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00:00:07:20 तो सभी को जय श्री राम। एक चर्चा हुई है हाल ही में नास्तिक और आस्तिक के बीच में। हालांकि वह अगर वैदिक दृष्टि से देखें, सनातन की दृष्टि से देखें तो जो आस्तिकता के पक्ष में खड़े हैं और तार्किकता की दृष्टि से भी जो हम आगे बात करेंगे तो उनकी भी आस्तिकता सिद्ध नहीं होती। अ लल्लन टॉप पर ये चर्चा हुई है। एक मुफ्ती हैं उनके और जावेद अख्तर के बीच में। अच्छा चर्चा को लेकर के चर्चा को लेकर के मेरे पास कई सारे फोन कॉल्स आए और मैसेजेस आए मुझे। कई प्रबुद्ध जनों ने मुझसे संपर्क किया और कई समर्थकों ने प्रशंसकों ने भी कहा कि आप इस पर अवश्य अपनी समीक्षा भी प्रस्तुत करें। तो उसी के लिए वीडियो बनाया जा रहा है। हो सकता है वीडियो थोड़ा लंबा हो जाए तो हो सकता है दो भाग में हम इसको डालें और अगर ज्यादा लंबा नहीं लगा या फिर सहजता रही तो एक ही भाग में पूरा वीडियो डाल देंगे। सबसे पहली बात तो मैं बधाई से शुरू करूंगा क्योंकि आस्तिकता के पक्ष से भले ही जो मुफ्ती थे जो खड़े थे उन्होंने कम से कम आस्तिकता

00:01:23:01 का झंडा वहां पर तो झुकने नहीं दिया और जब भी कभी नास्तिक और आस्तिक के बीच के भेद की बात आएगी तो हम वहां पर आस्तिक के समक्ष आस्तिक के पक्ष में ही हमें खड़े होना होगा क्योंकि कम से कम नास्तिकता के कंपैरेटिवली जो अह जिसका ईश्वर ईश्वर सिद्ध नहीं होता है या फिर जो किसी भी प्रकार से एक तृतीय सत्ता को स्वीकार करता है। है ना कि कि भाई क्या करना है और क्या नहीं करना है। इस संबंध में थोड़ा बहुत भी जितना भी वह स्वीकार करता है कि कोई है हमारे ऊपर भी जो हमें यह बताए कि सही क्या है और गलत क्या है तो उस स्थिति में हमें नास्तिकता के नास्तिकता से जब भी बात हो रही होती है तो हमें आस्तिकता के साथ में ही खड़े खड़े होना होता है। तो सबसे पहले मैं बधाई दूंगा कि वहां पर उन्होंने जो आस्तिकता का ध्वज था वह झुकने नहीं दिया। कई मामलों में अह जो है जो जावेद अख्तर जी थे नास्तिक पक्ष से उनका जो है मोरल डाउन होता हुआ दिखा और उनके तर्क भी वीक दिख रहे थे कई जगहों पर। अच्छा इस क्रम में आगे बढ़ने से पहले मैं यह बात भी बोल दूं कि यह चर्चा मुझे जो है सुनियोजित ढंग से

00:02:39:03 पक्षपाती चर्चा भी मतलब आयोजन ये जो था वो पक्षपात विहीन नहीं था। पक्षपाती आयोजन था। क्यों था? क्योंकि जब आप अह आस्तिकता के पक्ष से या इस्लाम के पक्ष से किसी पक्षकार को आप लेकर के आ रहे हैं तो वह अपने यहां का मर्मज्ञ है। ऐसा नहीं है कि वहां के किसी आप बस जो जुम्मे की नमाज पढ़ता है उसको ले आए या जो मदरसा जाता है उसको ले आए आप। ऐसा नहीं है। आप वहां के किसी मर्मज्ञ को पकड़ के लाए इस सेगमेंट के जो इस्लाम को मानने वाले हैं। यानी कि इस्लाम को ईश्वर को मानने वाले हैं। हालांकि व्यापक दृष्टि से देखेंगे तो वो वहां पर मर्मज्ञ भी सिद्ध नहीं होंगे। मगर जब नास्तिक और आस्तिक की दृष्टि से देखेंगे तो आस्तिकता में जिस तंत्र से वो जुड़े हुए हैं अपने तंत्र के मर्मज्ञ हैं। ठीक है? वहीं पर दूसरी ओर क्या दिखाया? क्या देख रहे हैं हम लोग? कि जावेद अख्तर जी जो हैं वह एक सामान्य नास्तिक हैं। कोई उन्होंने उसमें मर्मज्ञता प्राप्त नहीं की है। जिनके जिन्होंने कोई अपने दार्शनिक विचार दिए हो समाज को और समाज जिससे प्रभावित होकर उनको फॉलो कर रहा हो। जावेद अख्तर जी मर्मज्ञ हैं। गीतकार हैं। गीत लिखते हैं। जो उनका लेखन है

00:03:54:07 जो जो भी कह लें कवि हैं या जो भी उनको कह दिया जाए साहित्यिक दृष्टि से तो उनकी पहचान वो है। वो गीत लिखने के मर्मज्ञ हैं और संभवत अगर ये गीत लिखने की प्रतियोगिता होती तो उसमें पल्ला किसका भारी रहता? जावेद अख्तर जी का। परंतु क्योंकि यह नास्तिक और आस्तिक मतलब एक दार्शनिक विषय पर चर्चा हो रही थी तो दार्शनिकता के मामले में कोई उनका ऐसा कोई ठोस बैकग्राउंड मुझे नहीं मिला है जावेद अख्तर जी का तो पहली बात तो यह है कि एक ओर से आप इस्लाम की तरफ से ला रहे हो एक मर्मज्ञ व्यक्ति को और दूसरी ओर से ला रहे हो एक नॉर्मल व्यक्ति को एक सामान्य फॉलोअर को नास्तिकता का फॉलोअर यही कहेंगे उसे तो उसको आप लेकर के आ रहे हो तो पहली बात तो यह दूसरी बात कुछ वहां पर यह भी रहा। खैर यह बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता कि जो जावेद अख्तर जी थे वृद्ध होने के कारण या किसी किसी भी कारण से जो बात करने का तरीका था जावेद अख्तर जी के पास जो है एनर्जी कम दिख रही थी। एनर्जी नहीं थी उनकी। कहीं-कहीं पे उनके हाथ भी कांप रहे थे। अब वो हो सकता है मोरल डाउन होने की वजह से कांपने लगते हैं। जब व्यक्ति को असहज

00:05:09:13 स्थिति महसूस होने लगती है तब भी ऐसा होता है। तो उस उस पर तो बहुत ज्यादा बात नहीं करेंगे। इसके बाद फिर और ज्यादा ये पक्षपाती चर्चा कैसे दिख रही है कि चर्चा में मुफ्ती जी की ओर से एक पक्ष रखा गया था। वो क्या पक्ष था कि जो भी चीज किसी और पर निर्भर है। है ना? मतलब वो कार्य कारण वाला कि दुनिया में जो भी कुछ हो रहा है उसका एक मूल कारण है। तो जब उन्होंने पक्ष रखा था तो यह जो थ्योरी है इसको क्या नाम दिया था उन्होंने? कंटेंजेंसी थ्योरी है ना कुछ ऐसा ही शब्द था। मेरा अभी बहुत आंग्ल भाषा में बहुत अच्छी पकड़ नहीं है। तो आप लोग उसको इग्नोर करिएगा। ऐसी कोई त्रुटि हो जाए शब्द के उच्चारण में तो उन्होंने जब यह थ्योरी दी थी तो लल्लन टॉप इस थ्योरी को लेकर के यह फैला रहे हैं कि जो थ्योरी है यह ग्रीक से आई है। यह फला से आई है। वहां से आई है। मगर यह नहीं बता रहे कि भैया सनातन धर्म ग्रंथों में भी ये थ्योरी दी गई है। क्यों नहीं बता रहे? भाई चलो सनातन धर्म ग्रंथों में नहीं बता रहे। तो सनातन के इतने सारे विचारक हैं जिन्होंने आदि शंकराचार्य जी से लेकर रामानुजाचार्य जी से लेकर के मधवाचार्य जी अपने

00:06:25:03 ग्रंथों में कहीं ना कहीं इस थ्योरी को दिया है। हम मगर उसको आप प्रेजेंट ना करके और उनके कई सालों के बाद आने वाले लोगों के नाम उल्लेख मिला रहे हैं। तो जाहिर सी बात है इसमें वो जो जेएनयू जेएनयू का जो एजेंडा है और जो एक नास्तिकवादिता है या फिर धर्म से दूर ले जाने वाली बात है या फिर वो सेकुलर जो विचारधारा है तथाकथित सो कॉल्ड तो उसको पोषित करने के लिए किया जा रहा है और इस्लाम को ग्लोरिफाई करके करने के लिए किया जा रहा है कि एक पक्ष का व्यक्ति मजबूत वाला लाए मर्मज्ञ और एक पक्ष का जो हल्का और फिर बाद में आप जो उस थ्योरी को जिस थ्योरी के कारण जो है उसमें जो जीत दिखाई दे रही है आस्तिकता के पक्ष की तो उस थ्योरी से भी आप अन्यों को जोड़ रहे हो। आप वहां पर सत्यता नहीं बता रहे हो कि जिन लोगों का आपने नाम लिया उनसे कई वर्ष पूर्व का इतिहास मिलता है। वो इतिहास जिसको जो सामान्य जो आधुनिक विज्ञान है उसने भी स्वीकार किया है। वेद इत्यादि वेद जो वेद हैं ऋग्वेद हैं उनको यूनेस्को द्वारा प्रमाणित किया गया है कि वह जो है ईसा से भी अह करीब 1500 1800 वर्ष पूर्व की उनकी लिपि मिली

00:07:40:04 है अस्तलिपि तो ये सब बातों बातें जो ये दिखा रही प्रस्तुत कर रही हैं कि चर्चा सुनियोजित ढंग से एक पर्टिकुलर एक सेक्ट को या इस्लाम को कहें उसको ग्लोरिफाई करने के लिए कि एक एक चीज इसमें और आती है कि जावेद अख्तर जी ने बार-बार जब यह कहा कि भाई अगर ईश्वर है तो बुरा क्यों हो रहा है दुनिया में हम तो जो बुरा हो रहा है गाजा में तो उसके उदाहरण के लिए उन्होंने गाजा का उदाहरण दिया तो यह भी एक वो वाली चीज है कि सिंपैथी जब हासिल करनी है तो किसके लिए आप हासिल कर रहे हो जावेद अख्तर जी को बांग्लादेश में जो दीपपूस मारा जा रहा है जलाया जा रहा है त्रिपुरा में स्त्रियों को नग्न किया जा रहा है और भी बहुत सी चीजें हो रही हैं हमारे आसपास नजदीक वह नहीं आपको दिखाई दे रहा है या फिर कश्मीरी पंडित मारे जा रहे हैं लोग हैं उसमें वो सब आपको नहीं दिखाई दे रहा है आपको गाजा ही दिखाई दे रहा है तो एनी हाउ चाहे नास्तिकता की ओर से चाहे आस्तिकता की ओर से टू द पॉइंट एक सेंटर एक इस्लाम मतलब इस्लाम को ग्लोरिफाई करने के सेंट्रिक ये जो है चर्चा पूरी दिखाई देती है। वह बात और है कि इस चीज का ध्यान रखा गया कि भाई

00:08:56:21 पर्टिकुलर किसी एक अगर आप कहेंगे उसको रिलीजन मजहब क्योंकि धर्म तो वो सिद्ध नहीं होता है तो आपके हिसाब से रिलीजन या मजहब कह दें और लोकाचार की दृष्टि से क्योंकि आपको मेरी बात समझ में आ जाए तो धर्म भी कह सकते हैं। हालांकि धर्म सिद्ध नहीं होता है। तो पर्टिकुलर इस्लाम को ग्लोरिफाई करने वाली चर्चा दिखाई दी। अब आगे बढ़ते हैं। इसकी जो समीक्षा है मैंने कुछ

00:09:33:13 पांच पार्ट में तैयार की है। पहला पार्ट है छह पार्ट में सॉरी पह शुरुआत के जो दो पार्ट है कि अह जो मुफ्ती हैं उन्होंने किन पॉइंट्स के आधार पर किन दो पॉइंट्स के आधार पर ईश्वर की ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया है? क्या वह जो पॉइंट्स हैं जिनके आधार पर ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध हो रहा है। क्या उनसे इस्लाम रिलेट कर पाता है? इस्लाम सिद्ध होता है इस्लाम का कनेक्शन कि नहीं सिद्ध होता है? जिस जिन सिद्धांतों के द्वारा नास्तिकता को हराया गया है। है ना? क्या उनसे इस्लाम का कनेक्शन सिद्ध होता है? क्या मुफ्ती जी ने इस्लाम के सिद्धांतों के द्वारा नास्तिकता का खंडन किया है? या फिर इस्लाम के ठीक विपरीत जिन सिद्धांतों को इस्लाम नहीं मानता है और अगर उसके मूल में चले जाए तो सनातन सिद्धांतों के आधार पर नास्तिकता का खंडन किया है। तो ये हम देखेंगे शुरू के दो पॉइंट्स में और इसके बाद के जो चार पॉइंट्स हैं उसमें एक जो कुतर्क किए गए हैं जावेद अख्तर जी के द्वारा भी और मुफ्ती जी के द्वारा भी और वहीं पर जा जो कुछ अच्छी चीजें की गई हैं। अच्छी

00:10:48:21 चीजें कही गई है, उठाई गई हैं। तो जावेद अख्तर जी के द्वारा भी और मुफ्ती जी के द्वारा भी। ये चार चीजें भी हम देख लेंगे। तो सबसे पहली बात है कि मुफ्ती जी का कहना यह था कि यदि इस संसार में नष्ट होने वाली चीजें हैं तो उनका कोई ना कोई मूल है। उसी मूल को हम ईश्वर कहते हैं। और वो जो मूल है वो सर्वशक्तिमान है। ओमनीपोटेंट सर्वज्ञ है। ऑल नोइंग है। ओमनी प्रेजेंट इस्लाम नहीं मानता है। मगर ओमनी प्रेजेंट ना होने के कारण उसमें क्या-क्या दिक्कतें आएंगी वह भी है। अच्छा इसमें एक बात और है कि उन्होंने अपनी स्पीच को शुरू होने से पहले उन्होंने अपनी स्पीच को शुरू करने से पहले कहा कि भाई वो जो इस संसार को बनाने वाले रचयिता को मतलब उन्होंने अभिवादन किया उसका। तो सबसे पहली बात है क्या जो इस्लाम का ईश्वर है वह संसार को बनाने वाला सिद्ध होता है? क्या जो इस्लाम का ईश्वर है वो इस संसार का मूल कारण सिद्ध होता है? क्या जो

00:12:03:27 इस्लाम का ईश्वर है वह सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है? क्या जो इस्लाम का ईश्वर है वह सर्वज्ञ सिद्ध होता है? नहीं होता है। इनमें से कोई भी चीज वहां लागू नहीं होती। पहली बात संसार को बनाने वाला सिद्ध क्यों नहीं होता है? क्योंकि वह कहीं पर है और जहां वो है वहां एक स्थान पर वो बैठा हुआ है या खड़ा है जो भी है जो भी उसकी स्थिति है। मगर वो स्थान उसने नहीं बनाया। हम जहां वो है वो स्पेस उसने नहीं बनाया। उसने उस स्पेस में जो जो मटेरियल है मतलब जैसे सूरज, चंद्रमा, धरती इत्यादि यह सब जरूर बनाया मगर वो जो स्पेस है जहां पे वो है वो उसने नहीं बनाया। और यह जो सूर्य, चंद्रमा इत्यादि उसने बनाया है इस इसमें जो मटेरियल यूज़ होता है यानी कि जैसे मिट्टी धरती को बनाने के लिए मिट्टी चाहिए ना। और भी जो जो कुछ भी मटेरियल यूज होता हो वह मटेरियल उसने बनाया है कि नहीं बनाया या फिर पढ़ा हुआ था उसने यूज़ कर लिया तो इन चीजों से जो वो इस्लाम का ईश्वर है वो

00:13:19:01 सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं होता है। वो रचयिता सिद्ध नहीं होता है। सर्वशक्तिमान तो अभी आगे के स्टेप में आएगा। वह रचयिता सिद्ध नहीं होता। तो आप जो कह रहे हो ना कि सब कुछ बनाने वाले को हम प्रणाम करते हैं। आपकी भाषा में जो भी अभिवादन किया वो अभिवादन आपने इस्लाम के ईश्वर को नहीं किया। अगर आप उसको सर्वोच्च रचयिता मान रहे हैं क्योंकि इस्लाम का ईश्वर यहां पर एक कुम्हार की तरीके से प्रस्तुत हो रहा है। जो कि एक मिट्टी लेके घड़ा बनाता है। मगर मिट मिट्टी को उसने नहीं बनाया। मिट्टी पर उसका कंट्रोल नहीं है। मिट्टी का रचयिता वह नहीं है। इसलिए वह सब कुछ बनाने वाला सिद्ध नहीं होता है। दूसरी बात आपने कही कि वो सर्वशक्तिमान है। अब सर्वशक्तिमान है तो इसमें सबसे पहले तो एक वही आ जाता है कि अगर सर्वशक्तिमान है और वह सब कुछ कर सकता है तो वह अवतार क्यों नहीं ले सकता है? वह मनुष्यों के बीच में क्यों नहीं आ सकता है? मनुष्यों के बीच में ना आने वाली अगर बात कहें तो वहां पर आपके दो चीजें आती कि जो क्रिएशन उसने खुद बनाई है वह उसमें खुद कैसे आ जाएगा। है ना? तो अब यह जो क्रिएशन उसने बनाई है अगर आपके इस बात पर हम बात करें तो क्या उसने सृष्टि में किसी एक जगह पर खड़े होकर के अपने से दूर क्रिएशन बनाई है? पहली नंबर

00:14:34:04 बात यह हो सकता है कि भाई जैसे आज हम पृथ्वी पर हैं और यहां से हजारों करोड़ों किलोमीटर दूर कहीं पर जो इस्लाम का ईश्वर है वह बैठा हुआ है। उसने अपने से हजारों करोड़ों किलोमीटर दूर जो है ये क्रिएशन बनाई है। ठीक है? तो अगर ऐसा है तो क्या ये दूरी वो तय नहीं कर सकता है? पहली बात। और यदि डायमेंशन की बात है जैसे आप कहते हैं कि मेटाफिजिकल यदि डायमेंशन की बात है कि मेटाफिजिकल जो रियलिटी है और एक है फिजिकल रियलिटी तो अगर डायमेंशन की बात है कि जिस डायमेंशन में वो है उसने दूसरे डायमेंशन में अ सृष्टि बनाई है तो तब भी आप एक क्या वो एक डायमेंशन से दूसरे डायमेंशन में जा सकता है कि नहीं यह वाला भी आ जाएगा सवाल जब आप उसके अवतार या उसकी मूर्ति पूजा या उसके स्वरूप रूप लेने को बाधित करते हैं। कुल मिलाकर के वह बाध्य सिद्ध होता है क्योंकि वह यहां पर मूर्ति पूजा का आपके यहां पर खुलकर विरोध किया गया है।

