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00:00:00:14 आप जो वीडियो अभी देखने जा रहे हैं इन वीडियोस में आहान के द्वारा आयोजित की जाने वाली जो ऑनलाइन मीटिंग्स हैं उसमें आने वाले लर्नर्स के भाव भी व्यक्त किए गए हैं। तो इन वीडियोस को स्वाविवेक के द्वारा ही देखें। कही जाने वाली किसी भी बात को आह्वान के द्वारा निर्गत बात समझकर ही ना देखें। यह देखें कि उस मीटिंग में वह बात किसके द्वारा कही जा रही है। क्या मेरे द्वारा कही जा रही है या फिर वहां मीटिंग से जुड़ने वाले किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा कही जा रही है जो अभी केवल लर्नर है जो अभी-अभी जुड़ा है या फिर जिसे अभी सार्वभौम सिद्धांतों में जिसकी बहुत ज्यादा गति नहीं है। तो इन वीडियोस को आप प्रेरणा के लिए अवश्य देखें। परंतु कही जाने वाली सभी बातों को प्रमाण्य बुद्धि से ना देखें। उसमें देखें कि कौन सी बात आवाहान के द्वारा कही जा रही है और कौन सी बात वहां पर जुड़ने वाले किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा कही जा रही है। इन वीडियोस में सामान्य चर्चाएं हैं जिनको बिना किसी फिल्ट्रेशन के आप तक पहुंचाया जा रहा है जिससे कि उन्हें देखकर के जन सामान्य प्रेरित हो और उन अभियानों से जुड़े जिनसे जुड़कर के सामान्य जन आत्म कल्याण व धर्म उत्थान में दोनों में अपनी भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। जय श्री राम।

00:01:26:00 ठीक है। तो ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है कि पक्ष से कौन-कौन है? जी मैम हम भी है इसी पक्ष से अवनीश जी आप भी हैं। अच्छा मैं भी उसी पक्ष अच्छा और विश्वजीत जी किरण जी सुजीत जी करण दास जी और

00:01:59:15 नयन पक्ष नयन जी ये खंडन करेंगे ना इसका ठीक है भैया मैं तो समर्थन करूंगा आप खंडन वाले पक्ष पक्ष से नहीं है। मैं विश्वजीत नहीं मैं समर्थन के पक्ष हूं। अच्छा आप समर्थन करेंगे ना तो समर्थन वाले हो गए अवनीश जी, विश्वजीत जी, सरस्वती जी, स्वर्णिम जी है ना और नयन जी भी हैं। नयन जी किधर से हैं? जी मैं खंडन के रूप से हूं। अच्छा विश्वजीत जी विश्वजीत जी नहीं किरण जी नयन जी करण दास जी और सुजीत जी सुजीत और संभवत आवश्यकता पड़ी तो मैं तो हम लोग खंडन करेंगे नहीं मैं सर्वशक्तिमान के तरफ हूं किरण जी आप हां सर्वशक्तिमान है इसके तरफ हूं मैं तो एक बार सब लोग वो सर्वशक्तिमान सब कुछ कर सकता है इस पक्ष में जो लोग हैं वह अपने हाथ ऊपर हाथ हैंड रेज कर दें। उससे मैं एक बार में

00:03:14:16 ही देख लूं। अवनीश जी हो गए, विश्वजीत जी हो गए, सरस्वती जी हो गई और अ स्वर्णिम जी, किरण जी पांच तो यहीं पे दिख रहे हैं। तो सुजीत जी, नयन जी और करण दास जी केवल तीन लोग हैं सर्वशक्तिमान के वो सर्व खंडन करने के लिए किरण जी आपको उधर होना चाहिए था

00:03:52:12 खंडन वाले हम अभी हो जाइए आप किरण जी भी खंडन करेंगे हाथ नीचे कर लीजिए आप हम ठीक है। अब ठीक लग रही है। बैलेंस दिख रही है थोड़ा। ठीक है। सब लोग हाथ नीचे कर लीजिए। अवनीश जी आप भी हाथ नीचे कर लीजिए। तो हमारा क्लेम यह है। क्लेम सबसे पहले क्लेम अ जो समर्थन टीम है वह रख दे। आप में से कौन कौन है जो क्लेम रखना चाहता है? ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। किस पक्ष में?

00:04:50:21 समर्थन वालों में से कोई ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है। इसके संबंध में अपना जो दावा है वह प्रस्तुत करें। अरे चारों में से कोई भी यहां सभी को जय श्री राम। जी जी जय श्री राम। सभी को जय श्री राम। हमारा पक्ष यह है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर जो है वो स्वयं ब्रह्मांड बनाते भी हैं और बनते भी हैं। अवतरित भी होते हैं। वो सारे कार्य सिद्ध कर सकते हैं। ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वो सिद्ध ना कर सके।

00:05:38:02 इसका खंडन कीजिए। ठीक है। तो खंडन वाले पक्ष से किरण जी आप बोले जी तो एक बात मतलब एक बात बताइए कि ईश्वर एक ऐसा दंड बना सकता है जो एक ही टाइम पे लंबा भी हो रहा हो और छोटा भी हो रहा हो एक ही समय पे बताइए

00:06:13:08 हां हां बिल्कुल बना सकते हैं। समझाइए इस विषय को कैसे? हां कैसे बना सकते हैं? लेकिन आप मुझे एक बात बताइए क्यों बनाए इसको? अरे वो तो सर्वशक्तिमान है ना तो क्या यहां पर प्रश्न भी ना पूछूं क्या? नहीं नहीं एक एक बात पहले तो भगवान ईश्वर सर्वशक्तिमान है। सर्वशक्तिमान है क्योंकि यह दुनिया में जो कुछ हो रहा है चाहे बुरा अच्छा दोनों कॉम्बिनेशन ये ईश्वर ही के वजह से हो रहा है। तो ईश्वर का प्रेजेंस उसी से पता चलता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। जैसे कि कि दुनिया में आप अपने आप को ज़ूम आउट करके देखेंगे। ठीक है? जो किया धरा कर्म फल सबको इतना बराबर इतना सूक्ष्म तरीके से सब कुछ भगवान ही कर रहे हैं। हम तो ये तो कर ही रहे हैं ना भगवान रियल लाइफ में अपने आप को अब सिर्फ हम हमारी कमी है कि हम देख नहीं पाते हैं। लेकिन दुनिया में जो कुछ हो रहा है वो किसी मानव के हाथ से हो ही नहीं

00:07:28:14 सकता है। हम इतने कैपेबल नहीं है कि हम एक दूसरे के आप तो यहां पर ईश्वर को सिद्ध कर रहे हो कि ईश्वर नामक कोई सत्ता है उसके अस्तित्व को सिद्ध कर रहे हो। मैंने यह नहीं पूछा। मैंने पूछा है कि ईश्वर एक ऐसा दंड बना सकते हैं जो एक ही टाइम पर लंबा भी हो और छोटा भी हो रहा हो। अगर कर सकते हैं तो कैसे कर सकते हैं? यह बताइए। आप अब मैंने पहले इसको बोला तो आप मुझे उसका काउंटर दीजिए। मैंने बोला कि सर्वशक्तिमान है क्योंकि जो इस दुनिया में पूरे ब्रह्मांड में जो जो किया धरा है उनको सब कुछ ठीक- ठीक ना 1% ऊपर ना 1% नीचे सब कुछ सबको मिल रहा है। चाहे वो दुख हो सुख हो। हम दुख सुख अपने जीव की दृष्टि के वजह से कहते हैं ना तो कि भगवान की दृष्टि से तो अगर उसको देखा जाए तो कर तो रहे हैं तभी तो सर्वशक्तिमान है क्या आप कर सकते हैं क्या अपने आप अपने ठीक है ठीक है मैं मानता हूं कि मैं आपके ही बात को कह रहा हूं कि ठीक है चलो ईश्वर सब कुछ कर सकता है आप जब क्लेम कर रहे हो तो मैंने भी एक उदाहरण रखा कि यह कार्य ईश्वर कर सकता है तो आप मुझे समझाइए ना वो हां तो कर हर एक प्रश्न का उत्तर हर एक प्रश्न का उत्तर यही दे दीजिए

00:08:43:20 कि इस बार ही सब कुछ कर रहे हैं इसलिए इस बार ही सब कुछ कर सकता है फिर हर एक प्रश्न का उत्तर यही दे दीजिए डंडा छोटा बड़ा तो वो जी आप ही जो मॉडरेटर है वही अब निश्चय करे कि ये कोई उत्तर हुआ या नहीं मॉडरेटर है अवनीत जी आप बताएंगे मैं इसमें समस्या को सुलझा दू थोड़ा मैं सुलझा अभी तो उत्तर ही नहीं हुआ है। मैं मैं इस बात को सुलझा देता हूं। उत्तर तो दीजिएगा। मैं इस बात को सुलझा देता हूं। दोनों पक्षों में किस बात को लेकर के वो अटक रहा है मामला? प्रश्न ये किया गया कि अ यदि ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या वह एक ही समय में एक वह डंडा है जिसको वह लंबा भी कर सकता है और छोटा भी कर सकता है। यह प्रश्न किया गया। तो उसमें जब सरस जी ने कहा कि वह सब कुछ कर रहा है। सब कुछ करने वाला वही तो है। तो सब कुछ करने वाला वही तो है। मैं उन्होंने यह कहा कि जो भी कुछ घटित हो रहा है वह ईश्वर की कारण ही हो रहा है। इससे सिद्ध होता है कि वो सब कुछ कर सकता है। पर जब हम यह कहते हैं जैसे कि

00:09:58:24 जैसे सरस जी ने एक बात और कही कि उसको आवश्यकता क्या है करने की? तो आवश्यकता वाली बात तो वहां चली जाएगी जो आर्य समाजी कहते हैं अवतार लेने की आवश्यकता शिवा जी सो सॉरी टू करती हूं ऑफ करण जी आप बिल्कुल बहुत आसान है करण जी बिल्कुल कर सकते हैं डंडा छोटा बड़ा जो आप बोलोगे वो सब कुछ कर सकते हैं अरे बहन जी आप थोड़ा शांत होकर बात कीजिए हम झगड़ने नहीं आए आप अरे वो उनका नहीं वो झगड़ नहीं रही है उनकी जो आवाज है वो ऐसी ऐसी आवाज है तो शायद आपको लग रहा होगा कि वो झगड़ने के गुस्से कर रही है वो केवल अपना पक्ष ही रख रही है और बड़े ही शांत के शांति के साथ रख रही है। तो अ बात यह है यहां पर कि जब हम कहते हैं मैं इसका उत्तर दूं मैं पक्ष को स्पष्ट कर दूं कि समझ में आ जाए। वो उत्तर तो अभी मैं नहीं दे रहा हूं। बात बाकी रहेगा। हम तो इसमें बात ये है कि जैसे कई बार आर्य समाज ये क्लेम करता है कि जो सब जगह है वो जो सर्वव्यापक है वो एक देशीय कैसे हो सकता है? यानी जो सर्व निराकार रूप में यदि

00:11:15:01 निराकार रूप में यदि ईश्वर सर्वव्यापक है तो एक देश कैसे हो सकता है? तो हमें वहां पर उसको समझाना होता है कि भगवान का जो अवतार होता है वह किस प्रकार से एक देश दिखाई देता मात्र है। वस्तुत वो सब निराकार नहीं रहते। सर्वव्यापक होते हुए भी वो किसी एक देश काल परिस्थिति में स्वयं को एक निश्चित आकार स्वरूप में कुछ आंखों का विषय बना देते हैं। है ना? जैसे ईश्वर मान लीजिए जब बोलेगा ईश्वर जब बोलेगा तो क्योंकि वह सर्वव्यापक है तो सब जगह आवाज आएगी आएगी ना तो फिर कोई सुन पाएगा क्या ईश्वर को नहीं सुन पाएगा क्योंकि वो आवाज समझ में ही नहीं आएगी हां तो तो ईश्वर किनी अपने जो अपना जो सर्वव्यापक स्वरूप है उसको कंट्रोल कर सकता है कि उसको कहां पर किसकी इंद्रियों का विषय बनाना है। कहां पर नहीं बनाना है। कई यह बात तो आर्य समाज जी भी मानते हैं कि कई आकाशवाण फलाने ने सुनी और फलाने ने नहीं सुनी। ऐसा कैसे हो गया? भाई जब ईश्वर सर्वव्यापक था तो सब लोग सुनते। तो उन्होंने अपने आप को कंट्रोल किया

00:12:30:02 और कुछ कुछ मनुष्यों की या कुछ प्राणियों की इंद्रियों का विषय तो बनाया मगर सब मगर बाकियों का नहीं बनाया। तो इस तरीके से सर्व्यापक होते हुए भी उसको कुछ लोगों ने सुना। ऐसे ही कुछ ऋषियों के हृदय में अंतःकरण में या जहां पर भी वह मानते हैं वहां पर उन्होंने वेद का ज्ञान प्रकाशित किया तो यह भी नहीं हो सकता क्योंकि वह तो सर्वव्यापक है। तो उसने अपने आप को कंट्रोल किया। उसने कहीं-कहीं पर इंद्रियों का विषय बना दिया। मतलब अभी वो इंद्रियों का विषय नहीं है। सर्व्यापक होते हुए भी फिर कहीं-कहीं पर वो अपनी इच्छा अनुसार आंखों का या कानों का या हृदय का या सोच का मस्तिष्क का मन का विषय बना देता है। तो इस तरह से सर्व्यापक होते हुए भी उसका एक देश रूप वाला जो अवतार है वह सिद्ध होता है। तो एक तो यह तरीका रहा बताने का कि हां वह अवतार लेता है तो अवतार लेता है। हमारा यह क्लेम था हां वह अवतार ले सकता है। तो हमने उसे समझाया तो अभी सरसद जी क्या हो रहा है कि आप यह तो कह रही हैं कि हां वो कर सकता है। मगर वो थोड़ा सा एक्सप्लेन नहीं हो पा रहा है कि कैसे कर सकता है। उसके पक्ष में उदाहरण तर्क नहीं आ रहे हैं। अब उदाहरण और

00:13:45:06 तर्क जो आपने दिए हैं कि वह सब कुछ करता है। तो संसार में जो कुछ भी हो रहा है वो कुछ वो करता है तो हां वो सब कुछ करता है तो वो ये सब करने वाले से सृष्टि का रचयिता सिद्ध हो रहा है सृष्टि का संचालन उत्पत्ति स्थिति संहार करने वाला सिद्ध हो रहा है मगर जब हम सर्व विशेषण लगाएंगे सर्व विशेषण जो कुछ भी मनुष्य सोच सकता है या जो कुछ भी सृष्टि में हो रहा है वो ईश्वर करने वाला है कि नहीं तो वहां पर हमको उसके वस्तुनिष्ठता के साथ जब प्रश्न किया गया कि क्या वो वो एक ही समय में भेद को लंबा छोटा कर सकता है। तो उसके संबंध में हमें कुछ थ्योरी थोड़ा सा एक्सप्लेनेशन देना पड़ेगा कि ईश्वर यह कार्य कैसे करेगा। जैसे हमने अवतार के पक्ष में एक एक्सप्लेनेशन दिया। चाहते तो हम यह कह सकते हैं वो ले सकता है। दैट्स इट। मगर उसको एक्सप्लेन करना भी आवश्यक हो गया। जिससे कि समझ में आ जाए कि हां भाई भगवान अवतार कैसे लेते हैं। तो यह जो बेत को छोटा और बड़ा कर रहे हैं तो कैसे कर पा रहे हैं। तो इस संबंध में प्रश्न है। कैसे करेंगे?

00:14:50:04 है ना? सही कह रहे हैं। मैं कुछ पूछ सकता हूं तो भैया मैं इसका उत्तर दे। इसका उत्तर हो जाए पहले क्योंकि अभी ईश्वर वही है जो सब कुछ अच्छे से उत्तर है। जी विश्वजीत जी बोलिए। तो भैया इसका उत्तर ये प्रश्न वैसे भी बहुत आसान था। इसका उत्तर यही होगा कि अगर ईश्वर एक ही चीज को एक ही वक्त पर बड़ा और छोटा दोनों कर रहे तो वह स्थाई रहेगा। कांस्टेंट रहेगा। ना वह बड़ा होगा ना छोटा होगा। तो जो स्थाई है उसको ऐसा मान सकते हैं कोई इंसान हो चाहे जो भी हो एक वक्त पे या फिर कोई निर्जीव चीज हो वो तो एक वक्त पे ऐसा मान सकते हैं बड़ा भी हो रहा है छोटा भी हो रहा है तो वो कांस्टेंट है ना बड़ा हो रहा है अल्टीमेटली ना छोटा हो रहा है उसका जो सारांश लास्ट में तो यही निकलेगा ना हां काफी हद तक सही है जी और कोई जो देना चाहे इस प्रश्न का उत्तर

00:15:47:18 आप प्रश्न का उत्तर देना चाहेंगे कोई नयन जी आप बोले ना समर्थन में है ना आप तो फिर मेरा एक प्रश्न था नहीं खंडन में अच्छा अच्छा तो रुक जाइए तो रुक जाइए तो किरण जी इनका उत्तर आया है वो आप संतुष्ट है नहीं तो काउंटर करिए या फिर जो भी काउंटर कर हां इसका उत्तर यही हो सकता है कि वह कांस्टेंट रहेगा यही उत्तर है नयन जी जी नहीं तो पूछिए प्रश्न पूछिए जी तो मैं जो प्रश्न पूछना था कि पहले स्वर्णिन जी आपने शुरू किया था तो आप अपना पक्ष जरा एक और बार कहेंगे कि आपने क्या कहा था पहले नहीं नहीं नहीं नयन जी किसके तरफ से है मतलब खंडन का मैं खंडन में हूं खंडन में है नयन जी ठीक है ठीक है नयन जी एक ये कह रहा हूं पहले ये जो इन्होंने विश्वजीत जी ने जो आंसर दिया है इसका कोई काउंटर है आपके पास या नहीं करना चाहते? नहीं ये मेरे पास नहीं है। इसका काउंटर है मैं दे देता हूं काउंटर कि वो कांस्टेंट रहेगा।

00:17:02:24 है ना? आपने ये कहा जो एक ही समय में घटेगा बढ़ेगा वो कांस्टेंट रहेगा। है ना? जी भैया। इसका मतलब ये माना जा सकता है ना कि ऐसा नहीं कर सकता। क्यों भैया दोनों काम तो एक ही साथ हो रहा है। हम बड़ा और छोटा ईश्वर तो कर ही रहे हैं। तो आप तो कह रहे हो ना कि वो कांस्टेंट रहेगा। कांस्टेंट रहेगा कि नहीं? कांस्टेंट रहेगा इस विषय में। अगर भैया मान लीजिए मैं एक ही वक्त पे आपको कुछ दे रहा हूं और आपसे उतना ही ले ले रहा हूं। तब तो आपके पास कुछ बचा नहीं। आपको ऐसा लगेगा कि ईश्वर ना तो हमको कुछ दिए ना लिए। बट दोनों कार्य एक साथ हो रहा है। आपको पता नहीं चल रहा है वो चीज तो आप क्योंकि उसका जो पता नहीं चलेगा जो आपको ये कहना चाहिए ना कि पता नहीं चलेगा मगर ईश्वर करता है

00:17:55:15 तो करने के करने के विषय में आपने पक्ष नहीं रखा ना कि कैसे करेगा ये तो आप रिजल्ट बताया आपने कैसे करेगा उसके संबंध में कुछ हमें समझाया नहीं आपने वह तो आपने परिणाम बता दिया कि जब वह ऐसा करेगा तो वह कांस्टेंट रहेगा तो इसलिए पता नहीं चलेगा यानी ईश्वर कर तो सकता है मगर वह किसी को पता नहीं चलेगा मगर कैसे करेगा यह नहीं समझ में आया शिवश मैं कहना चाहती हूं डंडा कास्टेंट काफी हद तक वो जादूगर वाले जवाब पे मिल सकता है क्या जो जादूगर वाला जवाब होता है जब कोई एक्टर एक्टिंग करता है वो तो खुद जैसे कोई भी एक्टर होता है वो खुद पता है उसको कि मैं एक्टर हूं हां पहुंच रहे हैं दूसरों को दर्शाने के लिए हम जी भैया दूसरों के लिए तो वो ऐसा लगता है कि ये मूर्ख बन रहा है या फिर हंस रहा है, रो रहा है लेकिन अंदर से उसको पता है मैं अभिनेता हूं। अभिनेता का काम कर रहा हूं। बस सरस जी आप क्या कह रहे हैं? हां शिवा मैं कह रही थी दोनों चेंज कर रहे हैं। ओके मैं कह रही थी कि डंडा वो एट ए टाइम लंबा और छोटा भी हो रहा है। दुनिया भी एक्सपेंड हो रहा है। बड़ा हो रहा है। और डंडा जो है वह भी वो उस उस स्पीड पर बड़ा नहीं हो रहा है।

