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00:00:02:28 सभी को जय श्री राम। धर्म और अधर्म कभी-कभी इसमें बहुत बारीक सा अंतर होता है जिसको पकड़ पाना बहुत कठिन हो जाता है। आज विशेष रूप से वीडियो कुछ इसी विषय पर चर्चा के लिए बना रहे हैं क्योंकि अभी हाल ही में हमने संदीप देव जी के चैनल पर कुछ ऐसी सामग्री देखी है जिसके कारण हमें विवश होकर के यह वीडियो बनाना पड़ रहा है। अच्छा इसमें एक बात और है कि लोग हमसे कई बार आकर के पूछ रहे हैं भागवतंदी जो हैं कुछ अंधे फॉलोअर्स उसके कि भाई तुम बोल क्यों नहीं रहे पी एन मिश्र जी बोल रहे हैं या संदीप देव जी ऐसा बोल रहे हैं वैसा बोल रहे हैं तुम आकर के उनका प्रतिकार क्यों नहीं कर रहे तुम्हारे गुरु के लिए बोला जा रहा है तुम्हारी परंपरा के लिए बोला जा रहा है उन बेवकूफों से कोई यह नहीं पूछता और ना ही वह बेवकूफ दर्पण पर जाकर के स्वयं से प्रश्न करते हैं कि आज तुम्हारा यह विषय सामने आया है कि भागवतानंद और संदीप देव जी आपस में एक दूसरे का प्रतिकार कर रहे हैं। आज से पहले
00:01:18:04 संदीप देव जी के चैनल पर भागवतानंद जाता था। संदीप देव जी उसे मंच देते थे। भागवतानंद से हमारी प्रत्यक्ष रूप से जो एक आमने सामने की जो विरोध है आमने सामने का वो लगभग मार्च से चल रहा है और बहुत सारी काफी पराकाष्ठा तक बातें हुई है उसमें एक दूसरे का प्रतिकार करते समय परंतु उसके बाद भी संदीप देव जी उसे मंच दे रहे हैं। उसको समर्थन प्रकट कर रहे हैं। तो हमने तब संदीप देव जी का विरोध नहीं किया तो यह भागवतानंद के फॉलोवर्स क्यों नहीं आए थे कि संदीप देव जी का विरोध क्यों नहीं कर रहे हो भागवतानंद स्वयं मार्च 2025 से पहले से शंकराचार्यों का विरोध करता चला आ रहा था निग्रह करेगा भाई वो निग्रह कर दूंगा तीन घंटे का वीडियो बना करके हां वो यह सब करता चला आ रहा था तो हमने तब भागवतानंद का कभी विरोध नहीं किया था वीडियो बना करके या किसी भी अन्य माध्यम से उसका विरोध प्रकट नहीं किया था, प्रतिकार नहीं किया था। तब ये जो मूर्ख लोग हैं आकर के प्रश्न नहीं करते थे कि भाई तुम भागवत का विरोध क्यों नहीं कर रहे हो? वो तुम्हारे गुरुओं के बारे में ऐसा ऐसा बोल रहा है। है
00:02:33:06 ना अंधभक्ति भागवत ने क्या नहीं किया था? करपात्री जी का खंडन करने का प्रयास गुरुदेव का उपसया उसने दिव्यानुभूति वाले ग्रंथों पर। जबकि सभी जो मान्य आचार्य गण है स्वयं भागवतानंद भी उसके जीवन से भी ऐसी अलौकिक घटनाएं जुड़ी हुई है जिनका बैठकर के आर्य समाजियों की भाषा में बहुत अच्छे से मजाक उड़ाया जा सकता है। पर उसने उड़ाया। उसने हमारे जो मान्य आचार्य गण आचार्य गण हैं विशेष रूप से करपात्र धाम वाले जो आचार्य हैं उनके लिए लतखोर शब्द का प्रयोग किया। और यह सब जानते हुए भी उसके बाद भी उसको प्रश्न पर हमने कभी संदीप देव जी का नाम लेकर के ऐसा कोई वीडियो नहीं बनाया कि हम उनका जो है विरोध कर रहे हैं। वह भागवतानंद को प्रशय दे रहे हैं या या संदीप देव जी की और भी बहुत सी पहले की बातें कि भाई उत्तरकांड प्रक्षिप्त है या मुझे कंफर्म नहीं हूं मगर
00:03:39:15 ये कर्मणा वर्ण व्यवस्था पे भी समर्थन किया है क्या ऐसा कुछ मुझे नहीं पता तो तब ये लोग आकर के नहीं पूछते थे कि भाई तुम क्यों नहीं विरोध कर रहे हो क्यों नहीं विरोध कर रहे हो क्यों प्रतिकार नहीं कर रहे हो वो बात और है कि किसी का भी प्रतिकार करना है कि नहीं करना करना है। यह संदीप देव जी भी स्वयं समझते होंगे कि किन स्थितियों में किसी का प्रतिकार करना आवश्यक हो जाता है और करना ही पड़ता है क्योंकि वह धरातल पर कार्य करते हैं। यह भागवतानंद की तरह तो नहीं है वो कि केवल वो रूम में बैठकर के वीडियो बनाना जानते हो। धरातल पर उतरते हैं, जाते हैं, कार्य करते हैं। तो
