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00:00:01:16 [संगीत] तुम [संगीत] ये एक शक्ति संगम तंत्र ये दो ये तीन ये चार शक्ति संगम तंत्र शक्ति संगम तंत्र शक्ति संगम तंत्र जैसे और कोई पहुंच ही नहीं सकता वहां तक शक्ति संगम तंत्र क्या सोचा था पहुंचेंगे नहीं तो पिछले भाग में आपने देख लिया होगा जो 11 प्रकार के दावे इसने अपनी प्रामाणिकता के लिए अलग-अलग जगहों पर ठूसे हैं उसको हमने संकलित किया है। एक तरीके से जो निग्रह प्रवेशिका यह आज तक मेरे करण अर्जुन आएंगे।
00:01:16:24 मेरे करण अर्जुन आएंगे। के नाम पर जो यह निग्रह प्रवेशिका आएगी। निग्रह प्रवेशिका आएगी। जो ये ढिंढोरा पीटता रहता है। लोगों को बरगलाता रहता है। है ना कि इंतजार में रहे सब के सब। तो इसने तो वो निग्रह प्रवेशिका नहीं दी। मगर इसके जो तथाकथित प्रामाणिक होने के जो इसके दावे दावे थे ना जो क्लेम्स करता था जो यह वो सब प्रकार के क्लेम्स को हमने संकलित किया है। संकलित करके आपको पिछला भाग ना देखा हो तो उसमें हमने बताया भी है। इसने अपनी प्रमाणिकता के लिए क्या-क्या कहा है। अब इसके सभी जितने भी प्रकार के इसने अपने दावे कर रखे हैं उनकी मीमांसा करेंगे और चीथड़े उड़ाएंगे। हर एक दावे का सबसे पहले बात करते हैं और शक्ति संगम तंत्र में और भी ऐसी चीजें लिखी है जो इस व्यक्ति ने आपको नहीं बताई जिसका उल्लेख ये निग्रह निकासिका में आपको मिलेगा निग्रह निकासिका में इसने बहुत सी चीजें आपको नहीं बताई है ना शक्ति संगम तंत्र के बारे में और क्या-क्या लिखा है ना तो आज जिस आधार पर अपना डमरू बजा जाता था शक्ति संगम
00:02:32:04 तंत्र शक्ति संगम तंत्र शक्ति शक्ति संगम तंत्र उसी आधार पर इसकी प्रामाणिकता के चीड़े उड़ाएंगे जो प्रमाणिक बना फिरता है स्वगोषित आचार्य और हां यह पूरी की पूरी जो ये आप निग्रह निकासिका सुन रहे हैं पढ़ रहे हैं इस पूरी निग्रह निकासिका का जो एक स्लोगन है वो स्लोगन पता है क्या है वो है क्योंकि भागवतानंद ने कहा है निग्रह प्रवेशिका का भी निचोड़ यही है। इसके द्वारा कही जाने वाली हर बात का निचोड़ यही है। जो भी बात इसने परंपरा प्राप्त आचार्यों के विरुद्ध जाकर के स्वतंत्र रूप से कही है उस हर बात का निचोड़ यही है कि उसको क्यों माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। ठीक है? तो ये सारी जो विवेचना है वो आकर के प्रत्येक बार जब उसका अंत होगा तो इसी वचन के साथ उसका अंत होगा कि यह क्यों माना जाए? क्योंकि भागवत आनंद ने कहा है। चलिए तो सबसे पहला आता है बिंदु कि इसने जो 11 प्रकार के दावे किए हैं और उसमें जो हमने खंडात्मक तरीके से व्यवस्थित किया है कि पहला खंड जिसमें कि निग्रह संप्रदाय की स्पष्टता
00:03:47:08 कि वह एक संप्रदाय है कि नहीं उस पर प्रकाश डाला जाए। फिर उसके साथ इसका संबंध है कि नहीं इस पर प्रकाश डाला जाए और यह प्रमाणिक है कि नहीं इस पर प्रकाश डाला जाए और फिर इसने जो अपने आचार्यत्व के लिए मां भगवती का आलंबन मां भगवती के वरदान मां भगवती के कपोल कल्पित वरदान का जो आलंबन लिया है पर साधना के रूप को बदल करके और या फिर जो शास्त्रों के उन वचनों का आलंबन लिया है। यह देख लो आचरण क्योंकि आचरण मुझ में है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मैं जो है प्रामाणिक आचार्य हूं। भगवत गीता में एक जगह पर लिखा हुआ है कि जो भी व्यक्ति उल्टे वृक्ष की रूप में संसार की व्याख्या कर देगा। उल्टे वृक्ष के रूप में ठीक ठीक व्याख्या कर देगा। वह व्यक्ति तत्वदर्शी होगा। वह व्यक्ति वेदों का ज्ञाता होगा। अब इस एक बात को लेकर के उड़ते तोते की तरह फिरते हैं कौन? रामपाल एंड सनंस। और जब वह उड़ते फिरते हैं तो जो उनके द्वारा कुंठित मानसिकता वाले होते हैं उनके द्वारा
00:05:02:09 जो ब्रेन वाश लोग होते हैं वो यह सोचना भूल जाते हैं कि रामपाल ने अगर किसी की देखा देखी और गीता में पड़ने के बाद ही क्यों ना सही उल्टे वृक्ष की व्याख्या के रूप में बात कह दी तो बस उसे प्रामाणिक मान लिया जाए। भले ही वह सन्यास आश्रम में हो या ना हो। भले ही उसने परंपरा से ज्ञान प्राप्त किया हो या ना किया हो। भले ही वो श्रुति स्मृति के समस्त शास्त्र जो है उनमें सामंजस्य की शिक्षा ना देता हो। भले ही वो अपने शिष्य का अंधकार दूर ना कर पाता हो। बस क्योंकि उसने उल्टे पेड़ की व्याख्या के रूप में संसार की उल्टे पेड़ के रूप में संसार की व्याख्या कर दी तो वो हो गया तत्वदर्शी और सारे लक्षण गौण हो गए। चलिए तो सबसे पहली बात है कि यह क्यों माना जाए कि भागवतानंद पर मां भगवती प्रसन्न है। जिस कारण से भागवतानंद को निग्रहचार्य का पद प्राप्त हुआ मां भगवती के द्वारा। यह सारी घटना का साक्षी कौन है? क्या साक्ष्य है? क्या प्रमाण है? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। इसलिए मान लो यह क्यों ना माना जाए। अगला अगला
00:06:17:10 बिंदु क्या है? यह क्यों ना माना जाए कि षड्यंत्र पूर्वक शक्ति संगम तंत्र नामक ग्रंथ में निग्रह आगम का नाम पूर्व से ही संज्ञान में होने पर भी भागवतानंद द्वारा उक्त संप्रदाय का बोध भगवती द्वारा कराए जाने की चमत्कारिक कहानी गढ़ी गई है। यह क्यों ना माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। हां भैया भागवतानंद इस द ग्रेट। उसने कहा है भाई वो शब्द प्रमाण है ना हमारा। अच्छा यदि शास्त्र में निग्रह नामक आगम का संदर्भ प्राप्त होता भी है तो भागवतानंद को ही उस संप्रदाय का प्रामाणिक उत्तराधिकारी मानने के समर्थन में क्या प्रमाण है? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है हां शक्ति संगम तंत्र सहित अनेकानेक शास्त्रों में कई ऐसी परंपराओं का अथवा भगवान के अनेक ऐसे अवतारों का संदर्भ दिया गया है जो कब कहां कैसे उत्पन्न अथवा लुप्त हुए इन विषयों में कोई जानकारी स्पष्ट प्राप्त नहीं है। केवल शक्ति संगम तंत्र में ही आप देख लो तो बौद्ध आगम चीन आगम विश्वरूपागम इत्यादि नाम बताए गए हैं। जिनकी आगे कोई स्पष्ट जानकारी सनातन शास्त्रों द्वारा प्राप्त
00:07:32:14 नहीं होती है। कहां पर बताए गए हैं शक्ति संगम तंत्र में? चौथे खंड के सातवें अध्याय के 105 से 115 वे श्लोक के बीच में आप देख लीजिएगा जो ये नाम मैं बता रहा हूं। बौद्ध आगम चीन आगम है ना तो आने वाले टाइम में कोई यह भी कहने लगेगा भैया मैं बौद्ध आगमाचार्य हूं बौद्धाचार्य हूं चीनाचार्य हूं तो क्या है तो क्या ऐसे में यदि कोई दय कहानी गढ़ते हुए स्वयं को बौद्धाचार्य अथवा चीनाचार्य के रूप में ख्यापित करने का प्रयास करेगा तो क्या सनातनियों द्वारा उसे प्रामाणिक आचार्य के रूप में स्वीकार कर लेना उचित माना जाएगा शिव पुराण शत रुद्र समिता एक चार के अनुसार प्रत्येक युग में भगवान शिव के असंख्य अवतारों का वर्णन मिलता है। जिनके बारे में भी पूर्वोक्त पूछी गई जानकारियां प्राप्त नहीं है। इतना ही नहीं सर्वविदित है कि वेद की कई ऐसी शाखाएं हैं जो प्राय प्राय लुप्त हो चुकी है। अतः जिनकी भी जितनी भी परंपराएं अथवा भगवान के अवतार ऐसे हैं जिनकी जानकारी स्पष्ट रूप से प्राप्त नहीं है। उनसे स्वयं को जोड़कर किसी के भी द्वारा गढ़ी जाने वाली कहानी को आधार मानकर किसी भी व्यक्ति को भगवान के अवतार अथवा किसी प्रामाणिक परंपरा के उत्तराधिकारी के रूप
00:08:47:15 में स्वीकार कर लेना क्यों उचित माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है और सुनिए आगे क्या है कई सनातन शास्त्रों में भगवान शंकर द्वारा वैदिक धर्म की रक्षा के लिए भगवत पाद आदि शंकराचार्य भगवान के रूप में अवतार लेने के संबंध में प्रमाण प्राप्त होते हैं। जिस शक्ति संगम तंत्र नामक शास्त्र के संदर्भ का उपयोग करते हुए भागवतानंद द्वारा यह जो ढिंढोरा पीटा जाता है। है ना स्वयं को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए उस शास्त्र में भी जगतगुरु शंकराचार्य उनके द्वारा स्थापित चार आमनाय पीठों सहित शंकर संप्रदाय का स्पष्ट विवरण है। कहां पे है? चौथा खंड आठवा अध्याय 63 से 164 वे श्लोक के बीच इतना लंबा विस्तार से शंकर परंपरा का वर्णन वहां किया गया है शक्ति संगम तंत्र में और यह वो संप्रदाय है जिस पर निग्रह करेगा निग्रहचार्य जिसका कोई वहां पर संदर्भ नहीं है शक्ति संगम तंत्र में ठीक है यही नहीं शक्ति संगम तंत्र के ही प्रथम खंड में विभिन्न परंपराओं