00:19:11:01 तो क्योंकि दुनिया बड़ी हो रही है तो उसकी दृष्टि से वो छोटा हो रहा है तो लेकिन वो उसी इक्वल स्पीड से डंडा भी बड़ा हो रहा है तो एक्सपेंड भी हो रहा है। बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया लेकिन ये तो जी हमारा मत ये है कि जैसे एक स्थान पे कितने ही परमाणु होते हैं उन परमाणुओं में भी इतना ही स्थान है जितना हमें बाहर दृष्टिकोण दृष्टि से दिख रहा है तो उस पर यदि उस स्थान में उस परमाणु में भी वही कोई कार्य हो रहा हो जो बाहर हो रहा है तो उसके अंदर वो छोटा हो रहा हो और बाहर बड़ा हो रहा है तो एक साथ उसी स्थान पर वह बड़ा भी हो रहा है छोटा भी हो रहा है तो इसमें तो काउंटर ही बन जाएगा ना कि बाहर से हमको लंबा छोटा दिखाइए अंदर क्या हो रहा है डजंट मैटर हमें हम लोग वो वाले नहीं है ना कि हम अंदर वो मॉलिक्यूल्स वगैरह देखें इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन ये सब देखें हमें तो डंडा बड़ा अगर अंधे को दिखाने के लिए कहेंगे नहीं यहां पर मेरा पक्ष कट रहा है परंतु अगर अंधे

00:20:26:04 को अगर कहेंगे ये दिखाने का तो कैसे वो महाभारत में हो चुका है ऐसा है इसमें एक गढ़ बात है जो आप लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं वो मैं डाल देता हूं प्रकाश एक ही समय में डंडा बड़ा छोटा हो रहा है ये इसका साक्षी कौन बनेगा ये आपने सोचा इसका साक्षी, इसका दृष्टा, इसकी गवाही देने वाला कौन बनेगा? हमने तो कह दिया कि हम कर देंगे। साक्षी कौन बनेगा? कि लंबा एक ही डंडा एक ही बार में बड़ा छोटा हुआ। क्योंकि जब वो बड़ा हो रहा होगा तो साक्षी उसे देखेगा। जब वो छोटा हो रहा होगा तो साक्षी उसे देखेगा। क्योंकि वह स्थिर अवस्था में रहेगा। उसको पता ही नहीं चलेगा। जो भी साक्षी इसका अर्थ है कि यहां पर कुछ भी करने वाली स्थिति है ही नहीं। यहां पर केवल इंफॉर्मेशन प्रोवाइड करानी है ईश्वर को कि मैंने डंडा लंबा छोटा किया। यहां पर करना कुछ नहीं है। क्योंकि वह तो रिजल्ट क्या है? कांस्टेंट रहेगा क्योंकि लंबा भी हुआ, छोटा भी हुआ। रिजल्ट क्या है? कांस्टेंट रहा। तो क्रिया तो है ही नहीं।

00:21:41:20 तो फिर क्या है कि हमें केवल सामने वाले को इंफॉर्मेशन उसके माइंड में देनी है कि वह हुआ कि नहीं हुआ। तो होने के पक्ष में इंफॉर्मेशन देने के लिए हमें गवाह चाहिए। जो जिस पर वह विश्वास करता हो जो परीक्षा ले रहा है। है ना? या फिर उसको स्वयं को हम कंट्रोल कर लें। उसको यह फीड करा दें कि अह भाई तुमने देखा कि डंडा जो है बड़ा छोटा हुआ है ना तो ये हमें केवल उसको विश्वास दिलाने वाली बात है। इसमें क्रिया है ही नहीं।

00:22:27:03 जी करण दास जी जी भैया भैया एक काउंटर क्वेश्चन था अगर हो सके तो इसी बात पे जी इसी से मतलब डंडे के विषय में ही एक अलग ही मतलब जैसे गुरुत्वाकर्षण का विषय हुआ जैसे ईश्वर ने गुरुत्वाकर्षण का नियम दिया और बनाया इस सृष्टि पर लागू करा तो क्या ऐसा कुछ कर सकते हैं कि किसी वस्तु पे वो ना लगे क्योंकि अगर उस वस्तु पे वो ना लगेगा तो फिर गुरुत्वाकर्षण का नियम तो खंडन हो जाएगा क्योंकि वो तो सभी वस्तु के लिए समान रूप से लगने की का विषय है। तो क्या ईश्वर इसको करने में संभव है? क्योंकि अगर संभव है तो इससे फिर गुरुत्वाकर्षण की जो बात है वो उसका नियम यहां पे उलट जाएगा। नहीं तो प्राकृतिक नियम जो भगवान ने बनाए हैं तो उसको तोड़ने वाले ही तो ईश्वर है। कई ऐसे चमत्कार किए हैं जो बिना किसी साइंटिफिक प्रूवन के और जो है वो उड़ सकते हैं। वो बहुत कुछ कर सकते हैं। इवन जैसे सृष्टि का एक नियम है उठा लिए। एक मिनट इवन जैसे सृष्टि का एक नियम भगवान कृष्ण ने जब पहाड़ उठा लिए थे तो वो तो सृष्टि का एक नियम है कि मनुष्य माता-पिता के गर्भ से ही मनुष्य जन्म लेगा तो इतना तो आर्य समाजी भी मानते हैं कि पहला मनुष्य जो है

00:23:42:04 आलू से हुआ हम चमत्कार को मान लिया ना तो यह तो पृथ्वी का नियम सृष्टि का नियम टूटा हुआ माना खैर अभी थोड़ा सा सीक्वेंस में चलेंगे तो अभी ये बात समझ में आई कि यहां पे कोई क्रिया नहीं है। यहां पे केवल कुछ कार्य हुआ। ये सोने के विषय में सामने वाले को विश्वास दिलाना है। इंफॉर्मेशन प्रोवाइड करानी है। ये इसका और इसमें दृष्ट यहां से शुरू करना था इस कोच को। इसका दृष्टा कौन बनेगा? ठीक है। खैर अब जो है आप अपनी आगे की कंटिन्यू करें। किरण जी आप या नयन जी आप

00:24:26:16 नयन जी पूछ लीजिए हां नयन जी का एक भैया थे ना जो पहले शुरू किए थे हां वो है नहीं अभी हां स्वर्णिम जी तो स्वर्णिम भैया आप पहले जो कहा था जरा एक और बार दोहराएंगे परमाणु वाला ना परमाणु नहीं पहला जो उनका पहला जो पक्ष था उन्होंने तो यही कहा था उनके पक्ष आपने कुछ कहा था ना ऐसा कि ईश्वर जगत बना भी सकता है, बन भी सकता है। जी जी जी हां तो वहीं पर मेरा प्रश्न था तो ईश्वर क्या जगत बन सकता है?

00:25:11:15 जी बिल्कुल बन सकते हैं। मैं आप लोगों को एक बात कहूंगा जो ऐसे क्वेश्चंस हैं जिनसे इस विषय में जो आंसर है वो आ जाने के बाद हर चीज का आंसर वो हो सकता है। ऐसे जो गढ़ वर्थ वाले क्वेश्चंस हैं वो थोड़ा बाद में करें। पहले शुरुआत वाले क्वेश्चंस करें। हल्के वाले कि क्या वह पाप कर सकता है? जो प्रासंगिक क्वेश्चंस है पहले उनको यहां पर क्लियर करवाइए। है ना? और जो गुण अर्थ वाले क्वेश्चन है उनको बाद के लिए रखिए क्योंकि अगर उसको हमने यहां पे दे दिया तो ये समाप्त हो जाएगा सेशन। अभी भी मैंने जो यह जो डंडे वाली बात बताई है इसमें कुछ चीजें हैं जो रोक दी। हालांकि आप काउंटर कर सकते थे तो काउंटर नहीं किया। मैंने रोकी हुई हैं। तो वह अंत के लिए रोकी हुई है। यहां पर दे दूंगा तो अभी हर प्रश्न के जवाब में उससे आपको मदद मिलने लगेगी। ठीक है? तो वो वाले प्रश्न करिए जो प्रासंगिक पहले शुरू में वह वाले प्रश्न करिए जो प्रासंगिक है कि अच्छा क्या वो ये पाप कर सकता है? क्या वो बुरा कर सकता है? बहुत सारी चीजें हैं। ठीक है? तो धीरेधी उसप आइए जिसका जवाब वन एंड ओनली फिर अद्वैत के

00:26:26:19 पास होता है। ठीक है। ठीक है भैया। जी पूछिए। प्रासंगिक वाले बिल्कुल जो आपको बिल्कुल वैसे लगे ना जो आर्य समाधि के द्वारा उठाए जाते हैं सबके द्वारा वो सब आप जो है क्या मैं एक बार बोल सकता हूं पहला हां नारायण जी बोलिए अच्छा तो मैं दूसरा ही बोल रहा हूं तो एक जो पैराडॉक्स होते हैं ना बहुत सारे पैराडॉक्स मींस सेल्फ कंट्राडिक्टरी स्टेटमेंट्स तो एक पैराडॉक्स आया है कि ओमनी प्रेजेंट पैराडॉक्स जिसको कहते हैं कि एक पत्थर है क्या ईश्वर ऐसा एक पत्थर बना सकते हैं जिसको कोई नहीं उठा सकता। खुद ईश्वर भी नहीं। तो इस प्रश्न को अगर हम पूछेंगे इसका उत्तर हां या ना आ सकता है। अगर हम कहेंगे कि कोई भी नहीं उठा सकता। ऐसा पत्थर वो बना सकते हैं तो इसका मतलब ईश्वर खुद भी नहीं उठा सकता। तो यहां पर उसका सर्वशक्तिमत्ता तो खत्म हो गया। अब अगर वह उठा सकता है। ठीक है? फिर तो वह ऐसा पत्थर बना ही नहीं पाया जिसको कोई नहीं उठा सकता। तो यहां पर भी उसका सर्वशक्तिमानता तो खत्म हो ही गया। तो इसका उत्तर क्या होगा कि क्या वो ऐसा पत्थर बना सकते हैं जिसका कोई वाला प्रश्न है ये आना ही है। ये तो होना ही था। ये

00:27:41:25 ये सबके मेरे ख्याल से हम में से ऐसा कोई नहीं होगा जिसने सुना। मगर ये बाद वाला प्रश्न है। बाद वाला प्रश्न है। इसमें भी वही आंसर आएंगे जो खत्म कर देंगे। सारी डिबेट को ही बंद कर देंगे। ठीक है तो तो आप शुरुआत में थोड़ा शुरुआती लेवल वाले प्रश्नों को कहिए तो पूछूंगा कौन पूछेगा सरलता मैं पूछू जी हां किरण जी आप पूछिए एक बात बताइए जो साकार ईश्वर है वो बिना स्पेस के साकार हो सकता है अरे आप सब सारे ऐसे ही पूछ रहे हो कि उसमें जो है कह चलिए ईश्वर कोई बुरा कार्य कर सकता है। हां इस तरह से पूछिए यह जो भैया सभी यहां पर इंटेलेक्चुअल्स है तो प्रश्न तो

00:28:46:04 हां ये बताइए वह बुरा कार्य ये उन्होंने कोई कार्य किया वो बुरा है इसकी पुष्टि करेगा कौन इसका पुष्टि हम ही करेंगे जो कि हमारे साथ कर रहे हैं आके हां ये करो ना तो फिर इसका इसका उदेश जो एक एक मिनट इसका उद्देश्य क्या है इसका सेशन का कि हमें प्रैक्टिस हो कि हम मतलब तर्कों को रखने में अपने पक्ष को मजबूती के साथ रखने में निपुण हो जाए। इसका उद्देश्य ये है तो ये प्रश्न अच्छा है। इसमें आपने किया है ये क्योंकि बहुत प्रासंगिक रेलेवेंट चीजें हैं ना। कई जगह हम लोग खड़े होते हैं या सामने से ऐसी बातें आ जाती हैं। जी बताइए

00:29:35:13 स्वर्णिम जी बता दीजिए दोबारा से। जी हां कर सकते हैं। तो कर सकते हैं कि संबंध में वो तो बताओ। तो यानी कि ईश्वर पापी हो गया। आपने कहा इसका दृष्टा कौन होगा? इसका दृष्टा तो जो ईश्वर ने कहा है कि क्या अच्छा है? क्या बुरा है? जी पर शास्त्री यह भी तो कहता है कि ईश्वर पर कुछ लागू नहीं तो ईश्वर कुछ भी कर सकते हैं। वह किसी नियम का पालन नहीं भी करें तो भी उनको पाप पुण्य कुछ नहीं लगेगा। बताइए भाई किरण जी और बुरा कार्य कर सकते हैं भैया और आगे का प्रश्न

00:30:17:03 इस ब्रह्मांड में जितने भी लोग हैं मानव है प्राणी है चराचर जो भी है सब भगवान ही है तो जब बुरा मानव या जो कोई बुरा कार्य करता है उसमें भी भगवान विद्यमान है हां तो इससे तो यही सिद्ध हो है ना कि आपका जो ईश्वर है वो बुरा कार्य भी कर सकता है। वो तो वो तो उनसे परे है ना आत्मा रूप में विद्यमान है शरीर से कार्य कैसे परे है क्यों माना जाए कि उन पर नियम लागू नहीं होगा वो बताइए ना क्योंकि भैया जो भी बुरा कार्य करेंगे हम इस जगत में करेंगे और यह जगत उन्हीं का बनाया हुआ है और वह फिर से विनाश करके फिर से जगत बनाने की क्षमता उनमें है। जैसे हम किसी को मार नहीं सकते क्योंकि हम उसका जैसे मान लीजिए किसी को मार दिया किसी का उंगली को काट लिए तो हमारे पास इतनी क्षमता नहीं है कि उसका उंगली फिर से जोड़ दे या लगा दे तो ऐसा करना पाप माना जाता है कि जब हम किसी का भला नहीं कर सकते तो क्यों बुरा करें लेकिन ईश्वर तो खुद अपना संसार बना रहे हैं फिर विनाश कर रहे फिर से बना रहे उनके पास वो क्षमता है तो वो बुरा कैसे माना जाए मतलब उन्होंने अगर जगत बनाया है तो फिर उन्हें अधिकार मिल जाता है कि वो हमारे साथ कुछ भी करते रहे हम उनसे कुछ कहे ना जगत कभी जगत का विनाश

00:31:32:04 भी तो कर अधिकार है। विश्वजीत जी यहां पर एक बात है। हां तो यही तो मैं पूछ रहा हूं ना। उन्हें अधिकार किसने दिया हमारे साथ क्या करेंगे या नहीं? किरण जी एक मिनट विश्वजीत जी आपने कहा ईश्वर ये अच्छे बुरे सब कुछ से परे है। ठीक है वो परे है। उनके ऊपर शास्त्र का कोई नियम लागू नहीं होता। परंतु हमारे ऊपर तो लागू होता है ना। तो हम क्यों ऐसे ईश्वर को माने? हमारे सापेक्ष में हमारे ऊपर तो शास्त्र का नियम लागू होता है। हम तो उनको ही फॉलो करेंगे ना। अब देखिए ईश्वर जब अच्छा काम करते हैं तो राम कहते हैं

00:32:06:24 जी मुझे कंप्लीट करने दीजिए। अगर वो अच्छा काम कर रहे हैं तो हम कहते हैं राम विग्रह धर्म। अगर बुरे काम शास्त्र विरुद्ध काम करते हैं तो उनको बुद्ध कह रहे हैं। आप एक तरफ राम को मानते हैं परंतु बुद्ध को नहीं मानते। तो ऐसा क्यों? अगर शास्त्र से परे कुछ सब कुछ एक है तो आप दोनों को ही मानिए ना। हमें तो कोई बुरा कार्य करते हैं उससे भी सही कार्य सिद्ध होता है। हम तो यहां पर वो क्योंकि शास्त्र विरुद्ध काम कर रहे हैं इसलिए हम बुद्ध को नहीं मानते। हम राम को मानते हैं। है ना? तो हमारे सापेक्ष में अगर हमारे तरफ से अगर देखेंगे तब तो अच्छा बुरा है ना? वो कर रहे हैं वो तो हो रहा है ना काम। अगर अच्छा अगर हम कहेंगे बुरा काम तो क्या बुरा काम करेंगे? चोरी डकैती ऐसा ही कुछ करेंगे। वो तो व्यवहारिक दृष्टि से ही होगा ना पारमासिक दृष्टि से तो कुछ भी नहीं है सब कुछ वेदों का खंडन किया तो वेदों का खंडन किया तो उन्होंने बुद्ध रूप में

00:33:03:13 तो वेदों का खंडन वेदों की निंदा कर दी शक्ति तो प्राप्त नहीं हुई ना जैसे रामचंद्र जी को हुई और ना ही हम किसी भी प्रकार की स्तुतियां गाते हैं महात्मा बुद्ध की आपका प्रश्न यह है कि क्या ईश्वर पाप कर सकता है हमने इसका उत्तर कोई ऐसी ऐसा उदाहरण दीजिए इनको ईश्वर के एक मिनट भैया मैं इसका जवाब देता हूं सकते हैं और उसी के अनुसार हम ईश्वर का उस रूप को स्वागत भी करेंगे जैसे मान लीजिए कोई अपराधी के रूप में सुनिए सुनिए हमारी टीम में से कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करिए जिसको स्वीकार करने में सामने वाले पक्ष को परेशानी हो समस्या हो जाए ऐसा उदाहरण दीजिए क्या ईश्वर ऐसा कर सकता है तो उसको बोलने में ही तकलीफ हो जाए शरद जी अच्छा शरद जी क्या सुन लीजिए शरद जी हैंड रेज किए हुए हैं काफी देर तक जीर हां शशिवांश जी तो मैं कह रही हूँ कि जैसे सूरज है सूरज के होते हुए भीतर ही सब कुछ हो रहा है पाप पुण्य सब कुछ जो नहीं होना चाहिए वो भी हो रहा है जो हो रहा है वो भी हो रहा है तो क्या ये सूरज उसके कारण बनते

00:34:18:19 है इनडायरेक्टली यस ठीक है लेकिन क्या वो अटैच्ड है उस चीज का नहीं है तो वैसे ही तो इनडायरेक्टली वो कारण है भी लेकिन प्रतीत हमको होता है कि हम कर रहे हैं यू नो एक दूसरे के ऊपर जो भी होता है यू नो अच्छा बुरा एक्सट्रा सो द सेम वे तो भगवान भी वैसे ही है वो बिल्कुल डिटच्ड है ठीक है लेकिन है जरूर उनके भीतर ही है मतलब उनके आमने सामने ही हो रहा है जो भी हो रहा है तो पाप भी हो रहा है पुण्य भी हो रहा है लेकिन लेकिन हमने अपना अपना डेफिनेशन बना दिया है। वी गेट अटैच टू इट। है ना? हम अटैच हो जाते हैं। लेकिन सूरज कभी अटैच नहीं होते। वो कभी बोलते नहीं कि मेरे वजह से पाप हुआ। मेरे होते हुए ये हुआ। मेरे होते हुए अच्छा हुआ। आई थिंक दैट्स द एग्जांपल। किसी को काउंटर करना है तो कर सकते हैं। हम करिए मैडम। सूरज क्या पाप कर रहा है? सूरज के होते हुए ही हो रहा है ना नयन जी? मतलब ना दिन में चोरी होती है कर सकते हैं जैसे डेजर्ट रेगिस्तान एक अब अभी शरद जी और नयन जी में होने दीजिए फिर आवश्यकता पड़ने पे जिसका पक्ष हल्का होगा तो उसकी टीम का दूसरा मेंबर आ जाएगा ठीक है अच्छा तो हां एक सेकंड मैं कंप्लीट कर लूं