00:04:17:01 यह ध्यान देना पड़ता है कि भाई किसका विरोध कब किन स्थितियों में आवश्यक है तो करना ही है और कब किन बातों को सह लेना पड़ेगा। जैसे कि ज्योति पीठ वाले महाराज जी ने कहा कि विधर्मियों को मौका ना मिल जाए, अवसर ना मिल जाए इसलिए कभी-कभी सहना भी पड़ता है हम लोगों को। अब बहुत बातें बोली जा सकती है लेकिन क्या बोलना? बोलेंगे तो जो विधर्मी हैं उनको मसाला मिलेगा। तो इसलिए उनको मसाला ना देने की दृष्टि से हम लोगों को सब कुछ सह लेना पड़ता है। पर आज यह वीडियो बनाने के लिए हमें विवश किया है संदीप देव जी से और मेरा निवेदन है कि मैं ऐसी अपेक्षा करता हूं संदीप देव जी से कि मुझे आगे इस विषय में बोलने का बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ना ही वह मुझे अवसर देंगे। तो संदीप देव जी के चैनल पर मुझे सबसे पहले तो एक वीडियो प्राप्त हुआ जिस जो कि संदीप देव जी ने
00:05:18:21 इस विषय में बनाया था कि कुछ मान्य आचार्य गण शाक्य द्वीपीय ब्राह्मणों को ब्राह्मण ही कह रहे हैं। तो उसका उन बातों का प्रतिकार करने के लिए संदीप देव जी ने एक वीडियो बनाया था जिसमें वो विद्या भास्कर जी महाराज का भी नाम ले रहे हैं। मतलब परंपरा प्राप्तिक आचार्यों का नाम लेकर के शास्त्रीय विषय में उनका खंडन करने का प्रयास कर रहे हैं। और फिर अभी मैंने यह वीडियो बनाने से पहले कुछ देर पहले कल शाम तक मैंने यह भी देख लिया था कि संदीप देव जी ने कोई एक व्यंग चित्र बनाया है जिसमें कि भागवतानंद तो है ही। साथ ही साथ उसमें ऐसा लग रहा है कि वहां पर वैष्णवाचार्य जो हैं हमारे पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज वह भी वहां पर हैं। तो
00:06:14:09 मैं कहूंगा संदीप देव जी कि आप भागवतानंद से लड़ते लड़ते कारण कोई भी हो विषय कोई भी हो पर भागवतानंद से लड़ते लड़ते अगर आप भी भागवतानंद ही बन जाएंगे तो हमें क्या आवश्यकता है भागवतानंद से लड़ने की भागवतानंद की जो मूल त्रुटि है उसमें जो गलती है उसकी वह क्या है? प्रामाणिक आचार्यों का खंडन करने का प्रयास करना। प्रामाणिक आचार्यों के प्रति अनास्थावान बनाना सामान्य जन को यही तो उसका मूल वो है स्वभाव। जिससे हमें आपत्ति है। प्रामाणिक आचार्यों पर जब उंगली उठ जाएगी उंगली उठती है और जब उस उसकी उसने सीमाएं पार कर दी तब हमने उस पर बोलना शुरू किया। वो गुरुदेव पर बोलता रहा। काफी समय से करपात्री जी पर बोलता रहा। अन्य जगहों पर प्रेमानंद जी पर भी आपत्तिजनक बोला। क्या कहते हैं ये अन्य जो वृंदावन के कुछ आचार्य गण हैं उन पर भी बोला। राजेंद्र दास जी पर बोला हम मौन रहे। मगर एक सीमा
00:07:26:00 का उल्लंघन हो जाने पर हमें फिर बोलना पड़ा। तो यदि आप भागवतानंद जैसे तुच्छ व्यक्ति से लड़ते लड़ते दुष्ट व्यक्ति से लड़ते लड़ते उसका प्रतिकार करते करते यदि आप में भी वो वही सारी चीजें रिफ्लेक्ट होने लगेंगी दिखाई देने लगेंगी तो अंतर क्या हुआ यह तो वही वाली बात हो गई कि बाढ़ का पानी खतरे के निशान तक आ गया है नेताजी तो नेताजी बोल रहे हैं कि खतरे का निशान 2 इंच और बढ़ा दो हम लोग विधर्मियों से इसलिए लड़ रहे हैं कि हमारे यहां बहनों से विवाह नहीं किया जाता है तो विधर्मियों से लड़ने के लिए हम अपने धर्म में