00:15:34:21 मेटाफिजिकल की एक बात मैं आपको बता दूं कि आपने जब ये क्लेम किया ना कि मेटा मेटाफिजिकल क्योंकि वो है इसलिए जो है जो साइंटिफिक या प्रैक्टिकल ये सब चीजें उस पर लागू नहीं होंगी तो उसके लिए ये वाले सबूत नहीं मांगे जाएंगे। साइंस डजंट हैव द प्रोसेससेस टू प्रूव और डिस्प्रूव द एकिस्टेंस ऑफ़ गॉड। व्हाई? क्योंकि साइंस का ताल्लुक एंपेरिकल एविडेंस से है और एंपेरिकल एविडेंसेस का ताल्लुक हमारे नेचुरल और फिजिकल वर्ल्ड से है। जबकि गॉड नॉन फिजिकल और सुपर नेचुरल रियलिटी है। लिहाजा नॉन फिजिकल रियलिटी को आप उस टूल के साथ नहीं चेक कर सकते जिसका काम

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00:16:17:18 फिजिकल रियलिटी को तलाश करना है। लिहाजा आज इस डिबेट में गॉड की एग्ज़िस्टेंस को साबित करने या उसे डिनाई करने में साइंटिफिक एविडेंस को एक्सेप्ट नहीं किया जाएगा। हालांकि इस चीज को काउंटर किया है आगे चलकर के जावेद अख्तर जी ने जो काउंटर अच्छा था कि भाई मेटाफिजिकल है क्या जो हम मान लें कि भाई ये क्योंकि ये जो है हमारा जो खुदा है या हमारा जो ईश्वर है इस्लाम का वो मेटाफिजिकल रियलिटी है। नॉन फिजिकल रियलिटी है। इसलिए उस पर जो है ये साइंस वाली चीजें साइंस वाले सवाल नहीं किए जाएंगे। साइंस के प्रमाण नहीं मांगे जाएंगे। तो पहले आपको उसका मेटाफिजिकल रियलिटी का अस्तित्व सिद्ध करना होगा ना। आप यहीं से शुरू कर रहे हो कि वह जो है हमारा इस्लाम का ईश्वर वो मेटाफिजिकल रियलिटी है। आपने मेटाफिजिकल रियलिटी को सिद्ध नहीं किया है। आप सीधे यहीं से शुरू कर रहे हो। तो आपको सिद्ध करना चाहिए था। तो इस बारे में उन्होंने पूछा भी आगे चलकर के तो आपने कोई ऐसा जवाब नहीं दिया। अब उसको वहां पर बातें जो है छूट गई। अधूरी नहीं। कि मेटाफिजिकल रियलिटी सिद्ध कैसे होती है? यह भी तो हो कि जो हम ये संसार देख रहे हैं, प्रपंच रूपी संसार हम देख रहे हैं,

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00:17:32:12 जो ये जड़ देख रहे हैं, क्या इससे विपरीत कोई रियलिटी है? यह जो संसार हम देख रहे हैं, जो हमारी इन कर्मेंद्रियों का इन ज्ञानेंद्रियों का विषय है। क्या इसके विपरीत कोई ऐसी रियलिटी है जो हमारी कर्मेंद्रियों और हमारी ज्ञानेंद्रियों का विषय ना हो। समझ रहे हैं? तो इस बारे में आपने बात नहीं की। आपने तो यहीं से शुरू किया कि हमारा जो है वो मेटाफिजिकल रियलिटी है। अच्छा दूसरी एक बात यह भी आती है कि वो मेटाफिजिकल रियलिटी सिद्ध भी नहीं होता। मेटाफिजिकल रियलिटी को अगर हम सरल शब्दों में हिंदी में अगर कहें तो वो

00:18:08:00 व्यवहार में ना आ सकने वाली स्थिति है। मतलब वो एक ऐसी रियलिटी है जो हमारे व्यवहार में नहीं आ सकती। वो हो गई मेटाफिजिकल रियलिटी। ठीक है? मगर आपने यह व्यवहार में ना आ सकने वाली बात ना ही सिद्ध की और ना ही आप जिस ईश्वर को मानते हैं वो मेटाफिजिकल सिद्ध होता है क्योंकि आखि रात में भी जो लोग यहां से मोक्ष प्राप्त करते हैं आपके अनुसार जो मोक्ष है या जो भी है कुछ कहते होंगे आप उसे आखी रात कहते हैं क्या कहते हैं तो आपके अनुसार जब व्यक्ति यहां से जाता है तो वहां पर व्यवहार कर रहा होता है वो वहां पर भी व्यवहारिक है हम तो वो व्यवहारिक कैसे हो रहा है वहां पर? और अभी भी जब यहां पर हैं तो कुछ उसने ऐसी चीजें की हैं आपके यहां पर जो व्यवहार में आ रही हैं। तो फिर वो मेटाफिजिकल सिद्ध नहीं होता है। पहली बात कि मेटाफिजिकल इस्लाम का ईश्वर सिद्ध नहीं होता है और कुम्हार जैसा सिद्ध होता है जो कि मिट्टी लेकर के घड़ा बना रहा है। और तीसरी बात कि आपने मेटाफिजिकल रियलिटी को सिद्ध ही नहीं किया। आपने सीधे क्लेम कर दिया कि वह मेटाफिजिकल रियलिटी है। अब इस इसके बाहर जाकर के आप जो है साइंस को लाकर के सवाल नहीं कर सकते।

00:19:23:13 अब आ जाते हैं अपने मूल विषय पे जो कंटेंजेंट वाली थ्योरी दी आपने कंटिंजेंसी वाली। तो उसमें आपने कहा कि जो सबका मूल है वही ईश्वर है।कि ये यूनिवर्स और इस यूनिवर्स की तमाम चीजें कॉनंटिंजेंट है। कंटिंजेंट होने का मतलब यह होता है कि जो अपने एक्सिस्टेंस पे किसी के ऊपर डिपेंड करती हो। तो फिलॉसोफर्स की इस्तिला के मुताबिक हम उस टर्मिनोलॉजी के मुताबिक हम उस जगह तक पहुंचते हैं और उस हस्ती तक पहुंचते हैं जिसे नेसेसरी बीइंग कहा जाता है कि ये वो नेसेसरी बीइंग है जिसका मौजूद ना होना नामुमकिन हो। चूंकि अगर ये मौजूद ना हो तो सारी चीजें एक्सिस्टेंस में आएंगी ही नहीं। और ये सारी डिप कंटिंजेंट चीजें उसी के ऊपर डिपेंड करती है। ठीक है? है जो सबका मूल है वही ईश्वर है। परंतु जहां पर इस्लाम का ईश्वर बैठा है वो एक तख्त पे है, सातवें आसमान पे है। तो उसका मूल क्या है? वहां जो वहां जो इस्लाम के ईश्वर के अलावा जो दूसरी चीजें हैं उसका मूल क्या है? क्योंकि ईश्वर तो वहां स्वयं वहीं से स्टार्ट कर रहे हो चीजें। तो वो तो उसका मूल हुआ नहीं। अगर मूल हुआ तो वो चीजें भी उसी से निकलनी चाहिए थी। स्पेस भी उसी से निकलना चाहिए था। स्पेस पे उसका कंट्रोल होना चाहिए था। क्या है ऐसा? क्या इस बारे में कोई विवेचना है? मुझे अभी तक प्राप्त नहीं है।

00:20:38:19 अच्छा दूसरी बात कि अगर हम सबका मूल माने आपकी थ्योरी के हिसाब से तो इतनी बात तो तय है कि उसका सर्वज्ञ होना सर्वशक्तिमान होना बहुत आवश्यक है। और इन दोनों चीजों के लिए उसका सर्वव्यापक होना बहुत आवश्यक है। और जबकि इस्लाम का ईश्वर जो है वो सर्वव्यापक नहीं है। इसलिए ना वह सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है ना ही वह सर्वज्ञ सिद्ध होता है। यहां पर एक बात मैं बताता चलूं कि जो सनातन ईश्वर की व्याख्या की गई है, वहां पर यह जो मेटाफिजिकल वाली बात है वह लागू होती है कि वो स्टार्ट होती है कि एक स्थिति ऐसी है जो व्यवहार में नहीं आ सकती स्पष्ट शास्त्रों में लिखा हुआ है। कोई व्यवहार नहीं हो सकता उसके लिए और फिर वह ऐसा रूप लेती है जो व्यवहार में आ सकती है। ठीक है? मतलब व्यवहार में ना आ सकने वाली भी बात कही गई है और फिर उसके बाद वो अपने को प्रकट करती है या किसी के व्यवहार में आ सकने लायक बनाती है। वो उस पर हम बात करेंगे। अभी आ जाएगा अभी। तो इसको थोड़ा सा यह जो मूल पीछे जाने वाले मामले को थोड़ा सा इस तरह से देखते हैं कि अगर हम यह सोचें कि आपके वाले ईश्वर से इस्लाम वाले ईश्वर से अगर हम यह सोचना शुरू करें कि क्योंकि सबके पीछे मूल कारण है तो

00:21:53:22 इससे ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। वही ईश्वर है। वही इस्लाम का भी ईश्वर है। तो इस्लाम का ईश्वर सब जगह नहीं है। इस्लाम का ईश्वर एक जगह बैठा हुआ है और वहां से उसका कहना है कि मैं पूरी दुनिया को कंट्रोल करता हूं। ठीक है? अच्छा दूसरी बात यह है कि इसमें हम लोग इधर से अगर चलना शुरू करें तो इसमें एक बात कही जा सकती है कि सबके पीछे मूल में हम ईश्वर है या कोई मूल कारण है उसी का नाम ईश्वर है तो ऐसा भी तो हो सकता है कि 5 किलोमीटर के एरिया का मूल कोई और हो फिर उसके बगल के 5 किमी के एरिया का मूल कोई और हो फिर उसके बगल के 5 किमी के एरिया का मूल कोई और हो तो ये अलग-अलग ईश्वर हो गए मगर ऐसा तो आप मानते नहीं कोई भी नहीं मानता उसका उसका कारण है। उसका कारण क्या है कि ये जो 5-प किलोमीटर के भाग बने हुए हैं, यह एक 5 कि.मी. वाला भाग दूसरे 5 कि.मी. वाले भाग पर आपत्ति या फिर व्यवधान ना डाले। और अगर व्यवधान डालेगा तो फिर वहां की जो अह पूरा सुप्रीम कंट्रोल है, या तो वह उसके हाथ में नहीं रहेगा अगर व्यवधान पड़ रहा है। और नहीं तो वह व्यवधान नहीं डालेगा। इसका मतलब दोनों में सामंजस्य होगा। और सामंजस्य होगा बिल्कुल भी अंतर नहीं होगा। तो वहां पर एकत्व सिद्ध हो गया। यानी कि पूरे पर एक ही

00:23:08:24 का कंट्रोल होना बहुत आवश्यक है। यह तो हमें समझ में आ गया। अब बात ये आती है कि क्या जो इस्लाम का ईश्वर है उस उसकी जो ये जो ओमनीपोटेंट वाली बात है और पूरे पे सर्व नियंता वाली बात है। वो सिद्ध होती है। नहीं होती। क्यों नहीं होती? क्योंकि वह यह कहता है कि ईश्वर कण-कण में नहीं है। वह सर्वव्यापक नहीं है। वह किसी एक जगह बैठा हुआ है और उसकी शक्ति पूरे जगत में है। यानी कि उसने ये मान लिया कि उसमें और उसकी शक्ति में अंतर है। इसीलिए तो वो यह कह रहे हैं कि वो वहां नहीं है जहां पर उसकी शक्ति है। तो जब हम यह कह देंगे कि भैया शक्ति है वह वहां नहीं है तो कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ अंतर आ गया। उसकी शक्ति और उसमें और जब शक्ति और उसमें अंतर आ गया तो यह मानना पड़ेगा कि जहां पर इस्लाम का ईश्वर स्वयं बैठा है जितना कंट्रोल जो कंट्रोल वहां पर है उसका उतना ही कंट्रोल वहां पर नहीं है जहां पर उसकी शक्ति है तो यहां पर उसका जो क्या कहते हैं बाधित हो गया जो उसका सर्व नियंता होने वाली बात थी वो यहां पर बाधित हो गई दोबारा से एक और तरीके से क्यों क्योंकि जितना कंट्रोल वो जहां पर स्वयं है वहां कर रहा है उतना कंट्रोल वहां नहीं

00:24:23:27 कर पा रहा है जहां पर उसकी शक्ति है। और अगर वह यह कहेगा कि मेरा कंट्रोल वहां जो शक्ति है वह भी मेरे बराबर की शक्तिशाली है तो फिर शक्ति और उसमें अंतर क्या रहा? कुछ तो अंतर मानना पड़ेगा। जो अंतर हो जाएगा जैसे ही जरा सा भी अंतर हो जाएगा शक्ति और उसमें हम वैसे ही अ शक्ति कम हो जाएगी और जो है जहां वो बैठा हुआ है वहां पर उसका कंट्रोल ज्यादा हो जाएगा। तो क्योंकि आपने उसको सर्वव्यापक नहीं माना है। इसलिए उसकी वो सर्व नियंता सिद्ध नहीं होता है। और वहीं पर सनातन ईश्वर क्या है कि वो अपनी शक्ति के रूप में सब जगह विद्यमान है और पूर्ण रूप से विद्यमान है। तो शक्ति पूर्ण रूप से विद्यमान होने के कारण वो एक तो अभी मैं इसको और थोड़ा और सर्व्यापकता को और मैं थोड़ा सा क्लियर कर दूंगा। तो मगर यह है कि सनातन ईश्वर अपनी शक्ति के रूप में सर्व्यापक है। हम जहांजहां उसकी शक्ति वहां वहां शक्ति के रूप में वही है। अभिन्न जो सनातन ईश्वर है। और एक बात और कि शक्ति शक्तिमान को कभी द्वैत भाव में नहीं डालती है। मतलब हम शक्ति को शक्तिमान से अलग करके नहीं देख सकते हैं। यह

00:25:38:28 हमारी थ्योरी है। आप देख रहे हैं कि भैया वो नहीं है उसकी शक्ति है। तो वह द्वैत भाव में नहीं डालती। तो द्वैत भाव में ना डालने का मतलब क्या है कि भैया यह तो दो चीजें हो गई अलग-अलग तो हो गई तो जैसे कि मैं कहूं कि मेरा नाम शिवश नारायण द्विवेदी है। अब कोई गए अब मैं एक व्यक्ति हूं मगर कोई गए नहीं है। यहां पर तो दो हैं। एक से ज्यादा एंटिटी है कि क्या शिवश के हाथ भी तो हैं। आंख भी तो हैं। तो जैसे ये मेरे अभिन्न अंग है। इनको मिलकर के मैं बनता हूं। ऐसे ही जो शक्ति है वो ईश्वर का अभिन्न अंग है। उसको मिलकर के वो स्वरूप भूत है। ईश्वर के स्वरूप भूता है। तो ईश्वर की शक्ति के रूप में ईश्वर भी स्वयं सब जगह विद्यमान है पूर्ण रूप से। और इसीलिए वो वहां पर सुप्रीम कंट्रोलर है हर जगह का। जैसे हम कई बार कह देते हैं कि भाई उसने अपने फ्री विल से किया। किसी व्यक्ति ने फ्री विल से किया। आगे चलकर के ये बात भी आएगी कि फ्री विल से हुआ। तो क्या वहां पर ईश्वर का कंट्रोल नहीं है क्या? और कंट्रोल है तो कैसे कर पा रहा है वह कंट्रोल? किस माध्यम से कर पा रहा है? कनेक्शन क्या है? तो हमें वहां पर कहना पड़ेगा ना कि भैया वह अपनी शक्ति के रूप में वहां पर फुली कंट्रोल कर रहा है। तो क्योंकि वह अपने क्योंकि ये जो अ

00:26:55:03 इस्लाम का ईश्वर है यह सर्वव्यापक नहीं है। इसलिए यह समान रूप से सब जगह सर्व नियंता सिद्ध नहीं होता। और कई जगह कह भी रखा है इसने कि मैं यह नहीं कर सकता, मैं वो नहीं कर सकता। हम आगे चलकर के भी यह बातें कुछ आएंगी। क्या नहीं कर सकते? जैसे कि कंट्रोल नहीं कर सकते। यह मान रहा है। क्या इस्लाम का ईश्वर किसी व्यक्ति के मन को कंट्रोल कर सकता है? अगर कर सकता है तो जावेद अख्तर जी ने जब यह सवाल पूछा था कि वो जो है कत्ल क्यों कर रहे हैं लोग? यह क्यों हो रहा है? वो क्यों हो रहा है? तो वहां पर आपने सटीक उत्तर नहीं दिए थे। है ना? जो टू स्टॉप द ट्रेन पुल द चैन हो जाता है। वह उत्तर हमें प्राप्त नहीं हुए थे। वह उत्तर हम देंगे। अब

00:27:41:03 तो कुल मिलाकर के कहने की बात कहने का अर्थ यह है कि हमें अनलिमिटेड ईश्वर की आवश्यकता है। अगर ईश्वर है तो वह अनलिमिटेड होना चाहिए। देश काल परिस्थिति से बाधित नहीं होना चाहिए। और आप जिस ईश्वर की परिभाषा को दे रहे हैं, वह काल से तो बाधित नहीं है। एटरर्नल कह रहे हैं काल से। मगर देश से बाधित है, परिस्थिति से बाधित है। देश से क्या बाधित है? देश से बाधित यह है कि यहां है वहां नहीं है तो यहां बाधित है और फिर परिस्थिति से क्या बाधित है कि भैया जिसने वह सृष्टि बनाई वह उसमें कैसे आ सकता है अच्छा जब आप एक जगह पर यह कह देते हैं कि भैया ये मेटाफिजिकल रियलिटी है ये हमको कहीं-कहीं पर ऐसा मानना पड़ेगा कि भैया ये चीजें हमारी जो ये जो इंद्रियां हैं उसके बाहर की चीजें हैं। तो हम प्रैक्टिकली चीजों को नहीं समझ सकते। मगर फिर भी क्योंकि मैं बताऊंगा कि उसके अवतार ले सकने वाली क्षमता होने की भी आवश्यकता कैसे सिद्ध होती है। है ना वो आवश्यकता भी कैसे सिद्ध होती है। हालांकि सर्व्यापकता से तो अभी सिद्ध किया अ सर्व्यापकता से और सिद्ध करेंगे। मगर वो उसकी भी आवश्यकता है। अगर उसे ईश्वर सिद्ध करना है कि वो क्या कहते हैं? अवतार भी ले

00:28:56:04 सके। उसकी मूर्ति पूजा भी हो सके। उसकी भी आवश्यकता है। तो कहने का अर्थ यह है कि वह जो है लिमिटेड देश से और परिस्थिति से वह बाधित है और सनातन ईश्वर वह है जो देश कृत कालकृत और परिस्थिति कृत किसी भी बाधा से बाधित नहीं है। तो अब आप सोचो कि आप यह सब सवाल आपसे किए नहीं गए वहां पर जावेद अक्सर जी के द्वारा। परंतु यदि आप जीत रहे हैं वहां पर तो वहां पर कौन सा ईश्वर जीत रहा है? मूल कौन सा ईश्वर सिद्ध हो रहा है? क्या इस्लाम का ईश्वर मूल सिद्ध हो रहा है सभी जगह का? क्या वह सबका रचयिता सिद्ध हो रहा है? क्या वह सर्वशक्तिमान सिद्ध हो रहा है? और सर्वज्ञ भी सिद्ध नहीं होगा। आपकी एक दलील है। सर्वज्ञ क्यों नहीं सिद्ध हो रहा है?

