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00:00:02:28 तो सभी को जय श्री राम। बहु प्रतीक्षित विषय है पुषुंडी रामायण, शबरी जी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और सो कॉल्ड आजकल वो सो कॉल्ड आचार्य और आजकल के कर्मणा जगतगुरु है ना भागवतानंद। खैर अब वो कितने सो कॉल्ड हैं? कर्मणा कैसे हैं? वह सब आज का विषय नहीं है। पर विवेचना को आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पहले मैं आपको यह बता दूं कि
00:00:36:26 जो मेरे विषय हैं धर्म की रक्षा करने के निमित्त उसमें यह जो वस्तुनिष्ठ जानकारियां हैं कि कब क्या हुआ था? उसका क्या नाम है? वहां पर इस पर्टिकुलर उस घटनाक्रम में क्या-क्या किस क्रम में कैसे कौन सी चीजें घटित हुई थी। तो इस बारे में मेरी कोई ना तो रुचि है और ना ही मेरे लिए मेरे में मेरे जो मेरा जो क्षेत्र है उसमें उपयोगी होने वाली सामग्री है। तो इस कारण से उसमें गति होना भी मेरा कोई ना होना संभावित ही है। फिर भी क्योंकि इस विषय को आधार बना करके परंपरा प्राप्त प्रामाणिक आचार्य के प्रति लोगों को अनास्थावान बनाया जा रहा है। इसलिए इस विषय पर मुझे कार्य करना पड़ा। और इसका जो मूल आधार है इस विवेचना का जो मैंने अभी यह की है इसका मूल आधार है कि मेरे जीवन में जब कुछ नहीं था जब मैं गुरु को नहीं जानता था अपने ग्रंथों को भी ठीक से नहीं जानता था मैं बस एक नाम जानता था राम मैं राम को जानता था तो जो मेरा यह आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ हुआ है उसका कारण भी राम ही थे कभी कोई ऐसा टकरा गया था। कोई ऐसा मिल गया था जिसने
00:01:52:04 मेरे राम के आचरण पर उंगली उठाई थी। और उस व्यक्ति को उत्तर देने के निमित्त शास्त्रों का अध्ययन, स्वा अध्ययन, गुरुओं के प्रवचन का श्रवण यह सब प्रारंभ हुआ और धीरे धीरे धीरे धीरे मेरी वो जो यात्रा है, किस तरह से शंकराचार्य जी तक आकर के पूर्ण हुई। वो एक मैं कई बार अपनी सारा घटनाक्रम अपनी वीडियोस में आपको बता चुका हूं। तो प्रभु श्री राम पर उंगली उठाए जाने से ही मेरा आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ हुआ था। धर्म पर उंगली उठाए जाने से ही मेरा आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ हुआ था। और आज देख लीजिए घूम फिर के कहानी फिर वहीं पर आ गई। इतिहास फिर अपने आप को दोहरा रहा है कि मेरे प्रभु श्री राम पर अमर्यादित होने का ब्रह्म भाव से ही सही मर्यादा के बाहर जाकर के कार्य करने का अ आरोप लगाया जा रहा है तो मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि मैं प्रभु श्री राम के पक्ष को जनता के समक्ष जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत करूं क्योंकि मैंने आपको बताया कि जब मेरे पास ना धर्म शास्त्र थे ना गुरुओं के वचन थे। तब मेरे पास सिर्फ राम थे। क्या सही और क्या गलत। इस
00:03:07:10 मामले में मेरे पास एक ही पैरामीटर हुआ करता था। राम और उन्हीं प्रभु श्री राम पर जब उंगली उंगली उठाई गई तो मैं विवश हो गया सामने वाले को उत्तर देने के लिए। उसी प्रकार से आज उंगली उठाई जा रही है कि प्रभु श्री राम ने ब्रह्म भाव का आलंबन लेते हुए और मर्यादा को लांघ कर धर्म की शास्त्रों की मर्यादा को लांग कर शबरी के झूठे बेर खाए और उसमें अनेक कुतर्क और यहां तक कि जो तथाकथित कुछ ऐसे ग्रंथ हैं जिनका आलंबन लेकर के अनेक अनेक प्रकार के प्रलाप भी किए गए इन्हीं विषयों में। तो आज उन सबके बारे में हम बात करने वाले हैं। बहुत ही रोचक यात्रा होने वाली है। तो आप लोग अपनी सीट की पेटी बांध लें। तो मुख्य विषय पर आते हैं। सबसे पहले कि दो प्रकार की क्लेम है जिनको हम जिनका निराकरण प्रस्तुत कर रहे हैं। पहला क्लेम है कि शबरी जी ब्राह्मण नहीं थी। और दूसरा क्लेम है कि श्री राम जी ने शबरी के झूठे वेर खाए थे। ठीक है? और इसका आधार सामने वालों के पास
00:04:22:14 जो है मुख्य आधार वह है भूषुंडी रामायण। ठीक है? यह भी यह एक हमने जो पूर्व पक्ष है उसको संक्षिप्त में प्रस्तुत किया। बाकी सारे पूर्व पक्ष इसमें आएंगे जिसको मान लीजिए। तो जो पूरी शंकराचार्य ने कहा कि शबरी जी ब्राहणी थी। यह किस शास्त्र के आधार पर उनके पूर्व ने बताया? तो सबसे पहले मैं बता दूं आपको कि शबरी के ब्राह्मण होने के समर्थन में तथा श्री राम द्वारा शबरी के झूठे बेर ना खाने के समर्थन में जो प्रमाण हैं उनको मैं आपको थोड़ा सा उनसे आपको अवगत करा रहा हूं। पहला है कि शबरी जी को वाल्मीकि रामायण में तापसी कहा गया है। तपस्विनी कहा गया है। कहां कहा गया है? वाल्मीकि रामायण 3 74 10 ध्यातव्य है कि तप करना ब्राह्मण का स्वाभाविक कर्म है। कहां लिखा है? भगवत गीता 18 42 सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है। कहां लिखा है? भगवत गीता 18 44 इसके साथ ही साथ उच्चिष्ट पदार्थ किसी को खिलाना अथवा स्वयं खाना निषेध है। कहां लिखा है? मनुस्मृति दो 56 अपने अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार स्वकर्तव्य में निष्ठा ही धर्म है। हम पहले यह सेट कर रहे हैं पैराटर्स कि धर्म क्या है और अधर्म
00:05:37:20 क्या है? उसके बाद हम देखेंगे कि श्री राम जी धर्म के बाहर जाकर के आचरण करने वाले सिद्ध होते हैं या नहीं होते हैं। तो अब धर्म क्या है? अपने अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार स्वकर्तव्य में निष्ठा ही धर्म है। यह कहां से आया? भगवत गीता 18 45 और मनुस्मृति 735 वेदादि शास्त्रोक्त कर्म ही धर्म है। भगवत गीता 16 24 मीमांसा दर्शन एक 12 मनुस्मृति दो छ जो धर्म श्रुतियों और स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रम के आचार्य से युक्त तथा शिष्टाचार द्वारा परिवर्तित होता है। वही धर्म साधु संवत धर्म है। है ना? श्रोत स्मार्थ है ना वही साधु संवत धर्म है। कहां लिखा है? मत्स पुराण 145वा अध्याय 52वा श्लोक वर्णाश्रम के विभाग अनुसार प्रयुक्त हुआ धर्म स्मार्थ कहलाता है। इस प्रकार श्रोत और स्मार्थ द्विवध धर्म को शिष्टाचार कहते हैं। कहां लिखा है? मत्स पुराण 145वा अध्याय और 32वा श्लोक अर्थात अपने निर्धारित कर्मों के विरुद्ध कर्म करना अधर्म है अपराध है मर्यादा की दृष्टि से अपराध है शास्त्री शास्त्रीय मर्यादा की दृष्टि से अपराध
00:06:53:03 है अधर्म है ऐसे में अपराधी दंड का पात्र भी होता है नारद जी का वाल्मीकि जी के साथ संवाद प्रभु श्री राम को दृढ़ प्रतिज्ञ सत्य वक्ता सदाचारी नीतिज्ञ स्वधर्म का पालन करने वाला कहा गया है। इस संवाद में कहां से कहां तक है? वाल्मीकि रामायण एक दो दो से 14 भगवान श्री राम मनुस्मृति द्वारा निर्धारित आचरण करने की घोषणा करते हैं। वो घोषणा कर रहे हैं कि मनुस्मृति के आधार पर चलूंगा। कहां कर रहे हैं? वाल्मीकि रामायण चार 18 30 वह कह रहे हैं कि मैं मनु महाराज के बताए गए बताए गए जो संविधान है उसके अनुसार चलूंगा चलता हूं मानता हूं मनुस्मृति के दो श्लोक भी उन्होंने वहां पर इस बाली को संतुष्ट करने के लिए उद्रत किए थे। कौन से श्लोक थे?
00:07:48:16 मनुस्मृति आठ 316 और 8 300 18 कहां पर किए हैं? वाल्मीकि रामायण चार 18 31 से 32 यहां पर यह मनुस्मृति के दोनों श्लोक उन्होंने उ्रत किए। श्लोक में क्या कहा गया है कि अधर्मी को राजा द्वारा दंडित ना किए जाने की स्थिति में राजा के लिए दंड का प्रावधान है। यह उन्होंने बताया। अतः इस प्रकार वनवास के समय भी श्री राम ने स्वयं को राजा भरत की आज्ञा के अंतर्गत मनुस्मृति के सिद्धांतों अर्थात धर्म को स्थापित करने हेतु प्रतिबद्ध बताया है। एवं धर्म मार्ग से भटके हुए भ्रष्ट पुरुष को विधि पूर्वक दंड देने वाला भी बताया है। हम सब लोग इस आगे हम सब लोग अपने श्रेष्ठ धर्म में दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहकर भरत की आज्ञा को सामने रखते हुए धर्म मार्ग से भ्रष्ट पुरुष को विधि पूर्वक दंड देते हैं। कहां लिखा है वाल्मीकि रामायण 4 18 10 जो लोग आचार से भ्रष्ट होकर लोक विरुद्ध आचरण करते हैं। उसे रोकने या राह पर लाने के लिए मैं दंड के सिवा और कोई उपाय
00:09:03:18 नहीं देखता। वाल्मीकि रामायण 4:18 21 हमारे राजा भरत हैं। हम लोग तो केवल उनके आदेश का पालन करने वाले हैं। तुम धर्म से गिर गए हो। अतः तुम्हारी उपेक्षा कैसे की जा सकती थी? वाल्मीकि रामायण 4 18 23 हम लोग तो भरत की आज्ञा को ही प्रमाण मानकर धर्म मर्यादा का उल्लंघन करने वाले लोगों को दंड देने के लिए सदा उद्यत रहते हैं। वाल्मीकि रामायण 4 18 25 विद्वान राजा भरत महान धर्म से भ्रष्ट हुए पुरुष को दंड देते हैं और धर्मात्मा पुरुष का धर्म पूर्वक पालन करते हुए स्वेच्छाचारी पुरुषों के निग्रह में निग्रह किसके निग्रह में स्वेच्छाचारी वह स्वप्न सिद्ध संप्रदाय वाले है ना स्वेच्छाचारी तो निग्रह में तत्पर रहते हैं वाल्मीकि रामायण चार 18 24 अपनेप धर्म में संलग्न सब वर्णों तथा आश्रमों की रक्षा करने वाले को राजा कहा गया है। ध्यान रखिए राजा कौन है? अपने अपने धर्मों में संलग्न सब वर्णों तथा आश्रमों की रक्षा करने वाले को राजा कहा गया है। कहां कहा गया है? मनुस्मृति 7:35
