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00:00:03:01 ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है जिसको वह स्वयं ना उठा सके क्या ईश्वर मर

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00:00:07:20 सकता है क्या ईश्वर अपने एक्जिस्टेंस से बाहर जा सकता है क्या ईश्वर अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है हां बिल्कुल बना सकता है ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता है आपने देखा होगा कि प्रभु सीता माता का जब स्वयंवर हुआ था तो उसमें धनुष को कई महानुभाव उठा नहीं पाए थे रावण भी उठा नहीं पाया इसका अर्थ क्या है क्या उनके अंदर ईश्वर नहीं है तो रावण के रूप में या अन्य रूपों में उस दिन धनुष को ना उठाने वाला ईश्वर बाधित हो गया ना बाधित होकर दिखाया इसका मतलब ईश्वर पर यह नियम भी लागू नहीं होता कि ईश्वर बाधित नहीं हो सकता विष्णु भगवान के कान से मधु कटप का जन्म होता है जिसको वह स्वयं नहीं मार पाते मां भगवती को उन्हें मारने के लिए आना पड़ता है अब बात ये आती है अगर ईश्वर असमर्थ हो गया कोई कार्य करने में तो इसका मतलब बाधित हो गया ये तो ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं रहा नहीं जब वो मधु केटब को मार नहीं पाए उसके बाद भी वो ऐसे अस्तित्व में शेष थे जिस अस्तित्व के कारण दोबारा आए दूसरे रूप में और उन्होंने मधु कटप को मार दिया जब रावण के रूप में वो धनुष को नहीं उठा पाए तो दोबारा आए राम के रूप में और उन्होंने धनुष को उठा दिया

00:01:23:01 पहली बात तो यह है कि ईश्वर ऐसा पत्थर बना पाया जिसको वो स्वयं नहीं उठा पाया मगर वास्तविकता में ईश्वर का एक अस्तित्व ऐसा शेष रहता है जिसमें जिसके कारण वह पुनः किसी अन्य रूप में आकर के या उसी रूप में आकर के उस पत्थर को दोबारा उठा भी सकता है तो आपका प्रश्न फिर यह होगा क्या ईश्वर अंत में ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वह स्वयं ना उठा सके उसके बाद उसका रूप शेष ना रह जाए ऐसा कभी नहीं हो सकता कि ईश्वर का रूप कोई शेष ना रह जाए इसी को दूसरे प्रकार से देख ले आपने जो कहा क्या ईश्वर मर सकता है तो अगर देह के नाश को आप मरना मानते हैं तो हां ईश्वर ने कई ऐसी लीलाएं की है जिसमें उन्होंने अपनी देह को नाश करके भी दिखाया है क्या ईश्वर अपने एक्जिस्टेंस से बाहर जा सकता है तो यह भी यही हो गया कि देह के देह को उसने नष्ट कर दिया एक्जिस्टेंस से बाहर चला गया इसके अलावा क्या ईश्वर अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है तो हां राम भी आए परशुराम भी आए दूसरा ईश्वर बना दिया नरसिंह रूप बना दिया राम भी है हनुमान भी है यह भी हो गया और विष्णु भी है शिव भी है और राम भी है भी हो गया तो एक ही समय में ईश्वर अपने अपने जैसे अन्य ईश्वर भी उसने बनाए तो कुल मिलाकर के इन सारी गुथ यों में आपके द्वारा उलझाया

00:02:38:13 हुआ जो कुतर्क है वो है क्या ईश्वर मर सकता है क्योंकि आपने कहा क्योंकि जब ईश्वर ऐसा पत्थर बना देगा जिसको वो स्वयं नहीं उठा पा रहा है पर हम यह कहेंगे कि अभी भी ईश्वर का अस्तित्व बाकी है जो उसको उठा सकता है तो उस पर आपका प्रश्न ये होगा क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको नाना उठा सकने वाले रूप के अलावा उसका कोई भी रूप रूप शेष ना रहे तो इन सारे प्रश्नों में एक ही प्रश्न उलझा हुआ है एक ही कुतर्क है क्या ईश्वर मर सकता है तो नहीं ईश्वर मर नहीं सकता पर कहां परमार्थ में और ईश्वर मर भी और ईश्वर मर के भी दिखा सकता है कहां व्यवहार में तो दो दुनिया है एक परमार्थिक दुनिया और एक व्यवहारिक दुनिया तो परमार्थिक दुनिया में ईश्वर से भिन्न किसी भी वस्तु विशेष का अस्तित्व ही नहीं है किसी भी तत्व का अस्तित्व नहीं है ही परमेश्वर तो इस तरह से अगर देखा जाए तो व्यावहारिक शब्दों में अगर व्याख्या करें तो परमार्थ की दुनिया में परमार्थ के संसार में ईश्वर सीमित है निश्चित है बाधित है सुनिश्चित है हालांकि इन सारे मापदंडों पर ईश्वर को आंकना ही गलत है क्योंकि जो परमार्थ का ईश्वर का रूप है वह प्राप्त व्य है वह व्यवहार का विषय नहीं है प्राप्त व्य क्या होता है कि जो चीज हमें अचीव करनी

