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00:00:01:22 जो हमारे आर्य समाज की गुरु परंपरा है वह कहां से स्टार्ट होती है? इसमें आर्य समाज में गुरु परंपरा नहीं है। शास्त्र कहां से आए आपके पास? शास्त्र हमारे पास गुरु परंपरा से प्राप्त हुए। आचार्य परंपरा से प्राप्त हुए। किसी एक गुरु परंपरा को मानना पड़ेगा ना। इससे प्राप्त हुए। किससे प्राप्त हुए? नहीं कहीं से तो आपके गुरु ने ज्ञान दिया होगा। आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने किया। उनके गुरु? उनके गुरु स्वामी विरजानंद जी और उनके गुरु उनके गुरु के बारे में जानकारी नहीं है। जैसे मान लीजिए अष्टाध्याय सूत्र हैं जो उसमें मान लीजिए लिखा है पांच। एक एग्जांपल के तौर पे ले रहा हूं। उसमें लिखा है पांच। उसके बाद आपके किसी ने समझा पांच का मतलब पांच। किसी ने समझा नहीं पांच का मतलब छह। किसी ने समझा पांच का मतलब सात। किसी ने समझा पांच का मतलब आठ। अब ये सारे लोग आर्य समाज के नाम से बोल रहे हैं। भाई हमने वो जो उन्होंने पांच दिया है अष्टाध्याय सूत्र में पांच। मैं उसका अर्थ बता रहा हूं। तो यह पांच का पांच ही बता रहा है। एक पांच का छह बता रहा है। एक पांच का सात बता रहा है। तो इसमें आगे चलके आर्य समाज में ही हम कैसे पता लगाएंगे कौन सा व्यक्ति सही बोल रहा है? ठीक बोल रहे हैं। ठीक बोल रहे हैं। ठीक बोल रहे हैं। ठीक बोल रहे हैं। देखिए इस जगत में जगत
00:01:17:03 की जो सबसे प्राचीनतम ग्रंथ है वो वेद है। और वेद को पढ़ेंगे। वेद को पढ़ना कैसे है? वेद हमें प्राप्त कैसे हो रहे हैं? प्राचीनतम ग्रंथ हम तक आए कैसे? हमको अपने अध्ययन से प्राप्त हुआ है। आर्ष साहित्य के माध्यम से आपको जरूर मिलेंगे। स्वामी दयानंद सरस्वती जी तो गीता प्रेस वाला जो छाप देगा वो हो जाएगा आपका प्रमाण। मैं आपसे पूछ रहा हूं जो सदियों पहले वेद प्रकट होते हैं वो आप तक कैसे आए? ये स्वामी दयानंद सरस्वती जी स्वामी गुरु गुरु विजानंद सरस्वती जी से और मैं पूछ रहा हूं जैसे जो विजानंद सरस्वती जी हैं उन तक वेद कैसे आए? यह वो उनके गुरु से उनको मिले होंगे और उनके गुरु के पास कैसे आए? उनके गुरु से मिले होंगे। तो यहां पे तो आपने गुरु परंपरा को मान लिया। नहीं नहीं देखिए उससे पहले गुरु परंपरा का मतलब यह नहीं है कि आप गुरु गुरु परंपरा का अर्थ समझ लीजिए। मैं मैं जो आपको बता रहा हूं शायद आप समझ नहीं पाए। कि जैसे वेद प्रकट हुए। गुरु ने अपने शिष्य को वेद दिए। फिर उसने अपने शिष्य को वेद दिए। फिर उसने अपने शिष्य को वेद दिए। वेदों के साथ उन्होंने अर्थ भी दिया वेदों का ऐसा नहीं कि सिर्फ मंत्र दे दिए बोलो बस उसका अर्थ भी दिया विस्तार भी दिया समय-समय पर आकर के लोगों ने वेद पर भाष्य भी किया जैसे कि सायन भाष्य सबसे पुराना भाष्य जो हमें मिल रहा है वो सायन
00:02:32:16 भाष्य तो वो हमारा गुरु परंपरा से आया प्रश्न दिक्कत वाला ये है कि जिससे तुमको वेद मंत्र मिला उसके
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00:02:40:12 अर्थ पर यदि तुम्हें विश्वास नहीं है तो उसके मंत्र पर तुम्हें विश्वास कैसे और यदि उसके मंत्र
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00:02:45:18 पर विश्वास है तो उसके वेद मंत्र पर विश्वास क्यों तो जिसका हम जिसका हम अर्थ नहीं मान रहे अर्थ पे विश्वास नहीं है कि अर्थ गलत होगा उसके हम श्लोक पे विश्वास कैसे करें और जिसका हम श्लोक पे विश्वास कर रहे हैं उसके हम अर्थ पे विश्वास क्यों ना करें तो गुरु परंपरा पे या तो विश्वास होना चाहिए या विश्वास होना चाहिए वेद मंत्रों के लिए हम गुरु गुरु परंपरा पर विश्वास कर रहे हैं तो फिर अर्थ के लिए वेद मंत्रों पर अर्थ के लिए गुरु परंपरा पर विश्वास क्यों ना करें हम इस विषय में आपको इसीलिए नहीं बताएंगे क्योंकि यहां अच्छा
