⬜ Not used yet · 00:00:00:07 – 01:05:38:00 (1:05:38)
00:00:00:07 अपना परिचय दे दें यहां का परिचय देते हुए जननी जगदंबा की साक्षात्कार उनकी पत्नी की मूर्ति से प्राप्त किए शूद्र कुल में जन्म लेता है तो बाद में कर्म के अनुसार जो है वो ब्राह्मण भी बन सकता है जाते हुए आकर के इलाहाबाद में गुरु जी के पास पहुंचा और वहां परमहंसोपाधि को प्राप्त किए। विदेश यात्रा का क्या निषेध है? कर सकते हैं। जा सकते हैं। क्रिश्चियन पप के रूप में भी आए हैं। क्रिश्चियन पॉप के रूप में आए हैं। कौन कहना है? इसन वाले भी यही कहते हैं। इस वाले भी इस जानते हैं आप इस वाले आते हैं कभी-कभी आपके यहां जो थियोसोफिकल सोसाइटी के फाउंडर उस गौतम ऋषि बाद में इसी रूप में आकर के जगत में जन कल्याण किए। मोहम्मद भी क्या कोई श्री अमृतानंद सरस्वती जी भी शिष्य हैं क्या निगमानंद जी के अमृतानंद सरस्वती पूर्व शरीर में कोई बार क्रिश्चियन धर्मुरु बने आपके सारस्वत मंदिर में जो विग्रह होता है जी वो निगमानंद जी का ही होता है सबसे जो मेन मंदिर होता है वो गुरु जी की मूर्ति प्रतिष्ठा की है क्या लाखों बाबाओं हमको क्या और उनके अनुयाय उनको
00:01:15:15 मानते रहे हम कहां हाथ पकड़ने जाते लेकिन लेकिन उनके नाम पर हमारी मर्यादा को दूषित करना रामकृष्ण जी की मूर्ति के सामने उनके मूर्ति को लाकर प्रतिष्ठित करना ये तो उन्माद है इसका नाम धर्म नहीं है तो व्यापार है लेकिन सिद्ध है इसीलिए अरे सिद्ध है तो लाखों सिद्ध हुए हैं आज ही पहले कोई बाहर कोई सिद्ध हुआ है क्या एक से एक सिद्ध हुए हैं हम विश्वामित्र जी ने नई सृष्टि बना दी क्या उनके सामने कौन सिद्ध आप होंगे विश्वामित्र जी ने नई सृष्टि बना जी ये सब सिद्ध नहीं है क्या? तो हमारे यहां सिद्धों की क्या कमी है कि आपके सिद्ध का हम पूजन करें।
00:01:56:16 तो सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। इस समय हम आए हैं अ पुरी में और यहां पर है सारस्वत मठ। वहां पर हम इस समय हैं और हमारे साथ यहां पर महाराज जी हैं यहां के शंकरानंद सरस्वती जी महाराज महाराज जी जय श्री राम सबसे जय श्री राम और जैसा कि आप लोग जानते हैं हम विभिन्न जो विचारधाराएं हैं उनको आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। दर्शन को लेकर के, आध्यात्म को लेकर के, धर्म को लेकर के। तो इसी क्रम में आज हम यहां पर आए हैं और आज थोड़ा सा यहां का दृष्टिकोण देखेंगे कि क्या यहां की फिलॉसोफी है, क्या यहां के सिद्धांत हैं? और किस तरह से यह फिलॉसफी अस्तित्व में आई। तो महाराज जी सबसे पहले थोड़ा सा आप अपना परिचय दे दें। यहां का परिचय देते हुए जी मैं स्वामी शंकरानंद जय श्री राम जय गुरु मैं स्वामी शंकरानंद सरस्वती अध्यक्ष श्री श्री निगमानंद सरस्वत आश्रम लोकनाथ मार्ग पूरी ये आश्रम पूरी के लोकनाथ मार्ग में अवस्थित है। जगन्नाथ
00:03:12:07 देव जी के बगल में है। मंदिर के 1 कि.मी. डिस्टेंस में है। पश्चिम दिशा में यह आश्रम आसाम भंगीय सरस्वत मठ का अंतर्गत है। जिस मठ का फाउंडर है प्रतिष्ठाता परमहंस परिव्राजकाचार्य 108 स्वामी निगमानंद सरस्वती जी वह भारतवर्ष के साधकों में अनन्य असाधारण महापुरुष है। और तंत्र ज्ञान जो प्रेम चार साधना में सिद्धि लाभ किए। उनकी शरीर बंगाल की शरीर था और 1880 ख्रिस्ताब्दी में उनके अविर्भाव हुआ। इसके बाद वह शिक्षा आदि संपन्न करते हुए वैवाहिक संबंध में सुधांग सुला नामनी एक अनिंद्य सुंदरी कन्या के साथ संबंध में संबंधित हुए। चार साल के बाद उनका देहांत शरीर उपशांत हो जाने के बाद
00:04:28:00 तीन बार उनके छाया मूर्ति को दर्शन किए। इससे उनके अंदर में जिज्ञासा उदित हुई वह है कि नहीं मतलब जो उनको दिख रही है उनकी पत्नी वो पत्नी ही दिख रही है या उनको पत्नी शरीर की शरीर छायामूर्ति शरीर की बात में बलती थी बात में बलती थी इसीलिए उनकी धारणा थी जो देहांत के बाद कुछ नहीं रहता लेकिन बात में जिस समय सारे पत्नी के साथ दो-तीन बार साक्षात्कार हुआ वो भी बात भी किए इससे ही उनकी संशय उत्पन्न हुआ जो मरने के बाद कुछ ना कुछ अस्तित्व रह जाता है। जी जी इसीलिए उसी को ढूंढने के लिए वह निकले वह है तो कहां है और स्वप्न के माध्यम से भी वो निर्देश प्राप्त किया मंत्र प्राप्त किए और उसी मंत्र की साधना के लिए वेस्ट बंगाल में वीरभूम जिला की तरापीठ शशान में वहां तंत्र साधक थे महाकौड़स ना सिद्ध बामक खेपाजी महाराज उनके संस्पर्श में आकर
00:05:43:03 के तंत्र साधन में एक 21 दिन में वो तंत्र साधना की प्रस्तुत करते हुए एक रात्रि की चिता साधना में साक्षात जगत जननी जगदंबा की साक्षात्कार उनकी पत्नी की मूर्ति से प्राप्त किए जैसे पत्नी की मूर्ति उसी प्रकार प्राप्त किए मतलब समझा नहीं मतलब जगत जगत जन जगदंबा उनकी पत्नी की मूर्ति में साक्षात दिया है अच्छा उन्होंने अपनी पत्नी में जगदंबा नहीं नहीं जगदंबा जी ने आए दर्शन में लेकिन मूर्ति देखने के लिए थे जैसे उनकी पत्नी की मूर्ति में जैसे वो मूर्ति देख रहे हैं मां जगदंबा की हम तो उसमें उनकी पत्नी के दर्शन हुए ऐसे हां हां हां अच्छा मां जगदंबा की मूर्ति में उनको पत्नी के दर्शन हां हां अच्छा पत्नी की मूर्ति में जगदंबा जी ने दर्शन दिए पत्नी की मूर्ति में मूर्ति में जगदंबा जी ने दर्शन दिए तारापीठ में तारा तारा माता मतलब वो अपनी पत्नी की छवि देख रहे हैं उनको मां जगदंबा दिखाई दे दे रही है जगदंबा खुद वो साधना में जिस समय प्रकटित हुए माता ने उनकी गुरु जी ने बताए थे यदि सचमुच देवी आएगी तो आप प्रणाम
00:06:58:09 करने के बाद आपकी शीश के ऊपर पैर रखेंगे सचमुच जग जगत जननी नहीं होंगे तो पैर रखने को कभी भी समर्थ नहीं होगी जब पैर रखा वो पूछा आप कौन है इस मूर्ति वो बता बताए मैंने मैंने जगत जननी जगदंबा हूं। इस मूर्ति में क्यों ना तुम तो इसी मूर्ति में मुझे ढूंढ रहे हैं। इसीलिए जगत जननी थी लेकिन उनकी मूर्ति पत्नी की पत्नी की थी। तो पत्नी की मूर्ति बनाई थी उन्होंने मतलब पत्नी का तो चित्र होता है हमारे पास साधारण रूप से। मूर्ति देखने के जैसे अच्छा मतलब चित्र होगा। चित्र हां नहीं मूर्ति बिल्कुल आमनेसामने देखा। अच्छा आमने-सामने देखा। अच्छा और उनके उसी रूप में देखा और इसके बाद बहुत खुश हो गए और जगत जननी जी ने दर्शन दिए आशीर्वाद किए वो भी उनकी चेतना चली गई गुरु जी ने अधुर में मंदिर में विद्यमान थे रात्रि में और उनकी जिस समय चेतना चले गई गुरु जी ने आकर के उसको फिर जागृत किए तब गुरु जी ने उसको शांत करके करके भेज दिया। फिर बाद में
00:08:13:13 वह देखा जिस समय वर में प्राप्त किए थे जगत जनन ने दो वर प्रदान किए थे। एक वर था जिस समय वह स्मरण करेगा उसी मूर्ति में उसको दर्शन प्रदान करेंगे। और दूसरा वर था जो [संगीत] पहला वर में तो वो बताए थे मुझे कुछ प्राचना करो। उससे वो प्रार्थना किए थे। वो बोलते थे हमारे को जरूरत नहीं जिस समय चाहे तो उसी मूर्ति में दर्शन दे दे। अच्छा यह वर उन्होंने मांगा। वर मांगा वही हुआ अपना वो इंजीनियर थे अपना कर्म क्षेत्र में चले आए। जिस समय स्मरण किया अपना शरीर से एक ज्योति निर्गत होती थी और वो ज्योति उसी मूर्ति में प्रकटित होती थी। वो इसके बाद उनके जिज्ञासा उदित हो हुआ। जिज्ञासा उदित हुई। मतलब फिर माता दर्शन देती थी उनको हां बिल्कुल हमने पत्नी के पत्नी की मूर्ति में अपना शरीर से जिस समय वो स्मरण करते थे उस समय उनके शरीर से एक ज्योति निर्गत होती थी वही ज्योति पत्नी की मूर्ति परिग्रह करती थी उन्हें फिर गुरु जी के निगमानंद जी के शरीर