00:10:19:13 चर्चा के प्रारंभ में अब हमने यहां तक जान लिया कि श्री राम जी वहां पर धर्म क्या है और श्रुति शास्त्रों के द्वारा स्मृति शास्त्रों के द्वारा धर्म को किस तरह से डिफाइन किया गया है इस विषय के आलोक में और पर्टिकुलर जो श्री राम हैं वो अपने बारे में क्या बता रहे हैं वनवास के समय अभी आगे और भी उनके कई वचन आएंगे। अब जो है श्री राम जी के बारे में कुछ चीजें हम लोग स्थापित कर दें कि भैया श्री राम जी कौन हैं? कैसे हैं? उनका मुख्य चरित्र क्या है? तो चर्चा के प्रारंभ में श्री रामचंद्र जी के विषय में निम्नलिखित तथ्यों को जान लेना अति आवश्यक है। क्या है? मैंने तीन नियमों के पालन की दृढ़ प्रतिज्ञा की है। उसमें से पहली बात यह है कि मैं अपने मुख से निकली हुई बात का अवश्य मेंव पालन करने का नियम लिया है। मैं अपने मुख से निकली हुई बात को मिथ्या नहीं होने देता। उसे अवश्य पूर्ण करता हूं। साथ ही दोबारा मैं उस संबंध में कोई बात नहीं बदलता हूं। जो एक बार कह दिया उसे निश्चित ही पूरा करता हूं। मेरी दूसरी प्रतिज्ञा है कि सीता
00:11:34:26 के अतिरिक्त अन्य सभी स्त्रियां मेरे लिए माता कौशल्या के समान हैं। किसके समान है? प्रतिज्ञा है ये। माता कौशल्या के समान है। अन्य स्त्रियां प्रतिज्ञा है ये। ठीक है? मैं सीता के अतिरिक्त किसी अन्य को ना तो पत्नी बना सकता हूं और ना किसी स्त्री का मैं मन से भी चिंतन कर सकता हूं। करता हूं। मेरी तीसरी प्रतिज्ञा यह है कि मैं कोप करके जिसका वध करना चाहता हूं। उस पर केवल एक ही बाण का प्रयोग करता हूं। दूसरे बाण बाण का प्रयोग नहीं करता। आनंद रामायण विलास कांड सात 11 से 14 और सुनिए वाल्मीकि रामायण एक 12 श्री राम सत्य प्रतिज्ञ हैं। वाल्मीकि रामायण दो 18 28 से 30 श्री राम कह रहे हैं मैं दो प्रकार की बातें नहीं करता। जो भी बोलता हूं सोच समझ कर बोलता हूं। ठीक है? वाल्मीकि रामायण 4 82 मैंने पहले कभी भी झूठी बात नहीं कही है और भविष्य में भी कभी असत्य नहीं बोलूंगा। वाल्मीकि रामायण दो 150 43
00:12:50:16 मैं पिताजी के वचन का पालन करूंगा। वाल्मीकि रामायण श्री राम कह रहे हैं मैं अपने प्राण छोड़ छोड़ सकता हूं। तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकता हूं किंतु अपनी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ सकता। ठीक है? आगे चलके रामायण में देखिएगा इन वचनों का क्या होगा। वाल्मीकि रामायण तीन 37 13 रामो विग्रहान धर्मः अर्थात प्रभु श्री राम धर्म का साक्षात स्वरूप है स्वरूप।
00:13:25:13 अब बात यह आती है इन सारी जो हमने अभी तक जो प्रमाण संकलित किए यहां पर उसका निचोड़ क्या निकलता है कि श्री राम कोई भी बात यूं ही नहीं बोलते वही करते हैं कभी भी अपने वचन से विमुख नहीं होते वही करते हैं जो बोलते हैं सत्य प्रतिज्ञ है इसलिए उन्हें धर्म का मूर्तिमान स्वरूप कहा गया है इसलिए रामायण अर्थात श्री रामचरित्र के अनुसार बर्ताव करने वालों को शास्त्रों का मर्मज्ञ और कल्याण प्राप्त करने वाला मोक्ष प्राप्त करने वाला बताया गया है। कहां बताया गया है? स्कंद पुराण उत्तरखंड रामायण महात्म एक 22 से 23 श्री राम की तरह आचरण करना चाहिए। बृह धर्मत्तर पुराण 269 श्री राम के मनुष्य अवतार का मुख्य उद्देश्य मनुष्यों को शिक्षा देना है। श्रीमद् भागवत पांच 195 कर्तव्य से विमुख होने पर उन्हें राजा भरत द्वारा दंडित किया जाना भी सुनिश्चित था। मत्स्य पुराण 200 27 191 से 193
00:14:41:03 मत्स्य पुराण में राजा को दंड देने की बात की गई है कि जो दोषी को दंड नहीं देता है तो उसको दंड दिया जाता है राजा के द्वारा। अतः क्योंकि श्री राम शास्त्रीय नियमों के अनुसार वध करने योग्य व्यक्ति का वध अवश्य ही करते हैं। ठीक है? यह कहां लिखा है? वाल्मीकि रामायण दो 46 अतः क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार आताताई हो जाने पर ब्राह्मण का भी वध करने की आज्ञा दी गई है। मनुस्मृति 8 350 इसलिए श्री राम ने जहां एक ओर आताताई स्त्री ताड़का का वध किया वहीं दूसरी ओर ब्राह्मण का ब्राह्मण रावण का वध करके प्रायश्चित किया और वहीं एक ओर शास्त्रीय मर्यादा का अतिक्रमण करके तप करने वाले शंभूक का वध भी किया वाल्मीकि रामायण सात 74 तीन से चार अब जो शंभुक की बात आई है क्यों आई है क्योंकि हमने सबसे पहले स्थापित एक बात की थी कि शबरी जी को तपस्विनी कहा गया है। ठीक है? एक-एक करके चलते हैं। तो यहां पे शंभुक को तपस्या करने पर वध किया गया और वहां पर उनको प्रोत्साहन दिया गया उनकी तपस्या को।
00:15:56:12 जबकि जो आक्षेपकर्ता हैं भागवतानंद एंड कंपनी उनके अनुसार या भूषुंडी रामायण के आलोक में अगर देखें तो उसके अनुसार वो शूद्रा थी। शूद्रा को तप करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। और यह कहां से सिद्ध हो रहा है? वाल्मीकि रामायण से। 74 26 तीन युगों में तीन वर्ण का ही आश्रय लेकर तपस्या रूपी धर्म प्रतिष्ठित होता है। किंतु शूद्र को इन तीनों ही युगों में तप रूपी धर्म का अधिकार प्राप्त नहीं है। वाल्मीकि रामायण सात 74 26 परंतु शबरी के तप को श्री राम के द्वारा प्रोत्साहित किया गया। शबरी के तप की वृद्धि के बारे में उन्होंने पूछा। शबरी को तपोधना कहकर संबोधित किया। वाल्मीकि रामायण तीन 74 आठ से नौ शबरी जी को कृष्ण मृग चर्म व जटा धारण करने वाली भी कहा गया है जिसका विधान मुख्य रूप से ब्राह्मणों के निमित्त बताया गया है। वाल्मीकि रामायण कहां कहा गया उन्हें? कृष्ण मृग चर्म धारण करने वाली वाल्मीकि रामायण तीन 74 33 कृष्ण मृग चर्म ब्राह्मणों का सनातन ध्वज है। कहां लिखा है विष्णु धर्म पुराण
00:17:11:22 74 13 सिर पर जटा और मृग चर्म वानप्रस्थ आश्रमी को निर्देशित किया गया है। श्रीमद् भागवत 7 12 21 बलि वैश्व देव और होम से पूजित होने वाला मुनियों का पवित्र आश्रम जहां वेद मंत्रों के पाठ की ध्वनि गूंजती थी वहां रहने वाले जितेंद्रिय मुनि यानी कि ब्राह्मण हुए ना वेद मंत्र होता था और वातावरण को पवित्र कहा गया है। वेद मंत्रों का पाठ हो रहा है। और ऐसे मुनियों को महान कहा जा रहा है। आदर्श उनके विषय में कहा जा रहा है उनके संबंध में तो जितेंद्रिय मुनि भी कृष्ण मृग चर्म धारण करते थे वाल्मीकि रामायण तीन एक चार से सात इसी क्रम में शबरी जी को धर्माचारिणी धर्म निपुणा सिद्धा धर्म संस्थिता एवं अवयस्कता इत्यादि शब्दों द्वारा भी संबोधित किया गया है। कहां किया गया है? वाल्मीकि रामायण 374 छ वाल्मीकि रामायण 374 सात और वाल्मीकि रामायण 34 18 यहां पे इनको इन शब्दों से संबोधित किया गया है। ये हम क्यों बता रहे हैं? ये इसलिए बता रहे हैं कि कृष्ण मृग चर्म यदि कोई व्यक्ति यूं ही धारण कर
00:18:26:28 ले मतलब जैसे कोई शूद्र है और वो भी कृष्ण मृग चर्म धारण कर सकता है। ऐसा कुछ नहीं है। परंतु उसको धर्माचारी नहीं कहा जाएगा। उसको आदर्श रूप में प्रस्तुत करने वाली उपाधियां नहीं दी जाएंगी। मगर इनको दी गई है। इनको धर्माचारणी कहा गया है। इनको धर्म को जानने वाली कहा गया है। और तो और इनके द्वारा जो आचरण वहां दिखाए जा रहे हैं, वहां से भी सिद्ध होता है कि यह धर्म धर्म को जानने वाली थी और धर्माचारणी थी। तो इसलिए जब यह कृष्ण मृग चर्म धारण करेंगी तो वहां पर आएगा कि ये इन्होंने विधि विधान से विधि विधान के अनुरूप इन्होंने धारण किया है। इसलिए मानना पड़ेगा कि यह ब्राह्मणी थी। क्योंकि यह धर्म को जानने वाली हैं। कोई शूद्र है तो वह भी तपस्या कर सकता है। ऐसा नहीं है। मगर वहां पर उसको धर्माचारी नहीं कहा जाएगा। क्योंकि विधि क्या है? धर्म क्या है कि शूद्र को तपस्या नहीं करना है। ऐसे में यदि ये तपस्या करेंगी और इनको धर्माचारी कहा जाएगा और अगर ये विधि के विरुद्ध जाकर के तपस्या कर रही हैं तो फिर इनको धर्माचारिणी कहना वो संगति नहीं बैठेगी। खैर तो ब्राह्मणों के लिए प्रशस्त कृष्ण मृग चर्म धारण को विशेष रूप से चिन्हित करते हुए तपस्या करने वाले वाली शबरी जी के लिए धर्माचारिणी धर्मनिपुणा इत्यादि शब्दों से भी शबरी जी का ब्राह्मणी होना सिद्ध होता
00:19:42:02 है। ठीक है? अब क्या बात आ गई? एक तो तपस्या तपस्या से उनका तपस्या करने पर भी कोई आपत्ति नहीं श्री राम जी के द्वारा उन पर और तपस्या करने पर शंभुक का वध कर डाला ठीक है वो अभी कुछ आपके पूर्वाग्रह आ रहे होंगे वो हमने लिए हैं पूर्व पक्ष इस विषय में दूसरा दूसरी बात क्या आई कि उनका ब्राह्मण सिद्ध ब्राह्मण होना ही कैसे सिद्ध होता है क्योंकि वो धर्माचारणी थी धर्म को जानने वाली थी ऐसा है ना कि शूद्र को छोड़ के बाकी सब तो तपस्या में है अधिकृत है तो फिर उनको ब्राह्मण या क्षत्रिय वैश्य क्यों ना माना जाए? ब्राह्मण क्यों मान लिया जाए? क्योंकि वह धर्म धर्म को जानने वाली होते हुए कृष्ण मृग चर्म को धारण कर रही हैं। जो कि विशेष रूप से ब्राह्मणों का चिन्ह है। ठीक है? इस विषय में एक शंका और उत्पन्न हो जाती है। देखिए आ गया वही बात कि शास्त्रों में अब ब्राह्मण श्रवण कुमार की शूद्रा माता सहित कौशल्या सीता
00:20:38:26 शायद कुंती है। गांधारी हम और सत्यभामा द्रोपदी सगर भार्या सत्यवती उत्तरा अंबा शिखंडिनी आदि अनेक स्त्रियों के लिए तपस्विनी शब्द आया है तो विशेष रूप से बात करें यदि श्रवण कुमार की शूद्रा माता को तप्विनी कहे जाने की तो जिस प्रकार ट्रेन में यात्रा करने वाले जिस प्रकार ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले व्यक्ति को भी यात्री ही कहा जाएगा उसी प्रकार विधि का उल्लंघन करते हुए तप करने वाले किसी अनाधिकृत व्यक्ति को भी तपस्वी तो कहा ही जाएगा ना। मगर क्या श्रवण कुमार की शूद्रा माता को धर्माचारिणी कहा गया है? धर्म को जानने वाली कहा गया है? क्या उसे आदर्श रूप में प्रस्तुत करने वाली उपाधियां दी गई है? क्या वहां पर उस तप का समर्थन करने वाले श्री राम खड़े हैं? इस पूरे विषय में सबसे बड़ा जो प्रमाण है वह राम है क्योंकि वहां पर राम खड़े हुए हैं। राम अपने आप में धर्म है। ठीक है? तो क्या करते हैं आगे?