परिवर्तन कर देते हैं कि बहनों से विवाह हो जाएगा। नहीं कर सकते ना। क्योंकि यदि हमने परिवर्तन कर दिया तो हमारा धर्म नहीं होगा। वो विधर्म होगा। बस वहां सामने से उठकर के वो आज हमारे अंदर आ गया होगा। अभी सीमा के उस तरफ है। फिर सीमा के इस तरफ आ गया होगा। तो इस बात का आप ध्यान रखें कि जो धर्म रक्षक होता है वह स्वतंत्र नहीं होता है। उसके पास धर्म की सीमा होती है। उसके पास धर्म की लगाम होती है। धर्म की मर्यादा होती है। उसको उसके अंदर रहते हुए ही अधर्म
00:08:41:10 का नाश करना होता है। और अधर्म का ये प्लस पॉइंट होता है कि वह स्वयंभू होता है। उसके ऊपर कोई नहीं होता है। वह स्वयं निर्णय लेने वाला होता है। वह कुछ भी कर सकता है। वही वाली बात कि पुलिस वाले को गिन करके गोलियां मिलती है। इतनी ही गोली चलाओगे और जो क्रिमिनल्स हैं उनके पास अनेक गोलियां हैं। तो लड़िए, गिरिए मगर उस झरने की तरह जो गिरकर भी अपनी सुंदरता नहीं खोने देता। धर्म रक्षा करिए मगर धर्म की सीमा में रहकर रक्षा की तब तो बात है। यदि खुद भी अधर्मी हो गए खुद भी वही करने लगे जो भागवतानंद कर रहा था। तो फिर फायदा क्या हुआ? एक भाव भागवतानंद को आपने नष्ट कर दिया उसके शरीर को। मगर उसकी जो विचार है वो तो आपके अंदर आ गए कि समय आने पर जो है प्रामाणिक आचार्यों का भी खंडन कर देंगे। तो ये उचित नहीं है। अब प्रामाणिक आचार्यों का खंडन किया क्यों नहीं जा सकता। मैं इस पर थोड़ी सी बातें कर लूं। यदि सभी प्रामाणिक आचार्य एक तरफ से शाक्य द्वीपीय ब्राह्मणों को ब्राह्मण कह रहे हैं। अब्राह्मण नहीं मान रहे हैं। वो बोल रहे हैं पुरजोर
00:09:56:14 तरीके से। तो आपको क्या आवश्यकता है एक उसी बात को लेकर के भागवतानंद के पीछे पड़ने की? क्या भागवतानंद के अंदर और बहुत सी शास्त्रोक्त दृष्टि से कमियां नहीं है। उसकी परंपरा क्या है? उसने कितने सारे अब तक झूठ परोसे हैं। गाली देने वाला व्यक्ति आचार्य कैसे हो सकता है? शास्त्रीय खंडन है। हमने निग्रह निकासिका बनाई है। उसमें सारे सवाल उठाए हैं तर्क और प्रमाण के साथ कि वो आचार्य है ही नहीं। निग्राचार्य है ही नहीं। भगवती ने दीक्षा दी। जब वो कुरान के मंत्र बांट रहा है लोगों को। खुदा के मंत्र बांट रहा है लोगों को तो वैदिक आचार्य कैसे हुआ? कौन सी परंपरा से उसको प्राप्त हुआ है? ये सारे सवाल हमने उठाए। क्या सन्मार्ग वाले जो आचार्य हैं, वह उसका खंडन नहीं कर रहे हैं शास्त्री सीमा में। वह तो इस बात का सहारा नहीं ले रहे हैं। वह शाकपी ब्राह्मण नहीं है। यानी कि क्या यह माना जाए कि आप भागवतानंद का विरोध तभी कर सकते हैं जब वो शाक द्वीपीय ब्राह्मण ब्राह्मण ना कहे जाए। यानी वह जब ब्राह्मण सिद्ध हो जाएगा तभी हम उससे उसको पराजित कर सकते हैं। यही संदेश प्राप्त हो रहा है। इस लड़ाई से तो मतलब सामने वाला सामने वाला जब निहत्ता होगा आप तभी उससे लड़ने जा सकते हो। यदि वो सशस्त्र
00:11:12:04 है और उसके पास अपना दल बल है, सब कुछ है तो उस स्थिति में हम उससे नहीं लड़ेंगे। ये तो कायरता हो जाएगी। क्या नहीं होगी? तो क्या आवश्यकता है इस आधार पर लड़ाई लड़ने की जिस आधार में सभी प्रामाणिक आचार्य एक तरफ से हमारे पक्ष में नहीं है। कर्मणा वर्ण व्यवस्था के आप समर्थक है कि नहीं कि मुझे अभी क्लियर नहीं मालूम है। यदि है तो भाई एक तरफ से सारे आचार्य वर्ण व्यवस्था को जन्म से मानते हैं। और यदि आप कर्मणा वर्ण व्यवस्था के पक्ष में नहीं है इस वाली बात को मानते हैं कि जन्म होता है परंतु कर्म के आधार पर बदल जाता है तो उसमें भी बहुत सारे कंट्राडिक्शन आ जाएंगे। बात जमेगी नहीं। यही बातें तो आर्य समाज ही करते हैं। आचार्यों का खंडन ना किया होता अगर परंपरा प्राप्त आचार्यों का खंडन आर्य समाजियों ने तो आज ये रामपाल स्कॉन ब्रह्मा कुमारी जैसे कल्ट खड़े होकर के धर्मासी सनातना बनकर के हमारे सनातन को दीमक की तरह खा ना रहे होते।