00:09:28:14 से निर्गत होती थी निगमानंद जी के शरीर से निर्गत माता वो उनको माता दर्शन दे रही ये माना जाए कि निगमानंद जी का ही कोई अंश दर्शन दे रहा है नहीं नहीं माता आई है। फिर वो गए माता उनके ही शरीर में रहती थी। हां वही तो वही तो रहस्य हो गए। इसलिए उनका जिज्ञासा उदित हो हुआ। जिज्ञासा उदित हुई जो हमारी ज्योति से हमारी शरीर से माता की उत्पन्न हो रही है। तो मैं कौन हूं? माता कौन है? उसी प्रश्न लेकर के गए। फिर अपना गुरु बामा खेपा के पास बामा खेपा जी ने उसको खूब डांटा। जगत जननी जगदंबा जगत जननी की तुमसे पैदा हुआ। इसे डांटा फिर इसीलिए आप जाइए कोई शंकर परंपरा के सिद्ध साधक से आप सन्यास ग्रहण कीजिए। इसके बाद वो ढूंढते-ढूंढते उनके साक्षात्कार हुआ अजमेर में राजस्थान की अजमेर में एक धर्म सभा में जो उनको स्वप्न में मंत्र दिए थे। उसी उनहीं उनको ही देखा एक मंच के पर हां उनके उनके नाम थे परमहंस परिवराजकाचार्य स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज
00:10:43:18 और शंकर परंपरा के सन्यासी सन्यासी थे सच्चिदानंद सरस्वती परमहंस देव उनका आश्रम था सावित्री पहाड़ में पुष्कर की सावित्री पहाड़ में वहां थे उनके वो उसको वहां ले गए और गुरु जी के साथ अवस्थान किए वहां से ब्रह्मचर्य संस्कार प्राप्त किए और गुरु जी की कठोर ता के अंदर में रहते हुए भी सारी साध्या साधना को साधन किए। वेदांत की सारी पाठ ग्रहण किए। इसके बाद गुरु जी ने एक वेदांत की शिक्षा उनकी वहीं से हुई। वहीं से सच्चिदानंद जी से। सच्चिदानंद सच्चिदानंद जी बहुत वेदांती संत थे। हम और सच्चिदानंद जी ने उनको सन्यास प्रदान किए। नाम प्रदान किया स्वामी निगमानंद सरस्वती। अच्छा। और चार धाम की परिवजन के लिए उनको निर्देश किए। अच्छा बाद में साथ में खुद भी गए। साथ में खुद गए और मानव सरोवर वगैरह दो-तीन स्थान वो साथ में रहे। इसके बाद भेज दिया आप घूम के आ जाओ। वो चतुरधाम करते हुए गुरु जी के पास वापस आए। आकर के अपना अनुभूति प्रकट किए।
00:11:58:26 मैंने तो दर्शन किया जो जो आप जो पढ़ाए थे सच्चिदानंद सच्चिदानंद स्वरूप जो परम ब्रह्म परमात्मा परमेश्वर है वो सर्वत्र है जी सब कुछ में है लेकिन मैं उनको उसको अनुभव करने के लिए चाहता हूं मैं वही हूं उसको अपरोख अनुभूति प्राप्त करने के लिए मैं चाहता हूं वो मैं वो मैं ही हूं हूं इसलिए गुरु जी ने बताया ये वेदांत की स्मरण मनन में बहुत दिन निकल जाएगा। आपके पास इतना समय है नहीं। मुझे ही 40 साल लगा था। इसीलिए आप एक काम कीजिए। कोई जोगी गुरु की सहायता ले लीजिए। उससे जल्दी हो जाएगा। योगी गुरु योगी गुरु जी। फिर वो गुरु जी के निर्देश के अनुसार जोगी गुरु की अनुसंधान में निकले और हिमालय के मुसोरी पहाड़ में एक जोग ताप सुमेर दास जी करके घटना चक्र में साक्षात्कार हुआ। वह परशुराम तीर्थ में दर्शन करने के लिए गए थे और वहां उनका शरीर अनारोग्य हो गए। वो नहीं वापस आ पाया। वहां बस्ती में रहे वो पहाड़ी लोगों के साथ और एक संध्या में पहाड़ की शोभा दर्शन
00:13:14:07 करने के लिए निकले तो वहां वापस नहीं आ पाया। रास्ता मार्ग खो गए। विस्मृत हो गए और अपना पुड़िया को वापस नहीं आ पाया। रात में एक रात्रि में एक ब्रेक के कोटर में थे। वहां ही सुबह वही जोगी गुरु जी ने वहां से आकर के उनको लेकर के गए और उनके पास कोई मुसोरी पहाड़ में कोई एक गुमफा में गुमफा में वह विद्यमान रह के तीन तीन महीना तक वहां से जो की सारी साधन प्रक्रिया को प्रशिक्षण प्राप्त किए और इसके बाद गुरु जी ने बताया राजयोग की साधना के लिए थोड़ा से भोजन की भी उत्कृष्ट भोजन होना चाहिए। यहां ये कंदमूल वगैरह उसको लेकर के और राज्यों की साधना आना कष्ट है। आप चले जाइए। कई गृहस्थ लोग आपको मदद की गृहस्थ की मदद से आप इस साधना की अभ्यास कीजिए। महाराज जी ने मैं आशीर्वाद करता हूं। मैं भी आपके साथ रहूंगा। और पहली सिद्धि तो वहां हो गई। तंत्र में तंत्र को माता स्वयं पत्नी के मूर्ति में दिखने लगी। हां। दूसरी सिद्धि यहां पे सच्चिदानंद जी के पास आ गई। अनुभव हुआ जो वेदांत का
00:14:29:13 उन्होंने सिद्धांत का अनुभव किया लेकिन अभी उसका अपरोखानुभूति प्राप्त करने के लिए उनकी पिपासा उदित हुई। अब वो योगी वो गुरु योगी गुरु के पास जा रहे हैं। पास जा रहे हैं। तो गुरु जी ने भी उनको प्रशिक्षण प्रदान किए और उसी प्रशिक्षण से बताया तुम इसको अभ्यास करो। अभ्यास करने से निर्विकल्प समाधि आ जाएगी। और निर्विकल्प समाधि आ जाएगी। निर्भिकल्प समाधि में आपको सारी कुछ सब कुछ पहचान हो जाएगा। अच्छा वो आने से एक हरिपुर नाम के एक स्थान पे एक गृहस्थों के साहचर्य पहले साधना अभ्यास किए। बाद में आसाम की गुवाहाटी में एक सज्जनों की साहचर्य में वहां वह साधना अभ्यास किए। जगेश्वर विश्वास करके उनका नाम था एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिशर कमिश्नर थे वह आसाम गवर्नमेंट की उनकी साहचर्य में जोगी योग साधना की अभ्यास किए और वहां से ही वो पहले 24 घंटा के लिए समाधि अभ्यास किए। दूसरे बार तीन दिन
00:15:44:19 के लिए तीसरे बार सात दिन सात रात्रि के लिए वह समाधि अभ्यास किए और उनके निर्देश के अनुसार उन लोग उनका समाधि टूटे टूटा और वो वापस आए। इसके बाद उनमें साहस हो गए कि मुझे एक बार ये सारी सबिकल्प समाधि की अभ्यास हो गई। इसके बाद उनमें आकांक्षा उदित हुई कि मुझे निर्विकल्प निर्विकल्प में जाना चाहिए। जी और वहां आसाम की जो कामाख्या माता की मंदिर है उस मंदिर के बगल में बाजू में एक भुवनेश्वरी मंदिर है। उसी मंदिर के भी पश्चात में एक बिल वृक्ष की नीचे वो समाधि स्थल अभी वो उद्धार हुआ। अभी भी है। वहां वो अभ्यास किए निर्विकल्प समाधि में जाकर के उसी परतत्व को बोल रहे निर्विकल्प समाधि की अनुभूति के बारे में स्वामी जी ने गुरु जी ने बोल रहे उसी दिन मैंने वेदांत की निधि निध्यासन को आश्रय करके बैठा था और एक-एक चक्र को अतिक्रम करके सहस्त्रार में जाकर के वही पर तत्व के साथ वही एक ज्योति
00:17:00:07 एक-एक ज्योति को एक-एक द्वार को अतिक्रम करते हुए मैंने जाकर के एक ज्योतिर्मय मंडल में पहुंचा और वहां की जो आनंद है वहां की जो शांति है उसको हमारे अनुभूति में आ रही है लेकिन मैंने उसको प्रकाश करने को समर्थ नहीं हूं और अनिर्वचनीय स्थिति को चले गए कि वो बोल रहे मैंने कितना समय था वो भी हमारे जान पहचान में है नहीं इसके बाद हटात उनका अंदर में एक अनुभव जागृत हुआ देखा सर्वत्र ज्योतिर्मय मंडल मध्यम बीच में कोईकोई छिद्र एक छिद्र को आश्रय करके वो अंदर वापस आ गए प्रवेश कर गए उसी छिद्र में और छिद्र में प्रवेश करने के बाद उनमें अनुभूति आया जो मैं गुरु हूं गुरु रहम गुरु रहम इस अनुभव को उसी आध्यासिक भाव को अपनाते हुए वो निर्विकल्प समाधि से भगवान की इच्छा से भगवान जी ने जिस आधार को अवलंबन करके जगत के काम जगत जनजनता की काम करने के लिए कल्याण करने के लिए चाहते हैं। उस समय खुद उसी शरीर में आ जाते हैं। हम इसीलिए उसी शरीर में भगवान जी ने खुद को प्रकट किए।