00:21:51:01 तो जिस प्रकार ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले व्यक्ति को भी यात्री ही कहा जाएगा। उसी प्रकार अनाधिकृत रूप से तपस्या करने वाले के लिए तपस्वी शब्द के उपयोग पर आपत्ति कैसे हो सकती है? क्योंकि पूर्व काल में किसी के कहने अथवा करने से नहीं बल्कि शास्त्रों द्वारा स्वीकार किए जाने पर ही किसी घटनाक्रम को सनातन सिद्धांत के रूप में स्वीकार कर उसका अनुकरण किया जा सकता है। कहां लिखा है? महाभारत शांति पर्व दो 262
00:22:25:03 52 से 53 और 260 छ से सात अब यह बात मैंने क्यों कही कि भाई अगर शास्त्र में कोई व्यक्ति या सामान्य दृष्टि से देख लें तो यदि कोई हमने कोई कथा सुनी और उसमें किसी व्यक्ति के द्वारा ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने पर उसको जो है यात्री कह दिया गया तो इसलिए क्या हम यह मान लें कि ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करना क्या कहते हैं कानून का उल्लंघन नहीं है। यह मान लें क्योंकि किसी घटनाक्रम को बताते समय हमारे किसी प्रमाणिक स्त्रोत ने उसको भी यात्री कह दिया गया। नहीं जब तक उसकी यात्रा करने को उचित अथवा अनुचित की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा तब तक हम उस दृष्टांत से उस घटनाक्रम से कोई निर्णय नहीं ले सकते कि वहां पर यह धर्म है या यह अधर्म है। ठीक है? परंतु यहां पर शबरी जी के तप करने को समर्थन प्राप्त हुआ है। शास्त्रकार द्वारा भी, शास्त्र के रचयिता द्वारा भी और शास्त्र के रचयिता के द्वारा बताए गए घटनाक्रम के अनुसार वहां पर उपस्थित श्री राम के द्वारा भी जो कि अपने आप में धर्म के साक्षी हैं। धर्म की धर्म के विग्रहवान स्वरूप
00:23:40:16 हैं। सत्य प्रतिज्ञ हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम है। ऐसे में विचारणीय है कि क्या धर्म के साक्षात मूर्तिमान स्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के द्वारा शबरी की भांति श्रवण कुमार की माता के आचरण की प्रशंसा की गई है? क्या शास्त्रों द्वारा श्रवण कुमार की मां को कृष्ण मृग चर्म व जटा धारण पूर्वक निर्वाह करने वाली धर्माचारिणी कहा गया है? अभिप्राय यह है कि घटना का घटित होना उसके धर्म सम्मत होने में प्रमाण नहीं होता है। उसे शास्त्रों द्वारा धर्म के रूप में स्वीकार किया जाना ही प्रमाण होता है। शबरी को शास्त्रों द्वारा धर्म के रूप में स्वीकार किया गया। उसके आचरण को कैसे? धर्माचारणी कहकर कैसे? श्री राम के द्वारा प्रशंसनीय कहकर
00:24:27:22 ठीक जिस प्रकार शास्त्रों में रावण के कृत्यों का वर्णन मात्र कर देने से रावण के कृत्य अनुकरणीय नहीं हो जाते धर्म नहीं हो जाते उसी प्रकार श्रवण कुमार की शूद्रा माता द्वारा तप किए जाने पर उसे तपस्विनी कहे जाने पर उसके द्वारा तप करना धर्म नहीं हो जाता उचित सिद्ध नहीं हो जाता अतः श्रवण कुमार की मां को तपस्वनी कहे जाने से शबरी के ब्राह्मणी होने का कोई विरोध सिद्ध नहीं होता है। एक पूर्वाग्रह समाप्त। अब बात करें शेष स्त्रियों के लिए। बात करें शेष शेष स्त्रियों की तो यद्यपि यह सभी महिलाएं तपस्या में अधिकृत थी। तथापि क्योंकि शास्त्रों में गौण अर्थ में गृहस्थ जीवन को समर्पित अथवा किसी विशेष उद्देश्य में संलग्न अनुशासित निर्वाह करने वाले किसी मनुष्य मात्र को भी तप करने वाला कहा गया है। जिस प्रकार विष्णु पुराण में भगवान शब्द के उपयोग हेतु बताया गया है कि गौण अर्थ में इस शब्द का उपयोग गुरुजन माता-पिता इत्यादि किसी मान्य व्यक्ति के लिए भी हो सकता है। परंतु मुख्य रूप से भगवान शब्द का उपयोग तो भगवान के लिए ही किया जाता है। विष्णु पुराण छठवें अध्याय में है यह बात। ठीक उसी प्रकार गौण रूप से अनुशासित ग्रहणी को भी तपनी कहा जा सकता
00:25:42:28 है। परंतु शबरी की तपस्या का अर्थ गौण ना होकर मुख्यता क्योंकि वह शारीरिक क्लेश युक्त ध्यान उपासना करते हुए अती्द्रिय विषयों में निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु संघर्ष करने वाली सिद्धा थी। ठीक जिस प्रकार का तप के मुख्य अर्थ से युक्त तपस्या शंभू कर रहा था। परंतु जहां एक ओर शंभू की तपस्या के परिणाम स्वरूप उसे राजा द्वारा मृत्युदंड प्राप्त हुआ। वहीं दूसरी ओर शबरी द्वारा किए गए तप के परिणाम स्वरूप उन्हें भगवत धाम प्राप्त हुआ। इसी क्रम में एक आपत्ति और उठाई जाती है कि क्योंकि शंभूक गलत उद्देश्य से तपस्या कर रहा था इसलिए उसका वध किया गया। अब एक और आ गया भाई गलत उद्देश्य से तपस्या कर रहा था इसलिए जो है उसको उसका वध किया गया तो क्या अगर कोई शूद्र सही उद्देश्य से तपस्या करेगा या वेदोक्त कर्मों को करेगा तो उसको ग्राहय होगा वो हां क्या बचकाने जैसे आर्गुमेंट लेके आए हो आप लोग ये है आप लोगों की तैयारी शंकर परंपरा से करपात्री जी महाराज से भिड़ने के संबंध में यह तैयारी है हां अगर कोई शूद्र शद्र है जो अच्छे उद्देश्य से वेदोक्त कर्म
00:26:58:02 करेगा तो विधि विधि निषेध का उल्लंघन नहीं माना जाएगा विधि युक्त माना जाएगा उसे तो क्या है आंसर तो यहां प्रश्न ये उठता है कि क्या किसी शूद्र द्वारा अच्छे उद्देश्य से तपस्या करने के करने को शास्त्र शास्त्रोचित मान लिया जाएगा उद्देश्य कैसा भी हो मर्यादा के अतिक्रमण पूर्वक किए जाने वाले कार्य को मर्यादा पूर्वक तो नहीं माना जा सकता। ठीक जिस प्रकार एक अभियंता किसी किसी की प्राण रक्षा के निमित्त उसके शरीर की चीर फाड़ करना प्रारंभ कर दे। कोई इंजीनियर है वो दिक्कत नहीं है ऑपरेशन में और उसने भैया मैं तो प्राण रक्षा के लिए कर रहा हूं। चीड़ फाड़ करना प्रारंभ कर दे कि उसका उद्देश्य तो अच्छा था। इसलिए अब उसको कुछ ना कहा जाए उसकी मूर्खता के लिए। हम उसी में तो आ रहे हो। कर्मणा वर्ण व्यवस्था को ला रहे हो ना। कर्मणा के समर्थन कर्ता कर्मणा जगत गुरु आजकल बन गए हैं। ऐसे इंजीनियर ऐसे अभियंता को दंड नहीं दिया जाएगा जो अपनी मूर्खता के कारण जिसको बचाने चल रहा है उसके प्राणों को और उसको और कष्ट में डालने की तैयारी कर रहा है। जिस विषय में गति नहीं है जिस विषय में उसका अधिकार नहीं है उसमें वो पैर
00:28:13:10 डाल रहा है अपना। हम इसलिए शास्त्र कहते हैं क्या कहते हैं? अपने अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार स्वकर्तव्य निष्ठा ही धर्म है। कहां लिखा है? भगवत गीता 18 45 मनुस्मृति 735 अर्थात अपने निर्धारित कर्मों के विरुद्ध कर्म करना ही अधर्म है। अपराध है। ऐसे में अपराधी दंड का पात्र भी होता है। अतः शंभू द्वारा गलत उद्देश्य से की जाने वाली तपस्या के कारण तथा शबरी की तपस्या में अच्छा उद्देश्य होने पर भी शबरी के शूद्रा होते हुए उसका तपस्या में अधिकृत होना सिद्ध नहीं होता। एवं इसी क्रम में आगे श्री राम द्वारा उसके आचरण का विरोध ना करके प्रशंसा तथा शबरी को धर्माचारणी इत्यादि कहा जाना युक्ति युक्त सिद्ध नहीं होता। सरल भाषा में कहे तो शख की तपस्या में निहित गलत उद्देश्य से शबरी के ब्राह्मणी होने का विरोध सिद्ध नहीं होता। इसको कहते हैं अकाट्य। कहा था ना जब भी बोलेंगे तो अकाट्य बोलेंगे। यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि
00:29:15:27 सकाम उद्देश्य के लिए किए जाने वाले तप का फल प्राप्त होना तो सामान्य है। जिस प्रकार अनेक राक्षसों द्वारा तप करने पर उन्हें उनका अभीष्ट फल प्राप्त हुआ भी है। परंतु विधि को जानने वाला होते हुए भी विधि विरुद्ध आचरण करने पर का फल मुक्ति किस प्रकार माना जा सकता है। किस प्रकार मानोगे मुक्ति? नान्या पंथा कहा गया है ना? कैसे मानोगे मुक्ति? वेद भगवान कह रहे हैं। ध्यान रहे वेद भगवान की घोषणा है। नान्या पंथा क्या परम पद अर्थात मोक्ष पाने के लिए वेद के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है। कहां लिखा है? श्रोता शत्रुपनिषद तीन आठ यजुर्वेद 31 18 हम रामपालियों को आंसर देते थे ये वाले। जब वो कहते थे वेद में कहां लिखा है कि वेद से मुक्ति होगी। आज तुम लोगों को देने पड़ रहे हैं। शर्म आनी चाहिए। श्रुति और स्मृति मेरी आज्ञा है। जो इसका पालन नहीं करता वह आज्ञा छेदी मेरा द्रोही है। चाहे वह मेरी भक्ति करे तो भी उसे वैष्णव नहीं मानना चाहिए। विष्णु धर्म पुराण में भी है और एक वाधुली स्मृति में स्मृति है। उसमें भी संभवता है। अतः इस प्रकरण में भी धर्म को जानने वाली शबरी द्वारा शूद्रा होते हुए भी
00:30:31:03 अवधि पूर्वक तप करने पर उसको मुक्ति प्राप्त होना सिद्ध नहीं होता। शास्त्रों से संगति नहीं बैठ रही। शूद्रा होते हुए अधि पूर्वक वो तप अगर कर रही है तो शास्त्रों से संगति कैसे बैठेगी? उसको मोक्ष कैसे मिल रहा है? मुक्ति कैसे मिल रही है? एक ही तो मार्ग है ना वेद वैदिक मार्ग मुक्ति प्राप्त करने का और कोई मार्ग नहीं है उसके बाहर। तो विधि को जानने वाली होते हुए भी विधि का परित्याग करके वह काम कर रही है। फिर भी उसको मुक्ति मिल रही है।
00:31:03:18 खैर उसको मुक्ति प्राप्त होना सिद्ध नहीं होता। इस प्रकार शास्त्रीय वचनों सहित मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ संगति ना होने पर शबरी का ब्राह्मण होना ही सिद्ध होता है। अगर शूद्रा लेकर के जाएंगे तो मुक्ति के साथ संगति नहीं आएगी। राम के साथ संगति नहीं आएगी। धर्माचारणी के साथ संगति नहीं आएगी। कृष्ण मृग चर्म के साथ संगति नहीं आएगी। जटा के साथ संगति नहीं आएगी। विधि को जानने वाली होने के संबंध में संगति नहीं आएगी। आनंद रामायण में भी प्रभु श्री राम ने शबरी को शूद्र होने के कारण दासी मानने का खंडन किया है। हम क्या वहां पर कहा है कि वो कोई दासी नहीं है। वह तो मुनियों की सेवा में रत तापसी है। राज्यकांड पूर्वार्ध सर्ग तीन 44 व श्लोक धातव्य है कि शबरी के गुरु जिन्हें महर्षि भी कहा गया है। गायत्री मंत्र का जप करते थे। चलो ब्रह्म भाव से भगवान को रखा है ना ब्रह्म भाव से कुछ भी कर सकते हैं। मगर यह तो यहां पर वेदोक्त कर्म करने वाले गायत्री मंत्र का जप करने वाले हैं जिसके लिए कठोर वर्णाश्रम धर्म का पालन आवश्यक होता है। तो सभी जानते होंगे ना इतना
00:32:18:26 तुम लोगों को जो अब इस वीडियो को यहां तक झेल गए हैं जो देख पा रहे हैं। इसका मतलब है वो वर्णाश्रमी हैं। है ना? परंपरा निष्ठ तो हैं। अब परंपरा को किस रूप में वो स्वीकार करते हैं वो बात अलग है। मगर परंपरा का जो क्या कहते हैं जो तंत्र है परंपरा का उसका विरोध करने वाले तो नहीं है ना। परंपरा की जो विधि है उसका विरोध करने वाले तो नहीं है ना। तो क्या है? गायत्री मंत्र कौन जपता है? जो वर्णाश्रम धर्म का पालन करता है। शौचाचार का पालन करता है। विधि निषेध का पालन करता है। और शबरी के गुरु कौन थे? जो महर्षि थे। गायत्री मंत्र का जप करते थे। ऐसे मुनिजनों की सेवा पूर्वक शबरी जी आश्रम में निवास करती थी। कौन थी भीलनी अस्पश्य और वो निवास कहां कर रही हैं? गायत्री मंत्र का जाप करने वाले मुनियों के आश्रम में। और तब भी उस आश्रम को विधि निषेध हो रहा है क्योंकि अगर वो शूद्र है तो विधि निषेध हो रहा है। गायत्री मंत्र का जप चल रहा है। उनको भगवत धाम की प्राप्ति भी हो रही है। मुक्ति भी मिल रही है। और अंतत गत्वा शास्त्र रचनाकार के द्वारा ऐसे आश्रम को पवित्र भी कहा जा रहा है। कहां है? 3 74 15 374 22 से 23 तक यहां विचारणीय है कि यदि शबरी
00:33:34:04 अस्पर्श भीलनी होती तो उसका वर्णाश्रम मर्यादा के विरुद्ध आश्रम में निवास होने पर भी गायत्री मंत्र का जाप करने वालों वालों को महर्षि क्यों कहा जाता उस आश्रम को महर्षि वाल्मीकि जी द्वारा पवित्र परम पवित्र क्यों कहा जाता पद्म पुराण के अनुसार शबरी जी ने स्मार्थ धर्म के अनुसार श्री राम जी को कुश का आसन प्रदान किया था पद्म पुराण उत्तर खंड 200 68 उपरोक्त शास्त्र वाक्यों से शबरी का धर्म को जानने वाली होना भी सिद्ध होता है। इसी क्रम में उन्होंने प्रभु श्री राम का भी विधिवत अर्थात शास्त्र सम्मत आतिक ही किया था। विधि युक्त था। भाई ठीक है। ब्रह्म भाव से हम कुछ भी खिला दे रहे हैं। वो ठीक है। उसको विधि युक्त थोड़ी ना कहा जाएगा। विधि युक्त है ना? तो क्या था? विधिवत अर्थात शास्त्र सम्मत आत ही किया था। उसमें क्या विधि में विधि के बाहर जाके हो रहा है ना ब्रह्म भाव से जो भी हो रहा है विधि के बाहर तो है। तो क्या अब झूठा खिलाने को मनुस्मृति में मान्य किया गया है क्या कि आने वाले अतिथि को अपना झूठा खिलाया जाए हम तो शास्त्र सम्मत आत ही किया था। वाल्मीकि रामायण तीन 74 सात