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00:03:13:20 अब बात आ जाती है कि जो एक बहुत कई बार हम लोगों की इस पूरी बातचीत में बात आई कि अ गलत प्रक्षिप्त हो गया या मिलावट हो गई या भाष्य उसमें गलत कर दिया शास्त्र कहां से आए आपके पास शास्त्र हमारे पास गुरु परंपरा से प्राप्त हुए आचार्य परंपरा से प्राप्त हुए किसी एक गुरु परंपरा को मानना पड़ेगा ना इससे प्राप्त हुए किससे प्राप्त हुए जो आर्य समाज है इसकी गुरु परंपरा क्या है वह तो परमपिता परमात्मा सबका गुरु है एक तो यह वो अलौकिक गुरु है वही है जो ईश्वर्य का ज्ञान है वेद हमारे सोच का और हमारा आधार वही है कोई व्यक्ति विशेष हमारा गुरु तो नहीं नहीं नहीं वेदादि शास्त्र आज से कई अनेकानेक वर्ष पूर्व मंत्र दृष्टा बनते हैं हमारे ऋषि गण वहां से ले स्वामी दयानंद जी तक वह वेद मंत्र कैसे आए जिन्हें उन्होंने प्रमाण माना सनातन का श्रुति नाम सुना है ठीक है श्रुति का अर्थ क्या हुआ श्रुति जो सुना जाता है इस प्रकार से आज भी आप चले जाइए दक्षिण भारत में
00:04:29:08 चारों सुन सुन के याद है उनको नहीं नहीं मैं वही कह रहा हूं तो दयानंद जी ने किससे सुने स्वामी जब दयानंद जी ने जब सुने नहीं दयानंद जी ने जब पढ़े जब तक तो वो उनको लिपिबद्ध कर दिया गया था हमको अपने अध्ययन से प्राप्त हुआ है स्वा अध्ययन वो सभी ग्रंथों को तो गीता महाराज हिसाब देगा वो हो जाएगा आपका प्रमाण। तो मंत्र और सिद्धांत कहां से मिला है? हमको उन्हीं की कृपा से प्राप्त हुआ है। किसी से वेरीफाई तो करवाएंगे। वो थे ना फिर हाथ थे ना अपने क्या नाम गुरु विजानंद जी। विजानंद जी के गुरु पूर्णानंद जी पूर्णानंद जी के गुरु। अब ये इतने लंबी परंपरा नहीं वो बात है। कहने का मतलब है हम ये कैसे माने कि ये जो वेद मंत्र हैं ये वही मेन मंत्र है जो परमेश्वर ने दिए। क्योंकि हमें पूर्णानंद जी से पहले का गुरु मालूम ही नहीं है। जैसे वेद मार्केट से हम लेकर के आए तो गीता प्रेस वाला जो छाप देगा वो हो जाएगा आपका प्रमाण। उन्होंने भी किसी से सीखे ही होंगे तो वो किससे सीखे कैसे प्रमाणित ये तो एक विषय अलग है इसको देखना पड़ेगा ये हमें इसको होगा इसकी जानकारी ऐसा नहीं है कि नहीं है जो मत में दीक्षित ना हो उसको वैयक्तिक स्तर पर संतुष्ट करने के लिए उसका उपदेश ना करें श्रुति क्या हमें प्राप्त उसी पे आ रहा हूं बात ऐसी है कि जो गुरु शिष्य परंपरा जिसके बारे में हमें सामग्री प्राप्त है वो इनकी है शंकराचार्य निंबारकाचार्य इन सब की गुरु परंपराओं की सामग्री हमें प्राप्त है। कौन से सन में कौन गुरु हुए? प्रॉब्लम यह है कि जिनकी सामग्री हमें
00:05:44:09 प्राप्त है कि शंकराचार्य के कौन शिष्य हुए, उनके शिष्य कौन हुए, उनके शिष्य कौन हुए? आज तक के वह पूरी वंशावली हमें प्राप्त है। अब हमें अगर पूर्णानंद जी अगर मैं यह नहीं कह रहा कि नहीं है वो आप देंगे तो मिल जाएगी। अगर पूर्णानंद जी के गुरु के बारे में हमें नहीं पता और हम यह कह रहे हैं कि यह जो वेद मंत्र हैं जो वेद मंत्र शंकराचार्य जी की गुरु परंपरा के द्वारा यहां तक आ रहे हैं तो वेद मंत्रों का अर्थ तो हम मान रहे हैं अर्थ अपना दे रहे हैं और वेद मंत्र उनके मान ले रहे हैं उनके द्वारा दिए हुए अब बात ऐसी है यदि शंकराचार्य परंपरा या निंबारकाचार्य परंपरा या रामानुजाचार्य परंपरा गुरु शिष्य परंपरा