00:18:15:25 वो गुरु बोध को मैं गुरु हूं। मैं गुरु हूं। गुरु रहम गुरु रहम और उसी बोध को अपनाते हुए समंदर विकल्प समाधि से वापस आए और वहां से फिर उसी अपना स्थिति को समझा प्रधान अपना स्थिति को सूचना देने के लिए अपना गुरु जी सच्चिदानंद जी सन्यास गुरु जी जो सच्चिदानंद परमहंस देव जी ने उनके पास जाने के लिए संकल्प किए। जाने के मार्ग में उस समय उसी समय इलाहाबाद में कुंभ मेला चल रही थी और उसी कुंभ मेला में अपना गुरु जी भी थे। यह संवाद प्राप्त करते हुए गुरु जी के पास गए। गुरु जी उस समय श्रृंगरी पीठाधीश्वर कैंप में रहे थे और उसी सभा में वो जाकर के श्रृंगरी पीठाधीश को प्रणाम नहीं करते हुए अपना गुरु जी को प्रणाम किए। कौन? निगमानंद जी ने निगमानंद देव जी ने अपना गुरु जी सच्चिदानंद परमहंस को प्रणाम किए। उस समय वहां तो शंकराचार्य जी को प्रणाम प्रणाम नहीं किया। साधु मंडल में बिल्कुल हलचल मच गए। वो शंकराचार्य जी को प्रणाम नहीं करते हुए अपना गुरु को प्रणाम किए। उसमें वो उसमें जुक्त तर्क वितर्क हो गए। उसने शंकराचार्य जी ने उनको
00:19:31:08 अभिनव तर्क तीर्थ वही कई करके उस समय थे। और वह मतलब बुलाया पास बेटा आ जाओ हमारे पास बताया तुम यहां के परंपरा के भग्न क्यों किए मैंने तो कुछ भग्न की नहीं किया ना यहां जगतगुरु को पहले प्रणाम करना चाहिए था और बताए मनथ श्री जगन्नाथ मदगुरु श्री जगतगुरु मदात्मा सर्वभूत आत्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः हमारे गुरु की कई गुरु है इस प्रकार सिद्धांत को अपनाना जाए गुरु तो एक ही है एक एक अद्वितीय तत्व है। इसीलिए हमारे गुरु जी की गुरु की कई स्वीकार किया जाए तो गुरु में दोष लगता है। गुरु में दोष संस्पर्श होता है। इसीलिए गुरु जी की गुरु तो एक ही सत्ता है। किसी कौन सत्ता को अवलंबन करके शिष्य को कल्याण करते हैं। दूसरी बात है। जिस प्रकार विद्युत एक ही है। लेकिन बल्ब में वह लाइट अम आलो दे रहा है और पंखा में हम लोगों को हवा दे रहा है। ले सत्ता तो एक ही है। इस प्रकार समझाया शंकराचार्य जी ने उस उनको कई प्रश्न भी किए। इस प्रकार कुंभ मेला कहां देखे हुए हो? वो कुछ बोला मैं निर्विकल्प में
00:20:46:12 सारी कुछ देख लिया। इस प्रकार जगत ने सारे ये सब कुछ इस पिंड में जो कुछ है सारे ब्रह्मांड है उसको भी मैंने इसी पिंड में देख लिया तब जगतगुरु जी ने उनके गुरु जी को बताया वो तो परमहंस बन गए आप उनको क्यों दंड धारण क्रिया कराया ना वो जब से हमसे गया अभी तक आया नहीं अभी वो अभी मैंने उसको देख रहा हूं इसीलिए जगतगुरु के निर्देश से उनके सच्चिदानंद जी ने त्रिवेणी संगम में उनके दंड को विसर्जन दिया और साधु मंडल उनको परमहंस घोषित किए। परमहंस मतलब परमहंस मींस परम जो निर्विकल्प समाधि को प्राप्त परमहसु हंस चेती परमहंस जो से परम सत्ता को खुद मैं हूं। ब्रह्म मैं हूं सोहंग सोहंग इसी स्थिति में जो निर्विकल्प समाधि में जो अनुभव करता है जिस प्रकार हंस वो अनुभव कर रहे हैं तो फिर वो गुरु कैसे देख रहे हैं किसी को जैसे वो देख रहे हैं व्यवहारिक सत्ता है ना सत्ता त्रिविध है ना इसका मतलब परमार्थिक परमार्थिक व्यवहारिक और एक प्रतिभाषी इसमें एक इसमें एक व्यवहार
00:22:01:15 परमार्थिक स्थिति में तो अनुभव कर लिया मैं ब्रह्म हूं लेकिन व्यवहारिक सत्ता तो एक है ना अलग है ऐसे ही एक चीज एक यहां पे प्रश्न और आ रहा है छोटा सा कि जैसे उन्होंने परमार्थ और व्यवहार का अंतर किया कि भाई परमार्थ में मैं हूं मगर व्यवहार में गुरु गुरु अलग है। मैं अलग हूं। अलग नहीं है। गुरु को गुरु गुरु के स्थान पे व्यवहार करना पड़ेगा। तो जब उन्होंने परमार्थ और व्यवहार का यहां पे अंतर किया तो वैसे ही परमार्थ और व्यवहार का यहां भी अंतर करना चाहिए कि जैसे जगतगुरु है जो और जो मेरा गुरु है। हम वो विद्युत एक ही है। पारमार्थिक सत्य है कि एक ही विद्युत सब जगह चल रहा है। मगर वो किस रूप में प्रकट हो रहा है? ये व्यवहारिक हो गया कि पंखे से कैसा व्यवहार होगा? बल्ब से कैसा व्यवहार होगा। तो अगर एक जगह पे अगर परमार्थ व्यवहार में अंतर हो रहा है तो दूसरी जगह पे क्यों नहीं हो रहा? दूसरी जगह में होना चाहिए। लेकिन वो अपना गुरु को तो पहले तो हां वो एक भाव की व्यवहार भाव की बात है वहां पर जिस प्रकार हनुमंत जी ने कह रहे हैं श्रीनाथ जानकी नाथ अभेद परमात्मनी तथापि मम सर्वस्वम राम राजीव लोचन ये श्रीनाथ और जानकीनाथ तो एक ही बराबर है तब भी हमारे नाथ ही राम राजीव लोचन है उसी प्रकार मदगुरु
00:23:16:16 श्री जगतगुरु इस प्रकार भी गुरु की शिष्य की जो मान्यता मेरे लिए अनन्य भावन गुरु के लिए हां हां हां भले ही उनके मेरा कोई पर गुरु परदाता वाला रह सके रह सकता है हो सकता है लेकिन हमारे तो गुरु जगतगुरु हमारे गुरु ही जगुरु है मन्नत श्री जगन्नाथ मद्गुरु श्री जगतगुरु इस प्रकार की उनकी परमहंस उपाधि भी तो इस हिसाब से अब जो आपको गुरु मानेंगे वो आपसे बड़ा निगमन जी को नहीं मानेंगे जी जो इस समय आपको गुरु मानेंगे मान नहीं मानेंगे ना पर गुरु गुरु है वो मानेंगे नहीं तो कहेंगे मददगुरु जगतगुरु नहीं नहीं देखिए भावा द्वैतम सदा कुरत क्रियाद्वैतम नकारीचित इस प्रकार अद्वैत परंपरा में एक श्लोक है भावा द्वैतम सदा कुरत भाव में अद्वैत किया जा सकता है क्रिया में कभी भी अद्वैत भाव पोषण नहीं करना क्रिया में किया ना पहले जगतगुरु के छूने थे उन्होंने तर्क दिया कि मेरा ही गुरु जगत हां हां तो जैसे आपका कोई शिष्य है मान लीजिए हम वो आपसे आपको जगत गुरु मान मानेगा मानेगा पर गुरु के रूप में मानेगा लेकिन खुद गुरु को पहले ही श्रद्धा करना चाहिए मतलब आपको ही जगतगुरु कहेगा वो जगतगुरु नहीं हमारे पहले तो अपना गुरु को सम्मान करना चाहिए वही तो उसको
00:24:31:25 परिचय कराया ना इसीलिए पिता माता जितना भी अनपढ़ हो तब भी पिता माता पहला गुरु और पहला पूजनीय होते हैं ना इसी प्रकार इसी प्रकार दृष्टि से ले ठीक है वो तो भाव वाली बात है हां इससे पहले एक बात रह गए वो जिस समय प्रयाग आ रहे थे ये वाला बड़ा अच्छा बताया वो जो श्लोक पढ़ा है ना अभी भाव में तो अद्वैत हो सकता है क्रिया में कभी भी नहीं हां भावद्वैतम कहां का है श्लोक तो मैंने कहा कि नहीं बल पाऊंगा है भावद्वैतम भावद्वैतम क्र सदा कुरजात भाव में अद्वैत पोषण करना चाहिए क्रिया में कभी भी हां बहुत बढ़िया ये उसे इलाहाबाद जाने से पहले वो काशी में उतरे थे। हम अन्नपूर्णा जी ने उनको बताया अन्नपूर्णा जी के वो देखा सोने थे अन्नपूर्णा की काशी में कई कभी भी खुदा में भूखा नहीं रहते हम लेकिन मार्ग पे देखा ये कोई भिखारी ने वो झूठे पत्ता से कुछ खाद्य सामग्री लेकर के खा रहा है जी वो कोई ब्राह्मण को पूछा भाई अन्नपूर्णा की पूरी में यहां भी