00:12:16:07 आज हम क्या कर रहे हैं? यदि हम परंपरा प्राप्त प्रामाणिक आचार्यों का खंडन कर रहे हैं। और आवश्यकता क्या है? क्या भागवतानंद से हम तभी जीत सकते हैं? आप जैसा योद्धा तभी जीत सकता है भागवतानंद से जब ये शाक्य रूपीय ब्राह्मण के रूप में वो अब्राह्मण से सिद्ध हो जाए। भले ही उसके लिए हमें परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्यों का विरोध करना पड़ जाए। तो आपके पास बहुत सारी एबिलिटीज हैं अन्य। आप उनका उपयोग करें। परंतु यह रास्ता नापना है कि जिसमें कि प्रामाणिक और मान्य आचार्यों का आपको विरोध करना पड़े। वह भी शास्त्रीय विषयों में और यहां तक कि यदि मुझे नहीं पता है कि आपने उन्हीं को आधार बनाया है। पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज को पर जो फोटो मुझे दिखाई है, दिखाई गई है भागवतानंद के पेज पर उसमें साफ लग रहा है कि वह विद्या भास्कर जी महाराज का ही व्यंग बना है। यदि ऐसा है तो यह तो बिल्कुल अनुचित है। आप किस अधिकार से एक प्रामाणिक परंपरा प्राप्त वैष्णवाचार्य पर शास्त्रीय विषय में उंगली नहीं उठा सकते। इस तरह से व्यंग बनाना तो बहुत दूर की बात है। शास्त्रीय विषय में नहीं उंगली उठा
00:13:31:13 सकते। मैं आगे विवेचना कर रहा हूं इस बात की। क्यों नहीं उठा सकते? कम से कम भागवतानंद ने इस बारे में नहीं सोचा होगा तो कम से कम आप सोचें। क्योंकि मुझे लगता है कि भागवतानंद को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि धर्म स्थापना होनी है कि नहीं होनी है। धर्म रक्षा होनी है कि नहीं होनी है। पर मुझे आपको देख के अवश्य लगता है कि भले ही कुछ अंशों में आपको उस उन कुछ विषयों में दिशा ना प्राप्त हो परंतु जितने में प्राप्त है उतने में आप कर्मठ होकर के अपना कार्य करते हैं। आपने सोचा है कभी कैसा सन्यासी का जीवन है? कैसे वह वहां पर बटों को पढ़ा रहे हैं। कैसे उनके भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं। मैं खुद गया था अभी अयोध्या पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज के पास। आप देखिए उनकी जीवन शैली कितनी कठिन होती है। और ऐसे में ऐसे सन्यासी का
00:14:26:08 [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] इन लोगों ने हमारे धर्म को अपने रक्त से सीचा है। करपात्री जी महाराज,
00:15:01:15 वैष्णवाचार्य, शंकराचार्य ये लोग हमारे धर्म की रीड की हड्डी है। इसको अगर हम लोग चोट पहुंचाएंगे तो हमारा धर्म नष्ट हो जाएगा। सनातन बिना परंपरा के सनातन का अस्तित्व नहीं है। परंपरा पे आप उंगली उठाएंगे खत्म हो जाएगा। सनातन। आर्य समाजी जब मुझसे बात करने आते हैं कि भाई वेद में यह लिखा है वह लिखा है। एक ही बात के चार मतलब निकाले जा रहे हैं। मेरा मतलब क्यों ना माना जाए? उनका मतलब क्यों माना जाए? उनका मतलब क्यों ना माना जाए? मेरा मतलब क्यों माना जाए? क्योंकि मैं जो बोल रहा हूं वो परंपरा से मिला है मुझे। अब परंपरा क्या है? वेद कहां से प्राप्त हुए आपको? आप आचार्यों का खंडन करेंगे। तो मैं पूछता हूं। यह वेद जिसके आधार पर तुम बता रहे हो। गो बैक टू द वेदास। यह