00:29:46:14 सर्वज्ञ इसलिए नहीं सिद्ध हो रहा है क्योंकि आपने वीडियो में एक जगह कहा है कि छुरी बनाने वाले को दोष नहीं आता है। छुरी के गलत इस्तेमाल करने वाले पर दोष आता है। है ना? क्रिएटर ने इविल को बनाया है टेस्ट के लिए वो इविल नहीं है। इविल वो होगा वो होगा जो उसे इख्तियार करेगा। छुरी को बनाने वाला गलत नहीं होता है। छुरी का गलत इस्तेमाल करने वाला गलत होता है। क्या जो छुरी बनाने वाला है जब उसको ये मालूम है अगर वो सर्वज्ञ है तो उसे मालूम होना चाहिए कि इस छुरी का क्या उपयोग होने वाला है। तो तो वो उसको रोक देगा और वो कंट्रोलर भी है। मगर नहीं रोक रहा है तो दोष आएगा ना। आपको मालूम भी है और आप में रोकने का सामर्थ्य भी है। आपको पाप का बोध भी हो रहा है और आपके पास सामर्थ्य भी है क्योंकि आप स्वयं को सुप्रीम कंट्रोलर भी कह रहे हो। फिर भी आप नहीं रोक रहे हो तो आप कर आप पर दोष आएगा ना। सनातन ईश्वर पर नहीं आएगा। वो जो डेफिनेशन है वो आपको स्वीकार करनी पड़ेगी। पर वो तो आपने स्वीकार नहीं की है। तो आपके इस तर्क से आपके इस्लामिक ईश्वर का खंडन हो जाता है। उसकी सर्वज्ञता को आपने छीन लिया। जब आप यह कह दिया कि छुरी बनाने वाले को दोष लगता है। छुरी का गलत इस्तेमाल करने वाले को नहीं। अगर छुरी बनाने वाला यह जानता है कि

00:31:01:18 मैं जो बम बना रहा हूं बम बनाने वाला जो जानता है मैं जो बम बना रहा हूं देश की रक्षा के लिए नहीं स्कूल में बम या जो दिल्ली में अभी हुआ है ना कार के अंदर बम लगा करके या जो भी लगाया हो उसके लिए यूज़ होने वाला है। तो जब वो यह जानता है और प्लस उसके पास सामर्थ्य है कि वो चाहे तो चुटकी बजा के सब रोक सकता है। मगर फिर भी वह जब नहीं रोक रहा है तो उस पर दोष आता है। अब सनातन ईश्वर पर क्यों नहीं आ रहा है आता है वह भी मैं आगे बताऊंगा हम

00:31:35:25 तो कंटिंजेंसी वाली थ्योरी अर्थात सर्वाधार वाली थ्योरी या फिर ईश्वर को जीव मात्र की चाह का एकमात्र अंतिम विषय बनाने के आधार पर कंटिंजेंसी वाली थ्योरी के आधार पर या फिर जीव की चाह के वास्तविक विषय के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए ईश्वर का सर्व नियंता होना बहुत आवश्यक है। और सर्व नियंता होने के लिए ईश्वर का सर्वशक्तिमान होना अत्यंत आवश्यक है। और सर्वशक्तिमान सिद्ध होने के लिए ईश्वर का सर्वव्यापक होना भी अत्यंत आवश्यक है। और सर्वव्यापक सिद्ध होने के लिए अब यहां पर एक नई चीज इंट्रोड्यूस होती है कि संसार का ईश्वर से अभिन्न रूप से रचित होना आवश्यक है। हां, संसार ईश्वर से अलग से कहीं पर रचित होना आवश्यक नहीं है। अगर अलग से कहीं पर रचित होगा तो फिर ईश्वर वहां पर बाधित होगा। वो सर्व नियंता सिद्ध नहीं होगा क्योंकि वो सर्व्यापक नहीं सिद्ध होगा। तो सर्वव्यापक होने के लिए संसार का अभिन्न रूप से रचित होना आवश्यक है ईश्वर के साथ। ठीक है? अब बात यहां पर ये आती है कि जब ईश्वर सब जगह बिल्कुल बराबर मात्रा में है तो वहां पर कौन

00:32:50:26 सा स्पेस काटा जाएगा छुरी के द्वारा? विवेक चूड़ामणि पढ़िएगा शंकराचार्य जी की शंकराचार्य जी का जो ग्रंथ है उसमें उन्होंने एक उदाहरण दिया है कि मान लीजिए एक सेब है उस सेब में अगर आपको कुछ बनाना है तो आपको सेब के बाहर से या छुरी चाहिए जो उसको काटेगी तब जाकर के और फिर सेब के बाहर स्पेस भी होना चाहिए तब तो वो छुरी कोई आएगी और उसमें घुसेगी और वो खांचा बना करके बाहर निकालेगी थोड़ा सा स्टफ तब वहां पे स्पेस होगा तब वहां कुछ नया कल्पित होगा तो मगर यदि यदि हमने हमें उसको सर्व नियंता सर्व रचयिता सर्वोच्च रचयिता इत्यादि सिद्ध करना है जो कि जीव की चाह का एकमात्र विषय अन्यथा अगर वो यह सब सिद्ध नहीं होगा तो जीव की चाह का विषय सिद्ध नहीं होगा और ना ही वो सर्वाधार सिद्ध होगा तो अगर सर्वाधार सिद्ध करना है तो हमें यह इससे दूर हटना पड़ेगा कि ईश्वर से अतिरिक्त कुछ स्पेस है तो जब स्पेस नहीं है तो छुरी कहां से होगी जो आकर के उस सेब को कट करेगी तो कहने का अर्थ है कि जब ईश्वर में ही संसार को बनाएंगे जहां पर ईश्वर कहीं भी कम ज्यादा है ही नहीं तो कैसे बनाएंगे? यहीं पर आती है ईश्वर की माया शक्ति। साधारण भाषा में कहें तो वीडियो गेम की वह

00:34:05:27 कैसेट जो सदैव हमारे पास रखी है। हम कभी भी उस कैसेट को या फिर अपने मोबाइल को जो हमारे पास रखा हुआ है उस उससे स्वयं को कनेक्ट करके उस कैसेट के जरिए एक संसार क्रिएट करते हैं। इसी प्रकार से भगवान स्वयं में ही अपने से भिन्न नहीं अभिन्न रूप से अपनी माया शक्ति के द्वारा संसार को रचते हैं। इसीलिए ईश्वर को सनातन में कहा गया है हिरण्य गर्भा सियाराम मय सब जग जाना और जब इस तरीके से संसार निर्मित होता है तब ईश्वर उस संसार का सर्व नियंता सिद्ध होता है क्योंकि ईश्वर वहां पर सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है क्योंकि ईश्वर वहां पर सर्वव्यापक सिद्ध होता है। ठीक है? तो इस प्रकार से हमने देखा कि ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए उसका सर्वाधार होना मनुष्य जीव की चाह का वास्तविक विषय होना अति आवश्यक है और इसके लिए उसका सर्वशक्तिमान सर्वनियंता होना अति आवश्यक है और इसके लिए उसका सर्वव्यापक होना अति आवश्यक है और ईश्वर की सर्वव्यापकता के लिए संसार का उससे अभिन्न रूप से रचित होना आवश्यक है और संसार का अभिन्न रूप से रचित होने के लिए ईश्वर की माया

00:35:21:06 शक्ति का आलंबन लेना, अविद्या का आलंबन लेना आवश्यक है। उसके अस्तित्व को स्वीकार करना आवश्यक है। और जब हम ये करते हैं तब बाकी के जितने भी बाय प्रोडक्ट के रूप में जो जावेद अख्तर जी ने बहुत सारे सवाल किए ना ये अगर ईश्वर अच्छाई वो वहां मर क्यों रहा है कोई तो वो आगे इस वीडियो में आपको सारे सवालों के जवाब प्राप्त हो जाएंगे। अब क्या है कि अब हम थोड़ा सा बात कर लें कि कैसे ईश्वर जो है सर्वव्यापक सिद्ध होता है। सर्वव्यापक होने के साथ-साथ वो अवतार ले सकने वाला, प्रकट हो सकने वाला, व्यवहार में आ सकने वाला सिद्ध होता है। आपने क्या किया ना? आधी अधूरी बातें की हैं। इस्लाम की बात कर रहा हूं मैं आपकी नहीं। इस्लाम में आधी अधूरी बातें की गई है। इस्लाम में पूर्ण रूप से जो अव्यवहारिक ईश्वर है, व्यवहार में ना आ सकने वाला ईश्वर वो बोला ही नहीं गया है। वो तो बाद में भी मनुष्य यहां से फ्री हो जाएगा। उसके बाद मतलब वहां जब पहुंचेगा तो बाद में भी व्यवहार में आ सकता है। है ना? आप उसको देखेंगे ये होगा वो होगा। वहां पे क्रियाएं हो रही हैं। और जहां क्रियाएं हो रही हैं, वहां व्यवहार हो रहा है। व्यवहार हो रहा है तो वह फिर अव्यवहारिक नहीं रहा। और फिर आप उसको कहीं-कहीं पे अव्यवारिक भी कह रहे हो कि वो यहां कैसे आ सकता है? यहां व्यवहार का विषय है ही नहीं। तो पहले आप

00:36:36:09 सेट कर लो कि वह अव्यवहारिक है कि नहीं है या फिर अव्यवहारिक होते हुए भी वह व्यवहारिक बन सकता है। है ना? एक डायमेंशन में वो अव्यवहारिक है और अपने द्वारा बनाई गई दूसरी डायमेंशन में वो व्यवहारिक हो जाता है। ठीक है? अब हमने जब यह तय कर लिया कि भैया ईश्वर यदि सबका कोई मूल कारण है तो सबका मूल कारण सर्वव्यापक होना भी आवश्यक है। यह हमने देख लिया। अब जो सबका मूल कारण वह है संसार के चलने का मूल मूल कारण ईश्वर है और उसके लिए उसका सर्वव्यापक होना आवश्यक है। इसका मतलब यह है कि वो समान रूप से पूर्ण रूप से पूरे संसार में जो भी कुछ एक्सिस्ट कर रहा है वहां पर वो विद्यमान है। ठीक है? अब दिक्कत यह आती है कि यदि वो समान रूप से विद्यमान है बिल्कुल बराबर से हमारी तरह नहीं कि मेरा यहां पर सर है और यहां पे हाथ है। यानी यहां पे मैं समान रूप से विद्यमान नहीं हूं। कहीं पे मेरा सर है जो कुछ और काम कर सकता है। कहीं पे मेरे हाथ है जो कुछ और काम कर सकते हैं। पर ईश्वर ऐसा नहीं है। ईश्वर समान रूप से बराबर रूप से सब जगह विद्यमान है। तभी वह सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ इत्यादि और सबका मूल कारण सिद्ध हो पाएगा। तो जब वो समान रूप

00:37:51:13 से सब जगह विद्यमान है तो ऐसा कैसे है कि किसी एक जगह पर वह पृथ्वी बनाता है जो कि साइज में छोटी होती है और किसी एक जगह पर वह सूर्य बनाता है जो कि साइज में बड़ा होता है। ये कैसे? जब वो सब जगह अह वो है सर्वव्यापक। अच्छा दूसरी बात यह है कि जब हम ये कह देते हैं ना समान रूप से सब जगह विद्यमान है। तो फिर हम ये कहते हैं कि भैया ईश्वर ही है सब कुछ। क्योंकि उसमें जरा सा भी अगर हम अंतर करेंगे जैसे हमने कह दिया उसकी फ्री विल है तो जब हम जरा सा भी अंतर करेंगे तो उसका पूर्ण कंट्रोल वहां सिद्ध नहीं कर पाएंगे कुछ ना कुछ अंतर आ जाएगा फिर वो सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं हो पाएगा तो अगर हमको यहां से मूल उसको सिद्ध करना है ना तो उसको सर्वशक्तिमान सिद्ध करना होगा और यदि सर्वशक्तिमान उसको सिद्ध करना है तो हमें ये मानना पड़ेगा कि जर्राजर्रा ईश्वर का ही रूप है। ठीक है? अब क्या है कि वह एक डायमेंशन की बात है कि एक डायमेंशन में ईश्वर अपना जो है तत्व के रूप में विद्यमान है और दूसरे डायमेंशन में उसने अपने आप को जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट कर दिया। ठीक है? हां तो ये शंकराचार्य जी की फिलॉसफी है। थोड़ा सा पढ़िएगा आपको पता चल जाएगा। खैर अभी हम लोग ईश्वर को

00:39:06:14 सिद्ध और असिद्ध के रूप में देख रहे हैं। तो एक बात और हमने जान ली अभी जो मैंने आपको बताया डायमेंशन के द्वारा कि भाई जैसे एक वीडियो गेम खेल रहे हैं हम और उस वीडियो गेम में वीडियो गेम को हमने ही बनाया है तो उस वीडियो गेम के अंदर का संसार भी बनाने वाला कौन सिद्ध होता है? वो स्वयं ईश्वर ही सिद्ध होता है। वीडियो गेम को बनाने वाला भी। है ना? जिसने वीडियो गेम को बनाया है तो वीडियो गेम का संसार जो है वह भी ईश्वर ने बनाया। यानी कि वहां का स्पेस भी उसी ने बनाया। तो वह जो स्पेस वाली बात है ना यहां पर मिल जाती है कि स्पेस यानी कि अब यहां वाला जो ईश्वर है वो मिट्टी लेकर घड़ा बनाने वाला सिद्ध नहीं हो रहा है। क्यों? क्योंकि उसने स्पेस को भी क्रिएट किया है। बल्कि स्पेस के रूप में वो खुद ही है वहां पर। और तब यहां पर आती है माया वाली बात कि ईश्वर जो है अपनी माया शक्ति के द्वारा जो है संसार को उसमें रचते हैं। यही है जीव जगत और जगदीश्वर। तो इस कांसेप्ट से हमारा जो ईश्वर है सनातन ईश्वर वो सर्वशक्तिमान सिद्ध हुआ। सर्वव्यापक सिद्ध हुआ, सर्वज्ञ सिद्ध हुआ। और यह वाला जो ईश्वर है मैं साथ-साथ आपको इसलिए बताता चल रहा हूं कि यह वाला जो ईश्वर है वो सबका मूल सिद्ध होता है। मूल कारण सर्वाधार वो सिद्ध होता है।

00:40:21:06 तो अभी मैं आपको बता रहा हूं कि अब वो जो है अवतार वाली बात कैसे आती है। मैं उस पे आ जाता हूं कि जब ईश्वर सर्वव्यापक है। जब ईश्वर कहीं भी कम ज्यादा नहीं है तो फिर एक दिक्कत आएगी। कहीं ज्यादा पावर वाला काम कहीं पे कम पावर वाला काम कैसे हो रहा है? जैसे कि मान लीजिए कि मेरे पास इस समय एक टेबल है और उस पे बहुत सारी चीजें पड़ी हुई हैं। कहीं पे बड़ा डब्बा है और कहीं पे छोटा डब्बा है। तो अगर मेरी शक्ति सब जगह समान रूप से व्यापक है तो जब मैं कोई अपनी पावर यूज़ करूंगा तो समान रूप से होने के कारण सब चीजें एक साथ लुढ़क जाएंगी। अगर मुझे वहां से मेज को खाली करना है, तो वहां समान रूप से शक्ति होने के कारण जब मैं उसको यूज़ करूंगा, हरकत करूंगा, तो वो सारी जो क्या कहते हैं, डब्बे, ढक डब्बे, ढक्कन है, सब कुछ एक साथ गिर जाएंगे। तो, ऐसे में क्या करें? ऐसे में क्या मैं अपनी शक्ति को रेगुलेट कर सकता हूं? कि मुझे कौन सा डब्बा नीचे गिराना है, कौन सा नहीं गिराना है। अगर मैं शक्ति को रेगुलेट कर सकता हूं, तब तो यह हो पाएगा फलाना वाला डब्बा जो है, नीचे गिरेगा और फलाना वाला डब्बा नीचे नहीं गिरेगा। ठीक है? इसी तरीके से ईश्वर

00:41:36:12 अपने आप को रेगुलेट कर सकते हैं। सब जगह सर्वव्यापक होने के बावजूद भी ईश्वर अपने आप को रेगुलेट कर सकते हैं कि कहां पर उनकी फोर्स कितनी मात्रा में काम करनी है, कहां पर ज्यादा करनी है, कहां पर कम करनी है और कहां पर नहीं भी करनी। अन्यथा संसार में कोई भी रचना हो ही नहीं पाएगी। क्योंकि ईश्वर तो सर्वव्यापक है एक रस के रूप में। तो क्या ईश्वर में अपनी चीजों को रेगुलेट कर सकता है? अच्छा एक चीज और है कि जब वो मिट्टी के कणों को इकट्ठा करके जब वो पृथ्वी का निर्माण कर रहा है ईश्वर है ना तो वहां पर पृथ्वी पर एक धक्का लग रहा है या कोई फोर्स वहां पर यूज हो रही है। यानी कि वो पृथ्वी के लिए या मिट्टी के लिए व्यवहार में आ रहा है। उस समय अब वो बात अलग है। वो दूसरे डायमेंशन की बात है कि वही पृथ्वी भी है। वो ये भी है। मगर एक माया रूपी संसार में वो जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट है। अब वो जो है सृष्टि बना रहा है। तो सृष्टि बनाने के रूप में जब हम और उसको प्रैक्टिकल ये खोल रहे हैं चीजों को तब वहां पर यह वाली बात आ रही है कि जब वो मिट्टी के कणों को इकट्ठा कर रहा है तो वहां पर मिट्टी के कणों के लिए वो व्यवहारिक हो रहा है। क्या हो रहा है? व्यवहारिक। यानी

00:42:51:13 कि मिट्टी के कणों को फोर्स फील हो रही है वहां पर। मतलब उसके तो कोई प्रज्ञा शक्ति नहीं है। हमारे भौतिक जगत के अनुसार उसमें प्रज्ञा शक्ति नहीं है। परंतु वहां उसको व्यवहार प्राप्त हो रहा है कि वो धक्के के कारण वो आगे खिसक रही है। वो व्यवहार उसको प्राप्त हो रहा है। यह हम जानते हैं क्योंकि उसमें प्रज्ञा शक्ति नहीं है। भौतिक जगत के अनुसार वो नहीं जानती। मिट्टी नहीं जानती। मगर वहां व्यवहार हो रहा है मिट्टी के साथ। ऐसा ही व्यवहार पूरे संसार के साथ हो रहा है कि भैया कहीं पर धक्का लग रहा है और वह कुछ कर रहे हैं या कहीं पर उसको उठाया जा रहा है। यह सब चीजें हो रही हैं या कहीं पर कुछ तोड़ा भी जा रहा है। तो यहां पर क्या हो रहा है? ईश्वर व्यवहारिक हो रहा है। इसका अर्थ क्या हुआ कि ईश्वर कहीं पर किसी जगह पर व्यवहार का विषय बन रहा है। कहीं पर नहीं भी बन रहा है। कहीं पर ज्यादा बन रहा है और कहीं पर कम भी बन रहा है। दूसरी बात यह भी है अगर इसको ऐसे मान के चलें कि अगर एक हम छू के किसी चीज को मटके को बना रहे हैं। छू के तो कम से कम जो ये छूने वाली जो इंद्रिय है, है ना? उसका विषय तो बन ही रहा है ना ईश्वर कि कहीं पर वो पृथ्वी बना रहा है, कहीं पर वो जो है ah सूर्य बना रहा है तो वहां पर वो जो है उतने हिस्से में जब वो कोई क्रिया हो रही है तो वहां पर वो