00:34:49:13 और आनंद रामायण 3 108 यहां ध्यातव्य है कि गुरुजनों ने भी शबरी जी को श्री रामचंद्र जी का यथाविधि सत्कार करने का ही आदेश दिया था। 374 15 से 16 देखिए उनके जो गुरुजन थे चलो भक्ति में डूब कौन रही है? शबरी और ब्रह्म भाव से मर्यादा के बाहर कौन आ रहे हैं? मगर जो गुरुजन है जो गायत्री मंत्र का जाप करते हुए जा रहे हैं हम वह जाते-जाते यथाविधि सत्कार करने का आदेश देकर के जा रहे हैं। इसलिए शबरी जी ने उनका सत्कार किया आतिथ्य के रूप में। ध्यातव्य यह भी है कि जहां एक ओर शंभू के तप द्वारा ब्राह्मण के बालक की अकाल मृत्यु हो गई थी। वहीं दूसरी ओर शबरी जी के तप के द्वारा उन्हें भगवत प्राप्ति जैसे मांगलिक फल प्राप्त हो रहे हैं। हां तो क्या है आगे उपरोक्त शास्त्र वाक्यों के आधार पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के समक्ष धर्माचारिणी शबरी जी का तप शास्त्र सम्मत सिद्ध होने के कारण उनका शूद्रा ना होकर ब्राह्मण होना ही सिद्ध होता है। तथा इसी क्रम में शबरी जी द्वारा श्री राम का विधिवत आतिथ्य होने के कारण श्री राम द्वारा शबरी के झूठे बेर खाना भी सिद्ध नहीं होता। अन्यथा निम्नलिखित
00:36:05:13 शास्त्र वाक्यों की हानि होगी। श्री राम कौन-कौन से शास्त्र वाक्य जिनकी हानि होगी? श्री राम अपने धर्म में दृण प्रतिज्ञ पीछे हमने दृण प्रतिज्ञ वाला देखा ना श्री राम अपने धर्म में दण दृण प्रतिज्ञ स्वधर्म का पालन करने वाले सदाचारी अर्थात शास्त्र सम्मत आचरण करने वाले अपने क्षत्रिय धर्म को प्राथमिकता देने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम अर्थात विग्रहवान धर्म नहीं थे। एवं इसी क्रम में उनका चरित्र मनुष्य के लिए अनुकरणीय भी नहीं था। क्या-क्या हो गया? वहां तो अनुकरणीय कहा जा रहा है। यहां अनुकरणीय ना होना सिद्ध हो रहा है। वहां छात्रय धर्म को प्राथमिकता देने वाला कहा जा रहा है। यहां छात्र जो है छात्रय धर्म को पीछे छोड़ने वाला सिद्ध हो रहा है। अगर शूद्र मान लेंगे तो सत्य प्रतिज्ञा की बात भी टूट रही है क्योंकि वह अह अनेकोंनेक प्रकार से मनुस्मृति का पालन करने वाले हैं और भरत जी के शासन में जो है धर्म धर्म संस्थापना के निमित्त कार्य करने वाले तो वो सारी सत्य प्रतिज्ञाएं भी वो वहां पर सत्य प्रतिज्ञा भी सिद्ध नहीं हो रहे और अनेकानेक अन्य प्रकार से चीजें वो हो रही साथ ही साथ शबरी जी धर्माचार्य
00:37:21:08 णी धर्म निपुणा भी सिद्ध नहीं हो रही है। उन्होंने श्री राम का विधिवत आतित्य भी नहीं किया। विधिवत नहीं था। वो विधि युक्त नहीं था। विधि क्या है? धर्म शास्त्र कहते हैं वो विधि है। ऐसे में मीमांसा दर्शन के भाष्यकार मैथिल मनीषी श्री शबराचार्य के सदृश्य ही शबरी शब्द को जाति बोधक ना लेकर संज्ञात्मक रूप में ही ग्रहण करना युक्ति युक्त है। शबराचार्य एक हुए हैं। ब्राह्मण थे और मीमांसा दर्शन के भाष्यकार थे और उनका नाम था शबराचार्य। तो शबरी के नाम से उसको जो है क्योंकि उसमें सब आ गया तो इसलिए उसे शूद्र मानना वो ठीक नहीं है। नहीं तो इतने सारे शास्त्रों शास्त्र वाक्यों की हानि होगी। अब इस प्रकार धर्म को जानने वाली धर्माचारणी होते हुए ब्राह्मण चिन्हों को धारण पूर्वक तपस्या में ब्राह्मण चिन्हों के धारण पूर्वक तपस्या में संलग्न होने पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम द्वारा सब प्रकार से प्रशंसित होने वाली शबरी का ब्राहणी होना ही सिद्ध होता है। अब अगला एक कोई क्लेम है उसको ले लेते हैं। भगवान श्री राम चंद्र ने सर्व समर्थवान है। भगवान श्री रामचंद्र सर्व समर्थवान हैं। जब वह मरे हुए
00:38:36:14 को जीवित कर सकते हैं। पत्थर को तैरा सकते हैं। दुदुभी को शरीर दुदुभी के शरीर को अपने पैर के अंगूठे के प्रहार मात्र से अनेकों योजन दूर फेंक सकते हैं। और इस जैसे अनेक अतिमानवीय असाधारण कार्य कर सकते हैं तो वह ब्रह्म भाव से शबरी के झूठे बेर क्यों नहीं खा सकते? वाल्मीकि रामायण में रामचंद्र जी मर्यादा पुरुषोत्तम कहे गए हैं। हां बिल्कुल धर्माचरण करने वाले कहे गए हैं। तो वहां पर वो जो है अभक्ष भक्ष नहीं करेंगे। मतलब भक्ष भक्षण नहीं किया उन्होंने। शबरी के झूठे भेर खाना क्या है? शबरी के झूठे भेर खाना उन्होंने ब्रह्म भाव में खाया है। भक्ति भाव में खाया है। तो फिर सबसे पहले सर्वप्रथम यह विचारणीय है कि श्री राम द्वारा किए गए अतिमानवीय कार्यों जैसे पाषाण, तारण या दुदुंबी के कंकाल का प्रहार से किसी भी धर्म शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता। क्या वह पुल बना रहे हैं तो उससे धर्म शास्त्र का कोई वाक्य का उल्लंघन हो रहा है? क्या वह दुदुंबी को अनेकों योजन दूर फेंक रहे हैं तो उससे कोई मर्यादा टूट रही है? उसके बाहर जाकर के कर रहे हैं। ऐसा कोई निषेध नहीं है। ठीक है? शास्त्रों में सामर्थ्य प्रदर्शन को वर्जित नहीं किया गया। किंतु अभक्ष भक्षण या उच्छिष्ट झूठा भोजन को स्पष्टता निषिद्ध माना
00:39:51:20 गया है। पीछे प्रमाण दे आए हैं मनुस्मति। सामर्थ्य द्वारा प्राकृतिक नियमों गुरुत्वाकर्षण आदि पर विजय प्राप्त करना मर्यादा उल्लंघन नहीं है। मर्यादा का अर्थ है वेदों और ऋषियों द्वारा स्थापित धार्मिक विधि निषेध इत्यादि मर्यादा के भीतर रहना। झूठे बेर खाना शास्त्रीय मर्यादा का खंडन है। जबकि पराक्रम दिखाना शास्त्रीय धर्म का अंग है। श्री रामचंद्र जी ने एक होता है सिद्ध कोटि का धर्म। एक होता है साध्य कोटि का धर्म। तो जो हमें धर्म शास्त्रों से मर्यादा बताई जाती है वह साध्य कोटि का धर्म होता है। और यह सारी जो अतिमानवीय कार्य करना होता है यह जो कार्य है ये सिद्ध कोटि के धर्म में आते हैं। मतलब जो हमें नेचुरली हमारी सीमाएं हैं कि हम उड़ नहीं सकते। तो अगर मैंने उड़ा तो यह सिद्ध कोटि का इसका शास्त्रों से कोई मतलब नहीं है। शास्त्रों के द्वारा आपको वो बातें बताई गई है जिनमें अती्द्रिय विषयों में हमारी गति नहीं होती है। तो वहां पर हमारे लिए प्रमाण शास्त्र ही होते हैं। मैं कूदूंगा तो चोट लगेगी। इसके लिए शास्त्र की आवश्यकता नहीं है। यह मुझे अपने स्वभाव से ही प्राप्त चीजें हैं। आहार, निद्रा, भय, मैथुन
00:41:07:06 मर्यादा मानवता मुझे शास्त्र से प्राप्त होती है। तो भगवान श्री राम को जब कहा जाता है मर्यादा पुरुषोत्तम है, विग्रहान धर्म है। तो वो शास्त्रीय मर्यादा की वहां पर बात हो रही है। साध्य कोटि के धर्म की बात हो रही है। इसमें उनका चुनाव है कि मनुष्य को चुनना है कि मुझे साध्य कोटि के धर्म को साधना है कि नहीं साधना है। खैर फिर भी श्री रामचंद्र जी ने जो अतिमानवीय कार्य किए हैं इनके निमित्त भी क्या कहा गया है रामायण में? बला और अति बला नाम से श्री रामचंद्र जी ने स्वयं साक्षात ईश्वर होते हुए भी श्री रामचंद्र जी ने साक्षात ईश्वर होते हुए भी इन सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मानवीय प्रक्रिया का आश्रय लिया था। भगवान ने यह कहते हुए अतिमानवीय कार्य नहीं किए कि मैं भगवान हूं इसलिए मैं कर रहा हूं। यह उन्होंने प्रदर्शित नहीं किया राम रूप में। उन्होंने प्रदर्शित किया है कि एक मानव को किस-किस प्रकार से जीवन को जीना चाहिए। कैसे अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करना चाहिए और यदि उसको अतिमानवीय कार्य करने में भी गति प्राप्त करनी है तो वह किस तरह की तपस्या से उसको प्राप्त हो सकती है वो उन्होंने एग्जांपल सेट किया है। कैसे बला और
00:42:24:07 उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं अन्य ऋषियों से बला अतिबला जैसी विद्याएं और दिव्य शास्त्र प्राप्त किए। यह सिद्ध करता है कि उन्होंने यह कार्य ब्रह्म भाव से नहीं बल्कि एक आदर्श शिष्य और तपस्वी के पुरुषार्थ से संपन्न किए। बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध अब यहां वाल्मीकि रामायण के वचन को मैं कोट कर रहा हूं। बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध इस मंत्र समुदाय को ग्रहण करो। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी शम का अनुभव नहीं होगा। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी ज्वार नहीं होगा। तुम्हारे रूप में किसी प्रकार का विकार या उलटफेर नहीं होगा। सोते समय अथवा असावधानी की अवस्था में भी
00:43:08:14 शत्रु तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबल में तुम्हारे सामान्य तुम्हारे समान तुम्हारा सामना करने वाला कोई ना होगा। बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रह जाएगा। कहां पर है? वाल्मीकि रामायण एक 22 13 से 21 इतिहास साक्षी है कि विश्वामित्र जैसे महर्षियों ने अपनी तपस्या के बल पर नूतन सृष्टि की रचना तक कर डाली थी। जब ऋषि गण अपनी साधना से ऐसे चमत्कार कर सकते थे तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम के लिए यह कार्य बिना ब्रह्म भाव के केवल योग और अस्त्र विद्या के बल पर करना पूर्णतः संभव था। अनेक महापुरुषों और योगियों ने भी इतिहास में चमत्कारिक कार्य किए हैं। जिन्हें समाज ने ईश्वर का अवतार नहीं माना। अतः केवल अतिमानवीय कार्यों के आधार पर श्री राम पर ब्रह्म भाव का आरोप लगाते हुए उन्हें मर्यादा की परिधि से बाहर जाने वाला मान लेना तर्कसंगत सिद्ध नहीं होता। स्वयं के द्वारा किए गए समस्त पुरुषार्थ को प्रभु श्री राम ने भी मानव अभी मैंने बताया ना साध्य
00:44:23:25 कोटि का अति मानवीय अब उन्होंने अपने सभी कार्यों को समस्त पुरुषार्थ को मानव साध्य बताया गया है। मनुष्यों के द्वारा साधे जा सकते हैं। तो अनेक अनेक ऐसे मनुष्य हुए हैं जो जिन्होंने अति मानवीय कार्य किए तो वह सब क्या ईश्वर थे? ब्रह्म भाव से किए थे। तो भगवान श्री राम अपने समस्त पुरुषार्थ को स्वयं मानव साध्य ही बता रहे हैं। वाल्मीकि रामायण सात 115 अच्छा जब बात आती है कि ब्रह्म भाव से उन्होंने भैया शबरी के झूठे बेर खा लिए। तो हम बार-बार प्रमाण इस बात का दे रहे हैं कि भगवान श्री राम धर्म के अनुसार चलते हैं। धर्म के अनुसार कार्य करते हैं। अपने छात्र धर्म के अनुसार कार्य करते हैं। इस बात के ढेर सारे प्रमाण दे रहे हैं। क्या इस बात का प्रमाण दिया गया है कि वह ब्रह्म भाव के अनुसार काम करते हैं। भाई जैसे जब आप इसको निषेध कर रहे हो कि नहीं नहीं यहां पर ब्रह्म भाव से वो कर रहे हैं। हम अपने कहे हुए वाक्य के समर्थन में तो दे रहे हैं। हां? और जो अन्य वाक्य हैं, उसमें अनुमान प्रमाण इत्यादि लेकर के और श्री राम को धर्म का रूप मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाने के संबंध में उनके साथ संगति सिद्ध ना होने के कारण जो है
00:45:38:26 उन बातों का खंडन कर रहे हैं जिनके साथ इन वाक्यों की संगति नहीं बैठती। परंतु जब हम कह रहे हैं कि ब्रह्म भाव से उन्होंने झूठे बैर खा लिए। ब्रह्म भाव से उन्होंने ये किया वो किया। तो क्या शास्त्रों ने उन्हें ब्रह्म भाव से कार्य करने वाला कहा है। क्योंकि शास्त्रों से धर्म के अनुसार कार्य करने वाला तो हम सिद्ध कर रहे हैं। ब्रह्म भाव से कार्य करने वाला वो ब्रह्म है इसमें कोई दो राय नहीं है। पूर्ण पुरुषोत्तम है इसमें कोई दो राय नहीं है। परंतु वह लौकिक दृष्टि से कार्य किस प्रकार करते हैं। इस संबंध में हमारे पास प्रमाण है कि वह धर्मानुसार कार्य करते हैं। उसमें भी लिखा है तुम्हारी भुसुंडी रामायण में। उसमें भी लिखा हुआ है भुसुंडी रामायण में। ठीक है? कि वह धर्मानुसार कार्य करते हैं। तो ऐसे जो भी आचरण होंगे जो धर्म की सीमा से बाहर दिखाई दे रहे होंगे। यदि शास्त्र के वाक्यों का मान रखना है जिसको जिस शास्त्र में आपकी श्रद्धा है उसके वाक्यों को मान रखना है तो उसका ऐसा अर्थ लेना पड़ेगा जो वाल्मीकि रामायण के अनुकूल हो। इस पर भी आएंगे हम और या तो फिर उसको अगर वह वाल्मीकि रामायण के विपरीत जा रहा है तो वहां पर उसको दूर से प्रणाम करना पड़ेगा ऐसे शास्त्र को ऐसे शास्त्र वाक्य को या फिर आप दिव्य मान लो दिव्य घटनाएं मान लो