वेद आए कहां से तुम्हारे हाथ में चुप हो जाते टू स्टॉप द ट्रेन पुल द च अभी जब राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा वाला जो मामला हुआ था उसमें मैंने चिल्ला चिल्ला कर लोगों को पूछा था तुम अपने शंकराचार्यों पर उंगली उठा रहे हो कल को जब जाकिर नायक आकर के पूछेगा कि ये वेद तुम्हें कहां से मिले क्या बोलोगे गीता प्रस से चौखंबा से क्या बोलोगे पुराण कहां से मिले बोलना पड़ेगा ना परंपरा प्राप्त आचार्यों से तो जिन परंपरा प्राप्त आचार्यों से आपको ग्रंथ
00:16:16:26 मिल रहे हैं। यदि उनकी व्याख्या पर आपको विश्वास नहीं है, आपको लग रहा है कि अज्ञानता हो सकती है या वो आपको झूठ बोल सकते हैं, पक्षपाती हो सकते हैं। हां तो फिर आपको उनसे प्राप्त होने वाले ग्रंथों पर विश्वास कैसे है? कम से कम किसी एक वैष्णवाचार्य पर आपको विश्वास नहीं है तो किसी दूसरे परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्य का सानिध्य आपके पास होना चाहिए। कम से कम यदि किसी एक का आप खंडन करने जा रहे हैं। है आपके पास शंकराचार्य वैष्णवाचार्य विद्या भास्कर जी महाराज सन्यासी हैं। कौन होता है सन्यासी? जिनका मान मोह नष्ट हो चुका हो। जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली हो। वो है सन्यासी। वही तत्वदर्शी हो सकते हैं। वही धर्म का सही स्वरूप आपको बता सकते हैं। तो जब तक आपके पास किसी सन्यासी का आधार नहीं है पीछे तो आप किस आधार पर सन्यासी का खंडन करेंगे?
00:17:18:09 सन्यासी मनुस्मृति में क्या कहा गया है? धर्म में संशय होने पर अधिष्ठाता ब्रह्मचारी को बना है। सन्यासी का ब्रह्मचर्य सिद्ध है कि नहीं? भरभर के भगवत गीता में जगह-जगह यही बोला गया। वैराग्य वैराग्य वैराग्य और वह अपनी पराकाष्ठा पर खड़े हुए हैं सन्यासी होते हुए और यदि आप यह कह रहे हैं ये भागवतानंद तो इन सब चीजों को सोचता नहीं क्योंकि उसको अपने घर से बाहर कभी नहीं निकलना है। उसको अपने घर के ही लोगों को सुनाना है सुनना है। हमें तो हमें आपको तो बाहर निकल कर के औरों से विधर्मियों से लोहा लेना है ना। यह सब बातें सोचनी पड़ेगी ना। सन्यासी कौन है? जिसके मन में राग द्वेष इत्यादि सब समाप्त हो चुके हो। अब आप अगर किसी का इस तरीके से शंकराचार्यों की आपने भी समीक्षा की पूरी के शंकराचार्य जी की भी की और आज विद्या भास्कर जी की समीक्षा कर रहे हैं तो आप जो एक गस्थ होते हुए जब समीक्षा कर रहे हैं तो आप सीधे कह रहे हैं कि उनके अंदर मान मोह है, राग द्वेष है, जितेंद्रिय नहीं है वो। क्या अर्थ है इसका? क्या आप उनका सन्यासत्व का ही खंडन कर रहे हैं? फिर इसके बाद भागवत जैसा व्यक्ति बोलता है मैंने तो यह कहा है मैंने तो
00:18:33:10 उनके गलत कृत का खंडन करने की बात कही है। अरे भैया जिसके ऊपर तुमने राग द्वेष या लालच मान, मोह इत्यादि के आक्षेप लगा दिए तो उसका सन्यासी होने पर ही आपने प्रश्न खड़ा कर दिया ना। उसके तत्वदर्शी होने पर ही आपने प्रश्न खड़ा कर दिया ना। उसकी सन्यास की प्रमाणिकता पर ही आपने प्रश्न खड़ा कर दिया ना। तो इसका अर्थ है कि आपने बिना कहे ही उसके ऊपर पूर्ण रूप से अनास्था उत्पन्न कर दी। जो सन्यासी नहीं है वह सन्यासी बन के घूम रहा है। ऐसे नहीं होता है। और यह बात तो आपने भी अपने वीडियो में ली थी मुझे जहां तक याद है कि भाई हम व्यक्ति का खंडन नहीं। इसने जब ये बातें बोली थी कि हम व्यक्ति का खंडन नहीं कर रहे। हम तो उसके द्वारा किए जाने वाले गलत गलत कृत का खंडन कर रहे हैं। और जबकि