00:35:33:20 हां जी नयन जी सूरज के सामने ही हो रहा है ना गाली गलौज मारपीट एक दूसरे का जो भी जो भी हम सोच सकते हैं ना बुरा तो आप कह रहे उसका दोष उन पर नहीं लगेगा हां तो उनको दोष कहां लगती है अच्छा तो ऐसे तो अच्छा अच्छा चलिए आप रास्ते से जा रहे हैं कहीं पर किसी लोग किसी इंसान ने और किसी व्यक्ति को खून कर दिया तो आप सामने खड़े थे आप कुछ कर सकते थे नहीं परंतु नहीं किया तो उसका दोष आप पर नहीं लगेगा कि आपने ऐसा क्यों नहीं किया या फिर शास्त्रों में तो ऐसा भी आया है कि जो केवल मांस खाता है उसका दोष केवल उसे नहीं लगता जो उसको काटता है, जो उसको बनाता है, जो उसको देखता है, जो उसका समर्थन करता है, सभी के ऊपर समान पाप लगता है। हां नयन जी दोष लगता है जीव के पर्सपेक्टिव से ना तो कि ब्रह्म के पर्सेक्टिव से या ईश्वर के पर्सेक्टिव से। हां तो अगर पाप करेगा वो तो उसके पर्सेक्टिव से थोड़ी होगा। पाप तो हमारे पर्सेक्टिव से ही होगा। हां। तो हम मानव को थोड़ी ना ईश्वर कह रहे हैं। हम तो आम आदमी को ईश्वर नहीं कह रहे हैं। हम तो जो कार्य हो रहा है जिसका दृष्टा जैसे शिवश ने भी बोला जैसे सूरज है जो दृष्टा है जो सब कुछ उनको पता है उनके भीतर उनके आम सामने ही हो रहा है। ठीक है? लेकिन वो दूषित नहीं है। दूषित नहीं

00:36:48:24 है क्योंकि वो अटैच्ड नहीं है। वो खुद कर भी रहे हैं लेकिन नहीं भी कर रहे हैं। लेकिन मानव तो सीधा-सीधा वो तो मुक्त पुरुष नहीं है ना। वो तो सूरज नहीं है। वो तो लेगा ही ब्लेम। उसको तो पड़ेगा ही ब्लेम। और वैसे भी हम जगत में एक दूसरे को तो नहीं पूछ रहे हैं। अच्छा पहली बात मैम आप दीदी आप ये मत कहिए कि सूरज के उदाहरण को आप क्योंकि हम जो कि मैं क्या उदाहरण दू आप पहले सुनिए ना देखिए देखिए सूरज जो है आपने जो सूरज का उदाहरण दिया तो उसको तो हम फॉलो नहीं कर सकते जैसे कि राम कृष्ण कोई विग्रह है तो आप उसका उदाहरण दीजिए जिसको हम फॉलो कर सकते हैं जो मनुष्य बनकर आया है जो कार्य कर रहा है

00:37:30:21 अगर आप कहेंगे सूर्य चंद्र तो उनका हम कैसे फॉलो करेंगे वो पाप करेंगे पुण्य करेंगे सूरज को हम पूजते हैं कैसी बात कर रहे हैं नयन जी सूर्य आदित्य को हम पूजते हैं वो राम से कम नहीं है वो भी ईश्वर ही है जो पूरे जगत को चला रहे हैं अच्छा तो आप एक बात में एक लाइन में मुझे बताइए क्या सूरज पाप कर सकता है कि नहीं नयन जी उनके प्रेजेंस में ही तो हो रहा है सब कुछ पाप कर सकता है कि नहीं हो तो रहा है पाप तो जिसके समक्ष में पाप हो रहा है वो कुछ नहीं कर सकता है तो ऐसे पापी या पाप ईश्वर इसमें साक्षी कौन बनेगा कि ईश्वर पाप कर इसका साक्षी कौन बनेगा सूरज ही तो है मैं वही इसका उत्तर तो शिवश भैया ने दिया था ना वेद पुराण ही बोल आप देखता हूं मैं वेद पुराण में तो ईश्वर सब चीज है तो फिर उनको उनके ऊपर कैसे दोष लगेगा परमार्थ के दृष्टि से जी यहां पर प्रश्न ये है

00:38:39:20 उनको रुकिए रुकिए ये तो हमारा भ्रम हो सकता है कि हां ईश्वर हो रहा है लेकिन ऐसा ऐसा है ना जी आप नयन जी मैं आपको एक बात कहूंगा आप ना प्रश्न बदल दीजिए ना जैसे सूरज को ले बात हो रही है और उसमें आपको दिक्कत हो रही तो आप प्रश्न ये कर दीजिए क्या ईश्वर साकार स्वरूप लेकर के एक छोटी बच्ची के साथ बलात्कार कर सकता है? ऐसे करिए ना मैंने आपको पहले भी इस तरह का उदाहरण पूछने के लिए कहा था। ऐसा प्रश्न करिए जिसमें सामने वाले को उसको स्वीकार करने में ही छटपटाहट हो जाए। हां तो यही यही वाला प्रश्न इसको ऐसे और एक एक चीज मैं और कहूंगा कि अभी एक बात चल रही है कि जिसके समक्ष जो कार्य हो रहा होता है तो यदि किसी के समक्ष हो रहा है तो उसको वह कार्य करने वाला माना जाता है। तो यदि मैं मैं कहीं पर बैठा हूं और चींटी कोई कार्य कर रही है जो मैं नहीं कर सकता। वो बिल में घुस रही है तो क्या चींटी में बिल में चींटी के द्वारा बिल को बिना तोड़े

00:39:54:28 उसमें घुसना मैंने किया तो इस तरह का काउंटर करिए ना ठीक है शिवाजी सॉरी लेकिन मेरे उसका किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया मतलब सूरज के आपको समझ में आया उदाहरण नयन जी जी समझ में आया आपको मतलब मैं कहना क्या चाह रही हूं कि सूरज इनडायरेक्टली कारण है भैया अगर जैसा कि आपने सवाल पूछा आपने क्या होगा

00:40:27:13 सरस्वती जी आपने क्या कहा सूरज इनडायरेक्टली आपका कारण है नहीं नहीं सूर्य सुनिए सूरज के प्रेजेंस में प्रेजेंस में ही हो रहा है हम एक दिन दूसरे को देख पा रहे हैं गाली गलौज चलता है मारपीट चलती है बहुत कुछ अच्छा भी होता है बहुत कोई लोग कल्याण भी कर रहे हैं सब कुछ ही कर रहे हैं आप सोच लीजिए एक हफ्ता सूरज नहीं निकला कितना कुछ नुकसान हो सकता है। धरती इधर की उधर हो जाएगी। खानपीन इधर की उधर हो जाएगी। हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा। ऑक्सीजन आना बंद हो जाएगा। प्लांट नहीं ग्रो करेगा। सुनिए सुनिए मेरा कहना है कि सूरज होते हुए ही सब कुछ हो भी रहा है। पाप भी हो रहा है। सब कुछ हो रहा है। तो सूरज इज नॉट लेस देन एनी गॉड। है ना? वो साकार भी है। हम देख पाते हैं उठ के। है ना? तो उनकी पूजा भी करते हैं। हम में जब गर्मी होती है हम उनको दोष भी देते हैं कि भाई इतनी गर्मी हो रही है करके तो इनडायरेक्टली वो कारण बने हुए हैं या फिर जो अलग मतलब जो ग्रो किया है अपने यू नो आध्यात्मिक में उसकी दृष्टि अलग हो सकती है। इसका कुछ काउंटर है आपका तो पाप हो तो रहा है पाप भी हो रहा है पुण्य भी हो रहा है। एक मिनट मुझे बोलने दीजिए थोड़ा सा निष्कर्ष क्या निकला सूरज जो है वो जगत का कारण है और जगत में जो भी पाप आप दे रहे हो उदाहरण

00:41:43:03 तो इसका आप किस तरह से रीजन सूरज को बता रहे हो सूरज तो जगत के निर्माण का कारण आप बता रहे हो ना उसमें इनका सीधा सा प्रश्न है जानबूझ के ईश्वर पाप कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं बस जानबूझ के कर सकते हैं यस बिल्कुल कर सकते जानबूझ के बस अब काउंटर कीजिए नयन जी आप तो आपका निष्कर्ष क्या निकला इनडायरेक्टली आपका कारण है देखिए दुनिया में क्राइम्स हो रहे हैं ना क्या आप बार-बार उदाहरण दे आप सीधी बात कहे ना वो इनडायरेक्टली पाप का कारण है या नहीं अरे हम कोई बुरा कार्य कर सकते

00:42:28:04 है पुण्य का निष्ठा हो जाए तो वो पाप आचरण कर दे तो उसको हम समर्थन दे देंगे कि अगर वो दृष्टा स्वरूप में पाप कर रहा है सीधा सा बात है भगवान या सूरज जो भी कहेंगे इनडायरेक्टली पाप का कारण है हां या नहीं जैसे एग्जांपल के तौर पर राम जी ने बाली को पीछे से मारा वो नियम के तो विरोधी था विश्वजीत जी एक प्रश्न मैं पूछ रहा था आपसे कि जिस तरह से आप कह रहे हो कि पाप आचरण अगर दृष्टा स्वरूप में वो करे तो पाप आचरण स्वीकार है। तो यह पाप आचरण करने के लिए क्या उसके दृष्टा स्वभाव में ऐसा नहीं आ रहा कि ये पाप और पुण्य में क्या भेद है और पाप करना चाहिए कि पुण्य करना चाहिए। उनके लिए सब एक बराबर है।

00:43:23:10 क्योंकि उनको ना तो पाप लगता है ना पुण्य लगता है। वो कुछ भी करें। यह परमार्थ की दृष्टि से अगर हमारे दृष्टि से देखा जाए तो फिर यह सवाल हो सकता है तो दृष्टि हमारी होगी ना पाप और पुण्य तो हमारे हां आपके क्वेश्चन का तो मैंने जवाब दे दिया जो आप लोगों ने काउंटर किया कि पाप कर सकते हैं तो मैंने बोला हां शॉर्टकट में अगर आंसर दिया जाए एक बात में तो फिर दूसरा सवाल उठ रहा है ना कि पाप और पुण्य तो साधारण व्यक्ति भी भेद कर सकता है तो वो किस प्रकार से भेद नहीं कर पा रहे हैं और पाप कर दे रहे हैं नहीं आपने उनके शक्ति व्यक्तिमत्ता पे सवाल उठाया ना कि क्या कर सकते हैं? तो मैंने बोला हां चाहे तो कर सकते हैं। तो फिर आप इसका बताइए कि अगर कर सकता है तो फिर ऐसा अगर हो जाए तो कैसे कर पा रहा है कि अगर सात समत वो कार्य नहीं है तो उसको कर भी रहा है और दृष्टा भाव भी है कि मैं ईश्वर ने इसलिए बनाया ताकि मानव का कल्याण हो सके ना कि उन्होंने अपने ऊपर नियम लागू करने के लिए वो शास्त्र का निर्माण किए थे। ईश्वर वो मानव के कल्याण का एक रास्ता था शास्त्र कि उसका पालन करके हम ईश्वर तक पहुंच सके तो मोक्ष मिल सके टेररिस्ट है जिसका एक ऐम है कि पर्टिकुलर एरिया में हमको

00:44:38:16 जो है सबका विनाश करना है और उसको अंतत पता है कि शरीर तो है नहीं शरीर का तो विनाश ही हो जाना है तो हम अपने मकसद को पूरा करने के लिए मार देते हैं सभी को तो रूह ही अंतिम सत्य है तो उस विचार से तो फिर वो भी दृष्टा ही है और उस कार्य को आप समर्थन दोगे क्योंकि वो ईश्वर का ही कार्य कर रहा है यहां नहीं मैं अगर उसका अंत हो गया मतलब उसके कर्मों पे भी फल देते हैं भगवान ऐसा बात बट उसका जब अंत हो गया जैसे किसी का देहांत हो जाता है ना उसके लिए पाप पुण्य परिवार कोई मायने नहीं रखता क्योंकि उसका बहुत बार बहुत

00:45:16:24 अभी तक की चर्चा से एक चीज क्लियर हो जाए आदित्य जी मैं आपको लूंगा इसके बाद एक चीज मैं क्लियर कर दूं देखिए यहां पर प्रश्न ये हो रहा कि जैसे कि क्या ईश्वर पाप कर सकता है? तो हां यह समझ में आ रहा है कि क्योंकि सर्व सबका कारण वही है। उसके बिना किसी भी चीज का अस्तित्व ही नहीं है। तो हम यह नहीं कह सकते है। पाप का कारण भी वही है। ठीक है? मगर जब उसको और वस्तुनिष्ठता में जाएंगे कि क्या वो किसी निर्दोष की हत्या कर सकता है चाकुओं से गोद गोद कर? हम या फिर और भी इसी तरीके जैसे अभी थोड़ी देर पहले मैंने एक एग्जांपल दिया था उसको नहीं लेते चाकुओं से गोदने वाली बात को ले लेते हैं तो क्या वो किसी निर्दोष को चाकुओं से गोदगो गोद कर हत्या कर सकता है क्या वो किसी निर्दोष के साथ जो है और कुछ अन्याय पूर्वक कार्य कर सकता है तो यदि हम यह कहते हैं ना हां हां ठीक है हां कर सकता है ये तो एक अलग बात है कि हां ठीक है? यह तो हमको पता ही है ना कि आप हां ही कह कहेंगे जो समर्थन में आए हैं हां तो कहेंगे ही मगर फिर जब वो ऐसा कर सकता है तो उसको क्यों

00:46:31:27 ना माना जाए पापी उसके प्रति अच्छे अच्छा दृष्टिकोण क्यों रखा जाए सम्मान का दृष्टिकोण क्यों रखा जाए पाप करने वाला होते हुए भी उसको पापी क्यों ना माना जाए ठीक है तो ये बात आएगी इसका उत्तर देता हूं हम तो अभी पहले जरा आदित्य जी को सुन ले वो काफी देर से वेट कर रहे थे हम जय श्री राम भैया जय श्री राम बताइए जी मैं इसी प्रश्न का उत्तर देना चाहता था नयन जी ने जो पूछा कि क्या ईश्वर पाप कर सकता है हम तो सबसे पहले पाप के लिए हमें यहां पर दो लोग चाहिए कम से कम द्वैत होना चाहिए इसमें क्योंकि अगर पाप होगा तो दूसरे के साथ कुछ ना कुछ ऐसा घटित होगा जो कि सही नहीं है इसीलिए उसे पाप कहा जाएगा। जैसे चोरी, चकारी या किसी को मारना या किसी के साथ अहित करना तो वो दूसरा किस में होना चाहिए? हम तो अब जैसे हम सब जानते हैं नयन जी सबको पता है कि यह जगत है ईश्वर ईश्वर ने बनाया है। इसमें जितने भी जीव हैं वस्तुएं जो जो कुछ भी है सब ईश्वर ही है। तो हम जीव रूप में भी या रावण या कंस के रूप में भी

00:47:47:01 जितने भी जीव या जितने भी मनुष्य हैं वो सब ईश्वर ही हैं। आप यह बात तो मानते ही हैं। तो ईश्वर जीव रूप में या मनुष्य रूप में जो भी पाप कर रहा है मान लीजिए कि किसी मनुष्य ने जैसे अभी भैया ने कहा कि किसी को चाकू घोद के मार दिया तो जो मारने वाला था वो भी ईश्वर ही है और जो मरने वाला है वो भी ईश्वर ही है। तो इसमें ईश्वर ने किसी ना किसी रूप में वो पाप करके दिखा ही दिया। पाप किया है यहां पे। तो अब उसको आपका दूसरा प्रश्न है कि ईश्वर पाप कर सकता है लेकिन हम उस पापी क्यों ना माने तो शास्त्रों के अनुसार रामो विग्रह धर्मा पूजन या ईश्वर को मानना हमें केवल उसी रूप में मानना चाहिए जो धर्म का प्रतीक है जो पाप और पुण्य से जो शास्त्रों में लिखा है उसी है जी बिल्कुल ऐसे भगवान बुद्ध भगवान बुद्ध है उनको ईश्वर है तो ईश्वर का ही अवतार लेकिन उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए। नहीं करते हैं। ऐसा विधान नहीं है। राम की कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। शिव जी की पूजा करनी चाहिए। तो तो आदित्य जी जैसे अगर आप कह रहे सर्वशक्तिमान है और पाप और पुण्य

00:49:02:07 समान रूप से कर ही रहा है और उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है तो क्या ईश्वर ये भी कर सकता है कि हमारे सामने पाप और अधर्म का ही उदाहरण प्रस्तुत करें और हम अधर्म का जो है पूजन करने लगे जैसे धर्म की करते हैं क्योंकि ईश्वर तो इसको भी करने में हां बिल्कुल ऐसा ऐसा हुआ भी है रावण जो था वो पाप ही करता था और उसके पूजन भी करते थे उसके अनुय उसके अनुय नहीं चार भम दृष्टि से बताइए भैया मैं इसका उत्तर देता हूं अगर किसी का कोई भी कर सकता है जो उसके अनुय होते हैं वैसे का काउंटर ये हो सकता है बहुत सरल कि भाई आपने जो कुछ बताना शुरू किया वो अद्वैत से किया है तो उसके लिए तो पहले वो पहले सबको अद्वैत को मानने वाला होना चाहिए जी भैया यही बात वहां जाना पड़ेगा ना अद्वैत तत के आधार पर किया आपने ना शुरू में ही बोला कि सब कुछ ईश्वर ही है तो फिर ईश्वर क्या कहते हैं फिर ऐसा कह ही नहीं सकते कि कोई कार्य नहीं ले लीजिए इंद्रजीत

00:50:13:03 भैया इंद्रजीत का एग्जांपल ले लीजिए उन्होंने अपने पिता का बात ही माना था तो उनको पाप नहीं लग सकता उस वक्त उन्होंने वही किया जो उनके पिता ने कहा उनको पता था कि गलत है नारायण भगवान के अवतार से मैं युद्ध कर रहा हूं। बट फिर भी उन्होंने वो किया जो उनका धर्म था पिता का आज्ञा पालन करना। हम तो इसमें क्या पर युद्ध से जाने से पहले जैसे वो बोल रहे ना कि गलत कार्य को भी मतलब अपना बना सकते हैं मोरल। तो उसका एक एग्जांपल था कि हां उस वक्त भी पाप नहीं लगेगा। क्योंकि उनको पाप नहीं लगा था। इंद्रजीत जो थे इंद्रजीत को पाप लगा पाप नहीं लगा था। वो तो अपने पिता के उस व्यवस्था के कारण युद्ध में जा रहे थे पर इसका मतलब जैसे जैसे कोई गलत काम करते हैं उनका कोई अनुयाई बन जाता है ना तो वो अपना एक तरह से धर्मी कर रहे होते अपने अकॉर्डिंग बट गलत वो जिनको सब कुछ पता रहे कि हां मैं गलत कर रहा हूं उनके ऊपर दोष लगेगा चलिए भैया इनको काउंटर दीजिए

00:51:17:22 मतलब किसी भी प्रकार के दोष को अगर हम अवगत कराने के लिए कोई है और अगर अवगत करवाने के लिए अगर कोई करे तब पाप लगेगा। अवगत अगर वो हुआ ही नहीं तो उसके ऊपर क्या पाप लगेगा? मैं एक मैं एक जो है मैं एक एक विनोद पूर्ण बात यहां पे कहना चाहूंगा। पाप वाले कांसेप्ट हमारे क्लियर है नहीं जो शुरुआती स्तर पर किए जाते हैं विरोधियों के द्वारा और आप लोग जो है ईश्वर पत्थर और डंडा ये सब गुल्ली ये सब करने लगे। [हंसी] बताइए पाप वाला कांसेप्ट ही क्लियर नहीं है। मैंने तो बोल ही दिया था कि हां कर सकते हैं तो फिर काउंटर प्रश्न ही ऐसा कर रहे हैं उसके अकॉर्डिंग तो फिर डायवर्ट हो रहा है। अच्छा मैं एक बात कहूं आदित्य जी ने आपने जो कहा था कि ईश्वर पाप कर सकता है क्योंकि वो सभी प्राणियों में है। यह आपने अद्वैत के नजरिए से कहा। आप ये द्वैत के नजरिए से कहिए।