00:46:53:27 लौकिक दृष्टि से कुछ देखा ही नहीं किसी ने ऐसे कृत्यों को और जो पारलौकिक घटनाएं हैं आदि दैविक घटनाएं हैं। ठीक है? खैर बैक टू द पॉइंट। फिर भी यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पारलौकिक दृष्टि से सच्चिदानंद स्वरूप परम ब्रह्म होते हुए भगवान के कुछ भी कर सक करने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। अपितु मनुष्य दृष्टि से राजा दशरथ के पुत्र होते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम द्वारा मर्यादा के उल्लंघन को स्वीकार किए जाने पर आपत्ति है। अरे भाई सीधी सी बात है। अगर वो मर्यादा को लांग रहे है ब्रह्म भाव के आधार पर तो उस पर आपत्ति थोड़ी ना है। आपत्ति यह है कि फिर शास्त्र उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कह रहे हैं? अगर वो अपनी बात से विमुख हो रहे हैं तो फिर उनको सत्य प्रतिज्ञ क्यों कह रहे हैं? नहीं कहना चाहिए। शास्त्रों के इन वचनों की अब मानना कैसे सहन की जाए। अच्छा एक बात और कही गई कि उसको उससे उनको कोई दोष नहीं लगेगा। अरे भैया दोष लगने अथवा ना लगने की बात थोड़ी ना हो रही है। बात यह हो रही है कि वह शास्त्रीय मर्यादाओं के बाहर जाकर के कार्य कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं। उनको दोष लगेगा लग भी जाएगा तो उसका फल उन्हें प्राप्त होगा कि नहीं प्राप्त
00:48:08:28 होगा इससे क्या मतलब? यदि वह धर्म शास्त्रों की मर्यादा के बाहर जाकर के कार्य कर रहे हैं तो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहा जाएगा। अगर वो अपने वचन से विमुख हो रहे हैं तो उन्हें सत्य प्रतिज्ञ नहीं कहा जाएगा शास्त्रों के द्वारा। अगर वो सीता माता को छोड़कर के अन्य अन्य स्त्रियों के साथ रमण कर रहे हैं या अन्य स्त्रियों के साथ संग कर रहे हैं। उनके बारे में वो तो मन से भी नहीं सोचते। तो वो अगर ऐसा करते हुए दिख रहे हैं तो फिर कम से कम उन्हें एक पत्नी व्रत धारण करने वाला तो नहीं कहा जाएगा ना। चाहते क्या हो? घोट के चटनी बना दी जाए सारे शास्त्रों की।
00:48:50:07 अब चलो आ जाते हैं कि भगवान श्री राम ने सदैव धर्म शास्त्रों की मर्यादा में रहकर आगे चलते हैं। प्रभु श्री राम प्रभु श्री राम के रूप में भगवान ने सदैव धर्म शास्त्रों की मर्यादा में रहकर ही व्यवहार करना स्वीकार किया है। निम्नलिखित श्लोकों में उन्होंने स्वयं के लिए कई बारी वे यह पंक्तियां कही है। एक बात आई थी ना कि भगवान ये नहीं कर सकते। भगवान वो नहीं कर सकते। हम देखो भगवान श्री रामचंद्र अपने लिए कह रहे हैं कि मैं यह नहीं कर सकता मूर्ख इसको कहते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम सोनम
00:49:27:08 श्री राम अपने कुलोचित आचार में मग्न रहते थे वे अपने क्षत्रिय धर्म को अधिक महत्व देते थे क्षत्रिय धर्म को अधिक महत्व देते थे प्राथमिकता देते थे ब्रह्म धर्म को नहीं ब्रह्म भाव को नहीं क्षत्रिय धर्म को ठीक है और मानते थे अतः बड़ी प्रसन्नता के साथ उसमें संलग्न रहते थे वाल्मीकि रामायण दो एक 16 निषिद्ध कर्म करने में उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी निषिद्ध कर्म करने में प्रवृत्ति नहीं होती थी इसको कहां ले जाओगे फाड़ दे वाल्मीकि रामायण का यह वाक्य
00:50:07:25 शास्त्र विरुद्ध बातों को सुनने में उनकी रुचि नहीं थी वहां तो वह देख रहे हैं वाल्मीकि रामायण दो एक 17 अब सुनो यह जो कह रहे हो ना कि नहीं कर सकता आराम यह नहीं कर सकते वो नहीं कर सकते सुनो श्री राम ने स्वयं ये कहा है कि यदि मैं वेदोक्त शुभ कर्मों को छोड़ दूं और विधि हीन कर्मों में लग जाऊं तो कर्तव्य अकर्तव्य का ज्ञान रखने वाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर करेगा। वह इस बात का ध्यान दे रहे हैं कि लोग मुझे लौकिक दृष्टि से देखें तो मेरा व्यवहार भी कैसा होगा? परमार्थ के अनुसार नहीं परलोक के अनुसार नहीं इसी लोक के अनुसार होगा। वो वो देख रहे हैं कि मुझे किस दृष्टि से देख रहे हैं लोग। वह चाहते हैं कि उन्हें जो है मनुष्य की दृष्टि से देखा जाए और उसके अनुसार वह बरत रहे हैं तो वो इस बात की चिंता कर रहे हैं कि कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर करेगा। उस दशा में तो मैं इस जगत में दुराचारी या लोक को कलंकित करने वाला समझा जाऊंगा। वाल्मीकि रामायण इसी क्रम में जाबाली के नास्तिक मत का खंडन करते हुए उन्होंने इस पूरे सर्ग में प्रतिज्ञा का पालन रूपी मर्यादा के
00:51:23:01 प्रति स्वयं की बाध्यता का ही वर्णन किया है। बाध्य दिखाया है। मैं यह नहीं कर सकता, मैं वो नहीं कर सकता। वाल्मीकि रामायण तीन 110 18 से 39 ध्यान रहे वन में रहकर पवित्र फल खाने की भी उनकी प्रतिज्ञा थी। कहां लिखा है? वाल्मीकि रामायण तीन 110 26 से 27 देख लेना पवित्र फल खाना है पवित्र और काग भसुंडी रामायण के अनुसार भी श्री रामचंद्र ने कहा है भरत को कि मैं धर्मानुसार व्यवहार करूंगा धर्मानुसार व्यतीत करूंगा वनवास में कहा है कैसे कैसे कैसे झुठलाओगे इस वचन को हम तो बाली के समक्ष भी उन्होंने क्षत्रियचित धर्म का ही आलंबन लेकर बाली द्वारा लगाए जाने वाले आक्षेपों का खंडन किया था। सुनो क्या-क्या कहा था। मैं उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूं। अतः मेरे पापों को क्षमा मैं तुम्हारे पापों को क्षमा नहीं कर सकता। वाल्मीकि रामायण 4 18 22 कैसे देख रहे हैं वो? अपने आप को सामने वाले को क्या बता रहे हैं अपने बारे में? मैं कौन हूं? मैं उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हूं। और भगवान छलिया नहीं है।
00:52:38:02 बातों को बदलने वाले नहीं है। सत्य प्रतिज्ञ हैं। यह ध्यान रखना। श्री रामचंद्र स्वधर्म के पालक एवं रक्षक है। वाल्मीकि रामायण एक 14 श्री राम ने पिता की आज्ञा का पालन करने के रूप में वनवास रूपी कर्म को पूर्ण करने की प्रतिज्ञा ली थी। वाल्मीकि रामायण दो 105 43 ध्यान रहे पिता की आज्ञा का पालन भी धर्म है। वाल्मीकि रामायण दो 21 30 से 43 तुमको मुझको सीता को लक्ष्मण को और माता सुमित्रा को भी पिताजी की आज्ञा में ही रहना चाहिए। यही सनातन धर्म है। है ना? धर्म क्या है? पिता की आज्ञा का पालन। और सत्य प्रतिज्ञ होने के नाते अपनी बात से ना मुकरना धर्म है फिर यह इसीलिए ऐसे ही थोड़ी ना कहते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि यह विवेचना मैंने की कई स्मार्थ परंपरा के कई मान्य आचार्यों ने मेरे गुरु भाइयों ने मुझे जो है इसमें सहायता की तब जाकर के अनेक विषयों में विषयों को लेकर के ग्रंथों का निचोड़ लेकर के आपके समक्ष में प्रस्तुत हुआ
00:53:53:06 हूं। भरत जी ने विविध तर्कों के माध्यम से श्री राम के अयोध्या प्रत्यावर्तन को उचित सिद्ध करने का अनवर प्रयास किया। किंतु अपने दिवंगत पितृ देव की आज्ञा का पालन करने तथा सत्यनिष्ठ बने रहने की अपनी अटल प्रतिज्ञा के कारण श्री राम ने अयोध्या लौटने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। असमर्थता मैं ये नहीं कर सकता, मैं वो नहीं कर सकता। यह राम कह रहे हैं मूर्खों और उनके बारे में वही बातें हम बता रहे हैं तो तुम आपत्ति प्रकट कर रहे हो।
00:54:28:26 श्री राम कह रहे हैं ले सकता। मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूं। सुन सकता लक्ष्मण का परित्याग भी कर सकता हूं। सुन सकता किंतु अपनी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ सकता। सुन ले। यह आ गया। अब काट हंसी उड़ाओ भगवान श्री राम की मूर्ख अपने लेख में लिख रहा है भगवान ये नहीं कर सकते भगवान वो नहीं कर सकते भगवान वाद्य कर रहे हैं भगवान ने लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के रूप में मनुष्य होते हुए भी सभी मर्यादाओं के पार जाकर दिखाया तो प्रभु श्री राम के रूप में भगवान होते हुए भी सभी मर्यादाओं के अंदर रहना दिखाया समझे बने बने धर्माचार्य बने फिरते हैं। ना राम को समझे ना कृष्ण को। श्री राम जी के द्वारा श्री राम जी के द्वारा सीता माता के लिए युद्ध लड़ने का कारण भी लौकिक मर्यादा ही था। अब सुनो लौकिक मर्यादा है। लौकिक ब्रह्मभाव नहीं है कहीं भी उनके आचरण में। सुन लो। जो उन्होंने वह पुरुषार्थ किया था ना अति मानवीय जिसके कारण आप यह सिद्ध करना चाहते
00:55:44:00 हैं कि भगवान कुछ भी कर सकते हैं। भगवान श्री भगवान होते हुए भी श्री राम जी ने किस तरह से मर्यादा पालन किया है और करना सिखाया है। यह वाल्मीकि रामायण में बताया गया है। तो श्री राम जी ने युद्ध क्यों लड़ा था? यह मैं क्यों बता रहा हूं कि उन्होंने युद्ध क्यों लड़ा? धर्म की बाध्यता के कारण लगा लड़ा लौकिक जो लोकाचार है उसके लिए लड़ा इसलिए क्योंकि यहां पर हम यह बताने का प्रयास कर रहे हैं। यहां पर हम यह बता रहे हैं कि श्री राम जी उन्हें किस दृष्टि से देखने के देखने का समर्थन करते हैं। क्या श्री राम जी उन्हें ब्रह्म भाव से देखने का समर्थन करते हैं। जो हमें मान ले उन्होंने ब्रह्म भाव से कुछ किया। वह बार-बार अपनी क्षत्रियचित मर्यादा बता रहे हैं। सत्य प्रतिज्ञ होना बता रहे हैं। अपने पिता की आज्ञा का पालन बता रहे हैं। बार-बार वो स्वयं को मनुष्य दृष्टि से देखे जाने का ही समर्थन कर रहे हैं। हम और हम लगे उन्हें ब्रह्म भाव के आधार पर झूठे बेर खिलाने। जब तुम आश्रम में अकेली थी तो क्या कारण थे? श्री राम जी ने क्या लौकिक कारण बताए हैं? जब तुम आश्रम में अकेली थी, उस समय वह चंचल चित्त वाला राक्षस तुम्हें हर ले गया।
00:56:59:13 यह दोष मेरे ऊपर दैववश प्राप्त हुआ था। जिसे मैं मानव साध्य पुरुषार्थ द्वारा मार्जन कर दिया। किस पुरुषार्थ के द्वारा? मानव साध्य। मैंने कहा ना कि यह जो अतिमानवीय कृत्य दिखाई दे रहे हैं वह उन्होंने मानव साध्य कहा है और उदाहरण है मानवों के द्वारा इस प्रकार के अतिमानवीय कृत्यों को करना ऐसी सिद्धियों को प्राप्त करना मानव साध्य है ये वाल्मीकि रामायण 615 से 615 और पांच तुम्हें मालूम होना चाहिए मैंने जो यह युद्ध का परिश्रम उठाया है यह सब तुम्हें पाने के यह नहीं किया है। वाल्मीकि रामायण छ 115 का 15वा श्लोक सदाचार की रक्षा सब ओर फैले हुए अपवाद का निवारण तथा अपने सुविचार वंश पर लगे हुए कलंक का परिमार्जन करने के लिए ही यह सब मैंने किया है। वाल्मीकि रामायण छ 115 का 16वा श्लोक किस दृष्टि से देखने को देखने का समर्थन कर रहे हैं प्रभु श्री राम मनुष्य दृष्टि से उन्हें देखने का समर्थन कर रहे हैं। सीता माता को अग्नि परीक्षा से पूर्व स्वीकार ना करने का कारण
00:58:14:14 भी लौकिक बाध्यता अर्थात मर्यादा ही थी। क्या कहा उन्होंने? कौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घर में रही हुई स्त्री को ग्रहण कर सकता है। ऐसी दशा में अपने कुल को महान बताता हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूं? सकता राम यह नहीं कर सकते वो नहीं कर सकते यह देखो श्री राम अपने लिए सख सकता कह रहे हैं कैसे कर सकता हूं उड़ाओ इनका मजाक यह जो युद्ध है यह युद्ध झूठे भेर खाने और ना खाने के बीच में नहीं है यह युद्ध शिवश नारायण द्विवेदी और भागवतानंद के बीच में नहीं है। यह युद्ध मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उन्हें अमर्यादावान सिद्ध करने का प्रयास करने वालों के बीच में है। यह युद्ध धर्म और अधर्म के बीच में है। राम की मर्यादा और भागवतानंद जैसों की अमर्यादा के बीच में है।