00:10:02:19 के सन्यासियों का विवरण देते समय भी चीन आगम तथा बौद्ध आगम जैसे अवैदिक मत के सन्यासियों तक का विवरण है। चीन आगम को अवैदिक भी कहा गया है। बौद्ध आगम को अवैदिक भी कहा गया। उनके सन्यासियों का विवरण भी दिया गया है। मगर निग्रह संप्रदाय का विवरण देने में चूक हो गई। शक्ति संगम तंत्र के रचयिता को है ना। बौद्ध कैसे बद्ध बौद्ध आगम के कैसे सन्यासी हैं? वो शक्ति संगम तंत्र बताएगा। चीन आगम के कैसे सन्यासी हैं वो शक्ति संगम तंत्र बताएगा। परंतु निग्रह के कैसे सन्यासी होंगे? निग्रह के क्या स्वरूप होगा निग्रह संप्रदाय का वो शक्ति संगम तंत्र नहीं बताएगा। वो वैष्णव वैष्णव संप्रदायों की जानकारी प्रदान करेगा। शंकराचार्य शंकर परंपरा की स्पष्ट जानकारी प्रदान करेगा। मगर उन सब पर निग्रह करने वाला जो निग्रह संप्रदाय है निग्रह परंपरा है। वहां परंपरा शब्द के साथ तक निग्रह को प्रस्तुत नहीं किया जाएगा। केवल निग्रह आगम कहा जाएगा। निग्रह आगम और उसी पे हुलुल हुलु चालू कर दो उलना निग्रह आगम आ गया। निग्रह आगम
00:11:18:16 तो अब बात ये आती है कि भागवतानंद के अनुसार जिस निग्रह संप्रदाय को अन्य सभी संप्रदायों का निग्रह करना है। इतने महत्वपूर्ण निग्रह संप्रदाय का एवं उसके अंतर्गत आने वाली चलने वाली गुरु परंपरा का कोई विवरण प्राप्त नहीं होता है। ऐसे में निग्रह आगम के संदर्भ से उन तथ्यों को किस प्रकार प्रमाणिक मान लिया जाए जो भागवतानंद द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। निग्रह नाम तो लिखा है। मगर निग्रह संप्रदाय का स्वरूप मैं बता रहा हूं। वहां संप्रदाय भी नहीं है। वहां आगम है। निग्रह आगम तो वहां लिखा है। मगर निग्रह संप्रदाय के रूप में उस आगम को पकड़ के और मैं अपने अनुसार ले ले घोड़ा ले चाबुक दौड़ाने लगूं। तो क्यों मान लिया जाए इस बात को? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है हां है ना भागवतानंद के अनुसार निग्रह संप्रदाय लुप्त हो गया था जिसको पुन स्थापित करने का कार्य दिव्य योजना द्वारा भागवतानंद को सौंपा गया व दूसरी ओर शक्ति संगम तंत्र में ही शंकर परंपरा के विच्छिन्न होने और पुनः उदय होने का विवरण भी प्राप्त होता है। ध्यातव्य है कि
00:12:33:22 अब यह जो नोटिस हमको मिला था उसमें नोटिस में एक बात कही गई थी जिसने पहला भाग ना देखा हो वो देख ले यह जो निग्रह निकासिका हमारी ओर से प्रसारित की जा रही है जो करण अर्जुन आएगी वाली जो निग्रह प्रवेशिका है उसको उसके पूर्व पक्षों को संकलित करके उसके उत्तर पक्ष के रूप में यह जो क्या कहते हैं निर्गत की जा रही है तो यह जो है एक नोटिस जो हमें 100 करोड़ का मिला था उसके उत्तर के रूप में यह निग्रह निकासिका लिखी गई है। है ना? तो अब क्या है कि क्योंकि उसमें यह कहा गया था उस नोटिस में कि क्योंकि भागवतानंद जो है बड़े-बड़े धर्माचार्यों की पोल खोल रहे थे और शंकर परंपरा के बारे में भी बहुत सारे उसने एक्सपोज किया है शंकर परंपरा को इसलिए हमने इसलिए ऐसा ऐसा हमने भागवतानंद के विरुद्ध षड्यंत्र किया उसके बारे में अभद्र आपत्तिजनक और अपमान पूर्वक वचन कहे यह उसमें 100 करोड़ के नोटिस में कहा गया है जिसको और ज्यादा जानकारी लेनी हो पिछले वीडियो देख ले। खैर तो अब उसने यह जो भागवतानंद है यह शंकर मठ में
00:13:51:10 घट घटित होने वाले कोई भी घटनाओं को है ना अपने अनुसार अपनी दृष्टि से देखता है कि अगर कैमरा बंद हो गया, कोई टेक्निकल फॉल्ट चल रहा है, आवाज क्लियर नहीं आ रही है तो इसका मतलब यह षड्यंत्र पूर्वक ही किया जा रहा है क्योंकि भागवतानंद ने कहा है और यह बात प्रमाणित कैसे होती है क्योंकि शास्त्र में लिखा है कि परंपरा में विच्छिन्नता आएगी एक दिन तो वो विच्छिन्नता यही है परंपरा एक दिन नष्ट होगी परंपरा कुछ समय के लिए लुप्त होगी तो वो जो लुप्त होने का समय है वो यही है क्यों क्योंकि भागवतानंद ने कहा है है ना तो अभी यहां पर जो उसके द्वारा यह जो चीज प्रस्तुत की जाती है कि भैया शंकर संप्रदाय लुप्त होगा यह जो चीज स्पष्ट की जाती है और अपने एक वीडियो में हम इस बात पर भी करेंगे कि इसने बुद्ध के विषय में विरोध क्यों किया शंकर परंपरा का। उसका भी इसकी प्रामाणिकता से रिलेशन है। इसने बुद्ध के मामले में जो शंकर संप्रदाय का शंकराचार्यों का विरोध किया है। उस विरोध का भी संबंध इसकी अपनी प्रामाणिकता से है। यह अपनी प्रामाणिकता को सुरक्षित करने के लिए जो ये जो बुद्ध मत है इसको स्टार्ट
00:15:06:21 करने वाले जो जो सिद्धार्थ उनको विष्णु का अवतार सिद्ध करने पर तुला हुआ है। यह हम किसी और वीडियो में ले लेंगे। पर अभी क्या बात चल रही है कि यह जो यह कहता है कि देखो अगर वो वहां से आया तो इसका मतलब है वो इसीलिए आया होगा वहां से। थपाक थपाक थपाक। ये यहां से क्यों आया? थपाक थपाक थपाक। तो मैं जो कह रहा हूं वो इसीलिए आया होगा। देखो शास्त्र में भी लिखा है कि एक ना एक दिन ये परंपरा में संकट आएंगे। इस परंपरा में विच्छिन्न होगी ये परंपरा। शास्त्र में लिखा है और वो उधर से आया है। इसलिए मेरी वाणी सत्य मान लो कि वो इसीलिए आया है। वो जो है फिल्म देख के आया है। अभी-अभी जो उधर उस गेट से जो आएगा वो फिल्म देख करके ही आ रहा है। सिद्ध हो गया। कैसे सिद्ध हुआ? शक्ति संगम तंत्र में भविष्यवाणी की गई है ना विच्छिन्नता आएगी। तो मैं बता रहा हूं विच्छिन्नता आएगी। मान लो मेरी बात। क्यों? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है हां तो अभी हम इस बात का जवाब दे रहे हैं कि क्या शास्त्र की किसी भी भविष्यवाणी को आधार बना करके होने वाली घटनाओं को होने वाली घटनाओं को उस शास्त्र की भविष्यवाणी के अनुरूप देख कर के और होने वाली घटनाओं को बिना ठीक से
00:16:21:27 अनुसंधान किए मान लेना चाहिए कि विच्छिन्नता आ गई। बर्बाद हो गया सब। नष्ट हो गया सब। और अब जब सब नष्ट हो गया तो मान लो भैया सबसे बड़े आचार्य कौन है? निग्र आचार्य। हम चलो खैर तो क्या है कि तो उक्त शिकायत पत्र में आगे भागवतानंद द्वारा निराधार रूप से पूरी मठ में शास्त्र विरुद्ध अमर्यादित आचरण होने का आक्षेप लगाते हुए यह भागवतानंद द्वारा पूरी मठ के विरोध में किए गए।
00:16:55:25 उक्त कृत को ही हमारे द्वारा भागवतानंद के लिए आपत्तिजनक टिप्पणियां करने का कारण बताया गया है। यद्यपि हमारे अनुसार हमने कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की है। अतः यहां प्रसंग वश हम शिकायतकर्ता द्वारा पूरी मठ पर लगाए गए आक्षेपों के रूप में किए गए निराधार अनर्गल प्रलाप पर प्रलाप की वास्तविकता बताते हुए आगे बढ़ना उचित समझते हैं। भागवतानंद द्वारा स्वयं की वर्चस्वता को स्थापित करने के मंतव्य से वर्तमान में सुलभ सांकर पीठों के प्रति जन सामान्य को अनास्थावान बनाने के निमित्त शक्ति संगम तंत्र शास्त्र से प्राप्त शंकर परंपरा के विच्छिन्न होने की भविष्यवाणी को षड्यंत्र पूर्वक फेर बदल करके लुप्त हो जाने की भविष्यवाणी के रूप में प्रचारित किया जाता है। यह इसकी अमृत वचन का लिंक है और शक्ति संगम तंत्र के जो वचन है जहां पर ऐसा है विच्छिन्न होने की बात है वह भी हमने मेंशन कर दिया है। इतना ही नहीं सांकर परंपरा के पुनः उदित होने के विवरण को गौण रखते हुए उसी शक्ति संगम तंत्र में शंकर परंपरा के विच्छिन्न होने पर पुनः उदित होने की भविष्यवाणी भी की गई है। मगर उसको गौण करता है यह व्यक्ति और यह व्यक्ति केवल
00:18:10:26 इस पर ज्यादा जोर देता है कि विच्छिन्न होगी विच्छिन्न होगी जिससे कि वो जो सर्वोच्च आचार्य सार्वभौम आचार्य वाली बात है ना वो कहीं ना कहीं दब जाए खत्म हो जाए विच्छिन्न हो गई अब तो अब तो खाली पड़ा है तो जाके हम बैठ जाएंगे निग्र आचार्य बन जाएंगे और ये सार्वभौम सर्वोच्च से याद आया ये बड़ा एक प्रलाप करता है ये भागवतानंद एक प्रलाप बहुत करता है कि अरे वो जगतगुरु के बाद फिर आए एक उपाधि हो गई। सार्वभौम आचार्य फिर सर्वोच्च आचार्य शंकराचार्य जी के विषय में क्या है कि सर्वोच्च जगतगुरु इस बात पर मुझे थोड़ी आपत्ति है क्योंकि सर्वोच्च सनातन धर्म में कोई नहीं हो सकता। तो भाई पहले केवल घी आया करता था। ठीक है? जब केवल घी हुआ करता था उसके सामने कोई विशेषण लगाने की आवश्यकता नहीं होती थी। मगर जब कालांतर में डालडा आने लगा, तरह-तरह के नकली घी बनने लगे तो घी के सामने भी विशेषण लगाने की जरूरत पड़ती है। शुद्ध देसी घी दे दो। यद्यपि इसका शास्त्रों में वर्णन ना हो या फिर कोई विधिक विषयक शास्त्रों में इसका वर्णन ना हो। मगर लोकाचार में पहचान करने के
00:19:25:27 लिए कि श्रेष्ठतम उपाधि को लोग समझ पाए। श्रेष्ठतम आचार्य तक लोग पहुंच पाए या फिर उस ज्ञान को प्राप्त कर पाए जिस ज्ञान से मोक्ष मिलना है मूर्ख उसके लिए विशेषण देने पड़ते हैं। तो दिव्या अभिषेक दिव्य साम्राज्य अभिषेक के ऊपर कोई दीक्षा नहीं होने से सर्वोच्च दीक्षा युक्त होने से शंकराचार्य जी को हम शाक मत में सर्वोच्च धर्माधिकारी मानते हैं। धर्म अह गुरु मानते हैं। एकलिंग पुराण के प्रमाण से भी हम यह समझते हैं कि शंकराचार्य जी कलयुग के सर्वोच्च धर्म गुरु इस दृष्टि से मान्य हो जाते हैं। बताना पड़ता है।
