⬜ Not used yet · 00:00:01:16 – 00:16:04:00 (16:02)
00:00:01:16 [संगीत] तुम [संगीत] अब दो चीजें रह गई हैं जो यह उत्तर लिखने के बाद हमें प्राप्त हुई थी। वह भी हम बता देते हैं। और फिर जो केवल कोर्ट के दृष्टिकोण से हमने क्या जवाब दिया उस पर हम एक वीडियो अलग से बना देंगे। अब आते हैं भागवतानंद को प्रामाणिक कहने वाले जो कोई कोल आचार्य हैं। उन्होंने कहा है कि हम इनको प्रामाणिक कहते हैं या नियुक्त करते हैं कॉल संप्रदाय में शाक्य संप्रदाय में। ठीक है? तो इसमें सबसे पहली बात तो यह आ जाती है कि भैया आपने जो हमको यह पत्र प्रदान किया है कि यह किसी कोलाचार्य का है यह कोलाचार्य का नाम क्या है? इन तक कैसे पत्राचार किया जा सकता है? इनका पता क्या है? कहां रहते हैं? इनका फोन नंबर क्या है? यह सब कौन बताएगा?
00:01:19:03 हां कि बस उठाया मुंह और लिख दिया एक संस्कृत में। बस ये देखो हमको नियुक्ति पत्र मिल गया। कौन है? कहां रहते हैं? बताओ ना। उसको सार्वजनिक करो ना। यह कैसा पत्र जिसमें लिखने वाले का कोई जान लिखने वाले की कोई जानकारी स्पष्ट नहीं हो रही है। डर लगता है ना? शंकर के सैनिकों से डर लगता है ना? शिवश नारायण द्विवेदी से डर लगता है ना? राम के भक्तों से डर लगता है ना? इसलिए लिखवाते समय कह दिया होगा अपना वो मत लिखना। कहां रहते हो? फोन नंबर क्या है? हां। नहीं तो वो झूठे की हद तक और चोर के घर तक जाता है। हां पहली बात तो ये है। और दूसरी बात यह है कि कुछ अगर वो मुझे नहीं ज्ञात है कि पत्र कहां से आया है। मगर यदि आया हो वह प्रामाणिक आचार्य हैं। तो उनको बिल्कुल यथोचित उनका अभिवादन उनका उनका सम्मान और उनसे कुछ प्रश्न सम्मान पूर्वक। क्या
00:02:23:20 सबसे पहले तो वही बात है कि भैया इस पत्र के साथ कोई ऐसी जानकारी क्यों नहीं दी गई है जिससे कि हम पता लगा सके कौन कोलाचार्य हैं कहां के हैं क्या लिखते हैं आप देखिए शंकर शंकर मठ से श्रीमठ से निकलने वाले किसी पत्र को देखिए उसमें वहां का संपर्क सूत्र तक होता है एड्रेस के साथ-साथ कहां है इसमें एड्रेस संपर्क सूत्र प्रेम प्रेम पत्र है क्या कोई लेकिन उन्हीं का आदेश है कि उनके विषय में ज्यादा मैं चर्चा ना करूं अभी तो नाम तो कर सकते स्वामी श्री अमतानंद सरस्वती जी हां तो उन्होंने कहा कि मैं हाईलाइट नहीं होना चाहता हूं बस यही उनकी इच्छा है बाकी वो कहां है कैसे हैं ये सब अवगत है आपको व्यक्त बता दूंगा
00:03:09:23 [संगीत] जो अनाधिकृत रूप से दो लोगों में लिया दिया जा रहा है इसमें भी चोरी तो ऐसे पत्र को प्रामाणिक क्यों माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। अब आगे चलते हैं। अब सम्मान पूर्वक कोलाचार्य से कुछ प्रश्न है जिन्होंने इनको प्रामाणिक कहा है। कौलाचार्य ने निग्रह संप्रदाय को पहली बात तो यह कंफ्यूजन है कि उन्होंने उसको अपने ही संप्रदाय के अंतर्गत प्रामाणिक कहा है या फिर