00:44:06:14 व्यवहारिक हो रहा है। और उसने यह भी तय कर रखा है कि वह कहां पर कितनी मात्रा में व्यवहारिक हो, कहां पर कम मात्रा में हो, कहां पर ज्यादा मात्रा में हो, कहां पर ना भी हो। बस यहीं से अच्छा पहली बात तो यह है कि जो तीन डायमेंशंस है ना ईश्वर के निर्गुण निराकार था जो सब जगह सर्वव्यापक था। अब वो जब कहीं पर कम कहीं पर ज्यादा अपनी शक्ति यूज करने वाले के रूप में जब वो ईश्वर काम कर रहा है तो यहां पर वो सगुण निराकार हो गया। पहले वह निर्गुण निराकार क्योंकि वह अब एक रस है बस। दैट्स इट। मगर जब उसने अपने आप को रेगुलेट किया कहीं कम ज्यादा किया तो अब उसमें गुण आ गया सगुण निराकार और बस यहीं से वह चीज आती है कि जब वो अपने आप को इतना रेगुलेट कर सकता है कि कहीं पर वो धक्के का विषय बने हां और कहीं पर धक्के का विषय ना बने। कहीं पे वो फोर्स बनके किसी के लिए व्यवहारिक हो पाए और कहीं पे वो फोर्स बनके किसी के लिए व्यवहारिक ना हो पाए। जब वह अपने आप को इतना रेगुलेट कर रहा है तो फिर वह अपने आप को आगे एक जगह और रेगुलेट करता है कि इतने हिस्से में जो मैंने एक आकृति बनाई है मनुष्य के जैसी इतने

00:45:21:15 हिस्से में मुझको वो देख पाए मैं आंखों का विषय बनूं और बाकी के हिस्से में ना बनूं। तो यह वो वाली बात हो गई कि जो सब जगह वो एक जगह कैसे दिख रहा है? सब जगह है मगर उसका उतना ही हिस्सा आपको दिखाई दे रहा है। तो यह हो गया अवतार। यह हो गया सर्वशक्तिमान ईश्वर। अब इससे आगे चलते हैं। तो कहने का अर्थ यह है कि यहां से हमने दो चीजें निकाल ली कि सनातन ईश्वर सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ और सर्वव्यापक सिद्ध होता है। और वो सर्वम खलविदम ब्रह्म वाली बात जो कही गई थी इस चर्चा के बीच में एक शायद पूरी तरीके से उनको जानकारी नहीं होगी। या फिर उनको मौका नहीं दिया गया जो एक वृद्ध जन उन्होंने उठाई थी वाली बात कि भाई सब कुछ ईश्वर ही है तो उन्होंने कह दिया था कि सब कुछ ईश्वर है तो वो वहां पर सब कुछ ईश्वर कैसे हो सकता है भाई सब कुछ ईश्वर ऐसे हो सकता है कि जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है तो उस स्वप्न के अंदर जो सृष्टि होती है जो खाली स्पेस होता है वह स्पेस भी वही व्यक्ति होता है उसके अंदर जो प्राणी देखता है वह प्राणी भी वही होता है और उसके अंदर यदि उन प्राणियों की मदद करने के लिए वह अपनी कल्पना के या अपने स्वप्न

00:46:36:24 के अंदर जब किसी रूप में पहुंचता है तो वह उनका ईश्वर कहलाता है और वह ईश्वर भी वही होता है। इसी को कहते हैं ईश्वर जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में प्रकट होते हैं। व्यवहारिक होते हैं। तो इस यह जो दुनिया है स्वप्न की दुनिया एक व्यक्ति की उसको आप ईश्वर के दृष्टिकोण से एक डायमेंशन दूसरी डायमेंशन जो ईश्वर ने बनाई है एक डायमेंशन वो कह सकते हो या फिर ईश्वर का वीडियो गेम कह सकते हो या फिर ईश्वर की माया शक्ति भी कह सकते हो माया शक्ति के द्वारा निर्मित संसार तो कुल मिलाकर के क्या है कि जो इस्लाम का ईश्वर है वो सर्वव्यापक तो क्या वो तो सर्वशक्तिमान भी सिद्ध नहीं हो रहा है और थोड़ा सा चोट आपने वो छुरी वाला एग्जांपल दे के उसकी सर्वज्ञता पर भी कर दी। तो फिर क्या इस्लाम के ईश्वर के द्वारा नास्तिकता को पराजित किया गया है? नहीं किया गया। क्योंकि अगर ये क्वेश्चंस वहां पर रेज किए जाते कि भाई वो अगर सब पर कंट्रोल कर रहा है मगर वह तो एक जगह बैठा हुआ है तो कंट्रोल कैसे कर रहा है? किस रूप में? कैसे कर रहा है? के ईश्वर की जो माया शक्ति है, अविद्या शक्ति है, प्रकृति है, उसके अस्तित्व को और उस पर पूरी तरीके से अभिन्नता को स्वीकार करने के बाद ही

00:47:52:12 ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्व नियंता और सर्वसामर्थ्यवान सिद्ध होता है। और ऐसा नहीं है। अ कई ऐसे सेक्स हैं तथाकथित जो कई मामलों में ईश्वर को बाधित करते हैं सनातन के नाम से भी और हम उनके शोधन के लिए प्रयासरत हैं। तो ऐसा विचार मन में लाना है कि आपका तो वह वाला सेक्ट ऐसा नहीं मानता। हो सकता है आपके यहां भी कई सारे सेट हैं तो वह भी आपकी कई बातों से वो नहीं होंगे। तो वहां पर यह देखा जाता है कि फिर भैया कौन सी बात को वास्तविक सनातन धर्म के रूप में देखा जाए तो उसके बारे में भी हमारे पास पर्याप्त चीजें हैं। संभवत आपको क्यों देखा जाए इस बारे में आपके पास है कि नहीं मुझे नहीं लगता। है क्योंकि उस पर भी एक चोट है कि वह आपकी चेन ऑफ नरेशन की बात क्यों मानी जाए वह एक अलग विषय हो जाएगा। खैर हमारे पास उसे परंपरा कहते हैं। यह जो सनातन का अर्थ हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। यह प्रामाणिक रूप से प्रामाणिक जो परंपरा है जो वेद लेकर के आती है जो परंपरा जो शास्त्रों को लेकर के आती है जो परंपरा उस परंपरा के द्वारा बताया गया अर्थ है। ठीक है? तो यहां पर उसकी प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है कि सनातन के नाम से जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं उस पर यदि और कोई यह कह रहा है नहीं नहीं ऐसा नहीं है तो उस और

00:49:07:18 कोई पर जो है हम ये कह सकते हैं ये सनातन नहीं है। इतने अंश में है जो सनातन विरोधी है। तो यह वाली बात में भी आप ना जाएं। इसी क्रम में जावेद जी द्वारा एक जो है सवाल किया गया कि भैया अगर ईश्वर है तो फिर बच्चे मर क्यों रहे हैं? यह क्यों हो रहा है? वह क्यों हो रहा है? बुराई क्यों है? हम तो सबसे पहली बात तो यहां पर पहला उदाहरण यही है कि जब हम यह कहते हैं कि इस दुनिया में सबका मूल कारण ईश्वर है तो हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि हमको जो बुराई लग रही है उसका भी मूल कारण ईश्वर ही है। तो इसका अर्थ क्या हुआ कि ईश्वर के होने का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में बुराई ना हो। पहले तो एक तार्किक चीज है कि ईश्वर के अर्थ ईश्वर के होने का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में बुराई ना हो। क्योंकि सब चीजों का कारण ईश्वर ही है। मूल कारण ईश्वर ही सिद्ध होगा हर चीज का। तो अब यह बुराई का दोष ईश्वर पर जाता है कि नहीं? नहीं जाता तो क्यों नहीं जाता? यह सब चीजें सनातन इसके उत्तर देता है। इस्लाम इसके उत्तर नहीं देता है। यद्यपि वो प्रश्न वहां पूछे नहीं गए। और इसीलिए मैंने शुरू में कहा था कि भाई वहां मर्मज्ञ होना चाहिए था कोई। वो उत्तर देता। तो

00:50:23:20 इसमें एक बात और कही गई कि भाई जब बुरा वक्त बुरा विकल्प आपको दिया जाएगा और आप सही विकल्प के साथ खड़े रहोगे। मतलब क्या होता

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→ Used in: B · Live Discussion with Sanjay Parashar | Aadhyatmik Vishwavidyalay Truth | Brahma Kumar... at 36:41 ↗

00:50:33:03 अगर मैं अपने स्टूडेंट को एमसीक्यूस दूं और उसमें सिर्फ राइट आंसर लिख कर दे दूं और कहूं तुम्हारा टेस्ट हो गया। ये मीनिंगलेस है।

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00:50:39:13 इस दुनिया में अगर हम टेस्ट के लिए आए हैं तो जाहिर है गुड एंड इविल दोनों मौजूद है। बहुत ही वीक यहां पर ये तर्क दिया गया मुफ्ती के द्वारा। क्यों वीक तर्क था कि जब आपको हम बुराई की चीजें भी देंगे और आपको अच्छाई की चीजें भी देंगे। उन विकल्पों में से आप जब अच्छाई के साथ खड़े रहेंगे तब जाकर के आप जो है परीक्षा में पास होंगे, उत्तीर्ण होंगे। इसलिए एक सही उसके साथ तीन गलत विकल्पों की तरह जो है अच्छाई और बुराई दोनों चीजें दी जा रही है। यहां पर आप बहुत बुरा फर्ज गए ये बात कह के और यह बात मुझसे पहले भी कही गई है। मैं इनके ही एक मुफ्ती जो इस चर्चा में भी जुड़े हुए थे वो अलवजीदी शायद नाम है। उनसे ये प्रश्न आज से शायद तीन चार साल पहले कर चुका हूं। यही प्रश्न थे मेरे ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। और यह जो विकल्प वाली बात आई यहां फंस गए थे मुफ्ती तब भी फंस गए थे। क्या था मामला? इन्होंने मुझको वहीं पर यह कहा कि भैया यह तो एक खेल चल एक परीक्षा चल रही है और परीक्षा में आपको जैसे विकल्प दिए जाते हैं तीन ये विकल्प और एक सही वाला विकल्प उसी तरीके से आपको बुराई भी दी गई है यानी शैतान भी दिया गया है और जो है आपको अच्छाई भी दी गई है। अच्छा भाई

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→ Used in: B · Live Discussion with Sanjay Parashar | Aadhyatmik Vishwavidyalay Truth | Brahma Kumar... at 36:49 ↗

00:51:52:00 जो विकल्प होते हैं ना परीक्षा के समय हम उसमें से किसी कौन सा सही है और कौन सा गलत है यह जानने के लिए उस परीक्षा से पहले हमको एक पढ़ाई कराई जाती है। है ना? जिसमें हमको सही-सही चीजें बताई जाती हैं। तो अगर इस्लाम के द्वारा मिलने वाली जो शिक्षा है वह परीक्षा के विकल्पों की तरह है। है ना? तो पढ़ाई कहां पर हुई है?

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00:52:21:03 अगर कुरान सही विकल्प है। इस्लाम के अनुसार जो बताया जा रहा है, अगर कुरान सही वाला विकल्प है और जो उसके अगेंस्ट जो चीजें हैं, बुराइयां हैं वो वो गलत विकल्प है जिन्हें आपको नहीं सेलेक्ट करना है तो कुरान को सेलेक्ट करने का आधार हमारी जो पढ़ाई है वो कहां पर पढ़ाई गई है भाई? वो होएगी ना प्रमाण। तो कुरान प्रमाण नहीं हो गई ना। फिर कुरान को तो वहां परीक्षा के समय सही विकल्प के रूप में चुनना है। मगर कुरान सही है। यह हमें कौन सी पढ़ाई में बताया गया है? कुरान स्वयं जो बता रही है, कुरान स्वयं जो बता रही है, हम उसको प्रमाण मान रहे हैं। जबकि वह तो विकल्प के रूप में आई है। कहने का मतलब यह है सरल भाषा में कि जब आप यह कह रहे हैं कि आपको जो है विकल्प दिए गए हैं। एक सही है, तीन गलत। तो एक चीज सही है जैसे कुरान इस्लाम मान लिया और बाकी तीन गलत है बुराई मान ली नास्तिकता मान ली और आपके अनुसार जो आपके विरोधी जो तंत्र है या सनातन इत्यादि हैं वो उसमें दिक्कत यह आती है भाई साहब कि जब परीक्षा कराने वाला ही आपको दोनों चीजें दे रहा है तो उसमें से सही चीज चुनने के लिए आपके पास एक तृतीय पक्ष होना

00:53:36:07 चाहिए तो पक्ष क्या है इस्लाम का वेद वेदों से तय करोगे कौन सही है कौन गलत या फिर वेद नहीं है तो कौन सा पक्ष है आपका जिसमें हम यह तय कर पाए कि भैया इनमें से कौन सा हमें चुनना है कुरान चुननी है या दूसरी चीजें चुननी है कहां से तय कर रहे हो वो तृतीय पक्ष क्या है क्योंकि जो आपका जो भी कुछ है एंड वो तो कुरान स्वयं है तो कुरान का आधार क्या है हम वहां पर कुरान को किस आधार पर चुनेंगे वो पढ़ाई हमें कहां पर कराई जा रही है कि कुरान सही है कुरान आपको पढ़ाई करा रही है तो यानी कि कुरान के आधार आधार पर आपसे जब एक वह लिया जाए कि कुरान के अंदर यह लिखा है कि नहीं लिखा है। उस आधार पर आपको विकल्प दिए जाए तब तो ठीक है। मगर यहां तो कुरान स्वयं ही विकल्प में आ गई ना। हम तो कहने का अर्थ यह है कि यदि कुरान एक विकल्प है तो फिर कुरान को विकल्प बताने वाली कुरान को सही विकल्प बताने वाली पढ़ाई कहां पर है? छुरी बनाने वाला जो तर्क था वह भी कितना वीक था कि भैया जो बम बना रहा है उसका दोष नहीं है। वह तो देश की रक्षा के लिए बना सकता है। जो उसका उपयोग कर रहा है गलत उसका दोष है। नहीं यहां पर सीन दूसरा है जो बम

00:54:51:13 बना रहा है उसको पता भी है कि बम क्यों बनाया जा क्यों जा रहा है और साथ ही साथ उस वो उस बम को गलत उपयोग से रोक भी सकता है। मगर वो नहीं रोकता है। और ऐसे में आप जावेद जी के इन प्रश्नों के सटीक उत्तर नहीं दे पाए। वह बात और है कि जावेद जी किस कारण से आपके समक्ष वह जो स्ट्रांग आर्गुममेंट है वह आप प्रस्तुत नहीं कर सके। खैर आगे चलते हैं। कुल मिलाकर के यह है कि जब इस तरह के आरोप लगते हैं कि भाई वो भी क्या कहते हैं? इस तरह के आरोप लगते हैं कि दुनिया में बुरा क्यों हो रहा है? यह क्यों हो रहा है? वह क्यों हो रहा है? तो अगर हम इसमें माया के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे। इसको रियलिटी स्वीकार करेंगे। यही है सत्य। वास्तविक सत्य है। यह सब कुछ जो हो रहा है रियलिटी है। तो हम इन बातों का जवाब नहीं दे सकते। हमको माया, विद्या, प्रकृति इस इन रूपों में यहां होने वाली चीजों को स्वीकार करना ही पड़ेगा। अगर हमको किसी मूल कारण का अस्तित्व स्थापित करना है तो और उसको मूल कारण, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वनियंता इत्यादि सिद्ध कर सकना है तो सिद्ध करना है तो अब इसके बाद एक बात और आती है

00:56:06:19 कि यहां पर मैं अब अपनी परिभाषा लाने वाला हूं कि क्यों आवश्यकता है यह माया को स्वीकार करने की माया को स्वीकार करने की आवश्यकता क्यों है? जैसे कि भगवत गीता में कहा गया नैन छिनती शस्त्राण नैन दति पावका ना चैनम क्लेप ना शोषति मारुता तो यदि यानी यहां पर बताया गया है कि जो वास्तविकता में शरीर को धारण करने वाला शरीर है यानी आत्मा है वो जो है उसको कुछ नहीं हो रहा है और यहां पर होने वाली चीजें ये सब माया है। ये सब तुम अज्ञानता को प्राप्त हो इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है। ऐसे की कई बार ऐसा होता है कि जो बड़े होते हैं उनको वो चीजें दिख रही होती है छोटा बच्चा जिन चीजों के लिए रो रहा है जैसे आपने बताया ना डॉक्टर वाला उदाहरण कि डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाया तो जिसका पर्सपेक्टिव छोटा है उसके लिए तो वो बुरा काम हुआ है ना मगर डॉक्टर को मालूम है कि वो सही काम कर रहा है। तो यह जो पर्सपेक्टिव है ना यही माया वाला पर्सपेक्टिव है कि हमें लग रहा है कि हमें जो सुई चुभई जा रही है हमारी हम मर रहे हैं। हमें लग रहा है कि हम मर रहे हैं। और रियलिटी यह है कि हम नहीं मर रहे हैं। हमको यहां पर अज्ञानता के कारण ऐसा लग रहा है कि हम मर रहे हैं। और इस अज्ञानता से छूट जाना ही इस अज्ञानता

00:57:22:09 से पृथक हो जाना ही अपने स्वरूप भूत अपने भगवान में लय हो जाना ही मोक्ष है। हम्? खैर, इस पे अभी और आगे बात करेंगे। अभी यहां पे बात कर लेते हैं कि मैं अपनी परिभाषा लने वाला हूं। और एक बात और है। यह परिभाषा क्यों है? आवश्यक इस पर भी बात करनी होगी। परिभाषा इसलिए आवश्यक है क्योंकि चलो मान लिया कि वह जो ईश्वर है वह सबका मूल कारण है। हालांकि आपका वह सिद्ध नहीं होता। मगर वो मूल कारण सिद्ध कर लिया आपने। मगर वह मूल कारण है। मगर वह मनुष्य के लिए प्रतिपाद्य भी है। यह कैसे? मनुष्य का उद्देश्य भी है, प्राप्तव्य भी है। वह कैसे? वह तो आपने सिद्ध किया ही नहीं ना। यानी कि मान लो दुनिया में कोई बहुत पैसे वाला है तो उस पैसे वाला वाले का अनुगमन अनुसरण अनुकरण मैं क्यों करूं? क्यों करूं भाई? जब तक मुझे उसके पैसे की आवश्यकता सिद्ध नहीं होगी और यह सिद्ध नहीं होगा कि वह मुझे पैसा दे सकता है। देगा तब तक मैं उसका अनुकरण अनुगमन क्यों करूं तो तार्किक दृष्टि से आपने वो सिद्ध नहीं किया। आपके जो स्क्रिप्चर्स हैं वह यह कहेंगे कि हम देंगे। मगर तार्किकता