00:52:15:06 के ठीक है ठीक है परमार्थ की दृष्टि से सब कुछ है मगर हम व्यवहार की दृष्टि से पूछ रहे हैं व्यवहार में ईश्वर गलत कर सकता है आके सामने से और सरल कर देता हूं मानव का रूप लेकर के क्या वो किसी की हत्या कर सकता है यदि कर रहा है मानवीय रूप में तो भी उसको दोषी क्यों ना माना जाए निर्दोष की हत्या भैया। अच्छा चलिए एक और बात इसके साथ मैं जोड़ देता हूं। रामोग्रह धर्म है। एक मिनट रामो विग्रह वान धर्म है ना? राम धर्म के विग्रहवान है तो राम क्या अधर्म कर सकते हैं? चलिए ये बताइए। राम जी भगवान है तो वो अधर्म कर सकते हैं कि भैया इसका उत्तर दे दूं। हम तो भैया जैसे कि पूछा आपने कि क्या वो अवतार लेकर के गलत काम कर सकते हैं कि नहीं तो धर्म के विरुद्ध भी तो कार्य कुछ किए थे भगवान जैसे कि एग्जांपल अगर ले लिया जाए तो वो वाला जैसे बाली को पीछे से मारे थे तीर चला के यही तो मुझे सबसे ज्यादा खराब लगा कि आप बाली को पीछे से मारने को धर्म के विरुद्ध क्यों मानते हैं? अच्छा हुआ ना

00:53:30:12 कि यहां पर बात ही है क्षत्रिय धर्म तो क्षत्रिय धर्म ऐसा अल नहीं करता उनको चलिए इनको समझाएंगे या फिर मैं ही बताऊं सरस जी आप समझाने के लिए एक मिनट पहले तो ये जो पक्षकार टीम है उनकी तरफ से देख लीजिए उसके बाद जो खंडन वाली टीम है उससे देखेंगे है ना तो सरद जी आप बताएंगे इन्हें कि बाली हां फिर से रिपीट कर इनका कहना कहना है कि देखिए राम जी ने बाली को पीछे से मारा था तो वो धर्म नहीं था फिर भी उनको हम लोग नहीं मानते दो ये विश्व जी ने कहा है ना हम विश्वजीत जी ने कहा है अच्छा तो आपका ये मानना है कि बाकी को जो उन्होंने पीछे हम लोग खंडन वाले हैं ना पहले सरस जी जो उनहीं की टीम की है वो अगर बताना चाहे तो बता दे इनका इनका कहना ये है इस संबंध में कि ईश्वर पाप भी करता है पर हम उसे दोषी नहीं मानते हैं। तो इस संबंध में इनका कहना यह है कि देखिए राम जी ने भी पाप किया पर हम उन्हें पापी नहीं मानते बल्कि धार्मिक ही मानते हैं।

00:54:40:07 तो क्या आप मानती हैं कि राम जी ने पाप किया बाली को पीछे से मारने में? क्या आप सहमत हैं? आपकी टीम के जो कि ये कह रहे हैं। ये यहां पर है विषय। हां जी। हां जी। पाप हुआ राम जी से और उनको उसका फल भी मिला। जब श्री कृष्ण बन के आए थे तो उसका यू नो बाद में उनको वो भोगना भी पड़ा। उनके पैर में भी तीर लगा था। एक्सक्टली यस तो राम जी ने अधर्म किया था। व्यवहारिक दृष्टि से किया था। किया था तो हम उसे धर्म का विग्रह क्यों कहे? तब तो शास्त्र मिथ्या हो गया। तो शास्त्र मिथ्या देखिए कर्म सिद्धांत कर्म सिद्धांत ही यही है। अगर भगवान को अलग से हम देखने लग गए तो पार्शलिटी हो जाएगा। तो शास्त्र सुनिए एक सेकंड विश्वजीत जी एक सेकंड तो नयन जी तो यही तो है हम भगवान को पार्शियलिटी नहीं कर सकते। कर्म सिद्धांत तभी है चाहे वो भगवान हो राक्षस हो असुर हो मानव हो कोई भी हो जिससे अगर वह कार्य हो गया तो उसको भोगना ही पड़ेगा लेकिन ईश्वर मुक्त मुक्त एक सेकंड ईश्वर मुक्त है उनको कुछ फर्क नहीं पड़ता है कि वो भोग रहे हैं कि नहीं

00:55:55:10 क्योंकि ना वो भोगता है ना भोगने वाले है ना कुछ है ना लेकिन मानव अनफॉर्चुनेटली उस साइकिल में फस चुका है है ना तो राम जी को दोष लगी पाप किया उन्होंने उन्होंने भी भोगा उन्होंने भी सब कुछ किया लेकिन वो मुक्त पुरुष है तो हमें उस लेवल पर पहुंचना शास्त्र को हां जी हां जी सॉरी जी आपने यहां पर दो बात कही पहली बात पार्शियलिटी नहीं हो सकती भगवान के साथ दूसरी बात वो मुक्त पुरुष है तो मैं ये कहूंगा क्या कृष्ण मुक्त पुरुष नहीं है नरसिम नरसिम नहीं है वराह नहीं है तो उनको क्यों नहीं कहते राम को क्यों कहते हैं कि विग्रह वान है धर्म का जी मैं इसका उत्तर देना चाहता हूं बहुत बढ़िया नयन जी बहुत बढ़िया चरक जी आपने भी अच्छा बोला जी तो आप नयन जी आप ये मानते हैं कि ब्रह्म हत्या पाप होती है ब्राह्मण हत्या गौ हत्या जी होती है जी तो श्री राम ने राम के रूप में रावण का वध किया और रावण को कहा जाता है कि वो ब्राह्मण थे तो ब्राह्मण हत्या का लगा था और कहा कि जी ईश्वर अगरता है तो उनके ऊपर कोई पाप नहीं लगता।

00:57:10:14 एक मिनट एक मिनट मैं एक मैं एक पॉइंट दे दूं। शायद आदित्य जी भी नहीं जानते हैं। इनकी टीम से ही कोई व्यक्ति इस बात का उत्तर पहले ही दे चुका है कि यह जो अभी विषय चल रहा है ना इससे संबंधित उत्तर दे चुका है। मगर संभवत वो भूल गया है कि इस वो जो उसने बात कही थी वो यहां जो इस विषय के संबंध में भी वो बात हो सकती है। वो मैं बाद में बताऊंगा। जो ये बोले तो जी बात कर रहे हैं आदित्य जी और नयन जी इस समय बात कर रहे हैं जी तो जैसे श्री राम को पाप लगा था ब्राह्मण हत्या का और उन्होंने उसका प्रायश्चित भी किया था ऐसा भी हमने शास्त्रों में देखा है तो और तो आप इससे तो सिद्ध हो गया कि श्री राम जी भी उनसे भी अब पाप हुआ था ब्राह्मण हत्या की थी दूसरा उनको भगवान क्यों मानना चाहिए उनको पाप क्यों नहीं मानना चाहिए क्योंकि उन्होंने जो कर्म किया ब्राह्मण को मारने कहा वो धर्म की रक्षा के लिए गया। इसीलिए राम को रामो विग्रहान धर्मा कहा जाता है। क्योंकि धर्म की रक्षा करने के लिए वह आते से पाप हुआ वो वो भी सही है। लेकिन वो क्यों किया? क्योंकि उन्होंने धर्म की रक्षा करनी थी। इसलिए वो पूजनीय है। तो ये मेरा उत्तर है। मतलब ईश्वर को भी कर्म का फल मिलता है। मेरा प्रश्न रहेगा कि

00:58:26:04 तो जो अच्छा जो अकर्ता है उसको कर्म का फल कैसे मिल गया? ये जरा समझाइए। परमार्थ की दृष्टि से यह सवाल पूछ रहे हैं। आपने अभी की दृष्टि से पूछा था रावण के प्रश्न का भगवान जैसे आपने कहा था राम जी ने तो क्या रावण का शरीर जो था जन ब्राह्मण इस प्रकार से व्यवहारिक दृष्टि से उसने प्रायश्चित किया उसका अर्थ ये थोड़ी हो जाता है कि रावण को जो उन्होंने वध किया वो गलत किया है। रावण के वध के लिए आप कैसे ठहरा रहे हैं कि उन्होंने जो है हमने यह नहीं कहा कि गलत किया है। हमने यह कहा कि उनसे जो रावण का शरीर था वो ब्राह्मण शरीर था और उसका वध करने के लिए उनको पाप लगा जिसका प्रायश्चित भी उन्होंने किया। अच्छा हमने ये नहीं कहा कि गलत किया। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए ब्राह्मण रावण का वध किया तो उन्होंने सही किया। गलत थोड़ी किया। तो ईश्वर अकर्ता है। उसको कर्म का फल कैसे मिल गया? ये बताइए। की दृष्टि सेवा ईश्वर जब मानव रूप में है इस संसार में है तो कर्म तो करेगा और शरीर को कर्म के जो भी कर्म के जो फल है पाप हो या पुण्य हो वो लगेंगे ही

00:59:41:08 यानी कुछ क्षणों के लिए ही सही ईश्वर पापी भी कहलाएगा ईश्वर नहीं कहलाएगा वो भैया यहां पे कहलाएगा हमारे दृष्टि से परमार्थ की दृष्टि से दृष्टि से हम राम को कुछ देर अगर ईश्वर को आप जिस अंश में ईश्वर को कर्ता मान रहे हो और करने वाला भी वही है और उनके साथ ही हो रहा है। जिस अंश में आप यह मान लेते हैं ना तो फिर पाप का सवाल ही नहीं रहता। पापी हो सकते हैं ना राम हम कह सकते हैं ना राम भी पापी थे। कुछ घंटों के लिए ही सही हमारी दृष्टि से हां हमारी दृष्टि से कह सकते हैं। क्या बात है? अच्छी बात [हंसी] शिवशी वही वो पाप उनको तो उनको तो भोगना भी पड़ा था ना हम बताइए कृष्ण भगवान वो तो सभी भोगते हैं जो पाप करता है मतलब वो भी कर्म बंधन के अंदर है हम बड़ी खिचड़ी हो गई यहां पर व्यवहार परमार्थ परमार्थिक दृष्टि से ऐसा नहीं हो रहा हमारी दृष्टि से ऐसा हो रहा है अच्छा अच्छा एक बात बताइए राम जी ने जो पाप किया था उसके लिए उनको फल भोगना पड़ा ना जी ठीक है तो मनुष्य बनकर आए थे उसके बाद उनका पुनर्जन्म नहीं हुआ

01:00:55:13 हुआ बहुत बार हुआ अनेक बार हो चुका है उनका जन्म पुनर्जन्म एक चीज और बच रही है जो इन्होंने कही है नयन जी ने कि अ यदि श्री राम ने भी ऐसे कर कार्य किए जो धर्म से धर्म की सीमा के बाहर थे। फिर भी उन्हें और श्री कृष्ण ने भी किए। तो फिर ऐसा क्यों है कि श्री राम जी को रामो विग्रहवान धर्मा कहा गया मगर कृष्ण के लिए नहीं कहा गया। ये क्यों है? भैया इसका प्रश्न ये है राम जी को हम ईश्वर के रूप में मानते हैं। नाम तो उनका अलग-अलग है बट ईश्वर ऐसा नहीं बोल सकते कि नरसिंह जी धर्म के विग्रह नहीं है वो भी है शिव जी वे सभी जो हम पंच देवों को मानते हैं को ले लीजिए वो भी धर्म के विग्रह है बुद्ध भी है बुद्ध बुद्ध का आईडिया नहीं है उनके बारे में उनको पता नहीं पांच का बता सकते हैं आपको कौन है इनकी साइड जो देगा आंसर जितना आपसे सीखा है उतना बता सकते होगी उसको क्षमा करिएगा जी आशुतोष जी बताएं भैया जय श्री राम नारायण सभी को जय श्री राम भैया पूज्य गुरुदेव से

01:02:10:19 सुना है और आपके भी द्वारा कई बार सीखा है साकी ब्रह्मसूत्र में एक बात आई है भैया शास्त्र योनित्वाच हम इसका अर्थ ये है कि हमको भगवान मानना किसको चाहिए ये हम तय कैसे करेंगे अपने मनमुखी तरीके से तय करेंगे या किस तरीके से तो इसका अर्थ यही है कि शास्त्रों की सीमा के द्वारा बताए गए जो ईश्वर होंगे जो लक्षण होंगे हम ईश्वर उनहीं को मानेंगे ना कि जो शास्त्र के सीमा के बाहर जाकर के कार्य करेंगे उनको हम ईश्वर मानेंगे। जैसे कि बुद्ध भगवान जो है वो शास्त्र की सीमा के विरोध पर ईश्वर बनते हैं तो वो भगवान है भी फिर भी हम उनको भगवान नहीं मानेंगे। और श्री राम इत्यादि जो है उनके लिए वर्णन आया है। वो शास्त्र वहां पर हिंदी में क्या लिखा है जो आपने बोला है? जी भैया ब्रह्म सूत्र में हिंदी में क्या लिखा है? मैंने पढ़ा तो नहीं है। गुरुदेव के श्री मुख से सुना हुआ है। ऐसा है ऐसा है इसका अर्थ हम यही ले सकते हैं जी कि शास्त्र ने जिस पर ठप्पा लगा दिया मोहर लगा दी कि ये भगवान का स्वरूप है। भगवान का अवतार है। जी हमें

01:03:25:20 उसी को भगवान का अवतार मानना पड़ेगा। यह नहीं वहां पर दृष्टि रख सकते कि वो शास्त्र की सीमा में रह के कार्य कर रहा है या फिर शास्त्र की सीमा के बाहर जा रहा है। है ना? भैया क्योंकि वह मानव कल्याण के लिए शास्त्र ईश्वर बहुत सारे कार्य ऐसे करते हैं जो शास्त्र की सीमा से बाहर है क्योंकि शास्त्र में वर्णित नियम हमारे लिए है ईश्वर के लिए नहीं है तो शास्त्र जिस पर आपका पहला जो वो है ना पंक्ति वो सही है। शास्त्र जिस पर मोहर लगा देंगे वो ईश्वर है। है ना? उसको ईश्वर के रूप में स्वीकार करना है। पूजनीय जी सम्माननीय अच्छा एक प्रश्न है मेरा आप आशुतोष जी अब आप अपनी बात पूरी कर लीजिए। जी तो यही यही कह रहे थे कि बुद्ध भगवान को हम ईश्वर इसी वजह से नहीं मान सकते हैं कि वो शास्त्रों का विरोध करते थे। शास्त्र प्रमाणित कार्य नहीं करते थे। दूसरी बात जो ये श्री राम का जो बात हो रहा है देखिए यहां पे जो मैंने एग्जांपल दिया है ना वो यहीं पे ऐसे हो जाता है कि जैसे हम मान नहीं सकते हैं और शास्त्रों की सीमा के बाहर कार्य करते थे तो इस तरीके के कार्य तो कृष्ण जी के भी सिद्ध हो रहे हैं मगर हम उनको तो पूजनीय मान रहे हैं वैदिक मान रहे हैं भैया एक और प्रश्न मैं कर सकूं

01:04:41:25 बुद्ध को हमने ईश्वर माना है ईश्वर का अवतार माना है हमने बुद्ध को कहां लिखा ईश्वर का अवतार नहीं माना पूजनीय वो अनुगम अनुकरणीय नहीं माना अनुकरणीय अनुकरणीय हां ईश्वर तो माना है तो वही बात आ गई वही बात आ गई कि ईश्वर होते हुए भी वो अनुकरणीय नहीं होंगे हां अनुकरणीय तो बहुत सारे नहीं है ब्रह्मा जी नहीं है अनुकरणीय अनुकरणीय शिव जी नहीं है विष्णु भगवान राम को छोड़ के सारे रूप अनुकरणीय नहीं है अनुसरणीय है और अनुसरणीय बुद्ध भी नहीं है बुद्ध अनुसरणीय भी नहीं है अनुकरणीय भी नहीं है बुद्ध तो केवल ईश्वर का अवतार है। भगवत कार्य की पूर्ति के लिए जो उन्होंने लिया मगर ना अनुसरणीय है ना अनुकरणीय है। है ना? जी ठीक है। तो अच्छा आशुतोष भैया को एक प्रश्न है मेरा। नयन जी अभी एक बात हुई थी ना भैया अब हम लोगों की तरफ से एक सवाल करने दो। एक मिनट विश्वजीत जी एक मिनट जी अभी एक बात हुई थी ना जब आपने क्लपिंग भी की थी जब कुछ कुछ कुछ घंटों के लिए राम जी को पापी माना था ऐसा कुछ था क्या बात थी वो यही था कि कुछ क्षण के लिए वो पापी

01:05:56:28 थे सिद्ध हो जाते हैं हां ठीक है विश्वजीत जी भैया अब आप लोग मतलब सवाल तो पूछ लिए खंडन के लिए तो अब ये बताइए ऐसा कौन सा कार्य है जो ईश्वर नहीं कर सकते। ठीक है हम बताएंगे। अभी ये चैप्टर क्लोज हो जाए जरा जो पाप वाला चल रहा है। सरस जी बताएं। शिवश जी मैं कह रही हूं कि हम थोड़ा मिक्स कर दे रहे हैं। पाप, पुण्य, धर्म है ना तीनों को बहुत हम मिक्स कर दे रहे हैं। पाप पुण्य जीव की दृष्टि से है। धर्म तभी पिक्चर में आता है ना पाप ना पुण्य जो सही मतलब सही कह कहना भी मतलब मेरा बस एक्सप्लेनेशन का एक हेल्पिंग वर्ड है। लेकिन उस वक्त जो मतलब वो वो करना पड़ता है। उनके लिए सही पाप पुण्य नहीं लागू होता है। धर्म की स्थापना जैसे श्री कृष्ण ने अर्जुन को पूरी तरीके से तैयार कर दिया कि युद्ध करो। है ना? अब हम पाप पुण्य की बात करें तो मैदान में कितने लोग मरे, कितने लोग लड़े, कितना कुछ हो गया उधर है ना? अब राम जी को भी घर से जाना पड़ा क्योंकि वहां राम जी बैठकर बोल सकते थे आप मेरे साथ पाप कर रहे हो। मेरे को निकाल दे रहे हो। नहीं बोला उन्होंने उन्होंने क्या किया? धर्म कि मतलब नहीं पुत्र होने का धर्म है

01:07:12:00 ना। उन्होंने वो निभाया। तो हमें पाप पुण्य धर्म इन तीनों का डेफिनेशन पहले क्लियर करना पड़ेगा। फिर हम उसके हिसाब से हम डिस्कशन को आगे बढ़ा सकते हैं क्योंकि हां रावण रावण के भी बहुत सारे अवगुण गिनाए जाते हैं लेकिन रावण के बहुत सारे गुण भी है उन्होंने बहुत कुछ लिखा बहुत कुछ यू नो वर्णन किया बहुत शिव के बहुत बड़े भक्त थे सारा सब कुछ था ठीक है पाप पुण्य तो हमारे दृष्टि से अब बात आती है मानव कल्याण हमारा उद्धार जीवन का अल्टीमेट डेस्टिनेशन गोल क्या है मोक्ष है मोक्ष प्राप्ति के लिए क्या सब कुछ लागू होता है नहीं लागू होता है क्योंकि धर्म पाप पुण्य पाप पुण्य यह करोगे तो यह मिलेगा यह नहीं करोगे तो यह नहीं मिलेगा हम इसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं लेकिन मोक्ष इनके परे है ना हम इसको हम फिर ग्रो करके इसको एक अलग ज्ञान की दृष्टि से देखते हैं जो कि कृष्ण जी एग्जैक्टली वही ज्ञान अर्जुन को दिया तो हमें यह सब क्लियर करना पड़ेगा कि यू नो उन्होंने यह किया तो यह क्यों नहीं किया क्या वो पापी है क्या वो पुण्य कर रहे हैं या क्या कर रहे वहां पर धर्म की धर्म पिक्चर में आता है। तो यह मैं बस कहना चाह रही थी। ठीक है। अभी मैं ये राम जी वाली जो बात उठी है उसको