स्वतंत्र रूप से प्रामाणिक कहा है। तो अगर स्वतंत्र रूप से कहा है तो क्या है? कौलाचार्य ने निग्रह संप्रदाय को स्वतंत्र रूप से प्रामाणिक घोषित करते हुए उसमें भगवतानंद को नियुक्त किया है। अथवा वह स्वयं कोल संप्रदाय में नियुक्त है। एवं उसी परंपरा के अंतर्गत ही निग्रह संप्रदाय को एक उप संप्रदाय के रूप में स्वीकार करते हुए भागवत उनको निग्रचार्य के रूप में स्वीकार किया है। तो ये प्रश्न है पहला क्या है? इसमें से स्वतंत्र कहा है वह निग्रचार्य है या आपकी गुरु परंपरा में ही वह है। यदि ऐसा है तो आगे का प्रश्न सुनो। क्या भागवतानंद के द्वारा दी गई अव्यक्ता द्वैत की व्याख्या उसको नियुक्त करने वाले
00:04:24:24 कोलाचार्य की परंपरा से प्राप्त सिद्धांतों के समान है। यदि तात्विक विवेचना समान है तो स्वतंत्र रूप से निग्रह संप्रदाय किस प्रकार माना जाएगा? तो स्वतंत्र तो नहीं हुआ। फिर वो कोलाचार्य हुआ। फिर वह कोल संप्रदाय का कोलाचार्य हुआ। हां उसके बाद अगर उनकी पुष्टि हो जाती है वह संप्रदाय के बारे में जो जो उसने खिचड़ी पकाई है वो पकने के बाद तो अवश्य माना जा सकता है कि आपके सिद्ध उसके अंतर्गत जो है फिर भी वो अस्तित्व तो खंडन होगा ही मगर एक बार के लिए आपकी बात को रखा जा सकता है। तो पहले तो स्पष्ट करें कि वो स्वतंत्र रूप से निग्रचार्य आपने कहा है उसे या अपने संप्रदाय के अंतर्गत कहा है। अंतर्गत कहा है तो क्या उसकी व्याख्या आपकी व्याख्या सेम है जैसा कि हमने पहले पूछा है ना संशयों को दूर करें गुरु वही जो संशय को दूर कर दे गु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला दूर करें इन संशयों को अपनी जानकारी दीजिए जिससे कि ट्रेन का टिकट कटा के वहां तक आया जा सके मिला जा सके सवाल पूछे जा सके हम तो नहीं है ना डरने वाले भागवतानंद डरने वाला है हम डरने वाले नहीं है ना हम तो पूछे पूछेंगे ना प्रश्न प्रश्न पूछ लेंगे आकर के जो जो बातें कही गई हां यदि
00:05:40:04 तात्विक विवेचना आपके विपरीत है तो वह भागवतानंद द्वारा प्रतिवादित निग्रह संप्रदाय को प्रामाणिक कहकर क्या आप अपनी परंपरा के अगर अगर सही अगर आपकी आपसे मैच खाती है तो आपके अंतर्गत हो गया वो कालाचार्य होते हुए निग्रचार्य होगा और अगर आपके विपरीत है तो क्या आप अपनी परंपरा का जो तात्विक विवेचना है उसको नहीं मानते प्रामाणिक उसकी उसको प्रामाणिक मानते हैं यह प्रश्न आ जाएगा यदि किसी व्यक्ति कोल संप्रदाय के आचार्य द्वारा प्रामाणिक घोषित किया जाएगा तो वह कोल संप्रदाय का ही आचार्य कहलाएगा। वह स्वयं कोल संप्रदाय एवं उसके आचार्यों का भी निग्रह करने वाले के रूप में किसी स्वतंत्र संप्रदाय से जैसे निग्रह संप्रदाय इत्यादि का आचार्य किस आधार पर कहलाएगा? यह भी प्रश्न बनता है। भाई वह तो निग्रह करने निकला है। आपने उसका निग्रह किया। आपने उसके निग्रह के प्रति अधीनता को स्वीकार कर लिया है क्या?