00:20:03:13 इतनी सी बात नहीं घुसी तेरे भेजे में। खैर इतना ही नहीं शंकर परंपरा के पुनः उदित होने के विवरण को गौ रखते हुए इस विषय में कोई भी चर्चा नहीं करता है। ये है इसका पक्षपात दोगलापन। त्रया चरित्र कोई भी चर्चा नहीं करता शक्ति संगम तंत्र द्वारा की गई भागवतानंद के शब्दों में कहे तो लुप्त हो जाने की ही सही थोड़ी देर मान लेते दुर्जन तोषण आए भविष्यवाणी को भागवतानंद द्वारा वर्तमान की समय धारा से किस आधार पर जोड़ा गया है जिसके कारण शास्त्र में दी गई उक्त भविष्यवाणी का समर्थन लेते हुए शंकर पीठ पर लगाए जाने वाले भागवतानंद के निराधार आक्षेपों की पुष्टि करने का प्रयास किया जाता है। किस आधार पर अगर शक्ति संगम तंत्र ने ये कहा भी है कि परंपरा लुप्त हो जाएगी तो यही समय क्यों माना जाए कि इस समय परंपरा परंपरा लुप्त हो जाएगी। क्यों माना जाए? किस आधार पे? इसके लिए प्रमाण क्या है? हो सकता है परंपरा का विच्छिन्न होने का जो समय कालखंड था वो निकल चुका हो।
00:21:18:16 उस समय बहुत ज्यादा कार्य ना कर पाई हो। शंकर परंपरा इसलिए कहा गया हो कि विच्छिन्न हुई और पुनः उदित होना परंपरा विच्छिन्न हो जाएगी तो पुनः उदित नहीं होगी यदि वह समाप्त हो जाएगी यानी कि पुनः उदित होने की बात अगर की जा रही है शास्त्र में उसी शास्त्र में जिसके आधार पर तुमने अपने ताश के पत्तों का महल बनाया है उसी शास्त्र में शंकर परंपरा के विच्छिन्न हो जाने के बाद पुनः उदित होने की बात भी की जा रही है तो यदि परंपरा नष्ट हो जाएगी एक भी व्यक्ति नहीं बचेगा तो फिर परंपरा उदित कैसे होगी उदित तो तभी मानी जाएगी ना जब पिछले गुरु ने अगले अपने शिष्य को अपने उत्तराधिकारी को बनाया हो आगे पढ़ाया हो हां इसको ऐसे मान सकते हैं कि उतना प्रभाव नहीं रह जाएगा फिर उदित होगी फिर प्रभाव आएगा तो हो सकता है वह प्रभाव जो कम हुआ था वह निकल चुका हो वह समय देश कालखंड तुम्हारी बात को क्यों माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। चलो आगे चलते हैं। तो क्या है? संभव है कि यह भविष्यवाणी आने वाले एक दो सहस्त्र वर्षों के बाद घटित होनी हो अथवा भूतकाल में घटित हो चुकी हो। यदि मान भी मान
00:22:33:18 भी लिया जाए कि शक्ति संगम तंत्र में भागवतानंद के अनुसार सांकर परंपरा के केवल लुप्त हो जाने के ही की ही बात कही गई है तब भी यह कैसे माना जाएगा कि यह भविष्यवाणी वर्तमान के समय में ही चरितार्थ होती है। क्योंकि तुम तो कह दोगे आवाज खराब हो रही है तो इसका मतलब है कि वहां षड्यंत्र चल रहा है। इसका मतलब है शक्ति संगम तंत्र की भविष्यवाणी सही होने वाली है। भले ही वहां पर आवाज खराब होने का कारण कुछ और हो, भले ही सुबह से देर से शुरू होने वाले कार्यक्रम के व्यवस्थापन के लिए यह ध्यान दिलाना पड़े कि देर हो रही है, मगर वहां पर तुम उसको षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत करो। तुम्हें वास्तविकता से कोई मतलब नहीं है। तुम्हें धर्म से कोई मतलब नहीं है। तुम्हें कैरी मिनाटी बनना है, धार्मिक कैरी मिनाटी हां? बन तू। धार्मिक कैरी मिनाटी बन।
00:23:35:03 चलो फिर क्या है? आगे जिसके कारण भागवतानंद द्वारा सांकर पीठ के बारे में कुछ भी निराधार कह देने मात्र से ही सांकर पीठ का दोष युक्त होना सिद्ध हो जाता है। कि भैया शाक्ति संगम तंत्र में लिखा था विच्छिन्न होगी। इसलिए मैं जो विच्छिन्नता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं घटनाओं को तो मान लो कि विच्छिन्न हो रही है क्योंकि भविष्यवाणी है शास्त्र की हम अगर शास्त्र में कहीं लिखा है यह होगा ऐसा होगा देखो वहां कहा था और देखो मैंने उल्टे की व्याख्या कर दी देखो मैं ही हूं तत्वदर्शी मैं ही हूं नास्तमस की भविष्यवाणी रामपाल संस्कृत जाने वाला रामपाल नहीं तो तू और क्या है शंकर परंपरा को मानने वाला होने के नाम पर ही शंकर परंपरा को मिटा देने का प्रयास करने वाला नहीं तो तू और क्या है
00:24:31:10 [संगीत] और क्या कहता है तू प्रयास नहीं किया है खंडन किया है तोते उड़ जाएंगे बताऊंगा तुझे तेरी बौद्ध वाली कहानी और तेरी शबरी वाली कहानी रुक जा तू रुक जा बताऊंगा आने दे समय अभी फिलहाल तेरी यह परंपरा का पोस्टमार्टम कर ले जरा तो अब आगे क्या है इस पक्ष में कि ऐसे भविष्यवाणी से किसी भी दृष्टांत को किसी भी घटनाक्रम को किसी भी घटना को जोड़ करके देखना उचित नहीं है। उस संबंध में क्या है कि शास्त्र में यह तो बताया गया है कि कुछ समय अवधि के लिए परंपरा विच्छिन्न होगी। परंतु यह नहीं बताया गया कि मठों में अनाचार होने के कारण ऐसा होगा। विच्छिन्न होगी। मगर मठों में अनाचार होने के कारण ऐसा होगा। यह तो नहीं कहा गया। तो अनाचार से जोड़कर ही क्यों देखा जाए? हो सकता है दबाव के कारण हो जाए। जैसे कि अंग्रेजों के मुगल के शासनकाल में उतना काम नहीं कर पाए। मान लो किया मगर उतना लोगों के लिए प्रासंगिक नहीं रहा। तो वो जो विच्छिन्न होना था विच्छिन्न भी मानी गई। उसके बाद पुनः उदित हो रही है। हो सकता है उदित होने का ही कालखंड हो। [संगीत]
00:25:46:00 क्योंकि यह क्यों नहीं मानोगे? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। खैर आगे चलते हैं। फिर इसके बाद क्या है कि संभव है कि किसी युद्ध अथवा षड्यंत्र के कारण परंपरा विच्छिन्न किए जाने के संबंध में वह भविष्यवाणी कही हो। यदि मान भी लिया जाए कि विच्छिन्न होने का कारण अनाचार ही बताया गया है तब भी केवल इतने मात्र से किसी के भी द्वारा मठ मंदिरों पर लगाए जाने वाले आरोपों को बिना किसी उपयुक्त अनुसंधान के सत्य मान लेना पूर्णतया पूर्णतया अनुचित है किसी से भविष्यवाणी कर दी डायन है डायन है बिना यह सोचे समझे कि वो मातृ शक्ति डायन है कि नहीं मार डालो उसे क्योंकि भविष्यवाणी हो गई है
00:26:35:25 स्कंद पुराण में रामायण महात्म सहित अनेक शास्त्रों में बताया गया है कि कलयुग में स्त्रियां पर पुरुष गमन करेंगभचारणी हो जाएंगी तो क्या यह जो व्यक्ति ऐसा बोल रहा है वह अपनी माताओं और अपनी बहनों के लिए व्यभचारणी होना पर पुरुष गमन करना यह सब संबोधन को स्वीकार करेगा क्योंकि शास्त्र में कहा है तो हो गई। क्या किसी भी स्त्री पर लगने वाले आरोपों का यथोचित अनुसंधान ना करके केवल इस भविष्यवाणी के कारण आरोपित स्त्री को दोषी मान लिया जाएगा कि भैया वहां भविष्यवाणी हुई है कि कलयुग में स्त्रियां हो जाएंगी। इसलिए अगर इसके थोड़ा बहुत भी अगर संकेत भी मिल गया तो बस हो गई वैभचारणी। यही है ना तुम्हारे सिद्धांत यही है ना न्याय शर्म नहीं आती है [संगीत] यहां यह मानना होगा कि कलयुग में स्त्री पुरुषों से स्त्री पुरुषों के अधिक मात्रा में व्यभचारी होने की बात कही है परंतु प्रत्येक स्त्री अथवा प्रत्येक पुरुष व्यभिचारी हो जाएंगे ऐसा नहीं कहा गया। श्रीमद् भगवत गीता के चौथे अध्याय में भी
00:27:50:26 भगवान श्री कृष्ण ने भगवान सूर्य को दिए गए ज्ञान को लुप्त हो जाने की बात कही है। तो क्या इसका अर्थ यह मान लिया जाए कि उस कालखंड में ब्रह्म का ब्रह्म तत्व का ज्ञान किसी को था ही नहीं। कर्म योग का ज्ञान किसी को था ही नहीं। हम पुराणों में कर्म योग नहीं है। पुराणों में कर्म योग नहीं है क्या? पुराणों की रचना तो सृष्टि के प्रारंभ से ही हुई है। वेदों को भी रचना वेदों को भी कहने से पहले पुराणों का स्मरण किया था ब्रह्मा जी ने तो ज्ञान नहीं था उस समय लुप्त हो गया था ज्ञान तो प्राय लुप्त हो गया है ना के बराबर रह गया है ये मानना पड़ेगा ना कि यही मान लोगे खत्म ही हो गया था उस कालखंड में कोई था ही नहीं जिन गुरु संदीपन के पास भगवान श्री कृष्ण पढ़ने के लिए गए थे उनको ज्ञान नहीं था भीष्म को ज्ञान नहीं था विदुर को ज्ञान नहीं था किसी को भी ज्ञान नहीं था [संगीत] और वह एक कथा और आती इसमें कोई वैश्य था जा से उसका कुछ नाम था भागवत में ही आती है वो कथा भागवत में या महाभारत में उसको भी ज्ञान नहीं था।
00:29:07:01 ठीक इसी प्रकार शक्ति संगम तंत्र द्वारा किसी समय परंपरा के विच्छिन्न होने की भविष्यवाणी की गई है। यह भविष्यवाणी नहीं की गई है कि भागवत आनंद द्वारा बताए गए समय में उसके द्वारा जिन लोगों पर आधा अधूरा निराधार बिना अनुसंधान किए जो आरोप लगाया जाएगा उन्हीं के कारण परंपरा विच्छिन्न होगी। अतः भविष्यवाणी को आधार मानकर पूरी मठ पर लगने वाले किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं की जा सकती। उसके लिए यथोचित साक्ष्य इत्यादि के रूप में ठोस प्रमाणों की आवश्यकता होगी जो कि पूरी मठ में चल रहे अनाचरण का अनावरण कर देने का दंभ भरने वाले भागवतानंद द्वारा कभी भी उपलब्ध नहीं कराए गए केवल दम भरा है हमारे पास सुरक्षित है यह है वो है टेपों कभी आज तक सामने नहीं लाए