00:25:47:01 लोग भूखा रहते हैं कि ये कैसे है वह बताया जो पहले दिन आते हैं अन्नपूर्णा जी ने उनको खिलाते हैं और इसके बाद अपना प्रजत्न में भी करना अन्नपूर्णा जी देते हैं लेकिन आपको भी खुद प्रजत्न करना पड़ता है वो बताया मैंने तो आज पहले आया हूं देखा है देखिए अन्नपूर्णा जी ने कैसे मुझे खिला रहे वो जाकर के स्नान करने के लिए दशा स्वम में घाट में गए और वहां बैठते-बैठते ही समाधिस्थ हो गए। बैठने से समय वही एक वृद्धा ने आकर के एक टोकी एक दोना दिए थे जिसमें कुछ भोजन सामग्री थे रखने के लिए दिए थे और वो उसको रखा वहां रखते रखते समाधिस्त हो गए देखा तो रात बहुत हो गए जिस समय समाधि टूटी अधिक रात्रि हो गई और देखा कोई सुनसान घाट में कहीं है नहीं लेकिन जो समय उड़ने के लिए गए तो उसी वो जो भुजिया थे उसी भुजिया हाथ में लग गए देखा उसमें में बूढ़ी कहां गई ढूंढा तो कहां भी प्राप्त नहीं किया तो खोल दे खुल के देखा तो वर्धमान की हमारे वेस्ट बंगाल के वर्धमान की एक सीता भोग होती है गीता माता वो भोग बिल्कुल
00:27:02:04 टाटका है बिल्कुल गर्म है उष्णत है उसी अवस्था में उसको प्राप्त किए और उसी उसी अवस्था में उसको प्राप्त किए और वो उसको उसी अवस्था में प्राप्त किए और उसको भोजन भी कर लिया रात्रि में अन्नपूर्णा जी ने उनको तो बताया क्या बेटा हमारे पूरी में हमारे महिमा को आपका अनुभव हो कि नहीं वो बताया वो तो कोई मारवाड़ी बूढ़ी ने रखा था अब तो नहीं रखा था माता जी ने कहा कि क्या एक मारवाड़ी बूढ़ी के रूप परिग्रह करने की हमारी सामर्थ्य नहीं है तुम पर तत्व में तुम्हारा पर तत्व तुम्हारी अनुभव हो गए लेकिन अभी भी जिसको सच्चिदानंद आनंद कंद रूप में समाधि में अनुभव किए वह भी इसी सृष्टि में कण-कण में है। यह अनुभव तुम्हारी अभी भी अवशिष्ट है। तुम अभी भी ज्ञान में अपूर्ण हो। अपूर्ण है। वो जिस समय परिव्राजन कर रहे थे उस समय अपना सच्चिदानंद जी गुरु जी के साथ गए थे मुसरी पहाड़ की हिमालय की एक मुसौरी पहाड़ की एक साधिका के पास। उनके नाम थे गौरीमा और गौरीमा ने बताए
00:28:17:13 थे यह तुम्हारी उनकी गुरु सच्चिदानंद को बताए थे यह तुम्हारी चेला यदि कभी निर्विकल्प समाधि को प्राप्त किए तो हमारे पास भेज देना वो याद आ गए अभी तो मैंने निर्विकल्प को प्राप्त किए इसीलिए फिर गए गौरी मां के पास गौरीमा ने उनको भाव साधना में जो परम तत्व को निर्विकल्प में सच्चिदानंद आनंद कंद के रूप में अनुभव किए थे वही परमात्मा पर मेरे परमेश्वर ने एकांश में वही विद्यमान है उसको अनुभव किए सर्वत्र कण-कण में जनजन में पल पल में सर्वत्र वही है उनकी संस्पर्श में उनके आशीर्वाद से संस्पर्श से वो भाव समाधि को प्राप्त किए और अनुभव किए वो वही तत्व ही जो निर्विकल्प समाधि में जिसको अनुभव किए वही सर्वत्र विद्यमान हुए उसी स्थिति को बताने के लिए सूचना देने के लिए गुरु जी के पास जाते हुए आकर करके इलाहाबाद में गुरु जी के पास पहुंचा और वहां परमहंस उपाधि को प्राप्त किए। इलाहाबाद में प्राप्त हुई थी। इलाहाबाद की बाली शंकराचार्य इलाहाबाद उस समय समा कुंभ चल रहा था। अच्छा इलाहाबाद में वो आए थे। आए थे। हां हां इसीलिए इसके बाद गुरु जी ने अपना उसको अपना गद्दी में बैठाने
00:29:32:19 के लिए संकल्प किए और वो बताया जब मैं बंगाल में काम करूंगा। हमारे आग्रह प्रकाश किए। गुरु जी ने आकर के बंगाल में वो जहां से जो साधना कर रहे थे जगेश्वर विश्वास की घर पे वहां आकर के पहले उन लोगों को दीक्षा प्रदान किए और इसके बाद वो एक ग्रंथ लिखे थे जाकर के वो जहां जोग साधना किए थे वहां एकांत में रह के एक जोगी गुरु नाम के एक ग्रंथ रचना किए पहले जो जोग साधना में जिस ज्ञान को आहरण किए थे। उसी को अवलंबन करके पहले जोगी गुरु, ज्ञानी गुरु, तांत्रिक गुरु, प्रेमिक गुरु, ब्रह्मचर्य साधन, वेदांत विवेक ये सारी ग्रंथ को रचना किए। उसी ग्रंथ की संस्पर्श में आते हुए लोग उनके साहचर्य को प्राप्त किए। साधना अभ्यास, साधना शिक्षा के लिए लोग आने लगे। इसके बाद सारस्वत मठ, सारस्वत आश्रम यह सारी पूर्व भारत में उनकी अधिक से अधिक प्रतिष्ठा है। मठ आश्रम है और सारसत मठ करके पहले आसाम में प्रतिष्ठा किए। इसके बाद बंगाल में कोई आश्रम प्रतिष्ठा किए।
00:30:48:04 हमारे ये आश्रम जो है यहां वो मठाश्रम प्रतिष्ठा करते हुए सारसत मठ सारस्वत आश्रम प्रतिष्ठा किए। भक्तों की एकत्रित सत्संग के लिए सारस्वत संघ का प्रवर्तन किए जो एक हप्ताह में हर सप्ताह में उन लोग एकत्र एकत्रित होते हुए साधना भजन करते हैं और वो आर्य दर्पण नाम करके एक मासिक पत्रिका भी प्रवर्तन किए जो 100 साल अभी 115 साल हो गए अभी एक सार्वभौम भक्त सम्मेलनी नाम के जहांजहां उनके भक्त लोग है जो भी कोई आ सकता है उसी सम्मेलन में हर साल वो क्रिश्मास हॉलिडे में है 26 27 28 29 इस दिनों में वो एक भक्त सम्मेलनीय प्रवर्तन किए जगत कल्याण के लिए मठ आश्रम की समुन्नति के लिए और सारी विधि व्यवस्था को एक ट्रस्ट डीड करके समर्पण करके वो ई पुरी में आकर के अवस्थान किए और उस समय बाद में ये आश्रम हमारे 1900 61 में ट्रस्ट सिद्धांत के अनुसार संकल्प किया गया पूरी में आश्रम करने के लिए 66 में यहां की
00:32:03:08 आश्रम प्रतिष्ठा हुआ इसी आश्रम में इसका नाम है सारसत श्री निगमानंद सारसत आश्रम और यहां हमारे गुरु जी की आईडियोलॉजी है निगमानंद जी की ये उनका दार्शनिक सिद्धांत है शंकर की मत और गौरांग की पथ शंकर शंकर की माथे भक्ति उनकी चैतन महाप्रभु की और दर्शन बोल रहा हूं वो ब्रह्माद्वैत सिद्धांत है जीव ब्रह्म एव न अपर ये आचार्य शंकर की सिद्धांत है जीव ब्रह्म है जगत ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जीव ब्रह्म एव न अपरह ये इसलिए हर जीव परम ब्रह्म की सत्ता है परम ब्रह्म से बिल्कुल अभिन्न है लेकिन लेकिन जीव की कोई बोध नहीं है मैं ब्रह्म हूं जीव फंसे गए संसार की माया में। इसीलिए उसी बोध को अपना बोध इस प्रकार नहीं समझ पा रहा था। इसी बोध को प्राप्त करने के लिए आचार्य शंकर ने थोड़ा से कठोर मार्ग का उपदेश प्रदान किए। यह ब्राह्मण कुलोदभव सन्यासी ही केवल उसी स्थिति को प्राप्त कर सकता है। इसीलिए निगम देव जी देव जी ने थोड़ा
00:33:18:14 से कोहल पथ सुगम पथ को अपनाया महाप्रभु सिद्धांत तो आचार्य शंकर का है जीव ब्रह्मा बना अपरा लेकिन मार्ग को चुना महाप्रभु गौरांग देव जी की जो भक्ति और सेवा की पथ है भक्ति जीव क्यों नहीं अनुभव कर पा रहा है जीव इसीलिए अनुभव नहीं कर पा रहा है उनमें कई आध्यात सिक और बोध है जो काम क्रोध ये वगैरह प्रतिबंधक हो रहा है उसको जन्मांतरण संस्कार उसको बाधक हो रहा है उसी बोध में पहुंचने के लिए इसीलिए उसी संस्कार को लाघव करने के लिए परिमार्जित करने के लिए परिमल करने के लिए उन्हें सेवा और नाम संकीर्तन जप और नाम संकीर्तन को पथ को चुना जो महाप्रभु गौरंग देव जी की शंकर का मत मत गौरांग का पथ गौरांग का पथ ठीक उसी मार्ग में सेवा और भजन के मार्ग पर जाकर के जीव का जिस समय एक तरीके से कहा जाए तो यह जो बहुत ज्यादा विधि निषेध कर्मकांड इत्यादि पर ध्यान ना देते हुए भक्ति करना भक्त हैं वो बोल रहे हैं