00:59:24:14 राजा यद्यपि सीता माता अयोने जाती। अब देखो यहां पे ब्रह्म भाव कहां गया? यद्यपि सीता माता अयोने जाती दिव्य थी। उनकी पवित्रता किसी भी प्रकार से भंग नहीं हो सकती थी। परंतु फिर भी श्री रामचंद्र जी ने समर्थ के कारण सीता माता में अपवित्रता होने की संभावना को अस्वीकार कर दिया। क्यों भाई? सीता माता भी तो ब्रह्म का ही स्वरूप है। भगवत स्वरूपा हैं। हर उनके प्रति दोष दृष्टि क्यों रख रहे हैं श्री राम? क्योंकि वह अपनी लीला को मानवीय दृष्टि से देख रहे हैं और उसी दृष्टि का समर्थन भी कर रहे हैं। राजा जनक की अब सुनो वाल्मीकि रामायण का रामायण का वचन राजा जनक की यज्ञ भूमि से आविर्भूत होने के कारण ही मुझे जानकी कहकर पुकारा जाता है। वास्तव में मेरी उत्पत्ति जनक से नहीं हुई है। मैं भूतल से प्रकट हुई हूं। वहां पर जो है तपस्या के प्रभाव से भुसुंडी रामायण में इस तथ्य को बदल दिया गया है। वहां पर माता जानकी जो है वह गर्भ से ही उत्पन्न हो रही हैं। मगर भूतल से प्रकट हुई हूं। साधारण मानव जाति से विलक्षण हूं। यहां वो
01:00:39:15 ये कहने का प्रयास कर रही है। मैं दिव्य हूं। वो याद दिला रही हैं अपने सामर्थ्य को जो कह रहे हैं ना कि समर्थ के समर्थ के कारण जो है उनमें दोष नहीं देखा जाता है। है ना? वैसे तो यहां पर यह बात हो ही नहीं रही है कि उनको दोष लगेगा कि नहीं लगेगा। बात तो ये हो रही है कि उन्होंने मर्यादा के बाहर जाकर आचरण किया कि नहीं किया। श्री राम जी ने मैं फिर याद दिला दूं। पर फिर भी यदि आप यह कह रहे हैं कि भगवान अपनी लीला को ब्रह्म भाव से देखने का भी समर्थन कर रहे हैं जगह-जगह पे कि लोग ये देख ले अरे वह तो भगवान है कुछ भी कर सकते हैं तो माता सीता में क्यों दोष देख रहे हैं? वह भी माता है। फिर वह उनमें कैसे दोष आ सकता है? किसी भी मनुष्यगत गतिविधि के कारण नहीं आ सकता। मगर प्रभु श्री राम उनमें दोष देख रहे हैं। उनमें समर्थ के कारण दिव्य होने के कारण ब्रह्म स्वरूपा होने के कारण उनमें दोष ना देख देखने की बात का समर्थन नहीं कर रहे। दोष होने की संभावना को अस्वीकार नहीं कर रहे। जैसे तुमने ब्रह्म भाव के आधार पर श्री रामचंद्र जी में दोष होने की बात होने की संभावना को अस्वीकार कर दिया। वैसे देखो क्या कह रहे हैं। क्या कह रही हैं। आपने मेरी इन विशेषताओं का
01:01:54:28 आपने मेरी इन विशेषताओं को अधिक महत्व नहीं दिया। इन सबको आपने सामने नहीं रखा। जब श्री राम जी ने उनको स्वीकार करने पर आपत्ति जताई तो माता सीता अपनी दिव्यता प्रकट कर रही है कि भाई मैं तो अपवित्र हो ही नहीं सकती हूं तो तुम कैसे मुझ मुझ पर यह आरोप लगा सकते हो कि मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ होगा जिसके कारण मुझे तुम ग्रहण नहीं कर रहे हो मैं तो अपवित्र हो ही नहीं सकती मैं तो दिव्य हूं मगर प्रभु श्री राम उनमें दोष क्यों देख रहे हैं क्योंकि वह खुद अपने लीला को लौकिक दृष्टि से देख रहे हैं और देखना सिखा रहे हैं जिससे कि हम उनसे सीख पाए क्या सीख पाए मर मर्यादा धर्म हम तो ये कहां लिखा है माता सीता का ये जो वचन है कहां पर है वाल्मीकि रामायण छ 116 15वा श्लोक मेरा चरित्र शुद्ध है जो कह रहे हो ना दोष देख रहे हैं कि नहीं देख रहे वो भी देख लो मेरा चरित्र शुद्ध है फिर भी रघुनाथ मुझे दूषित समझ रहे हैं। अरे भाई जब ब्रह्म भाव से दोष लगता ही नहीं है तो रामचंद्र जी दोष क्यों देख रहे हैं? ब्रह्म स्वरूपा में शक्तिभुता में राम से बड़े हो गए हो तुम लोग।
01:03:05:25 वाल्मीकि रामायण छे 116वां श्लोक। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि प्रभु श्री राम परम ब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर हैं तो माता सीता भी उनकी ही स्वरूप भूता है। जब विधि के उल्लंघन का दोष समर्थ होने के कारण श्री राम को नहीं लगेगा तो ऐसे में स्वयं श्री राम द्वारा ही जगत जननी माता सीता को दोष दृष्टि से देखने की बात क्यों की गई है? और यदि प्रभु श्री राम अपनी लीला को, अपने कर्मों को, अपने कर्तों को दोष दृष्टि से देखने की भावना व्यक्त कर रहे हैं तो क्या हम और आप उनसे बड़े हो गए हैं? श्री रामचंद्र से भी आगे जाकर के उनकी चीजों को देखेंगे। हां मर्यादा पुरुषोत्तम है। क्षत्रिय कुल में उत्पन्न है। सत्य प्रतिज्ञ हैं। अपने पिता की आज्ञा का पालन करने वाले हैं। भरत के शासन में रहकर धर्म संस्थापना करने वाले हैं। मनु को फॉलो करने वाले हैं। मनु मनु का अनुसरण करने वाले हैं। हम और फिर तुम कह दो ब्रह्म भाव से कुछ भी बताता हूं अभी तुम्हारे ब्रह्म भाव को।
01:04:15:15 खैर इस प्रकार यहां भी यही सिद्ध होता है कि साक्षात सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर होते हुए भी श्री रामचंद्र जी लोक शिक्षणार्थ स्वयं को और अपनी स्वरूप भूता जगत जननी को भी लौकिक दृष्टि से मनुष्य दृष्टि से ही देखते हुए ही उनके व्यवहार की समीक्षा करने का समर्थन कर रहे हैं। है ना? इसी कारण श्री रामचंद्र जी ने सदैव मानव साध्य मर्यादा अर्थात श्रोत स्मार्थ धर्म का ही पालन किया। इसी क्रम में आगे लोक व्यवहार की बाध्यता को ही श्री राम द्वारा सीता त्याग का कारण बताया गया। भाई ब्रह्म भाव से तो सीता का त्याग क्यों कर रहे हैं? क्यों इस इन मर्यादाओं के नीचे स्वयं को खड़ा प्राप्त कर रहे हैं। कि मेरे बारे में कोई ऐसा ना कह दे उसकी कुल की हानि हो जाएगी। लौकिक अपकीर्ति हो जाएगी। ये सब बातें क्यों कर रहे हैं प्रभु श्री राम? ब्रह्म भाव से वो तो कुछ भी करने में सक्षम है। क्योंकि उनको मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का चरित्र निभाना है। श्री राम का आदर्श प्रस्तुत करना है।
01:05:29:25 क्या है? श्री राम बोल रहे हैं नगर और जनपद के लोग मेरी सीता के बारे में भरत के लक्ष्मण के तथा शत्रुघ्न और माता कैकई के विषय में क्या-क्या बातें करते हैं क्योंकि राजा यदि आचार से विहीन हो तो वह अपने राज्य में तथा वन में भी निंदा के निंदा का विषय बन जाते हैं। सर्वत्र उन्हीं की बुराइयों की चर्चा होती है। वाल्मीकि रामायण 7 43 पांच से छ मेरे बारे में नगरवासी जो जो भी शुभ अथवा अशुभ बातें करते हैं वह मुझे बताओ नगर में लोग मेरे विषय में जो भी शुभ मानते हैं मैं उनका आचरण करूंगा और अशुभ बातें सुनकर जिन्हें वह अशुभ समझते हैं उन्हें उन तथ्यों को त्याग दूंगा वाल्मीकि रामायण किस आधार पर कि उनको मनुष्य दृष्टि से देखे जाने पर क्या सुनिश्चित हो रहा है उसके आधार पर आचरण करने की बात कर रहे हैं ह
01:06:30:04 उन तथ्यों को त्याग दूंगा और यह कब है जब वो वनवास से वापस आ चुके तब की बात है ये तो जबकि शबरी के यदि झूठे बैर खा लिए थे ब्रह्म भाव से और वो जो है मनुष्यगत मनुष्य दृष्टि से देखी गई घटना थी तो फिर तो उनका ब्रह्म भाव प्रसिद्ध होना हो जाना चाहिए था फिर तो किसी को उन्हें मनुष्य दृष्टि से देखना ही नहीं चाहिए था उस तराजू में तौलना ही नहीं चाहिए था और अगर कोई तौल भी रहा है तो उसका समर्थन श्री राम को नहीं करना चाहिए था। उसके कारण अपनी भार्या को वनवास नहीं भेजना चाहिए था। कहां तक जाओगे? तुम डाल डाल हम पातपात। हां तो क्या हुआ? त्याग दूंगा। कहां लिखा वाल्मीकि रामायण 7:43 9 से 10 जिस किसी भी प्राणी की अपकीर्ति लोक में सबकी चर्चा का विषय बन जाती है वह अधम लोकों में गिर जाता है और जब तक उस अपयश की चर्चा होती है तब तक वही पड़ा रहता है। वाल्मीकि रामायण सात 45 10 से 12 बताइए लोग उन्हें मनुष्य दृष्टि से देखकर क्या सुनिश्चित कर रहे हैं? इसके आधार पर वह अपनी कृत्यों को प्रभावित कर रहे हैं। यह प्रमाण हमें प्राप्त है। शबरी के झूठे भेर और शबरी
01:07:45:06 के झूठ शबरी के झूठे भेर ना खाने के विषय में और शबरी के ब्राह्मणी होने के विषय में राम ही प्रमाण है। अच्छा सुपनखा एवं सहस्त्रों कन्याओं सहित अनेक अनेक अन्य अनेक सुंदर व योग्य स्त्रियों द्वारा भी प्रभु श्री राम को विवाह का प्रस्ताव प्राप्त होता रहा। परंतु उन्होंने पत्नी व्रत धर्म से स्वयं को मरदित बताते हुए सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। वाल्मीकि रामायण के अनुसार भसुंडी रामायण अभी बाकी है। देखिएगा वह इस विषय में वह क्या कहती है। हम
01:08:31:25 अगस्त ऋषि के आश्रम में भी श्री राम ने मर्यादा की रक्षा हेतु अगस्त ऋषि द्वारा दी गई भेंट को अपने क्षत्रिय धन पर विचार करके अस्वीकार कर दिया था। जब उनके यहां पर वह गए थे तो वह जो देना चाह रहे थे उनको धनुष इत्यादि वह उन्होंने अस्वीकार कर दिया था क्योंकि एक क्षत्रिय का ब्राह्मण से दान लेना उन्हें स्वीकार नहीं था। तब बाद में जब श्री रामचंद्र को अगस्त जी ने उनके उनमें जो है इंद्र का अंश होते हुए और यज्ञ में इंद्र को आहुति दिए जाने के विषय में धर्म याद दिलाया अनुष्ठान याद दिलाया राजा में इंद्र का अंश होते हुए और इंद्र का यज्ञ का अमुक अमुक आहुतियों का भोक्ता होते हुए उस रूप में ब्राह्मण द्वारा इंद्र को दिए जाने वाले रूप में एक क्षत्रिय राजा होने वाले रूप में राम श्री राम जी के द्वारा अगस्त जी से भेंट लेना स्वीकार हो पाया। इतने मरदित थे। नहीं तो भगवान तो भाग के भूखे हैं। ब्रह्म भाव से ले लेते। क्या करना है? मतलब वो हर जगह पर धर्म बता रहे हैं कि मैं यह कर सकता हूं, यह नहीं कर सकता हूं। मैं यह ले सकता हूं, नहीं ले सकता हूं। मगर एक बस वही सबरी के यहां पर जाकर के उन्होंने झूठे भेर खा लिए।
01:09:47:27 हां। अच्छा। श्री राम ने यह कहां लिखा है यह अगस्त मुनि वाला वाल्मीकि रामायण 76 35 से 36 बाद में है ना युद्ध कांड के बाद शबरी वाले पूरे प्रकरण के बाद वो तो वो तो विधि निषेध का उल्लंघन करके ब्रह्म भाव से कुछ भी ग्रहण कर लेते हैं तो फिर बाद में जाकर करके अगस्त मुनि जी से लेने से मना क्यों कर रहे हैं? वह वह श्रद्धा युक्त नहीं है।
01:10:31:13 निषाद निषाद राज भी भगवान के ही भक्त थे। वहां भी यह संशय हो सकता है। निषाद राज के विषय में संशय होता है कि भाई निषाद राज जो है वह उसका स्पर्श निषिद्ध है। ऐसा होते हुए श्री रामचंद्र जी ने उसका आलंघन क्यों किया? वाल्मीकि रामायण 3 74 17 और अमरकोष के अनुसार अमरकोष 2 10 20 के अनुसार तो क्या है सर्वप्रथम यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रतिलोमज निषाद चांडाल होने के कारण अस्पर्श माना गया ना कि शूद्र सधर्मा अनुलोमज इसमें ये जो संशय दूर करते चले चल रहे हैं तो एक प्रवाह से तो ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न अनुलोमज होता है मतलब जो अह प्रतिलोमज निषाद है, वह अस्पर्श है। उसको चांडाल कहा गया है। मगर जो अनुलोमज निषाद है, वह अस्पर्श नहीं है। तो, यहां वही हम सिद्ध कर रहे हैं। तो, ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न अनुलोमज जिसका नामांतर पार्श्व भी है, पार्श्व भी है, वह नौका जीवी होता है। मनुस्मृति 108 10 आठ और 10 35 वाल्मीकि रामायण के अनुसार भी वह नौका जीवी ही थे। अतः रामायण के निषाद
01:11:46:24 अनुलोमज होने से स्पर्श हैं। प्रतिलोमज अस्पर्श नहीं थे। तथापि श्री रामचंद्र जी ने निषाद राज से कोई भी खाद्य पदार्थ इत्यादि के रूप में कोई सामग्री स्वीकार नहीं की थी बल्कि जल भी लक्ष्मण जी के द्वारा लाया गया ही ग्रहण किया था। यह देखो इसको कहते हैं मर्यादा। 250 43 250 48 पढ़ लेना इसको। इस प्रकार यह तथ्य होता है क्योंकि निषाद अनुलोमज होने के कारण अस्पष्ट तो नहीं थे परंतु खाद्य पदार्थ के व्यवहार का निषाद के विषय में भी निषेध था। इसलिए उन्होंने निषाद का आलिंगन तो किया परंतु लक्ष्मण जी के द्वारा लाया हुआ जल ग्रहण करके शास्त्रोक्ति विधि निषेध का भली-भांति पालन किया। इस प्रकार अनेक उदाहरण है रामायण में जहां प्रभु श्री राम ने भगवान होते हुए भी स्वयं को शास्त्र की मर्यादा में ही सीमित रखा है। यदि भगवान राम ब्रह्म भाव के आधार पर व्यवहार करने वाले होते तो वह इन अनेक प्रकरणों में ब्रह्म भाव से कार्य क्यों ना करते? अब लो और कुछ प्रकरण ले लो। यह हो के शबरी जी के प्रति ही एकमात्र भेदभाव करते