00:29:58:28 यहां यह जान लेना आवश्यक है कि भविष्यवाणी के आधार पर किसी घटना की पुष्टि नहीं होती। अपितु किसी घटना के सत्यापित हो जाने पर भविष्यवाणी की पुष्टि अवश्य होती है। अथवा भविष्यवाणी में उसे किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थिति से जोड़ने के समर्थन में वस्तुनिष्ठता के साथ विषय का ऐसा स्पष्ट विवरण दिया गया हो जिसके आधार पर स्पष्टता के साथ किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थिति को उस भविष्यवाणी से जोड़ा जा सके। स्पष्ट विवरण के अभाव में इस प्रकार की शास्त्रों भविष्यवाणियों का पर्यावसान किसी को दोषी अथवा निर्दोष सिद्ध करने में ना होते हुए भविष्य में आने वाली समस्याओं के लिए पूर्व से ही सतर्क होने में है। कि हम समय के लिए सतर्क हो पाए। जो कठिन समय आ सकता है उसके लिए सतर्क रहे। ऐसे वाक्यों का पर्यावसान केवल इस बात में है। इस बात में नहीं है कि अगर कह दिया गया स्त्रियां जो है व्यभचारणी हो जाएंगी तो प्रत्येक स्त्री हो गई। अगर कह दिया गया पुरुष जो है काम लोप हो जाएंगे तो प्रत्येक पुरुष हो गया। मानते हो तुम? मानता है तू अपने आप को प्रत्येक पुरुष हो गया। मानता है तू अपने
00:31:14:00 आप को काम लो। लिखा है रामायण महात्म में वैसे तुझसे तो यह प्रश्न करना बेकार ही है। गुप्ताचार्य हम [संगीत] जिस प्रकार सीधी सी बात है गर्मी के मौसम में गर्मी तो पड़ेगी ही इसका अर्थ यह नहीं कि गर्मी से बचने के उपाय बंद कर दिए जाए। उसी प्रकार कलयुग की ये जो चीजें बताई जा रही है ऐसा हो जाएगा। उससे हम निपटने के लिए तैयारी कर सके। इस भावना से शास्त्रों में वचन लिखे हैं। नहीं तो तुम में और रामपालियों में क्या अर्थ अंतर रह जाएगा? कलयुग के राक्षस सतयुग के राक्षस कलयुग में ब्राह्मण के रूप में जन्म लेंगे। बस
00:32:25:27 हो गया। हो गया। हर ब्राह्मण राक्षस हो गया। सतयुग का जो राक्षस था वही आज ब्राह्मण है। यह रामपाल ही करते हैं। वही तुम करो। धार्मिक कैनी मिनाटी बनेंगे। तो अब क्या अर्थ निकला इस सबका कि भागवतानंद द्वारा पूरी पीठ पर लगाए गए सभी आक्षेप पूर्णतः निराधार है। एवं इस प्रकार सनातन धर्म की सर्वमान्य सर्वोच्च आचार पीठ पर ना केवल निराधार आक्षेप लगाना अपितु मनगढ़ंत विधि द्वारा उनकी पुष्टि करने का दावा करते हुए उनका प्रचार करना मठ की छवि को नष्ट करने का प्रयास है। जो पूर्ण रूप से आपराधिक कृत है।
00:33:11:08 तथा जिसकी पुष्टि भागवतानंद द्वारा लिखित रूप से इस शिकायत पत्र में भी कर दी गई है। वह शिकायत पत्र जो मां रानी का लूटे समय दिया गया है। जो भी हो भागवतानंद के अनुसार इतना तो स्पष्ट है कि वर्तमान में शंकर परंपरा लुप्त होने वाली है और इस घटना की भविष्यवाणी भी शक्ति संगम तंत्र में शास्त्र में प्राप्त होती है। अब प्रश्न यहां यह उठता है कि जहां एक और किसी आचार परंपरा का विस्तृत वर्णन शक्ति संगम तंत्र सहित अनेक सनातन शास्त्रों में प्राप्त होता है। इतना ही नहीं उस परंपरा के इतिहास सहित भविष्य भविष्य में कुछ समय के लिए उस परंपरा के लुप्त होने तथा उसके पुन स्थापित होने की भविष्यवाणी भी शास्त्रों में प्राप्त होती है। परंतु वहीं दूसरी ओर जिस संप्रदाय की उत्पत्ति सभी प्रामाणिक संप्रदायों का निग्रह करने के लिए हुई है उसका ना तो कोई ऐसा स्मृति परक स्पष्ट वर्णन किसी शास्त्र में दिया गया है जिसके आधार पर उसके सिद्धांत इत्यादि का अनुसंधान किया जा सके अथवा ना ही ऐसा कोई वर्णन मिलता है जिसके आधार पर उसके साथ किसी के संबंध को सत्यापित किया जा सके। इतना ही नहीं जो
00:34:26:14 परंपरा अभी लुप्त नहीं हुई है उसके लुप्त होने की भी भविष्यवाणी शास्त्रों से प्राप्त है। यहां तक कि उसके पुनः उदित होने की भविष्यवाणी शास्त्रों से प्राप्त है। परंतु जो सबसे महत्वपूर्ण परंपरा पूर्व में ही लुप्त हो चुकी है। उसके पुनः उदित होने का तो क्या उसके लुप्त हो जाने का विवरण भी कहीं प्राप्त नहीं होता है। ना तो उसका लुप्त होना बताया गया। ना उसका पुनः उदित होना बताया गया। ना ही उसके लिए परंपरा शब्द का उपयोग किया गया। ना ही उसके लिए संप्रदाय शब्द का उपयोग किया गया। मगर केवल निग्रह आगम आ गया। अब सब हम फिट कर लेंगे। बाकी का हम सब गढ़ लेंगे।
00:35:15:15 तो ऐसे में ऐसे में जब उसकी ना तो ना तो लुप्त होने के बारे में बताया कि भविष्यवाणी हुई। अरे भैया लुप्त होना तो स्पष्ट है ना। तुम ही तो कह रहे हो ना कि लुप्त हो जाएगा तो वह भविष्यवाणी तक उसमें नहीं है शास्त्र में। क्यों नहीं है? फिर क्यों मान ले संप्रदाय था कोई? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है ना लुप्त होना शास्त्रों में है ना उदित पुनः उदित होना शास्त्रों में है ना उसका स्वरूप ऐसा होगा जैसा भागवतानंद बता रहा है यह शास्त्रों में है ना उसके जो तात्विक सिद्धांत है वो शास्त्रों में है मगर इन सब पर क्यों मान लिया जाए एज इट इज जैसा ये बता रहा है भागवतानंद क्योंकि भागवतानंद ने कहा है और फिर भागवतानंद को उस परंपरा का आचार्य कैसे मान लिया जाए क्योंकि भागवत ने कहा है शक्ति संगम तंत्र में बहुत से वैदिक आगमों के संबंध में भी उल्लेख प्राप्त होता है। यही नहीं इस बात की घोषणा भी की जा रही है कि वहां उल्लेखित कई आगम ऐसे हैं जो पाखंड मात्र हैं। शक्ति संगम तंत्र में ही बताया गया है। कहां बताया गया है? चौथा खंड सातवां
00:36:30:26 अध्याय 108वा श्लोक अर्थात अवैदिक मत बताए गए हैं कि भैया हम जो नाम यहां पर ले रहे हैं उनमें से कई ऐसे मत है जो अवैदिक हैं। ठीक है? यह किस आधार पर माना जाएगा कि शक्ति संगम तंत्र में जिस निग्रह आगम की बात हो रही है वह श्रुति सम्मत आगम ही है। यह कैसे स्पष्ट हुआ? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। भागवतानंद ने निग्रह संप्रदाय से मिलने वाले ज्ञान को श्रुति सम्मत कहा है। ऐसे में देखना होगा कि अलग-अलग संप्रदाय में से किस संप्रदाय द्वारा स्वीकार्य वैदिक तात्पर्य के अनुकूल निग्रह संप्रदाय का सिद्धांत है। उसके लिए भागवतानंद को उस अमुक संप्रदाय के वैदिक तात्पर्य का परंपरागत अध्ययन होना आवश्यक है। श्रीमद् भागवत 10 80 32 के अनुसार परमात्मा प्राप्ति का ज्ञान प्रदान करने वाला परम गुरु होता है। ऐसे में जिस परंपरा से भागवतानंद को परम तत्व विषयक स्तुति का अर्थ प्राप्त हो रहा है। निग्रह संप्रदाय से प्राप्त सिद्धांतों के सत्यापन हेतु जिस परंपरा से वैदिक तात्पर्य के अनुसार ब्रह्म ज्ञान का मूल प्राप्त हो रहा है। भागवतानंद को उस परंपरा का अनुयाई अथवा शिष्य क्यों ना माना जाए।
00:37:45:27 क्यों ना माना जाए? उपनिषदों का भाष्य लोगे शंकर का वेदों का भाष्य लोगे सायन का और फिर कहीं कह दोगे हमको भगवती ने आकर के वो जिब्राइल की तरीके से वो दिया है नया शास्त्र और शास्त्रीय पुष्टि कैसे होगी कैसे पता चलेगा कि ये शास्त्र सही है कि नहीं उसके लिए वैदिक तात्पर्य का सहारा लेना होगा ना उसके लिए वह वेद होने चाहिए ना परंपरा तो तुम्हें उस परंपरा का क्यों ना माना जाए जिस पर तुम निर्भर हो अपने वो जिब्राइल वाले शास्त्रों के लिए उनके सत्यापन के लिए क्यों ना माना जाए
00:38:33:06 क्योंकि भागवतानंद ने कहा है तुम्हारी तथाकथित गढ़ी गई जो कहानी है भागवतानंद उसमें मां भगवती ने तुम्हें परमाक्षर सूत्र नामक ग्रंथ दिया है ना वेद तो नहीं दिए वेद का तात्पर्य तो नहीं दिया उपनिषदों का तात्पर्य तो नहीं दिया। वह तुम्हें किस परंपरा से मिला है? जिसके आधार पर तुम ये तय करोगे कि मुझे जो ग्रंथ मिला है वो वैदिक है कि नहीं? वो किसी बुरी शक्ति ने तो नहीं दिया। मेरी परी ने तो नहीं दिया। कालिया जिन कालिया जिन ने तो नहीं दिया। कैसे तय करोगे? परंपरा पर निर्भर करना पड़ेगा ना। शंकर परंपरा पर। चलिए आगे चलते हैं। भागवतानंद के अनुसार निग्रह संप्रदाय का सिद्धांत अव्यक्ता द्वैत शंकर परंपरा का अद्वैत सिद्धांत ही है। ऐसे में यदि भागवतानंद द्वारा निग्रह संप्रदाय को श्रुति सम्मत बताने के लिए उसका शंकर संप्रदाय अंतर्गत अद्वैत सिद्धांत के अनुकूल होना बताया जाता है तो यह मानना होगा कि उसे शंकर संप्रदाय के दार्शनिक पक्ष का ज्ञान है। ऐसे में या तो यह माना जाए कि उसे शंकर संप्रदाय द्वारा दी गई तात्विक विवेचना का बोध भी दिव्य योजना द्वारा ही प्राप्त हुआ।