00:34:34:04 करना है सारी को कुछ मना नहीं किया वो मना नहीं किया भजन सारी पूजन विधि व्यवस्था भी चाहिए लेकिन साधन मार्ग के लिए भजन पूजन जप वगैरह ये सारी को आश्रय करना चाहिए। जीव को शिव ज्ञान से नर को नारायण ज्ञान से सेवा करना चाहिए। उससे ही धीरे धीरे धीरेधीरे जीव की संस्कार परिमार्जित हो जाएगा। जन्मांतरण कर्म संस्कार लाघव हो जाएगा। उससे ही जीव अनुभव कर पाएगा। जिस समय अंत आचार्य शंकर भी शंकर भी उसी प्रकार भाष्य आदि भाष्य में बोल रहे हैं। जिस समय जीव की निष्काम कर्म योग निष्काम उपासना के द्वारा अंतकरण पवित्र हो जाएगा। उस समय उसमें जिज्ञासा आएगी मैं कौन हूं। और जिज्ञासा के निरसन के लिए गुरु के पास जाने के बाद गुरु जी ने जो तत्व मसी महावाक्य को उपदेश प्रदान करेंगे उससे ही ओहम ब्रह्मास्म बोध में प्रतिष्ठा आ सकती है। ये भी शंकर शंकर सिद्धांत है। इसीलिए गुरु जी ने उसी को बताया जो निष्काम उपासना के द्वारा कि हम लोग वहां शंकर सिद्धांत में पहुंच पाएंगे। मैं ब्रह्म हूं। उसी अनुभूति मुझे भी आ सकती है।
00:35:49:15 ये हो गए उनके सिद्धांत और उसी को अपना मठाश्रम में बताया जो हमारे दार्शनिक सिद्धांत है शंकर का मत और गौरांग का पथ वो भक्त लोगों की उपदेश देने के लिए बताया उनका मठाश्रम के भी तीन आदर्श है वो उनकी सिद्धांत है जो हमारे आदर्श गृहस्थ होना चाहिए जो हमारे चतुराश्रम और चतुर वर्ण की परंपरा है वो भी उसको भी गुरुत्व दिया प्रदान किए बोल रहे हैं जे चतुराश्रमिक परंपरा में गृहस्थ आश्रम सर्वश्रेष्ठ आश्रम है क्योंकि वह सारी आश्रम का पृष्ठ पोषक है जो ब्रह्मचर्य है वानप्रस्थ है सन्यास है वो सारी जुड़े हुए सन्यास गृहस्थ आश्रम के साथ इसलिए गृहस्थ जितना निर्मल पवित्र होगा गृहस्थों की अन्न जितना पवित्र होंगे उतना ही तीनों आश्रम उतना ही निर्मल होंगे इसलिए गृहस्थ आश्रम के गृहस्थ स्थाश्रमियों की साधन के लिए वो जो हमारे शास्त्र में पंच ऋण के बारे बारे में कहा गया है देव दे देव ऋण और ऋषि ऋण पितृ मातृ ऋण न ऋण और भूत ऋण इसी की उसको
00:37:05:03 परिशोध के लिए वो नियम पंचक नाम के एक विधि प्रवर्तन किए जिससे साधना के द्वारा हम लोग देवण देवताओं की उपासना के द्वारा देवण परिशोध करते हैं। गुरु शास्त्र के आकर शास्त्र के अध्ययन अध्यापना के द्वारा ऋषि ऋण परिशोध करते हैं। पिता माता की सेवा और श्राद्ध तर्पण के द्वारा पितृ ऋण निऋण दूसरों के उपकार के लिए उपकार के लिए इसलिए वो अर्थ क्लस्ट के कल्याण के लिए गौरंग सेति सेवानिकेतन नाम के एक सेवा विभाग की प्रवर्तन किए जहां से सारी सेवा विधि व्यवस्था चलती है और इस प्रकार सारी विधि व्यवस्था बनाए हमारे मठाश्रम में सारी विधि व्यवस्था को देखते और गृहस्थों के लिए एक मठास विशेष विवाह पद्धति ऐसा कुछ नहीं विधि व्यवस्था जो पंच ऋण की परिशोध के लिए वो विधि व्यवस्था बनाए और एक बताया जे साधन साधकों के लिए गृहस्थ साधकों के लिए कि हम लोग को आदर्श होना चाहिए हमारे ऋषि योग में ऋषियों भी
00:38:20:14 गृहस्थ थे वो जिस प्रकार आदर्श को तो जिस प्रकार आध्यात्मिक आध्यात्मिकता को अपना करके जीवन गुजार रहे थे उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन जापन हमारे गृहस्थ में होना चाहिए जैसे सत संतान की आगमन हो सके इसीलिए कहते हैं आदर्श गृहस्थ जीवन गठन और संघ होना चाहिए संघ शक्ति कड़ जुगे कलयुग में कोई एकला साधन करके समुन्नति प्राप्त करे यो बहुत कष्टाध्य है इसलिए बीच-बीच में हम लोग संघ होकर के आपस में भाव विनिमय के द्वारा वो अपना जो कमी को पूर्ति कर सकते हैं। इसलिए तीन प्रकार आदर्श को भी वो दिगदर्शन पदा आदर्शक व्यस्त जीवन गठन संघ शक्ति प्रतिष्ठा और भाव विनिमय ये हमारे मठाश्रम की भी उसी परंपरा में चलता है। चलती है। यहां की भी जो आश्रम है वह जगतगुरु की जो आसन आप देख रहे हैं जहां गुरु जी की मूर्ति है उससे पहले एक वेदी है वो जग उसका वैशिष्ट्य है उसी आसन में जगतगुरु तो भगवान ही है परमात्मा परमेश्वर है इसीलिए परमेश्वर में सारी देव देवता है इसीलिए
00:39:35:27 उसी जगतगुरु के प्रतीकात्मक आसन में कोई ना कोई देवता की भी कोई भी अपना इष्ट को स्मरण करके चिंतन करके पूजन भी कर सकता है। भाव भी ले सकता है। जगतगुरु की जगतुगुरु की आसन प्रतिष्ठा की आसन प्रतिष्ठा हां मतलब जगतगुरु का आसन है वहां पर आप अपना जिसमें भी जो उसको स्मरण करके भी आप भाव जगुरु के प्रति भी कर सकते हैं। कर सकते हैं। कोई भगवान समझ के कर सकते हैं। हां कर सकते हैं। इस प्रकार व्यवस्था किए और यह जो हमारे आश्रम में वह जगतगुरु की सेवा में भी निरत है और यहां की एक वेद विद्यालय है और एक बोर्ड ऑफ सेकेंडरी उड़ीसा सरकार की तत्वावधान में है लेकिन हम लोग प्राइवेट में उसको मैनेज करते हैं। सारसत विद्या निकेतन करके वहां से भी 1100 बच्चा पढ़ते हैं। वो भी मोरालिटी जैसे डेवलप किया जाए उस प्रकार गीता भाग गीता और ब्रह्मचर्य जोग के भी वहां से शिक्षण प्रदान करते हैं। हमारे एक दातव्य चिकित्सालय है वहां से एलोपैथी और आयुर्वेदिक चिकित्सा भी प्रदान किया जाता है। जगन्नाथ देव जी की जो यात्रा महोत्सव है उसमें भी हम लोग व्यापक के रूप में
00:40:51:22 जो आते हैं दर्शनार्थी लोग तीर्थ तीर्थटन के लिए उन लोगों के भी हम लोग भोजन पान वगैरह सारी विधि व्यवस्था भी करते हैं उन लोगों के लिए हमारे गौशाला भी है यज्ञशाला भी है भगवान की कृपा से जगन्नाथ देव जी की श्री चरण में और गुरु जी की विधि व्यवस्था से ये सारी चल रहे है वो चला रहा है हम लोग निमित्त मात्र एक बात बताएं महाराज जी मुख्य रूप से आपके सारसत मंदिर में जो विग्रह होता है जी वो निगमानंद जी का ही होता है सबसे जो मेन मंदिर होता है वो गुरु जी की मूर्ति प्रतिष्ठा की है लेकिन हर प्रायता हर आश्रम में भगवान शंकर की जो शिवलिंग भी होते हैं और सबसे बड़ी मूर्ति तो मैंने देखा निगमंद जी की निगानंद जी की अच्छा एक ये इस तरह की एक वीडियो हमने देखी थी हम इसमें निगमंद जी हैं हम और उनके साथ में यह मां भगवती हैं। निगम सहस्त्र नाम ये आप ही का ऑफिशियल चैनल है नहीं हमारे यहां के नहीं ये
00:42:05:10 ये कोई स्तुति हो रही है। ये आप ही के मतलब आप ही के और कोई वही किया है ये स्मृति होगी ना आपके यहां कोई कौन सी भाषा में है ये उड़िया शास्त्र नाम तो संस्कृत में है अच्छा सुनने दी पहले