00:06:37:15 हां यह भी प्रश्न आएगा और दूसरा दूसरी बात यह आएगी कि यदि आपने उसे घोषित किया है कि तू भाई हमारे परंपरा के अंतर्गत है तो फिर आप उसका निग्रह करोगे ना वो कहां से निग्रह करने वाला हो गया आपके धर्म और ब्रह्म की व्याख्या में वो हस्तक्षेप करेगा यह सही है यह गलत है क्या वो आपके विपरीत जाएगा और विपरीत जाने पर क्या आप उसको स्वीकार करोगे उसके प्रति नतमस्तक होगे और यदि उसके प्रति नतमस्तक होगे तो यह सिद्ध होगा कि आप उसके गुरु नहीं वह आपका गुरु है। ऐसे में आपके द्वारा प्रमाणिक कहे जाने को किस आधार पर सही मान लिया जाए। प्रामाणिकता के लिए आपका शब्द प्रमाण और धर्म ब्रह्म की व्याख्या के लिए उसका शब्द प्रमाण। वो भी तब जब आप मान लो। मुझे नहीं लगता कि आप मानोगे। उसकी आधीनता स्वीकार करोगे। निग्रह की वो निग्रह करने निकला है ना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ही निग्रह है। यह निग्रह ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है जो उसने कह दिया। ये उसको कभी प्रामाणिक सिद्ध नहीं कर करने होने देगा। निग्रह
00:07:45:03 उसका सबसे बड़ा ड्रॉबक भागवतानंद का निग्रह है। निग्रह है। किसी के द्वारा प्रामाणिक नहीं हो पाएगा वो। क्योंकि वह सबको प्रामाणिक वो सब क्योंकि वह सबका निग्रह करने निकला है ना तो भागवतानंद की सबसे बड़ी कमजोरी उसका निग्रह है जिसके कारण वो किसी भी प्रामाणिक आचार्य के द्वारा प्रामाणिक सिद्ध नहीं हो सकता। क्यों? क्योंकि वह निग्रह करेगा उसका भी जो उसको प्रामाणिक कहेगा और निग्रह करने की स्थिति होने बनी रहने के कारण जो आपको प्रामाणिक कह रहा है उसमें प्रमाण्य बुद्धि सिद्ध नहीं होगी। जब प्रमाण्य बुद्धि सिद्ध नहीं होगी तो उसके द्वारा प्रामाणिक कहे जाने पर आप भी प्रामाणिक सिद्ध नहीं होगे। समझ रहे हो ना? घूमो चक्कर खाओ इसी में निग्रह में करो निग्रह [संगीत] तो मैं दोबारा से आचार्य जी के पास आता हूं जिन्होंने यह पत्र जारी किया है। यदि निग्रह संप्रदाय एक स्वतंत्र संप्रदाय है तो क्या किसी भी संप्रदाय के आचार्य किसी भी अन्य संप्रदाय में किसी भी व्यक्ति को प्रामाणिक रूप से घोषित कर सकते हैं? यदि किसी आचार्य के द्वारा किसी व्यक्ति को किसी संप्रदाय
00:09:00:19 में प्रामाणिक रूप से नियुक्त किए जाने की बात को स्वीकार कर लिया जाना उचित है तो क्या शंकराचार्य भी श्री संप्रदाय में किसी को प्रामाणिक रूप से नियुक्त कर सकते हैं क्या वो कोला कॉल संप्रदाय में किसी को नियुक्त कर सकते हैं फिर नियुक्त कर सकते हैं तो क्या किसी को बहिष्कृत भी कर सकते हैं ये पूछा जाएगा पूछा जाएगा ना यदि कोई भी मुंह उठाकर के कहीं भी करने लगेगा तो फिर भैया शंकराचार्य भी करेंगे हां शंकराचार्य तो मना कर रहे हैं। निग्राचार्य केवल ईश्वर हो सकते हैं और सही है। तार्किक रूप से वो बात बिल्कुल हो ही नहीं सकता कोई एक व्यक्ति निग्रह करने वाला सारे संप्रदायों को। [संगीत]