00:39:48:09 जिसके समर्थन में जिसके समर्थन में अभी तक भागवतानंद द्वारा कोई वक्तव्य लेख यह सब नहीं दिया गया है। कि मुझे दिव्य योजना द्वारा ब्रह्म तत्व का ज्ञान हुआ था। मैं व्यक्तिगत रूप से सिद्धांतगत रूप से अपनी परंपरा में अद्वैती हूं। भगवान को जिस मत का जिस संप्रदाय का जिस आचार विधान का जब उन्हें अद्वैत मत की स्थापना करनी थी तो भगवान शंकराचार्य जी के रूप में आ गए। अब भगवान शंकराचार्य जी कौन है? शाक्तों की जो दीक्षा परंपरा है उसमें क्या कहते हैं? है तो दिव्या अभिषेक दिव्य साम्राज्य अभिषेक के ऊपर कोई दीक्षा नहीं होने से सर्वोच्च दीक्षा युक्त होने से शंकराचार्य जी को हम शाक मत में सर्वोच्च धर्माधिकारी मानते हैं धर्म गुरु मानते हैं तो एकलिंग पुराण के प्रमाण से भी हम यह समझते हैं कि शंकराचार्य जी कलयुग के सर्वोच्च धर्म गुरु इस दृष्टि से मान्य हो जाते हैं। परमाक्षर सूत्र मिला था। मगर जो यह ब्रह्म तत्व की व्याख्या है उपनिषदों के भाष्य इत्यादि के रूप में वह उसको दिव्य रूप से प्राप्त हुई है। इस बारे में उसने कुछ कुछ नहीं कहा है। ठीक है? परंतु यदि दिव्य योजना द्वारा
00:40:56:21 आगे भविष्य आगे भविष्य में हां अभी तक उसने यह नहीं कहा है। मगर अभी तक उसने इस संबंध में कोई वक्तव्य नहीं दिया है। परंतु भविष्य में यदि वह कोई ऐसी कहानी कर दे तो बात अलग है। भाई जब ऐसी बात उठा दी गई तो हमने गढ़ दिया। लो आए थे एक और जिब्राइल हमारे पास। जिब्राइल बहुत जल्दी आ जाता है। जो भी पसंद होता है ना उसके लिए जिब्राइल तुरंत आता है। जैसे ही इच्छा होगी जो भगवान का दूत है उसकी जो भगवान का वो है संदेश वाहक जैसे ही इच्छा होगी जो भी करने की जिब्राइल तुरंत आ जाएगा। उसी प्रकार से जैसे यह निग्रह संप्रदाय के रूप में अपने आप को तथाकथित स्वषित आचार्य जो हैं यह अपने आप को सिद्ध कर रहे हैं। प्रामाणिक आचार्य के रूप में तो इनकी भी जैसे ही जो इच्छा होगी तुरंत इनके पास आ जाएगी नन्ही परी इनकी सोन परी आकर के दे जाएगी इनको चीजें मटेरियल शंकराचार्य की चीजों के लिए शंकराचार्य का शब्द प्रमाण नहीं है। सन्यासी का शब्द प्रमाण नहीं है। मगर इनके म्लेच्छराज को मानने के लिए इनका शब्द प्रमाण है। देखना हो देखो वरना बंद कर दो। और तुम्हारे अंत चेतना पर इतना प्रभाव डाल चुके हैं कि फुटपाट शर्ट
00:42:11:27 पहन के खड़े-खड़े मूत रहे हो और स्त्रियां जो है शादी से पहले गर्भपात कराई घूम रही है। बिना पैसा की शक्ति के तुमको लग रहा है। अब इससे ज्यादा क्या प्रमाण दे दे तुमको? कि गली-गली में रील बनाकर लड़कियां जो है सो नाच रही है और व्यभचार फैला रही है। इतनी अंदर की मानसिकता से क्यों वहां पड़ जा रहा है। क्यों पड़ रहा है? बिना किसी पैशाचिक शक्ति के तो जिस पैशाचिक शक्ति के माध्यम से ऐसा हो रहा है उसका जहांजहां संदर्भ जिस प्रकार से प्राप्त होगा चाहे अधिक परंपरा से चाहे अनुभूत परंपरा से
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00:42:35:10 हम उसका वर्णन करेंगे अगर तुमको इसमें प्रमाण नहीं मानना है तो अपनी कंबल तानो और सो जाओ तुम्हारे लिए हम थोड़े बना रहे हैं
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00:42:40:26 ये सब बातें शंकराचार्य यदि उत्तर ना दे तो शंकराचार्य की आत्म मुगधता तुम उत्तर ना दो तो वो तुम्हारी प्रामाणिकता [संगीत] यदि दुर्जन तोष न्याय से मान भी मान भी लिया जाए कि दिव्य योजना द्वारा ही इसको ये तात्विक विवेचना भी प्राप्त हुई है तब भी भागवतानंद द्वारा शंकर परंपरा के आचार का आश्रय लेना तो सिद्ध होगा क्योंकि उसकी पुष्टि कैसे करोगे वैदिक परंपरा से ही तुम्हें आश्रय लेकर ये सिद्ध करना होगा कि मुझे जो मां भगवती ने शास्त्र दिया है वो वैदिक है। उसके लिए जाना पड़ेगा तुम्हें वैदिक परंपरा के पास और यदि उसके पास जाओगे तो उससे पुष्टि करनी होगी कि तुमको दिखाई देने वाली मां भगवती है या फिर परी की है तुमने पुष्टि नहीं आओ चलो लिखो निग्रह प्रवेशिका हम तो निग्रह संप्रदाय के सिद्धांतों का सत्यापन भागवतानंद द्वारा शंकर संप्रदाय के शरणागत होकर किए जाने
00:43:55:27 पर भी भागवतानंद को शंकर संप्रदाय का शिष्य अनुयाई ना मानकर स्वतंत्र रूप से आचार्य किस आधार पर माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। हर कहानी देखिए कहां आकर के खत्म हो रही है। समाप्त हो रही है। क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। ज्ञातव्य है कि भागवतानंद द्वारा उसके व्यवहारिक गुरुओं का तारापीठ और कामाख्या पीठ से संबंध होना भी बताया गया है। एवं इससे अधिक कुछ भी स्पष्ट बताने को अस्वीकार करते हुए भागवतानंद के वैदिक ज्ञान किस परंपरा से आया यह स्पष्ट नहीं किया गया है। यदि मान भी लिया जाए कि भागवतानंद द्वारा बताए गए गुरुजनों जिनके बारे में उसने नाम लेने से मना कर दिया है। मेरे गुरुजन जो है उन्होंने मना किया है। अब मैं थोड़ा गुरु परंपरा का भी संकेत कर देता हूं। यद्यपि मेरे गुरुजनों ने मना किया है। फिर भी मैं सबों का तो नाम नहीं लूंगा। कामा की परंपरा से और तारापीठ की परंपरा से मेरा संबंध है। इससे अधिक मैं अभी नहीं बता सकता। गुरुजनों ने मना किया है। शंकराचार्य मना नहीं कर सकते। भाई भागवतानंद मना कर सकता है। कुछ बताने अथवा ना बताने से। उसकी इच्छा हो सकती है। उसका निर्णय हो सकता है। शंकराचार्य का नहीं हो सकता। मूर्ख [संगीत]
00:45:14:07 औरों को लथखोर कहेगा और तेरे लिए आरती उतारे। [संगीत] तो यदि मान भी लिया जाए कि भागवतानंद द्वारा बताए गए गुरुजनों जिनके बारे में वो नाम बताने से मना करता है। ऐसे गुरुजनों से उनको वैदिक ज्ञान प्राप्त हुआ है। तब भी यह मान जानने की आवश्यकता होगी कि वह गुरुजन जिस परंपरा से हैं उस परंपरा के सभी सिद्धांत भागवतानंद द्वारा निग्रह संप्रदाय के बताए गए सभी सिद्धांतों के पूर्णतया अनुकूल है अथवा नहीं यह भी चेक करना होगा ना कि अगर वो यह देख रहा है ये कह रहा है कि मुझे तारापीठ से जुड़े हुए जो मेरे आचार्य गुरु हैं जिनका मैं नाम नहीं बता रहा हूं अगर वो कह रहा है कि मुझे वैदिक ज्ञान उनसे ही प्राप्त हुआ तो इसके द्वारा गढ़ी जाने वाली जो कहानियां है सारी कहानियां उनके अनुकूल है कि नहीं और एक छोटी सी बात कर दूं इसका निग्रह करना उनको स्वीकार है कि नहीं धर्म और धर्म की व्याख्या यह जो बताएगा वो उनके द्वारा स्वीकार होगी कि नहीं मान लीजिए वह कह रहे हैं नहीं धर्म यह है ऐसा करना है ऐसा नहीं करना
00:46:29:13 है और यह कह रहा है नहीं ऐसा करना है वैसा नहीं करना है तो क्या इसका निग्रह उनको स्वीकार होगा और जब तक स्वीकार नहीं है तब तक इसके द्वारा उनमें प्रमाण्य बुद्धि रखना सिद्ध नहीं होगा। प्रमाण्य बुद्धि ना होने के कारण यह उस गुरु परंपरा से अपने आप को प्रामाणिक रूप से जोड़ नहीं पाएगा। तो यह उस परंपरा का भी प्रमाणिक सिद्ध नहीं होगा। हम्म और वैसे भी यह तो अपना स्वतंत्र रूप से तैयार कर रहा है ना। तो स्वतंत्र रूप से इसके पास वैदिक भाष्य कहां से आए? उपनिषदों का भाष्य कहां से आया? अगर इसे उपनिषद पढ़ने की आवश्यकता नहीं भी पड़ी। मगर वैदिक समाज इसको सनातनी तभी मानेगा ना जब इसकी चीजें वेद से मैल खा रही होंगी। तो इसने कहां से पुष्टि की है अपने आप के वैदिक होने की? नहीं पता। जवाब नहीं है। बस मान लो। क्यों? क्योंकि भगवत आनंद ने कहा है नहीं तो वीडियो बंद कर दोगे अगर तुमको इसमें प्रमाण नहीं मानना है तो अपनी कमल तानो सुनाओ तुम्हारे लिए हम थोड़े बना रहे हैं ये सब बातें तो
00:47:44:24 अगर अब या तो उनके अनुकूल होना चाहिए चेक करना पड़ेगा अनुकूल है कि नहीं 99% तो यही अनुकूल नहीं है क्योंकि निग्रह करना तो कम से कम स्वीकार नहीं है किसी भी परंपरा के प्रामाणिक आचार्यों को यह तथाकथित गुप्ता आचार्य के द्वारा उनका निग्रह किया जाना स्वीकार होगा क्या तो निग्रह इसका स्वीकार नहीं है तो क्या हुआ उस परंपरा का नहीं है और वैसे भी ये स्वयं ही कहता है कि मैं स्वतंत्र परंपरा वाला हूं स्वतंत्र है मेरी परंपरा और जो मेरे पीछे के आचार्य हैं वो लुप्त है गुप्त है हम तो अगर उनके अनुकूल इसके सिद्धांत इसकी व्याख्या इसका निग्रह संप्रदाय का स्वरूप नहीं है तो यदि वह अनुकूल नहीं है तो निग्रह संप्रदाय को मानने की स्थिति में भागवतानंद का उन गुरुजनों पर प्रमाण बुद्धि होना सिद्ध नहीं होगा जिनके नाम पर भागवतानंद द्वारा बताए जिनके नाम भागवतानंद द्वारा बताए गए हैं। इस प्रकार भी भागवतानंद के पास परंपरागत रूप से प्रामाणिक वैदिक ज्ञान होना सिद्ध नहीं होगा। यदि भागवतानंद द्वारा बताए गए गुरुजनों और निग्रह संप्रदाय