00:03:53:24 है अचीव करने के लिए प्राप्त करने के लिए हमें करना क्या है कुछ और जैसे कि हम कैलोरी प्राप्त करनी है भूख लग रही है अपनी इंटेस्टाइन को तृप्त करने के लिए हमें कैलोरी प्राप्त करनी है परंतु कैलोरी के लिए हम व्यवहार नहीं कर सकते हैं कैसे व्यवहार करोगे हाथ पैर मारोगे क्या हवा में व्यवहार किसके लिए करेंगे जो कैलोरी का सोर्स होता है फूड हम उसके लिए व्यवहार कर सकते हैं तो हम फूड के लिए व्यवहार करते हैं दिखाई देने वाला सगुण साकार स्वरूप कैलोरी का स्त्रोत उसके लिए हम व्यवहार करते हैं और फल स्वरूप प्राप्त होती है हमें कैलोरी क्योंकि कैलोरी हम हमारे व्यवहार का विषय नहीं है इसी प्रकार से पार मार्थी जो रूप भगवान का वो हमारे व्यवहार का विषय नहीं है परंतु फिर भी व्यवहारिक व्याख्या में आपके ही शब्दों के अनुसार हम यह कह सकते हैं कि परमार्थ में ईश्वर निश्चित है सीमित है बाधित है नियम नियमों के नीचे भी है वो नियमों के नीचे कैसे है कि परमार्थ में वो ऐसा नहीं कर सकता कि वेदों पर चलने वाला मनुष्य उनके पास गया और वहां उसको मोक्ष ना मिला नहीं धर्म के मार्ग पर चलने वाले को तो मोक्ष मिलेगा ही हां व्यवहार में रावण के रूप में आके कंस के रूप में आके या आजकल जितने भी सनातन विरोधी तत्व उनके रूप में आकर के ईश्वर धर्म के ईश्वर

00:05:09:00 धर्म के मार्ग पर चलने वालों के साथ अन्याय भी कर देता है व्यवहार में तो कुल मिलाकर के ये जो चैप्टर है व्यवहार और परमार्थ के बीच अंतर को समझाने के लिए है अब बात ये आती है अब बात ये आती है कि व्यवहार में उसके निश्चित सीमित वादित नियमों के नीचे आपके अनुसार हालांकि वहां पर ये जो नियम है इनके पर्सपेक्टिव से ईश्वर को जांचना गलत है पर फिर भी आपके अनुसार वो नीचे है नियमों के पर कहां पर है परमार्थ में अब ये परमार्थ और व्यवहार का अंतर क्या है व्यवहार वो दुनिया है जिसको मनुष्य ने अपनी आंखों से जाना अपनी आंखों से देखा और परमार्थ वो दुनिया है जिसको वो ईश्वर की आंखों से देखता है ईश्वर की आंखों से जानता है ईश्वर के कानों से सुनता है इसका अर्थ क्या है कि यदि आपके हिसाब से मान भी लिया जाए कि परमार्थ में ईश्वर निश्चित है सीमित है बाधित है सब कुछ है पर उसके आधार पर उस ईश्वर को नकारा नहीं जा सकता क्यों क्योंकि उस दुनिया को मनुष्य जान ही तब पाया जब उसने किसी को ईश्वर मान लिया ईश्वर को ईश्वर मानने के बाद वो एक जान पाया कि इसके अलावा एक दुनिया है जहां पर ईश्वर ही ईश्वर है दूसरा कोई तत्व ही नहीं है जहां वो अपने जैसा कोई दूसरा ईश्वर