00:58:37:25 से आपने उसको सिद्ध नहीं किया कि हम क्यों उसका अनुगमन करें। क्यों उसके पीछे पीछे जाए। हम क्यों अट्रैक्ट हो उसके लिए हमारी चाह का विषय आपने सिद्ध ही नहीं किया उसको तो सिद्ध क्या-क्या नहीं किया आपने एक तो मेटाफिजिकल का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया आपका जो ईश्वर है वो मेटाफिजिकल सिद्ध नहीं होता है क्योंकि वह अंत में भी व्यवहारिक है अंततो कत्वा सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ सर्वज्ञ तो खैर आपकी वह भूल है को तर्क देना नहीं तो सर्वज्ञ तो आप मानते होगे परंतु यहां पर कुतर्क देकर के फंस रहे हो। तो यह भी भूल है। अ सर्वज्ञ चलो हटा देते हैं। सर्वज्ञ मानते हो आप सर्वज्ञ कहते हो उसे और यह जो आपने तर्क दिया है वो गलत दे दिया। गलती से दे दिया। ये मान लेते हैं। मगर फिर जब गलती से दे दिया तो वो वाला दोष मुक्त नहीं हो पाओगे। हमारे ईश्वर को माने बिना। यह भी दिक्कत है कि जो छुरी को बनाने वाला जो होता है उसको दोष नहीं लगता। छुरी का गलत इस्तेमाल करने वाले को दोष लगता है। तो अगर आप यह बात मैंने मुफ्ती से भी पूछी थी जो मुफ्ती जी इसमें खड़े हुए हैं ना अंत में उनसे पूछी थी कि क्या बुराई को बनाने वाला बुराई को बनाना बुराई नहीं है। तो मुफ्ती जी बोले नहीं

00:59:52:26 बुराई नहीं है। यहां अटक गए थे मुफ्ती जी। देखिएगा आप तो इन्होंने कह दिया था बुराई को बनाना बुराई नहीं है। उस सूरत में बुराई नहीं जब बुराई को बना बुराई को बनाने वाला ना जानता हो बुराई है। उस सूरत में बुराई नहीं है जब बुराई को बनाने वाला बुराई को रोक ना सकता हो। बुरा होने से मगर तब बुराई है जब वह रोक सकता है तब बुराई है जब वह जानता है कि बुराई है। तो कहने का मतलब यह है कि आपने ईश्वर को मूल के रूप में हालांकि वो सनातन ईश्वर का ही आलंबन लेना पड़ेगा। इस्लाम का ईश्वर मूल सिद्ध नहीं होगा। हमने बता दिया और तो और अगर मूल भी सिद्ध कर दिया तो आपने वह विवेचना नहीं की जिससे कि वो मनुष्य के लिए अनिवार्य हो जाए। वह अनिवार्य कैसे सिद्ध होता है? प्राप्तव्य मनुष्य का एकमात्र प्राप्तव्य अंतिम विकल्प कैसे सिद्ध होता है? वह आपने सिद्ध नहीं किया। तो अब हम तार्किक निरुत्तर कर देने वाली ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने वाली व्याख्या और नास्तिकों को निरुत्तर कर देने वाली व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। संसार का प्रत्येक मनुष्य भगवान को ही ढूंढ रहा है। फिर वह भले ही स्वयं को नास्तिक ही क्यों ना कहता हो। दोबारा सुनिए।

01:01:08:21 संसार का प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर सतचित आनंद की चाह के रूप में भगवान को ही खोज रहा है। फिर वह भले ही नास्तिक ही क्यों ना कहता हो अपने आप और जैसे कि जो आपके जावेद जावेद जी हैं वहां पर वो कह रहे हैं कि दुनिया में यह क्यों हो रहा है अगर भगवान है तो वह भी परफेक्शन को ढूंढ रहे हैं। यह जो पूर्णता को ढूंढ रहे हैं ना वो कि कहीं भी कुछ गड़बड़ ना हो। कहीं पर भी कुछ अभाव ना हो। यह जो उनके अंदर लगातार चल रहा है, भले ही वह ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करें या ना करें। मगर पूर्णता के अस्तित्व को वो ढूंढ रहे हैं और ढूंढने के अंश में वो ये मान रहे हैं कि दुनिया में पूर्णता है। तभी कोई उसकी खोज शुरू करता है। हम तो कहने का मतलब यह है कि जीव की चाह का वास्तविक विषय ही ईश्वर है। और यह बात सनातन धर्म ग्रंथों में कई जगह कही गई है। जैसे कि असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्युमा मृतमय यहां पर जीव की चाह बताई जा रही है अमर अमर हो जाना चाहता है अखंड ज्ञानी हो जाना चाहता है सदा आनंदित रहने वाला हो जाना चाहता है तो यहां से जीव की चाह के रूप में

01:02:23:27 ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है हमारे अंदर जितनी भी इनबिल्ट इच्छाएं हैं उनका विषय दुनिया में मौजूद है इसलिए वह इच्छा है यानी इच्छा मात्र होने से डंके की चोट पर उस इच्छा के विषय का अस्तित्व सिद्ध होता है जैसे हमारे अंदर प्यास है तो दुनिया में पानी है। हमारे अंदर सुनने की क्षमता है तो दुनिया में आवाज है। हमारे अंदर देखने की क्षमता है तो उसका जो विषय है दृश्य वो दुनिया में है। इसी प्रकार से हमारे अंदर जो सच्चिदानंद हो जाने की चाह है तो इसका मतलब दुनिया में सच्चिदानंद है। और इस डिबेट के लास्ट में एक व्यक्ति ने कुछ अभी आ गया होगा यह नया जो खोज है। कुछ बता रहे थे रिसर्च आया कि लोगों के अंदर ईश्वर की चाह है। जावेद अख्तर जी के अंदर भी है। हम वह मैं अभी बताऊंगा कैसे है। तो यहां से हमने सिद्ध किया कि ईश्वर है। अब जो ईश्वर है वह क्योंकि चाह का विषय है इसलिए मनुष्य का अंतिम विकल्प है।

01:03:23:15 और यहां पे एक कनेक्शन हम और स्थापित करते हैं। इस्लाम के अनुसार जो जीव है यानी जो प्राणी है जो भी है वो ईश्वर का अंश नहीं है। मगर हमने तो सिद्ध किया ईश्वर जो है सर्व्यापक हो गया। सब जगह बराबर मात्रा में वह उपस्थित हो गया। तभी वह सब जगह सबका कंट्रोलर है। है ना? नहीं तो आप उसको सुप्रीम कंट्रोलर सिद्ध नहीं कर पाएंगे। कोई हो तो आ जाइएगा। बात कर लेंगे इत्मीनान से बैठ के। तो कोई हो तो आ जाए। तो आप उसको सुप्रीम कंट्रोलर सिद्ध नहीं कर पाएंगे। जब तक उसको सब जगह सर्वव्यापक बराबर रूप से उपस्थित नहीं। और जब वो बराबर रूप से उपस्थित है सब जगह तो फिर आप उसको जरा सा भी अलग नहीं कर पाएंगे। फिर आपको मानना पड़ेगा कि एक ही परम तत्व जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में परिलक्षित हो रहा है। केवल हम जैसे एक व्यक्ति वीडियो गेम जिसने बनाया है तो वीडियो गेम को बनाने वाले के रूप में वो वीडियो गेम के अंदर की जो सृष्टि है उसके रूप में भी वही है और वीडियो गेम में जो प्यादा खेल रहा है उसके रूप में भी वही है और प्यादे की मदद करने जो पहुंच रहा है उसके रूप में भी वही है। या फिर स्वप्न का उदाहरण अगर मान लें माया शक्ति के लिए स्वप्न का उदाहरण अगर मान लें तो जो स्वप्न का संसार है उसमें जो संसार है वह भी वही है यानी जगत और वहां के

01:04:38:19 जो सामान्य जीव हैं वो भी वही है और यदि कोई वहां पर ऐसा आपका रूप वहां पहुंचता है जो रूप यह जानता है कि मेरा स्वप्न है तो वह वहां के लिए वहां का ईश्वर है तो जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में परिलक्षित होता है। अब दूसरी बात ये है कि हमने माना कि भाई अंश है तो अंश में अपने अंशी की तरफ आकर्षण होता है। जैसे अग्नि जो होती है अग्नि की लपट आकाश में स्थित सूर्य की ओर भागती है। सूर्य आकाश में स्थित है तो अग्नि जो है हमेशा भागती है। जो ये जो फल फूल हैं ये सदैव इसर यात्रा कर रहे होते हैं कि मिट्टी से निकले मिट्टी में ही समा जाए। तो अंश सदैव अपने अंशी की ओर आकृष्ट होता है। लॉ ऑफ अट्रैक्शन यह तो आप जानते ही होंगे। उसी प्रकार से हमारे अंदर जो मुख्य आकर्षण है हम एसी में, टीवी में, फ्रिज में, पंखे में, कूलर में या तमाम चीजों में हम जो है अपने अंशीभूत

01:05:41:25 ईश्वर की ओर ही आकृष्ट हो रहे हैं। परंतु क्योंकि इतना हमें बोध नहीं है कि हम हमारी मूल चाह ईश्वर है। इसलिए हम लोग इनमें फंसे रहते हैं और परेशान होते रहते हैं। जब हम इस रास्ते पर आते हैं कि हमारी मूल चाह वही है तब हमें संतुष्टि मिलती है। जो हमारे अंदर की वो जो प्यास है आत्मा की असतो मा सदगया तमसो मागमया मृत्युमा मतम गमया तब वो संतुष्टि मिलने लगती है उसको तो अब जब हमने क्या किया कि ना ही सिर्फ ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया बल्कि साथ ही साथ ईश्वर के साथ रिलेशन भी सिद्ध किया कि आपका अंतिम विकल्प भी वही है। आप इसका इसका उत्तर नहीं दे सकते। नहीं तो सवाल यह आएगा कि दुनिया में अगर एलन मस्क है तो मैं क्या करूं? अच्छा दूसरी बात यह है कि एलन मस्क है यह हमको किसी और ने बताया। जबकि ईश्वर के बारे में हमें कोई बताता नहीं है। हम उसे ईश्वर नाम दें या परफेक्शन परफेक्शन नाम दें, पूर्णता का नाम दें। हमें यह कोई बताता नहीं है। हम तब भी मौत से भागते हैं। अमरता ढूंढते हैं। हमें कोई बताता नहीं है। अमरता क्या एक्सिस्ट करती है ईश्वर के रूप में। हमें कोई बताता नहीं है। फिर भी हमारी पलकें झपकती है जब हम पर कोई वार करता है। तो यह हमारे

01:06:57:01 अंदर इनबिल्ट है। इससे पता लग रहा है कि हमारी जो प्रकृति है स्वाभाविक रूप से हम उसकी ओर आकर्षित है। तो यह है इससे पता लगता है कि हम जो हमारा प्राप्तव्य क्या है? ईश्वर। और इसीलिए हम इस संसार यह जो संसार जो दुखप्रद है जो जड़ता प्रद है जो क्या कहते हैं आपको सच्चिदानंद के विपरीत है ठीक तो इसीलिए हम सच्चिदानंद के तरफ आकर्षित होते हैं क्योंकि हम उसके अंश हैं। और वह हमारा अंश।

01:07:35:22 अच्छा। यहां से हमने रिलेशन भी सिद्ध किया और ईश्वर के ईश्वर को अकाट रूप से सिद्ध कर दिया। वो आपने कहा था ना अकल से सिद्ध करें। वो अकल से ही सिद्ध हुआ है। हां वो बात अलग है कि ये चीजें भी हमारे सनातन धर्म ग्रंथों में हमें दी गई है। ऐसा नहीं कि हमने अपने मन से कहीं से इतनी इसकी पढ़ ली, इतनी उसकी पढ़ ली। ऐसे हमें नहीं करना पड़ता। है ना? जैसे आपने कई कुछ चीजें कही हैं। आगे चर्चा होगी उन चीजों की। अ उसमें आप आपने अपने इस्लाम से बाहर की चीजों का आलंबन लेकर के जावेद जी को चुप कराया। इस्लाम से बाहर की चीजों अब क्या हुआ? जब हमने सनातन ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध कर लिया। सर्वज्ञ सर्व्यापक सिद्ध कर लिया। और क्योंकि हमारे मन में सर्वशक्तिमान ईश्वर की ही चाह है। अबाध्य ईश्वर की ही चाह है। और अबाध्य वो तभी सिद्ध हो पाएगा जब वो देश कृत कालकृत और परिस्थिति कृत किसी भी तरह की बाधा से रहित हो। तो इसीलिए इस संसार का मायाकृत होना, माया से बना होना, अविद्या से बना होना जिसको हम प्रकृति भी कहते हैं इत्यादि इत्यादि थोड़े-थोड़े से भेद से कहा जाता है। सनातन धर्म दर्शन है उनमें। तो जब हम जब हमारे अंदर की जो प्यास है वह अबाध्य हो जाने की प्यास है तो हमारा ईश्वर भी अबाध्य होगा।

01:08:50:26 वह देशत देशत कालकृत और परिस्थिति ग्रत किसी भी प्रकार की बाधा से रहित होगा। तभी तो ऐसा सिद्ध करने के लिए हमें माया का आलंबन लेना आवश्यक होगा और जब माया का आलंबन लेगा तो वह फिर अपनी माया में अपने अपने द्वारा रचित संसार में कहीं पर भी किसी भी रूप में प्रकट हो सकेगा। इसी को अवतार कहते हैं। अब बात आती है कि जो गाजा में जो लोग मर रहे हैं यद्यपि गाजा का उदाहरण लेना आवश्यक नहीं था तो उसका ईश्वर पर दोष क्यों नहीं जाता है जाहिर सी बात है क्यों नहीं जाता है क्योंकि ईश्वर को मालूम है कि तुम्हें कुछ नहीं हो रहा है ये जो भी कुछ हो रहा है वो माया मात्र है वो तुम्हारी अज्ञानता है जो तुम इस वीडियो गेम की दुनिया को रियल समझ रहे हो और तुम सोच रहे हो कि भैया यह गड्ढा है और मैं मर रहा हूं वास्तविक िकता क्या है कि तुम्हें कुछ नहीं हो सकता। ईश्वर यह जानता है इसलिए ईश्वर प्रभावित नहीं होता। अच्छा ईश्वर की एक जो व्याख्या है, है ना? ईश्वर की एक जो व्याख्या है जो अ

01:10:02:09 यह भी तो है कि वह सदा सुखी रहने वाला है। तो फिर आप यह कैसे कह सकते हो कि गाजा में चीजें होने के कारण वो दुखी होगा। तो दुखी क्यों नहीं होगा? अगर इस गाजा में होने वाले कष्ट को आप रियल मानोगे और ईश्वर को आप दयालु मानोगे तो उसको दया आएगी। दुखी होगा वह। तो इसका मतलब आपको मानना पड़ेगा कि ईश्वर जानता है कि यहां पे ये सब माया है। इसलिए ईश्वर को कुछ नहीं होता है। मगर ईश्वर व्यवहार में आकर के वो वो दयालुता वाला रूप भी धारण करता है। मगर वस्तुतः वो सच्चिदानंद है। उसको कोई फर्क नहीं है। क्योंकि उसको मालूम है कि अज्ञानता में फंसा हुआ है सब कुछ। हां वो व्यवहारिक जब होता है रूप लेता है श्री रामकृष्ण आदि के रूप में आकर के तो वह तरह-तरह की वहां अंदर उस स्वप्न की दुनिया में अंदर आकर के वीडियो वहां अंदर उस वीडियो गेम की दुनिया के अंदर आकर के वो जब अवतार लेता है तो वह तरह-तरह के वहां पर रोल भी निभाता है। आपको आपके जैसा प्रतीत होने के लिए वह दयालुता भी दिखाता है। जिससे कि आप उसकी ओर आकृष्ट हो सको। उसका आलंबन लेकर के उसके साथ एक ही भूत हो करके उस वीडियो गेम की दुनिया से मुक्त हो सको। हम चलिए खैर कहने का मतलब यह है कि गाजा इत्यादि जैसी जो चीजें हो रही हैं ईश्वर के दृष्टिकोण से वह सारी चीजें काल्पनिक है। वो सारी चीजें माया है,

01:11:17:13 अविद्या है और जिससे जुड़ा होने के कारण उसका जो अंश है वो परेशान है और वह परेशान नहीं क्योंकि वह जानता है कि माया है। ठीक है? यानी कि वह अज्ञानी है जो जुड़ा हुआ है और वह जो मुक्त है प्रभावित नहीं है वह ज्ञानी है। ज्ञान स्वरूप ईश्वर हो गए। तो अब यहां से क्या हुआ कि इसीलिए भगवत गीता में कहा गया कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। क्योंकि वो समस्त कर्मों के मूलाधार तो हैं। मूल तो है वो। दुनिया में जो भी कुछ हो रहा है। मगर क्योंकि वह वहां के जो हो रहा है उसके परिणाम में लिप्त नहीं है। मतलब परिणाम से प्रभावित नहीं है। मतलब मान लीजिए कि हवा चल रही है। अब उनको अगर यह अपेक्षा नहीं है कि हवा चलने से मुझे ठंडक मिलेगी। तो कर्म फल से वह प्रभावित नहीं है। इस कारण से कर्मों में लिप्त ना होने के कारण और वह जानते हैं सर्वज्ञ होने के कारण वह जानते हैं कि माया की दुनिया है अविद्या है। इसलिए वो सब कुछ करने वाले होते हुए भी उन दोषों से मुक्त हैं जिन दोषों से किसी सामान्य व्यक्ति को जब करते हुए हम देखते हैं जुड़ा जुड़ा हुआ हम देखते हैं तो उसको हम दोषी मानते हैं। क्यों? अब उसको क्यों दोषी मान रहे हैं? क्योंकि उसकी जानकारी में उसके पर्सपेक्टिव

01:12:32:21 में वह सब झूठ नहीं है। ठीक है? अब यह पर्सपेक्टिव की बात है। हमारे लिए जो रियलिटी है ईश्वर के लिए वह रियलिटी नहीं है। तो इसलिए ईश्वर पर वह दोष नहीं लगता है। हम हम पर वो दोष लगता है क्योंकि हमारे लिए वो रियलिटी है। तो जितना भी दुनिया में बुरा कार्य हो रहा है ऐसा नहीं है कि उसके मूल कारण कोई और है। दूसरे खुदा है। उसका भी ईश्वर ही है। मगर क्योंकि ईश्वर जानता है कि यह सब कुछ नाटक है। यह सब कुछ अविद्या है। यह सब कुछ अज्ञान है। इसलिए सब कुछ का कारण होते हुए भी उस पर दोष नहीं लगता है। किस पर लगता है? जो ये नहीं जानता है कि अविद्या है। जो जानता है कि रियलिटी है। जो जानता है कि रेप करने से जो ऐसा सोच रहा है कि रेप करने से मुझे सुख मिलेगा। तो वो जब रेप में लिप्त होगा तो वो दोषी है। क्योंकि वो सुख प्राप्त करने के लिए उसको रियलिटी मान करके वह कार्य कर रहा है। ठीक है? अब अब यह ठीक इस तरीके से है जैसे कि इसको एक तरीके से समझ लें जैसे पृथ्वी को गोल माना गया है विज्ञान के द्वारा पृथ्वी गोल है तो बाहर से पृथ्वी गोल है मगर हमारे पर्सपेक्टिव से पृथ्वी क्या है चपटी तो हमारा जो व्यवहार होता है कैसा होता है पृथ्वी के साथ कैसा होता है पृथ्वी