जिसकी वंशावली हमें प्राप्त है वो आपको गलत अर्थ दे रही है क्योंकि उनके अर्थों को हमने नहीं माना शायन के अर्थ को आर्य समाज ने नहीं माना तो शायनाचार्य के अर्थ को जब हम नहीं मान रहे हैं तो उनकी ही परंपरा के द्वारा आने वाले वेद मंत्रों को हम कैसे विश्वास कर ले रहे हैं कि वही वेद मंत्र हैं जो ईश्वर के हैं। कैसे करेंगे आप? उन्हीं शब्द प्रमाणों से सिद्ध करें। वो शब्द प्रमाण आपके पास आए कैसे जब उन शब्द प्रमाण को देने वाले पर आपका भरोसा नहीं है। ये पहला प्रश्न आप कर रहे हैं। मेरे ख्याल से आज तक दुनिया में किसी ने किया नहीं था। अगर हम गुरु के बिना शास्त्र को लेंगे तो शास्त्र की प्रमाणिकता कहां से आएगी? अब लास्ट है कि जैसे मैंने कुछ आपको कोट किए कि वेदों में यह दिया है या उपनिषदों में यह दिया है। तो आपने कहा कि आपने
00:06:59:13 गलत वो किसी और का भाष्य पढ़ लिया। गलत भाष्य पढ़ लिया है। तो इसमें बात ये आती है कि आर्य समाज की गुरु परंपरा क्या
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00:07:06:14 है? शास्त्र कहां से आए आपके पास? शास्त्र हमारे पास गुरु परंपरा से प्राप्त हुए। आचार्य परंपरा से प्राप्त हुए। किसी एक गुरु परंपरा को मानना पड़ेगा ना। इससे प्राप्त हुए। किससे प्राप्त हुए? गुरु तो सबसे आदि गुरु तो हमारा वही परमात्मा ही है और
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00:07:27:25 उसके बाद जो हमें सैद्धांतिक रूप से जो ज्ञान दिया वो हमारे गुरु महर्षि दयानंद सरस्वती नहीं इधर से गुरु परंपरा थोड़ी सी बताइए कि परंपरा वहां तक कैसे जाती ऋषियों तक जैसे दयानंद सरस्वती जी फिर उनके गुरु विजानंद फिर उनके गुरु कौन फिर उनके थोड़ा थोड़ा पीछे ऐसे हम तो ऋषि दयानंद के गुरु थे विजयानंद जी और फिर ऋषि दयानंद जी तो हैं वो हम सबके गुरु हैं नहीं जी के पीछे भाई परंपरा परमेश्वर तक है ना तो परमेश्वर से यहां तक जो आई है मध्यकाल के गुरु होंगे एक बहुत एक लंबा सिस्टम नहीं थोड़े से दो चार कुछ पीछे के कुछ पीढ़ियों पहले के गुरु के नाम जैसे विजानंद के ये थे इनके ये थे ऐसे कुछ थोड़ा दो चार पीढ़ियों ये सब जो ये वेद शास्त्र है ये जो ऋषियों के ग्रंथ है यह सब हमारे गुरु ही है ऐसे नाम बद्ध की भाई विजानंद को इन्होंने पढ़ाया इन्होंने वेद मंत्र सिखाए फिर उनको इन्होंने वेद मंत्र सिखाया ऐसे पांच छह पीढ़ी तो हमें तो ऋषि दयानंद ऋषि दयानंद से तो बहुत दो धाराएं फूटी दो तरह के इनके शिष्य तैयार हुए एक नहीं ऋषि दयानंद जी नहीं ऋषि दयानंद जी के पीछे इधर का नहीं ऋषि दयानंद
00:08:43:06 जी के पास वेद मंत्र कहां से आए कैसे आए ऋषि दयानंद जी ने तो गुरु विजानंद जी से ज्ञान ग्रहण किया बिरजानंद जी के वो गुरु थे पूर्णानंद जी पूर्णानंद जी के गुरु पूर्णानंद जी के गुरु का नहीं इतनी लंबी परंपरा का स्मरण नहीं है सब नहीं लंबी नहीं कुछ पांच छी जैसे हमें मध्यकालीन पूर्णानंद जी तक टीपू सुल्तान का इतिहास स्वामी विजानंद जी के गुरु गुरु पूर्णांद जी सबसे पहले कि गुरुओं का नाम नहीं है स्मरण नहीं है पढ़ा तो है स्मरण नहीं है मतलब किसी शास्त्र में दिया गया है ऐसा हां हां तो गुरु परंपरा जब चली आ रही है तो सबके होंगे ही नहीं नहीं कुछ पांच छह पीढ़ी पहले के गुरुओं के नाम जितना था वो मैंने बता दिया कुछ और पूछिए अच्छा तो इसमें ये बात आती है कि पूर्णानंद जी को वेद मंत्र किससे मिले ये हमें ये नहीं पता है तो हम ये कैसे माने कि जो वेद मंत्र हैं जो पूर्णानंद जी ने इनको दिए वो वही वेद मंत्र हैं जो परमात्मा दे रहा है ऋषियों को उनहीं शब्द प्रमाणों से सिद्ध करें शब्द प्रमाण आपके पास आए कैसे जब उन शब्द प्रमाण को देने वाले पर आपका भरोसा नहीं है
