी आपने देख लिया ना चर्चा में क्या स्थिति थी
00:28:12:12 उसकी? बुद्ध के विषय में अगर वह दो दो बुद्ध मानता है और एक को वो क्षत्रिय मानता है दूसरे को वो जो ब्राह्मण के घर में मानता है। तो जो क्षत्रिय बुद्ध है उसके बारे में शास्त्रों में वर्णन आया है कि जो वो जो बुद्ध है ना जो शुद्धोधन का पुत्र जो है जिसको क्षत्रिय समझ में आ रहा है उसके लिए वर्णन आया है कि वो माया मोह स्वरूप है ना भगवान का एक दूत जैसा है वो माया मोह स्वरूप था वो तो वो भगवान का अवतार नहीं था वो बुद्ध क्योंकि भगवान के जो अवतार होते हैं वह सच्चिदानंद स्वरूप होते हैं। माया मोह स्वरूप नहीं होते हैं। माया मोह स्वरूप तो प्रपंच में फंसाने वाला हो जाएगा ना। तो खैर वो बुद्ध के विषय वाली बात तो वो बहुत आगे बढ़ी नहीं। फिर इसके बाद जो सबरी वाला मामला है वो बहुत क्लियर हुआ कि इनका कहना है कि वो जो है वो अलौकिक घटना है। यानी कि दिव्य दृष्टि से देखी जा सकने वाली घटना। जैसे कि भगवान श्री कृष्ण की वो जो रास लीला घटित हुई थी वो दिव्य दृष्टि से देखी जा सकने वाली घटना थी। व्यवहारिक दृष्टि से दिखने में क्या था कि व्यवहारिक दृष्टि में तो कोई भी स्त्री अपने घर से अपने पति से अपने भाई से दूर गई नहीं वो सब स्त्रियां अपने घर अपनेप घर
00:29:27:15 में यथावत सो रही थी। व्यवहारिक दृष्टि से यह हुआ था। पारमार्थिक दृष्टि से एक लीला घटित हुई थी कि सारी स्त्रियां वहां पहुंची। ठीक है? तो वहां पे हम उसको एक्सेप्ट कर सकते हैं कि ब्रह्म भाव से भगवान ने शबरी के झूठे बेर खाए हुए हैं। मगर वो दिव्य दृष्टि से देखने पर ही वह है। उसका जब व्यवहारिक हम अर्थ करेंगे तो वहां पे हमें देखना पड़ेगा कि या तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उन्होंने भाव ग्रहण किए या फिर यही स्वीकार करना पड़ेगा। कम से कम झूठे बेर ग्रहण करना तो सिद्ध नहीं होता। इसी में एक बात आई थी कि भाई वो अहिल्या को पैर से क्यों छुआ? जब क्षत्रिय थे तो मनुष्य दृष्टि से उन्होंने एक पत्थर छुआ था। ब्रह्म भाव से शायद वो जानते थे कि मैं उसको छूंगा तो वो मुक्त हो जाएगी। मनुष्य दृष्टि से उन्होंने मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। तो यह चीज सिद्ध हो गई कि भाई वो जो बात है वह व्यवहारिक दृष्टि से देखी जा सकने वाली बात नहीं। की मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी सीता माता के जो पति हैं जिनको स्वयंवर में उन्होंने वरमाला डाली मनुष्यगत दृष्टि से उन्होंने शबरी माता के झूठे बेर नहीं खाए थे। ठीक है? यह भी हमने क्लियर कर लिया। सिद्धांतिक विरोध नहीं करेगा। हालांकि दो जगह किया है। फिर ये हमने क्लियर कर लिया। इसके बाद जब अब प्रामाणिकता की फिर भी बात आती है कि भाई तुमने कहा है कि