01:13:47:27 के साथ हमारा व्यवहार हमारा व्यवहार होता है चपटेपन के अनुसार हम किसी को यह नहीं कहते कि ऐसे जाओ ऐसे कहते हैं सीधे जाओ चप चपेटेपन के अनुसार व्यवहार होता है। इसी में एक बात और ले लेता हूं। जावेद जी ने एक बात उठाई थी कि भैया दुआ क्यों मांग रहे हैं? जब वो अपने हिसाब से ही कुछ भी करता है तो हमारे दुआ मांगने से क्या होगा? तो दुआ मांगने से हमारे अंदर जो हम उसके प्रति जो आकर्षण आकर्षित हो रहे हैं ना। तो दुआ मांगने से जब हम क्या कहते हैं? हमारे यहां पर जो दुआ का कांसेप्ट है वो है ईश्वर का चिंतन करना। ईश्वर कौन है? जो सच्चिदानंद है। जब हम इस दुखप्रद इस माया के संसार को छोड़कर इसके ठीक विपरीत सच्चिदानंद को स्मरण स्मरण करते हैं तो हमारे लिए यहां पर वो जो भौतिक चीजें होती हैं बदलती नहीं है। वो होते हुए भी हमको उसका कष्ट कम होने लगता है। जैसे संभाजी की आंखें निकाली जा रही हैं। मगर वह जगदंबा कह रहे हैं। उनकी आंखें निकाली जा रही हैं। तो जब हम जितना ज्यादा ईश्वर में जा अपने प्राप्तव्य की ओर आकर्षित होते जाते हैं तो हमें यहां से मिलने वाली जो इंफॉर्मेशन है जो हमको बेवकूफ बना रही हैं वो उनका प्रभाव हमारे ऊपर कम होने लगता

01:15:02:28 है। है ना? जितना कम होने लगता है उतना ही ज्यादा हम उन परिस्थितियों में होते हुए भी दुखी नहीं होते। तो क्या हुआ? इसको एक्सेस समझिए एग्जांपल से कि जैसे दुआ क्यों करते हैं? तो दुआ से इसमें आर्य समाज भी आ जाता है। वह कह देता है कि ईश्वर जो है वह क्षमा नहीं करता। तो क्षमा कैसे होता है? उसको आप समझ लीजिए। ईश्वर क्षमा कैसे करते हैं? जैसे कि मान लीजिए कि एक समय था जब मैं लोगों के कपड़े चुराया करता था। मुझे जींस बहुत अच्छी लगती थी। मुझे टीशर्ट बहुत अच्छी लगती थी और मैं लोगों के कपड़े चुराता था। तो मेरे लिए निर्धारित हो गया कि मेरे भी कपड़े किसी दिन मुझसे छीन लिए जाएंगे। ठीक है? वो कपड़े जिनसे मुझे प्रेम था वो मुझसे छीन लिए। ऐसा कष्ट मेरे लिए निर्धारित था। अगर जावेद जी के दृष्टिकोण से कहें तो भैया मेरे ऊपर एक गाज गिरने वाली है कि बिना कारण के। मैंने कुछ ऐसा किया नहीं। मगर मेरे ऊपर एक गाज गिरने वाली है जो जिसमें कि मेरे कपड़े मुझसे छीन जाएंगे। यह कष्ट मुझे मिलने वाला है। तो हम दुआ क्यों मांग रहे हैं? जब ईश्वर को उससे कोई मतलब नहीं है। तो बात ऐसी है कि परमार्थिक दृष्टि से क्या हो रहा है कि जब हम सच्चिदानंद परमार्थिक दृष्टि वही पर्सेक्टिव

01:16:18:07 ईश्वर के डायमेंशन से जब हम उन चीजों को देख रहे हैं तो क्या हो रहा है कि जब हम ईश्वर की वंदना कर रहे हैं, ईश्वर का चिंतन मनन कर रहे हैं इस भाव से कि भैया वो हमारी परेशानी को दूर कर दे। तो उसके कारण मेरे जब कपड़े बाद में छीने गए मुझसे आज मेरे पास जींस टीशर्ट नहीं है या आज मैं फिल्में नहीं देख पा रहा हूं या आज मैं गाड़ियों में नहीं घूम पा रहा हूं या आज मेरे मेरे भाग्य में था कि मेरा घर टूट जाए या ऐसे ही और दूसरे कष्ट इसको आप इसकी जो गंभीरता है उसको बढ़ा भी सकते हैं। तो ये जो कष्ट हैं इन कष्टों से प्रभावित होना मेरा कम हो जाता है। तो क्या होता है कि इसका मतलब वो रियलिटी तो नहीं बदली। जो होनी थी वो तो हो ही रहा है। उसमें ईश्वर का हस्तक्षेप भी नहीं हुआ। यह कौन सी रियलिटी है? ईश्वर की रियलिटी कि जो होना था वही हुआ। मगर एक व्यवहारिक रियलिटी भी है कि मैंने जब ईश्वर की वंदना की तो ईश्वर ने मुझे क्षमादान दिया। मुझे कोई कष्ट नहीं है। जो मुझे कष्ट होना था कपड़ों के जाने का है ना? कपड़े तो गए हैं मगर मुझे कष्ट नहीं है तो मुझे ईश्वर से क्षमा मिली। यह व्यवहारिक सत्य है। और ईश्वर की डायमेंशन से क्या हुआ है कि मेरा वो जो मुझे कपड़े मिलने वाला जो कष्ट था वो कम हो गया। इसमें एक बात और आती है सीधे सरल शब्दों में कहें कि दुख का नाम ही संसार है। भेद का नाम ही संसार

01:17:33:13 है। भाई मान लो किसी को मुझे इसी बात का दुख होने लगे मैं वहां क्यों नहीं हूं। तो देश कृत बाधा से मुझे दुख हो गया ना। है ना? मैं उस समय वहां क्यों नहीं था। काल कृत बाधा से मुझे दुख हो गया ना। तो दुख का नाम ही संसार है। और जो ईश्वर का कांसेप्ट है वह आपको दुख से मुक्त कराने के लिए ही है। वहीं की वही आपको सही कर देने के लिए नहीं है। हां, वहां पर कुछ हद तक आपको सहायता दी जा सकती है कि आप अपने उस मार्ग पर आगे कैसे बढ़ पाए। वो सहायता आपको मिल रही है। यानी कि आपको जो चीजें प्रभावित हो रही थी कि मेरे पास कार नहीं है। मैं जिऊंगा कैसे अब मैं जाप कैसे करूंगा। उसमें आपको सहायता मिलती है भक्ति से। मगर एट दी एंड आपकी यात्रा क्या है कि उस चीजों से मुक्त होना। जहां पर वह जो बीज बाकी है दुखी होने वाला बीज संसार में बाकी है। जब तक आप संसार में हो तो बीज बाकी है। आपको यहां से सदा के लिए मुक्त होना ही आपका वो है। तो फिर आप यह कह सकते हो ये कैसे कह सकते हो कि ईश्वर है तो दुख क्यों है? भाई ईश्वर का कांसेप्ट ही यह है कि आपको दुख से दूर ले जाया जा रहा है। हां ईश्वर को अभी जानने मानने से आप वो यात्रा कर पाओगे जहां आपको जाना है। प्लस अभी का जो आपका जीवन है वह सरल होने लगेगा। वो दुख कम होने लगे। मैंने दोनों पर्सपेक्टिव आपको बता दिए। अब कहने

01:18:48:14 का मतलब यह है कि आपको इस पर आपत्ति है कि किसी को दुख क्यों हो रहा है और हम उसके दुख को कम कर रहे हैं। मगर आप हमें रोक रहे हो। जावेद जी से बात हो रही है। आप हमें रोक रहे हो। क्यों बता रहे हो भाई उसको ईश्वर का कांसेप्ट? ईश्वर का कांसेप्ट बताने की वजह से वो जो अपने दुख से प्रभावित हो रहा है। क्या आपने ऐसे लोग देखे हैं कि नहीं देखे हैं? जो किसी कारणवश अपने चिंतन के कारण अपनी इच्छा शक्ति के कारण उसी भौतिक प्रहार से कम दुखी होते हैं। जिस भौतिक प्रहार से कम इच्छा शक्ति होने के कारण कम प्रज्ञा शक्ति होने के कारण ज्यादा दुखी होते हैं। तो जब हम उसको एक आधार दे रहे हैं दुख से दूर उसके दुख कम करने का तो आप बाधा बन रहे हो कि नहीं साहब यह जो आप आधार दे रहे हो इसका अस्तित्व ही नहीं है। खैर अस्तित्व हमने सिद्ध कर दिया है। हम अगर अब दूसरे तरीके से भी आपको बताएं तो आप हमें रोक रहे हो उसका दुख कम करने के लिए जिसका दुख आप कम करना चाहते हो इसको कहते हैं सनातन अगर हम आपके दृष्टिकोण से भी देख लें कि भाई जो बच्चे मर गए उनका क्या ठीक है भाई अगर हम भौतिक वाधिता की दृष्टि से देखें तो जो बच्चे मर गए हम उनका कुछ नहीं कर पाएंगे वो बात अलग है कि वो देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता देह के भेद से आत्मा में भेद नहीं होता शरीर का अस्तित्व हमेशा रहता

01:20:03:20 है और इसी से रिलेट करके क्या कहते हैं यहां पर फिर से इस्लाम की हार है। यहां पर इस्लाम पराजित होता है। क्योंकि हमारे यहां पर तो यह कांसेप्ट है कि भैया जो अभी खटाख किसी कारण से मर गया तो अभी अगर वो मुक्त नहीं हुआ है। यानी अभी वो दुख से दूर नहीं हुआ है तो उसको फिर दोबारा मौका मिलेगा कि वो दुख से दूर दूर होने वाली यात्रा कर सके। दुख में ही नहीं रह गया। है ना? हमारे यहां यह है मगर इस्लाम में नहीं है। फिर वहां से क्या-क्या चीजें निकलती है वह तो बाद की बात है। अभी मैं बात करूंगा। मगर यह तो आपको मानना पड़ेगा कि जो मर गए हैं या जिनके साथ हो गया है और जो अब बदला नहीं जा सकता आपके अनुसार है ना अगर यह भी मान लें तो क्या इस कारण से जिनको हम बचा सकते हैं दुख से उनको भी ना बचाएं। उनको यह ना बताएं कि ईश्वर का जाप करो। उसके कारण तुम अपने तुम्हारे साथ यहां की चीजें जो हो रही है जो होकर ही रहेंग क्योंकि दुख का नाम ही संसार है। उसके कारण आप में वह क्षमता उद्भाषित हो पाएगी जो आप वो जो दुखी करने वाली चीजें उनके होने पर भी आप दुखी ना हो। जब आपको यह मालूम पड़ता है नैन छिनती शस्त्राण नैन दति पावक तो आपके अंदर वह सामर्थ वो बल आता है जिससे कि आप यह दुख देने वाली घड़ियों से गुजर पाते हैं।

01:21:21:03 अच्छा अब बात करते हैं कि इस्लाम का इसमें क्या दिक्कत है? इस्लाम की दिक्कत वही है कि जो कुत्ता है जो आज जन्मा और मर गया उसका क्या होना है? इस बारे में इस्लाम का क्या कांसेप्ट है? या फिर जो बच्चा है जो अभी जिसको अभी पता ही नहीं चल पाया। भाई उसको न्याय मिलेगा जिसने इस्लाम को फॉलो किया होगा। सीधी सी बात है। अगर उसको उसने इस्लाम को इस्लाम के विपरीत चलने वाले को तो वो नरक मिलेगा। सजाएं मिलेंग। तो इस्लाम को जो जान ही नहीं पाया और वह फॉलो ही नहीं कर पाया। उससे पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। इस्लाम तक वो विकल्प भी नहीं आ पाए। यह इस्लाम है और यह दूसरी चीजें जो है विरुद्ध है। विकल्प अभी तो प्रमाण वाली बात तो आना दूर की बात है। वो तो आपने दिया ही नहीं है दुनिया को। यदि यदि कुरान परीक्षा में आने वाला विकल्प है तो उसको विकल्प उसको सही विकल्प के रूप में चुनने के लिए पढ़ाई कहां पर कराई जा रही है? इस्लाम में दोबारा में से मैं रिपीट कर देता हूं। लल्लन टॉप पर होने वाली जो डिबेट है उसमें इस्लाम को मानने वाले मुफ्ती जी द्वारा एक बात कही गई है बड़ी ही कुतर्कपूर्ण अपने मत को स्थापित करने के चक्कर में कि जो इस्लाम इस्लाम का जो पक्ष है इस्लाम

01:22:36:16 के द्वारा बताया गया जो खुदा का पक्ष है ईश्वर का पक्ष है वो आपको परीक्षा में दिया गया एक विकल्प है और जितनी उसके विपरीत चीजें यानी कि बुराई इस्लाम के पर्सेक्टिव से जो बुराइयां है उसमें दूसरे ईश्वर को मानने वाले भी आ गए। वह सब आपको परीक्षा में दिए गए गलत विकल्प है। तो यदि इस्लाम का जो पक्ष है अगर शॉर्ट फॉर्म में कहें कुरान यदि इस्लाम का जो पक्ष है कुरान वह परीक्षा में दिया गया एक विकल्प है तो इस्लाम के द्वारा वो पढ़ाई कहां पर कराई जा रही है जहां पर व्यक्ति यह जान सके सीख सके कि कुरान को सही विकल्प लिखना है परीक्षा में जब आएगा तब वह पढ़ाई कहां पर कराई जा रही है बेस क्या है कुरान को सही विकल्प चुनने के लिए उस परीक्षा से पहले की पढ़ाई कहां पर हो रही है यह बताने का कष्ट करें मुफ्ती जी। ठीक। आगे बढ़ते हैं। तो अब जो है

01:23:38:24 यहां पे हमने क्या किया कि अकाट रूप से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध किया और अकाट रूप से सिर्फ अस्तित्व ही सिद्ध नहीं किया कि क्या एलन मस्क है भैया दुनिया में। अरे तो हम क्या करें? तुमको उस तक जाना है। तुम्हारा वही विषय है। तुम्हारा वही उद्देश्य है। वह सिद्ध किया हमने। वह रिलेशन सिद्ध किया हर तरह से। और जब हम उसके अस्तित्व को सिद्ध कर रहे हैं मूल वाले रूप में तो उसमें भी उसका सर्वनियंता, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान होना आवश्यक बताते हुए, सिद्ध करते हुए और फिर उसको तीनों चीजें सिद्ध भी की। यह हमने किया और जबकि इस्लाम के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर ना ही वह मूल सिद्ध होता है सृष्टि का क्यों नहीं होता है? क्योंकि वह सर्व्यापक नहीं है। क्यों नहीं होता? क्योंकि वह सर्वशक्तिमान नहीं है और अपने कुतर के कारण उन्होंने उसको सर्वज्ञाता सिद्ध होने से भी रोक दिया। इसके साथ ही साथ एक क्वेश्चन यह आ जाता है कि जो बच्चे आज जन्मे हैं और आज ही आपकी वो प्रलय आई या फिर इनका क्या होने वाला है? क्योंकि इनको तो ऑप्शन मिला ही नहीं। विकल्प के रूप में भी नहीं मिला। परीक्षा में विकल्प के रूप में भी इनको नहीं मौका मिल पाया तो इनका क्या होने वाला है? ठीक है? यह है हमारे यहां तो कर्म फल है। कर्म फल के कारण वो यहां पर उत्पन्न हुआ है। उसके साथ ऐसा होना था। उसके बाद

01:24:53:27 यदि वो मुक्त नहीं हुआ है इस जीवन में तो उसको अगला जीवन मिलेगा। आपके यहां तो वो है नहीं। तो आपके यहां क्या सिद्धांत है उसका? वह आपने कहीं पर क्लियर मेरी जानकारी में नहीं किया है। अब जो है जावेद अख्तर जी ने जो कुछ गलत चीजें कही हैं उसको मैं बता दूं उन पर थोड़ी सी बात कर कर लेते हैं कि उन्होंने कहा कि जुल्म का जो नक्शा आप बनाओगे तो जहां-जहां पर धर्म है वहीं-वहीं पर जुल्म का नक्शा आपको प्राप्त होगा। जहां पर धर्म होगा वहीं जुल्म का नक्शा होगा। तो आप पहले तो इसके मूल में जाइए। क्या होता है कि सतही स्तर पर बात करने के कारण ही यह अज्ञानता फैलती

01:25:29:22 है। पहले आप इसके मूल में जाइए कि दुनिया में लड़ाई किन दो पार्टियों के बीच में है? लड़ाई किन दो पार्टियों के बीच में है? एक पार्टी है जो कंजशन करना चाहती है जो केवल भोग करना चाहती है और वो अपने से आसपास वालों के साथ भी मतलब अत्याचार करना चाहती है और अपने स्वार्थ को देख रही है वो भी भौतिक वादिता के चश्मे से क्योंकि वो यह नहीं मान रही है कि नहीं भैया हमारी आत्मा को भी सुख देना है अंतत तो कतवा हमारा कारण ईश्वर है वह इन सब पर ध्यान नहीं दे रही तो उसने यह बना रखा है कि हमको भोग करना है। लस्ट इन सब चीजों को हमें पूर्ति करनी है और उसके कारण हमें अत्याचार करने हैं। अत्याचार करने के बीच में क्या चीजें हैं जो हमारी बाधा बन रही है? ठीक है? यह नास्तिकता है। यहां से सबसे पहला क्या है? नास्तिकता। तो बाधा क्या बन रही है? बाधा बन रही है वह बातें जो ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करती हैं। वह मान्यताएं जो ईश्वर को मानती है जिनके कारण हमें धर्म प्राप्त होता है। जिनके कारण हमें क्या सही है और क्या गलत है यह बातें प्राप्त होती है। डूस एंड डोंट्स और जब डूस एंड डोंट्स आ जाते हैं ईश्वर

01:26:44:28 के कारण। यह भी आगे बात करूंगा जो जिसमें मुफ्ती जी ने अच्छी चीजें कही हैं और जावेद जी तो हल्के पढ़ ही चुके थे। तो जो डस एंड डोंट्स है वह हमें ईश्वर के कारण प्राप्त होते हैं। धर्म अभी तक हमने ब्रह्म पर बात की थी। धर्म कि अगर हमें ईश्वर को प्राप्त करना है तो हमें यह करना है और यह नहीं करना है। यह डूस एंड डोंट्स यही धर्म है। यही मर्यादा है। ठीक है? और इसी को आप मोरालिटी भी कह सकते हैं। तो लड़ाई किन दो पक्षों के बीच में? पहले इसको आप समझ लीजिए। एक जो यह मानता है कि ईश्वर है और वो होने के कारण वो डूस एंड डोंट्स अप्लाई कर रहा है। तो जब ये डस एंड डोंट्स अप्लाई होते हैं ना तो जिन लोगों को भोग में ज्यादा जिनकी वृत्ति है यह व्यवहारिक सत्ता है। सत्य है अब फिर आप मेरे पारमार्थिक सत्य को बीच में मत ले आना। तो जिन लोगों के अंदर भोग की चीजें ज्यादा हैं, वह उनको तकलीफ होती है ईश्वर के अस्तित्व से और ईश्वर को प्राप्त कराने वाली विधा अर्थात धर्म से। तो पहली नंबर बात तो वो सीधे खंडन करते हैं। ईश्वर है ही नहीं तो मुझे धर्म को नहीं मानना पड़ेगा। जब इससे दाल नहीं गलती है तब दूसरे दूसरे धर्म

01:28:00:07 स्थापित किए जाते हैं। जिसे हम कहते हैं धर्माभास। ठीक है? तो जहां पर भी यह धर्म के नाम पर जो युद्ध हो रहा है ना वह युद्ध धर्म के लिए नहीं हो रहा है। वह युद्ध हो रहा है कंजशन के लिए। फॉर एग्जांपल किसी व्यक्ति को अपनी बहन से विवाह करना है। धर्म उसके आड़े आ रहा है। मां से विवाह करना है। धर्म उसके आड़े आ रहा है। क्या करें? मेरे पास तो भैया आ गया। ईश्वर का एक भेजा हुआ मैसेंजर। उसने बता दिया कि भैया फलानी फलानी बहन से विवाह कर सकते हैं। है ना? यह सब चीजें हैं। तो किस में हो रही है लड़ाई? एक जो कंजशन करना चाहता है अत्याचार करके भी किसी भी तरह से एनी हाउ दूसरी जो लिविंग बीइंग्स है उनको खत्म करके उन पर उनका शोषण करके और दूसरा जो ईश्वर को मानने के कारण धार्मिक बाधाओं में बंधे होने के कारण ये जो शोषण वाली चीजें हैं उनसे वह कम हो रहा है। शोषण तो सभी लोग कर रहे हैं। पेड़ों का शोषण तो शाकाहारी भी कर रहा है। कर रहा है ना? मगर उसमें एक कहीं ना कहीं वो क्या कहते हैं उसको? अनुशासन है जिसके कारण धीरे-धीरे वह शोषण से मुक्त हो रहा है।