00:09:48:16 वही है। नहीं नहीं वही है वो सही है। मगर पूर्णानंद जी ने वही वेद मंत्र दिए हैं जो परमात्मा ने निष्कासित किए वही पूर्णानंद जी ने विजानंद जी को दिए। तो यह किस आधार पर? कहने का अर्थ यह है कि जो अन्य परंपराएं हैं गुरुओं की जैसे नबार्क परंपरा या आगे कर लीजिए या रामानुजाचार्य परंपरा या शंकराचार्य परंपरा इनकी परंपरा में लिपिबद्ध बिल्कुल गुरुओं का नाम एक एक पता है। अब बात ये आती है कि अगर हमें इन गुरु परंपराओं से वेद प्राप्त होना हम स्वीकार करते हैं तो इन गुरु परंपराओं के अर्थ को हम स्वीकार क्यों नहीं करते? और अगर इनके अर्थ को स्वीकार नहीं करते तो इनके वेद मंत्र पर हमें हम क्यों स्वीकार करते हैं? इस तरह से रहे क्योंकि जो जैसे जो हमको गलत अर्थ दे सकता है वह हमको गलत मंत्र भी तो दे सकता है कि हमें अगर उसके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो उन मंत्रों पर विश्वास क्यों है कि ये वही मंत्र है जो परमात्मा ने दिए हैं परमात्मा की जो चीज अनादि काल से चली आ रही है मगर उसमें बीच में वो है ना पाखंडी आपके अनुसार शंकराचार्य पाखंडी है ना
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00:10:50:21 हम इस विषय में आपको इसीलिए नहीं बताएंगे जो मैं आपको प्रमाण दिखाऊंगा शब्द प्रमाण वो मैं आप ही के आचार्य को दिखाऊंगा तो कोई मतलब भेद भी नहीं होगा। जैसे परंपरा की बात कब आएगी? जब मैं बोलूंगा कि भाई आग नहीं यहां पे आग का मतलब पानी है। इंद्र का मतलब ईश्वर नहीं। इंद्र का मतलब बिजली है। तो आप बोलेंगे नहीं मेरे आचार्य तो कुछ और कह रहे हैं। तो मैं आप ही के आचार्य का दिखाऊंगा। कोई समस्या नहीं है इसमें। ठीक है? सरे जी को भेलने तो अप दीक्षित जी ने भी माना था। देखो ऐसा है जैसे कि बैरन बांस की बांसुरिया गिरजा मुख चूमत बनवारी। आप मान लो कि ये मेरे आचार्य है जिन्होंने ये लिखा बैरन बांस की बांसुरिया गिरजा मुख चूमत बनवारी। ठीक है? आपने कहा ये आपके आचार्य ने लिखा है। अब इसमें गिरजा मुख चूमत बनवारी मतलब गिरजा यानी पार्वती मुख चूम रही है बनवारी का। पार्वती इसका अर्थ निकल रहा है कि मुख चूम रही है पार्वती। अब आप कहोगे देखिए आपके आचार्य ने लिखा है कि पार्वती माता ने भगवान श्री कृष्ण का मुख चूमा। ठीक है? तो मैं बताऊंगा कि भाई मेरे आचार्य ने तो यहां पर ये कहा था कि जो गोपियां है वो कह रही है बैरन बांस की बांसुरिया यानी जो बांसुरी है बांस की ये बैरी है मेरी और ये गिर जा ये पार्वती नहीं है गिरजा ये गिर जाए जो बनवारी का मुख चूम रही है बनवारी का जो मुख चूम रही है
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→ Used in: B · Video रामपाल की गुरु परंपरा का काला सच: क्या है सतलोक और कबीर साहेब का असली रहस्य? | R... at 0:02 ↗
→ Used in: A · Video श्रीराम ने ब्राह्मण शबरी माता से अपने पैर क्यों धुलवाए? भागवतानंद प्रलाप भंजन :... at 1:09:42 ↗
00:12:01:10 उन्होंने क्या कहा आपको कैसे पता चला क्योंकि उनके ग्रंथों में ये बात लिखी हुई अरे भाई उनके ग्रंथों का अर्थ आपको कौन देगा ग्रंथ कौन देगा आपको उनकी परंपरा ना तो इसलिए इसलिए वहां पे मेरी बात को मानना पड़ेगा उनकी क्योंकि मैं उनका शिष्य हूं। मैंने उनकी बात को उनसे समझा है। कोई इशू नहीं है। जी। मुझे कोई इशू नहीं। अब ये बताइए मुझे कि जिन श्लोकों का अर्थ आप लेते हैं कि हमारे वेदों से मेल खा रहे हैं। यानी वेद आपके लिए प्रमाण है। अच्छा ये वेद आपको मिले कैसे?