00:30:42:16 मैं अब आज वो पता चल रहा है कि सैद्धांतिक विरोध नहीं करेगा। केवल आचरण का ही विरोध करेगा। सिद्धांतिक विरोध कर कर ही नहीं सकता। वह तर्क सम्मत सिद्ध नहीं होगा। हालांकि उस तक पहुंचने इस बात तक पहुंचने के लिए भी काफी मुझे मेहनत करनी पड़ी कि जिस गुरु से आपने रामानुजाचार्य परंपरा का सिद्धांत लिया है तो उस दृष्टि से रामानुजाचार्य जी को जानने के संबंध में तुम उनके शिष्य हुए। तो रामानुजाचार्य जी ने क्या कहा है, क्या नहीं कहा है इस संबंध में तुम उनका निग्रह नहीं कर सकते। यानी कि जितनी भी परंपराओं का तुम निग्रह करने चले हो। परंपराओं के आचार्यों का उन सब परंपराओं के किसी ना किसी एक-एक प्रामाणिक आचार्य को तुम्हें गुरु स्वीकार करना पड़ेगा। पड़ा पड़ेगा और तब तुम उस परंपरा के शिष्य कहलाओगे। कम से कम तुम उनका निग्रह तो नहीं कर पाओगे। उनका खंडन नहीं कर पाओगे सैद्धांतिक तौर पर। हां। और बाकी सारी चीजें तो आप इसमें देख ही लीजिएगा कि वह कहां-कहां पर कैसे कर रहा है कि मैंने जब पूछा कि भाई तुम्हें शास्त्र कहां से प्राप्त हुए तो पहले स्वध्य से फिर भगवती की कृपा से फिर मैं तुमको क्यों बताऊं तो वो सब चीजें तो अलग हैं। फिर आगे जो यह जो बात चली फिर एक बात आई कि सुमेरू पीठ क्यों है? मैंने वहां भी जवाब दिया लोकाचार की दृष्टि से। वास्तविकता यही है करपात्री जी
00:31:57:22 ने उसको उपपीठ के रूप में बनाया है। उस वो पूरी पीठ के अंतर्गत आने वाली सुमेरू पीठ है। वो अलग से एक स्वतंत्र पीठ नहीं है। जैसे एक बेंच है हाई कोर्ट की इलाहाबाद बेंच और उसकी उसकी एक बेंच है लखनऊ बेंच। है ना? इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ। तो वो उसकी एक बेंच है उपशाखा। मगर वह प्रॉपर स्वतंत्र रूप से एक अपने आप में वो नहीं है। हां वो रसगत दृष्टि है अनन्यता के लिए कि भाई कोई कहता है कि जैसे माला में सुमेरू सबसे ऊपर होता है ऐसे ही जो है सुमेरू पीठ सबसे ऊपर है तो उससे किसी को कोई आपत्ति नहीं क्योंकि धर्म और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं आ रहा है। जब अंतर आने लगता है तब जो है दिक्कत आती है। एक बात और आई थी कि अह यह वाली बात आई फिर जो है कि ऐसे तो सब कुछ सब कोई हो जाएगा। नहीं होगा ना जिसको प्रामाणिक आचार्य किसी उपपीठ के रूप में या लोकाचार्य की दृष्टि से शंकराचार्य कहेंगे वही शंकराचार्य कहा जाएगा और वो भी वो तो नहीं कहा जाएगा यहां पे तो बात किसकी हो रही है कि जो स्वयं को गोवर्धन पीठ का ही शंकराचार्य कह रहा है वो अपने आप को एक अलग से पीठ का और शंकराचार्य नहीं कह रहा है। वो गोवर्धन पीठ का ही शंकराचार्य कह रहा है। जबकि गोवर्धन पीठ के प्रमाणिक शंकराचार्य हमें प्राप्त है। तो