00:49:00:00 के सिद्धांतों में अनुकूलता है भी तब भी यह जानने की आवश्यकता होगी कि क्या भागवतानंद के उन गुरुजनों ने भागवतानंद को निग्रहचार्य के रूप में घोषित अथवा स्वीकार किया है अथवा नहीं। इन दोनों ही स्थितियों की संभावना भागवतानंद द्वारा दिए द्वारा निर्गत किए गए वक्तव्यों से ही समाप्त हो जाती है। जिनमें बताया गया है कि उसे निग्रचार्य का पद मां भगवती ने दिया है। एवं साथ ही साथ वह निग्राचार्य के रूप में स्वीकार नहीं करते क्योंकि यह पद किससे मिला है? मां भगवती से। स्वतंत्र है ना यह बेलगाम घोड़ा। जैसे बेलगाम घोड़ा होता है ना कोई किसी की लगाम नहीं होती। वैसे ही है ये।
00:49:43:13 साथ ही साथ उसने किसी भी अन्य व्यक्ति के द्वारा अपने पद के सत्यापन पर आपत्ति जताते हुए अपनी पुस्तक में स्वयं को ही स्वयं के द्वारा आचार्य घोषित करना स्वीकार किया है। एक जो नए एक नया पर्चा आया मेरे पास चुटकुले वाला उस पर्चे में यही बताया गया है कि भैया किसी अमुक अमुक संप्रदाय के आचार्य ने जो है इनको जो है घोषित कर दिया। नियुक्त कर दिया। क्यों नहीं नियुक्त कर रहे हो भाई? तुम तो तुम तो स्वयं को स्वयं ही आचार्य घोषित करते हो। तुम्हें तो यह बात करनी नहीं चाहिए कि मुझे फलाने ने नियुक्त किया है। वो बात और है कि सनातन संविधान के अनुसार सनातन शास्त्रों के अनुसार जब तक कोई प्रामाणिक आचार्य किसी को नियुक्त नहीं करेगा, अपना उत्तराधिकारी अपना शिष्यत्व प्रदान नहीं करेगा तब तक उसको सनातन समाज नहीं मानेगा कि वो प्रामाणिक है। मगर इसके कारण तुम अपने सिद्धांत थोड़ी ना बदलोगे। या तो कह दो हम दोगले हैं। गाओ गाना दोगला नंबर वन मैं हूं दोगला नंबर वन गाओ
00:50:51:01 तो क्या है कुल मिलाकर एक तथ्य को तो स्वीकार करना ही होगा कि यदि भागवतानंद उन गुरु उन गुरुजनों के आधार पर स्वयं की प्रामाणिकता को सिद्ध करता भी है तब भी उसे स्वयं को उन गुरुजनों की अमुक अमुक परंपरा से सद्ध स्वीकार ार करना पड़ेगा कि मैं फलाना कोलाचार्य के आपसे दीक्षित हूं। फिर उन्होंने पद दिया है कि नहीं दिया बात की है। तुम्हारा निग्रह संप्रदाय कहां से आ गया भाई? अलग से निग्रह संप्रदाय को तो निग्रह संप्रदाय स्वतंत्र रूप से आपको घोषित करना है ना। और आचार्य की उपाधि आपने स्वयं ही स्वयं को दी है। हम चलो आगे। उस उस स्थिति में भी उसे स्वतंत्र रूप से निग्रचार के रूप में स्वीकार करना तर्कसंगत सिद्ध नहीं होगा। जो भी हो एक बात तो स्पष्ट है कि भागवतानंद के पास वैदिक ज्ञान जहां से भी आया हो निग्रह संप्रदाय से तो नहीं आया। जबकि शास्त्र के कई ऐसे वचन है जिनके आधार पर परंपरा से प्राप्त ज्ञान को ही प्रामाणिक मानना पड़ेगा। वैदिक ज्ञान किससे आया? मां भगवती से आया। वैदिक ज्ञान वेद का तात्पर्य उपनिषद
00:52:06:07 का तात्पर्य बहुत सारे वचन है निरुक्त का एक छ पांच मुंडकोपनिषद एक एक से चार एक दो 12 शतपद ब्राह्मण 11 पांच छ श्रीमद् भगवत गीता तीन 16 चार दो छंदो उपनिषद छ 14 दो और चार नौ तीन यही नहीं भागवतानंद द्वारा निग्रह संप्रदाय की प्रामाणिकता के को सिद्ध करने हेतु बताए गए शक्ति संगम तंत्र शास्त्र में भी परंपरा के ज्ञान को प्रामाणिकता दी गई है। उसी ज्ञान को प्राथमिकता देते हुए मुख्य परंपरा के रूप में शंकर परंपरा को बताया गया है। शंकराचार्य परंपरा का विस्तृत वर्णन दिया गया है। तो निग्रह संप्रदाय के पास स्वतंत्र रूप से श्रुति शास्त्रों का परंपरागत ज्ञान नहीं है। ऐसे में निग्रह संप्रदाय के सिद्धांत को श्रुति समुति का समर्थन प्रदान करने हेतु किसी ना किसी परंपरा द्वारा प्राप्त वेदार्थ के आलंबन से निग्रह संप्रदाय के सिद्धांत की सुति सम्मतता को सत्यापित किया जाना किया जाएगा
00:53:21:13 करना पड़ेगा तो किसी भी अंश में शंकर परंपरा द्वारा दिए जाने वाले सिद्धांतों का अगर किया जाएगा तो कम से कम जिस पर आप निर्भर है वेदार्थ के लिए वेद भाष्य के लिए उपनिषद भाष्य के लिए तो किसी भी अंश में शंकर परंपरा द्वारा दिए जाने वाले सिद्धांतों का विरोध तर्क संगत सिद्ध नहीं होगा। यदि जिससे आप वेद का अर्थ ले रहे हो उसके किसी और सिद्धांत को आप खंडन नहीं कर सकते। मगर आपने तो किया है। आपने तो किया है ना। क्योंकि यदि किसी के द्वारा प्राप्त होने वाले वेद अथवा वेदार्थ पर आपको विश्वास है तो उसी के द्वारा प्रदान किए जाने वाले अन्य किसी भी सिद्धांत पर आपका विश्वास होना सिद्ध नहीं होता है। और यदि
00:54:12:26 किसी आचार अथवा परंपरा अगर परंपरा पर परंपरा के किसी एक अंश पर भी आपको विश्वास नहीं है। हम आपके द्वारा कहा जाता है कि शास्त्रों का गलत अर्थ प्रदान कर रहे हैं तो वह आपको गलत वेद मंत्र अथवा उनकी गलत व्याख्या भी दे सकते हैं। वही आर्य समाजी हो गए ना तुम भी जहां से वेद मिले उसका अर्थ मिला वेद मानेंगे मंत्र मानेंगे उसका अर्थ नहीं मानेंगे फस जाओगे ना भू हम फिर क्या है आगे
00:54:47:10 यदि इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो हमारे ही द्वारा आर्य समाज रामपाल से लेकर डॉक्टर जाकिर नायक जैसे सभी सनातन धर्म के आचार्य सनातन धर्म के आचार्य होने का डंका का पीटेंगे अगर हम अरे भाई परंपरा की आवश्यकता क्या है? अगर परंपरा की बातों को शब्द प्रमाण के रूप में नहीं लेना है तो क्या आवश्यकता है परंपरा की? प्रमाण है परंपरा और तुमने खेल बना दिया है। और अगर तुम्हारी तरह अगर मान ले तो फिर सबको छूट मिल जाएगी। आर्य समाज भी कहेगा मेरा भी वेद भाष्य मान लो। मैंने भी समाधिष्ट होकर के वह प्राप्त किया है वेद का ज्ञान परम सीधे परमेश्वर से वो भी कहेगा जिब्राइल आ गया था वो जाकिर नायक लो डायरेक्ट आ गया मेरे पास परी आ गई मेरे पास
00:55:48:12 हम फिर आगे क्या है यदि भागवतानंद द्वारा किया दिया जाने वाला ज्ञान निग्रह संप्रदाय का ही माना जाए तो बुद्ध अवतार एवं शबरी प्रकरण में भागवतानंद द्वारा दिए गए निर्णय का सांकर संप्रदाय के विरुद्ध होने के कारण भागवतानंद की सांकर संप्रदाय में प्रमाण्य बुद्धि होना सिद्ध नहीं होता। अतः स्वतंत्र रूप से परंपरागत वैदिक ज्ञान प्राप्त ना होने एवं वैदिक ज्ञान के लिए जिस पर आश्रित है उस पर प्रमाण बुद्धि ना रखने की स्थिति में निग्रह संप्रदाय द्वारा शंकर संप्रदाय से प्राप्त वेद अथवा वेदार्थ पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता है। ऐसे में निग्रह संप्रदाय को अवैदिक क्यों ना माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है।
00:56:36:21 यदि यह कहा जाए कि भागवतानंद को शंकर परंपरा का प्रामाणिक ज्ञान उसकी सर्वोच्च पीठ पर विराजमान आचार्य अथवा जगतगुरु शंकराचार्य से भी अधिक है। जिनके निर्णय के विरोध में भागवतानंद ने बुद्ध अवतार और शबरी प्रकरण में अपना निर्णय दे दिया है। तब यह कितनी हास्यप्रद बात होगी भाई। उस संप्रदाय में क्या हुआ है? क्या कहा गया है? क्या नहीं कहा गया है? उस संप्रदाय का प्रामाणिक और वो भी जगतगुरु शंकराचार्य की गद्दी पर बैठने वाला बताएगा तुम होते कौन हो बताने वाले कि पूर्वाचार्य ने क्या कहा था क्या नहीं कहा था प्रश्न कर सकते हो बस समझ में आया तो ठीक है [संगीत]
00:57:22:02 संशय कर सकते हो संशय उत्पन्न हो सकता है पूछ लो मगर पूछेंगे नहीं उसको आरोप के रूप में खंडन किया है शक्ल देखी अपनी खींचे ने पुरवा लो बस खंडन करेंगे कृपात्री जी महाराज का [संगीत] फिर क्या फायदा क्या लाभ है परंपरा का मैं पूछता हूं जब उस परंपरा के प्रामाणिक आचार्य कह रहे हैं कि हमारे पूर्वाचार्यों से हमें यह ज्ञान प्राप्त हुआ है। मगर एक निठल्ला दूसरा व्यक्ति बाहर से आकर के बता रहा है। नहीं नहीं पूर्वाचार्य ने तो ये कहा था तुम होते कौन हो
00:58:07:00 [संगीत] और और यदि तुम हो ही आर्य समाजी रामपाली जाकिर नायक तो ये परंपरा का ढिंढोरा पीटना बंद करो परंपरा को मानने वाला होना भी है। यदि हर कोई एरा गैरा न्थू गहरा आ के किसी परंपरा के क्या सिद्धांत है? क्या उसकी मान्यता है? यदि कोई भी सड़क पर चलता हुआ आकर के विवेचना कर दे उस परंपरा के प्रामाणिक आचार्यों के विरुद्ध और उसको मान लिया जाए तो फिर परंपरा शब्द की आवश्यकता क्या है? ये बता तू मुझे
00:58:43:06 [संगीत] परंतु उस स्थिति में भी यदि ये जब ये कहता है कि भागवतानंद को बुद्ध और शबरी के विषय में जगदगुरु शंकराचार्य जो उसके प्रामाणिक आचार्य होते हैं उनसे भी ज्यादा ज्ञान है। है ना? तो उस स्थिति में भी यह तो मानना ही होगा कि भागवतानंद ने शंकर परंपरा का प्रामाणिक रूप से अध्ययन किया है। तभी तो वह कह रहा है कि नहीं नहीं इनके पूर्व ने यह कहा वो कहा। इसने समझ लिया अच्छे से आकर के तो प्रामाणिक अध्ययन कहां से किया है? शंकर परंपरा से। है ना? ऐसे में भागवतानंद को शंकर परंपरा का शिष्य क्यों ना माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है हम यदि बुद्ध और शबरी के विषय में अन्य वैष्णव परंपराओं में से किसी का आलंबन लिया जाएगा अगर वो यह कहे कि नहीं फलाना वैष्णव संप्रदाय है वो तो यह मानता है वो तो देखो मेरे से मैच खाता है तो इसको उसका शिष्य मानना पड़ेगा तो ऐसे में अमुक संप्रदाय का निर्णय स्वीकार करने की स्थिति में भागवतानंद द्वारा उस परंपरा में प्रमाण्य बुद्धि रखते हुए उसके सभी सिद्धांतों को स्वीकार करना पड़ेगा करेगा करेगा