01:29:15:10 जैसे हमारे यहां जो सबसे वरिष्ठ जो आश्रम कहा गया वो सन्यास आश्रम सन्यासी इस सृष्टि का सबसे कम शोषण करता है। जो कंजशन है धर्म के कारण वो कंजशन जो है नियंत्रित होता है। अनुशासित होता है। और क्या है कि अगर हम नियंत्रित और अनुशासित नहीं करेंगे उस कंजमप्शन को तो उससे उसके गर्भ से और कंजमशन निकलता जाएगा। तो धर्म उसको क्योंकि अनुशासित करता है तो वह बढ़ने की बजाय कैंसर की तरह वो कम होता है। जैसे कि आध्यात्म मार्ग में आने के बाद मैं अपनी बात करूं तो मेरा जो कंजपशन को लेकर के कंजशन को लेकर के पर्सपेक्टिव था वो कम हुआ है। और हो सकता है आने वाले सालों में और कम होता चला जाए। तो यह हो रहा है। जब धर्म को मानेंगे तो कंजप्शन और जो है नियंत्रित होंगे। हमारे पास धर्म होगा। बहन से विवाह नहीं करना है। माताओं को दृष्टि से नहीं देखना है। और जब हमारे पास धर्म नहीं होगा तो हम लोग इनमें भी हम अपने लिए छूट स्वतंत्र होकर के सबको देखेंगे। और फिर जो ये प्रवृत्ति है नग्न देखने की कामना है जो पुरुष के मन में स्त्री को वो जो प्रवृत्ति है उस प्रवृत्ति से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। मुक्त मुक्त नहीं हो पाएंगे

01:30:30:19 तो फिर हमारा अटैचमेंट माया रूपी संसार से बना रहेगा। माया रूपी संसार से बना रहेगा तो सदा दुखी रहेंगे। वह सारे कांसेप्ट आपको मैंने क्लियर किए। तो कहने का मतलब यह है कि अह किन दो लोगों के बीच में लड़ाई है एक जो भोग करना चाहते हैं। दूसरे जो मुक्त होना चाहते हैं। जो जो ये इस चीज को स्वीकार कर रहे हैं। भैया इस संसार से हमें अंतिम सुख नहीं मिलेगा। और दूसरे जो इस अंतिम सुख को मना कर रहे हैं वह नास्तिक है। अब क्या होता है? नास्तिक चोला ओढ़ते हैं जब उनकी दाल नहीं गलती है। वह नए-नए ईश्वर खड़े करते हैं और उनको कहते हैं धर्माभास। वो रियल धर्म नहीं बनाते बताते। रियल ईश्वर नहीं बताते। ईश्वर जैसा कुछ बताते हैं। तो सनातन के पर्सपेक्टिव से जब हमने पूर्ण ईश्वर को ख्यापित किया, सर्वशक्तिमान को ख्यापित किया, सर्वज्ञ को ख्यापित किया, सर्वव्यापक को ख्यापित किया। हां। तो उस पर्सेक्टिव से जब यहां पर इस्लाम भी उसी कैटेगरी में दिखाई देगा आपको जब आप देखेंगे तो तो फिर क्या होता है कि अब भैया हमने अपना एक नया कांसेप्ट बना लिया कि ईश्वर ये कर सकता है ये नहीं कर सकता पूर्ण नहीं है यहां बैठा वहां नहीं बैठा और ज्यादा गहराई में जाकर बातें मत करो है ना जैसे कि

01:31:45:20 एक जगह बोला गया मुफ्ती जी के द्वारा हमारे यहां सवाल करने के लिए मना नहीं किया गया है किया गया है कुरान 5 101 कहती है कि ज्यादा सवाल मत करो वरना ना जो तुमसे पहले भी कुछ लोगों ने ऐसे ही सवाल किए गए थे तो उनके लिए वो आयतें भी खोल दी गई थी जिनका निर्वाह करना बहुत कठिन होता है तो तुम्हारे लिए भी खोल दी जाएंगी हम इस पर भी आगे बात करेंगे कि अगर लोगों को जो कठिन लग रहा है उसके हिसाब से ईश्वर को प्राप्त होने वाली विधा में परिवर्तन किया जा रहा है

01:32:21:18 तो फिर यह ईश्वर जो है बदल रहा है तो एटरर्नल कैसे उसको प्राप्त कराने वाली जो विधा है वह तो बदल रही है तो पहले वह किसी और विधा से प्राप्त हो सकता था अब वह किसी और विधा से प्राप्त हो रहा है तो वो तो बदल रही है दो 187 में कहा जा रहा है कि भैया अभी तक जो है रोजे की रात में अपनी स्त्रियों के साथ जो है संग स्त्री संग कर लेना जो है पाप नहीं था पाप था आज से पाप नहीं होगा यह क्या है ऑन द स्पॉट हो रहा है पहले से नहीं था पहले से तो कुछ और था पाप था आज से पाप मुक्त हो गए तो क्या बदल रहा है आपके यहां चीजें चेंज हो रही हैं। तो अगर ईश्वर को प्राप्त कराने वाली चीजें चेंज हो रही हैं तो फिर वह ईश्वर भी तो चेंज हो रहा है जिसको प्राप्त करना है। वो नहीं हो रहा चेंज। भाई पहले कुछ और तत्व था तभी तो उसके लिए विधा दूसरी थी। अब कुछ और तत्व है तभी तो उसके लिए विधा दूसरी है। विधा चेंज हो रही है तो ईश्वर का भी चेंज होना उससे परिलक्षित हो रहा है। अब आप यह समझ गए कि किन दो लोगों के बीच में लड़ाई है। भोग करने वाले और मुक्ति के मार्ग पर चलने वाले जो मुक्ति के मार्ग पर चलने वाले लोग हैं। वही साधु कहलाते हैं। साधु मेरा मतलब अच्छे लोग सज्जन लोग वही साधु कहलाते हैं। और वही जो है धर्म पद पर आगे बढ़ते हैं। तो

01:33:36:24 वही अनुशासित होते हैं। अब आप कहोगे भैया मैं तो धर्म को नहीं मानता मगर मैं भी जो है उन चीजों का पालन करता हूं। तो यह ठीक इस तरीके से है जैसे आप थॉमस अलवा एडिसन को नहीं जानते मगर आपके घर में बल्ब जल रहा है। बल्ब बल्ब के जितने हिस्से में आपके जीवन में बल्ब है ना उतने हिस्से में आप थॉमस अलवा एडिसन से कनेक्टेड हो। उसी प्रकार से जितने हिस्से में आपके यहां पर मर्यादा है नास्तिक के अंदर उतने हिस्से में आप आस्तिकता से कनेक्टेड हो और उसी प्रकार से जितने हिस्से में जो इस्लाम इत्यादि जो सनातन के विपरीत धर्म है जितने हिस्से में वो सनातन के साथ सामंजस्य देखा जाता है उनमें तो उतने हिस्से में उनका भी कनेक्शन हो जाता है सनातन से। ठीक है? अब आप इसमें एक तर्क और ले लीजिए कि आपने कहा कि आज हम पहली बात तो आपका एक तर्क था कि आज जो है यह वाली बहस करने का हमें अवसर प्राप्त हो रहा है। तो यह भी बात एक बहुत गलत बात है। हिरण्यकश्यप ने भी यह सब बातें कही थी कि अगर ईश्वर है तो इस खंभे से निकल के दिखाए। तो ये सारे तर्क तो हमारे यहां जाने कब से हैं।

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01:34:46:14 चलिए मान लीजिए कि ये तो मानेंगे कि भैया आज से 100 साल पहले का तो पुराण है। चलो उस पे आप लोग आक्षेप लगा लो। हमारे आर्य समाजियों ने तो बहुत फैलाया ही है। है ना? हालांकि वह आर्य समाजी भी क्या क्या सिद्ध होते हैं वह भी बात करेंगे हम लोग। मगर अ हमारे यहां पर 100 साल से कहीं अधिक समय से ये सब कुतर्क चले आ रहे हैं। ऐसे ही नहीं बौद्धों का खंडन किया आदि शंकराचार्य जी ने। वो भी तो नास्तिकता थी।

01:35:16:00 बौद्धों ने भी तो नास्तिकता ही फैलाई। 2500 साल पहले तो तर्क था। ईश्वर के ना होने में ऐसे ऐसे भयंकर तर्क किए गए। जाइए पढ़िए बुद्ध दर्शन। मेरे ख्याल से अगर आप बुद्ध को पकड़ लेंगे तो कम से कम इस्लाम को मानने वाले जो ये जो मुफ्ती जी हैं आपके समकक्ष खड़े हुए हैं। यह तो आपको परास्त नहीं कर पाएंगे। इतनी बात तो मैं कह रहा हूं। उस नास्तिकता को वो जो बुद्ध की नास्तिकता है ना उसको हराने के लिए सनातनी को आना पड़ेगा। मनुवादी को आना पड़ेगा। शंकर परंपरा के व्यक्ति को आना पड़ेगा। ठीक है? वहां तब काम नहीं चल पाएगा। यह इस्लाम को मानने वाले जो मुफ्ती इत्यादि हैं। खैर तो दो लोगों के बीच में युद्ध है। एक कंसशन भोग वाली पार्टी है और एक जो है मुक्ति पाने की चाह रखने वाली पार्टी जो उसके प्रति क्रिया उसने स्वीकार किया कि मेरे अंदर वो भूख है। और स्वीकार करके उसके अनुसार वो चल रहे हैं। अब क्या है कि पहली नंबर बात ये जो नास्तिक पार्टी है वो अपना चोला ओढ़ती चोला उड़ती है धर्म का दूसरे धर्म का विधर्मी तो वहां युद्ध होता है। ठीक है? युद्ध कैसे होता है कि जो जिसने चोला ओढ़ा है धर्म का जिसने ईश्वर जैसा ईश्वर आभास फैलाया है तो फिर वहां उसके साथ जो वास्तविक धर्म है और जो कल्पित धर्म है उसके बीच में आपको

01:36:31:08 दिखाई देता है युद्ध और क्यों हो रहा है युद्ध क्योंकि हमें उन सिद्धांतों को बचाना है जहां पर एक मां को मां कहा जाए ईश्वर के अस्तित्व को बचाना है असतो मा सद्गमयातम सो मा ज्योतिर्गमया मृत्युमा मृतम गमया को बचाना है ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध कर सकने वाले इन सिद्धांतों को बचाना है। इसलिए वह युद्ध हो रहा है। मानवता के लिए युद्ध हो रहा है। ठीक है ना? क्योंकि अगर धर्म नहीं है तो मानवता नहीं है। पशुता है। धर्मणी ना पशु भी समाना। अब वो आगे बात करेंगे कि मोरल्टी आपने जो कुतर्क किया है वो तो उन कुतर्कों का खंडन तो उन्होंने कर ही दिया मुक्ति जी ने। तो

01:37:18:24 एक बात अब अब एक चीज और बताता चलूं जब धर्माभास की भी दाल नहीं गलती है तो वह फिर बन जाता है सनातनाभास जिनके शोधन के लिए हम कार्य कर रहे हैं वो सनातनाभास क्या है जो हमारे दर्शक है वो जानते हैं इस आर्य समाज रामपाल ब्रह्माकुमारी ये सब सनातनाभास है पहले था धर्माभास अब हो गया सनातनाभास और फिर इसके इन इस ये भी और आगे थोड़ा सा एक्सप्लोर हो जाते तो इनसे वैचारिक युद्ध चलता वो युद्ध आपको युद्ध जैसा नहीं दिखेगा। वैचारिक युद्ध चलता है कि भैया तुम सनातन के नाम से जो जो गलत बातें फैला रहे हो मत फैलाओ। वैचारिक युद्ध चलता है और वहां पर जो है व्यवहारिक युद्ध भी दिख जाता है सीधे-सीधे वालों में और अंतत गतवा किस किस चीज के लिए लड़ाई हो रही है? आपने कहा ना कि बच्चों को मारा ना जाए। बच्चे ना मरे, बच्चों के साथ अत्याचार ना हो। यह भी एक धर्म है, नैतिकता है। अगर आप ईश्वर के अस्तित्व को हटा देंगे तो लोग आपसे क्वेश्चन करेंगे कि भैया तुम्हारे अंदर इन बच्चों को ना मारने का भाव है। हमारे अंदर तो खाने का भाव है। निठार ही हैं। हम तो क्या कर लोगे? कैसे सिद्ध करोगे वही धर्म? और ये बात मुफ्ती जी ने भी आगे कही है। ज्यादा लोगों के कह देने से वही धर्म हो जाएगा क्या?

01:38:34:04 मुफ्ती यह जो अलवजदी है ना जो इसमें आए हुए हैं इनके ही यहां पर इनहीं की टीम थी। वहां पर आया था एक व्यक्ति। इन्होंने प्रश्न किया कि भाई फिर बहन को अगर तुम ईश्वर को नहीं मानते, धर्म को नहीं मानते तो बहन के साथ बहन के साथ वो जो संबंध बना रहा है उससे आप का आपको आपत्ति है। उसने कह दिया नहीं आपत्ति। लो अगर हम ईश्वर के अस्तित्व को हटा देंगे भाई साहब तो यह जो धार्मिक मर्यादा आपको दिख रही है ना छिनभिन्न हो जाएगी और ऐसा हो भी चुका है हिस्ट्री पढ़ लीजिएगा डार्विन ने जब कह दिया था कि वो नहीं है कोई ईश्वर नहीं है वहां का वहां की हिस्ट्री जान लीजिए आप अच्छा दूसरी बात क्या है कि आजकल आपने कहा कि मेजॉरिटी के पीपल तो आजकल जो हां आपने आधुनिक आधुनिकता से जोड़ा कि आधुनिकता हो रही इसलिए आपको आज ये मंच मिल रहा है। आप बताइए संस्कार कम हुए हैं पहले से या ज्यादा हुए हैं? आप ही के परिवेश में बता दीजिए। संस्कार पहले से कम है या ज्यादा है? पोर्न इंडस्ट्री जो आज की डेट में है व्यभचार का अड्डा वो पहले ज्यादा सशक्त थी या आज ज्यादा सशक्त है या क्या कहते हैं आज से आने वाले भविष्य में? तो जिसको आप आधुनिकता का नाम दे रहे हैं वहां मानवता का गला

01:39:49:08 घोटा जा रहा है। समझ रहे हैं? और यदि हम लोग हम जैसे लोग इतने हिस्से में मुफ्ती जी को भी साथ में लूंगा वो बात और है फिर उनका ईश्वर सिद्ध नहीं होता धर्मास सिद्ध होता है वो बात अलग है मगर इतने हिस्से में तो उनको साथ में लूंगा हम जैसे लोग अगर नास्तिकता को काउंटर नहीं करेंगे तो ये जो रेशियो अभी थोड़ा-थोड़ा दिख रहा है ना आपके घर के बगल में वैशालय नहीं है या आपके घर की स्त्रियों को जो है गलत कुदृष्टि से नहीं देख रहा है कोई या आपके घर में ही ऐसी संताने नहीं उत्पन्न हो रही हैं हमारे आपके घर में ऐसी संताने उत्पन्न नहीं हो रही है जो बहन के ऊपर कोई दृष्टि डालें। मां के ऊपर कुद दृष्टि डालें। अगर हम जैसे लोग मैं और मुफ्ती जैसे लोग अगर खड़े नहीं होंगे नास्तिकता के विरोध में तो वहां पर आपको यह दृष्टि भी देखने को मिल जाएंगे। तब सोचोगे कारण दो ना उसको। मां को मां मानने का कारण दो। बहन को बहन मानने का कारण दो। नहीं दे पाओगे आप। तो मेजॉरिटी क्या कर रही है? सम सेक्स चेंज ऑपरेशन करा रही है। तो आपको तो पसंद होंगे। आपने कहा था ना फतवे जारी हो गए थे। विज्ञान के कारण यह है वो वो हुए होंगे। गलत भी होंगे। मगर भाई विज्ञान के नाम पर आप गला घोट रहे हो कि नहीं घोट रहे हो? प्रकृति का हनन कर रहे हो कि नहीं कर रहे हो? विज्ञान के नाम पे।

01:41:02:19 अब आप यह कह दोगे कि उसी विज्ञान का सहारा लेकर के क्यों बोल रहे हो? इसके इसमें भी तर्क ले लो। धरती पर गिरा हुआ इंसान धरती का ही सहारा लेकर के उठ खड़ा होता है। जिस वायुयान को आकाश में उड़ना है वह धरती का ही पहले सहारा लेता है। तब जो है अपने आप को उस योग्य बनाता है कि जो आकाश में धरती को छोड़कर के आकाश में उड़े। तो उसी प्रकार से यह जो विज्ञान के कारण विज्ञान के आधार पर जो मानवता का गला घोटा जा रहा है। इन परिस्थितियों से निकलने के लिए इन्हीं परिस्थितियों का सहारा ले रहे हैं हम लोग। ठीक है? अगर आप कहते कि मोरल्टी अपने अंदर से आती है तो क्या निठारी लोगों की मोरल्टी उनके अंदर से नहीं आई थी? सेट कैसे करेंगे? निठारी कहेगा मुझे कुकर में उबाल करके बच्चों को खाना है। कैसे करोगे मोरल्टी सेट?