00:33:14:14 किसी को भी नहीं कहा जाएगा। पहली बात तो प्रामाणिक आचार्य के द्वारा ही किसी को उपीठ या लोकाचार्य की दृष्टि से कहा जाएगा और दूसरी बात यह कि अधोक्षजा गंद के केस में तो वह भी संभव नहीं क्योंकि वह तो स्वयं को उसी पीठ का प्रामाणिक आचार्य घोषित कर रहा है जिस पीठ के प्रामाणिक आचार्य हमें प्राप्त है। ठीक है? अब दूसरा एक्सपीरियंस वहां पर क्या रहा? सबसे पहले तो मेरी दृष्टि समझ लीजिए कि मैं कैसे गया था। कई बार मुझे लोग कहते हैं कह रहे थे कि भाई तुम जोधपुर चले गए तुम गुवाहाटी क्यों नहीं गए? या फिर कुछ लोगों ने कहा था कि भाई तुम लखनऊ में क्यों नहीं गए? भाई आज जब मैं उसके प्रांगण में गया तो आपने मतलब वहां मेरे साथ क्या हुआ है और क्यों हुआ है? इन्हीं सब कारणों से मैं नहीं जाता था। भाई किसी के यहां जब हमें मालूम है कि उसकी दृष्टि हमारे प्रति किस प्रकार की है तो हम वहां अध करके क्यों उसको परोसने के लिए जाए स्वयं को उसकी थाली में। फिर भी क्योंकि मुझे एनी हाउ हर कीमत पर इसकी जो पोल पट्टी है तथाकथित सो कॉल्ड निग्रह परंपरा की वह खोलनी थी तो सबसे पहले साहस एकत्र किया गुरु गोविंद ग्रंथ के बल से कि भाई हम जाएंगे उसके प्रांगण में जाएंगे हालांकि एक भगवत कृपा रही कि प्रांगण वो वासुदेवाचार्य जी महाराज का था वरना पता ही नहीं और भी कुछ अनर्थ होता
00:34:29:22 और जाएंगे और साथ ही साथ मुझे वहां पर अपने आप को वो मनु सस्पति श्लोक भी याद करना पड़ा कि भाई ब्राह्मण को सदैव अपमान का भूखा होना चाहिए। मैं इस शर्त पर वहां गया था कि वहां पर मुझे हीन से हीन व्यवहार भी अगर प्राप्त होगा उससे बात करने के लिए तो मैं उस हीन व्यवहार को भी स्वीकार करूंगा और वो हुआ भी मेरे साथ जब तक हम जैसे आप वीडियो में देख देखा ही होगा कि हम जैसे आचार्य जो वहां के थे जो संचालक थे शिविर के उनके पास जब गए तो उन्होंने सम्मान किया। जब मैं भागवतानंद के उसमें गया जब उसने मुझे अपने कक्ष में बुलाया तो उसने वो ऊपर बैठा था। हालांकि उससे भी ऊपर भगवान थे तो सब लोग नीचे बैठे थे तो मुझसे कहा गया कि नीचे बैठ जाओ तो मैं बैठ गया क्योंकि मैं वो हम तो घर से निकले ही थे बांध कर सर पर कफन जहां हथेली पर ली लोब चले है कदम तो मैं बैठ गया मैंने देखा भगवान राम जी की विग्रह लगा हुआ है ऊपर है तो हम नीचे बैठ जाते कोई दिक्कत नहीं है मगर इस भाव के साथ भी मैं गया था और वहां पर मुझे जो है एक ये जो प्रामाणिक शिष्य हैं विद्या भास्कर जी महाराज के संस्कृतज्ञ हैं। वह जब वहां पे आए तो स्पेशली उनको कहा गया कि आप तो अपने ही आसन पे आकर के बैठिए।