00:43:05:25 ये नहीं है। संस्कृत शास्त्र नाम है ना निगम शास्त्र निगम शास्त्र तो यह संस्कृत में है और ये जो चैनल है ये निगम सुधा ये चैनल आपके मतलब कोई जानकार वाले हैं या आप ही की परंपरा की कोई दूस परंपरा में दूसरे कई किए हैं भक्षक के कोई संघर्ष कर अच्छा होंगे अच्छा इसमें एक ये आगे ये जो भगवती दिखाई दे रही हैं निगमंद जी के साथ हम्म तो ये कौन है? उसको गुरु शक्ति कहते हैं। इस प्रकार वो बैठा दिया उस पर एडिट करके। अच्छा हां गुरु और गुरु शक्ति अभिन्न कहते हैं ना। अच्छा गुरु और गुरु शक्ति गुरु शक्ति को त्रिशूल के रूप में ऐसे कल्पना करना थे। लेकिन वो मूर्ति रूप में बैठा दिया। तो ये वामांग में इस प्रकार कहने का मतलब है ना कि जैसे ऐसे पत्नी के रूप में बैठी है वो। है ना? इस प्रकार बैठाना नहीं चाहिए था। हम लोग भी उसको सही दृष्टि से नहीं लेते। एक पत्नी की एक काल्पनिक मूर्ति को लेकर के इस प्रकार दिखाना मां मां जगदंबा उनकी पत्नी के रूप में बैठी हैं।
00:44:21:01 इस प्रकार अधिक इस प्रकार शोभाजी करना जरूरत नहीं है। साधन की जगत में जो हो गए हो गए। सुधांशु माला जी ने जगत जननी थे और उनकी हम लोगों का श्रद्धा भक्ति है लेकिन एक परम फिर वो तो उनकी पूर्वाश्रम की बात था एक सन्यासी फिर परमहंस सन्यासी हां उनको फिर खींच करके ला के सन्यास जीवन में उनकी पत्नी को संजोग करना ये साधकों की दृष्टि से सही नहीं सही सही लगेगा कि हमारी जगदंबा को आप निगमानंद जी के साथ बिठा रहे हो तो अजीब लग रहा है वो इसीलिए इसीलिए देखिए आज तो सोशल मीडिया है कोई किसी को रुकावट करने का भी समर्थ नहीं है। वो क्या कहा निगमानंद जी के जाने के बाद उनका प्रामाणिक शिष्य किसको माना जाए? नहीं वह तो जाने से पहले वो ट्रस्ट बोर्ड करके गए ना 11 जन 11 सदस्यों को लेकर के वो उसका परंपरा अभी भी जागृत रखा है जागृत रखा है तो वो लोग तो ये नहीं करते ना कि ट्रस्ट बोर्ड से इसका कोई संबंध है नहीं अच्छा तो ये मतलब इसको एक तरीके से आपको रोकना चाहिए कोई काम
00:45:36:14 किसको रोकेंगे नहीं बात ये है ना कि फिर आपके नाम से ऐसा हो रहा है वो निगम ानंद जी के नाम से तो छवि खराब हो गई ना फिर वो सोशल मीडिया में उसमें कोईकोई प्रतिष्ठित लोग लोगों के लोगों के भी हाथ है जिन लोग अपना भाव से इस प्रकार तैयार किया एक ये निगम तत्व में इन्होंने लिखा कि गौतम ऋषि की देह से बुद्ध देव मोहम्मद जी ईशु और गौरांग ये सब गौत वो गौतम ऋषि की देह से उत्पन्न हुए बात में गौतम ऋषि इसी बात में इसी इसी रूप में आकर के जगत में जन कल्याण किए। मोहम्मद भी मोहम्मद ईशु ईसा मसीह हां वो भी मना नहीं कर सकते हमारे जो एक ये एनीबसंत की बात सुने होंगे आप एनीबिसेंट हां वो एडिआर में है ना जो थियोसोफिकल सोसाइटी के फाउंडर उसमें इनके जो गुरुदेव है जोगी गुरु सुमेर दास जी उनको तो बताते हैं वो कई बार क्रिश्चियन पॉप के रूप में भी आए हैं। क्रिश्चियन पॉप के रूप में आए हैं। कौन
00:46:51:20 और गौतम ऋषि नहीं नहीं सुमेरदास जी ने सुमेदा दास जी सुमेरदास जी ने इससे पहले कितना बार क्रिश्चियन धर्मगुरु के रूप में भी आए हैं। वो खुद ये जो औरंगजेब भी थे वो एक शरीर में औरंगजेब हां औरंगजेब वो मुसलमान मुसलमान वो एक शरीर में औरंगजेब भी थे पिथागोरस मैथमेटिशियन जो पिथागोरस है वो थे वो आपके पाइथागोरस हां पाइथागोरस मैथमेटिशियन मैथमेटिशियन वो एक शरीर में वही सुमेरदास जी वही थे हां और सुमेरस पूर्व पूर्व शरीर में तो सुमेरदास जी या फिर गौतम ऋषि पूर्व नहीं मैं बोल रहा हूं जी सुमेर दास जी ने इस शरीर में तो प्रसिद्ध जोगी है और इतना जो सिद्ध महापुरुष है उनका शिष्य थे आनी बसंत और उन्होंने प्रतिष्ठा किए क्या आपके जो मद्रास में थियोसोफिकल सोसाइटी उसी थियोसोफिकल सोसाइटी से बोल रहे हैं वैशांत की गुरु जी जोगी गुरु जो सुमेरदास जी जो निगम देव की भी गुरु जी है अच्छा वो गुरु जी ने इससे पूर्व शरीर में एनी बेसेंट
00:48:06:26 के गुरु सुमेर दास जी जो जो वही सुमेर दास जी इनके भी गुरु हैं गुरु है और एनी बेसेंट ने थियोसफिकल सोसाइटी प्रतिष्ठा की हां उस वहां की एक चैनल में आप भी देख सकते हैं वहां बोल रहे सुमेर दास जी ने इससे पूर्व पूर्व शरीर में कोई बार क्रिश्चियन धर्मगुरु बने और औरंगजेब जी भी बने और वो पाइथागोरस जो मैथमेटिक्स भी बने सुमेर दास जी जो निगमन जी के योगी गुरु थे वो पूर्व शरीर जेब भी बने हैं पूर्व के शरीर में और वो पथागोरस भी बने पाइथागोरस भी बने और वो कितना बार यीशु और मोहम्मद के रूप में भी मोहम्मद ने ई क्रिश्चियन धर्मगुरु भी बने। अच्छा क्रिश्चियन भी वो इसीलिए वो यदि हो सके इसीलिए हमारे महापुरुषों ने बीच-बीच में कोई उसको कहते हैं आवेश अवतार अवतार तो कितना प्रकार के होते हैं ऋषि ने रूप लिया उस ईशु का उसी रूप नहीं ले सकते ले भी सकते उसमें आवेश होते हैं बीच-बीच में हमारे ऋषियों ने अपना तपशक्ति को आश्रय करते हुए जगत की कल्याण के लिए कोई निर्मल पवित्र आधार में आवेश हो जाते हैं। उसको कहते हैं आशा
00:49:22:02 अवतार। इसी दृष्टि से वो बताया। इसमें एक चीज नहीं आती। जैसे पुराण के द्वारा प्रतिपादित होने वाला जो ईश्वर है सिद्धांत है। जो कि मोहम्मद ने बताया है या बाइबल है तो वह तो हमारे सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है। देखिए विपरीत नहीं है। ये हमारे सनातन सिद्धांत है। कुरान में भी वही है। देखिए हमारे सिद्धांत को चुरा करके एक सिद्धांत को वो बोल रहे हैं। सब सब कुछ है। चुरा के कहां? वो तो वही है ना। गौतम ऋषि तो प्रकट हुए। चुराया कहां से? नहीं नहीं। वही बोल रहा हूं। हमारे सनातन सिद्धांत को सनातन सिद्धांत को एक-एक सिद्धांत को उन लोग वो सर्वश्रेष्ठ कह करके बोल रहे हैं। हमारे सेवा भी है समर्पण भी है कि नहीं? हमारे सनातन सिद्धांत में सेवा और समर्पण है कि नहीं? वो तो उन लोग को तो वही नहीं कुर्बान भी कर रहा है जो अंत है निचोड़ है वो तो बिल्कुल विपरीत जैसे भी एक जगह कहा गया है 334 में कहा गया कि यदि तुमने किसी को बहन बेटी मां इत्यादि बोल दिया फिर भी तुम उसके साथ विवाह कर सकते हो कुरान में नहीं वो अलग है मैं उसे वहां नहीं जा रहा हूं तो फिर कुरान में तो कुछ कुछ कुछ है जिसको भी ग्रहणीय नहीं है
00:50:37:03 इस प्रकार कहते हैं तो फिर हम फिर कुरान को क्यों जस्ट वो करना नहीं देखिए देखिए कलुषित हमारे सना ये हमारे हिंदुओं में भी एक कोई परंपरा है जिन लोग गीता की कुछ श्लोक को स्वीकार करते हैं और कुछ अपव्याख्या भी करते हैं अपना अनुकूल में व्याख्या करते हैं उसी प्रकार कुरान के सिद्धांत को भी कुछ कुछ लोग ये क्या-क्या कर रहे हैं हम लोगों का ऐसा पता नहीं है नहीं मगर ये है ना कि कुरान जिन लोगों से हमारे पास तक आई है जैसे परंपरा हम तो उनकी कुरान की जो परंपरा है कुरान में क्या लिखा है यह कुरान वाले ही बता सकते हैं। उनकी जो परंपरा है जैसे हमारे वेदांत में क्या लिखा है वो हम शंकर परंपरा वाले ही बता सकते हैं क्या लिखा है कोई दूसरा आके चैलेंज नहीं कर सकता कि नहीं मुझको ज्यादा पता है आपको कम पता है क्योंकि वो लेके कौन आ रहा है वेदांत परंपरा से लेके आ रहे हैं। ऐसे ही कुरान जो लेके आ रहे हैं वो कुरान वाले लेके आ रहे हैं। कुरान वाले क्लेम कर रहे हैं कि नहीं बोली मुंह बोली बहन से विवाह हो सकता है। हमारे यहां कह रहे हैं रघकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर प्रवचन ना जाए विवाह नहीं हो सकता है तो इस तरीके से गौतम ऋषि के द्वारा मोहम्मद का प्रकट होना ये जो है देखिए ले देखिए ये जो हम लोग एक तरीके से हम लोग नहीं नहीं सुनिए मुसलमान