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01:41:54:26 तो यह आपका गलत तर्क है। इसमें उन्होंने बहुत अच्छे से वहां पर आपको रिफ्यूट किया। दुआ क्यों मांगते हैं? इस पर मैंने आपको बता ही दिया। गलत कर्म से तबाही होगी। आपने एक जगह माना कि भाई गलत करेंगे तो तबाही होगी। पहली बात तो गलत करेंगे सेट कहां से होगा? आप आप धर्म बन जाओगे लोगों का। फिर अगर आप यह सेट करने लगोगे हम किसको मानते हैं जावेद अख्तर के धर्म को। वही धर्म जिसको आप कुछ और नाम दे दो तो बस धर्म नाम ना दो। बात तो वही हो गई ना घुमा फिरा करके। आप एक नियमावली जैसे ही दोगे वैसे ही आपको आपकी उस नियमावली को मानने वाले आपके लोग हो जाएंगे। दूसरी बात यह है कि यहां पर आपने उस बिलीफ को मान लिया जिसमें आपने यह कहा था शुरू में कि क्या कहते हैं वो भैया मैं ऐसी किसी चीज को नहीं मानता हूं जिसमें मुझे तर्क के साथ जो है उसमें जरा भी बस कह दिया और मान लो आपने यहां मान लिया तबाही होगी साइंस ने आपको प्रूफ किया है क्या झूठ बोलने में तबाही होगी किया है प्रूफ मगर आप मानते हो झूठ नहीं बोलना चाहिए हां कई साइंटिस्ट कहते बहन इत्यादि के साथ जो है संभोग नहीं करना चाहिए। कई साइंटिस्ट कहते हैं कर भी सकते हैं।

01:43:10:28 हम तो फिर आप कह दोगे साइंस की सबसे बड़ी दिक्कत तो यह भी है ना। जैसे आपने एक जगह जब आपसे कहा गया कि भैया वो एक रिसर्च हुई है जिसमें कि जो है अ ये कहा गया कि लोग 90% लोग होते हैं उनके अंदर ईश्वर की चाह है। वो है वो तो हम अलग से भी सिद्ध कर रहे हैं। आपके अंदर भी है। एक नास्तिक व्यक्ति भी यह सोचता है कि बारिश थोड़ी कम हो जाए। क्यों भाई? क्यों सोच रहे हो बारिश को कम करने के बारे में? साइंस ने तो कहा नहीं तुम कम कर सकते हो? तो आप साइंस के ठीक विपरीत जाकर के बारिश को कम करने की चाह मन में आ रही है। आपके धूप को कम करने की चाह मन में आ रही है आपके। इसी से सिद्ध होता है कि आपके मन में सतचित आनंद की चाह विद्यमान है। 200 वर्ष के होने पर भी आपके माता-पिता आपके प्रियजन यदि बीमार पड़ेंगे, मृत्यु के कगार पर पहुंचेंगे, आपके मन में आएगा कि बच जाए। है ना? तो आप मृत्यु से भाग रहे हो, दुख से भाग रहे हो और आप अज्ञानता से भाग रहे हो। जबकि मृत्यु, दुख और अज्ञानता यही रियलिटी है इस दुनिया की। तो फिर आप भाग क्यों रहे हो? यहीं से सिद्ध होता है कि इस रियलिटी के विपरीत

01:44:26:16 एक रियलिटी है। जहां दुख नहीं है, जहां अज्ञानता नहीं है और जहां मृत्यु नहीं है, उसी का नाम ईश्वर है, वही ईश्वर का स्थान है। एक बात मैं बता दूं कि मोरल्टी से भगवान के अस्तित्व को सिद्ध नहीं किया जाता है। मगर मोरल्टी से भगवान का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। भगवान का अस्तित्व सिद्ध होने से मोरल्टी प्राप्त होती है। मोरल्टी से भगवान का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। ठीक है? यह आप ध्यान रखिए। मोरल्टी एक बाय प्रोडक्ट है कि अब हमें पहले पता लगा कि कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है और जो हमारी चाह का विषय है। अब उसको प्राप्त करने के लिए हमें डूज एंड डोंट्स बताए गए हैं। यही मोरल्टी है। ठीक है? मोरल्टी होने से यह पता चलता है कि यह भी जाने अनजाने में भगवान को मान रहा है। भगवान का अस्तित्व यहां से सिद्ध होता है कि हमारे अंदर चाह है। तो इसका मतलब इस दुनिया में उसका अस्तित्व है। ठीक है? आपने कहा कि बहुत से साइंटिस्ट हैं जिन्होंने यह बनाया वो बनाया। पहले इसका जवाब नहीं दिया उन्होंने मुफ्ती जी ने। उन्होंने बहुत से ऐसे चीजें बनाई है जो अच्छी चीजें थी समाज के लिए। वो सभी आपने कहा कि वो सभी सवाल करने वाले थे। हां सवाल करने वाले थे। मगर आज की डेट में भी 90% जो

01:45:41:22 साइंटिस्ट वगैरह हैं वो आस्तिक हैं। जाके देखिए। सवाल करने वाले थे। कोई सवाल करने से नहीं रोका जाता सनातन में। इस्लाम और सनातन में अंतर है। हमारे यहां तो कहा जा रहा है ना असतो मा सद्गमया सवाल ही तो है यह तमसो मा ज्योतिर्गमया मेरी अज्ञानता को दूर करो सवाल ही तो करना है अथातो धर्म जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा करो सवाल संशयात्मा विनश्यति भगवान ने कहा तेरे संशय को ही दूर करना है मुझे यह है सवाल का जवाब तो मोरल्टी एक बाय प्रोडक्ट है और मैंने एक मोरल्टी की बहुत अच्छी व्याख्या आपको बताई कि किसके बीच में युद्ध है जो धर्म के नाम पर युद्ध हो रहा है वास्तविकता मानवता और पशुता के बीच का युद्ध है। अब क्या है? पशुता जो है नास्तिकता के रूप में, फिर धर्माभास के रूप में, फिर सनातनाभास के रूप में और फिर जो है आगे और जिस तरीके से वो लड़ रही है मानवता से। मानवता कहां से आ रही है? ईश्वर के अस्तित्व से। सर्वशक्तिमान पूर्ण ईश्वर। बाधित नहीं।

01:46:44:12 अब थोड़ा सा मुफ्ती जी के भी कुतर्क है कुछ जो मैंने नोट किए। एक उन्होंने कहा कि भाई जो नॉन फिजिकल चीज क्योंकि जो वह ईश्वर है वह नॉन फिजिकल एंटिटी है इसलिए उस पर जो है उसके लिए साइंटिफिक यानी फिजिकल दलीलें नहीं मांगी मांगी जाएंगी और उसी में उन्होंने उसको कहा कि दिखाओ ये वाली भी साइंटिफिक दलील मांग ली और या फिर और भी कहा था प्लास्टिक से और मतलब उन्होंने उसी चीज को बार-बार कहा मगर सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने नॉन फिजिकल वो है नॉन फिजिकल चीज का अस्तित्व है इसका उन्होंने क्या कहते कहते हैं। इस चीज को प्रूव नहीं किया इन्होंने कि वो है उसका अस्तित्व। नॉन फिजिकल चीजें भी हैं। और आगे चलकर के उन्होंने क्या किया कि यह कह दिया कि आप जो है नॉन फिजिकल यहां पे तो मना कर दिया कि आप जो है उसके होने के विषय में सबूत जो है मुझे साइंस से नहीं मांगोगे। मगर जब खंडन करना है ईश्वर का तो मुझे साइंटिफिक वो चाहिए। यह मुफ्ती जी ने कह दिया आगे चलकर के। मतलब अपने लिए बचाव में कह रहे हैं कि उसके होने का सबूत मैं साइंटिफिक नहीं दूंगा। मगर ना होने के संबंध में आपको साइंटिफिक दलील देनी होगी। गलत कर दिया।

01:48:00:14 जब आप उसको नॉन जब आप यह बाउंड कर रहे हैं सामने वाले को कि नॉन फिजिकल एंटिटी है। इसलिए आप जो है साइंस से नहीं मांग सकते। चीजों साइंस के आधार पे नहीं मांग सकते। अह दलील। तो फिर आप उसको स्वतंत्रता भी दीजिए ना कि नॉन फिजिकल एंटिटी है तो मैं नॉन फिजिकल वाली दलील भी दूं। फिर साइंटिफिक दलील क्यों मांग मांग रहे हैं? हालांकि हमारी तो कांसेप्ट ही अलग है। हमारा तो हम तो ये हमारा तो यह कहना है कि भाई ये भगवान का भी विज्ञान ही तो है। विज्ञान क्या है जो आपको चीजों को पता है ऐसा ऐसे हो रहा है। ऐसा ऐसे हो रहा है। तो उसको आप विज्ञान से अलग क्यों करते हैं? अलग अलग नहीं करना चाहिए।

01:48:40:00 हां विज्ञान का एक भाग हो सकता है कि भैया हमने विधा को जाना ईश्वर को प्राप्त कराने वाली विधा को जाना दार्शनिकता का स्तर विज्ञान का एक भाग हो सकता है मगर विज्ञान के विपरीत कहना उचित नहीं है अच्छा फिर इन्होंने एक कुतर्क ये भी कर दिया कि हमारी जो हम मैं तो जो है सवाल पूछने से नहीं रोकता आपकी कुरान रोकती है 5 101 पढ़ लीजिए और खुदा तक पहुंचने की चीजें बदल रही हैं तो आपका वो एटरनल सिद्ध नहीं हो रहा है। कालकृत कालकृत वाला मामला है ना वह बिगड़ रहा है। वह भी बिगड़ रहा है।

01:49:18:16 अच्छा आपके कुछ अच्छे भी पॉइंट थे इनके मुफ्ती जी के वो क्या थे? जैसे कि फॉल्स फेथ वर्सेस गुड फेथ वाली जो उन्होंने बात कही थी वो सही बात है। जब भी लोग ऐसे करते हैं कि भाई मैं फेथ नहीं मानता। तो उन्होंने अच्छा अच्छी दलील वहां पे दी अच्छा तर्क दिया था कि भाई फॉल्स फेथ को मत मानिए मगर जो सही फेथ हैं जो तार्किकता की ओर ले जाने वाले फेथ हैं वह तो आपको मानने पड़ेंगे ना जैसे कि मेरे दर्द हो रहा है इस विषय में तो मेरा शब्द ही प्रमाण है ना कि मुझे कष्ट हो रहा है अगर मान लो मेरा मांस भी कटा हुआ है या नहीं कटा हुआ है मान लीजिए तो क्या मेरे दर्द हो सकता है कि नहीं मैं बैठा हुआ हूं मेरे दर्द हो रहा है इस विषय में तो शब्द ही प्रमाण है तो यहां फेथ करना पड़ेगा कि नहीं मेरे ऊपर

01:50:07:01 तो कई जगहों पर शब्द ही प्रमाण होता है। ये आपको मानना पड़ेगा। तो वहां पर जो तार्किकता की दृष्टि से या जिसका खंडन ना हो रहा हो उसको फेथ को फिर स्वीकार करना पड़ता है। अच्छा दूसरी बात क्या है कि इन्होंने मुफ्ती जी ने एक पॉइंट और बढ़िया कहा था कि अगर आप उसको लेकर के आपको नहीं मालूम है उसके बारे में चीजें तो निर्णय क्यों दे रहे हो? निर्णायक क्यों कर हो रहे हो? जावेद जी को सदैव यह कहना चाहिए कि भाई मैं न्यूट्रल पोजीशन में हूं। मुझे ना तो ये मैं ना तो यह मान पाया हूं कि ईश्वर है ना ही यह मान पाया हूं कि ईश्वर नहीं है। क्योंकि मैंने उस विषय में अभी तक कोई ऐसी खोज नहीं कर ली है। आपको यह नहीं कहना चाहिए कि ईश्वर नहीं है। तब आप यह कह दो। तब आप यह कह सकते हो कि ईश्वर होने के सबूत आप मुझे दो। तो यह भी अच्छा पॉइंट था। और भी बहुत सारे किए हैं और मोरल्टी पर तो बहुत अच्छा तोड़ा है मुफ्ती जी ने वहां पर मगर मैं बता दूं कि मोरल्टी पर जिन्होंने तोड़ा है मोरल्टी से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है इनकी ही चीजें हैं व्यक्ति आकर के जब आपसे यह कह देगा मुझे नहीं चाहिए मोरल्टी फिर तो खाऊंगा फिर क्या करोगे निरुत्तर करिए सामने वाले को निरुत्तर और ऐसे

01:51:22:07 लोग हैं दुनिया में ऐसे लोग हैं निठारी जैसे लोग हैं सेक्स चेंज कराने वाले लोग हैं। समलैंगिक लोग हैं जो आपकी दृष्टि से भी बुरे हैं। हैं वो आपको कह देंगे ये चीजें मैं मोरल्टी को नहीं मानता। तो मोरल्टी से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होने से हमें मोरल्टी प्राप्त होती है। इसको ऐसे समझना पड़ेगा। एक छोटी सी बहस और हुई थी। इनमें टाइम को लेकर के एक आर्गुमेंट था जो कंक्लूजन तक नहीं पहुंच पाया था जावेद जी और मुफ्ती जी के बीच में वो क्या था कि जावेद जी कह रहे थे कि खुदा इससे पहले क्या कर रहा था और इनका कहना था कि इससे पहले टाइम था ही नहीं तो वो प्रश्न ही गलत हो गया तो यह इसका सटीक उत्तर नहीं है। इसका सटीक उत्तर यही है कि भाई अगर वह कुछ नहीं कर रहा है प्रलय काल चल रहा है तो उससे मतलब क्या हो रहा है? इससे उसका अस्तित्व सिद्ध नहीं होने के संबंध में कौन सी दलील आती है? कि वह कुछ नहीं कर रहा है तो अब वह नहीं है। इसका मतलब यह कौन सी बात है? दूसरी बात कि बार-बार वह यह कह रहे थे उससे पहले टाइम नहीं है। मगर वास्तविकता में सही शब्द यह हो सकता था उस बात के लिए कि टाइम की काउंटिंग वहां से शुरू होती है जब सृष्टि की रचना

01:52:37:08 होती है। काउंटिंग मगर उसको टाइम है ही नहीं। उससे पहले यह कह लेना उतना सटीक उत्तर नहीं बैठता है। और अ दूसरी बात जावेद अख्तर जी की ओर से क्या दिक्कत हो रही है कि आप वो वाले प्रश्न उनसे कर सकते हो जिन जिन प्रश्नों को आप बिलीव करते हो जिनका अस्तित्व है। जब आपने ईश्वर के अस्तित्व को माना ही नहीं है तो आप उस दुनिया में जाकर के जो ईश्वर के अस्तित्व को मानने के बाद आपको प्राप्त हो रही है। उस दुनिया में जाकर के ईश्वर का खंडन कैसे करोगे? अगर कर भी दिया मान लो कर भी दिया उस दुनिया में जाकर के ईश्वर का खंडन तो आप यह कैसे बताओगे लोगों को कि मैंने इस आधार पर ईश्वर का खंडन किया है क्योंकि जब ईश्वर को आप मानते नहीं है तो उस दुनिया का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होता जहां जाकर के आप ईश्वर का खंडन कर रहे हो तो आपका वो खंडन का अस्तित्व सिद्ध नहीं होगा यही रह के आप जो है ईश्वर का खंडन करिए कि ईश्वर वहां था तो क्या कर रहा था

01:53:39:06 आगे जावेद जी की कुछ अच्छी बातें थी उसमें जैसे उन्होंने कहा कि भगवान का सबूत आपको देना है मुझे नहीं मगर यहां पर उन्हें यह कहना चाहिए कि मैं भगवान को मानता हूं और ना मानते मैं न्यूट्रल हूं। मैंने कोई निर्णय नहीं लिया है। मुझे नहीं मालूम। जैसे कि वह जैसे कोई आकर के मुझे कहे कि फलानी कोई लेडी है वह तुमसे मिलने आ रही है। तो भाई मैं इस बारे में ना तो यह कह सकता हूं कि वास्तव में वह आ रही है ना ही यह कह सकता हूं। अगर मुझे उस कहने वाले पर मतलब वो कहने वाला कहने वाले को मैं नहीं जानता हूं। वह मेरे लिए शब्द प्रमाण नहीं है। तो भी मैं उस लेडी के आने के विषय में कंठस्थ नहीं हूं। कंफर्म नहीं हूं कि वह नहीं आ रही है। और ना ही मैं यह कंफर्म हूं कि वो आ रही है। तो यह जो स्थिति है ना न्यूट्रल वाली यह आपको कहनी चाहिए। मगर यह बात आपकी अच्छी थी कि भगवान का सबूत आपको देना है। भगवान के ना होने का सबूत मुझे नहीं देना है। और आपने वहां पर नास्तिकता नास्तिक की वजह जिज्ञासु की भूमिका बनाई है। अगर आपको स्वास सही तर्क और डेफिनेशन वगैरह दी जाती तो हो सकता है आपके अंदर भावना उद्भाषित हो। आपने एक तर्क बहुत अच्छा दिया था। मेटाफिजिकल बाउंड

01:54:54:14 कर दिया है मुझे कि मैं मेटाफिजिकल में नहीं जा सकता। तो वो जो बाउंडनेस है ना कि बाउंड किया उस बाउंडनेस को उन्होंने सिद्ध नहीं किया। बाउंडनेस को सिद्ध करिए। और दूसरी बात फिर यह मत कहिए कि साइंस वाली चीजें मुझसे मत मांगिए। और टाइम पर भी एक बहुत तगड़ा जवाब इन्होंने दिया था कि भैया अगर वह उससे पहले वो नहीं था तो यह क्यों कहते हो कि हमेशा हमेशा का मतलब वहां टाइम था। बस वह काउंट नहीं हो रहा था। मुफ्ती जी के अकॉर्डिंग वह काउंट नहीं हो रहा था और बिना काउंट की स्थिति थी। मगर वह जो टाइम की एक बहस चली थी उस बहस के अनुसार क्या कहते हैं? उसका एक सरल सा जवाब हो सकता है कि भाई अगर भगवान कुछ नहीं कर रहा है तो इससे उसका अस्तित्व असिद्ध कहां से हो जाता है? अगर वह ऐसी स्थिति में है कि जब वह कुछ नहीं कर रहा है तो उससे उसका अस्तित्व असिद्ध नहीं होता है।

01:55:50:16 तो कुल मिलाकर के अगर हम मूल विषय पे आए तो संसार का मूल आधार बताया मुफ्ती जी ने ईश्वर को मगर इस्लाम का ईश्वर मूल आधार सिद्ध नहीं होता क्योंकि वह सर्व्यापक नहीं है। सर्वशक्तिमान नहीं है। बहुत से कई जगहों पर वो देशकृत और जो है परिस्थिति कृत बाधा से बाध्य है। और फिर तीसरी बात यदि उसको प्राप्त कराने वाली नियमावली बदल रही है जो कि वह खुद कुरान कहती है तो वहां पर वह काल कालकृत बाधा से भी बाध्य हो जाता है।

01:56:26:24 शाश्वतता भी भंग हो जाती है उसकी। और इसके साथ ही साथ तो कुल मिलाकर के जिस आधार पर ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध किया गया वो आधार इस्लाम के पास है नहीं। और अगर बात करें मोरल्टी की तो मोरल्टी से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। मोरल्टी हमें बाय प्रोडक्ट के रूप में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार और उसे प्राप्त करने की भावना के कारण स्वीकार करनी पड़ती है। ठीक है? इसके साथ ही साथ जो विकल्प परीक्षा चल रही है, विकल्प में आपको मिला है। यह बहुत बड़ा कुतर्क था इनका। मतलब बहुत ही वीक अह इन्होंने आर्गुमेंट दिया था वहां पर और जो इन्होंने छुरी वाली बात कही थी वह भी बहुत वीक बात कही थी और इसी कारण से यह जो है सटीक नृत्तर कर देने वाले उत्तर उनको नहीं दे पाए जावेद जी को। क्यों? क्योंकि इनके पास सनातन सिद्धांत नहीं था। इनके पास सनातन सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं था। इनके पास वेद नहीं थे। और अगर ऐसा करते तो वहां पर जावेद जी को निरुत्तर कर देने वाले प्रश्न वहां पर सिद्धांत दिए जाते। हालांकि क्योंकि वह खुद अपने विषय के मर्मज्ञ नहीं थे जावेद जी तो वह उस तरह के

01:57:42:12 सवाल खड़े नहीं कर पाए कई कारणों से जिसके कारण जो है वहां पर आस्तिकता का पलड़ा भारी रहा। मगर जब भारी रहा तो उतने अंश में मुफ्ती जी को भी अपने इस्लाम के ईश्वर की सीमा से या तो बाहर निकलना पड़ेगा सनातन ईश्वर का आलंबन लेना पड़ेगा और नहीं तो आस्तिकता का पलड़ा भारी होना सिद्ध नहीं हो पाएगा तो कैसी लगी आपको यह विवेचना सभी लोग बताएं जय श्री राम

01:58:21:03 [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:58:26 · 27 Dec 2025

क्या इस्लाम नास्तिकता का खंडन करने में समर्थ है @TheLallantop Debate on does God exsts

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