01:08:27:03 एक्सप्लेन कर दूं। और देखिए सबसे पहली बात है कि श्री राम ने जो बाली का वध किया था वह शास्त्र की सीमा के बाहर नहीं है। इसलिए उसे पाप नहीं कहा जाएगा। मनुस्मृति में लिखा हुआ है कि जिस असत्य से जिस असत्य से किसी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र की मृत्यु हो रही हो। जिस सत्य से यदि आपके सच बोलने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र की अब यहां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कौन है? जो अपने कर्म का पालन करता है उसकी बात हो रही है। ऐसा नहीं कि किसी भी दोषी की नहीं निर्दोष की जो एक सदाचारी व्यक्ति है उसकी यदि मृत्यु हो रही है तो वहां पर असत्य बोलना ही धर्म है। वहां पर असत्य आपका सत्य हो जाता है। यह शास्त्र की सीमा ये शूद्रों पे भी लागू होगा। हां शूद्रों पर भी लागू होगा। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र चारों में से कोई भी अगर मृत्यु होने वाली है और उसकी मृत्यु को बचाया जा सकता है असत्य बोलकर तो वहां पर आपका असत्य सत्य बन जाएगा और सत्य आपका असत्य बन जाएगा। यह शास्त्र का नियम।

01:09:42:16 क्षत्रियों के अनुसार पशुओं का आखेट करने का अधिकार क्षत्रियों को शास्त्र से प्राप्त है। ठीक है? भैया तो ब्राह्मण तो बहुत सारे आज के आज के टाइम में देखा जाए तो किसी ने अगर कुछ गलत किया हो उसको बचाने के लिए हम झूठ बोल दे तो क्या वो धर्म होगा या अधर्म होगा क्योंकि मैं तो ब्राह्मण का रक्षा कर रहा हूं मतलब असत्य बोल के उसको ब्राह्मण अगर ब्राह्मण अगर वो दोषी नहीं है उसकी हत्या हो रही है यहां मैं उदाहरण दे दूं जैसे कि मान लीजिए कोई ब्राह्मण है उसको मारने के लिए कोई अधर्मी आया है कि मैं इस ब्राह्मण की जान ले लूंगा और आप संयोग से वहीं पर पहुंच गए। ब्राह्मण छुप गया आपके सामने कहीं पर गुफाओं के अंदर या अपने घर के अंदर या कहीं पर भी जहां पर वो जो मारने आया है आक्रांता वो नहीं पहुंच पा रहा है। हां तो उसको जैसे असत्य बोल देंगे कि मुझको पता नहीं कि वो कहां छुपे हैं। तो उसको वहां पर आपका असत्य बोलना ही सत्य है। वहां पर वही धर्म है। ठीक है? और अगर दोषी हो तो दोषी हो तो फिर क्यों बचाओगे उसे? ठीक है भैया। ठीक है।

01:10:58:07 कर्म नहीं है ना उसके तो आप बचाओगे तो आपको पर ही दोष लगेगा। तो शिवश जी वही वही ना जैसे आपने अभी कहा कि सत्य असत्य हो जाता है असत्य असत्य हो जाता है तो वही वो पाप पुण्य के बीच में वो धर्म का मेन पिक्चर ही वही है कि कि ये सब उन पे नहीं लागू होता है जो उस वक्त जैसे क्षत्रिय धर्म ब्राह्मण क्वेश्चन ये आ जाएगा सरसद जी कि उन पर लागू नहीं होता है फिर उनको क्यों धर्म के पैरामीटर से आप नाप के लोगों को बता रहे हैं कि यह राम विग्रह धर्म फिर आप मत बताइए आप कहिए कि ये धर्म से बाहर की चीजें हैं ईश्वर आप धर्म में मत लाइए ना उन्हें किसी और को एग्जांपल बनाइए मगर हम तो कहते हैं कि हमारे आदर्श है श्री राम फिर धर्म धर्म के वो है ना वो है मतलब आइडल है ना तो धर्म के आइडल है तो वो धर्म में आ गए ना धर्म का पालन अथवा ना करने वाले पालन करने वाले अथवा ना करने वाले हो गए ना फिर वो फिर उनको उस दृष्टि में नहीं रखा जा सकता कि वो जो ब्रह्म वाली दृष्टि है सब कुछ करते हुए भी मैं करता हूं फिर तो वहां चेक किया जाएगा कि उन्होंने पाप किया कि नहीं क्योंकि उनको धर्म के पैरामीटर पर नापा जा रहा है।

01:12:07:01 मतलब कहने का यह है कि हम जो यह कहते हैं कि हमें राम को फॉलो करना है। श्री राम को हमें फॉलो करना है। तो जब हम यह कहते हैं तो हम उन्हें देखेंगे ना कि उन्होंने क्या किया और क्या नहीं किया। तो वो जो यह वाली बात है कि उनको इस द सृष्टि से नहीं देखना चाहिए। धर्म अथवा अधर्म पाप अथवा पुण्य। तो वो वाली बात मैं धर्म नहीं कह रही हूं। मैं कह रही हूं कि पाप पुण्य अलग है। वो हो चुका है। उन्होंने भी भोगा है। उन्होंने भी उनका भरपाई का मैं उन सारी बातों की बात बोल दे रहा हूं कि उन्होंने भोगा या नहीं भोगा। तो अब बात आती है कि अ पहली बात तो यह ना बाली को मार के उन्होंने कोई पाप किया। उन्होंने शास्त्र की सीमा में किया और ना ही उन्होंने जो है दूसरा कोई प्रकरण था क्या? नहीं था। रावण रावण रावण हां रावण को मार के भी कोई पाप नहीं किया। क्यों नहीं किया? क्योंकि शास्त्र ही यह बताते हैं कि व्यष्टि और समष्टि का धर्म होता है। एक धर्म होता है व्यष्टि और एक होता है समष्टि। आत्म कल्याण के लिए की जाने वाली सारी चीजें जो डायरेक्ट आत्म कल्याण के लिए हैं। वो सब हमारे व्यक्तिगत उत्थान के लिए है।

01:13:22:19 और एक हो जाता है समष्टि। उसमें मुझे मीनिंग में थोड़ा कहीं पर फर्क हो सकता है। समष्टि यानी जो आप समाज के हित के लिए जब समष्टि वाला जो आपका कर्तव्य है वह व्यष्टि वाले कर्तव्य पर हावी हो तो वहां पर व्यष्टि को नहीं चुनते हैं। वहां पर समष्टि को चुनते हैं। वही आपके लिए आत्म कल्याणकारी हो जाता है। तो क्योंकि एक ब्राह्मण की हत्या करना जो है आत्म कल्याण में बाधक है। ठीक है। परंतु एक दुराचारी राक्षस प्रवृत्ति वाले किसी एंटिटी की एंटिटी का वध करना वो समष्टि के लिए हितकारक था। इसलिए उन्होंने अपनी चीज को छोड़ के अपने आत्म कल्याण वाली बात को छोड़ के और जो है उसको चुना। तो यहां पर भी उन्हें पापी नहीं कहा जाएगा। और रही बात यह वाली कि उन्होंने दूसरा जन्म लेकर के जो उन्होंने वह भोगा यह जो कहा जा रहा है तो हम यहां पर जो देख रहे हैं ना जो यह धर्म और अधर्म का निर्णय कर रहे हैं वो किस किस दृष्टि से कर रहे हैं धर्म और अधर्म का निर्णय किस दृष्टि

01:14:37:20 से होगा व्यवहारिक दृष्टि से व्यवहारिक दृष्टि से तो आपको यह व्यवहारिक दृष्टि से ज्ञात हुआ है क्या कि राम जी ने फल को भोगा दृष्टि से प्राप्त हुआ है क्या? नहीं राम जी ने दूसरा जन्म जो लिया वो आपको दिव्य दृष्टि से प्राप्त हुआ है कि दूसरा जन्म कृष्ण के रूप में लेकर के उन्होंने फल को भोगा। मगर व्यवहारिक दृष्टि से राम जी ने उसको फल को नहीं भोगा। मतलब जो आप फल भोगने मेरे को पूरा कर लेने दीजिए। श्री राम पर बात आई है ना तो मुझे पूरा कर लेने दीजिए। तो कहने का अर्थ यह है कि

01:15:20:12 श्री राम जी ने जो आपके हिसाब से वह पापी थे या अधर्मी थे है ना तो उसको पु उसकी पुष्टि के लिए आप यह कह रहे हैं कि उन्होंने फल को भोगा था। जो फल को भोगना है वह आपको शास्त्र के वचनों से प्राप्त है। जो फल को भोगना है वह आपको मनुष्य दृष्टि से प्राप्त नहीं है। दिव्य दृष्टि से प्राप्त है। जिन्होंने दो सारे युग देखे उन्होंने बताया किसी मनुष्य ने नहीं लिख दिया कि राम ही कृष्ण बन के जन्मे। समझ रहे हैं? है ना? कोई आकाशवाणी ये आकाशवाणी या दिव्य दृष्टि आध्या जो हमारा शास्त्रीय पक्ष है आध्यात्मिक दृष्टि से उससे आपको बताया गया। तो आप उसके द्वारा यहां पर आप पुष्टि नहीं कर सकते। तो मनुष्य को धर्म के रूप में क्या मिला कि हां व्यष्टि को पीछे किया गया और समष्टि को आगे किया गया तो भगवान ने जो है क्या किया? पुण्य किया पाप नहीं किया राम के रूप में। अब यहां पर एक बात आ जाती है जहां से ये प्रश्न उठा था। वो बात क्या थी? प्रश्न उठा ऐसे था कि क्या श्री राम के रूप में आकर के भगवान अधर्म कर सकते हैं? क्या श्री राम के रूप में भगवान अधर्म कर सकते हैं? मतलब राम जी क्या अधर्म कर

01:16:35:15 सकते हैं? यह प्रश्न पुट अप किया गया था। तो आपने मान लिया था कि हां वो कर सकते हैं और फिर आपने राम को पापी पापी मतलब पापी के सम पक्ष में उनसे क्या-क्या पाप हुए उस पक्ष में आपने वह दे दिए और जो है अधर्म वाली बातें भी मान ली। इसीलिए यह डिबेट मतलब सेशन जरूरी है। इससे क्या आता है कि हमारी जो माइनर माइनर चीजें हैं ना जो कहीं पर बची हुई है वो क्लियर होती हैं इससे क्योंकि जब तक विरोध नहीं होगा तब तक हम लोग उस तरह से खुल के सामना नहीं आएंगे। वो मन में ही रह जाएंगी बातें। जैसे आज आपने ये चीजें बोली शायद ही आपने आज से पहले बोली हो श्री राम जी के लिए विश्वजीत जी आपसे कह रहा हूं। जी भैया नहीं बोली होंगी ना? पर आज आपको बोलना पड़ गया अपने पक्ष को बचाने के लिए। सर्वशक्तिमत्ता को बचाने के लिए हां तो तो श्री राम का अर्थ हां आशुतोष जी आप सही कह रहे हैं श्री राम तो यहां पर क्या होता है आपको यह समझना होगा कि श्री राम के रूप में आकर के भी भगवान ऐसी चीजें कर सकते हैं जो शास्त्र की सीमा में ना आए। ठीक है? मगर हम उन्हें श्री राम

01:17:50:19 का रूप नहीं मानेंगे। अब इसका मैं उत्तर दे रहा हूं आपको कैसे? जैसे कि मान लीजिए हम सबके जानकारी में हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी थे। ठीक है? अब अभी आकाश से कोई हनुमान जी के रूप में उतरे गधा लेकर के। ठीक। और वो जो है विवाह कर ले आपके समक्ष स्त्री संग कर ले। तो क्या आप मानेंगे कि वो हनुमान जी हैं। वो उड़ के दिखा दे। वो अपना सारा परिचय दे दे। सब कर दें। मगर यदि उन्होंने यह कर दिया कि उन्होंने विवाह कर लिया तो आप यह नहीं मानेंगे कि वाल्मीकि रामायण वाले वो हैं। वानर बिल्कुल मानेंगे नहीं मानेंगे। नहीं मानेंगे। और भैया इसका अर्थ क्या है कि ईश्वर तो सब कुछ कर सकता है। वो हमारी प्रॉब्लम है कि हम उन्हें जब वो राम के रूप में जब वो शास्त्र की सीमा से बाहर जा रहे हैं तो हम उन्हें मान नहीं रहे कि नहीं ये राम ही है। हम उनको कुछ और मान ले रहे हैं। जैसे कि ईश्वर ने तो कृष्ण के रूप में आकर के शास्त्र की सीमा से कई बार लीला पूर्वक बाहर गए। मगर हमने फिर क्या मान लिया कि हां भैया यह जो है कृष्ण है। ठीक है? और और मैं बताऊं आपको कि हनुमान जी

01:19:06:02 अ बाल ब्रह्मचारी हैं। मगर जब भगवान श्री कृष्ण अपना विराट स्वरूप दिखाते हैं जो इस समय आपकी उसमें डीपी में भी दिख रहा है मुझे तो उस समय उनका एक मुख हनुमान जी का भी होता है कि नहीं होता है? जी भैया। होता है। इसका मतलब कृष्ण यह कह रहे हैं कि हनुमान भी मैं ही हूं। यही कह रहे हैं ना तो कृष्ण के रूप में तो उन्होंने क्या कहते हैं विवाह भी किया तो इसका अर्थ ये हुआ कि भगवान राम के रूप में आकर के भी शास्त्रों की सीमा के परे जाकर के आपको व्यवहारिक रूप से दिखा देंगे मगर आप उन्हें राम नहीं मानोगे क्योंकि शास्त्र ने कहा है कि राम कौन है? रामो विग्रह वान धर्म इसलिए ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को बचाने के लिए हमें श्री राम को अधर्मी कहने की आवश्यकता नहीं है। ठीक है? तो भैया शिव जी को ऐसा नहीं कह सकते शिव विग्रवा धर्म क्योंकि भगवान मेरी मेरी जानकारी में शास्त्र की दृष्टि में आया नहीं है। बात यह है कि धर्म विषय क्या है? पहले तो आप यह समझिए धर्म विषय क्या है? धर्म विषय द्वैत का है। धर्म विषय व्यवहार का है। धर्म की आवश्यकता कहां पर है आपको? व्यवहार में कि परमार्थ में? व्यवहार

01:20:21:13 में। हां। तो धर्म विषय व्यवहार का है। तो क्या कहते हैं? जब धर्म व्यवहार का विषय है तो शिव जी के जो कार्य है वो पारमार्थिक भी है, आध प्रातिभाषिक भी हैं और व्यवहारिक भी है। तीनों तरह के कार्य हैं शिव जी के। तो इसलिए उनको सीधेसीधे क्योंकि उनके क्या कहते हैं व्यवहारिक दृष्टि से बाहर के भी उनके कार्य रहे मतलब शिव मतलब हम राम जी को इसीलिए बोलते हैं क्योंकि वो सिर्फ मानव के कल्याण के लिए उन्होंने जो भी बताया परिकुलर राम रूप में उन्होंने धर्म का उल्लंघन धर्म की सीमा के बाहर या शास्त्र की सीमा के बाहर वो नहीं गए इसलिए राम विग्रह धर्म का वास्तविकता तो यह है कि शिव जी ही तो राम जी के रूप में कर रहे हैं। धर्म की स्थापना समझ रहे हैं? मगर क्योंकि शिव सृष्टि की रचना भी कर रहे हैं। शिव तो बिना विवाह के जो है सृष्टि उत्पन्न कर दे रहे हैं। तो इसलिए उनका पारमार्थिक दृष्टि से भी स्वरूप है। प्रातिभाषिक दृष्टि से भी स्वरूप है और व्यवहारिक दृष्टि से भी स्वरूप है। तो इसलिए उनको डायरेक्टली शिव नाम से शिव शिव विग्रह

01:21:36:24 धर्मा ऐसी पंक्ति मैंने अभी तक नहीं पढ़ी है। तो वो हमारे लिए पूजनीय है। सम्मान नहीं है क्योंकि वह ईश्वरीय स्वरूप में हमको प्राप्त हो रहे हैं और श्री राम ईश्वरीय स्वरूप में होते हुए भी मानवीय रूप में सभी समस्त धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने वाले हमको उदाहरण के रूप में प्राप्त हुए जिस जिनको हम आदर्श मानकर उनका अनुगमन अनुसरण अनुकरण सब कुछ कर सकते हैं। ठीक है जी जब हम कह रहे हैं कि रामो विग्रह धर्म तो वहां पर शिव शिव के लिए ही तो कह रहे हैं तो वहां शिव का अपमान कैसे हो गया है ना मगर राम रूप के लिए इसलिए कहा जाएगा क्योंकि व्यवहार की दृष्टि से राम ये हैं शिव ये है तो इस तरह से वहां पर राम के लिए पर्टिकुलरली ये लाइन आएगी तो अब मैं दोबारा से अपनी बात को पूरा कर दूं कि ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को सिद्ध करने के लिए हमें अह श्री राम को अधर्मी या पापी कहने की आवश्यकता नहीं है। इतना तो आप लोगों को समझ में आई मतलब अह क्लियर हुआ होगा। जी है ना? और ये जो मैंने कहा था ना कि आप आप में से किसी ने इसके संबंध में बात

01:22:51:27 कही है जो इसका उत्तर है तो वो आपने ही दिया था वो उत्तर। ईश्वर तो सब जगह है मगर हम ईश्वर उसी को मानते हैं जो शास्त्र के अनुसार जिसको कहा गया होता है ये ईश्वर है तो हम मानेंगे हां ये ईश्वर है तो यह उत्तर तो आपने कहा था कि अद्वैत की दृष्टि से हो गया तो राम जी किसी और रूप में कोई पाप कर सकते हैं जैसे आपने कहा वो राम के रूप में नहीं कर सकते हैं या अद्वैत की दृष्टि से हो गया लेकिन नयन जी का जो प्रश्न था वो ये था कि राम के ही रूप में क्योंकि रामो विग्रहान धर्म तो वो उसी रूप में कोई पाप कर सकते हैं तो इसका आंसर आपका वाला ही था ना कि हां कर सकते हैं। मगर तब हम उसे शास्त्र की क्योंकि शास्त्र में नहीं कहा गया कि राम ऐसा करते थे तो हम नहीं मानेंगे कि राम है। हम मानेंगे कि कोई बैरुपिया है। जैसे कि सीता माता के पास रावण जब सर काट के ले गए। है ना? श्री राम का सर काट के ले गया था रावण। तो क्योंकि सीता माता को राम जी की यह मर्यादा पता थी कि उनको कोई वध नहीं कर सकता। ठीक है? जी। पता थी ना? तो इसलिए सीता माता ने उस कटे हुए सर को राम जी का नहीं माना। राम जी वाला मुख होते हुए भी नहीं माना। ठीक है? तो यहां पे जो सवाल

01:24:06:28 आता है कि राम जी मतलब भैरोपिया मान लेंगे बट जो प्रश्न वहां पे यही रहा ना कि कर सकते हैं अपनी इच्छा से कि नहीं? राम जी कर तो रहे हैं ना। कर तो रहे हैं ना। ये आपकी प्रॉब्लम है कि आप मान रहे हैं। अच्छा हां समझ गए। मतलब कर रहे हैं बट हम उस उस मतलब उस सीन को मतलब भगवान का नहीं मानेंगे। हां हम लोग नहीं मानेंगे। नहीं नहीं भगवान नहीं है। हां हां कर तो रहे हैं जिसको शास्त्र जिसको प्रमाणित नहीं करेंगे उसको हम नहीं मानेंगे। हां हम लोग उसे राम नहीं कहेंगे। बस इतनी सी बात है तो भैया वो जो पहले बात चल रही थी कि शास्त्रों के परे भी अगर ईश्वर रहता है उस जगह पर मैं एक बात कहूं इसमें यही उत्तर रहेगा कि शास्त्र के ही परिधि में वो कुछ करेगा तो ही ईश्वर अनुकरणीय रहेगा एक बात है जी वो शास्त्र में तो राम जी का जितना वर्णन आया है रामायण में हम तो उतने कहानियों को जानते हैं परंतु ऐसा तो हो सकता है ना मतलब राम जी तो 11000 वर्ष तो शासन किए थे सभी का तो विवरण नहीं हर दिन वो क्या किए थे तो कुछ ना कुछ पाप ऐसा हो भी सकता है जो उसका वर्णन नहीं है शास्त्र में परंतु किए थे मगर शास्त्र ने जब उनको धर्मकार स्वरूप कह दिया तो हम ये क्यों मानेंगे उन्होंने उल्लंघन किया होगा भैया