यही व्यक्ति जब बागेश्वर वाले जाकर के मिलते हैं किसी ऐसे व्यक्ति से जो आपत्तिजनक है तो यह क्या कहता है देखो देखो बागेश्वर वालों से मिल रहे हैं पूरी के शंकराचार्य क्यों भाई तब यह नहीं सोच सकते हो कि तुमने बागेश्वर वालों का खंडन नहीं किया था बल्कि बागेश्वर वाले बागेश्वर वालों के उस गलत कृत का खंडन किया था बागेश्वर वालों का खंडन नहीं कर दिया इसलिए पूरी के शंकराचार्य जी अगर बागेश्वर वालों से उनके अच्छे कार्यों के लिए मिले तो वो गलत नहीं है। यह सब तर्क बुद्धि तो अपनी बेच खाया है। बेच खाया
00:19:48:16 है यह व्यक्ति। मगर आप में तो है। आप उसका सदुपयोग करें। आपके पास यदि आप परंपरा प्राप्त आचार्यों का खंडन करने उतर आएंगे संदीप जी तो आपके पास उन ग्रंथों की प्रामाणिकता का ही आपके पास ये ग्रंथ प्रामाणिक होना ही सिद्ध नहीं होगा। खत्म हो जाएगी सारी कहानी। सनातन को समझिए। गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल ग्रंथ नहीं केवल गोविंद नहीं तीनों के मिश्रण से सनातन धर्म पनपता है। अगर आप गुरु का खंभा हटा देंगे कि हमारे पास ग्रंथ है पूछा जाएगा ना ग्रंथ कहां से आया? श्रुति श्रुति परंपरा मुंडकोपनिषद एक से चार तक ऋषियों की परंपरा बताई जा रही है कि विद्या कैसे आई? किस ऋषि से किस ऋषि तक आई? भगवत गीता में भगवान कह रहे हैं परंपरा से आ रहा है ज्ञान। भगवत गीता में कहा जा रहा है कि जो लोग परंपरा से प्राप्त होने वाले सिद्धांतों को नहीं का निर्वाह नहीं करते उन पर नहीं चलते वह फंसे रह जाते हैं। कहां कहां परंपरा की बात नहीं हो रही है? क्यों हो रही है परंपरा की बात? अगर हम परंपरा प्राप्त आचार्यों का खंडन करने लगेंगे तो हम अपने हाथों से अपने सनातन धर्म को नष्ट करेंगे। हमको अपने शब्द प्रमाण को बचा के रखना होगा। संदीप जी आप
00:21:03:20 जैसे योद्धाओं की आवश्यकता है। और ये ये मच्छर जैसा यह भी अच्छा था। अगर यह अपना कैरी मिनाटी बनने का प्रयास ना करता तो काम आता धर्म के इसका अगर सिंगल पॉइंट एजेंडा अपने YouTube चैनल को बढ़ाना ना होता एक लड़की ने इसको रात में फोन किया उसके ऊपर किसी ने तंत्र बाधा की थी ऐसा उसका कहना था और किसी इसके फॉलोअर ने जो मेरी जानकारी में है इसके फॉलोअर ने जो इसका प्रशंसक था उस समय पहले की बात है उसके पास वो लड़की उसके पास उस मातृशक्ति का फोन फोन आया था कि मेरे को ऐसेसे कोई तंत्र बाधा इत्यादि है। मुझे आप मदद बताइए। और इसको इस पर इतना भरोसा था इस भागवतानंद पर इस फॉलोअर पर फॉलोअर को प्रशंसक को इतना भरोसा था कि उसने कहा कि आप इनसे बात कर लीजिए। बहुत पहुंचे हुए जो है कॉलम कॉल मार के आचार्य हैं। यह आपकी जो है सहायता करेंगे। और उस मातृशक्ति ने आव ना देखा था उसको क्योंकि उसकी ऐसी गंभीर स्थिति थी। उसने आधी रात में लगभग आधी रात में नहीं लगभग 11 12 बजे के आसपास उसको भागवतानंद को फोन कर दिया कि मैं ऐसी ऐसी समस्या में हूं तंत्र बाधा में हूं आप मेरी मदद कर दीजिए इस व्यक्ति ने सुबह उठते ही पता है क्या