00:06:24:06 नहीं बना सकता जहां व मर नहीं सकता जहां वह किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकता वो दुनिया आप कब देख पाए जब आपने ईश्वर को ईश्वर मान लिया तो कुल मिलाकर के ईश्वर की पार मर्थक निश्चित के आधार पर उसको मनुष्य नकार नहीं सकता हम जब भी कहते हैं कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है तो हम कहते हैं कि मनुष्य दृष्टि से सोचा जा सकने वाला ऐसा कोई कार्य नहीं है जो ईश्वर नहीं कर सकता मनुष्य दृष्टि अगर मनुष्य सोच रहा है अपनी व्यवहारिक दुनिया के अनुसार उस दृष्टि से ईश्वर ऐसा कोई कार्य नहीं है जो नहीं कर सकता हां वो न्याय भी करेगा व पत्थर ऐसा बनाएगा जिसको वो खुद ना उठा सके वो रोएगा भी वो हसेगा भी वो सब कुछ करके दिखा सकता है किसी भी नियम के नीचे नहीं है मगर व्यवहार में इसको ऐसे समझ लीजिए कि कोई मनुष्य यह नहीं कह सकता कि किसी के

00:07:12:10 आवाज देने के कारण मैं जाग गया क्यों क्योंकि अगर वह सो रहा था तो उसका सुनना सिद्ध नहीं होता और अगर वह सुन रहा है तो उसका सोना सिद्ध नहीं होता है ठीक इसी प्रकार पार मर्थक दुनिया में ईश्वर की निश्चित के आधार पर उसको नकारा नहीं जा सकता है क्यों क्योंकि अगर वो परमार्थ को मान रहा है तो उसका ईश्वर को ना मानना सिद्ध नहीं होता और अगर वह ईश्वर को नहीं मान रहा है तो उसका परमार्थ को जानना सिद्ध नहीं होता

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00:07:39:12 है अगर प्रैक्टिकली देखें तो आपने ईश्वर की पार मार्थी निश्चित के कारण उसको नकार दिया उसके बाद आपसे पूछा जाएगा कि आपने ईश्वर को क्यों नकारा आप कहोगे भाई वो परमार्थ में निश्चित है अपने जैसा ईश्वर नहीं बना सकता है वो ऐसा पत्थर नहीं बना सकता है जिसके बाद जिसको ना उठा सकने वाले रूप के अलावा उसका अस्तित्व शेष ना रहे परमार्थ में वो मर जाए वो मर नहीं सकता है वो अपने एक्जिस्टेंस से बाहर नहीं जा सकता है वो धर्म के मार्ग पर चलने वाले के साथ अन्याय नहीं कर सकता है तो क्योंकि ईश्वर सीमित है ईश्वर भी तो इसलिए मैं नहीं मान रहा हूं परमार्थ की दुनिया में ईश्वर सीमित है इसलिए मैं नहीं मान रहा हूं तो प्रश्न आपसे फिर यह बनेगा कि परमार्थ तो आपके लिए एजिस्ट ही नहीं करता ना क्योंकि आप ईश्वर को नहीं मानते तो कुल मिलाकर के ईश्वर को मानने वाला परमार्थ िक दुनिया के आधार पर ईश्वर को नकार नहीं सकता और ईश्वर को ना मानने वाला परमार्थिक दुनिया में ईश्वर का बाधित होना सिद्ध नहीं कर सकता ठीक है अर्थात ईश्वर का सर्वशक्तिमान सब कुछ कर सकने वाला सिद्ध होना व्यवहार में अनिवार्य है परमार्थ में नहीं क्योंकि परमार्थ तो प्राप्त व्य का विषय है मगर यह जितने भी तथाकथित तंत्र है जो ईश्वर के विषय

00:08:54:16 में बात करते हैं फिर वो भले ही सनातन विरोधी तंत्र हो इस्लाम ईसाई आदि या फिर वह तथाकथित सनातनी तंत्र आर्य समाज स्कोन आदि या जिनसे भी हम प्रश्न करते हैं इनके द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है वह व्यवहार में ही बाधित हो जाता है जिसे नास्तिकों द्वारा आसानी से नकारा जा सकता है क्योंकि जो मनुष्य के व्यवहार में ही बाधित हो जाए वह ईश्वर ईश्वर ही सिद्ध नहीं होता जिसके कारण अधर्म को समर्थन मिलता है धर्म का हास होता है अब इस प्रश्न को दूसरे पर्सपेक्टिव से भी समझ लेते हैं तो लीला रूप में अपनी शक्तियों को रेगुलेट करके एक निश्चित लीला में बाधित होना या फिर असमर्थ होना यह तो शक्तियों का ही एक और रूप भी हो सकता है कि उसने अपनी चीजों को रेगुलेट भी कर लिया मगर जब आप यह कहते हैं कि जब वह असमर्थता अपनी सिद्ध कर दे उसके बाद वह सामर्थ्य वान ना बन सके अर्थात उसके बाद असमर्थ से भिन्न उसका कोई एक्जिस्टेंस ना रह जाए या फिर वो मर जाए या फिर वो अपने एक्जिस्टेंस से बाहर चले जाए जब इस रूप में आप बात करते हैं तो आप अप्रत्यक्ष रूप से यह कह रहे हैं कि हम भी यह कहने लगे कि ईश्वर