00:59:57:15 ठेंगा करेगा तू तथा उन सभी सिद्धांतों का त्याग भी करना आवश्यक हो जाएगा जो एक अंश में भी उस अमुक परंपरा के विरोध में होंगे जिस परंपरा द्वारा बुद्ध और शबरी प्रकरण के निर्णय में समर्थन लेकर उस अमुक परंपरा में भागवतानंद की प्रमाण बुद्धि स्थापित मानी गई है। उस स्थिति में भी भागवतानंद को स्वतंत्र रूप से आचार्य ना मानकर उस अमुक परंपरा जिससे आपने बुद्ध और शबरी का समर्थन प्राप्त किया है उसका शिष्य क्यों ना माना जाए। क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। अच्छा एक बात हम पूर्व में ही कह आए हैं कि शक्ति संगम तंत्र शास्त्र में वर्णित निग्रह आगम के वैदिक होने पर भी संदेह है। कोई स्पष्ट है ही नहीं। केवल शब्द है निग्रह आगम क्योंकि अनेकानेक अवैदिक आगमों के बीच वर्णित भी है। यहां से भी एक और वो आता है भाई जहां चीन आगम लिखा है बौद्ध आगम लिखा है वही आसपास निग्रह आगम भी लिखा है। वो ये कह रहा है कि कई ऐसे अवैदिक है जिनका यहां नाम उल्लेख किया जा रहा है। तो निग्रह आगम को केवल शक्ति संगम तंत्र के आधार पर कैसे मान ले वो वैदिक
01:01:12:16 है? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है तो निग्रह आगम का वैदिक होने के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण प्राप्त नहीं होता। ऐसे में निग्रह संप्रदाय के जो कार्य भागवतानंद ने बताए हैं वही कार्य निग्रह संप्रदाय के हैं। यह किस आधार पर माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है भागवतानंद के अनुसार सभी संप्रदायों में किस किसी भी प्रकार से आने वाली विकृति को नष्ट करने हेतु उस अमुक संप्रदाय का निग्रह करना भी निग्रह संप्रदाय के तीन प्रमुख कार्यों में से एक कार्य है। यहां ज्ञातव्य है कि सभी संप्रदायों का भिन्न-भिन्न तात्विक सिद्धांत है। अतः सभी संप्रदायों में उनके यहां का तात्विक सिद्धांत अक्षरश प्रसारित किया जा रहा है या नहीं इस विषय में निर्णय लेने हेतु निग्रह करने वाले को सभी संप्रदायों का तात्विक सिद्धांत प्रामाणिक रूप से ज्ञात होना आवश्यक है ज्ञात होगा ये भागवतानंद को तो सब कुछ ज्ञात होगा बिल्कुल तरीके से विशिष्टा द्वैत द्वैत सुद्धा द्वैत सब उनके यहां का सब पढ़ लिया होगा कहीं कोई गुरु गलत तो नहीं बोल रहा सब पढ़ लिया होगा भैया कोई गुरु गुरु अपने शिक्षाओं में बदलाव तो नहीं कर रहा ब्रिटिशर्स से प्रभाव में आकर के तो निग्रह करना है ना तुझे
01:02:27:18 तो तो तूने पढ़ लिया होगा कि वल्लभाचार्य कब किससे मिले कब नहीं मिले उनकी सारी वस्तुनिष्ठता से तेरे पास जानकारी होगी है ना तो क्या है कि पहली बात तो ऐसा बहुत दुर्गम है परंतु सभी संप्रदाय का प्रमाणिक ज्ञान ना होने की स्थिति में किस व्यक्ति विशेष को सभी संप्रदाय का निग्रह करने वाले के रूप में किस आधार पर स्वीकार किया जाएगा? यदि तुमको सभी संप्रदायों का प्रामाणिक ज्ञान है ही नहीं। उनके अंदर की बहुत सी छोटी बड़ी ऐसी बातें हैं जो आपको पता ही नहीं है। वल्लभ संप्रदाय की नबाग संप्रदाय की बहुत सी छोटी बड़ी ऐसी कहानियां होंगी जो आपको नहीं पता है। तो फिर किस आधार पर तुमको उस पर निग्रह करने वाला मान लिया जाए। इसीलिए जगतगुरु शंकराचार्य ने कहा था निग्रचार भगवान हो सकते हैं केवल भगवान और तुम बनने चले भगवान हम गॉड मैन
01:03:35:06 तो अच्छा यद्यपि ये चीज संभव नहीं है कि सभी संप्रदायों का बिल्कुल एक एक बाल बराबर आपको ज्ञान हो जाए परंतु फिर भी सभी संप्रदायों का ज्ञान प्रामाणिक रूप से होने की स्थिति में भी निग्रह करने वाले की प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा ही रहेगा। क्योंकि सभी संप्रदायों की तात्विक विवेचना दूसरे संप्रदाय की तात्विक विवेचना से भिन्न है। अथवा यदि यह भी मान लिया जाए कि क्योंकि अद्वैत में सभी सिद्धांतों का लय हो जाता है। इसलिए सिद्धांतों को प्रमाणिक मानते हुए सभी सिद्धांतों को प्रमाणिक मानते हुए उनका पर्यावसान अद्वैत में मानना चाहिए। ऐसे में यह जानना आवश्यक होगा कि क्या सभी संप्रदाय अपने सिद्धांत का पर्यावसान अद्वैत में मानते हैं या नहीं। यदि नहीं मानते और ना मानते हुए बल्कि खंडन कर देते हैं। अद्वैत है ही नहीं। यदि नहीं मानते तो उन्हें प्रमाणिक कहने के कारण क्योंकि तुम निग्रह करने वाले हो। यह ध्यान रखना। निग्रह करने वाले हो ना तुम तो तात्विक विवेचना को प्रमाणिक कहना पड़ेगा ना। नहीं तो उसकी विवेचना का खंडन करोगे तो
01:04:52:26 उन्हें प्रमाणिक कहने वाले कहने के कारण उनके ही अनुसार अद्वैत में सबका परवसान बताने वाला स्वयं अप्रामाणिक सिद्ध हो जाएगा। अतः यद्यपि संभव है कि फिर भी लोकाचार की दृष्टि से शास्त्रों की सीमा के बाहर आपसी सामंजस्य के निमित्त किसी पद द्वारा सभी संप्रदायों का निग्रह करने के बारे में सोचा भी जा सकता है। परंतु सभी संप्रदायों में अंश मात्र भी भेद होने की स्थिति में एक ही आचार्य पद द्वारा सभी संप्रदायों का निग्रह किए जाने के जाने को शास्त्रीय समर्थन होने की बात को कपोल कल्पना क्यों ना कहा जाए। एक व्यक्ति जो इनमें से किसी परंपरा का नहीं है। वो यह कह रहा है कि तुम्हारे यहां का सिद्धांत क्या है? क्या नहीं है? यह मैं तय करूंगा। वहां के प्रामाणिक आचार्य नहीं एक व्यक्ति और वह किसको मानने वाला है? अद्वैत को मानने वाला। [संगीत] तो इसको ये शास्त्र सम्मत अथवा अमुक अमुक संप्रदाय सम्मत जो अधिकार है वो प्राप्त हुआ कि नहीं हुआ? अगर वो नहीं दे रहे हैं तो उनसे लड़ना होगा। लड़ रहे हो क्या? क्या वो दे रहे हैं तुम्हें निग्राचार्य
01:06:08:02 का पद? हम पर निग्रह करने वाला है निग्रचार्य। तो इसको कपोल कल्पना क्यों ना माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है क्या भागवतानंद के अनुसार श्री संप्रदाय मद संप्रदाय नार्क संप्रदाय इत्यादि सभी मान्य संप्रदायों ने अव्यक्ता द्वैत के रूप में ब्रह्म की व्याख्या अथवा पंच देवोपासना के रूप में ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती गणेश के एकत्व रूपी स्तुति सम्मत सिद्धांत अर्थात निग्रह संप्रदाय के दार्शनिक पक्ष और दैय पक्ष को स्वीकार कर लिया अथवा नहीं नहीं किया है। यदि नहीं किया है तो निग्रह संप्रदाय द्वारा बताए गए श्रुति के अर्थ को वैदिक तात्पर्य श्रुति के अर्थ को वैदिक तात्पर्य को स्वीकार ना करने वालों का निग्रह ना करने की स्थिति में भागवतानंद को उसके द्वारा बताए गए निग्रह संप्रदाय के स्वरूप के अनुसार निग्रहचार निग्रह संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य क्यों माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है भागवतानंद के अनुसार निग्रह संप्रदाय का कार्य अन्य सभी संप्रदायों पर निग्रह करना है। जिसके अंतर्गत निग्रचार्य पद पर बैठे होने के कारण भागवतानंद को
01:07:24:19 सभी संप्रदायों का निग्रह करने हेतु भगवती द्वारा नियुक्त किया गया है। क्या भाग भागवतानंद द्वारा स्वीकार्य अन्य सभी प्रामाणिक श्रीमद् इत्यादि संप्रदायों ने भागवतानंद द्वारा उनके संप्रदाय का निग्रह किए जाने की प्रति अधीनता को स्वीकार कर लिया जो बात अभी मैंने पिछले उदाहरण के लिए ली है। कर लिया है। क्या राघवाचार्य जी महाराज मानते हैं कि आप हमारा निग्रह करेंगे। हम जो धर्म ब्रह्म की व्याख्या बता रहे होंगे उसमें यदि तुम आते हो हमसे विपरीत होगे तो हम तुम्हारी मान लेंगे। यह मानते हैं राघवाचार्य जी
01:08:02:24 कर ली तुम्हारी अधीनता स्वीकार मध संप्रदाय ने यूवाचार्य [संगीत] तो अधीनता को स्वीकार कर लिया है यदि नहीं तो ऐसे में स्वयं को वैदिक कहने वाले निग्रह संप्रदाय द्वारा किए जाने वाले निग्रह को स्वीकार ना करते हुए अवैदिक सिद्ध होने वाले संप्र संप्रदायों का निग्रह करने की स्थिति में भी निग्रह ना करने की स्थिति में भी भागवतानंद को निग्रह संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य कैसे माना जाए? उसके द्वारा जो कार्य बताया गया वही वो नहीं कर रहा है तो वो आचार्य कैसे हुआ? उसके द्वारा कहा गया है ना कि मैं सबका निग्रह करूंगा क्योंकि मैं निग्रह आचार्य हूं। और उसके अनुसार वेद का तात्पर्य अद्वैत ये दोनों चीजें सभी संप्रदायों ने मान ली है क्या? नहीं मानी है और नहीं मानी है तो वह शास्त्रार्थ करें। शास्त्रार्थ नहीं हो रहा है तो फिर वह शस्त्र का युद्ध करें और अगर नहीं कर रहा है तो ऐसे में निग्रचार को और अगर नहीं कर रहा है तो ऐसे में भागवतानंद को निग्राचार्य क्यों माना जाए क्योंकि भागवतानंद ने कहा है