01:25:22:09 मैं बोलू इस पे राम जी का जो परिचय है वो हमको शास्त्र ही उससे प्राप्त होता है ना और कहीं से तो प्राप्त होता नहीं है इसलिए जितना शास्त्र में उतना ही मानना पड़ेगा हर रोज का दिनचर्या क्या था उससे क्या मतलब मानव कल्याण के लिए जो जितना आशुतोष जी वाली बात को मैं और क्लियर कर दूं कि जब राम को हम जानते ही शास्त्र से हैं तो हम यह नहीं कह सकते हो शास्त्र में नहीं बताया होगा उन्होंने अधर्म भी किया हो राम राम के लिए शास्त्र ने यह कह दिया कि वह विग्रहवान धर्म थे तो हमें फिर यह मानना पड़ेगा कि उन्होंने कभी भी कुछ भी ऐसा नहीं किया जो धर्म की सीमा के बाहर हो तो आज कितनी अच्छी चीज क्लियर हुई है ना हां सर जी बताइए और भैया वो मेरा एक प्रश्न मेरा एक प्रश्न एक मिनट एक मिनट सरस जी बताएं हां शिवश जी शास्त्र एक हेल्पिंग हैंड है हम हम उसको जानने के लिए हम उसी को लेके उसको जानने की उसकी परे जानने की कोशिश कर रहे हैं ठीक है जो वो कहते हैं आंखें बंद करके मानो ये शास्त्र खुद मना करता है ठीक है तो वो जो कह रहे हैं राम जी आते हैं जाते हैं जो भी करते और

01:26:37:13 वैसे भी शिवश जी हमने राम जी को अधर्मी नहीं कहा है। हम पाप और पुण्य की डेफिनेशन में उनको लाना पड़ा। ठीक है? खैर तो हां तो लेकिन खैर हम ये कह रहे हैं कि शास्त्र एक हेल्पिंग हैंड है। हम आंखें बंद के बस शास्त्र कह रहा है। हम हमारा कभी उद्धार नहीं होगा। उद्धार के लिए बोली है क्या? किसी ने बोली है क्या आंख बंद करके और जो है वो वही हो रहा है ना शिव जी मैं क्या कह रही हूं? कि रामो विग्रह जो भी है ना स्टेटमेंट है ठीक है तो वो कह रहे हैं ठीक है एक उपासना हो सकता है कि तुम अपने कल्याण के लिए तुम ही राम हो तुम ही रावण हो तुम ही सीता हो तुम ही शिव हो तुम ही से ब्रह्मांड शुरू होती है तुमसे ही खत्म होती है ठीक है जब वो इस इस रास्ते में चलने लग जाता है ठीक है वो शास्त्र इतना डीप है कि वो डॉट कनेक्ट करते करते करते बात अपनी तरफ ही आ जाती है रिवर्स इंजीनियरिंग करते करते है ना शास्त्र को मैं एक वो बताऊं शास्त्र का उदाहरण दूं तो गुलेल होती है ना गुलेल गुलेल मतलब गुलेल होती है ना वो जो पहले निशाना लगाने के लिए निशाना लगाने के लिए शॉट स्लिंग शॉट कहते हैं उसको स्लिंग शॉट कहते हैं पता नहीं क्या

01:27:52:14 है तो गुलैल में नहीं हम लोग ये कुछ अपना जो क्या होता है उसको गोली या गिट्टी या पत्थर का कंकड़ तो उसको रख के उसको उसमें में रख के उसमें छोड़ते तो शास्त्र उसी तरह की एक गुलैल जैसे हैं जो आपको उस गंतव्य तक पहुंचाते हैं। मगर ऐसा नहीं है कि उस गंतव्य जब आप पहुंचो तो वहां भी शास्त्र आपके हाथ में हो। वो यहां से एक ऐसा धक्का देते हैं आपको जो आपका परमार्थ सिद्ध हो जाए। अब बात यह आती है कि आंख बंद करके विश्वास करने की बात नहीं की जा रही है। वहां तर्क दिया जा रहा है कि राम जी अपने डेली लाइफ में कहीं-कहीं पर कुछ कुछ गल अमर्यादा कर देते थे। ऐसा हम क्या मान नहीं सकते? क्योंकि शास्त्र में तो सब कुछ वर्णित नहीं है तो वर्णित तो यह भी नहीं है कि वह करते थे। तो यह क्यों मान ले कि वह करते थे। इसके संबंध में कहा कि शास्त्र ने यदि शास्त्र ने यदि उनको विग्रहवान धर्म कहा है तो हमें यही मानना होगा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी भी धर्म का उल्लंघन नहीं किया क्योंकि यदि हम शास्त्र पर डाउट करेंगे तो राम जी का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होगा फिर हमें ये हम शास्त्र की किसी बात पर

01:29:07:15 डाउट करने से सबसे पहली दिक्कत ये आ जाती है फिर हम शास्त्र को पूर्णतया मानने वाले सिद्ध नहीं होते हमारे लिए परम प्रमाण नहीं रह जाता है शास्त्र यह नहीं कहा जा रहा है कि उनकी किसी बात को आंख बंद करके मान लो। आपको हर तरह से तर्क दिया जाएगा, संतुष्ट किया जाएगा। मगर हम यह कहे कि हम शास्त्र की इस बात को तो प्रमाण के रूप में मानते हैं कि राम थे। भाई राम थे ये सिद्ध कहां से हुआ? हो सकता है जो राम ने किया वो रावण रावण के नाम से लिखा हो और जो रावण ने किया वो राम के नाम से लिखा हो। जब शास्त्र ये झूठ बोल सकते हैं कि वह विग्रहवान धर्म थे। तो बाकी बातें भी तो झूठ बोल सकते हैं। तो यहां यह कहा जा रहा है कि शास्त्र को अर्ध कुकुट न्याय से मानने वाले आप नहीं हो सकते। पहले आप फिर शास्त्र को मानने वाला ना होने की बात को स्वीकार करिए। फिर हम आपको स्वीकार करवाएंगे कि शास्त्र को क्यों मानना है। उसके बाद फिर आप आइए। ये कहा जा रहा है। जी वही है ना कि शास्त्र तभी मानेंगे जब हम जानेंगे। है ना? नाम को हम सिर्फ नाम रूप से धर्म अधर्म सो एंड सो वर्ड जब तक हम शब्दों से खेलते रहेंगे हम यही घूमते रहेंगे है ना ठीक है लेकिन हम शास्त्र ये भी क्लेम कर रहा है कि वो इस शास्त्र से परे है इस ब्रह्मांड से परे है एक्सट्रा है ना

01:30:22:19 जब तक हम राम को अपने से अलग देखते रहेंगे तब तक हम कभी उद्धार हो ही नहीं सकते राम क्योंकि वो वो भी वो तो एक है ही कि देखिए ऐसा है कि दादा मेरा एक निजी प्रश्न ये जो है थोड़ा सा ये ये बात जो है ना डिफरेंट वे में जा रही है। अभी आज हमें जो ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है के संबंध में बात करनी थी जिसमें पाप की बात चल रही थी वो पाप की बात में बीच में राम जी की बात आई मगर आपने जो बात उठाई है वो मैं एक छोटा सा कुछ कह करके क्लियर कर दूं कि राम जी को परे भी कहा गया है तो वहां पर भगवान के शास्त्रीय वचनों द्वारा भगवान के भगवत स्वरूप होने की बात की जा रही है और जो ये वाली बात है कि जब तक हम राम को अपने से अलग मानेंगे तो अपने से अलग मानना पड़ेगा जब तक हम मुक्त नहीं है। मुक्ति प्राप्त करने के लिए ही अपने से अलग मानना है। मतलब जैसे धरती पर गिरे हुए हैं तो धरती से उठने के लिए ही धरती का सहारा लेना है। इसी प्रकार से क्या कहते हैं? भेद में फंसे हुए हैं तो भेद से निर्भेद तक पहुंचने के लिए ही भेद का सहारा लेना है। तो भेद का सहारा कैसे लेना है? भेद का सहारा ऐसे लेना है कि राम जी वो रहे और मैं यह रहा। तो यह भेद करते हुए

01:31:37:25 ही आप क्योंकि चलिए इस यहां पर हम मान लेंगे कि राम जी जो है हमसे अलग नहीं है। मगर हमारे अभी भी जीवन के 99% अंश ऐसे हैं जिसमें हम बार-बार भले ही थ्योरिकली हम मानते हैं कि सब कुछ एक है। मगर बार-बार हम काम उसी के अनुसार कर रहे हैं कि यह सब कुछ एक नहीं है। तो उस सब कुछ एक नहीं है। 99% वाले अंश में भी यह जानने के लिए कि सब कुछ एक है और उसी के अनुसार आचरण फील करने के लिए हमको यहां पर भी राम जी को भी अपने से अलग मान करके द्वैत भाव रखते हुए उनका अनुगमन अनुसरण पूजा वगैरह करनी होगी जिससे कि हमारा वो 99% वाला भी सुधर जाए तो हम हमारा जो है परमार्थ हमें प्राप्त हो सके। मैं छोटा सा बोल देती हूं शिवश जी वही मैं कह रही हूं कि अलग देखते रहेंगे तो अलग होता रहेगा। कि क्या बोलते हैं विवेक चूड़ामणि में भी शंकराचार्य यही कह रहे हैं शिष्य को कि गुरु कह रहा है कि तुम आज तय कर लो कि तुम ब्रह्म हो आज तुम तय कर लो अभी वो वो शिष्य मुक्त भी नहीं हुआ वो ज्ञान के लिए आया है और उसको बोल दिया कि तुम तय कर लो कि तुम ब्रह्म हो अब इस जर्नी को तुम डॉट्स कनेक्ट करो एक सेकंड एक सेकंड शिवाजी तो जब तत्व मसीह मैं ही राम सब कुछ आता है तो मैं

01:32:53:06 चिंतन करूंगी मैं राम कैसे मैं तो इतनी दुष्ट हूं हूं। मैं तो ऐसे बोलती हूं। मैं तो ऐसे करती हूं। मैं राम कैसे हो सकती हूं? है ना? तो मैं ऐसे डॉट्स कनेक्ट करते करते एक दिन मुझे उसका अनुभूति हो ही जाएगा। उसके अलावा जिस दिन मैं निश्चय कर लूंगी कि मैं राम कैसे? राम मेरे से अलग ये चलता रहेगा। ये नेवर एंडिंग है। जिस दिन मैं सवाल करूंगी। मैं राम कैसे? उस दिन मेरी डेस्टिनेशन के दरवाजे खुल जाएंगे। बिल्कुल आपको जो है जो शंकराचार्य जी ने विवेक चूड़ामणि में कहा है उसको आपको शब्द प्रमाण के रूप में तुरंत स्वीकार कर लेना चाहिए। आपकी थ्योरिकली आपको जान लेना चाहिए कि आप ही राम हो। मगर अभी अभी आपको क्या करना है? व्यवहार करना बाकी है। आपने थ्योरिकली ये जान लिया है कि आप ही राम हो। मगर आपको अभी वह फील नहीं है। नैन चिनती शस्त्राण नैन दति पावक यह आपने जान लिया है कि हां आत्मा को आपको कोई कुछ नहीं कर सकता है। मगर आपको उस जानने को उसमें एक बाधा आ रही है कि आप जो प्रपंच रूपी संसार में फंसे हुए हो आपकी जो ज्ञानेंद्रियां और आपकी जो कर्मेंद्रियां जो प्रकृति से जुड़ी हुई है वह आपको बार-बार मैसेज दे

01:34:08:09 रही है कि आपको कुछ भी हो सकता है। तो आपने थ्योरिकली जब यह जान लिया है कि मुझे कुछ नहीं हो सकता है। अगर आपको प्रकृति से मैसेज आ रहा है कि आपको कुछ भी हो सकता है तो आपको अपने शरीर के द्वारा अपनी वाणी के द्वारा अपनी कर्मेंद्रियों ज्ञानेंद्रियों के द्वारा ऐसा व्यवहार ऐसा आचरण करना है कि आपने जो वो परम सत्य जान लिया है ना नैन छिन्नति शस्त्राणी वाला या तत्व मसीह वाला वो आपको स्वरूप भूत हो जाए। हां एक्सक्टली वही शिव जैसे कि मैं सुनिए मैं जैसे जॉब जॉब मैं उसको पूरा कर दूं पूरा कर दूं। हां जी हां जी वो स्वरूप भूत होने तक की यात्रा में आपको व्यवहार आपको व्यवहार वैसा ही रखना पड़ेगा जो आप इधर फंसे हुए हो वो वाला जैसे कि पृथ्वी गोल है यह सेटेलाइट के द्वारा अपनी किताबों में या अपने टीचर्स की वाणी के द्वारा हमने जान लिया कि पृथ्वी गोल है। हमारे मन में फिट हो गया। तो इस रूप में हम यह जानते हैं कि पृथ्वी गोल है। मगर वास्तविकता में यदि हमको पृथ्वी को गोल फील भी करना है तो हमें एक सेटेलाइट एक स्पेसशिपिप की आवश्यकता है जो हम पृथ्वी की पर्दी से बाहर निकल सके और पृथ्वी को देख सकें। तो उसके लिए हमें सेटेलाइट बनाने की आवश्यकता है। उसके लिए हमें उसमें बैठने की आवश्यकता है।

01:35:23:15 सेटेलाइट बनाने के लिए उसमें बैठने जाने के लिए हमें धरती पर इधर से उधर यात्रा करनी पड़ेगी और उस दौरान यह मानना पड़ेगा, व्यवहार करना पड़ेगा कि पृथ्वी फ्लैट है। है ना? भैया नहीं शिवश जी मैं वही कह रही हूं। आप जो बोल रहे हो जो भी है परमार्थ मुझे नहीं समझ में आता क्योंकि अध्यात्म एक ही कहता है कि अद्वैत वही कह रहा है कि परमार्थ परमार्थ कुछ नहीं है। जैसे कि मैं आपको बताती हूं। ठीक है? दुष्ट काम करना बहुत आसान है। है ना? मुश्किल वही होता है जो धर्म सही करना होता है। जैसे कि मैं मुश्किल घड़ी में हूं। मेरे लिए इजी वे बहुत है। बहुत सारे मैं एक्सक्यूसेस देती हूं। लेकिन ये अवगुण है। ये राक्षस ये रावण के अवगुण है मेरे अंदर। क्योंकि मैं ही राम हूं मैं ही रावण हूं। तो मैं शास्त्र को मैं रेफर करूंगी कि मैं इस सिचुएशन में हूं। मुझे क्या करना चाहिए? शास्त्र तो कह रहा है कि तुम ही राम हो। अगर मैं राम हूं तो मैं इस सिचुएशन में क्या करूं? क्या कर कर सकते हैं राम जी इस सिचुएशन में? तो मैं शास्त्र को रेफर करूंगी। है ना? फिर मैं डॉट्स कनेक्ट करूंगी कि अच्छा लोक व्यवहार में भी राम जी होते हुए मैं इस इस डेस्टिनेशन को कैसे कैसे पहुंच सकती हूं? क्योंकि अल्टीमेटली जीव को मुक्त होना है। जीव ही ढूंढेगा रास्ता। जीव ही शास्त्र रेफर करेगा। जीव ही परमार्थिक व्यवहारिक जो

01:36:38:19 भी है जो भी व्यवहार है वही करेगा। इवेंचुअली सब कुछ वही होगा। तो हमें जब तक हम अपने से अलग देखेंगे भगवान को हमारे लिए दिक्कत होती रहेगी। जब तक हम अपने पर लागू नहीं करेंगे तो शास्त्र को हम अंधे भक्त की तरह जैसे आपने बोला कि हां जानना एक नॉलेज है। रियलाइजेशन होना अलग बात है। क्या मैं राम हूं? इसका रियलाइजेशन नहीं है। शास्त्र कह रहा है बस। ठीक है। मैं बस इसको मान करके चलूं। इससे मेरा कभी उद्धार नहीं होगा। लेकिन मैं वशी भी तो वही कर रही है। वो जानें हां जान रही हूं। करेक्ट शिवशी उपनिषद शास्त्र ये सब कुछ वही वो तो कर चुके हैं स्टेटमेंट। है ना? वो तो कर चुके हैं कि आप ही ब्रह्म हो। आप ही ब्रह्मांड है। एक्सेट्रा वो कर चुके हैं। तो हो गया ना। बात खत्म हो गई। फिर हमें करना क्या है? परमार्थ की दृष्टि से परमार्थ की दृष्टि से आप लेकिन उस को प्राप्त करने के लिए खैर मैं इसको बता रहा हूं कह रही है मैं समझ रहा हूं यहां पे थोड़ा सा गु्थमगु हो रही है बातों की उसकी वजह से थोड़ा कंफ्यूजन है इसको हम रखेंगे अद्वैत और द्वैत पे बात करेंगे कब मानना है कब नहीं मानना है ये अलग चैप्टर है मगर पूरी तरीके

01:37:53:27 से हम अब अभी इसलिए नहीं मान सकते कि आपको अभी के अभी अप्लाई कर देना है कि मैं नहीं रहा हूं क्योंकि अगर यह अद्वैत को अप्लाई कर दें व्यवहार में वैसे मुझे नहीं लगता कि आप कह रही हैं कि व्यवहार में अप्लाई कर दो अद्वैत को मगर अद्वैत को यदि अप्लाई कर देंगे तो कुछ भी करना बाकी नहीं रह जाएगा क्योंकि अद्वैत का अर्थ है जहां पे क्रिया भी नहीं है ज्ञान स्वरूप कोई है ही नहीं स्वयं सिद्ध हो जाएंगे कि मैं ही ब्रह्म हूं तो ये जानकारी है सेल्फ जो आपने कहा ना सेल्फ रियलाइजेशन वो हमें प्राप्त करनी है तो जानकारी होने से लेकर के सेल्फ रियलाइजेशन के बीच की जो यात्रा है उसमें यह जानने वाला होते हुए भी कि सेल्फ रियलाइजेशन में मुझे क्या प्राप्त होगा मैं ही राम हूं यह जानने वाला होते हुए भी आपको राम से अलग रह के ही उनकी पूजा करनी पड़ेगी। शिवश जी अद्वैत वेरी मच एप्लीकेबल होता है। लोक व्यवहार में भी मैं आपको एग्जांपल देती हूं। जैसे सब स्वप्न है। स्वप्न में हम बहुत कुछ कर जाते हैं। हम हम ही सब कुछ बने होते हैं अपने स्वप्न में स्वप्न में। जैसे भगवान ही सब कुछ है। हमारे स्वप्न में मैं ही पानी बनी हूं। मैं ही राक्षस बनी हूं। मैं ही मर रही हूं।