00:22:18:21 किया उसकी मदद इत्यादि कुछ नहीं की उसकी रिकॉर्डिंग लेकर के डाल दी ये देखो हमें फंसाने के लिए षड्यंत्र किया जा रहा है वो लड़की परेशान हो गई ये क्या हो गया उसने दोबारा फोन किया कि आप वो हटा दीजिए आप मेरी की मदद नहीं करना चाहते मत करिए प्लीज वो रिकॉर्डिंग हटा दीजिए मेरी बदनामी हो रही है मेरी मेरा विवाह नहीं होगा इसने वो रिकॉर्डिंग भी डाल दी निर्दय ने सोचिए और फिर जिस प्रशंसक को इन पर भरोसा था उस प्रशंसक ने इनको फोन किया कि भाई उसकी वो हटा दो ये कर दो वो कर दो मेरे संज्ञान में नहीं उसकी भी रिकॉर्डिंग डाली है कि नहीं डाली है प्रशंसक ने फोन किया कि मैं तुम्हें बहुत मानता हूं और तुम पर मुझे मुझे विश्वास था इसलिए इस मातृशक्ति को मैंने आपका नंबर दे दिया था। आप उसकी रिकॉर्डिंग हटवा दो और वह इतनी परेशान हो गई रिकॉर्डिंग डल जाने के कारण हॉस्पिटल में भी एडमिट हो गई वो लड़की तो इससे इसका उद्देश्य पता चलता है ना भाई मेरे जैसे किसी विरोधी का फोन जाए किसी और अन्य विरोधी का फोन जाए और ये रिकॉर्डिंग कर ले उसको अगले दिन डाल दे तो समझ में आता है। कोई मदद मांगने आ रहा है व्यक्ति, उसकी जो स्थिति है, उसको
00:23:34:02 भी अपने व्यूज बढ़ाने और अपने फॉलोवर्स बढ़ाने में कैसे यूज़ करना है, इसका ये सिंगल पॉइंट एजेंडा रहता है। जब हमसे इसका विवाद शुरू हुआ था, तो मैंने इससे कहा था कि कुछ ऐसे किसी के व्यक्तिगत विषयों पर आप सार्वजनिक चर्चा ना करें। हां, व्यक्तिगत रूप से चर्चा अपेक्षित है। की जा सकती है। तो ये व्यक्ति को नहीं मुझे तो यही चर्चा करनी है। यानी कि इसको मसाले से मतलब था। मसाला सनसनीखेत मसाला तो हम और आप तो ऐसे नहीं है। हमें तो इस बात का ध्यान रखना है ना कि धर्म की स्थापना कैसे होगी।
00:24:09:27 तो परंपरा प्राप्त आचार्यों पर यदि हम अनास्था दिखाएंगे अविश्वास दिखाएंगे तो हर दूसरा आर्य समाज हर दूसरा रामपाली खड़ा हो जाएगा कि नहीं ना तस प्रतिमा अस्ति का अर्थ है कि मूर्ति पूजा निषेध है। समझ रहे हैं आप मेरी बात? यदि हम परंपरा प्राप्तिक आचार्यों के भाष्य धर्म अधर्म की व्याख्या शास्त्रों के व्याख्यान पर ही उंगली उठाने लगेंगे। कि यहां पर परंपरा प्राप्त आचार्य जो है इस बात का गलत अर्थ बता रहे हैं। सही अर्थ यह है तो फिर हमें हमारे पास उनसे प्राप्त होने वाले जो ग्रंथ हैं उन पर हमारा विश्वास होना सिद्ध नहीं होगा और फिर हम आर्य समाजियों से नहीं पूछ पाएंगे कि तुम किस अधिकार से इसका वेद वेद का भाष्य कर रहे हो? किस परंपरा से तुमको वेद मिले हैं। कैसे पता कि यह वेद जो है ईश्वर से आने वाले ही शास्त्र हैं। कैसे पता? तुमको कहीं ना कहीं मानना पड़ेगा किसी परंपरा प्राप्त आचार्य से तुमको वेद मिले। उसने बताया ईश्वर की वाणी है। अपष ग्रंथ है। उसने बताया। यानी कि किसी एक अंश में तुमको परंपरा पर निर्भर होना पड़ेगा। और अगर तुम परंपरा पर निर्भर हो गए। तुमने उन किसी के शब्द प्रमाण से मान लिया कि वेद
00:25:25:06 वेद में जो लिखा हुआ है ये जो ईश्वर प्रदत्त है तो फिर तुम उनके दिए हुए भाष्य का खंडन नहीं कर सकते। यह फंस जाते हैं। दुनिया का कोई व्यक्ति सनातन की जो परंपरा प्रणाली है इससे लड़ नहीं सकता है। जीत नहीं सकता है। भले ही वो मुसलमान हो, भले ही वो क्रिश्चियन हो, जाकिर नायक के रूप में आए, किसी भी रूप में आए। तो इसलिए परंपरा प्राप्त आचार्यों का शास्त्रीय विषय में खंडन करने का प्रयास ना करें। हां स्वयं प्रामाणिक आचार्य ही किसी तात्विक विषय में एक दूसरे से बात करें तो बात समझ में आती क्योंकि परंपरा प्राप्त है। प्रामाणिक आचार्य कर रहे हैं। और एक इसमें एक बात और आती है कि यदि गुरु भी ऐसा वही वाली बात उसने अपने पक्ष में भी वही वाली बात घुमाई है और फिर आप लोग भी वही बात कर रहे हो कि नहीं आवश्यकता पड़ जाए तो गुरु का भी वो किया जाता है। गुरु का प्रतिकार हम कर सकते हैं। जब गुरुदेव का आचरण जब गुरु का आचरण उनके द्वारा दी गई व्याख्या जो है धर्म और अधर्म की उसके विपरीत हो यदि उन्होंने बताया है कि यह मर्यादा है और स्वयं उनका आचरण विपरीत है तो उतने अंश में उन्हें उनका आचरण हमें ग्रहण नहीं करना है ये