01:13:01:25 हुए सबको एक किनारे करते हुए सीता को नहीं देखा। अपने भरत को नहीं देखा। मगर केवल एक शबरी जी को ही उन्होंने जो है मर्यादा के बाहर जाकर के उनके झूठे बेर खा लिए। है ना? देखो क्या अपने पिता महाराज दशरथ और माता कौशल्या का विलाप उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था। रो रहे थे रथ के पीछे भाग रहे हैं। श्री राम जी के वनगमन के विषय में अपनी दुख पूर्ण भावनाएं व्यक्त करते करते-करते राजा के नेत्रों से आंसू भर गए। भर आए। उनकी इंद्रियां शिथिल हो गई और वह एक ही बार में हे राम कहकर मूर्छित हो गए। आगे कुछ ना बोल सके। वाल्मीकि रामायण 2 398 यदि तुम मुझे शोक में डूबी हुई छोड़कर वन को चले जाओगे तो मैं उपवास करके प्राण त्याग दूंगी। वाल्मीकि रामायण 221 27 जब श्री राम जी रथ में बैठकर वनवास हेतु चल दिए। तब उन्होंने पीछे घूम कर देखा तो उन्हें विषाद ग्रस्त तथा भ्रांतित पिता राजा दशरथ और दुख में डूबी हुई माता कौशल्या दोनों ही मार्ग पर अपने पीछे आते हुए दिखाई दिए। परंतु जैसे रस्सी में बंधा हुआ घोड़े का बच्चा अपनी मां को देख तो पाता है पर कुछ कर नहीं पाता।
01:14:17:03 उसी प्रकार धर्म के बंधन में बंधे हुए श्री रामचंद्र जी भी अपनी माता की ओर स्पष्ट रूप से ना देख सके। धर्म के बंधन में बंधे हुए ये है राम। किस राम को जानते हो तुम? जो धर्म को तोड़ देते हो। बार-बार धर्म की सीमाओं का उल्लंघन करते हो। ये है राम खूंटे से बंधे हुए। कौन सा खूंटा? धर्म का खूंटा। पीछे मां दौड़ रही है। पिता दौड़ रहे हैं। मगर घोड़े के बच्चे के समान जैसे वह रस्सी में बंधा हुआ होता है। यह धर्म से बंधे हुए थे। और प्रतिज्ञा पे अडिक रहने के कारण उतर नहीं गए। माता-पिता के प्रति सबरी का भाव नहीं आ पाया इनके। हम क्या अपने सौदर भरत का सर पटक-पटक कर रोना उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था? देखिए क्या कह रहे हैं भरत। मैं आपके चरणों में माथा टेक कर याचना करता हूं। आप मुझ पर दया कीजिए। जैसे महादेव जी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं। जब लेने गए थे। जब राजा भरत प्रभु श्री राम को लेने गए हैं। पिता का समाचार देने गए कि पिता ने देह त्याग कर दिया है। आप चलिए पिता ने गलती कर दी थी। आपके आपके संबंध में इस इस
01:15:32:07 तरह का निर्णय लेकर के आप चलिए। राज्य को भोगिए। हां उस समय का दृश्य है। तब राजा भरत गिड़गिड़ा रहे हैं। अपना सर उनके चरणों में रखकर मैं आपके चरणों में माथा टेक कर याचना करता हूं। आप मुझ पर दया कीजिए। जैसे महादेव जी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं। उसी प्रकार आप भी अपने बंधु बांधवों पर कृपा कीजिए। इस प्रकार ग्लानी में पड़े हुए भरत ने मनोभिराम राजा श्री राम को उनके चरणों में माथा टेक कर प्रसन्न करने की चेष्टा की। तथापि उन रघुनाथ जी ने अपने पिता की आज्ञा में दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहना ही रहकर अयोध्या जाने का विचार नहीं किया। शर्म कर लो पापियों ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को तुम कह रहे हो कि वह जो है ब्रह्म भाव से जो है खाने लगे झूठा। वाल्मीकि रामायण तीन 10 वाल्मीकि रामायण तीन और 106 31 से 33 अब सुनो माता सीता श्री रामचंद्र जी के वाग बाणों से पीड़ित होकर ये कौन सा दृश्य है जब माता सीता को स्वीकार करने पर आपत्ति प्रकट कर दी थी श्री राम जी ने युद्ध के बाद हं
01:16:47:22 तो वहां पर श्री राम माता सीता जो है विलाप कर रही हैं। श्री रामचंद्र जी के वाक बाणों से पीड़ित होकर जनक किशोरी अपने ही अंगों में विलीन सी होने लगी। उनके नेत्रों से आंसुओं का विरल प्रभाव जारी हो गया। नेत्रों के जल से भीगे हुए अपने मुख को आंचल से पोंछती हुई वह धीरे-धीरे गदगद वाणी में पतिदेव से बोली आप मुझे जैसी समझती हैं, समझते हैं, मैं वैसी नहीं हूं। मुझ पर विश्वास कीजिए। मैं अपने सदाचार की शपथ खाकर कहती हूं। मैं संदेह के योग्य नहीं हूं। यह बातें पर्याप्त नहीं थी उनके लिए। ब्रह्म भाव से कार्य करने के लिए। परंतु अकारण ही शबरी जी के द्वारा झूठे भेर प्रस्तुत कर देना। वहां पर जो है कारण मिल गया उनको। है ना? ऐसे ही है ना तुम्हारे राम हम यह हैं हमारे राम। एवं इसी प्रकार क्या सहस्त्रों समर्पित कन्याओं सहित निषाद राज जैसे परम भक्त का समर्पण क्या उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था? जो कहीं वह एक पत्नी रूपी धर्म से बंधे रहे तो दूसरी ओर कहीं भी विधि निषेध इत्यादि धर्म का त्याग भी नहीं किया। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दृष्टि से देखे जा सकने वाले उनके व्यवहार का आधार शास्त्रीय मर्यादा अर्थात धर्म था। धर्म की रस्सी
01:18:03:03 में बंधा हुआ घोड़े के बच्चे के समान श्री राम को वाल्मीकि कह रहे हैं और तुम मनु महाराज की आज्ञा का उल्लंघन करने वाला बता रहे हो। उनको ब्रह्म भाव के आधार पर दोष नहीं लगेगा। अरे यहां दोष लगने की बात हो रही है क्या कि उनको दोष लगेगा कि नहीं लगेगा? दंड मिलेगा कि नहीं मिलेगा? यहां बात हो रही है। उन्होंने विधि के बाहर जाकर के आचरण किया कि नहीं किया? यदि किया तो वह कैसे सत्य प्रतिज्ञ यदि किया तो कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम? और यदि कर रहे हैं तो यहां क्यों नहीं कर रहे हैं? यहां क्यों धर्म की डोरी में बंधे हुए हैं?
01:18:45:06 निम्नलिखित शास्त्रीय वचनों द्वारा यह तथ्य निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाता है कि श्री रामचंद्र जी ब्रह्म होते हुए भी स्वयं के व्यवहार की समीक्षा के विषय में मनुष्य दृष्टि रखने का ही समर्थन करते थे। मनुष्य के रूप में देखो मुझे मैं अतिमानी भी कार्य करूंगा तपस्या करके जिससे तुम तपस्या करना सीखोगे। विषम से विषम परिस्थिति में भी अपनी प्रतिज्ञा पर अक रहना रहूंगा मैं जिससे तुम सच बोलना सीखोगे। एक पत्नी व्रत धारण पूर्वक रहूंगा मैं जिससे तुम व्यभचार से स्वयं को बचाना सीखोगे। मैं हूं राम। वो है राम।
01:19:34:12 मैं तो अपने अच्छा अब निम्नलिखित शास्त्रीय वचनों से और हमारी यह जो बात है कि वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से देख रहे हैं। स्वयं के व्यवहार को और देखने का ही समर्थन भी कर रहे हैं। अब इसकी और पुष्टि ले लो। तो निम्नलिखित शास्त्रीय वचनों द्वारा यह तथ्य निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाता है कि श्री रामचंद्र जी ब्रह्म होते हुए भी स्वयं के व्यवहार की समीक्षा के विषय में मनुष्य दृष्टि रखने का ही समर्थन करते थे। अब लो बंपर ऑफर ले लो। क्या कह रहे हैं प्रभु श्री राम? मैं तो अपने को मनुष्य दशरथ पुत्र राम ही समझता हूं। ब्रह्म नहीं। यह श्री राम कह रहे हैं झूठे हैं ना वो क्या समझ रहे हैं वह अपने आप को व्यवहार की दृष्टि से
01:20:24:16 मैं तो अपने को मनुष्य दशरथ पुत्र राम ही समझता हूं मैं जो हूं और जहां से आया हूं वह सब आप ही मुझे बताएं युद्ध कांड में अंत में कह रहे हैं स्वयं को किस दृष्टि से देख रहे हैं मनुष्य दृष्टि से ब्रह्म दृष्टि से नहीं देखना कहां स्वीकार कर रहे हैं। वो छ 117 11वा श्लोक हां शबरी जी से मिलते समय भी प्रभु श्री राम लोक संग्रह की दृष्टि से ही व्यवहार व्यवहार ही कर रहे थे। अन्यथा यदि ब्रह्म भाव से कर रहे होते तो सर्वज्ञ होते हुए भी शबरी जी से वह सीता माता के विषय में जिज्ञासा क्यों करते? इसलिए शबरी जी ने स्वयं श्री राम के उस समय के व्यवहार को लोकाचार कहा था कि प्रभु आप लोकाचार के कारण मुझसे पूछ रहे हैं। अद्भुत रामायण में यह वचन है। यद्यपि प्रभु श्री राम का दर्शन सत्कार इत्यादि के द्वारा शबरी जी की मुक्ति का विधान था। परंतु शबरी के आश्रम में प्रभु श्री रामचंद्र भगवान के रूप में नहीं अपितु अतिथि के रूप में ही पहुंचे थे। जिनका यथावत सत्कार करने की आज्ञा यथावत का मतलब शास्त्र सम्मत सत्कार करने की आज्ञा भी शबरी जी के गुरु ने ही उन्हें दी थी।
01:21:40:14 वाल्मीकि रामायण 374 15 से 16 स्वयं प्रभु श्री राम ने अपनी जीवन लीला को लोक यात्रा ही घोषित किया है। वाल्मीकि रामायण तीन 110 27 लोक यात्रा कह रहे हैं अपनी यात्रा को। दिव्य यात्रा नहीं कह रहे हैं। भूषुंडी में उनकी चीजों को दिव्य कहा गया है। श्री राम अपने को किस रूप में देखने का देखना सिखा रहे हैं। अपने व्यवहार की समीक्षा किस आधार पर करना सिखा रहे हैं। यह मैटर नहीं करता आप लोगों के लिए। इसलिए रामायण अर्थात श्री राम चरित्र के अनुसार वर्ताव करने वालों को शास्त्रों का मर्मज्ञ और कल्याण को प्राप्त करने वाला बताया गया है। स्कंद पुराण उत्तर खंड रामायण महात्म एक 22 से 23 श्री राम की तरह आचरण करना चाहिए। ब्रह धर्म उत्तर पुराण 269 श्री राम के मनुष्य अवतार का मुख्य प्रयोजन मनुष्यों को शिक्षा देना है। श्रीमद् भागवत पांच अ 19 5 श्री राम का व्यवहार केवल लोक शिक्षा के लिए है। किस लिए है? केवल लोक शिक्षा के लिए।
01:22:55:22 5 19 7 अब क्योंकि समस्त शास्त्रों व समस्त आचार्यों द्वारा निर्विवाद रूप से यह तो स्वीकार किया ही गया है कि श्री रामचंद्र जी सत्य प्रतिज्ञ थे। एवं स्वयं श्री रामचंद्र जी ने भी कभी भी वचन से ना मुकरने की अथवा असत्य भाषण ना करने की प्रतिज्ञा ली हुई है। इतना तो मानोगे। ऐसे में यदि व्यवहार अर्थात मनुष्य दृष्टि से भी वह ब्रह्म भाव का आलंबन लेकर सबरी के झूठे झूठे भेर ग्रहण करेंगे तो व्यवहार में भी उनका स्वयं को ब्रह्म भाव से जानने वाला होना सिद्ध होगा। ब्रह्म भाव से यदि वह झूठे बेर खा ग्रहण कर रहे हैं तो इसका मतलब वो जानते हैं कि वह कौन है। व्यवहार की व्यवहारिक सत्य की बात कर रहा हूं। है ना? वो जानते हैं तो यहां पर उनकी उनका वचन भंग हो गया ना क्योंकि उन्होंने तो ब्रह्मा जी से कहा है मैं तो अपने आप को मनुष्य मानता हूं हां तो काहे के सत्य प्रतिज्ञ भैया फिर काहे के मर्यादा पुरुषोत्तम
01:24:03:13 हद हो गई है केवल अपने वर्चस्व के लिए केवल सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए किसी एक मंतव्य की पूर्ति के श्री राम पर भी उंगली उठा दो। मैं नहीं होने दूंगा। हां। इस प्रकार वह सत्य प्रतिज्ञ सिद्ध नहीं होंगे। एवं उनको सत्य प्रतिज्ञ और मर्यादा पुरुषोत्तम बताने वाले महर्षि वाल्मीकि जी भी सनातन शास्त्र प्रदान करने वाले अह नहीं कहलाएंगे। अंतत गत्वा इस प्रकार शास्त्र के सिद्धांतों एवं श्री रामचंद्र जी की मर्यादा के प्रतिकूलता के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम द्वारा ब्रह्म भाव से मनुष्य दृष्टि में शबरी के झूठे बेर खाना सिद्ध नहीं होता। तो
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→ Used in: A · Video श्रीराम ने ब्राह्मण शबरी माता से अपने पैर क्यों धुलवाए? भागवतानंद प्रलाप भंजन :... at 0:02 ↗
01:24:54:24 हमने दो चैप्टर पढ़ लिए। पहला चैप्टर जिसमें हमने शबरी को ब्राह्मणी सिद्ध किया। है ना। किस कारण? कि वह धर्माचारणी कही गई हैं। श्री राम जी उनकी तपस्या को को प्रोत्साहित कर रहे हैं। जटा धारण कर रही हैं। मृग चर्म धारण कर रही हैं। धर्म को जानने वाली हैं। और तब वो जो है तपस्या इत्यादि कर रही हैं। तो तब हमने पहले चैप्टर में सिद्ध किया ब्राह्मणी हैं। उनका जो शबरी नाम है वो जैसे शबराचार्य थे मीमांसा दर्शन के भाष्यकार उनके ही सदृश्य उनका नाम शबरी है। और दूसरे चैप्टर में हमने यह सिद्ध किया कि प्रभु श्री राम ब्रह्म भाव से कार्य नहीं करते थे। मनुष्य जो देख सकते हैं, उस देख सकने वाले दृश्यों में वह ब्रह्म भाव से कोई कार्य नहीं करते थे। वह मनुष्य दृष्टि से ही कार्य करते थे। ठीक है? और हमने यह भी देख लिया, यह भी सिद्ध कर लिया कि वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से ही देखने का समर्थन भी करते हैं। अब उन्होंने