00:51:52:04 जो इस्लाम है उसको पार्ट बना रहे हैं पार्ट नहीं है नहीं नहीं हम लोगों को कहना है अवतार जो दार्शनिक नहीं नहीं मैं व्यवहार के ऊपर नहीं जा रहा हूं व्यवहार में कोई कैसे शादी ब्याह कर रहे हैं वो वहां नहीं जा रहा हूं। हमारे जो परंपरा है जो दार्शनिक सिद्धांत है जो मैं उसी के ऊपर फोकसिंग कर रहा हूं। हमारे ऋषियों ने भी उसके ऊपर फोकसिंग करते थे। लेकिन ये जो व्यवहार को कैसे वो जो देखिए कुरान में जैसे कह रहे हैं उस कुरान को मानने वाले मैडम लोग भी उसको कहां-कहां भी विरोध करते हैं। हमारे कुरान में है नहीं करके। जिस प्रकार में करते हैं कहां-कहां भी मगर उनके जो ऑथेंटिक वो है ना चैन ऑफ नरेशन वाले वो जो कहेंगे वो मानना पड़ेगा भले ही कोई कुछ भी कहता रहे नहीं देखिए सब कुछ वहां जैसे शंकराचार्य ने क्या कहा जैसे जैसे निगमानंद जी ने क्या कहा वो जो 11 बोर्ड मेंबर्स हैं वो जो कहेंगे मानना पड़ेगा कि निगमानंद जी ने ये कहा कोई और आके चैलेंज नहीं कर सकता क्योंकि वो ऑथेंटिक है उनको ठप्पा लगा के गए कि मैंने जो कहा वो ये बताएंगे तो ऐसे ही कुरान ने जो मोहम्मद ने जो कहा है वो वही बता बताएंगे जो मोहम्मद के बाद की सीरीज में है। सीरीज
00:53:07:18 में देखिए बात में उसको कुछ कुछ भी इधर-उधर किया गया है तो तो हम तो हम यह नहीं कह सकते ना कि कुरान ने ये लिखा हम ये कह सकते हैं हम नहीं मानते। हम कुरान को ही नहीं मानते। मगर कुरान में ये लिखा है जो हम जानते हैं और वो नहीं लिखा है जो वो जानते हैं। वो फिर गलत क्लेम हो जाएगा। आप क्या कह रहे हैं? कुरान को क्या करना? नहीं नहीं मैं बस यह कह रहा हूं थोड़ा सा कि गौतम ऋषि के देह से यह सब उत्पन्न हुए तो इसमें कहीं ना कहीं समाज में एक शंका आ सकती है। बस वो कह रहा हूं। निगम तत्व में एक बात कही है कि अल्लाह का नाम लो या भगवान का नाम लो जिसमें आपकी आस्था लग जाए उसका नाम आपको लेना चाहिए। तो सनातनियों के लिए नहीं है। जो जिस धर्म में ये बोलता रहे आपकी आप तो खींच के किसी को ला नहीं सकते। सनातनी बन जाओ। ये तुम्हारे उसी में उनकी कहना है। तुम्हारे उसमें आस्था है तो उसको ही आश्रय करो। समय आएगा वो भगवान ने तुम खींच करके सही रास्ता पर ले आए। मतलब ये कहा है ना इन्होंने कि अल्लाह का नाम लो या भगवान का जिसमें तुम्हारी आस्था है। इस्लाम लोग तो अल्लाह का नाम लेंगे ही। इस्लाम लोग तो अल्लाह उनकी तो कोई भी इस्लामिक जिसका जिसमें आस्था हो उसका नाम उसका पहले उसको ही आस्था पोषण करो। बाद में जो जरूरत होगा भगवान जी ने करा लेंगे तुमसे।
00:54:23:06 कहना है इस वाले भी यही कहते हैं। इस वाले भी इस जानते हैं आप इस वाले आते हैं कभी-कभी आपके यहां यहां नहीं आते पूरी में आते हैं पूरी भुवनेश्वर में जो आते हैं अनुष्ठान में अनुष्ठान में आते हैं तो वो भी वो भी इसी तरह से प्रचार करते हैं कि भाई अल्लाह और कृष्ण एक हैं तुम अल्लाह को भजे या कृष्ण को भजो अल्लाह कृष्ण है कि नहीं ऐसे कहना नहीं चाहिए तुम्हारी इस्लामियों को कि तुम्हारी अल्लाह में आस्था है उसको भजो बाद में वो भगवान जी ने जो जिसको खींचना है जहां खींच लेंगे जी अच्छा ये निगम तत्व में एक चीज लिखी है मनुस्मृति के आधार पर लिखा है कि अह अगर कोई शूद्र कुल में जन्म लेता है तो बाद में कर्म के अनुसार जो है वो ब्राह्मण भी बन सकता है।
00:55:13:01 वहां कहते हैं जन्मना जायते शद्रम जी अह संस्कारा द्विजो उच्चते वेदाध्याय भवेत विप्र ब्रह्म जानातीति ब्राह्मण ये भी एक मनुस संगीिता में एक श्लोक है उसके आधार पर कहते हैं जिस प्रकार हमारे विश्वामित्र जी ने क्षत्रिय थे क्षत्रिय थे बाद में जिस समय वशिष्ठ के साथ उनका टक्कर हुआ उस समय में वशिष्ठ देव जी की ब्रह्मत से वो प्रतिहत हो गए। इसीलिए बाद में तपस्या करके ब्रह्मसित को प्राप्त किए। तो क्षत्रिय ब्रह्मसित को प्राप्त हो गए। मगर इस ये वाला प्रश्न तो युधिष्ठिर जी ने पूछा था भीष्म जी से कि इसमें वो बताते हैं भीष्म जी कि क्या कहते हैं? ऐसा नहीं है। वो जो उनका जन्म के समय का प्रसंग था ना हम तो उनकी माता ने ब्राह्मणोचित खीर खा ली थी जिसमें ब्राह्मण तत्व था। अच्छा और जो परशुराम जी की माता है उन्होंने क्षत्रियचित खीर खा ली थी। जहां पे क्षत्रिय तत्व का बालक जन्म लेना था वहां ब्राह्मण तत्व का बालक जन्म ले लिया और जहां पे ऋषि द्वारा दिया गया वो था वरदान। तो फिर बाद उनके अंदर तत्व तो जन्म से ही था क्योंकि उन्होंने
00:56:28:02 वो वरदान था। फिर बाद में वो कई बार वशिष्ठ जी के पास गए। परंतु वशिष्ठ जी ने उनको ब्रह्म ऋषि नहीं माना। अंत में उन्होंने बहुत तपस्या की। बहुत तपस्या की। तब ब्रह्मा जी ने आकर के कहा कि तुम ब्रह्म ऋषि हो गए। हो गए। मगर वो जो तत्व था वो जन्म से था उनके अंदर। तो और दूसरी बात यह है कि जैसे मनुस्मृति में यह बताया गया है कि अमुक अमुक अवधि में जैसे इस वाली ऋतु में ब्राह्मण का जनेऊ होना चाहिए। इस ऋतु में क्षत्रिय का जनेऊ होना चाहिए। या फिर इतनी आयु से पहले ब्राह्मण का जने हो जाना चाहिए। इतनी आयु से पहले क्षत्रिय का जने हो जाना चाहिए। यानी कि जनेऊ होने से पहले ही यह तय करना है कि यह ब्राह्मण है कि क्षत्रिय है कि वैश्य के शूद्र है तो फिर जन्म से ही मानना पड़ेगा हम और एक ये चीज आ जाती है कि कौन सा एग्जजेक्टली कर्म होगा जिसके आधार पे ये माना जाए कि हां अब ये ब्राह्मण हो गया ये दिक्कतें आएंगी। अच्छा अब एक एक चीज और है कि क्या आपके कोई यह जो 11 बोर्ड मेंबर्स हैं प्रामाणिक शिष्य निगमानंद जी के इनके अलावा भी और कोई शिष्य हो सकते हैं जो प्रामाणिक हो। मतलब निगमानंद जी की ओर से कौन क्लेम कर सकता है कि निगमानंद
00:57:43:15 जी ने क्या कहा और क्या नहीं कहा? जैसे कोई अभी आप बता रहे हो कि कोई अपने मन से निगमंद देव जी ने जो कुछ किए हम उनकी परंपरा चलने के लिए तो वो विधि व्यवस्था करके गए बोर्ड तैयार करके इन लोग हमारी प्रशासनिक और विधि व्यवसाय विधि व्यवस्था को चलाएंगे 11 इसके बाद में क्या कौन क्या कर रहे हैं मतलब मेन प्रमाणिक यही है यही है इसके बाद जो कुछ करेगा वो कुछ ना कुछ स्वेच्छाचारिता कुछ ना कुछ भ्रष्टाचार 11 में से आप भी मैं पहले था बीच में मैं छोड़ के भारत भ्रमण में चले गए थे। इसीलिए अभी तक फिर दूसरी बार उसमें नहीं गए। अच्छा आपके यहां पे गुरु जी की सभा के निर्देश आएगा तो कब हो सकता है नचे वही तो जो कर रहा हूं। अच्छा आपके यहां पे विदेश यात्रा का क्या निषेध है? कर सकते हैं जा सकते हैं। विदेश यात्रा जा सकते हैं। जाते हैं। जाते हैं। विदेश कर सकते हैं। इस बारे में विदेश यात्रा को उन्होंने स्वीकार किया। निवांत जी उनके समय पे प्रश्न नहीं आया था। विदेश में हम लोग हमारे जो मान लीजिए उनके समय एक मिनट जब मान लीजिए उनके समय पे नहीं आया तो फिर हमें देखना पड़ेगा कि उनके गुरु ने क्या कहा अब उनके गुरु हैं सच्चिदानंद जी शंकर परंपरा वो तो कह रहे हैं कि विदेश यात्रा
00:58:59:20 द्विजों को नहीं करनी चाहिए नहीं करना चाहिए है ना तो फिर हम लोग क्या माने कि करनी चाहिए कि नहीं करनी चाहिए अकॉर्डिंग टू निगम इसके ऊपर तो वो कुछ कहा नहीं लेकिन हमारे जो भक्त लोग कुछ है लोग विदेश में रह रहे हैं। वहां विदेश में हमारे जो सारसत संघ है ना वो संगठन बना के भी वहां पूजा पाठ कर रहे हैं। मतलब विदेश यात्रा अलाउ है निगमानंद जी के अकॉर्डिंग अकॉर्डिंग उनके अकॉर्डिंग वो तो कुछ कहा नहीं बात में कोई तो फिर आपको प्रामाणिक कैसे माना जाएगा फिर जब निगमानंद जी के गुरु जो कह रहे हैं वो आप 11 लोग नहीं कर रहे हैं। मान लीजिए या तो यह मानना पड़ेगा निगमानंद जी ने थोड़ी बहुत अपने से अलऊ किया हम और अगर आप नहीं निगमंद जी को नहीं मान रहे मान लीजिए निगमानंद जी ने इसमें मौन है और उनके गुरु कह रहे हैं विदेश यात्रा नहीं तो फिर आप लोग कर रहे हैं तो फिर आपकी ऑथेंटिसिटी पे सवाल आ जाएगा क्या अपने मन से अपने मन से देखिए देखिए अभी निगम देव जी ने जहां पहले मठाश्रम की सूचना की वो तो अभी बंगाल बांग्लादेश में हो गए हम वहां लाखों भगत हैं हम बांग्लादेश नहीं बांग्लादेश की नहीं बात कर समुद्र पार की जो विदेश यात्रा भाई ऐसे तो अपना अखंड भारत का जो नक्शा है उसमें तो बांग्लादेश वगैरह सब आ जाता है
01:00:14:24 आ जाता है वो जो विदेश यात्रा है समुद्र पार करके जापान यूएसए यूएसए सब जिनको मलेच्छ भूमि कहा गया तो वहां उसके विधि निषेध की बात कर रहा हूं उसके पर हमारे कोई अभी तक ठीक है एक चीज और है क्या कोई श्री अमृतानंद सरस्वती जी भी शिष्य हैं क्या निगमानंद जी अमृतानंद सरस्वती आपने डायरेक्ट निगानंद जी से लिया बात नहीं उनके शिष्य से उनके शिष्य के शिष्य हैं तो कोई अमृतानंद सरस्वती जी भी हैं शिष्य नहीं तो प्रामाणिक शिष्य अच्छा क्योंकि कोई अच्छा एक चीज और है आपके पास ज्ञान कई जगह से आया है क्योंकि निगमंद जी की कई परंपराएं हो गई एक बाबा के कृपाल जी की हो गई एक वो सुमेरु सुमेर दास जी की हुई और वेदांत की परंपरा शंकराचार्य जी की हो तो यह माना जाएगा गौरिमा भी है बाप की परंपरा बाप शादी का बाप शादी का क्या है गौरिमा है ना गौरिमा जहां जाकर के जो निर्विकल्प समाधि में जिसको अनुभव किए वहां कौन गुरु थे गुरु थे गौरिमा बताया ना गौरी हां प्रति बताया अच्छा वो इनकी गुरु थी एक चौथा गुरु थे मतलब महिला इनकी गुरु एक बाप उनसे कोई नहीं मार्गदर्शन
01:01:30:26 हां वो जिस समय अन्नपूर्णा जी ने बताया तुम अभी भी अपूर्ण है निर्विकल्प समाधि में जो परतत्व को साक्षात्कार किए वही तत्व यहां कण-कण में है। उसको भी अनुभव करना है। इसीलिए वो पहले जो गुरु मां जो सच्चिदानंद जी के साथ गए थे गौरी मां के आश्रम गौरी मां जी ने वहां बताए थे कि उसका निर्विकल्प समाधि हो जाने से मुझे भेज देना। अच्छा उसको याद करते हुए वहां चले गए और वहां उनके संस्पर्श में आते हुए वो 250 साल की उम्र वाली थी वो माने 250 साल उम्र वाली और वहां से उनके संस्पर्श में आते हुए वो उनका संस्पर्श में आते हुए उनका दृष्टि खुल गई जिसको मैंने वहां दर्शन किए थे वो यहां भी तो एक बात तो माननी पड़ेगी ना कि आपकी जो वैदिक परंपरा है वो वैदिक परंपरा आपकी शंकराचार्य से ही आई है वेदांत क्योंकि वो तो तंत्रोक्त हो गई वो वाली है ना तो वेदांत की परंपरा आपकी शंकराचार्य से ही आई है। यानी कि जो सिद्धांत हैं या जो भी ग्रंथ इत्यादि है वो शंकर परंपरा से ही आ रहे हैं। तो अब क्या हो रहा है कि क्या यह माना जा सकता है कि शंकर शंकराचार्य परंपरा ने जो आज के जो वर्तमान जगतगुरु
01:02:45:27 शंकराचार्य होते हैं वो कोई सिद्धांत बता दें कि ऐसा-सा हमारे ग्रंथ में लिखा है। परंतु कोई अपने आप को निगमानंद जी का शिष्य कहते हुए यह कहे कि नहीं नहीं यहां पर शंकराचार्य गलत बोल रहे हैं। वैदिक उसमें वैदिक ग्रंथावली में तो क्या उसका मान्य होगा? जैसे कि मेरे गुरु ने मुझको मंत्र वेद के मंत्र भी दिए हम और उसका अर्थ भी दिया। हम अब मैं अगर कहूं कि मुझे तुम्हारे मंत्र पे तो विश्वास है कि ये भगवान का मंत्र है। हम वेदों भगवान का दिया हुआ ज्ञान है। मगर अर्थ मैं अपना निकालूंगा। तो इसका मतलब जब मैं मुझे अगर उसके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो मुझे उसके मंत्र पर भी विश्वास नहीं है। क्योंकि मुझे उसकी क्रेडिबिलिटी पर विश्वास नहीं है ना और यदि मुझे उसके मंत्र पर विश्वास है तो मुझे उसके अर्थ पे भी विश्वास होना चाहिए। मैं अगर अपने आप को निगमानंद परंपरा से कह रहा हूं और निगमानंद जी शंकर परंपरा से वेदांत पढ़ते हैं पढ़ाते हैं। तो हम शंकर परंपरा के जो मान्य आचार्य हैं शंकराचार्य उनका विरोध हम नहीं कर सकते। करेंगे तो हम निगमानंद परंपरा के सिद्ध नहीं होंगे और यदि निगमानंद जी कर देते तो वो शंकराचार्य परंपरा के सिद्ध नहीं होते। है तो ये थोड़ा सा मैं आपसे कहूंगा कि जो श्री अमृतानंद सरस्वती जी हैं स्वामी अमृतानंद सरस्वती जी
01:04:01:06 उनके नाम से एक दुष्प्रचार किया जा रहा है। थोड़ा सा आप इस पर अगर हो सके तो पता करिएगा कि उनके आश्रम कहां वो शायद अपने आप को बोर का बताया गया है। उन्होंने तो पूछा गया उस व्यक्ति से कि भाई तुम्हारे वो जो जिनका तुम गुरु का नाम ले रहे हो वो कहां है? पहले तो बताया कि मैं बताऊंगा ही नहीं। फिर धीरे-धीरे थोड़ा सा उसने बताया कि स्वामी अमृतानंद सरस्वती जी बोर में है। नहीं नहीं वैसे कोई हमारे बेंगलुरु में भी कोई सन्यास आश्रम है नहीं हम और कोई क्या कर रहे हैं वह अपना बिजनेस चलाने के लिए कोई कोई भी इस प्रकार मतलब निगमंद जी का कोई प्रामाणिक शिष्य नहीं है नहीं बिल्कुल स्वामी अमृतानंद सरस्वती के नाम से है ना शिष्य है तो वो बताना चाहिए किनसे लिया प्रामाणिक मतलब उत्तराधिकारी देखिए शंकराचार्य के हम भी शिष्य हैं हमारी जो ट्रस्ट परंपरा में वो बिल्कुल जुड़े हुए हैं हां तो निगमानंद जी का कोई प्रामाणिक शिष्य नहीं है अमृतानंद सरस्वती जी नाम है ना चलिए जैसे कहिए उड़ीसा में भी कई कई बहुत प्रतिष्ठित हो गए लेकिन कोई हमारे जो परंपरा के पारंपरिक में भी है नहीं अपना को खुद निगम को चीज को मानते हैं चलाते हैं क्या कर सकते हैं आज तो ठीक है आपने काफी सारा समय दे दिया बहुत सारी चीजें आप और आपको भी अच्छा लगा होगा ये सारा
01:05:16:07 वर्तमान सुन के जी जी और आप आए तो यहां पर आ सकते हैं यहां देख सकते हैं और निगमानंद जी का विग्रह भी स्थापित होता है यहां पर। तो उनका भी दर्शन कर सकते हैं और उनमें अपने ईस्ट का दर्शन कर सकते हैं या फिर अपने ईस्ट में अपने निगमानंद जी का दर्शन कर सकते हैं। ठीक है सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। [संगीत]
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निगमानंद मठ : भागवतानंद और एनी बेसेंट का क्या संबंध है?
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