00:09:41:20 अब तुम अब अब ये गालीबाज अपने आप को ईश्वर सिद्ध करने में लग जाएगा। थोड़े दिन बाद पर साधना और कालिया जिंदगी की साधना से शक्तियां प्राप्त करके। खैर यदि अमुक कोलाचार्य निग्रह संप्रदाय कोल संप्रदाय का ही अंग मानते हैं तो वह कोलाचार्य होते हुए निग्रचार्य कहलाएगा स्वतंत्र रूप से निग्रचार किस आधार पर कहा जाएगा क्या कोल संप्रदाय के आचार्य जिनोपासना और परिसाधना के समर्थक हैं क्योंकि यह व्यक्ति कर्ता करवाता है यदि कोई व्यक्ति स्वयं को एक स्वतंत्र संप्रदाय या गुरु परंपरा के रूप में स्थापित करता है तो उसके पास स्वतंत्र स्वतंत्र रूप से वेदों अथवा उपनिषदों के भाष्य होने चाहिए। जैसा कि पहले भी बात हुई यदि किसी के पास स्वतंत्र रूप से तत्व विवेचना वाला शास्त्र उपलब्ध भी है स्वतंत्र जैसे इसका परमाक्षर सूत्र तब भी यह देखना आवश्यक होगा कि वह शास्त्र वेद उपनिषद इत्यादि के साथ सामंजस्य रखता है या नहीं। ऐसे में भी वेद उपनिषदों के परंपरा प्राप्त भाष्य होना महत्वपूर्ण हो जाता है। अथवा जिस परंपरा के वेद उपनिषदों के भाष्यों से उस अमुक स्वतंत्र शास्त्र का सत्यापन किया जाएगा। उस शास्त्र एवं उसके आधार पर स्वयं को स्थापित करने वाले व्यक्ति को इस अमुक परंपरा का माना जाएगा। जिस अमुक परंपरा के भाष्यादियों
00:10:56:24 के द्वारा उसने अपने अमुक शास्त्र को सत्यापित किया गया है। सरल भाषा में कहें तो यदि किसी व्यक्ति की अपनी वैदिक परंपरा नहीं है तो उसे वेदों, उपनिषदों और अन्य वैदिक ग्रंथों की व्याख्या के लिए अन्य परंपरा पर निर्भर रहना होगा। ऐसे में वह स्वयं को स्वतंत्र रूप से वैदिक परंपरा का आचार्य किस आधार पर कह सकता है? है ना? यह भी प्रश्न बनेगा। यह आपसे भी प्रश्न है। भागवतानंद के द्वारा के कई विषयों में सांकर परंपरा का विरोध होने के कारण उसे सांकर परंपरा का प्रामाणिक आचार्य भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में कोल संप्रदाय के आचार्य को यह बताना होगा कि उन्होंने भागवतानंद को किस वैदिक संप्रदाय के अंतर्गत प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया है। हम अपने में किया है, स्वतंत्र निग्रह में किया है या फिर जिनका यह वेद भाष इत्यादि उपयोग में ले रहा है। उनके में किया है। भागवतानंद के द्वारा क्या कॉल संप्रदाय के आचार्य को निग्रह संप्रदाय का बोध भागवतानंद द्वारा बताए जाने से पूर्व से था? यदि हां तो किस परंपरा अथवा किन आचार्यों द्वारा उन्हें इसका ज्ञान कराया गया। यदि नहीं तो किस आधार पर उन्होंने निग्रह संप्रदाय को प्रामाणिक रूप से उस रूप में स्वीकार किया है जिस रूप में भागवतानंद द्वारा अन्य सभी संप्रदायों
00:12:11:27 का निग्रह करने वाला होते हुए निग्रह संप्रदाय का स्वरूप बताया जाता है। यदि भागवतानंद के अनुसार निग्रह संप्रदाय का कार्य सभी संप्रदायों पर शासन करना है तो यह जानना आवश्यक है कि क्या कोल संप्रदाय के उक्त आचार्य जो निग्रह संप्रदाय एवं भागवतानंद को निग्रह संप्रदाय के प्रामाणिक आचार्य के रूप में स्वीकार करते हैं। उन्होंने निग्रह संप्रदाय की अधीनता अथवा निग्रहचार्य को अपना नियंत्रक स्वीकार कर लिया है। क्या आप मानते हैं आप उसके अधीन हो? जो मैंने