00:35:44:28 आप क्यों वहां पर खड़े हो रहे हैं? आपका आसन तो यहां है। मतलब वहां एक तरीके से मुझे ऐसा लगा कि मुझे सुनाया गया कि भाई देखो किसी और को तुम्हारे जैसे कोई किसी को हम जो है बिठा रहे हैं या जो भी है। पर मैं अपनी उस दृष्टि अपना जो लक्ष्य था ना जिस लक्ष्य को लेके गया था उसके प्रति मैं सीमित था। अब ये सारी बातें मैं आपको बता क्यों रहा हूं? मैं इसलिए बता रहा हूं यह सारी बातें कि अंत में जब यह सब हो गया ना जब जगह-जगह पर उसको या तो कुतर्क करने पड़े कि मुझे स्वा अध्ययन से प्राप्त है शास्त्र या मुझे जो है उसने बताए हैं शास्त्र क्या कहते हैं भगवती ने कृपा से प्राप्त है वाक स्कलन जो है वो न्यून दोष हुआ था अधर्म हुआ था पर न्यून हुआ था उसका कोई पैरामीटर नहीं भगवती ने यह नहीं बताया कि कितने परसेंट तक तुमसे अधर्म होगा वो न्यूनता की लिस्ट नहीं दी तस्मा शास्त्र प्रमाणम ना न्यूनता किसे कहेंगे? भगवती ने अगर कहा है कि अधर्म नहीं होगा विवेक रोक लेगा तो रोक ले या तो अगर नहीं रोकेगा तो फिर किस नहीं रोकेगा तो फिर उसका आधार क्या होगा कि कहां तक रोका जाएगा कहां तक नहीं तो इसमें तो ये सब चीजें प्राप्त है। मगर ये सब चीजें जब हो चुकी थी। इसके बाद जब हम लोग उठ खड़े हुए तो वहां पर पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज के वह शिष्य भी हैं। उन्होंने भी देखा वहां पर
00:37:00:02 और कई और भी लोग थे। तो जब हम खड़े हुए तो वापस आ रहे थे तो यह जो जो बृजेश पाठक है यह बोलता है कि भाई तुम जाहिलों वाले प्रश्न कर रहे हो। मैंने उसको उसकी भाषा का याद दिलाया तो फिर और कुछ बोलने लगा। फिर मैंने कहा कि क्या कर लोगे तुम? अगर मैं ये प्रश्न कर रहा हूं तो क्या करोगे तुम? तो बोला फिर उसने हमको गाली दी जो आप हम बोल नहीं सकते मगर गाली दी। अब बात यह है कि गाली का जवाब हम तो भाई स्वषित आचार्य बने नहीं फिर रहे हैं। हमको तो भगवती ने स्वप्न नहीं दिया ना दीक्षा दी। हम तो भाई समर्थवान गुरु की शरण में हैं। हम तो राम का केवल नाम नहीं केवल नाम के लिए उनका नाम नहीं लेते हैं। हम उनको फॉलो करने का प्रयास करते हैं। तो जब फॉलो करने का प्रयास करते तो राम ने कभी नहीं सिखाया कि कोई अगर तुम्हें मां बहन की कुछ गाली दे रहा है, अश्लील गाली दे रहा है तो तुम भी उसको पलट के गाली दो। तो हम अपनी मर्यादा को नहीं भूले उस समय भी। हमने उसको पलट के गाली नहीं दी। हमने उसको कहा कि तू जो गाली दे रहा है तू बाहर आजा मैं तुझको उठा के पटक दूंगा। यही कहा था उसके यहां। उसके कुछ लोग कह रहे हैं। मैंने उसके ही प्रांगण में उसके ही घर में घुसकर और जब उसने मुझे गाली दी तो मैंने उससे कहा था कि तू