00:10:09:22 सर्वशक्तिमान नहीं है भाई हमारे और आपके बीच में वैचारिक मतभेद इस चीज को लेकर है कि आप कह रहे हैं कि ईश्वर में सब कुछ हर स्थिति में सब कुछ कर सकने वाली शक्ति नहीं है और हम यह कह रहे हैं कि ईश्वर में हर समय में सब कुछ कर सकने वाली शक्ति है मगर जब जब आप यह कह देते हैं कि क्या व मर सकता है तो फिर आप यह कह रहे हैं क्या ईश्वर में शक्ति नहीं है क्या कोई ऐसी स्थिति हो सकती है जब ईश्वर में शक्ति ना रहे मतलब आप वाद विवाद के समय पर हमारे मुख के द्वारा अपने पक्ष को कलवाने का प्रयास मात्र कर रहे हैं इस कुतर्क के द्वारा आप कह रहे हैं कि ईश्वर शक्तिहीन है कुछ कुछ परिस्थितियों में तो आप यह चाह रहे हैं कि हम भी खुद ये स्वीकार कर ले कि ईश्वर शक्ति ने कुछ कुछ परिस्थितियों में तो ध्यान रखिए कि चर्चा इस बात पर है कि आपको सिद्ध करना है ईश्वर सब कुछ नहीं कर सकता और हमें सिद्ध करना है ईश्वर सब कुछ कर सकता है तो आप हमसे यह कलवा समय क्या ईश्वर मर सकता है आप हमसे यह कलवाना चाह रहे हैं कि ईश्वर सब कुछ नहीं कर सकता है तो आपको हमें ऐसा प्रश्न देना होगा जिसमें कि ईश्वर

00:11:24:24 की शक्ति मत्ता सिद्ध हो ना कि शक्ति हीनता अच्छा एक एक बात मैं और बताता चलूं आपको कि ये जो कुतर्क है यह करने वाले वो नास्तिक लोग होते हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की आड़ में अपनी जो पशुता है उसको पोषित करना चाहते हैं वो मर्यादाओं को नहीं मानना चाहते हैं वो बहन को बहन की दृष्टि से नहीं देखना चाहते हैं वो माता को माता की दृष्टि से नहीं देखना चाहते हैं धर्मेन हीना पशु भी समाना तो भगवान को प्राप्त कराने वाले विधि विधान मर्यादा का नाम धर्म है तो यदि धर्म को नकारना है तो हमें भगवान को ही नकारना पड़ेगा तो जो कुतर्क है ये ऐसे नास्तिक पैराडॉक्स वगैरह करते हैं और वो सारे तंत्र जो ईश्वर को स्वीकार तो करते हैं मगर अपूर्ण रूप में निश्चित रूप में सीमित रूप में जिनके मूल में भी नास्तिकता ही है वह सारे तंत्र भी जब उनके सामने कभी ऐसा प्रश्न आता है कि क्या आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है क्या वो किसी भी नियम के नीचे नहीं है बल्कि सभी नियमों को बनाने वाला सर्व नियामक है तो इस प्रकार के प्रश्न आने पर जो ये तथाकथित तंत्र होते हैं वह इन नास्तिकों के कुतर्कों का ही सहारा लेते हैं क्या ईश्वर मर सकता है क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसको वह स्वयं ना उठा सके तो आज के बाद आप इन

00:12:39:26 कुतर्कों से परेशान नहीं होंगे आपको बस यह जानना है कि दो दुनिया है एक व्यवहारिक और एक पार मार्थी पार मार्थी दुनिया में ईश्वर की निश्चिता के आधार पर उसे नकारा नहीं जा सकता और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार बिना पार मार्थी संसार को स्वीकारा नहीं जा सकता जय श्री [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 13:04 · 08 May 2024

क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बन सकता जिसको वह स्वयं ना उठा सके Part-2 #iskcon #aryasamaj #satyarthprakash

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