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00:12:32:00 शास्त्र कहां से आए आपके पास? शास्त्र हमारे पास गुरु परंपरा से प्राप्त हुए। आचार्य परंपरा से प्राप्त हुए। किसी एक गुरु परंपरा को मानना पड़ेगा ना। इससे प्राप्त हुए। किससे प्राप्त हुए? मिलेगा यह तो मोबाइल में अभी आपके में उनके
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→ Used in: B · Video रामपाल की गुरु परंपरा का काला सच: क्या है सतलोक और कबीर साहेब का असली रहस्य? | R... at 0:40 ↗
00:12:47:25 पास वो जो खोद के दिखा रहे हैं जो किताबें वो कहां से आई हैं? मार्केट से आई हैं और कहां से आई? तो गीता प्रेस वाला जो हिसाब देगा वो हो जाएगा आपका प्रमाण। तो इसका मतलब है आप मार्केट को प्रमाण मानते हैं। अगर हम गुरु के बिना शास्त्र को लेंगे तो शास्त्र की प्रमाणिकता कहां से आएगी? अरे मोबाइल में कहां से आए? मार्केट में कहां से आए? गोरखपुर से प्रकट कहां से हुए? तो आप तक कैसे आए? आपको सपने में आके दिए।
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00:13:16:02 हमारे शास्त्र हमारे साथ अतीत जन्मांतर विद्यमान है। और एक शास्त्र पूरा सुना दीजिए अभी। चलिए कौन सा शास्त्र सब प्राप्त है ना? क्यों सुना रहे हैं? आपके सिद्धांत आपको कहां से मिले वो बताओ। हमको सिद्धांत इन्होंने दिया। कान में दिया? हां। कान में दिया, माथा में दिया। शास्त्र में दिए। हां। तो एक शास्त्र सुना दिया वाल्मीकि रामायण। आपको हम क्यों शास्त्र? इसका मतलब नहीं दिए। आपसे यह ना पूछा जाए कि निग्रह परंपरा कैसे क्या है?
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→ Used in: B · Video रामपाल की गुरु परंपरा का काला सच: क्या है सतलोक और कबीर साहेब का असली रहस्य? | R... at 1:22 ↗
00:13:38:24 इसका मतलब अभी जो मार्केट में जो किताबें जो बिक रही है, जो वेद है, कुरान शरीफ है, गीता है, ये सब बेकार है। बेकार नहीं है। मुझे मालूम है। मुझे मालूम है वो कहां से आया? मैं आपसे सुनना चाह रहा हूं। क्या आपको पता है वो कहां से आया? कहां से आया? क्या आपको पता है वो कहां से आया? वेद। हां। मुझे पता है कि मार्केट में वो जो किताबें छप रही है, किस आधार पे छप रही है। क्या आपको पता है किस आधार पे छप रही है? नहीं पता। हां। वह छप रही हैं गुरु शिष्य परंपरा के आधार पर। जब वेद प्रकट होते हैं तो उसके बाद गुरु अपने शिष्य को वेद रटाते हैं और उसका अर्थ भी रटाते हैं। फिर वह अपने शिष्य को रटाता है। तो ऐसे शिष्य के शिष्य के शिष्य के शिष्य के शिष्य के द्वारा आज तक वो वेद व्याप्त है। तो अब ये समझ में आया कि गुरु परंपरा के द्वारा अब तक वेद आया। मेरा कहने का मतलब यह है। सुनिए मैं जो कहना चाह रहा हूं। मैं वही वही मैं कह रहा हूं। देखिए वह जो खोल के दिखा रहे हैं वो जहां से श्लोक आए हैं वहीं से अर्थ भी आया है। अगर आपको किसी व्यक्ति के ऊपर विश्वास नहीं है कि यह भूु है मान लो ये बुद्धि बुद्धू है ये तो उसके श्लोक पर भी विश्वास नहीं होना चाहिए। बुद्धू है गलत श्लोक बता सकता है ना और अगर उसके श्लोक पर विश्वास है
00:14:53:27 तो उसके अर्थ पर भी विश्वास होना चाहिए। मगर आप श्लोक उससे ले रहे हो। अर्थ अपना दे रहे हो। अब सुनिए मैं यह कह रहा था कि आपके रामपाल जी को वेदों के सारे मंत्र याद हैं क्या?