01:09:18:09 किसी मनुष्य द्वारा धारण किए जाने वाले पद के रूप में निग्रचार नामक कोई उपाधि अथवा आचार्य पीठ सनातन शास्त्रों में नहीं दी गई है। इस बात की पुष्टि सनातन धर्म के सर्वमान्य सर्वोच्च सुन ले सर्वमान्य सर्वोच्च सार्वभौम विशेषण लगाने पड़ेंगे। जब जब तुम्हारे जैसी गंदगी समाज में व्याप्त होने लगी तबतब जब जब देसी घी के नाम पर घी के नाम पर डालडा आलू से बनने वाले वनस्पति घी को बेचा जाने लगेगा तबतब विशेषण लगाने पड़ेंगे शुद्ध देसी घी समझे
01:09:55:20 केवल धर्म ही पर्याप्त शब्द है धारण करने वाले के रूप में मगर विशेषण लगाने पड़ते हैं सनातन वैदिक आर्य हिंदू [संगीत] मूर्ख तो क्या है जगतगुरु शंकराचार्य जी ने और न्यायालय के दृष्टिकोण से ये बात लिखी हुई है इसमें जिनका परामर्श सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मांगा जाता है तट पूंजियों का नहीं आई रिपीट तट पुंजियों का नहीं समझे निगचार्य निगचार्य
01:10:39:22 तो शंकर परंपरा के 145 वे श्रीमद जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर जिनका परामर्श सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी मांगा जाता है। उन्होंने पुष्टि की है। निग्राचार्य नामक कोई उपाधि नहीं है। शास्त्रों में मनुष्य द्वारा धारण किए जाने योग्य। केवल भगवान अवतरित हो सकते हैं। ब्रह्म अवतरित हो सकते हैं। और अगर तू कल को यह कहने लगे कि मैं ब्रह्म हूं तो बहुत पोस्टमार्टम किया जाएगा कि क्यों नहीं कर रहा वो हत्या बंद ब्रह्म है तो तू ईश्वर है तो तू ऐसे ही करता है ना हंसी उड़ाता है ना 83 वर्ष की आयु में भारत भ्रमण की यात्रा करने वाले एक वृद्ध सन्यासी की उपास उड़ाता है
01:11:36:16 तो सनातन धर्म के ऐसे अंतिम निर्णायक पद पर विराजमान जगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर जी महाराज ने स्पष्ट कहा है कि निग्रचार केवल स्वयं ईश्वर ही हो सकते हैं। अर्थात कोई भी मनुष्य निग्रचार नामक उपाधि के योग्य नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि यदि वह निग्रह जैसे कि तू बता रहा है कि निग्रह करेगा पूरे पे तो सब लोगों को तेरा निग्रह स्वीकार होना चाहिए। नहीं होने की स्थिति में तुझे उनसे शास्त्रार्थ या फिर शस्त्र युद्ध लड़ना पड़ेगा। शास्त्रार्थ तो थोड़ा बहुत तू कर लेगा। यद्यपि प्रत्येक परंपरा में तार्किक व्यक्ति विराजमान है। मगर जब तक वो सामने नहीं आएगा तब तक तू नौ मन उछल लेगा। चाचा चाचा चाचा कर लेगा। मगर शस्त्र युद्ध लड़ेगा तू। धातु बचा है तेरे शरीर में 50 किलो के व्यक्ति
01:12:27:25 युद्ध लड़ेंगे शस्त्र से मिल जा कहीं पे कर ले दो दो हाथ कर लेते हैं तेरे भगवती से प्राप्त तपोबल की वो पुष्टि कि वो भगवती से प्राप्त है कि वो परी साधना से प्राप्त है कर लेते हैं मिल ले कहीं पर नहीं मिलेगा भागता फिरेगा YouTube ट्यूबराचार्य बनेगा। क्या करेगा? क्या कहता है? मैं आ रहा हूं। इनकी पोस्टमार्टम करूंगा। क्या मैं अभी बताता हूं मेरे पास समय नहीं है। अबे समय नहीं है तो समय होने पर तू ये करेगा? वीडियो बनाएगा। अबे उतर धरती पर। जाके पुरुषार्थ कर। हां मैं छाती ठोक के कह सकता हूं। मैंने पुरुषार्थ किया है धर्म के लिए। तू कह छाती ठोक के। नहीं कहा जाएगा। शर्म से आंखें नीची हो जाएंगी। यूबर आचार्य केवल YouTube पर बोलने को यह कहते हैं पोस्टमार्टम धर्म रक्षा कर पुरुषार्थ।
01:13:32:02 और तू तो ये कह रहा है ना कि मेरा कार्य है शस्त्र से युद्ध लड़ना। नहीं मानता तेरी व्याख्या को। बता कब कर रहा है शस्त्र से युद्ध? लिख के दे दूंगा अपनी। विल बना दूंगा विल। भैया मुझे कुछ भी हो जाए इसके साथ मल युद्ध करते समय शस्त्र युद्ध करते समय तो इस पर कोई वो नहीं आएगा मैं अपनी ओर से ये लिख के दे दूंगा आजा कर ले 50 किलो का वजन नहीं है हाड़ मास में चले हैं शस्त्र युद्ध करने कपोल कल्पित कहानियां अगड़ के जनता को बेवकूफ बनाएंगे पटक दूंगा उठाउ उठा के अगर मल्य युद्ध हुआ कभी तो उठा उठा उठा के पटकूंगा तान दूंगा तुझको मैं हवा में कितनी बार कहा है कि अपना वो सांप लेके आजा जो लगा के फिरता है साथ में सर्पदंड वो सांप लेके आजा मैं बिना उसके आऊंगा बिना हाथ में कुछ धारण किए आऊंगा तू अपना सांप ले आजा कर लेना शस्त्र से युद्ध [संगीत] यदि कभी ऐसा
01:14:47:13 ऐसी प्रतियोगिता हुई ना तेरे साथ तो उठा के पटक दूंगा तुझे तान के पटक दूंगा। क्या है तेरे अंदर? धातु नाम की मात्रा है क्या थोड़ी बहुत? चले हैं शस्त्र से युद्ध करने। 32 ही देख लो इनकी। शस्त्र से युद्ध करेंगे। यह धर्म की रक्षा के लिए। YouTube से बाहर कभी निकल ना पाए। पोस्टमार्टम करते हैं मान्य आचार्य जनों का। हैं? प्रतिष्ठित लोगों का पोस्टमार्टम करते हैं। तूतक करते हैं। गोवर्धन मठ के भावी शंकराचार्य के रूप में जिसको प्रोजेक्ट किया जा रहा है ना दिव्य चेतन ब्रह्मचारी का भी नाम इसमें है। अरे लतखोरों मैं सतर्क करता हूं तुम लोगों को। ये जो दंभ पाले हो ना कुशासन के गुलाम बने हुए हो अन्नदोष के चक्कर में इससे बाहर निकलो। मैं यात्रा पूर्ण होते ही तुम लोगों का पोस्टमार्टम करूंगा। यह जो तुम लोग लथोरी दिखा रहे हो धर्म शास्त्रों का प्रवचन कर रहे हो यह सारे ब्रह्म राक्षसों की वृत्ति का मैं पर्दाफाश करूंगा यह करेंगे धर्म रक्षा समय मिलने दो मैं वापस आके वीडियो बनाऊंगा
01:15:52:14 बना वीडियो यही है तेरा पुरुषार्थ वरना नहीं मानता तेरे सिद्धांतों को आजा कर ले शस्त्र से युद्ध तो जब शंकराचार्य जगतगुरु शंकराचार्य जिनका आलंबन समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा भी लिया जाता है। जब जगतगुरु शंकराचार्य ने कह दिया कि कोई भी मनुष्य निग्रचार पद के योग्य नहीं है। निग्रचार ऐसा पद नहीं है जिस पर कोई मनुष्य विराजमान हो सके क्योंकि विप्लव हो जाएगा। चीजें आपस में सामंजस्य बैठेगा ही नहीं क्योंकि तुमको सभी संप्रदायों का निग्रह करना है। है ना कंट्रोल करना है उन्हें नियंत्रण तो जब ऐसे में यह यह क्यों ना माना जाए कि शास्त्र में बताए गए सभी आगमों की आचार परंपरा हो यह आवश्यक नहीं है आगम शास्त्रों के बारे में बता दिया गया निग्रह आगम जरूरी नहीं कि वहां किसी परंपरा को बताया गया शक्ति संगम तंत्र में तो यह क्यों ना माना जाए कि जिस प्रकार शास्त्र में बताए गए सभी
01:17:07:18 आगमों की आचार परंपरा हो या आवश्यक नहीं उसी प्रकार निग्रह आगम की भी कोई आचार परंपरा नहीं है। वो निग्रह आगम मात्र हैं। मगर वो कोई अपने आप में संप्रदाय कोई परंपरा इत्यादि नहीं है। यह क्यों ना माना जाए? जहां एक और आचार अथवा परंपराओं के विषय में बताते समय स्पष्ट रूप से संप्रदाय अथवा परंपरा जैसे शब्दों का उपयोग किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर निग्रह आगम जैसे अति महत्वपूर्ण संप्रदाय के लिए परंपरा अथवा संप्रदाय इत्यादि शब्दों का कोई उपयोग नहीं किया गया है। ज्ञातव्य है कि निग्रह शब्द का उल्लेख स्कंद पुराण सहित कई अन्य शास्त्रों में कई स्थानों पर प्राप्त होता है। ऐसे में बिना किसी आधार के कपोल कल्पित कहानी करते हुए उन सभी प्रमाण स्थलों का उपयोग भागवतानंद द्वारा परिभाषित निग्रह संप्रदाय को प्रामाणिक सिद्ध करने हेतु किया जाना कहां तक उचित है? फिर भले ही वहां पर निग्रह शब्द का प्रयोग किसी दूसरे की प्रसंग में किसी दूसरे प्रसंग में किसी देवता के लिए हो रहा हो। किसी देवी के लिए हो रहा हो। परंतु उसको जो है निग्रह शब्द आ गया। बस देखो मैं निग्रह निग्रह संप्रदाय बोल रहा हूं ना और देखो निग्रह शब्द उसमें यह सोचना भूल ही गए कि शास्त्र
01:18:22:21 में निग्रह शब्द का क्या स्वरूप दिया गया है किस बाबत दिया गया है यह सोचना भूल ही गए दुर्जनोष न्याय से अगर वो संप्रदाय भी है तो तू उससे कनेक्ट हो गया ये कैसे मान ले ऐसे में यह क्यों ना माना जाए कि शक्ति संगम तंत्र शास्त्र में बताए गए इन आगमों के द्वारा किसी आचार परंपरा अथवा संप्रदाय को संबोधित नहीं किया बल्कि आगमों के इन नामों द्वारा केवल अमुक अमुक आगम शास्त्रों का संबोधन मात्र किया गया है। जिनकी वैदिकता भी अभी सुनिश्चित नहीं है। तो ये क्यों ना माना जाए? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। है ना?
01:19:05:23 [संगीत]
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निग्रह परंपरा का अस्तित्व एवं भागवतानंद की नियुक्ति The Nigrah Nikasika Chapter 3
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