00:38:15:03 बाहर आजा। बृजेश पाठक की आंख में आंख डाल के कहा था बाहर आजा। पटक दूंगा तुझे उठा के। और बृजेश पाठक की आंखों में मैंने उस समय खौफ देखा था। वो खौफ अच्छा लगता है। कहा है ना मत पड़ो चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में। इसीलिए कहा है तो बृजेश पाठक के हाथ पाव ढीली हो गए। नहीं आए बाहर आ जाता तो मैं उसको पटक देता। हां मैं गाली नहीं दे सकता। ये सीखा नहीं है मैंने। गाली का जवाब वो डायलॉग है ना क्या है? हम बीहड़ के रहने वाले हैं। वहां गाली के पीछे गोली चल जाती है। गाली के पीछे गाली नहीं चलती है। खैर तो यह इसलिए बताना आवश्यक था कि वो जो वहां से आने के बाद हम जो वहां पर दुर्व्यवहार हुआ हमारे साथ। फिर मैंने यह भी कहा कि जब वाल्मीकि रामायण हम तुमसे पूछी गई तो वो तो तुम नहीं सुना पाए। पर तुम्हारी भगवती जो तुम्हारी जो तथाकथित भगवती तो ऐसा नहीं कर सकती। पर तुम्हारी जो तथाकथित जो वो जिसको तुम देवी कहते हो उसने क्या सिखाया वो दिखाई दे रहा है। तुम जो करते हो ना वो दिख रहा है यहां पर जो तुम्हारा पाला हुआ गुंडा स्वयं तुम भी गुंडे ही हो जो तुमने भी ऐसी ही गालियां बकी है लोगों को तो तुम्हारा ये पाला हुआ गुंडा जो है वो हमको गाली दे रहा है। मैंने उसको कहा वहां पर और उसका मुंह इतना साधा देखने लायक है। बहुत जबरदस्त सीन था वो। जब मैंने उसको कहा ना आंख में हाथ डाल के
00:39:30:07 भागवत आनंद को यह यह सुनाती है भगवती आके कान में कहती है ना वो ये है कुछ नहीं तो ये सारी चीजें थी जो आपको बतानी आवश्यक थी इसलिए आवश्यक थी क्योंकि वो दृश्य हमने यहां पर प्रस्तुत नहीं की है गाली इत्यादि वाले क्योंकि हमें उसमें आगे कुछ नहीं करना है। हम बहुत संतुष्ट हैं। हम वहां गए और सैद्धांतिक धरातल पर हमने धज्जियां उड़ाई। अब आगे तुमने गाली दे दी। ठीक है भाई तुम्हारे द्वारे आए कुछ भी कर लो और भी कुछ कर सकते थे। भाई सामने वाला क्या है जैसे रामपाल इत्यादि हैं इनके पास जब जाते हैं तो हमें इस तैयारी के साथ जाना होता है कि सामने वाला यदि सैद्धांतिक तौर पर नहीं जीत पाएगा ना तो वह कुछ विवाद खड़ा करने का प्रयास करेगा कि हमारे प्रांगण में आया तो हम उसको ऐसे सब ऐसे फंसा लें। तो बृजेश पाठक ने वो बृजेश पाठक बोल देता हूं बार-बार मेरे को भगवती के वरदान नहीं प्राप्त है ना तो इसलिए वाकस्लन हो जाता है। तो क्या कहते हैं यह बृजेश पांडे ने वही कोशिश की थी लास्ट में कि भाई मैं गाली दूं यह भी गाली दे फिर कुछ गाली गलौज हो जाए हमने वो नहीं किया हमने कहा उठा के पटक दूंगा बाहर आ जा पूछना कोई बृजेश पाठक से फोन करके कहा था कि नहीं शिवश नारायण द्विवेदी ने फिर तुमने क्या
00:40:45:08 किया था तुम उसको गए थे कि नहीं बाहर मिलने है ना ये सारी चीजें और हां अब कुछ लोग यह कहेंगे कि भाई वो गाली वाला जो वीडियो है वो दो ये करो पहली बात तो ईश्वर साक्षी है वहां पर जो कुछ हुआ हमने यथावत कहा है और वीडियो जो अच्छा हां इस वीडियो में एक जगह बीच में कट इसलिए लगा है कि मेरे साथ जो मेरे साथ जो गए थे वीडियो को रिकॉर्ड कर रहे थे उनको पीछे से धक्का लगा था तो एक अंश जो है वहां पर वो कुछ गड़बड़ हो गई थी तो उन्हें दोबारा वीडियो को शुरू करना पड़ा वो कट इसलिए लगाया अगर आपको कहीं और से वो बीच का हिस्सा प्राप्त हो जाए तो ऐसा कोई महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है जो कट गया मगर प्राप्त हो जाए तो कोई ऐसी बात नहीं है कि उसको यह भी कहा जाएगा अरे कट लगा दिया कट लगा दिया इसलिए बताना आवश्यक है। तो कुछ लोग यह अवश्य कह सकते हैं कि भाई जो है आपने वीडियो तो दिखाया नहीं। हम कैसे मान ले वहां गाली दी गई तो वहां पर पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज के भी शिष्य हैं और ये भागवतन बाबू जी तो थे ही तो और शायद वहां पर कुछ और भी ब्राह्मण रहे होंगे। तो निग्रह बाबू का तो बहुत भागवतन बाबू का तो बहुत विश्वास है जनेऊ हाथ में लेकर के सौगंध खाने का। तो ये जनेऊ हाथ में लेकर के और वो जो विद्या भास्कर जी महाराज के जो शिष्य थे वहां संस्कृतज्ञ
00:42:00:09 ये लोग वहां जनेऊ हाथ में ले बोल दें कि जो है गाली इत्यादि नहीं दी गई है। हालांकि मुझे इस विषय में आगे बढ़ना नहीं है। मैं बहुत संतुष्ट हूं। मगर यदि कोई यह कहता है कि गाली नहीं दी गई है। है ना? तो उस विषय में भागवतानंद ये भी कर दे अपने जने को हाथ में लेकर के बोल दे। गंगा में उतरने की आदत है ना इसको हर बात पे। आप लोग वो इनसे कहो बाबू जी से कि गाली दी गई है कि नहीं दी गई? और गाली दी गई है तो कब दी जाती है गाली? कब दी जाती है? जब हमारा सिद्धांत का बल कमजोर पड़ रहा होता है तब मुंह से गाली या फिर और दूसरे अभद्राचरण निकलते हैं। ठीक है? तो ये सारी बातें थी। आपको गाली की वजह से आपको मुझे ये सब चीजें बतानी पड़ी कि इसलिए मैं नहीं जाता था। और आज भी गया तो ऐसे-से करके गया। इसलिए नहीं जाना चाहिए इस तरह की जगह पे। वहां आपका अपमान होगा। वहां आपके खिलाफ षड्यंत्र होगा। वहां आपके साथ अनहोनी घट सकती है। परंतु अगर फिर भी कुछ ऐसी स्थिति पड़ जाए तो किस-किस प्रकार से कौन-कौन से रिस्क लेकर के जाना पड़ता है वो अब आप लोगों के सामने है। और हां गुरु परंपरा के संबंध में, गुरु की प्रमाणिकता के संबंध में या स्वयं की प्रमाणिकता के संबंध में किसे आचार्य बनाए? इस संबंध में एक बहुत ही तार्किक और सैद्धांतिक विश्लेषण हमें ब्रह्मानंद जी से भी प्राप्त हुआ है। उसका भी वीडियो अलग से डाला जाएगा।
00:43:15:20 है ना? तो उसमें भी आप देखिएगा कि जो सारे सिद्धांत है ना सिद्धांतिक विरोध जो ये स्वयं को कहता फिरता है ना निग्रह परंपरा निग्रह परंपरा वो सब उसमें उसकी धज्जियां उड़ती हुई दिखाई देंगी आपको जय श्री राम [संगीत]
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घर में घुसकर किया गया स्वरचित ‘निग्रह संप्रदाय’ का भंडाफोड़
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