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00:15:07:15 विद्यमान है और शास्त्र एक शास्त्र पूरा सुना दीजिए अभी। चलिए कौन सा आपको सब प्राप्त है ना? वो सुना हम आपको क्यों तो वही मैं कह रहा हूं। जो गीता और वेद है वो हमारे पास तक कैसे आए? क्योंकि वो आज से दो अरब वर्ष पूर्व या आपके अनुसार 5000 5000 5000 वर्ष पूर्व सृष्टि है और 5000 साल में वो क्वेश्चन दूसरा है कि जो वेद है वो आज से 5000 साल पहले आए आपके अनुसार और हमारे अनुसार 2 अरब वर्ष हुआ है। ठीक है? तो जो 5000 वर्ष पूर्व जो वेद आते हैं प्रकट होते हैं जो भी है हम कह रहे हैं कि आज के समय में जो उसका अर्थ कर रहे हैं उसको अनर्थ कर दिया है। गलत कर दिया है। तो वो जो वेद के मंत्र हैं और वो जो वेद गीता के श्लोक हैं वो हमारे पास तक आपके पास तक कैसे आए हैं? 5000 वर्ष से यहां तक कैसे आए? वो कैसे आए? हां जब हमारे ज्ञान के अनुसार जैसे अभी मैंने वीरेंद्र देवी दीक्षित जी का नाम लिया उन्होंने पूरा उसको वह कौन व्यक्ति था जिसने लिया वहां पे 5000 साल पहले वेदव्यास वेदव्यास जी फिर उनसे फिर उन फिर गद्दियां चल जाती है ना फिर वो गद्दी कौन सी थी क्या नाम था इतना मेरे को नहीं आप उसकी शास्त्रीयता पूछी जा रही है आपकी परंपरा के लिए तो उसमें आप सारी बातें बता रहे हैं उसकी प्रामाणिकता के विषय में आप कह
00:16:22:19 रहे हैं कि नहीं बताएंगे हम समझ नहीं मैंने ये प्रश्न क्यों किया मैं इसको क्लियर करूं बात ये है कि हमको गीता गीता वेद पुराण प्राप्त होते हैं परंपरा से गुरु शिष्य परंपरा चलती थी मुंडकोपनिषद में एक से ले चार तक बताया गया है वो तो हर चीज की परंपरा मुंडकोपनिषद में एक से ले चार तक ये बताया गया है कि मेरे ये गुरु थे मेरे ये गुरु थे ऐसे करके विद्या मुझ तक आई है। भगवत गीता में भी चार दो तीन 16 में परंपरा की बात कही है भगवान ने कि ज्ञान जो है परंपरा से प्राप्त हो रहा है। अच्छा वेद के जो मंत्र होते हैं ना उसका अर्थ करने के लिए हमको नॉर्मल डिक्शनरी नहीं चाहिए होती है। एक डिक्शनरी है निरुक्त नाम सुना है नहीं मैंने सुना क्योंकि उतना अब है मैं बता रहा हूं निरुक्त जो है उसको निरुक्त को रचने वाले उसके रचनाकार हैं यासकाचार्य आचार्य यास जी तो वो भी उसमें कहते हैं कि श्रुति परंपरा से ही ज्ञान प्राप्त होता है। यानी कि हमारे पास जो वेद के मंत्र आ रहे हैं वो श्रुति परंपरा से आ रहे हैं। अगर परंपरा नहीं है तो वेद के मंत्र भी नहीं है। अगर परंपरा है तो वेद के मंत्र हैं। गीता के गीता के श्लोक हैं। तो कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे मान लीजिए कि हमको परंपरा से अब वो परंपरा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मधवाचार्य इत्यादि के रूप में आज भी है