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01:25:56:26 जो घटनाएं मनुष्य दृष्टि से नहीं देखी जा सकती हैं। दिव्य घटनाएं देवताओं के यहां पर इस लोक की है ही नहीं। भूलोक की है ही नहीं। उन घटनाओं उन घटनाओं में अगर कोई यह कहे कि उन्होंने यह किया वो किया वो किया तो बात अलग है। परंतु मनुष्य दृष्टि से देखे जा सकने वाली घटनाओं में सबसे पहले उनका चरित्र जो है वो है सत्य प्रतिज्ञ धर्म मर्यादा पुरुषोत्तम। यह सब कहां ले जाओगे? एक पत्नी व्रत धारण करने वाले। रामोद भाषेते। खैर आगे चलते हैं। अब भगवान श्री कृष्ण की बात आ जाती।
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01:26:36:12 तो हमने दो चैप्टर पढ़ लिए। पहला चैप्टर जिसमें हमने शबरी को ब्राह्मणी शब्द सिद्ध किया। है ना? किस कारण? कि वह धर्माचारणी कही गई हैं। श्री राम जी उनकी तपस्या को को प्रोत्साहित कर रहे हैं। जटा धारण कर रही हैं। मृग चर्म धारण कर रही हैं। धर्म को जानने वाली हैं। और तब वो जो है तपस्या इत्यादि कर रही हैं। तो तब हमने पहले चैप्टर में सिद्ध किया ब्राह्मणी हैं। उनका जो शबरी नाम है वो जैसे शबराचार्य थे मीमांसा दर्शन के भाष्यकार उनके ही सदृश्य उनका नाम शबरी है। और दूसरे चैप्टर में हमने यह सिद्ध किया कि प्रभु श्री राम ब्रह्म भाव से कार्य नहीं करते थे। मनुष्य जो देख सकते हैं, उस देख सकने वाले दृश्यों में वह ब्रह्म भाव से कोई कार्य नहीं करते थे। वह मनुष्य दृष्टि से ही कार्य करते थे। ठीक है? और हमने यह भी देख लिया, यह भी सिद्ध कर लिया कि वह स्वयं को मनुष्य दृष्टि से ही देखने का समर्थन भी करते हैं। अब
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01:27:37:27 उन्होंने जो घटनाएं मनुष्य दृष्टि से नहीं देखी जा सकती हैं। दिव्य घटनाएं देवताओं के यहां पर इस लोक की है ही नहीं। भूलोक की है ही नहीं। उन घटनाओं उन घटनाओं में अगर कोई यह कहे कि उन्होंने यह किया वो किया वो किया तो बात अलग है। परंतु मनुष्य दृष्टि से देखे जा सकने वाली घटनाओं में सबसे पहले उनका चरित्र जो है वो है सत्य प्रतिज्ञ धर्म मर्यादा पुरुषोत्तम यह सब कहां ले जाओगे? एक पत्नी व्रत धारण करने वाले रामोदभ भाषेते खैर आगे चलते हैं। अब भगवान श्री कृष्ण की बात आ जाती है। तो जब श्री कृष्ण सहित ईश्वर के अनेक रूपों द्वारा मनुष्य दृष्टि से ही अनेक अलौकिक घटनाओं का विवरण प्राप्त होता है। ऐसे में जब भगवान
01:28:30:26 द्वारा मनुष्य दृष्टि से ही पूरी की पूरी सेना को निगलने पर भी उन्हें दोष दृष्टि से नहीं देखा जाता तो श्री राम रूप को इस प्रकरण में दोष दृष्टि से क्यों देखा जाएगा? यह एक पूर्व पक्ष को रखा है। तो सुनिए सबसे पहले ध्यातव्य है कि विषय यह नहीं है कि श्री रामचंद्र जी शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करने पर श्री रामचंद्र जी को शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करने पर दोष लगेगा या नहीं लगेगा। विषय यह है कि वह शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करते हैं कि नहीं करते हैं। दोष लगेगा कि नहीं लगेगा यह बात नहीं है। करते हैं कि नहीं करते तो कहां से प्राप्त हो रहा है कि वह जो है करने वाले हैं। ब्रह्म भाव के ही आधार पर कार्य करने वाले यही बता दो। वह तो स्वयं के लिए कह रहे हैं भैया मैं तो मनुष्य हूं। मैं तो अपने आप को मनुष्य जानता हूं। अभी तक जो सारे कार्य करा आए हैं मनुष्य दृष्टि से ही होना सिद्ध होता है। फिर वो क्या जब शबरी के झूठे बैर खा रहे थे तो उनको पता नहीं था वो ब्रह्म है। और वहां झूठ बोल रहे थे ब्रह्मा जी से कि वो जानते हैं कि वो अपने आप को ब्रह्म नहीं जानते हैं। वो झूठ बोल रहे थे। असत्य भाषण करने वाले भी थे। शबरी का झूठा बेर खिलाना सिद्ध करने के लिए या कर्पात्री जी का विरोध करने के लिए यद्यपि कर्पात्री जी के अलावा भी कई अन्य आचार्यों ने इस बात का समर्थन
01:29:46:04 किया है कि शबरी जी ब्राह्मणी थी और झूठे बेर वाली घटना जो है वो लौकिक दृष्टि से मनुष्य दृष्टि से वो सिद्ध नहीं होती। करपात्री जी अकेले नहीं है। परंतु सिंगल पॉइंट करपात्री जी को का खंडन सिद्ध करने के लिए जो है कितना गिर सकते हो? कितना गिर सकते हो? श्री राम को असत्य भाषण करने वाला भी सिद्ध कर दोगे और तुम्हारी भुसुंडी रामायण के अनुसार तो जो है श्री रामचंद्र जी एक पत्नी व्रत धारण करने वाले भी सिद्ध नहीं होंगे। अभी देखना बंपर प्राइ है तुम्हारे लिए भसुंड रामायण का। तो ध्यातव्य है कि विषय यह नहीं है कि श्री रामचंद्र जी शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करने पर उन पर दोष लगेगा या नहीं। विषय यह है कि वह शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करते हैं या नहीं करते। अपने वचन से विमुख हो सकते हैं या नहीं हो सकते। अपनी ली हुई प्रतिज्ञा के विपरीत कार्य कर सकते हैं या नहीं। तो श्री रामचंद्र जी के अनुसार वे ऐसा नहीं कर सकते। वो बात और है कुछ धूर्तों के अनुसार वह ऐसा कर सकते हैं। श्री रामचंद्र जी के अनुसार वो अपने वचन से विमुख नहीं हो सकते। मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकते। हां उनके धूर्त और पाखंडी स्वयं को कहने वाले तथाकथित उनके भक्त और कर्मणा जगतगुरु के द्वारा
01:31:01:10 जो है के अनुसार श्री राम जी की बात का भी अतिक्रमण करते हुए उनके अनुसार श्री राम जी सत्य असत्य भाषण करते हैं। अपनी मर्यादा का उल्लंघन करने वाले इत्यादि हैं। खैर वाल्मीकि जी के अनुसार वह ऐसा नहीं कर सकते। श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाना ही उनके द्वारा मर्यादा का उल्लंघन ना होने की पुष्टि करता है। यदि तब भी कोई उनके द्वारा मर्यादा के उल्लंघन को सिद्ध करने का कुप्रयास करता है तो यह ठीक इस प्रकार से है जैसे हनुमान जी को वाल्मीकि रामायण में अविवाहित बताया गया परंतु तब भी ब्रह्म भाव के नाम पर उनके विवाह का वर्णन कर दिया जाए अथवा श्री राम को एक पत्नी व्रत धारण करने वाला बताया जाए तथापि उनके द्वारा अनेक स्त्रियों के संग विवाह की बात कही जाए। बात करें यदि भगवान श्री कृष्ण और राम के बीच के अंतर की दृष्टि से अंतर की तो तत्व से अभेद होते हुए भी भगवान श्री कृष्ण के जन्म का मुख्य प्रयोजन सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर से मनुष्य मात्र को परिचित करवाना था। तो वहीं श्री राम के अवतार का मुख्य प्रयोजन सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करने के निमित्त बताई गई विधि को धारण पूर्वक धर्म से मनुष्य मात्र का
01:32:16:24 परिचय करवाना था। धारण करते हुए धारण अपनी स्वयं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए उनका प्रयोजन था। अनेक अनेक विचारधाराएं हैं ईश्वर के विषय में संसार में कहीं भी किसी भी विचारधारा में उनके ही द्वारा बताई गई नियमावली को पूरी तरीके से एज इट इज फॉलो करने वाला कोई भी आदर्श किसी के पास भी नहीं है। इसलिए पूरी दुनिया लगी हुई है। श्री रामचंद्र जी के कृत्यों में कहीं पर किसी जगह पर कुछ एक अंकुश तो निकाल दे जो उन्होंने शास्त्रों की सीमा के बाहर जाकर के कार्य कर दिया। पूरी दुनिया लगी हुई है। यह भागवत आनंद पहला नहीं है। उसको सपोर्ट करने वाले लोग पहले नहीं है। बुलके जैन इत्यादि पता नहीं कितने लोग लगे हुए हैं। पूरी दुनिया यही तुली हुई है कि श्री राम जी से भी मर्यादा का उल्लंघन होना हम लोग सिद्ध कर दे। किसी प्रकार जिससे कि इनका आदर्श छिन जाए इनसे। इनके यहां पर कोई भी मूर्तिमान स्वरूप ना रह जाए। धर्म का विग्रह ना रह जाए। अपने ही हाथों से अपने ही घर में आग लगाने वाले हो तुम लोग। जो इन जैसे कर्मणा
01:33:32:14 जगत गुरुओं का साथ देते हो। कर्मणा ब्राह्मण नहीं होगा। कर्मणा वर्णाश्रम नहीं होगा कर्मणा आचार्यत्व होगा संसार में धर्म को धारण करने वाला आदर्श स्थापित करना ही प्रभु श्री राम रूप में भगवान के अवतार का मुख्य प्रयोजन था। इसलिए जहां एक ओर भगवान श्री कृष्ण को लीला पुरुषोत्तम कहा जाता है तो वहीं दूसरी ओर प्रभु श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम। जहां एक ओर एक राक्षस के बंधन से मुक्त होने पर अग्नि परीक्षा के बाद भी मर्यादा पुरुषोत्तम अपनी प्राणप्रिय पत्नी सीता को उनकी पवित्रता जानते हुए भी लोक संग्रह के उद्देश्य से त्यागने की बात कहते हैं तो वहीं भगवान श्री कृष्ण 16108 कन्याओं को राक्षस की कैद से छुड़ाकर स्वीकार कर लेते हैं। ध्यान रहे यह वही 16108 कन्याएं हैं जिनको भगवान श्री राम ने राम रूप में एक पत्नी व्रत व सत्य प्रतिज्ञा रूपी धर्म के कारण अस्वीकार कर दिया था। जहां एक और भगवान को मानव देह में देखकर उनके ब्रह्म भाव को ना जानने वाले को भगवान श्री
01:34:47:22 कृष्ण मूर्ख कह रहे हैं। भगवत गीता 91 तो वहीं दूसरी ओर स्वयं ब्रह्म होते हुए भी वह स्वयं को साधारण मनुष्य के रूप में जानने वाला ही बता रहे हैं। वाल्मीकि रामायण 6 117 111 ये अंतर है। भगवान श्री कृष्ण जो अन्य लोग हैं वह उनको ब्रह्म के रूप में नहीं देख रहे हैं। तो उनको वह मूर्ख कह रहे हैं। और प्रभु श्री राम अन्यों की तो बात छोड़ो स्वयं स्वयं को मनुष्य रूप से ही देख रहे हैं।
01:35:19:25 अतः भगवान श्री कृष्ण अथवा ईश्वर के अन्य वह रूप जिन्होंने मानवीय मर्यादाओं की सीमा के परे रहकर मानव समाज को अह शिक्षा प्रदान की है। धर्म संस्थापना की है। उनके आधार पर श्री राम को भी मर्यादा का उल्लंघन पूर्वक कार्य करने की करने वाला होने की बात कहना युक्ति युक्त सिद्ध नहीं होता। तथापि केवल और केवल आक्षेप करने वाले वाले की संतुष्टि के लिए हम यहां बता देना आवश्यक समझते हैं कि ब्रह्म भाव का आलंबन लेकर दोष ना लगने की संभावना व्यक्त करते हुए प्रभु श्री राम द्वारा मर्यादा के उल्लंघन को स्वीकार करने की बात करने वाले आप पहले व्यक्ति नहीं है। ठीक है? ब्रह्म भाव के आधार पर उन पर दोष नहीं लगेगा। इस तरह की बातें जो है कहने वाले तुम पहले नहीं हो भागवतानंद वाल्मीकि रामायण में ही लोगों ने ऐसी बातें कही है। सुनो कहां कही है? तो कहां कही है? वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांड के 107वें सर्ग में महाराज भरत द्वारा पिता की आज्ञा एवं श्री राम की प्रतिज्ञा के उल्लंघन पूर्वक श्री राम को अयोध्या लौट चलने हेतु प्रेरित किया गया है। एवं जिसके समर्थ में वह
01:36:34:26 श्री राम को नाना प्रकार की युक्तियां देकर यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि ऐसा करने पर उन्हें कोई दोष नहीं लगेगा। तुमने कही थी ना बात उनको दोष क्यों लगेगा? समर्थ को दोष नहीं लगता। यह तुम पहले नहीं हो। राजा भरत ने भी कहा था कि तुमको कोई दोष नहीं लगेगा। वशिष्ठ जी ने भी कहा था कि तुमको कोई दोष नहीं लगेगा। मगर प्रभु श्री राम सत्य प्रतिज्ञ मर्यादा पुरुषोत्तम थे। नहीं मेरे पिता की आज्ञा मिथ्या नहीं होगी। धर्म का उल्लंघन होगा। तो क्या कहा? ऐसा करने पर तुम्हें कोई दोष नहीं लगे। वशिष्ठ जी द्वारा तो स्पष्ट रूप से कहा गया कि अमुक- अमुक कारणों से तुम्हारा अयोध्या वापस लौटना धर्म का उल्लंघन नहीं होगा। लौट चलो राम वाल्मीकि रामायण दो 111 से
01:37:30:12 111 का पांच पांच पांचव से सातवां श्लोक परंतु श्री राम कहते हैं कि मेरे जन्मदाता मेरे पिता दशरथ ने मुझे जो आज्ञा दी है वह मिथ्या नहीं होगी। अरे कैसे राम है यह और कैसे राम तुम दे रहे हो संसार को? शर्म कर लो। लज्जा आती है ऐसे लोग बैठकर के राम कथा करते हैं बोर्ड लगा के। बताइए राम कथा कहेंगे। ये कर्मणा जगतगुरु।
01:38:05:08 चलो आगे चलते हैं। [संगीत]
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शबरी शंका समाधान : भाग १ माता शबरी ब्राह्मण या शूद्र? क्या प्रभु श्रीराम ने जूठे बेर खाए थे?
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