पूछा पहले क्या वह स्वीकार करते हैं निग्रचार्य के रूप में भागवतानंद उनका भी आपका भी निग्रह कर सकता है निग्रह संप्रदाय के अनुसार सिद्धांत अनुसार शास्त्रार्थ अथवा युद्ध द्वारा अद्वैत अथवा अव्यक्ता द्वैत के सिद्धांत को ना मानने वाले सभी संप्रदायों का निग्रह ना करके अपितु उनके साथ मित्रता पूर्ण व्यवहार करने वाले भागवतानंद को उसी के अनुसार बताए गए निग्रह संप्रदाय के स्वरूप से भागवतानंद की ठीक विपरीत स्थिति होते हुए भी भागवतानंद को निग्रह संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य किस आधार पर स्वीकार किया गया है? यह सारे प्रश्न आचार्य श्री से चल रहे हैं जो कौल संप्रदाय के आचार्य हैं। ऐसा सुनने
00:13:27:03 में आता है। भागवतानंद द्वारा अनेक बार उनकी उसकी जीवा से असत्य भाषण हो जाने को वाकलन कहते हुए स्वीकार किया गया है। जबकि भागवतानंद के अनुसार उसकी कर्म इंद्रियों द्वारा किसी भी प्रकार से अनुचित कर्म ना होने का वरदान उसे मां भगवती से प्राप्त है। ऐसे में मां भगवती का वरदान झूठा सिद्ध हो जाता है। एवं इस प्रकार भगवती द्वारा निग्रह संप्रदाय का बोध और आचार्य के रूप में नियुक्ति भी संदिग्ध हो जाती है। ऐसे में कोलाचार्य द्वारा इस बात को प्रमाणिक कहना किस प्रकार से उचित माना जाए
00:14:02:04 भागवतंद स्वयं को शाक्त बताता है और आप भी कोलाचार्य हैं। क्या आप भी पंच देवसना करते करवाते हैं? क्या आप अच्छा शाक्त होता कौन है? जो सर्वोच्च रूप में शक्ति को देखे। कम से कम उनके मंत्र तो ना देना आगे। कार्य कर रहे हो स्मारतों वाले और कह रहे हो अपने आप को सात। आप यह बताएंगे कि आप कौन से मंत्र दीक्षा लेने आए हैं। जैसे विष्णु भगवान, दुर्गा मैया, शिव जी, हनुमान जी, सूर्यदेव, गणपति भगवान, कुमार कार्तिकेय ये सब जो भी शास्त्रक्त देवता है उन देवता का आप नाम लिख देंगे। क्या कर रहे हैं आप? आप पंच देवोपासना के मंत्र दे रहे हैं। ये इस समय आचार्य श्री से बात नहीं हो रही। क्या कर रहा है व्यक्ति? भागवतानंद कहने को कौलाचार्य ने कह दिया कि भैया प्रामाणिक है या इसने कह दिया मैं सा हूं तो कहने को यह साक्त है। मगर मंत्र दे रहा पंचदेव उपासना के। कैसा साक्त है भाई? यदि कोई अपने आप को वैष्णव कहेगा यदि वह सब में एकत्व भी देखता होगा तब भी मंत्र तो वह वैष्णव विष्णु का ही देगा ना
00:15:18:28 तो इसकी विवेचना कैसे करोगे यह सा है या स्मार्थ है पहले तय कर लीजिए यदि ये स्मार्थ है तो इसकी गुरु परंपरा क्या है स्मार्थ का इसका अध्ययन कहां से है वो सब देखना पड़ेगा क्या आपके यहां स्मार्थ का अध्ययन है या साक्त का अध्ययन है ये देखना पड़ेगा बहुत सारी सारी चीजें हम उसका वर्णन करेंगे। अगर तुमको इसका प्रमाण नहीं मानना है तो अपनी कंबल तानो। सो जाओ। तुम्हारे लिए हम थोड़े बना रहे हैं ये सब बातें। [संगीत] आ
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कौलाचार्य का प्रमाण पत्र @SwamiNigrahacharya गुरु परंपरा क्या है | The Nigrah Nikasika Chapter 5
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