00:17:37:22 आपको गीता का अर्थ बताने के लिए वेद का अर्थ बताने के लिए। अब दिक्कत क्या है कि अगर हम यह कह देते हैं कि उन्होंने अर्थ को बदल दिया है। ठीक है? तो हमें वेद के मंत्र किससे मिल रहे हैं? उन्हीं से मिल रहे हैं। गीता के श्लोक किससे मिल रहे हैं? उन्हीं से मिल रहे हैं। तो अगर हम यह कहते हैं कि उन्होंने अर्थ को बदल दिया है तो अगर हमें उन पर विश्वास नहीं है तो फिर हम यह कैसे विश्वास करें कि ये जो वेद के मंत्र हैं ये वही मंत्र हैं जो भगवान ने दिए थे 5 साल 5000 साल पहले या तो विश्वास करना पड़ेगा तो पूरा करना पड़ेगा। सिद्ध कैसे करेंगे आप? उन्हें शब्द प्रमाणों से सिद्ध करें। शब्द प्रमाण आपके पास आए कैसे? जब उन शब्द प्रमाण को देने वाले पर आपका भरोसा नहीं है। किसने? कि भैया परंपरा से गीता प्रेस तो हमारी कोई धर्म धर्माचार्य है नहीं। गीता प्रेस या फिर चौखंबा ये सब कोई हमारे धर्माचार नहीं है। हमारे जो धर्माचार्य होते हैं वो गुरु शिष्य परंपरा से मंत्रों को लेके आए हैं। तो अगर हम ये कह देंगे कि हमें इन पर भरोसा नहीं है। हम तो अपना अर्थ करेंगे। हम अपना अर्थ करेंगे या या फिर हमारे पास कोई दिव्य एक मिनट या फिर या फिर हमारे पास कोई दिव्य शक्ति आ रही है। हम उसका अर्थ मानेंगे और श्लोक लेंगे इनसे मंत्र लेंगे इनसे और अर्थ लेंगे इनसे। तो अगर इस पे हमें भरोसा नहीं जिससे हम मंत्र ले रहे हैं या अर्थ ले रहे
00:18:52:24 हैं तो उनके मंत्रों पर भी हमें भरोसा उसके अर्थ पर हमें अगर भरोसा नहीं है तो उनके मंत्रों पर भी हमारा भरोसा करना सिद्ध नहीं होता। जैसे हिस्ट्री नहीं है। आपने कहा 2500 की है। मैं तो वो वेद वेदों को तो मान रहा हूं मगर उसका जो अर्थ है ना तो शुरुआत में आपका मानना सिद्ध नहीं होता ना। जैसे मैंने कहा कि मैं जो है क्या कहते हैं ये ये आपने लिखा है आध्यात्मिक विश्वविद्यालय। मैं आध्यात्मिक विश्वविद्यालय को तो मान रहा हूं। आपने लिखा है अच्छा लिखा है। मगर इसका मतलब है आध्यात्मिक विश्वविद्यालय का पागलखाना। तो फिर सही बात होगी क्या यह? तो ये थोड़ी सी दिक्कत आएगी। ये पोस्टर अगर आपने लगवाया है ये पोस्टर अगर आपने हमें दिया है और इसके थ्रू हम इस लाइन को जान रहे हैं कि आध्यात्मिक विश्वविद्यालय तो हमें आपके अर्थ पर भी विश्वास करना होगा और नहीं करेंगे तो हमारा इस पोस्टर पर भी विश्वास सिद्ध नहीं होगा। अब मैं सवाल कर आपसे। हां बोलिए। नात प्रतिमा अस्ति ये जो श्लोक है ऋग्वेद का क्या ये ऋग्वेद का श्लोक जो है ये सही है शबरी जी को भेलने तो अप दीक्षित जी ने भी माना था आप ही के पूराचार्य हो गया सवाल पहले पूछ रहा हूं सही है क्या ये सही है सही है तो इस
00:20:07:25 श्लोक के अनुसार जो है उसका कोई रूप नहीं है उसकी कोई प्रतिमा नहीं है अब जो कोई भी उसकी प्रति बोलने देंगे कि नहीं नात प्रतिमा अस्ति का अर्थ मैं आपको बता रहा हूं मैं आपको बता रहा हूं आपको जवाब देना है जवाब आपको मैं नहीं टोकूंगा आपको मैं आपको नहीं टोकूंगा मैं सिर्फ अपनी पूरा डिटेल बता रहा हूं जब कुछ बच जाए तो आप काउंटर करिएगा मैं डिटेल बता रहा हूं पूरा सवाल और ऑब्जेक्शन होने दो ताकि आप आसानी से जवाब दे सके ठीक है सवाल क्योंकि आप सवाल में आप अर्थ बता रहे हैं अर्थ मत बताइए सवाल करिए हां तो सवाल तो कर दिया