01:39:09:15 कोई और है ही नहीं मेरे स्वप्न में। मेरे ही बहुत रूप है। मेरे ही बहुत नाम है। ठीक है? लेकिन जब मैं उठ जाती हूं तो मुझे रियलाइज होता है कि वो तो स्वप्न था। मैं तो मुक्त मतलब उससे मैं जुड़ी तो नहीं हूं ना। मैं उस चिंता में तो नहीं हूं। तो अद्वैत फिलोसफी लोक व्यवहार में यही करेगा जैसे मेरी आपकी झगड़ा हो गई। ठीक है? लेकिन मैं सोचूंगी शिवश मैं ही हूं। शिवश मैं शिवश हूं। शिवश ही मैं हूं। है ना? वहां पे द्वैत है ही नहीं। मैं लड़ूं किस बात की? शिवश जी से तो मैं उनसे यू नो जो धर्म की बात आती है कि मैं आराम से बात करके आपसे सॉर्ट आउट करने की कोशिश करूंगी। तो मैं ऐसे करती रहूंगी तो मेरे मैं वही कह रहा हूं जो आप कह रही हैं जैसे आप मैं इसको एंडिंग करूंगा क्योंकि यह दूसरा टॉपिक का दूसरा टॉपिक खड़ा है। मैं उसको हैंडिंग करूंगा। मैं बस यह कह रहा हूं कि जिस दिन आप यह समझने लग गए ना क्या कि शिवश मैं ही हूं उस दिन आपको धर्म की आवश्यकता ही नहीं रह गई। आप मुक्त है उस समय। जी भैया। समझ रही है? कह रहे लेकिन मुझे पड़ेगा लोक व्यवहार में अप्लाई होता है। तो व्यवहार कहां से आ गया? जब जब हम जब हम मुक्त हो गए हैं

01:40:24:21 जब हम मुक्त हो गए हैं तो वहां पर पूरी तरीके से अद्वत जो आपने कहा ना लोक व्यवहार में पूरी तरीके से अद्वैत अप्लाइड हो सकता है। पूरी तरीके से नहीं हो सकता है। हां अपनी चीजों को सुधारने के लिए हम लोग थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा उसका सहारा ले सकते हैं। बिल्कुल ले सकते हैं। मगर शंकराचार्य भगवान ने भज गोविंदम भज गोविंदम क्यों किया? एक एक नहीं वो वो भी मानती है भज गोविंदम वो भी मानती है यहां समझने में कंफ्यूजन हो रही है कि हम क्या कह रहे हैं वो क्या कह रही है तो कहने का अर्थ है कि जिस दिन पूरी तरीके से अद्वैत हो जाएगा मामला उस दिन व्यवहार की आवश्यकता ही नहीं रहेगी तो ये पंक्ति जो है ना कि लोक व्यवहार में भी अप्लाई होता है ये पंक्ति आपस में कंट्राडिक्टिंग है व्यवहार है ही नहीं ना अद्वैत है जब किसके साथ व्यवहार और व्यवहार क्रिया भी मैं हूं है ना वह चार 24 भगवत गीता यज्ञ जो हो रहा है उसमें होने वाली क्रिया भी मैं हूं यानी व्यवहार है ही नहीं तो फिर लोक व्यवहार में अद्वैत के आने की वो ही नहीं है। हां ये है कि थोड़ा थोड़ा ये हम उसका सहारा ले सकते हैं। जैसे कि मान लीजिए मैं यह बात अपनी उदाहरण में कई बार कहता हूं कि मैं गाड़ी चला रहा हूं और गाड़ी चलातेचलाते मैंने किसी व्यक्ति को देखा। वो मुझे बिना

01:41:39:25 हाथ दिए बिना इंडिकेटर दिए उसने अपनी गाड़ी हमारे आगे से पूरा रास्ता हमारा काट दिया तो हमें गुस्सा आता है। क्यों आता है कि भाई यार ये देखो ये व्यक्ति कई बार लोग गाली वाली भी देने लगते हैं उसको। मगर जब हम जब हम अद्वैत ये जो भगवान की वाली जो लाइन है कि देखो जब वो जो ज्ञान है चार 35 में कहा कि तू जो तत्वदर्शी से जो तुझे ज्ञान प्राप्त होगा तो तू पहले समस्त संसार को स्वयं में और पीछे मुझ में देखेगा कहा है ना चार 35 तो वो जो ज्ञान है समस्त संसार में खुद को या समस्त संसार को खुद में देखेगा तो क्या होता है जब आपके सामने से बिना हाथ दिए बिना इंडिकेटर दिए जब कोई विश्वजीत जी आप अपना बंद कर लीजिए म्यूट कर लीजिए बिना हाथ दिए बिना इंडिकेटर दिए जब कोई निकल रहा होता है तो वहां पर गुस्सा आने की बजाय यह लगता है यह भी तो राम ही जा रहे हैं यह भी तो राम ही है लीला कर रहे हैं तो वहां गुस्सा गुस्सा आने की बजाय वहां गुस्सा आने की बजाय क्रोध आने की बजाय गाली निकलने की बजाय वहां पर आप जो है अपने व्यवहार को साध पाते हैं। अपनी सात्विकता को बचा पाते हैं। अपने धर्म पथ पर ज्यादा अिकता से टिक पाते हैं।

01:42:54:26 ठीक है? अब हम लोग पाप पे मामला चल रहा है। जिसको भी पाप वाली बात पे कुछ और कहना हो तो वो कह दे। फिर आज को हम इसको वो करेंगे। सवाल पूछूंगा ब्रेक लेंगे अगले अगला जो सेशन होगा वो यहीं से स्टार्ट होगा आज पाप वाली बात पे ही काफी देर हो गई जी सर एक सवाल पूछना था मेरे को रिलेटेड नहीं होगा ना पाप वाले पे मैं कहना चाहूंगा भैया पाप वाले पे बोलिए पाप वाले में ये है भैया कि जरूरी नहीं है कि जो चीज हमको अपनी दृष्टि से पाप वाला लग रहा है अधर्म लग रहा है और जो चीज हमको अपनी दृष्टि से धर्म लग रहा है वही अंतिम धर्म हो या वही अधर्म हो उसके लिए हमको शास्त्र का ही आलंबन लेना पड़ेगा। जैसे श्री राम ने जो सम्मुख वध किया था वो सभी को मतलब तर्कसंगत नहीं लगता है या फिर न्यायसंगत नहीं लगता है। कई लोगों को लेकिन क्या हां मतलब हां सभी को नहीं कह सकते कई लोगों को। लेकिन क्या है कि जब उसके मूल में जाएंगे तो पता चलता है कि वो शास्त्रीय मर्यादा के अंदर रह के राम जी ने उनका वध किया था और उसके जो दुष्प्रभाव थे उस दुष्प्रभाव का भी अंत हुआ। तो इसलिए जो है कि पाप और पुण्य का

01:44:10:00 या धर्म और अधर्म का निर्णय जो है हम अपने मन से नहीं लेंगे। जो शास्त्र कहते हैं उस शास्त्र के हिसाब से ही लेना पड़ेगा। इसीलिए जो धर्म का जो अंतिम निर्णय है वो जो परंपरा प्राप्त आचार्य हैं उनके लिए छोड़ा गया है। हम यही कहना अच्छा एक क्फजन और हो रही थी वो सरद जी का वो भी मैं क्लियर कर दूं कि शास्त्र को अंधा बन के अनुकरण के लिए नहीं कहा जा रहा है। ये कहा जा रहा है यदि आप शास्त्र को प्रमाण के रूप में स्वीकार कर रहे हैं तो करिए तो पूरा करिए। नहीं कर रहे हैं तो बिल्कुल मत करिए। तो अगर नहीं करने वाले हैं तो भी संतुष्ट किया जाएगा। मगर यदि करने वाले हैं तो अर्ध कुकुट न्याय नहीं हो सकता कि आप थोड़ी सी चीज माने और थोड़ी चीज ना माने। ये नहीं कहा जा रहा है कि अंधाई बने। और एक बात और है कि जैसे ये जो ये वाली बात है ना कि राम भी हम ही हैं तो शास्त्र का शास्त्र से बाहर निकलना पड़ेगा। तो बात यह है कि राम भी हम ही है। इस स्टेज तक पहुंचने के लिए ही शास्त्र है। इस स्टेज तक पहुंच जाएंगे तब शास्त्र की आवश्यकता ही नहीं है। तब तो मुक्ति हो गई। तो धर्म की आवश्यकता काहे के लिए है? ब्रह्म को साधने के लिए। ब्रह्म तक पहुंचने के लिए मुक्ति के लिए। ठीक

01:45:25:01 है। शिवश जी वही है ना मुक्त होने के बाद भी तो बस हमें रियलाइजेशन हो जाता है ना कि हम जीव नहीं है। जीव को पता चल जाता है। सॉरी जीव को पता चल जाता है कि जो मैं बने बैठा हूं वो मैं नहीं हूं। मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। है ना? ठीक है। लेकिन उसके बाद भी हमारा शरीर कार्य सब कुछ चलता रहेगा। लेकिन बस उस इंसान को रियलाइजेशन हो चुका है कि दूध का दूध पानी का पानी उसके लिए हो चुका है। है ना? लेकिन व्यवहार तो चलता रहेगा क्योंकि बहुत सारे बुक्स में मतलब आध्यात्मिक बुक में भी आया है कि उस जो मुक्त पुरुष है उस पे कुछ भी लागू नहीं होता है। वो कुछ भी कर सकता है। है ना? हम लोग इसको इसको किसी दिन ले लेंगे। पाप वाली बात पे और कुछ भैया मेरा एक प्रश्न है अभी जो आशुतोष जी ने और आपने अभी जो कहा उसका सार सब यही निकला बाद में कि शास्त्र ही प्रमाण है। अंत में शास्त्र को ही मानना चाहिए और गीता 16 24 में भी ऐसा ही लिखा है। तो शास्त्र में तो ये भी लिखा है कि ईश्वर अकर्ता है। वो कर्म नहीं करता। उसके उसके ऊपर कर्म या कर्म का फल का बंधन उसको नहीं लगता है। तो कर्म का फल तो या तो पाप होगा या पुण्य होगा। तो कर्म ही नहीं लगता करता है तो फल कैसे लग जाएगा उसको ना पाप लगेगा ना पुण्य लगेगा तो यह

01:46:40:04 प्रश्न फिर क्यों आता है कि ईश्वर यह पाप कर सकता है या ये पुण्य कर सकता है ये प्रश्न ही क्यों आते हैं मैं बता रहा हूं प्रमाण है इसको मैं इसको पूरा कर दू नयन जी आपको बोलना है कुछ भैया मैं अभी मेरा दो प्रश्न था तो अभी ज्यादा समय नहीं है आपको दो बता आइए पाप वाली बात को आज पूरा कर लेते हैं फिर अगली बार का रखते हैं ना 10 बार एक बार में एक मेरा निजी प्रश्न है। मैं आपसे पूछ सकता हूं मुझसे हां पूछिए कि राम जी को लेकर जो था तो आपने कहा था कि क्योंकि शास्त्र में नहीं आया तो वो कभी पाप नहीं किए ऐसा ही मानना पड़ेगा। तो क्या ऐसा भी मान ले कि जो वो निश्वास में जो कीड़े मकोड़े मरते हैं या फिर बैठने चलने से तो उसको भी मान ले कि उससे भी कोई पाप नहीं हुआ था। वो शास्त्र की सीमा के अंदर है ना। हम लोग संध्या वंदन क्यों करते हैं पता है आपको? हां जी वो बड़ी वैश्वदेव वाला संध्या वंदन करते ही इसलिए है कि जो अभी पिछले तीन चार घंटे में हमने जो पाप किए हो वो नष्ट होते हैं संध्या वंदन से तो शास्त्र की सीमा के अंदर में जो इस तरह के पाप होते हैं कि रसोई घर में खाना बनाते समय कुछ ना कुछ कीटाणु मरते होंगे तो वो शास्त्र की सीमा के अंदर है। शास्त्र

01:47:55:22 का उल्लंघन नहीं है वहां। ठीक है। ठीक है। धन्यवाद। अच्छा अच्छा मैं एक और अच्छा ठीक है। आप पाप का निराकरण कर लीजिए। उसके बाद बस एक बात कह कर मैं अभी मतलब पाप की बात ऐसी है। सबसे पहली बात तो एक गुण बात है जिस पर किसी ने बात ही नहीं की। कि जब हम यह कहते हैं कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो क्या वह पाप कर सकता है या कोई बुराई कर सकता है। ठीक है?

01:48:28:04 तो वहां पर एक सबसे पहली बात आती है कि क्या तुम ईश्वर को मानने वाले हो कि नहीं कि इस दुनिया में कोई ईश्वर है। सबसे पहली बात क्या आएगी कि ईश्वर को मानने वाले हो कि नहीं आप? है ना? क्योंकि यह जो लड़ाई है कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है। यह ईश्वर की सिद्धि के लिए है। ईश्वर है यह सिद्ध करो। अब वो कैसे है? कि हम कहते हैं इस दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है तो नास्तिक क्या कहता है वो यह कर सकता है वो वो कर सकता है तो यदि आप पहले ही ईश्वर को मानने वाले हैं तो आपका ये प्रश्न उचित ही नहीं ठहरता कि क्या ये कर सकता है कि नहीं कर सकता है तो ईश्वर को ना मानने वाले होने के दृष्टिकोण से ये पूछा जाता है कि क्या ईश्वर कर सकता है कि नहीं कर सकता है ये वाले जो प्रश्न आते हैं। ठीक है? अब क्या होता है कि इसमें जैसे आर्य समाजी जो ईश्वर है, आर्य समाज के अनुसार जो ईश्वर होता है, वह क्या करते हैं कि ईश्वर क्योंकि ईश्वर ने सृष्टि बनाई है तो उसके हम लोग कई बार बात कर चुके हैं। फिर कभी बात करेंगे इसलिए ईश्वर है परंतु यह नहीं कि वह सब कुछ कर सकता है। अच्छा वहां पर एक बात आती है कि वो सर्वव्यापक

01:49:43:08 है। तो ऐसा ऐसी कोई जगह नहीं है जहां वो ना हो। तो यहां पे सर्व का अर्थ क्या लिया? आर्य समाजियों ने जहां जिससे शेष कुछ ना बचे क्या वह वो सर्वज्ञ है जिसके जिसकी जानकारी से कुछ भी बाहर ना हो। परंतु जब सर्वशक्तिमान की बात आती है तो हां कुछ कार्य ऐसे हैं जो ईश्वर नहीं कर सकता। ठीक है? तो अब यहां पर यह आ जाता है कि जब वो ईश्वर को मानने वाले हैं तो जब यह बात वो कह रहे हैं कि क्या वो पाप कर सकता है? तो ऐसा कई बार हो सकता है जब भगवान हमको ऐसे कार्य करते हुए दिख जाए जो प्रथम दृष्ट्या में हमको जो है पाप जैसे फील हो दिखाई दे जैसे कि मान लीजिए इसको छोड़ दीजिए कि वो किसी साकार स्वरूप में आकर के जो है वो किसी का वध करेंगे निर्दोष का इसको छोड़ दीजिए अभी आर्य समाज का ईश्वर ही ले लेते हैं उनके हिसाब से ईश्वर पाप नहीं कर सकता इसीलिए वह प्रश्न कर रहे हैं ना कि वो पाप नहीं कर सकता। उनके हिसाब से उनका ईश्वर जो है बुराई नहीं कर सकता। अच्छा जो भी दुनिया में कुछ हो रहा है जिसको भी कर्मों का फल दे रहा है तो वह ईश्वर ही दे रहा है। ठीक है? तो अगर

01:50:58:12 कोई नवजात शिशु ने अभी-अभी जन्म लिया है और उसको किसी प्राकृतिक आपदा के द्वारा या फिर किसी मनुष्य के द्वारा मार दिया गया तो ईश्वर की सत्ता में हुआ ना यह कार्य। तो यह मानना पड़ेगा ना कि ईश्वर ने पाप कर दिया नवजात शिशु को मार के तो वहां पर यह मानना पड़ेगा उनको भी कि हां उसको उसका कर्म फल मिला तो प्रथम दृष्ट्या में क्या दिखा कि हां ईश्वर ने ऐसा कर दिया ये अभी उनके ईश्वर की बात हो रही है। प्रथम दृष्ट्या में क्या हुआ कि उनको हमें ऐसा दिखा कि अरे क्या अनहोनी हो गई। नवजात शिशु को अभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होना चाहिए था। मगर जब उसके उसमें गढ़ अर्थ में गए जब हमने जानकारी की तो हां भाई कोई ऐसी आत्मा थी जिसको विधि के विधान के अनुसार जिसने कुछ ऐसे पाप कर्म किए थे जिसको इस शरीर में डाला गया और जो है जिससे कि उसको कम समय में ही अल्प आयु में ही उसकी मृत्यु हो गई। ठीक है? तो तब हमें पता चला कि ईश्वर ने ईश्वर पाप करने वाला दिखाई देते हुए भी पाप करने वाला नहीं है। अब बात यह आती है कि जब वह पाप करने वाला नहीं है तो फिर पाप करने वाला दिखाई देते हुए भी जब आप नास्तिक हो

01:52:13:20 तो हमें आपको यह बताना होगा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और सर्वशक्तिमान को सिद्ध करने के लिए शास्त्रों को आपके ऊपर लागू करने के लिए ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को अनुमान प्रमाण से प्रातिभाषिक प्रमाण से हमें सिद्ध करना होगा। और उसके बाद जब आप यह वाली बात को स्वीकार कर लेंगे कि हां ईश्वर है शास्त्र को मैं मानता हूं तब ईश्वर और शास्त्र को मानने वाला होने के रूप में आपको यह मानना पड़ेगा कि यहां यहां ये जो लिखा है इस जन्म में जो ये हुआ पुनर्जन्म का यह फल है वो फल है ये सारी चीजें माननी पड़ेंगी। अच्छा अब इसमें पाप वाले विषय में एक बात और आती है कि क्या कहते हैं? बहुत सारी एक तो बातें हो गई ना तो मैं कुछ मिस मैंने प्रश्न लिखा हां बताइए भैया अगर किसी पुत्र को यह पता हो कि उसका पिता पाप कर रहा है फिर भी वो अपने पिता को समझा रहा है वो समझ नहीं रहे हैं तो उसको पुत्र धर्म का पालन करते हुए पिता का साथ देना चाहिए उस बारे में या फिर उनको त्याग देना चाहिए अपने पिता को प्रह्लाद अच्छे थे या मेघनाथ अच्छा था पुत्र धर्म तो दोनों पुत्र धर्म में अच्छे थे मतलब मतलब प्रह्लाद सही थे। प्रह्लाद है या

01:53:28:26 मेघनाथ कौन प्रह्लाद तो बस आपको आंसर आपका मिल गया। परंतु भैया इसमें पुत्र का क्या गलती है वहां पे? क्योंकि मेघनाथ वहां पर बोल रहा है कि आप गलत कर रहे हो। फिर भी उसने पुत्र धर्म का चयन किया। गलती है कि उसने समष्टि के धर्म पर अपने व्यष्टि के धर्म को हावी होने दिया। अच्छा हां ठीक है भैया समझ गए। समझ गए? जी भैया भैया पाप कर्म का निराकरण हो गया। पाप कर्म का निराकरण नहीं हुआ क्योंकि बात बहुत घूम गई ना तो मैं भी कुछ स्मृति भ्रम हो गया मुझे भी। तो मैं एक बात रखूं अपना कोई एक प्रश्न ये भी कर सकता है कि क्या भगवान ऐसा रूप धारण कर सकते हैं जो नियम के नीचे आके दिखा सके? तो उनके लिए हमको राम जी का उदाहरण लेना पड़ेगा। हम अच्छा एक बात मैं कहूं सुभाष भैया ने अभी कहा कि वह नैन छिनती शस्त्राण वाला आत्मा को कोई काट नहीं सकता शस्त्रों से जल से भिगो नहीं सकता हवा से सुखा नहीं सकता तो क्या ईश्वर आत्मा को मार सकते हैं ईश्वर को हां ये वाला प्रश्न बाकी रह गया था अच्छा हुआ पाप और पुण्य के बीच में ईश्वर आत्मा को मार सकते