00:26:40:07 है उन बातों का मतलब मगर हम उनकी व्याख्या पर ही उंगली उठा देंगे तो हम किस आधार पर उनकी व्याख्या पर उंगली उठा रहे हैं वो हमारी परंपरा क्या है वो ज्ञान हमारे पास किस कहां से आ रहा है तो वो हमें परंपरा बतानी होगी ना कहां से आया भाई गीता प्रेस और चौखंबा पे आधारित है क्या हम लोग अपने धर्म और अधर्म के लिए क्या आवश्यकता है कि यदि हमारे मान्य आचार्य गण ये कह रहे हैं कि जो शाक द्वीपीय होते हैं ब्राह्मण ही होते हैं तो एक उसी आधार को पकड़ के पीछे चलना अरे भैया बहुत सारी बातें हैं लोग आपसे सवाल करेंगे तार्किक रूप से सवाल खड़ा होगा क्या खड़ा होगा कि भाई तुम अब तक इसको मंच देते थे अपने यहां। अब तुमसे कुछ मतभेद हो गया तो तुम इसकी पुरानी बातें खोद रहे हो। पहले कहां थे तुम? यदि आप यह कह देते मैंने एक वीडियो में सुना था आपका। यदि आप यह कह देते हैं कि मुझे पहले इसके बारे में पता नहीं था तो कैसे रिपोर्टर हैं आप? किसी को बिना जाने ही प्रशय दे देते हैं क्या? बिना जाने ताने ही आप बैठकर के शंकराचार्यों की समीक्षा करवाने लगते हैं अपने चैनल पर। यह सब सवाल नहीं खड़े होंगे। तो क्या आवश्यक है? अरे वो कुछ नहीं है।
00:27:56:12 पीछे पड़ जाएंगे। उसका निस्त नाबूत कर देंगे आप अकेले ही। क्या आवश्यक है इन बातों को खोदना और प्रामाणिक आचार्यों को बीच में लाना। यही तो वो चाहता है। अरे यही तो वो चाहता है कि हमें अपने सभी परंपरा प्राप्त आचार्यों में अनास्था हो जाए हमारे मन में। और एकमात्र निग्रह निग्रह निग्रह वीडियो बना दूंगा। निग्रह कर दूंगा इस नाम पर। इस नाम पर एकमात्र वही बाबा कहलाया जाए। वही सबका प्रामाणिक आचार्य। यही तो वह चाहता है। एक एक करके आज आपके द्वारा विद्या भास्कर जी महाराज का करवा रहा है। अन्यों के द्वारा शंकराचार्यों का कराएगा। राजेंद्र दास जी का करेगा। इधर से कराएगा, उधर से कराएगा। सारे आचार्यों के लिए सनातन समाज में अनास्था उत्पन्न कर देगा। और उसका उद्देश्य क्या है? अपने चैनल का निर्माण, अपनी स्थापना, स्वयं को ख्यापित करना। परंतु वह यह नहीं देखेगा। उसको यह नहीं दिखाई देगा कि ऐसा करने से परंपरा प्राप्त आचार्य प्रामाणिक आचार्यों पर अनास्था उत्पन्न हो जाने से हमारे पास हमारे धर्म का शब्द प्रमाण नष्ट हो जाएगा। क्या शब्द प्रमाण है? कि यह वेद है, ईश्वरीय
00:29:12:02 है, अपौरुषय हैं। वह शब्द प्रमाण नष्ट हो जाएगा हमारा तो कम से कम वह नहीं ध्यान दे रहा है। आप तो ध्यान दें और बिल्कुल वो जो व्यंग चित्र है अगर उसका आधार पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज है तो मेरा आपसे बहुत विनम्र निवेदन है कि इसकी पुनरावृत्ति ना करें। अन्यथा मुझे आपके समक्ष खड़ा होना पड़ेगा। मुझे आप अपने मार्ग में पाएंगे। कुछ विषयों में लेकर के आंतरिक मतभेद है। कुछ विषयों में वैचारिक मतभेद है। परंतु मैं तो कभी नहीं आया आपके मार्ग में। कभी आपके लिए कोई वीडियो नहीं बनाया। और मैं अपेक्षा करता हूं कि आप मुझे ऐसा अवसर नहीं देंगे भविष्य में भी कि मुझे कोई वीडियो आपके लिए बनाना पड़े। इस विनम्र निवेदन के साथ मैं अपनी बात को यहां पर समाप्त कर रहा हूं। जय श्री राम। [संगीत]
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प्रमाणिक आचार्य की अवमानना स्वीकार नहीं
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