00:20:48:02 वो अर्थ जो आपने जो अर्थ बताया वो जो आपने अर्थ बताया वो अर्थ गलत है। जो आपने अर्थ बताया वो अर्थ गलत है। तो बस मैं वही कह रहा हूं ना मुझे अर्थ बताने दीजिए। जब शैतान की बात आई थी आपने शैतान का अर्थ बताया। जब मलाइका की बात आई थी तो आपने मलाइका का अर्थ बताया। जब आदम की बात आई थी आपने आदम का अर्थ बताया। तो जब आप मेरे ऊपर क्लेम कर रहे हैं मेरे ग्रंथों पर जब आप मेरे ऊपर क्लेम कर रहे हैं मेरे ग्रंथों पर तो आप मुझे उसका अर्थ बताने देंगे ना बताइए हां बताइए
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00:21:24:16 अब फिर वही बात है उन्होंने क्या कहा आपको कैसे पता चला क्योंकि उनके ग्रंथों में ये बात लिखी अरे भाई उनके ग्रंथों का अर्थ आपको कौन देगा ग्रंथ कौन देगा आपको परंपरा ना
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00:21:33:01 अब पहले तो मैं अर्थ बताऊंगा उसके बाद मेरी एक और दलील है उसको भी आप सुनिएगा अर्थ सुनिए पहले आप अर्थ बताइए। हां अर्थ बता नातस प्रतिमा अस्ति का जो अर्थ है प्रतिमान से बना है प्रतिमा किससे बना है प्रतिमान मान मतलब वैल्यू मान मतलब वैल्यू तो यहां पर उसने ये नहीं कहा मेरे जैसी प्रतिमा यानी मेरी मूर्ति नहीं है कोई यानी मेरी मूर्ति नहीं है कोई ये बात नहीं हो रही यहां कह रहे मेरे जैसा मान मेरे जैसी वैल्यू किसी की नहीं है संसार में मेरे जैसी वैल्यू ठीक है अब क्योंकि मूर्ति दिखने के मामले में किसी के जैसी होती है। जैसे मान लीजिए मेरी किसी ने मूर्ति बनाई तो दिखने के मामले में वो मेरी जैसी है। तो इसलिए मूर्ति को भी प्रतिमा कहा जाने लगा। मगर प्रतिमा शब्द का वास्तविक अर्थ है प्रतिमान। मेरे समान कोई नहीं है। वहां ये कहा जा रहा है। पहली बात। दूसरी बात ये है कि मेरे ग्रंथों के विषय में मैं आपको बताऊंगा और आपके ग्रंथों के विषय में आप मुझे आप मुझे बताएंगे। क्यों? क्योंकि यहां पर ये क्लेम नहीं हो रहा है कि वो क्यों? क्यों?
00:22:48:16 उसका कारण ये है एक शब्द होता है परंपरा। भगवत गीता चार दो में तीन 16 में और मांडकोपनिषद में मुंडकोपनिषद में सॉरी एक से ले चार तक पहले ही अध्याय में शायद परंपरा बताई जा रही है कि भैया ऋषियों ने वेद दिए उसको फिर उसने दिए इस ऋषि को फिर उसने दिए इस ऋषि को ऐसे करके करके ऋषियों से लेकर आज तक के जो हमारे आचार्य वहां तक की हमें परंपरा प्राप्त है तो हमारे ग्र ग्रंथ का अर्थ कौन बताएगा जिसको अपनी परंपरा से वेद प्राप्त हुआ होगा। हां मैं कुरान को लेकर के ये नहीं कह सकता हूं। नहीं आपकी कुरान में ये लिखा है। मैं सही बता रहा हूं। दूसरी बात ये है कि मैंने अभी तक आपकी किताब को लेकर के क्लेम ये नहीं किया कि आपकी किताब में ये लिखा है। आप ये कैसे बोल रहे हो? मैंने उसको एज इट इज माना जो आपने अपनी किताब के अनुसार बोला। क्योंकि मैं क्लेम नहीं कर सकता हूं। आपकी किताब में क्या लिखा है मैं बताऊंगा। क्यों? क्योंकि परंपरा से वो किताब आपको पाठ आई है। मेरे पास नहीं आई है। मैंने उस चैन ऑफ नरेशन से उसका अध्ययन नहीं किया है जिस जिससे आपने किया है। तो आपकी किताबों में क्या लिखा है? क्या नहीं लिखा है? इस बात को लेकर
00:24:10:05 [संगीत]
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एक सवाल : दुनिया भर के पाखंडी परेशान | परंपरा
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