01:54:44:02 हैं वाली बात आत्मा है ये आपने मान लिया है क्या? आत्मा तो परमार्थिक विषय है ना व्यवहार का विषय है ही नहीं नहीं अभी ईश्वर ईश्वर का अस्तित्व है आत्मा का अस्तित्व है आपने मान लिया है क्या क्योंकि ये लड़ाई तो ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए है ना आपने माना कैसे ईश्वर है माना कैसे मानने की यात्रा में ये लड़ाई है जब मान लिया तो फिर आप क्वेश्चन क्यों उठा रहे हो नहीं समझे जैसे कि एक सोतासु से जागा हुआ व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि वो किसी की आवाज देने के कारण जाग गया। क्यों? क्योंकि यदि वो सुन रहा था तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता और सो रहा है तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता। उसी तरीके से एक ईश्वर को ना मानने वाला व्यक्ति ये नहीं कह सकता कि ईश्वर आत्मा को कैसे मार रहा है। क्योंकि अगर वो ईश्वर को आत्मा को मारने वाला मारने आत्मा के होने की बात को स्वीकार कर रहा है। ईश्वर के होने की बात को स्वीकार कर रहा है तो ईश्वर को ना मानने वाला नहीं हो सकता। और ईश्वर को ना मानने वाला है तो ईश्वर के द्वारा कोई क्रिया या आत्मा के स्वरूप को स्वीकार करने की बात नहीं कर सकता। तो पारमार्थिक सवाल से आप ईश्वर के व्यवहारिक का खंडन नहीं कर सकते। यह कह रहा हूं मैं।

01:55:59:08 परमार्थ में पहुंचे कैसे आप जैसे वो रैशनलिस्ट आर्य भी है। एक दिन वो आकर के वो अपना झूठ बोलबाल के बोला कि क्या ईश्वर अपने परमार्थ वाले पता नहीं कुछ ऐसा ही सवाल किया था जिसमें परमार्थ की दृष्टि की बात थी। तो परमार्थ की दृष्टि आपको प्राप्त कहां से हुई है? ईश्वर ईश्वर से होकर गुजरे बिना आप परमार्थ की बात कैसे कर रहे हैं? आत्मा से होकर गुजरे बिना आप परमार्थ की बात कर कैसे रहे हैं? यानी कि आपने ईश्वर को ईश्वर माना हुआ है। तो अब बात ये आएगी जैसे एक दिन संदीपन रॉय बोला था या पता नहीं कौन बोला था कि क्या द्वैत को मानने वाले ईश्वर नहीं होते हैं? या क्या हां उस तरीके से आप जाओगे अगर अद्वैत का खंडन करते हुए तो ईश्वर सिद्ध ही नहीं होगा तो आपकी परमार्थ की दृष्टि आपको प्राप्त होना वही सिद्ध नहीं होगा। आपको परमार्थ की दृष्टि मिल ही ईश्वर से रही है ना तो ईश्वर को पहले मानना पड़ेगा आपको और जब मान लिया तो खंडन नहीं कर पाओगे परमार्थ की दृष्टि से क्या ईश्वर आत्मा को मार सकता है नहीं मार सकता कहां नहीं मार सकता परमार्थ में आपको पता कैसे चलेगा कि परमार्थ में क्या हुआ आत्मा का क्या नहीं हुआ आपको विश्वास करना पड़ेगा ना किसी की वाणी पे किसकी वाणी पे ईश्वर की वाणी पे तो ईश्वर की वाणी

01:57:14:14 पे जब आपको विश्वास है तो फिर क्यों मना कर रहे हो ईश्वर है नहीं और दूसरे जो ईश्वर है वो ईश्वर सिद्ध नहीं हो सकते तो उनके द्वारा आपको आपके द्वारा परमार्थ को जानना पारमार्थिक विषयों पर चर्चा करना वो सिद्ध नहीं होता सिद्ध उन विषयों को जानने के लिए उन विषयों पर चर्चा करने के लिए पहले आपको ईश्वर को मानने वाला होना सिद्ध करना पड़ेगा और ईश्वर को मानने वाला सिद्ध होने के लिए आपको पहले व्यवहारिक दुनिया में ईश्वर के द्वारा समस्त कर्मों को करने की शक्ति रखने वाला ईश्वर को सिद्ध करना पड़ेगा कहना पड़ेगा। यह यह था। यह प्रश्न था जो मैं छूट रहा था मेरे से। भैया मरना तो सिर्फ व्यवहार की बात है। तो परमार्थ में तो यह सवाल हो ही नहीं सकता प्रश्न। वही वही मैं कह रहा हूं। पारमार्थिक आप पहुंच गए आप। इसका मतलब ईश्वर को मानते हैं। पहुंचे कैसे? आर्य समाज के ईश्वर से कैसे पहुंच सकते हैं? वो ईश्वर सिद्धि नहीं होगा। हम काट देंगे उसको। अद्वैत का अद्वैत के ईश्वर का खंडन करने वाला कोई भी फिलोसफी आपको परमार्थ तक नहीं पहुंच पाया पहुंचा पाएगी। हम उसको ईश्वर को ईश्वर मानते हुए भी उनको नीचा दिखाया जा रहा है। ऐसे में हां स्वीकार कर लिया कि ईश्वर है

01:58:29:15 उसके बाद तुम जाकर के कह रहे हो अच्छा ईश्वर परमार्थ की दृष्टि वाले सवाल कर रहे हो। पहुंचे कैसे? आर समाजी ईश्वर को आर्य समाजी ईश्वर के आलंबन के बिना आर्य समाजी ईश्वर के आलंबन से आप परमार्थ तक पहुंच ही नहीं सकते ना [हंसी] जैसे श्री राम को पापी बता दिया एक और बात और मैं वो वाली बात बता दूं कि जो समस्त कर्मों को करते हुए भी अकर्ता जान क्यों जान क्योंकि कर्मों के फल में भगवान की आसक्ति नहीं होती है इट्स ऑल अबाउट आवर कॉन्शियसनेस अगर और गढ़ में जाएंगे हम जो भी कर रहे हैं उसका पाप हमें क्यों लग रहा है? क्योंकि हमारी कॉन्शियसनेस हमारे कुछ भी करने से प्रभावित हो रही है। यह छुपा हुआ छुपे हुए कार्यों के पर मैंने कई बार बात की है ना। तो जब छिपाने का भाव उत्पन्न करने वाले हम कार्य करते हैं तो हमारी कॉन्शियसनेस वीक होती है और जब बताने का भाव उत्पन्न करने वाले कार्य हम करते हैं तो हमारी कॉन्शसनेस स्ट्रांग होती है। तो जिन कामों को करते समय हम लोग छिपाने का भाव आ रहा है कि मैं चोरी कर रहा हूं, व्यभचार कर रहा हूं। ये सब पाप कहे गए ना तो इनमें छिपाने का भाव आ रहा है तो इसलिए कॉन्शियसनेस हमारी वीक होती है तो कॉन्शियसनेस वीक होने के कारण हम और फंसते हैं द्वैत में भेद में

01:59:45:01 और फंसते हैं प्रपंच रूपी संसार में है ना तो फिर क्या कहते हैं ये जो भगवान है उनकी कॉन्शियसनेस सबसे ज्यादा होती है। भगवान का अवतार उसी को कहा गया है कि जो सुप्रीम कॉन्शियसनेस है जो फ्री है सब कुछ जानने वाली है वो जब इस प्रपंच रूपी संसार में हमारे समक्ष प्रकट होती है हमें मुक्त कराने के निमित्त है ना तो उनकी कॉन्शियसनेस के अनुसार जो होता है उनकी कॉन्शियसनेस इतनी स्ट्रांग होती है कि उनको मालूम होता है कि कहीं कुछ हो ही नहीं रहा है मैं ही तो हूं उनको यह मालूम होने के कारण उनको किसी भी कर्म को करते हुए उसके फलन में कोई आसक्ति नहीं होती है। वो बस यह उनके द्वारा यह सृष्टि का निर्माण होना यह होना वो होना यह केवल उनकी शक्ति का वो है परिणाम कि वो शक्तिमान है इसलिए ये हो रहा है। जैसे आंख है तो वो देख रही है। उसमें उनका कोई हेतु नहीं है। शत्रुपनिषद ठीक है। तो कर्मों के फल में आसक्ति ना होने के कारण समस्त कर्मों को करने वाले होते हुए भी हम मनुष्यों के समक्ष वो अकर्ता होते हैं। इसलिए उनको पाप पुण्य का वो नहीं लगता है।

02:01:00:09 दोष अथवा लाभ ठीक है। और भैया वो पत्थर वाला एक प्रश्न था ना जो अब वो अगली बार लेंगे आवाज देखो पाक में ही इतना अटके हैं। राम जी भी आए काफी देर तक उन पर भी चर्चा चली। अद्वैत अद्वैत पे भी बात हो गई सर जी के साथ। मुझे लगता है जी शिव जी एक सवाल है बस कि क्या भगवान जगत बनने से रोक सकते हैं? ऐसा सोच सकते हैं मतलब कि कैसे जगत बनने से बिल्कुल रोक सकते हैं। देखिए मैं ये गुण वाले सवाल है। अभी आंसर दे दूंगा तो सोचने के लिए पूछा मैंने। हां ये है क्या? नहीं है। अच्छा सवाल सवाल अच्छा है। बात ये है कि इसका जवाब अगर मैं आज दे दूंगा तो सारी वो खत्म हो जाएंगी। कुछ आर्गुममेंट बाकी नहीं रह जाएगी। तो नहीं मुझे मुझे खुद को सोचने के लिए ऐसे बस पूछा है कि मतलब कर सकते हैं मैं बताऊंगा कैसे कर सकते हैं और अगर वो मैंने अभी बता दिया तो फिर ये अगली बार ये जो सेशन होना है वो होगा ही नहीं फिर और जो छोटी छोटी और जो दिक्कतें वो सॉल्व नहीं होंगी है ना तो इसलिए क्रम से चले नीचे से ऊपर की ओर जाए सीधे ऊपर चले जाएंगे तो हो गया काम

02:02:15:20 अभी आपके पास मतलब प्रश्न हुआ है ना अभी पाप वाला काफी हद समझ में आ गया ना? जी ठीक है। तो आज का सेशन भी अच्छा ही रहा और एक बार छोटा सा प्रश्न है हां हां सुन रहा है तो सोता सिद्ध नहीं होता है। सो रहा है तो सुनता सुनना उसका सिद्ध नहीं हो रहा है। तो इसके पीछे का मतलब रहस्य क्या है? मतलब समझना क्या है? इससे थोड़ा सा ये थोड़ा सा बता सरल शब्द में अगर वो ईश्वर को मानने वाला है तो इस आधार पे के ईश्वर परमार्थ में क्या करते हैं इस जैसे परमार्थ में ईश्वर किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकते व्यवहार में कर सकते हैं। समझ रहे हैं? तो यदि उसने मान लिया कि परमार्थ की भी दुनिया है तो इसका मतलब उसने पहले माना ना कि ईश्वर है। ईश्वर है। ठीक है? तो जब उसने ईश्वर को ईश्वर मान लिया है तो परमार्थ की दुनिया पर उसका कुछ ना करने कुछ समथिंग समथिंग वो नहीं कर सकता। इस स्थिति के आधार पर उसको ईश्वर को ना मानने वाला वो सिद्ध नहीं होता। जी अगर वो परमार्थ अगर वो परमार्थ को जानने वाला है यानी कि वो सुन रहा है ठीक है? तो उसका सोना

02:03:31:01 सिद्ध नहीं होता। यदि यानी कि वो यदि वह परमार्थ को जानने वाला है तो उसका ईश्वर को ना मानने वाला सिद्ध नहीं होता। वो नास्तिक सिद्ध नहीं होता। नहीं होता। ठीक है? क्योंकि सोना जो है वो व्यवहार का विषय है और वो सो ही नहीं रहा है। परमार्थ में नहीं नहीं अगर वो सो रहा है यानी कि वो नास्तिक है। ठीक है। वही कह रहा हूं। अब वो बात कह रहा है परमार्थ में आत्मा होती है। सिद्ध कैसे हुआ? तुम यह वाले प्रश्न करने का वो कैसे कर रहे हो? सिद्ध कैसे हुआ तुमने? वो सिद्ध करो ना। पहले आत्मा होती है। सिद्ध करने जाओगे तो तुम्हें मानना पड़ेगा। ईश्वर है आत्मा है। मानना पड़ेगा ना। आप यदि ईश्वर को ईश्वर कह रहे हो तो सब कुछ सिद्ध हो गया वहीं पे। हां। तो जब तुमने ईश्वर मान लिया है तो फिर खंडन मत करो। तो परमार्थ की दुनिया के आधार पर यानी सोते सोने वाला होते हुए तुम सुनने वाली होने के आधार पर सोने वाला होते हुए सुनने वाले होने के आधार पर आप जागने का खंडन नहीं कर सकते समझ रहे हो मेरी बात और यदि आप क्या कहते हैं जागने वो सुनने वाले हैं तो सुनने वाले होते हुए

02:04:46:24 सोने के आधार पे आप जागने का खंडन नहीं कर सकते। नहीं कर सकते। ठीक है? तो इसी प्रकार से ईश्वर को यदि मानने वाले हैं तो ईश्वर के पारमार्थिक संसार में होने वाली क्रियाओं के आधार पर आप ईश्वर का खंडन नहीं कर सकते। उसके लिए पहले आपको ईश्वर को ईश्वर मानना पड़ेगा और अद्वैत के विरोध में जितने भी ईश्वर आप लाओगे वह खंडित हो जाएंगे। अद्वैत के आधार पर ही आप परमार्थ को जानने वाला होने का दावा कर सकते हो। तब यह कह सकते हो क्या वहां आत्मा हो सकती है? और जब आपने ईश्वर को ईश्वर मान लिया है तो फिर हमें कुछ भी सिद्ध करने की वहां आवश्यकता नहीं रह जाती कि भैया वो वहां आत्मा को मार सकते हैं कि नहीं मार सकते हैं। पारमार्थिक सवाल होते हैं ना ये। ठीक है। परमार्थ को व्यवहार से कभी मिला नहीं सकते हैं। परमार्थ अलग विषय है और व्यवहार अलग विषय है। ईश्वर को सिद्ध करने के लिए पारमार्थिक आधार को नहीं ला सकते। नहीं ला सकते। ठीक है? पारमार्थिक आधार को लाकर के ईश्वर को सिद्ध अथवा असिद्ध करने का प्रयास करना व्यर्थ है। हमें यहीं से सिद्ध करना होगा। ठीक है? ये सुनने

02:06:01:27 से सोते वाला एक बार और समझ लीजिए आशुतोष जी कि जैसे सोता हुआ व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मैंने तुझे सुना इसलिए मैं नहीं मानता कि मैं जाग रहा हूं। ठीक है? हम उसी प्रकार से एक नास्तिक यह नहीं कह सकता कि परमार्थ में आत्मा को मारा जा सकता है या परमार्थ में समथिंग समथिंग के कारण मैं ईश्वर को नहीं मानता क्योंकि परमार्थ को जानने से ही यह सिद्ध हो गया कि आप ईश्वर को मानते हैं। तो माने कैसे? पहले यह बताइए। बिना ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के सिद्ध हुए आपने ईश्वर को कैसे मान लिया? ठीक है? इसी प्रकार से इसी प्रकार से आपने सुना कैसे यह बताइए पहले बिना जागे आपने सुन कैसे लिया ये बताइए पहले यहां ये कहने का मतलब समझ गए जी जी जी जी जैसे आपने आत्मा के विषयक बात की ना जब किसी ने की थी ना आत्मा के विषयक बात तो आत्मा है और वहां पर उससे भिन्न ईश्वर भी है यह आपने जाना कैसे साइंस ने बताया कैसे कैसे जाना कि आत्मा त्मा होती है।

02:07:18:02 वहां कैसे पहुंचे उस दुनिया में आप तो आपको मानना पड़ेगा ईश्वर से। अच्छा ईश्वर है ईश्वर कैसे माना आपने के आर्य समाज का ईश्वर है। आर्य समाज का ईश्वर ईश्वर ही नहीं है। वो तो जन्म नहीं ले सकता। बाधित है। सर्वशक्तिमान नहीं है तो ईश्वर कैसे के अद्वैत के विरोध में जितने भी ईश्वर है वह सब खंडित हो जाएंगे। तो फिर आप कैसे पहुंचे? परमार्थ में तो आपको मानना पड़ेगा अद्वैत के ईश्वर को। हम तो परमार्थिक बाध्यता के कारण जो हमें शब्दों में सुनाई दे रही है भाषिक रूप में सुनाई दे रही है ईश्वर की परमार्थिक बाध्यता उसके कारण आप ईश्वर उसका ईश्वर का खंडन नहीं कर पाओगे हां व्यवहार में ईश्वर मगर इनका ईश्वर क्या है जो अद्वैत के विरोध में खड़े किए गए ईश्वर है इनके ईश्वर व्यवहार में ही बाधित है समझ रहे हैं वो व्यवहार में कई काम ऐसे कर देते हैं जो कई जगह ऐसा कह देते हैं कि वह यह नहीं कर सकते वह नहीं कर सकते। इस कारण से एक नास्तिक आराम से उनके ईश्वर का खंडन कर देगा। और यहां जो लड़ाई है आर्य समाजियों से या समथिंग समथिंग लोगों से नहीं है। लड़ाई मूल रूप से दो ही लोगों में है। नास्तिक और आस्तिक

02:08:33:20 धर्म और अधर्म। ठीक है? तो नास्तिकों को कभी मौका ना मिले। इसलिए जो गलत ईश्वर खड़े किए जा रहे हैं संसार में उनका उनको जो है शोधन आवश्यक है। इसलिए हम लोग ये बातें करते हैं। ठीक है। धर्म की रक्षा के लिए। ठीक है। तो आज आनंद रहा। काफी अच्छी चर्चा हुई। शिव जी कुछ एक दो प्रश्न थे किसी पाप और पुण्य वाले में नहीं नहीं नहीं कुछ अलग विषय में अलग विषय फिर अगली बार अब काफी समय हो गया है अब अगली बार बात अरे सुन तो लीजिए अब सुन तो लीजिए थोड़ा जी जी जी बताइए मैं पूछ रहा था कि मतलब गुरुदेव शंकराचार्य जी अभी होंगे मठ में हां मठ में है और कब तक रहेंगे

02:09:28:00 पूरा चातुर्मास रहेंगे लगभग लगभग बाकी कुछ डेट आप कंफर्म कर लीजिएगा ग्रुप के जो एडमिन है उनसे ठीक है अच्छा और दूसरा प्रश्न था कि मतलब इसके बाद जब अगली बार जो चर्चा होगा डिबेट होगा तो उसमें विषय क्या रहेगा अब विषय यही रहेगा अभी ईश्वर वही है सब कुछ कर सकता है अभी पूरा कहां हुआ अभी इसमें डंडा और वो सब बाकी तो रह गया पत्थर दो और दो पांच है और शिवश ये जो है कि मतलब साकार होना परमार्थ का विषय है या फिर व्यवहार का साकार होना व्यवहार

02:10:10:19 हां ठीक है भैया जितने भी ऐसे हार्ड क्वेश्चन है सबका उत्तर तो एक ही पे आके अटक जाता है कि व्यवहारिक रूप से ऐसा दिखा सकते हैं बट परमार्थिक रूप से गलत नहीं कर सकते बिल्कुल बिल्कुल या फिर परमार्थिक रूप से ऐसा हो नहीं रहा है क्रिया भैया का उत्तर तो भैया एक ही पे अटक जाता है। बिल्कुल इसीलिए तो बहुत गढ़ वाले प्रश्न बाद में करें। अब देखिए पाप और पुण्य वाला कितना अच्छा विषय निकला। बहुत कुछ सीखने को मिला सभी को। हमें भी काफी कुछ समझ में आया। कैसे बात को रखना है क्या करना है। ठीक है? तो आने के लिए सभी का आभार और ये फिर तीन संडे तीन रविवार छोड़ के फिर अगले मतलब अगले माह के रविवार में ये दोबारा से होगा। तब तक आप लोग अपनीप कमर कसे जी भैया जी भैया ठीक सभी को जय श्री राम जय श्री राम जयघोष कर ले भैया सभी को हां जयघोष कर ले भैया धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो नाश हो प्राणियों में सद्भावना विश्व का कल्याण हो गौ माता की जय बंधु

02:11:27:08 अखंड हो अखंड हो हर हिंदू हम भारत भव्य बनाएंगे बनाएंगे [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 2:12:02 · 15 Feb 2026

क्या ईश्वर सच में सर्वशक्तिमान है? दो टीमों के बीच तीखी बहस!

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